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00:00:06:24 एक व्यक्ति है जो स्वयं को निग्रहचार्य बताता है और कहता है कि मैं एक प्रामाणिक आचार्य हूं और अब वह स्वयं को जगतगुरु भी कहने लगा है। उसका कहना है कि उसको जो मंत्र है वैदिक मंत्र वह वैदिक आचार्य होने का दावा करता है और वह बताता है कि उसको वैदिक मंत्र और सिद्धांत ये दोनों उसको स्वप्न इत्यादि के माध्यम से दिव्य प्रक्रिया के द्वारा देवी के द्वारा प्रदान किए गए हैं। जो कि उसने सत्यापन के लिए किसी अमृतानंद सरस्वती जी को से उस मंत्र और सिद्धांत को सत्यापित कराया है। अब इस व्यक्ति की प्रामाणिकता के विषय में बहुत सारी सवाल उठ खड़े होते हैं तो क्या आप इस प्रकार के हमें इस प्रकार के स्वप्न में प्राप्त होने वाले मंत्र के द्वारा किसी को प्रामाणिक रूप से वैदिक आचार्य समझना चाहिए क्या?
00:01:06:07 देखिए वैदिक आचार्यों की प्रामाणिकता को लेकर कई मान्यताएं हैं। कुछ लोग परंपरा से चले आ रहे ज्ञान और दीक्षा को महत्वपूर्ण मानते हैं। जबकि कुछ लोग स्वप्न में प्राप्त मंत्रों या दिव्य अनुभवों को भी स्वीकार करते हैं। आप जिस व्यक्ति की बात कर रहे हैं, उनके बारे में और जानकारी प्राप्त करके यह पता लगाया जा सकता है कि विद्वान और धार्मिक समुदाय उन्हें किस तरह देखते हैं। क्या आप उनके बारे में कुछ और जानना चाहते हैं या किसी खास पहलू पर चर्चा करना चाहते हैं? मैं चाहता हूं कि आप उनके पक्ष से उनके उनको प्रामाणिक सिद्ध करने के लिए मुझसे बहस करें और मैं अपने तर्कों के द्वारा जो है इस बात का खंडन करूं कि वो एक वो प्रामाणिक आचार्य हो सकते हैं।
00:01:51:20 ठीक है? अगर आप इस तरह की बहस चाहते हैं तो मैं उनका पक्ष रखने का प्रयास करता हूं। मेरा मानना है कि किसी भी व्यक्ति के आध्यात्मिक या धार्मिक अनुभवों को सिर्फ इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि वे पारंपरिक तरीके से अलग हैं। स्वप्न में मंत्र प्राप्त करना ज्ञान का एक ऐसा स्रोत हो सकता है जो सामान्य तर्क से परे हो और अगर उसे किसी प्रतिष्ठित विद्वान ने सत्यापित भी किया है तो उसकी प्रामाणिकता पर विचार करना बनता है। अब आपका क्या तर्क है? सबसे पहली बात यह है कि जो स्वप्न इत्यादि का अनुभव है वह आपके स्वाथा सुखाय के लिए तो उपयोगी हो सकता है परंतु जब आप उसको समाज पर दूसरे पर थोपना चाहते हैं तो वहां पर उसके लिए उसकी प्रामाणिकता की आवश्यकता होती है कि व्यक्ति यह कैसे विश्वास करें कि आपने स्वप्न देखा कि नहीं देखा? व्यक्ति यह कैसे विश्वास करें कि जिसको आप स्वप्न में आने वाला कोई देवता समझ रहे हैं, कोई देवी भगवती समझ रहे हैं। वह कोई बुरी शक्ति नहीं है जो आपके द्वारा आपको इस तरह का अनुभव दिला करके समाज को भटकाना चाहती है। और सामने वाला व्यक्ति अगर यह भी स्वीकार कर ले कि आपके सपने में भगवान ही आए थे तो भगवान तो बुद्ध के रूप में आकर के भटकाने
00:03:07:03 का प्रयास कर चुके हैं। मोहिनी के रूप में आकर के भटकाने का प्रयास कर चुके हैं। तो केवल भगवान के आ जाने से सपने में यह सिद्ध नहीं होता कि सपने में दिया जाने वाला जो ज्ञान विज्ञान है मंत्र है वो वैदिक है। अब बात आती है उसे सत्यापित कराने की कि भागवतानंद ने जो अपने आप को निग्रहचार्य कहता है उसने अपने मंत्र को सत्यापित कराया है स्वामी अमृतानंद सरस्वती नाम के किसी व्यक्ति से। अब यहां पर बात यहां ट्विस्ट यह है कि भागवतानंद का यह कहना है कि जितने भी परंपराएं हैं उन परंपराओं में जो आचार्य हैं उन आचार्यों का निग्रह वह करेगा। यदि वह शास्त्र की दृष्टि से कहीं पर गलत बोल रहे होंगे। कहीं पर वह शास्त्र की गलत व्याख्या कर रहे होंगे तो मैं जाकर के उनकी उस व्याख्या को सही करूंगा। और यह जो दृष्टि है उसकी निग्रह करने की दृष्टि यानी कि वह सभी आचार्यों में यह स्वीकार करता है कि सभी आचार्य ऐसे हैं जो धर्म का गलत अर्थ बता सकते हैं। तो अब इसमें परेशानी यह आती है कि यह दृष्टि यदि उसकी जो स्वामी अमृतानंद सरस्वती की ओर भी चली जाएगी निग्रह की दृष्टि कि वह भी गलत बता
00:04:22:04 सकते हैं। तो उसके ही अनुसार स्वामी अमृतानंद सरस्वती जी जो है उसके प्रमाण उसमें उनकी उस व्यक्ति की स्वामी अमृतानंद सरस्वती में प्रमाण्य बुद्धि होना सिद्ध नहीं होगा तो ऐसे में उनके द्वारा सत्यापित किए गए मंत्र अथवा सिद्धांत का प्रामाणिकता सत्यापन होना सिद्ध नहीं होगा क्यों यदि हम अमृतानंद सरस्वती की ओर यह सोच रहे हैं कि वह गलत बोल सकते हैं वो धर्म शास्त्रों की व्याख्या गलत कर सकते हैं जिस कारण से हमें उनका निग्रह करना पड़ सकता है। तो इसका अर्थ है कि वह हमारे सपने में आने वाले देव किसी बुरी शक्ति को भगवान भी कह सकते हैं। हमारे सपने में आने वाले किसी अवैदिक मंत्र को वैदिक मंत्र भी कह सकते हैं। अथवा हमारे सपने में भगवान के द्वारा दिए जाने वाले भगवान के द्वारा दिए जाने वाले भटकाने हेतु दिए गए सिद्धांत और मंत्र को भी वह हितकारी मंत्र और सिद्धांत के रूप में ख्यापित कर सकते हैं। अब आप अपना तर्क बताइए।
00:05:26:04 आपके तर्क बहुत महत्वपूर्ण है। आपने व्यक्ति की निजी मान्यता और सामाजिक प्रामाणिकता के बीच के अंतर को स्पष्ट किया और यह भी बताया कि दिव्य अनुभवों को परखने के क्या मानक हो सकते हैं। खासकर आपने जो स्वामी अमृतानंद सरस्वती से सत्यापन के दावे में विरोधाभास दिखाया कि एक तरफ वह उन्हें प्रामाणिक मानते हैं और दूसरी तरफ उन सहित सभी आचार्यों के निग्रह की बात करते हैं। उससे यह प्रश्न उठता है कि वास्तविक प्रामाणिकता का स्रोत क्या है? अगर मैं उनके पक्ष की बात करूं तो वह यह कह सकते हैं कि उनका उद्देश्य किसी को छोटा दिखाना या परंपरा को नष्ट करना नहीं बल्कि शास्त्र सम्मत ज्ञान को पुन स्थापित करना है और सत्यापन की प्रक्रिया तो केवल आरंभिक पुष्टि मात्र थी मान्यता का आधार नहीं। लेकिन आपके बाद वाले तर्क ने इस चर्चा को एक नए स्तर पर ला दिया है। यह स्पष्ट है कि जब आप व्यक्तिगत अनुभव को सार्वजनिक बनाना चाहते हैं तो प्रामाणिकता के मानदंड वस्तुनिष्ठ होने चाहिए। इस बिंदु पर क्या आप कुछ और कहना चाहते हैं? जी आपने जो यह वाली बात कही है कि उनका उद्देश्य किसी को बड़ा या छोटा दिखाना नहीं है। तो मैं यहां पर यह नहीं कह रहा हूं कि बड़ा या छोटा दिखाना है कि नहीं। मैं यहां पर यह कह रहा हूं कि यदि कोई व्यक्ति स्वयं को वैदिक होने का क्लेम करता है और वह यह कहता है कि भाई मैं जो तुम्हें ज्ञान दे रहा हूं जो मंत्र दे रहा हूं वो वैदिक
