1
00:00:01,840 --> 00:00:06,320
तो हमने दो चैप्टर पढ़ लिए। पहला चैप्टर जिसमें हमने शबरी को ब्राह्मणी

2
00:00:06,320 --> 00:00:11,040
सिद्ध किया। है ना? किस कारण? कि वह धर्माचारणी

3
00:00:11,040 --> 00:00:15,040
कही गई हैं। श्री राम जी उनकी तपस्या को को प्रोत्साहित कर रहे हैं। जटा

4
00:00:15,040 --> 00:00:19,360
धारण कर रही हैं। मृग चर्म धारण कर रही हैं। धर्म को जानने वाली हैं।

5
00:00:19,360 --> 00:00:23,520
और तब वो जो है तपस्या इत्यादि कर रही हैं। तो तब हमने पहले चैप्टर में सिद्ध

6
00:00:23,520 --> 00:00:27,520
किया कि ब्राह्मणी हैं। और उनका जो शबरी नाम है वो जैसे शबराचार्य

7
00:00:27,520 --> 00:00:32,000
थे मीमांसा दर्शन के भाष्यकार उनके ही सदृश्य उनका नाम

8
00:00:32,000 --> 00:00:36,560
शबरी है। और दूसरे चैप्टर में हमने यह सिद्ध किया

9
00:00:36,560 --> 00:00:40,880
कि प्रभु श्री राम ब्रह्म भाव से कार्य नहीं करते

10
00:00:40,880 --> 00:00:45,200
थे। मनुष्य जो देख सकते हैं, उस देख सकने वाले दृश्यों

11
00:00:45,200 --> 00:00:49,280
में वह ब्रह्म भाव से कोई कार्य नहीं करते थे। वह

12
00:00:49,280 --> 00:00:53,360
मनुष्य दृष्टि से ही कार्य करते थे। ठीक है?

13
00:00:53,360 --> 00:00:57,600
और हमने यह भी देख लिया, यह भी सिद्ध कर लिया कि

14
00:00:57,600 --> 00:01:01,840
वह स्वयं को मनुष्य दृष्टि से ही देखने का समर्थन

15
00:01:01,840 --> 00:01:03,760
भी करते हैं। अब बात

16
00:01:03,760 --> 00:01:08,000
आती है वह आतिथ्य संस्कार वाली पैरों

17
00:01:08,000 --> 00:01:12,240
पैर कैसे धुलाए भैया ब्राह्मणी थी तो यदि प्रभु

18
00:01:12,240 --> 00:01:16,880
श्री राम ब्रह्म भाव से कुछ भी नहीं करते थे तो उन्होंने ब्राह्मणी होते हुए भी

19
00:01:16,880 --> 00:01:21,200
शबरी को अपने चरण स्पर्श क्यों करने दिए

20
00:01:21,200 --> 00:01:25,360
यही नहीं शबरी द्वारा उनके चरणोदक को क्यों ग्रहण किया गया

21
00:01:25,360 --> 00:01:29,760
यही नहीं प्रभु श्री राम ने अपने पैरों से ऋषि पत्नी अहिल्या

22
00:01:29,760 --> 00:01:33,760
को स्पर्श क्यों किया ब्राह्मण रावण का वध क्यों क्यों किया? राम जी

23
00:01:33,760 --> 00:01:37,920
का पैर धोइए। सबरी जी राम जी का पैर सबरी जी धोई हैं। एक क्षत्रिय कैसे-कैसे ब्राह्मण

24
00:01:37,920 --> 00:01:42,000
से पैर धुलवा रहा है भाई मर्यादा पुरुषोत्तम होकर ये बताइए। देखिए जी आपने कहा कि बेर

25
00:01:42,000 --> 00:01:46,160
जूठा बैर खाया तो खाया कब? जब गए तब ना जब गए हैं उसी समय शबरी जी पैर

26
00:01:46,160 --> 00:01:50,240
धोई है कि नहीं उनका? तो वो कैसे मर्यादा पुरुषोत्तम है जो झूठा बेर खाकर तो गलत

27
00:01:50,240 --> 00:01:54,240
कर सकते हैं कदाचित। लेकिन शबरी जैसे पैर धुलवाकर गलत नहीं कर रहे हैं। अहिल्या जैसे

28
00:01:54,240 --> 00:01:58,400
ऋषि पत्नी को पैर से छूकर गलत नहीं कर रहे हैं। हम ठीक चलो।

29
00:01:58,400 --> 00:02:02,480
वैसे मैं यह समझता था मैंने दर्शन के विषय में भागवतानंद

30
00:02:02,480 --> 00:02:06,480
को कभी कुछ तार्किक बात करते हुए तत्व की विवेचना करते हुए मैंने

31
00:02:06,480 --> 00:02:10,640
कभी नहीं देखा। ठीक है? परंतु मैं इतना मेरी जानकारी में

32
00:02:10,640 --> 00:02:14,800
था कि भागवतानंद को यह विधि निषध इत्यादि में भैया बहुत

33
00:02:14,800 --> 00:02:18,800
अच्छे से उसने रटा हुआ है। यह करने पर यह जो कर्मकांड

34
00:02:18,800 --> 00:02:22,960
विषयक चीजें होती है उसमें उसकी गति है। पर जब यह बात मेरे सामने आई

35
00:02:22,960 --> 00:02:27,040
तो मुझे हंसी आएगी। उसकी गति तो इनमें भी नहीं है। अरे भाई जिसकी

36
00:02:27,040 --> 00:02:31,200
गति होगी वो तो जानता होगा ना कि आतित्य संस्कार में ब्राह्मण भी

37
00:02:31,200 --> 00:02:35,520
क्षत्रिय के जो है पैर धुलवा सकता है, धुला सकता

38
00:02:35,520 --> 00:02:39,600
है। पाद्य उनको अर्पण कर सकता है। पाद्य प्रक्षालन कर

39
00:02:39,600 --> 00:02:43,600
सकता है। हां। बड़े निम्न

40
00:02:43,600 --> 00:02:48,640
कोटि के निकले यार तुम। खैर चलो।

41
00:02:48,640 --> 00:02:52,640
तो श्री राम द्वारा रावण वध के विषय में यह आपत्ति ब्राह्मण रावण

42
00:02:52,640 --> 00:02:56,720
का वध कैसे कर दिया? सबसे पहली बात समष्टि और

43
00:02:56,720 --> 00:02:59,520
व्यष्टि

44
00:02:59,520 --> 00:03:03,040
धर्म कहां पर

45
00:03:03,040 --> 00:03:07,040
किस बात को धर्म माना जाएगा वह भी देखना है ना। सबसे

46
00:03:07,040 --> 00:03:11,280
पहली बात रावण जैसे आता ताई को मारने की आज्ञा मनुस्मृति

47
00:03:11,280 --> 00:03:15,280
से ही प्राप्त है। तो इसमें धर्म की सीमा का उल्लंघन कैसे होगा?

48
00:03:15,280 --> 00:03:19,520
श्री राम द्वारा रावण वध के विषय में हम पूर्व में ही कह आए हैं। यदि ब्राह्मण

49
00:03:19,520 --> 00:03:23,840
भी आताताई होए हो जाए तो उसका वध कर देने की ही आज्ञा शास्त्रों

50
00:03:23,840 --> 00:03:28,320
से भी प्राप्त होती है। मनुस्मृति 8350 तथापि

51
00:03:28,320 --> 00:03:32,400
श्री राम जी के द्वारा ब्राह्मण वध का पश्चाताप भी किया गया है।

52
00:03:32,400 --> 00:03:36,480
पश्चाताप भी किया भाई पद्म पुराण पाताल खंड इसके

53
00:03:36,480 --> 00:03:38,960
अलावा

54
00:03:38,960 --> 00:03:43,280
समष्टि और व्यष्टि दो प्रकार के जो धर्म होते हैं समष्टि के हित के लिए कर्तव्य

55
00:03:43,280 --> 00:03:47,760
का निर्णय कभी एकांकी नहीं होता है धर्म तो था

56
00:03:47,760 --> 00:03:51,760
हिरण्यकश्यपों की बातें मान लेना प्रह्लाद जी के लिए परंतु समष्टि का क्या

57
00:03:51,760 --> 00:03:55,760
था कि नारायण का त्याग नहीं करना जब आपका समष्टि

58
00:03:55,760 --> 00:03:59,760
का धर्म जो है व्यष्टि अह व्यष्टि का धर्म समष्टि के

59
00:03:59,760 --> 00:04:04,240
धर्म पर हावी होने लग जाए तो वहां पर व्यष्टि के धर्म का त्याग और समष्टि

60
00:04:04,240 --> 00:04:08,560
के धर्म को ग्रहण करना ही धर्म होता है। और जो ऐसा करता है वह आदर्श

61
00:04:08,560 --> 00:04:12,880
बनता है। जो ऐसा नहीं करता है वो उपेक्षणीय हो जाता है। जैसे

62
00:04:12,880 --> 00:04:14,720
भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा

63
00:04:14,720 --> 00:04:19,280
को प्राथमिकता दी। नारी के सम्मान को नहीं। तो

64
00:04:19,280 --> 00:04:23,280
हमारे लिए उनका वध सबसे

65
00:04:23,280 --> 00:04:29,280
पहले भगवान के कोप का वह विषय बने।

66
00:04:29,440 --> 00:04:33,440
इसी प्रकार से द्रोण आचार्य कोटि के

67
00:04:33,440 --> 00:04:37,440
लोग होते हुए भी इनको इन्होंने

68
00:04:37,440 --> 00:04:41,520
कौरवों का साथ दिया। जबकि अपने व्यष्टि

69
00:04:41,520 --> 00:04:45,600
के धर्म का एकांकी धर्म का पालन ही तो कर रहे थे।

70
00:04:45,600 --> 00:04:49,680
परंतु क्योंकि इन्होंने समष्टि के धर्म को प्राथमिकता देना यह भूल गए

71
00:04:49,680 --> 00:04:53,840
थे। इसलिए दंड के पात्र बने। हम चलो खैर आगे

72
00:04:53,840 --> 00:04:58,000
चलते हैं। हम पूर्व में ही बताए हैं कि प्रभु श्री राम

73
00:04:58,000 --> 00:05:02,160
शबरी जी के यहां अतिथि रूप में गए थे। अतिथि अतिथि बनकर आएंगे।

74
00:05:02,160 --> 00:05:06,640
यह लिखा है वहां वाल्मीकि रामायण कहां लिखा है? वाल्मीकि रामायण 374

75
00:05:06,640 --> 00:05:10,640
15 से 16 के बीच में आतित संस्कार के अंतर्गत

76
00:05:10,640 --> 00:05:15,040
ही धर्म शास्त्रों द्वारा अतिथि के रूप में अभ्यागत के प्रति हिरण्य गर्भ

77
00:05:15,040 --> 00:05:19,040
बुद्ध और विष्णु बुद्धि रखते हुए उनका पूजन करने का

78
00:05:19,040 --> 00:05:23,360
निर्देश दिया गया है। जब अतिथि आएगा तो उसके प्रति आपको विष्णु

79
00:05:23,360 --> 00:05:27,520
बुद्धि रखनी है। हिरण्य गर्भ बुद्धि रखनी है। उस बुद्धि के उस बुद्धि

80
00:05:27,520 --> 00:05:29,920
से उसका संस्कार किया जाएगा। पाद्य

81
00:05:29,920 --> 00:05:34,480
प्रक्षालन इत्यादि आतित्य संस्कार में ही आता है। घर

82
00:05:34,480 --> 00:05:38,640
आए हुए अतिथि की विद्या, शिक्षा, कुल, वंश, चरित्र या

83
00:05:38,640 --> 00:05:42,800
शील की परीक्षा नहीं करनी चाहिए। वह कहां से आया हुआ है? उसका देश या

84
00:05:42,800 --> 00:05:46,960
स्थान क्या है? यह भी नहीं पूछना चाहिए। चाहे अतिथि कुरूप हो या सुंदर

85
00:05:46,960 --> 00:05:51,040
हो फटे पुराने वस्त्रों में हो या अच्छे वस्त्रों में हो या

86
00:05:51,040 --> 00:05:55,120
विद्वान हो वह विद्वान हो या मूर्ख गुणवान हो या निर्गुण घर

87
00:05:55,120 --> 00:05:59,520
आए हुए उस अतिथि को साक्षात भगवान नारायण विष्णु का रूप मानना

88
00:05:59,520 --> 00:06:03,520
चाहिए। उसके विषय में कभी भी मन में कोई संदेह या

89
00:06:03,520 --> 00:06:07,520
संकोच नहीं करना चाहिए। नरसिंह पुराण जिसको पहले

90
00:06:07,520 --> 00:06:11,760
कभी ना देखा हो ऐसे आए अतिथि को स्वागत वचन

91
00:06:11,760 --> 00:06:15,840
कहना आसन देख देना देखकर उठना जल

92
00:06:15,840 --> 00:06:20,160
आदि से पूजन सत्कार करें चरणों को धोने से पितृग प्रीति

93
00:06:20,160 --> 00:06:25,360
को प्राप्त होते हैं हारित स्मृति चार 56

94
00:06:25,360 --> 00:06:27,600
58

95
00:06:27,600 --> 00:06:31,680
अतिथि के चरण धोने से भलीभांति सत्कार करने से

96
00:06:31,680 --> 00:06:34,080
उबटन

97
00:06:34,080 --> 00:06:38,400
अतिथि के चरण धोने से भलीभांति सत्कार करने से उबटन

98
00:06:38,400 --> 00:06:42,640
आदि मलने से वेद से भी अधिक

99
00:06:42,640 --> 00:06:45,440
स्वर्ग की प्राप्ति होती है। व्यास स्मृति

100
00:06:45,440 --> 00:06:49,440
तीन 39 जब मलेंगे उबटन को

101
00:06:49,440 --> 00:06:53,760
तो चरण स्पर्श नहीं होंगे वहां। हां अभ्यागत को

102
00:06:53,760 --> 00:06:58,000
पुत्र द्वारा भी पाद्य दिया जा सकता है। पारस्कर ग्रह सूत्र

103
00:06:58,000 --> 00:07:01,120
एक तीन चार

104
00:07:01,120 --> 00:07:05,200
यह क्यों बताया मैंने? यह बताने के लिए कि पुत्र के रूप

105
00:07:05,200 --> 00:07:09,520
में भी अगर वैकल्पिक है कि पुत्र के द्वारा भी दिलवा सकते हैं।

106
00:07:09,520 --> 00:07:13,920
परंतु पुत्र दे आप स्वयं दें। वहां पर जो है आतिथ्य

107
00:07:13,920 --> 00:07:18,160
संस्कार में पाद्य देने की बात की जा रही है। छह पुरुष पूज्य

108
00:07:18,160 --> 00:07:22,560
होते हैं। कौन-कौन होते हैं पूज्य? हम आचार्य यह

109
00:07:22,560 --> 00:07:26,880
आतिथित्य धर्म के अंतर्गत ही बताया जा रहा है। आचार्य, वेदाध्यापक,

110
00:07:26,880 --> 00:07:32,560
ऋत्विक,

111
00:07:32,560 --> 00:07:36,720
वैवाह राजा अर्थात

112
00:07:36,720 --> 00:07:40,880
प्रजापालक क्षत्रिय राजा प्रिय अर्थात अपने समान जाति

113
00:07:40,880 --> 00:07:45,280
का मित्र स्नातक उपनयन पूर्वक ब्रह्मचर्य आश्रम

114
00:07:45,280 --> 00:07:50,960
समाप्त करके आया हुआ यह कहां लिखा है पारसकर ग्रह सूत्र

115
00:07:50,960 --> 00:07:55,200
एक तीन एक कुश विस्तर पाद्य देना आसन

116
00:07:55,200 --> 00:07:59,440
देना मधुबर इत्यादि देना भी अभ्यागत के लिए निर्देशित

117
00:07:59,440 --> 00:08:03,520
है कहां लिखा है पारस्कर गृहसूत्र एक तीन तीन

118
00:08:03,520 --> 00:08:07,920
पांच और यह कुश का आसन

119
00:08:07,920 --> 00:08:12,320
माता शबरी ने पद्म पुराण के अनुसार श्री राम जी को दिया था। इतने आति

120
00:08:12,320 --> 00:08:17,120
धर्म को जानती थी वो ऐसी धर्म निपुणा

121
00:08:17,120 --> 00:08:21,360
और फिर विधि का उल्लंघन करेंगी। हां। तो

122
00:08:21,360 --> 00:08:25,920
कोई बात नहीं। ब्रह्म भाव से करवाना मान भी लो। पर फिर उनको यह वाली उपाधियां

123
00:08:25,920 --> 00:08:30,320
जो है इनकी संगति नहीं होगी ना। इनको फाड़ना पड़ेगा ना।

124
00:08:30,320 --> 00:08:35,040
फिर फिर जो है उनको मर्यादा पुरुषोत्तम मत कहो। सत्य प्रतिज्ञ मत कहो।

125
00:08:35,040 --> 00:08:41,040
धर्म में बंधा हुआ मत कहो।

126
00:08:41,120 --> 00:08:45,200
ध्यान रहे क्योंकि श्री राम जी की ही चरण पादुकाएं

127
00:08:45,200 --> 00:08:49,360
रखकर राजा भरत अयोध्या का सिंहासन संभाल रहे थे। इस दृष्टि

128
00:08:49,360 --> 00:08:53,520
से श्री राम ना केवल कुलीन क्षत्रिय थे बल्कि राजा भी थे।

129
00:08:53,520 --> 00:08:58,480
राजा को आसन और जल देकर सत्कार करें। गौतम धर्म सूत्र

130
00:08:58,480 --> 00:09:02,880
आदि शंकराचार्य जी लिखते हैं राजसूय यज्ञ में क्षत्रिय

131
00:09:02,880 --> 00:09:07,440
जाति का कारणभूत होकर भी ब्राह्मण नीचे बैठकर

132
00:09:07,440 --> 00:09:11,520
ऊंचे बैठे हुए क्षत्रिय की उपासना करें। प्रधारणिक उपनिषद

133
00:09:11,520 --> 00:09:16,000
सांकर भाष्य एक चार 11 अचिंत

134
00:09:16,000 --> 00:09:20,000
अभ्यागत होने से ही अतिथि ऐसा कहा जाता है।

135
00:09:20,000 --> 00:09:24,080
भविष्य पुराण

136
00:09:24,080 --> 00:09:28,080
ब्राह्म पर्व 100 48वा

137
00:09:28,080 --> 00:09:34,080
अध्याय और नौवा श्लोक

138
00:09:34,160 --> 00:09:38,480
अतिथि धर्म से जो भी अकाल्पनिक पुरुष आया है उसके

139
00:09:38,480 --> 00:09:42,560
रूप में वैश्वदेव का ही समागम ब्राह्मण को

140
00:09:42,560 --> 00:09:46,720
समझना चाहिए। यानी जान गए तो जाने हुए में किस किसके अनुसार

141
00:09:46,720 --> 00:09:51,280
होगा? आतिथ्य जो मैंने ऊपर बताया आचार्य राजा ऋत्विक

142
00:09:51,280 --> 00:09:55,440
वैवाह प्रिय मित्र स्नातक इत्यादि

143
00:09:55,440 --> 00:09:59,600
और जब नहीं जानते हैं तो फिर नहीं जानने में

144
00:09:59,600 --> 00:10:03,920
तो फिर कोई संदेह करना ही नहीं है। फिर सीधे विष्णु बुद्धि रखनी है।

145
00:10:03,920 --> 00:10:06,640
तो

146
00:10:06,640 --> 00:10:10,720
अतिथि धर्म से जो भी अकाल्पनिक पुरुष आया है मतलब यदि

147
00:10:10,720 --> 00:10:14,880
मतलब यहां बताया जा रहा है अकाल्पनिक के लिए सम्मान और फिर जिनको आप जानते

148
00:10:14,880 --> 00:10:19,200
हैं उनके लिए सम्मान तो उनमें कौन-कौन है जिनके लिए पूजन

149
00:10:19,200 --> 00:10:23,360
आदि का विधान है पूजन आदि का विधान तो सबके लिए पर अमुक अमुक

150
00:10:23,360 --> 00:10:27,760
तरीके से तो उसमें जो यह वाला है पाद्य भी ग्रहण पाद्य भी दे सकते हैं चरणोदक

151
00:10:27,760 --> 00:10:32,000
भी ले सकते हैं तो वह विधान किस-किस में तो वह मैंने पूज्य बता दिए कौन-कौन

152
00:10:32,000 --> 00:10:36,160
से हैं तो उस उसके रूप में वैश्वदेव

153
00:10:36,160 --> 00:10:40,160
का ही समागम ब्राह्मण को समझना समझना है और हिरण्यगर्भ बुद्धि

154
00:10:40,160 --> 00:10:44,160
से वह उपास्य है। विष्णु पुराण 113 63

155
00:10:44,160 --> 00:10:48,240
यदि अतिथि आ जाए तो उसका स्वागत आदि से आसन देकर

156
00:10:48,240 --> 00:10:52,960
और चरण धोकर सत्कार करें। विष्णु पुराण

157
00:10:52,960 --> 00:10:56,800
11 तीन 49

158
00:10:56,800 --> 00:11:00,960
इस व्यवहार के अनेक उदाहरण हमें वाल्मीकि रामायण में भी मिलते हैं। ब्रह्म ऋषि

