1
00:00:06,720 --> 00:00:12,720
पहले मैं आपको प्रणाम करता हूं महाराज जी अ

2
00:00:12,880 --> 00:00:17,120
तो थोड़ा सा आप अपना अगर परिचय दर्शकों

3
00:00:17,120 --> 00:00:21,200
को दे दे कुछ बता दे वो लिख देगा परिचय देगा जी वो लिख

4
00:00:21,200 --> 00:00:26,560
देगा परिचय देगा जी वो लिख देगा परिचय देगा जी महाराज जी एक

5
00:00:26,560 --> 00:00:30,800
आज के युवाओं में देखते हैं एक परेशानी चल रही है कि युवा धीरे-धीरे नास्तिक

6
00:00:30,800 --> 00:00:35,040
होता जा रहा है। तो ये जो ईश्वर

7
00:00:35,040 --> 00:00:39,120
की सिद्धि है युवाओं के समक्ष क्योंकि ज्यादातर

8
00:00:39,120 --> 00:00:43,680
लोग जो कॉलेज जाने वाले बच्चे हैं वो आजकल क्या है भगवान को नहीं मानते।

9
00:00:43,680 --> 00:00:48,000
तो ऐसा कौन सा सिद्धांत उन्हें दिया जाए जो वो भगवान पर विश्वास

10
00:00:48,000 --> 00:00:52,000
करना शुरू कर दे कि हां भगवान है। जो भगवान को नहीं मानते

11
00:00:52,000 --> 00:00:56,240
ऐसा कहते हैं तो मुझे लगता है कि वो लोग भगवान को बहुत

12
00:00:56,240 --> 00:01:00,320
मानते हैं कि जिसकी कोई सत्ता

13
00:01:00,320 --> 00:01:04,480
नहीं है उसकी चर्चा हो ही नहीं सकती। जिसकी

14
00:01:04,480 --> 00:01:08,480
संपूर्ण सत्ता है उसकी ही चर्चा होगी। कोई

15
00:01:08,480 --> 00:01:12,640
यह नहीं कह सकता कि मैं आकाश से अंगूर नहीं तोडूंगा या

16
00:01:12,640 --> 00:01:16,640
मैं आकाश में फले हुए सेव फल नहीं खाऊंगा क्योंकि आकाश में

17
00:01:16,640 --> 00:01:21,880
सेव नहीं फलते। अंगूर भी नहीं फलता।

18
00:01:21,880 --> 00:01:22,480
[संगीत]

19
00:01:22,480 --> 00:01:27,280
जो चीज होती है वही कही जाती है। इसलिए

20
00:01:27,280 --> 00:01:32,080
ईश्वर को जो मानते हैं वही ये कहते हैं कि मैं मान नहीं मानता हूं।

21
00:01:32,080 --> 00:01:36,080
बहुत बढ़िया। तो महाराज जी इसमें कई बार यह होता है कि जैसे

22
00:01:36,080 --> 00:01:40,160
हम लोग कॉलेजेस वगैरह में जाते हैं ना कैंप लगाते हैं ये तो

23
00:01:40,160 --> 00:01:44,160
उसमें क्या होता है कि वो लोग इस तरह के अनर्गल काउंटर करते हैं तो क्या

24
00:01:44,160 --> 00:01:48,240
हमारे पास कोई परफेक्ट ऐसा सिद्धांत नहीं है कि उसका एक का

25
00:01:48,240 --> 00:01:52,320
एक दिक्कत है कि तो उनमें मार्गदर्शन का

26
00:01:52,320 --> 00:01:56,480
अभाव है। शिक्षण प्रशिक्षण का अभाव है। अह मगर मैं

27
00:01:56,480 --> 00:02:00,480
महाराज जी ये चीज जानना चाह रहा था जैसे कोई एक ऐसा प्रॉपर एक

28
00:02:00,480 --> 00:02:04,480
कोई [संगीत] सिद्धांत कोई फंडामेंटल हमारे सनातन धर्म ने दिया हो कि

29
00:02:04,480 --> 00:02:08,640
हम उसको काउंटर कर सके जब जैसे आपने कहा ना कि जो चीज नहीं

30
00:02:08,640 --> 00:02:12,720
है उसके बारे में बात ही नहीं होगी तो इसमें वो लोग ये कह देंगे कि तुमने कोई कल्पना

31
00:02:12,720 --> 00:02:16,960
की हम उस कल्पना को मना कर रहे हैं। आपने कल्पना की भगवान की