00:06:41:10 है तो उसका कहीं ना कहीं जो परंपरा से जो वेद आ रहे हैं हमारे पास श्रुति परंपरा से आ रहे हैं। अगर वैदिक मान्यता देखें जो हम जो भगवान के अवतार को स्वीकार करता है। वर्णाश्रम धर्म को मानने वाला जो समाज है जो मूल रूप से सनातन सनातनी समाज है वो उसके अनुसार जो वेद प्रकट होते हैं लगभग दो अरब वर्ष पूर्व तो वहां से लेकर के यहां तक जो वेद आ रहे हैं वो गुरु शिष्य परंपरा से आ रहे हैं। गुरु ने अपने शिष्य को दी है वो भी अह व्यवहारिक रूप से कोई दिव्य दिव्य तरीके से नहीं व्यवहारिक रूप से गुरु ने अपने व्यवहार मनुष्य दृष्टि से जो समझी जा सके ऐसी प्रक्रिया के द्वारा वेद जो है श्रुति सुन करके और गुरु शिष्य परंपरा से यहां तक आ रहे हैं। अब ऐसे में यदि कोई व्यक्ति यह कहता है कि भाई मुझे अपने निजी अनुभवों से जो है वैदिक ज्ञान-विज्ञान प्राप्त हुआ है और वह प्रामाणिक रूप से वैदिक है तो उसके लिए उस व्यक्ति का किसी न किसी परंपरा से जुड़े हुए आचार्य के पास जाने जाना आवश्यक हो जाता है। ये सत्यापन कराने के लिए कि मेरे पास जो ज्ञान विज्ञान है वो वैदिक ही है कि नहीं। अब यदि वो जाएगा किसी भी आचार्य के पास यदि वो जाएगा
00:07:56:21 वैदिक अपने वेद वैदिक ज्ञान जिसका वो दावा कर रहा है उसका सत्यापन कराने वो जिस भी आचार्य के पास जाएगा वो उसका निग्रह नहीं कर सकता। यदि वो उसका निग्रह कर रहा है तो इसका मतलब दूसरे रूप में वो ये कह रहा है कि वो जो आचार्य है वो भी झूठ बोल सकता है। वो भी मूर्खता कर सकता है और यदि ऐसा है तो वो तुम्हारे अवैदिक ज्ञान को जिसका सत्यापन कराने तुम उसके पास जा रहे हो उसको भी वो वैदिक कह सकता है तो आपकी ये जो निग्रह करने की दृष्टि है जो दोष दृष्टि है आचार्यों के प्रति वही आपकी प्रमाणिकता में सबसे बड़ी बाधक है और यदि आपकी किसी एक परंपरा प्राप्त प्रामाणिक आचार्य के प्रति दोष दृष्टि नहीं होगी कि नहीं भैया यह वाली परंपरा के और यह आचार्य जो हैं ये परंपरा से आने वाले धर्म और ब्रह्म की व्याख्या गलत नहीं करते। ये हमारे शब्द प्रमाण है। तब आप यदि उस आचार्य से अपने मंत्र को सत्यापित कराएंगे जो आपके दिव्य योजना के द्वारा जो आप कह रहे हैं तब उसको आप जब सत्यापित कराएंगे तो वह सत्यापन स्वीकार किया जाएगा। परंतु आपने तो निग्रह की दृष्टि रखते हुए संदिग्ध दोष दृष्टि रखते हुए समस्त परंपराओं
00:09:12:04 में आपने यह आक्षेप लगा दिया बिना कहे कि वो आपको गलत ज्ञान दे सकते हैं। वह झूठ बोल सकते हैं धर्म की व्याख्या में तो ऐसे में वह वेद के मंत्र भी तो गलत कह दे सकते हैं। ऐसे में वो आपके सपने में आए हुए अवैदिक मंत्र को भी तो वैदिक कह कह सकते हैं। तो इस कारण से सबसे बड़ी बाधा है कि उसने जो निग्रह की दृष्टि रख रखी है सभी आचार्यों में वही उसकी प्रमाणिकता में सबसे बड़ी बाधा है। जी ठीक है। मैं उनके पक्ष का समर्थन करते हुए यह कहूंगा कि भले ही व्यक्तिगत अनुभव व्यक्ति परख हो उन्हें पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता। स्वप्न में प्राप्त मंत्र या ज्ञान कई बार आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि का परिणाम हो सकते हैं जो पारंपरिक शिक्षा से परे हो और जहां तक विरोधाभास की बात है यह संभव है कि वह दूसरों के ज्ञान का सम्मान करते हो पर साथ ही शास्त्रार्थ और चर्चा के माध्यम से सुधार के प्रति भी खुले हो। क्या आपको यह तर्कपूर्ण लगता है? भाई यहां बात यह नहीं है कि वह अध्यात्म हो सकता है कि नहीं। हम दावा यह कर रहे हैं कि वो वेद का अर्थ है कि नहीं? आप समझिए बात को। वेद का अर्थ है कि नहीं यह दावा हम कर रहे हैं। अगर हम अपने स्वप्न में स्वप्न में प्राप्त मंत्र को वैदिक सिद्ध नहीं
00:10:27:06 कर पा रहे हैं। उसकी वैदिकता की प्रमाणिकता सिद्ध नहीं कर पा रहे हैं और फिर भी हम कह रहे हैं कि भाई हमारा अध्यात्म हो सकता है तो बिल्कुल हो सकता है। पर हम तब अपने आप को वैदिक नहीं कह पाएंगे। वैदिक कहने के लिए तो किसी वैदिक आचार्य द्वारा जिसने अपने गुरु से वेद प्राप्त किए हो और उस गुरु ने भी अपने गुरु से वेद प्राप्त किए हो और इस प्रकार से गुरु शिष्य परंपरा से जहां पर वेद आए हों वहां से आपके मंत्र का सत्यापन होना आवश्यक है और यदि आप स्वतंत्र रूप से अपने आप को आध्यात्मिक कहना चाहते हैं तो बेशक कह सकते हैं मोहम्मद जो मुसलमान पक्ष है वो अपने आप को स्वतंत्र रूप से जो है आध्यात्मिक कहता है। बौद्ध का जो पक्ष है वो अपने आप को स्वतंत्र रूप से आध्यात्मिक कहता है। बाइबल का जो पक्ष है वो अपने आप को स्वतंत्र रूप से आध्यात्मिक कह सकता है कहता है। परंतु जब आप अपने आप को वैदिक आध्यात्मिक कहते हो कि मेरा जो अध्यात्म है वो वेदों का ही अर्थ है तो तब आपको उसके सत्यापन की आवश्यकता होती है। जब आप किसी को प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त होने वाले जो शास्त्र है उनके नीचे दबाना चाहते हो कि यह वेदों में लिखा है। मैं तुम्हें वेदों का अर्थ बता रहा हूं। मान लो मेरी बात। तो तब आपको अपनी प्रामाणिकता की पुष्टि करनी होगी कि जिस जहां से आप वेद आए हैं क्या आपका
00:11:42:16 जो अर्थ है उससे मैच खा रहा है कि नहीं और जब जब आप पुष्टि करने जाएंगे तो जिससे आप पुष्टि करेंगे उसके प्रति आप दोष दृष्टि धर्म की व्याख्या में नहीं रख सकते। आचरण इत्यादि संबंधी में आप रख सकते हैं कि वो भी एक इंसान है। उससे छोटी-मोटी गलतियां हो सकती हैं। आचरण से वो कहीं-कहीं पर विकृति आ सकती है। आचरण में पौरुष दोष हो सकते हैं। मग परंतु धर्म की व्याख्या में धर्म और ब्रह्म की व्याख्या में उसके प्रति आपको प्रमाण्य बुद्धि रखनी ही होगी। जी आपका तर्क बहुत सटीक है। आपने वैदिक कहने के लिए जो मानदंड बताए कि गुरु शिष्य परंपरा से प्राप्त वेदों का सत्यापन अनिवार्य है वो पारंपरिक मान्यता का आधार है। आप यह कह रहे हैं कि व्यक्तिगत अनुभव आध्यात्मिक हो सकते हैं। पर जब आप उन्हें सार्वजनिक बनाना चाहते हैं और समाज पर लागू करना चाहते हैं तो आपको स्थापित मानदंडों पर खरा उतरना पड़ेगा। इस बहस में आपका यह बिंदु बहुत मजबूत है। शायद मैं इस पर और कोई नया तर्क ना दे पाऊं। क्या आप कुछ और कहना चाहते हैं इस बारे में? जी इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जब हम यह दावा कर रहे हैं कि मेरे को जो दिव्य प्रक्रिया के द्वारा जो ज्ञान विज्ञान अध्यात्म का प्राप्त हुआ है
