1
00:00:06,880 --> 00:00:11,040
तो सभी को जय श्री राम। इस समय हम

2
00:00:11,040 --> 00:00:15,200
आए हुए हैं वृंदावन में और जैसा कि आप लोग जानते हैं कि

3
00:00:15,200 --> 00:00:19,520
हम विभिन्न जो धार्मिक मान्यताएं हैं उनको लेकर के जो अलग-अलग

4
00:00:19,520 --> 00:00:23,600
वैचारिक दृष्टिकोण है उनसे आपको अवगत कराते हैं। इसी

5
00:00:23,600 --> 00:00:27,840
क्रम में आज हम वृंदावन में गुरुकुल रोड पर एक गुरुकुल स्थित है। वो

6
00:00:27,840 --> 00:00:32,160
काफी बड़े प्रांगण में फैला हुआ है और मेरे ख्याल से दयानंद

7
00:00:32,160 --> 00:00:36,160
जी ने इस गुरुकुल को स्टार्ट किया है। ऐसा कुछ काफी पुराना गुरुकुल

8
00:00:36,160 --> 00:00:42,160
है ये। तो हमारे साथ में यहां के आचार्य हैं एक जो

9
00:00:42,320 --> 00:00:46,480
थोड़ा सा आर्य समाज के सिद्धांत इस गुरुकुल के इतिहास इत्यादि के संबंध

10
00:00:46,480 --> 00:00:51,040
में प्रकाश डालेंगे। तो आचार्य जी सबसे पहले आपको जय श्री राम।

11
00:00:51,040 --> 00:00:55,040
जी आचार्य जी थोड़ा सा अपना परिचय और इस

12
00:00:55,040 --> 00:00:59,680
गुरुकुल के साथ आपका संबंध थोड़ा सा अवगत करा। जी जी

13
00:00:59,680 --> 00:01:03,840
मैं आचार्य पंकज आर्य अधिष्ठाता गुरुकुल

14
00:01:03,840 --> 00:01:08,000
वृंदावन मथुरा और आर्य समाज की यूथ

15
00:01:08,000 --> 00:01:12,560
विंग है। उसका मैं प्रांतीय मुख्य संचालक हूं। अच्छा

16
00:01:12,560 --> 00:01:16,640
थोड़ा सा आपका अध्ययन कहां से हुआ? कहां तक मतलब थोड़ा सा मेरा

17
00:01:16,640 --> 00:01:20,640
अध्ययन हुआ छठवीं से लेकर 12वीं तक माध्यमिक शिक्षा परिषद के

18
00:01:20,640 --> 00:01:24,640
ही विद्यालय में आदर्श लक्ष्मण इंटर कॉलेज कैंथल में। हम उसके बाद

19
00:01:24,640 --> 00:01:28,960
मैंने सेठ फूलचंद बांग्ला पीजी कॉलेज हाथरस से ग्रेजुएशन

20
00:01:28,960 --> 00:01:33,520
किया और पोस्ट ग्रेजुएशन मैंने चार बार किया हिंदी हिस्ट्री

21
00:01:33,520 --> 00:01:37,600
पॉलिटिकल साइंस एवं ये जो गुरुकुलय परंपरा

22
00:01:37,600 --> 00:01:41,760
है गुरुकुल साधु आश्रम से साहित्यचारी किया है और उसके

23
00:01:41,760 --> 00:01:46,240
बाद हम लोग सेवा में इसमें लगे हुए हैं। निश्चित रूप से

24
00:01:46,240 --> 00:01:50,320
जी जी बोलिए बोले आप निश्चित रूप से गुरुकुलों का उद्देश्य यह

25
00:01:50,320 --> 00:01:54,640
था कि हमारी जो प्राचीन संस्कृति है परंपरा जैसे वैदिक

26
00:01:54,640 --> 00:01:57,360
संस्कृति कहा गया है जो ईश्वरी ज्ञान

27
00:01:57,360 --> 00:02:01,520
के आधार पर सृष्टि में पहले चार ऋषियों को जिनके नाम

28
00:02:01,520 --> 00:02:05,760
अग्नि वायु आदित्य अंगरा चार ऋषियों को उनके

29
00:02:05,760 --> 00:02:10,000
हृदय में ईश्वरी ज्ञान आया और उसी परंपरा से

30
00:02:10,000 --> 00:02:14,000
फिर सुरती परंपरा से गुरु ने शिष्य को सुना

31
00:02:14,000 --> 00:02:18,000
दिया फिर उसके शिष्य ने अपने शिष्य को सुना दिया इस

32
00:02:18,000 --> 00:02:22,320
प्रकार से ये परंपरा चली इसलिए वेदों को सुरती नाम दिया गया हम

33
00:02:22,320 --> 00:02:26,480
कि तो ये श्रुति है सुनकर के परंपरा जब स्मरण शक्तियां कम

34
00:02:26,480 --> 00:02:30,640
होने लगी तब कागज का आविष्कार हुआ फिर ये लिखित में प्राप्त हुआ

35
00:02:30,640 --> 00:02:34,640
है तो वैदिक संस्कृति वेद पर आधारित है तो बहुत ही सुंदर

36
00:02:34,640 --> 00:02:38,640
परिचय रहा आचार्य जी का अ आचार्य जी

37
00:02:38,640 --> 00:02:42,640
इसमें एक आजकल जैसे एक आप देख रहे हैं

38
00:02:42,640 --> 00:02:46,640
कि जैसे हमारी आजकल की जो जनरेशन है आज की पीढ़ी जो है नास्तिकता

39
00:02:46,640 --> 00:02:51,440
की ओर बढ़ रही है बहुत ज्यादा तो अ

40
00:02:51,440 --> 00:02:55,440
ईश्वर कि क्या कहते हैं यह जो वंदना की जाती

41
00:02:55,440 --> 00:02:59,440
है इससे उसे क्या मिलता है? मतलब ईश्वर की वंदना करने से क्या

42
00:02:59,440 --> 00:03:04,000
प्राप्त होता है? मतलब ऐसा कहते हैं कि ईश्वर जो है आपको जैसे

43
00:03:04,000 --> 00:03:08,000
ईश्वर की वंदना करने से सबसे बड़ा एक मिनट

44
00:03:08,000 --> 00:03:12,000
एक मिनट ऐसे लोगों का कई लोगों का मानना है कि भाई हम ईश्वर की पूजा करते हैं तो

