1
00:00:07,280 --> 00:00:11,440
तो सभी को जय श्री राम। अमोग लीला जी का एक वीडियो प्राप्त

2
00:00:11,440 --> 00:00:15,440
हुआ है जिसमें वो प्रभुपाद जी की लेखनी में किए जा

3
00:00:15,440 --> 00:00:19,760
रहे बदलाव को लेकर के कुछ कुतर्क करते हुए दिखाई दे रहे हैं। जो

4
00:00:19,760 --> 00:00:23,840
एक प्रश्न उठाया जाता है कि चलो भाई आपने भगवत

5
00:00:23,840 --> 00:00:27,840
गीता में भगवान ने जो कहा है उसको बदल भी दिया फिर भी आप एज

6
00:00:27,840 --> 00:00:32,480
इट इज क्यों कह रहे हो? जैसे ब्रह्मपणम ब्रह्मते गंतव्यम

7
00:00:32,480 --> 00:00:36,640
तो उसमें तो इन इस श्लोक में आप देखेंगे 42 24 में भगवत

8
00:00:36,640 --> 00:00:40,800
गीता में ब्रह्म शब्द कई बार आ रहा है और

9
00:00:40,800 --> 00:00:45,440
जब ब्रह्म शब्द कई बार आ रहा है तो ट्रांसलेशन

10
00:00:45,440 --> 00:00:49,600
में अच्छा मीनिंग में भी कहीं-कहीं पर ब्रह्म का अर्थ ब्रह्म दिया गया

11
00:00:49,600 --> 00:00:53,600
है। ट्रांसलेट करते समय एक भी बार ब्रह्म शब्द का

12
00:00:53,600 --> 00:00:57,920
अर्थ ब्रह्म नहीं आया। वहां पर उसको कृष्ण भावना भावित कर दिया गया है। इसमें

13
00:00:57,920 --> 00:01:02,080
इनके कोई एक बंगाल के प्रचारक हैं यूबर जो यह

14
00:01:02,080 --> 00:01:06,160
कहते हैं कि भाई जो भगवान का भक्त होता है उसको जो

15
00:01:06,160 --> 00:01:10,240
है वही दिखता है। कोई अमरेंद्र प्रभु जी करके हैं बंगाल

16
00:01:10,240 --> 00:01:12,400
के

17
00:01:12,400 --> 00:01:16,560
बंगाल की शैली में बात करते हैं। तो उन्होंने एक और अव्वल

18
00:01:16,560 --> 00:01:20,800
दर्जे का कुतर्क किया है कि क्या भाई कि जो भगवान का भक्त हो जाता है

19
00:01:20,800 --> 00:01:22,400
उसको हर जगह भगवान ही दिखता

20
00:01:22,400 --> 00:01:26,480
है। इसलिए वो सब जगह भक्ति भक्ति भक्ति भक्ति डाल देते हैं। ठीक है

21
00:01:26,480 --> 00:01:30,720
भाई तो आप यह मान रहे हो ना कि आपकी अंतर्भावना

22
00:01:30,720 --> 00:01:34,880
से प्रभावित आपकी दृष्टि है तो आपको हर जगह भगवान भक्ति

23
00:01:34,880 --> 00:01:39,840
भक्ति भक्ति दिख रही है तो फिर उसको सनातन शास्त्र क्यों कह रहे हो?

24
00:01:39,840 --> 00:01:44,160
उसको एज इट इज क्यों कह रहे हो? यह कहो ना कि भाई मेरी प्रभावित

25
00:01:44,160 --> 00:01:48,400
दृष्टि से प्रभावित यह शास्त्र है। मेरी अच्छी

26
00:01:48,400 --> 00:01:52,400
बात है। भक्ति से प्रभावित होना चाहिए। पर वो जो है उसको आप वैसे

27
00:01:52,400 --> 00:01:56,560
ही लिखो ना। फिर आप डंका क्यों पीट रहे हो? हां कि

28
00:01:56,560 --> 00:02:02,080
हम भैया एज इट इज दे रहे हैं। एज इट इज दे रहे हैं। अच्छा दूसरी बात यह भी है

29
00:02:02,080 --> 00:02:04,400
कि

30
00:02:04,400 --> 00:02:08,880
अगर आपको यहां पर भक्ति दिख रही है क्योंकि

31
00:02:08,880 --> 00:02:13,120
यहां पर क्या है कि यहां पर अद्वैत की सिद्धि होती है। इस श्लोक

32
00:02:13,120 --> 00:02:17,360
में अद्वैत की सिद्धि कैसे होती है कि सब कुछ ब्रह्म

33
00:02:17,360 --> 00:02:21,520
ही है। क्रिया भी ब्रह्म है। प्राप्त होने वाला फल भी ब्रह्म है। करने वाला कर्ता

34
00:02:21,520 --> 00:02:25,760
भी ब्रह्म है। तो कैसे बचे भाई यहां पर? तो इसलिए कह दो कि भैया ऐसा

35
00:02:25,760 --> 00:02:29,760
है यहां पर जो है ब्रह्म की बात ही मत करो। कृष्ण भावना भावित

36
00:02:29,760 --> 00:02:33,840
हो जाता है। वह जो है उसको परम मोक्ष प्राप्त हो जाता है। यह कर दो। ट्रांसलेशन की

37
00:02:33,840 --> 00:02:37,920
बात कर रहा हूं मैं। भाष्य में व्यक्ति अपनी जो

38
00:02:37,920 --> 00:02:41,920
अपना दृष्टिकोण है उसको लिखता है। हालांकि वो भी सिद्ध हो पा रहा है कि नहीं

39
00:02:41,920 --> 00:02:46,000
हो पा रहा है वो बात एक अलग है। परंतु जब वो ट्रांसलेट कर रहे हो तब

40
00:02:46,000 --> 00:02:50,000
तो कम से कम उसकी एज इट इज अनुवाद कर दो

41
00:02:50,000 --> 00:02:54,080
उसका। पर नहीं अनुवाद में भी बदलाव करेंगे और फिर

42
00:02:54,080 --> 00:03:00,080
कहेंगे हम एज इट इज वाले हैं। हम एज इट इज वाले हैं। हां और

43
00:03:00,880 --> 00:03:05,200
अगर भक्ति के नाम पर हमें कहीं भी कुछ भी दिख जाता है।

44
00:03:05,200 --> 00:03:09,200
यदि भक्ति के नाम पर हमें ब्रह्म की जगह कृष्ण भावना भावित दिख जाता है। जो

45
00:03:09,200 --> 00:03:13,360
इस का नाम है। है ना? कृष्णा कॉन्शियसनेस

46
00:03:13,360 --> 00:03:17,840
तो फिर भैया तुम एक भी शब्द कैसे देख रहे हो? उसके बिना

47
00:03:17,840 --> 00:03:21,840
जब तुम यहां पर ब्रह्म की जगह पर कृष्ण भावना भावित देख रहे हो तो तुम

48
00:03:21,840 --> 00:03:26,000
हर जगह वही करो ना युद्ध की जगह भी कृष्ण भावना भावित करो अर्जुन

49
00:03:26,000 --> 00:03:30,160
की जगह भी कृष्ण भावना भावित करो क्योंकि तुमको तो और कुछ दिखाई नहीं देना चाहिए पर

50
00:03:30,160 --> 00:03:34,480
तुम्हें तो दिख रहा है तो इसको क्या कहते हैं दोहरापन

51
00:03:34,480 --> 00:03:38,560
दोगलापन है ना तो वो बात और

52
00:03:38,560 --> 00:03:43,120
है कि भगवत गीता के साथ किस तरह से खिलवाड़ किया गया इस कौन के द्वारा

53
00:03:43,120 --> 00:03:47,200
परंतु फिर भी उसके और निचले स्तर में जब आ तो यहां

54
00:03:47,200 --> 00:03:51,520
तो प्रभुपाद जी ने जो लिखा है उसको भी बदला जा रहा है इस कोन के द्वारा।

55
00:03:51,520 --> 00:03:53,120
इसी संबंध में प्रश्न उठता

56
00:03:53,120 --> 00:03:57,200
है और इस प्रश्न के निराकरण के स्वरूप

57
00:03:57,200 --> 00:04:01,200
अमोग लीला जी ने एक फोरमैनी वाली कुतर्कों

58
00:04:01,200 --> 00:04:05,280
की व्याख्या प्रस्तुत कर दी है। तो हम इनके कुतर्कों की थोड़ी समीक्षा कर

59
00:04:05,280 --> 00:04:09,520
ले। क्या है? तो इन्होंने दो जो कुतर्क किए हैं उसमें पहला है

60
00:04:09,520 --> 00:04:13,840
कि भाई प्रभुपाद जी जो है बोलते थे। उनकी रिकॉर्डिंग होती थी। पुरानी मशीनंस

61
00:04:13,840 --> 00:04:18,480
थी। उनको कोई सुनता था, सुनने में गैप आता था और

62
00:04:18,480 --> 00:04:22,640
वो मशीनंस ठीक से वो उच्चारण नहीं होता था।

63
00:04:22,640 --> 00:04:26,720
सही से सुन ना पाने के कारण वो कुछ बोलते थे। कुछ का कुछ कभी-कभी टाइप हो जाता