159
00:11:00,960 --> 00:11:04,960
वशिष्ठ द्वारा राज ऋषि विश्वामित्र जी को पाद्य दिया गया। उस समय तक

160
00:11:04,960 --> 00:11:09,040
वह ब्रह्म ऋषि नहीं बने थे। तो तुम अतिथियों में श्रेष्ठ

161
00:11:09,040 --> 00:11:11,600
हो इसलिए

162
00:11:11,600 --> 00:11:15,680
यत्न पूर्वक तुम्हारा सत्कार करना मेरा कर्तव्य है। अतः मेरे द्वारा

163
00:11:15,680 --> 00:11:19,680
किए गए इस सत्कार को तुम ग्रहण करो। इसी क्रम में वशिष्ठ जी ने

164
00:11:19,680 --> 00:11:21,920
विश्वामित्र जी का पाद्य आचमनीय आदि

165
00:11:21,920 --> 00:11:26,320
वस्तु द्वारा वस्तुओं द्वारा पूजन सत्कार किया। वाल्मीकि रामायण

166
00:11:26,320 --> 00:11:31,760
एक 52 14 से 16

167
00:11:31,760 --> 00:11:35,840
शबरी से मिलने के पूर्व अगस्त ऋषि द्वारा भी श्री राम जी

168
00:11:35,840 --> 00:11:39,840
को पाद्य देकर यथावत पूजन सत्कार किया था। चलो वहां तो वो

169
00:11:39,840 --> 00:11:44,320
भक्त भगवान तो भाव के भूखे हैं। भगवान तो ऐसे ही लोगों ने तो

170
00:11:44,320 --> 00:11:48,480
बेड़ा गर्क करवाया सनातन का। पहले तो एक और जाकर के कठोर

171
00:11:48,480 --> 00:11:52,560
वर्णाश्रम धर्म का प्रचार करो। फिर यह बातें कहने लगो। हर कोई व्यक्ति

172
00:11:52,560 --> 00:11:56,560
हर दूसरा व्यक्ति समर्थ के नाम पर कुछ भी करने का कुछ भी करने के लिए

173
00:11:56,560 --> 00:12:00,640
छूट पाएगा। फिर वो रामपाल बनेगा। मुझे कबीर ने दर्शन दिए। फिर

174
00:12:00,640 --> 00:12:04,800
वो भागवतानंद बनेगा। मुझे भगवती ने दर्शन दिए और बन जाएंगे सब

175
00:12:04,800 --> 00:12:09,040
लोग करुणा। जगतगुरु आचार्य और उनके कर्मों का साक्षी

176
00:12:09,040 --> 00:12:13,360
भी कौन होगा? जो उनके अपने प्रियजन हो गए। रामपाल अच्छा व्यक्ति है। इस संबंध

177
00:12:13,360 --> 00:12:17,440
में साक्षी कौन है? जो उनके अनुगत लोग हैं जो उसको जानने वाले हैं।

178
00:12:17,440 --> 00:12:21,520
भागवतानंद के विषय भागवतानंद के अच्छे कर्मों अच्छे आचरण के विषय में

179
00:12:21,520 --> 00:12:25,600
साक्षी कौन माने जाएंगे भैया जो उसकी चापलूसी किया करते हैं वही

180
00:12:25,600 --> 00:12:29,680
घोषित कर देंगे हां हां भैया इसके आचरण बहुत अच्छे हैं

181
00:12:29,680 --> 00:12:34,160
और फिर केवल उसी आचरण के आधार पर किसी अधिकार

182
00:12:34,160 --> 00:12:37,120
दिए जाने पूर्वक नहीं बल्कि आचरण के आधार

183
00:12:37,120 --> 00:12:41,120
पर और उसके आधार पर उसको कर्मणा जगत गुरु घोषित कर

184
00:12:41,120 --> 00:12:45,360
दो तो

185
00:12:45,360 --> 00:12:49,600
शंभुक वध के बाद पुनः अगस्त ऋषि द्वारा भी

186
00:12:49,600 --> 00:12:54,240
श्री राम जी का भली-भांति पूजन सत्कार किया गया। वाल्मीकि रामायण

187
00:12:54,240 --> 00:12:58,240
76 21 से 24 और शबरी जी से मिलने के पूर्व

188
00:12:58,240 --> 00:13:02,320
अगस्त ऋषि ने जो पाद्य देकर यथावत पूजन सत्कार किया था वो

189
00:13:02,320 --> 00:13:06,320
क्या था? वाल्मीकि रामायण तीन 12

190
00:13:06,320 --> 00:13:10,320
14 ध्यान दे रहे हैं आप। उनकी मुक्ति कैसे होनी

191
00:13:10,320 --> 00:13:14,320
थी? झूठे बेर खिलाकर नहीं उनका आतित्य

192
00:13:14,320 --> 00:13:18,320
करके ठीक है आतित

193
00:13:18,320 --> 00:13:22,880
सत्कार धर्म शास्त्रों के अनुसार आतित्य करने से उनकी मुक्ति थी उसमें

194
00:13:22,880 --> 00:13:27,040
झूठे बेर का कहीं पर भी कोई विवरण हमें धर्म शास्त्रों से

195
00:13:27,040 --> 00:13:31,600
प्राप्त नहीं है। हां पाद्य प्रक्षालन कहा है कि शबरी ने

196
00:13:31,600 --> 00:13:35,600
शबरी ने पैर कैसे धुला दिए जब वो ब्राह्मणी थी तो हम सुन

197
00:13:35,600 --> 00:13:40,400
लो कैसे धुला दिए तो तो यद्यपि वाल्मीकि रामायण के अनुसार

198
00:13:40,400 --> 00:13:42,720
अहिल्या

199
00:13:42,720 --> 00:13:46,800
द्वारा श्री राम का आतिथित्य सत्कार करने से ही उनकी मुक्ति का विधान था। वो बात

200
00:13:46,800 --> 00:13:50,880
और है कि पद्म पुराण इत्यादि के अनुसार जो है वो उनके

201
00:13:50,880 --> 00:13:52,320
चरणों के स्पर्श से होना

202
00:13:52,320 --> 00:13:56,400
था। परंतु जब वो वाली घटना लेंगे चरणों के स्पर्श वाली घटना तो वहां

203
00:13:56,400 --> 00:14:00,400
पर प्रभु श्री राम ने किसी ब्राहणी को पैर से

204
00:14:00,400 --> 00:14:04,400
स्पर्श नहीं किया। वहां तो आप तत्व देख रहे हैं। फिर तत्व

205
00:14:04,400 --> 00:14:08,800
देख रहे तब तो वहां कुछ है ही नहीं। फिर और तत्व में चले जाओ। मगर व्यवहार

206
00:14:08,800 --> 00:14:13,120
से वहां पर क्या था? एक पाषाण था, एक पत्थर था। उसको स्पर्श किए और

207
00:14:13,120 --> 00:14:17,200
वाल्मीकि रामायण के अनुसार प्रभु श्री राम का आतिथ्य सत्कार

208
00:14:17,200 --> 00:14:21,440
कर देने मात्र से ही शबरी जी अहिल्या जी को मुक्ति

209
00:14:21,440 --> 00:14:25,680
प्राप्त हो जाने हो जाने का विधान सुनिश्चित था। कहां लिखा है?

210
00:14:25,680 --> 00:14:30,880
वाल्मीकि रामायण चार 48 29 से 32

211
00:14:30,880 --> 00:14:35,120
तथापि यह मान भी लिया जाए कि श्री राम ने ऋषि पत्नी अहिल्या का ही

212
00:14:35,120 --> 00:14:39,280
अपने चरणों से स्पर्श किया। तब भी यदि किसी पुण्य आत्मा का यहां भी वही समष्टि

213
00:14:39,280 --> 00:14:43,840
और व्यष्टि आ जाएगा कि हमें पाप लग भी रहा है यदि

214
00:14:43,840 --> 00:14:47,920
परंतु उससे समष्टि का कोई कार्य हो रहा है तो फिर हम उस पाप को

215
00:14:47,920 --> 00:14:52,560
प्रायश्चित पूर्वक या ग्रहण करते हुए आगे बढ़ेंगे ना

216
00:14:52,560 --> 00:14:56,800
हम संध्या वंदन क्यों करते हैं पाप तो कर रहे हैं बार-बार मगर

217
00:14:56,800 --> 00:15:01,040
संध्या वंदन क्या है संध्या वंदन में जो हम

218
00:15:01,040 --> 00:15:05,280
रसोई घर में डेली नित्य प्रति हमारे घर में जो

219
00:15:05,280 --> 00:15:07,440
जीव जंतु मारे मारे जाते हैं। उनका

220
00:15:07,440 --> 00:15:11,440
प्रायश्चित हर एक पहर के बाद अगली जो संध्या होती

221
00:15:11,440 --> 00:15:17,360
है उसमें होता है। हम तो

222
00:15:17,360 --> 00:15:21,520
समष्टि के भाव से यदि पहली बात व्यवहार से उन्होंने किया

223
00:15:21,520 --> 00:15:25,520
नहीं। वाल्मीकि रामायण के अनुसार तो हुआ ही नहीं।

224
00:15:25,520 --> 00:15:29,600
और पद्म पुराण का यदि पुराणों में जो दी गई दिया गया

225
00:15:29,600 --> 00:15:33,840
घटनाक्रम है जहां वो शिला है तो वहां पर ब्राह्मणी को नहीं छुआ। शिला को छुआ।

226
00:15:33,840 --> 00:15:38,000
फिर भी दुर्जनोष ने ऐसे यदि मान लिया जाए कि नहीं भैया उन्होंने ब्राह्मणी

227
00:15:38,000 --> 00:15:42,160
को छुआ तो यहां पर अपने स्वयं के कष्ट को स्वीकार

228
00:15:42,160 --> 00:15:46,400
करते हुए किसी अन्य के लिए परोपकार करने की भावना से किया ना तथापि

229
00:15:46,400 --> 00:15:50,480
यह भी मान लिया जाए कि श्री राम ने ऋषि पत्नी अहिल्या का ही

230
00:15:50,480 --> 00:15:54,560
अपने चरणों से स्पर्श किया तब भी यदि किसी पुण्य आत्मा का उद्धार एक क्षत्रिय

231
00:15:54,560 --> 00:15:58,880
के चरणों का स्पर्श होने से ही होना था होना है तो क्या क्षत्रिय को अपने व्यष्टि

232
00:15:58,880 --> 00:16:02,960
के धर्म को वरीयता देते हुए समष्टि के धर्म को त्याग देना चाहिए अभी मैंने समष्टि

233
00:16:02,960 --> 00:16:07,280
और व्यष्टि का धर्म बता दिया है। कुंभकरण ने

234
00:16:07,280 --> 00:16:11,360
यह जानते हुए भी कि उसका बड़ा भाई दुराचारी था। किसी की निर्दोष

235
00:16:11,360 --> 00:16:15,600
स्त्री को अपहरण पूर्वक ले आया था। तथापि अपने भाई की

236
00:16:15,600 --> 00:16:20,080
ओर से युद्ध करते हुए समष्टि के धर्म का त्याग करके

237
00:16:20,080 --> 00:16:22,800
व्यक्तिगत धर्म को अपनाया। इसी

238
00:16:22,800 --> 00:16:26,800
प्रकार धर्मज्ञ होते हुए भरी सभा में द्रोपदी का चीर हरण होते समय

239
00:16:26,800 --> 00:16:30,880
प्रतिकार ना करते हुए भीष्म और द्रोणाचार्य ने भी राजगद्दी के प्रति अपने व्यक्तिगत

240
00:16:30,880 --> 00:16:35,040
कर्तव्य को ही प्राथमिकता दी। क्या यह सभी हमारे

241
00:16:35,040 --> 00:16:39,120
लिए आदर्श हैं? हमारे आदर्श तो वो प्रह्लाद हैं जिनके पिता ने जब

242
00:16:39,120 --> 00:16:43,200
जगदीश्वर भगवान विष्णु का विरोध किया तो उन्होंने अपने व्यक्ति

243
00:16:43,200 --> 00:16:47,360
अपने व्यष्टि के कर्तव्य को गौण करते हुए ईश्वर के पक्ष में खड़े

244
00:16:47,360 --> 00:16:51,520
होकर समष्टि के धर्म को प्राथमिकता दी। हमारे आदर्श तो प्रभु श्री राम है

245
00:16:51,520 --> 00:16:55,600
जिन्होंने अपनी स्वधर्म निष्ठ प्रजा की सुख शांति के लिए अपनी

246
00:16:55,600 --> 00:16:59,760
निर्दोष पत्नी को भी त्याग कर यह उदाहरण प्रस्तुत किया कि कर्तव्य

247
00:16:59,760 --> 00:17:05,760
का निर्णय कभी भी एकांकी नहीं होता है।

248
00:17:05,920 --> 00:17:10,000
पूरी शंकराचार्य जी का वचन है ये। भसुंडी रामायण

249
00:17:10,000 --> 00:17:15,520
के आलोक में अब आ जाती है भसुंडी रामायण। यह बड़ा

250
00:17:15,520 --> 00:17:19,760
मजेदार है। चलिए उपरोक्त शास्त्र वाक्यों

251
00:17:19,760 --> 00:17:23,920
के ठीक विपरीत भूषुंडी रामायण के अनुसार शबरी बहिष्कृता थी। जबकि वहां

252
00:17:23,920 --> 00:17:29,920
पर अहिस्तकता लिखा है उनके लिए और यहां पर बहिष्कृता लिखा है।

253
00:17:29,920 --> 00:17:34,080
एवं श्री राम द्वारा वहां पर भी शबरी की जाति के विषय में

254
00:17:34,080 --> 00:17:38,080
शंका ना करने को कहकर शबरी जी के प्रति हीन भावना रखने का

255
00:17:38,080 --> 00:17:42,240
खंडन किया है श्री राम ने। ठीक है? भसुंडी रामायण दक्षिण

256
00:17:42,240 --> 00:17:46,560
खंड 171वा अध्याय और 20वां श्लोक इस प्रकार भी

257
00:17:46,560 --> 00:17:50,560
श्री राम जी सहित वहां उपस्थित अन्य ब्राह्मणों सहित लक्ष्मण जी

258
00:17:50,560 --> 00:17:54,800
के वर्णाश्रम उचित धर्म का उल्लंघन स्वीकार करना होगा क्योंकि

259
00:17:54,800 --> 00:17:59,200
भुसुंडी रामायण के अनुसार ना केवल प्रभु श्री राम ने वहां पर

260
00:17:59,200 --> 00:18:03,680
जो धर्मशास्त्र है उनकी सीमा के बाहर जाकर के कार्य किया बल्कि

261
00:18:03,680 --> 00:18:07,760
वहां जो ब्राह्मण थे और उनके छोटे अनुज जो लक्ष्मण

262
00:18:07,760 --> 00:18:12,400
थे उनको भी वैसा ही करने को कहा

263
00:18:12,400 --> 00:18:16,640
उनको कहा ब्राह्मणों को जाकर के प्रमाण प्रणाम करिए क्षमा मांगिए

264
00:18:16,640 --> 00:18:20,800
और वह वहां जाते हैं और शबरी जी शबरी जी से कहते हैं आप हमारे आएंगे आपके चरणों

265
00:18:20,800 --> 00:18:21,300
की धूल

266
00:18:21,200 --> 00:18:25,520
से हमारा आश्रम पवित्र हो जाएगा अमुक अमुक बातें कहते हैं ये सब क्या है

267
00:18:25,520 --> 00:18:29,600
भाई ब्रह्म भाव से भगवान राम है ना ब्रह्म

268
00:18:29,600 --> 00:18:33,600
भाव से भगवान राम को कोई दोष नहीं लगेगा ना ब्राह्मणों

269
00:18:33,600 --> 00:18:37,600
को तो लगेगा झूठे बैर खाने पर लक्ष्मण जी को तो लगेगा कि

270
00:18:37,600 --> 00:18:41,840
वह भी ब्रह्म भाव से झूठे बेर खाएंगे अच्छा यदि

271
00:18:41,840 --> 00:18:46,000
यह मान लिया जाए कि भगवान ने कहा तो नहीं लगेगा तो फिर तो बुद्ध

272
00:18:46,000 --> 00:18:50,160
के रूप में भी मान लो फिर वेदों का विरोध फिर रही कहां गया धर्म आग

273
00:18:50,160 --> 00:18:54,400
लगा दो तुम धर्म में ऐसा करो आग लगा दो

274
00:18:54,400 --> 00:18:58,640
करपात्री जी का विरोध करके दिखाना है कर नहीं पाओगे

275
00:18:58,640 --> 00:19:03,040
बात और है अकाट्य सिद्धांत है भैया अकाट्य सांप

276
00:19:03,040 --> 00:19:07,200
और बिच्छू शेरों को काटा नहीं करते दूर ही दूर से रेंग कर निकल जाते हैं

277
00:19:07,200 --> 00:19:11,360
ठीक है मगर मगर नीचता

278
00:19:11,360 --> 00:19:15,360
की पराकाष्ठा है। नीचता की कृपात्री जी से

279
00:19:15,360 --> 00:19:19,920
द्रोह दिखाने के लिए कितना नीचे गिरोगे?

280
00:19:19,920 --> 00:19:24,080
कि भगवान ने कहा इसलिए जो है उन ब्राह्मणों को दोष नहीं लगेगा।

281
00:19:24,080 --> 00:19:28,080
भगवान का कहा हुआ था। और भगवान का कहा हुआ तो बुद्ध का

282
00:19:28,080 --> 00:19:32,080
कहा हुआ भी था। फिर वहां पर वेदों का उल्लंघन करने पर

283
00:19:32,080 --> 00:19:36,320
दोष क्यों माना जा रहा? फिर क्या बात रह जाएगी वेद की? नान्यापन

284
00:19:36,320 --> 00:19:40,880
था। क्या बात रह जाएगी फिर? हां।

285
00:19:40,880 --> 00:19:43,440
चलो।

286
00:19:43,440 --> 00:19:46,800
खैर आगे चलते हैं।

287
00:19:46,800 --> 00:19:51,600
तो

288
00:19:51,600 --> 00:19:56,800
प्रभु श्री राम ने शबरी के झूठे बैर खाए। बल्कि उनके साथ-साथ

289
00:19:56,800 --> 00:20:01,120
लक्ष्मण जी ने भी कहा शबरी के झूठे बेर खाए। भुसुंडी रामायण दक्षिण

290
00:20:01,120 --> 00:20:05,200
खंड 167 वा अध्याय और 15वा श्लोक

291
00:20:05,200 --> 00:20:09,600
और वहीं दूसरी ओर 172वा अध्याय और 21 से

292
00:20:09,600 --> 00:20:14,160
25वें श्लोक इन सब में ये सारा विवरण आपको प्राप्त हो जाएगा कि ब्राह्मणों

293
00:20:14,160 --> 00:20:18,160
ने भी अपने वर्णाश्रम उचित धर्म से बाहर जाकर के कुछ कार्य

294
00:20:18,160 --> 00:20:22,480
किए लक्ष्मण जी ने किए सब आपको प्राप्त हो जाएगा तो फिर इनको दोष क्यों लगवाया

295
00:20:22,480 --> 00:20:26,480
भाई भगवान राम है उनकी भक्त वो हैं भक्त के उसमें

296
00:20:26,480 --> 00:20:30,720
आवेश में आकर के वह ब्रह्म भाव से वह कार्य कर रहे वैसे ब्रह्म भाव से ना करना

297
00:20:30,720 --> 00:20:34,880
सिद्ध कर दिया। शबरी जी को ब्राह्मणी सिद्ध कर दिया। वह कार्य नहीं

298
00:20:34,880 --> 00:20:38,960
और वह अपने कार्यों की समीक्षा ब्रह्म भाव से नहीं बल्कि मनुष्य भाव से

299
00:20:38,960 --> 00:20:43,280
करने का समर्थन करते हैं। यह भी सिद्ध कर दिया। राम और कृष्ण

300
00:20:43,280 --> 00:20:47,520
के व्यवहारिक भेद को भी सिद्ध कर दिया। ठीक

301
00:20:47,520 --> 00:20:53,520
है? और इसके बाद जो है

302
00:20:54,240 --> 00:20:58,400
जो पाद्य प्रक्षालन इत्यादि को लेकर के आपत्ति

303
00:20:58,400 --> 00:21:02,480
थी उसमें भी निराकरण प्रस्तुत कर दिया। अब बात आती है कि भूषुंडी रामायण के

304
00:21:02,480 --> 00:21:06,560
अनुसार तो भैया मर्यादा का उल्लंघन श्री राम ही नहीं कर रहे बल्कि वो

305
00:21:06,560 --> 00:21:11,040
ब्राह्मणों से भी करवा रहे और लक्ष्मण जी से भी करवा रहे। तो ब्रह्म भाष ब्रह्म वो है ना