45
00:03:12,000 --> 00:03:12,500
वो हम पर

46
00:03:12,480 --> 00:03:16,560
जो है हमारे को हमारे पाप से मुक्त करता है या वो ऐसा

47
00:03:16,560 --> 00:03:20,640
माना ऐसी मान्यता होती है वो अपनी शरण में ले लेते हैं ईश्वर और जो है फिर जो

48
00:03:20,640 --> 00:03:25,040
है आपको जो है आपके दुख हर लेते हैं तो यह वाली मान्यता भी है

49
00:03:25,040 --> 00:03:29,120
तो आर्य समाज ये मानता है कि ईश्वर जो है

50
00:03:29,120 --> 00:03:33,520
पूजा करने से ऐसा नहीं है कि आपको कुछ दे दे। तो फिर

51
00:03:33,520 --> 00:03:37,920
पूजा करने का क्या लाभ? पूजा करने का

52
00:03:37,920 --> 00:03:42,160
लाभ कोई धन संपदा, वैभव या किसी दुख

53
00:03:42,160 --> 00:03:46,400
से दूर करने का नहीं है। जी निश्चित रूप से

54
00:03:46,400 --> 00:03:50,960
दुख जो होते हैं वो पापों से होते हैं और पाप होते हैं वृतियों से।

55
00:03:50,960 --> 00:03:55,200
और जैसी व्यक्ति की वृत्ति बन जाती है वैसा ही मनुष्य बनता चला जाता

56
00:03:55,200 --> 00:03:59,600
है। इसलिए हमारी वृत्ति खराब ना हो इसलिए हम स्तुति,

57
00:03:59,600 --> 00:04:03,760
उपासना और प्रार्थना करते हैं। जब वृत्ति सही होंगी तो

58
00:04:03,760 --> 00:04:07,840
हम अच्छे कर्म करेंगे। अच्छे कर्म करेंगे तो अच्छा फल मिलेगा। इसलिए

59
00:04:07,840 --> 00:04:11,840
महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती से पूछा कि हम ईश्वर की स्तुति

60
00:04:11,840 --> 00:04:15,840
क्यों करें? जब वो पापों को माफ नहीं करेगा। ईश्वर किसी

61
00:04:15,840 --> 00:04:19,920
को दंड को समाप्त नहीं करेगा। उसको देना है तो देना ही है क्योंकि

62
00:04:19,920 --> 00:04:24,080
भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा अवश्य भोग कर्तव्यम कृतम

63
00:04:24,080 --> 00:04:27,520
कर्म शुभाशुभम हे अर्जुन किए हुए कर्म

64
00:04:27,520 --> 00:04:31,600
शुभ और अशुभ का हमें फल प्राप्त होगा ही चाहे

65
00:04:31,600 --> 00:04:35,600
वो जो शुभ है उसका अच्छा कर्म फल मिलेगा

66
00:04:35,600 --> 00:04:40,320
और अशुभ है उसका बुरा मिलेगा लेकिन भोगना इसी जीवात्मा को पड़ेगा

67
00:04:40,320 --> 00:04:44,400
इसलिए स्वामी दयानंद से पूछा कि फिर स्तुति क्यों करें तो

68
00:04:44,400 --> 00:04:48,560
स्वामी जी उत्तर देते हैं कि पहाड़ जैसा भी दुख

69
00:04:48,560 --> 00:04:52,720
उसको राई के बराबर लगेगा। यदि वह तैनिक स्तुति करता

70
00:04:52,720 --> 00:04:57,200
है, साधना करता है। इससे बड़ा और क्या लाभ प्राप्त होगा?

71
00:04:57,200 --> 00:05:01,360
परमात्मा कोई धन संपदा नहीं देता है। पुरुषार्थ करो धन संपदा प्राप्त हो जाएगी।

72
00:05:01,360 --> 00:05:05,360
इसका सीधा सा उदाहरण है। जो लोग ईश्वर को नहीं मानते उनके पास भी धन

73
00:05:05,360 --> 00:05:09,520
संपदा होती है। भाई 3 अरब लोग धरती पर नास्तिक हैं।

74
00:05:09,520 --> 00:05:13,680
धन संपदा, गाड़ी, बंगला, कोठी सब कुछ है। यदि ईश्वर

75
00:05:13,680 --> 00:05:17,840
पूजा से देता तो निश्चित रूप से उनके पास क्यों है जो ईश्वर को गाली

76
00:05:17,840 --> 00:05:22,640
देते और नहीं मानते। इसलिए यह तो पुरुषार्थ का फल है।

77
00:05:22,640 --> 00:05:27,040
लेकिन स्तुति का सबसे बड़ा लाभ है कि हमारी वृत्तियां अच्छी बने। वृत्तियों

78
00:05:27,040 --> 00:05:31,280
से संस्कार अच्छे बने। संस्कार से कर्म अच्छे करेंगे। कर्म अच्छे

79
00:05:31,280 --> 00:05:35,360
करेंगे तो सुख प्राप्त होगा। तो महाराज जी एक तरीके से एक तो

80
00:05:35,360 --> 00:05:39,440
आपने ये कहा जो कि क्या कहते हैं जो नास्तिक

81
00:05:39,440 --> 00:05:42,640
हैं जी उनके पास भी धन संपदा की है तो इसमें तो जो

82
00:05:42,640 --> 00:05:46,800
प्रारब्ध है कि उसने पूर्व जन्म में क्या किया उसके आधार पे उसको इस क्या मिला

83
00:05:46,800 --> 00:05:51,040
वो भी हो सकती है धन संपदा दुष्ट को भी प्राप्त हो सकती है महाकवि तुलसीदास

84
00:05:51,040 --> 00:05:55,280
प्रारब्ध के कारण भी हो सकती है। प्रारब्ध के द्वारा भी हो सकती है और उसके

85
00:05:55,280 --> 00:05:59,360
पुरुषार्थ नया भी कर रहा है और धन संपदा प्राप्त ये

86
00:05:59,360 --> 00:06:03,520
फिक्स नहीं कर सकते कि उसको पुरुषार्थ से ही मिला है। उसको प्रारब्ध और पुरुष दोनों

87
00:06:03,520 --> 00:06:07,600
चलते हैं साथसा दोनों साथसा मतलब फिक्स नहीं कर सकते। जी अच्छा इसमें एक चीज

88
00:06:07,600 --> 00:06:12,320
और है महाराज जी जैसे कि ये जो कहा गया है कि

89
00:06:12,320 --> 00:06:16,720
कर्मों के द्वारा पुरुषार्थ के द्वारा आपको मिलेगा और स्तुति