64
00:04:26,720 --> 00:04:30,800
था। इसमें इसी से मिलताजुलता एक कुतर्क और है कि

65
00:04:30,800 --> 00:04:34,960
प्रभुपाद जी की जो शैली थी बोलने की वो बांग्ला वाली थी।

66
00:04:34,960 --> 00:04:38,960
बंगाली थे वो और जो ये थे सुनने

67
00:04:38,960 --> 00:04:42,960
वाले अंग्रेज थे। तो इसलिए कई शब्दों में बदलाव हो जाता

68
00:04:42,960 --> 00:04:47,040
था। जैसे कि उन्होंने उदाहरण भी दिया अपनी वीडियो में कि

69
00:04:47,040 --> 00:04:52,080
भाई जैसे उन्होंने कहा सनातन तो सुनने वाले ने सुन लिया सोनटोन

70
00:04:52,080 --> 00:04:56,080
उन्होंने कहा कि मून तो सुनने वाले ने सुन लिया कि डेमन नहीं

71
00:04:56,080 --> 00:05:00,640
उन्होंने कहा डेमन तो सुनने वाले ने सुन लिया मून

72
00:05:00,640 --> 00:05:04,640
अच्छा ठीक है आप यह मान रहे हो कि आपको प्रभुपाद जी को

73
00:05:04,640 --> 00:05:08,400
समझने में असफलता हो रही है और आप

74
00:05:08,400 --> 00:05:12,720
वो चाहते कुछ थे छापना और छाप कुछ रहे हो। ठीक है? पहली बात

75
00:05:12,720 --> 00:05:17,280
यहां से यह समझ लेना चाहिए। अच्छा यहीं पर एक बात और है

76
00:05:17,280 --> 00:05:21,680
कि जो रिकॉर्डिंग होती थी उसके बीच-बीच में गैपिंग आती थी। तो प्रभुपाद

77
00:05:21,680 --> 00:05:25,840
जी से जब पूछा गया कि इतनी देर आप चुप क्यों हो जाते हो? तो प्रभुपाद जी ने बताया कि

78
00:05:25,840 --> 00:05:29,840
भाई मैं बहुत गहन चिंतन करता हूं कि मुझे एग्जैक्टली किन शब्दों

79
00:05:29,840 --> 00:05:33,840
को प्रस्तुत करना है। किन शब्दों को वाक्यों में पिरोते हुए

80
00:05:33,840 --> 00:05:38,160
यहां पर प्रस्तुत करना है जिससे कि सिद्धांत भी बना रहे और व्यक्ति की निष्ठा

81
00:05:38,160 --> 00:05:44,000
भी अह प्रगति पथ पर आकर बढ़ आगे बढ़ती रहे।

82
00:05:44,000 --> 00:05:48,000
तो यह उन्होंने गैप के संबंध में बताया। यह बाद में काम आएगा। अब सबसे पहली

83
00:05:48,000 --> 00:05:52,640
बात है जब सुनने में दिक्कत आ सकती है और इसलिए आप जो है गड़बड़ी हो रही है आपसे

84
00:05:52,640 --> 00:05:56,720
तो फिर क्या ऐसा हो सकता है कि द्वैत की जगह अद्वैत लिखा

85
00:05:56,720 --> 00:06:00,800
हो और अद्वैत की जगह द्वैत लिखा हो ऐसा भी हो सकता है फिर तो

86
00:06:00,800 --> 00:06:04,800
जब आप संभावना व्यक्त कर रहे हो कि हम प्रभुपाद जी की चीजें एज

87
00:06:04,800 --> 00:06:08,800
इट इज दे पाने में असमर्थ हैं। उन्होंने कहा कुछ हम समझ नहीं पा रहे

88
00:06:08,800 --> 00:06:12,880
हैं तो हो सकता है कि जहां पर अद्वैत की बात हो रही है वहां द्वैत की बात हुई हो।

89
00:06:12,880 --> 00:06:17,760
जहां द्वैत की बात हो रही हो वहां अद्वैत की बात हुई हो। यह भी हो सकता है फिर तो अच्छा

90
00:06:17,760 --> 00:06:22,480
यह भी हो सकता है कि गुण कर्म के आधार पर

91
00:06:22,480 --> 00:06:23,920
व्यक्ति का

92
00:06:23,920 --> 00:06:28,160
पारमार्थिक वर्ण निर्धारित होता है। है ना?

93
00:06:28,160 --> 00:06:32,240
गुण गुण कर्म के आधार पर उसकी पारमार्थिक जो गति

94
00:06:32,240 --> 00:06:36,240
है वो निर्धारित होती है। व्यवहारिक गति निर्धारित नहीं होती। यह भी तो हो सकता है कहा

95
00:06:36,240 --> 00:06:40,320
हो उन्होंने। अच्छा सब कुछ कहा हो यह बता दो कि 230 में आत्मा की

96
00:06:40,320 --> 00:06:44,480
नित्यता को कटिंग क्यों की गई? वहां तो श्लोक में भी आत्मा को नित्य कहा गया

97
00:06:44,480 --> 00:06:48,640
है। शब्दार्थ में भी नित्य का अर्थ बताया गया एटरनल और

98
00:06:48,640 --> 00:06:52,880
फिर आपने श्लोक में एटरर्नल को गायब ही कर दिया कि जो शरीर

99
00:06:52,880 --> 00:06:57,360
में रहने वाली शरीरी है यानी जीवात्मा है वो जो है

100
00:06:57,360 --> 00:07:01,520
नित्य है। उसका कभी नाश नहीं होता। आपने नित्यता को काट दिया। उसका कभी नाश

101
00:07:01,520 --> 00:07:05,840
नहीं होता। इसको रख लिया। क्यों?

102
00:07:05,840 --> 00:07:09,920
एक अब इसमें जो तीसरा पक्ष आता है वह यह दिया है

103
00:07:09,920 --> 00:07:13,920
इन्होंने कि भाई वह जो बोलते थे वह स्पोकन इंग्लिश है। ये ध्यान देना

104
00:07:13,920 --> 00:07:17,920
इनकी कुतर्क की भी कोई सीमा होती है। श्रोताओं

105
00:07:17,920 --> 00:07:22,160
को क्या बेवकूफ समझते हो?

106
00:07:22,160 --> 00:07:26,320
प्रभुपाद जी जो बोलते थे वो स्पोकन इंग्लिश थी। और रिटन

107
00:07:26,320 --> 00:07:30,320
इंग्लिश में लिखते समय जो लिखने वाले लोग थे या छपवाने वाले लोग थे

108
00:07:30,320 --> 00:07:34,800
वह उनकी स्पोकन इंग्लिश को इंग्लिश वो रिटन इंग्लिश में परिवर्तित करके तब लिखवाते

109
00:07:34,800 --> 00:07:38,800
थे और खुद ही क्या कह रहा है ये व्यक्ति थोड़ी देर पहले खुद ही

110
00:07:38,800 --> 00:07:43,120
अपने वीडियो में ये कह रहे हैं मोग लीला कि भाई प्रभुपाद जी एक एक

111
00:07:43,120 --> 00:07:47,280
बात बहुत सोच समझ के बोलते थे कि किन शब्दों में पिरोकर वाक्य

112
00:07:47,280 --> 00:07:51,280
को प्रस्तुत किया जाए जिससे कि सिद्धांत की भी पुष्टि

113
00:07:51,280 --> 00:07:55,440
हो और व्यक्ति की भक्ति भी बढ़ती इसी

114
00:07:55,440 --> 00:07:59,520
व्यक्ति ने कहा तो जब कोई आचार्य है आपका कोई

115
00:07:59,520 --> 00:08:03,760
गुरु है वो एक एक शब्द पर काफी देर मनन चिंतन

116
00:08:03,760 --> 00:08:08,000
करके एक वाक्य प्रस्तुत कर रहा है तब आप उसको स्पोकन और रिटन

117
00:08:08,000 --> 00:08:11,120
के नाम पर बदलोगे

118
00:08:11,120 --> 00:08:15,600
इसीलिए प्रभुपाद जी ने अपने

119
00:08:15,600 --> 00:08:19,600
भगवत गीता के जो भाष्य किया है उसकी भूमिका में वह

120
00:08:19,600 --> 00:08:24,320
लिख रहे हैं क्या लिख रहे हैं श्रीमद् भागवतम

121
00:08:24,320 --> 00:08:28,560
की भूमिका क्या लिख रहे हैं श्री प्रभुपाद व्याख्या का अर्थ

122
00:08:28,560 --> 00:08:32,800
है परिवर्तन यदि मनुष्य अपूर्ण है

123
00:08:32,800 --> 00:08:37,360
यद्यपि यह वाली बात वहां भी लागू हो सकती है जो यहां कही जा रही है

124
00:08:37,360 --> 00:08:41,360
जहां पर सीधे-सीधे भगवान के वाक्यों को ही बदल दिया गया है परंतु

