1
00:00:02,960 --> 00:00:07,360
तो सभी को जय श्री राम। बहु प्रतीक्षित विषय है

2
00:00:07,360 --> 00:00:11,600
पुषुंडी रामायण, शबरी जी मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम

3
00:00:11,600 --> 00:00:15,760
और सो कॉल्ड आजकल वो सो कॉल्ड

4
00:00:15,760 --> 00:00:20,560
आचार्य और आजकल के कर्मणा जगतगुरु

5
00:00:20,560 --> 00:00:24,720
है ना भागवतानंद। खैर अब वो कितने सो कॉल्ड

6
00:00:24,720 --> 00:00:29,280
हैं? कर्मणा कैसे हैं? वह सब आज का विषय नहीं है। पर

7
00:00:29,280 --> 00:00:33,280
विवेचना को आपके समक्ष प्रस्तुत करने से पहले मैं आपको यह बता

8
00:00:33,280 --> 00:00:36,880
दूं कि

9
00:00:36,880 --> 00:00:40,960
जो मेरे विषय हैं धर्म की रक्षा करने के निमित्त उसमें

10
00:00:40,960 --> 00:00:45,040
यह जो वस्तुनिष्ठ जानकारियां हैं कि कब क्या

11
00:00:45,040 --> 00:00:49,120
हुआ था? उसका क्या नाम है? वहां पर इस पर्टिकुलर उस

12
00:00:49,120 --> 00:00:53,280
घटनाक्रम में क्या-क्या किस क्रम में कैसे कौन सी चीजें घटित हुई थी। तो

13
00:00:53,280 --> 00:00:57,760
इस बारे में मेरी कोई ना तो रुचि है और ना ही मेरे लिए

14
00:00:57,760 --> 00:01:01,760
मेरे में मेरे जो मेरा जो क्षेत्र है उसमें उपयोगी होने वाली

15
00:01:01,760 --> 00:01:06,160
सामग्री है। तो इस कारण से उसमें गति होना भी मेरा कोई

16
00:01:06,160 --> 00:01:10,160
ना होना संभावित ही है। फिर भी क्योंकि इस विषय

17
00:01:10,160 --> 00:01:14,640
को आधार बना करके परंपरा प्राप्त प्रामाणिक आचार्य के प्रति

18
00:01:14,640 --> 00:01:18,800
लोगों को अनास्थावान बनाया जा रहा है। इसलिए इस विषय पर मुझे

19
00:01:18,800 --> 00:01:23,040
कार्य करना पड़ा। और इसका जो मूल

20
00:01:23,040 --> 00:01:27,200
आधार है इस विवेचना का जो मैंने अभी यह की

21
00:01:27,200 --> 00:01:31,360
है इसका मूल आधार है कि मेरे जीवन में जब कुछ

22
00:01:31,360 --> 00:01:35,520
नहीं था जब मैं गुरु को नहीं जानता था अपने ग्रंथों

23
00:01:35,520 --> 00:01:40,720
को भी ठीक से नहीं जानता था मैं बस एक नाम जानता था राम

24
00:01:40,720 --> 00:01:45,200
मैं राम को जानता था तो जो मेरा यह आध्यात्मिक

25
00:01:45,200 --> 00:01:49,360
जीवन प्रारंभ हुआ है उसका कारण भी राम ही थे कभी

26
00:01:49,360 --> 00:01:52,160
कोई ऐसा टकरा गया था। कोई ऐसा मिल गया था जिसने

27
00:01:52,160 --> 00:01:56,560
मेरे राम के आचरण पर उंगली उठाई थी। और उस

28
00:01:56,560 --> 00:02:00,640
व्यक्ति को उत्तर देने के निमित्त शास्त्रों का

29
00:02:00,640 --> 00:02:04,640
अध्ययन, स्वा अध्ययन, गुरुओं के प्रवचन का श्रवण यह

30
00:02:04,640 --> 00:02:08,800
सब प्रारंभ हुआ और धीरे धीरे धीरे धीरे मेरी वो जो

31
00:02:08,800 --> 00:02:12,880
यात्रा है, किस तरह से शंकराचार्य जी तक आकर के पूर्ण हुई।

32
00:02:12,880 --> 00:02:17,200
वो एक मैं कई बार अपनी सारा घटनाक्रम अपनी वीडियोस में

33
00:02:17,200 --> 00:02:21,280
आपको बता चुका हूं। तो प्रभु श्री राम पर उंगली उठाए

34
00:02:21,280 --> 00:02:25,280
जाने से ही मेरा आध्यात्मिक जीवन प्रारंभ हुआ था। धर्म पर उंगली

35
00:02:25,280 --> 00:02:29,360
उठाए जाने से ही मेरा आध्यात्मिक जीवन प्रारंभ हुआ था। और आज

36
00:02:29,360 --> 00:02:33,440
देख लीजिए घूम फिर के कहानी फिर वहीं पर आ गई।

37
00:02:33,440 --> 00:02:37,920
इतिहास फिर अपने आप को दोहरा रहा है कि मेरे प्रभु श्री राम पर

38
00:02:37,920 --> 00:02:42,000
अमर्यादित होने का ब्रह्म भाव से ही सही मर्यादा के बाहर

39
00:02:42,000 --> 00:02:46,240
जाकर के कार्य करने का अ

40
00:02:46,240 --> 00:02:50,240
आरोप लगाया जा रहा है तो मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ कि

41
00:02:50,240 --> 00:02:54,320
मैं प्रभु श्री राम के पक्ष को जनता के

42
00:02:54,320 --> 00:02:58,720
समक्ष जनसामान्य के समक्ष प्रस्तुत करूं क्योंकि

43
00:02:58,720 --> 00:03:02,960
मैंने आपको बताया कि जब मेरे पास ना धर्म शास्त्र थे ना गुरुओं के वचन

44
00:03:02,960 --> 00:03:07,040
थे। तब मेरे पास सिर्फ राम थे। क्या सही और क्या गलत।

45
00:03:07,040 --> 00:03:07,540
इस

46
00:03:07,360 --> 00:03:12,400
मामले में मेरे पास एक ही पैरामीटर हुआ करता था। राम

47
00:03:12,400 --> 00:03:16,480
और उन्हीं प्रभु श्री राम पर जब उंगली उंगली

48
00:03:16,480 --> 00:03:20,640
उठाई गई तो मैं विवश हो गया सामने वाले को उत्तर देने

49
00:03:20,640 --> 00:03:25,680
के लिए। उसी प्रकार से आज उंगली उठाई जा रही है कि प्रभु श्री राम ने

50
00:03:25,680 --> 00:03:30,000
ब्रह्म भाव का आलंबन लेते हुए और

51
00:03:30,000 --> 00:03:34,160
मर्यादा को लांघ कर धर्म की शास्त्रों की मर्यादा

52
00:03:34,160 --> 00:03:38,160
को लांग कर शबरी के झूठे बेर खाए

53
00:03:38,160 --> 00:03:42,480
और उसमें अनेक कुतर्क और यहां तक कि जो

54
00:03:42,480 --> 00:03:46,480
तथाकथित कुछ ऐसे ग्रंथ हैं

55
00:03:46,480 --> 00:03:50,560
जिनका आलंबन लेकर के अनेक अनेक प्रकार के प्रलाप भी

56
00:03:50,560 --> 00:03:54,640
किए गए इन्हीं विषयों में। तो आज उन सबके बारे में हम बात

57
00:03:54,640 --> 00:03:58,720
करने वाले हैं। बहुत ही रोचक यात्रा होने वाली है। तो आप लोग अपनी सीट की पेटी

58
00:03:58,720 --> 00:04:03,440
बांध लें। तो मुख्य विषय पर आते हैं। सबसे पहले

59
00:04:03,440 --> 00:04:07,600
कि दो प्रकार की क्लेम है जिनको हम

60
00:04:07,600 --> 00:04:11,920
जिनका निराकरण प्रस्तुत कर रहे हैं। पहला क्लेम है कि शबरी जी

61
00:04:11,920 --> 00:04:16,480
ब्राह्मण नहीं थी। और दूसरा क्लेम है कि श्री राम जी ने

62
00:04:16,480 --> 00:04:20,480
शबरी के झूठे वेर खाए थे। ठीक है?

63
00:04:20,480 --> 00:04:22,480
और इसका आधार सामने वालों के पास

64
00:04:22,480 --> 00:04:26,640
जो है मुख्य आधार वह है भूषुंडी रामायण। ठीक है? यह

65
00:04:26,640 --> 00:04:30,880
भी यह एक हमने जो पूर्व पक्ष है उसको संक्षिप्त में प्रस्तुत

66
00:04:30,880 --> 00:04:35,120
किया। बाकी सारे पूर्व पक्ष इसमें आएंगे जिसको मान लीजिए। तो जो पूरी

67
00:04:35,120 --> 00:04:39,440
शंकराचार्य ने कहा कि शबरी जी ब्राहणी थी। यह किस शास्त्र के आधार पर उनके पूर्व

68
00:04:39,440 --> 00:04:44,080
ने बताया? तो सबसे पहले मैं बता दूं आपको कि

69
00:04:44,080 --> 00:04:48,160
शबरी के ब्राह्मण होने के समर्थन में तथा श्री

70
00:04:48,160 --> 00:04:52,160
राम द्वारा शबरी के झूठे बेर ना खाने के समर्थन में जो

71
00:04:52,160 --> 00:04:56,320
प्रमाण हैं उनको मैं आपको थोड़ा सा उनसे आपको अवगत करा रहा हूं। पहला है

72
00:04:56,320 --> 00:05:00,720
कि शबरी जी को वाल्मीकि रामायण में तापसी कहा गया है। तपस्विनी

73
00:05:00,720 --> 00:05:05,760
कहा गया है। कहां कहा गया है? वाल्मीकि रामायण 3 74 10

74
00:05:05,760 --> 00:05:09,840
ध्यातव्य है कि तप करना ब्राह्मण का स्वाभाविक कर्म है। कहां लिखा है?

75
00:05:09,840 --> 00:05:14,080
भगवत गीता 18 42 सेवा करना शूद्र

76
00:05:14,080 --> 00:05:18,800
का स्वाभाविक कर्म है। कहां लिखा है? भगवत गीता 18 44

77
00:05:18,800 --> 00:05:23,040
इसके साथ ही साथ उच्चिष्ट पदार्थ किसी को खिलाना अथवा

78
00:05:23,040 --> 00:05:27,040
स्वयं खाना निषेध है। कहां लिखा है? मनुस्मृति

79
00:05:27,040 --> 00:05:31,440
दो 56 अपने अपने वर्ण तथा आश्रम के अनुसार

80
00:05:31,440 --> 00:05:35,440
स्वकर्तव्य में निष्ठा ही धर्म है। हम पहले यह सेट कर रहे हैं

81
00:05:35,440 --> 00:05:37,680
पैराटर्स कि धर्म क्या है और अधर्म

82
00:05:37,680 --> 00:05:41,760
क्या है? उसके बाद हम देखेंगे कि श्री राम जी धर्म के बाहर जाकर

83
00:05:41,760 --> 00:05:46,800
के आचरण करने वाले सिद्ध होते हैं या नहीं होते हैं। तो

84
00:05:46,800 --> 00:05:50,960
अब धर्म क्या है? अपने अपने वर्ण तथा आश्रम के अनुसार स्वकर्तव्य

85
00:05:50,960 --> 00:05:55,440
में निष्ठा ही धर्म है। यह कहां से आया? भगवत गीता 18

86
00:05:55,440 --> 00:06:00,240
45 और मनुस्मृति 735 वेदादि

87
00:06:00,240 --> 00:06:04,320
शास्त्रोक्त कर्म ही धर्म है। भगवत गीता 16 24

88
00:06:04,320 --> 00:06:08,480
मीमांसा दर्शन एक 12 मनुस्मृति दो छ जो

89
00:06:08,480 --> 00:06:12,960
धर्म श्रुतियों और स्मृतियों द्वारा प्रतिपादित वर्णाश्रम के आचार्य से युक्त

90
00:06:12,960 --> 00:06:17,360
तथा शिष्टाचार द्वारा परिवर्तित होता है। वही धर्म साधु

91
00:06:17,360 --> 00:06:21,440
संवत धर्म है। है ना? श्रोत स्मार्थ है

92
00:06:21,440 --> 00:06:25,520
ना वही साधु संवत धर्म है। कहां लिखा है? मत्स पुराण 145वा

93
00:06:25,520 --> 00:06:29,600
अध्याय 52वा श्लोक वर्णाश्रम के विभाग अनुसार प्रयुक्त हुआ

94
00:06:29,600 --> 00:06:33,600
धर्म स्मार्थ कहलाता है। इस प्रकार श्रोत और स्मार्थ

95
00:06:33,600 --> 00:06:38,320
द्विवध धर्म को शिष्टाचार कहते हैं। कहां लिखा है? मत्स पुराण

96
00:06:38,320 --> 00:06:42,560
145वा अध्याय और 32वा श्लोक अर्थात अपने

97
00:06:42,560 --> 00:06:46,880
निर्धारित कर्मों के विरुद्ध कर्म करना अधर्म है

98
00:06:46,880 --> 00:06:51,040
अपराध है मर्यादा की दृष्टि से अपराध है शास्त्री

99
00:06:51,040 --> 00:06:53,120
शास्त्रीय मर्यादा की दृष्टि से अपराध

100
00:06:53,120 --> 00:06:57,120
है अधर्म है ऐसे में अपराधी दंड का पात्र भी होता है

101
00:06:57,120 --> 00:07:01,280
नारद जी का वाल्मीकि जी के साथ संवाद प्रभु

102
00:07:01,280 --> 00:07:06,800
श्री राम को दृढ़ प्रतिज्ञ सत्य वक्ता सदाचारी

103
00:07:06,800 --> 00:07:10,800
नीतिज्ञ स्वधर्म का पालन करने वाला कहा

104
00:07:10,800 --> 00:07:15,120
गया है। इस संवाद में कहां से कहां तक है? वाल्मीकि रामायण एक

105
00:07:15,120 --> 00:07:19,200
दो दो से 14 भगवान श्री राम

106
00:07:19,200 --> 00:07:23,200
मनुस्मृति द्वारा निर्धारित आचरण करने की घोषणा करते

107
00:07:23,200 --> 00:07:27,600
हैं। वो घोषणा कर रहे हैं कि मनुस्मृति के आधार पर चलूंगा। कहां कर रहे हैं?

108
00:07:27,600 --> 00:07:31,760
वाल्मीकि रामायण चार 18 30 वह

109
00:07:31,760 --> 00:07:35,760
कह रहे हैं कि मैं मनु महाराज के बताए गए बताए गए जो संविधान है उसके अनुसार

110
00:07:35,760 --> 00:07:39,840
चलूंगा चलता हूं मानता हूं मनुस्मृति के दो

111
00:07:39,840 --> 00:07:43,920
श्लोक भी उन्होंने वहां पर इस बाली को संतुष्ट करने के लिए उद्रत किए थे। कौन

112
00:07:43,920 --> 00:07:48,560
से श्लोक थे?

113
00:07:48,560 --> 00:07:52,640
मनुस्मृति आठ 316 और

114
00:07:52,640 --> 00:07:57,040
8 300 18 कहां पर किए हैं? वाल्मीकि

115
00:07:57,040 --> 00:08:01,200
रामायण चार 18 31 से 32 यहां पर यह

116
00:08:01,200 --> 00:08:05,520
मनुस्मृति के दोनों श्लोक उन्होंने उ्रत किए। श्लोक में क्या कहा गया है

117
00:08:05,520 --> 00:08:09,520
कि अधर्मी को राजा द्वारा दंडित ना किए जाने की

118
00:08:09,520 --> 00:08:14,480
स्थिति में राजा के लिए दंड का प्रावधान है। यह उन्होंने बताया।

119
00:08:14,480 --> 00:08:18,720
अतः इस प्रकार वनवास के समय भी श्री राम ने स्वयं को

120
00:08:18,720 --> 00:08:22,880
राजा भरत की आज्ञा के अंतर्गत मनुस्मृति के सिद्धांतों

121
00:08:22,880 --> 00:08:27,440
अर्थात धर्म को स्थापित करने हेतु प्रतिबद्ध बताया है।

122
00:08:27,440 --> 00:08:31,440
एवं धर्म मार्ग से भटके हुए भ्रष्ट पुरुष को विधि पूर्वक दंड

123
00:08:31,440 --> 00:08:36,000
देने वाला भी बताया है। हम सब लोग इस आगे

124
00:08:36,000 --> 00:08:40,080
हम सब लोग अपने श्रेष्ठ धर्म में दृढ़ता पूर्वक स्थिर

125
00:08:40,080 --> 00:08:44,240
रहकर भरत की आज्ञा को सामने रखते हुए धर्म मार्ग

126
00:08:44,240 --> 00:08:48,480
से भ्रष्ट पुरुष को विधि पूर्वक दंड देते हैं।

127
00:08:48,480 --> 00:08:53,360
कहां लिखा है वाल्मीकि रामायण 4 18 10

128
00:08:53,360 --> 00:08:57,680
जो लोग आचार से भ्रष्ट होकर लोक विरुद्ध आचरण करते

129
00:08:57,680 --> 00:09:02,000
हैं। उसे रोकने या राह पर लाने के लिए मैं दंड

130
00:09:02,000 --> 00:09:03,600
के सिवा और कोई उपाय

131
00:09:03,600 --> 00:09:08,240
नहीं देखता। वाल्मीकि रामायण 4:18 21

132
00:09:08,240 --> 00:09:12,480
हमारे राजा भरत हैं। हम लोग तो केवल उनके आदेश का पालन

133
00:09:12,480 --> 00:09:16,480
करने वाले हैं। तुम धर्म से गिर गए हो। अतः तुम्हारी

134
00:09:16,480 --> 00:09:20,800
उपेक्षा कैसे की जा सकती थी? वाल्मीकि रामायण

135
00:09:20,800 --> 00:09:24,880
4 18 23 हम लोग तो भरत की आज्ञा को ही प्रमाण

136
00:09:24,880 --> 00:09:29,040
मानकर धर्म मर्यादा का उल्लंघन करने वाले लोगों को दंड

137
00:09:29,040 --> 00:09:33,120
देने के लिए सदा उद्यत रहते हैं। वाल्मीकि

138
00:09:33,120 --> 00:09:37,360
रामायण 4 18 25 विद्वान राजा भरत

139
00:09:37,360 --> 00:09:41,600
महान धर्म से भ्रष्ट हुए पुरुष को दंड देते हैं

140
00:09:41,600 --> 00:09:46,080
और धर्मात्मा पुरुष का धर्म पूर्वक पालन करते हुए स्वेच्छाचारी

141
00:09:46,080 --> 00:09:50,720
पुरुषों के निग्रह में निग्रह किसके निग्रह में स्वेच्छाचारी

142
00:09:50,720 --> 00:09:56,400
वह स्वप्न सिद्ध संप्रदाय वाले है ना स्वेच्छाचारी

143
00:09:56,400 --> 00:10:01,520
तो निग्रह में तत्पर रहते हैं वाल्मीकि रामायण चार 18 24

144
00:10:01,520 --> 00:10:05,680
अपनेप धर्म में संलग्न सब वर्णों तथा आश्रमों की रक्षा

145
00:10:05,680 --> 00:10:10,000
करने वाले को राजा कहा गया है। ध्यान रखिए राजा कौन है? अपने अपने धर्मों

146
00:10:10,000 --> 00:10:14,240
में संलग्न सब वर्णों तथा आश्रमों की रक्षा करने वाले को

147
00:10:14,240 --> 00:10:19,440
राजा कहा गया है। कहां कहा गया है? मनुस्मृति 7:35

148
00:10:19,440 --> 00:10:23,440
चर्चा के प्रारंभ में अब हमने यहां तक जान लिया कि श्री राम जी

149
00:10:23,440 --> 00:10:28,080
वहां पर धर्म क्या है और

150
00:10:28,080 --> 00:10:32,160
श्रुति शास्त्रों के द्वारा स्मृति शास्त्रों के द्वारा धर्म को किस तरह

151
00:10:32,160 --> 00:10:36,560
से डिफाइन किया गया है इस विषय के आलोक में और

152
00:10:36,560 --> 00:10:40,880
पर्टिकुलर जो श्री राम हैं वो अपने बारे में क्या बता रहे हैं

153
00:10:40,880 --> 00:10:44,880
वनवास के समय अभी आगे और भी उनके कई वचन आएंगे।

154
00:10:44,880 --> 00:10:49,120
अब जो है श्री राम जी के बारे में कुछ चीजें हम लोग स्थापित

155
00:10:49,120 --> 00:10:53,200
कर दें कि भैया श्री राम जी कौन हैं? कैसे हैं? उनका मुख्य

156
00:10:53,200 --> 00:10:57,440
चरित्र क्या है? तो चर्चा के प्रारंभ में श्री रामचंद्र

157
00:10:57,440 --> 00:11:01,600
जी के विषय में निम्नलिखित तथ्यों को जान लेना अति आवश्यक है।

158
00:11:01,600 --> 00:11:05,760
क्या है? मैंने तीन नियमों के पालन की दृढ़ प्रतिज्ञा की

159
00:11:05,760 --> 00:11:09,760
है। उसमें से पहली बात यह है कि मैं अपने मुख से निकली

160
00:11:09,760 --> 00:11:13,920
हुई बात का अवश्य मेंव पालन

161
00:11:13,920 --> 00:11:17,920
करने का नियम लिया है। मैं अपने मुख से निकली हुई बात

162
00:11:17,920 --> 00:11:22,480
को मिथ्या नहीं होने देता। उसे अवश्य पूर्ण करता हूं।

163
00:11:22,480 --> 00:11:27,440
साथ ही दोबारा मैं उस संबंध में कोई बात नहीं बदलता हूं।

164
00:11:27,440 --> 00:11:31,680
जो एक बार कह दिया उसे निश्चित ही पूरा करता हूं।

165
00:11:31,680 --> 00:11:34,880
मेरी दूसरी प्रतिज्ञा है कि सीता

166
00:11:34,880 --> 00:11:39,360
के अतिरिक्त अन्य सभी स्त्रियां मेरे लिए माता कौशल्या के समान हैं।

167
00:11:39,360 --> 00:11:43,360
किसके समान है? प्रतिज्ञा है ये। माता कौशल्या के समान

168
00:11:43,360 --> 00:11:47,520
है। अन्य स्त्रियां प्रतिज्ञा है ये। ठीक है? मैं

169
00:11:47,520 --> 00:11:51,680
सीता के अतिरिक्त किसी अन्य को ना तो पत्नी बना सकता

170
00:11:51,680 --> 00:11:55,840
हूं और ना किसी स्त्री का मैं मन से भी चिंतन कर सकता

171
00:11:55,840 --> 00:11:59,840
हूं। करता हूं। मेरी तीसरी प्रतिज्ञा यह है कि

172
00:11:59,840 --> 00:12:04,000
मैं कोप करके जिसका वध करना चाहता हूं। उस

173
00:12:04,000 --> 00:12:08,000
पर केवल एक ही बाण का प्रयोग करता हूं। दूसरे बाण बाण

174
00:12:08,000 --> 00:12:12,400
का प्रयोग नहीं करता। आनंद रामायण विलास कांड

175
00:12:12,400 --> 00:12:16,880
सात 11 से 14 और सुनिए वाल्मीकि रामायण

176
00:12:16,880 --> 00:12:20,960
एक 12 श्री राम सत्य प्रतिज्ञ हैं।

177
00:12:20,960 --> 00:12:25,120
वाल्मीकि रामायण दो 18 28 से 30 श्री राम

178
00:12:25,120 --> 00:12:29,280
कह रहे हैं मैं दो प्रकार की बातें नहीं करता। जो भी बोलता

179
00:12:29,280 --> 00:12:34,240
हूं सोच समझ कर बोलता हूं। ठीक है? वाल्मीकि

180
00:12:34,240 --> 00:12:38,240
रामायण 4 82 मैंने पहले

181
00:12:38,240 --> 00:12:42,400
कभी भी झूठी बात नहीं कही है और भविष्य में भी

182
00:12:42,400 --> 00:12:47,440
कभी असत्य नहीं बोलूंगा। वाल्मीकि रामायण

183
00:12:47,440 --> 00:12:50,560
दो 150 43

184
00:12:50,560 --> 00:12:55,040
मैं पिताजी के वचन का पालन करूंगा। वाल्मीकि रामायण