90
00:06:16,720 --> 00:06:20,880
से आपको वृत्ति सही होगी। उसको तो हम अभी देख अभी बात करेंगे वृत्ति

91
00:06:20,880 --> 00:06:24,880
सही होने पे। तो जो ये पुरुषार्थ मिलने की जो बात है मतलब हमें ये मानना

92
00:06:24,880 --> 00:06:29,040
है कि हमारे कर्मों से ही हमें जो मिलेगा वो मिलेगा। हमारे

93
00:06:29,040 --> 00:06:33,200
कर्मों को किए बिना नहीं मिलेगा। मतलब मैं करूंगा तो ही मुझे मिलेगा अन्यथा

94
00:06:33,200 --> 00:06:37,200
नहीं मिलेगा। पर इसमें एक दिक्कत आती है सत्यार्थ प्रकाश में स्वामी जी ने

95
00:06:37,200 --> 00:06:41,280
यह कहा है कि ईश्वर की स्तुति करने से निराभिमानता आती है।

96
00:06:41,280 --> 00:06:45,280
जी निराभिमानता निराभिमानता मतलब कि इस बात का अभिमान

97
00:06:45,280 --> 00:06:49,440
कि मेरे करने से हो रहा है। ये तो बिल्कुल सही बात है। ये

98
00:06:49,440 --> 00:06:53,520
वृत्तियों में ही शामिल होगा। मैं वही कह रहा हूं। तो उसमें क्या है कि व्यक्ति

99
00:06:53,520 --> 00:06:57,600
जब अच्छी वृत्ति बनेगी तो निर्म अभिमानता आएगी ही। व्यक्ति यह सोचे

100
00:06:57,600 --> 00:06:58,100
कि

101
00:06:57,840 --> 00:07:01,920
नहीं सोचे कि यह मेरे कर्मों का फल है या फिर यह सोचे कि मैंने ईश्वर

102
00:07:01,920 --> 00:07:06,160
की स्तुति की है और मुझे कर्म वैसे हमारा वैदिक वांग में यह कहता है आचार्य

103
00:07:06,160 --> 00:07:10,560
श्री कि हम कर्म करें फल की इच्छा ना करें

104
00:07:10,560 --> 00:07:14,560
उसमें ही आ जाएगा कि मैंने पुरुषार्थ किया है कि नहीं मैं कुछ कर रहा हूं जभी

105
00:07:14,560 --> 00:07:18,800
मिल रहा है ईश्वर की व्यवस्था क्या है लेकिन निर

106
00:07:18,800 --> 00:07:22,960
अभिमानता वृत्ति साफ होने से ही आती चली जाएगी और

107
00:07:22,960 --> 00:07:27,040
उस व्यक्ति के जो अहंकार आ रहा है वो ईश्वर

108
00:07:27,040 --> 00:07:31,040
की स्तुति से समाप्त मतलब अहंकार नहीं आना चाहिए। जी जी तो फिर हम ये क्यों

109
00:07:31,040 --> 00:07:35,120
कह रहे हैं कि ये जो कर जो परिणाम हमें प्राप्त हुआ है वो ईश्वर ने नहीं

110
00:07:35,120 --> 00:07:39,520
किया है। फिर हम उसको ये क्यों ईश्वर ने क्यों नहीं किया? जब हमारी वृत्त

111
00:07:39,520 --> 00:07:43,600
मैं मैं देखो सुनो फिर सुनिए जी कि हम लोग जो ईश्वर

112
00:07:43,600 --> 00:07:47,760
की स्तुति करते हैं या कोई धर्म कमाते हैं परोपकार

113
00:07:47,760 --> 00:07:51,920
करते हैं पुण्य करते हैं उसका उस तक

114
00:07:51,920 --> 00:07:55,920
पहुंचाने के लिए वृत्त की संस्कारों की बहुत जरूरत है बहुत सारे

115
00:07:55,920 --> 00:08:00,000
व्यक्ति चाहते करना पुण्य करना लेकिन वृत्ति नहीं बनती है

116
00:08:00,000 --> 00:08:04,320
उनकी संस्कार नहीं बनते और नहीं कर पाते चाहते हुए भी नहीं कर पाते

117
00:08:04,320 --> 00:08:08,480
चाहते हुए सत्संग में जाना यज्ञ में बैठना है यज्ञ चल रहा है लेकिन

118
00:08:08,480 --> 00:08:13,200
उनकी वृत्ति नहीं है। यज्ञ यहां चल रहा है। वो दूसरी जगह समय अपना

119
00:08:13,200 --> 00:08:17,440
जो है पास कर रहे हैं। तो उस वृत्ति को बनाने के लिए उस

120
00:08:17,440 --> 00:08:21,920
अच्छाई को प्राप्त करने के लिए अच्छे संस्कार बनाने के लिए कि हमारी वृत्ति बने

121
00:08:21,920 --> 00:08:26,160
इसके लिए भी ईश्वर की स्तुति उपासना प्रार्थना बहुत आवश्यक

122
00:08:26,160 --> 00:08:30,640
है। नहीं ये मैं समझ रहा हूं। आपने जो कहा है ना वो तो मैं समझने का प्रयास कर रहा हूं।

123
00:08:30,640 --> 00:08:34,640
मतलब उसको एट द एंड पाना मतलब यह अपने मन में क्या विचार रखना

124
00:08:34,640 --> 00:08:38,800
है कि यह जो मुझे फल प्राप्त हुआ है यह मेरे करने से हुआ है ईश्वर

125
00:08:38,800 --> 00:08:42,800
की कृपा से हुआ है। तो वैसे तो ईश्वर के बारे में

126
00:08:42,800 --> 00:08:46,960
कर्म फल व्यवस्थापन एक मिनट अगर हम यह सोचे कि

127
00:08:46,960 --> 00:08:50,960
ईश्वर की कृपा से हुआ है तो दयानंद जी ने ये कहा है कि ईश्वर स्तुति करने से कुछ नहीं देता

128
00:08:50,960 --> 00:08:54,960
है तो कृपा भी नहीं देगा। वो तो आपके कर्मों का फल ही है। ठीक है?

129
00:08:54,960 --> 00:08:58,960
और अगर हम यह सोचे कि मेरे कर्मों का फल है तो दयानंद जी ने ये भी कह दिया कि निराभिमानता

130
00:08:58,960 --> 00:09:03,920
होनी चाहिए। नहीं तो मेरे कर्मों का फल में क्या अभिमान आएगा इसमें?

