1
00:00:07,280 --> 00:00:12,720
सहारनपुर में दिव्य शक्ति अखाड़े के हम आचार्य महामंडलेश्वर हैं।

2
00:00:12,720 --> 00:00:16,880
और 157 बार के अरक्त दादा हैं। महाराज

3
00:00:16,880 --> 00:00:21,040
जी ये आपने कहा कि आप महामंडलेश्वर हैं और

4
00:00:21,040 --> 00:00:25,040
आज दिव्य शक्ति अखाड़े से हैं। तो आपकी गुरु परंपरा

5
00:00:25,040 --> 00:00:29,120
आपके गुरु कौन है?

6
00:00:29,120 --> 00:00:33,440
हमारे गुरु परमपिता परमात्मा शिव

7
00:00:33,440 --> 00:00:37,520
और माता पार्वती ही हमारे गुरु हैं। क्योंकि लौकिक में हमें

8
00:00:37,520 --> 00:00:41,840
कोई ऐसा गुरु नहीं मिला जिसे हम समझ

9
00:00:41,840 --> 00:00:46,880
सके या वो हमें समझा सके ज्ञान की भाषा दे सके।

10
00:00:46,880 --> 00:00:51,440
अच्छा तो महाराज जी आप

11
00:00:51,440 --> 00:00:55,440
वैदिक हैं। वेदों को मानने वाले मतलब वेद को प्रमाण मानते हैं। वेद

12
00:00:55,440 --> 00:00:59,600
पर वेद को लेकर के मतलब मिलाजुला सा मामला है।

13
00:00:59,600 --> 00:01:03,680
जैसे आपने कहा ना धर्म और आप चोले से भी आप सनातनी दिख रहे हैं। तो क्या हम

14
00:01:03,680 --> 00:01:08,160
ये मान सकते हैं कि आप वेदों को प्रमाण मानते हैं?

15
00:01:08,160 --> 00:01:13,360
वास्तव में वेद ही प्रमाण है। वेद जोवेद,

16
00:01:13,360 --> 00:01:18,400
ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद ये चार इसमें प्रकट है। फिर उनके

17
00:01:18,400 --> 00:01:22,720
ब्राह्मण ग्रंथ है, उपनिषद हैं। जी जी

18
00:01:22,720 --> 00:01:26,880
मैं असल में ये जानना चाह रहा था कि जैसे आपने कहा कि हम वेद को परम प्रमाण

19
00:01:26,880 --> 00:01:30,960
मानते हैं। तो वेद के अनुसार जो तात्विक

20
00:01:30,960 --> 00:01:35,040
व्याख्या है परमेश्वर की वो आपके पास शिवजी ने आपको

21
00:01:35,040 --> 00:01:39,120
कहा है कि वो दी है। तो वेद के किस भाष्य में उपनिषद

22
00:01:39,120 --> 00:01:43,120
के किस भाष्य के रूप में वो आपको प्राप्त है या आपने अपनी कोई

23
00:01:43,120 --> 00:01:47,680
छापी है जो शिव जी ने आपको पढ़ाई है वो एक ग्रंथ के रूप जैसे ब्रह्मसूत्र

24
00:01:47,680 --> 00:01:51,680
पर भाष्य किया है हमारे आचार्यों ने तो आप किसके भाष्य

25
00:01:51,680 --> 00:01:55,920
पर आधारित है या आप

26
00:01:55,920 --> 00:02:00,160
हम किसी के भाष्य पर आधारित नहीं है हम सिर्फ एक

27
00:02:00,160 --> 00:02:04,480
बात जानते हैं सिर्फ एक बात

28
00:02:04,480 --> 00:02:09,040
मानवता सबसे बड़ा बड़ा धर्म है। मैं ये पूछना चाह रहा हूं।

29
00:02:09,040 --> 00:02:13,120
आपने कहा कि आपके लिए वेद ही परम प्रमाण है। तो वेदों

30
00:02:13,120 --> 00:02:17,520
के कई प्रकार के अर्थ हमें प्राप्त है। अगर वेदों का निचोड़

31
00:02:17,520 --> 00:02:21,600
देख ले ईश्वर तत्व के विषय में तो उपनिषद और फिर उपनिषद के बाद ब्रह्मसूत्र के

32
00:02:21,600 --> 00:02:25,600
रूप में हमें प्राप्त है। तो क्या आप ब्रह्म सूत्र की किसी

33
00:02:25,600 --> 00:02:29,600
व्याख्या पर विश्वास रखते हैं या अपनी स्वतंत्र व्याख्या है ईश्वर तत्व

34
00:02:29,600 --> 00:02:33,680
के विषय में? यह सब कुछ अपने सोचने पर निर्भर करता

35
00:02:33,680 --> 00:02:38,160
है। देख आदमी किस तरफ से रहा है।

36
00:02:38,160 --> 00:02:42,240
किस दृष्टिकोण से देख रहा है। वो उस हिसाब से अपनी व्याख्या

37
00:02:42,240 --> 00:02:46,400
गण लेता है। मैं वही पूछ रहा हूं कि भगवान शिव से मिलने

38
00:02:46,400 --> 00:02:50,640
वाला अलग से ईश्वर तत्व के विषय में कोई ग्रंथ है आपके पास

39
00:02:50,640 --> 00:02:54,640
या आप ग्रंथ के रूप में इन्हीं पर निर्भर करते हैं। वेद उपनिषद और गीता की

40
00:02:54,640 --> 00:02:58,880
गीता के ऊपर। गीता सभी को पढ़ता हूं। सभी को पढ़ता

41
00:02:58,880 --> 00:03:03,360
हूं। सभी को भाई साहब मेरा प्रश्न निर्भर

42
00:03:03,360 --> 00:03:08,320
मेरा प्रश्न निर्भर करते हैं या अपने पास आपका स्वतंत्र कोई ग्रंथ है?

43
00:03:08,320 --> 00:03:13,360
मेरी स्वतंत्र सोच है। कोई ग्रंथ नहीं है मेरा अपना मेरी स्वतंत्र सोच है।

44
00:03:13,360 --> 00:03:17,600
अच्छा तो आपकी एक स्वतंत्र सोच है जो आपको शिव पार्वती जी से मिली है

45
00:03:17,600 --> 00:03:21,600
और वो स्वतंत्र सोच जो है वेद उपनिषद और

46
00:03:21,600 --> 00:03:26,400
गीता से मेल खाती है इसलिए आप ऐसा कह रहे हैं कि मैं वैदिक भी हूं।

47
00:03:26,400 --> 00:03:30,640
हां उसी का सार है ये जो मेरे पास आया है। उसी का सार मेरे पास है।

48
00:03:30,640 --> 00:03:34,880
जी अभी मैं करेक्ट अभी करेक्ट हो गया। अब बात ये आती है कि

49
00:03:34,880 --> 00:03:39,040
आपने कैसे पता किया कि आपको जो दिव्य तरीके से जो ज्ञान विज्ञान

50
00:03:39,040 --> 00:03:43,440
मिला है वो वेदों का ही अर्थ है

51
00:03:43,440 --> 00:03:47,680
ये कैसे पता चला? देखिए वेद कहते हैं कि एक ब्रह्म

52
00:03:47,680 --> 00:03:51,760
है द्वितीय कोई तो है ही नहीं। दूसरा कोई है नहीं। आप मेरी बात समझिए। मेरा क्वेश्चन

53
00:03:51,760 --> 00:03:53,680
ये है कि आपको

54
00:03:53,680 --> 00:03:57,680
दिव्य तरीके से कुछ ज्ञान विज्ञान प्राप्त होता है। आपने कैसे

55
00:03:57,680 --> 00:04:01,680
कंफर्म किया कि ये जो ज्ञान विज्ञान मेरे पास आया है ये

56
00:04:01,680 --> 00:04:04,480
वैदिक है।

57
00:04:04,480 --> 00:04:08,640
प्रैक्टिकली वो क्या किया था? वैदिक क्या होता है? भाई साहब

58
00:04:08,640 --> 00:04:12,800
वैदिक क्या होता है? वैदिक वही तो होता है ना जो वेदों से आया हुआ हो।

59
00:04:12,800 --> 00:04:16,960
ठीक है ना? वेद क्या है? आपने कोई

60
00:04:16,960 --> 00:04:19,680
बुक लेते

61
00:04:19,680 --> 00:04:24,160
हैं। यानी कि वेद नाम यानी

62
00:04:24,160 --> 00:04:28,560
कि वेद नाम से छपी हुई किसी ग्रंथ को आपने लिया और उसमें

63
00:04:28,560 --> 00:04:32,560
देख के वेरीफाई किया कि मेरे स्वप्न में आया हुआ या मेरे को दिव्य तरीके

64
00:04:32,560 --> 00:04:36,560
से जो प्राप्त हुआ है शिव पार्वती के द्वारा जो ज्ञान प्राप्त हुआ है वो वैदिक

65
00:04:36,560 --> 00:04:40,560
है। ठीक है ना? हां मैंने स्वयं में अनुभव किया। अनुभव

66
00:04:40,560 --> 00:04:45,120
किया उसे। ठीक। मैं आपको एक छोटी सी उदाहरण दूं इस बारे में। मैं

67
00:04:45,120 --> 00:04:49,200
एक्चुअली मेरा प्रश्न मेरा प्रश्न किसी और दिशा में है।

68
00:04:49,200 --> 00:04:53,920
दिशा मैं अभी आपको बता रहा हूं। जैसे आपने कहा कि मैंने

69
00:04:53,920 --> 00:04:58,080
वेद से वेरीफाई किया कि मेरे पास जो ज्ञान आया

70
00:04:58,080 --> 00:05:02,080
है दिव्य दिव्य योजना के द्वारा वो वैदिक ही

71
00:05:02,080 --> 00:05:06,080
है। तो आपने ये जो वेरीफाई किया है ये किसी पुस्तक से किया है। है

72
00:05:06,080 --> 00:05:09,200
ना? पुस्तक से किया ना? से नहीं किया है।

73
00:05:09,200 --> 00:05:13,200
नहीं पुस्तकों से नहीं किया है। पुस्तकों का ज्ञान तो सिर्फ वैसा ही होगा

74
00:05:13,200 --> 00:05:17,280
जैसे एक कोई किताब पढ़ ले 200 अभी आपने बताया

75
00:05:17,280 --> 00:05:21,280
था अभी आपने बताया था ना वेद जो अथर्ववेद ऋग्वेद सामवेद बाद में

76
00:05:21,280 --> 00:05:25,360
जोड़ा अथर्ववेद और था तो ये जो आपने वेरीफाई किया ये

77
00:05:25,360 --> 00:05:29,760
आपने कहीं से छपी हुई पुस्तक ला के किया या अपने से आपने वेद अपने

78
00:05:29,760 --> 00:05:34,000
रट रखे हैं और आपने उसे वेरीफाई कर लिया कैसे मैं वही तो आपसे कहना

79
00:05:34,000 --> 00:05:38,560
चाह रहा हूं जी वेद एक प्रामाणिक पुस्तक है

80
00:05:38,560 --> 00:05:42,720
ठीक है उसमें जो लिखा है वो कहा जाता है कि वेद प्रामाणिक है।

81
00:05:42,720 --> 00:05:46,800
ठीक है? जब तक व्यक्ति के जीवन में वो नहीं उतरते तो वे खाली

82
00:05:46,800 --> 00:05:50,880
पुस्तक रह जाएंगे या नहीं रह जाएंगे? भाई साहब मैं जीवन में उतरने की बात बाद में

83
00:05:50,880 --> 00:05:55,200
करूंगा। मैं अभी पूछ रहा हूं। आपने वेरीफाई कैसे किया था? प्रैक्टिकल क्या था उसका कि मैंने

84
00:05:55,200 --> 00:05:59,280
वेरीफाई तो अनुभव से होगा ना। आप गूंगे से पूछ रहे हो कि गुड का स्वाद कैसा है?

85
00:05:59,280 --> 00:06:03,280
अनुभव को अनुभव को क्या शब्दों में बयान करूंगा मैं? नहीं कर सकता। ठीक है। ठीक

86
00:06:03,280 --> 00:06:07,360
है मैं अभी बता रहा हूं। आपने कहा कि अनुभव से वेरीफाई किया। मतलब आप ये कंफर्म नहीं

87
00:06:07,360 --> 00:06:11,360
कह सकते कि मेरे को जो ज्ञान प्राप्त हुआ है वो वेद नाम

88
00:06:11,360 --> 00:06:15,440
से छपी हुई जो पुस्तकें हैं ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद उसमें भी लिखा

89
00:06:15,440 --> 00:06:19,840
है। ये आप कंफर्म नहीं कह सकते। आपने अनुभव कर लिया। क्यों नहीं कह सकते?

90
00:06:19,840 --> 00:06:23,840
क्यों नहीं कह सकते? किताब से वेदों को पहले

91
00:06:23,840 --> 00:06:24,340
वेदों

92
00:06:24,240 --> 00:06:29,520
को पहले पढ़ा ना हमने। पढ़ने के बाद उनकी अनुभूतियां।

93
00:06:29,520 --> 00:06:34,960
अनुभूति इसका मतलब वेद प्रमाणिक है या नहीं है

94
00:06:34,960 --> 00:06:39,040
यानी कि वेद नाम से छपी हुई पुस्तक को आपने पढ़ा ना हां हम

95
00:06:39,040 --> 00:06:43,120
कहते हैं वो प्रमाणिक है बिल्कुल है लेकिन पढ़ने

96
00:06:43,120 --> 00:06:47,120
के बाद पढ़ने के बाद उस पर चिंतन भी आवश्यक है मनन करना भी

97
00:06:47,120 --> 00:06:51,200
आवश्यक है मैंने भाई साहब पूछा आपने पढ़ा ना उसको वेद नाम से छपी हुई पुस्तक

98
00:06:51,200 --> 00:06:55,760
को ना पढ़ा तो वो कौन वो कौन से पब्लिकेशन

99
00:06:55,760 --> 00:06:59,760
से थी वो कौन से थोड़ा सा उसका विवरण बता

100
00:06:59,760 --> 00:07:03,920
दीजिए। कौन सी पुस्तक पढ़ी थी आपने? वेदनाथ से छपी हुई। हां हमने

101
00:07:03,920 --> 00:07:08,800
गायत्री परिवार वालों की जो पुस्तक है आदर अच्छा अच्छा

102
00:07:08,800 --> 00:07:12,800
शर्मा आचार्य अच्छा अच्छा अच्छा गीत गायत्री परिवार जो हरि बार

103
00:07:12,800 --> 00:07:16,800
गायत्री परिवार वाले हैं उनकी पुस्तकें हमने मंगाई पढ़ी।

104
00:07:16,800 --> 00:07:20,880
उन्होंने उन्होंने तो चारों पर भाष्य नहीं किया है मेरे हिसाब

105
00:07:20,880 --> 00:07:24,880
से। उन्होंने उन्होंने खाली उसका ट्रांसलेशन

106
00:07:24,880 --> 00:07:29,680
दिया है। हां। तो उसी को किया

107
00:07:29,680 --> 00:07:33,680
उसी को हमने पढ़ा और पढ़ने के बाद अपने जीवन में ढाला एक सूत्र

108
00:07:33,680 --> 00:07:38,000
ढाल लिया तो बात खत्म हो जाती है। जी हां ठीक अब अब सवाल

109
00:07:38,000 --> 00:07:39,440
ये आता है कि आपको

110
00:07:39,440 --> 00:07:43,600
कैसे विश्वास है क्योंकि श्री राम शर्मा जो आचार्य

111
00:07:43,600 --> 00:07:48,080
हैं वो आपके गुरु तो है नहीं क्योंकि आपने कहा गुरु तो मेरे शिव और पार्वती है

112
00:07:48,080 --> 00:07:52,160
नहीं है है ना हां तो जब वो आपके गुरु नहीं है तो आपको

113
00:07:52,160 --> 00:07:56,480
कैसे पता कि जो अरबों साल पहले जो वेद मंत्र आए हैं

114
00:07:56,480 --> 00:08:00,720
वही वेद मंत्र श्री राम शर्मा आचार्य ने उनका अर्थ किया है और किताबें छापी