306
00:21:11,040 --> 00:21:15,120
बाकी सब भी ब्रह्म है जो उनको दोष नहीं लगेगा। खैर

307
00:21:15,120 --> 00:21:19,120
क्या इस प्रकार श्री राम मनुवाद रूपी धर्म के

308
00:21:19,120 --> 00:21:23,120
रक्षक सिद्ध होंगे? अन्यों से करवाना स्वयं करना नहीं अन्यों

309
00:21:23,120 --> 00:21:27,120
से भी करवाना। ठीक है? तो यहां यह अवश्य माना जा

310
00:21:27,120 --> 00:21:31,600
सकता है। यह हम अपना एक पक्ष रख रहे हैं कि अगर भसुंडी

311
00:21:31,600 --> 00:21:35,600
रामायण के वचनों का मान रखना है तो उसकी घटनाओं को या तो दिव्य

312
00:21:35,600 --> 00:21:39,840
घटनाएं मान लो। लौकिक घटनाएं या नहीं। लौकिक मतलब मनुष्य दृष्टि से

313
00:21:39,840 --> 00:21:43,920
ना देखी जा सकने वाली घटनाएं मान लो। दिव्य लोकों में हो रही हैं। दिव्य

314
00:21:43,920 --> 00:21:48,000
दृष्टि से ही दिख रही हैं। जो हमारे सामान्य चक्षु हैं

315
00:21:48,000 --> 00:21:52,400
स्थूल शरीर के उनसे यह घटनाएं नहीं दिख रही हैं। हमारी जानकारी

316
00:21:52,400 --> 00:21:56,480
में तो मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने मर्यादा में रहकर ही

317
00:21:56,480 --> 00:22:02,080
शबरी जी के साथ व्यवहार किया। खैर

318
00:22:02,080 --> 00:22:06,560
तो यहां और क्या-क्या माना जा सकता है? एक तो दिव्य दृष्टि दैविक

319
00:22:06,560 --> 00:22:09,360
घटना या फिर यहां यह माना जा सकता है। यहां यह

320
00:22:09,360 --> 00:22:13,520
अवश्य माना जा सकता है कि उच्च कुल की होते हुए भी सब क्षेत्र में रहने

321
00:22:13,520 --> 00:22:17,680
के कारण वह सबरी कहलाती थी। जिस कारण वन में रहने वाले अन्य ब्राह्मण

322
00:22:17,680 --> 00:22:21,840
उन्हें भील जाति के होते हुए बहिष्कृता ही मानते थे। जिस संबंध में बहिष्कृता

323
00:22:21,840 --> 00:22:25,920
वाले श्लोक आ गए। और जिस प्रकार भगवान ने कृष्ण रूप में

324
00:22:25,920 --> 00:22:29,920
कर्ण का रहस्य बोध कराया था। उसी प्रकार उन्होंने शबरी के विषय में

325
00:22:29,920 --> 00:22:34,000
भी रहस्य बोध कराया उन ब्राह्मणों को कि इसकी जाति को लेकर इसके

326
00:22:34,000 --> 00:22:38,080
प्रति हीन भावना मत रखो। अगर इस प्रकार से अर्थ निकालना चाहें तो

327
00:22:38,080 --> 00:22:42,160
भी निकाला जा सकता है। पुषुंडी रामायण दक्षिण खंड 171वां अध्याय

328
00:22:42,160 --> 00:22:46,320
20वां श्लोक जहां एक ओर प्रभु श्री राम वनवास

329
00:22:46,320 --> 00:22:50,320
के समय फल मूल इत्यादि ग्रहण करने की प्रतिज्ञा

330
00:22:50,320 --> 00:22:54,320
ले रहे हैं। तो वहीं दूसरी ओर मुसुंडी रामायण में शबरी जी द्वारा उन्हें दाल

331
00:22:54,320 --> 00:22:58,320
भात खिलाया जा रहा है। भाई प्रतिज्ञा ले रहे हैं। कि मैं जो है फल

332
00:22:58,320 --> 00:23:02,480
मूल पाऊंगा। कहां ले रहे प्रतिज्ञा? वाल्मीकि रामायण

333
00:23:02,480 --> 00:23:06,560
3 110 16 से 27 26

334
00:23:06,560 --> 00:23:10,800
से 27 और दाल भात कहां खा रहे हैं? भसुंडी

335
00:23:10,800 --> 00:23:15,040
रामायण दक्षिण खंड 167वा अध्याय और

336
00:23:15,040 --> 00:23:19,600
11 से 12वा श्लोक। खिलाओ दाल भात। इसी

337
00:23:19,600 --> 00:23:23,840
प्रकार यदि श्री राम को मर्यादा पुरुषोत्तम और शबरी को यथाविधि सत्कार

338
00:23:23,840 --> 00:23:25,200
करने वाली धर्माचारिणी

339
00:23:25,200 --> 00:23:29,280
कृष्ण मृग चर्म धारणी कहा गया है तो क्या हमें मनुस्मृति

340
00:23:29,280 --> 00:23:34,080
का खंडन करते हुए किसी और का उत्ष्ट उच्छिष्ट पदार्थ

341
00:23:34,080 --> 00:23:38,320
खाना अथवा अतिथि को स्वयं का उच्चिष्ट खिलाने

342
00:23:38,320 --> 00:23:42,480
को विधि मानना होगा क्योंकि भाई वहां तो उनको मर्यादा

343
00:23:42,480 --> 00:23:46,640
पुरुषोत्तम कहा जा रहा है तो उनके द्वारा की किए जाने वाले को कार्यों

344
00:23:46,640 --> 00:23:50,640
को मर्यादा मानना पड़ेगा शबरी की चीजों को हमें धर्म मानना पड़ेगा क्योंकि

345
00:23:50,640 --> 00:23:54,720
उनको धर्माचारणी कहा गया है। विधि को जानने वाली कहा गया है। विधि से

346
00:23:54,720 --> 00:23:58,800
कार्य करने वाली कहा गया है तो उनके द्वारा की जाने वाली चीजों को विधि मानना पड़ेगा। तो

347
00:23:58,800 --> 00:24:02,640
हम भी वही करें। हां

348
00:24:02,640 --> 00:24:06,960
अथवा शास्त्र के उन वचनों को ही त्याग दें जिनके द्वारा श्री रामचंद्र सत्य

349
00:24:06,960 --> 00:24:11,200
प्रतिज्ञ सदाचारी मनुवादी रूपी धर्म के प्रचारक

350
00:24:11,200 --> 00:24:15,360
रक्षक और पालक होते हुए मर्यादा का पोषण करने वाले मूर्तिमान धर्म

351
00:24:15,360 --> 00:24:19,440
सिद्ध होते हैं। ज्ञातव्य है कि उच्चिष्ट का

352
00:24:19,440 --> 00:24:23,600
अर्थ अवशिष्ट भी होता है। अब यहां एक समर्थन में भसुंडरी

353
00:24:23,600 --> 00:24:28,240
रामायण के समर्थन में एक पक्ष और रख रहे हैं कि

354
00:24:28,240 --> 00:24:32,960
उच्चिष्ट का अर्थ अवशिष्ट भी ले सकते हैं। अवशिष्ट

355
00:24:32,960 --> 00:24:37,040
एक अवशिष्टांश अनेक प्रकार का होने से उच्चिष्ट को अवशिष्ट भी

356
00:24:37,040 --> 00:24:41,520
कहा जा सकता है। उच्चिष्ट शब्द का अर्थ ही होता है छोड़ा हुआ या परिशेष

357
00:24:41,520 --> 00:24:45,680
भाग। तो ऐसे संदिग्ध स्थलों पर जहां शास्त्रंतरों से संगति

358
00:24:45,680 --> 00:24:49,920
आवश्यक है। यदि यदि झूठा लेने देने का मनवादी शास्त्रों

359
00:24:49,920 --> 00:24:53,920
में निषेध है एवं यदि मनु विरुद्ध कोई भी स्मृति प्रशस्त नहीं

360
00:24:53,920 --> 00:24:58,160
मानी जाती है। ऐसी स्थिति में अवशिष्ट पद पर विचार

361
00:24:58,160 --> 00:25:02,560
आवश्यक हो जाता है। मनुप्रोक्त उच्चिष्ट शब्द का

362
00:25:02,560 --> 00:25:06,560
अर्थ यदि सभी स्थितियों में अवशिष्टांश का निषेध माना

363
00:25:06,560 --> 00:25:10,560
जाएगा तब आतित्य प्रकरण में ही आने वाले निम्नलिखित

364
00:25:10,560 --> 00:25:14,880
वचनांश का विरोध हो जाएगा। ठीक है? कौन सा वचनांश का विरोध होगा?

365
00:25:14,880 --> 00:25:19,520
जब ब्राह्मण अपने सेवक भोजन

366
00:25:19,520 --> 00:25:23,600
ब्राह्मण और अपने सेवक भोजन कर चुके हो तो उसके पीछे

367
00:25:23,600 --> 00:25:28,240
अवशिष्ट अन्य को स्त्री अन्य स्त्री पुरुष

368
00:25:28,240 --> 00:25:32,880
अवशिष्ट का अन्य स्त्री पुरुष भोजन करें। मनुस्मृति

369
00:25:32,880 --> 00:25:37,040
100 16 तो यह वाला जो बचा हुआ

370
00:25:37,040 --> 00:25:41,040
अवशिष्ट है उसको झूठा करना आवश्यक नहीं है। जो

371
00:25:41,040 --> 00:25:45,200
भोजन प्राप्त करने के बाद बचा हुआ अवशिष्ट है वह भी किसी को दिया जा सकता

372
00:25:45,200 --> 00:25:49,360
है। तो उस अवशिष्ट को देने के रूप में यदि शबरी

373
00:25:49,360 --> 00:25:53,520
जी के द्वारा जो प्रभु श्री राम को बेर दिए गए हैं।

374
00:25:53,520 --> 00:25:57,840
उस रूप में यदि बेरों को मान लें कि उन्होंने एक जो बेर

375
00:25:57,840 --> 00:26:02,160
लिए जिस ढेर जो ढेरी थी बेर की उसमें से एक बेर को चक लिया और

376
00:26:02,160 --> 00:26:06,160
देखा कि इस ये जो ढेर है बेर का इसमें जो है मीठे फल

377
00:26:06,160 --> 00:26:10,560
हैं एक से पता लगा लिया जैसे चावल से पता लगाते हैं और वो फिर जो अवशेष

378
00:26:10,560 --> 00:26:16,480
है वो उनको दे दिया तो यहां पर तब भी संगति बैठ जाएगी तो अतः

379
00:26:16,480 --> 00:26:20,480
शिष्ट कुलीन सदाचार के अनुसार ही इसे समझना चाहिए जिस

380
00:26:20,480 --> 00:26:24,480
प्रकार चावल पकाते समय चावल के दो दानों का परीक्षण करके

381
00:26:24,480 --> 00:26:28,640
यह ज्ञात कर लिया जाता है कि वह पक चुका है अथवा नहीं। उसी प्रकार

382
00:26:28,640 --> 00:26:32,640
यदि यह माना जाए कि जिन फलों को शबरी तोड़कर लाई थी उनमें से

383
00:26:32,640 --> 00:26:36,880
कुछ फलों को उसने ग्रहण कर जब यह परीक्षण पूर्वक निर्णय कर लिया कि

384
00:26:36,880 --> 00:26:41,120
वह फल मीठे ही हैं तब अवशिष्ट रूपी फलों को जिन्हें

385
00:26:41,120 --> 00:26:45,440
उच्चिष्ट भी कह सकते हैं। उच्चिष्ट का अर्थ अवशिष्ट होता है क्योंकि फलों

386
00:26:45,440 --> 00:26:50,160
को श्री राम जी ने ग्रहण किया तो ऐसे में ना ही शबरी के धर्माचारणी

387
00:26:50,160 --> 00:26:54,320
होने पर कोई आपत्ति उठेगी और ना ही श्री राम जी के द्वारा मनुस्मृति की मर्यादा

388
00:26:54,320 --> 00:26:58,400
के बाहर जाकर आचरण करने की कोई आपत्ति शेष रह जाएगी। अतः

389
00:26:58,400 --> 00:27:02,560
उच्चिष्ट के स्थान पर अवशिष्ट पदार्थ को प्रदान करना एवं श्री

390
00:27:02,560 --> 00:27:06,720
राम जी द्वारा ग्रहण करना तथा शबरी जी को ब्राह्मणी स्वीकार करने पर

391
00:27:06,720 --> 00:27:10,800
इन विषयों में कहे गए पूर्वोत्तर किसी भी शास्त्र वाक्य

392
00:27:10,800 --> 00:27:14,800
का विरोध नहीं होगा। जो शास्त्रंतर हो रहा है ना भूषुंडी रामायण ये कह रही है

393
00:27:14,800 --> 00:27:19,200
और वाल्मीकि रामायण ये कह रही है तो यहां वाल्मीकि रामायण जो भुसुंडी रामायण

394
00:27:19,200 --> 00:27:23,200
है उसकी जो है अवमानना नहीं होगी इस तरीके से

395
00:27:23,200 --> 00:27:27,200
अर्थ को लेने पर या तो दिव्य से ले लो या फिर वो वाला

396
00:27:27,200 --> 00:27:31,440
ले लो कि वो जो है क्या कहते हैं उन्होंने जो है

397
00:27:31,440 --> 00:27:31,940
यह

398
00:27:31,680 --> 00:27:35,680
शंका जो थी ब्राह्मणों की कि वह जो है हीन जाति की है शूद्र

399
00:27:35,680 --> 00:27:39,760
हैं उस शंका को उन्होंने दूर किया इस इस रूप में उनका अर्थ ले लो

400
00:27:39,760 --> 00:27:43,920
खैर ध्यातव है और या फिर यह वाला और साथ ही साथ यह वाला भी

401
00:27:43,920 --> 00:27:48,000
लेना पड़ेगा। कौन सा कि उन्होंने उच्चिष्ट मतलब झूठा मुंह

402
00:27:48,000 --> 00:27:52,000
से झूठा किया हुआ नहीं बल्कि अवशिष्ट दिया था। जिसको उच्चिष्ट

403
00:27:52,000 --> 00:27:56,880
कहा गया है वहां पर। जैसे हम अन्य

404
00:27:56,880 --> 00:28:01,040
शास्त्रंतर की स्थिति में जो है संगति बैठाने के लिए जन्मना

405
00:28:01,040 --> 00:28:05,040
जाति शूद्रा का अर्थ भी क्या कहते हैं? शूद्रवत

406
00:28:05,040 --> 00:28:09,440
ले लेते हैं। हम खैर आगे चलते हैं। ध्यातव

407
00:28:09,440 --> 00:28:13,760
है कि भसुंडी रामायण के अनुसार प्रभु श्री राम ने वह सारे आचरण किए हैं

408
00:28:13,760 --> 00:28:17,840
जिस प्रकार के आचरण भगवान ने राम रूप में ना करके मर्यादा पुरुषोत्तम

409
00:28:17,840 --> 00:28:21,920
की उपाधि को प्राप्त किया था। वह सारे कार्य इसमें

410
00:28:21,920 --> 00:28:26,000
किए ना तो वह सत्य प्रतिज्ञ सिद्ध हो रहे हैं। भसुंडी

411
00:28:26,000 --> 00:28:30,240
के रामायण भसुंडी रामायण के राम ना तो सत्य प्रतिज्ञ सिद्ध

412
00:28:30,240 --> 00:28:34,240
हो रहे हैं। ना धर्माचरण में बंधे रहकर कार्य करने वाले सिद्ध हो रहे

413
00:28:34,240 --> 00:28:38,240
हैं। और तो और अंतत गत्वा वो

414
00:28:38,240 --> 00:28:42,320
जो है एक पत्नी व्रत धारण पूर्वक चलने वाले भी सिद्ध नहीं हो रहे हैं। क्या

415
00:28:42,320 --> 00:28:47,040
सिद्ध हो रहे हैं? देखो रास लीला है भैया इसमें रास लीला।

416
00:28:47,040 --> 00:28:51,360
तो ब्रजांगनाओं के स ब्रजांगनाओं

417
00:28:51,360 --> 00:28:55,520
अर्थात पराई स्त्रियों के साथ रमण ना करने का कारण

418
00:28:55,520 --> 00:28:59,520
धर्म अथवा मर्यादा नहीं अपितु माता सीता का रूठना बता रहे

419
00:28:59,520 --> 00:29:03,760
हैं। पुषुंडी रामायण पूर्व खंड 26वां अध्याय 56

420
00:29:03,760 --> 00:29:08,000
से 60वा श्लोक ब्रजांगनाओं की इच्छा पूर्ति

421
00:29:08,000 --> 00:29:12,240
हेतु मुनियों द्वारा श्री राम को सर्वप्रथम

422
00:29:12,240 --> 00:29:16,320
विवाह के बिना ही माता सीता के साथ रमण कर उन्हें अपनी एकनिष्ठता

423
00:29:16,320 --> 00:29:20,560
प्रदर्शित करने एवं उसी क्रम में आगे अनेक वृजांगनाओं के साथ रमण

424
00:29:20,560 --> 00:29:25,120
करने का परामर्श दिया जा रहा है। भुसुंडी रामायण पूर्व खंड

425
00:29:25,120 --> 00:29:29,120
26वा अध्याय 72 से 78 श्लोक यह

426
00:29:29,120 --> 00:29:33,840
है भसुंडी रामायण में रास रचा रहे भगवान श्री राम

427
00:29:33,840 --> 00:29:37,840
अब एक पत्नी व्रत भी खंडित सत्य प्रतिज्ञ होना भी खंडित

428
00:29:37,840 --> 00:29:41,840
मर्यादा पुरुषोत्तम होना भी खंडित केवल नाम के राम

429
00:29:41,840 --> 00:29:46,000
रह गए हैं बदल डालो इतिहास को पूरा राम

430
00:29:46,000 --> 00:29:50,160
है ही नहीं ये भी कह दो

431
00:29:50,160 --> 00:29:54,640
माता के माता सीता के साथ विवाह रहित रमण वृतांत

432
00:29:54,640 --> 00:30:00,560
है इसमें पूरा वही भागवत जैसा वो रामायण पूर्व खंड

433
00:30:00,560 --> 00:30:06,560
28वा अध्याय

434
00:30:08,080 --> 00:30:13,280
ब्रजांगनाओं के साथ श्री राम की रास लीला का वृतांत

435
00:30:13,280 --> 00:30:17,520
पहले माता सीता के साथ और फिर ब्रजांगनाओं के साथ भुसुंडी

436
00:30:17,520 --> 00:30:20,800
रामायण पूर्व खंड

437
00:30:20,800 --> 00:30:25,280
31 36 46 से 54 और

438
00:30:25,280 --> 00:30:29,920
36 46 से

439
00:30:29,920 --> 00:30:32,880
64

440
00:30:32,880 --> 00:30:36,880
अशोक वाटिका जहां तीनों लोकों की कन्याएं

441
00:30:36,880 --> 00:30:41,120
बंद थी। तरह-तरह की सुंदर कन्याएं अशोक वाटिका में बंदी बनी हुई थी।

442
00:30:41,120 --> 00:30:45,120
वहां प्रमोद वन को प्रमोद वन को उत्पन्न किया गया।

443
00:30:45,120 --> 00:30:49,280
एवं श्री राम ने माता सीता सहित रावण के द्वारा बंदी बनाई गई। सभी

444
00:30:49,280 --> 00:30:53,280
मृगनयनी कन्याओं के साथ रमण किया। भसुंडी रामायण दक्षिण

445
00:30:53,280 --> 00:30:57,600
खंड 195वा अध्याय

446
00:30:57,600 --> 00:31:02,080
और एक से 12 श्लोक एक पत्नी व्रत भी खत्म।

447
00:31:02,080 --> 00:31:06,240
वो वहां पर प्रतिज्ञा कर रहे हैं कि मैं किसी और के बारे में सोचूंगा भी नहीं। मन से

448
00:31:06,240 --> 00:31:10,320
भी वर्णन नहीं करूंगा। और यहां ये

449
00:31:10,320 --> 00:31:14,800
विचारणीय है कि भुसुंडी रामायण के घटनाक्रमों में क्रमों के नायक दशरथ

450
00:31:14,800 --> 00:31:19,360
पुत्र मर्यादा पुरुषोत्तम धनुरधारी श्री राम ही हैं। अथवा

451
00:31:19,360 --> 00:31:23,520
बांसुरी बजाने वाले लीला पुरुषोत्तम कृष्ण है। यह विचार करने वाली बात

452
00:31:23,520 --> 00:31:28,080
है कि यहां किसकी बात हो रही है। राम है कि कृष्ण है

453
00:31:28,080 --> 00:31:32,160
जिनको भुसुंडी रामायण में राम नाम से संबोधित मात्र किया है। यह विचार करने

454
00:31:32,160 --> 00:31:36,320
योग्य मात्र है। वह धनुधारी श्री राम है या बांसुरी बजाने वाले श्री

455
00:31:36,320 --> 00:31:40,400
कृष्ण है। जिनको यहां पर भुसुंडी रामायण में राम कहा गया है। बस इतनी