185
00:12:55,040 --> 00:12:59,280
श्री राम कह रहे हैं मैं अपने प्राण छोड़ छोड़ सकता

186
00:12:59,280 --> 00:13:03,520
हूं। तुम्हारा और लक्ष्मण का भी परित्याग कर सकता

187
00:13:03,520 --> 00:13:07,520
हूं किंतु अपनी प्रतिज्ञा को नहीं तोड़ सकता।

188
00:13:07,520 --> 00:13:11,520
ठीक है? आगे चलके रामायण में देखिएगा इन वचनों का

189
00:13:11,520 --> 00:13:15,840
क्या होगा। वाल्मीकि रामायण तीन 37 13

190
00:13:15,840 --> 00:13:19,920
रामो विग्रहान धर्मः अर्थात प्रभु श्री राम

191
00:13:19,920 --> 00:13:25,440
धर्म का साक्षात स्वरूप है स्वरूप।

192
00:13:25,440 --> 00:13:29,680
अब बात यह आती है इन सारी जो हमने अभी तक जो प्रमाण

193
00:13:29,680 --> 00:13:33,680
संकलित किए यहां पर उसका निचोड़ क्या निकलता है कि श्री राम कोई

194
00:13:33,680 --> 00:13:38,400
भी बात यूं ही नहीं बोलते वही करते

195
00:13:38,400 --> 00:13:42,640
हैं कभी भी अपने वचन से विमुख नहीं होते वही

196
00:13:42,640 --> 00:13:46,960
करते हैं जो बोलते हैं सत्य प्रतिज्ञ है इसलिए उन्हें धर्म

197
00:13:46,960 --> 00:13:51,840
का मूर्तिमान स्वरूप कहा गया है इसलिए

198
00:13:51,840 --> 00:13:56,720
रामायण अर्थात श्री रामचरित्र के अनुसार

199
00:13:56,720 --> 00:14:00,880
बर्ताव करने वालों को शास्त्रों का मर्मज्ञ और

200
00:14:00,880 --> 00:14:04,960
कल्याण प्राप्त करने वाला मोक्ष प्राप्त करने वाला बताया गया है। कहां बताया

201
00:14:04,960 --> 00:14:09,200
गया है? स्कंद पुराण उत्तरखंड रामायण महात्म

202
00:14:09,200 --> 00:14:13,440
एक 22 से 23 श्री राम की तरह आचरण

203
00:14:13,440 --> 00:14:18,880
करना चाहिए। बृह धर्मत्तर पुराण 269

204
00:14:18,880 --> 00:14:22,880
श्री राम के मनुष्य अवतार का मुख्य उद्देश्य मनुष्यों

205
00:14:22,880 --> 00:14:27,040
को शिक्षा देना है। श्रीमद् भागवत पांच

206
00:14:27,040 --> 00:14:31,200
195 कर्तव्य से विमुख होने पर उन्हें

207
00:14:31,200 --> 00:14:35,680
राजा भरत द्वारा दंडित किया जाना भी सुनिश्चित था। मत्स्य पुराण

208
00:14:35,680 --> 00:14:39,920
200 27 191 से

209
00:14:39,920 --> 00:14:41,120
193

210
00:14:41,120 --> 00:14:46,080
मत्स्य पुराण में राजा को दंड देने की बात की गई है कि जो

211
00:14:46,080 --> 00:14:50,320
दोषी को दंड नहीं देता है तो उसको दंड दिया जाता है राजा

212
00:14:50,320 --> 00:14:54,960
के द्वारा। अतः क्योंकि श्री राम

213
00:14:54,960 --> 00:14:59,520
शास्त्रीय नियमों के अनुसार वध करने योग्य व्यक्ति का वध

214
00:14:59,520 --> 00:15:03,520
अवश्य ही करते हैं। ठीक है? यह कहां

215
00:15:03,520 --> 00:15:07,840
लिखा है? वाल्मीकि रामायण दो 46 अतः क्योंकि

216
00:15:07,840 --> 00:15:11,920
मनुस्मृति के अनुसार आताताई हो जाने पर ब्राह्मण का भी वध करने की

217
00:15:11,920 --> 00:15:16,240
आज्ञा दी गई है। मनुस्मृति 8 350

218
00:15:16,240 --> 00:15:20,640
इसलिए श्री राम ने जहां एक ओर आताताई स्त्री ताड़का का वध किया

219
00:15:20,640 --> 00:15:25,200
वहीं दूसरी ओर ब्राह्मण का ब्राह्मण रावण का वध करके प्रायश्चित किया

220
00:15:25,200 --> 00:15:29,200
और वहीं एक ओर शास्त्रीय मर्यादा

221
00:15:29,200 --> 00:15:33,600
का अतिक्रमण करके तप करने वाले शंभूक का वध भी किया वाल्मीकि

222
00:15:33,600 --> 00:15:37,600
रामायण सात 74 तीन से

223
00:15:37,600 --> 00:15:41,600
चार अब जो शंभुक की बात आई है क्यों

224
00:15:41,600 --> 00:15:45,680
आई है क्योंकि हमने सबसे पहले स्थापित एक बात की थी कि शबरी जी

225
00:15:45,680 --> 00:15:49,680
को तपस्विनी कहा गया है। ठीक है? एक-एक करके चलते हैं। तो यहां पे

226
00:15:49,680 --> 00:15:53,920
शंभुक को तपस्या करने पर वध किया गया और वहां पर उनको

227
00:15:53,920 --> 00:15:56,400
प्रोत्साहन दिया गया उनकी तपस्या को।

228
00:15:56,400 --> 00:16:01,120
जबकि जो आक्षेपकर्ता हैं भागवतानंद एंड कंपनी

229
00:16:01,120 --> 00:16:05,280
उनके अनुसार या भूषुंडी रामायण के आलोक में अगर देखें तो

230
00:16:05,280 --> 00:16:09,280
उसके अनुसार वो शूद्रा थी। शूद्रा को तप करने

231
00:16:09,280 --> 00:16:13,840
का अधिकार प्राप्त नहीं है। और यह कहां से सिद्ध हो रहा है? वाल्मीकि

232
00:16:13,840 --> 00:16:18,400
रामायण से। 74 26 तीन युगों में

233
00:16:18,400 --> 00:16:22,400
तीन वर्ण का ही आश्रय लेकर तपस्या रूपी धर्म

234
00:16:22,400 --> 00:16:26,560
प्रतिष्ठित होता है। किंतु शूद्र को इन

235
00:16:26,560 --> 00:16:31,200
तीनों ही युगों में तप रूपी धर्म का अधिकार प्राप्त नहीं है।

236
00:16:31,200 --> 00:16:35,360
वाल्मीकि रामायण सात 74 26 परंतु शबरी

237
00:16:35,360 --> 00:16:39,520
के तप को श्री राम के द्वारा प्रोत्साहित किया गया। शबरी के तप की

238
00:16:39,520 --> 00:16:43,840
वृद्धि के बारे में उन्होंने पूछा। शबरी को तपोधना कहकर संबोधित

239
00:16:43,840 --> 00:16:47,840
किया। वाल्मीकि रामायण तीन 74 आठ

240
00:16:47,840 --> 00:16:52,080
से नौ शबरी जी को कृष्ण मृग चर्म व

241
00:16:52,080 --> 00:16:56,240
जटा धारण करने वाली भी कहा गया है जिसका विधान मुख्य

242
00:16:56,240 --> 00:17:00,400
रूप से ब्राह्मणों के निमित्त बताया गया है। वाल्मीकि रामायण

243
00:17:00,400 --> 00:17:05,040
कहां कहा गया उन्हें? कृष्ण मृग चर्म धारण करने वाली वाल्मीकि रामायण

244
00:17:05,040 --> 00:17:09,280
तीन 74 33 कृष्ण मृग चर्म ब्राह्मणों का सनातन

245
00:17:09,280 --> 00:17:11,760
ध्वज है। कहां लिखा है विष्णु धर्म पुराण

246
00:17:11,760 --> 00:17:16,080
74 13 सिर पर जटा और मृग चर्म वानप्रस्थ

247
00:17:16,080 --> 00:17:20,320
आश्रमी को निर्देशित किया गया है। श्रीमद् भागवत 7

248
00:17:20,320 --> 00:17:24,560
12 21 बलि वैश्व देव और

249
00:17:24,560 --> 00:17:28,800
होम से पूजित होने वाला मुनियों का पवित्र आश्रम

250
00:17:28,800 --> 00:17:33,040
जहां वेद मंत्रों के पाठ की ध्वनि गूंजती थी वहां

251
00:17:33,040 --> 00:17:37,040
रहने वाले जितेंद्रिय मुनि यानी कि ब्राह्मण हुए ना वेद मंत्र

252
00:17:37,040 --> 00:17:41,040
होता था और वातावरण को पवित्र कहा गया

253
00:17:41,040 --> 00:17:45,200
है। वेद मंत्रों का पाठ हो रहा है। और ऐसे मुनियों को महान कहा

254
00:17:45,200 --> 00:17:49,200
जा रहा है। आदर्श उनके विषय में कहा जा रहा है

255
00:17:49,200 --> 00:17:53,280
उनके संबंध में तो जितेंद्रिय मुनि भी कृष्ण मृग चर्म

256
00:17:53,280 --> 00:17:57,360
धारण करते थे वाल्मीकि रामायण तीन एक

257
00:17:57,360 --> 00:18:01,680
चार से सात इसी क्रम में शबरी जी को धर्माचारिणी

258
00:18:01,680 --> 00:18:06,000
धर्म निपुणा सिद्धा धर्म संस्थिता एवं अवयस्कता

259
00:18:06,000 --> 00:18:10,560
इत्यादि शब्दों द्वारा भी संबोधित किया गया है। कहां किया गया है? वाल्मीकि

260
00:18:10,560 --> 00:18:14,880
रामायण 374 छ वाल्मीकि रामायण 374 सात

261
00:18:14,880 --> 00:18:19,120
और वाल्मीकि रामायण 34 18 यहां पे इनको इन शब्दों

262
00:18:19,120 --> 00:18:23,440
से संबोधित किया गया है। ये हम क्यों बता रहे हैं? ये इसलिए बता रहे हैं कि कृष्ण मृग

263
00:18:23,440 --> 00:18:26,960
चर्म यदि कोई व्यक्ति यूं ही धारण कर

264
00:18:26,960 --> 00:18:30,960
ले मतलब जैसे कोई शूद्र है और वो भी कृष्ण मृग चर्म धारण कर सकता

265
00:18:30,960 --> 00:18:35,680
है। ऐसा कुछ नहीं है। परंतु उसको धर्माचारी नहीं कहा जाएगा। उसको आदर्श

266
00:18:35,680 --> 00:18:40,400
रूप में प्रस्तुत करने वाली उपाधियां नहीं दी जाएंगी। मगर इनको दी गई है। इनको धर्माचारणी

267
00:18:40,400 --> 00:18:44,480
कहा गया है। इनको धर्म को जानने वाली कहा गया है। और तो और इनके द्वारा

268
00:18:44,480 --> 00:18:48,800
जो आचरण वहां दिखाए जा रहे हैं, वहां से भी सिद्ध होता है कि यह धर्म धर्म को जानने

269
00:18:48,800 --> 00:18:53,040
वाली थी और धर्माचारणी थी। तो इसलिए जब यह कृष्ण मृग चर्म

270
00:18:53,040 --> 00:18:57,200
धारण करेंगी तो वहां पर आएगा कि ये इन्होंने विधि विधान से विधि

271
00:18:57,200 --> 00:19:01,280
विधान के अनुरूप इन्होंने धारण किया है। इसलिए मानना पड़ेगा कि यह

272
00:19:01,280 --> 00:19:05,520
ब्राह्मणी थी। क्योंकि यह धर्म को जानने वाली हैं। कोई शूद्र

273
00:19:05,520 --> 00:19:09,520
है तो वह भी तपस्या कर सकता है। ऐसा नहीं है। मगर वहां पर उसको धर्माचारी नहीं कहा

274
00:19:09,520 --> 00:19:13,600
जाएगा। क्योंकि विधि क्या है? धर्म क्या है कि शूद्र को तपस्या नहीं करना है।

275
00:19:13,600 --> 00:19:17,600
ऐसे में यदि ये तपस्या करेंगी और इनको धर्माचारी कहा जाएगा और अगर

276
00:19:17,600 --> 00:19:21,680
ये विधि के विरुद्ध जाकर के तपस्या कर रही हैं

277
00:19:21,680 --> 00:19:26,480
तो फिर इनको धर्माचारिणी कहना वो संगति नहीं बैठेगी। खैर

278
00:19:26,480 --> 00:19:30,800
तो ब्राह्मणों के लिए प्रशस्त कृष्ण मृग चर्म धारण को

279
00:19:30,800 --> 00:19:35,040
विशेष रूप से चिन्हित करते हुए तपस्या करने वाले वाली

280
00:19:35,040 --> 00:19:39,280
शबरी जी के लिए धर्माचारिणी धर्मनिपुणा इत्यादि शब्दों से भी

281
00:19:39,280 --> 00:19:42,080
शबरी जी का ब्राह्मणी होना सिद्ध होता

282
00:19:42,080 --> 00:19:46,640
है। ठीक है? अब क्या बात आ गई? एक तो तपस्या तपस्या

283
00:19:46,640 --> 00:19:51,040
से उनका तपस्या करने पर भी कोई आपत्ति

284
00:19:51,040 --> 00:19:55,040
नहीं श्री राम जी के द्वारा उन पर और तपस्या करने पर शंभुक का वध कर

285
00:19:55,040 --> 00:19:59,120
डाला ठीक है वो अभी कुछ आपके पूर्वाग्रह आ रहे होंगे वो

286
00:19:59,120 --> 00:20:04,000
हमने लिए हैं पूर्व पक्ष इस विषय में दूसरा दूसरी बात क्या आई कि

287
00:20:04,000 --> 00:20:08,400
उनका ब्राह्मण सिद्ध ब्राह्मण होना ही कैसे सिद्ध होता है क्योंकि वो धर्माचारणी

288
00:20:08,400 --> 00:20:12,400
थी धर्म को जानने वाली थी ऐसा है ना कि शूद्र को छोड़ के बाकी सब तो

289
00:20:12,400 --> 00:20:16,400
तपस्या में है अधिकृत है तो फिर उनको ब्राह्मण या क्षत्रिय

290
00:20:16,400 --> 00:20:20,480
वैश्य क्यों ना माना जाए? ब्राह्मण क्यों मान लिया जाए? क्योंकि वह धर्म धर्म को जानने

291
00:20:20,480 --> 00:20:24,560
वाली होते हुए कृष्ण मृग चर्म को धारण कर रही हैं। जो कि विशेष

292
00:20:24,560 --> 00:20:28,560
रूप से ब्राह्मणों का चिन्ह है। ठीक है? इस विषय में एक शंका और उत्पन्न

293
00:20:28,560 --> 00:20:32,560
हो जाती है। देखिए आ गया वही बात कि शास्त्रों में अब ब्राह्मण श्रवण

294
00:20:32,560 --> 00:20:38,560
कुमार की शूद्रा माता सहित कौशल्या सीता

295
00:20:38,880 --> 00:20:42,880
शायद कुंती है। गांधारी हम

296
00:20:42,880 --> 00:20:47,040
और सत्यभामा द्रोपदी सगर भार्या

297
00:20:47,040 --> 00:20:51,760
सत्यवती उत्तरा अंबा शिखंडिनी

298
00:20:51,760 --> 00:20:55,840
आदि अनेक स्त्रियों के लिए तपस्विनी शब्द आया है तो विशेष

299
00:20:55,840 --> 00:20:59,840
रूप से बात करें यदि श्रवण कुमार की शूद्रा माता को तप्विनी कहे जाने

300
00:20:59,840 --> 00:21:04,320
की तो जिस प्रकार ट्रेन में यात्रा करने वाले

301
00:21:04,320 --> 00:21:08,720
जिस प्रकार ट्रेन में बिना टिकट यात्रा करने वाले व्यक्ति को भी यात्री

302
00:21:08,720 --> 00:21:12,720
ही कहा जाएगा उसी प्रकार विधि का उल्लंघन करते हुए

303
00:21:12,720 --> 00:21:17,200
तप करने वाले किसी अनाधिकृत व्यक्ति को भी

304
00:21:17,200 --> 00:21:21,360
तपस्वी तो कहा ही जाएगा ना। मगर क्या

305
00:21:21,360 --> 00:21:25,440
श्रवण कुमार की शूद्रा माता को धर्माचारिणी कहा गया

306
00:21:25,440 --> 00:21:29,520
है? धर्म को जानने वाली कहा गया है? क्या उसे आदर्श रूप में प्रस्तुत करने

307
00:21:29,520 --> 00:21:33,760
वाली उपाधियां दी गई है? क्या वहां पर उस तप का

308
00:21:33,760 --> 00:21:37,840
समर्थन करने वाले श्री राम खड़े हैं? इस पूरे विषय में

309
00:21:37,840 --> 00:21:42,160
सबसे बड़ा जो प्रमाण है वह राम है क्योंकि वहां

310
00:21:42,160 --> 00:21:46,160
पर राम खड़े हुए हैं। राम अपने आप में धर्म है।

311
00:21:46,160 --> 00:21:51,040
ठीक है? तो क्या करते हैं आगे?

312
00:21:51,040 --> 00:21:55,040
तो जिस प्रकार ट्रेन में बिना टिकट यात्रा करने वाले व्यक्ति

313
00:21:55,040 --> 00:21:59,120
को भी यात्री ही कहा जाएगा। उसी प्रकार अनाधिकृत रूप से तपस्या

314
00:21:59,120 --> 00:22:01,520
करने वाले

315
00:22:01,520 --> 00:22:05,680
के लिए तपस्वी शब्द के उपयोग पर आपत्ति कैसे हो सकती

316
00:22:05,680 --> 00:22:09,840
है? क्योंकि पूर्व काल में किसी के कहने अथवा करने से नहीं

317
00:22:09,840 --> 00:22:14,080
बल्कि शास्त्रों द्वारा स्वीकार किए जाने पर ही किसी घटनाक्रम को

318
00:22:14,080 --> 00:22:18,240
सनातन सिद्धांत के रूप में स्वीकार कर उसका अनुकरण किया जा सकता

319
00:22:18,240 --> 00:22:22,320
है। कहां लिखा है? महाभारत शांति पर्व दो

320
00:22:22,320 --> 00:22:25,120
262

321
00:22:25,120 --> 00:22:29,440
52 से 53 और 260 छ से सात अब यह बात मैंने क्यों कही

322
00:22:29,440 --> 00:22:33,920
कि भाई अगर शास्त्र में कोई व्यक्ति या

323
00:22:33,920 --> 00:22:38,160
सामान्य दृष्टि से देख लें तो यदि कोई हमने कोई कथा सुनी

324
00:22:38,160 --> 00:22:42,160
और उसमें किसी व्यक्ति के द्वारा ट्रेन में बिना टिकट यात्रा

325
00:22:42,160 --> 00:22:46,240
करने पर उसको जो है यात्री कह दिया गया तो इसलिए क्या हम यह मान लें कि

326
00:22:46,240 --> 00:22:50,240
ट्रेन में बिना टिकट यात्रा करना क्या कहते हैं कानून का उल्लंघन

327
00:22:50,240 --> 00:22:54,720
नहीं है। यह मान लें क्योंकि

328
00:22:54,720 --> 00:22:58,800
किसी घटनाक्रम को बताते समय हमारे किसी प्रमाणिक स्त्रोत ने उसको भी यात्री

329
00:22:58,800 --> 00:23:03,280
कह दिया गया। नहीं जब तक उसकी यात्रा

330
00:23:03,280 --> 00:23:07,280
करने को उचित अथवा अनुचित की दृष्टि से नहीं देखा जाएगा

331
00:23:07,280 --> 00:23:12,000
तब तक हम उस दृष्टांत से उस घटनाक्रम से कोई

332
00:23:12,000 --> 00:23:16,320
निर्णय नहीं ले सकते कि वहां पर यह धर्म है या यह अधर्म

333
00:23:16,320 --> 00:23:20,480
है। ठीक है? परंतु यहां पर

334
00:23:20,480 --> 00:23:24,560
शबरी जी के तप करने को समर्थन प्राप्त हुआ है। शास्त्रकार द्वारा

335
00:23:24,560 --> 00:23:29,120
भी, शास्त्र के रचयिता द्वारा भी और शास्त्र के रचयिता

336
00:23:29,120 --> 00:23:33,280
के द्वारा बताए गए घटनाक्रम के अनुसार वहां पर उपस्थित

337
00:23:33,280 --> 00:23:37,360
श्री राम के द्वारा भी जो कि अपने आप में धर्म के

338
00:23:37,360 --> 00:23:40,560
साक्षी हैं। धर्म की धर्म के विग्रहवान स्वरूप

339
00:23:40,560 --> 00:23:44,560
हैं। सत्य प्रतिज्ञ हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम है। ऐसे

340
00:23:44,560 --> 00:23:48,560
में विचारणीय है कि क्या धर्म के साक्षात मूर्तिमान स्वरूप मर्यादा पुरुषोत्तम

341
00:23:48,560 --> 00:23:52,640
श्री राम के द्वारा शबरी की भांति श्रवण कुमार की माता के आचरण

342
00:23:52,640 --> 00:23:56,640
की प्रशंसा की गई है? क्या शास्त्रों द्वारा श्रवण कुमार की मां

343
00:23:56,640 --> 00:24:00,720
को कृष्ण मृग चर्म व जटा धारण पूर्वक निर्वाह

344
00:24:00,720 --> 00:24:04,880
करने वाली धर्माचारिणी कहा गया है? अभिप्राय यह

345
00:24:04,880 --> 00:24:08,960
है कि घटना का घटित होना उसके धर्म सम्मत होने

346
00:24:08,960 --> 00:24:13,200
में प्रमाण नहीं होता है। उसे शास्त्रों द्वारा धर्म के रूप में स्वीकार

347
00:24:13,200 --> 00:24:17,200
किया जाना ही प्रमाण होता है। शबरी को शास्त्रों द्वारा

348
00:24:17,200 --> 00:24:21,440
धर्म के रूप में स्वीकार किया गया। उसके आचरण को कैसे? धर्माचारणी

349
00:24:21,440 --> 00:24:27,440
कहकर कैसे? श्री राम के द्वारा प्रशंसनीय कहकर

350
00:24:27,760 --> 00:24:31,840
ठीक जिस प्रकार शास्त्रों में रावण के कृत्यों का वर्णन मात्र कर देने से

351
00:24:31,840 --> 00:24:36,000
रावण के कृत्य अनुकरणीय नहीं हो जाते धर्म नहीं हो जाते

352
00:24:36,000 --> 00:24:40,080
उसी प्रकार श्रवण कुमार की शूद्रा माता द्वारा तप किए जाने पर

353
00:24:40,080 --> 00:24:44,560
उसे तपस्विनी कहे जाने पर उसके द्वारा तप करना धर्म नहीं हो जाता

354
00:24:44,560 --> 00:24:48,880
उचित सिद्ध नहीं हो जाता अतः श्रवण कुमार की मां को तपस्वनी

355
00:24:48,880 --> 00:24:53,440
कहे जाने से शबरी के ब्राह्मणी होने का कोई विरोध सिद्ध नहीं होता है।

356
00:24:53,440 --> 00:24:57,520
एक पूर्वाग्रह समाप्त। अब बात करें शेष स्त्रियों के लिए। बात करें

357
00:24:57,520 --> 00:25:01,920
शेष शेष स्त्रियों की तो यद्यपि यह सभी महिलाएं तपस्या में अधिकृत

358
00:25:01,920 --> 00:25:06,000
थी। तथापि क्योंकि शास्त्रों में गौण अर्थ में गृहस्थ

359
00:25:06,000 --> 00:25:10,240
जीवन को समर्पित अथवा किसी विशेष उद्देश्य में संलग्न अनुशासित

360
00:25:10,240 --> 00:25:14,480
निर्वाह करने वाले किसी मनुष्य मात्र को भी तप करने वाला