115
00:08:00,720 --> 00:08:05,280
है। यह कैसे कंफर्म किया आपने? हमने अर्थ देखा,

116
00:08:05,280 --> 00:08:10,000
अर्थ देखा, श्लोक पढ़ा। उस अर्थ को अपने भीतर अनुभव किया,

117
00:08:10,000 --> 00:08:14,240
मनन किया तब हमें लगा कि ये बिल्कुल ठीक है। नहीं नहीं भाई साहब।

118
00:08:14,240 --> 00:08:18,240
हमने माना कि प्रमाणिक है। आपने अनुभव जो किया वो तो एक अलग

119
00:08:18,240 --> 00:08:22,320
बात हो गई। मैं ये कह रहा हूं कि वेद के नाम पर जो मंत्र उसमें

120
00:08:22,320 --> 00:08:26,320
मंत्र होते हैं, श्लोक नहीं होते हैं वेद में। तो वेद के नाम पर जो मंत्र आप

121
00:08:26,320 --> 00:08:30,480
कह रहे हैं जिनको आपने पढ़ा और फिर मनन किया। आप यह कैसे कंफर्म

122
00:08:30,480 --> 00:08:34,480
किया आपने कि यह वही मंत्र है जिन्हें ईश्वर ने

123
00:08:34,480 --> 00:08:38,960
दिया था सृष्टि के प्रारंभ में।

124
00:08:38,960 --> 00:08:43,520
ये वेदों में भी लिखा है कि वेद ईश्वर की वाणी है।

125
00:08:43,520 --> 00:08:47,680
जैसे मुझे ये विश्वास करना पड़ता है। सुन लीजिए। जैसे ये मुझे विश्वास

126
00:08:47,680 --> 00:08:51,760
करना पड़ता है। मेरी मां मुझे बताती है कि तुम्हारा पिता है तो मुझे मानना पड़ता है ना कि

127
00:08:51,760 --> 00:08:55,920
मेरा पिता है। इसी तरह से जब मां को हम

128
00:08:55,920 --> 00:09:00,080
गुरु कहते हैं ना आपका गुरु तो है नहीं। श्री राम शर्मा आचार्य आपके

129
00:09:00,080 --> 00:09:04,080
गुरु तो वो जो लेकिन उन्होंने लेकिन

130
00:09:04,080 --> 00:09:08,080
उन्होंने वेदों को संकलित तो किया है। अगर कोई संकलन

131
00:09:08,080 --> 00:09:12,160
करता है तो कोई गलत काम तो नहीं करता ना वो। नहीं तो संकलन करने के नाम पर तो

132
00:09:12,160 --> 00:09:16,160
कोई भ्रष्ट धूत व्यक्ति भी संकलित कर सकता है। हो सकता है कि वेद के मंत्र कुछ

133
00:09:16,160 --> 00:09:20,160
और हो। आपको झूठ बोल दे। आपको देखिए ऐसा है मेरा कहने

134
00:09:20,160 --> 00:09:24,560
का तात्पर्य यह है कि जिससे हम वेद मंत्र ले रहे हैं उसके प्रति हमको परमान्य

135
00:09:24,560 --> 00:09:28,800
बुद्धि रखनी पड़ेगी। यह हमारा गुरु है। अगर नहीं रखेंगे

136
00:09:28,800 --> 00:09:34,240
तो फिर हमें उसके वेद मंत्र पर विश्वास कैसे?

137
00:09:34,240 --> 00:09:38,800
उन्होंने वेदों का संकलन किया। हमने उन वेदों को पढ़ा।

138
00:09:38,800 --> 00:09:42,880
हमने अपने जीवन में उतार के देखा। हमने अपने जीवन में उतार के देखा

139
00:09:42,880 --> 00:09:47,120
कि बिल्कुल सही है। तो हमारे लिए सही है। प्रमाणिकता सिद्ध हो गई।

140
00:09:47,120 --> 00:09:51,440
प्रमाणिकता सिद्ध करने के लिए क्या किसी का सर्टिफिकेट थोड़ी लेना पड़ेगा?

141
00:09:51,440 --> 00:09:55,440
जैसे जैसे मान लीजिए मान लीजिए कि मेरे को जो है

142
00:09:55,440 --> 00:09:59,600
किसी व्यक्ति को एहसास हो कि भाई मुझे जो है चोरी करने में खुशी

143
00:09:59,600 --> 00:10:03,600
मिल रही है। ठीक है? अब किसी व्यक्ति ने कहा हो

144
00:10:03,600 --> 00:10:07,760
अपनी किताब एक छापी हो और उसमें लिखा हो कि भगवान ने किताब छापी

145
00:10:07,760 --> 00:10:12,000
है। इसमें लिखा है चोरी करने से खुशी मिलती है और मैंने उसको पढ़ लिया और मुझे अनुभव

146
00:10:12,000 --> 00:10:16,160
भी हो रहा है चोरी करने से खुशी मिल रही है। तो मैं मान लूं और सबसे

147
00:10:16,160 --> 00:10:20,240
बड़ी बात सबसे बड़ी बात तो ये है कि राम शर्मा

148
00:10:20,240 --> 00:10:24,400
आचार्य जी आपके गुरु नहीं है। यानी कि राम शर्मा आचार्य जी झूठ भी बोल सकते हैं। गलत

149
00:10:24,400 --> 00:10:27,360
भी लिख सकते हैं।

150
00:10:27,360 --> 00:10:31,440
वो गलत लिख सकते हैं। चलिए मान लेता हूं। आपकी बात ऊपर रख देता हूं। लेकिन सवाल

151
00:10:31,440 --> 00:10:35,440
ये उठता है कि उन्होंने जो वेदों के मंत्र लिखे हैं

152
00:10:35,440 --> 00:10:39,440
वो तो गलत नहीं हो सकते ना। वो तो गलत नहीं हो सकते। मैं वही कह

153
00:10:39,440 --> 00:10:43,440
रहा हूं। ये कैसे तय किया आपने? वो गलत नहीं हो सकते। तय किया।

154
00:10:43,440 --> 00:10:47,840
बार-बार आपसे कह रहा हूं कि मैंने उन्हें अपने अनुभव में उतारा और उनसे तय कर लिया।

155
00:10:47,840 --> 00:10:49,920
मुझे जो

156
00:10:49,920 --> 00:10:54,640
एक मंत्र का एक मंत्र का वो बताइए। फॉर एग्जांपल कैसे आपने तय किया?

157
00:10:54,640 --> 00:10:59,520
मैं आपको बता देता हूं। साधारण सी बात है। साधारण सी बात है।

158
00:10:59,520 --> 00:11:03,520
जैसे वेदों का सार आ जाता है उपनिषदों

159
00:11:03,520 --> 00:11:07,600
में। फिर आ जाता है अपने पुराण। अभी आप वेद अभी आप

160
00:11:07,600 --> 00:11:11,680
वेद से ही बताइए ना कोई आप सुन तो ले पहले सुनेंगे तभी तो

161
00:11:11,680 --> 00:11:16,640
बताऊंगा आपको। जी

162
00:11:16,640 --> 00:11:21,120
न बंधो अस्ति न मोक्ष अस्ति ब्रह्म वास्त निरामयं नमस्त

163
00:11:21,120 --> 00:11:26,960
सचितम विजते ठीक एक तो ये क्योंकि

164
00:11:26,960 --> 00:11:31,200
कहां का है ये? पहले सुनने की थोड़ी सी आदत

165
00:11:31,200 --> 00:11:35,280
डालेंगे तो बड़ा अच्छा होगा क्या मैं ना आपको समझा वरना क्या हमारी

166
00:11:35,280 --> 00:11:40,480
जो बातचीत हो रही है ना आपस में वो खिचड़ी बन के रह जाएगी

167
00:11:40,480 --> 00:11:44,480
बिल्कुल एक्चुअली मेरे पास ग्रंथ रखे हैं तो मैं खोलता उसको आप जो

168
00:11:44,480 --> 00:11:49,760
बता रहे है इसलिए पूछा था मैंने हां हां

169
00:11:49,760 --> 00:11:54,160
अब ना बंधन है ना मोक्ष सभी

170
00:11:54,160 --> 00:11:58,400
का सार आ गया गीता में ठीक

171
00:11:58,400 --> 00:12:02,480
मानव को ना इधर का रहना

172
00:12:02,480 --> 00:12:06,560
चाहिए ना उधर का रहना चाहिए। बीच में आ जाना चाहिए। यही

173
00:12:06,560 --> 00:12:10,720
शब्द संत का भी अर्थ होता है। सम अंत हर

174
00:12:10,720 --> 00:12:15,040
चीज के दो सिरे होते हैं। हर्ष और शोक दुख और सुख

175
00:12:15,040 --> 00:12:19,120
लाभ हानि यश अपयश मान अपमान हर चीज के दो

176
00:12:19,120 --> 00:12:23,520
सिरे होते हैं जीवन में। और उन दो सिरों के बीच में जो आ जाता है

177
00:12:23,520 --> 00:12:27,600
ना उसे दुख का अनुभव होता है ना सुख का अनुभव होता है ना हर्ष का होता है ना शोक का होता है ना मान

178
00:12:27,600 --> 00:12:31,840
का अपमान का यश अपयश जो इनमें बराबर आ जाता है

179
00:12:31,840 --> 00:12:36,000
यानी ज्ञान यज्ञ में चला जाता है उसके लिए सारे

180
00:12:36,000 --> 00:12:40,000
कर्म जो हैं वो गौण हो जाते हैं। सारे

181
00:12:40,000 --> 00:12:44,080
उसी तरह से भस्म हो जाते हैं जैसे लकड़ी भस्म हो जाती है। यह भगवान श्रीकृष्ण

182
00:12:44,080 --> 00:12:48,320
गीता के चौथे अध्याय में पहले से शुरुआत करते हुए दसवें

183
00:12:48,320 --> 00:12:52,480
श्लोक तक चले जाते हैं। मैं एक्चुअली मैं आपसे

184
00:12:52,480 --> 00:12:56,560
किसी श्लोक की व्याख्या नहीं पूछ रहा हूं। मैं एक आपसे आपने कहा वेद मंत्र आपने

185
00:12:56,560 --> 00:13:00,720
पढ़े हैं। श्री रामचार की व्याख्या बताई है। वेदों की ही व्याख्या

186
00:13:00,720 --> 00:13:05,680
बताई है। ये

187
00:13:05,680 --> 00:13:10,080
हमारी बात अभी चल रही थी कि वेद मंत्र आपने श्री राम शर्मा आचार्य के पढ़े

188
00:13:10,080 --> 00:13:14,080
और फिर उसको अनुभव किया वेद मंत्रों को। तो वो मंत्र कोई एक बताइए।

189
00:13:14,080 --> 00:13:18,640
थोड़ा सा फिर उसका कैसे अनुभव किया वो बता दीजिए मुझे। मैं

190
00:13:18,640 --> 00:13:23,600
आपको अनुभव तो बता सकता हूं। इस समय मंत्र बोलने की

191
00:13:23,600 --> 00:13:28,880
बोलिए बोलिए कोई मंत्र नहीं

192
00:13:28,880 --> 00:13:33,040
वेद शुरुआत ही अग्निवीर से हो जाती है। अग्नि क्या? मैं आपको

193
00:13:33,040 --> 00:13:38,000
एक शब्द से ले लूंगा तो आप बोलेंगे कि लंबी व्याख्या हो जाएगी। अग्नि अग्नि क्या?

194
00:13:38,000 --> 00:13:42,080
क्या भीतर की अग्नि मंत्र पूछ रहा हूं। भाई साहब मैं मंत्र पूछ रहा हूं। कोई एक मंत्र कोट करिए

195
00:13:42,080 --> 00:13:46,160
जिससे मैं बोल सकूं। सर आवश्यकता नहीं है। मेरे पास भी

196
00:13:46,160 --> 00:13:50,240
पड़ी है। मैं आपको दिखा देता हूं। नहीं नहीं दिखाने की

197
00:13:50,240 --> 00:13:56,240
नहीं कह रहा हूं मैं।

198
00:13:59,760 --> 00:14:03,920
मैं भी आपको दिखा रहा हूं। मैं दिखाने के लिए नहीं कह रहा हूं। आपने कहा आपने

199
00:14:03,920 --> 00:14:07,920
कहा कोई मंत्र बता दीजिए। तो मैंने आपको बोला ओम अग्नि नीले। बोला ना

200
00:14:07,920 --> 00:14:12,000
अग्नि मिले। ओम अग्नि मिनीले मैं यही पहले इसी को पहले इसी को तो समझ

201
00:14:12,000 --> 00:14:17,440
ले। ओम क्या है और अग्निवीले क्या है तभी तो बाकी को पढूंगा मैं

202
00:14:17,440 --> 00:14:22,560
ओम अग्निवीर तो पढ़ लू क्या है किस अग्नि देव की स्तुति करने जा रहे हैं

203
00:14:22,560 --> 00:14:26,560
ओम का अर्थ क्या है जब तक ये नहीं जान लेते तो बाकी वेद का जानना बेकार हो

204
00:14:26,560 --> 00:14:30,880
गया ना ये तो पूरी पुस्तक कह रहा हूं देखिए जैसे कि

205
00:14:30,880 --> 00:14:35,760
वेद ने एक जगह मंत्र मुझे पढ़ के सुना दीजिए मंत्र बता दीजिए किस मंत्र ने आपको

206
00:14:35,760 --> 00:14:39,840
मंत्र मैं पूछ रहा हूं वेद ने वेद

207
00:14:39,840 --> 00:14:44,080
ने एक जगह कोट किया है कि वेद के अलावा कोई

208
00:14:44,080 --> 00:14:48,800
भी और मोक्ष का मार्ग नहीं है। ठीक है?

209
00:14:48,800 --> 00:14:52,800
ठीक है? मान ली आपकी बात। आप किताब की बात कर रहे हैं। मैं कह रहा

210
00:14:52,800 --> 00:14:57,040
हूं विद धातु की ज्ञान की बात कर रहा हूं। आप सिर्फ किताबों में

211
00:14:57,040 --> 00:15:01,840
किताब की बात कर रहे हैं ना। आप श्री राम शर्माचार्य जी का पढ़ा ना आपने।

212
00:15:01,840 --> 00:15:05,840
किताब पढ़ने के बाद आगे भी तो चलना ही या किताब पे ही उलझा रह जाना है। अगर मैं

213
00:15:05,840 --> 00:15:09,920
कहूं अगर मैं कहूं कि मील का पत्थर है। अभी अभी

214
00:15:09,920 --> 00:15:14,000
मैं कहूं ये मील का पत्थर है और यहां से 200 किलोमीटर दूर दिल्ली है और मील

215
00:15:14,000 --> 00:15:14,880
का पत्थर पकड़ के

216
00:15:14,880 --> 00:15:18,960
बैठ जाएंगे तो दिल्ली कब पहुंचेंगे। देखिए बैठने की बात नहीं जब तक क्लियर नहीं होगी

217
00:15:18,960 --> 00:15:23,120
तब तक हम आगे कैसे चले जाए। हमें जाना कानपुर है और हम चले जाए सीतापुर। इसीलिए

218
00:15:23,120 --> 00:15:27,360
तो कह रहा हूं। इसीलिए तो आपसे कह रहा हूं। पहले वो भी बता देता हूं।

219
00:15:27,360 --> 00:15:31,440
अब अभी अब अभी वेद की बात मैं कर रहा हूं। आपने कहा कि आपने

220
00:15:31,440 --> 00:15:36,640
वेद मंत्र पढ़े हैं श्री राम शर्माचार्य के। श्री राम शर्माचार्य

221
00:15:36,640 --> 00:15:40,720
श्री राम शर्मा आचार्य के नहीं ऋग्वेद के मंत्र पढ़े हैं। श्री राम आचार्य ने वो

222
00:15:40,720 --> 00:15:45,200
संकलित किए हैं। बदलिए आप

223
00:15:45,200 --> 00:15:51,200
भाषा को बदलिए प्लीज। वो वो किताब आपको कहां से मिली थी?