456
00:31:40,400 --> 00:31:44,720
सी बात है। श्री राम बांसुरी बजा बजाते हुए उन रमणियों

457
00:31:44,720 --> 00:31:48,160
के मध्य ऐसे प्रतीत हो रहे थे जैसे विद्युत वनिताओं

458
00:31:48,160 --> 00:31:53,520
से घिरे गर्जन करते मेघ भुसुंडी रामायण पूर्व खंड

459
00:31:53,520 --> 00:31:57,680
35वा अध्याय और 13 से 14

460
00:31:57,680 --> 00:32:01,840
श्लोक तो एक काम करो अब धनुष ले लो उनके हाथ से

461
00:32:01,840 --> 00:32:06,880
बांसुरी पकड़ा दो खड़ा कर दो पूरा सिस्टम ही चेंज कर दो

462
00:32:06,880 --> 00:32:10,880
अपने द्वेष के चलते अच्छा श्री राम

463
00:32:10,880 --> 00:32:15,440
जी छलिया भी है छलिया भी है श्री राम जी लो भसुंडी

464
00:32:15,440 --> 00:32:21,360
रामायण पूर्व खंड छलिया कहा जा रहा है राम को

465
00:32:21,360 --> 00:32:26,240
तो ये राम है कि कृष्ण है कौन है ये रामायण

466
00:32:26,240 --> 00:32:30,720
पूर्व खंड 39वा अध्याय 20 से 25वा श्लोक

467
00:32:30,720 --> 00:32:34,800
धातव्य है कि उक्त उक्त घटनाओं को ब्रह्म भाव

468
00:32:34,800 --> 00:32:39,040
के आधार पर व्यवहारिक रूप में भी स्वीकार करने पर कोई आपत्ति नहीं

469
00:32:39,040 --> 00:32:43,360
है कोई आपत्ति नहीं है सारी घटनाएं स्वीकार है। उनका रास रचाना

470
00:32:43,360 --> 00:32:47,440
बांसुरी बजाना सब कुछ स्वीकार है। परंतु तब उक्त घटनाओं

471
00:32:47,440 --> 00:32:51,520
में प्रस्तुत भगवत स्वरूप को एक पत्नी व्रत धारण करने

472
00:32:51,520 --> 00:32:55,520
वाला कैसे स्वीकार किया जाएगा? सत्य प्रतिज्ञा कैसे

473
00:32:55,520 --> 00:33:00,080
स्वीकार किया जाएगा। मर्यादा पुरुषोत्तम कैसे स्वीकार किया जाएगा।

474
00:33:00,080 --> 00:33:03,280
यह तथ्य तब और भी पुष्ट हो जाता है जब भसुंडी

475
00:33:03,280 --> 00:33:07,280
रामायण के राम को पूर्ण परम ब्रह्म सच्चिदानंद इत्यादि को तो कहा

476
00:33:07,280 --> 00:33:11,760
गया है परंतु कहीं भी सत्य प्रतिज्ञ इत्यादि उपाधियां ना देकर

477
00:33:11,760 --> 00:33:15,760
ठीक इनके विपरीत छलियां इत्यादि उपाधियां दी गई है।

478
00:33:15,760 --> 00:33:19,840
एवं इसी क्रम में मर्यादा पुरुषोत्तम अथवा एक

479
00:33:19,840 --> 00:33:24,560
पत्नी व्रत रूप के विपरीत श्री राम को चरितार्थ

480
00:33:24,560 --> 00:33:28,640
करने वाले घटनाक्रम अनेक हैं। अनेक

481
00:33:28,640 --> 00:33:33,440
घटनाक्रम प्राप्त होते हैं। कैसे प्राप्त होते हैं? भूषुंड

482
00:33:33,440 --> 00:33:37,920
रामायण से प्राप्त होते हैं। कैसे प्राप्त होते हैं? भूषुंड

483
00:33:37,920 --> 00:33:42,080
रामायण में भी वो जो भरत वाला जो प्रकरण चल रहा है जब भरत

484
00:33:42,080 --> 00:33:46,080
जी कह रहे हैं कि चलो लौट चलो। तो उस समय भूषुंड रामायण में भी

485
00:33:46,080 --> 00:33:50,080
प्रभु श्री राम भरत जी को कह रहे हैं कि मैं 14

486
00:33:50,080 --> 00:33:54,080
साल वनवास करूंगा और धर्मानुसार आचरण

487
00:33:54,080 --> 00:34:00,000
करूंगा। धर्मानुसार ब्रह्मानुसार नहीं

488
00:34:00,000 --> 00:34:04,400
हां यही कह रहे हैं तो अगर भसुंडी रामायण के कथानक

489
00:34:04,400 --> 00:34:08,560
को मान लिया जाए कि झूठे वेर पाए तो मानना पड़ेगा

490
00:34:08,560 --> 00:34:12,880
कि भाई धर्मानुसार वो वहां नहीं चले तो उनकी प्रतिज्ञा भंग हो गई

491
00:34:12,880 --> 00:34:17,200
सत्य प्रतिज्ञा रह गई और सीता माता के अतिरिक्त

492
00:34:17,200 --> 00:34:18,720
जो उन्होंने आनंद

493
00:34:18,720 --> 00:34:23,440
रामायण में प्रतिज्ञा की हुई है। वाल्मीकि रामायण में प्रतिज्ञा की हुई है।

494
00:34:23,440 --> 00:34:28,320
सीता माता के अतिरिक्त किसी को भी

495
00:34:28,320 --> 00:34:34,320
माता के रूप में देखने की प्रतिज्ञा हम

496
00:34:34,320 --> 00:34:38,400
उसका भी विरोध हो जाएगा भसुंडी रामायण में क्योंकि यहां तो वो

497
00:34:38,400 --> 00:34:42,480
वो रास यही रचा रहे हैं। कृष्ण रूप के लिए वो नहीं दे रहे वरदान कि मैं

498
00:34:42,480 --> 00:34:46,560
अगले जन्म में आऊंगा। एक राम वो हैं जिनको जब पराई

499
00:34:46,560 --> 00:34:50,640
स्त्रियां मिल रही है या अमुक अमुक दिव्यांगनाएं हैं जो

500
00:34:50,640 --> 00:34:54,720
प्रकट हुई है वहां पर

501
00:34:54,720 --> 00:34:58,960
जो लीलाएं हैं उनको

502
00:34:58,960 --> 00:35:02,960
प्रस्तुत करने के निमित्त जो दिव्य भाव भगवान का उसको प्रस्तुत

503
00:35:02,960 --> 00:35:07,040
करने के निमित्त जो प्रकट हुई है उनको एक वो राम है

504
00:35:07,040 --> 00:35:11,120
जो अपने कृष्ण रूप की प्रतीक्षा करने को कह रहे हैं और एक वो राम

505
00:35:11,120 --> 00:35:15,200
है जो यहीं पर सब कुछ सब पूरा यही फुल एंड

506
00:35:15,200 --> 00:35:19,440
फाइनल कर दे रहे हैं ब्रह्म भाव के नाम पर यह बात और है

507
00:35:19,440 --> 00:35:23,520
यहां पर भी भगवान ने कई बार वहां वहां पर वो दिव्यता दिखाई

508
00:35:23,520 --> 00:35:27,680
है। ज्ञातव्य है कि भुसुंडी रामायण के अनुसार भी श्री राम ने

509
00:35:27,680 --> 00:35:31,680
भरत के समक्ष वनवास के समय भी धर्माचरण करने की ही

510
00:35:31,680 --> 00:35:36,240
प्रतिज्ञा की थी। भुसुंडी रामायण दक्षिण खंड 41वां अध्याय

511
00:35:36,240 --> 00:35:40,320
और 26 से 29वा श्लोक। ऐसे

512
00:35:40,320 --> 00:35:45,920
में उनके द्वारा आगे चलकर

513
00:35:45,920 --> 00:35:49,920
ब्रह्म भाव से शबरी के झूठे बेर खाने के रूप में उनके द्वारा

514
00:35:49,920 --> 00:35:54,000
धर्म की मर्यादा का उल्लंघन करते हुए कार्य करने पर भी उन्हें सत्य

515
00:35:54,000 --> 00:35:58,000
प्रतिज्ञ किस आधार पर कहा जाएगा। हम अब

516
00:35:58,000 --> 00:36:02,000
यहां फिर से वही बात एक बार ध्यान दिला दूं कि ध्यान रहे हम पूर्व में

517
00:36:02,000 --> 00:36:06,080
भी कह आए हैं कि विषय दोष लगने अथवा ना लगने का नहीं है। विषय यह

518
00:36:06,080 --> 00:36:10,320
है कि धर्म के अनुसार आचरण करेंगे। श्री राम अथवा ब्रह्म

519
00:36:10,320 --> 00:36:14,320
भाव के अनुसार यदि वे ब्रह्म भाव से धर्म की सीमा के बाहर

520
00:36:14,320 --> 00:36:18,720
कोई कार्य कर भी रहे हैं तो कोई आपत्ति नहीं परंतु उक्त कृत्यों

521
00:36:18,720 --> 00:36:22,720
की संगति शास्त्र के उन वाक्यों के साथ ना बैठने

522
00:36:22,720 --> 00:36:27,040
पर आपत्ति है जिनमें श्री राम को धर्मानुसार

523
00:36:27,040 --> 00:36:31,200
आचरण करने वाला कहा गया है। यहां तो भुसुंडी रामायण से ही भसुंडी

524
00:36:31,200 --> 00:36:36,480
रामायण की बात कट रही है। वाल्मीकि जी की भी आवश्यकता नहीं है। अब क्या करोगे?

525
00:36:36,480 --> 00:36:40,480
हम यदि वह ब्रह्म भाव के आधार पर दिए

526
00:36:40,480 --> 00:36:44,800
गए वचनों से विमुख भी हो जाते हैं तो कोई आपत्ति नहीं है। परंतु

527
00:36:44,800 --> 00:36:48,800
शास्त्र द्वारा उनको वचन से विमुख ना होने वाला कहे जाने वाले

528
00:36:48,800 --> 00:36:53,040
वाक्यों के साथ संगठ संगति ना बैठने पर आपत्ति है। आपत्ति

529
00:36:53,040 --> 00:36:57,120
किस पर है समझ लो। जब आप जब यह जो भागवतानंद

530
00:36:57,120 --> 00:37:00,960
है अपने दृष्टांत की पुष्टि हेतु इसका एक वीडियो है जिसमें

531
00:37:00,960 --> 00:37:05,600
यह अपने दृष्टांत की पुष्टि करने के लिए क्या बता रहा है

532
00:37:05,600 --> 00:37:10,240
कि भसुंडी रामायण के शब्दों में शाब्दिक अर्थ के विपरीत

533
00:37:10,240 --> 00:37:14,480
तर्क दे रहा है कि माता शबरी ने श्री राम को अपने नेत्रों

534
00:37:14,480 --> 00:37:18,800
के अश्रु जल से पाद्य अर्पित किया। अब यह अश्रु

535
00:37:18,800 --> 00:37:24,000
कहां से आ गया वहां पर? एज इट इज लेना है ना अर्थ। हम लोग अर्थ को

536
00:37:24,000 --> 00:37:28,000
शास्त्रंतर भेद को मिटाने शास्त्रंतरता को मिटाने

537
00:37:28,000 --> 00:37:32,240
के लिए हम जो है शब्दों का वो नहीं गुरु

538
00:37:32,240 --> 00:37:36,480
वचनों के आधार पर परंपरा प्राप्त ज्ञान विज्ञान के आधार पर यह जो शास्त्र

539
00:37:36,480 --> 00:37:40,640
में भेद आ रहा है वहां पर हम यह नहीं कर सकते कि भाई

540
00:37:40,640 --> 00:37:44,640
जो है कि वहां पर कहा जा रहा है कि झूठे वेदर दिए या तो वो दिव्य घटना

541
00:37:44,640 --> 00:37:49,520
है या तो अवशिष्ट है और या तो उन्होंने अपने भाव प्रदान किए

542
00:37:49,520 --> 00:37:53,600
ऐसा कुछ हम अर्थ नहीं ले सकते एज इट इज लेना है परंतु

543
00:37:53,600 --> 00:37:57,840
यह स्वयं यह स्वयं अवश्य ले सकता है। यह स्वयं

544
00:37:57,840 --> 00:38:02,160
वहां पर क्या कह रहा है कि शबरी ने अपने नेत्रों के अश्रु

545
00:38:02,160 --> 00:38:06,320
जल से पाद्य अर्पित किया। क्यों कह रहे हो भाई? एज इट इज लो ना। शबरी

546
00:38:06,320 --> 00:38:10,560
जी तुरंत आए। उनके चरणों को अपने नेत्रों से ही धोते हुए अपने नेत्र के आंसुओं

547
00:38:10,560 --> 00:38:14,720
से धोते हुए शबरी जी आश्रम में ले आए। तुम अपने व्याख्यान के लिए

548
00:38:14,720 --> 00:38:16,000
छेड़छाड़ कर सकते हो।

549
00:38:16,000 --> 00:38:20,240
परंतु शास्त्रंतर को मिटाने के लिए दोष

550
00:38:20,240 --> 00:38:24,240
दृष्टि ना आ जाए कि भाई यह वाली जो यह घटनाक्रम है यह बिल्कुल विपरीत

551
00:38:24,240 --> 00:38:28,240
है श्री राम के श्री राम की सत्य प्रतिज्ञता की रक्ष रक्षा करने

552
00:38:28,240 --> 00:38:33,040
के लिए वहां पर उच्चिष्ट को अवशिष्ट ना समझा जाए

553
00:38:33,040 --> 00:38:37,120
वहां पे एज इट इज लेना है। फल का मतलब फल ही होता है ना। अब तू बता

554
00:38:37,120 --> 00:38:41,120
भाई ये नेत्रों से आंसू आंसू गिरने वाली बात वहां कहां

555
00:38:41,120 --> 00:38:45,120
लिखी है? हां।

556
00:38:45,120 --> 00:38:49,280
खैर तरस आता है ऐसे लोगों पर अपने ही हाथों

557
00:38:49,280 --> 00:38:53,360
से अपने ही घर में आग लगाते हैं फेम प्राप्त करने

558
00:38:53,360 --> 00:38:58,000
के लिए प्रसिद्धि प्राप्त करने के लिए।

559
00:38:58,000 --> 00:39:01,040
चलिए

560
00:39:01,040 --> 00:39:05,360
माता शबरी ने श्री राम को अपने नेत्रों से अश्रु जल से पाद्य अर्पित

561
00:39:05,360 --> 00:39:09,760
किया। ये भागवतानंद कह रहा है तो मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम

562
00:39:09,760 --> 00:39:13,760
के चरित्र की निर्मलता अक्षुण रखने हेतु

563
00:39:13,760 --> 00:39:19,760
भुसुंडी रामायण का अर्थ वाल्मीकि रामायण के आलोक में क्यों नहीं ग्रहण किया जा सकता।

564
00:39:20,560 --> 00:39:25,280
सब प्रश्न यह है। इससे यह सिद्ध होता है कि आक्षेपकर्ता का मंतव्य

565
00:39:25,280 --> 00:39:29,520
किसी शास्त्रीय दृष्टांत का अन्वेषण अथवा शोध करना नहीं है। अपितु उन प्रामाणिक

566
00:39:29,520 --> 00:39:33,520
आचार्यों का विरोध करना है। उसका एकमात्र लक्ष्य जिनस में उन

567
00:39:33,520 --> 00:39:37,840
आचार्यों के प्रति अनास्था उत्पन्न करना है। जिनके सिद्धांतों

568
00:39:37,840 --> 00:39:42,480
के आधार पर कोई व्यक्ति स्वयं को नास्तिक के स्थान पर आस्तिक, सनातनी

569
00:39:42,480 --> 00:39:46,800
और वस्तुतः मनुष्य कहलाने का अधिकारी मानता है। जिनके

570
00:39:46,800 --> 00:39:50,960
द्वारा आज धर्म स्थापित है ना उनके प्रति अनास्था जगा

571
00:39:50,960 --> 00:39:53,200
दो।

572
00:39:53,200 --> 00:39:57,200
मुझसे कई लोग आकर के कहते हैं कि चलो ठीक है उनके कुछ कार्य गलत है। वो

573
00:39:57,200 --> 00:40:01,520
प्रामाणिक नहीं है। पर फिर भी उनका विरोध नहीं करना चाहिए।

574
00:40:01,520 --> 00:40:05,680
अगर आज हमने किसी अप्रामाणिक ऐसे स्वोषित स्वप्न निर्मित

575
00:40:05,680 --> 00:40:09,760
आचार्य को प्रश्न दिया ना तो कल को हर व्यक्ति को छूट

576
00:40:09,760 --> 00:40:14,080
मिल जाएगी। हमको भी सपना आया

577
00:40:14,080 --> 00:40:18,160
कर्म कर्म पर वैसे ही रामपाल जैसे लोग खड़े हुए हैं। फिर तो हमारे ही द्वारा वो

578
00:40:18,160 --> 00:40:22,320
लोग पोषित होने लगेंगे। हर कोई व्यक्ति आएगा कहेगा मेरा भी सपना

579
00:40:22,320 --> 00:40:26,560
मान लो। क्यों ना माने? वो कहेगा भैया इसके आचरण

580
00:40:26,560 --> 00:40:30,880
बहुत अच्छे हैं। भागवतानंद के। मेरे भी आचरण बहुत अच्छे हैं। इस संबंध

581
00:40:30,880 --> 00:40:34,960
में साक्षी कौन है? भागवत के मानने

582
00:40:34,960 --> 00:40:39,440
वाले भागवत के साक्षी हैं और रामपाल को मानने वाले रामपाल के साक्षी हैं।

583
00:40:39,440 --> 00:40:43,840
बनाओ करणा जगतगुरु जैसे कोई व्यक्ति आकर के कहे कर्मणा

584
00:40:43,840 --> 00:40:48,080
रॉन्ग साइड में अच्छा ड्राइवर करणा कैसे भाई कोई

585
00:40:48,080 --> 00:40:52,080
आकर के कहे कि भैया यह बहुत कुशल ड्राइवर है रॉन्ग साइड में भी अच्छी गाड़ी चलाएगा

586
00:40:52,080 --> 00:40:55,600
इसलिए उसको अनुमति दे दो

587
00:40:55,600 --> 00:40:59,680
हं बिना एक्सीडेंट के गाड़ी चलाएगा इसलिए उसको अनुमति दे दो फिर क्या होगा

588
00:40:59,680 --> 00:41:04,080
सब लोग मैं भी कुशल हूं मैं भी कुशल हूं मैं भी कुशल हूं ऐसे किसी विप्लव

589
00:41:04,080 --> 00:41:08,080
को प्रश्रय देना होगा भागवतानंद जैसे स्वगोषित

590
00:41:08,080 --> 00:41:12,560
और अप्रामाणिक एक व्यक्ति को प्रश्रय देने

591
00:41:12,560 --> 00:41:16,640
का अर्थ ऐसे विप्लव को अंजाम देना और

592
00:41:16,640 --> 00:41:20,640
ऐसा ही भूतकाल में जब लोगों के द्वारा किया गया है तो उसी

593
00:41:20,640 --> 00:41:24,800
का तो ये परिणाम है आर्य समाज इस रामपाल

594
00:41:24,800 --> 00:41:28,880
निरंकारी राधास्वामी अडगड़ानंद सब

595
00:41:28,880 --> 00:41:29,380
वही

596
00:41:29,280 --> 00:41:31,760
है।

597
00:41:31,760 --> 00:41:35,840
अतः इस प्रकार भी श्री रामचरित के विषय में स्थापित मौलिक

598
00:41:35,840 --> 00:41:39,920
सिद्धांतों के आलोक में भसुंडी रामायण का अर्थ करने पर भी

599
00:41:39,920 --> 00:41:44,320
शबरी जी ब्राह्मणी ही सिद्ध होंगी एवं मनुष्य दृष्टि से उनके

600
00:41:44,320 --> 00:41:48,480
उच्चिष्ट रूपी फलों का सेवन श्री रामचंद्र जी द्वारा कभी ना किया जाना

601
00:41:48,480 --> 00:41:52,480
ही सिद्ध होता है। ठीक है? चलो भाई

602
00:41:52,480 --> 00:41:55,120
आगे चलते हैं।

603
00:41:55,120 --> 00:41:59,120
अब श्री रामचरित के विषय में वाल्मीकि रामायण मूल क्यों?