125
00:08:41,360 --> 00:08:45,360
अभी प्रभुपाद जी के वाक्यों को बदलने पर अगर दृष्टि डालें तो देखिए क्या कह रहे

126
00:08:45,360 --> 00:08:50,240
हैं प्रभुपाद जी कि व्याख्या का अर्थ है परिवर्तन

127
00:08:50,240 --> 00:08:54,240
यदि मनुष्य अपूर्ण है तो वह परम परमेश्वर के वचनों

128
00:08:54,240 --> 00:08:58,240
को कैसे कैसे बदल सकता है? तो यह बात तो वहां भी आ जाती है। ब्रह्म्पणम

129
00:08:58,240 --> 00:09:02,640
ब्रह्म गंतव्यम को कर दिया कृष्ण भावना भावित

130
00:09:02,640 --> 00:09:06,720
और ऐसा एक जगह नहीं हुआ है। अनेक जगह हुआ है। अनेक

131
00:09:06,720 --> 00:09:10,880
जगह भगवत गीता के जो अंतिम अध्याय है

132
00:09:10,880 --> 00:09:15,200
18वा अध्याय उसमें जहां पर यह बताया गया है कि व्यक्ति

133
00:09:15,200 --> 00:09:19,200
का जो स्वभाव होता है उसके आधार पर उसके कर्म निर्धारित किए

134
00:09:19,200 --> 00:09:23,200
गए हैं। वहां पर तो प्रभुपाद जी की कोई व्याख्या ही

135
00:09:23,200 --> 00:09:26,320
प्रस्तुत नहीं की गई। वाह! और सीधे-सीधे वहां

136
00:09:26,320 --> 00:09:30,400
पर ऐसा शब्दों का तोड़ मरोड़ करके पेश किया गया जो मूल अर्थ था

137
00:09:30,400 --> 00:09:34,560
उसको समझ ना पाए व्यक्ति कंफ्यूज हो जाए वहां पर क्या लिखा है वहां

138
00:09:34,560 --> 00:09:38,720
पर कि व्यक्ति के स्वाभाविक कर्मों के आधार पर कर्मों का निर्धारण

139
00:09:38,720 --> 00:09:42,880
किया गया है यानी कि कर्म के आधार पर उसके उसका

140
00:09:42,880 --> 00:09:47,120
स्वभाव निश्चित नहीं होगा बल्कि स्वभाव के आधार पर उसका कर्म निश्चित

141
00:09:47,120 --> 00:09:51,200
होगा और स्वभाव किस आधार पर निश्चित होगा स्वभाव उसके जन्म के आधार

142
00:09:51,200 --> 00:09:55,520
पर निश्चित होगा यह वहां पर दे रहे हैं इस पर एक विस्तृत

143
00:09:55,520 --> 00:09:59,520
एक अलग से वीडियो बनाएंगे। है ना कि गौ संप्रदाय वर्ण व्यवस्था के बारे में

144
00:09:59,520 --> 00:10:03,520
क्या कहता है। खैर फिलहाल बात यह है

145
00:10:03,520 --> 00:10:07,680
कि वहां पर तो प्रभुपाद जी ने कोई व्याख्या ही नहीं दी। सीधे आगे बढ़ गए

146
00:10:07,680 --> 00:10:11,920
और तोड़ मरो मरोड़ करके जो अनुवाद है उसके साथ ऐसी

147
00:10:11,920 --> 00:10:16,160
छेड़छाड़ की है कि वहां से निष्कर्ष निकाल पाना

148
00:10:16,160 --> 00:10:20,160
मुश्किल हो जाए। व्यक्ति को कंफ्यूज हो जाए। भाई अचिंत। सवाल मत करो।

149
00:10:20,160 --> 00:10:24,240
5 101 कुरान। ठीक है? वही वाली बात अचिंत

150
00:10:24,240 --> 00:10:28,240
तो व्यक्ति अचिंत हो जाए। जहां भी दिक्कत आए वहां ऐसी खिचड़ी

151
00:10:28,240 --> 00:10:32,320
पका दो जहां अचिंत हो जाए। तो मैं यह नहीं कह रहा प्रभुपाद जी ने ही किया

152
00:10:32,320 --> 00:10:37,360
है। यह भी बात है। कौन कर रहा है यह सोचने वाली बात है। क्योंकि

153
00:10:37,360 --> 00:10:41,840
इस से एक नाम जुड़ा हुआ है जयद्वैत। जय

154
00:10:41,840 --> 00:10:46,000
द्वैत और ये जो जय द्वैत है यह कोई इजराइलियन

155
00:10:46,000 --> 00:10:51,760
है और परिवर्तित हिंदू है। है ना?

156
00:10:51,760 --> 00:10:56,720
अब इसका क्या लक्ष्य है? क्या नहीं लक्ष्य है? पर

157
00:10:56,720 --> 00:11:00,800
चर्च जैसे मंदिर बनना, पाश्चात्य वातावरण बनना

158
00:11:00,800 --> 00:11:04,960
मंदिरों में और भी ना जाने कितनी चीजें जो हो रही हैं यह किस

159
00:11:04,960 --> 00:11:08,960
ओर इशारा कर रही हैं। यह आप इन चीजों से समझने

160
00:11:08,960 --> 00:11:13,440
का प्रयास करें। तो क्या है कि

161
00:11:13,440 --> 00:11:17,680
प्रभुपाद जी कह रहे हैं कि व्याख्या का अर्थ है परिवर्तन।

162
00:11:17,680 --> 00:11:21,840
यदि मनुष्य अपूर्ण है तो वह परमेश्वर के वचनों को कैसे

163
00:11:21,840 --> 00:11:25,920
बदल सकता है? यदि शब्दों को बदला जा सकता है तो पूर्ण नहीं

164
00:11:25,920 --> 00:11:30,240
है। इसलिए शंका होगी कि वचन परमेश्वर ने कहे हैं या किसी

165
00:11:30,240 --> 00:11:34,320
अपूर्ण व्यक्ति ने। श्रील प्रभुपाद फिर कहते हैं। जैसे ही

166
00:11:34,320 --> 00:11:38,640
आप शास्त्र की व्याख्या करते हैं या उसे बदलते हैं। शास्त्र अपना अधिकार

167
00:11:38,640 --> 00:11:42,800
खो देते हैं। तब दूसरा मनुष्य आकर बातों का अपने ढंग से अर्थ

168
00:11:42,800 --> 00:11:46,800
बताएगा। एक और आएगा और फिर एक और। और इस तरह शास्त्र का

169
00:11:46,800 --> 00:11:52,080
मूल तात्पर्य खो जाएगा। खो जाता है। अच्छा

170
00:11:52,080 --> 00:11:55,200
इसके बाद इन्होंने

171
00:11:55,200 --> 00:11:57,600
आगे बताया है

172
00:11:57,600 --> 00:12:02,240
प्रभुपाद जी ने राय राम को पत्र लिखा है 21 दिसंबर 1967

173
00:12:02,240 --> 00:12:06,320
को तो उसमें लिखा है कि अगर हम टेलीग्राम

174
00:12:06,320 --> 00:12:10,640
भेजते हैं तो टेलीग्राम देने वाले व्यक्ति को इसमें सुधार करने इसे

175
00:12:10,640 --> 00:12:15,040
संपादित करने या इसमें कुछ जोड़ने की आवश्यकता नहीं होती।

176
00:12:15,040 --> 00:12:19,040
वह बस इसे प्रस्तुत करता है। यही गुरु का व्यवसाय है।

177
00:12:19,040 --> 00:12:25,040
यह कौन कह रहे हैं? प्रभुपाद जी कह रहे हैं। ठीक है?