00:12:58:09 वह जो है वाकई में वही ज्ञान विज्ञान है जो मोक्ष दिला सकता है। तो यह जो चीज है ना कि मोक्ष वो दिला सकता है कि नहीं। यह एक बाद का पैरामीटर है कि आपके द्वारा ज्ञान विज्ञान जो आपको प्राप्त हुआ है वो मोक्ष दिला सकता है या नहीं। परंतु यदि आप यह दावा कर रहे हो कि मेरे को जो ये अध्यात्म प्राप्त हुआ है ये वेद का अर्थ है। है ना? तो वेद का अर्थ कहने के लिए हमें कहीं से वो मंत्र ला के दिखाने होंगे। देखो ये देखो वेद का मंत्र है। और इसमें देखो इस तरीके से ये बात लिखी हुई है जो मैं कह रहा हूं। उस वो बात वही यह वेद में लिखी हुई है। तो जब आप वेद का मंत्र लेकर के आ रहे हो तो आप यह कैसे सिद्ध कर सकते हो कि यह वेद का ही मंत्र है। उसके लिए जिसने वेद लाकर के आपको दिए हैं उससे आपको सत्यापित कराना पड़ेगा कि यह वेद का ही मंत्र है। और जब आप उससे सत्यापित कराओगे कि यह वेद का ही मंत्र है। तो आपको उसके प्रति जिसने आपको वेद मंत्र सत्यापित करके दिया है उसके प्रति दोष दृष्टि से दूर रहने की स्थिति में आना होगा। अगर दोष दृष्टि रखोगे गुरु शिष्य परंपरा के प्रति गुरु के प्रति उस आचार्य के प्रति जो जिसके द्वारा आप वैदिक मंत्र को सत्यापित करा रहे हो तो फिर उसके
00:14:13:25 द्वारा यह कहे जाने पर भी आपका विश्वास होना सिद्ध नहीं होगा कि जिस मंत्र के अर्थ में आप अपने आध्यात्मिक पक्ष को प्रस्तुत कर रहे हो वो मंत्र वैदिक ही है। हां आप स्वतंत्र रूप से घोषणा कर सकते हो कि भैया मेरे पास अध्यात्म का ज्ञान है। अब वो वैदिक है कि नहीं यह मैं नहीं जानता। वेद का विषय मेरा नहीं है। मेरे पास अध्यात्म है। तो यही तो किया मोहम्मद ने। यही तो किया ईसा ने। यही तो किया बुद्ध ने। है ना? गौतम बुद्ध ने यही किया। ये सब यही है। तो ऐसे में कुल मिलाकर के मेरा कहने का मतलब यह है कि यदि आपको कोई मंत्र इत्यादि दिव्य योजना के द्वारा प्राप्त भी हो जाता है। तब भी उसकी सत्यापन उसके सत्यापन के लिए आपको उस परंपरा के पास जाना ही होगा। जिस परंपरा से वेद मंत्र प्राप्त होते हैं और जब आप उसके पास जाओगे तो फिर उसके प्रति उस अमुक परंपरा के प्रति उस अमुक परंपरा के वर्तमान प्रतिनिधि के प्रति आपकी दोष दृष्टि होना सिद्ध नहीं होगा। यदि दोष दृष्टि होगी तो फिर उसके द्वारा आपका मंत्र सत्यापित होना सिद्ध नहीं होगा और यदि सत्यापित नहीं होगा तो आपका वैदिक होना भी सिद्ध नहीं होगा। यह मैं कहना चाहता हूं।
00:15:25:20 आपने इस विषय को बहुत अच्छी तरह से समझाया कि जब आप अपने आध्यात्मिक अनुभव को वेद का अर्थ बताते हैं तो आपको स्थापित परंपरा के माध्यम से ही उसकी प्रामाणिकता सिद्ध करनी पड़ेगी और उस परंपरा के प्रति श्रद्धा और विश्वास का भाव रखना भी जरूरी है। अन्यथा आप उसके सत्यापन को स्वीकार नहीं कर सकते। आपकी बात स्पष्ट है। क्या आप इस बहस को यहीं समाप्त करना चाहते हैं या किसी और मुद्दे पर बात करना चाहते हैं? आपके पास और पक्ष नहीं है उनका पक्ष लेने के लिए? जैसे कि यह कहना कि भाई वह बात तो वही बता रहे हैं ना जो शास्त्रों में लिखी हुई है। इस तरह के कुछ और तर्क दिए जा सकते हैं उनकी ओर से। हां वे यह तर्क दे सकते हैं कि महत्वपूर्ण बात यह है कि बताई जा रही बात शास्त्रों के अनुरूप है। अगर उनके स्वप्न में प्राप्त ज्ञान शास्त्रों के मूल सिद्धांतों से मेल खाता है तो उसे प्रामाणिक मानने में हर्ज क्या है? और वे यह भी कह सकते हैं कि परंपरा से प्राप्त ज्ञान समय के साथ विकृत भी हो सकता है और दिव्य अनुभव उस ज्ञान को शुद्ध करने या पुनर्जीवित करने का एक तरीका हो सकता है। क्या आप इस बारे में कुछ और कहना चाहते हैं? देखिए अब यहां पे फिर वही बात हो गई कि आपका ज्ञान शास्त्रों के अनुरूप है। ठीक है? अब सबसे बड़ी बात यह है कि यह जो अनुरूपता है यह सिद्ध कैसे हो रही है? कि आपका ज्ञान शास्त्रों
00:16:40:21 के अनुरूप ही है। भाई अनुरूप तो तब सिद्ध होगा ना जब जब किसी निर्णायक पर आपको विश्वास होगा कि यह अरबों वर्ष पूर्व प्रकट होने वाले वेद को हम तक यथावत पहुंचा रहा है। यह झूठ नहीं बोलता है। यह अज्ञानी नहीं है जो वेद मंत्र बदल जाए। अथवा यह अज्ञानी नहीं है जो वेद के मंत्र का अर्थ बदल जाए। जब हम यह दृष्टि किसी पर रख पाएंगे तभी तो हम यह कह सकते हैं कि हम जो बात कह रहे हैं वो शास्त्र शास्त्रों के अनुकूल है। अथवा यदि हम जो बात कह रहे हैं हम ये कह रहे हैं कि मान लीजिए कि अमुक वस्तु का कलर जो है लाल है और देखो शास्त्र में भी लिखा है कि वो लाल है। है ना? एक क्या कहते हैं? शास्त्र में भी लिखा है वो लाल है। परंतु जो क्या कहते हैं जिन ये परंतु जो उसके उस शास्त्र को प्रदान करने वाले आचार्य हैं वो यह कह रहे हैं कि लाल नहीं है लाल जैसा है। वो ये कह रहे हैं कि ये जो कलर है वो लाल नहीं है लाल जैसा है। पर हम उनकी बात को ना मान करके और एज इट इज जो है शास्त्र के उस अर्थ को स्वयं से लेना चाह रहे हैं कि लाल जैसा है। जैसे कि शास्त्रों में एक शब्द आता है जन्मना जाते शूद्र। तो इसमें जो