131
00:09:03,920 --> 00:09:08,000
तो यही तो अभिमान है कि भाई मेरे मेरे से हुआ मैंने किया। यही तो अभिमान

132
00:09:08,000 --> 00:09:12,000
है। अब ये मेरे को अपने कर्मों का फल मिलेगा। तो कर्तापन है

133
00:09:12,000 --> 00:09:16,640
ना? वही अभिमानता वही अहंकार है। कर्तापन मैंने किया। हम तो

134
00:09:16,640 --> 00:09:20,960
अहंकार के बिना तो शरीर ही नहीं बनेगा। हां भाई अहम होता

135
00:09:20,960 --> 00:09:25,040
है तभी यह शरीर तो अगर हमारा देखिए देखिए बात प्रश्न

136
00:09:25,040 --> 00:09:28,320
यह है कि अगर हमारा लक्ष्य निरभिमानता है

137
00:09:28,320 --> 00:09:32,560
तो फिर हमें ये मानना पड़ेगा अपने आप को बताना पड़ेगा कि ईश्वर ने ही दिया

138
00:09:32,560 --> 00:09:36,800
ईश्वर ने ही कृपा की। अगर हम ईश्वर की कृपा नहीं मानेंगे तो हम यहां निराभिमानता

139
00:09:36,800 --> 00:09:41,040
नहीं ले सकते। निर्राभिमानता या अहंकार या स्वाभिमान इनमें

140
00:09:41,040 --> 00:09:45,360
अंतर है बहुत सा। ठीक है? स्वाभिमान होता है। हमने दूसरे

141
00:09:45,360 --> 00:09:49,360
के लिए किया है। परोपकार में किया है कोई और हम कह रहे हैं कि हमने यह किया है

142
00:09:49,360 --> 00:09:53,600
तो ये स्वाभिमान कहलाएगा। और इसी काम को हम अपने लिए करें

143
00:09:53,600 --> 00:09:58,080
तो यही अहंकार कहलाएगा। इसलिए स्वाभिमान शब्द आ यह तो

144
00:09:58,080 --> 00:10:02,080
आचार्य जी जो अह सत ही लेवल की बात है। अहंकार

145
00:10:02,080 --> 00:10:06,080
का मतलब है आखिर में जो अहम तत्व के लिए हमने कहा कि

146
00:10:06,080 --> 00:10:10,320
मैं अपने लिए कह रहा हूं कि भाई ये जैसे ये जो ये पेंटिंग

147
00:10:10,320 --> 00:10:14,320
है दयानंद जी की ये किस किसने बनाई? तो व्यक्ति के अंदर एक भावना तो

148
00:10:14,320 --> 00:10:18,400
ये आ सकती है भाई मैंने मेहनत की उससे पेंटिंग बनी। और दूसरी भावना ये आ सकती है

149
00:10:18,400 --> 00:10:22,400
भगवान ने कृपा की तो मैं पेंटिंग बना पाया। वैसे भगवान

150
00:10:22,400 --> 00:10:26,560
कृपा करता है हमारे लिए जैसे उसने बिना मांगे हमें जल

151
00:10:26,560 --> 00:10:30,560
दिया है। जी कोई हमने नहीं वो वो सही आप कह रहे हैं। बस दिक्कत

152
00:10:30,560 --> 00:10:34,560
यहां फस रही दोनों बातें हो गई। एक तो कि भगवान की कृपा से होना नहीं मानना है। ये तो

153
00:10:34,560 --> 00:10:38,880
क्लियर हो गया और ये भी ये भी नहीं मानना है कि मैंने किया तो किया किसने फिर

154
00:10:38,880 --> 00:10:43,040
पेंटिंग बनाई किसने? भगवान की कृपा और दया दो शब्द

155
00:10:43,040 --> 00:10:44,480
हैं।

156
00:10:44,480 --> 00:10:48,560
दया जो होती है उसकी होती ही है। जैसे बहुत सारी

157
00:10:48,560 --> 00:10:52,640
चीजें बिना मांगे हमें मिनी शरीर मिलता है और चीजें मिलती हैं। उसमें भी

158
00:10:52,640 --> 00:10:57,280
हमने कर्म किया है। ज हमें मनुष्य का जीवन तो दया भी नहीं हुई।

159
00:10:57,280 --> 00:11:01,440
लेकिन बहुत सारी चीजें जैसे यह हमें हमने हवा नहीं मांगी उनसे

160
00:11:01,440 --> 00:11:05,600
ना कोई शुल्क देते हैं ना कोई पानी का शुल्क देते हैं ना सूर्य का शुल्क

161
00:11:05,600 --> 00:11:09,680
देते हैं। तो इस प्रकार से ये ये तो उनकी हमारे

162
00:11:09,680 --> 00:11:13,760
ऊपर दया हो रही है। और हमें जो ठीक-ठीक कर्मों का फल दे रहा है।

163
00:11:13,760 --> 00:11:17,840
ये दया भी एक दिक्कत आती है। जैसे जीव जो है संसार में आने के बाद ही

164
00:11:17,840 --> 00:11:22,080
फंसा है। जी पहले तो मुक्त है। नहीं वो तो पहले पहले पूर्व जन्मों

165
00:11:22,080 --> 00:11:26,240
में भी मुक्त है। मुक्त तो वह पूर्व जन्म में संसार में था ना संसार

166
00:11:26,240 --> 00:11:30,320
के बाहर तो मुक्त है ना संसार के बाहर कहां मुक्त है संसार के बाहर तो

167
00:11:30,320 --> 00:11:35,120
मुक्त उसके लिए एक संसार के कि मनुष्य जीवन से प्राप्त करके

168
00:11:35,120 --> 00:11:39,280
अष्टांग योग करने के बाद समाधि जब जीव संसार में नहीं

169
00:11:39,280 --> 00:11:43,280
है तो वो मुक्त अवस्था में है ना जब प्रपंच रूपी संसार में है तब वो

170
00:11:43,280 --> 00:11:47,280
फंसा हुआ है बंधन कहीं ना कहीं जन्म तो उसने लिया है जब कुछ नहीं होगा वो तो

171
00:11:47,280 --> 00:11:51,840
संसार है वही कह रहा हूं अगर वो संसार में है तो फंसा हुआ है

172
00:11:51,840 --> 00:11:55,840
किसी भी किसी भी जन्म में किसी भी जन्म में हो और संसार में नहीं है