178
00:12:25,040 --> 00:12:29,040
तो बहुत सी ऐसी चीजें हैं जो प्रभुपाद जी के विरुद्ध है। और इसी कारण से एक

179
00:12:29,040 --> 00:12:35,040
दिन प्रभुपाद जी जब वृंदावन में बैठे थे बगीचे में उन्होंने

180
00:12:36,080 --> 00:12:40,720
वो जब अपनी उनको अपनी अपने जो ग्रंथ है उनको सुनना पसंद था।

181
00:12:40,720 --> 00:12:45,200
तो जब कोई यशोदा नंदन प्रभु जी थे वह ईशोपनिषद

182
00:12:45,200 --> 00:12:49,360
पढ़ रहे थे। जब श्रील प्रभुपाद ने उन्हें रोका और अंतिम पैराग्राफ

183
00:12:49,360 --> 00:12:53,440
को फिर से पढ़ने को कहा। इसे फिर से सुनने के बाद श्रील प्रभुपाद ने

184
00:12:53,440 --> 00:12:57,440
कहा यह मेरे शब्द नहीं है। वह मेरे शब्द बदल रहे

185
00:12:57,440 --> 00:12:59,840
हैं।

186
00:12:59,840 --> 00:13:03,920
क्या मेरी अंग्रेजी अच्छी नहीं है? श्रील प्रभुपाद बहुत क्रोधित

187
00:13:03,920 --> 00:13:07,920
हो गए और उन्होंने कहा यह सबसे बुरा काम है जो एक शिष्य कर सकता है।

188
00:13:07,920 --> 00:13:12,000
एक छलांग मेंढक की तरह मत बनो और आध्यात्मिक गुरु के ऊपर से

189
00:13:12,000 --> 00:13:16,560
यह सोच कर कूदने की कोशिश मत करो कि तुम उससे बेहतर जानते हो।

190
00:13:16,560 --> 00:13:20,880
उनसे तुरंत कहो मेरे शब्दों को ना बदले। यह प्रभुपाद

191
00:13:20,880 --> 00:13:25,280
जी कह रहे हैं। तो कुल मिलाकर के अमोग

192
00:13:25,280 --> 00:13:29,520
लीला जी ने जो कुतर्क प्रस्तुत किए हैं वो ना तो प्रभुपाद

193
00:13:29,520 --> 00:13:33,760
जी की संगति है। धर्म की तो संगति है ही नहीं। शास्त्रों की संगति तो उसमें है ही नहीं।

194
00:13:33,760 --> 00:13:37,760
प्रभुपाद जी की भी संगति नहीं है। अब प्रभुपाद जी के साथ

195
00:13:37,760 --> 00:13:42,080
छल किस प्रकार से हो रहा है। इस के मैनेजमेंट कह लो या वो जयद्वैत

196
00:13:42,080 --> 00:13:46,720
कह लो। इजराइलियन कन्व्टेड हिंदू है जो इस सब के पीछे माना जाता है। जिसको

197
00:13:46,720 --> 00:13:50,720
किसी को भी समझ लो अह परंतु

198
00:13:50,720 --> 00:13:51,280
और भी

199
00:13:51,280 --> 00:13:55,440
कई सारी चीजें ऐसी हैं जो इस ओर इशारा करती हैं कि एक षड्यंत्र चल

200
00:13:55,440 --> 00:13:59,680
रहा है। कैसी है वो? कौन सी सामग्री है? जैसे

201
00:13:59,680 --> 00:14:04,560
कि मैं अलग से एक वीडियो बनाऊंगा कि गौडिया वैष्णव संप्रदाय

202
00:14:04,560 --> 00:14:09,760
वर्णाश्रम धर्म के विषय में कितना स्पष्ट और क्या कहता है? और

203
00:14:09,760 --> 00:14:14,320
इनके जो यह श्रील ठाकुर भक्ति विनोद है।

204
00:14:14,320 --> 00:14:18,400
इनके ही ग्रंथ के आधार पर मैं बताऊंगा आपको। अलग से एक

205
00:14:18,400 --> 00:14:22,560
वीडियो बना रही हूं। इसके अलावा अगर प्रभुपाद जी की कुछ मोटी मोटी

206
00:14:22,560 --> 00:14:26,720
चीजों पर ध्यान दिया जाए तो आप देख सकते हैं कि

207
00:14:26,720 --> 00:14:30,880
प्रभुपाद जी भगवत गीता प्रभुपाद

208
00:14:30,880 --> 00:14:35,040
जी के रेफरेंस से भगवत गीता 262 में भगवान शिव की

209
00:14:35,040 --> 00:14:39,120
बहुत अवहेलना की गई है। अपमानजनक बातें की गई है। क्या-क्या कहा गया है

210
00:14:39,120 --> 00:14:43,120
कि भगवान शिव अपनी इंद्रियों पर कंट्रोल नहीं कर पाए। वहीं पर एक भक्त

211
00:14:43,120 --> 00:14:47,440
था हरिदास। वह उन्होंने अपनी इंद्रियों पर कंट्रोल कर लिया।

212
00:14:47,440 --> 00:14:52,240
शिव जी को मनाने के लिए माता पार्वती आई विवाह के लिए और हरिदास

213
00:14:52,240 --> 00:14:56,880
ठाकुर को एक वैश्या वहां पर

214
00:14:56,880 --> 00:15:00,960
भोग के लिए प्रवृत्त करने आई। तो शिव जी का

215
00:15:00,960 --> 00:15:04,960
क्योंकि कंट्रोल नहीं था। वह वैष्णव वो परम वैष्णव भक्त

216
00:15:04,960 --> 00:15:06,640
नहीं थे। समझिए

217
00:15:06,640 --> 00:15:11,120
परम वैष्णव भक्त नहीं माना यहां पर क्योंकि हरिदास ठाकुर से कंपैरिजन में

218
00:15:11,120 --> 00:15:15,360
शिव जी को बताया क्योंकि शिव जी को अपनी इंद्रियों पर कंट्रोल नहीं था वो ध्यान मंगने

219
00:15:15,360 --> 00:15:19,520
थे पार्वती के उसाने पर वो मान गए सहमत हो गए विवाह हो गया फल स्वरूप कार्तिकेय

220
00:15:19,520 --> 00:15:23,760
का जन्म हुआ जबकि हरिदास ठाकुर जो शुद्ध वैष्णव भक्त थे उनके

221
00:15:23,760 --> 00:15:27,760
पास जब एक वैश्या आई तो वह

222
00:15:27,760 --> 00:15:32,000
उन्होंने अपनी इंद्रियों पर कंट्रोल रखा उन्होंने उसका जो उसका जो प्रस्ताव

223
00:15:32,000 --> 00:15:36,080
था उसको ठुकरा दिया इस तरीके से कंपैरिजन किया गया अब

224
00:15:36,080 --> 00:15:40,080
यहां पर सीधे तौर पर देखा जाए तो सिर्फ शिवजी का कंपैरिजन हरिदास ठाकुर

225
00:15:40,080 --> 00:15:44,160
से नहीं हुआ। सबसे पहले तो इनके इनके द्वारा जो ढिंढोरा पीटा जाता है ना वो

226
00:15:44,160 --> 00:15:48,160
तो सबसे बड़े वैष्णव है। परम वैष्णव है। क्या हो गया यहां पे भाई परम वैष्णवता को

227
00:15:48,160 --> 00:15:52,160
शिवजी की चले गए। अब उनकी वैष्णवता भंग हो गई।

228
00:15:52,160 --> 00:15:56,240
अब वो वैष्णवा नाम यथाशंभू वो भूल गए। अच्छा

229
00:15:56,240 --> 00:16:00,560
चलिए वो वैष्णव नहीं है। परम वैष्णव नहीं है। थोड़ा निचले स्तर के वैष्णव है। हरिदास

230
00:16:00,560 --> 00:16:04,880
ठाकुर के कंपैरिजन। अब उसके बाद आगे क्या हुआ है कि

231
00:16:04,880 --> 00:16:09,120
केवल शिव जी की तुलना हरिदास ठाकुर से नहीं हुई है। यहां

232
00:16:09,120 --> 00:16:13,600
पर शिव पार्वती के बीच जो दिव्य दैवीय

233
00:16:13,600 --> 00:16:17,760
वैवाहिक संबंध बना उसकी तुलना किससे हो रही है? व्यभचार

234
00:16:17,760 --> 00:16:21,920
से एक वैश्या और उसके ग्राहक के बीच बनने वाले संबंध

235
00:16:21,920 --> 00:16:26,720
से। उससे तुलना यहां पर कर दी 262 में भगवत गीता में।

236
00:16:26,720 --> 00:16:31,040
और इतना ही नहीं अगर शिव जी की तुलना वहां अरदास

237
00:16:31,040 --> 00:16:35,280
ठाकुर से हो रही है और विवाह की तुलना शिव पार्वती

238
00:16:35,280 --> 00:16:39,360
के विवाह की तुलना वहां पर व्यभचार से हो रही है। एक वैश्या और उसके

239
00:16:39,360 --> 00:16:43,360
ग्राहक के बीच बनने वाले संबंध से हो रही है। तो माता पार्वती

240
00:16:43,360 --> 00:16:47,360
की तुलना किससे हो रही है? माता पार्वती की तुलना। भाई यहां पर शिवजी को

241
00:16:47,360 --> 00:16:51,840
मनाने कौन आया था? जगत जननी मां पार्वती। तो

242
00:16:51,840 --> 00:16:55,920
यहां पर आप दिखा रहे हो कि वह जो है सहमत हो गए और वहां जो वैश्या से तुलना कर

243
00:16:55,920 --> 00:17:00,000
रहे हो। कहने का तात्पर्य यह है कि आपके लिए पार्वती

244
00:17:00,000 --> 00:17:04,000
जी और जो जिसका आप नाम ले रहे हो वो सब एक समान है ना।

245
00:17:04,000 --> 00:17:08,000
इसलिए शिव जी को सहमत नहीं होना चाहिए था क्योंकि जिस प्रकार वहां पर हरिदास

246
00:17:08,000 --> 00:17:12,080
ठाकुर वैश्या के मनाने पर सहमत नहीं हुए। किस तरह की

247
00:17:12,080 --> 00:17:16,320
नीच मानसिकता का पोषण करने वाले लोग हो आप लोग। शर्म

