1
00:00:01,960 --> 00:00:06,160
[संगीत][घंटी की आवाज़] तो अभी हम ब्रह्मा कुमारीज में क्या

2
00:00:06,160 --> 00:00:10,160
कर रहे हैं और हमें मतलब जैसे हमें पता चल गया कि आत्मा का

3
00:00:10,160 --> 00:00:14,480
ज्ञान ये है। ज्ञान पता चल गया कि हम आत्मा है आत्मस्वरूप है।

4
00:00:14,480 --> 00:00:18,880
फिर हम ब्रह्मा कुमारीज में क्या प्रैक्टिसिंग करते हैं और उस प्रैक्टिसिंग

5
00:00:18,880 --> 00:00:23,120
से हमें मिलना क्या है? फाइनल गोल क्या है हमारा? फाइनल जो लक्ष्य है मैंने पहले

6
00:00:23,120 --> 00:00:27,120
ही बताया। मनुष्य से देवता बनाने की पढ़ाई परमात्मा पढ़ाने के

7
00:00:27,120 --> 00:00:31,280
लिए आया है। ये इससे हमारा दुनिया के भी

8
00:00:31,280 --> 00:00:35,520
मतलब हम देवता बनते हैं। देवता बना पढ़ाई पढ़ा रहा। अब अगर

9
00:00:35,520 --> 00:00:39,680
आप पढ़ेंगे तो ही बनेंगे। नहीं पढ़ेंगे। जितना पढ़ेंगे

10
00:00:39,680 --> 00:00:43,760
देवताओं की भी कैटेगरी होती है। शनि का अपना काम, इंद्र

11
00:00:43,760 --> 00:00:47,760
का अपना काम है। विष्णु का अपना उसकी कैटेगरी ऊंची है। विष्णु जी की

12
00:00:47,760 --> 00:00:51,760
कैटेगरी ऊंची है। ब्रह्मा जी की ऊंची है। शंकर जी की ऊंची है। और उसे

13
00:00:51,760 --> 00:00:55,920
भी थोड़ा कैटेगरी स्तर कम होता है। जो जैसा

14
00:00:55,920 --> 00:00:59,920
यहां अध्ययन करता पढ़ाई करता है आत्मा के बारे में परमात्मा के बारे में।

15
00:00:59,920 --> 00:01:04,080
वो उसी तरह की कैटेगरी वाले देवत्व में पहुंचता है। उसी तरीके से उसकी पूजा

16
00:01:04,080 --> 00:01:08,080
भी भक्ति में होती थी। अच्छा उसके बाद देवता बनने के बाद भी कोई गोल आ गया?

17
00:01:08,080 --> 00:01:12,160
भैया जैसे हम डीएम बन जाए तो फिर मुझे नहीं लगता कि डीएम पद

18
00:01:12,160 --> 00:01:16,480
पाने के बाद कोई दूसरा कोई और मतलब फाइनल गोल यही है कि देवत्व को प्राप्त

19
00:01:16,480 --> 00:01:17,520
करना है।

20
00:01:17,520 --> 00:01:21,760
मैंने कहा ना इस पढ़ाई से मनुष्य देव पद को प्राप्त करता।

21
00:01:21,760 --> 00:01:26,000
अगर पढ़ता है सही तरीके से तो जो भगवान के नियम के अनुसार

22
00:01:26,000 --> 00:01:30,880
चलता है तो अन्यथा नहीं। फिर वो कोई भी हो

23
00:01:30,880 --> 00:01:35,360
तो जो मोक्ष का कांसेप्ट है वो अधूरा नहीं लगता आपको

24
00:01:35,360 --> 00:01:39,360
मुझे नहीं लगता है इसलिए क्योंकि जैसे आपने कहा ना डीएम

25
00:01:39,360 --> 00:01:43,520
डीएम वाली बात जैसे आपने कही वो एक अलग बात है वो लक्ष्य की आपसे कही थी

26
00:01:43,520 --> 00:01:47,840
लक्ष्य और लक्ष्य में फर्क है जी जी मोक्ष क्या है मोक्ष जैसे

27
00:01:47,840 --> 00:01:52,000
आवागमन से हमारा छुटकारा होना तो देवता जब बन जाएंगे