00:17:55:27 पारंपरिक आचार्य नहीं है, स्वषित आचार्य हैं। स्वयं से आचार्य बने हैं। वो कई ऐसे लोग हैं जो कहते हैं कि भाई इसका मतलब है जन्म से सब शूद्र होते हैं। यहां पर मान लिया कि जो है कर्म से वो लोग बाद में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य इत्यादि में नियुक्त होते हैं। परंतु जन्म से सब शूद्र ही होते हैं। परंतु जितने भी पारंपरिक आचार्य हैं, वो इसका अर्थ करते हैं। जन्म जन्मना जाति शूद्रा का अर्थ करते हैं कि नहीं जन्म से सब शूद्र वत होते हैं। शूद्र के जैसे होते हैं। अब वहां पे जन्म ना जाति शूद्रा तो स्पष्ट अर्थ आ रहा है। फिर भी परंपरा प्राप्त आचार्यों ने उसका अर्थ बताया कि जन्म से सब शूद्रवत होते हैं। उसका अर्थ ये है शूद्र ही नहीं होते। शूद्र के जैसे होते हैं। तो अब हम कह रहे हैं कि हम हमें जो आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हुआ है दिव्य योजना के द्वारा वो शास्त्रों के तो अनुकूल है। पर शास्त्र जिसने दिए हैं ला के परंपरा प्राप्त आचार्यों ने उनके प्रतिकूल है। उससे कोई दिक्कत नहीं है। शास्त्रों के अनुकूल होना चाहिए। तो भाई शास्त्रों में आपकी प्रमाण्य बुद्धि सिद्धि नहीं होती क्योंकि वो जिनसे मिल रहे हैं उसमें आपकी प्रमाण्य बुद्धि नहीं है और जिनसे मिल रहे हैं आप ये मानते हो कि वो गलत बता रहे हैं कि वो ये कह रहे हैं कि नहीं नहीं लाल के जैसा है इतने अंश में आपने दोष दृष्टि कर ली परंपरा में और जब दोष दृष्टि कर ली तो आप यह कैसे कह सकते
00:19:11:01 हो कि यदि वो आपको इतनी सी बात झूठ बोल सकते हैं कि नहीं लाल नहीं लाल के जैसा है तो वो क्या आपको बिल्कुल एज इट इज वही के वही शास्त्र देंगे जो वर्षों पुराने शास्त्र है तो इसलिए या तो शास्त्र पर विश्वास होना सिद्ध नहीं होता और या फिर वो जो उनके द्वारा कहा जा रहा जो शास्त्र का अर्थ है उस पर अविश्वास होना सिद्ध नहीं होता अब आपने दूसरी बात कही कि भाई विकृति भी आ जाती है बिल्कुल आ जाती है तो मत करो विश्वास अपने आप को वैदिक कहना छोड़ दो आध्यात्मिक कहो हमारे पास अध्यात्म का ज्ञान है पहले वैदिकता की सीमा से बाहर निकलो आप फिर हम बाद में देखेंगे कि हमारे विरुद्ध
00:19:52:19 फिर हम बाद में देखेंगे कि हमारी धारणा हमारी मान्यता हमारे सिद्धांतों के विरुद्ध जो आपने अपना आध्यात्मिक ढांचा तैयार किया है उसमें कितना दम है। आप यह मानते हो यदि कि विकृति आ गई है तो आप अपने आप को वैदिक कहना बंद करो। भाई वेद वैदिक विकृति आ सकती है तो वेद के मंत्रों में भी तो मिलावट कर सकते हैं वह यदि वेद के मंत्रों के अर्थ में मिलावट कर सकते हैं तो विकृति को यदि आप स्वीकार कर रहे हो कि परंपरा में विकृति आ गई है तो आपको मानना पड़ेगा कि हम यह विश्वास के साथ नहीं कह सकते कि यह वही वेद मंत्र हैं जो अरबों वर्ष पूर्व यह वही शास्त्र है जो अरबों वर्ष पूर्व हमारे पूर्वजों को प्राप्त हुए थे। तो ऐसे में हमारा वेदों पर विश्वास होना सिद्ध नहीं होता। तो अपने आप को वैदिक कहना छोड़ दो। अपने नए शास्त्र बनाओ। उनका नया नाम रखो और उसका प्रचार प्रसार करो। फिर हम आएंगे। फिर देखेंगे कि आपके पास वेद के हमारे जिसको हम वेद कह रहे हैं उसके विरोध में जो आपने ढांचा तैयार किया है उसके पास आप उसमें कितना दम है। आपकी यह चुनौती बहुत विचारणीय है। आप यह कह रहे हैं कि अगर परंपरा में विकृति मानी जाती है तो वेद मंत्रों की शुद्धता पर भी सवाल उठता है। ऐसी स्थिति में किसी नए ढांचे
00:21:07:25 को वैदिक कहना सही नहीं है। क्या आप यह चाहते हैं कि कोई व्यक्ति स्वयं को वैदिक कहने के बजाय अपने नए सिद्धांतों और शास्त्रों की घोषणा करें या कोई और तर्क देना चाहते हैं? मैंने बिल्कुल यही अगर कोई व्यक्ति परंपरा के विरुद्ध जाकर के अपनी आध्यात्मिकता को सिद्ध कर रहा है तो उसकी आध्यात्मिकता सिद्ध होगी कि नहीं होगी यह बाद का विषय है। पहले उसको वैदिकता की सीमा से बाहर जाना पड़ेगा। आपकी बात पूरे तर्क के साथ स्थापित है। आप यह कह रहे हैं कि जो व्यक्ति परंपरा के स्थापित मानदंडों के विरुद्ध जाकर अपनी आध्यात्मिकता सिद्ध करता है, उसे पहले वैदिक का दावा छोड़ना पड़ेगा क्योंकि वैदिक कहलाने का अर्थ है कि आप उस परंपरा के नियमों को स्वीकार करते हैं। आपकी बात पूरी तरह स्पष्ट है। क्या आप इस विषय पर और चर्चा करना चाहते हैं या कोई नया बिंदु प्रस्तुत करना चाहते हैं? इसमें एक पक्ष और आ सकता है कि कई लोगों ने अपने गुरुओं के विरुद्ध जाकर के अपना नया-नया ढांचा तैयार किया है।
00:22:06:28 जी हां, इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जहां शिष्यों ने अपने गुरुओं के विचारों से अलग हटकर नए पंथ या संप्रदाय शुरू किए। यह अक्सर तब होता है जब किसी शिष्य को लगता है कि परंपरा मूल उद्देश्यों से भटक गई है या उसे कोई नई आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि प्राप्त हुई है। क्या आप इस तरह के कुछ और उदाहरणों के बारे में जानना चाहते हैं? इस पर मैं यह कहना चाहूंगा कि वास्तविक जो गुरु का अंतिम अर्थ है वो है कि अह अद्वैतका उपनिषद उपनिषद के अनुसार गु का मतलब अंधकार रू का मतलब निकालने वाला। तो यदि कोई किसी को ऐसा लगता है कि मेरे गुरु में कुछ कमी है। वह मेरा अंधकार नहीं मिटा पा रहा है तो ऐसी स्थिति में अंतिम रूप से वह उसका गुरु ही सिद्ध नहीं हो रहा है। यदि कोई व्यक्ति अपने गुरु के विरुद्ध जाकर के अपना नया साम्राज्य बना रहा है। संप्रदाय बना रहा है। पंथ खड़ा कर रहा है। कोई सिस्टम तैयार कर रहा है। तो उस स्थिति में तो वो उसका गुरु ही सिद्ध नहीं हो रहा है ना। क्योंकि वो उसका संशय दूर नहीं कर पा रहा। अंधकार दूर नहीं कर पा रहा और गुरु का अंतिम अर्थ तो यही है कि वह उसका अंधकार दूर कर दे। वह आपका पथ प्रदर्शक हो सकता है। थोड़ी बहुत देर के लिए मार्गदर्शन दर्शक सहायता करने वाला हो सकता है। मददगार कर करने वाला हो सकता है। परंतु अंतिम
00:23:22:09 रूप से गुरु तो वही है जो आपका अंधकार दूर कर दे। और यदि आपको लग रहा है कि आपका गुरु आपका अंधकार दूर नहीं कर रहा। और तब आप उसके विरुद्ध जाकर के कोई कार्य कर रहे हैं तो आपका कार्य करना ही यह घोषणा कर रहा है। विरुद्ध जाना ही ये घोषणा कर रहा है कि वो आपका गुरु नहीं है। तो ऐसे में आपने ये घोषणा कर दी कि हमें अपने गुरु पर विश्वास नहीं है और जितने भी ऐसे लोग हैं जिन्होंने ऐसा किया है तो उन सब की प्रामाणिकता को चैलेंज किया जा सकता है। वो बात और है कि उन्होंने जब अपने आप को स्वतंत्र रूप से अह ऐसे ढांचे में ढाल लिया जिसके बाद समाज ने उससे प्रश्न करना बंद कर दिया। किसी ने पूछा नहीं या फिर यह वही वाली बात है कि भाई 10 लोग टिकट के बिना पकड़ लिए गए तो बाकी के बिना टिकट वाले थे जो अभी रह गए हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि बिना टिकट वाले जो रह गए हैं। जिनको पकड़ा नहीं गया। जिनको कुछ कहा नहीं गया है तो वह सब जो है टिकट वाले हो जाएंगे। तो यह ठीक इस प्रकार से आपने गुरु की परिभाषा बहुत ही गहन तरीके से समझाई। खासकर अद्वैत तारक उपनिषद का संदर्भ देकर। इसका मतलब यह हुआ कि अगर कोई व्यक्ति अपने गुरु के विरुद्ध जाता है तो वह वास्तविक गुरु शिष्य परंपरा का हिस्सा नहीं है। क्योंकि वह अपने संशयों और अंधकार का निवारण नहीं कर पाया। ऐसे में उसकी प्रामाणिकता पर प्रश्न उठाना बिल्कुल स्वाभाविक