224
00:15:51,520 --> 00:15:55,680
खरीदी हमने परचेस की है भाई। अरे भाई तो किसकी छपी हुई किताब

225
00:15:55,680 --> 00:15:59,840
थी वो। वो किसकी छपी हुई किताब थी भाई साहब? ये

226
00:15:59,840 --> 00:16:04,080
छपी हुई है वहां पे गायत्री परिवार वालों ने छापी है।

227
00:16:04,080 --> 00:16:08,240
हां तो गायत्री परिवार वालों से आपने वेद के मंत्र लिए हैं ना वो

228
00:16:08,240 --> 00:16:13,760
शिव और पार्वती ने नहीं दिए ना आपको वेद के मंत्र

229
00:16:13,760 --> 00:16:17,760
भाई साहब आपको मैं समझा नहीं पाऊंगा क्योंकि मुझे लगता है कि आप

230
00:16:17,760 --> 00:16:21,920
अभी उस स्तर पे नहीं आ पा रहे हैं जिस स्तर पे मैं

231
00:16:21,920 --> 00:16:25,920
बात करना चाह रहा हूं। नहीं आप उस चाहते हैं कि आपसे प्रश्न ना

232
00:16:25,920 --> 00:16:29,920
किया जाए। नहीं आप समझना नहीं चाह रहे आप समझना नहीं चाह रहे आप एक ही बात पे खड़े हुए

233
00:16:29,920 --> 00:16:34,000
हैं आप मेरा

234
00:16:34,000 --> 00:16:38,320
कहने का अर्थ है कहना चाह रहा हूं

235
00:16:38,320 --> 00:16:42,320
मैं कहना चाह रहा हूं मैं कहना यह चाह रहा हूं

236
00:16:42,320 --> 00:16:46,400
कि यदि आपको राम शर्मा जी पर विश्वास नहीं है एज

237
00:16:46,400 --> 00:16:50,560
ए गुरु आप उनको स्वीकार नहीं करते तो फिर उनके द्वारा दिए गए वेद

238
00:16:50,560 --> 00:16:54,560
मंत्र पर आपको विश्वास कैसे है यह कह रहा हूं मैं

239
00:16:54,560 --> 00:16:58,720
तो आपसे बार-बार कह रहा हूं आपको आप अपने आप अपनी हमारी

240
00:16:58,720 --> 00:17:02,720
बातों को पहले ध्यान से सुने। हमने ये कब कहा कि श्री रामचर्या ने श्री

241
00:17:02,720 --> 00:17:06,880
राम शर्मा आचार्य ने ये वो वेद मंत्र दिए हैं। हमने ये तो कभी कहा ही नहीं।

242
00:17:06,880 --> 00:17:11,600
हमने कहा कि ये मंत्र है। रुगद के मंत्र ये

243
00:17:11,600 --> 00:17:16,480
वेद के ही मंत्र है। आपने कैसे इसको वो किया? वेरीफाई।

244
00:17:16,480 --> 00:17:20,720
वेरीफाई अपने अनुभव से किया। बार-बार आपसे कह रहा हूं। अपने अनुभव से किया।

245
00:17:20,720 --> 00:17:24,880
जैसे पहला ही मंत्र आपने पढ़ा। भाई साहब ये बताइए वेद से मुक्ति मिलती

246
00:17:24,880 --> 00:17:28,880
है ये अनुभव आपने कैसे कर लिया बताइए मुक्ति मिल गई आपको मुक्त

247
00:17:28,880 --> 00:17:32,960
हो चुके हैं क्योंकि मुक्ति मिल चुकी है आपको मुक्त हो चुके

248
00:17:32,960 --> 00:17:37,040
आप अब मैं आपकी ओर अगर अगर आपकी ओर कोई वार करेगा तो आपकी

249
00:17:37,040 --> 00:17:40,640
पलक तो नहीं झपकेगी

250
00:17:40,640 --> 00:17:44,800
वो तो स्वाभाविकता है ना यानी मुक्त नहीं हुए ना

251
00:17:44,800 --> 00:17:48,800
यानी मुक्त नहीं हुए ना अगर पलक झपक जाए तो इसका मतलब आदमी मुक्त नहीं

252
00:17:48,800 --> 00:17:52,960
हुआ ये आपकी दृष्टि है आपका दृष्टिकोण है मेरा दृष्टिकोण नहीं अच्छा चलिए पलक

253
00:17:52,960 --> 00:17:56,960
झपकना किस बात का प्रमाण है बताइए शरीर को शरीर

254
00:17:56,960 --> 00:18:01,440
को आत्मा को आप दोनों को इकट्ठा कर रहे हैं अरे

255
00:18:01,440 --> 00:18:05,440
तो यहां प्रपंच रूपी संसार में है जो मुक्त नहीं हुआ वही तो संसार में है

256
00:18:05,440 --> 00:18:09,520
आप कह रहे हैं आप मुक्त हो गए आप मुक्त हो गए तो आपको भूख लगती है ना आप सोच

257
00:18:09,520 --> 00:18:13,520
जाते होंगे तो फिर आप ऐसा करें आप ऐसा करें थोड़ा सा गीता का अध्ययन कर

258
00:18:13,520 --> 00:18:18,080
ले चौथा अध्याय पढ़ ले आदमी किस तरह से मुक्त होता है

259
00:18:18,080 --> 00:18:22,080
ज्ञान मार्ग में चलने वाला व्यक्ति और कर्म मार्ग करने

260
00:18:22,080 --> 00:18:26,080
वाला व्यक्ति कर्म क्या है? पांच इंद्रियां करती है। पांच ज्ञानेंद्रियां करती

261
00:18:26,080 --> 00:18:30,080
है। साथ में एक मन कार्य करता है। ये 11 चीजें काम

262
00:18:30,080 --> 00:18:34,240
करती है। लेकिन इनसे कर्म किया हुआ इनसे कर्म

263
00:18:34,240 --> 00:18:38,320
किया हुआ उससे श्रेष्ठ कौन है? जो व्यक्ति ज्ञान यज्ञ में चला जाता है और ज्ञान यज्ञ

264
00:18:38,320 --> 00:18:42,560
में गया हुआ व्यक्ति वैसे ही जिस तरह से ईंधन अग्नि में भस्म

265
00:18:42,560 --> 00:18:44,320
हो जाता है। उसी प्रकार

266
00:18:44,320 --> 00:18:48,400
वो बिल्कुल ही मुक्त हो जाता है। क्यों? नहीं

267
00:18:48,400 --> 00:18:52,480
होता। ऐसे व्यक्ति को पथिक कहा जाता है कि वो मुक्ति के मुमुक्षु

268
00:18:52,480 --> 00:18:56,480
है बट वो मुक्त नहीं है। मुक्त तो तभी है जब वो मुक्त हुआ जब उसको बोध हो

269
00:18:56,480 --> 00:19:00,640
गया। आत्म स्वरूप हो गया। जिसकी पलक ना झप या तो पलक

270
00:19:00,640 --> 00:19:04,720
या तो पलक जो त्रिविध ताप है जो भौतिक दैविक

271
00:19:04,720 --> 00:19:08,720
ताप में अगर कोई पलक झपकना छोड़ दे तो इसका मतलब वो मुक्त हो

272
00:19:08,720 --> 00:19:12,800
गया। और भी चीजें हैं उसको ना भूख लगी। किसी चीज की आवश्यकता नहीं होगी। वो

273
00:19:12,800 --> 00:19:17,040
स्थिर प्रज्ञ हो जाएगा। स्थिति प्रज्ञ हो जाएगा।

274
00:19:17,040 --> 00:19:21,120
आप उस स्तर पे बात नहीं कर पा रहे हैं जिस स्तर पे हम करना चाहते हैं। आप थोड़ा और

275
00:19:21,120 --> 00:19:25,120
ऊंचा उठे अच्छा लगे। ऐसा नहीं है भाई साहब आपके पास जवाब नहीं है इसलिए आप

276
00:19:25,120 --> 00:19:29,120
ऐसी बातें कर रहे हैं। जवाब जवाब हम आपको देना चाहते आप सुनना नहीं चाहते। हम

277
00:19:29,120 --> 00:19:33,280
बार-ब कह रहे हमने पूछा जब आपको राम शर्माचार्य जी पर

278
00:19:33,280 --> 00:19:37,440
आपको जब राम शर्माचार्य जी पर विश्वास नहीं है तो आपको यह विश्वास कैसे

279
00:19:37,440 --> 00:19:42,000
है कि उन्होंने जो मंत्र वही मंत्र है जो वही

280
00:19:42,000 --> 00:19:46,160
है विश्वास नहीं है लेकिन हम तो बार-बार कह रहे हैं कि हमें ये ऋग्वेद

281
00:19:46,160 --> 00:19:51,280
पर विश्वास है ऋग्वेद को हमने पढ़ा नहीं

282
00:19:51,280 --> 00:19:55,360
मालूम किया वही आपको बताना अनुभव

283
00:19:55,360 --> 00:20:00,400
से किया आप अनुभव करो ना मेरे साथ बैठ के अनुभव आपने मुक्ति कर लिया भाई साहब

284
00:20:00,400 --> 00:20:04,560
आपने अनुभव मुक्ति का कर लिया कर लिया तो

285
00:20:04,560 --> 00:20:08,640
आप बोलिए ना तो आपका स्वास्थ्य खराब होता होगा ना

286
00:20:08,640 --> 00:20:13,040
ही आपका जो है आपको भूख लगती होगी स्वास्थ्य स्वास्थ्य

287
00:20:13,040 --> 00:20:17,200
शरीर की बात है तो शरीर से भी आप शरीर

288
00:20:17,200 --> 00:20:21,200
से आप जुड़े हुए है ना जब ईश्वर भी पृथ्वी पर आता

289
00:20:21,200 --> 00:20:25,200
है तो उसके शरीर को भी भूख लगती है वो

290
00:20:25,200 --> 00:20:29,600
भी विवशता नहीं होती उसकी जी यही

291
00:20:29,600 --> 00:20:34,000
अंतर है। वो अपनी इच्छा से करता है। हमारी व्यवस्था है।

292
00:20:34,000 --> 00:20:38,160
आपकी व्यवस्था है भोजन करने की। ईश्वर की व्यवस्था नहीं है। ईश्वर

293
00:20:38,160 --> 00:20:42,320
चाहे तो 14 कितने दिन तक लक्ष्मण लक्ष्मण जी ही देख लीजिए कितने

294
00:20:42,320 --> 00:20:46,480
दिन तक वो बिना रात में सोए जगे समय अवधि काट दी

295
00:20:46,480 --> 00:20:49,440
थी उन्होंने।

296
00:20:49,440 --> 00:20:53,600
वो भी बात है मेरा कहने का अर्थ यह है महाराज जी

297
00:20:53,600 --> 00:20:57,680
कि यदि हम किसी से वेद के मंत्र ले रहे हैं तो हमें उसके प्रति

298
00:20:57,680 --> 00:21:01,840
प्रमाण बुद्धि दिखानी पड़ेगी किसी से भी ले क्योंकि हमको

299
00:21:01,840 --> 00:21:06,400
डायरेक्ट या तो हमको डायरेक्ट मिल गए हो शिव पार्वती जी ने डायरेक्ट हमें दे दिए हो

300
00:21:06,400 --> 00:21:11,040
गए आप डायरेक्ट मिल गए आपको लगता है कि

301
00:21:11,040 --> 00:21:15,360
आप सुनिए मान लीजिए कि यहां से किसी ने मुंबई जाना है मुंबई

302
00:21:15,360 --> 00:21:19,360
जाना है कोई तो साइकिल से जा रहा है, कोई पैदल जा रहा है, कोई कार पे जा रहा है, कोई

303
00:21:19,360 --> 00:21:24,080
बस पे जा रहा है, कोई ट्रेन पे जा रहा है, कोई बाय एयर जा रहा है। रास्ते अलग-अलग है।

304
00:21:24,080 --> 00:21:28,400
है ना? तो साधु सन्यासी क्या करते हैं? उनको डायरेक्ट मिल जाता है।

305
00:21:28,400 --> 00:21:32,400
हमें डायरेक्ट मिल गया। मिल गया तो चाहिए। आपको डायरेक्ट मिला है। वेद का

306
00:21:32,400 --> 00:21:37,040
मंत्र वगैरह सब मिला है। हमें मिल गया। अब कुछ पाने की चाह नहीं।

307
00:21:37,040 --> 00:21:41,200
कुछ पाने की चाह नहीं। कुछ पाने की गायत्री परिवार से लिया

308
00:21:41,200 --> 00:21:45,360
है। फिर आप क्यों कह रहे अरे हमने आपसे कहा कि गायत्री

309
00:21:45,360 --> 00:21:49,600
परिवार का हमने ये लिखा हुआ पढ़ा। आप को घुमा

310
00:21:49,600 --> 00:21:53,600
रहे हैं। हम कह रहे पढ़ा क्या क्या किसी किताब को पढ़ना

311
00:21:53,600 --> 00:21:57,840
आपने किसी आपके पीछे इतनी सारी किताबें दिख रही है तो क्या आपने वो पढ़ी

312
00:21:57,840 --> 00:22:02,960
है ना? है ना? पढ़ी है ना इसी तरह से हमने भी किताबों को पढ़ा है।

313
00:22:02,960 --> 00:22:04,640
को पढ़ा है। तो वेद

314
00:22:04,640 --> 00:22:08,640
मंत्र आपको स्वतंत्र रूप से मिले हां स्वतंत्र मिले

315
00:22:08,640 --> 00:22:12,800
हैं क्योंकि ग्रंथों में हमने देखा स्वतंत्र रूप से आपको

316
00:22:12,800 --> 00:22:16,960
वेद दिए हमने ग्रंथों को पढ़ा ग्रंथों को पढ़ा उनप मनन किया चिंतन किया

317
00:22:16,960 --> 00:22:21,120
और इन चीजों से परे हट गए हम ठीक है सारे वेद दे सारे वेद दे दिए

318
00:22:21,120 --> 00:22:25,280
हैं ना उन्होंने आपको शिव पार्वती सब कुछ दे दिया है जो हमें चाहिए था वो

319
00:22:25,280 --> 00:22:29,280
हमें मिल गया है इसके अलावा हमें और कुछ नहीं चाहिए हमें कुछ पाना ही नहीं है मंडल

320
00:22:29,280 --> 00:22:35,280
का दसवे मंडल का 192वा सूक्त सुना सकते हैं वेद का

321
00:22:35,520 --> 00:22:39,840
है ही नहीं नहीं सवाल है आप ये क्लेम कर रहे हैं कि आपको

322
00:22:39,840 --> 00:22:43,920
स्वप्न में या दिव्य योजना से वेद के मंत्र प्राप्त हुए हैं। मारने

323
00:22:43,920 --> 00:22:48,000
की बात जानना चाह रहा हूं आप विषय से

324
00:22:48,000 --> 00:22:52,000
विषय से आप भटक रहे हैं ना भटके मैं विषय पे ही हूं।

325
00:22:52,000 --> 00:22:56,240
मैं आपकी प्रामाणिकता मैं आपकी प्रामाणिकता पर प्रश्न उठा रहा हूं। आपने कहा

326
00:22:56,240 --> 00:23:00,800
कि मुझे सिर्फ देखिए देखिए ऐसा है

327
00:23:00,800 --> 00:23:04,960
ऐसा है देखिए ऐसा है भगवान ने मोहिनी

328
00:23:04,960 --> 00:23:08,960
का रूप धारण करके ठल भी किया है भगवान ने बुद्ध

329
00:23:08,960 --> 00:23:13,120
का रूप धारण करके जो वैदिक यज्ञ है उनका खंडन भी

330
00:23:13,120 --> 00:23:17,600
किया है इसका अर्थ है कि भगवान ऐसा रूप ऐसा कृत कर सकते हैं

331
00:23:17,600 --> 00:23:20,000
जो वेदों के विरुद्ध हो

332
00:23:20,000 --> 00:23:24,000
तो इसलिए यदि आप यह कह रहे हैं कि शिव पार्वती ने मुझे ज्ञान दिया है

333
00:23:24,000 --> 00:23:28,000
तो मुझे उसकी प्रमाणिकता जांच रहा हूं कि भाई वो वही है कि नहीं।