28
00:01:52,000 --> 00:01:56,160
तो उसके बाद आवागमन नहीं होना हां होना वही तो मैं बता रही हूं मोक्ष कभी किसी

29
00:01:56,160 --> 00:02:00,320
प्राणी को नहीं मिलता क्यों कई बता मोक्ष ऐसा क्यों कहा गया? जैसे

30
00:02:00,320 --> 00:02:04,400
कई बार होता है ना कि आप मोक्ष कभी किसी प्राणी को नहीं मिलता है।

31
00:02:04,400 --> 00:02:08,960
हम मैं बताती हूं कैसे बेहतर होता है बस। हां हां मैं बताती हूं जीवन

32
00:02:08,960 --> 00:02:13,040
एक तरीके से छुटकारा कभी जैसे मान लीजिए हमारी आपकी कोई लड़ाई हुई

33
00:02:13,040 --> 00:02:17,040
तो हम परेशान होके क्या बोलते आपसे मोक्ष छुटकारा मिल जाए।

34
00:02:17,040 --> 00:02:21,040
भगवान मुझे इस धरती पे नहीं भेजना प्रभु। क्यों? क्यों परेशान हो

35
00:02:21,040 --> 00:02:25,040
के ऐसे शब्द अगर किसी का बहुत प्रेम है अच्छा है अच्छा

36
00:02:25,040 --> 00:02:29,040
व्यवहार है तो शायद उसके मुंह से कभी निकले कि ना प्रभु धरती पर

37
00:02:29,040 --> 00:02:32,720
भेजना आदमी को चाहे नफरत व

38
00:02:32,720 --> 00:02:36,720
जिससे जिसका अच्छा अथवा बुरा हिसाब है उसे

39
00:02:36,720 --> 00:02:41,120
चुक्त करने के लिए इस धरती पर आना ही पड़ता है

40
00:02:41,120 --> 00:02:45,200
वो मोक्ष का सवाल नहीं उठता अगर आपने किया है तो भी

41
00:02:45,200 --> 00:02:49,280
उसे आप चुने के लिए आए उसकी प्रालब्ध आपको भोगने के लिए आना

42
00:02:49,280 --> 00:02:53,280
ही पड़ता नहीं ऐसा इसमें एक क्वेश्चन बनता है हां जी

43
00:02:53,280 --> 00:02:57,360
कि अ जैसे आपने कहा कि

44
00:02:57,360 --> 00:03:01,360
उसको किसी व्यवहार के साथ चुकता करना है तो उसको आना पड़ता है वो

45
00:03:01,360 --> 00:03:05,440
एक अलग बात है कि जब तक हमारे को कोई दुख देने वाला मौजूद है अगर

46
00:03:05,440 --> 00:03:10,000
दुख देने वाला ही नहीं होगा तो हमें क्यों ऐसा लगेगा कि हम यहां से जाएं मगर

47
00:03:10,000 --> 00:03:14,000
अगर अगर हम किसी से हमारी बैरभाव

48
00:03:14,000 --> 00:03:18,560
है भी नहीं फिर भी हमारी अपनी बॉडी की कई ऐसी चीजें हैं जिनके कारण

49
00:03:18,560 --> 00:03:22,800
हम लोग कई कई बार ऐसा फील कर जाते हैं कि भाई हमें जो है यहां से बेहतर कहीं

50
00:03:22,800 --> 00:03:26,960
पर पहुंचना चाहिए। जैसे कि जैसे कि भूख लगना, समय

51
00:03:26,960 --> 00:03:30,960
पर भोजन नहीं मिल रहा है। मान लीजिए नदी है, नदी नहीं मिल

52
00:03:30,960 --> 00:03:35,440
रही है हमें। पानी नहीं मिल रहा है पीने के लिए या फिर वो जो बूढ़ापन

53
00:03:35,440 --> 00:03:39,520
आता है, वृद्धावस्था आती है, चल नहीं पा रहे हैं। उठा ले भगवान उठा ले। ये कहते हैं।

54
00:03:39,520 --> 00:03:43,680
वहां पे हमारा कोई दुश्मन नहीं है। हम स्वतः अपनी स्थिति में वो स्थित हो रहे हैं।