248
00:17:16,320 --> 00:17:20,960
आनी चाहिए। खैर बैक टू द पॉइंट।

249
00:17:20,960 --> 00:17:23,440
तो

250
00:17:23,440 --> 00:17:27,600
अब 262 में इन्होंने दिखा दिया कि शिव जी का अपनी इंद्रियों पर कंट्रोल नहीं

251
00:17:27,600 --> 00:17:31,680
है। परंतु आठ सात 33 आठवां

252
00:17:31,680 --> 00:17:35,680
स्कंध सातवां अध्याय और 33वा श्लोक प्रभुपाद जी का जो

253
00:17:35,680 --> 00:17:38,240
भाष्य है श्रीमद् भागवतम

254
00:17:38,240 --> 00:17:42,640
उसमें प्रभुपाद जी के रेफरेंस से ही फिर से लिखा हुआ है

255
00:17:42,640 --> 00:17:46,640
कि पार्वती के साथ रहते देख माता पार्वती के साथ रहते

256
00:17:46,640 --> 00:17:50,720
देख शिवजी को इंद्रियों के वशीभूत समझने वाले मूर्ख हैं। अब

257
00:17:50,720 --> 00:17:54,800
आप फैसला कर लो निर्णय कर लो कि शिवजी इंद्रियों के अधीन है कि

258
00:17:54,800 --> 00:17:58,960
नहीं है। लिखने वाला मूर्ख है कि ज्ञानी है और

259
00:17:58,960 --> 00:18:04,960
या फिर दो 62 सही है या फिर 8 7 33 सही है भागवतम

260
00:18:04,960 --> 00:18:09,040
तो यह इस ओर इशारा करती है इस तरह की चीजें कि किस

261
00:18:09,040 --> 00:18:13,280
तरह से प्रभुपाद जी को भी धोखा दिया जा रहा है। गौडिया वैष्णव

262
00:18:13,280 --> 00:18:17,360
संप्रदाय की जो वर्णाश्रम व्याख्या है वो उसके ठीक विपरीत यहां पर

263
00:18:17,360 --> 00:18:21,520
पूरा षड्यंत्र चल रहा है। आत्मा की नित्यता को काटा

264
00:18:21,520 --> 00:18:25,520
जा रहा है। और इस तरह से विरोधाभासी

265
00:18:25,520 --> 00:18:29,520
चीजें प्रभुपाद जी के ही रेफरेंस से आपके समक्ष प्रस्तुत हैं। आपका ये तय

266
00:18:29,520 --> 00:18:33,600
कर पाना मुश्किल है कि प्रभुपाद जी ने एग्जैक्टली कहा क्या है? और

267
00:18:33,600 --> 00:18:38,240
जो भी प्रश्न है उसके अंत में डाल दो। अचिंत है। कुछ मत पूछो।

268
00:18:38,240 --> 00:18:42,400
अरे भाई तो कोई तुम्हारे गाल पर आकर के चांटा मार देगा तब भी यही कह देना।

269
00:18:42,400 --> 00:18:46,720
अचिंत है। कुछ मत पूछो। खैर अब इसमें एक

270
00:18:46,720 --> 00:18:50,800
एक कुतर्कता एक कुतर्क और किया गया कि भैया जो

271
00:18:50,800 --> 00:18:53,440
पहले वाली बुक है उसको गायब थोड़ी ना कर दिया गया

272
00:18:53,440 --> 00:18:57,760
है भाई गायब नहीं किया गया है मगर धर्म का लोप कैसे

273
00:18:57,760 --> 00:19:02,080
होता है क्या एक दिन में अचानक से कुरान आ जाती है क्या

274
00:19:02,080 --> 00:19:06,080
एक दिन में बाइबल आ जाती है क्या एक दिन में द्वापर से कलयुग आ जाता है

275
00:19:06,080 --> 00:19:10,320
क्या लोप होता है धीरेधीरे शय श

276
00:19:10,320 --> 00:19:15,200
और वह हो रहा है वो हो रहा है ना आप अगर

277
00:19:15,200 --> 00:19:19,360
1 लाख भगवत गीता छापते हैं जो आपको छापनी

278
00:19:19,360 --> 00:19:23,520
है जो आपको प्रचारित करनी है तो उसके अनुपात में 10 भगवत गीता

279
00:19:23,520 --> 00:19:27,840
छपती है आपकी जो वो 1972 वाला एडिशन

280
00:19:27,840 --> 00:19:32,640
है उसकी आपके स्टोर्स पर कौन सी भगवत गीता

281
00:19:32,640 --> 00:19:38,240
थोक के भाव रखी रहती है 1972 वाली

282
00:19:38,240 --> 00:19:42,320
हां तो यह कहना आपका गौ हो गया कि भैया हम वो वाली भी तो

283
00:19:42,320 --> 00:19:46,320
उपलब्ध करा रहे यह तो सनय सनय बदलाव चल रहा है ना एकदम से

284
00:19:46,320 --> 00:19:50,400
थोड़ी ना धीरे-धीरे अच्छा फिर इन्होंने कहा कि भैया हम अगर

285
00:19:50,400 --> 00:19:54,400
अगर उन्होंने बदला होता तो हम भक्त कैसे बन जाते मतलब इसमें

286
00:19:54,400 --> 00:19:58,720
कहना क्या चाहते हो कि आप प्रभुपाद के फॉलोअर कैसे बन जाते

287
00:19:58,720 --> 00:20:02,720
आप जब एक किताब को मानने वाला होते हुए यह

288
00:20:02,720 --> 00:20:06,720
दावा कर रहे हो कि हम प्रभुपाद को मान रहे हैं और प्र और उस

289
00:20:06,720 --> 00:20:09,040
किताब का संबंध

290
00:20:09,040 --> 00:20:13,360
प्रभुपाद से होने पर सवाल किया जा रहा है तो उस समय में आप

291
00:20:13,360 --> 00:20:17,680
अपने उस प्रभुपाद के संबंध को एज ए प्रमाण कैसे प्रस्तुत

292
00:20:17,680 --> 00:20:20,560
कर सकते हो?

293
00:20:20,560 --> 00:20:24,720
क्योंकि अभी जिस किताब के आधार पर आप अपना भक्त होना

294
00:20:24,720 --> 00:20:28,720
सिद्ध कर रहे हो, उस किताब का संबंध ही प्रभुपाद जी से होना

295
00:20:28,720 --> 00:20:33,120
सिद्ध नहीं हो रहा है या उसके ऊपर सवाल उठाया जा रहा है। तो अपना संबंध आप प्रभुपाद

296
00:20:33,120 --> 00:20:37,200
के साथ कैसे सिद्ध कर रहे हो? उस किताब के आधार पर क्या हम इस किताब

297
00:20:37,200 --> 00:20:41,200
को फॉलो कर रहे हैं? इसलिए हमारा संबंध भक्त भक्ति का हो गया क्योंकि हम प्रभुपाद

298
00:20:41,200 --> 00:20:45,280
को फॉलो कर रहे हैं। इस किताब को फॉलो करने वाला होते हुए हम प्रभुपाद को फॉलो करने

299
00:20:45,280 --> 00:20:49,440
वाले सिद्ध होते हैं। और क्योंकि हम प्रभुपाद को फॉलो करने वाले सिद्ध हैं। इसका

300
00:20:49,440 --> 00:20:55,440
मतलब है कि यह किताब सही है। क्या बकवास है भाई ये?

301
00:20:56,240 --> 00:21:00,320
जब आपके जिस आधार पर प्रश्न किया गया है, जिसके आधार पर आप

302
00:21:00,320 --> 00:21:04,400
प्रभुपाद के फॉलोअर हैं या फिर जिसके आधार पर आप अपने आपको प्रभुपाद

303
00:21:04,400 --> 00:21:08,480
के अनुसार वैष्णव भक्त बताते हैं, जब उसकी प्रामाणिकता पर बात चल

304
00:21:08,480 --> 00:21:12,480
रही है तो वहां पर आपकी भक्ति आपका आचरण वो

305
00:21:12,480 --> 00:21:16,000
जो भी है उसको आप भक्ति कहो

306
00:21:16,000 --> 00:21:20,960
या धर्माभास कहो वो प्रमाण कैसे हो जाएगी?