334
00:23:28,000 --> 00:23:32,080
तो सुनिए सुनिए प्रमाणिकता तो वो

335
00:23:32,080 --> 00:23:36,080
जानेगा ना जो स्वयं परमात्मा को जान चुका हो। आप तो एक

336
00:23:36,080 --> 00:23:40,240
साधारण मानव है। आप कैसे हमारी प्रमाणिकता जानेंगे? मैं परमात्मा को जानने की

337
00:23:40,240 --> 00:23:44,240
प्रमाणिकता नहीं जांच रहा हूं। मैं सामने वाले की

338
00:23:44,240 --> 00:23:48,320
प्रमाणिकता जांच रहा हूं। नहीं नहीं नहीं आप आप प्रमाणिकता जान

339
00:23:48,320 --> 00:23:52,320
रहे हैं। इसलिए कि सामने वाले के अंदर कितना ज्ञान है। ये जानना चाह रहे हैं आप। ना ना

340
00:23:52,320 --> 00:23:56,320
ज्ञान नहीं ज्ञान ज्ञान नहीं ज्ञान नहीं ज्ञान तो आप में मुझसे बहुत ज्यादा है

341
00:23:56,320 --> 00:24:00,560
मैं जान रहा हूं मैं ज्ञान नहीं वो ज्ञान प्रमाणिक है वैदिक

342
00:24:00,560 --> 00:24:04,640
है कि नहीं मेरा बस इतना है आपके पास बहुत ज्ञान हो सकता है सब कुछ

343
00:24:04,640 --> 00:24:08,880
हो सकता है वो ज्ञान वैदिक है कि नहीं सवाल ये चल रहा है वैदिक

344
00:24:08,880 --> 00:24:13,200
वो वैदिक जो हमें परंपराओं से प्राप्त होने वाले के द्वारा जो ज्ञान विज्ञान

345
00:24:13,200 --> 00:24:17,200
प्राप्त होता है रामानुजाचार्य शंकराचार्य परंपराओं से

346
00:24:17,200 --> 00:24:21,200
प्राप्त होता है आपका जो ज्ञान विज्ञान है वो वही उन्ही परंपराओं का

347
00:24:21,200 --> 00:24:25,280
है कि नहीं आप मुझे वैदिक अर्थ बता दे चलिए कहानी

348
00:24:25,280 --> 00:24:29,360
खत्म गेम ओवर बताइए भाई साहब अभी बात ये चल रही

349
00:24:29,360 --> 00:24:33,440
है आपने कहा आपको स्वतंत्र रूप से मुझसे पूछ

350
00:24:33,440 --> 00:24:35,200
रहे हैं आप मुझे ये बता दीजिए कि वैदिक

351
00:24:35,200 --> 00:24:39,360
का अर्थ क्या है बस इतना बता दीजिए बाकी कुछ नहीं हमारे परम प्रमाण

352
00:24:39,360 --> 00:24:43,440
है सनातनियों के श्रुति शास्त्र जो कल्प के प्रारंभ में

353
00:24:43,440 --> 00:24:47,760
ब्रह्मा जी को स्वास रूप में प्राप्त होते हैं नारायण के द्वारा

354
00:24:47,760 --> 00:24:51,760
वो जो ग्रंथ है कालांतर में जब लिपिबद्ध किए जाते आचार्यों के द्वारा

355
00:24:51,760 --> 00:24:55,760
व्यास जी के द्वारा उनहीं ग्रंथों को हम वेद के नाम से जानते हैं। यद्यपि

356
00:24:55,760 --> 00:24:59,760
वेद का अर्थ ज्ञान भी है। वेद का अर्थ ज्ञान भी है। पर

357
00:24:59,760 --> 00:25:03,920
यहां पर वेद ग्रंथों की बात हो रही है जिस पर विश्वास करने वाले को सनातनी

358
00:25:03,920 --> 00:25:08,160
कहा जाता है। अब आपने कहा कि ये जो वेद के मंत्र हैं

359
00:25:08,160 --> 00:25:12,480
लिपिबद्ध होते हुए जो वेद के मंत्र है यह आपको

360
00:25:12,480 --> 00:25:16,640
शिव जी और पार्वती जी से प्राप्त हुए हैं और स्वतंत्र रूप से आपको किसी

361
00:25:16,640 --> 00:25:21,280
किताब की जरूरत नहीं पड़ी। तो मैं आपसे बस इतना कहना हां

362
00:25:21,280 --> 00:25:26,480
ठीक है तो आप मुझे केवल दव मंडल का 192वा सूक्त जरा सुना दीजिए

363
00:25:26,480 --> 00:25:31,440
कोई आवश्यकता नहीं है मुझे मैं आपसे एक छोटा सा प्रश्न

364
00:25:31,440 --> 00:25:35,520
आपकी ये बात जो है ये आप जो परीक्षा

365
00:25:35,520 --> 00:25:39,680
लेना चाहते हैं ना हम आपकी परीक्षा में नहीं बैठना चाहते मैं परीक्षा नहीं

366
00:25:39,680 --> 00:25:43,840
ले रहा हूं फिर आपको ये कहना चाहिए मैं वैदिक हूं मैंने पूछा

367
00:25:43,840 --> 00:25:48,000
था पहले जब हमसे पूछा था आपने कि वेद का कोई मंत्र बताइए तो हम शुरुआत ऋग्वेद

368
00:25:48,000 --> 00:25:50,560
से करने वाले थे। लेकिन उसके बाद आपने आगे

369
00:25:50,560 --> 00:25:54,720
बढ़ गए। सीधा द मंडल में चले जाते हैं आप। अब पहले का पहले

370
00:25:54,720 --> 00:25:59,120
श्लोक का ही यानी पहले जो मंत्र का है उसका अर्थ तो आप मुझे बता दें।

371
00:25:59,120 --> 00:26:03,200
मैं आपको वेद पढ़ने नहीं बैठा हूं ना। यहां पर आप एक क्लेम

372
00:26:03,200 --> 00:26:07,200
कर रहे हैं कि आप ब्रह्मकुमारी का समर्थन करते हैं तो फिर सबसे पहले ब्रह्मा कुमारी का

373
00:26:07,200 --> 00:26:12,000
समर्थन करने वाले का समर्थन हो रहा है कि नहीं हो रहा है? ये देख रहा हूं मैं।

374
00:26:12,000 --> 00:26:16,400
मैं तो ब्रह्माकुमारी का समर्थन करता हूं। हां तो इसीलिए

375
00:26:16,400 --> 00:26:21,120
मैं आपकी प्रमाणिकता पूछ रहा हूं। इसीलिए मैंने आपकी प्रमाणिकता पूछी।

376
00:26:21,120 --> 00:26:25,200
आपको बता रहे हैं परंपरा

377
00:26:25,200 --> 00:26:29,200
है। आप मेरी प्रमाणिकता ना पूछ के आप पूछ रहे हैं कि मेरा

378
00:26:29,200 --> 00:26:33,200
ज्ञान कितना है? मुझे कितना फलाने कहा

379
00:26:33,200 --> 00:26:37,360
है कि वेद के मंत्र मुझे योजना से प्राप्त हुए हैं तो मैं जानना चाहता हूं।

380
00:26:37,360 --> 00:26:41,360
प्राप्त हुए भी है कि ये एक बात है केवल एक। क्यों जानना चाहते? क्यों

381
00:26:41,360 --> 00:26:45,600
जानना चाहते हैं आप? क्यों जानना चाहते हैं? और आप मुझे एक बात आप एक अप्रामाणिक

382
00:26:45,600 --> 00:26:49,840
संस्था का समर्थन कर रहे हैं ना भाई साहब इसलिए आपकी प्रमाणिकता जान रहा हूं मैं

383
00:26:49,840 --> 00:26:54,000
तो उस संस्था के बारे में आप बात कर ले मुझसे वेदों की प्रमाणिकता

384
00:26:54,000 --> 00:26:58,240
छोड़ दे आपकी प्रमाणिकता के बारे में ना पूछू आपसे ना क्यों पूछेंगे

385
00:26:58,240 --> 00:27:02,320
आप जब क्योंकि आप प्रमाण पहले तो ये है ना कि आप वेदों को जानिए आपको

386
00:27:02,320 --> 00:27:08,320
वैदिक का अर्थ पूरा मालूम नहीं है अच्छा ये बताइए जब

387
00:27:08,880 --> 00:27:12,960
कक्षा का एक कक्षा का विद्यार्थी एक एमए और पीएचडी वाले का

388
00:27:12,960 --> 00:27:17,200
एग्जाम देने के लिए सामने बैठा हो तो कैसे कोई एग्जाम दे देगा? ये ये तय

389
00:27:17,200 --> 00:27:21,440
कौन कर रहा है यहां पर? किसने तय किया? तय हम कर रहे हैं ना। पहले

390
00:27:21,440 --> 00:27:26,960
आप तय कर रहे थे हम कक्षा के विद्यार्थी हैं।

391
00:27:26,960 --> 00:27:31,040
यानी कि आप स्वयं को एक अथॉरिटी के रूप में

392
00:27:31,040 --> 00:27:36,000
यहां प्रस्तुत कर रहे हैं ना। मानते हैं क्योंकि हमें कुछ नहीं

393
00:27:36,000 --> 00:27:40,240
भाई साहब महाभारत में एक सिद्धांत लिखा है भीष्म जी का वाक्य है कि अन्यों

394
00:27:40,240 --> 00:27:44,320
के साथ वही व्यवहार करिए जो स्वयं के साथ स्वीकार्य हो तो आप जब

395
00:27:44,320 --> 00:27:48,400
स्वयं को अथॉरिटी के रूप में प्रस्तुत यहां कर रहे हैं तो मैं ये नहीं कह रहा मुझे

396
00:27:48,400 --> 00:27:53,120
भी अथॉरिटी कम से कम अपनी अथॉरिटी के बारे में मुझे प्रश्न तो करने दीजिए

397
00:27:53,120 --> 00:27:57,120
बिल्कुल आपने प्रश्न कर लिया लेकिन सवाल ये है कि मेरा जवाब आपको संतुष्ट कर ही नहीं

398
00:27:57,120 --> 00:28:01,840
पा रहा है नहीं मैंने क्योंकि आप अपने विद्यार्थी

399
00:28:01,840 --> 00:28:07,760
आप कह रहे हैं मैंने कहा

400
00:28:07,760 --> 00:28:11,920
आपको समस्त वेद जो है वो शिव पार्वती जी के द्वारा

401
00:28:11,920 --> 00:28:16,080
डायरेक्ट प्राप्त हुए हैं। आपका कोई गुरु नहीं है। है ना? उन्होंने ही दिए

402
00:28:16,080 --> 00:28:20,080
हैं। उन्होंने ही ग्रंथ आपको ऋग्वेद

403
00:28:20,080 --> 00:28:24,400
का दसवे मंडल का 192वा सूक्त बताने में क्या दिक्कत है?

404
00:28:24,400 --> 00:28:28,560
पहले मैं वही तो वही तो कह रहा हूं कि आप ऋग्वेद के दव मंडल

405
00:28:28,560 --> 00:28:32,560
पे अटक गए हैं। श्लोक पे उसके मंत्र पे अटक गए। लेकिन

406
00:28:32,560 --> 00:28:36,720
नौवा मंडल बता दीजिए। नौवा पहले वाला तो आपको पहले वाला पता

407
00:28:36,720 --> 00:28:40,880
नहीं चलेगा। भाई साहब नौवा मंडल बता दीजिए। पहले

408
00:28:40,880 --> 00:28:45,280
वाला हमें पता नहीं और दसवं पे चल दिए। शुरुआत तो पहले कर ले। अरे मैं

409
00:28:45,280 --> 00:28:49,600
वेद पढ़ने नहीं बैठा हूं। मैं केवल ये मैं मेरी ये जिज्ञासा है कि आप जो क्लेम

410
00:28:49,600 --> 00:28:54,080
कर रहे हैं कि मुझे स्वप्न में मिला है वो वास्तविकता है या केवल एक बात है। मैं

411
00:28:54,080 --> 00:28:58,240
जानना चाह रहा हूं। आपके पास आपके पास

412
00:28:58,240 --> 00:29:02,240
यदि कोई दिव्यता है तो मैं जैसे अर्जुन ने भी भगवान से कहा था जब भगवान ने

413
00:29:02,240 --> 00:29:06,240
कहा था मैं ही भगवान हूं। अर्जुन ने कहा कि आप अपना विराट स्वरूप दिखा दीजिए।

414
00:29:06,240 --> 00:29:10,240
उन्होंने दिखा दिया। ऐसे ही मेरी आपके प्रति जिज्ञासा है कि यदि आपके

415
00:29:10,240 --> 00:29:14,320
पास दिव्यता है तो उसका दिव्यता का सबूत दे दीजिए मुझे। तो पहले आप उसी तरह

416
00:29:14,320 --> 00:29:18,480
से अर्जुन बनकर आइए हमारे पास। फिर बात करेंगे। ठीक है। तो

417
00:29:18,480 --> 00:29:22,640
पहले हम आपको सारा देंगे। हां। ठीक है। कुल

418
00:29:22,640 --> 00:29:23,140
मिला

419
00:29:22,880 --> 00:29:26,880
के आपको ऋग्वेद नहीं बताना है। चलिए ठीक है। अब मुझे बता दीजिए आपके अनुसार धर्म

420
00:29:26,880 --> 00:29:30,960
क्या है? ऋग्वेद के ऋग्वेद के अगर पहले वाले से शुरू करते हैं। प्रथम मंडल से

421
00:29:30,960 --> 00:29:35,040
सूत्र नंबर एक से शुरू मेरे आचार्यों से मुझे मेरे

422
00:29:35,040 --> 00:29:39,360
आचार्यों से पूज्यपाद जगद्गुरु शंकराचार्य जी का मैं शिष्य हूं। जो

423
00:29:39,360 --> 00:29:43,520
आध्यात्म के विषय में मेरी जो जिज्ञासाएं होती है मैं उनसे शांत कर लेता हूं। अपनी

424
00:29:43,520 --> 00:29:47,520
जिज्ञासाओं को मैं आपके पास यहां पर कक्षा लेने के लिए नहीं बैठा हूं।

425
00:29:47,520 --> 00:29:51,520
मुझे ये बताया गया था कि आप ब्रह्मा कुमारीज का समर्थन करते हैं। और अपने

426
00:29:51,520 --> 00:29:55,520
आप को महामंडलेश्वर भी कहते हैं। यद्यपि महामंडलेश्वर कहने के विषय में

427
00:29:55,520 --> 00:29:59,520
भी एक अच्छी खासी एक बात हो जाएगी। मगर वो अभी हमारा मुख्य विषय नहीं है। तो उसको

428
00:29:59,520 --> 00:30:03,600
जाने देता हूं। फिलहाल मैं आपसे ब्रह्मा कुमारी पर बात करने के

429
00:30:03,600 --> 00:30:08,240
लिए अब आगे बढ़ता हूं। ठीक है। हां जी। हां ठीक है। आइए।

430
00:30:08,240 --> 00:30:14,240
हां। अब मुझे बता दीजिए। आपके अनुसार धर्म किसे कहते हैं?

431
00:30:14,240 --> 00:30:18,400
किसी भी गुणों को धारण करना। जितने

432
00:30:18,400 --> 00:30:22,400
भी गुण है उन को धारण करना वही धर्म

433
00:30:22,400 --> 00:30:28,240
कहलाता है और वह मानवता के अंतर्गत आता है।

434
00:30:28,240 --> 00:30:33,280
तो मानवता की कोई सुनिश्चित नियमावली है आपके पास?