361
00:25:14,480 --> 00:25:18,640
कहा गया है। जिस प्रकार विष्णु पुराण में भगवान शब्द के

362
00:25:18,640 --> 00:25:22,720
उपयोग हेतु बताया गया है कि गौण अर्थ में इस

363
00:25:22,720 --> 00:25:26,880
शब्द का उपयोग गुरुजन माता-पिता इत्यादि किसी मान्य

364
00:25:26,880 --> 00:25:31,120
व्यक्ति के लिए भी हो सकता है। परंतु मुख्य रूप से भगवान

365
00:25:31,120 --> 00:25:35,120
शब्द का उपयोग तो भगवान के लिए ही किया जाता है। विष्णु पुराण

366
00:25:35,120 --> 00:25:39,600
छठवें अध्याय में है यह बात। ठीक उसी प्रकार गौण

367
00:25:39,600 --> 00:25:42,960
रूप से अनुशासित ग्रहणी को भी तपनी कहा जा सकता

368
00:25:42,960 --> 00:25:47,520
है। परंतु शबरी की तपस्या का अर्थ गौण ना होकर मुख्यता क्योंकि

369
00:25:47,520 --> 00:25:51,680
वह शारीरिक क्लेश युक्त ध्यान उपासना करते हुए

370
00:25:51,680 --> 00:25:56,080
अती्द्रिय विषयों में निश्चित उद्देश्य की प्राप्ति हेतु संघर्ष

371
00:25:56,080 --> 00:26:00,560
करने वाली सिद्धा थी। ठीक जिस प्रकार का तप

372
00:26:00,560 --> 00:26:04,960
के मुख्य अर्थ से युक्त तपस्या

373
00:26:04,960 --> 00:26:09,120
शंभू कर रहा था। परंतु जहां एक ओर शंभू की तपस्या के परिणाम स्वरूप

374
00:26:09,120 --> 00:26:13,200
उसे राजा द्वारा मृत्युदंड प्राप्त हुआ। वहीं दूसरी ओर शबरी द्वारा किए

375
00:26:13,200 --> 00:26:17,920
गए तप के परिणाम स्वरूप उन्हें भगवत धाम प्राप्त हुआ।

376
00:26:17,920 --> 00:26:22,400
इसी क्रम में एक आपत्ति और उठाई जाती है कि क्योंकि शंभूक

377
00:26:22,400 --> 00:26:26,400
गलत उद्देश्य से तपस्या कर रहा था इसलिए उसका वध किया गया।

378
00:26:26,400 --> 00:26:30,480
अब एक और आ गया भाई गलत उद्देश्य से तपस्या

379
00:26:30,480 --> 00:26:34,800
कर रहा था इसलिए जो है उसको उसका वध किया गया

380
00:26:34,800 --> 00:26:38,960
तो क्या अगर कोई शूद्र सही उद्देश्य से तपस्या करेगा

381
00:26:38,960 --> 00:26:43,440
या वेदोक्त कर्मों को करेगा तो उसको ग्राहय होगा वो हां

382
00:26:43,440 --> 00:26:47,440
क्या बचकाने जैसे आर्गुमेंट लेके आए हो आप लोग ये है आप

383
00:26:47,440 --> 00:26:51,600
लोगों की तैयारी शंकर परंपरा से करपात्री जी महाराज से भिड़ने के संबंध

384
00:26:51,600 --> 00:26:55,600
में यह तैयारी है हां अगर कोई

385
00:26:55,600 --> 00:26:58,080
शूद्र शद्र है जो अच्छे उद्देश्य से वेदोक्त कर्म

386
00:26:58,080 --> 00:27:02,240
करेगा तो विधि विधि निषेध का उल्लंघन नहीं माना जाएगा विधि

387
00:27:02,240 --> 00:27:08,240
युक्त माना जाएगा उसे

388
00:27:08,400 --> 00:27:13,360
तो क्या है आंसर तो

389
00:27:13,360 --> 00:27:17,600
यहां प्रश्न ये उठता है कि क्या किसी शूद्र द्वारा अच्छे उद्देश्य से तपस्या

390
00:27:17,600 --> 00:27:21,600
करने के करने को शास्त्र शास्त्रोचित मान लिया

391
00:27:21,600 --> 00:27:25,680
जाएगा उद्देश्य कैसा भी हो मर्यादा के अतिक्रमण पूर्वक

392
00:27:25,680 --> 00:27:29,760
किए जाने वाले कार्य को मर्यादा पूर्वक तो नहीं माना जा सकता। ठीक जिस

393
00:27:29,760 --> 00:27:33,760
प्रकार एक अभियंता किसी किसी की प्राण रक्षा के निमित्त उसके

394
00:27:33,760 --> 00:27:38,080
शरीर की चीर फाड़ करना प्रारंभ कर दे। कोई इंजीनियर है वो दिक्कत

395
00:27:38,080 --> 00:27:42,320
नहीं है ऑपरेशन में और उसने भैया मैं तो प्राण रक्षा के लिए कर रहा हूं।

396
00:27:42,320 --> 00:27:46,400
चीड़ फाड़ करना प्रारंभ कर दे कि उसका उद्देश्य तो अच्छा था। इसलिए अब उसको कुछ

397
00:27:46,400 --> 00:27:50,960
ना कहा जाए उसकी मूर्खता के लिए। हम उसी में तो आ रहे हो।

398
00:27:50,960 --> 00:27:55,360
कर्मणा वर्ण व्यवस्था को ला रहे हो ना। कर्मणा के समर्थन कर्ता कर्मणा

399
00:27:55,360 --> 00:27:59,760
जगत गुरु आजकल बन गए हैं। ऐसे इंजीनियर

400
00:27:59,760 --> 00:28:03,920
ऐसे अभियंता को दंड नहीं दिया जाएगा जो अपनी मूर्खता के कारण जिसको

401
00:28:03,920 --> 00:28:08,080
बचाने चल रहा है उसके प्राणों को और उसको और कष्ट में डालने

402
00:28:08,080 --> 00:28:12,080
की तैयारी कर रहा है। जिस विषय में गति नहीं है जिस विषय में उसका अधिकार नहीं

403
00:28:12,080 --> 00:28:13,360
है उसमें वो पैर

404
00:28:13,360 --> 00:28:17,520
डाल रहा है अपना। हम इसलिए शास्त्र कहते हैं क्या कहते

405
00:28:17,520 --> 00:28:21,840
हैं? अपने अपने वर्ण तथा आश्रम के अनुसार स्वकर्तव्य

406
00:28:21,840 --> 00:28:25,840
निष्ठा ही धर्म है। कहां लिखा है? भगवत गीता 18

407
00:28:25,840 --> 00:28:29,920
45 मनुस्मृति 735 अर्थात अपने निर्धारित कर्मों

408
00:28:29,920 --> 00:28:33,920
के विरुद्ध कर्म करना ही अधर्म है। अपराध है। ऐसे में

409
00:28:33,920 --> 00:28:38,000
अपराधी दंड का पात्र भी होता है। अतः शंभू द्वारा गलत उद्देश्य

410
00:28:38,000 --> 00:28:42,240
से की जाने वाली तपस्या के कारण तथा शबरी की तपस्या में अच्छा

411
00:28:42,240 --> 00:28:46,320
उद्देश्य होने पर भी शबरी के शूद्रा होते हुए उसका तपस्या में अधिकृत

412
00:28:46,320 --> 00:28:50,480
होना सिद्ध नहीं होता। एवं इसी क्रम में आगे श्री राम द्वारा उसके

413
00:28:50,480 --> 00:28:54,800
आचरण का विरोध ना करके प्रशंसा तथा शबरी को धर्माचारणी

414
00:28:54,800 --> 00:28:58,880
इत्यादि कहा जाना युक्ति युक्त सिद्ध नहीं होता। सरल

415
00:28:58,880 --> 00:29:03,200
भाषा में कहे तो शख की तपस्या में निहित गलत उद्देश्य से शबरी

416
00:29:03,200 --> 00:29:08,400
के ब्राह्मणी होने का विरोध सिद्ध नहीं होता। इसको कहते हैं अकाट्य।

417
00:29:08,400 --> 00:29:12,400
कहा था ना जब भी बोलेंगे तो अकाट्य बोलेंगे। यहां ध्यान रखने वाली

418
00:29:12,400 --> 00:29:15,920
बात यह है कि

419
00:29:15,920 --> 00:29:20,160
सकाम उद्देश्य के लिए किए जाने वाले तप का फल प्राप्त होना तो सामान्य है।

420
00:29:20,160 --> 00:29:24,160
जिस प्रकार अनेक राक्षसों द्वारा तप करने पर उन्हें उनका अभीष्ट

421
00:29:24,160 --> 00:29:28,400
फल प्राप्त हुआ भी है। परंतु विधि को जानने वाला होते हुए भी

422
00:29:28,400 --> 00:29:32,640
विधि विरुद्ध आचरण करने पर का फल मुक्ति किस प्रकार माना जा सकता

423
00:29:32,640 --> 00:29:37,200
है। किस प्रकार मानोगे मुक्ति? नान्या पंथा कहा गया है ना?

424
00:29:37,200 --> 00:29:41,280
कैसे मानोगे मुक्ति? वेद भगवान कह रहे हैं। ध्यान रहे

425
00:29:41,280 --> 00:29:45,360
वेद भगवान की घोषणा है। नान्या पंथा

426
00:29:45,360 --> 00:29:49,440
क्या परम पद अर्थात मोक्ष पाने के लिए वेद के अतिरिक्त दूसरा

427
00:29:49,440 --> 00:29:53,440
कोई मार्ग नहीं है। कहां लिखा है? श्रोता शत्रुपनिषद तीन आठ

428
00:29:53,440 --> 00:29:57,840
यजुर्वेद 31 18 हम रामपालियों

429
00:29:57,840 --> 00:30:01,920
को आंसर देते थे ये वाले। जब वो कहते थे वेद में कहां लिखा है कि वेद से

430
00:30:01,920 --> 00:30:07,760
मुक्ति होगी। आज तुम लोगों को देने पड़ रहे हैं। शर्म आनी चाहिए।

431
00:30:07,760 --> 00:30:11,920
श्रुति और स्मृति मेरी आज्ञा है। जो इसका पालन नहीं करता वह

432
00:30:11,920 --> 00:30:16,160
आज्ञा छेदी मेरा द्रोही है। चाहे वह मेरी भक्ति

433
00:30:16,160 --> 00:30:20,160
करे तो भी उसे वैष्णव नहीं मानना चाहिए। विष्णु धर्म

434
00:30:20,160 --> 00:30:24,720
पुराण में भी है और एक वाधुली स्मृति में स्मृति है। उसमें भी संभवता

435
00:30:24,720 --> 00:30:28,720
है। अतः इस प्रकरण में भी धर्म को जानने वाली शबरी

436
00:30:28,720 --> 00:30:31,120
द्वारा शूद्रा होते हुए भी

437
00:30:31,120 --> 00:30:35,280
अवधि पूर्वक तप करने पर उसको मुक्ति प्राप्त होना सिद्ध

438
00:30:35,280 --> 00:30:39,280
नहीं होता। शास्त्रों से संगति नहीं बैठ रही। शूद्रा

439
00:30:39,280 --> 00:30:43,600
होते हुए अधि पूर्वक वो तप अगर कर रही है तो शास्त्रों से संगति

440
00:30:43,600 --> 00:30:47,600
कैसे बैठेगी? उसको मोक्ष कैसे मिल रहा है? मुक्ति कैसे मिल रही

441
00:30:47,600 --> 00:30:51,600
है? एक ही तो मार्ग है ना वेद वैदिक मार्ग मुक्ति प्राप्त

442
00:30:51,600 --> 00:30:55,920
करने का और कोई मार्ग नहीं है उसके बाहर। तो विधि को जानने

443
00:30:55,920 --> 00:30:59,920
वाली होते हुए भी विधि का परित्याग करके वह काम कर रही है। फिर भी उसको

444
00:30:59,920 --> 00:31:03,600
मुक्ति मिल रही है।

445
00:31:03,600 --> 00:31:06,160
खैर

446
00:31:06,160 --> 00:31:10,160
उसको मुक्ति प्राप्त होना सिद्ध नहीं होता। इस प्रकार शास्त्रीय

447
00:31:10,160 --> 00:31:14,480
वचनों सहित मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के साथ संगति ना होने पर शबरी

448
00:31:14,480 --> 00:31:18,880
का ब्राह्मण होना ही सिद्ध होता है। अगर शूद्रा लेकर के जाएंगे

449
00:31:18,880 --> 00:31:23,120
तो मुक्ति के साथ संगति नहीं आएगी। राम के साथ संगति नहीं आएगी। धर्माचारणी

450
00:31:23,120 --> 00:31:27,120
के साथ संगति नहीं आएगी। कृष्ण मृग चर्म के साथ संगति नहीं

451
00:31:27,120 --> 00:31:31,280
आएगी। जटा के साथ संगति नहीं आएगी। विधि को जानने वाली

452
00:31:31,280 --> 00:31:35,680
होने के संबंध में संगति नहीं आएगी। आनंद रामायण

453
00:31:35,680 --> 00:31:39,680
में भी प्रभु श्री राम ने शबरी को

454
00:31:39,680 --> 00:31:44,160
शूद्र होने के कारण दासी मानने का खंडन किया है।

455
00:31:44,160 --> 00:31:48,320
हम क्या वहां पर कहा है कि वो कोई दासी

456
00:31:48,320 --> 00:31:52,480
नहीं है। वह तो मुनियों की सेवा में रत तापसी है।

457
00:31:52,480 --> 00:31:56,800
राज्यकांड पूर्वार्ध सर्ग तीन 44

458
00:31:56,800 --> 00:32:00,960
व श्लोक धातव्य है कि शबरी के गुरु जिन्हें महर्षि भी कहा

459
00:32:00,960 --> 00:32:05,760
गया है। गायत्री मंत्र का जप करते थे। चलो ब्रह्म भाव से भगवान

460
00:32:05,760 --> 00:32:10,320
को रखा है ना ब्रह्म भाव से कुछ भी कर सकते हैं। मगर यह तो यहां पर वेदोक्त

461
00:32:10,320 --> 00:32:14,400
कर्म करने वाले गायत्री मंत्र का जप करने वाले हैं जिसके लिए

462
00:32:14,400 --> 00:32:18,880
कठोर वर्णाश्रम धर्म का पालन आवश्यक होता है। तो सभी जानते होंगे ना इतना

463
00:32:18,880 --> 00:32:22,960
तुम लोगों को जो अब इस वीडियो को यहां तक झेल गए हैं जो देख

464
00:32:22,960 --> 00:32:26,960
पा रहे हैं। इसका मतलब है वो वर्णाश्रमी हैं। है ना? परंपरा निष्ठ

465
00:32:26,960 --> 00:32:31,040
तो हैं। अब परंपरा को किस रूप में वो स्वीकार करते हैं वो बात अलग है। मगर

466
00:32:31,040 --> 00:32:35,360
परंपरा का जो क्या कहते हैं जो तंत्र है परंपरा

467
00:32:35,360 --> 00:32:39,600
का उसका विरोध करने वाले तो नहीं है ना। परंपरा की जो विधि है उसका विरोध

468
00:32:39,600 --> 00:32:43,600
करने वाले तो नहीं है ना। तो क्या है? गायत्री मंत्र कौन जपता है?

469
00:32:43,600 --> 00:32:47,600
जो वर्णाश्रम धर्म का पालन करता है। शौचाचार का पालन करता है।

470
00:32:47,600 --> 00:32:51,920
विधि निषेध का पालन करता है। और शबरी के गुरु कौन थे?

471
00:32:51,920 --> 00:32:56,960
जो महर्षि थे। गायत्री मंत्र का जप करते थे।

472
00:32:56,960 --> 00:33:01,200
ऐसे मुनिजनों की सेवा पूर्वक शबरी जी आश्रम में निवास करती

473
00:33:01,200 --> 00:33:05,200
थी। कौन थी भीलनी अस्पश्य और वो निवास

474
00:33:05,200 --> 00:33:09,920
कहां कर रही हैं? गायत्री मंत्र का जाप करने वाले मुनियों के आश्रम में।

475
00:33:09,920 --> 00:33:13,920
और तब भी उस आश्रम को विधि निषेध हो रहा है क्योंकि अगर वो शूद्र

476
00:33:13,920 --> 00:33:18,160
है तो विधि निषेध हो रहा है। गायत्री मंत्र का जप चल रहा है। उनको भगवत धाम की प्राप्ति

477
00:33:18,160 --> 00:33:22,720
भी हो रही है। मुक्ति भी मिल रही है। और अंतत गत्वा शास्त्र रचनाकार

478
00:33:22,720 --> 00:33:27,120
के द्वारा ऐसे आश्रम को पवित्र भी कहा जा रहा है। कहां है?

479
00:33:27,120 --> 00:33:31,200
3 74 15 374 22 से 23

480
00:33:31,200 --> 00:33:34,160
तक यहां विचारणीय है कि यदि शबरी

481
00:33:34,160 --> 00:33:38,160
अस्पर्श भीलनी होती तो उसका वर्णाश्रम मर्यादा के विरुद्ध

482
00:33:38,160 --> 00:33:42,160
आश्रम में निवास होने पर भी गायत्री मंत्र का जाप करने वालों

483
00:33:42,160 --> 00:33:46,320
वालों को महर्षि क्यों कहा जाता उस आश्रम को महर्षि वाल्मीकि जी

484
00:33:46,320 --> 00:33:50,480
द्वारा पवित्र परम पवित्र क्यों कहा जाता पद्म पुराण के अनुसार

485
00:33:50,480 --> 00:33:54,560
शबरी जी ने स्मार्थ धर्म के अनुसार श्री राम जी को कुश

486
00:33:54,560 --> 00:33:58,560
का आसन प्रदान किया था पद्म पुराण उत्तर खंड

487
00:33:58,560 --> 00:34:02,560
200 68 उपरोक्त शास्त्र वाक्यों से

488
00:34:02,560 --> 00:34:06,560
शबरी का धर्म को जानने वाली होना भी सिद्ध होता है। इसी क्रम में उन्होंने

489
00:34:06,560 --> 00:34:10,560
प्रभु श्री राम का भी विधिवत अर्थात शास्त्र सम्मत

490
00:34:10,560 --> 00:34:14,640
आतिक ही किया था। विधि युक्त था। भाई ठीक है।

491
00:34:14,640 --> 00:34:19,200
ब्रह्म भाव से हम कुछ भी खिला दे रहे हैं। वो ठीक है। उसको विधि युक्त थोड़ी ना कहा जाएगा।

492
00:34:19,200 --> 00:34:23,600
विधि युक्त है ना? तो क्या था?

493
00:34:23,600 --> 00:34:27,920
विधिवत अर्थात शास्त्र सम्मत आत ही किया था। उसमें

494
00:34:27,920 --> 00:34:31,920
क्या विधि में विधि के बाहर जाके हो रहा है ना ब्रह्म भाव से

495
00:34:31,920 --> 00:34:36,240
जो भी हो रहा है विधि के बाहर तो है। तो क्या अब झूठा खिलाने

496
00:34:36,240 --> 00:34:40,400
को मनुस्मृति में मान्य किया गया है क्या कि आने वाले अतिथि

497
00:34:40,400 --> 00:34:44,800
को अपना झूठा खिलाया जाए हम तो

498
00:34:44,800 --> 00:34:49,040
शास्त्र सम्मत आत ही किया था। वाल्मीकि रामायण तीन 74

499
00:34:49,040 --> 00:34:49,540
सात

500
00:34:49,440 --> 00:34:53,600
और आनंद रामायण

501
00:34:53,600 --> 00:34:57,920
3 108 यहां ध्यातव्य है कि गुरुजनों ने भी शबरी

502
00:34:57,920 --> 00:35:02,000
जी को श्री रामचंद्र जी का यथाविधि सत्कार करने का ही

503
00:35:02,000 --> 00:35:06,320
आदेश दिया था। 374 15 से 16

504
00:35:06,320 --> 00:35:10,480
देखिए उनके जो गुरुजन थे चलो भक्ति में डूब कौन रही है? शबरी

505
00:35:10,480 --> 00:35:14,560
और ब्रह्म भाव से मर्यादा के बाहर कौन आ रहे हैं? मगर जो गुरुजन है जो

506
00:35:14,560 --> 00:35:19,440
गायत्री मंत्र का जाप करते हुए जा रहे हैं हम वह जाते-जाते

507
00:35:19,440 --> 00:35:23,920
यथाविधि सत्कार करने का आदेश देकर के जा रहे हैं। इसलिए शबरी जी ने उनका

508
00:35:23,920 --> 00:35:28,000
सत्कार किया आतिथ्य के रूप में। ध्यातव्य यह भी है कि

509
00:35:28,000 --> 00:35:32,320
जहां एक ओर शंभू के तप द्वारा ब्राह्मण के बालक की अकाल मृत्यु

510
00:35:32,320 --> 00:35:36,480
हो गई थी। वहीं दूसरी ओर शबरी जी के तप के द्वारा उन्हें भगवत प्राप्ति

511
00:35:36,480 --> 00:35:40,800
जैसे मांगलिक फल प्राप्त हो रहे हैं। हां

512
00:35:40,800 --> 00:35:44,800
तो क्या है आगे उपरोक्त शास्त्र वाक्यों के आधार पर मर्यादा पुरुषोत्तम

513
00:35:44,800 --> 00:35:48,880
श्री राम के समक्ष धर्माचारिणी शबरी जी का तप शास्त्र

514
00:35:48,880 --> 00:35:52,960
सम्मत सिद्ध होने के कारण उनका शूद्रा ना होकर ब्राह्मण होना ही सिद्ध

515
00:35:52,960 --> 00:35:57,280
होता है। तथा इसी क्रम में शबरी जी द्वारा श्री राम का विधिवत

516
00:35:57,280 --> 00:36:01,520
आतिथ्य होने के कारण श्री राम द्वारा शबरी के झूठे बेर खाना भी सिद्ध

517
00:36:01,520 --> 00:36:05,440
नहीं होता। अन्यथा निम्नलिखित

518
00:36:05,440 --> 00:36:09,520
शास्त्र वाक्यों की हानि होगी। श्री राम कौन-कौन से शास्त्र वाक्य

519
00:36:09,520 --> 00:36:13,760
जिनकी हानि होगी? श्री राम अपने धर्म में दृण प्रतिज्ञ पीछे

520
00:36:13,760 --> 00:36:17,920
हमने दृण प्रतिज्ञ वाला देखा ना श्री राम अपने धर्म में दण दृण

521
00:36:17,920 --> 00:36:22,000
प्रतिज्ञ स्वधर्म का पालन करने वाले सदाचारी अर्थात शास्त्र

522
00:36:22,000 --> 00:36:25,440
सम्मत आचरण करने वाले

523
00:36:25,440 --> 00:36:29,600
अपने क्षत्रिय धर्म को प्राथमिकता देने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम

524
00:36:29,600 --> 00:36:33,840
अर्थात विग्रहवान धर्म नहीं थे। एवं इसी क्रम में उनका चरित्र

525
00:36:33,840 --> 00:36:37,840
मनुष्य के लिए अनुकरणीय भी नहीं था। क्या-क्या हो गया?