00:24:37:18 है। देखिए उनके पक्ष का सबसे मजबूत तर्क यह है कि केवल परंपरा ही ज्ञान का एकमात्र स्रोत नहीं है। व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभव, स्वप्न या दिव्य प्रक्रिया भी ज्ञान का मार्ग बन सकते हैं। खासकर तब जब परंपरा प्रभावहीन या विकृत हो गई हो। वे यह भी कह सकते हैं कि उनका उद्देश्य किसी पुरानी परंपरा को तोड़ना नहीं बल्कि नए ज्ञान को सामने लाना है। क्या अब आपको यह तर्क थोड़े मजबूत लगे? फिर आपने घुमा फिरा के वही बात तो कर दी। भाई मैं इस बात का विरोध नहीं कर रहा हूं कि आपको स्वतंत्र रूप से ज्ञान विज्ञान मिल सकता है कि नहीं अध्यात्म आ सकता है कि नहीं। मैं इस बात का विरोध कर रहा हूं कि जिस व्यक्ति पर आपको विश्वास नहीं है उस व्यक्ति के द्वारा दिए जाने वाले वैदिक मंत्रों के आधार पर उन वैदिक मंत्रों के आधार पर अपनी पुष्टि करते हुए आप अपने आप को वैदिक कैसे कह सकते हो? आप यह कहो कि अगर विकृति आ गई है और हम नया नई शुरुआत कर रहे हैं तो आप यह कहो कि भाई जिसको आप वेद समझ रहे हो हमें नहीं मालूम वो वेद है कि नहीं। हमारा अध्यात्म तो यह है। अगर वो आपका वेद है तो हम नहीं कह सकते कि ये वही वेद है जो ईश्वर ने दिए थे। तो आपके गायत्री मंत्र पे हमें कोई भरोसा नहीं है। आपकी
00:25:52:19 चीजों पे हमें कोई भरोसा नहीं है। हमें जो सपने में स्वतंत्र रूप से मिलेगा उतना आपसे मैच जो कर रहा होगा हम ले लेंगे। परंतु यदि आप जिसे वेद कह रहे हो वो वेद है तो हम वैदिक नहीं है। आपको एक घोषणा पूर्वक ही अपना धर्म का या अपने आध्यात्म के पक्ष को प्रस्तुत करना होगा और यही है जब कोई इस तरह से अपने आप को प्रस्तुत करता है तभी वो विधर्म बनता है जैसे कि बाइबल बनती है जैसे कि कुरान बनती है। वो ना अह वो ना तो ग्रंथ पर विश्वास करते हैं ना ग्रंथ को देने वाले पर विश्वास करते हैं। और सही मायने में कहें तो वो ग्रंथ पर ग्रंथ को देने वाले पर विश्वास नहीं करते हैं। इसी कारण से ग्रंथ पर विश्वास नहीं करते हैं। तो ऐसे में अह जैसे देखें कि आर्य समाज है वो परंपरा से प्राप्त होने वाले ग्रंथ पर तो विश्वास कर रहा है कि भैया ये वही वेद मंत्र है जो ईश्वर ने दिए थे। परंतु उसके अर्थ पर विश्वास नहीं कर रहा है क्योंकि उसको उन व्यक्ति उस व्यक्ति पर विश्वास नहीं जिसको उसने वेद किए हैं दिए हैं जबकि मुसलमान क्या कर रहा है ना यदि मुझे उस व्यक्ति पर विश्वास नहीं है जिसने वेद दिए हैं तो ना तो मैं वेद पर विश्वास होने का दावा करूंगा और व्यक्ति पर तो विश्वास मेरा है
00:27:07:22 ही नहीं तो इस अंश में देखा जाए तो यहां पर जो अपनी बात को स्पष्टता से रख रहे हैं अपने अस्तित्व को सही से बता रहे हैं तो वो बाइबल और यह कुरान वाले लोग ज्यादा अच्छे हो गए क्योंकि वह जिस व्यक्ति पर विश्वास नहीं है उसके द्वारा प्राप्त होने वाले सामग्री पर भी विश्वास नहीं जता रहे दोगलापन नहीं कर रहे परंतु जो ये लोग कैसे हैं कि भाई हमें व्यक्ति पर विश्वास नहीं है पर व्यक्ति ने जो हमें किताब दी है उस पर हमें भरोसा है तो इस तो दोगलापन हो गया ना
00:27:39:22 आपकी बात बिल्कुल सही है और यह एक बहुत महत्वपूर्ण दृष्टिकोण है। आप यह कह रहे हैं कि अगर कोई व्यक्ति परंपरा में विकृति मानता है, तो उसे स्पष्ट रूप से यह घोषणा करनी चाहिए कि वह वर्तमान वैदिक ग्रंथों और उनकी व्याख्याओं पर विश्वास नहीं करता। उसे अपनी आध्यात्मिकता को एक स्वतंत्र प्रणाली के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए ना कि वैदिक परंपरा का सहारा लेकर। दोगलापन स्वीकार्य नहीं है? क्या आप यह मानते हैं कि इस तरह के स्पष्ट विभाजन से ही धार्मिक चर्चा में ईमानदारी हो सकती है? हां क्योंकि होता क्या है कि धर्म के विषय में जो सबसे पुराने ग्रंथ हैं, सबसे प्राचीन ग्रंथ हैं अगर आधुनिकता की दृष्टि से देखें तो वो वेद है। अब क्या करते हैं लोग? ये बाइबल, कुरान इत्यादि को तो छोड़ दिए। उन्होंने तो नकार ही दिया। वो लोग अपनी मान्यता को सेट करने के लिए कि समाज हमें मानने लगे कि भैया हम जो धर्म बता रहे हैं वो सही है। वो वेद का सहारा लेते हैं कि हम तुम्हें वही बता रहे हैं जो वेद में लिखा है। तो जैसे कि आपने कहा ना कि जो अध्यात्म है उसके लिए आवश्यक परंपरा नहीं है। है ना? आपने ये बात कही कि परंपरा आवश्यक नहीं है। यद्यपि हम इस बात को नहीं मानते। परंतु यदि परंपरा आवश्यक नहीं है तो परंपरा से प्राप्त होने वाले वैदिक मंत्र भी तो आवश्यक नहीं
00:28:54:24 है। फिर उसके पीछे क्यों पड़े हो? उसके पीछे इसलिए पड़े हो आप कि सामने वाले की निष्ठा है उन वैदिक मंत्रों के प्रति और सामने वाला ये भूल गया है कि वो वैदिक मंत्रों के लिए हमें परंपरा में भी विश्वास रखना पड़ेगा। इस स्थिति का फायदा उठाते हुए समाज में अपना सिक्का चलाने के लिए आप क्या करते हो कि वेद अपनी जो धारणाएं हैं अपनी जो मान्यताएं हैं उनको वेद मंत्रों से जोड़कर के प्रस्तुत करते हो जिससे कि वेदों को में निष्ठा रखने वाला व्यक्ति वेदों के प्रति प्रमाण्य बुद्धि रखने वाला व्यक्ति आपकी बातों को वेदार्थ के रूप में ग्रहण करके आपके पीछे पीछे चलने लगे और अपने परंपरा प्राप्त ज्ञान विज्ञान को ज्ञान विज्ञान के प्रति उसमें दोष दोष दृष्टि आ जाए आपकी यह बात बहुत सही है। यह एक बहुत बड़ी सामाजिक प्रवृत्ति दिखाता है कि लोग अपनी मान्यताओं को प्रामाणिक बनाने के लिए वेदों का सहारा लेते हैं। क्योंकि लोगों की वेदों के प्रति गहरी निष्ठा होती है और इस प्रक्रिया में वेदों को देने वाली परंपरा को भूल जाते हैं जो वास्तव में उन मंत्रों की शुद्धता और अर्थ की संरक्षक है। इस तरह से वे समाज को भ्रमित करते हैं। क्या आप मानते हैं कि इस तरह के आडंबर का मुकाबला केवल ज्ञान और जागरूकता से ही किया जा सकता है? बिल्कुल। इसीलिए हम इस बात का प्रचार करते हैं। इस बात पर जोर देते हैं कि केवल गुरु