55
00:03:43,680 --> 00:03:47,840
तो हम चाहते हैं कि हम ये जो त्रिविध

56
00:03:47,840 --> 00:03:51,920
ताप है दैहिक, दैविक, भौतिक इन तापों से हमारी मुक्ति हो।

57
00:03:51,920 --> 00:03:56,080
जी। परंतु जैसे आपने कहा कि हम देवता ही बन रहे हैं और देवता के बाद

58
00:03:56,080 --> 00:04:00,160
आगे कुछ नहीं। देवता बनके रह जाएंगे। अब फिर से ये चक्र चलेगा। तो

59
00:04:00,160 --> 00:04:04,160
यानी कि देव मैं बता किस स्टार्ट कर देखिए क्या होता है

60
00:04:04,160 --> 00:04:08,320
जैसे हम कभी-कभी क्या घर में कई बार बहुत परेशान हो जाते तो कहते

61
00:04:08,320 --> 00:04:12,320
बस हो गया। अब इससे बात नहीं करनी। मतलब नहीं। फिर जब उसे सिर्फ

62
00:04:12,320 --> 00:04:16,320
सुख मिलता या किसी से थोड़ा समय में रिस्पेक्ट भी कोई कह दे देता।

63
00:04:16,320 --> 00:04:20,400
फिर हम भूल जाते। रहने दो कोई बात नहीं है। अभी अच्छा है हमें

64
00:04:20,400 --> 00:04:24,480
जीना है इसके साथ। जब स्वयं से बहुत ज्यादा त्रस्त हो जाते तब भी व्यक्ति

65
00:04:24,480 --> 00:04:28,640
कहता है कि मोक्ष दे परमात्मा लेकिन उस समय तक एक ही जीवन तक

66
00:04:28,640 --> 00:04:32,640
ऐसा होता है लेकिन उससे बेहतर एक हमको जब जीवन मिलता है तब हम

67
00:04:32,640 --> 00:04:37,040
ये भूल जाते हैं। अगर हमें याद रहे तो हम बार-बार वही रिपीट करें।

68
00:04:37,040 --> 00:04:41,280
यह एक और भी प्रकृति किसी हमें प्रदत्त एक चीज है भूल

69
00:04:41,280 --> 00:04:45,520
जाने की। एक चीज में तंग होके हम भविष्य का निर्माण कर पाना

70
00:04:45,520 --> 00:04:49,680
सोच पाना यह बहुत मुश्किल क्योंकि कुछ चीजें अनचाही हमारे जीवन

71
00:04:49,680 --> 00:04:53,680
में होंगी और कुछ चीजें मनचाही प्रभु कुछ और चाहता

72
00:04:53,680 --> 00:04:57,840
है और हम आप कुछ और हम चाहते मोक्ष मिल जाए लेकिन हमारे

73
00:04:57,840 --> 00:05:02,240
कर्मों का जो हिसाब है वो हमें वापस आना ही पड़ता चुक्त

74
00:05:02,240 --> 00:05:03,200
करने

75
00:05:03,200 --> 00:05:07,280
के लिए धरती पर आना पड़ता दूसरे जन्म में हम भूल गए बात खत्म हो

76
00:05:07,280 --> 00:05:12,320
गई जा करके फिर एक नया अच्छा जन्म मिला तो यानी कि एक तरीके से हम

77
00:05:12,320 --> 00:05:16,320
ऐसा नहीं लग रहा कि हम स्पिरिचुअल लाइफ जी के हमें बेवकूफ बेवकूफ बनाया जा

78
00:05:16,320 --> 00:05:20,560
रहा है कि हम भूल गए अपनी चीजों को। नहीं नहीं बिल्कुल नहीं। क्योंकि आप किसी

79
00:05:20,560 --> 00:05:24,800
के जीवन से किसी के शब्दों में चेहरे पे ना जाकर के उसके

80
00:05:24,800 --> 00:05:28,800
व्यवहारिक जीवन को नहीं नहीं जैसे आपने कहा ना कि वो दूसरे जन्म में आप

81
00:05:28,800 --> 00:05:33,200
ये भूल जाएंगे कि आप मोक्ष लेकर आए हैं। अच्छा बात बताइए। तो आपका मोक्ष जी

82
00:05:33,200 --> 00:05:37,360
जैसे मान लीजिए आपकी किसी से दुश्मनी है। ठीक? और आपको अगला

83
00:05:37,360 --> 00:05:41,360
जन्म याद हो जाए कि फलाने भेजे एक करोड़ नहीं दुश्मनी नहीं फॉर

84
00:05:41,360 --> 00:05:45,600
एग्जांपल और आपको याद आ जाए उस जन्म में भी तो आप क्या करोगे?