526
00:36:37,840 --> 00:36:42,080
वहां तो अनुकरणीय कहा जा रहा है। यहां अनुकरणीय ना होना सिद्ध हो रहा है। वहां

527
00:36:42,080 --> 00:36:46,320
छात्रय धर्म को प्राथमिकता देने वाला कहा जा रहा है। यहां छात्र

528
00:36:46,320 --> 00:36:50,400
जो है छात्रय धर्म को पीछे छोड़ने वाला

529
00:36:50,400 --> 00:36:54,640
सिद्ध हो रहा है। अगर शूद्र मान लेंगे तो सत्य प्रतिज्ञा की

530
00:36:54,640 --> 00:36:58,960
बात भी टूट रही है क्योंकि वह अह अनेकोंनेक

531
00:36:58,960 --> 00:37:03,760
प्रकार से मनुस्मृति का पालन करने वाले हैं और

532
00:37:03,760 --> 00:37:08,000
भरत जी के शासन में जो है धर्म धर्म संस्थापना के निमित्त कार्य

533
00:37:08,000 --> 00:37:12,080
करने वाले तो वो सारी सत्य प्रतिज्ञाएं भी वो वहां पर सत्य प्रतिज्ञा भी

534
00:37:12,080 --> 00:37:16,080
सिद्ध नहीं हो रहे और अनेकानेक अन्य

535
00:37:16,080 --> 00:37:20,320
प्रकार से चीजें वो हो रही साथ ही साथ शबरी जी

536
00:37:20,320 --> 00:37:21,280
धर्माचार्य

537
00:37:21,280 --> 00:37:25,440
णी धर्म निपुणा भी सिद्ध नहीं हो रही है। उन्होंने श्री राम

538
00:37:25,440 --> 00:37:29,520
का विधिवत आतित्य भी नहीं किया। विधिवत नहीं था। वो विधि युक्त नहीं था। विधि क्या

539
00:37:29,520 --> 00:37:33,600
है? धर्म शास्त्र कहते हैं वो विधि है। ऐसे में मीमांसा दर्शन के

540
00:37:33,600 --> 00:37:38,000
भाष्यकार मैथिल मनीषी श्री शबराचार्य के सदृश्य

541
00:37:38,000 --> 00:37:42,080
ही शबरी शब्द को जाति बोधक ना लेकर संज्ञात्मक रूप में

542
00:37:42,080 --> 00:37:46,640
ही ग्रहण करना युक्ति युक्त है। शबराचार्य

543
00:37:46,640 --> 00:37:50,640
एक हुए हैं। ब्राह्मण थे और मीमांसा दर्शन

544
00:37:50,640 --> 00:37:54,720
के भाष्यकार थे और उनका नाम था शबराचार्य। तो

545
00:37:54,720 --> 00:37:58,960
शबरी के नाम से उसको जो है क्योंकि उसमें सब आ गया तो इसलिए

546
00:37:58,960 --> 00:38:03,120
उसे शूद्र मानना वो ठीक नहीं है। नहीं तो इतने

547
00:38:03,120 --> 00:38:07,280
सारे शास्त्रों शास्त्र वाक्यों की हानि होगी। अब इस प्रकार धर्म को जानने

548
00:38:07,280 --> 00:38:12,160
वाली धर्माचारणी होते हुए ब्राह्मण चिन्हों को धारण पूर्वक तपस्या में

549
00:38:12,160 --> 00:38:16,480
ब्राह्मण चिन्हों के धारण पूर्वक तपस्या में संलग्न होने पर मर्यादा

550
00:38:16,480 --> 00:38:20,480
पुरुषोत्तम श्री राम द्वारा सब प्रकार से प्रशंसित होने वाली शबरी का ब्राहणी

551
00:38:20,480 --> 00:38:24,640
होना ही सिद्ध होता है। अब अगला

552
00:38:24,640 --> 00:38:28,720
एक कोई क्लेम है उसको ले लेते हैं। भगवान श्री राम चंद्र

553
00:38:28,720 --> 00:38:33,120
ने सर्व समर्थवान है। भगवान श्री रामचंद्र

554
00:38:33,120 --> 00:38:36,480
सर्व समर्थवान हैं। जब वह मरे हुए

555
00:38:36,480 --> 00:38:40,880
को जीवित कर सकते हैं। पत्थर को तैरा सकते हैं। दुदुभी को शरीर दुदुभी

556
00:38:40,880 --> 00:38:44,960
के शरीर को अपने पैर के अंगूठे के प्रहार मात्र से अनेकों योजन दूर

557
00:38:44,960 --> 00:38:50,160
फेंक सकते हैं। और इस जैसे अनेक

558
00:38:50,160 --> 00:38:54,240
अतिमानवीय असाधारण

559
00:38:54,240 --> 00:38:58,320
कार्य कर सकते हैं तो वह ब्रह्म भाव से शबरी के झूठे

560
00:38:58,320 --> 00:39:02,320
बेर क्यों नहीं खा सकते? वाल्मीकि रामायण में रामचंद्र जी मर्यादा पुरुषोत्तम

561
00:39:02,320 --> 00:39:06,320
कहे गए हैं। हां बिल्कुल धर्माचरण करने वाले कहे गए हैं। तो वहां पर वो

562
00:39:06,320 --> 00:39:10,400
जो है अभक्ष भक्ष नहीं करेंगे। मतलब भक्ष भक्षण नहीं किया उन्होंने। शबरी के झूठे भेर खाना

563
00:39:10,400 --> 00:39:14,480
क्या है? शबरी के झूठे भेर खाना उन्होंने ब्रह्म भाव में खाया है। भक्ति भाव में खाया

564
00:39:14,480 --> 00:39:18,640
है। तो फिर सबसे पहले सर्वप्रथम यह विचारणीय है कि श्री

565
00:39:18,640 --> 00:39:22,720
राम द्वारा किए गए अतिमानवीय कार्यों जैसे पाषाण, तारण

566
00:39:22,720 --> 00:39:26,800
या दुदुंबी के कंकाल का प्रहार से किसी भी धर्म शास्त्रीय

567
00:39:26,800 --> 00:39:30,960
मर्यादा का उल्लंघन नहीं होता। क्या वह पुल बना रहे हैं तो उससे धर्म शास्त्र

568
00:39:30,960 --> 00:39:34,960
का कोई वाक्य का उल्लंघन हो रहा है? क्या वह दुदुंबी को अनेकों

569
00:39:34,960 --> 00:39:38,960
योजन दूर फेंक रहे हैं तो उससे कोई मर्यादा टूट रही है?

570
00:39:38,960 --> 00:39:43,520
उसके बाहर जाकर के कर रहे हैं। ऐसा कोई निषेध नहीं है। ठीक है?

571
00:39:43,520 --> 00:39:48,000
शास्त्रों में सामर्थ्य प्रदर्शन को वर्जित नहीं किया गया। किंतु अभक्ष भक्षण

572
00:39:48,000 --> 00:39:51,680
या उच्छिष्ट झूठा भोजन को स्पष्टता निषिद्ध माना

573
00:39:51,680 --> 00:39:55,680
गया है। पीछे प्रमाण दे आए हैं मनुस्मति। सामर्थ्य द्वारा प्राकृतिक

574
00:39:55,680 --> 00:39:59,840
नियमों गुरुत्वाकर्षण आदि पर विजय प्राप्त करना मर्यादा उल्लंघन नहीं है।

575
00:39:59,840 --> 00:40:04,000
मर्यादा का अर्थ है वेदों और ऋषियों द्वारा स्थापित धार्मिक विधि

576
00:40:04,000 --> 00:40:10,000
निषेध इत्यादि मर्यादा के भीतर रहना। झूठे बेर

577
00:40:10,320 --> 00:40:15,200
खाना शास्त्रीय मर्यादा का खंडन है। जबकि

578
00:40:15,200 --> 00:40:19,680
पराक्रम दिखाना शास्त्रीय धर्म का अंग है। श्री रामचंद्र

579
00:40:19,680 --> 00:40:23,760
जी ने एक होता है सिद्ध कोटि का धर्म। एक होता

580
00:40:23,760 --> 00:40:28,240
है साध्य कोटि का धर्म। तो जो हमें धर्म शास्त्रों से मर्यादा

581
00:40:28,240 --> 00:40:32,240
बताई जाती है वह साध्य कोटि का धर्म होता है। और यह सारी

582
00:40:32,240 --> 00:40:36,240
जो अतिमानवीय कार्य करना होता है यह जो कार्य

583
00:40:36,240 --> 00:40:40,240
है ये सिद्ध कोटि के धर्म में आते हैं। मतलब जो हमें नेचुरली हमारी सीमाएं

584
00:40:40,240 --> 00:40:44,240
हैं कि हम उड़ नहीं सकते। तो अगर मैंने उड़ा तो यह सिद्ध कोटि का इसका

585
00:40:44,240 --> 00:40:49,200
शास्त्रों से कोई मतलब नहीं है। शास्त्रों के द्वारा आपको

586
00:40:49,200 --> 00:40:53,440
वो बातें बताई गई है जिनमें अती्द्रिय विषयों में हमारी गति नहीं होती है।

587
00:40:53,440 --> 00:40:57,760
तो वहां पर हमारे लिए प्रमाण शास्त्र ही होते हैं। मैं कूदूंगा

588
00:40:57,760 --> 00:41:02,000
तो चोट लगेगी। इसके लिए शास्त्र की आवश्यकता नहीं है। यह

589
00:41:02,000 --> 00:41:07,200
मुझे अपने स्वभाव से ही प्राप्त चीजें हैं। आहार, निद्रा, भय, मैथुन

590
00:41:07,200 --> 00:41:12,320
मर्यादा मानवता मुझे शास्त्र से प्राप्त होती है।

591
00:41:12,320 --> 00:41:16,560
तो भगवान श्री राम को जब कहा जाता है मर्यादा पुरुषोत्तम है, विग्रहान

592
00:41:16,560 --> 00:41:20,720
धर्म है। तो वो शास्त्रीय मर्यादा की वहां पर बात

593
00:41:20,720 --> 00:41:24,880
हो रही है। साध्य कोटि के धर्म की बात हो रही है। इसमें उनका चुनाव

594
00:41:24,880 --> 00:41:29,040
है कि मनुष्य को चुनना है कि मुझे साध्य कोटि के धर्म को साधना

595
00:41:29,040 --> 00:41:33,360
है कि नहीं साधना है। खैर फिर भी श्री रामचंद्र

596
00:41:33,360 --> 00:41:37,760
जी ने जो अतिमानवीय कार्य किए हैं इनके निमित्त भी

597
00:41:37,760 --> 00:41:42,000
क्या कहा गया है रामायण में? बला और अति

598
00:41:42,000 --> 00:41:46,160
बला नाम से श्री रामचंद्र जी ने स्वयं साक्षात ईश्वर

599
00:41:46,160 --> 00:41:50,320
होते हुए भी श्री रामचंद्र जी ने साक्षात ईश्वर

600
00:41:50,320 --> 00:41:54,320
होते हुए भी इन सिद्धियों को प्राप्त करने के लिए मानवीय

601
00:41:54,320 --> 00:41:58,640
प्रक्रिया का आश्रय लिया था। भगवान ने यह कहते हुए अतिमानवीय

602
00:41:58,640 --> 00:42:02,960
कार्य नहीं किए कि मैं भगवान हूं इसलिए मैं कर रहा हूं। यह उन्होंने प्रदर्शित नहीं किया राम

603
00:42:02,960 --> 00:42:06,960
रूप में। उन्होंने प्रदर्शित किया है कि एक मानव को किस-किस प्रकार

604
00:42:06,960 --> 00:42:11,120
से जीवन को जीना चाहिए। कैसे अपने वर्णाश्रम धर्म का पालन करना चाहिए

605
00:42:11,120 --> 00:42:15,360
और यदि उसको अतिमानवीय कार्य करने में भी गति प्राप्त करनी है तो

606
00:42:15,360 --> 00:42:19,360
वह किस तरह की तपस्या से उसको प्राप्त हो सकती है वो उन्होंने एग्जांपल

607
00:42:19,360 --> 00:42:24,240
सेट किया है। कैसे बला और

608
00:42:24,240 --> 00:42:28,400
उन्होंने महर्षि विश्वामित्र एवं अन्य ऋषियों से बला अतिबला जैसी

609
00:42:28,400 --> 00:42:32,480
विद्याएं और दिव्य शास्त्र प्राप्त किए। यह सिद्ध

610
00:42:32,480 --> 00:42:36,560
करता है कि उन्होंने यह कार्य ब्रह्म भाव से नहीं बल्कि

611
00:42:36,560 --> 00:42:40,640
एक आदर्श शिष्य और तपस्वी के पुरुषार्थ से संपन्न

612
00:42:40,640 --> 00:42:44,720
किए। बला और अतिबला नाम से प्रसिद्ध अब

613
00:42:44,720 --> 00:42:48,880
यहां वाल्मीकि रामायण के वचन को मैं कोट कर रहा हूं। बला और अतिबला नाम से

614
00:42:48,880 --> 00:42:53,440
प्रसिद्ध इस मंत्र समुदाय को ग्रहण करो। इसके प्रभाव से तुम्हें कभी

615
00:42:53,440 --> 00:42:57,920
शम का अनुभव नहीं होगा। इसके प्रभाव से तुम्हें कभी

616
00:42:57,920 --> 00:43:02,000
ज्वार नहीं होगा। तुम्हारे रूप में किसी प्रकार का विकार या उलटफेर नहीं होगा।

617
00:43:02,000 --> 00:43:08,000
सोते समय अथवा असावधानी की अवस्था में भी

618
00:43:08,480 --> 00:43:12,720
शत्रु तुम्हारे ऊपर आक्रमण नहीं कर सकेंगे। इस भूतल पर बाहुबल

619
00:43:12,720 --> 00:43:15,920
में तुम्हारे सामान्य

620
00:43:15,920 --> 00:43:20,400
तुम्हारे समान तुम्हारा सामना करने वाला कोई ना होगा।

621
00:43:20,400 --> 00:43:24,880
बला और अतिबला का अभ्यास करने से तीनों लोकों में तुम्हारे समान

622
00:43:24,880 --> 00:43:29,200
कोई नहीं रह जाएगा। कहां पर है? वाल्मीकि रामायण

623
00:43:29,200 --> 00:43:33,600
एक 22 13 से 21 इतिहास साक्षी है कि विश्वामित्र

624
00:43:33,600 --> 00:43:37,680
जैसे महर्षियों ने अपनी तपस्या के बल पर नूतन सृष्टि की रचना तक

625
00:43:37,680 --> 00:43:41,760
कर डाली थी। जब ऋषि गण अपनी साधना से ऐसे चमत्कार कर सकते थे

626
00:43:41,760 --> 00:43:46,240
तो मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के लिए मर्यादा

627
00:43:46,240 --> 00:43:50,320
पुरुषोत्तम राम के लिए यह कार्य बिना ब्रह्म भाव के केवल

628
00:43:50,320 --> 00:43:54,400
योग और अस्त्र विद्या के बल पर करना पूर्णतः संभव

629
00:43:54,400 --> 00:43:58,400
था। अनेक महापुरुषों और योगियों ने भी इतिहास में चमत्कारिक

630
00:43:58,400 --> 00:44:02,960
कार्य किए हैं। जिन्हें समाज ने ईश्वर का अवतार नहीं माना।

631
00:44:02,960 --> 00:44:06,960
अतः केवल अतिमानवीय कार्यों के आधार पर

632
00:44:06,960 --> 00:44:11,360
श्री राम पर ब्रह्म भाव का आरोप लगाते हुए उन्हें मर्यादा की परिधि

633
00:44:11,360 --> 00:44:15,360
से बाहर जाने वाला मान लेना तर्कसंगत सिद्ध

634
00:44:15,360 --> 00:44:19,360
नहीं होता। स्वयं के द्वारा किए गए समस्त पुरुषार्थ को प्रभु

635
00:44:19,360 --> 00:44:23,360
श्री राम ने भी मानव अभी मैंने बताया ना

636
00:44:23,360 --> 00:44:23,860
साध्य

637
00:44:23,840 --> 00:44:27,920
कोटि का अति मानवीय अब उन्होंने अपने सभी कार्यों को

638
00:44:27,920 --> 00:44:32,080
समस्त पुरुषार्थ को मानव साध्य बताया गया है। मनुष्यों

639
00:44:32,080 --> 00:44:36,400
के द्वारा साधे जा सकते हैं। तो अनेक अनेक ऐसे मनुष्य हुए हैं जो जिन्होंने

640
00:44:36,400 --> 00:44:40,560
अति मानवीय कार्य किए तो वह सब क्या ईश्वर थे? ब्रह्म भाव से किए

641
00:44:40,560 --> 00:44:45,600
थे। तो भगवान श्री राम अपने समस्त पुरुषार्थ को

642
00:44:45,600 --> 00:44:50,400
स्वयं मानव साध्य ही बता रहे हैं। वाल्मीकि रामायण सात

643
00:44:50,400 --> 00:44:54,480
115 अच्छा जब बात आती है कि ब्रह्म भाव

644
00:44:54,480 --> 00:44:59,200
से उन्होंने भैया शबरी के झूठे बेर खा लिए। तो

645
00:44:59,200 --> 00:45:03,440
हम बार-बार प्रमाण इस बात का दे रहे हैं कि भगवान श्री राम

646
00:45:03,440 --> 00:45:07,600
धर्म के अनुसार चलते हैं। धर्म के अनुसार कार्य करते हैं। अपने छात्र धर्म के अनुसार

647
00:45:07,600 --> 00:45:11,600
कार्य करते हैं। इस बात के ढेर सारे प्रमाण दे रहे हैं। क्या इस बात

648
00:45:11,600 --> 00:45:16,080
का प्रमाण दिया गया है कि वह ब्रह्म भाव के अनुसार काम करते हैं।

649
00:45:16,080 --> 00:45:20,160
भाई जैसे जब आप इसको निषेध कर रहे हो कि नहीं नहीं यहां पर ब्रह्म भाव से वो

650
00:45:20,160 --> 00:45:24,880
कर रहे हैं। हम अपने कहे हुए वाक्य के समर्थन में तो दे रहे हैं।

651
00:45:24,880 --> 00:45:29,040
हां? और जो अन्य वाक्य हैं, उसमें अनुमान प्रमाण इत्यादि लेकर

652
00:45:29,040 --> 00:45:33,520
के और श्री राम को धर्म का रूप मर्यादा पुरुषोत्तम

653
00:45:33,520 --> 00:45:38,080
कहे जाने के संबंध में उनके साथ संगति सिद्ध ना होने के

654
00:45:38,080 --> 00:45:38,880
कारण जो है

655
00:45:38,880 --> 00:45:42,880
उन बातों का खंडन कर रहे हैं जिनके साथ इन वाक्यों की संगति नहीं

656
00:45:42,880 --> 00:45:47,120
बैठती। परंतु जब हम कह रहे हैं कि ब्रह्म भाव से उन्होंने झूठे बैर

657
00:45:47,120 --> 00:45:51,200
खा लिए। ब्रह्म भाव से उन्होंने ये किया वो किया। तो

658
00:45:51,200 --> 00:45:55,520
क्या शास्त्रों ने उन्हें ब्रह्म भाव से कार्य करने वाला कहा है। क्योंकि

659
00:45:55,520 --> 00:45:59,760
शास्त्रों से धर्म के अनुसार कार्य करने वाला तो हम सिद्ध कर रहे हैं। ब्रह्म

660
00:45:59,760 --> 00:46:03,760
भाव से कार्य करने वाला वो ब्रह्म है इसमें कोई दो राय नहीं है। पूर्ण

661
00:46:03,760 --> 00:46:08,240
पुरुषोत्तम है इसमें कोई दो राय नहीं है। परंतु वह लौकिक दृष्टि

662
00:46:08,240 --> 00:46:12,400
से कार्य किस प्रकार करते हैं। इस संबंध में हमारे पास प्रमाण है

663
00:46:12,400 --> 00:46:16,560
कि वह धर्मानुसार कार्य करते हैं। उसमें भी लिखा है तुम्हारी भुसुंडी

664
00:46:16,560 --> 00:46:20,640
रामायण में। उसमें भी लिखा हुआ है भुसुंडी रामायण में। ठीक है? कि

665
00:46:20,640 --> 00:46:26,000
वह धर्मानुसार कार्य करते हैं। तो ऐसे जो भी आचरण होंगे

666
00:46:26,000 --> 00:46:30,080
जो धर्म की सीमा से बाहर दिखाई दे रहे होंगे। यदि

667
00:46:30,080 --> 00:46:34,480
शास्त्र के वाक्यों का मान रखना है जिसको जिस शास्त्र में आपकी

668
00:46:34,480 --> 00:46:38,640
श्रद्धा है उसके वाक्यों को मान रखना है तो उसका ऐसा अर्थ लेना पड़ेगा जो

669
00:46:38,640 --> 00:46:43,200
वाल्मीकि रामायण के अनुकूल हो। इस पर भी आएंगे हम और

670
00:46:43,200 --> 00:46:47,280
या तो फिर उसको अगर वह वाल्मीकि रामायण के विपरीत जा रहा है तो वहां पर उसको

671
00:46:47,280 --> 00:46:51,280
दूर से प्रणाम करना पड़ेगा ऐसे शास्त्र को ऐसे शास्त्र वाक्य को

672
00:46:51,280 --> 00:46:53,920
या फिर आप दिव्य मान लो दिव्य घटनाएं मान लो

673
00:46:53,920 --> 00:46:57,920
लौकिक दृष्टि से कुछ देखा ही नहीं किसी ने ऐसे कृत्यों को और

674
00:46:57,920 --> 00:47:03,280
जो पारलौकिक घटनाएं हैं आदि दैविक घटनाएं हैं। ठीक है?

675
00:47:03,280 --> 00:47:07,200
खैर

676
00:47:07,200 --> 00:47:11,200
बैक टू द पॉइंट। फिर भी यहां यह ध्यान रखना आवश्यक है

677
00:47:11,200 --> 00:47:15,680
कि पारलौकिक दृष्टि से सच्चिदानंद स्वरूप परम ब्रह्म होते हुए

678
00:47:15,680 --> 00:47:20,080
भगवान के कुछ भी कर सक करने पर किसी को कोई आपत्ति नहीं है।

679
00:47:20,080 --> 00:47:24,160
अपितु मनुष्य दृष्टि से राजा दशरथ के पुत्र होते

680
00:47:24,160 --> 00:47:28,640
हुए मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम द्वारा मर्यादा के उल्लंघन

681
00:47:28,640 --> 00:47:33,120
को स्वीकार किए जाने पर आपत्ति है। अरे भाई सीधी सी बात है।

682
00:47:33,120 --> 00:47:37,200
अगर वो मर्यादा को लांग रहे है ब्रह्म भाव के आधार पर तो उस पर आपत्ति थोड़ी

683
00:47:37,200 --> 00:47:41,200
ना है। आपत्ति यह है कि फिर शास्त्र उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम क्यों

684
00:47:41,200 --> 00:47:45,200
कह रहे हैं? अगर वो अपनी बात से विमुख हो रहे हैं तो फिर उनको सत्य प्रतिज्ञ

685
00:47:45,200 --> 00:47:49,200
क्यों कह रहे हैं? नहीं कहना चाहिए। शास्त्रों के इन वचनों की

686
00:47:49,200 --> 00:47:53,280
अब मानना कैसे सहन की जाए। अच्छा एक बात और

687
00:47:53,280 --> 00:47:57,360
कही गई कि उसको उससे उनको कोई दोष नहीं लगेगा। अरे भैया दोष लगने

688
00:47:57,360 --> 00:48:01,760
अथवा ना लगने की बात थोड़ी ना हो रही है। बात यह हो रही है कि वह शास्त्रीय मर्यादाओं

689
00:48:01,760 --> 00:48:05,760
के बाहर जाकर के कार्य कर रहे हैं कि नहीं कर रहे हैं। उनको दोष

690
00:48:05,760 --> 00:48:08,960
लगेगा लग भी जाएगा तो उसका फल उन्हें प्राप्त होगा कि नहीं प्राप्त

691
00:48:08,960 --> 00:48:12,960
होगा इससे क्या मतलब? यदि वह धर्म शास्त्रों की मर्यादा के बाहर

692
00:48:12,960 --> 00:48:17,200
जाकर के कार्य कर रहे हैं तो उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं कहा जाएगा। अगर वो अपने वचन

693
00:48:17,200 --> 00:48:21,680
से विमुख हो रहे हैं तो उन्हें सत्य प्रतिज्ञ नहीं कहा जाएगा शास्त्रों के द्वारा। अगर वो

694
00:48:21,680 --> 00:48:25,680
सीता माता को छोड़कर के अन्य अन्य स्त्रियों के साथ रमण कर रहे

695
00:48:25,680 --> 00:48:29,760
हैं या अन्य स्त्रियों के साथ संग कर रहे हैं। उनके बारे में वो तो मन से भी

696
00:48:29,760 --> 00:48:33,760
नहीं सोचते। तो वो अगर ऐसा करते हुए दिख रहे हैं तो

697
00:48:33,760 --> 00:48:38,480
फिर कम से कम उन्हें एक पत्नी व्रत धारण करने वाला तो नहीं कहा जाएगा ना।

698
00:48:38,480 --> 00:48:41,760
चाहते क्या हो?