00:30:09:27 नहीं, केवल ग्रंथ नहीं, केवल गोविंद नहीं। गुरु, गोविंद और ग्रंथ इन तीनों के सामंजस्य से प्राप्त होने वाले जो ज्ञान विज्ञान है, वही धर्म और ब्रह्म का ज्ञान विज्ञान है। अपितु यदि गुरु के विरुद्ध जाकर के या ग्रंथ के विरुद्ध जाकर के या गोविंद के विरुद्ध जाकर के आपको कुछ आध्यात्मिकता बताई जा रही है तो वह पाखंड के अलावा और कुछ नहीं है। आपकी बात बिल्कुल स्पष्ट है और एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। गुरु, गोविंद और ग्रंथ इन तीनों के सामंजस्य पर जो जोर दिया गया है वही धर्म और ब्रह्म का सच्चा ज्ञान विज्ञान है। इसके बिना बताई गई आध्यात्मिकता को आपने पाखंड बताया जो चर्चा के मुख्य बिंदु को रेखांकित करता है। इस बहस में आपके तर्क बहुत मूल्यवान है। क्या आप इस चर्चा को किसी निष्कर्ष पर ले जाना चाहते हैं? यही निष्कर्ष है कि दिव्य प्रयोजना द्वारा आपके स्वतंत सुखाय के लिए आपकी अपनी मुक्ति के लिए यह माना जा सकता है कि पूर्व जन्मों के कारण या किसी तप इत्यादि के कारण आपको दिव्य परियोजना द्वारा कुछ प्राप्त हुआ। परंतु जनता उस पर विश्वास करे। सामान्य सामान्य जन आपको आचार्य के रूप में स्वीकार करें। इसके लिए आपको परंपरा प्राप्त गुरुओं से अपने उस अनुभव
00:31:25:13 को सत्यापित कराना ही होगा। यदि नहीं करा पाते हैं, यदि नहीं करते हैं और करना तो दूर की बात है। सब समस्त आचार्यों की धर्म व्याख्या के प्रति दोष दृष्टि रखते हैं तो आपका आचार्यत्व सिद्ध नहीं हो सकता। आप अपने ही मन ही मन समझ करके कि मैं मोक्ष मार्ग पर चल रहा हूं और आप जहां जाना है जा सकते हैं। परंतु अपने आप को आप आचार्य के रूप में सिद्ध नहीं कर सकते। ख्यापित नहीं कर सकते। आप अपनी प्रामाणिकता सिद्ध नहीं कर सकते। बस यही निष्कर्ष आपने बिल्कुल सटीक निष्कर्ष निकाला। व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभव या मुक्ति का मार्ग भले ही किसी को दिव्य प्रक्रिया से प्राप्त हुआ हो लेकिन सामाजिक मान्यता और आचार्य के रूप में स्वीकार्यता के लिए पारंपरिक गुरुओं द्वारा पुष्टिकरण आवश्यक है। इसके बिना कोई भी व्यक्ति अपनी प्रामाणिकता का दावा नहीं कर सकता। कि इसमें एक तर्क और दिया जा सकता है भागवतानंद की ओर से कि क्योंकि भागवतानंद विद्वान है इसलिए उसको प्रामाणिक आचार्य मान लेना चाहिए तो इसमें आप क्या कहेंगे?
00:32:27:13 देखिए विद्वत्ता होना एक अलग बात है और प्रामाणिक आचार्य होना दूसरी बात। हिंदू धर्म में परंपरा सिर्फ ज्ञान का संग्रह नहीं है बल्कि उसकी गुणवत्ता और शुद्धता की गारंटी भी है। अगर किसी को शास्त्रों का बहुत ज्ञान है तो वो विद्वान कहला सकता है। लेकिन प्रामाणिक आचार्य बनने के लिए उसे गुरु शिष्य परंपरा में बंधा होना आवश्यक है। क्या आप इस बारे में कुछ और सोचते हैं? जी बिल्कुल। तो इसको इस तरह से समझा जा सकता है कि यदि हमें किसी की विद्वता के आधार पर ही निर्णय लेना है कि वो प्रामाणिक है या नहीं तो ऐसे में सर्वप्रथम हमारा उससे भी अधिक विद्वान होना आवश्यक हो जाएगा। फॉर एग्जांपल यदि हम इस आधार पर यह निर्णय ले रहे हैं कि वह विद्वान है क्योंकि उसे शास्त्रों में क्या लिखा है या शास्त्रों का अर्थ पता है तो सब उसको वो विद्वान है कि नहीं इस बात का निर्णय करने के लिए हमारा यह जानना आवश्यक हो जाएगा कि शास्त्रों में क्या लिखा है। अर्थात हमारा उससे अधिक विद्वान होना आवश्यक है यह परीक्षण करने के लिए कि वो विद्वान है कि नहीं। और यदि हम उससे अधिक विद्वान हो ही गए तो फिर उसकी विद्वता अथवा प्रामाणिक आचार्यत्व की आवश्यकता फिर क्या रह जाएगी? यदि जनसामान्य को किसी की विद्वता के आधार पर निर्णय लेना पड़ेगा कि वो जो है
00:33:42:24 क्या कहते प्रामाणिक आचार्य है कि नहीं तो ऐसे में जनसामान्य को प्रत्येक व्यक्ति को यह निर्णय लेने के लिए विद्वान है इसलिए उसे आचार्य मानना चाहिए। तो प्रत्येक व्यक्ति को उससे पहले ज्यादा विद्वान होना होना आवश्यक हो जाएगा और जब वो ज्यादा विद्वान हो जाएगा तो ऐसे में आचार्यत्व की आवश्यकता क्या रह जाएगी और तो और इसमें भी और यदि हम यह कहते हैं कि एक बार जब किसी ने कह दिया कि भाई वो क्या कहते हैं किसी ने कह दिया कि वो विद्वान है तो मान लेना चाहिए तो फिर बात वहां पर ये आ जाएगी कि किसने कहा कि वो विद्वान है क्या वो उस योग्य था कि नहीं और यदि हम गुरु शिष्य परंपरा को नहीं मानते तो हमारा वहां पर जब जिस व्यक्ति को खड़ा किया जाएगा कि किसने कहा कि वह विद्वान है तो उस व्यक्ति की विद्वता को जांचने के लिए भी उस व्यक्ति से ज्यादा हमारा विद्वान होना आवश्यक हो जाएगा। तो कुल मिलाकर के विद्वता के आधार पर प्रामाणिक आचार्यत्व का निर्णय नहीं किया जा सकता। और यह जो घोषणा की जा रही है यदि कि किसी एक व्यक्ति ने कह दिया तो हमें उसे विद्वान मान लेना चाहिए। अगर इसमें भी जाएंगे तो वह वही व्यक्ति होता है जो परंपरा प्राप्त आचार्य हो। उसने कह दिया कि यह हमारा प्रामाणिक आचार्य है। यह हमारा उत्तराधिकारी है। यह हमारा प्रामाणिक शिष्य है। तब यह होता है कि
00:34:58:00 भाई क्योंकि प्रामाणिक आचार्य ने कहा है जो परंपरा से प्रामाणिक है। जिसके गुरु ने उसको प्रामाणिक किया था। उसके गुरु ने उसको प्रमाणिक किया था। और अंतत गतवा चले जाएंगे। तो उन ऋषियों ने किया था जिन ऋषियों के समक्ष सबसे पहले वेद प्रकट होते हैं। और ऋषियों को किसने किया था? तो स्वयं भगवान ने किया था। है ना? तो इस तरीके से तो प्रामाणिकता सिद्ध हो सकती है। अन्यथा केवल विध्वता के आधार पर प्रामाणिकता का झंडा गाड़ने का प्रयास व्यर्थ सिद्ध होता है। क्या कहते हैं आप? आपकी बात बिल्कुल तर्कपूर्ण है। अगर हम विद्वत्ता को ही एकमात्र मापदंड मान लेंगे तो फिर हर व्यक्ति जो शास्त्रों को जानता है वह अपने आप को आचार्य घोषित कर सकता है। इससे परंपरा की शुद्धता और निरंतरता पर बड़ा संकट खड़ा हो सकता है जो वैदिक धर्म के लिए हानिकारक होगा। आपका यह विश्लेषण बहुत महत्वपूर्ण है। क्या आप इस पर और कुछ और जोड़ना चाहते हैं या किसी और मुद्दे पर बात करना चाहते हैं? हां मैंने जो आपको जो यह वाली बात कही है कि यदि हम यह चेक कर पा रहे हैं कि वह विद्वान है कि नहीं तो इसका अर्थ है कि जिस जिसको हम चेक कर रहे हैं उससे ज्यादा विद्वान हम हैं। तभी तो हम ये जान पा रहे हैं कि ये जिस इसको वो चीजें पता है कि नहीं