604
00:41:59,120 --> 00:42:03,360
हर प्रश्न लिया है जो भी तुम लोग सोच सकते हो ना सारी सारी चीजें

605
00:42:03,360 --> 00:42:07,520
ली तो समन्वय बिाने के निमित्त आदि रामायण के श्लोक आदि रामायण

606
00:42:07,520 --> 00:42:11,600
यानी कि भुंडी रामायण श्लोकों का अर्थ ज्यों की त्यों ना लेकर

607
00:42:11,600 --> 00:42:15,600
वाल्मीकि रामायण से प्रभावित होकर क्यों लिया जाए वही आदि रामायण के आधार

608
00:42:15,600 --> 00:42:19,760
पर वाल्मीकि रामायण के अर्थ को मतलब यहां एक पक्ष रखा है कि

609
00:42:19,760 --> 00:42:23,920
भाई आदि रामायण के आधार पर तुम वाल्मीकि को बदलो ना वाल्मीकि के आधार पर आधी रामायण को क्यों

610
00:42:23,920 --> 00:42:28,000
बदल रहे हो यह क्यों नहीं हो सकता मतलब तुम राम को कृष्ण बना दो ना

611
00:42:28,000 --> 00:42:32,320
राम की की अपनी कथा तो कुछ रह ही नहीं जाएगी। अपना उनका जो तात्विक जो स्वरूप

612
00:42:32,320 --> 00:42:36,400
है उनका जो जो उनके द्वारा धर्म की संस्थापना है एक आदर्श

613
00:42:36,400 --> 00:42:40,640
स्थापित करना है वो सब तो कुछ रह ही नहीं जाएगा। खैर

614
00:42:40,640 --> 00:42:45,600
तो क्या है?

615
00:42:45,600 --> 00:42:49,600
तो यदि आप यह चाहते हैं कि वाल्मीकि के

616
00:42:49,600 --> 00:42:53,680
आधार पर भुसुंडी के अर्थ को लिया जाए तो यह ऐसा क्यों ना किया जाए कि वाल्मीकि

617
00:42:53,680 --> 00:42:57,760
का अर्थ भुसुंडी के आधार पर ले लिया जाए। यद्यपि जो भसुंडी रामायण

618
00:42:57,760 --> 00:43:02,000
है वह स्वयं वाल्मीकि को प्रमाण मान रही है। सबसे पहली बात तो है

619
00:43:02,000 --> 00:43:06,160
तो समन्वय बिाने के निमित्त यह पूर्व पक्ष रख रहा हूं मैं। समन्वय बिाने

620
00:43:06,160 --> 00:43:10,560
के निमित्त आदि रामायण के श्लोकों का अर्थ ज्यों की त्यों ना लेकर

621
00:43:10,560 --> 00:43:14,960
वाल्मीकि रामायण से प्रभावित होकर क्यों लिया जाए? वहीं

622
00:43:14,960 --> 00:43:18,960
आदि रामायण के आधार पर वाल्मीकि रामायण के अर्थ को क्यों ग्रहण ना

623
00:43:18,960 --> 00:43:23,200
किया जाए अथवा स्वतंत्र रूप से दोनों ही कथाओं को स्वीकार क्यों

624
00:43:23,200 --> 00:43:26,160
ना किया जाए।

625
00:43:26,160 --> 00:43:30,160
तो जब हम यह कह रहे हैं कि भाई वाल्मीकि रामायण के आलोक में आप

626
00:43:30,160 --> 00:43:34,160
भसुंडी रामायण को देखो तो हम यह क्यों नहीं करते कि भसुंडी रामायण

627
00:43:34,160 --> 00:43:38,160
के आलोक में वाल्मीकि रामायण को देखें यह भी तो हो सकता है या फिर दोनों के स्वतंत्र

628
00:43:38,160 --> 00:43:43,760
देखें वहां पर राम ने झूठ बोला यहां पे राम ने झूठ नहीं बोला है ना

629
00:43:43,760 --> 00:43:48,240
तो क्यों वाल्मीकि रामायण का आलोक जरूरी आवश्यक है

630
00:43:48,240 --> 00:43:52,320
श्रुति ने वेद वाणी को ही नित्य कहा है ऋग्वेद वैसे

631
00:43:52,320 --> 00:43:56,400
बताने की आवश्यकताएं नहीं है पर पर फिर भी ऋग्वेद 8

632
00:43:56,400 --> 00:44:01,040
75 छ व्यास जी ने भी वेद को नित्य कहा है। कहां पर? ब्रह्मसूत्र

633
00:44:01,040 --> 00:44:05,120
में एक तीन 28 29 वेद

634
00:44:05,120 --> 00:44:09,760
अपषय हैं। ब्रहानक उपनिषद दो 4 10 और

635
00:44:09,760 --> 00:44:13,840
तमाम अन्य प्रमाण स्थल हैं। वेद ही परम प्रमाण

636
00:44:13,840 --> 00:44:18,320
है। मनुस्मृति दो 13 इसी क्रम में जब सच्चिदानंद

637
00:44:18,320 --> 00:44:22,640
स्वरूप भगवान श्री राम के रूप में अवतरित होते हैं तब अपचय

638
00:44:22,640 --> 00:44:26,720
वेद ही वाल्मीकि रामायण के रूप में अवतरित होते हैं। कहां

639
00:44:26,720 --> 00:44:30,720
लिखा है? वाल्मीकि रामायण एक एक और एक चार छ

640
00:44:30,720 --> 00:44:34,720
में भी कुछ इसी प्रकार का भाव प्रस्तुत है। अतः अपौषय होने

641
00:44:34,720 --> 00:44:39,520
के कारण वाल्मीकि रामायण भी स्वतः प्रमाण हो जाती है। स्वतः प्रमाणता

642
00:44:39,520 --> 00:44:43,520
प्रमाण नहीं एवं इसी कारण से श्री रामचरित

643
00:44:43,520 --> 00:44:47,600
के विषय में इसे मूल मानकर इसके ही आलोक में अन्य राम कथाओं का अर्थ

644
00:44:47,600 --> 00:44:51,600
करना युक्ति युक्त सिद्ध होता है। अर्थात किसी भी राम कथा का ऐसा अर्थ

645
00:44:51,600 --> 00:44:55,840
निकालना जो कि वाल्मीकि रामायण के विरुद्ध

646
00:44:55,840 --> 00:44:59,920
जा रहा होगा वह वहां पर वेदों का ही खंडन मान्य होगा।

647
00:44:59,920 --> 00:45:03,920
ज्ञातव्य है कि जहां एक ओर वाल्मीकि रामायण में धर्म के

648
00:45:03,920 --> 00:45:08,080
विषय में प्रमाण मानने के निमित्त श्री राम जी के लौकिक

649
00:45:08,080 --> 00:45:12,480
मनुष्य स्वरूप को प्राथमिकता दी गई है तो वहीं दूसरी और अन्य रामायण

650
00:45:12,480 --> 00:45:16,160
राम कथाओं में उनके पारलौकिक ईश्वरीय स्वरूप को प्राप्त करने के निमित्त

651
00:45:16,160 --> 00:45:20,240
प्राथमिकता दी गई है। इसके साथ ही साथ कल्प वेद के कारण भी अन्य

652
00:45:20,240 --> 00:45:24,400
राम कथाओं की वाल्मीकि रामायण के साथ भिन्नता प्राप्त होती है।

653
00:45:24,400 --> 00:45:28,720
ऐसे में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के व्यवहार रूपी चरित्र के विषय में उनके लौकिक

654
00:45:28,720 --> 00:45:32,720
स्वरूप को प्राथमिकता से बताने वाले अपौरुषय ग्रंथ

655
00:45:32,720 --> 00:45:36,880
वाल्मीकि रामायण को प्रमाण मानते हुए श्री राम के पारलौकिक स्वरूप की प्रधानता

656
00:45:36,880 --> 00:45:40,960
से रची गई राम कथाओं में वाल्मीकि रामायण के विपरीत दिखने

657
00:45:40,960 --> 00:45:45,040
वाली घटनाओं को मनुष्य दृष्टि से ना जानकर दिव्य दृष्टि से समझना

658
00:45:45,040 --> 00:45:49,040
ही तर्कसंगत है। यहां ध्यातव्य

659
00:45:49,040 --> 00:45:53,280
है। जहां एक ओर भुसुंडी रामायण की प्रामाणिकता विद्वानों के मध्य आज

660
00:45:53,280 --> 00:45:57,360
भी शोध का विषय है। वहीं दूसरी ओर समाज में प्रभु श्री राम के

661
00:45:57,360 --> 00:46:01,840
चरित्र को नष्ट करने के निमित्त सनातन विरोधियों द्वारा दशरथ जातक,

662
00:46:01,840 --> 00:46:06,080
घट रामायण, अनामक जातक, दशरथ कथानक,

663
00:46:06,080 --> 00:46:10,160
राम की कहानी, राम की जवानी इत्यादि

664
00:46:10,160 --> 00:46:14,240
अनेक मनगढ़ंत पुस्तकों की रचना की गई है। दशरथ जातक में माता सीता को

665
00:46:14,240 --> 00:46:18,400
श्री राम जी की बहन बताते हुए उन दोनों के विवाह की कथा

666
00:46:18,400 --> 00:46:22,480
कही गई है। ऐसे में समाज में रामायण के नाम से घूम

667
00:46:22,480 --> 00:46:26,480
रही किसी भी पुस्तक द्वारा दिए जाने वाले संदिग्ध वृतांत से

668
00:46:26,480 --> 00:46:30,800
श्री राम जी को देखना किस प्रकार उचित हो सकता है?

669
00:46:30,800 --> 00:46:31,300
बहन

670
00:46:31,280 --> 00:46:36,080
मान लो सीता माता बहन है दुसर्ग जातक के अनुसार प्रभु श्री राम की

671
00:46:36,080 --> 00:46:40,240
है ना क्योंकि भाई वह किसी में छपी हुई कहानी है

672
00:46:40,240 --> 00:46:44,640
और कागज के पन्नों में हमें दिख रही है इसलिए वो ग्रंथ है और फिर उसको मान लो

673
00:46:44,640 --> 00:46:48,720
और ऐसा बना दो श्री राम के चरित्र को और ब्रह्म भाव दे दो ब्रह्म

674
00:46:48,720 --> 00:46:53,120
भाव है कुछ भी कर सकते हैं दे दो बस इसलिए करपात्री

675
00:46:53,120 --> 00:46:59,120
ने भी बुल के जैसे सनातन विरोधियों के प्रतिकार स्वरूप रचे गए अपने

676
00:46:59,360 --> 00:47:03,600
कालज ग्रंथ धर्म रामायण मीमांसा में पुसुंडी

677
00:47:03,600 --> 00:47:08,160
रामायण इत्यादि अनेक राम कथाओं का भलीभांति अवलोकन करके ही अपौरुषय

678
00:47:08,160 --> 00:47:12,240
वाल्मीकि रामायण को मूल मानकर उसी के आलोक में अन्य सभी राम कथाओं को देखने

679
00:47:12,240 --> 00:47:17,920
की बात कही है। एवं वाल्मीकि रामायण द्वारा स्थापित मर्यादा

680
00:47:17,920 --> 00:47:22,320
पुरुषोत्तम श्री राम के अनुकरणीय आदर्श चरित्र का खंडन

681
00:47:22,320 --> 00:47:26,800
खंडन करने के निमित्त लोक में प्रचलित अन्य राम कथाओं का आलंबन

682
00:47:26,800 --> 00:47:30,800
लिए जाने पर ही उन्होंने बुलके जैन जैसे विरोधियों

683
00:47:30,800 --> 00:47:35,280
का प्रतिकार करते हुए अपने ग्रंथ रामायण में मानसा के पृष्ठ संख्या

684
00:47:35,280 --> 00:47:39,280
703 में आदि रामायण को प्रमाण मानने का स्पष्ट

685
00:47:39,280 --> 00:47:43,840
प्रमाण कोटि का ग्रंथ मानने को स्पष्ट अस्वीकृत

686
00:47:43,840 --> 00:47:46,880
किया है। उन्होंने वहां कहा है तथाकथित

687
00:47:46,880 --> 00:47:51,120
कहा है जो एक बताया जाता है ना कि उन्होंने जो है यह पढ़ी

688
00:47:51,120 --> 00:47:55,200
ही नहीं थी। उन्होंने देखा ही नहीं भुसुंडी रामायण को इस तरह का आरोप लगाया

689
00:47:55,200 --> 00:47:59,200
जाता है या उन्होंने प्रमाण माना है। उन्होंने उतने ही अंशों

690
00:47:59,200 --> 00:48:04,160
को उद्रत किया है जितने अंश वाल्मीकि रामायण के संगत हैं।

691
00:48:04,160 --> 00:48:08,400
उन्होंने प्रमाण नहीं माना है कि भाई ये आपके यहां भी लिखा है। जैसे

692
00:48:08,400 --> 00:48:12,480
हम किसी बात को कहते हैं कि इतने ये जो वेदों से मैच खाने वाली

693
00:48:12,480 --> 00:48:16,640
चीजें इतनी चीज तो आपके यहां भी लिखी है। परंतु अपनी उस मान्यता को

694
00:48:16,640 --> 00:48:20,720
स्वीकार करने के लिए हम उस अमुक ग्रंथ पर आधारित नहीं

695
00:48:20,720 --> 00:48:24,800
है। हमारे पास अपनी स्वतंत्र विवेचना है। स्वतंत्र प्रमाण है। आपकी

696
00:48:24,800 --> 00:48:28,880
संतुष्टि के लिए हम आपकी जिसमें प्रमाण्य बुद्धि है उससे हम निकाल

697
00:48:28,880 --> 00:48:33,040
करके कुछ दिखा देते हैं कि भाई यह चीज तो तुम्हारे यहां भी लिखी है। इसमें तो कोई शंका होनी

698
00:48:33,040 --> 00:48:37,360
नहीं चाहिए। तो उस रूप में उन्होंने अनेकानेक जो

699
00:48:37,360 --> 00:48:41,520
राम कथाएं हैं उनके वचनों को द्रत मात्र किया है। परंतु प्रमाण कोटि

700
00:48:41,520 --> 00:48:45,760
का ग्रंथ नहीं माना उन्हें। तो वहां पर रामायण मीमांसा

701
00:48:45,760 --> 00:48:49,760
के 703 वे पृष्ठ में पढ़ लेना। आदि रामायण को उन्होंने प्रमाण के रूप

702
00:48:49,760 --> 00:48:53,920
में नहीं माना है। अच्छा देखा

703
00:48:53,920 --> 00:48:58,000
जाए तो ऐसे अनेक आगम ग्रंथ हैं जो दूसरे संप्रदाय के उपास्य देवी देवताओं

704
00:48:58,000 --> 00:49:02,320
के प्रति ब्रह्म बुद्धि रखने का निषेध करते हैं। ऐसे में सभी संप्रदाय

705
00:49:02,320 --> 00:49:06,400
द्वारा प्रमाण माने जाने वाले इस प्रकार के अह सभी

706
00:49:06,400 --> 00:49:10,480
शास्त्रों को विवेचना का आधार

707
00:49:10,480 --> 00:49:14,560
सभी शास्त्रों को विवेचना का आधार बनाने पर किस प्रकार का विप्लव हो सकता

708
00:49:14,560 --> 00:49:18,960
है? समझ रहे हैं ना? आगम शास्त्र में क्या-क्या एक दूसरे का विरोध है

709
00:49:18,960 --> 00:49:23,040
हम चलो अद्वैत संप्रदाय तो मान भी लेगा ये श्री संप्रदाय

710
00:49:23,040 --> 00:49:27,440
मद संप्रदाय ये सब कैसे मानेगा भाई खैर

711
00:49:27,440 --> 00:49:31,680
यह निर्णय पाठक गण स्वयं करें आदि रामायण को सुलभ कराने वाले लेखक

712
00:49:31,680 --> 00:49:35,680
लेखक भी प्राप्त प्रति की भूमिका के पृष्ठ संख्या 60 पर लिखते

713
00:49:35,680 --> 00:49:39,840
हैं कि आदि रामायण वैष्णवों का आगम ग्रंथ है जिसमें माधुर्य

714
00:49:39,840 --> 00:49:44,160
भाव की प्रधानता अन्य देवी देवताओं का तिरस्कार वर्णाश्रम की उपेक्षा

715
00:49:44,160 --> 00:49:48,480
एवं आचरण संबंधी नियम में नियमों में शिथिलता दिखाई गई है।

716
00:49:48,480 --> 00:49:52,480
ध्यातव्य है कि दक्ष के यज्ञ में शापितों के उद्धार हेतु शैव वैष्णव और

717
00:49:52,480 --> 00:49:56,720
सौर सा तथा गानपत्य आगमों की रचना की गई है।

718
00:49:56,720 --> 00:50:01,040
यह शास्त्र कापालिक अघोर भैरव आदि नामों से भी जाने जाते हैं।

719
00:50:01,040 --> 00:50:05,040
उनमें कहीं-कहीं वेद से विरुद्ध अंश भी है। वेद से भिन्न

720
00:50:05,040 --> 00:50:09,520
वेद यानी कि वाल्मीकि रामायण अपौरष है। वेद से भिन्न

721
00:50:09,520 --> 00:50:13,520
अर्थ को स्वीकार करने के लिए द्विज सर्वथा

722
00:50:13,520 --> 00:50:18,160
अनाधिकारी हैं। वह होते हैं जो पढ़ाते हैं। अर्थात

723
00:50:18,160 --> 00:50:22,400
वेद से भिन्न अर्थ को तो स्वीकार करना ही नहीं चाहिए। अत

724
00:50:22,400 --> 00:50:26,800
वैदिक पुरुष सभी प्रकार से प्रयत्न करके वेद का ही आश्रय लें।

725
00:50:26,800 --> 00:50:31,200
यही शाश्वत धर्म है। देवी भागवत 7 39

726
00:50:31,200 --> 00:50:35,360
28 से 33 यहां यह तथ्य स्मरणीय है कि

727
00:50:35,360 --> 00:50:39,520
कतिपय शास्त्रों के प्रति संशय पूर्ण दृष्टिकोण होने के उपरांत भी

728
00:50:39,520 --> 00:50:43,920
प्रमाणिक आचार्य आवश्यकता अनुसार अपने वक्तव्य के समर्थन में उनके

729
00:50:43,920 --> 00:50:49,520
संदर्भ प्रस्तुत करते हैं। इसका मुख्य कारण उन विशिष्ट अंशों की वेदमूलकता

730
00:50:49,520 --> 00:50:53,520
वेदों पर आधारित होना है। वही जितना अब हमारे वाल्मीकि

731
00:50:53,520 --> 00:50:57,600
रामायण से मैच खा रहा है तो इसमें तो शंका नहीं होनी चाहिए उस रूप में। अर्थात लोक

732
00:50:57,600 --> 00:51:01,680
में प्रचलित शास्त्रों के वह अंश जो स्वतः प्रमाण शास्त्रों

733
00:51:01,680 --> 00:51:06,160
के प्रतिकूल नहीं है। उनका आलंबन केवल सिद्धांत की पुष्टि और बोधगम्यता

734
00:51:06,160 --> 00:51:10,400
हेतु लिया जाता है। उदाहरण स्वरूप पूज्य करपात्री जी ने भी

735
00:51:10,400 --> 00:51:15,440
अपने ग्रंथों में आदि रामायण या अन्य

736
00:51:15,440 --> 00:51:19,520
गौण रामायणों के उद्धरण अपने पक्ष को सुदृण करने

737
00:51:19,520 --> 00:51:23,680
के लिए दिए हैं। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि वो जो पक्ष वहां सुद्रण करना चाह

738
00:51:23,680 --> 00:51:27,680
रहे हैं उसके लिए वो उन्हीं प्रमाणों पर आश्रित है ना।

739
00:51:27,680 --> 00:51:31,920
उनके पास स्वतंत्र रूप से अपने जो अपने पक्ष को पुष्ट करने हेतु पर्याप्त

740
00:51:31,920 --> 00:51:33,200
सामग्री है।

741
00:51:33,200 --> 00:51:37,280
पर लोगों की यदि अमुक अमुक ग्रंथों में

742
00:51:37,280 --> 00:51:41,520
आस्था है तो उस ग्रंथ का उतने उस

743
00:51:41,520 --> 00:51:45,520
सिद्धांत की पुष्टि के लिए जिस सिद्धांत में वो जो ग्रंथ है

744
00:51:45,520 --> 00:51:49,760
वह प्रतिकूल नहीं है। अनुकूल है। उसका उदाहरण दिया जा रहा है। तो यह बात कहना

745
00:51:49,760 --> 00:51:53,840
गलत है कि उन्होंने अपने ग्रंथ में जो है इतना इतना प्रमाण यूज़ किया

746
00:51:53,840 --> 00:51:59,120
है। पहले पूरा जान लिया करो तब बोला करो। ठीक है?