699
00:48:41,760 --> 00:48:47,760
घोट के चटनी बना दी जाए सारे शास्त्रों की।

700
00:48:50,240 --> 00:48:54,240
अब चलो आ जाते हैं कि भगवान श्री राम ने सदैव धर्म शास्त्रों

701
00:48:54,240 --> 00:48:58,720
की मर्यादा में रहकर आगे चलते हैं। प्रभु श्री राम

702
00:48:58,720 --> 00:49:02,800
प्रभु श्री राम के रूप में भगवान ने सदैव धर्म शास्त्रों की मर्यादा में

703
00:49:02,800 --> 00:49:06,880
रहकर ही व्यवहार करना स्वीकार किया है। निम्नलिखित श्लोकों में

704
00:49:06,880 --> 00:49:10,880
उन्होंने स्वयं के लिए कई बारी वे यह पंक्तियां कही है। एक बात आई थी

705
00:49:10,880 --> 00:49:15,520
ना कि भगवान ये नहीं कर सकते। भगवान वो नहीं कर सकते। हम देखो

706
00:49:15,520 --> 00:49:21,040
भगवान श्री रामचंद्र अपने लिए कह रहे हैं कि मैं यह नहीं कर सकता मूर्ख

707
00:49:21,040 --> 00:49:27,040
इसको कहते हैं मर्यादा पुरुषोत्तम सोनम

708
00:49:27,280 --> 00:49:31,760
श्री राम अपने कुलोचित आचार में मग्न रहते थे

709
00:49:31,760 --> 00:49:36,240
वे अपने क्षत्रिय धर्म को अधिक महत्व देते थे क्षत्रिय

710
00:49:36,240 --> 00:49:40,400
धर्म को अधिक महत्व देते थे प्राथमिकता देते थे ब्रह्म

711
00:49:40,400 --> 00:49:45,200
धर्म को नहीं ब्रह्म भाव को नहीं क्षत्रिय धर्म को

712
00:49:45,200 --> 00:49:49,360
ठीक है और मानते थे अतः बड़ी प्रसन्नता के साथ उसमें

713
00:49:49,360 --> 00:49:54,480
संलग्न रहते थे वाल्मीकि रामायण दो एक 16

714
00:49:54,480 --> 00:49:58,560
निषिद्ध कर्म करने में उनकी कभी प्रवृत्ति नहीं होती थी निषिद्ध कर्म करने में

715
00:49:58,560 --> 00:50:02,800
प्रवृत्ति नहीं होती थी इसको कहां ले जाओगे फाड़ दे वाल्मीकि

716
00:50:02,800 --> 00:50:07,840
रामायण का यह वाक्य

717
00:50:07,840 --> 00:50:12,000
शास्त्र विरुद्ध बातों को सुनने में उनकी रुचि नहीं थी वहां तो वह देख

718
00:50:12,000 --> 00:50:16,080
रहे हैं वाल्मीकि रामायण दो एक 17 अब सुनो

719
00:50:16,080 --> 00:50:20,160
यह जो कह रहे हो ना कि नहीं कर सकता आराम यह

720
00:50:20,160 --> 00:50:24,320
नहीं कर सकते वो नहीं कर सकते सुनो श्री राम ने

721
00:50:24,320 --> 00:50:28,480
स्वयं ये कहा है कि यदि मैं वेदोक्त शुभ कर्मों को छोड़ दूं और विधि हीन

722
00:50:28,480 --> 00:50:32,640
कर्मों में लग जाऊं तो कर्तव्य अकर्तव्य का ज्ञान रखने वाला कौन

723
00:50:32,640 --> 00:50:36,720
समझदार मनुष्य मुझे श्रेष्ठ समझकर आदर करेगा। वह इस बात का ध्यान

724
00:50:36,720 --> 00:50:40,720
दे रहे हैं कि लोग मुझे लौकिक दृष्टि से देखें

725
00:50:40,720 --> 00:50:46,720
तो मेरा व्यवहार भी कैसा होगा? परमार्थ के अनुसार नहीं

726
00:50:47,200 --> 00:50:51,200
परलोक के अनुसार नहीं इसी लोक के अनुसार होगा। वो वो देख रहे हैं कि

727
00:50:51,200 --> 00:50:55,200
मुझे किस दृष्टि से देख रहे हैं लोग। वह चाहते हैं कि उन्हें जो है मनुष्य की दृष्टि

728
00:50:55,200 --> 00:51:00,400
से देखा जाए और उसके अनुसार वह बरत रहे हैं

729
00:51:00,400 --> 00:51:04,640
तो वो इस बात की चिंता कर रहे हैं कि कौन समझदार मनुष्य

730
00:51:04,640 --> 00:51:08,640
मुझे श्रेष्ठ समझकर आदर करेगा। उस दशा में तो मैं इस जगत

731
00:51:08,640 --> 00:51:13,120
में दुराचारी या लोक को कलंकित करने वाला समझा जाऊंगा। वाल्मीकि

732
00:51:13,120 --> 00:51:18,640
रामायण इसी क्रम में जाबाली के नास्तिक मत का खंडन करते हुए

733
00:51:18,640 --> 00:51:22,800
उन्होंने इस पूरे सर्ग में प्रतिज्ञा का पालन रूपी मर्यादा

734
00:51:22,800 --> 00:51:23,300
के

735
00:51:23,040 --> 00:51:27,200
प्रति स्वयं की बाध्यता का ही वर्णन किया है।

736
00:51:27,200 --> 00:51:32,080
बाध्य दिखाया है। मैं यह नहीं कर सकता, मैं वो नहीं कर सकता। वाल्मीकि रामायण

737
00:51:32,080 --> 00:51:36,080
तीन 110 18 से 39 ध्यान रहे

738
00:51:36,080 --> 00:51:40,400
वन में रहकर पवित्र फल खाने की भी उनकी प्रतिज्ञा थी। कहां लिखा है? वाल्मीकि

739
00:51:40,400 --> 00:51:45,440
रामायण तीन 110 26 से 27

740
00:51:45,440 --> 00:51:49,760
देख लेना पवित्र फल खाना है पवित्र और

741
00:51:49,760 --> 00:51:53,920
काग भसुंडी रामायण के अनुसार भी श्री

742
00:51:53,920 --> 00:51:58,240
रामचंद्र ने कहा है भरत को कि मैं धर्मानुसार

743
00:51:58,240 --> 00:52:03,120
व्यवहार करूंगा धर्मानुसार व्यतीत करूंगा वनवास में कहा है

744
00:52:03,120 --> 00:52:07,200
कैसे कैसे कैसे झुठलाओगे इस वचन को हम

745
00:52:07,200 --> 00:52:11,520
तो बाली के समक्ष भी उन्होंने क्षत्रियचित धर्म का ही आलंबन लेकर

746
00:52:11,520 --> 00:52:15,520
बाली द्वारा लगाए जाने वाले आक्षेपों का खंडन किया था। सुनो

747
00:52:15,520 --> 00:52:19,840
क्या-क्या कहा था। मैं उत्तम कुल में उत्पन्न क्षत्रिय हूं।

748
00:52:19,840 --> 00:52:24,080
अतः मेरे पापों को क्षमा मैं तुम्हारे पापों को क्षमा नहीं

749
00:52:24,080 --> 00:52:28,720
कर सकता। वाल्मीकि रामायण 4 18 22

750
00:52:28,720 --> 00:52:32,880
कैसे देख रहे हैं वो? अपने आप को सामने वाले को क्या बता रहे हैं अपने बारे में? मैं कौन हूं?

751
00:52:32,880 --> 00:52:38,080
मैं उत्तम कुल में उत्पन्न क्षत्रिय हूं। और भगवान छलिया नहीं है।

752
00:52:38,080 --> 00:52:42,560
बातों को बदलने वाले नहीं है। सत्य प्रतिज्ञ हैं। यह ध्यान रखना।

753
00:52:42,560 --> 00:52:46,640
श्री रामचंद्र स्वधर्म के पालक एवं रक्षक है। वाल्मीकि रामायण

754
00:52:46,640 --> 00:52:48,960
एक

755
00:52:48,960 --> 00:52:53,360
14 श्री राम ने पिता की आज्ञा का पालन करने के रूप में वनवास

756
00:52:53,360 --> 00:52:58,080
रूपी कर्म को पूर्ण करने की प्रतिज्ञा ली थी। वाल्मीकि रामायण

757
00:52:58,080 --> 00:53:02,400
दो 105 43 ध्यान रहे पिता की आज्ञा

758
00:53:02,400 --> 00:53:07,040
का पालन भी धर्म है। वाल्मीकि रामायण दो

759
00:53:07,040 --> 00:53:10,800
21 30 से 43

760
00:53:10,800 --> 00:53:14,880
तुमको मुझको सीता को लक्ष्मण को और माता सुमित्रा को भी

761
00:53:14,880 --> 00:53:19,280
पिताजी की आज्ञा में ही रहना चाहिए। यही सनातन धर्म

762
00:53:19,280 --> 00:53:24,560
है। है ना? धर्म क्या है? पिता की आज्ञा का पालन।

763
00:53:24,560 --> 00:53:28,720
और सत्य प्रतिज्ञ होने के नाते अपनी

764
00:53:28,720 --> 00:53:32,720
बात से ना मुकरना धर्म है फिर यह इसीलिए ऐसे ही थोड़ी ना

765
00:53:32,720 --> 00:53:36,960
कहते हैं मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम को मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ कि यह विवेचना

766
00:53:36,960 --> 00:53:41,520
मैंने की कई स्मार्थ परंपरा के कई मान्य आचार्यों

767
00:53:41,520 --> 00:53:45,600
ने मेरे गुरु भाइयों ने मुझे जो है इसमें

768
00:53:45,600 --> 00:53:49,680
सहायता की तब जाकर के अनेक विषयों में विषयों

769
00:53:49,680 --> 00:53:53,200
को लेकर के ग्रंथों का निचोड़ लेकर के आपके समक्ष में प्रस्तुत हुआ

770
00:53:53,200 --> 00:53:57,760
हूं। भरत जी ने विविध तर्कों के माध्यम से श्री राम के अयोध्या

771
00:53:57,760 --> 00:54:01,760
प्रत्यावर्तन को उचित सिद्ध करने का अनवर प्रयास

772
00:54:01,760 --> 00:54:05,840
किया। किंतु अपने दिवंगत पितृ देव की आज्ञा का पालन

773
00:54:05,840 --> 00:54:10,240
करने तथा सत्यनिष्ठ बने रहने की अपनी अटल प्रतिज्ञा के कारण

774
00:54:10,240 --> 00:54:14,240
श्री राम ने अयोध्या लौटने में अपनी असमर्थता

775
00:54:14,240 --> 00:54:18,240
व्यक्त की। असमर्थता मैं ये नहीं कर सकता, मैं वो नहीं कर सकता। यह राम

776
00:54:18,240 --> 00:54:22,240
कह रहे हैं मूर्खों और उनके

777
00:54:22,240 --> 00:54:28,240
बारे में वही बातें हम बता रहे हैं तो तुम आपत्ति प्रकट कर रहे हो।

778
00:54:28,880 --> 00:54:33,200
श्री राम कह रहे हैं ले सकता। मैं अपने प्राण

779
00:54:33,200 --> 00:54:37,200
छोड़ सकता हूं। सुन सकता लक्ष्मण का परित्याग भी

780
00:54:37,200 --> 00:54:41,840
कर सकता हूं। सुन सकता किंतु अपनी प्रतिज्ञा

781
00:54:41,840 --> 00:54:46,400
को नहीं तोड़ सकता। सुन ले। यह आ गया।

782
00:54:46,400 --> 00:54:51,520
अब काट हंसी उड़ाओ भगवान श्री राम की मूर्ख

783
00:54:51,520 --> 00:54:55,600
अपने लेख में लिख रहा है भगवान ये नहीं कर सकते भगवान वो नहीं

784
00:54:55,600 --> 00:54:59,680
कर सकते भगवान वाद्य कर रहे हैं भगवान ने लीला

785
00:54:59,680 --> 00:55:03,920
पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण के रूप में मनुष्य होते हुए भी सभी

786
00:55:03,920 --> 00:55:07,920
मर्यादाओं के पार जाकर दिखाया तो प्रभु श्री राम के

787
00:55:07,920 --> 00:55:12,080
रूप में भगवान होते हुए भी सभी मर्यादाओं के अंदर रहना

788
00:55:12,080 --> 00:55:15,440
दिखाया समझे

789
00:55:15,440 --> 00:55:21,280
बने बने धर्माचार्य बने फिरते हैं। ना राम को समझे ना कृष्ण को।

790
00:55:21,280 --> 00:55:25,520
श्री राम जी के द्वारा श्री राम जी के द्वारा

791
00:55:25,520 --> 00:55:29,520
सीता माता के लिए युद्ध लड़ने का कारण भी लौकिक मर्यादा

792
00:55:29,520 --> 00:55:34,640
ही था। अब सुनो लौकिक मर्यादा है। लौकिक

793
00:55:34,640 --> 00:55:38,880
ब्रह्मभाव नहीं है कहीं भी उनके आचरण में। सुन लो। जो उन्होंने

794
00:55:38,880 --> 00:55:42,960
वह पुरुषार्थ किया था ना अति मानवीय जिसके कारण

795
00:55:42,960 --> 00:55:44,000
आप यह सिद्ध करना चाहते

796
00:55:44,000 --> 00:55:48,080
हैं कि भगवान कुछ भी कर सकते हैं। भगवान श्री भगवान होते हुए

797
00:55:48,080 --> 00:55:52,240
भी श्री राम जी ने किस तरह से मर्यादा पालन किया है और करना

798
00:55:52,240 --> 00:55:58,240
सिखाया है। यह वाल्मीकि रामायण में बताया गया है।

799
00:55:58,320 --> 00:56:02,400
तो श्री राम जी ने युद्ध क्यों लड़ा था? यह

800
00:56:02,400 --> 00:56:06,400
मैं क्यों बता रहा हूं कि उन्होंने युद्ध क्यों लड़ा? धर्म की बाध्यता के कारण

801
00:56:06,400 --> 00:56:10,480
लगा लड़ा लौकिक जो लोकाचार है उसके लिए लड़ा इसलिए

802
00:56:10,480 --> 00:56:14,480
क्योंकि यहां पर हम यह बताने का प्रयास कर रहे हैं।

803
00:56:14,480 --> 00:56:18,560
यहां पर हम यह बता रहे हैं कि श्री राम जी उन्हें किस दृष्टि से

804
00:56:18,560 --> 00:56:22,640
देखने के देखने का समर्थन करते हैं। क्या श्री राम जी उन्हें

805
00:56:22,640 --> 00:56:26,720
ब्रह्म भाव से देखने का समर्थन करते हैं। जो हमें मान ले उन्होंने ब्रह्म भाव

806
00:56:26,720 --> 00:56:30,720
से कुछ किया। वह बार-बार अपनी क्षत्रियचित मर्यादा बता रहे

807
00:56:30,720 --> 00:56:35,040
हैं। सत्य प्रतिज्ञ होना बता रहे हैं। अपने पिता की आज्ञा का पालन

808
00:56:35,040 --> 00:56:39,040
बता रहे हैं। बार-बार वो स्वयं को मनुष्य दृष्टि से देखे

809
00:56:39,040 --> 00:56:43,200
जाने का ही समर्थन कर रहे हैं। हम और हम लगे उन्हें ब्रह्म भाव

810
00:56:43,200 --> 00:56:47,200
के आधार पर झूठे बेर खिलाने। जब तुम आश्रम में

811
00:56:47,200 --> 00:56:51,360
अकेली थी तो क्या कारण थे? श्री राम जी ने क्या लौकिक कारण

812
00:56:51,360 --> 00:56:55,840
बताए हैं? जब तुम आश्रम में अकेली थी, उस समय वह चंचल

813
00:56:55,840 --> 00:56:59,440
चित्त वाला राक्षस तुम्हें हर ले गया।

814
00:56:59,440 --> 00:57:03,200
यह दोष मेरे ऊपर दैववश

815
00:57:03,200 --> 00:57:07,600
प्राप्त हुआ था। जिसे मैं मानव साध्य पुरुषार्थ द्वारा मार्जन

816
00:57:07,600 --> 00:57:11,760
कर दिया। किस पुरुषार्थ के द्वारा? मानव साध्य।

817
00:57:11,760 --> 00:57:15,840
मैंने कहा ना कि यह जो अतिमानवीय कृत्य दिखाई दे रहे हैं वह उन्होंने मानव

818
00:57:15,840 --> 00:57:19,840
साध्य कहा है और उदाहरण है मानवों के द्वारा इस प्रकार

819
00:57:19,840 --> 00:57:23,440
के अतिमानवीय

820
00:57:23,440 --> 00:57:27,440
कृत्यों को करना ऐसी सिद्धियों को प्राप्त करना मानव साध्य है

821
00:57:27,440 --> 00:57:29,920
ये

822
00:57:29,920 --> 00:57:34,400
वाल्मीकि रामायण 615 से 615

823
00:57:34,400 --> 00:57:38,560
और पांच तुम्हें मालूम होना चाहिए मैंने जो यह

824
00:57:38,560 --> 00:57:42,720
युद्ध का परिश्रम उठाया है यह सब तुम्हें पाने के यह नहीं किया है। वाल्मीकि

825
00:57:42,720 --> 00:57:47,120
रामायण छ 115 का 15वा श्लोक सदाचार

826
00:57:47,120 --> 00:57:51,840
की रक्षा सब ओर फैले हुए अपवाद का निवारण

827
00:57:51,840 --> 00:57:56,400
तथा अपने सुविचार वंश पर लगे हुए कलंक का परिमार्जन

828
00:57:56,400 --> 00:58:00,800
करने के लिए ही यह सब मैंने किया है। वाल्मीकि रामायण छ 115

829
00:58:00,800 --> 00:58:05,120
का 16वा श्लोक किस दृष्टि से देखने को देखने का समर्थन

830
00:58:05,120 --> 00:58:09,120
कर रहे हैं प्रभु श्री राम मनुष्य दृष्टि से उन्हें देखने का समर्थन

831
00:58:09,120 --> 00:58:13,280
कर रहे हैं। सीता माता को अग्नि परीक्षा से पूर्व स्वीकार ना

832
00:58:13,280 --> 00:58:14,480
करने का कारण

833
00:58:14,480 --> 00:58:18,880
भी लौकिक बाध्यता अर्थात मर्यादा ही थी।

834
00:58:18,880 --> 00:58:22,960
क्या कहा उन्होंने? कौन ऐसा कुलीन पुरुष होगा जो तेजस्वी

835
00:58:22,960 --> 00:58:28,400
होकर भी दूसरे के घर में रही हुई स्त्री को

836
00:58:28,400 --> 00:58:32,800
ग्रहण कर सकता है। ऐसी दशा में अपने कुल को महान बताता

837
00:58:32,800 --> 00:58:37,920
हुआ मैं फिर तुम्हें कैसे ग्रहण कर सकता हूं? सकता

838
00:58:37,920 --> 00:58:42,160
राम यह नहीं कर सकते वो नहीं कर सकते यह देखो श्री राम अपने

839
00:58:42,160 --> 00:58:47,680
लिए सख सकता कह रहे हैं कैसे कर सकता हूं उड़ाओ इनका मजाक

840
00:58:47,680 --> 00:58:51,760
यह जो युद्ध है यह युद्ध झूठे भेर खाने

841
00:58:51,760 --> 00:58:55,920
और ना खाने के बीच में नहीं है यह युद्ध

842
00:58:55,920 --> 00:59:00,800
शिवश नारायण द्विवेदी और भागवतानंद के बीच में नहीं है।

843
00:59:00,800 --> 00:59:05,120
यह युद्ध मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम और

844
00:59:05,120 --> 00:59:09,280
उन्हें अमर्यादावान सिद्ध करने का प्रयास

845
00:59:09,280 --> 00:59:13,600
करने वालों के बीच में है। यह युद्ध धर्म और अधर्म

846
00:59:13,600 --> 00:59:17,600
के बीच में है। राम की मर्यादा और भागवतानंद जैसों की

847
00:59:17,600 --> 00:59:23,600
अमर्यादा के बीच में है।

848
00:59:24,480 --> 00:59:28,640
राजा यद्यपि सीता माता अयोने जाती।

849
00:59:28,640 --> 00:59:32,720
अब देखो यहां पे ब्रह्म भाव कहां गया? यद्यपि सीता माता

850
00:59:32,720 --> 00:59:36,800
अयोने जाती दिव्य थी। उनकी पवित्रता किसी भी प्रकार से भंग

851
00:59:36,800 --> 00:59:41,120
नहीं हो सकती थी। परंतु फिर भी श्री रामचंद्र

852
00:59:41,120 --> 00:59:45,360
जी ने समर्थ के कारण सीता माता में अपवित्रता

853
00:59:45,360 --> 00:59:49,520
होने की संभावना को अस्वीकार कर दिया। क्यों भाई? सीता माता

854
00:59:49,520 --> 00:59:54,480
भी तो ब्रह्म का ही स्वरूप है। भगवत स्वरूपा हैं।

855
00:59:54,480 --> 00:59:57,120
हर

856
00:59:57,120 --> 01:00:01,280
उनके प्रति दोष दृष्टि क्यों रख रहे हैं श्री राम? क्योंकि वह अपनी लीला

857
01:00:01,280 --> 01:00:05,280
को मानवीय दृष्टि से देख रहे हैं और उसी दृष्टि का समर्थन भी

858
01:00:05,280 --> 01:00:09,600
कर रहे हैं। राजा जनक की अब सुनो वाल्मीकि रामायण का रामायण

859
01:00:09,600 --> 01:00:13,760
का वचन राजा जनक की यज्ञ भूमि से आविर्भूत होने के कारण

860
01:00:13,760 --> 01:00:18,000
ही मुझे जानकी कहकर पुकारा जाता है। वास्तव में

861
01:00:18,000 --> 01:00:22,000
मेरी उत्पत्ति जनक से नहीं हुई है। मैं भूतल से प्रकट हुई

862
01:00:22,000 --> 01:00:26,240
हूं। वहां पर जो है तपस्या के प्रभाव से भुसुंडी रामायण

863
01:00:26,240 --> 01:00:30,480
में इस तथ्य को बदल दिया गया है। वहां पर माता जानकी जो है

864
01:00:30,480 --> 01:00:34,160
वह गर्भ से ही उत्पन्न हो रही हैं।

865
01:00:34,160 --> 01:00:38,240
मगर भूतल से प्रकट हुई हूं। साधारण मानव जाति

866
01:00:38,240 --> 01:00:39,520
से विलक्षण हूं। यहां वो

867
01:00:39,520 --> 01:00:43,840
ये कहने का प्रयास कर रही है। मैं दिव्य हूं। वो याद दिला रही हैं अपने सामर्थ्य

868
01:00:43,840 --> 01:00:47,920
को जो कह रहे हैं ना कि समर्थ के समर्थ के कारण जो है उनमें दोष नहीं

869
01:00:47,920 --> 01:00:52,080
देखा जाता है। है ना? वैसे तो यहां पर यह बात हो ही नहीं रही है कि उनको

870
01:00:52,080 --> 01:00:56,240
दोष लगेगा कि नहीं लगेगा। बात तो ये हो रही है कि उन्होंने मर्यादा के

871
01:00:56,240 --> 01:01:00,320
बाहर जाकर आचरण किया कि नहीं किया। श्री राम जी ने मैं फिर याद दिला दूं।

872
01:01:00,320 --> 01:01:04,320
पर फिर भी यदि आप यह कह रहे हैं कि भगवान अपनी

873
01:01:04,320 --> 01:01:08,640
लीला को ब्रह्म भाव से देखने का भी समर्थन कर रहे हैं जगह-जगह पे

874
01:01:08,640 --> 01:01:12,800
कि लोग ये देख ले अरे वह तो भगवान है कुछ भी कर सकते हैं तो माता सीता में क्यों दोष देख

875
01:01:12,800 --> 01:01:16,800
रहे हैं? वह भी माता है। फिर वह उनमें कैसे दोष आ सकता है? किसी भी

876
01:01:16,800 --> 01:01:20,960
मनुष्यगत गतिविधि के कारण नहीं आ सकता।

877
01:01:20,960 --> 01:01:25,280
मगर प्रभु श्री राम उनमें दोष देख रहे हैं।

878
01:01:25,280 --> 01:01:29,280
उनमें समर्थ के कारण दिव्य होने के कारण ब्रह्म स्वरूपा होने

879
01:01:29,280 --> 01:01:33,360
के कारण उनमें दोष ना देख देखने की बात का समर्थन

880
01:01:33,360 --> 01:01:38,080
नहीं कर रहे। दोष होने की संभावना को अस्वीकार नहीं कर रहे।

881
01:01:38,080 --> 01:01:43,120
जैसे तुमने ब्रह्म भाव के आधार पर श्री रामचंद्र जी में

882
01:01:43,120 --> 01:01:47,600
दोष होने की बात होने की संभावना को अस्वीकार कर दिया। वैसे

883
01:01:47,600 --> 01:01:52,080
देखो क्या कह रहे हैं। क्या कह रही हैं। आपने

884
01:01:52,080 --> 01:01:54,960
मेरी इन विशेषताओं का

885
01:01:54,960 --> 01:01:59,120
आपने मेरी इन विशेषताओं को अधिक महत्व नहीं दिया। इन सबको

886
01:01:59,120 --> 01:02:03,600
आपने सामने नहीं रखा। जब श्री राम जी ने उनको स्वीकार करने पर आपत्ति जताई

887
01:02:03,600 --> 01:02:07,680
तो माता सीता अपनी दिव्यता प्रकट कर रही है कि भाई मैं तो अपवित्र

888
01:02:07,680 --> 01:02:11,920
हो ही नहीं सकती हूं तो तुम कैसे मुझ मुझ पर

889
01:02:11,920 --> 01:02:15,920
यह आरोप लगा सकते हो कि मेरे साथ ऐसा कुछ हुआ होगा जिसके कारण मुझे तुम

890
01:02:15,920 --> 01:02:20,080
ग्रहण नहीं कर रहे हो मैं तो अपवित्र हो ही नहीं सकती मैं तो दिव्य हूं मगर प्रभु श्री राम

891
01:02:20,080 --> 01:02:24,080
उनमें दोष क्यों देख रहे हैं क्योंकि वह खुद अपने लीला को लौकिक

892
01:02:24,080 --> 01:02:28,400
दृष्टि से देख रहे हैं और देखना सिखा रहे हैं जिससे कि हम उनसे सीख पाए

893
01:02:28,400 --> 01:02:32,640
क्या सीख पाए मर मर्यादा धर्म

894
01:02:32,640 --> 01:02:36,800
हम तो ये कहां लिखा है माता सीता

895
01:02:36,800 --> 01:02:40,800
का ये जो वचन है कहां पर है वाल्मीकि रामायण छ 116

896
01:02:40,800 --> 01:02:44,800
15वा श्लोक मेरा चरित्र शुद्ध है जो कह

897
01:02:44,800 --> 01:02:48,800
रहे हो ना दोष देख रहे हैं कि नहीं देख रहे वो भी देख लो मेरा चरित्र शुद्ध

898
01:02:48,800 --> 01:02:53,040
है फिर भी रघुनाथ मुझे दूषित समझ रहे हैं। अरे भाई जब ब्रह्म

899
01:02:53,040 --> 01:02:57,200
भाव से दोष लगता ही नहीं है तो रामचंद्र जी दोष क्यों देख रहे हैं?