173
00:11:55,840 --> 00:11:59,680
तो वो मुक्त है है ना तो जो हम हवा पानी वगैरह उसको

174
00:11:59,680 --> 00:12:03,760
कह रहे हैं कि उसने दया दी है वो तो संसार में उसका बंधन का कारक है वो तो मुक्त था

175
00:12:03,760 --> 00:12:08,240
बढ़िया था बंधन का कारण है मुक्त तो तभी होगा जब एक

176
00:12:08,240 --> 00:12:12,480
उसकी अवधि है और मनुष्य जीवन नहीं जैसे हम ये कह रहे हैं ना कि ईश्वर ने दया

177
00:12:12,480 --> 00:12:16,560
दी पानी दिया तो ये हमको संसार में डाल के दे दिया है ना

178
00:12:16,560 --> 00:12:20,560
हम तो मुक्त थे मुक्त कहां थे तो कहां थे मुक्त

179
00:12:20,560 --> 00:12:24,800
होते तो फिर इतने लंबे समय के लिए सर 36,000 बार सृष्टि

180
00:12:24,800 --> 00:12:28,800
बने बिगड़े। नहीं नहीं इतना लंबा कार्यकाल दिया है। मैं मैं ये कह रहा हूं कि जब

181
00:12:28,800 --> 00:12:32,800
हम संसार में नहीं है ना जीव जी तो जीव कहां है? मुक्ति में तो है।

182
00:12:32,800 --> 00:12:36,960
किसी न किसी जन्म में है। वो जन्म भी तो संसार है। संसार के बाहर

183
00:12:36,960 --> 00:12:41,040
बंधन में तो है ही। मतलब कहने का ये है जब जब हम ये कहेंगे कि ईश्वर ने हमें

184
00:12:41,040 --> 00:12:45,200
आग, पानी या हवा दी, पृथ्वी दिया, दया की तबतब हमारा

185
00:12:45,200 --> 00:12:49,920
बंधन सिद्ध होगा। तो ईश्वर ने तो हमें बंधन में डाला। उसको दया कैसे मान लें?

186
00:12:49,920 --> 00:12:54,000
ये एक प्रश्न आ रहा है जिज्ञासा। इसलिए है कि उसने बिना मांगे

187
00:12:54,000 --> 00:12:58,240
हमें दिया। कोई प्रार्थना हमने नहीं की। तो फसाया है ना और उसने

188
00:12:58,240 --> 00:13:02,560
जो है उनको भी देता है जो ईश्वर स्तुति नहीं करते हैं। उपासना नहीं करते हैं।

189
00:13:02,560 --> 00:13:06,720
और उनको भी देता है जो ईश्वर स्तुति करते हैं। उसकी ये दया है हमारे ऊपर कि

190
00:13:06,720 --> 00:13:10,720
उसने सबको दे रखा है। जी बिना मांगे दिया है। दे रखा

191
00:13:10,720 --> 00:13:14,800
है। मगर एट द एंड उसकी वजह से हम फंस रहे हैं ना। जैसे उसने हमें शरीर

192
00:13:14,800 --> 00:13:18,960
दिया बिना मांगे। फंसे तो हम अपने कर्मों से ही हैं। जब हम संसार

193
00:13:18,960 --> 00:13:23,040
में हमने संसार में रह के ही तो कर्म किए हैं बुरे कि बाहर भी किए हैं। संसार

194
00:13:23,040 --> 00:13:27,120
में रह के ही बुरे या कर्म किए हैं। तो जब हम संसार जब हम संसार में

195
00:13:27,120 --> 00:13:31,200
नहीं है तब तो मुक्त है ना संसार में नहीं है ये स्थिति अलग

196
00:13:31,200 --> 00:13:35,280
है। मोक्ष लेकिन किसी न किसी जीव के अंदर है तो बंधे हुए हैं।

197
00:13:35,280 --> 00:13:39,360
और बंधने का कारण हमारा ही है। हमारे कर्मों का परिणाम है। यदि

198
00:13:39,360 --> 00:13:43,440
हम मनुष्य जीवन प्राप्त करने के बाद और यम नियम लगा के

199
00:13:43,440 --> 00:13:47,520
समाधि करके और मोक्ष को प्राप्त होते हैं। बंधन दूर होते मतलब कि हम ये जो

200
00:13:47,520 --> 00:13:52,000
शरीर में फंसे हैं वो हमारे कर्मों का फल है और जब

201
00:13:52,000 --> 00:13:56,880
कर्मों का फल है जो हम शरीर में फंसे हैं और इससे मुक्ति

202
00:13:56,880 --> 00:14:00,880
जब हम इस शरीर में नहीं होते हैं तो हम मुक्त अवस्था में हैं। है ना? तो

203
00:14:00,880 --> 00:14:04,960
कहने का मतलब ये है हमको शरीर दिया भगवान ने और शरीर के अनुसार फिर पानी,

204
00:14:04,960 --> 00:14:09,200
हवा इत्यादि सब दे दिया। तो फिर यहां पे तो वो फंसाने वाला सिद्ध हो गया ना।

205
00:14:09,200 --> 00:14:13,680
फसाने वाला कैसे सिद्ध होगा? जब उनको मुक्त जो है बंधन में डाला है।

206
00:14:13,680 --> 00:14:17,920
बंधन में डाल के पिता है पिता कोई दंड भी देता है

207
00:14:17,920 --> 00:14:22,320
तो उसमें ये भावना होती है कि इसका कल्याण हो। तो यदि

208
00:14:22,320 --> 00:14:26,320
मगर दंड वो उस बात का देता है ना कि उसने पहले गलती की है। हां तो वो गलती कहां

209
00:14:26,320 --> 00:14:30,000
पे हो रही है? गलती हो रही है कि हम लोग जो है जो मनुष्य

210
00:14:30,000 --> 00:14:34,240
जीवन का उद्देश्य है कि सुख प्राप्त करना। विशेष सुख प्राप्त यानी मोक्ष

211
00:14:34,240 --> 00:14:39,360
प्राप्त करना। नहीं नहीं गलती कहां पे हो रही है भाई उसने हमें संसार में डाला ही क्यों

212
00:14:39,360 --> 00:14:43,520
यही बात है संसार हमारे कर्मों के फल देने के लिए तो वो कर्म गलत

213
00:14:43,520 --> 00:14:47,600
वाले कहां किए थे हमने किसी न किसी जन्म में किए संसार में ना संसार