435
00:30:33,280 --> 00:30:38,400
मानवता के जो गुण है जैसे प्रेम है,

436
00:30:38,400 --> 00:30:43,840
शुद्ध आचरण है, स्पष्ट वादिता है,

437
00:30:43,840 --> 00:30:46,880
सच्चाई है,

438
00:30:46,880 --> 00:30:50,880
ज्ञान का सागर है। यह जो परमात्मा के गुण बताए गए हैं।

439
00:30:50,880 --> 00:30:55,440
उनहीं गुणों को यदि व्यक्ति अपने जीवन में धारण करता है तो

440
00:30:55,440 --> 00:30:59,600
कहते हैं कि गुण धारण कर लिए उसने और वह धर्म

441
00:30:59,600 --> 00:31:03,680
के मार्ग पर चल रहा है। तो जो धारण किया जाए वह

442
00:31:03,680 --> 00:31:07,760
धर्म है। ठीक है? धारक तत्व को धर्म कहते हैं। इसकी उपयोगिता क्या

443
00:31:07,760 --> 00:31:12,000
है? आवश्यकता क्या है इसकी?

444
00:31:12,000 --> 00:31:16,000
मानव के जीवन में उसके भीतर ही

445
00:31:16,000 --> 00:31:20,160
दो शक्तियां चलती हैं। एक शक्ति होती है रचनात्मक,

446
00:31:20,160 --> 00:31:25,360
एक होती है नकारात्मक। जब रचनात्मक शक्ति

447
00:31:25,360 --> 00:31:29,440
कम हो जाती है और नकारात्मक शक्तियां उभर जाती है

448
00:31:29,440 --> 00:31:33,600
तो उस समय एक आत्मा और बुद्धि बुद्धि ये कहती है कि यह

449
00:31:33,600 --> 00:31:37,840
गलत है बुद्धि ये कहती है कि ये सही है बुद्धि तोलती है

450
00:31:37,840 --> 00:31:41,920
तराजू की तरह तोलती है और उस समय जो निर्णय सही

451
00:31:41,920 --> 00:31:46,160
है बुद्धि का निर्णय जो सही है उस मार्ग पर चलना

452
00:31:46,160 --> 00:31:50,240
श्रेयस्कर कहलाता है वो श्रेय मार्ग

453
00:31:50,240 --> 00:31:53,040
है

454
00:31:53,040 --> 00:31:57,920
बुद्धि जो कहती है उस मार्ग पर चलना श्रेयस्कर कहलाता है। वो धर्म है।

455
00:31:57,920 --> 00:32:02,960
बुद्धि जो कहेगी उस समय उस मार्ग पर चलना उस समय ये नहीं कि

456
00:32:02,960 --> 00:32:06,960
नकारात्मक सोच वाले मार्ग पे नहीं जाना। जी आपने अभी एक बात कही कि

457
00:32:06,960 --> 00:32:10,960
जो धारण किए जाए जिन गुणों को वही धर्म है। इसलिए कोई चोर है वो चोरी करने

458
00:32:10,960 --> 00:32:15,200
के गुण को धारण करता है तो चोरी करना धर्म है। लेकिन

459
00:32:15,200 --> 00:32:19,360
उसे ये भी तो होता है ना कि मैं चोरी कर रहा हूं तो गलत कर रहा हूं। हां

460
00:32:19,360 --> 00:32:23,600
तो ये गलत और सही ये जो गलत और सही है इसका इसका आधार

461
00:32:23,600 --> 00:32:27,920
क्या है क्या गलत है क्या ये निर्णय ही बुद्धि करवाती

462
00:32:27,920 --> 00:32:31,920
है बुद्धि करवाती है कि ये ठीक है या नहीं है करनी आपो

463
00:32:31,920 --> 00:32:36,000
अपनी के ने के दूर जिन इनाम आया गए मशकत काल नानक ते

464
00:32:36,000 --> 00:32:40,160
उजले केती छुट्टी नाल दिवस रातया खेला जगत

465
00:32:40,160 --> 00:32:44,240
सुनिए दिवस रात दादाया खेला सकल जगत ये जगत जो है

466
00:32:44,240 --> 00:32:48,800
दिवस रात दिवस और रात यानी अंधेरे और उजाले के भीतर नकारात्मक

467
00:32:48,800 --> 00:32:53,040
और सकारात्मक विचारों के बीच में झूल रहा है। कर रहा है। निर्णय आपको

468
00:32:53,040 --> 00:32:57,040
करना है। आपके हाथ में चाकू दे दिया है। चाहे तो सेब काट ले, सब्जी काट ले या

469
00:32:57,040 --> 00:33:01,200
किसी के पेट में घूप दे। तो अब यहां से दो

470
00:33:01,200 --> 00:33:05,440
प्रश्न आते हैं। दो प्रश्न आते हैं। एक कि ये जो मेरी

471
00:33:05,440 --> 00:33:08,480
आवाज आ रही है, ये बुद्धि से नहीं आ रही है।

472
00:33:08,480 --> 00:33:12,480
बल्कि मन से आ रही है। बुद्धि के अलावा मन है ना? तो बुद्धि से

473
00:33:12,480 --> 00:33:16,480
नहीं आ रही है। एक बुद्धि से नहीं आ रही है। मन से आ रही है। पहला

474
00:33:16,480 --> 00:33:20,640
सवाल यह निश्चित कैसे होगा? बुद्धि की आवाज सुननी है और मन की नहीं सुननी

475
00:33:20,640 --> 00:33:24,720
है। ये निश्चित कैसे होगा? भाई मैं मेरे ही अंदर से दोनों आवाजें आ रही हैं।

476
00:33:24,720 --> 00:33:28,720
तो मेरे को कैसे पता चलेगा? जैसे कोई व्यक्ति है वो बिना कपड़ों के बाहर जाना चाहता

477
00:33:28,720 --> 00:33:32,800
है। है ना? कोई व्यक्ति है जो ऐसी स्त्री के साथ संबंध बनाना

478
00:33:32,800 --> 00:33:37,760
चाहता है जो उसके जिसके लिए वो अधिकारी योग्य नहीं है। अनाधिकृत रूप से व्यभचार।

479
00:33:37,760 --> 00:33:41,760
तो यह जो आवाज आ रही है गलत करने वाली यह उसके मन

480
00:33:41,760 --> 00:33:46,400
मतलब बुद्धि से नहीं आ रही है बल्कि मन से आ रही है। यह निर्णय वो कैसे करेगा?

481
00:33:46,400 --> 00:33:50,400
पहली बात। दूसरी बात यदि वो दूसरी बात यदि वो कर

482
00:33:50,400 --> 00:33:54,400
भी लेगा तो इससे उसे फायदा क्या होगा? मैंने

483
00:33:54,400 --> 00:34:00,400
पूछा उपयोगिता क्या है? आवश्यकता क्या है धर्म की? दो बातें। जी

484
00:34:01,200 --> 00:34:05,280
ये जो दो आवाजें आ रही है ना आपने कहा। ये एक ही

485
00:34:05,280 --> 00:34:09,600
स्थान से दो आवाजें आ रही है। जब तक शरीर के भीतर

486
00:34:09,600 --> 00:34:13,840
आत्मा है तभी तक तो आवाज आएगी। नहीं तो क्या होगा?

487
00:34:13,840 --> 00:34:17,920
शरीर के सारे अंग पांच कर्मेंद्रियां, पांच ज्ञानेंद्रियां

488
00:34:17,920 --> 00:34:22,080
यूं के यूं जमीन पर पड़ी हुई होंगी, आंखें भी होंगी, नाक भी होगा।

489
00:34:22,080 --> 00:34:26,160
होठ भी होंगे, कान भी होंगे, त्वचा भी होगी, सारे के सारे

490
00:34:26,160 --> 00:34:30,400
अंग होंगे। और अगर इसमें से आत्मा यानी रथी जो

491
00:34:30,400 --> 00:34:34,880
चला रहा है इस शरीर को रथी निकल गया तो कह दिया जाएगा यह अरथी हो गई

492
00:34:34,880 --> 00:34:38,960
या कह दिया जाएगा निधन हो गया ऐसा कहां इतना लंबा जा

493
00:34:38,960 --> 00:34:43,040
रहे हैं मैंने आपसे पूछा है कि मन और बुद्धि में अंतर कैसे करें कि ये आवाज मेरी

494
00:34:43,040 --> 00:34:47,040
बुद्धि की आवाज नहीं है ये अंतर कैसे करें और दूसरी बात

495
00:34:47,040 --> 00:34:51,120
की यदि अंतर कर भी लिया तो इससे मुझे फायदा क्या होगा स्वयं के स्वयं के

496
00:34:51,120 --> 00:34:55,120
भीतर ये आवाज उठती है स्वयं के भीतर ये आवाज उठती है ये गलत है

497
00:34:55,120 --> 00:34:59,120
लेकिन क्या होता है कि उसे उसे दबा दिया जाता है। मन दबा लेता है। नहीं कोई बात नहीं चल

498
00:34:59,120 --> 00:35:03,680
बाद में देख लेंगे। कोई बात नहीं चल बाद में देख लेंगे फिर कर लेंगे। और जैसे जैसे

499
00:35:03,680 --> 00:35:07,840
स्वयं के भीतर से ही आवाजों को इसीलिए तो हम जब

500
00:35:07,840 --> 00:35:11,840
स्वयं के भीतर से ही जब दबा सकते हैं तो हमें कोई बाह्य बल

501
00:35:11,840 --> 00:35:15,920
चाहिए ना निश्चित करने के लिए क्या सही है क्या गलत है इसीलिए भगवान ने कहा तेरे लिए

502
00:35:15,920 --> 00:35:16,420
कर्तव

503
00:35:16,400 --> 00:35:20,480
कर्तव्य के विषय में शास्त्र प्रमाण है तो बुद्धि के ऊपर डिपेंड

504
00:35:20,480 --> 00:35:24,640
इसलिए नहीं हो सकते कि वहां हम निर्णय नहीं कर पाएंगे कि कौन सी आवाज बुद्धि से कौन सी मन से

505
00:35:24,640 --> 00:35:28,640
जैसे निठारी वालों को निठारी हत्याकांड में बच्चों का मांस

506
00:35:28,640 --> 00:35:32,640
कुकर में उबाल के खाना ही धर्म लग रहा है वहां उनकी बुद्धि

507
00:35:32,640 --> 00:35:36,720
से आवाज आ रही होगी। उन्होंने दबा दी। उन्होंने सोचा जो मना कर रहा है वो गलत है और जो कह

508
00:35:36,720 --> 00:35:41,040
रहा है खा ले वो सही है। उन्होंने आवाज दबा दी ना

509
00:35:41,040 --> 00:35:45,040
लेकिन आवाज तो आई थी। ये हम सिद्ध कैसे

510
00:35:45,040 --> 00:35:49,440
करेंगे? ये हम सिद्ध कैसे करेंगे? उनके

511
00:35:49,440 --> 00:35:54,800
अंदर ज्ञान और अभ्यास की कमी थी। क्या

512
00:35:54,800 --> 00:35:59,040
हम सामने वाले को यह सिद्ध कैसे करेंगे कि यह जो आवाज

513
00:35:59,040 --> 00:36:03,040
आ रही है तुम्हारे अंदर से गलत आवाज है। तुम गलत डायरेक्शन में

514
00:36:03,040 --> 00:36:07,040
जा रहे हो। सिद्ध कैसे करेंगे उसको? हम बाहर से सिद्ध नहीं कर सकते।

515
00:36:07,040 --> 00:36:11,120
उसके भीतर ही आवाज आती है और वही वही हो रहा है। इसका मतलब उससे ये नहीं कह सकते

516
00:36:11,120 --> 00:36:16,240
निठारी वाले से कि तुम अधर्म कर रहे हो।

517
00:36:16,240 --> 00:36:20,320
आप कहे उससे अधर्म कर रहे हो। कह सकते हैं? कह सकते हैं लेकिन

518
00:36:20,320 --> 00:36:24,480
उसके भीतर की आवाज भी तो आती है ना उसके अंदर से और उसके लिए

519
00:36:24,480 --> 00:36:28,800
सत्संग की आवश्यकता होती है। उसके लिए ज्ञान की आवश्यकता होती है। क्योंकि

520
00:36:28,800 --> 00:36:31,520
अगर किसी को सुधार कैसे होगा वो एक अलग

521
00:36:31,520 --> 00:36:36,000
बात है। सुधार कैसे होगा अलग बात है। मैं पूछ रहा हूं कि

522
00:36:36,000 --> 00:36:40,080
जो व्यक्ति एक नॉर्मल खड़ा हुआ है उसके अंदर दोनों तरह की आवाजें हैं। तो उसमें

523
00:36:40,080 --> 00:36:44,400
से किस आवाज किस उसमें से जो सकारात्मकता वाली आवाज है उसको सुनना

524
00:36:44,400 --> 00:36:48,480
है और नकारात्मकता वाली आवाज है उसको नहीं सुनना है। उसको हम किस आधार

525
00:36:48,480 --> 00:36:52,480
पर सिद्ध करवाएंगे कि ये नकारात्मक है। इसको नहीं सुनना है। ये सकारात्मक है। इसको सुनना

526
00:36:52,480 --> 00:36:56,720
है। मेरे मेरा कहना है कि उसको शास्त्र दिए जाएंगे। भाई शास्त्र में लिखा है

527
00:36:56,720 --> 00:37:00,800
बहन के साथ विवाह नहीं करना है तो नहीं करना है। ये वाली दूसरी

528
00:37:00,800 --> 00:37:04,880
आवाज को दबा दो। ठीक है। कह रहे हैं कि अंदर से ही

529
00:37:04,880 --> 00:37:08,880
अंदर से ही निर्णय होगा। तो अंदर से निर्णय लेने के नाम पे तो व्यक्ति कुछ भी

530
00:37:08,880 --> 00:37:13,120
करता रहेगा। केवल शास्त्र देने से काम चलेगा या शास्त्र

531
00:37:13,120 --> 00:37:17,280
पढ़ने के बाद उस पर अमल करने से उसका अभ्यास करने से काम चलेगा? अरे वो

532
00:37:17,280 --> 00:37:21,840
तो आगे की बात है ना भाई साहब आप दूसरे डायरेक्शन में क्यों जा रहे हैं इसका मतलब उस

533
00:37:21,840 --> 00:37:26,000
व्यक्ति ने निठारी कांड वाले व्यक्ति ने अभ्यास नहीं किया उसने

534
00:37:26,000 --> 00:37:30,160
शास्त्रों को नहीं जाना बार बार अगर शास्त्रों को जाना

535
00:37:30,160 --> 00:37:34,400
होता पढ़ा होता सत्संग किया होता तो ये नौबत ही नहीं आती

536
00:37:34,400 --> 00:37:38,480
हां हां शास्त्र से मतलब शास्त्र से तय होगा क्या गलत है क्या सही मैं

537
00:37:38,480 --> 00:37:42,480
ये कहना चाह रहा हूं अब मुझे ये बता दीजिए इसका फायदा के ज्ञान से शास्त्र

538
00:37:42,480 --> 00:37:46,720
एक माध्यम है शास्त्र के ज्ञान से अरे ऐसे भाई साहब बातों

539
00:37:46,720 --> 00:37:51,280
के लक्ष्य बनाने तो मैं भी कह दूं शास्त्र के ज्ञान से नहीं

540
00:37:51,280 --> 00:37:55,280
ईश्वर प्राप्ति से प्राप्त होगा और बोलो ईश्वर की शरण में जाने से प्राप्त होगा और

541
00:37:55,280 --> 00:38:00,240
बोलो ऐसे बातों के लक्ष्य नहीं बनाने ईश्वर की शरण में वही तो जाएगा

542
00:38:00,240 --> 00:38:04,240
जिस व्यक्ति ने उस सकारात्मक ज्ञान को समझ लिया और अपने जीवन

543
00:38:04,240 --> 00:38:08,400
के ढाल लिया इसी तरीके से सकारात्मक ज्ञान वही तो प्राप्त करेगा जो शास्त्र

544
00:38:08,400 --> 00:38:12,480
के अधीन हो जाएगा बातों के लक्ष्य क्यों बनाने हैं वही बात

545
00:38:12,480 --> 00:38:16,560
मैं कह रहा हूं वही बात आपको लगता है लक्ष्य तो ठीक है लेकिन हमने जो

546
00:38:16,560 --> 00:38:20,640
अपनी बात कहनी थी वो कह दीजिए। अच्छा ठीक है। अभी मुझे बताइए

547
00:38:20,640 --> 00:38:26,640
सही गलत का चुनाव करने का फायदा क्या है? क्यों किया जाए?