85
00:05:45,600 --> 00:05:49,680
आप उस जीवन को जी नहीं पाओगे जो आपको मिला है जिस घर में

86
00:05:49,680 --> 00:05:53,760
आपको वो जीवन याद रहेगा कि उसने मुझे कष्ट दिया था। अब

87
00:05:53,760 --> 00:05:57,760
मुझे उससे बदला लेना है। मैं वो नहीं कह रहा हूं। इसलिए भूलना जरूरी होता है। मैं वो नहीं कह रहा हूं

88
00:05:57,760 --> 00:06:02,000
भूलना। मैं यह कह रहा हूं जैसे कि अपने शरीर की अवस्था

89
00:06:02,000 --> 00:06:06,240
ऐसी होती है जिसमें हमको जरूरतें पड़ती हैं और वो जब जरूरत जैसे

90
00:06:06,240 --> 00:06:10,320
हम कहते हैं कि हम जब हम किसी को स्पिरिचुअल मार्ग पे लाते

91
00:06:10,320 --> 00:06:14,800
हैं तो हम ये हमारा एक क्लेम होता है होना चाहिए जितनी भी आध्यात्मिक संस्थाएं

92
00:06:14,800 --> 00:06:18,320
हैं कि भाई हम आपको जो आपको दुख हो रहे हैं उससे हम

93
00:06:18,320 --> 00:06:22,320
मुक्ति दिलाएंगे हम जो आपको अभी दुख हो रहे हैं तो उसमें अभी

94
00:06:22,320 --> 00:06:26,800
ये आता है कि जैसे भाई आप ऐसा कौन सा सुख देने वाले हैं जो कि हमें

95
00:06:26,800 --> 00:06:30,800
यहां नहीं मिल रहा है मूवी देखने में नहीं मिल रहा है या मिठाई खाने में नहीं

96
00:06:30,800 --> 00:06:34,800
मिल रहा है। भोजन खाने करने में नहीं मिल रहा है। तो हम ऐसा सुख आपको देने वाले

97
00:06:34,800 --> 00:06:38,880
हैं जो शाश्वत हो जिसमें ब्रेक ना आए। जी जिसमें कि बीच

98
00:06:38,880 --> 00:06:42,960
में बाधा ना उत्पन्न हो वो लगातार आप जो है स्थित प्रज्ञ हो जाए।

99
00:06:42,960 --> 00:06:47,040
आत्म स्थित हो जाए। आत्मस्वरूप हो जाए। तो ये

100
00:06:47,040 --> 00:06:51,120
हम कहेंगे अच्छा अगर हम ये कहें कि ये जो सुख तुम्हें मिल रहा है इससे

101
00:06:51,120 --> 00:06:55,200
बेहतर सुख होगा मगर ब्रेक तो उसमें भी आएगी। जी है ना? अनंत सुख

102
00:06:55,200 --> 00:06:59,440
नहीं होगा। वहां शाश्वतता नहीं होगी। तो फिर वो कहेगा भाई ठीक है फिर मैं अपना

103
00:06:59,440 --> 00:07:03,440
जो प्रैक्टिकल कर रहा हूं उसमें ही ठीक हूं खुश हूं फिर हम जब उसको वो दे

104
00:07:03,440 --> 00:07:07,520
नहीं रहे दूसरी बात ये है कि जैसे हमने कहा कि दूसरा

105
00:07:07,520 --> 00:07:11,600
दूसरा जन्म मिलता है वहां पर भी मोक्ष मिलता है मतलब मोक्ष नहीं मतलब वो देवत्व की

106
00:07:11,600 --> 00:07:15,840
प्राप्ति होती है तो कहने का मतलब है इन शॉर्ट कि ब्रह्मा कुमारीज