307
00:21:20,960 --> 00:21:24,960
क्योंकि आपके कनेक्शन के बीच में तो वह किताब है ना जिसको आप फॉलो कर रहे हो और

308
00:21:24,960 --> 00:21:29,280
उसकी प्रमाणिकता पर बात हो रही है। अच्छा

309
00:21:29,280 --> 00:21:33,360
दूसरी बात यह है कि रामपाल जो ग्रंथों में मिलावट करता

310
00:21:33,360 --> 00:21:37,520
है आपसे भी और उत्कृष्ट श्रेणी की मिलावट अव्वल दर्जे की मिलावट

311
00:21:37,520 --> 00:21:41,520
करता है। वो भी यह कह सकता है कि अगर मैंने मिलावट की होती तो

312
00:21:41,520 --> 00:21:45,840
लोग भक्त कैसे बन रहे होते? क्योंकि भक्त की पहचान तो यही है ना कि भक्त कहेगा कि मैं भक्त हूं।

313
00:21:45,840 --> 00:21:50,000
और कोई पहचान तो है नहीं भक्त की। भक्त की पहचान

314
00:21:50,000 --> 00:21:54,000
यही है कि उसने कह दिया मैं भक्त हूं। ज्यादा बोलोगे तो राम कह दूंगा

315
00:21:54,000 --> 00:21:58,000
राम कृष्ण कह दूंगा। लो हरे कृष्णा हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम

316
00:21:58,000 --> 00:22:02,160
राम हरे हरे मैं भक्त हो गया। अब मेरा प्रमाण मान लो। जाकिर नायक

317
00:22:02,160 --> 00:22:06,320
भी आकर कह देगा हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। फिर तुम्हारे

318
00:22:06,320 --> 00:22:10,320
वो रट्टू तोते जो घुमा करते हैं वो आकर के कह देंगे कि जिसकी जीवा पे भगवान का

319
00:22:10,320 --> 00:22:11,440
नाम हो वो ब्राह्मण

320
00:22:11,440 --> 00:22:15,440
हो गया। लो उसको बना दो अपने यहां का आचार्य जाकिर नायक

321
00:22:15,440 --> 00:22:19,760
को वो आएगा। हां बढ़िया। वाह अब बनूंगा आचार्य।

322
00:22:19,760 --> 00:22:24,880
अब आचार्य बन के इनके अंदर से इनके गुर्दे का ऑपरेशन करूंगा।

323
00:22:24,880 --> 00:22:28,480
है ना?

324
00:22:28,480 --> 00:22:32,640
तो रामपाल भी यह कह सकता है फिर के भक्त कैसे

325
00:22:32,640 --> 00:22:36,880
बन गए होते? क्योंकि भक्त कौन है? कौन नहीं है? डिसाइड करने वाला स्वयं रामपाल

326
00:22:36,880 --> 00:22:40,960
ही है। जैसे तुमने अपने आप को भक्त घोषित करते हुए अपने आप को प्रमाण के रूप में रख दिया।

327
00:22:40,960 --> 00:22:44,960
तो कुतर्कों से बाहर निकलो थोड़ा और जो अंधे बन के इसको सुन

328
00:22:44,960 --> 00:22:48,960
रहे हैं ना मर गई है ना तर्क शक्ति तुम लोगों

329
00:22:48,960 --> 00:22:51,360
की

330
00:22:51,360 --> 00:22:56,320
ना प्रमाण ना युक्ति जो मन में आए वाह वाह वाह वाह वाह वाह

331
00:22:56,320 --> 00:23:00,960
खैर अब जरा सैद्धांतिक बातों पर आ जाते हैं। आचार्य

332
00:23:00,960 --> 00:23:05,120
के लेख को संशोधित करने का जो जो

333
00:23:05,120 --> 00:23:09,440
क्या कहते टाइपिंग मिस्टेक होती है। जैसे आचार्य ने

334
00:23:09,440 --> 00:23:13,600
किसी ग्रंथ का श्लोक या मंत्र वहां पर

335
00:23:13,600 --> 00:23:18,000
प्रस्तुत किया है। वहां पर क्रमांक जो है गड़बड़ हो गए। उस क्रमांक को सही कर दिया।

336
00:23:18,000 --> 00:23:22,000
या फिर वो जो क्या कहते हैं? वर्तनी है वो

337
00:23:22,000 --> 00:23:26,240
अशुद्ध हो गई है। उसको ठीक कर दिया। हां। यहां तो पूरा का पूरा

338
00:23:26,240 --> 00:23:26,740
तात्पर्य

339
00:23:26,720 --> 00:23:30,720
ही बदला जा रहा है। पूरा का पूरा नित्य शब्द ही गायब कर दिया जा रहा

340
00:23:30,720 --> 00:23:34,960
है। और ऐसे एक नहीं अनेकों उदाहरण है और आप कह रहे हो भैया सुनने

341
00:23:34,960 --> 00:23:38,960
में गलती हो गई। अरे भैया गलती हो गई तो ठीक है।

342
00:23:38,960 --> 00:23:43,040
तो सबसे पहली बात तो यह है कि इस प्रकार से संशोधन

343
00:23:43,040 --> 00:23:47,040
ऐसा कोई उदाहरण हमें प्राप्त नहीं होता। ना ही शास्त्र की व्याख्या हमें प्राप्त होती है इस प्रकार

344
00:23:47,040 --> 00:23:51,440
की। हां यदि आप संशोधन कर रहे हैं। यदि आप आचार्य

345
00:23:51,440 --> 00:23:55,600
ने कहा क्या कहा था उसको आप समझाना चाहते हैं तो आप

346
00:23:55,600 --> 00:24:00,320
आचार्य की टीका पर भी टीका लिखो ना।

347
00:24:00,320 --> 00:24:04,560
अगर आप आचार्य के जीवन काल में जो ग्रंथ छप गए

348
00:24:04,560 --> 00:24:08,800
थे उनके जीवित रहते हुए उन्होंने उन ग्रंथों को देख लिया था

349
00:24:08,800 --> 00:24:12,880
और उसके बाद भी उन ग्रंथों में अगर संशोधन कर रहे हो तो उसमें अपना नाम लिखो

350
00:24:12,880 --> 00:24:18,160
ना कि प्रभुपाद की कमेंट्री पर मेरी कमेंट्री

351
00:24:18,160 --> 00:24:21,920
अपना नाम लिखो उसमें

352
00:24:21,920 --> 00:24:26,080
नहीं तब तो कहेंगे एज इट इज दूसरी बात

353
00:24:26,080 --> 00:24:30,320
यह है कि अगर यह संशोधन सत्यापित ित कैसे होगा

354
00:24:30,320 --> 00:24:34,320
भाई? उनके जीवन काल में छपी किताबें। उन्होंने छपवाई किताबें।

355
00:24:34,320 --> 00:24:38,320
अब वह चले गए। सत्यापित कैसे होगा? वह तो है नहीं सत्यापित करने के लिए।

356
00:24:38,320 --> 00:24:43,120
एक बार को वो होते तो भैया ठीक है उनसे सत्यापित हो गया।

357
00:24:43,120 --> 00:24:47,280
ना ही उनका कोई उत्तराधिकारी है सत्यापित करने के लिए। कहो कि जीबीसी उनका

358
00:24:47,280 --> 00:24:52,480
उत्तराधिकारी है। तो जीबीसी स्वयं शास्त्र इकाई है आपकी।

359
00:24:52,480 --> 00:24:56,560
आपके सामान्य भक्त को यह पता है कि उसका धर्म का अंतिम निर्णायक कौन

360
00:24:56,560 --> 00:25:00,720
है? जिसको वह गुरु मान रहा है उसका बॉस कौन है? मुझको पता है।

361
00:25:00,720 --> 00:25:04,880
मैं छाती ठोक के कह सकता हूं मेरा गुरु मेरे गुरु शंकराचार्य हैं। पूरी

362
00:25:04,880 --> 00:25:10,800
के पीठाधीश्वर वर्तमान लो कोई नहीं है उनके ऊपर

363
00:25:10,800 --> 00:25:14,480
जो उनको कंट्रोल कर रहा हो।

364
00:25:14,480 --> 00:25:18,560
और अगर कोई किसी गृहस्थ का भी गुरु है प्रामाणिक परंपराओं

365
00:25:18,560 --> 00:25:23,200
में तो उस परंपरा के जो अमुक पीठाधीश्वर होंगे

366
00:25:23,200 --> 00:25:27,520
जिनके अंतर्गत उनका कोई गृहस्थ गुरु होगा किसी का तो उसका अंतिम

367
00:25:27,520 --> 00:25:31,680
निर्णायक वो पीठाधीश्वर सिद्ध हो जाएंगे मगर तुम्हारे यहां तो गुरु गद्दी

368
00:25:31,680 --> 00:25:36,160
है ही नहीं तुम्हारे यहां तो कमिटी है जीबीसी

369
00:25:36,160 --> 00:25:36,960
जिसके बारे में

370
00:25:36,960 --> 00:25:41,040
सामान्य भक्त को नहीं पता जीबीसी ये तय कर रही है कि कौन गुरु होगा कौन गुरु

371
00:25:41,040 --> 00:25:45,200
नहीं होगा किसके शिष्य होंगे किसके शिष्य नहीं होंगे होंगे कहां शास्त्रों में वर्णन

372
00:25:45,200 --> 00:25:51,200
है भाई जीबीसी का

373
00:25:51,760 --> 00:25:56,160
और तो और सबसे श्रेष्ठतम हमारा जो आश्रम

374
00:25:56,160 --> 00:26:00,240
है वो है सन्यास आश्रम किसी व्यक्ति का गुरु कोई सन्यासी है आपके

375
00:26:00,240 --> 00:26:04,560
अकॉर्डिंग वो सन्यासी है भी कि नहीं है वो बाद की बात आपके अकॉर्डिंग