548
00:38:27,920 --> 00:38:33,280
क्योंकि इससे एक आत्मिक शांति की अनुभूति होती है।

549
00:38:33,280 --> 00:38:37,360
आत्मिक शांति की अनुभूति का पहला जो

550
00:38:37,360 --> 00:38:42,080
तरीका है जो मैंने अनुभव किया है कि रात को कोई सपना नहीं आता।

551
00:38:42,080 --> 00:38:46,640
मन में विचार नहीं चलते फालतू के। व्यक्ति

552
00:38:46,640 --> 00:38:51,040
के विचार जो होते हैं बड़ी मुश्किल से चार ही रह जाते हैं। 40

553
00:38:51,040 --> 00:38:55,200
नहीं चलते सिर्फ चार रह जाते हैं। और कई

554
00:38:55,200 --> 00:39:00,400
लोग तो ऐसे होते हैं जो विचारों से शून्य हो जाते हैं। अच्छा

555
00:39:00,400 --> 00:39:04,480
तो इसका अर्थ है कि ये जो ज्ञान विज्ञान है इसका सब

556
00:39:04,480 --> 00:39:10,480
कुछ जो लय है वो है परम कल्याण यानी कि मोक्ष में।

557
00:39:11,200 --> 00:39:15,920
जी जब उसको किसी भी

558
00:39:15,920 --> 00:39:20,080
जब उसके पास किसी भी प्रकार का अभाव ना रह जाए अभाव रहित

559
00:39:20,080 --> 00:39:24,080
हो जाए हां उसे किसी चीज की इच्छा ही ना रह जाए कि मुझे

560
00:39:24,080 --> 00:39:28,480
ये पाना है जो परमात्मा ने दिया है जो ईश्वर ने दिया है काफी है हे प्रभु

561
00:39:28,480 --> 00:39:32,560
तेरा शुक्रिया हम तूने जो दिया है हम

562
00:39:32,560 --> 00:39:36,960
तेरी संतान है तूने पहले ही बहुत कुछ दिया है हमें और इतना कुछ दे रखा है उसने

563
00:39:36,960 --> 00:39:40,960
देखिए मैं छोटी सी अगर आप एक मिनट दे तो मैं आपसे अपनी

564
00:39:40,960 --> 00:39:45,200
बात पूरी कर लूं। ईश्वर ने हमें यानी वो परमपिता जिसे

565
00:39:45,200 --> 00:39:49,280
हम कहते हैं उस परमपिता ने परमात्मा शिव और माता पार्वती ने

566
00:39:49,280 --> 00:39:53,280
हमें ये पृथ्वी दी है। ठीक है? पृथ्वी में उसने जो पेड़

567
00:39:53,280 --> 00:39:58,000
दिए हैं अगर उनको पत्थर भी मारे तो वो भी क्या करते हैं? हमें फल देते हैं।

568
00:39:58,000 --> 00:40:02,240
सूर्य कभी भी ये नहीं देखता कि मैं मुसलमान के यहां चमकू

569
00:40:02,240 --> 00:40:06,720
या हिंदू के यहां चमकू या उसके यहां ना चमकू, उसके यहां ना चमकू।

570
00:40:06,720 --> 00:40:10,880
हो सकता है कि हम लोग आपस में बांट ले। हम लोग बांट ले कि ठीक है

571
00:40:10,880 --> 00:40:14,880
ईद पे तेरा चंद्रमा है और करवा चौथ पे मेरा चंद्रमा है। हम बांट सकते हैं लेकिन

572
00:40:14,880 --> 00:40:18,960
चंद्रमा को तो मालूम ही नहीं है। इसी तरह से जो हवाएं चलती है मुझे छूकर किसी

573
00:40:18,960 --> 00:40:23,120
दूसरे के पास चली जाती है। फिर तीसरे के पास चली जाती है। तो कोई धर्म भ्रष्ट किसी

574
00:40:23,120 --> 00:40:26,400
का नहीं होता। यहां ये धर्म नहीं है। धर्म भ्रष्ट होता ही नहीं किसी का।

575
00:40:26,400 --> 00:40:30,800
इसी तरह से पृथ्वी रात भर अन्न उगाती रहती है। उसको

576
00:40:30,800 --> 00:40:34,800
पानी दो, बीज को और बीजों को भी पता है कि उगना है और परमात्मा ने तो

577
00:40:34,800 --> 00:40:39,040
यहां तक कर रखा है कि सबसे ऊपर गेहूं की बाली लगती है। उससे नीचे पहले भूसा

578
00:40:39,040 --> 00:40:43,120
लग जाता है। जानवरों के लिए भी उसने बंदोबस्त कर रखा है। तो ये जो परमात्मा का जब

579
00:40:43,120 --> 00:40:47,360
किसी से भेदभाव नहीं करता है। हम मनुष्य क्यों भेदभाव

580
00:40:47,360 --> 00:40:51,600
करें? सबसे बड़ा एक मेरा सवाल

581
00:40:51,600 --> 00:40:56,000
कुछ है। आप थोड़ा सा ट्रैक उसमें खो जाते हैं। आप मैं पूछ रहा हूं।

582
00:40:56,000 --> 00:41:00,080
कि जब हम यह फॉलो करेंगे कि यह

583
00:41:00,080 --> 00:41:04,160
करना है और यह नहीं करना है। अंत में सबसे महत्वपूर्ण चीज हमें जो मिलने वाली

584
00:41:04,160 --> 00:41:08,400
है वो है मोक्ष। ठीक है? यही है ना? तो यही

585
00:41:08,400 --> 00:41:12,400
हां यही हम कहना चाह रहे हैं। फिर वो जो स्मृति आ जाती है व्यक्ति की जो स्मृति आ

586
00:41:12,400 --> 00:41:16,480
जाती है मोक्ष यानी कि जब मेरे

587
00:41:16,480 --> 00:41:20,960
को कुछ भी और प्राप्त करना शेष ना रह जाए। जैसे कि गीता में लिखा हुआ है।

588
00:41:20,960 --> 00:41:25,360
है ना? हां। बिल्कुल बिल्कुल हां। तो वो यानी कि जो

589
00:41:25,360 --> 00:41:29,520
जो मोक्ष है मोक्ष है उसको अगर हम लोग थोड़ी सी शास्त्री

590
00:41:29,520 --> 00:41:34,480
भाषा में कहे तो सच्चिदानंद की प्राप्ति ही मोक्ष है

591
00:41:34,480 --> 00:41:39,360
बिल्कुल है ना सच्चिदानंद की प्राप्ति

592
00:41:39,360 --> 00:41:41,680
एक मिनट मैंने सच्चिदानंद

593
00:41:41,680 --> 00:41:46,240
की प्राप्ति सतित आनंद की प्राप्ति यानी कि अनंत

594
00:41:46,240 --> 00:41:50,720
अबाध्य स्वरूप से स्थित और आनंद में मग्न

595
00:41:50,720 --> 00:41:54,960
जी है ना बिल्कुल बिल्कुल अब बात

596
00:41:54,960 --> 00:41:58,960
आती है कि ब्रह्मा कुमारी ब्रह्मा कुमारी

597
00:41:58,960 --> 00:42:04,240
वाले ये कहते हैं कि इस्लाम भी धर्म है।

598
00:42:04,240 --> 00:42:08,720
ठीक है। हां हां बोलिए। तो क्या

599
00:42:08,720 --> 00:42:13,680
यानी कि कुरान में बताया गया जो ज्ञान विज्ञान है वो भी धर्म है।

600
00:42:13,680 --> 00:42:17,760
हां जी। ठीक है। पहली बात तो ये है कि इस्लाम कोई धर्म ही

601
00:42:17,760 --> 00:42:21,760
नहीं है। इस्लाम धर्म नहीं है। नहीं

602
00:42:21,760 --> 00:42:25,840
है। इस्लाम एक एक मिनट एक मिनट इस्लाम धर्म

603
00:42:25,840 --> 00:42:29,840
नहीं है और बाइबल ईसाई वो भी कोई धर्म

604
00:42:29,840 --> 00:42:34,000
नहीं है। हां ठीक है। तो यानी ब्रह्मा कुमारी जो ये क्लेम

605
00:42:34,000 --> 00:42:38,560
कर रही है कि इस्लाम धर्म है और बाइबल धर्म है ये गलत कर रही है।

606
00:42:38,560 --> 00:42:42,800
उन्होंने कहीं क्लेम नहीं किया है। हमसे विदियों की बात हो रही है।

607
00:42:42,800 --> 00:42:46,880
मैं आपको वीडियो दिखा दूं। वीडियो दिखा दूं आपको कि

608
00:42:46,880 --> 00:42:51,120
परमात्मा ने सबसे पहले सृष्टि की शुरुआत की हां।

609
00:42:51,120 --> 00:42:55,200
तो जिस धर्म की स्थापना की हम वो है देवी देवता

610
00:42:55,200 --> 00:42:57,120
धर्म। देवता धर्म

611
00:42:57,120 --> 00:43:01,440
के बाद अब्राहम आया जिसने

612
00:43:01,440 --> 00:43:05,680
अपनी आत्मिक बल से पवित्रता की शक्ति से

613
00:43:05,680 --> 00:43:09,680
इस्लाम धर्म स्थापन किया। तो अगर अगर ब्रह्मा कुमारी

614
00:43:09,680 --> 00:43:13,680
वाले यह कह रहे हैं कि इस्लाम भी धर्म है

615
00:43:13,680 --> 00:43:17,920
और ये ईसाई भी धर्म है तो इतने

616
00:43:17,920 --> 00:43:23,920
अंश में आप फिर समर्थक नहीं है ना ब्रह्मा कुमारी के

617
00:43:24,400 --> 00:43:28,640
किस बात का समर्थक नहीं हूं। अरे भाई समर्थक

618
00:43:28,640 --> 00:43:32,960
नहीं हूं मैं। ठीक है। अगर कोई सुनिए अगर कोई

619
00:43:32,960 --> 00:43:37,040
अगर कोई खुद को प्रमाणिक कह रहा है कि मैं प्रामाणिक हूं और

620
00:43:37,040 --> 00:43:41,280
उसमें एक रत्ती भर भी हमें ये लग रहा है कि ये झूठ बोल रहा है यहां पे गलत बोल रहा है

621
00:43:41,280 --> 00:43:46,320
तो उसकी अप्रामाणिक वो प्रामाणिकता तो भंग हो गई ना वहां

622
00:43:46,320 --> 00:43:50,320
तो उनसे बात की जा सकती है इस बारे में। देखिए बौद्ध कोई धर्म

623
00:43:50,320 --> 00:43:54,480
है तो तो जब तक बात नहीं होती जब जब तक बात नहीं

624
00:43:54,480 --> 00:43:58,880
होती तब तक तो अप्रामाणिक ही कहलाएंगे ना। हां

625
00:43:58,880 --> 00:44:02,880
अब अब हम आपको बताते हैं कि हम है संत व्यक्ति। हम जहां भी

626
00:44:02,880 --> 00:44:07,040
जाते हैं वहां देखते हैं कि गुण ले लेते हैं। अवगुण छोड़ देते हैं। हमें अवगुण

627
00:44:07,040 --> 00:44:12,000
से कोई मतलब ही नहीं। भाई साहब जब

628
00:44:12,000 --> 00:44:14,480
आप

629
00:44:14,480 --> 00:44:18,560
ये आप तब कह पा रहे हैं ना जब फोर्स लगी हुई है सरहदों पे। आपकी

630
00:44:18,560 --> 00:44:22,560
कोई रक्षा कर रहा है खाकी वर्दी पहन करके डंडा लेकर के। तब आप कह रहे हैं हमें कोई मतलब

631
00:44:22,560 --> 00:44:26,560
नहीं है। अभी आपको डकैती करने आपके आसपास कोई आएगा। आपको जान से मारने

632
00:44:26,560 --> 00:44:30,640
आएगा। आपको नहीं आपके परिजनों को मारने आएगा आपके प्रियजनों को मारने आएगा या

633
00:44:30,640 --> 00:44:34,800
कहीं पर भी कुछ आएगा तब आपको लगेगा नहीं इसको रोकना जरूरी इसके गुण नहीं लेने इसको

634
00:44:34,800 --> 00:44:39,840
रोकना है एट द टाइम हां तो उस समय रोका जाएगा ना परिस्थिति

635
00:44:39,840 --> 00:44:43,920
मतलब अपने आसपास जब गलत हो तो वहां पर रोकना पड़ता है ये नहीं कि उसके गुण

636
00:44:43,920 --> 00:44:48,240
ले ले अगर किसी के घर में अगर जैसे कोई कहे कि भाई दुनिया भर में वैश्यावत्त

637
00:44:48,240 --> 00:44:53,360
हो रही है तो हमें कोई मतलब नहीं है हम तो उसके गुण लेंगे

638
00:44:53,360 --> 00:44:55,520
जब

639
00:44:55,520 --> 00:44:59,920
ब्रह्मा कुमारी वाले किसी पे आक्रामक नहीं हो रहे हैं। किसी पे हमला भी नहीं कर रहे हैं। वो

640
00:44:59,920 --> 00:45:04,400
वैचारिक तौर पर आक्रामक हो रहे हैं ना। वैचारिक तौर पर हिंदुओं को दिशाहीन

641
00:45:04,400 --> 00:45:08,400
बना रहे हैं ना। उन्होंने तो कभी नहीं कहा कि दिशाहीन हो जाओ। कभी

642
00:45:08,400 --> 00:45:12,560
नहीं कहा उन्होंने। अरे भाई जब वो ये क्लेम कर रहे हैं। आप कह रहे हो कि इस्लाम और ईसाइयत धर्म

643
00:45:12,560 --> 00:45:16,320
नहीं है और वो कह रहे हैं कि धर्म है।

644
00:45:16,320 --> 00:45:20,320
तो इतने मुझे मानना पड़ेगा ना कि कर रहे हैं। मुझे

645
00:45:20,320 --> 00:45:24,400
देखिए जो मेरा अपना अनुभव है मुझे नहीं लगा कि अभी उन्होंने इस तरह की कोई बात हमसे की

646
00:45:24,400 --> 00:45:28,960
हो। तो आपको पता करना चाहिए था वीडियो दिखा दूंगा आपको

647
00:45:28,960 --> 00:45:33,760
वीडियो दिखा दूंगा

648
00:45:33,760 --> 00:45:37,760
आपको समर्थन तब करना चाहिए ना ब्रह्मा कुमारी का जब आप पता कर लो मैं

649
00:45:37,760 --> 00:45:41,760
आपको 10 वीडियो दिखा दूंगा उनके टॉप लीडर्स के द्वारा ये क्लेम किया जा रहा है कि इस्लाम और

650
00:45:41,760 --> 00:45:45,920
ईसाइयत भी धर्म है हमें क्या पड़ी है उनका विरोध करने की यदि वो इस तरह की बातें

651
00:45:45,920 --> 00:45:49,200
ना करें तो

652
00:45:49,200 --> 00:45:54,800
मेरी बात को थोड़ा ध्यान से समझने की कोशिश कीजिए कि

653
00:45:54,800 --> 00:45:58,880
जो भी धर्म है जो भी धर्म है धर्म

654
00:45:58,880 --> 00:46:03,600
तो एक है सनातन और ब्रह्मा कुमारी सनातन धर्म को ही मानती है

655
00:46:03,600 --> 00:46:07,600
वो मैं अभी उसप भी आ रहा हूं मैं ब्रह्मा कुमारी की अपनी

656
00:46:07,600 --> 00:46:11,680
फिलोसफी पे भी आ रहा हूं पर पहले इस्लाम वाली बात क्लियर कर लूं इस्लाम

657
00:46:11,680 --> 00:46:15,760
और ईसाइयत धर्म नहीं है वो लोग ये क्लेम कर रहे हैं मैं 10 वीडियो आपको दिखा दूंगा

658
00:46:15,760 --> 00:46:19,840
अब आप मुझे वचन दे दीजिए आप नहीं मानते कि वो ऐसा क्लेम कर रही है और पता

659
00:46:19,840 --> 00:46:24,880
लगा तो आप क्षमा मांगेंगे सार्वजनिक रूप से कि मैंने ब्रह्मा कुमारी का समर्थन किया

660
00:46:24,880 --> 00:46:29,440
हमने हमने इस बात का समर्थन नहीं किया है। हमने ब्रह्मा कुमारी के गुणों का समर्थन

661
00:46:29,440 --> 00:46:33,600
भाई साहब जब हम किसी को यह कह रहे हैं ये जो थाली है झूठी नहीं है।

662
00:46:33,600 --> 00:46:38,000
उसमें एक और भी झूठा डाल दिया जाएगा तो थाली झूठी हो गई।

663
00:46:38,000 --> 00:46:42,080
झूठी थाली और एक मानव की मानवता में बहुत फर्क होता है। इंसान में बहुत

664
00:46:42,080 --> 00:46:46,240
फर्क होता है। भाई साहब जब हम किसी से आध्यात्म का

665
00:46:46,240 --> 00:46:49,120
विषय लेने जाते हैं। ठीक है? अध्यात्म

666
00:46:49,120 --> 00:46:53,200
के विषय में हम ज्ञान लेने जाते हैं तो जिससे हम लेने जा रहे हैं उसको

667
00:46:53,200 --> 00:46:57,200
झूठ बोलने वाला गलत बोलने वाला नहीं होना चाहिए। जितना पता है

668
00:46:57,200 --> 00:47:02,240
उतना बोले कम से कम झूठ तो ना बोले

669
00:47:02,240 --> 00:47:06,240
आप अपनी जगह पे आप ही ने आप ही ने क्लेम कर दिया तो मैं आप ही पे सवाल

670
00:47:06,240 --> 00:47:10,320
कर रहा हूं। आपने पता ही नहीं किया कि ब्रह्मा कुमारी ये क्लेम करती है और आप उनका समर्थन लेते फिर

671
00:47:10,320 --> 00:47:14,480
रहे है ये तो गलत बात है। आप पता करिए ब्रह्मा कुमारी ब्रह्मा कुमारी

672
00:47:14,480 --> 00:47:18,880
के आपने पोस्टर देखे हैं कभी? ब्रह्मा कुमारी के आपने पोस्टर देखे कभी?