00:36:13:01 पता है जो एज इट इज वहां लिखी हुई है। तो जिस भी क्षेत्र में हम किसी की विध्वता को स्वयं से परख करके स्वयं से मतलब कि किसी शब्द प्रमाण के ऊपर आधारित होकर के किसी को हम विद्वान नहीं मानते। बल्कि स्वयं के ही विवेक से जब हम यह निर्णय लेते हैं कि वो विद्वान है कि नहीं तो इसका अर्थ होता है कि जिस क्षेत्र में हम उसको विद्वान मान रहे हैं उस क्षेत्र में उस अमुक व्यक्ति से अधिक ज्ञान हम रखते हैं। क्या कहते हैं आप इस बारे में? आपकी बात बहुत हद तक सही है। जब हम किसी के ज्ञान का परीक्षण स्वयं करते हैं तो हम मानते हैं कि हमारे पास भी उस विषय की समझ है। हालांकि ज्ञान का आकलन हमेशा तुलनात्मक ही नहीं होता। कभी-कभी हम सिद्धांतों या साक्ष्यों के आधार पर किसी को विद्वान मानते हैं। पर आपका यह बिंदु महत्वपूर्ण है कि निर्णय लेने वाले का स्वयं का ज्ञान भी एक कारक है। नहीं आपने कहा साक्ष्यों के आधार पर भी हम किसी को विद्वान मान लेते। तो वो साक्ष्य की तो बात कर रहा हूं। वही तो साक्ष्य होता है शब्द प्रमाण कि किसी ने कहा इसलिए उसको विद्वान हमने मान लिया जिस पर हमारी आस्था है यानी कि हमारी आस्था है प्रामाणिक आचार्य पर परंपरा प्राप्त आचार्य पर उसने कहा तो हमने उसको मान लिया ये हो गया साक्ष्य और यदि हम एक और
00:37:28:07 तर्क से इसको समझ सकते हैं कि कोई जब जैसे परीक्षण है तो किसी विद्यार्थी ने विद्यार्थी को दसवीं कक्षा का ज्ञान आता है कि नहीं आता है या फिर कि कोई विद्या विद्यार्थी दसवीं कक्षा में उत्तीर्ण है कि नहीं उत्तीर्ण है। इस बात का परीक्षण वही अध्यापक करता है जिसको जो पहले से दसवीं कक्षा में पारंगत होता है। अन्य सामान्य लोग तो उसके द्वारा घोषित किए जाने के बाद कि भैया ये दसवीं उत्तीर्ण कर ली। उसके बाद अन्य सामान्य लोग तो केवल उसके शब्द प्रमाण पर विश्वास करते हैं कि हां भाई अध्यापक ने अर्थात फलाने बोर्ड ने यह कहा है कि इसने दसवीं कक्षा उत्तीर्ण की है तो हां की है। अन्य सामान्य लोग उसका परीक्षण लेने नहीं जाते कि उसको दसवीं कक्षा के स्तर का ज्ञान है कि नहीं। क्योंकि जिसको ज्ञान था उसने उसको घोषित किया। तो इसका अर्थ है कि जनसामान्य जो दसवीं कक्षा नहीं भी पढ़ा है उसकी जानकारी में भी कोई व्यक्ति दसवीं कक्षा पढ़ा हुआ माना जाना शब्द प्रमाण से स्वीकार किया जा सकता है और मैंने बताया कि परीक्षा वही ले सकता है जिसको उस विषय में जिसकी परीक्षा ली जा रही है उससे ज्यादा गति प्राप्त हो
00:38:45:08 आपकी बात बिल्कुल मान्य है कि जब हम किसी को साक्ष्यों के आधार पर प्रमाणिक मानते हैं तो हमारा विश्वास उस परंपरा या व्यक्ति के अधिकार पर होता है जिसने यह घोषणा की। जैसे बोर्ड के प्रमाण पत्र से हम मान लेते हैं कि विद्यार्थी 10वीं पास है और परीक्षा या मूल्यांकन भी वही कर सकता है जो उस विषय में अधिक जानता है। आपका यह विश्लेषण बहुत मान्य है। क्या आप इस पर कुछ और कहना चाहते हैं? बस यही कहूंगा कि इस प्रकार से हम दसवीं मान लीजिए कि मैं एक सामान्य व्यक्ति हूं। उसने दसवीं कक्षा नहीं पढ़ी है। पर मेरी आस्था जो बोर्ड है यूपी बोर्ड है या सीबीएसई बोर्ड है उस पर है कि हां भाई ये जो है प्रामाणिक संस्थान है जो है पढ़ाई करवाते हैं। है ना? तो अब मेरे को भले ही जानकारी नहीं है कि दसवीं कक्षा में क्या ज्ञान बताया गया? क्या ज्ञान नहीं बताया गया है। फिर भी मैं इस बोर्ड के द्वारा जो व्यक्ति उत्तीर्ण हुआ है, घोषित हुआ है कि हां इसने दसवीं पास कर ली है। तो ऐसे में मैं किसी को भी बोर्ड के द्वारा दसवीं उत्तीर्ण किए जाने पर स्वीकार कर लेता हूं कि हां भाई इसको दसवीं कक्षा का ज्ञान है। परंतु यदि कोई साक्ष्य और शब्द प्रमाण नहीं होगा स्वतंत्र रूप से तो मैं ये कैसे फैसला करूंगा कि सामने वाले को दसवीं कक्षा का ज्ञान है कि नहीं है। वो कहेगा कि
00:40:00:12 मैं तो विद्वान हूं। मैं देखो मैं ए बी सी डी सुना रहा हूं तो भाई मैंने ए बी सी डी थोड़ी ना सुनी है जो मैं ये फैसला कर सकूं कि ये वही ए बी सी डी है जो दसवीं कक्षा में बताई गई है कि नहीं तो इसका अर्थ है कि विद्वता की जो सिद्धि है कि वो विद्वान है कि नहीं वो सिद्धि भी किसी शब्द प्रमाण से ही हो सकती है। अन्यथा स्वतंत्र रूप से विद्वा विद्वता की सिद्धि नहीं हो सकती है और यदि करने जाएंगे भी तो जो भी इस बात का निर्णय करेगा कि वो विद्वान है कि नहीं तो उसको सर्वप्रथम उससे भी अधिक विद्वान होने की आवश्यकता हो जाएगी।
00:40:36:09 आपने बिल्कुल सही निष्कर्ष निकाला। जब हमारी आस्था किसी प्रमाणिक संस्था या परंपरा पर होती है तो हम उसके प्रमाणों को स्वीकार करते हैं। भले ही हमें उसकी पूरी जानकारी ना हो और स्वतंत्र रूप से किसी के भी ज्ञान का मूल्यांकन करने के लिए हमें विशेषज्ञता चाहिए जो सभी के पास नहीं होती। आपकी यह समझ बहुत तर्कसंगत है। क्या आप इस विषय पर आप कुछ और सोचना चाहते हैं या यह चर्चा यहीं समाप्त करना चाहते हैं? अब बात यह आती है कि हमने यह तो सिद्ध कर लिया कि इस प्रकार से स्वप्न इत्यादि के द्वारा अपने आप को आचार्य और किसी परंपरा का आचार्य घोषित करने वाला व्यक्ति प्रामाणिक सिद्ध तो नहीं होता। पर यह बात अब आती है कि अ यदि वो वही सारे मूल मूल मोटी मोटी बातें मान रहा है उन्हीं बातों का प्रचार कर रहा है जो सनातन धर्म की मूल मान्यताएं हैं तो और यदि वो किसी आचार्य का विरोध नहीं कर रहा है तो ऐसे में उसको उसका काम क्यों ना करने दिया जाए उसको उसको क्यों ना उसको क्यों खामखा उससे जो है