376
00:26:04,560 --> 00:26:08,640
इस का किसी भक्त का जो गुरु है वो सन्यासी

377
00:26:08,640 --> 00:26:12,720
है उसको कंट्रोल कौन कर रहा है जेबीसी जिसमें गस्थ बैठा हुआ है वाह कौन कौन

378
00:26:12,720 --> 00:26:16,880
होता है? गस्थ पता है जो दिन भर में छिपाने

379
00:26:16,880 --> 00:26:21,120
वाले कार्य तामसिक कार्य ज्यादा करता है। उसका

380
00:26:21,120 --> 00:26:25,120
कंट्रोल कैसे करोगे? उस उसका कंट्रोल कैसे स्वीकार

381
00:26:25,120 --> 00:26:29,120
कर लोगे किसी सन्यासी पर? जो छिपाने वाले कार्य कर ही

382
00:26:29,120 --> 00:26:34,560
नहीं रहा है।

383
00:26:34,560 --> 00:26:38,560
मनुस्मृति 12वा अध्याय 37वा श्लोक जिन कर्मों को करते

384
00:26:38,560 --> 00:26:43,040
समय छिपाने का भाव उत्पन्न हो वो तामसिक कार्य है।

385
00:26:43,040 --> 00:26:47,280
गस्थ के जीवन में सन्यासी की अपेक्षाकृत तामस

386
00:26:47,280 --> 00:26:51,360
तत्व ज्यादा होता है। आप गस्थ

387
00:26:51,360 --> 00:26:55,840
से सन्यासी को कंट्रोल करवा रहे हो।

388
00:26:55,840 --> 00:27:00,160
या तो यही होता जीबीसी में केवल सन्यासी होते।

389
00:27:00,160 --> 00:27:04,480
हालांकि वह भी शास्त्र कितना वो भी विचार नहीं होता। पर इससे

390
00:27:04,480 --> 00:27:08,560
तो अच्छा होता। यहां एक भक्त को मालूम ही नहीं है मेरा गुरु कौन है। पहले

391
00:27:08,560 --> 00:27:12,720
कह रहा 500 गुरु है मेरे अंतिम निर्णायक। फिर लास्ट में कह रहा 12 है। अभी अभी

392
00:27:12,720 --> 00:27:18,720
पता चल गया। चर्चा के दौरान पता चल गया। यह तो हालत है आप लोगों की।

393
00:27:20,160 --> 00:27:24,720
एट द एंड सब बातें एक तरफ। यदि आप यह संभावना

394
00:27:24,720 --> 00:27:28,960
आपने खुद व्यक्त कर ली कि हमने समझने में गलती हो गई थी क्योंकि

395
00:27:28,960 --> 00:27:33,120
आप जो छाप रहा है वह उसका अंतिम प्रमाण है आपके

396
00:27:33,120 --> 00:27:37,680
यहां के एक भक्त का जिसको आप डिवोटी कहते हो एक स्कनिस्ट

397
00:27:37,680 --> 00:27:41,760
का अंतिम प्रमाण कौन है जो प्रभुपाद जी

398
00:27:41,760 --> 00:27:46,000
के ज्ञान को प्रस्तुत कर रहा है उनके समक्ष किताबों

399
00:27:46,000 --> 00:27:50,000
के माध्यम से और वह जो अंतिम प्रमाण है वह कह रहा है कि

400
00:27:50,000 --> 00:27:53,760
मुझसे गलतियां हुई समझने में

401
00:27:53,760 --> 00:27:58,160
गलतियां तो बहुत हो सकती हैं। फिर वह अपनी प्रमाण जो

402
00:27:58,160 --> 00:28:02,400
अपनी प्रामाणिकता का खुद ही वह खंडन कर रहा है कि मुझे आप शब्द

403
00:28:02,400 --> 00:28:06,400
प्रमाण ना समझे तो किसे समझे? तो इस के यहां पर

404
00:28:06,400 --> 00:28:10,560
इस के जो डिवोटीज है उनके लिए कौन शब्द प्रमाण है? अचिंत है।

405
00:28:10,560 --> 00:28:14,560
अचिंत। शब्द प्रमाण कौन है? अचिंत। कंटाप किसने मारा?

406
00:28:14,560 --> 00:28:17,040
अचिंत।

407
00:28:17,040 --> 00:28:21,200
सब अचिंत कर दो। फिर एट द एंड अगर

408
00:28:21,200 --> 00:28:25,440
आप यह स्वीकार कर रहे हो कि हां भाई हमसे गलती

409
00:28:25,440 --> 00:28:29,760
हो गई थी अब हमने सही दिया है तो यानी आप अपनी अपने अपने अंदर दोष

410
00:28:29,760 --> 00:28:33,920
दृष्टि डाल रहे हो जो लोग आपको प्रामाणिक समझते हैं जो लोग जिन

411
00:28:33,920 --> 00:28:35,760
लोगों के लिए आप प्रमाण हो

412
00:28:35,760 --> 00:28:39,840
ठीक है तो इस तरह से बदलाव होने वाले जो शास्त्र है

413
00:28:39,840 --> 00:28:43,920
आप खुद कह रहे थे ये सनातन शास्त्र है अभी तक बदलाव से पहले तक उसके बाद

414
00:28:43,920 --> 00:28:48,240
आपने बदलाव किया उसमें कि भैया वहां पर नित्य नहीं कहा

415
00:28:48,240 --> 00:28:52,240
प्रभुपाद जी ने हम नित्य हटा देंगे। आत्मा की नित्यता से आपको

416
00:28:52,240 --> 00:28:56,880
दिक्कत हो रही है। यही तो अब ब्राह्मीकरण कर रहे हो।

417
00:28:56,880 --> 00:29:02,880
धीरे-धीरे आत्मा को नित्य होना उसका बंद कर दो। वही बना दो उसको।

418
00:29:03,120 --> 00:29:07,760
इस्लाम और बाइबल वाला आत्मा अनित्य नहीं है।

419
00:29:07,760 --> 00:29:11,760
हम खैर अगर आप

420
00:29:11,760 --> 00:29:15,760
खुद स्वीकार कर रहे हो कि हम शास्त्रों में हमारे शास्त्रों में बदलाव

421
00:29:15,760 --> 00:29:21,760
हो रहा है तो इनको सनातन शास्त्र मत कहो ना भाई।

422
00:29:22,240 --> 00:29:26,480
अगर आपको सुनाई नहीं दे रहा था ठीक से समझ में नहीं आ रहा था ठीक से आप

423
00:29:26,480 --> 00:29:30,640
एलिजिबल नहीं थे उस योग्य या फिर अगर आपने

424
00:29:30,640 --> 00:29:34,880
स्वयं को एलिजिबिलिटी दी या नहीं दी आपको जिसने दी उस पर भी दोष जाता

425
00:29:34,880 --> 00:29:38,880
है। जब आप इस योग्य नहीं थे तो उसने आपको वहां वो ये

426
00:29:38,880 --> 00:29:42,960
इतना गंभीर कार्य क्यों दिया? पहली बात और आप इतने

427
00:29:42,960 --> 00:29:47,040
सच्चे क्यों नहीं थे कि आपको अगर समझ में नहीं आ रहा था तो आप मना कर देते भाई मेरे को समझ में नहीं

428
00:29:47,040 --> 00:29:51,120
आ रहा यहां क्या कार्य जा रहा है यह धर्म की बात है इसके साथ खिलवाड़

429
00:29:51,120 --> 00:29:56,720
नहीं होता है धर्म है ये

430
00:29:56,720 --> 00:30:01,040
अच्छा एट द एंड अगर आप बदलने का बदलने की संभावना स्वीकार

431
00:30:01,040 --> 00:30:05,120
कर रहे हो शास्त्रों में तो वो सनातन सिद्ध नहीं होंगे तो वो कैसे सिद्ध होंगे वो कुरान

432
00:30:05,120 --> 00:30:09,120
की तरह सिद्ध होंगे कुरान दो 106 में

433
00:30:09,120 --> 00:30:13,120
एक आयत आती है क्या कहते हैं उसमें कि ऊपर वाला अपनी कोई

434
00:30:13,120 --> 00:30:17,440
आयत बदल देता है तो उससे बेहतर आयत देता है। लो साहब इसका

435
00:30:17,440 --> 00:30:21,440
अर्थ क्या है कि आज भयंकर मूर्ति पूजा विरोधी बने हुए हैं। कल

436
00:30:21,440 --> 00:30:25,440
को बदल जाएगी आयत क्या बदल जाएगी भैया मूर्ति

437
00:30:25,440 --> 00:30:31,280
पूजा करो। बेकार में ही मरे हम तो लड़ लड़ के

438
00:30:31,280 --> 00:30:35,440
बुत तोड़ो बुत तोड़ो बुत परस्ती को खत्म कर दो बेकार में ही लड़े

439
00:30:35,440 --> 00:30:39,440
बदल जाएगी आयत तो ऐसे ही

440
00:30:39,440 --> 00:30:43,600
आपकी चीजों में आप खुद खुद दोष दृष्टि उत्पन्न कर रहे हो उनको