214
00:14:47,600 --> 00:14:51,920
में संसार से पहले तो मुक्त थे मुक्त थे

215
00:14:51,920 --> 00:14:56,720
अच्छा मुक्त होते तो फिर लंबी अवधि के लिए चले जाते छोड़िए उसमें लूप हो जाएगा

216
00:14:56,720 --> 00:15:00,720
ये ये पूछ रहा था जैसे हम ये कहते हैं कि ईश्वर मांगने से कुछ

217
00:15:00,720 --> 00:15:04,880
देता नहीं है मगर वेदों में ऐसी कई स्तुतियां है जो मांगा जा रहा है कि हमारे हमारे गाय

218
00:15:04,880 --> 00:15:09,200
की रक्षा करो, हमारे अश्व की रक्षा करो। सीधे-सीधे मांग रहे हैं।

219
00:15:09,200 --> 00:15:13,680
मांगने के साथसाथ जो प्रार्थना है उसकी परिभाषा कि

220
00:15:13,680 --> 00:15:17,680
मांगते समय पुरुषार्थ की सहाय की प्रार्थना करना। यानी

221
00:15:17,680 --> 00:15:21,920
पुरुषार्थ करते हुए सहाय की प्रार्थना करना। यदि

222
00:15:21,920 --> 00:15:26,160
आप मांग भी रहे हैं और पुरुषार्थ भी कर रहे हैं तो निश्चित

223
00:15:26,160 --> 00:15:30,640
रूप से मिलता भी है। ऐसे तो हम सीधे पुरुषार्थ करेंगे तो नहीं मिलेगा।

224
00:15:30,640 --> 00:15:35,600
सीधे पुरुषार्थ करेंगे तो हो सकता है कि गलत कर्म हो जाए हम पर

225
00:15:35,600 --> 00:15:40,000
सीधे भाई वृत्त हमारी सही नहीं बनी तो वो तो वो तो प्रार्थना

226
00:15:40,000 --> 00:15:44,160
करके पुरुषार्थ करने में भी गलत कर्म हो सकता है प्रार्थना करने पर वहां

227
00:15:44,160 --> 00:15:45,040
हो सकता है लेकिन कम

228
00:15:45,040 --> 00:15:49,200
चांस है उससे कम चांस है इसका कहीं विवरण कि इसमें ज्यादा चांस है इसमें कम चांस

229
00:15:49,200 --> 00:15:53,520
है ऐसा और क्या स्तुति का फल क्या है नहीं नहीं मतलब वेदों में स्तुति

230
00:15:53,520 --> 00:15:58,160
का फल है किसी जैसे स्तुति कहते किसी के गुणों का बखान करना

231
00:15:58,160 --> 00:16:02,320
स्तुति तो ठीक है मगर अगर मांग रहे हैं ना जैसे भूभु स्वा तस वितुर्वेण्य

232
00:16:02,320 --> 00:16:06,480
भर्गो देवस्य धीमहि धो यो प्रचोदयात तो इसमें तो हमने मांगा बुद्धि

233
00:16:06,480 --> 00:16:11,280
दो हमें सद्गुरु बुद्धि दो लेकिन बुद्धि के लिए पुरुषार्थ भी किया है तो वही

234
00:16:11,280 --> 00:16:15,280
हम डायरेक्ट पुरुषार्थ करेंगे तो नहीं मिलेगा पर

235
00:16:15,280 --> 00:16:19,280
प्रार्थना कहां हुई वही तो मैं कह रहा हूं प्रार्थना की आवश्यकता क्या है वही जो पहला

236
00:16:19,280 --> 00:16:23,360
क्वेश्चन वही था कि भाई पूजा करने का लाभ क्या है जब हमको तो कर्मों से सब मिल जा

237
00:16:23,360 --> 00:16:27,760
रहा है जी जी ये दिक्कत है अच्छा

238
00:16:27,760 --> 00:16:32,720
ठीक है छोड़िए अह दूसरा एक चीज़ लेते हैं कि अह

239
00:16:32,720 --> 00:16:36,800
निराभिमानता भी क्लियर अह थोड़ा सा अगर करें कि दोनों बातें उन्होंने कह

240
00:16:36,800 --> 00:16:40,800
दी कि ईश्वर आपको स्तुति से कुछ नहीं देता है। मांगने से कुछ नहीं देता

241
00:16:40,800 --> 00:16:45,040
है। और दूसरी ओर फिर वो दयानंद जी कह रहे हैं कि भाई आपको यह नहीं सोचना है कि मैंने

242
00:16:45,040 --> 00:16:49,200
किया। क्योंकि निराभिमानता का अर्थ वही है मैंने ही किया। ऐसा तो नहीं कहां

243
00:16:49,200 --> 00:16:53,280
पर कहा? उसी में कहा है। जहां पे ये कहा है ना कि ईश्वर की स्तुति से क्या मिलता है? उसी में एक शब्द आया

244
00:16:53,280 --> 00:16:57,360
निराभिमानता। मेरा अभिमान तोता आया है। मतलब किसी की भी स्तुति करोगे चाहे

245
00:16:57,360 --> 00:17:00,560
ईश्वर की करो चाहे किसी बड़े व्यक्ति की करो निरभिमानता

246
00:17:00,560 --> 00:17:04,640
आएगी ही नहीं आएगी ठीक है मगर हमें निरभिमानता पे जाना है कि

247
00:17:04,640 --> 00:17:08,640
ईश्वर की कृपा पे जाना है ये समझ में नहीं आ रहा एक तरफ कह रहे हैं कि हमें अपने

248
00:17:08,640 --> 00:17:12,800
कर्मों के फल से ही मिलेगा ईश्वर नहीं देगा एक तरफ कह रहे हैं कि ऐसा नहीं

249
00:17:12,800 --> 00:17:17,840
सोचना है कि हमने किया तो हमने नहीं किया तो ये मानना पड़ेगा ईश्वर ने किया

250
00:17:17,840 --> 00:17:21,920
एक्चुअली है क्या जो लोग ऐसा कहते हैं भगवान ने वो दिया आपने शुरू में एक

251
00:17:21,920 --> 00:17:26,080
बात कही थी कि ईश्वर की पूजा करने पर जो है बड़े से बड़ा

252
00:17:26,080 --> 00:17:30,080
दुख भी तुम्हें राय के समान लगता है। उसी को लोग ये कहते हैं

253
00:17:30,080 --> 00:17:34,480
अपनी मान्यता में कि ईश्वर ने माफ कर दिया। मतलब जैसे मान लीजिए