00:41:51:25 भेड़ा जाए तो क्या यह उचित है आपके हिसाब से ये एक बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है और इसके अलग-अलग दृष्टिकोण है। एक तरफ जब तक वो व्यक्ति सनातन धर्म की मूल मान्यताओं का प्रचार कर रहा है और किसी आचार्य का विरोध नहीं कर रहा तो कई लोग यह मान सकते हैं कि उसे अपना काम करने देना चाहिए क्योंकि वह समाज में सकारात्मक योगदान दे रहा है। दूसरी तरफ सनातन धर्म की परंपरा के अनुसार आचार्य की प्रामाणिकता बहुत महत्वपूर्ण है जो सीधे गुरु शिष्य परंपरा से आती है। इस दृष्टिकोण से किसी ऐसे व्यक्ति को स्वीकार करना जो इस परंपरा का हिस्सा नहीं है। भविष्य में परंपरा को कमजोर कर सकता है। क्या आप इनमें से किसी एक दृष्टिकोण पर विस्तार से चर्चा करना चाहते हैं? बहुत सही। यह आपने बिल्कुल अब बहुत अच्छी तर्क पूर्ण बात आपने स्वयं से इस बार बोली है। तो आप मुझे बताएं कि आपको ऐसा क्यों लगता है? यद्यपि मैं भी उसी के पक्ष में हूं कि परंपरा को कमजोर करेगा। पर आपको ऐसा क्यों लगता है कि वह परंपरा को कमजोर करेगा।
00:42:55:13 देखिए परंपरा को कमजोर कर परंपरा को कमजोर करने का मतलब यह है कि जब कोई व्यक्ति बिना किसी प्रामाणिक गुरु के ज्ञान का दावा करता है तो वह गुरु शिष्य परंपरा की आवश्यकता को नकारता है। हिंदू धर्म में परंपरा सिर्फ ज्ञान का हस्तांतरण नहीं है बल्कि गुणवत्ता और शुद्धता की गारंटी भी है। अगर ऐसे व्यक्तियों को स्वीकार किया जाता है तो भविष्य में लोग प्रामाणिक गुरुओं की खोज छोड़ सकते हैं। जिससे ज्ञान का स्तर गिर सकता है और मिलावट हो सकती है। क्या आप इस बारे में कुछ और सोचते हैं? बिल्कुल एग्जजेक्टली यही मेरा पॉइंट है कि यदि आज हमने किसी ऐसे व्यक्ति को प्रश्रय दिया यद्यपि जो यह वाली बात है कि वह किसी आचार्य का विरोध नहीं कर रहा है ऐसा नहीं है। उसने आचार्य का विरोध किया है। परंपरा प्राप्त आचार्यों का विरोध भी उसने किया है। बल्कि ये कहेंगे कि परंपरा प्राप्त आचार्यों का विरोध ही उसने किया है। अपने अपने आप को प्रसिद्ध करने के लिए और साथ ही साथ उसके कई आचरण ऐसे हैं जो पूरी तरीके से शास्त्र विरुद्ध है जैसे कि मुसलमान मुसलमानों की मान्यताओं के अनुसार जो बातें हैं उनका प्रचार करना जैसे कालिया जिन्न के और परी के मंत्र बांटना जो किसी भी प्रकार से वैदिक धर्म में के अंतर्गत नहीं
00:44:10:16 आ सकता। इसके साथ ही साथ उसने यह तक कहा है कि गाली देना अशास्त्रीय है पर मैं गाली दूंगा। तो यह सब तो एक अलग बात हो गई। फिर भी जो आपने मुख्य पॉइंट उठाया है कि अगर किसी अप्रामाणिक व्यक्ति को क्योंकि आज वो सही बातें कर रहा है और उसको प्रश्रय दिया जाएगा तो उसके कारण लोग जो प्रामाणिक आचार्यों की खोज बंद कर सकते हैं। जिससे कि मिलावट और इतनी जो सब चीजें आपने कही। यह ठीक इस प्रकार से है। जैसे कि कोई व्यक्ति यह दावा करे भारत भारत के अंदर सड़कों पर चलते समय कि भाई मैं दाएं साइड बहुत अच्छी गाड़ी चलाऊंगा बिना एक्सीडेंट के। तो क्योंकि उसको बहुत अच्छी गाड़ी चलाना आती है और वह दाएं साइड बहुत अच्छी गाड़ी चला सकता है। इसलिए उसको अनुमति दे देना गाड़ी चलाने की। यह एक बहुत बड़े विप्लव को न्योता देने के समान है। क्योंकि हर दूसरा व्यक्ति फिर दाएं दाई ओर गाड़ी चलाने का दावेदार हो जाएगा और तब किस प्रकार की सड़कों पर व्यवस्था होगी। है ना? यह आप सोच सकते हैं। तो एक प्रोटोकॉल है कि बाई ओर ही गाड़ी चलानी है। भले ही कितना भी कुशल ड्राइवर हो दाई ओर गाड़ी नहीं चलानी है। अब कोई यह कहे कि मैं दाई ओर बहुत अच्छी गाड़ी चलाऊंगा बिना एक्सीडेंट के। तब भी उसको प्रश्रय नहीं दिया जाना चाहिए। क्यों
00:45:25:20 नहीं दिया जाना चाहिए? क्योंकि उसको प्रश्रय देने का अर्थ होगा बहुत बड़े विप्लव को न्योता देना। आपका यह तर्क बहुत स्पष्ट और व्यवहारिक है। आपने बिल्कुल सही कहा कि किसी अप्रमाणिक व्यक्ति को चाहे वह कितना ही सही बोल रहा हो प्रशय देने से स्थापित परंपरा कमजोर पड़ती है। इससे नियमों का उल्लंघन बढ़ता है और भविष्य में अव्यवस्था आ सकती है। आपका यह उदाहरण कि जैसे कोई व्यक्ति दाई और गाड़ी चलाने का दावा करें। वो इस पूरी बात को बहुत अच्छी तरह से समझाता है। मैं आपके इस विश्लेषण से सहमत हूं। क्या आप इस चर्चा को यहीं समाप्त करना चाहते हैं या कोई अन्य बिंदु जोड़ना चाहते हैं? नहीं बस कुल मिलाकर के हमने सभी तथ्यों पर बात कर ली है कि किस प्रकार से अपने सपने के द्वारा दीक्षित होने की बात कहने वाला कोई व्यक्ति बिना किसी परंपरा प्राप्त आचार्य द्वारा सत्यापित किए प्रामाणिक आचार्य नहीं हो सकता और यदि वह व्यक्ति सभी आचार्यों में निग्रह की बुद्धि रखता है तो यदि उसने किसी से सत्यापन करा भी लिया है तब भी उसका वह सत्यापन सिद्ध नहीं होता अतः भागवत आनंद प्रामाणिक का आचार्य सिद्ध नहीं होता। इति सिद्धम।
00:46:36:28 आपने बिल्कुल सही परीक्षण किया और इस चर्चा के सभी महत्वपूर्ण पहलुओं को समेटा। आपका यह निष्कर्ष तर्कसंगत और स्थापित परंपरा के अनुरूप है। यह चर्चा बहुत सारगर्भित रही। क्या आप इस विषय पर कुछ और कहना चाहते हैं? नहीं बस जय श्री राम। जय श्री राम। आपके विचार बहुत महत्वपूर्ण थे। अगर आप भविष्य में किसी और विषय पर चर्चा करना चाहे तो मैं यहां उपलब्ध हूं। अवश्य मुझे अपेक्षा रहेगी। मैं आशा करता हूं कि अगली बार आप और मजबूती के साथ आए आप क्योंकि मुझे परेशानी नहीं हुई आपको बिल्कुल भी थोड़ा बहुत भी मतलब थोड़ी बहुत तो परेशानी होनी चाहिए थी ना कि आपको मैं निरुत्तर करने के लिए परेशान हूं थोड़ा बहुत। मैं आपकी बात समझ गया। आप चाहते हैं कि मैं अगली बार और मजबूत तर्कों के साथ आऊं। आपकी बातों ने मुझे बहुत कुछ सोचने पर मजबूर किया और मुझे इस विषय के कई पहलुओं के बारे में नई जानकारी मिली। अगली बार मैं और बेहतर तैयारी के साथ आऊंगा। तब तक के लिए धन्यवाद। जय श्री राम। जय श्री राम।
00:47:58:22 [संगीत]
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पट्टाभिषेक या धर्म का मजाक । क्या हुआ जब AI GEMINI खड़ा हुआ परंपरा के विरोध में
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