747
00:51:59,120 --> 00:52:05,120
उन्होंने इतना प्रमाण माना उतना प्रमाण माना है। खैर

748
00:52:08,080 --> 00:52:12,240
इसका आधार वेद इसका आधार उन संदर्भों की वेद

749
00:52:12,240 --> 00:52:16,720
मूलकता है। इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि वह उन्हें वाल्मीकि

750
00:52:16,720 --> 00:52:20,800
रामायण के ही समान सर्वथा प्रामाणिक स्वीकार करते हैं।

751
00:52:20,800 --> 00:52:25,280
करपात्री जी ने ऐसी अनेक राम कथाओं के प्रसंग भी उद्रत

752
00:52:25,280 --> 00:52:29,440
किए हैं जो सामान्यतः अप्रामाणिक मानी जाती है। किंतु वहां उनका आधार उस विशिष्ट

753
00:52:29,440 --> 00:52:33,760
अंश की सिद्धांत अनुकूलता है ना कि संपूर्ण ग्रंथ की प्राथमिकता।

754
00:52:33,760 --> 00:52:38,160
साथ ही यह भी स्पष्ट है कि इन बाह्य संदर्भों के अभाव में भी

755
00:52:38,160 --> 00:52:42,160
उनके पास सिद्धांतों को सिद्ध अपने सिद्धांतों को सिद्ध करने हेतु पर्याप्त

756
00:52:42,160 --> 00:52:46,480
स्वतंत्र एवं मौलिक प्रमाण उपलब्ध हैं। अथवा यदि केवल संदर्भ

757
00:52:46,480 --> 00:52:50,480
प्रस्तुत करने मात्र से कर्पात्री जी द्वारा भुसुंडी रामायण को

758
00:52:50,480 --> 00:52:54,880
प्रमाण माना जाना सिद्ध होता है तो क्या रामायण मीमांसा में

759
00:52:54,880 --> 00:52:58,880
गुण भद्रकृत जैन उत्तर पुराण का संदर्भ प्रस्तुत किए

760
00:52:58,880 --> 00:53:02,960
जाने पर करपात्री जो करपात्री जी द्वारा इस रामकथा

761
00:53:02,960 --> 00:53:06,960
को भी प्रमाण माना जाना स्वीकार किया जाएगा। जैन की जैनों

762
00:53:06,960 --> 00:53:11,040
द्वारा रचित एक पुस्तक है गुण भद्र कृत

763
00:53:11,040 --> 00:53:15,040
जैन उत्तर पुराण इसको भी स्वीकार इस आपके हिसाब से करते

764
00:53:15,040 --> 00:53:19,360
क्योंकि उन्होंने उसका वचन उद्रत कर दिया है। ध्यान रहे किसी शास्त्र को बिना पर्याप्त

765
00:53:19,360 --> 00:53:23,120
अनुसंधान के प्रमाण रूप में स्वीकार कर लेना भी उतना ही घातक है

766
00:53:23,120 --> 00:53:27,200
जितना कि बिना अनुसंधान के किसी भी प्रमाणिक शास्त्र को प्रक्षिप्त कह देना। अब

767
00:53:27,200 --> 00:53:31,680
यहां पर प्रक्षिप्त वाली बात आ रही है। यदि आर्य समाजियों द्वारा हमारे शास्त्रों को प्रक्षिप्त

768
00:53:31,680 --> 00:53:35,680
कहकर अस्वीकार करने की बात का हम विरोध करते तो इसका

769
00:53:35,680 --> 00:53:39,920
अर्थ यह बिल्कुल नहीं हो सकता कि हमें किसी भी शास्त्र को बिना पर्याप्त अनुसंधान

770
00:53:39,920 --> 00:53:44,080
के प्रामाणिक मान लेना चाहिए। यह ठीक इस प्रकार से है कि यदि वर्तमान

771
00:53:44,080 --> 00:53:48,160
में वर्तमान वातावरण में बहन भाई के विवाह को अस्वीकार किए

772
00:53:48,160 --> 00:53:52,240
जाने के कारण जनसामान्य धर्माभास की ओर आकर्षित होने लगे

773
00:53:52,240 --> 00:53:56,320
तो हम इस समस्या का निराकरण करने के लिए बहन भाई के विवाह को भी धर्म बताने

774
00:53:56,320 --> 00:54:00,320
लगे हैं। ठीक उसी प्रकार यदि प्रक्षिप्तवाद का सहारा लेकर आर्य

775
00:54:00,320 --> 00:54:04,320
समाज दुराग्रह करते तो इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं कि हम शास्त्रों

776
00:54:04,320 --> 00:54:08,480
में मिलावट किए जाने की संभावना को ही नकार दें। ऐसी ही स्थिति

777
00:54:08,480 --> 00:54:12,560
में परंपरा प्राप्त आचार्य की उपयोगिता सिद्ध होती है। इसलिए

778
00:54:12,560 --> 00:54:17,040
केवल गुरु नहीं केवल गोविंद नहीं केवल ग्रंथ नहीं

779
00:54:17,040 --> 00:54:21,280
अपितु हम सदैव गुरु गोविंद और ग्रंथ के सामंजस्य

780
00:54:21,280 --> 00:54:25,440
से धर्म के निर्णय को स्वीकार करने का समर्थन करते हैं। हमारे हर

781
00:54:25,440 --> 00:54:30,720
वीडियो के अंत में देखिएगा एक मैसेज आता है मिशन एम3जी

782
00:54:30,720 --> 00:54:36,720
मिशन गुरु गोविंद और ग्रंथ

783
00:54:36,800 --> 00:54:40,960
शबरी के अब्राहमणीय होने व श्री राम द्वारा शबरी के झूठ झूठे

784
00:54:40,960 --> 00:54:45,120
भेर खाने के समर्थन में भसुंडी रामायण का कुछ वैदिक परंपराओं

785
00:54:45,120 --> 00:54:49,280
द्वारा स्वीकार होने की बात भी कही जाती है। ऐसे में सर्वप्रथम विचारणीय

786
00:54:49,280 --> 00:54:53,360
है कि क्या किसी भी प्रामाणिक परंपरा द्वारा स्वीकार किए जाने

787
00:54:53,360 --> 00:54:57,920
पर उस शास्त्र अथवा सिद्धांत को निर्विवाद रूप से सभी परंपराओं

788
00:54:57,920 --> 00:55:01,920
द्वारा स्वीकार किया जाना आवश्यक है। अब यह

789
00:55:01,920 --> 00:55:05,920
जो बात कुछ कह रहा है कि उसको अमुक परंपरा ने जो है स्वीकार कर रखा है। इसलिए

790
00:55:05,920 --> 00:55:10,160
उसको निर्वाद रूप से स्वीकार कर लो। गुरु गोविंद और ग्रंथ केवल

791
00:55:10,160 --> 00:55:14,640
ग्रंथ नहीं केवल गुरु नहीं केवल गोविंद नहीं। इस बात को

792
00:55:14,640 --> 00:55:19,280
समझो कि इसका अर्थ क्या है। ठीक है?

793
00:55:19,280 --> 00:55:23,280
चलिए। अब केवल यहां पर किसी परंपरा के

794
00:55:23,280 --> 00:55:27,760
द्वारा उसको स्वीकार किए जाने पर केवल ग्रंथ की बात आ रही है कि केवल जो है

795
00:55:27,760 --> 00:55:31,760
वहां पर जो है गुरु के कारण हम ले लें। क्योंकि गुरु ने उसको स्वीकार किया इसलिए हम ले

796
00:55:31,760 --> 00:55:35,840
लें। भाई जो वाल्मीकि रामायण है जो अपुषय ग्रंथ है उसके

797
00:55:35,840 --> 00:55:39,920
विपरीत यदि भुसुमंडी रामायण के घटनाक्रम जा रहे हैं तो

798
00:55:39,920 --> 00:55:44,000
या तो उन घटनाक्रमों को का अर्थ ऐसा प्रकट करिए जो

799
00:55:44,000 --> 00:55:48,000
वाल्मीकि रामायण के समर्थन में हो। अन्यथा किस प्रकार से उसको स्वीकार

800
00:55:48,000 --> 00:55:51,280
किया जाएगा।

801
00:55:51,280 --> 00:55:55,280
जब पद्म पुराण में वाक्य आता है कि

802
00:55:55,280 --> 00:55:59,360
भैया विष्णु की ही भक्ति हो और अन्य सब

803
00:55:59,360 --> 00:56:03,440
भी कुछ है तो वहां पर उनका अर्थ लेते हैं ना अनंतता में वेदों की रक्षा के

804
00:56:03,440 --> 00:56:07,440
लिए भैया यहां पर अनंता के लिए कह दिया

805
00:56:07,440 --> 00:56:11,440
और वहां पर जो जो अर्थ वो ले रहे होते हैं वैष्णव

806
00:56:11,440 --> 00:56:15,600
वो तो हम नहीं लेते हैं हम ये कहां का

807
00:56:15,600 --> 00:56:19,760
क्या मजाक है क्या वास्तविकता में प्रश्न उत्तर के योग्य है किसी

808
00:56:19,760 --> 00:56:24,080
परंपरा द्वारा स्वीकार किए जाने पर वह ग्रंथ उक्त परंपरा के लिए मान्य हो सकता है।

809
00:56:24,080 --> 00:56:28,320
उसके स्वमत की पुष्टि हेतु हो सकता है। परंतु सार्वभौम रूप से किसी ग्रंथ

810
00:56:28,320 --> 00:56:32,640
को स्वीकार करने के लिए तर्क और प्रमाण दोनों की ही आवश्यकता होती है।

811
00:56:32,640 --> 00:56:36,880
अब विचार करें यदि इस सिद्धांत को अपना लिया जाए तो श्वेतासत्रपनिषद

812
00:56:36,880 --> 00:56:41,520
में तीसरे अध्याय के दूसरे मंत्र में और भी आगे यजुर्वेद

813
00:56:41,520 --> 00:56:45,760
सोलवा अध्याय दूसरा मंत्र इत्यादि श्रुतियों

814
00:56:45,760 --> 00:56:49,920
श्रुतियों में भगवान शिव को परम तत्व

815
00:56:49,920 --> 00:56:54,080
कहे जाने वाले वचनों को वैष्णव परंपराओं द्वारा विष्णु परक बताया

816
00:56:54,080 --> 00:56:58,320
जाता है। यह किस किस आधार पर स्वीकार किया जाएगा भाई? क्यों?

817
00:56:58,320 --> 00:57:02,480
एज इट इज मानो। क्यों वहां पे उसको विष्णु परख कर दे रहे हो? जहां श्रुति और श्रुति

818
00:57:02,480 --> 00:57:06,560
शास्त्रों में भगवान शिव को परम तत्व कहा गया है। हम रामानुज

819
00:57:06,560 --> 00:57:10,560
संप्रदाय के प्रामाणिक आचार्य गोविंद राज भूषण द्वारा रामायण के भाष्य में युद्ध

820
00:57:10,560 --> 00:57:15,680
कांड के अंतर्गत 126 वे अध्याय के

821
00:57:15,680 --> 00:57:19,680
126व सर्ग के 23वें श्लोक में पृष्ठ संख्या भी

822
00:57:19,680 --> 00:57:24,640
बता रहा हूं। 438 468 महादेव

823
00:57:24,640 --> 00:57:28,720
जो है वहां पर महादेव उन्होंने समुद्र को कह दिया। वह जो समुद्र

824
00:57:28,720 --> 00:57:32,800
पूजन हुआ है ना वहां पर शिवलिंग का पूजन महादेव का पूजन

825
00:57:32,800 --> 00:57:36,800
वहां उन्होंने महादेव का पूजन बता दिया वह तो समुद्र का पूजन

826
00:57:36,800 --> 00:57:40,880
किया है रुद्र का पूजन नहीं किया है स्पष्ट लिखा उन्होंने रुद्र का पूजन नहीं है वहां शिव

827
00:57:40,880 --> 00:57:44,880
जी का पूजन नहीं है मान ले इस बात को और उन्होंने क्यों नहीं

828
00:57:44,880 --> 00:57:50,240
माना एज इट इज हम उन्होंने क्यों नहीं माना

829
00:57:50,240 --> 00:57:54,320
अर्थात श्री राम ने रामेश्वरम में भगवान शिव की पूजा नहीं की थी बल्कि समुद्र देव

830
00:57:54,320 --> 00:57:58,320
की पूजा की थी यह गोविंद जी लिख रहे हैं क्या

831
00:57:58,320 --> 00:58:02,480
यह सभी परंपराओं द्वारा स्वीकार करने योग्य सिद्धांत है? और

832
00:58:02,480 --> 00:58:07,600
सबसे बड़ी बात कि उन्होंने क्यों नहीं स्वीकार किया राम के द्वारा शिव को पूजित होना?

833
00:58:07,600 --> 00:58:11,600
यही नहीं तथाकथित स्वगोचित स्वप्न सिद्ध आचार्य कर्मणा

834
00:58:11,600 --> 00:58:15,920
जगतगुरु भागवतानंद द्वारा आदिका प्रस्तुत

835
00:58:15,920 --> 00:58:20,160
किया जाने वाला शाक्त संप्रदाय का आगम शास्त्र वही वो भी

836
00:58:20,160 --> 00:58:21,760
उसमें बात की ना हमने देवी

837
00:58:21,760 --> 00:58:26,400
भागवत में क्या लिखा है शक्ति संगम तंत्र है जिसमें छिन मस्ता खंड

838
00:58:26,400 --> 00:58:30,480
तृतीय पटल में मंत्र जाप की ऐसी अनेक विधियां दी गई है

839
00:58:30,480 --> 00:58:35,040
जिन्हें श्री संप्रदाय कभी स्वीकार नहीं करेगा। क्यों भैया? भागवतानंद

840
00:58:35,040 --> 00:58:39,200
तो स्वीकार कर रहा है ना। तो स्वीकार कर ले श्री संप्रदाय वाले वहां

841
00:58:39,200 --> 00:58:43,680
पे अलग-अलग तरीके से मंत्र जाप दिखाया है कि रजसला स्त्री के अह

842
00:58:43,680 --> 00:58:47,920
इस तरह से जीवा ये करके और उसको तो बोलने भी असहज

843
00:58:47,920 --> 00:58:52,240
है। खैर आप लोग खुद ही पढ़ें। चिन्मस्ता खंड तृतीय पटल

844
00:58:52,240 --> 00:58:56,400
हम वहां देखें किस-किस तरीके से मंत्र जाप करना है जिससे मुक्ति हो जाएगी

845
00:58:56,400 --> 00:59:00,480
कल्याण हो जाएगा तो स्वीकार कर लो भागवतानंद की जो

846
00:59:00,480 --> 00:59:04,560
स्वप्न निर्मित परंपरा है ना उसको स्वीकार कर लो सब लोग और वही

847
00:59:04,560 --> 00:59:10,560
कार्य करो जो उसमें लिखा हुआ है शक्ति संगम तंत्र में

848
00:59:12,480 --> 00:59:16,480
क्या उपरोक्त सिद्धांत के अनुसार इन अंशों में प्रत्येक वैष्णव

849
00:59:16,480 --> 00:59:20,480
संप्रदाय को भी अशास्त्रीय कहा जाएगा? जो इस तरह से

850
00:59:20,480 --> 00:59:24,800
विष्णु विष्णु शिव जी के लिए जो द्रत जो वचन है उनको विष्णु परक

851
00:59:24,800 --> 00:59:28,880
कर लिया और जो यह महादेव बता दिया समुद्र को तो क्या इनको

852
00:59:28,880 --> 00:59:32,880
अशास्त्री कहा जाएगा जबकि वो वहां तो उनका शास्त्र के

853
00:59:32,880 --> 00:59:37,120
विपरीत जाना स्पष्ट दिखाई दे रहा है फिर भी

854
00:59:37,120 --> 00:59:41,200
क्या इनको अशास्त्रीय कहा जा रहा है और यदि कहा जा रहा है तो

855
00:59:41,200 --> 00:59:46,560
फिर काहे की रामानुज परंपरा श्री संप्रदाय कैसे होगा हम

856
00:59:46,560 --> 00:59:48,800
खैर

857
00:59:48,800 --> 00:59:53,120
अंतत गतवा भसुंडी रामायण तो दूर सार्वभौम रूप से स्वीकार्य आनंद

858
00:59:53,120 --> 00:59:57,120
रामायण में श्री राम और सीता को भगवान शिव और पार्वती का अवतार बताया

859
00:59:57,120 --> 01:00:01,120
गया है आनंद रामायण में हम बिना किसी

860
01:00:01,120 --> 01:00:05,200
लाग लपेट के शास्त्र की इस पंक्ति को कौन सा वैष्णव संप्रदाय स्वीकार

861
01:00:05,200 --> 01:00:09,200
करता है मुझे बता दें आनंद रामायण में दुर्गा माता

862
01:00:09,200 --> 01:00:13,360
कह रही हैं कि सीता में सीता के रूप में मैं हूं और राम के

863
01:00:13,360 --> 01:00:17,360
रूप में महादेव है और हम दोनों में जो और इनमें जो भेद

864
01:00:17,360 --> 01:00:21,360
भेद करता है। वह नरकगामी है। देखो क्या लिखा है। मैं ही सीता

865
01:00:21,360 --> 01:00:25,520
हूं। राम साक्षात शिव है और हम में और सीता में

866
01:00:25,520 --> 01:00:27,760
राम में तथा शिव में भेद

867
01:00:27,760 --> 01:00:31,760
मानते हैं। जो लोग वह करोड़ों जन्म पर्यंत रॉक नरक

868
01:00:31,760 --> 01:00:36,480
में सड़ते हैं। आनंद रामायण मनोहर कांड 12वा अध्याय

869
01:00:36,480 --> 01:00:40,640
12वा सर्ग 26 से 28वा श्लोक अद्वैतवादी

870
01:00:40,640 --> 01:00:46,640
शंकर संप्रदाय के विपरीत यह किस वैष्णव संप्रदाय द्वारा स्वीकार किया जाएगा?

871
01:00:47,280 --> 01:00:51,280
तो इसीलिए कहता हूं मत पड़ो चक्कर में कोई है नहीं टक्कर में

872
01:00:51,280 --> 01:00:55,440
खामखा का पड़ी लकड़ी मोल ले ली

873
01:00:55,440 --> 01:00:59,920
इसी क्रम में जहां एक और मलूक पीठाधीश्वर राजेंद्र दास जी

874
01:00:59,920 --> 01:01:04,000
भी अपने एक वक्तव्य में कहते हैं कि भक्तमाल प्रमाण कोटि

875
01:01:04,000 --> 01:01:08,080
का ग्रंथ नहीं है। राजेंद्र दास जी देखिए सहज सहजता से बात को

876
01:01:08,080 --> 01:01:12,320
प्रस्तुत कर दिया। अपने मत की पुष्टि में तो उन

877
01:01:12,320 --> 01:01:16,720
ग्रंथों का अध्ययन है परंतु प्रमाण कोटि का ग्रंथ नहीं है। वहीं दूसरी

878
01:01:16,720 --> 01:01:21,120
ओर अखंडानंद सरस्वती जी महाराज की बात की जाती है कि भैया उन्होंने शबरी को शूद्रा

879
01:01:21,120 --> 01:01:25,200
कह दिया। तो अखंडानंद सरस्वती जी भी समाज में शबरी को

880
01:01:25,200 --> 01:01:29,440
लेकर व्याप्त धारणा के अनुसार प्रवचन तो करते हैं। किया होगा।

881
01:01:29,440 --> 01:01:33,520
बिल्कुल परंतु धर्म और अधर्म के विषय में करपात्री

882
01:01:33,520 --> 01:01:37,680
जी को ही निर्णायक घोषित करते हुए अपनी वाणी को उन्होंने उस अंश में प्रमाण

883
01:01:37,680 --> 01:01:42,000
कोटि का नहीं कहा है। समाज में व्याप्त जो धारणाएं

884
01:01:42,000 --> 01:01:42,960
हैं उनके अनुसार

885
01:01:42,960 --> 01:01:46,960
यदि हमने किसी सिद्धांत को किसी प्रवचन में कहीं पर बोला है तो

886
01:01:46,960 --> 01:01:51,280
उससे हमारा उसको प्रमाण के रूप में ही स्वीकार करना सिद्ध नहीं होता है।

887
01:01:51,280 --> 01:01:55,360
उन्होंने यह भी बोला है कि धर्म और अधर्म के विषय में करपात्री जी ही उनके

888
01:01:55,360 --> 01:01:59,760
निर्णायक हैं। एक नाम हमारे मन में

889
01:01:59,760 --> 01:02:03,760
लौट के आ गया फिर श्री कृपात्री जी महाराज

890
01:02:03,760 --> 01:02:09,520
से मेरा परिचय

891
01:02:09,520 --> 01:02:13,600
सन 42 से ही जब मैंने दंड ग्रहण किया था मुझे याद

892
01:02:13,600 --> 01:02:17,920
है कि मैं हरिद्वार से चल के वृंदावन

893
01:02:17,920 --> 01:02:23,440
पैदल आया तो रास्ते में मेरठ में उनका यज्ञ हो रहा था

894
01:02:23,440 --> 01:02:27,520
तो वहां गया था और उनके सत्संग

895
01:02:27,520 --> 01:02:31,680
से जो नारायण

896
01:02:31,680 --> 01:02:36,160
धर्म पर, वेद पर, शास्त्र पर, वेदांत पर, अद्वैत

897
01:02:36,160 --> 01:02:40,480
पर जो श्रद्धा और अनुभूति की

898
01:02:40,480 --> 01:02:44,800
स्पष्टता हुई है। उसके लिए मैं उनका

899
01:02:44,800 --> 01:02:48,960
कृतज्ञ हूं। और नारायण

900
01:02:48,960 --> 01:02:53,680
और भी हमारे क्या क्या बताएं। निश्चनंद

901
01:02:53,680 --> 01:02:58,960
जी महाराज हमको रोज वेदांत सुनाते हैं। उपनिषद

902
01:02:58,960 --> 01:03:03,200
उपनिषदों का सार तो हमको ऐसा लगता है कि स्वामी

903
01:03:03,200 --> 01:03:07,280
जी महाराज श्री कृपात्री जी महाराज ही उनके रूप में बैठकर के हमको