254
00:17:34,480 --> 00:17:38,480
कि कोई व्यक्ति है उसको कपड़े चोरी करके पहनने की

255
00:17:38,480 --> 00:17:42,640
आदत है। ठीक है? उसने खूब लोगों के कपड़े चुराए। फिर

256
00:17:42,640 --> 00:17:46,640
उसके जीवन में जब अध्यात्म आया और उसको पाप लग गया था।

257
00:17:46,640 --> 00:17:51,040
कपड़े चुराने वाला पाप लग गया था। अब उसको फल भोगना है। उसका उसका

258
00:17:51,040 --> 00:17:55,120
निर्णय हो गया कि भाई तुम्हें किसी ना किसी दिन ऐसा होगा जब तुम्हारे पास कपड़ों

259
00:17:55,120 --> 00:17:59,760
की कमी होगी। मगर इसी बीच क्या हुआ कि उसके पास जो है

260
00:17:59,760 --> 00:18:03,840
आध्यात्म आ गया। ईश्वर आ गए। उसने ईश्वर की भक्ति की खूब। तो जब

261
00:18:03,840 --> 00:18:08,000
उसके पास वो दौर आया जब उसके कपड़े से छिन जाएंगे। वस्त्र उसके

262
00:18:08,000 --> 00:18:12,080
पास नहीं होंगे। वो दौर उसको पता ही नहीं लगा। तो यहां पे उसको उसके कर्मों का फल

263
00:18:12,080 --> 00:18:15,920
भी मिला। परंतु वो एक तरीके से माफी भी मिल गई क्योंकि कष्ट नहीं मिला।

264
00:18:15,920 --> 00:18:20,160
यह चीज है। अच्छा ठीक है। इसमें मेरा गोल ब्लडर का ऑपरेशन

265
00:18:20,160 --> 00:18:24,320
हुआ। अभी ताके कटवा के आया था। अभी अभी अभी सीधे

266
00:18:24,320 --> 00:18:28,480
चले आ रहे हैं। हां प्रहलाद जी के पास देखे गए थे। एक डेढ़ घंटा

267
00:18:28,480 --> 00:18:32,480
हो गया यहां पहुंचे। बस एक छोटा सा प्रश्न करके बंद कर देते हैं। है

268
00:18:32,480 --> 00:18:36,800
ना? ये मैं पूछ रहा था कि आर्य समाज

269
00:18:36,800 --> 00:18:40,800
ईश्वर को सर्वशक्तिमान तो कहता है। है ना? जी। सर्वशक्तिमान तो

270
00:18:40,800 --> 00:18:45,440
है ईश्वर। पर वो ये कहता है कि भाई ईश्वर अवतार नहीं ले सकता।

271
00:18:45,440 --> 00:18:49,600
है ना? जी तो यहां पर उसकी जो शक्ति है वो बाधित हो रही है ना कि उस सर्व कार्यों

272
00:18:49,600 --> 00:18:54,320
को करने की शक्ति नहीं है। वह अवतार नहीं ले पा रहा है। तो सर्वशक्तिमान फिर कैसे? सर्वशक्तिमान

273
00:18:54,320 --> 00:18:58,400
का अर्थ यह नहीं जो कुछ भी चाहे वो करे। सर्वशक्तिमान का अर्थ

274
00:18:58,400 --> 00:19:02,480
होता है स्वामी दयानंद ने किया है कि अपने कार्यों में

275
00:19:02,480 --> 00:19:07,040
किसी की मदद नहीं लेता। और वो पांच ही कार्य करता है। संसार को बनाना,

276
00:19:07,040 --> 00:19:11,120
पालन करना, नष्ट करना, समय पर, जीवों को कर्मों के

277
00:19:11,120 --> 00:19:15,200
अनुसार फल देना और वेद का ज्ञान देना। इन पांचों कार्यों में ना

278
00:19:15,200 --> 00:19:19,360
सुपरवाइजर की जरूरत ना चपरासी की ना किसी मैनेजर की ना इंजीनियर

279
00:19:19,360 --> 00:19:24,240
की अपने कार्यों को स्वयं करता है इसलिए वो सर्वशक्तिमान

280
00:19:24,240 --> 00:19:28,240
है ये नहीं कि वो सब काम कर ले रोटी भी बना ले और कुछ भी कर ले

281
00:19:28,240 --> 00:19:31,120
आचार्य जी ईश्वर के अलावा कौन-कौन से तत्व हैं

282
00:19:31,120 --> 00:19:35,360
एक तो प्रकृति एक जीव है हां तीन अनाद सत्ता है ईश्वर

283
00:19:35,360 --> 00:19:39,440
जीव और प्रकृति तो ईश्वर संसार को बनाने के लिए प्रकृति की सहायता

284
00:19:39,440 --> 00:19:43,520
नहीं लेता नहीं प्रकृति की सहायता लेता है तो प्रकृति तो है

285
00:19:43,520 --> 00:19:47,520
उसी के नियंत्रण में प्रकृति अलग कहां है? प्रकृति के बिना काम नहीं करता

286
00:19:47,520 --> 00:19:51,600
ना। ऐसे नहीं कि उसको कोई सुपरवाइजर की जरूरत है। प्रकृति तो उसी का तत्व

287
00:19:51,600 --> 00:19:55,680
है। तीन अनाथ सत्ता है। जैसे तो प्रकृति की सहायता से ऐसे

288
00:19:55,680 --> 00:20:00,080
तो जीव को भी प्रकृति में बांध दिया। यहां पर जीवात्मा भी है। मतलब

289
00:20:00,080 --> 00:20:04,080
सुपरवाइजर मतलब कि अपना कोई नुमाइंदा बना करके उससे काम ऐसे

290
00:20:04,080 --> 00:20:08,080
नहीं करता। जैसे हम लोग करते हैं भाई फैक्ट्री चलाते हैं तो एक मैनेजर की जरूरत है। चपरासी की

291
00:20:08,080 --> 00:20:12,160
जरूरत है। उसकी जरूरत है। अच्छा। ऐसे नहीं करता। वो अपने कार्यों

292
00:20:12,160 --> 00:20:16,240
में अच्छा किसी की मदद नहीं लेता। तो एक बात कही जाती है कि जब जब धरती

293
00:20:16,240 --> 00:20:20,240
पर पाप बढ़ता है तो वो अपने पुण्य आत्माओं को भेजता है। पुण्य

294
00:20:20,240 --> 00:20:24,240
आत्माएं तो आती रहती हैं। भेजता क्या है? वो नहीं भेजता है। नहीं