900
01:02:57,200 --> 01:03:01,840
ब्रह्म स्वरूपा में शक्तिभुता में राम

901
01:03:01,840 --> 01:03:05,840
से बड़े हो गए हो तुम लोग।

902
01:03:05,840 --> 01:03:11,120
वाल्मीकि रामायण छे 116वां श्लोक।

903
01:03:11,120 --> 01:03:15,200
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि यदि प्रभु श्री राम परम ब्रह्म सच्चिदानंद

904
01:03:15,200 --> 01:03:19,200
स्वरूप परमेश्वर हैं तो माता सीता भी उनकी ही स्वरूप भूता है।

905
01:03:19,200 --> 01:03:23,280
जब विधि के उल्लंघन का दोष समर्थ होने के कारण

906
01:03:23,280 --> 01:03:27,360
श्री राम को नहीं लगेगा तो ऐसे में स्वयं श्री राम द्वारा ही जगत जननी

907
01:03:27,360 --> 01:03:31,680
माता सीता को दोष दृष्टि से देखने की बात क्यों की गई है?

908
01:03:31,680 --> 01:03:35,920
और यदि प्रभु श्री राम अपनी लीला को, अपने कर्मों को, अपने कर्तों

909
01:03:35,920 --> 01:03:39,920
को दोष दृष्टि से देखने की भावना व्यक्त कर रहे हैं

910
01:03:39,920 --> 01:03:43,920
तो क्या हम और आप उनसे बड़े हो गए हैं? श्री

911
01:03:43,920 --> 01:03:49,040
रामचंद्र से भी आगे जाकर के उनकी चीजों को देखेंगे।

912
01:03:49,040 --> 01:03:53,200
हां मर्यादा पुरुषोत्तम है। क्षत्रिय कुल में उत्पन्न

913
01:03:53,200 --> 01:03:57,360
है। सत्य प्रतिज्ञ हैं। अपने पिता की आज्ञा का पालन करने वाले

914
01:03:57,360 --> 01:04:01,520
हैं। भरत के शासन में रहकर धर्म संस्थापना करने वाले हैं। मनु

915
01:04:01,520 --> 01:04:05,600
को फॉलो करने वाले हैं। मनु मनु का अनुसरण

916
01:04:05,600 --> 01:04:10,800
करने वाले हैं। हम और फिर तुम कह दो ब्रह्म भाव से कुछ भी

917
01:04:10,800 --> 01:04:15,520
बताता हूं अभी तुम्हारे ब्रह्म भाव को।

918
01:04:15,520 --> 01:04:21,520
खैर

919
01:04:23,120 --> 01:04:27,280
इस प्रकार यहां भी यही सिद्ध होता है कि साक्षात सच्चिदानंद

920
01:04:27,280 --> 01:04:31,920
स्वरूप परमेश्वर होते हुए भी श्री रामचंद्र जी लोक शिक्षणार्थ

921
01:04:31,920 --> 01:04:36,240
स्वयं को और अपनी स्वरूप भूता जगत जननी को भी लौकिक दृष्टि

922
01:04:36,240 --> 01:04:40,720
से मनुष्य दृष्टि से ही देखते हुए ही उनके व्यवहार की समीक्षा

923
01:04:40,720 --> 01:04:44,960
करने का समर्थन कर रहे हैं। है ना? इसी कारण

924
01:04:44,960 --> 01:04:49,200
श्री रामचंद्र जी ने सदैव मानव साध्य मर्यादा अर्थात श्रोत

925
01:04:49,200 --> 01:04:53,200
स्मार्थ धर्म का ही पालन किया। इसी क्रम में आगे लोक

926
01:04:53,200 --> 01:04:57,200
व्यवहार की बाध्यता को ही श्री राम द्वारा सीता त्याग का कारण

927
01:04:57,200 --> 01:05:02,160
बताया गया। भाई ब्रह्म भाव से तो सीता का त्याग क्यों कर रहे हैं?

928
01:05:02,160 --> 01:05:06,160
क्यों इस इन मर्यादाओं के नीचे स्वयं को खड़ा प्राप्त कर

929
01:05:06,160 --> 01:05:10,320
रहे हैं। कि मेरे बारे में कोई ऐसा ना कह दे उसकी

930
01:05:10,320 --> 01:05:14,400
कुल की हानि हो जाएगी। लौकिक अपकीर्ति हो जाएगी। ये सब

931
01:05:14,400 --> 01:05:18,560
बातें क्यों कर रहे हैं प्रभु श्री राम? ब्रह्म भाव से वो तो कुछ भी करने में सक्षम

932
01:05:18,560 --> 01:05:22,880
है। क्योंकि उनको मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम

933
01:05:22,880 --> 01:05:28,880
का चरित्र निभाना है। श्री राम का आदर्श प्रस्तुत करना है।

934
01:05:29,840 --> 01:05:34,080
क्या है? श्री राम बोल रहे हैं नगर और जनपद के

935
01:05:34,080 --> 01:05:40,080
लोग मेरी सीता के बारे में

936
01:05:40,240 --> 01:05:44,240
भरत के लक्ष्मण के तथा शत्रुघ्न और माता कैकई के विषय

937
01:05:44,240 --> 01:05:48,240
में क्या-क्या बातें करते हैं क्योंकि राजा यदि आचार से

938
01:05:48,240 --> 01:05:52,560
विहीन हो तो वह अपने राज्य में तथा वन में भी निंदा के

939
01:05:52,560 --> 01:05:56,880
निंदा का विषय बन जाते हैं। सर्वत्र उन्हीं की बुराइयों

940
01:05:56,880 --> 01:06:01,760
की चर्चा होती है। वाल्मीकि रामायण 7 43

941
01:06:01,760 --> 01:06:05,920
पांच से छ मेरे बारे में नगरवासी जो जो भी

942
01:06:05,920 --> 01:06:10,000
शुभ अथवा अशुभ बातें करते हैं वह मुझे बताओ नगर में लोग मेरे विषय में जो

943
01:06:10,000 --> 01:06:14,000
भी शुभ मानते हैं मैं उनका आचरण करूंगा और अशुभ बातें

944
01:06:14,000 --> 01:06:18,000
सुनकर जिन्हें वह अशुभ समझते हैं उन्हें उन तथ्यों को

945
01:06:18,000 --> 01:06:22,080
त्याग दूंगा वाल्मीकि रामायण किस आधार पर कि उनको मनुष्य

946
01:06:22,080 --> 01:06:26,080
दृष्टि से देखे जाने पर क्या सुनिश्चित हो रहा है उसके आधार पर आचरण

947
01:06:26,080 --> 01:06:30,160
करने की बात कर रहे हैं ह

948
01:06:30,160 --> 01:06:34,320
उन तथ्यों को त्याग दूंगा और यह कब है जब वो

949
01:06:34,320 --> 01:06:38,640
वनवास से वापस आ चुके तब की बात है ये तो जबकि

950
01:06:38,640 --> 01:06:43,440
शबरी के यदि झूठे बैर खा लिए थे ब्रह्म भाव से और वो जो है मनुष्यगत

951
01:06:43,440 --> 01:06:47,440
मनुष्य दृष्टि से देखी गई घटना थी तो फिर तो उनका ब्रह्म भाव

952
01:06:47,440 --> 01:06:51,440
प्रसिद्ध होना हो जाना चाहिए था फिर तो किसी को उन्हें मनुष्य दृष्टि से देखना ही नहीं चाहिए

953
01:06:51,440 --> 01:06:55,600
था उस तराजू में तौलना ही नहीं चाहिए था और अगर कोई तौल भी रहा है तो उसका समर्थन

954
01:06:55,600 --> 01:06:59,600
श्री राम को नहीं करना चाहिए था। उसके कारण अपनी भार्या को

955
01:06:59,600 --> 01:07:03,600
वनवास नहीं भेजना चाहिए था। कहां तक जाओगे? तुम डाल

956
01:07:03,600 --> 01:07:07,760
डाल हम पातपात। हां तो

957
01:07:07,760 --> 01:07:10,160
क्या हुआ?

958
01:07:10,160 --> 01:07:14,560
त्याग दूंगा। कहां लिखा वाल्मीकि रामायण 7:43 9 से 10

959
01:07:14,560 --> 01:07:18,640
जिस किसी भी प्राणी की अपकीर्ति लोक में सबकी चर्चा का विषय

960
01:07:18,640 --> 01:07:22,640
बन जाती है वह अधम लोकों में गिर जाता है और जब तक उस अपयश की

961
01:07:22,640 --> 01:07:26,800
चर्चा होती है तब तक वही पड़ा रहता है। वाल्मीकि रामायण सात 45

962
01:07:26,800 --> 01:07:30,160
10 से 12 बताइए

963
01:07:30,160 --> 01:07:34,160
लोग उन्हें मनुष्य दृष्टि से देखकर क्या सुनिश्चित कर रहे हैं? इसके आधार

964
01:07:34,160 --> 01:07:39,200
पर वह अपनी कृत्यों को प्रभावित कर रहे हैं।

965
01:07:39,200 --> 01:07:43,520
यह प्रमाण हमें प्राप्त है। शबरी के झूठे

966
01:07:43,520 --> 01:07:45,200
भेर और शबरी

967
01:07:45,200 --> 01:07:49,520
के झूठ शबरी के झूठे भेर ना खाने के विषय में और

968
01:07:49,520 --> 01:07:55,520
शबरी के ब्राह्मणी होने के विषय में राम ही प्रमाण है।

969
01:07:56,960 --> 01:08:01,440
अच्छा सुपनखा एवं सहस्त्रों कन्याओं सहित

970
01:08:01,440 --> 01:08:05,440
अनेक अनेक अन्य अनेक सुंदर व योग्य स्त्रियों द्वारा

971
01:08:05,440 --> 01:08:09,440
भी प्रभु श्री राम को विवाह का प्रस्ताव प्राप्त होता रहा।

972
01:08:09,440 --> 01:08:13,440
परंतु उन्होंने पत्नी व्रत धर्म से स्वयं को मरदित

973
01:08:13,440 --> 01:08:17,760
बताते हुए सभी प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया। वाल्मीकि

974
01:08:17,760 --> 01:08:22,080
रामायण के अनुसार भसुंडी रामायण अभी बाकी है। देखिएगा

975
01:08:22,080 --> 01:08:28,080
वह इस विषय में वह क्या कहती है। हम

976
01:08:31,840 --> 01:08:36,240
अगस्त ऋषि के आश्रम में भी श्री राम ने मर्यादा की रक्षा हेतु अगस्त

977
01:08:36,240 --> 01:08:40,400
ऋषि द्वारा दी गई भेंट को अपने क्षत्रिय धन पर विचार करके

978
01:08:40,400 --> 01:08:44,560
अस्वीकार कर दिया था। जब उनके यहां पर वह गए थे तो वह जो देना

979
01:08:44,560 --> 01:08:49,120
चाह रहे थे उनको धनुष इत्यादि वह उन्होंने अस्वीकार कर दिया था

980
01:08:49,120 --> 01:08:53,360
क्योंकि एक क्षत्रिय का ब्राह्मण से दान लेना उन्हें

981
01:08:53,360 --> 01:08:57,520
स्वीकार नहीं था। तब बाद में जब

982
01:08:57,520 --> 01:09:01,760
श्री रामचंद्र को अगस्त जी ने उनके उनमें जो है इंद्र

983
01:09:01,760 --> 01:09:05,920
का अंश होते हुए और यज्ञ में इंद्र को आहुति दिए

984
01:09:05,920 --> 01:09:10,320
जाने के विषय में धर्म याद दिलाया अनुष्ठान याद दिलाया

985
01:09:10,320 --> 01:09:14,400
राजा में इंद्र का अंश होते हुए और इंद्र का यज्ञ

986
01:09:14,400 --> 01:09:18,640
का अमुक अमुक आहुतियों का भोक्ता होते हुए उस

987
01:09:18,640 --> 01:09:23,120
रूप में ब्राह्मण द्वारा इंद्र को दिए जाने वाले रूप में एक क्षत्रिय

988
01:09:23,120 --> 01:09:27,280
राजा होने वाले रूप में राम श्री राम जी के द्वारा अगस्त जी

989
01:09:27,280 --> 01:09:31,280
से भेंट लेना स्वीकार हो पाया। इतने मरदित

990
01:09:31,280 --> 01:09:35,360
थे। नहीं तो भगवान तो भाग के भूखे हैं। ब्रह्म भाव से ले लेते। क्या करना

991
01:09:35,360 --> 01:09:39,360
है? मतलब वो हर जगह पर धर्म बता रहे हैं कि मैं यह कर सकता हूं,

992
01:09:39,360 --> 01:09:43,600
यह नहीं कर सकता हूं। मैं यह ले सकता हूं, नहीं ले सकता हूं। मगर एक बस वही

993
01:09:43,600 --> 01:09:47,920
सबरी के यहां पर जाकर के उन्होंने झूठे भेर खा लिए।

994
01:09:47,920 --> 01:09:51,760
हां।

995
01:09:51,760 --> 01:09:57,760
अच्छा।

996
01:10:01,600 --> 01:10:05,360
श्री राम ने

997
01:10:05,360 --> 01:10:09,760
यह कहां लिखा है यह अगस्त मुनि वाला वाल्मीकि

998
01:10:09,760 --> 01:10:13,920
रामायण 76 35 से 36 बाद में

999
01:10:13,920 --> 01:10:18,160
है ना युद्ध कांड के बाद शबरी वाले पूरे प्रकरण के बाद वो तो

1000
01:10:18,160 --> 01:10:22,160
वो तो विधि निषेध का उल्लंघन करके ब्रह्म भाव से कुछ भी ग्रहण कर लेते हैं तो फिर

1001
01:10:22,160 --> 01:10:26,160
बाद में जाकर करके अगस्त मुनि जी से लेने से मना क्यों कर रहे हैं?

1002
01:10:26,160 --> 01:10:31,440
वह वह श्रद्धा युक्त नहीं है।

1003
01:10:31,440 --> 01:10:35,440
निषाद निषाद राज भी भगवान के ही भक्त थे। वहां भी

1004
01:10:35,440 --> 01:10:39,600
यह संशय हो सकता है। निषाद राज के विषय में संशय होता है कि भाई निषाद राज

1005
01:10:39,600 --> 01:10:43,680
जो है वह उसका स्पर्श निषिद्ध है। ऐसा होते

1006
01:10:43,680 --> 01:10:48,720
हुए श्री रामचंद्र जी ने उसका आलंघन क्यों किया? वाल्मीकि रामायण

1007
01:10:48,720 --> 01:10:52,720
3 74 17 और अमरकोष के अनुसार अमरकोष

1008
01:10:52,720 --> 01:10:56,720
2 10 20 के अनुसार तो क्या है सर्वप्रथम

1009
01:10:56,720 --> 01:11:01,120
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि प्रतिलोमज निषाद चांडाल होने के कारण

1010
01:11:01,120 --> 01:11:06,320
अस्पर्श माना गया ना कि शूद्र सधर्मा अनुलोमज

1011
01:11:06,320 --> 01:11:10,800
इसमें ये जो संशय दूर करते चले चल रहे हैं तो एक प्रवाह से

1012
01:11:10,800 --> 01:11:14,960
तो ब्राह्मण से शूद्रा में उत्पन्न अनुलोमज होता है मतलब

1013
01:11:14,960 --> 01:11:19,040
जो अह प्रतिलोमज निषाद

1014
01:11:19,040 --> 01:11:23,360
है, वह अस्पर्श है। उसको चांडाल कहा गया है। मगर जो अनुलोमज निषाद

1015
01:11:23,360 --> 01:11:27,600
है, वह अस्पर्श नहीं है। तो, यहां वही हम सिद्ध कर रहे हैं। तो, ब्राह्मण

1016
01:11:27,600 --> 01:11:31,680
से शूद्रा में उत्पन्न अनुलोमज जिसका नामांतर पार्श्व

1017
01:11:31,680 --> 01:11:35,840
भी है, पार्श्व भी है, वह नौका जीवी होता

1018
01:11:35,840 --> 01:11:40,320
है। मनुस्मृति 108 10 आठ

1019
01:11:40,320 --> 01:11:44,560
और 10 35 वाल्मीकि रामायण के अनुसार भी वह नौका

1020
01:11:44,560 --> 01:11:46,800
जीवी ही थे। अतः रामायण के निषाद

1021
01:11:46,800 --> 01:11:50,880
अनुलोमज होने से स्पर्श हैं। प्रतिलोमज

1022
01:11:50,880 --> 01:11:54,880
अस्पर्श नहीं थे। तथापि श्री रामचंद्र जी ने निषाद

1023
01:11:54,880 --> 01:11:59,440
राज से कोई भी खाद्य पदार्थ इत्यादि के रूप में कोई सामग्री

1024
01:11:59,440 --> 01:12:03,600
स्वीकार नहीं की थी बल्कि जल भी लक्ष्मण जी के द्वारा लाया

1025
01:12:03,600 --> 01:12:08,400
गया ही ग्रहण किया था। यह देखो इसको कहते हैं मर्यादा।

1026
01:12:08,400 --> 01:12:12,480
250 43 250 48 पढ़

1027
01:12:12,480 --> 01:12:16,640
लेना इसको। इस प्रकार यह तथ्य

1028
01:12:16,640 --> 01:12:20,960
होता है क्योंकि निषाद अनुलोमज होने के कारण अस्पष्ट तो नहीं

1029
01:12:20,960 --> 01:12:25,040
थे परंतु खाद्य पदार्थ के व्यवहार का निषाद

1030
01:12:25,040 --> 01:12:29,040
के विषय में भी निषेध था। इसलिए उन्होंने निषाद का

1031
01:12:29,040 --> 01:12:33,280
आलिंगन तो किया परंतु लक्ष्मण जी के द्वारा लाया हुआ जल ग्रहण करके

1032
01:12:33,280 --> 01:12:38,240
शास्त्रोक्ति विधि निषेध का भली-भांति पालन किया।

1033
01:12:38,240 --> 01:12:42,480
इस प्रकार अनेक उदाहरण है रामायण में जहां प्रभु श्री राम ने भगवान

1034
01:12:42,480 --> 01:12:47,520
होते हुए भी स्वयं को शास्त्र की मर्यादा में ही सीमित रखा है।

1035
01:12:47,520 --> 01:12:51,760
यदि भगवान राम ब्रह्म भाव के आधार पर व्यवहार करने वाले होते तो

1036
01:12:51,760 --> 01:12:56,080
वह इन अनेक प्रकरणों में ब्रह्म भाव से कार्य क्यों ना करते?

1037
01:12:56,080 --> 01:13:00,240
अब लो और कुछ प्रकरण ले लो। यह हो के शबरी जी के प्रति ही

1038
01:13:00,240 --> 01:13:01,840
एकमात्र भेदभाव करते

1039
01:13:01,840 --> 01:13:06,160
हुए सबको एक किनारे करते हुए सीता को नहीं देखा। अपने भरत

1040
01:13:06,160 --> 01:13:10,160
को नहीं देखा। मगर केवल एक शबरी जी को ही

1041
01:13:10,160 --> 01:13:14,400
उन्होंने जो है मर्यादा के बाहर जाकर के उनके झूठे बेर खा लिए। है ना?