441
00:30:43,600 --> 00:30:48,960
इनको तर्कों के द्वारा उस पर लीपापोती करने का प्रयास कर रहे हो

442
00:30:48,960 --> 00:30:53,600
दो 106 में कहते हैं कि भैया कोई आयत आती है तो बदल जाती है यह है वो है

443
00:30:53,600 --> 00:30:57,600
एक सैनिक वर्सेस कुछ थे जब इनको कहीं पर समझौता करना

444
00:30:57,600 --> 00:31:01,600
था ना मोहम्मद को तो वहां पर मूर्ति पूजा के लिए इन्होंने कुछ आयत पढ़

445
00:31:01,600 --> 00:31:05,840
दी थी। बाद में कहा गया कि वह आयत हटा रहे हैं कुरान से। क्यों हटा रहे हैं? क्योंकि

446
00:31:05,840 --> 00:31:10,080
उस समय शैतान ने जीवा पर कंट्रोल कर लिया था। यानी कि दोष

447
00:31:10,080 --> 00:31:14,160
दृष्टि खुद मान ली। और यहां पर भी कुरान ने खुद अपने अंदर

448
00:31:14,160 --> 00:31:18,240
दोष दृष्टि मान ली कि मैं बदल सकता हूं

449
00:31:18,240 --> 00:31:22,400
आयतों को। तो जब आपने दोष दृष्टि उत्पन्न कर ली तो वो परम प्रमाण

450
00:31:22,400 --> 00:31:26,400
नहीं रह गया सामने वाले के लिए। अंतिम प्रमाण नहीं

451
00:31:26,400 --> 00:31:30,640
रह गया फिर वो सनातन शास्त्र नहीं रह गया वह

452
00:31:30,640 --> 00:31:34,800
और कुरान इसको आगे फॉलो करती है दो 187 में कहा जाता है

453
00:31:34,800 --> 00:31:39,040
कि आज से पहले रोजों की रात में स्त्री

454
00:31:39,040 --> 00:31:43,120
का स्त्री संग करना मना था पर आज जो है इसको अलऊ कर

455
00:31:43,120 --> 00:31:46,320
दे रहे हैं। हुआ क्या था वहां पे किसी ने रोजों की रात्र

456
00:31:46,320 --> 00:31:50,320
में रात में स्त्री संग कर लिया था तो तुरंत आयत आ गई

457
00:31:50,320 --> 00:31:54,560
एक चलो आज से अलऊ है आज से पहले अलऊ

458
00:31:54,560 --> 00:31:59,120
नहीं थी आज से अलाऊ है क्यों आई मतलब इससे पहले धर्म नहीं था

459
00:31:59,120 --> 00:32:03,200
इससे पहले क्या था अगर यह धर्म है तो अगर करना धर्म है तो वो क्या

460
00:32:03,200 --> 00:32:08,560
था आज तक बेवकूफ बनाया जा रहा था

461
00:32:08,560 --> 00:32:10,240
ऐसे ही पांच 101 में कहती

462
00:32:10,240 --> 00:32:14,240
है कुरान कि ज्यादा सवाल मत करो अन्यथा तुम्हारे लिए वो आयत खोल दी

463
00:32:14,240 --> 00:32:16,240
जाएंगी जिन आयतों

464
00:32:16,240 --> 00:32:20,240
के कारण कुछ लोग पहले बागी हो गए थे तो क्या मान लिया जाए यहां पे कि पहले भाई

465
00:32:20,240 --> 00:32:24,560
शास्त्रनिष्ठ धर्मनिष्ठ वाला धर्म था लोगों का

466
00:32:24,560 --> 00:32:28,720
और उस उसमें कुछ लोगों को पशुता पसंद आ रही थी कि नहीं नहीं मुझे चचेरी

467
00:32:28,720 --> 00:32:32,720
बहन से विवाह करना है मेरी बहन से विवाह करना है तो इसलिए आयतों

468
00:32:32,720 --> 00:32:37,040
को बदल दिया गया भाई उन आयतों को दबा दिया गया पुरानी वाली को

469
00:32:37,040 --> 00:32:41,200
श्रुति को ह माना जाए जब

470
00:32:41,200 --> 00:32:45,280
स्वयं वो किताब ही कह रही है मैं बदल बदलती हो तो उसने तो स्वयं ही अपने अंदर दोष

471
00:32:45,280 --> 00:32:50,480
अपने में दोष दृष्टि वहां प्रस्तावित कर दी ना।

472
00:32:50,480 --> 00:32:54,640
तो कुल मिलाकर के यदि आप खुद इस तरह से पहली बात तो आपके

473
00:32:54,640 --> 00:32:58,640
जो कुतर्क हैं वो सेट नहीं होते। यदि आप कहेंगे

474
00:32:58,640 --> 00:33:02,720
कि सुनने में दिक्कत आ गई थी तो फिर तो और भी दिक्कतें मानी जा सकती

475
00:33:02,720 --> 00:33:06,720
है। आगे भविष्य में और चेंज कर देना। सुनने में दिक्कत आ गई होगी। हो सकता है

476
00:33:06,720 --> 00:33:10,800
धीरे-धीरे वो द्वैत परक व्याख्या होते और अद्वैत परक व्याख्या

477
00:33:10,800 --> 00:33:15,440
हो जाए। हो सकता है वो जो गुण कर्म के नाम पर

478
00:33:15,440 --> 00:33:19,440
वह जो जो व्यक्ति जो कार्य कर रहा है उसकी वही जाति हो गई। इस नाम

479
00:33:19,440 --> 00:33:23,440
पर जो आप वर्ण व्यवस्था को अपना रहे हो वो भी बदल जाए आगे

480
00:33:23,440 --> 00:33:27,440
चलते-चलते यह भी हो सकता है। यह भी मान सकते हैं। फिर व्यक्ति अपने धर्म को लेकर के

481
00:33:27,440 --> 00:33:31,440
मजबूत कैसे रहे? वो तो नए संस्करण में आप नया धर्म ले आओगे

482
00:33:31,440 --> 00:33:33,680
ना।

483
00:33:33,680 --> 00:33:38,240
हां। और कि भाई वह बंगाली

484
00:33:38,240 --> 00:33:42,320
थे और वह स्पोकन इंग्लिश रिटन इंग्लिश आप जिसको गुरु कह

485
00:33:42,320 --> 00:33:46,320
रहे हैं वह कह रहे हैं मैं बहुत विचार करके बोलता हूं और उसको आप रिटन इंग्लिश के नाम पर

486
00:33:46,320 --> 00:33:51,120
बदल दे रहे हो क्या कुतर्क है भाई

487
00:33:51,120 --> 00:33:55,120
और एट दी एंड इस प्रकार से मिलने वाले शास्त्र जो है वो सनातन शास्त्र सिद्ध

488
00:33:55,120 --> 00:33:59,280
नहीं होते अगर किसी को छापने में दिक्कत हो रही थी हो रही है तो

489
00:33:59,280 --> 00:34:03,520
उसको मना करना चाहिए मैं नहीं कर सकता ये कार्य मुझे समझ में नहीं आ रहा है

490
00:34:03,520 --> 00:34:07,840
कि प्रभुपाद जी क्या बोल रहे हैं? जो समझ में आ जाए वो ना लिखो।

491
00:34:07,840 --> 00:34:12,720
समझ में आए वही लिखो। यह होता है धर्म। रामोद

492
00:34:12,720 --> 00:34:17,280
भाषते राम दो प्रकार की बातें नहीं करता।

493
00:34:17,280 --> 00:34:21,280
आज इस का भक्त उस आज एक सामान्य

494
00:34:21,280 --> 00:34:25,440
इस के डिवोटी का अंतिम निर्णायक कौन है?

495
00:34:25,440 --> 00:34:30,640
धर्म का अंतिम निर्णायक कौन है? वह जो दो प्रकार की बातें करता है।

496
00:34:30,640 --> 00:34:34,720
वह जो जिसको जो समझ में आ गया वह सुन के छाप देता है। वह

497
00:34:34,720 --> 00:34:38,800
जो डेमोन को मून लिख देता है। ऐसे अयोग्य

498
00:34:38,800 --> 00:34:42,800
व्यक्ति इस में जाने वाले जो श्रद्धावान लोग हैं

499
00:34:42,800 --> 00:34:47,120
भगवान के नाम पर जो वहां पहुंच रहे हैं उनके धर्म का अंतिम निर्णायक

500
00:34:47,120 --> 00:34:51,200
ऐसा अयोग्य व्यक्ति है। तो इस प्रकार के

501
00:34:51,200 --> 00:34:55,520
कुतर्कों द्वारा इस में चल रहे षड्यंत्रों

502
00:34:55,520 --> 00:34:59,600
और इन परियोजनाओं पर लीपापोती करने का

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00:34:59,600 --> 00:35:05,600
प्रयास बंद कर देना चाहिए। जय श्री राम।

504
00:35:16,980 --> 00:35:20,980
[संगीत]