32
00:02:16,960 --> 00:02:21,440
तो हम नास्तिक हैं। हम उसको मना कर रहे हैं। तो कोई ऐसा नास्तिक आस्तिक

33
00:02:21,440 --> 00:02:25,520
का जो यह वाद विवाद है जी यह

34
00:02:25,520 --> 00:02:29,840
बहुत पुराना है ये ऋषि ऋषि कुल में भी था जी

35
00:02:29,840 --> 00:02:33,840
जो नहीं मानते हैं वो नहीं मानते हैं वो तो हिरण्यकश्यपों भी कहते थे

36
00:02:33,840 --> 00:02:37,600
कि मैं भगवान को नहीं मानता जी और भगवान नाम की कोई चीज नहीं

37
00:02:37,600 --> 00:02:41,760
है। तो कहने का मतलब यह है कि जो ये सदियों से चली आ रही है हमारे

38
00:02:41,760 --> 00:02:45,760
पास प्रॉपर नास्तिकता का कोई खंडन नहीं है। हमारे आचार्यों ने

39
00:02:45,760 --> 00:02:49,760
दिया हो। नहीं ऐसे नास्तिक आचार्य भी हुए हैं हमारे। नहीं हमारे जो

40
00:02:49,760 --> 00:02:54,480
जैसे हर दर्शन हमारे मान्य हैं लेकिन ऐसे भी दार्शनिक हुए हैं

41
00:02:54,480 --> 00:02:58,640
जो बड़े विद्वान थे लेकिन भगवान को नहीं मानते धर्म को नहीं नहीं नहीं चारवाक आदि

42
00:02:58,640 --> 00:03:02,640
जैसे हमारे जो शंकराचार्य आदि शंकराचार्य जी इनके द्वारा कोई ऋषि महर्षियों

43
00:03:02,640 --> 00:03:06,640
द्वारा दिया गया कोई ऐसा अकाट्य सिद्धांत जिससे कि हम नास्तिकों की बोलती

44
00:03:06,640 --> 00:03:10,720
बंद कर दे माने या ना माने उनको निरुत्तर कर दे निराधार कर दे बहुत है आदि गुरु

45
00:03:10,720 --> 00:03:14,880
शंकराचार्य ने वेदों पर भाष्य किया है उपनिषदों पर भाष्य किया है

46
00:03:14,880 --> 00:03:19,040
वेदों पर भी किया है और क्या और अनेक ग्रंथ लिखे हैं बहुत तो वह सब वही

47
00:03:19,040 --> 00:03:23,040
तो मैं कह रहा हूं कि गुरुकुल प्रणाली आएगी तो सारा

48
00:03:23,040 --> 00:03:27,040
अधूरा ज्ञान भी अजीरण करता है। तो उन्होंने कोई सिद्धांत नास्तिकों के खंडन

49
00:03:27,040 --> 00:03:31,680
के लिए दिया हो ऐसा कुछ बहुत कुछ है उनके जितने

50
00:03:31,680 --> 00:03:35,840
अद्वैत सिद्धांत के ग्रंथ हैं जी तो हमें कोई एक सिद्धांत

51
00:03:35,840 --> 00:03:39,840
आप दे देते वो YouTube में नहीं मिल सकता। अच्छा अच्छा वो YouTube में नहीं मिल सकता। अच्छा

52
00:03:39,840 --> 00:03:44,400
अच्छा वो YouTube में नहीं मिल सकता। अच्छा अच्छा वो YouTube में नहीं मिल सकता। अच्छा अच्छा

53
00:03:44,400 --> 00:03:49,120
ठीक है। आगे बढ़ते हैं तो महाराज जी फिर अब

54
00:03:49,120 --> 00:03:52,800
एक चीज यह पूछ मतलब आता है कि धर्म

55
00:03:52,800 --> 00:03:57,200
की क्या डेफिनेशन दें जिससे कि धर्म किसी के

56
00:03:57,200 --> 00:04:01,440
जीवन में अंतिम विकल्प के रूप में ख्यापित हो जाए वेद

57
00:04:01,440 --> 00:04:05,520
प्रणयितो धर्म अधर्मस तद विपर्यया जो

58
00:04:05,520 --> 00:04:09,600
वेद सम्मत कार्य है वो धर्म है और वो करना चाहिए

59
00:04:09,600 --> 00:04:13,840
मनुष्य को और वेद विरुद्ध जो कार्य है जी वो अधर्म