1042
01:13:14,400 --> 01:13:18,480
देखो क्या अपने पिता महाराज दशरथ और माता कौशल्या

1043
01:13:18,480 --> 01:13:22,880
का विलाप उनके लिए महत्वपूर्ण नहीं था। रो रहे थे रथ के पीछे भाग रहे हैं।

1044
01:13:22,880 --> 01:13:27,120
श्री राम जी के वनगमन के विषय में अपनी दुख पूर्ण भावनाएं

1045
01:13:27,120 --> 01:13:31,360
व्यक्त करते करते-करते राजा के नेत्रों से आंसू भर गए। भर आए। उनकी इंद्रियां

1046
01:13:31,360 --> 01:13:35,600
शिथिल हो गई और वह एक ही बार में हे राम कहकर मूर्छित हो गए।

1047
01:13:35,600 --> 01:13:39,760
आगे कुछ ना बोल सके। वाल्मीकि रामायण 2 398 यदि

1048
01:13:39,760 --> 01:13:44,080
तुम मुझे शोक में डूबी हुई छोड़कर वन को चले जाओगे तो मैं उपवास

1049
01:13:44,080 --> 01:13:48,560
करके प्राण त्याग दूंगी। वाल्मीकि रामायण 221

1050
01:13:48,560 --> 01:13:52,880
27 जब श्री राम जी रथ में बैठकर वनवास हेतु

1051
01:13:52,880 --> 01:13:56,960
चल दिए। तब उन्होंने पीछे घूम कर देखा तो उन्हें विषाद

1052
01:13:56,960 --> 01:14:01,120
ग्रस्त तथा भ्रांतित पिता राजा दशरथ और दुख में डूबी

1053
01:14:01,120 --> 01:14:05,440
हुई माता कौशल्या दोनों ही मार्ग पर अपने पीछे आते हुए दिखाई

1054
01:14:05,440 --> 01:14:09,920
दिए। परंतु जैसे रस्सी में बंधा हुआ घोड़े का बच्चा

1055
01:14:09,920 --> 01:14:13,200
अपनी मां को

1056
01:14:13,200 --> 01:14:17,120
देख तो पाता है पर कुछ कर नहीं पाता।

1057
01:14:17,120 --> 01:14:21,360
उसी प्रकार धर्म के बंधन में बंधे हुए श्री रामचंद्र जी भी अपनी

1058
01:14:21,360 --> 01:14:25,440
माता की ओर स्पष्ट रूप से ना देख सके। धर्म के बंधन

1059
01:14:25,440 --> 01:14:29,440
में बंधे हुए ये है राम। किस राम को

1060
01:14:29,440 --> 01:14:33,680
जानते हो तुम? जो धर्म को तोड़ देते हो। बार-बार

1061
01:14:33,680 --> 01:14:37,760
धर्म की सीमाओं का उल्लंघन करते हो। ये है राम

1062
01:14:37,760 --> 01:14:41,920
खूंटे से बंधे हुए। कौन सा खूंटा? धर्म का खूंटा।

1063
01:14:41,920 --> 01:14:46,240
पीछे मां दौड़ रही है। पिता दौड़ रहे हैं।

1064
01:14:46,240 --> 01:14:50,400
मगर घोड़े के बच्चे के समान जैसे वह रस्सी में बंधा हुआ

1065
01:14:50,400 --> 01:14:54,640
होता है। यह धर्म से बंधे हुए थे। और प्रतिज्ञा पे अडिक रहने

1066
01:14:54,640 --> 01:14:58,720
के कारण उतर नहीं गए। माता-पिता के प्रति सबरी का

1067
01:14:58,720 --> 01:15:02,960
भाव नहीं आ पाया इनके। हम

1068
01:15:02,960 --> 01:15:06,960
क्या अपने सौदर भरत का सर पटक-पटक कर रोना उनके

1069
01:15:06,960 --> 01:15:11,200
लिए महत्वपूर्ण नहीं था? देखिए क्या कह रहे हैं भरत। मैं आपके

1070
01:15:11,200 --> 01:15:15,680
चरणों में माथा टेक कर याचना करता हूं। आप मुझ पर दया कीजिए।

1071
01:15:15,680 --> 01:15:19,920
जैसे महादेव जी सब प्राणियों पर अनुग्रह करते हैं। जब लेने गए

1072
01:15:19,920 --> 01:15:23,920
थे। जब राजा भरत प्रभु श्री राम को लेने गए हैं।

1073
01:15:23,920 --> 01:15:27,920
पिता का समाचार देने गए कि पिता ने देह त्याग कर दिया

1074
01:15:27,920 --> 01:15:32,000
है। आप चलिए पिता ने गलती कर दी थी। आपके आपके संबंध में

1075
01:15:32,000 --> 01:15:32,500
इस इस

1076
01:15:32,240 --> 01:15:36,560
तरह का निर्णय लेकर के आप चलिए। राज्य को भोगिए। हां

1077
01:15:36,560 --> 01:15:40,800
उस समय का दृश्य है। तब राजा भरत गिड़गिड़ा रहे हैं। अपना

1078
01:15:40,800 --> 01:15:44,800
सर उनके चरणों में रखकर मैं आपके चरणों में माथा टेक कर याचना

1079
01:15:44,800 --> 01:15:49,200
करता हूं। आप मुझ पर दया कीजिए। जैसे महादेव जी सब प्राणियों

1080
01:15:49,200 --> 01:15:53,680
पर अनुग्रह करते हैं। उसी प्रकार आप भी अपने बंधु बांधवों

1081
01:15:53,680 --> 01:15:57,760
पर कृपा कीजिए। इस प्रकार ग्लानी में पड़े हुए भरत ने

1082
01:15:57,760 --> 01:16:01,840
मनोभिराम राजा श्री राम को उनके चरणों में माथा टेक कर प्रसन्न

1083
01:16:01,840 --> 01:16:06,000
करने की चेष्टा की। तथापि उन रघुनाथ जी ने अपने पिता

1084
01:16:06,000 --> 01:16:10,400
की आज्ञा में दृढ़ता पूर्वक स्थिर रहना ही

1085
01:16:10,400 --> 01:16:15,680
रहकर अयोध्या जाने का विचार नहीं किया।

1086
01:16:15,680 --> 01:16:20,080
शर्म कर लो पापियों ऐसे मर्यादा पुरुषोत्तम

1087
01:16:20,080 --> 01:16:25,840
श्री राम को तुम कह रहे हो कि वह जो है ब्रह्म भाव से जो है खाने लगे झूठा।

1088
01:16:25,840 --> 01:16:29,840
वाल्मीकि रामायण तीन 10 वाल्मीकि रामायण तीन और

1089
01:16:29,840 --> 01:16:34,080
106 31 से 33 अब सुनो

1090
01:16:34,080 --> 01:16:38,080
माता सीता श्री रामचंद्र जी के वाग बाणों से पीड़ित

1091
01:16:38,080 --> 01:16:43,040
होकर ये कौन सा दृश्य है जब माता सीता को स्वीकार करने

1092
01:16:43,040 --> 01:16:47,040
पर आपत्ति प्रकट कर दी थी श्री राम जी ने युद्ध के बाद

1093
01:16:47,040 --> 01:16:47,760
हं

1094
01:16:47,760 --> 01:16:51,920
तो वहां पर श्री राम माता सीता जो है विलाप कर रही हैं। श्री

1095
01:16:51,920 --> 01:16:55,920
रामचंद्र जी के वाक बाणों से पीड़ित होकर जनक किशोरी अपने ही अंगों

1096
01:16:55,920 --> 01:17:00,240
में विलीन सी होने लगी। उनके नेत्रों से आंसुओं का विरल प्रभाव जारी

1097
01:17:00,240 --> 01:17:04,240
हो गया। नेत्रों के जल से भीगे हुए अपने मुख को आंचल से पोंछती हुई वह

1098
01:17:04,240 --> 01:17:08,240
धीरे-धीरे गदगद वाणी में पतिदेव से बोली आप मुझे जैसी समझती हैं,

1099
01:17:08,240 --> 01:17:12,720
समझते हैं, मैं वैसी नहीं हूं। मुझ पर विश्वास कीजिए। मैं अपने सदाचार

1100
01:17:12,720 --> 01:17:17,040
की शपथ खाकर कहती हूं। मैं संदेह के योग्य नहीं हूं। यह बातें पर्याप्त

1101
01:17:17,040 --> 01:17:21,040
नहीं थी उनके लिए। ब्रह्म भाव से कार्य करने के लिए। परंतु

1102
01:17:21,040 --> 01:17:25,280
अकारण ही शबरी जी के द्वारा झूठे भेर प्रस्तुत

1103
01:17:25,280 --> 01:17:29,280
कर देना। वहां पर जो है कारण मिल गया उनको। है ना? ऐसे ही है ना

1104
01:17:29,280 --> 01:17:32,480
तुम्हारे राम हम

1105
01:17:32,480 --> 01:17:35,920
यह हैं हमारे राम।

1106
01:17:35,920 --> 01:17:40,240
एवं इसी प्रकार क्या सहस्त्रों समर्पित

1107
01:17:40,240 --> 01:17:44,400
कन्याओं सहित निषाद राज जैसे परम भक्त का समर्पण क्या उनके लिए महत्वपूर्ण

1108
01:17:44,400 --> 01:17:48,480
नहीं था? जो कहीं वह एक पत्नी रूपी धर्म से बंधे रहे तो

1109
01:17:48,480 --> 01:17:52,720
दूसरी ओर कहीं भी विधि निषेध इत्यादि धर्म का त्याग भी नहीं किया। इन

1110
01:17:52,720 --> 01:17:56,800
सभी तथ्यों से स्पष्ट होता है कि मनुष्य दृष्टि से देखे जा सकने

1111
01:17:56,800 --> 01:18:01,040
वाले उनके व्यवहार का आधार शास्त्रीय मर्यादा अर्थात

1112
01:18:01,040 --> 01:18:03,120
धर्म था। धर्म की रस्सी

1113
01:18:03,120 --> 01:18:07,120
में बंधा हुआ घोड़े के बच्चे के समान श्री राम को वाल्मीकि कह

1114
01:18:07,120 --> 01:18:11,600
रहे हैं और तुम मनु महाराज की आज्ञा का उल्लंघन

1115
01:18:11,600 --> 01:18:15,600
करने वाला बता रहे हो। उनको ब्रह्म भाव के आधार पर दोष

1116
01:18:15,600 --> 01:18:19,680
नहीं लगेगा। अरे यहां दोष लगने की बात हो रही है क्या कि उनको

1117
01:18:19,680 --> 01:18:23,760
दोष लगेगा कि नहीं लगेगा? दंड मिलेगा कि नहीं मिलेगा? यहां बात हो रही है।

1118
01:18:23,760 --> 01:18:28,080
उन्होंने विधि के बाहर जाकर के आचरण किया कि नहीं

1119
01:18:28,080 --> 01:18:32,240
किया? यदि किया तो वह कैसे सत्य प्रतिज्ञ यदि किया तो

1120
01:18:32,240 --> 01:18:36,320
कैसे मर्यादा पुरुषोत्तम? और यदि कर रहे हैं तो यहां क्यों नहीं

1121
01:18:36,320 --> 01:18:42,320
कर रहे हैं? यहां क्यों धर्म की डोरी में बंधे हुए हैं?

1122
01:18:45,200 --> 01:18:49,360
निम्नलिखित शास्त्रीय वचनों द्वारा यह तथ्य निर्विवाद

1123
01:18:49,360 --> 01:18:53,600
रूप से स्पष्ट हो जाता है कि श्री रामचंद्र जी ब्रह्म होते हुए भी

1124
01:18:53,600 --> 01:18:57,760
स्वयं के व्यवहार की समीक्षा के विषय में मनुष्य दृष्टि रखने का

1125
01:18:57,760 --> 01:19:01,920
ही समर्थन करते थे। मनुष्य के रूप में देखो मुझे मैं

1126
01:19:01,920 --> 01:19:05,920
अतिमानी भी कार्य करूंगा तपस्या करके जिससे

1127
01:19:05,920 --> 01:19:09,680
तुम तपस्या करना सीखोगे।

1128
01:19:09,680 --> 01:19:13,760
विषम से विषम परिस्थिति में भी अपनी प्रतिज्ञा पर अक रहना

1129
01:19:13,760 --> 01:19:18,320
रहूंगा मैं जिससे तुम सच बोलना सीखोगे।

1130
01:19:18,320 --> 01:19:22,640
एक पत्नी व्रत धारण पूर्वक रहूंगा मैं जिससे तुम व्यभचार

1131
01:19:22,640 --> 01:19:27,280
से स्वयं को बचाना सीखोगे। मैं हूं राम।

1132
01:19:27,280 --> 01:19:33,280
वो है राम।

1133
01:19:34,400 --> 01:19:38,560
मैं तो अपने अच्छा अब निम्नलिखित शास्त्रीय वचनों

1134
01:19:38,560 --> 01:19:42,640
से और हमारी यह जो बात है कि वह स्वयं को मनुष्य दृष्टि से देख

1135
01:19:42,640 --> 01:19:46,720
रहे हैं। स्वयं के व्यवहार को और देखने का ही समर्थन भी कर रहे हैं। अब

1136
01:19:46,720 --> 01:19:50,800
इसकी और पुष्टि ले लो। तो निम्नलिखित शास्त्रीय वचनों

1137
01:19:50,800 --> 01:19:55,040
द्वारा यह तथ्य निर्विवाद रूप से स्पष्ट हो जाता है कि श्री रामचंद्र जी

1138
01:19:55,040 --> 01:19:59,200
ब्रह्म होते हुए भी स्वयं के व्यवहार की समीक्षा के विषय

1139
01:19:59,200 --> 01:20:03,600
में मनुष्य दृष्टि रखने का ही समर्थन करते थे। अब लो बंपर

1140
01:20:03,600 --> 01:20:07,760
ऑफर ले लो। क्या कह रहे हैं प्रभु श्री राम? मैं तो अपने

1141
01:20:07,760 --> 01:20:11,760
को मनुष्य दशरथ पुत्र राम ही समझता

1142
01:20:11,760 --> 01:20:15,840
हूं। ब्रह्म नहीं। यह श्री राम कह रहे

1143
01:20:15,840 --> 01:20:19,840
हैं झूठे हैं ना वो क्या समझ रहे

1144
01:20:19,840 --> 01:20:24,560
हैं वह अपने आप को व्यवहार की दृष्टि से

1145
01:20:24,560 --> 01:20:28,800
मैं तो अपने को मनुष्य दशरथ पुत्र राम ही समझता हूं

1146
01:20:28,800 --> 01:20:33,760
मैं जो हूं और जहां से आया हूं वह सब आप ही मुझे बताएं

1147
01:20:33,760 --> 01:20:38,560
युद्ध कांड में अंत में कह रहे हैं

1148
01:20:38,560 --> 01:20:42,720
स्वयं को किस दृष्टि से देख रहे हैं मनुष्य दृष्टि से ब्रह्म दृष्टि

1149
01:20:42,720 --> 01:20:46,720
से नहीं देखना कहां स्वीकार कर रहे हैं। वो छ 117

1150
01:20:46,720 --> 01:20:50,800
11वा श्लोक हां शबरी जी से मिलते समय भी प्रभु श्री

1151
01:20:50,800 --> 01:20:55,040
राम लोक संग्रह की दृष्टि से ही व्यवहार व्यवहार ही कर रहे थे।

1152
01:20:55,040 --> 01:20:59,280
अन्यथा यदि ब्रह्म भाव से कर रहे होते तो सर्वज्ञ होते हुए भी शबरी

1153
01:20:59,280 --> 01:21:03,360
जी से वह सीता माता के विषय में जिज्ञासा क्यों करते?

1154
01:21:03,360 --> 01:21:07,360
इसलिए शबरी जी ने स्वयं श्री राम

1155
01:21:07,360 --> 01:21:11,520
के उस समय के व्यवहार को लोकाचार कहा था

1156
01:21:11,520 --> 01:21:15,520
कि प्रभु आप लोकाचार के कारण मुझसे पूछ रहे हैं। अद्भुत रामायण

1157
01:21:15,520 --> 01:21:19,600
में यह वचन है। यद्यपि प्रभु श्री राम का दर्शन सत्कार

1158
01:21:19,600 --> 01:21:23,600
इत्यादि के द्वारा शबरी जी की मुक्ति का विधान था। परंतु शबरी

1159
01:21:23,600 --> 01:21:28,000
के आश्रम में प्रभु श्री रामचंद्र भगवान के रूप में

1160
01:21:28,000 --> 01:21:32,240
नहीं अपितु अतिथि के रूप में ही पहुंचे थे। जिनका यथावत सत्कार

1161
01:21:32,240 --> 01:21:36,720
करने की आज्ञा यथावत का मतलब शास्त्र सम्मत सत्कार

1162
01:21:36,720 --> 01:21:40,480
करने की आज्ञा भी शबरी जी के गुरु ने ही उन्हें दी थी।

1163
01:21:40,480 --> 01:21:46,480
वाल्मीकि रामायण 374 15 से 16

1164
01:21:46,560 --> 01:21:50,560
स्वयं प्रभु श्री राम ने अपनी जीवन लीला को लोक यात्रा

1165
01:21:50,560 --> 01:21:55,520
ही घोषित किया है। वाल्मीकि रामायण तीन 110

1166
01:21:55,520 --> 01:21:58,560
27

1167
01:21:58,560 --> 01:22:02,720
लोक यात्रा कह रहे हैं अपनी यात्रा को। दिव्य यात्रा नहीं कह रहे हैं।

1168
01:22:02,720 --> 01:22:06,720
भूषुंडी में उनकी चीजों को दिव्य कहा गया है। श्री

1169
01:22:06,720 --> 01:22:11,200
राम अपने को किस रूप में देखने का देखना सिखा रहे हैं। अपने व्यवहार की समीक्षा

1170
01:22:11,200 --> 01:22:15,920
किस आधार पर करना सिखा रहे हैं। यह मैटर नहीं करता आप लोगों के लिए।

1171
01:22:15,920 --> 01:22:19,920
इसलिए रामायण अर्थात श्री राम चरित्र के अनुसार वर्ताव

1172
01:22:19,920 --> 01:22:24,080
करने वालों को शास्त्रों का मर्मज्ञ और कल्याण को प्राप्त

1173
01:22:24,080 --> 01:22:28,400
करने वाला बताया गया है। स्कंद पुराण उत्तर खंड

1174
01:22:28,400 --> 01:22:32,480
रामायण महात्म एक 22 से 23

1175
01:22:32,480 --> 01:22:36,480
श्री राम की तरह आचरण करना चाहिए। ब्रह धर्म उत्तर

1176
01:22:36,480 --> 01:22:40,560
पुराण 269 श्री राम के मनुष्य अवतार

1177
01:22:40,560 --> 01:22:44,720
का मुख्य प्रयोजन मनुष्यों को शिक्षा देना है। श्रीमद् भागवत

1178
01:22:44,720 --> 01:22:48,960
पांच अ 19 5 श्री

1179
01:22:48,960 --> 01:22:52,960
राम का व्यवहार केवल लोक शिक्षा के लिए है। किस लिए

1180
01:22:52,960 --> 01:22:55,760
है? केवल लोक शिक्षा के लिए।

1181
01:22:55,760 --> 01:22:59,920
5 19 7 अब क्योंकि समस्त शास्त्रों

1182
01:22:59,920 --> 01:23:04,160
व समस्त आचार्यों द्वारा निर्विवाद रूप से यह तो स्वीकार

1183
01:23:04,160 --> 01:23:08,480
किया ही गया है कि श्री रामचंद्र जी सत्य प्रतिज्ञ थे।

1184
01:23:08,480 --> 01:23:12,800
एवं स्वयं श्री रामचंद्र जी ने भी कभी भी वचन से ना मुकरने

1185
01:23:12,800 --> 01:23:17,920
की अथवा असत्य भाषण ना करने की प्रतिज्ञा ली हुई है। इतना तो मानोगे।

1186
01:23:17,920 --> 01:23:21,920
ऐसे में यदि व्यवहार अर्थात मनुष्य दृष्टि से भी वह ब्रह्म

1187
01:23:21,920 --> 01:23:26,240
भाव का आलंबन लेकर सबरी के झूठे झूठे भेर ग्रहण

1188
01:23:26,240 --> 01:23:30,320
करेंगे तो व्यवहार में भी उनका स्वयं को ब्रह्म भाव से जानने वाला

1189
01:23:30,320 --> 01:23:33,680
होना सिद्ध होगा।

1190
01:23:33,680 --> 01:23:37,840
ब्रह्म भाव से यदि वह झूठे बेर खा ग्रहण कर रहे हैं

1191
01:23:37,840 --> 01:23:41,840
तो इसका मतलब वो जानते हैं कि वह कौन है। व्यवहार

1192
01:23:41,840 --> 01:23:46,240
की व्यवहारिक सत्य की बात कर रहा हूं। है ना? वो जानते हैं

1193
01:23:46,240 --> 01:23:50,240
तो यहां पर उनकी उनका वचन भंग हो गया ना क्योंकि उन्होंने

1194
01:23:50,240 --> 01:23:54,720
तो ब्रह्मा जी से कहा है मैं तो अपने आप को मनुष्य मानता हूं हां

1195
01:23:54,720 --> 01:23:58,960
तो काहे के सत्य प्रतिज्ञ भैया फिर काहे के मर्यादा

1196
01:23:58,960 --> 01:24:03,440
पुरुषोत्तम

1197
01:24:03,440 --> 01:24:06,480
हद हो गई है

1198
01:24:06,480 --> 01:24:11,040
केवल अपने वर्चस्व के लिए केवल

1199
01:24:11,040 --> 01:24:15,280
सामने वाले को नीचा दिखाने के लिए किसी एक मंतव्य

1200
01:24:15,280 --> 01:24:21,200
की पूर्ति के श्री राम पर भी उंगली उठा दो।

1201
01:24:21,200 --> 01:24:27,200
मैं नहीं होने दूंगा। हां।

1202
01:24:28,560 --> 01:24:32,720
इस प्रकार वह सत्य प्रतिज्ञ सिद्ध नहीं होंगे। एवं उनको सत्य प्रतिज्ञ

1203
01:24:32,720 --> 01:24:36,880
और मर्यादा पुरुषोत्तम बताने वाले महर्षि वाल्मीकि जी भी सनातन शास्त्र

1204
01:24:36,880 --> 01:24:41,280
प्रदान करने वाले अह नहीं कहलाएंगे। अंतत

1205
01:24:41,280 --> 01:24:45,600
गत्वा इस प्रकार शास्त्र के सिद्धांतों एवं श्री रामचंद्र

1206
01:24:45,600 --> 01:24:49,840
जी की मर्यादा के प्रतिकूलता के कारण मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम द्वारा

1207
01:24:49,840 --> 01:24:53,920
ब्रह्म भाव से मनुष्य दृष्टि में शबरी के झूठे बेर खाना सिद्ध नहीं

1208
01:24:53,920 --> 01:24:54,800
होता। तो

1209
01:24:54,800 --> 01:24:59,040
हमने दो चैप्टर पढ़ लिए। पहला चैप्टर जिसमें हमने शबरी को ब्राह्मणी

1210
01:24:59,040 --> 01:25:03,680
सिद्ध किया। है ना। किस कारण? कि वह धर्माचारणी

1211
01:25:03,680 --> 01:25:07,760
कही गई हैं। श्री राम जी उनकी तपस्या को को प्रोत्साहित कर रहे हैं। जटा

1212
01:25:07,760 --> 01:25:12,000
धारण कर रही हैं। मृग चर्म धारण कर रही हैं। धर्म को जानने वाली हैं।

1213
01:25:12,000 --> 01:25:16,160
और तब वो जो है तपस्या इत्यादि कर रही हैं। तो तब हमने पहले चैप्टर में सिद्ध

1214
01:25:16,160 --> 01:25:20,160
किया ब्राह्मणी हैं। उनका जो शबरी नाम है वो जैसे शबराचार्य

1215
01:25:20,160 --> 01:25:24,640
थे मीमांसा दर्शन के भाष्यकार उनके ही सदृश्य उनका नाम

1216
01:25:24,640 --> 01:25:29,200
शबरी है। और दूसरे चैप्टर में हमने यह सिद्ध किया

1217
01:25:29,200 --> 01:25:33,520
कि प्रभु श्री राम ब्रह्म भाव से कार्य नहीं करते

1218
01:25:33,520 --> 01:25:37,840
थे। मनुष्य जो देख सकते हैं, उस देख सकने वाले दृश्यों

1219
01:25:37,840 --> 01:25:42,000
में वह ब्रह्म भाव से कोई कार्य नहीं करते थे। वह

1220
01:25:42,000 --> 01:25:46,000
मनुष्य दृष्टि से ही कार्य करते थे। ठीक है?