673
00:47:18,880 --> 00:47:22,960
देखे हैं। देखे हैं। देखे हैं। उसमें वो ईसा नहीं होते हैं। उसमें

674
00:47:22,960 --> 00:47:26,960
मोहम्मद नहीं होते हैं। हां होते हैं। हां। तो

675
00:47:26,960 --> 00:47:31,760
क्या क्या दिखाना चाह रहे हैं उस? उसमें गुरु नानक लेकिन

676
00:47:31,760 --> 00:47:35,840
वो महापुरुष है। महापुरुष वो फोटो लगाए हुए हैं उन्होंने। यानी कि

677
00:47:35,840 --> 00:47:39,920
मोहम्मद आपके हिसाब से मोहम्मद जी भी आदर्श है ना। महापुरुष

678
00:47:39,920 --> 00:47:42,720
आदर्श हो गए।

679
00:47:42,720 --> 00:47:46,800
तो वो उन्होंने फोटो लगा रखे हैं। ठीक है। वो उनका भाई साहब

680
00:47:46,800 --> 00:47:51,040
महापुरुष आदर्श होते हैं कि नहीं भगवत गीता का वो ध्यान है कि नहीं आपको मनुष्य

681
00:47:51,040 --> 00:47:55,760
हमेशा श्रेष्ठ को फॉलो करता है आपने अभी मोहम्मद जी को महापुरुष कहा है

682
00:47:55,760 --> 00:47:59,760
मोहम्मद को महापुरुष कहा है ना आपने ये तो फिर भविष्य पुराण खोल के देखेंगे

683
00:47:59,760 --> 00:48:03,840
उसमें भी मोहम्मद का नाम आया है तो क्या उसमें से भी उड़ा देंगे काट देंगे आप भाई

684
00:48:03,840 --> 00:48:04,640
साहब मैंने

685
00:48:04,640 --> 00:48:08,800
तो उसका ना उसका नाम इस बात में आया है कि वो जो आदर्श है वहां

686
00:48:08,800 --> 00:48:12,880
तो हमारे आदर्शों के साथ चित्रण कर रहे है ना उनका

687
00:48:12,880 --> 00:48:17,120
उसमें उसमें उसमें ये दिया है कि ये भी पृथ्वी पर अवतार लेंगे।

688
00:48:17,120 --> 00:48:21,120
भविष्य पुराण में लिखा है महाम के रूप में उनके वो आने

689
00:48:21,120 --> 00:48:25,280
के बारे में है। हम कहते हैं कि ये हो सकता है कि महापुरुषों

690
00:48:25,280 --> 00:48:29,360
के फोटो उन्होंने लगा रखे हैं। ठीक है लगा दिए। उनके लिए महापुरुष है। आप मोहम्मद

691
00:48:29,360 --> 00:48:34,160
को आप मोहम्मद को महापुरुष मानते हैं कि नहीं मानते। मैं आपसे पूछ रहा हूं।

692
00:48:34,160 --> 00:48:38,560
हम मोहम्मद को ना महापुरुष मानते हैं। ना ही उसको

693
00:48:38,560 --> 00:48:42,960
ये ठीक है कि वो मोहम्मद कौन था, क्या नहीं था? हमें नहीं मालूम ना हम जानना चाहते हैं।

694
00:48:42,960 --> 00:48:47,120
हमें अपने से मतलब है कि हम क्या है। भाई साहब

695
00:48:47,120 --> 00:48:51,200
अभी बात ये चल रही है। आपने उसको महापुरुष बोला है थोड़ी देर पहले।

696
00:48:51,200 --> 00:48:55,360
अभी नहीं बोला है। हमने कहा कि उन्होंने दोबारा महापुरुषों

697
00:48:55,360 --> 00:48:59,440
के चित्र हमने कहा कि उन्होंने उन महापुरुषों के चित्र लगा रखे हैं। ठीक है ना?

698
00:48:59,440 --> 00:49:03,440
तो आपने पोस्टर की बात की वो महापुरुष है आपने ये कहा चित्र

699
00:49:03,440 --> 00:49:08,880
लगा रखे हैं नहीं कहा है

700
00:49:08,880 --> 00:49:13,120
वो महापुरुष है महापुरुषों को फोटो लगाए हुए हैं उन्होंने

701
00:49:13,120 --> 00:49:17,760
वो महापुरुष है महापुरुषों को फोटो लगाए हुए हैं उन्होंने

702
00:49:17,760 --> 00:49:21,760
मोहम्मद ने अपना एक धर्म चलाया हर आदमी एक

703
00:49:21,760 --> 00:49:25,840
अपने अपने पीछे लोग चला लोग चल पड़ते हैं किसी के पीछे भी चल पड़ते हैं

704
00:49:25,840 --> 00:49:29,840
तो वो लोग चल गए उसके पीछे उन्होंने वहां चलाया ना नहीं जानना चाह रहा हूं।

705
00:49:29,840 --> 00:49:34,160
मैं मोहम्मद का इतिहास नहीं जानना चाह रहा हूं। मैं यह कह रहा हूं आप उसे उन्हें

706
00:49:34,160 --> 00:49:39,360
महापुरुष मानते हैं कि नहीं मानते? बस ये बताइए।

707
00:49:39,360 --> 00:49:43,600
कुछ बातें कुरान में अच्छी लिखी है तो हम अच्छी मानते हैं जो नहीं ठीक लगती हमें नहीं मानते।

708
00:49:43,600 --> 00:49:47,920
आगे बोलिए। मोहम्मद महापुरुष है कि नहीं? ये पूछा है मैंने।

709
00:49:47,920 --> 00:49:52,080
हां मैं बताता हूं। अब सूर अल फातिहा पहली सूरह जो है वो

710
00:49:52,080 --> 00:49:56,080
वो बिल्कुल अपने गायत्री मंत्र मैं पूछ रहा हूं कंक्लूजन

711
00:49:56,080 --> 00:50:00,400
क्या है? महापुरुष है कि नहीं है? कंक्लूजन ये है कि

712
00:50:00,400 --> 00:50:04,480
कुरान में भी मिक्सचर हो गया। कुरान में भी मिक्सचर हो गया। वरना कुरान

713
00:50:04,480 --> 00:50:08,640
में भी बहुत सारी अच्छी-अच्छी बातें भी तो लिखी है। तो बोलो ना कि महापुरुष है। फिर उनकी लिखी

714
00:50:08,640 --> 00:50:12,880
किताब में मिक्सचर हो गया है। ये बोलो ना मिक्सचर हो गया। महापुरुष है।

715
00:50:12,880 --> 00:50:17,040
ऐसा ऐसा मान ले किताबों में मिक्सचर हो गया है। हमारे

716
00:50:17,040 --> 00:50:21,120
में भी मिक्सचर हुआ है। महापुरुष है। ठीक है।

717
00:50:21,120 --> 00:50:24,320
अच्छा है। तो इसका मतलब उन्होंने जो धर्म दिया था वो सनातन

718
00:50:24,320 --> 00:50:29,200
ही था। वो पहले सारे सनातनी ही थे।

719
00:50:29,200 --> 00:50:33,360
नहीं महा मोहम्मद ने जो बताया वो सनातन था। ये तो मानना

720
00:50:33,360 --> 00:50:37,440
महापुरुष मान रहे हो टोटल महापुरुष तो मानना ही पड़ेगा सनातन था। तो मोहम्मद

721
00:50:37,440 --> 00:50:41,440
ने मोहम्मद ने भी जो कुछ लिया है वो भी वेदों से

722
00:50:41,440 --> 00:50:45,440
ही लिया है। क्योंकि कह रहा हूं मैं पूछ कह रहा हूं भाई

723
00:50:45,440 --> 00:50:49,440
साहब कि मोहम्मद ने सनातन ही बताया था ना टोटल

724
00:50:49,440 --> 00:50:53,600
बाद में मिक्सचर हो गया उनके नाम पे। मिक्सचर हो गया। हां ठीक है। तो यानी

725
00:50:53,600 --> 00:50:57,520
वो सनातन ही था।

726
00:50:57,520 --> 00:51:01,680
वहां का रहने वाला वहां का रहने वाला पहले जब उसके

727
00:51:01,680 --> 00:51:05,920
परिवार के लोग सारे के सारे पुजारी थे तो पुजारी आखिरकार तो सनातनी

728
00:51:05,920 --> 00:51:09,920
थे या नहीं थे। भाई साहब मैं कह रहा हूं कि मोहम्मद ने जो दिया विरोध

729
00:51:09,920 --> 00:51:13,920
पूर्वक 300 मूर्तियों को तोड़ के वो सनातन दिया था

730
00:51:13,920 --> 00:51:17,920
कि नहीं दिया था? वो मोहम्मद का दृष्टिकोण

731
00:51:17,920 --> 00:51:22,400
अलग था गलत था। मूर्तियां यानी कि वो महापुरुष

732
00:51:22,400 --> 00:51:25,440
नहीं था।

733
00:51:25,440 --> 00:51:30,560
महापुरुष भी दो तरह के हो सकते हैं ना। एक नेगेटिव थिंकिंग वाले, एक पॉजिटिव थिंकिंग वाले।

734
00:51:30,560 --> 00:51:34,640
अच्छा मतलब खलनायक मगर बड़ा गजब का खलनायक। ऐसा उन्होंने

735
00:51:34,640 --> 00:51:38,880
उन्होंने नेगेटिव रास्ता अपना लिया। मूर्तियां तोड़ दी। 360 मूर्तियां

736
00:51:38,880 --> 00:51:42,880
थी तोड़ दी। ठीक है कि नहीं? तो लेकिन जो अच्छी बातें हैं वो

737
00:51:42,880 --> 00:51:46,880
तो ले लेनी चाहिए ना। बुराई पर बुराइयां छोड़ देनी चाहिए। अच्छी बातें तो

738
00:51:46,880 --> 00:51:51,040
हमारे वेदों में ही है। हमें कहीं क्यों जाना लेने के लिए?

739
00:51:51,040 --> 00:51:55,200
वहां भी तो है। कई जगह लिखा हुआ है। अच्छी बातें लिखी हुई है। ऐसी कोई बात बता

740
00:51:55,200 --> 00:51:59,200
दीजिए जो वेद के बाहर हो। बताइए। वेद के बाहर

741
00:51:59,200 --> 00:52:03,440
कोई भी बात नहीं है। तो फिर हम कुरान फिर हम क्या करेंगे

742
00:52:03,440 --> 00:52:08,960
कुरान से? कुरान का क्या करें? फिर हम क्यों जाए कुरान के पास?

743
00:52:08,960 --> 00:52:12,560
ना जाइए। आपको कौन कह रहा है कि जाइए? अरे ब्रह्मा कुमारी

744
00:52:12,560 --> 00:52:16,720
वाले कह रहे हैं ना कि भैया हमारे रामचंद्र जी के साथ शिव जी के साथ खड़ा कर रहे हैं ना मोहम्मद

745
00:52:16,720 --> 00:52:20,800
को क्यों कर रहे हैं भाई जब हमारे शिव जी के पास सब कुछ है राम के पास सब कुछ

746
00:52:20,800 --> 00:52:25,120
है तो क्यों ला रहे हो मोहम्मद को जिसमें वेद वेद की कॉपी होने के साथसाथ

747
00:52:25,120 --> 00:52:29,360
वेद के वेद का विरोध भी है वेद

748
00:52:29,360 --> 00:52:33,680
विरोधी को मनुस्मृति में नास्तिक कहा गया है ठीक है तो

749
00:52:33,680 --> 00:52:37,840
आप इस बात को जांच आप इस बात को जांच लीजिएगा कि ब्रह्मा कुमारी

750
00:52:37,840 --> 00:52:42,080
वाले ये क्लेम करते हैं कि इस्लाम और ईसाइयत भी धर्म

751
00:52:42,080 --> 00:52:44,800
है।

752
00:52:44,800 --> 00:52:48,960
ये सिर्फ हमारी दृष्टि में एक संप्रदाय है। ये जैसे

753
00:52:48,960 --> 00:52:53,280
बौद्ध एक संप्रदाय है। सिख एक संप्रदाय है। ये सारे के सारे संप्रदाय हैं।

754
00:52:53,280 --> 00:52:57,440
जैन एक संप्रदाय है। ये संप्रदाय है। लेकिन सभी का एक ही मूल

755
00:52:57,440 --> 00:53:00,560
है।

756
00:53:00,560 --> 00:53:04,160
पंथ शब्द उपयुक्त है।

757
00:53:04,160 --> 00:53:08,960
पंथ भी कह सकते हैं। पंथ भी कह सकते हैं।

758
00:53:08,960 --> 00:53:13,520
इनको वैदिक दिखाना वैदिक प्रतीक चिन्हों के साथ खड़ा करना

759
00:53:13,520 --> 00:53:17,760
यह संशय पूर्ण स्थिति फैलाने के जैसा है। क्यों है? क्योंकि

760
00:53:17,760 --> 00:53:21,760
हमारा धर्म सिखा रहा है कि रकुल रीत सदा चली आई प्राण जाई पर वचन ना

761
00:53:21,760 --> 00:53:25,840
जाई। और 33 चार में कुरान ये कह रही है कि

762
00:53:25,840 --> 00:53:29,840
यदि आपने किसी को मुख से मां बहन इत्यादि जैसा कुछ मान लिया है

763
00:53:29,840 --> 00:53:33,920
तो भी उसके उलट आप उससे विवाह कर सकते हो। हमारा धर्म सिखा

764
00:53:33,920 --> 00:53:37,920
रहा है। अपने वचन के पक्के हो जाओ। और वहां पर सिखाया जा रहा है कि

765
00:53:37,920 --> 00:53:42,000
आपने माता बहन कुछ बोल दिया तब भी उससे विवाह कर लो या विवाह के बिना भी

766
00:53:42,000 --> 00:53:45,840
जो कुछ किया जा सकता है वो भी कर लो।

767
00:53:45,840 --> 00:53:50,240
नहीं मेरे ख्याल से तो 33 चार में बात नहीं लिखी है। खोलिए