60
00:04:13,840 --> 00:04:18,000
है और वो नहीं करना चाहिए मनुष्य जाति को बस वेदों यही स्पष्टीकरण

61
00:04:18,000 --> 00:04:22,080
उसका है। जी बाकी व्याख्या बड़ी है। नहीं वो तो

62
00:04:22,080 --> 00:04:26,160
है मतलब वेद को तो तब हम प्रमाण के रूप में जब कोई वेद को

63
00:04:26,160 --> 00:04:30,240
मानता हो। अभी तो एक सामान्य सा लड़का है कोई और उसको

64
00:04:30,240 --> 00:04:34,480
हमें बताना है कि धर्म वेद को ना मानने वाले के लिए हमारे पास कोई उपाय नहीं है।

65
00:04:34,480 --> 00:04:38,640
वो नास्तिक मत है। नास्तिक मत हमेशा से रहते हैं।

66
00:04:38,640 --> 00:04:42,800
नहीं फिर भी हम कुछ समझा तो सकते हैं ना कि क्यों मानना चाहिए तुम्हें वेद को? क्यों

67
00:04:42,800 --> 00:04:46,880
मानना चाहिए तुम्हारे धर्म को? आज तक तो नहीं समझे हैं। समझाने वाले समझा रहे हैं। आदि

68
00:04:46,880 --> 00:04:51,200
गुरु शंकराचार्य समझाने ही आए थे। जी जी भगवान राम समझाने ही आए थे।

69
00:04:51,200 --> 00:04:55,280
जी जी श्री कृष्ण समझाने ही आए थे। जी तो जो समझने वाले हैं वो समझ

70
00:04:55,280 --> 00:04:59,840
जाते हैं और जो नहीं समझने वाले हैं वो नहीं समझते। हां तो कुछ उन्होंने

71
00:04:59,840 --> 00:05:04,000
ऐसा बोला होगा ना कि ये समझ लो तब जिससे कि वो समझे वो

72
00:05:04,000 --> 00:05:07,920
ना समझे नहीं बात अलग है। मगर हम कुछ ऐसा बताएं तो कि वो धर्म को समझ

73
00:05:07,920 --> 00:05:12,640
पाए। धर्म उनके लिए क्यों आवश्यक है? धर्म का पालन अष्टादश पुराणेशु

74
00:05:12,640 --> 00:05:16,080
व्यासस वचनद्वयम

75
00:05:16,080 --> 00:05:20,720
धर्म का व्याख्याता सबसे बड़ा हमारा महर्षि व्यास है

76
00:05:20,720 --> 00:05:25,840
और वो कहते हैं कि अष्टादश पुराणेशु व्यासस

77
00:05:25,840 --> 00:05:30,480
वचनद्वयं परोपकाराय पुण्याय पापाय

78
00:05:30,480 --> 00:05:34,640
परपीनम परोपकार के समान कोई

79
00:05:34,640 --> 00:05:39,600
पुण्य नहीं है और दूसरे को सताने के समान कोई पाप नहीं है।

80
00:05:39,600 --> 00:05:43,760
परहित सरिश धर्म नहीं भाई और पर पीड़णा सम

81
00:05:43,760 --> 00:05:48,160
नहीं अधमाई तुलसीदास जी की भाषा में दूसरे को पीड़ा

82
00:05:48,160 --> 00:05:52,480
पहुंचाने जैसे कोई अधम कार्य नहीं है और परहित करने जैसा

83
00:05:52,480 --> 00:05:56,960
कोई अच्छा कार्य नहीं है सबसे अच्छा कार्य परहित जी जी जी

84
00:05:56,960 --> 00:06:00,960
मगर ये तो लक्षण हो गए ना महाराज जी धर्म की उपयोगिता अब्बास अब हमारा

85
00:06:00,960 --> 00:06:05,040
समय खत्म हुआ अब्बास अब हमारा समय खत्म हुआ अब्बास अब हमारा समय खत्म

86
00:06:05,040 --> 00:06:09,120
हो गया अब्बा हमारा समय खत्म हो बहुत-बहुत तुम्हारे दर् दर्शकों

87
00:06:09,120 --> 00:06:13,200
को हमारे चैनल के बहुत-बहुत आशीर्वाद और कुंभ मेले से उन

88
00:06:13,200 --> 00:06:17,280
सबके कल्याण की कामना तीर्थराज प्रयाग सबका सबको

89
00:06:17,280 --> 00:06:23,280
कल्याण करें और सब सुखी रहें

90
00:06:31,690 --> 00:06:35,690
[संगीत]