1221
01:25:46,000 --> 01:25:50,240
और हमने यह भी देख लिया, यह भी सिद्ध कर लिया कि

1222
01:25:50,240 --> 01:25:54,480
वह स्वयं को मनुष्य दृष्टि से ही देखने का समर्थन

1223
01:25:54,480 --> 01:25:56,880
भी करते हैं। अब उन्होंने

1224
01:25:56,880 --> 01:26:01,440
जो घटनाएं मनुष्य दृष्टि से नहीं देखी जा सकती हैं। दिव्य घटनाएं

1225
01:26:01,440 --> 01:26:05,680
देवताओं के यहां पर इस लोक की है ही नहीं।

1226
01:26:05,680 --> 01:26:09,840
भूलोक की है ही नहीं। उन घटनाओं उन घटनाओं

1227
01:26:09,840 --> 01:26:14,000
में अगर कोई यह कहे कि उन्होंने यह किया वो किया वो किया तो बात अलग है।

1228
01:26:14,000 --> 01:26:18,080
परंतु मनुष्य दृष्टि से देखे जा सकने वाली घटनाओं में सबसे पहले

1229
01:26:18,080 --> 01:26:22,560
उनका चरित्र जो है वो है सत्य प्रतिज्ञ धर्म मर्यादा

1230
01:26:22,560 --> 01:26:26,880
पुरुषोत्तम। यह सब कहां ले जाओगे? एक पत्नी व्रत धारण

1231
01:26:26,880 --> 01:26:31,680
करने वाले। रामोद भाषेते।

1232
01:26:31,680 --> 01:26:35,760
खैर आगे चलते हैं। अब भगवान श्री कृष्ण की

1233
01:26:35,760 --> 01:26:36,400
बात आ जाती।

1234
01:26:36,400 --> 01:26:40,400
तो हमने दो चैप्टर पढ़ लिए। पहला चैप्टर जिसमें हमने शबरी को ब्राह्मणी

1235
01:26:40,400 --> 01:26:44,400
शब्द सिद्ध किया। है ना? किस कारण? कि

1236
01:26:44,400 --> 01:26:48,720
वह धर्माचारणी कही गई हैं। श्री राम जी उनकी तपस्या को को प्रोत्साहित

1237
01:26:48,720 --> 01:26:52,960
कर रहे हैं। जटा धारण कर रही हैं। मृग चर्म धारण कर रही हैं। धर्म को जानने

1238
01:26:52,960 --> 01:26:56,960
वाली हैं। और तब वो जो है तपस्या इत्यादि कर रही हैं। तो तब हमने

1239
01:26:56,960 --> 01:27:01,120
पहले चैप्टर में सिद्ध किया ब्राह्मणी हैं। उनका जो शबरी नाम है वो जैसे

1240
01:27:01,120 --> 01:27:05,520
शबराचार्य थे मीमांसा दर्शन के भाष्यकार उनके ही सदृश्य

1241
01:27:05,520 --> 01:27:09,600
उनका नाम शबरी है। और दूसरे चैप्टर में हमने

1242
01:27:09,600 --> 01:27:13,760
यह सिद्ध किया कि प्रभु श्री राम ब्रह्म

1243
01:27:13,760 --> 01:27:18,000
भाव से कार्य नहीं करते थे। मनुष्य जो देख सकते हैं, उस

1244
01:27:18,000 --> 01:27:22,160
देख सकने वाले दृश्यों में वह ब्रह्म भाव से कोई

1245
01:27:22,160 --> 01:27:26,240
कार्य नहीं करते थे। वह मनुष्य दृष्टि से ही कार्य करते

1246
01:27:26,240 --> 01:27:30,320
थे। ठीक है? और हमने यह भी देख लिया, यह भी

1247
01:27:30,320 --> 01:27:34,400
सिद्ध कर लिया कि वह स्वयं को मनुष्य दृष्टि से

1248
01:27:34,400 --> 01:27:37,920
ही देखने का समर्थन भी करते हैं। अब

1249
01:27:37,920 --> 01:27:42,080
उन्होंने जो घटनाएं मनुष्य दृष्टि से नहीं देखी जा सकती हैं। दिव्य

1250
01:27:42,080 --> 01:27:46,240
घटनाएं देवताओं के यहां पर इस लोक की है

1251
01:27:46,240 --> 01:27:50,880
ही नहीं। भूलोक की है ही नहीं। उन घटनाओं

1252
01:27:50,880 --> 01:27:55,040
उन घटनाओं में अगर कोई यह कहे कि उन्होंने यह किया वो किया वो किया तो बात

1253
01:27:55,040 --> 01:27:59,120
अलग है। परंतु मनुष्य दृष्टि से देखे जा सकने वाली घटनाओं में

1254
01:27:59,120 --> 01:28:03,760
सबसे पहले उनका चरित्र जो है वो है सत्य प्रतिज्ञ धर्म

1255
01:28:03,760 --> 01:28:08,240
मर्यादा पुरुषोत्तम यह सब कहां ले जाओगे? एक पत्नी व्रत

1256
01:28:08,240 --> 01:28:13,440
धारण करने वाले रामोदभ भाषेते

1257
01:28:13,440 --> 01:28:17,520
खैर आगे चलते हैं। अब भगवान श्री कृष्ण की

1258
01:28:17,520 --> 01:28:21,600
बात आ जाती है। तो जब श्री कृष्ण सहित ईश्वर के अनेक रूपों द्वारा

1259
01:28:21,600 --> 01:28:25,600
मनुष्य दृष्टि से ही अनेक अलौकिक घटनाओं का

1260
01:28:25,600 --> 01:28:30,880
विवरण प्राप्त होता है। ऐसे में जब भगवान

1261
01:28:30,880 --> 01:28:35,040
द्वारा मनुष्य दृष्टि से ही पूरी की पूरी सेना को निगलने पर भी उन्हें दोष दृष्टि

1262
01:28:35,040 --> 01:28:39,040
से नहीं देखा जाता तो श्री राम रूप को इस प्रकरण में दोष दृष्टि से क्यों

1263
01:28:39,040 --> 01:28:43,200
देखा जाएगा? यह एक पूर्व पक्ष को रखा है।

1264
01:28:43,200 --> 01:28:47,280
तो सुनिए सबसे पहले ध्यातव्य है कि विषय

1265
01:28:47,280 --> 01:28:51,360
यह नहीं है कि श्री रामचंद्र जी शास्त्रीय मर्यादा का उल्लंघन करने

1266
01:28:51,360 --> 01:28:55,440
पर श्री रामचंद्र जी को शास्त्रीय मर्यादा का उल्लंघन

1267
01:28:55,440 --> 01:28:59,920
करने पर दोष लगेगा या नहीं लगेगा। विषय यह है कि वह शास्त्रीय

1268
01:28:59,920 --> 01:29:03,920
मर्यादा का उल्लंघन करते हैं कि नहीं करते हैं। दोष

1269
01:29:03,920 --> 01:29:08,000
लगेगा कि नहीं लगेगा यह बात नहीं है। करते हैं कि नहीं करते

1270
01:29:08,000 --> 01:29:12,400
तो कहां से प्राप्त हो रहा है कि वह जो है करने वाले हैं। ब्रह्म

1271
01:29:12,400 --> 01:29:16,480
भाव के ही आधार पर कार्य करने वाले यही बता दो। वह तो स्वयं के लिए कह रहे हैं भैया मैं

1272
01:29:16,480 --> 01:29:20,720
तो मनुष्य हूं। मैं तो अपने आप को मनुष्य जानता हूं। अभी तक जो सारे कार्य करा आए हैं मनुष्य

1273
01:29:20,720 --> 01:29:24,880
दृष्टि से ही होना सिद्ध होता है। फिर वो क्या जब शबरी के झूठे बैर खा रहे

1274
01:29:24,880 --> 01:29:28,880
थे तो उनको पता नहीं था वो ब्रह्म है। और वहां झूठ बोल रहे थे ब्रह्मा जी से कि वो जानते हैं

1275
01:29:28,880 --> 01:29:34,160
कि वो अपने आप को ब्रह्म नहीं जानते हैं। वो झूठ बोल रहे थे।

1276
01:29:34,160 --> 01:29:38,480
असत्य भाषण करने वाले भी थे। शबरी का झूठा बेर खिलाना सिद्ध

1277
01:29:38,480 --> 01:29:42,800
करने के लिए या कर्पात्री जी का विरोध करने के लिए यद्यपि

1278
01:29:42,800 --> 01:29:46,160
कर्पात्री जी के अलावा भी कई अन्य आचार्यों ने इस बात का समर्थन

1279
01:29:46,160 --> 01:29:50,640
किया है कि शबरी जी ब्राह्मणी थी और झूठे बेर वाली घटना जो है वो लौकिक

1280
01:29:50,640 --> 01:29:55,600
दृष्टि से मनुष्य दृष्टि से वो सिद्ध नहीं होती।

1281
01:29:55,600 --> 01:29:59,680
करपात्री जी अकेले नहीं है। परंतु सिंगल पॉइंट करपात्री जी

1282
01:29:59,680 --> 01:30:04,720
को का खंडन सिद्ध करने के लिए जो है कितना

1283
01:30:04,720 --> 01:30:08,720
गिर सकते हो? कितना गिर सकते हो? श्री राम को असत्य भाषण

1284
01:30:08,720 --> 01:30:12,880
करने वाला भी सिद्ध कर दोगे और तुम्हारी भुसुंडी रामायण के अनुसार तो

1285
01:30:12,880 --> 01:30:17,040
जो है श्री रामचंद्र जी एक पत्नी व्रत धारण करने वाले भी सिद्ध नहीं होंगे। अभी

1286
01:30:17,040 --> 01:30:21,600
देखना बंपर प्राइ है तुम्हारे लिए भसुंड रामायण का।

1287
01:30:21,600 --> 01:30:25,840
तो ध्यातव्य है कि विषय यह नहीं है कि श्री रामचंद्र जी शास्त्रीय मर्यादा

1288
01:30:25,840 --> 01:30:30,000
का उल्लंघन करने पर उन पर दोष लगेगा या नहीं। विषय यह

1289
01:30:30,000 --> 01:30:34,160
है कि वह शास्त्रीय मर्यादा का उल्लंघन करते हैं या नहीं करते। अपने वचन से विमुख

1290
01:30:34,160 --> 01:30:38,240
हो सकते हैं या नहीं हो सकते। अपनी ली हुई प्रतिज्ञा के विपरीत कार्य कर

1291
01:30:38,240 --> 01:30:42,320
सकते हैं या नहीं। तो श्री रामचंद्र जी के अनुसार वे ऐसा नहीं कर सकते। वो

1292
01:30:42,320 --> 01:30:46,400
बात और है कुछ धूर्तों के

1293
01:30:46,400 --> 01:30:50,400
अनुसार वह ऐसा कर सकते हैं। श्री रामचंद्र जी के अनुसार वो अपने वचन से विमुख

1294
01:30:50,400 --> 01:30:54,400
नहीं हो सकते। मर्यादा का उल्लंघन नहीं कर सकते। हां

1295
01:30:54,400 --> 01:30:58,400
उनके धूर्त और पाखंडी स्वयं को कहने वाले तथाकथित उनके

1296
01:30:58,400 --> 01:31:01,360
भक्त और कर्मणा जगतगुरु के द्वारा

1297
01:31:01,360 --> 01:31:05,840
जो है के अनुसार श्री राम जी की बात का भी

1298
01:31:05,840 --> 01:31:10,400
अतिक्रमण करते हुए उनके अनुसार श्री राम जी सत्य

1299
01:31:10,400 --> 01:31:15,680
असत्य भाषण करते हैं। अपनी मर्यादा का उल्लंघन करने वाले इत्यादि हैं। खैर

1300
01:31:15,680 --> 01:31:20,000
वाल्मीकि जी के अनुसार वह ऐसा नहीं कर सकते।

1301
01:31:20,000 --> 01:31:24,080
श्री राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाना ही उनके द्वारा मर्यादा का उल्लंघन

1302
01:31:24,080 --> 01:31:28,160
ना होने की पुष्टि करता है। यदि तब भी कोई उनके द्वारा मर्यादा के

1303
01:31:28,160 --> 01:31:32,160
उल्लंघन को सिद्ध करने का कुप्रयास करता है तो यह ठीक इस प्रकार से है जैसे

1304
01:31:32,160 --> 01:31:36,320
हनुमान जी को वाल्मीकि रामायण में अविवाहित बताया गया परंतु तब भी ब्रह्म

1305
01:31:36,320 --> 01:31:40,320
भाव के नाम पर उनके विवाह का वर्णन कर दिया जाए अथवा श्री राम को एक

1306
01:31:40,320 --> 01:31:44,320
पत्नी व्रत धारण करने वाला बताया जाए तथापि उनके द्वारा अनेक स्त्रियों

1307
01:31:44,320 --> 01:31:48,560
के संग विवाह की बात कही जाए। बात करें यदि भगवान

1308
01:31:48,560 --> 01:31:53,600
श्री कृष्ण और राम के बीच के अंतर की दृष्टि से

1309
01:31:53,600 --> 01:31:57,760
अंतर की तो तत्व से अभेद होते हुए भी भगवान श्री

1310
01:31:57,760 --> 01:32:02,000
कृष्ण के जन्म का मुख्य प्रयोजन सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर से मनुष्य

1311
01:32:02,000 --> 01:32:06,320
मात्र को परिचित करवाना था। तो वहीं श्री राम के अवतार का

1312
01:32:06,320 --> 01:32:10,320
मुख्य प्रयोजन सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर को प्राप्त करने के निमित्त बताई

1313
01:32:10,320 --> 01:32:15,200
गई विधि को धारण पूर्वक धर्म से

1314
01:32:15,200 --> 01:32:16,800
मनुष्य मात्र का

1315
01:32:16,800 --> 01:32:20,240
परिचय करवाना था।

1316
01:32:20,240 --> 01:32:24,400
धारण करते हुए धारण अपनी स्वयं को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हुए

1317
01:32:24,400 --> 01:32:28,880
उनका प्रयोजन था। अनेक अनेक विचारधाराएं

1318
01:32:28,880 --> 01:32:32,960
हैं ईश्वर के विषय में संसार में कहीं भी किसी

1319
01:32:32,960 --> 01:32:37,200
भी विचारधारा में उनके ही द्वारा बताई गई नियमावली को पूरी

1320
01:32:37,200 --> 01:32:41,360
तरीके से एज इट इज फॉलो करने वाला कोई भी आदर्श किसी के पास

1321
01:32:41,360 --> 01:32:45,440
भी नहीं है। इसलिए पूरी दुनिया

1322
01:32:45,440 --> 01:32:49,760
लगी हुई है। श्री रामचंद्र जी के कृत्यों में कहीं पर

1323
01:32:49,760 --> 01:32:53,760
किसी जगह पर कुछ एक अंकुश तो निकाल दे जो उन्होंने शास्त्रों की

1324
01:32:53,760 --> 01:32:57,920
सीमा के बाहर जाकर के कार्य कर दिया। पूरी दुनिया लगी हुई है। यह

1325
01:32:57,920 --> 01:33:02,720
भागवत आनंद पहला नहीं है। उसको सपोर्ट करने वाले लोग पहले नहीं है।

1326
01:33:02,720 --> 01:33:08,720
बुलके जैन इत्यादि पता नहीं कितने लोग लगे हुए हैं।

1327
01:33:08,800 --> 01:33:12,880
पूरी दुनिया यही तुली हुई है कि श्री राम जी से भी मर्यादा

1328
01:33:12,880 --> 01:33:17,280
का उल्लंघन होना हम लोग सिद्ध कर दे। किसी प्रकार

1329
01:33:17,280 --> 01:33:21,440
जिससे कि इनका आदर्श छिन जाए इनसे। इनके यहां पर

1330
01:33:21,440 --> 01:33:27,280
कोई भी मूर्तिमान स्वरूप ना रह जाए। धर्म का विग्रह ना रह जाए।

1331
01:33:27,280 --> 01:33:31,760
अपने ही हाथों से अपने ही घर में आग लगाने वाले हो तुम लोग। जो इन जैसे

1332
01:33:31,760 --> 01:33:32,480
कर्मणा

1333
01:33:32,480 --> 01:33:38,480
जगत गुरुओं का साथ देते हो।

1334
01:33:42,720 --> 01:33:46,800
कर्मणा ब्राह्मण नहीं होगा। कर्मणा वर्णाश्रम

1335
01:33:46,800 --> 01:33:51,360
नहीं होगा कर्मणा आचार्यत्व होगा

1336
01:33:51,360 --> 01:33:55,520
संसार में धर्म को धारण करने वाला आदर्श स्थापित करना ही

1337
01:33:55,520 --> 01:33:59,920
प्रभु श्री राम रूप में भगवान के अवतार का मुख्य प्रयोजन था।

1338
01:33:59,920 --> 01:34:04,000
इसलिए जहां एक ओर भगवान श्री कृष्ण को लीला पुरुषोत्तम कहा जाता है

1339
01:34:04,000 --> 01:34:08,320
तो वहीं दूसरी ओर प्रभु श्री राम को मर्यादा पुरुषोत्तम। जहां

1340
01:34:08,320 --> 01:34:12,480
एक ओर एक राक्षस के बंधन से मुक्त

1341
01:34:12,480 --> 01:34:16,720
होने पर अग्नि परीक्षा के बाद भी मर्यादा पुरुषोत्तम अपनी प्राणप्रिय पत्नी

1342
01:34:16,720 --> 01:34:21,120
सीता को उनकी पवित्रता जानते हुए भी लोक संग्रह के उद्देश्य

1343
01:34:21,120 --> 01:34:25,760
से त्यागने की बात कहते हैं तो वहीं भगवान श्री कृष्ण 16108

1344
01:34:25,760 --> 01:34:29,920
कन्याओं को राक्षस की कैद से छुड़ाकर स्वीकार कर

1345
01:34:29,920 --> 01:34:34,000
लेते हैं। ध्यान रहे यह वही 16108 कन्याएं

1346
01:34:34,000 --> 01:34:38,320
हैं जिनको भगवान श्री राम ने राम रूप में एक पत्नी व्रत व सत्य

1347
01:34:38,320 --> 01:34:42,560
प्रतिज्ञा रूपी धर्म के कारण अस्वीकार कर दिया था। जहां

1348
01:34:42,560 --> 01:34:46,800
एक और भगवान को मानव देह में देखकर उनके ब्रह्म भाव को ना जानने

1349
01:34:46,800 --> 01:34:47,760
वाले को भगवान श्री

1350
01:34:47,760 --> 01:34:52,000
कृष्ण मूर्ख कह रहे हैं। भगवत गीता 91 तो वहीं

1351
01:34:52,000 --> 01:34:56,000
दूसरी ओर स्वयं ब्रह्म होते हुए भी वह स्वयं को साधारण

1352
01:34:56,000 --> 01:35:00,240
मनुष्य के रूप में जानने वाला ही बता रहे हैं। वाल्मीकि रामायण 6 117

1353
01:35:00,240 --> 01:35:04,320
111 ये अंतर है। भगवान श्री कृष्ण

1354
01:35:04,320 --> 01:35:08,320
जो अन्य लोग हैं वह उनको ब्रह्म के रूप में नहीं देख रहे हैं। तो उनको

1355
01:35:08,320 --> 01:35:12,400
वह मूर्ख कह रहे हैं। और प्रभु श्री राम अन्यों की

1356
01:35:12,400 --> 01:35:16,560
तो बात छोड़ो स्वयं स्वयं को मनुष्य रूप से ही देख

1357
01:35:16,560 --> 01:35:19,840
रहे हैं।

1358
01:35:19,840 --> 01:35:23,840
अतः भगवान श्री कृष्ण अथवा ईश्वर के अन्य वह रूप

1359
01:35:23,840 --> 01:35:28,320
जिन्होंने मानवीय मर्यादाओं की सीमा के परे रहकर मानव समाज को

1360
01:35:28,320 --> 01:35:32,400
अह शिक्षा प्रदान की है। धर्म संस्थापना की है।

1361
01:35:32,400 --> 01:35:36,640
उनके आधार पर श्री राम को भी मर्यादा का उल्लंघन पूर्वक कार्य

1362
01:35:36,640 --> 01:35:40,640
करने की करने वाला होने की बात कहना युक्ति युक्त सिद्ध

1363
01:35:40,640 --> 01:35:43,760
नहीं होता।

1364
01:35:43,760 --> 01:35:47,840
तथापि केवल और केवल आक्षेप करने वाले वाले की संतुष्टि

1365
01:35:47,840 --> 01:35:51,920
के लिए हम यहां बता देना आवश्यक समझते हैं कि ब्रह्म भाव

1366
01:35:51,920 --> 01:35:55,920
का आलंबन लेकर दोष ना लगने की संभावना व्यक्त करते हुए प्रभु

1367
01:35:55,920 --> 01:36:00,400
श्री राम द्वारा मर्यादा के उल्लंघन को स्वीकार करने की बात

1368
01:36:00,400 --> 01:36:04,640
करने वाले आप पहले व्यक्ति नहीं है। ठीक

1369
01:36:04,640 --> 01:36:08,720
है? ब्रह्म भाव के आधार पर उन पर दोष नहीं

1370
01:36:08,720 --> 01:36:13,600
लगेगा। इस तरह की बातें जो है कहने वाले तुम पहले नहीं हो भागवतानंद

1371
01:36:13,600 --> 01:36:17,680
वाल्मीकि रामायण में ही लोगों ने ऐसी बातें कही है। सुनो कहां कही

1372
01:36:17,680 --> 01:36:22,000
है? तो कहां कही है? वाल्मीकि रामायण अयोध्या

1373
01:36:22,000 --> 01:36:26,320
कांड के 107वें सर्ग में महाराज भरत द्वारा पिता की आज्ञा

1374
01:36:26,320 --> 01:36:30,320
एवं श्री राम की प्रतिज्ञा के उल्लंघन पूर्वक श्री राम को अयोध्या

1375
01:36:30,320 --> 01:36:34,560
लौट चलने हेतु प्रेरित किया गया है। एवं जिसके समर्थ में

1376
01:36:34,560 --> 01:36:35,060
वह

1377
01:36:34,880 --> 01:36:39,040
श्री राम को नाना प्रकार की युक्तियां देकर यह सिद्ध करने का प्रयास

1378
01:36:39,040 --> 01:36:43,120
करते हैं कि ऐसा करने पर उन्हें कोई दोष नहीं लगेगा। तुमने कही थी ना बात उनको

1379
01:36:43,120 --> 01:36:47,280
दोष क्यों लगेगा? समर्थ को दोष नहीं लगता। यह तुम पहले नहीं हो।

1380
01:36:47,280 --> 01:36:51,280
राजा भरत ने भी कहा था कि तुमको कोई दोष नहीं लगेगा। वशिष्ठ जी ने भी कहा था कि

1381
01:36:51,280 --> 01:36:55,280
तुमको कोई दोष नहीं लगेगा। मगर प्रभु श्री राम सत्य

1382
01:36:55,280 --> 01:36:59,760
प्रतिज्ञ मर्यादा पुरुषोत्तम थे। नहीं

1383
01:36:59,760 --> 01:37:04,640
मेरे पिता की आज्ञा मिथ्या नहीं होगी।

1384
01:37:04,640 --> 01:37:09,120
धर्म का उल्लंघन होगा। तो क्या कहा?

1385
01:37:09,120 --> 01:37:13,200
ऐसा करने पर तुम्हें कोई दोष नहीं लगे। वशिष्ठ जी द्वारा तो स्पष्ट रूप

1386
01:37:13,200 --> 01:37:17,280
से कहा गया कि अमुक- अमुक कारणों से तुम्हारा अयोध्या वापस

1387
01:37:17,280 --> 01:37:21,360
लौटना धर्म का उल्लंघन नहीं होगा। लौट

1388
01:37:21,360 --> 01:37:25,840
चलो राम वाल्मीकि रामायण दो

1389
01:37:25,840 --> 01:37:30,400
111 से

1390
01:37:30,400 --> 01:37:34,640
111 का पांच पांच पांचव से सातवां श्लोक

1391
01:37:34,640 --> 01:37:38,960
परंतु श्री राम कहते हैं कि मेरे जन्मदाता

1392
01:37:38,960 --> 01:37:43,040
मेरे पिता दशरथ ने मुझे जो आज्ञा दी है वह मिथ्या नहीं

1393
01:37:43,040 --> 01:37:47,360
होगी। अरे कैसे राम है यह और कैसे राम तुम दे रहे हो संसार

1394
01:37:47,360 --> 01:37:51,360
को? शर्म कर लो। लज्जा आती

1395
01:37:51,360 --> 01:37:57,040
है ऐसे लोग बैठकर के राम कथा करते हैं बोर्ड लगा के। बताइए

1396
01:37:57,040 --> 01:38:01,920
राम कथा कहेंगे। ये

1397
01:38:01,920 --> 01:38:05,280
कर्मणा जगतगुरु।

1398
01:38:05,280 --> 01:38:11,280
चलो आगे चलते हैं।

1399
01:38:29,480 --> 01:38:33,480
[संगीत]