768
00:53:50,240 --> 00:53:52,400
जरा।

769
00:53:52,400 --> 00:53:58,400
रुकिए जरा एक मिनट। हां एक मिनट रुकिए जरा।

770
00:53:58,880 --> 00:54:03,280
हम सूर अलहजाब हम

771
00:54:03,280 --> 00:54:09,280
ठीक है जी। तो इसमें लिखा है

772
00:54:11,200 --> 00:54:15,360
अल्लाह ने किसी के सीने में दो दिल नहीं दिए। हम और ना तुम्हारी

773
00:54:15,360 --> 00:54:20,080
बीवियों को जिनसे तुम जिहार करते हो तुम्हारी मां बनाया

774
00:54:20,080 --> 00:54:24,880
और ना तुम्हारे मुंह बोले बेटों को तुम्हारा बेटा बना दिया हम

775
00:54:24,880 --> 00:54:29,040
ठीक है ये सब तुम्हारे अपने मुंह की बातें हैं मुंह की बातों

776
00:54:29,040 --> 00:54:33,040
को कैंसिल कर दिया ना हम सुनो मुंह की बातें हैं

777
00:54:33,040 --> 00:54:37,120
और अल्लाह ए हक की बात करता है और सीधा रास्ता दिखाता है मुंह मोले

778
00:54:37,120 --> 00:54:42,160
बेटों को उनके बापों की निस्सीत से पुकारो

779
00:54:42,160 --> 00:54:46,160
मुंह मोले बेटों को मुंह की बातों का यहां पे डिनाई कर

780
00:54:46,160 --> 00:54:50,240
रहे हैं ना। मुंह बोले रिश्तों को डिनाई किया ना यहां पे। ना ना ये थोड़ा

781
00:54:50,240 --> 00:54:54,800
समझ का फर्क आ गया। मुंह भोले बेटों को उनके बापों को से पुकारो।

782
00:54:54,800 --> 00:54:58,960
अल्लाह के नजदीक तुम्हारा मुंसना बात है। फिर अगर तुम उनके बाप को ना जानो

783
00:54:58,960 --> 00:55:03,360
तो तुम्हारे दीनी भाई हैं। ठीक है। मतलब मतलब

784
00:55:03,360 --> 00:55:07,440
हम भाई नहीं बना सकते। मुंह बोल मुंह बोला है। बोला

785
00:55:07,440 --> 00:55:10,720
भाई

786
00:55:10,720 --> 00:55:14,720
और इसी में भी है। मुझे जिहारत का जिहार का

787
00:55:14,720 --> 00:55:18,320
अर्थ बता दीजिए जरा।

788
00:55:18,320 --> 00:55:23,440
देख लेते हैं जरा। कुरान उतारना है जरा ऊपर। हरी वाली।

789
00:55:23,440 --> 00:55:27,680
हां। तलाक देने की सूरत सुनिए।

790
00:55:27,680 --> 00:55:31,680
तलाक देने की सूरत जिसमें शौहर अपनी बीवी से कहता था कि तुम मेरे

791
00:55:31,680 --> 00:55:35,760
लिए मां की पीठ की तरह हो। यानी जैसे हम मौसी कहते हैं कि

792
00:55:35,760 --> 00:55:39,760
तुम मेरी मां जैसी हो। यह माना है यहां पे। जिहार

793
00:55:39,760 --> 00:55:43,920
का मतलब किसको कहता था? हां

794
00:55:43,920 --> 00:55:48,240
ये देखिए बताता हूं। दोबारा बताता हूं। तलाक देने की एक सूरत

795
00:55:48,240 --> 00:55:52,480
तलाक देने की एक सूरत जिसमें शौहर अपनी बीवी से कहता है कि तुम मेरे

796
00:55:52,480 --> 00:55:56,640
लिए मां की पीठ की तरह हो। जब उसने तलाक दे दिया तो फिर उसके साथ जो व्यवहार

797
00:55:56,640 --> 00:56:01,200
करेगा वो मां की तरह करेगा। अरे भाई साहब

798
00:56:01,200 --> 00:56:05,360
थोड़ा सा जान लीजिए कुरान के बारे में। ये जिहार

799
00:56:05,360 --> 00:56:09,360
वहां पर होता था। लोग अपनी पत्नी को मां कह के

800
00:56:09,360 --> 00:56:13,760
तलाक दे देते थे। तो उस संबंध में एक आयत आई

801
00:56:13,760 --> 00:56:18,240
जिसमें यह कहा गया कि तुम ये मुंह बोले रिश्ते तुम्हारे मायने नहीं रखते।

802
00:56:18,240 --> 00:56:22,480
ये मुंह से मां कह देना, मुंह से बेटा कह देना ये सब गलत है। और उसके

803
00:56:22,480 --> 00:56:26,160
बाद से उनके यहां पर गोद लेने का जो है बंद हो गया।

804
00:56:26,160 --> 00:56:30,800
मना कर दिया गया टोटल।

805
00:56:30,800 --> 00:56:34,880
जो मेरी दृष्टि में आया वो भी मैंने आपको बताया। हां। तो आप

806
00:56:34,880 --> 00:56:39,600
पहले समझ लीजिए कि क्या कहा जा रहा है वहां पे। एक मिनट।

807
00:56:39,600 --> 00:56:44,000
हां देख ले आप भी। देखिए इसमें

808
00:56:44,000 --> 00:56:46,640
लिखा है

809
00:56:46,640 --> 00:56:50,640
ऐ ईमान वालों उन मुंह बोले बेटों को

810
00:56:50,640 --> 00:56:54,800
उनके सगे बापों के नाम से बुलाया करो। यही

811
00:56:54,800 --> 00:56:59,440
बात अल्लाह के नजदीक जियाद है। ठीक है?

812
00:56:59,440 --> 00:57:03,440
पर अगर तुम उनको उनके बाप का नाम मालूम ना हो मुंह बोले

813
00:57:03,440 --> 00:57:07,520
बेटे का। ठीक है? तो वो तुम्हारे दीनी भाई हैं। दीनी दोस्त

814
00:57:07,520 --> 00:57:11,680
हैं। पर तुमसे इसमें भूल चूक हो

815
00:57:11,680 --> 00:57:15,920
जाए तो इसमें तुम पर कुछ पाप नहीं। यानी

816
00:57:15,920 --> 00:57:20,240
कि जो मुंह बोले रिश्ते इत्यादि है उसमें अगर रिश्तों के विरुद्ध

817
00:57:20,240 --> 00:57:24,560
जाते हुए तुमसे कुछ उल्टा व्यवहार हो जाए तो तुम पर कोई पाप नहीं क्योंकि वो मुंह बोले

818
00:57:24,560 --> 00:57:28,560
ये सब आपने कहा ना ये सब तुम्हारे मुंह की बातें हैं मुंह की बातों

819
00:57:28,560 --> 00:57:33,120
की अवहेलना हुई ना और हमारे यहां मुंह की बात का वो हो रहा है सम्मान

820
00:57:33,120 --> 00:57:37,840
रखुरी सदा चली आई प्राण जाई पर वचन ना जाई

821
00:57:37,840 --> 00:57:41,280
क्योंकि ये सब तुम्हारे मुंह की बातें हैं

822
00:57:41,280 --> 00:57:45,440
और यह जो जिहारत है इसी के कारण ये वाली बात उतरी और

823
00:57:45,440 --> 00:57:51,120
ऐसी एक चीज नहीं है कुरान में केवल एक ही पंक्ति है।

824
00:57:51,120 --> 00:57:55,200
दूसरी बात एक ये है कि जब आप कुरान में कुरान को जस्टिफाई करने

825
00:57:55,200 --> 00:57:59,840
बैठे हैं तो इसका मतलब सबसे पहले तो हम ये मान रहे हैं मैं

826
00:57:59,840 --> 00:58:04,160
हम जस्टिफाई नहीं करने बैठे हैं। हमने तो ये कहा है कि जिस तरह से इनकी

827
00:58:04,160 --> 00:58:09,200
सूरह अल फातिहा जो पहली सूरह है कुरान की वो

828
00:58:09,200 --> 00:58:14,400
गायत्री मंत्र से ली गई है। सब तारीफ

829
00:58:14,400 --> 00:58:18,480
हमें मतलब क्या है जब हमारे पास गायत्री मंत्र है मेरा कहने का

830
00:58:18,480 --> 00:58:22,560
अर्थ यह है कि दुनिया में कहीं भी यदि कोई थोड़ी बहुत भी चमक है तो

831
00:58:22,560 --> 00:58:27,040
हमारे वेदों के कारण है जिस प्रकार से दुनिया में कहीं भी कोई बल्ब जल रहा है

832
00:58:27,040 --> 00:58:31,280
तो हम ये थोड़ी ना कह सकते ये जो है स्वतंत्र रूप से थॉमस अलवा एडिसन के बिना जल रहा है।

833
00:58:31,280 --> 00:58:35,680
जो बात आप कह रहे हैं मैं दूसरे तरीके से कह रहा हूं। इस्लाम

834
00:58:35,680 --> 00:58:39,680
धर्म जो जिसको मानते हैं ये धर्म कहते हैं। इस्लाम कितने साल

835
00:58:39,680 --> 00:58:43,840
पुराना है 14 1500 साल वेद कितना पुराना है पुराने है

836
00:58:43,840 --> 00:58:48,240
यह सभी के सभी गूगल भी खोल के देखते हैं तो लिखा जाता है कि वेद बहुत प्राचीन

837
00:58:48,240 --> 00:58:52,240
है तो इसका मतलब वेदों से कॉपी पेस्ट किया हुआ है मैं

838
00:58:52,240 --> 00:58:57,200
यही तो बात हम भी कहना चाह रहे उसमें एक दिक्कत कर दी ना

839
00:58:57,200 --> 00:59:01,200
पहले जितनी भी किताबें आई है उसमें मिलावट हो गई है

840
00:59:01,200 --> 00:59:05,280
इसलिए मैं सबकी वो करूंगी सत्यापन यह कर दिया उसने विरोध

841
00:59:05,280 --> 00:59:09,280
ना करती तो सब चला लेते काम विरोध एक मिनट

842
00:59:09,280 --> 00:59:13,440
जैसे आपने बताया था ना पानी का गिलास पानी के गिलास की बात बताई थी।

843
00:59:13,440 --> 00:59:17,520
समर्थन इस बात का समर्थन हम भी नहीं करते हैं। हम तो ये कह

844
00:59:17,520 --> 00:59:21,520
रहे हैं कि ये जो कुरान किताब आई ऐसे में ऐसे में हमें

845
00:59:21,520 --> 00:59:27,040
ये कुरान के द्वारा ऐसे में

846
00:59:27,040 --> 00:59:31,600
ऐसे में हमें ये कहना पड़ेगा कि कुरान के द्वारा बताया गया जो नियमावली

847
00:59:31,600 --> 00:59:36,240
है वो मोक्ष प्राप्त कराने में सहायक नहीं है।

848
00:59:36,240 --> 00:59:40,800
वेदों में पहले से ही है। सही है।

849
00:59:40,800 --> 00:59:44,800
मैं कह रहा हूं कि कुरान को अगर हम एज इट इज माने कुरान

850
00:59:44,800 --> 00:59:49,120
क्योंकि कुरान तो यह नहीं कह रही ना कि जितना वेद वेद से मैच करे उतना ही लेना।

851
00:59:49,120 --> 00:59:53,120
कुरान ये कह रही है मैं ही हूं टोटल। तो जब वो ये कह रही है कि मैं

852
00:59:53,120 --> 00:59:57,200
ही हूं टोटल। तो उसकी इन गलत चीजों को भी हमें मानना पड़ेगा।

853
00:59:57,200 --> 01:00:01,360
ये भी कुरान कह रही है। और जब यह मानना पड़ेगा तो एट द एंड हमें ये मानना

854
01:00:01,360 --> 01:00:05,360
पड़ेगा कि कुरान से कुरान में जो नियमावली

855
01:00:05,360 --> 01:00:09,360
दी गई है उससे हमें सच्चित आनंद प्राप्त नहीं

856
01:00:09,360 --> 01:00:12,560
होगा क्योंकि वेद नहीं

857
01:00:12,560 --> 01:00:16,560
हो सकता। इसका मतलब कुरान में बताया गया धर्म धर्म नहीं

858
01:00:16,560 --> 01:00:20,720
है। हम तो पहले ही कह चुके हैं कि कुरान में बताया गया धर्म धर्म

859
01:00:20,720 --> 01:00:25,040
नहीं है। वो सिर्फ एक तो इसका मतलब इसका मतलब ब्रह्मा कुमारी

860
01:00:25,040 --> 01:00:29,280
वालों का ये कहना कि कुरान बाइबल ये सब धर्म है। ये कहना

861
01:00:29,280 --> 01:00:33,600
गलत है। इस्लाम धर्म है। ये गलत है।

862
01:00:33,600 --> 01:00:38,800
ये एक पुस्तक है जिसको वो लोग अपनी पवित्र पुस्तक मानते हैं तो मानते रहे।

863
01:00:38,800 --> 01:00:43,200
ठीक है ना? मानते रह। हम कह रहे हैं कि ब्रह्मा हम कह रहे हैं कि ब्रह्मा

864
01:00:43,200 --> 01:00:48,400
कुमारी का यह कहना कि इस्लाम धर्म है और ये

865
01:00:48,400 --> 01:00:54,240
क्रिश्चियनिटी धर्म है। ये कहना गलत है ना?

866
01:00:54,240 --> 01:00:58,320
आपकी बात से हम सहमत है और कई बार क्या होता है कि बच्चे को कहना पड़ता है का

867
01:00:58,320 --> 01:01:02,480
से कबूतर। ख से खरगोश है ना? ए से एप्पल,

868
01:01:02,480 --> 01:01:06,640
बी से बैट, सी से कैट। तो क्या सारे अक्षर ए से एप्पल ही होते हैं या बी

869
01:01:06,640 --> 01:01:10,880
से बैट ही होते हैं? सी से कैट ही होते हैं? का से कबूतर होते हैं, ख से खरगोश ही होते हैं या गा से गाय

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01:01:10,880 --> 01:01:15,040
होता है। नहीं ना? तो कई बार क्या होता है जो कुछ लोगों को समझाने

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के लिए उन्होंने ये कहा कि ये धर्म है लेकिन जब आदमी अंदर

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धीरेधी आता चला जाता है दीदियों के साथ या उनके साथ राजयोग

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की अवस्था में जाता है तो अलग ही उसकी आभा निकल जाती है

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वो सब एक

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परमात्मा

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किसी तरीके से वो कन्वेंस करने के लिए कहना पड़ता है कि ये भी धर्म है

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कन्वस करने के लिए तो आपने जो तर्क दिया है कि ए से

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01:01:42,560 --> 01:01:46,640
ए फॉर एप्पल बी फॉर बॉय ये कहा जाता है क्या सिर्फ ए से एप्पल ही होता है

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तो जब हम ए से एप्पल कहते हैं ए से जब हम एप्पल कहते हैं तो हम ये

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नहीं कहते कि ए से कुछ और हो ही नहीं सकता हम फॉर एग्जांपल

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ले चलते हैं जैसे ए से एप्पल जैसे बी से बॉय वहां पे कहीं भी लिमिट

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नहीं लगाई जीत

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इसका मतलब ये लिमिट नहीं है वहां पे कि नहीं दूसरा हो ही नहीं सकता मगर हम

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किसी ऐसी चीज को ले रहे हैं जो ये कह रही है कि नहीं

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ए से एप्पल ही होगा। दूसरा कुछ नहीं हो सकता। जो यह कह रही है

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01:02:15,600 --> 01:02:19,760
उसको हम कह रहे हैं सही पढ़ाई है। उसको हमारी नहीं

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कहा जाता क्योंकि हमारी बड़ी बहनों बड़ी वीडियो से बात होती रहती है।

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वीडियो के वीडियो मैं आपके कथन के साथ लगा दूंगा और मैं आपको

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भेज भी दूंगा। तो आप आ के फिर दोबारा से इस बारे में चर्चा कर लीजिएगा।

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ठीक है। ठीक है। ठीक है। ठीक है जी।

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[संगीत]