107
00:07:15,840 --> 00:07:20,000
के अनुसार मोक्ष नहीं है जी देवत्व की प्राप्ति

108
00:07:20,000 --> 00:07:24,080
है और देवत्व की प्राप्ति होने के बाद आप यह भूलते हुए कि आप

109
00:07:24,080 --> 00:07:28,160
यह जीवन पहले काट चुके हैं दोबारा वही जीवन आपको जीना है। देवत्व

110
00:07:28,160 --> 00:07:32,320
की प्राप्ति के बाद नहीं जीवन बेहतर जीना है। जीवन जीना नहीं

111
00:07:32,320 --> 00:07:33,440
देवत्व से पतित होना

112
00:07:33,440 --> 00:07:37,520
है ना दोबारा। नहीं पतित साइकिल चलेगी ना बहुत समय बाद

113
00:07:37,520 --> 00:07:41,760
जब हमें विस्मृति हो जाती है। जब अजंता लोहरा वगैरह में गुफाओं

114
00:07:41,760 --> 00:07:45,760
में ऐसी चीजें आती तो विकृति आती मन के अंदर होती है। तब हमारा

115
00:07:45,760 --> 00:07:49,920
तो लास्ट तक बहुत अच्छा जन्म होता। द्वापर के अंत तक हमारा

116
00:07:49,920 --> 00:07:54,000
बहुत देवत्व बना रहता। मतलब एक मतलब एक बड़े टाइम की अब कोई नहीं

117
00:07:54,000 --> 00:07:58,080
16 कला फिर आठ कला कम हो जाते हैं ना जैसे आप बचपन जैसे

118
00:07:58,080 --> 00:08:02,320
जेल में पेरोल मिलता है ना आप 8 दिन के लिए घुमाओ जाके

119
00:08:02,320 --> 00:08:06,400
ऐसा तो मैं नहीं कहूंगी पेल जैसी शब्द तो नहीं कहूंगी लेकिन

120
00:08:06,400 --> 00:08:10,560
हां लास्ट में मुझे लगता है आप शायद सुना

121
00:08:10,560 --> 00:08:14,640
होगा अपने बड़ों से अभी तक 100 साल के अंदर जितनी गिरावट हुई

122
00:08:14,640 --> 00:08:18,640
नैतिक पतन हुआ है चारित्रिक पतन हुआ हमारी सोच नीचे आई है

123
00:08:18,640 --> 00:08:22,800
उतनी तो पहले भी नहीं थी नहीं थी तो कहां गिरा था मनुष्य

124
00:08:22,800 --> 00:08:26,880
कुल मिला के एक चीज समझ ले कि यह जो आवागमन है इससे हमारा

125
00:08:26,880 --> 00:08:30,960
छुटकारा नहीं है। अगर एक जैसे मान लीजिए किसी चीज का नहीं नहीं वो ठीक

126
00:08:30,960 --> 00:08:35,200
है मैं आपकी बात मान गया भाई बी के जो ब्रह्माकुमारी है उसकी विचारधारा यह है

127
00:08:35,200 --> 00:08:39,440
कि जो ये आवागमन है इससे मुक्ति नहीं है हां इससे बेटर

128
00:08:39,440 --> 00:08:43,600
में आप जाओगे मुक्ति नहीं जीवन मुक्ति मिलेगी एक अच्छा जीवन मिलेगा जैसे

129
00:08:43,600 --> 00:08:47,840
अभी आपने कहा था ना बीच में अपने से इंसान परेशान हो जाता है तो मोक्ष

130
00:08:47,840 --> 00:08:48,800
तो वहां अपना

131
00:08:48,800 --> 00:08:52,960
जीवन बहुत ही बेहतर जीवन होगा जिसको जीने के लिए मन करेगा

132
00:08:52,960 --> 00:08:57,360
कि मैं इस जीवन को जीू। बेहतर बेहतर जीवन में देखिए

133
00:08:57,360 --> 00:09:01,360
कोई रोग नहीं होगा मैं वही मैं मैं आपको कह रहा हूं। पहली बात तो यह है कि