904
01:03:07,280 --> 01:03:10,160
सुना रहे हैं।

905
01:03:10,160 --> 01:03:15,120
तो उनको निर्णायक घोषित करते हुए उन्होंने यह घोषणा

906
01:03:15,120 --> 01:03:19,440
इन शब्दों में अप्रत्यक्ष रूप से घोषणा की है कि उनके किसी भी वक्तव्य को कर्पात्री

907
01:03:19,440 --> 01:03:23,680
जी जैसे वाल्मीकि रामायण के आलोक में अन्य रामायणों को देखा जाएगा। ऐसे

908
01:03:23,680 --> 01:03:27,680
ही अखंडानंद सरस्वती जी महाराज जब स्वयं अपना

909
01:03:27,680 --> 01:03:31,760
निर्णायक करपात्री जी को घोषित कर रहे हैं तो कर्पात्री जी के आलोक में उनके किसी वचन

910
01:03:31,760 --> 01:03:35,760
को स्वीकार अथवा अस्वीकार किया जाएगा। अथवा उनके अर्थ को

911
01:03:35,760 --> 01:03:39,760
कर्पात्री जी के आलोक में लिया जाएगा। तो उनके किसी

912
01:03:39,760 --> 01:03:44,000
भी वक्तव्य को करपात्री जी महाराज अथवा सांकर परंपरा की निर्णायक गद्दी गद्दी

913
01:03:44,000 --> 01:03:48,800
पर विराजमान शंकराचार्य जी के आलोक में ही स्वीकार किया जाएगा।

914
01:03:48,800 --> 01:03:53,120
अंतत कथवा एक ही प्रश्न जिस ग्रंथ की प्रामाणिकता आज भी

915
01:03:53,120 --> 01:03:57,600
संशय का विषय है। ऐसी भुसुंडी रामायण में स्वतः प्रमाण

916
01:03:57,600 --> 01:04:01,600
वेद के अवतार अपरुषय ग्रंथ वाल्मीकि रामायण के विपरीत

917
01:04:01,600 --> 01:04:06,080
कहे गए कुछ वचनों के आधार पर मर्यादा पुरुषोत्तम सत्य प्रतिज्ञ

918
01:04:06,080 --> 01:04:10,560
श्री राम के आचरण को ब्रह्मभाव के नाम पर विधि बहाय

919
01:04:10,560 --> 01:04:14,160
सिद्ध कर उन्हें वचन से विमुख हो जाने वाला मानकर उनमें

920
01:04:14,160 --> 01:04:18,480
दोष दृष्टि रखना परंतु वहीं तुलनात्मक रूप से काक भुसुंडी के अज्ञात

921
01:04:18,480 --> 01:04:22,800
रचनाकार के प्रति प्रमाण बुद्धि रखना ये किस प्रकार से धर्म

922
01:04:22,800 --> 01:04:28,720
संगत है बिल्कुल धर्म संगत सिद्ध नहीं होता।

923
01:04:28,720 --> 01:04:33,520
अब आता है छठवां अध्याय अपया दीक्षित

924
01:04:33,520 --> 01:04:37,760
जी के विषय में शंका समाधान। शंकर अब पूर्व पक्ष क्या है? शंकर

925
01:04:37,760 --> 01:04:41,840
परंपरा के ही मान्य आचार्य अपय दीक्षित जी ने उनके ब्रह्मसूत्र

926
01:04:41,840 --> 01:04:46,000
भाष्य में सबरी को शूद्र ही माना है। इसके लिए उन्होंने श्लोक

927
01:04:46,000 --> 01:04:50,000
प्रस्तुत किया है। कहां का? विष्णु धर्म पुराण का। उस श्लोक का अर्थ है धर्मव्याद

928
01:04:50,000 --> 01:04:54,240
आदि अन्यों ने भी घणित निम्न योनि में होकर

929
01:04:54,240 --> 01:04:58,480
पूर्व के अभ्यास से वैसे ही सिद्धि प्राप्त की जैसे श्रमणी शबरी

930
01:04:58,480 --> 01:05:02,640
ने प्राप्त की थी। ठीक है? सर्वप्रथम तो हम यही कहेंगे कि अनुसंधान

931
01:05:02,640 --> 01:05:06,800
की परिधि में ना आकर यह प्रश्न किसी विकृत मानसिकता वाले व्यक्ति की

932
01:05:06,800 --> 01:05:10,960
संकीर्ण सोच को ही प्रकट करता है और वस्तुतः यह अत्यंत

933
01:05:10,960 --> 01:05:15,280
हास्यपूर्ण है। क्यों है हास्यपूर्ण? कतिपय दिवस पूर्व रामानुज

934
01:05:15,280 --> 01:05:19,280
संप्रदाय के प्रतिष्ठित आचार्य विद्या भास्कर जी ने एक चलचित्र के

935
01:05:19,280 --> 01:05:23,600
माध्यम से शूद्र वर्ण शूद्र वर्ण के आचार्यत्व के समर्थन

936
01:05:23,600 --> 01:05:28,080
में अपना वक्तव्य निर्गत किया था। अभी वीडियो लगा देते कि भाई चरण

937
01:05:28,080 --> 01:05:29,280
चरण में मस्तक

938
01:05:29,280 --> 01:05:33,520
झुकता है मस्तक ब्राह्मण है ब्राह्मणों से मुख मासी बाहु

939
01:05:33,520 --> 01:05:38,400
राज्याद्रो

940
01:05:38,400 --> 01:05:42,400
तो कितनी गहरी बात भाई रस तो है जहां

941
01:05:42,400 --> 01:05:46,720
दास रस है भक्ति रस है वही तो ज्यादा रस मिलता है

942
01:05:46,720 --> 01:05:51,040
और संकल्प में शूद्र के लिए दासोहम के साथ शर्मा

943
01:05:51,040 --> 01:05:55,200
वर्माहम गुप्तोहम दासोहम जब कहते हैं तो

944
01:05:55,200 --> 01:05:59,600
ये अनुभव हमारा जो दासोम कहना है वह तो औपाधिक

945
01:05:59,600 --> 01:06:03,840
होगा लेकिन वहां दासोम वास्तविक है इसीलिए

946
01:06:03,840 --> 01:06:07,840
हम उनको अपने आचार्य के रूप में स्वीकार करते हैं

947
01:06:07,840 --> 01:06:12,240
और कहते हैं महाराज जी आप हमारे यहां चरण पधरा दे।

948
01:06:12,240 --> 01:06:16,400
इस वीडियो के अनुसार जब इस वीडियो को देखने के बाद तार्किक

949
01:06:16,400 --> 01:06:20,720
दृष्टि से यह अनुमानित है कि उनका मंतव्य केवल शूद्र वर्ण से मार्गदर्शन

950
01:06:20,720 --> 01:06:25,120
प्राप्त करने तक ही सीमित रहा होगा। हम अपनी ओर से आकलन

951
01:06:25,120 --> 01:06:29,120
कर रहे हैं। नहीं तो भागवतानंद यदि द्वेषी हो जाए। है

952
01:06:29,120 --> 01:06:33,360
ना? अभी फिलहाल ठीक चल रहा है। मगर यदि जैसे मुक्तेश्वरानंद

953
01:06:33,360 --> 01:06:37,440
जी के विपरीत गया समय आने पर जैसे पूरी पीठ के विपरीत गया समय समय आने पर

954
01:06:37,440 --> 01:06:42,000
जैसे पीएन मिश्र के विपरीत गया समय आने पर जैसे

955
01:06:42,000 --> 01:06:44,560
संदीप

956
01:06:44,560 --> 01:06:45,060
क्या

957
01:06:44,800 --> 01:06:50,000
कहते हैं? संदीप जी के विपरीत गया समय आने पर। ऐसे ही

958
01:06:50,000 --> 01:06:54,000
किसी दिन जब यह विद्या भास्कर जी के विरुद्ध जाएगा तो

959
01:06:54,000 --> 01:06:58,160
उनके ऐसे ही वक्तव्यों का खूब चौआ उड़ाएगा। अरे वह तो शूद्र

960
01:06:58,160 --> 01:07:02,080
को जो है आचार्य बनाने की बात करते हैं।

961
01:07:02,080 --> 01:07:06,080
हम यहां पर अनुमानित अपनी ओर से ही कह रहे हैं कि भाई वहां पर

962
01:07:06,080 --> 01:07:10,800
जो है शूद्रों के महिमा मंडन में कह दिया है। परंतु

963
01:07:10,800 --> 01:07:15,920
वो वाक्य भी उसी तरह से प्रमाण कोटि का नहीं है जैसे कि अखंडानंद जी का वो वाक्य।

964
01:07:15,920 --> 01:07:20,000
शूद्र को आचार बनाया जाना चाहिए। यह वाक्य है इनका विद्या भास्कर जी

965
01:07:20,000 --> 01:07:24,400
का। तो अब इसका क्या अर्थ लिया जाए कि उन्होंने शूद्र को केवल

966
01:07:24,400 --> 01:07:28,560
व्यास गद्दी पर बैठने की बात नहीं कही है। उन्होंने शूद्र के द्वारा मार्गदर्शन इत्यादि

967
01:07:28,560 --> 01:07:32,880
की बात कही है। इस इसके

968
01:07:32,880 --> 01:07:36,960
इस अर्थ में उनके उस वक्तव्य का अर्थ

969
01:07:36,960 --> 01:07:41,440
लेना चाहिए। तो

970
01:07:41,440 --> 01:07:45,760
ना कि ना कि उन्होंने शूद्र को शास्त्रीय व्यासपीठ

971
01:07:45,760 --> 01:07:50,000
अथवा प्रामाणिक आचार्य पद पर प्रतिष्ठित करने की बात कही है। किंतु

972
01:07:50,000 --> 01:07:54,320
उनकी अनुपस्थिति में अब विद्यास्कर जी महाराज की अनुपस्थिति में

973
01:07:54,320 --> 01:07:58,480
उनके इस कथन का अनर्थ करते हुए यह निष्कर्ष सरलता से निकाला

974
01:07:58,480 --> 01:08:02,480
जा सकता है कि वे आर्य समाज या इस्कॉन की ही भांति वर्णाश्रम धर्म के

975
01:08:02,480 --> 01:08:06,480
विरोधी हैं। ठीक है? तो अगर

976
01:08:06,480 --> 01:08:10,640
वह यहां पर नहीं है तो उनके इस वाक्य का यह अर्थ भी निकाला जा सकता

977
01:08:10,640 --> 01:08:14,720
है। तो क्यों ना निकाला जाए? अगर अपया दीक्षित जी नहीं है तो

978
01:08:14,720 --> 01:08:19,520
उनका अर्थ जो है कोई भी कुछ भी निकाल सकता है। तो उनके

979
01:08:19,520 --> 01:08:23,600
यदि विद्या भास्कर जी महाराज नहीं है तो उनके कहे हुए वचन का अर्थ कोई भी कुछ भी

980
01:08:23,600 --> 01:08:28,880
निकाल सकता है। ऐसे नहीं है ना। परंपरा की आवश्यकता क्या है भाई?

981
01:08:28,880 --> 01:08:33,440
मैं समझ सकता हूं कि श्री संप्रदाय वाले तो कम से कम यह समझ रहे होंगे। भागवतानंदी

982
01:08:33,440 --> 01:08:38,080
तो नहीं समझेंगे। हां तो क्या है

983
01:08:38,080 --> 01:08:42,080
कि इस प्रकार की व्याख्याओं के प्रसार से पूर्व यह गहन

984
01:08:42,080 --> 01:08:46,080
अनुसंधान अनिवार्य है कि वक्तव्य की व्याख्या करने वाला व्यक्ति

985
01:08:46,080 --> 01:08:50,080
संबंधित आचार्य का प्रामाणिक प्रतिनिधि अथवा शिष्य है कि नहीं

986
01:08:50,080 --> 01:08:55,040
यहीं पर काम आती परंपरा कि अपया दीक्षित ने क्या बताए मैं बताऊंगा

987
01:08:55,040 --> 01:08:56,560
विद्या भास्कर जी महाराज ने क्या

988
01:08:56,560 --> 01:09:00,560
बताए उनका प्रामाणिक शिष्य बताएगा उनके

989
01:09:00,560 --> 01:09:04,560
वक्तव्य का अर्थ करने का अधिकार उनके प्रामाणिक परंप परंपरा

990
01:09:04,560 --> 01:09:10,560
से प्रामाणिक शिष्य को है। ठीक है?

991
01:09:12,880 --> 01:09:15,200
खैर

992
01:09:15,200 --> 01:09:19,280
अन्यथा अन्यथा कोई भी व्यक्ति किसी के भी कथनों का कुतर्क पूर्ण

993
01:09:19,280 --> 01:09:23,280
अर्थ निकालने हेतु स्वतंत्र हो जाएगा। ठीक इसी प्रकार अपया दीक्षित

994
01:09:23,280 --> 01:09:27,440
जी से प्रत्यक्ष अथवा प्रामाणिक रूप से संबद्ध ना होने पर भी उनके संदर्भ

995
01:09:27,440 --> 01:09:31,920
के आधार पर उनके निष्ठावान शिष्यों की प्रामाणिकता पर प्रश्न चिन्ह लगाना

996
01:09:31,920 --> 01:09:36,240
प्रश्न चिन्ह लगाना। किस प्रकार से उचित है? सर्वथा अनुचित है। शबरी

997
01:09:36,240 --> 01:09:40,720
जी को भेलने तो अप दीक्षित जी ने भी माना था। तो आप ही के पूर्वचार्य इससे

998
01:09:40,720 --> 01:09:44,880
अब फिर वही बात है। उन्होंने क्या कहा आपको कैसे पता चला? क्योंकि उनके ग्रंथों में ही बात लिखी हुई। अरे

999
01:09:44,880 --> 01:09:48,880
भाई उनके ग्रंथों का अर्थ आपको कौन देगा? ग्रंथ कौन देगा आपको? परंपरा

1000
01:09:48,880 --> 01:09:52,880
ना। सत्य तो यह है कि जिस विषय के बोध हेतु कोई पक्ष

1001
01:09:52,880 --> 01:09:57,120
पूर्णतः शंकर परंपरा की शंकर परंपरा उसकी निर्णायक शंकराचार्य

1002
01:09:57,120 --> 01:10:01,680
पीठ पर ही आश्रित है। उसी विषय में शंकराचार्य द्वारा प्रदत्त्य

1003
01:10:01,680 --> 01:10:05,760
वक्तव्यों के अर्थ को संदिग्ध सिद्ध करने का प्रयास नितांत

1004
01:10:05,760 --> 01:10:10,560
तर्कहीन और व्याघात पूर्ण है।

1005
01:10:10,560 --> 01:10:11,680
विष्णु धर्म पुराण के

1006
01:10:11,680 --> 01:10:15,920
संदर्भित प्रकरण में ना तो सोनक ऋषि ने शबरी का परीक्षण कर उन्हें शूद्र घोषित

1007
01:10:15,920 --> 01:10:19,920
किया है और ना ही आचार्य अप दीक्षित ने अपने अनुसंधान

1008
01:10:19,920 --> 01:10:24,000
द्वारा उनके शूद्र होने की पुष्टि की है। इस विषय में वस्तु

1009
01:10:24,000 --> 01:10:28,480
स्थिति निम्नलिखित है। क्या है? सोनक ऋषि का दृष्टिकोण

1010
01:10:28,480 --> 01:10:32,560
क्या था? विष्णु धर्म पुराण के इस अंश में सोनक ऋषि योग

1011
01:10:32,560 --> 01:10:36,640
की महिमा का प्रतिपादन कर रहे हैं। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि पूर्व जन्म के

1012
01:10:36,640 --> 01:10:40,640
अभ्यासों के कारण धर्मव्याध जैसे अल्प वर्ण के मनुष्यों को

1013
01:10:40,640 --> 01:10:44,800
भी परम सिद्धि प्राप्त हो गई। दृष्टांत क्या है? औचित्य

1014
01:10:44,800 --> 01:10:48,960
क्या था? यहां शबरी जी की तुलना धर्म व्याध से करने मा करने

1015
01:10:48,960 --> 01:10:52,960
का एकमात्र तर्कसंगत कारण परलोक गमन के दृश्य

1016
01:10:52,960 --> 01:10:57,200
का चित्रांकन है। जो शबरी जी ने जो परलोक गमन

1017
01:10:57,200 --> 01:11:01,200
की यात्रा की थी वो चित्र वो चित्रण वहां पर दिया गया है कि वो कैसे उस

1018
01:11:01,200 --> 01:11:05,280
समय का दृश्य क्या था। शास्त्रों में शबरी जी के परधाम गमन

1019
01:11:05,280 --> 01:11:09,840
के समय उनकी देह और वातावरण की दिव्यता का विस्तृत वर्णन

1020
01:11:09,840 --> 01:11:14,080
उपलब्ध है। तो यहां जो सोनक ऋषि जी ने उपयोग किया

1021
01:11:14,080 --> 01:11:18,080
है धर्मव्याध के लिए शबरी जी का उदाहरण वो इसलिए किया है

1022
01:11:18,080 --> 01:11:22,160
कि वह समझा रहे हैं कि योग वाले को मुक्ति मिलती है तो दृश्य कैसा होता है कि

1023
01:11:22,160 --> 01:11:26,160
शबरी जी जैसा होता है। यह नहीं कि धर्मव्याध क्योंकि शूद्र था तो

1024
01:11:26,160 --> 01:11:27,040
शबरी भी शूद्र

1025
01:11:27,040 --> 01:11:31,360
थी। वहां योग की महिमा बताते समय योग से मिलने वाले

1026
01:11:31,360 --> 01:11:35,680
फल को का चित्रण बताने के लिए उन्होंने शबरी जी का उपयोग किया।

1027
01:11:35,680 --> 01:11:40,160
कैसे? क्या हुआ था? तो शबरी जी के बारे में वाल्मीकि रामायण

1028
01:11:40,160 --> 01:11:44,160
तीन 74 32 से 34 में आया है। श्री राम के इस प्रकार आज्ञा देने

1029
01:11:44,160 --> 01:11:48,240
पर मस्तक पर जटा और शरीर पर चीर एवं काला

1030
01:11:48,240 --> 01:11:52,400
मृग चर्म धारण करने वाली शबरी ने आग में अपने को

1031
01:11:52,400 --> 01:11:56,720
होम कर प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी स्वरी शरीर प्राप्त

1032
01:11:56,720 --> 01:12:00,800
कर लिया। वह दिव्य वस्त्र दिव्य आभूषण दिव्य फूलों

1033
01:12:00,800 --> 01:12:04,960
की माला और दिव्य अनुपन धारण किए हुए दिखाई देने लगी

1034
01:12:04,960 --> 01:12:09,040
तथा सुदामा सुदाम पर्वत पर प्रकट होने

1035
01:12:09,040 --> 01:12:13,440
वाली बिजली के समान उस प्रदेश को प्रकाशित करती हुई

1036
01:12:13,440 --> 01:12:17,520
स्वर्ग लोक चली गई। तो यह जो चित्रण है यह दिखाना

1037
01:12:17,520 --> 01:12:21,520
विष्णु धर्म पुराण के अनुसार वहां पर सोनक जी के द्वारा

1038
01:12:21,520 --> 01:12:25,680
जो है धर्मव्याद के लिए उदाहरण प्रस्तुत किया कि धर्मव्याद को मुक्ति

1039
01:12:25,680 --> 01:12:29,840
मिली थी तो कैसा दृश्य था? तो ऐसा दृश्य था। इस रूप में शबरी

1040
01:12:29,840 --> 01:12:33,920
जी का नाम वहां पर लिया गया। ना कि इस रूप में कि क्योंकि वो शूद्र

1041
01:12:33,920 --> 01:12:37,920
था। वो हीन जाति में जन्मा था तो शबरी भी हीन जाति में जन्म करके मुक्ति

1042
01:12:37,920 --> 01:12:42,000
को प्राप्त हो गई। अतः धर्म की धर्मव्याद की वैसी ही अलौकिक

1043
01:12:42,000 --> 01:12:42,500
सद्गति

1044
01:12:42,480 --> 01:12:46,640
को श्रोताओं के समक्ष स्पष्ट रूप से दृश्यमान करने के निमित्त

1045
01:12:46,640 --> 01:12:50,720
ही शबरी जी का उदाहरण सोनक ऋषि जी ने लिया है। अब निष्कर्ष क्या

1046
01:12:50,720 --> 01:12:54,800
है? स्पष्ट है कि यहां शबरी जी का संदर्भ उनकी जाति के निर्धारण हेतु नहीं।

1047
01:12:54,800 --> 01:12:58,880
अबितु उनकी सिद्धि की विलक्षणता को दर्शाने के लिए किया गया है। ना

1048
01:12:58,880 --> 01:13:02,880
तो सोनक ऋषि का और ना ही अपया दीक्षित का उद्देश्य