134
00:09:01,360 --> 00:09:05,440
वो बेहतर जीवन भी शाश्वत नहीं होगा। नहीं उसमें भी एक ना एक दिन हम गिरावट आनी

135
00:09:05,440 --> 00:09:09,680
है। अपना जीवन छ साल के थे। अभी आप जो भी हो गए तो सबका

136
00:09:09,680 --> 00:09:13,760
मतलब वो मुक्ति नहीं होनी है। जो यहीं जैसा रहना है। आगे बस ये लंबे

137
00:09:13,760 --> 00:09:17,840
समय के लिए अच्छा जीवन मिल जाएगा। मुक्ति नहीं मिलेगी। [नाक से की जाने वाली आवाज़] अब उसमें एक चीज

138
00:09:17,840 --> 00:09:22,080
यह भी है कि जब तक हम किसी देश काल परिस्थिति

139
00:09:22,080 --> 00:09:26,160
पर निर्भर हैं तब तक हम अपने आप को पूर्ण

140
00:09:26,160 --> 00:09:30,320
रूप से सुखी नहीं मान पाते। जैसे कि अगर मैं पानी पर निर्भर हूं। मुझे प्यास

141
00:09:30,320 --> 00:09:34,960
लग रही है तो मैं कभी-कभी सोचता हूं मुझे उठा के ना लाना पड़े। ये भी सोचता हूं।

142
00:09:34,960 --> 00:09:39,040
और भोजन के लिए मुझे पकाना ना पड़े, कुक ना करना

143
00:09:39,040 --> 00:09:43,040
पड़े। जी। और मुझे बढ़िया स्वादिष्ट भोजन भी मिल जाए। या फिर इसके

144
00:09:43,040 --> 00:09:47,040
अलावा और भी आप समझ रही होंगी कि काफी काम वासना इत्यादि ये सब इच्छाएं

145
00:09:47,040 --> 00:09:51,200
भी होती हैं। तो ये सारी चीजें जो होती हैं जब तक हम

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अपने से किसी द्वैत भाव पे निर्भर रहते हैं। द्वैत मतलब किसी देश

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काल परिस्थिति पे हमारी सुख की निर्भरता जब तक होगी तब तक हम

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पूर्ण रूप से सुखी नहीं हो सकते। जैसे किसी क्रिया की ही जरूरत हो गई। क्रिया

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मतलब

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कि किसी के मतलब रमण करना ये सब इस इसमें ही हमारी जरूरत हो गई। या

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फिर हमारी भोजन पे आवश्यक भोजन पे हम निर्भर हो गए। ये भी हम किसी

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सामग्री पर निर्भर है कि वो वहां रखी मुझे उठा के लानी है। तो मेरे अंदर ये है कि मैं

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क्यों जाऊं? कोई मुझे अपने आप दे दे। तो जब तक हम किसी देश काल परिस्थिति

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पर निर्भर हैं तब तक हम पूर्ण रूप से सुखी नहीं। तो हम ये मान सकते हैं कि

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जो बीके को फॉलो कर रहे हैं यहां पर उसको देवत्व की प्राप्ति होनी

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है। यहां से बहुत बेटर जीवन मिलना है और बहुत सालों तक वो चलना है। बहुत

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समय तक वो चलना है। आप ये भूल ही जाओगे कि आपने कभी दुख देखा भी था। मगर

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एक दिन ये दुख वापस भी आएगा। ये भैया जैसे सतयुग

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बार कलयुग आता है ना ये तो शाश्वत सत्य है ना प्रमाणिक है

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सभी में है तो ऐसे हर चीज हमारी आपकी बाल्यावस्था

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और फिर किशोरी युवा और फिर क्या होता है वृद्धि

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मतलब पूर्ण रूप से मुक्ति नहीं है कोई चीज नहीं है क्योंकि जो चीज बनी है

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जो इसमें सर्किल में है सोमवार मंगल बुद्ध बृहस्पत

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आता है ना ऐसे चार ऋतुओं का है 12 महीनों का है सभी

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का एक तो है हमें हम एक लंबे समय की मुक्ति दे रहे हैं व्यक्ति

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को यहां से लंबे समय की लंबे समय की परंतु

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यह नहीं है कि मुक्ति है ही नहीं मुक्त ही हो गए

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[संगीत]