1049
01:13:02,880 --> 01:13:07,600
शबरी जी के वर्ण पर कोई निर्णय देना था। अपया

1050
01:13:07,600 --> 01:13:13,040
दीक्षित को अपने भाष्य में यह बताना था कि

1051
01:13:13,040 --> 01:13:18,240
शूद्र शरीर मिलने पर भी व्यक्ति को जो है अह

1052
01:13:18,240 --> 01:13:22,320
मतलब वो ज्ञान प्राप्त हो सकता है जो मुक्ति पथ में आगे उसको बढ़ाए।

1053
01:13:22,320 --> 01:13:26,480
तो उन्होंने वहां पर यह विष्णु धर्म पुराण का उदाहरण लिया। वहां पर शबरी जी

1054
01:13:26,480 --> 01:13:30,720
को शूद्रा सिद्ध करने का कोई उद्देश्य ही नहीं है। उसको पढ़िए आप भाष्य

1055
01:13:30,720 --> 01:13:35,120
को। तो उनको वहां पर यह सिद्ध करना है कि जन्मांतर

1056
01:13:35,120 --> 01:13:40,400
में जो पूर्व जन्म में योगाभ्यास किया होगा। तो इस जन्म में

1057
01:13:40,400 --> 01:13:44,480
जो है शूद्र जन्म मिलने के बाद भी जो पिछले जन्म का योगाभ्यास था उस

1058
01:13:44,480 --> 01:13:48,480
योगाभ्यास में आगे के क्रम में बढ़ने पर इस जन्म में उसे

1059
01:13:48,480 --> 01:13:52,480
वैसे ही मुक्ति प्राप्त हुई। जैसी शबरी को प्राप्त हुई कैसी मुक्ति थी

1060
01:13:52,480 --> 01:13:56,960
वह उस समय का वो दृश्य ना कि शबरी

1061
01:13:56,960 --> 01:13:57,760
शबरी क्योंकि

1062
01:13:57,760 --> 01:14:02,000
शूद्र थी और उसको मुक्ति प्राप्त हुई उसी प्रकार जो है धर्म व्याद को भी मुक्ति प्राप्त

1063
01:14:02,000 --> 01:14:07,440
हो जाएगी ना अगर ऐसा होता तो जो

1064
01:14:07,440 --> 01:14:11,440
क्या कहते हैं यदि अपय दीक्षित जी शबरी को शूद्र मानते

1065
01:14:11,440 --> 01:14:16,160
होते तो वह सीधे-सीधे शबरी का उदाहरण लेते ना

1066
01:14:16,160 --> 01:14:20,240
कि भैया शूद्र उनको तो यह सिद्ध करना था ना कि शूद्र शूद्र कुल

1067
01:14:20,240 --> 01:14:25,280
में जन्म मिलने पर भी जो है आपको मुक्ति प्राप्त हो जाएगी तो विष्णु धर्म पुराण क्यों लेते

1068
01:14:25,280 --> 01:14:29,280
वो सीधे शबरी का प्रकरण उठाते और दे देते देखिए यहां

1069
01:14:29,280 --> 01:14:33,760
शद्रा शबरी को मुक्ति प्राप्त हो रही है उनका फोकस धर्मव्याद पे था

1070
01:14:33,760 --> 01:14:37,760
धर्मव्याद को मुक्ति प्राप्त हुई वो बात और है कि बाय प्रोडक्ट

1071
01:14:37,760 --> 01:14:42,880
से उसी श्लोक में शबरी जी का नाम लिखा गया है इस रूप इस इस

1072
01:14:42,880 --> 01:14:46,880
क्या कहते हैं इस अर्थ में कि जो धर्मव्यात को मुक्ति मिल रही है

1073
01:14:46,880 --> 01:14:51,040
वो किस कैसी दिख रही है मुक्ति वो चित्रित कैसा हो रहा है वो वो बाय

1074
01:14:51,040 --> 01:14:55,120
प्रोडक्ट है वहां शबरी जी का नाम जो अप दीक्षित है उनका

1075
01:14:55,120 --> 01:14:59,840
फोकस धर्मव्याद पर है कि धर्मव्याद को मुक्ति मिली

1076
01:14:59,840 --> 01:15:03,840
तो उनको धर्मव्याद से मतलब था उस श्लोक को उन्होंने उर्रत किया वो

1077
01:15:03,840 --> 01:15:07,920
बात और है कि धर्मव्याद की मुक्ति को चित्रित करने के निमित्त

1078
01:15:07,920 --> 01:15:12,000
वहां पर जो शबरी जी हैं उनका उदाहरण दिया गया था ना

1079
01:15:12,000 --> 01:15:12,880
तो सोनक ऋषि

1080
01:15:12,880 --> 01:15:17,200
ने निर्णय किया कि शबरी जी शूद्रा थी और ना ही अपया दीक्षित

1081
01:15:17,200 --> 01:15:21,280
ठीक है चलो आ जाना आमनेसामने से बात

1082
01:15:21,280 --> 01:15:25,680
करना

1083
01:15:25,680 --> 01:15:30,080
तो अतः धर्म व्याद की वैसी ही अलौकिक सद्गति को श्रोताओं

1084
01:15:30,080 --> 01:15:34,160
के समक्ष स्पष्ट रूप से दसमान करने के निमित्त ही शबरी जी का उदाहरण

1085
01:15:34,160 --> 01:15:38,240
दिया गया है। निष्कर्ष क्या है? स्पष्ट है कि यहां शबरी जी का संदर्भ उनकी जाति

1086
01:15:38,240 --> 01:15:42,240
के निर्धारण हेतु नहीं अपितु उनकी सिद्धि की विलक्षणता को दर्शाने के लिए

1087
01:15:42,240 --> 01:15:46,640
किया गया है। ना तो सोनक ऋषि का और ना ही अप दीक्षित का उद्देश्य शबरी

1088
01:15:46,640 --> 01:15:51,200
जी के वर्ण पर कोई निर्णय देना था। इसी क्रम में यदि रामचरितमानस

1089
01:15:51,200 --> 01:15:55,280
की चर्चा करें कुछ छोड़ेंगे नहीं चिंता ना करो तो

1090
01:15:55,280 --> 01:15:59,360
रामचरितमानस से क्या है रामचरितमानस की चर्चा करें

1091
01:15:59,360 --> 01:16:03,440
जहां शबरी जी स्वयं को अधम और अधम ते अधम कह रही हैं तो ज्ञातव्य है कि

1092
01:16:03,440 --> 01:16:07,440
अध्यात्म रामायण इत्यादि में भी शबरी ने स्वयं के लिए

1093
01:16:07,440 --> 01:16:11,520
हीन जाति जैसे शब्दों का प्रयोग किया है। अध्यात्म रामायण

1094
01:16:11,520 --> 01:16:15,680
तीन 10 18 पढ़िए। एवं गोस्वामी तुलसीदास

1095
01:16:15,680 --> 01:16:19,760
जी ने तो शबरी जी की पंक्ति को ज्यों की त्यों प्रस्तुत मात्र किया

1096
01:16:19,760 --> 01:16:23,840
है। मतलब वह अपने आप को अगर अधम कह रही हैं अन्य अन्य रामायणों

1097
01:16:23,840 --> 01:16:28,000
में तो उन्होंने उसको उद्ध्रत कर दिया। इससे यह नहीं सिद्ध होता है कि तुलसीदास

1098
01:16:28,000 --> 01:16:32,160
जी उनको जो है वो मान रहे हैं। उस समय पर शबरी जी ने अपने बारे में क्या

1099
01:16:32,160 --> 01:16:36,160
कहा था। तो शबरी जी ने जो कहा था वो उन्होंने बता दिया

1100
01:16:36,160 --> 01:16:40,320
कि इन्होंने तो यह कहा था। मगर इसका मतलब यह नहीं कि उन्होंने उसका अर्थ अपने हिसाब

1101
01:16:40,320 --> 01:16:44,400
से लेकर के उसको शूद्र मान लिया। अच्छा उन्होंने क्यों कहा था फिर भी

1102
01:16:44,400 --> 01:16:48,400
देख लेते हैं उन्होंने क्यों कहा था गोस्वामी तुलसीदास जी ने तो शबरी जी की

1103
01:16:48,400 --> 01:16:52,560
पंक्ति को ज्यों की त्यों प्रस्तुत मात्र किया है जिसका भाव हमें उसी अर्थ

1104
01:16:52,560 --> 01:16:56,880
में ग्रहण करना चाहिए जिस अर्थ में हनुमान जी ने श्री राम के प्रति अपना

1105
01:16:56,880 --> 01:17:01,360
दासत्व प्रकट करने हेतु स्वयं की हीनता का वर्णन किया है। रामचरितमानस

1106
01:17:01,360 --> 01:17:05,520
चार छ क्या कहा था कि प्रात ले जो नाम

1107
01:17:05,520 --> 01:17:10,560
हमारा ते दिन ताई ना मिले आहारा

1108
01:17:10,560 --> 01:17:13,280
तो क्या है

1109
01:17:13,280 --> 01:17:17,440
यह तो मोक्ष दायक है हनुमान जी। क्या उनका नाम नहीं लेना

1110
01:17:17,440 --> 01:17:21,520
चाहिए? मगर यहां तो वो कह रहे हैं कि भाई मेरा

1111
01:17:21,520 --> 01:17:25,520
जो नाम ले लेता है उसको आहार नहीं मिलता। अपनी दीनता प्रकट कर रहे हैं। ये सब

1112
01:17:25,520 --> 01:17:30,160
बातें मुझे रामपाल को बतानी पड़ती थी। रामपाल वाले आकर खड़े हो जाते थे।

1113
01:17:30,160 --> 01:17:34,240
आज बताओ वर्णाश्रम धर्मियों को बतानी पड़ रही है। तो जिसका मन सच

1114
01:17:34,240 --> 01:17:38,480
में चंगा है ना वो स्वयं को अधम हूं, नीच हूं, पापी हूं, दुर्जन हूं। ये कहते

1115
01:17:38,480 --> 01:17:42,560
धर्मराज के अवतार विभीषण जी अपने को अधम नीच कह रहे हैं। गिद्धराज जटायु अपने

1116
01:17:42,560 --> 01:17:46,560
को अधम नीच कह रहे हैं। हनुमान जी कह रहे हैं अपने को अधम नीच। शबरी जी अधमति अधम

1117
01:17:46,560 --> 01:17:50,640
अधमति नारी तनमय मति बंद अघारी धातव्य है कि

1118
01:17:50,640 --> 01:17:54,640
यहां पर यज्ञ पवित्र धारण करने वाले हनुमान जी ने स्वयं को परम कुलीन होने

1119
01:17:54,640 --> 01:17:59,360
का भी विरोध किया है। वहां पर उन्होंने ध्यातव्य

1120
01:17:59,360 --> 01:18:03,600
है कि यहां पर यज्ञ पवित्र धारण करने वाले हनुमान जी ने स्वयं के परम कुलीन

1121
01:18:03,600 --> 01:18:07,920
होने का भी विरोध किया है। स्वयं तुलसीदास जी ने भी ग्रंथ

1122
01:18:07,920 --> 01:18:12,560
के शुभारंभ में अत्यंत विनम्रता पूर्ण स्वयं पूर्वक

1123
01:18:12,560 --> 01:18:16,640
अत्यंत विनम्रता पूर्वक स्वयं को तुच्छ और अज्ञानी कहा है जो कि केवल

1124
01:18:16,640 --> 01:18:20,880
उनके समर्पण भाव और दैन्य का परिचायक है। इसका मतलब यह नहीं कि उनकी बात पर विश्वास

1125
01:18:20,880 --> 01:18:24,960
नहीं करना है। उनकी बात को सुनना ही नहीं है। उन्होंने तो बहुत बुरा बुरा कहा है अपने आप

1126
01:18:24,960 --> 01:18:25,760
अपने लिए।

1127
01:18:25,760 --> 01:18:30,080
रामचरितमानस एक 11 दो पढ़ लेना। अनेकत्र

1128
01:18:30,080 --> 01:18:34,640
भी शबरी जी के लिए प्रयुक्त अधम अथवा हीन जाति जैसे शब्दों का शास्त्रीय विश्लेषण

1129
01:18:34,640 --> 01:18:38,960
भी देख लेते हैं। स्त्री योनि का संदर्भ यहां अधर्म अधम

1130
01:18:38,960 --> 01:18:43,040
और हीन जाति का अभिप्राय मुख्य रूप से स्त्री योनि से श्रीमद् भगवत गीता के नौवें

1131
01:18:43,040 --> 01:18:47,520
अध्याय के 32व श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं कहा है कि

1132
01:18:47,520 --> 01:18:51,520
जो पाप योनि में जन्म लेने वाले उसमें स्त्री स्त्री शूद्र वैश्य का वो

1133
01:18:51,520 --> 01:18:55,520
आया है। तो शूद्र योनि को आध्यात्मिक साधना के दृष्टिकोण से

1134
01:18:55,520 --> 01:18:59,680
अपेक्षाकृत कठिन या निम्न माना गया है। भगवत गीता

1135
01:18:59,680 --> 01:19:04,240
9 32 इसी क्रम में भागवत में भी यज्ञ पवीत व वेदाध्यन

1136
01:19:04,240 --> 01:19:08,320
निषेध के कारण पतित द्विज स्त्री व शूद्र को एक ही पंक्ति में रखा गया

1137
01:19:08,320 --> 01:19:12,400
है। स्त्री शूद्र और पतित द्व जाति तीनों ही वेद श्रवण के अधिकारी नहीं है क्योंकि

1138
01:19:12,400 --> 01:19:16,400
वह कल्याणकारी शास्त्रोक्त कर्मों के आचरण में भूल कर बैठते

1139
01:19:16,400 --> 01:19:20,560
हैं। अब इसके द्वारा उनका भी कल्याण हो जाए। यह सोचकर वेदव्यास

1140
01:19:20,560 --> 01:19:25,040
जी ने बड़ी कृपा करके महाभारत इतिहास की रचना की। श्रीमद्

1141
01:19:25,040 --> 01:19:29,360
भागवत 1425

1142
01:19:29,360 --> 01:19:33,600
ऐसे में स्त्री होते हुए शबरी के लिए हीन जाति शूद्र अथवा अधम

1143
01:19:33,600 --> 01:19:37,600
जैसे शब्दों के संबोधन में यज्ञ पवीत एवं वेद अध्ययन के निषेध को ही

1144
01:19:37,600 --> 01:19:41,600
आधार मानना चाहिए। इसलिए शास्त्र में स्पष्ट तौर पर कहा भी

1145
01:19:41,600 --> 01:19:46,240
गया है जन्मना जाति शूद्रः हम आ गया।

1146
01:19:46,240 --> 01:19:50,480
जन्म से सभी शूद्र होते हैं। संस्कार से वह द्विज कहे जाते हैं। स्कंद

1147
01:19:50,480 --> 01:19:53,680
पुराण नागर खंड उत्तरार्ध

1148
01:19:53,680 --> 01:19:57,840
139 व अध्याय का 31वा श्लोक।

1149
01:19:57,840 --> 01:20:02,240
ठीक है? पढ़ लेना भाई। यहां भी शास्त्रंतर सामंजस्य

1150
01:20:02,240 --> 01:20:06,720
हेतु शूद्र का अर्थ शूद्र ना लेकर शूद्रवत लिया जाता है। प्रामाणिक

1151
01:20:06,720 --> 01:20:10,880
आचार्य द्वारा जिसका हेतु यज्ञ

1152
01:20:10,880 --> 01:20:15,440
पवित रहित व वेद अध्ययन रहित ही है। भाव

1153
01:20:15,440 --> 01:20:19,440
शबरी जी ने इन्हीं शास्त्रीय मर्यादाओं का स्मरण करते हुए श्री राम के समक्ष

1154
01:20:19,440 --> 01:20:23,680
अपनी स्त्री योनि की सहज हीनता प्रस्तुत की है ताकि उनका अनन्य

1155
01:20:23,680 --> 01:20:27,840
भक्ति भाव और दासत्व पूर्णतः प्रकट हो सके। अतः यह निष्कर्ष

1156
01:20:27,840 --> 01:20:32,160
निकालना कि शबरी जी का वर्ण शूद्रता पूर्णतः त्रुटिपूर्ण है। उनका कथन

1157
01:20:32,160 --> 01:20:36,160
केवल ईश्वर के प्रति उनकी निरभिमानता

1158
01:20:36,160 --> 01:20:40,400
और परम लघुता का दर्शन कराता है। जिसे जातिगत

1159
01:20:40,400 --> 01:20:45,520
आधार पर परिभाषित करना पूर्ण रूप से युक्ति विरुद्ध है। युक्ति विरुद्ध

1160
01:20:45,520 --> 01:20:48,400
इतने पर भी

1161
01:20:48,400 --> 01:20:52,640
इतने पर भी कुछ कुतर्की कहते हैं। इतना सब

1162
01:20:52,640 --> 01:20:56,720
बता देने पर भी कुछ कुतर्की कहते हैं कि शबरी के ब्राह्मणी होने के

1163
01:20:56,720 --> 01:21:01,200
विषय में और श्री राम द्वारा उनके झूठे बेर

1164
01:21:01,200 --> 01:21:05,600
झूठे वेर ना खाए जाने के विषय में क्या प्रमाण है? तो सुन लो

1165
01:21:05,600 --> 01:21:09,840
सुन लो उक्त विषयों में मर्यादा

1166
01:21:09,840 --> 01:21:14,000
पुरुषोत्तम श्री राम की मर्यादा ही प्रमाण है। सुन

1167
01:21:14,000 --> 01:21:18,240
लिया मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम तुम

1168
01:21:18,240 --> 01:21:21,440
छीनोगे हमसे राम को

1169
01:21:21,440 --> 01:21:24,400
आ जाना अब

1170
01:21:24,400 --> 01:21:29,120
किसी भी प्रकार के वैचारिक मतभेद के निमित्त

1171
01:21:29,120 --> 01:21:30,400
प्रत्यक्ष वार्ता करने

1172
01:21:30,400 --> 01:21:34,400
का साहस प्रकट करें। अन्यथा मुंगेरी लाल के हसीन सपनों की दुनिया

1173
01:21:34,400 --> 01:21:36,720
में डूबे रहने के लिए स्वतंत्र हैं आप। ठीक

1174
01:21:36,720 --> 01:21:40,800
है? और यह जो सारी विवेचना है ना वीडियो के साथ

1175
01:21:40,800 --> 01:21:45,120
उसमें भी पीडीएफ फॉर्म में भी आपको प्राप्त हो जाएगी।

1176
01:21:45,120 --> 01:21:49,360
तो सौभाग्य था मेरा जो प्रभु श्री राम

1177
01:21:49,360 --> 01:21:53,760
का पक्ष रखने का मुझे अवसर प्राप्त हुआ और

1178
01:21:53,760 --> 01:21:57,840
यह जो बात फैली हुई है समाज में एक भ्रांति

1179
01:21:57,840 --> 01:22:01,840
कि शबरी जी शूद्रा थी हीन जाति की थी और या फिर

1180
01:22:01,840 --> 01:22:05,840
उनके झूठे बेर मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने पाए

1181
01:22:05,840 --> 01:22:09,920
थे। इसका भी निराकरण हो जाना एक

1182
01:22:09,920 --> 01:22:13,920
इनफेटिव वीडियो केवल वह नहीं है कि भागवतानंद को उत्तर देना

1183
01:22:13,920 --> 01:22:17,920
था। ठीक है? तो अपने राम को जानिए।

1184
01:22:17,920 --> 01:22:22,160
रात में बैठकर जा रहे हैं। माता-पिता पीछे चिल्ला

1185
01:22:22,160 --> 01:22:26,320
चिल्ला के भाग रहे हैं। राम राम राम वाल्मीकि रामायण

1186
01:22:26,320 --> 01:22:32,240
में क्या लिख रहे हैं वाल्मीकि जी? खूंटे से बंधा हुआ घोड़े का बच्चा।

1187
01:22:32,240 --> 01:22:36,480
वो देख रहा है अपनी मां को कुछ कर नहीं सकता।

1188
01:22:36,480 --> 01:22:40,640
किस खूंटे से बंधा है? धर्म के खूंटे

1189
01:22:40,640 --> 01:22:44,720
से। कौन सी रस्सी है? मर्यादा की

1190
01:22:44,720 --> 01:22:50,720
रस्सी।

1191
01:22:52,480 --> 01:22:58,240
अपने आदर्श को इस प्रकार से

1192
01:22:58,240 --> 01:23:02,000
लुप्त मत करो।

1193
01:23:02,000 --> 01:23:06,480
यह हमारे सनातन का गौरव है। प्रभु श्री राम

1194
01:23:06,480 --> 01:23:10,960
उनको इस प्रकार से अपनी द्वेष भावना के कारण मत मतंतरों

1195
01:23:10,960 --> 01:23:15,120
के कारण अपनी मान्यताओं के कारण इस प्रकार से

1196
01:23:15,120 --> 01:23:19,520
उन्हें जाने मत दो भाई। जय

1197
01:23:19,520 --> 01:23:25,520
श्री राम।

1198
01:23:41,940 --> 01:23:45,940
[संगीत]