295
00:20:24,240 --> 00:20:28,320
ऐसा नहीं कि वो कोई जो है अवतार लेकर के आता है। नहीं मैं अवतार क्यों नहीं

296
00:20:28,320 --> 00:20:32,480
कह रहा? पुण्यत्मा को तो पुण्य आत्मा तो समय-समय पे आती हैं। संसार को सही करती हैं।

297
00:20:32,480 --> 00:20:36,480
नहीं नहीं वो राम के रूप में, कृष्ण के रूप में वो व्यवस्था

298
00:20:36,480 --> 00:20:40,560
नहीं देखता। हां भेजता होगा। तो मतलब वह अपना

299
00:20:40,560 --> 00:20:44,560
काम करा रहा है। फिर क्या भेजकर पुण्य आत्माओं को भेज

300
00:20:44,560 --> 00:20:46,720
के करा रहा है। वो तो सबको

301
00:20:46,720 --> 00:20:50,880
यह तो वो तो ईश्वरों का ईश्वर है। हम

302
00:20:50,880 --> 00:20:55,200
जैसे ईश्वर जीवात्मा को भी कहा ईश्वर हम

303
00:20:55,200 --> 00:20:59,200
और वो ईश्वरों का ईश्वर है। तो उसके कार्यों को करने से

304
00:20:59,200 --> 00:21:03,200
ही उसकी स्तुति या उपासना का फल प्राप्त होता

305
00:21:03,200 --> 00:21:07,360
है। किसी जैसे मैं तुम्हारी स्तुति करूं हम फिर प्रार्थना करता हूं। मांगता

306
00:21:07,360 --> 00:21:11,680
हूं। पहले कीर्तन करता हूं फिर मांगता हूं। आपकी उपासना यह है कि आपके अधूरे

307
00:21:11,680 --> 00:21:15,840
कार्य उनको पूरा करो। नहीं वो उपासना नहीं जैसे जैसे

308
00:21:15,840 --> 00:21:20,080
ईश्वर का एक कार्य है कि भाई वो मैनेज करता है पालन और पालन में धर्म धर्म

309
00:21:20,080 --> 00:21:24,480
संस्थापना वो पालन थोड़ी करा रहा है। नहीं नहीं धर्म संस्थापना भी आ गया। अब

310
00:21:24,480 --> 00:21:28,640
पालन करने में मैनेजमेंट कोई पुण्य आत्मा क्या पालन करेगी?

311
00:21:28,640 --> 00:21:33,200
हम धर्म की स्थापना के लिए धर्म संस्थापना उसका कार्य नहीं है। किसका?

312
00:21:33,200 --> 00:21:37,200
ईश्वर का। ईश्वर का कार्य यह तो स्वतंत्र है

313
00:21:37,200 --> 00:21:41,360
जीव नहीं धर्म संस्थापना उसका स्वतंत्र जीव है मैं पूछ रहा हूं धर्म संस्थापना

314
00:21:41,360 --> 00:21:45,760
उसका कार्य है कि नहीं धर्म संस्थापना उसने

315
00:21:45,760 --> 00:21:49,760
नियम बनाए और नियमों में चलोगे तो कर्मों का फल देगा नहीं उसका कार्य है

316
00:21:49,760 --> 00:21:53,840
कि नहीं अच्छा नहीं ईश्वर का कार्य नहीं है तो उसने ही तो धर्म संस्थापना की ना फर्स्ट

317
00:21:53,840 --> 00:21:57,920
टाइम जब वो ऋषियों के उसमें आ के अंतःकरण में धर्म दिया धर्म संस्थापना कर दी ना

318
00:21:57,920 --> 00:22:02,160
ज्ञान दे दिया सिलेबस दे दिया वही तो धर्म धर्म संस्थापना है नहीं ज्ञान देना

319
00:22:02,160 --> 00:22:06,240
धर्म संस्थापना जैसे मैंने मैंने ऐसा सुना था कि आर्य समाज के अनुसार वो ये जो

320
00:22:06,240 --> 00:22:10,320
महापुरुषों का आना ईश्वर के द्वारा व्यवस्थित बताता है कि जब जब धर्म

321
00:22:10,320 --> 00:22:14,320
की हानि होती है तो ईश्वर पुण्य आत्माओं को भेजता है स्वयं नहीं आता अवतार नहीं लेता हां ये

322
00:22:14,320 --> 00:22:20,320
तो खैर इसका श्लोक है महाभारत का धर्म संस्थापना

323
00:22:21,280 --> 00:22:25,280
जैसे हमने कहा कि सर्वशक्तिमान है मगर सर्व का मतलब ये नहीं है कि वो

324
00:22:25,280 --> 00:22:29,440
किसी सब कुछ करे मगर हम कहते हैं कि सर्वज्ञ है ईश्वर सर्वज्ञ

325
00:22:29,440 --> 00:22:33,520
है तो हम वहां मानते हैं कि ऐसा कुछ नहीं जो ईश्वर को ना ज्ञात तो तो वो

326
00:22:33,520 --> 00:22:37,760
सर्वज्ञ हो गया। फिर हम कहते हैं कि वो सर्वव्यापक है। तो हम कहते हैं कि ऐसी

327
00:22:37,760 --> 00:22:41,760
कोई जगह नहीं है जहां ईश्वर ना हो। है ना? तो यानी कि

328
00:22:41,760 --> 00:22:46,240
जब सर्वव्यापक में सर्व आ रहा है तो हम ले रहे हैं कि सब कुछ।

329
00:22:46,240 --> 00:22:50,240
सर्वज्ञ में सर्व आ रहा है तो हम सब कुछ ले रहे हैं। जब सर्वशक्तिमान में

330
00:22:50,240 --> 00:22:55,280
सर्व आ रहा है तो हम कह रहे हैं कि नहीं नहीं वो अपने कार्य खुद कर सकता है। इसका क्या करें?

331
00:22:55,280 --> 00:22:59,440
यह तो परिभाषाएं ऋषि ने दी है ऋषि दयानंद ने कि वह अपने

332
00:22:59,440 --> 00:23:03,680
कार्य में किसी की मदद नहीं देता। आर्य समाज के दूसरे नियम में यह शब्द मदद

333
00:23:03,680 --> 00:23:07,840
लेना सिद्ध हो रहा है ना वो पुण्य आत्माओं को भेज रहा है वो प्रकृति की मदद ले रहा है प्रकृति

334
00:23:07,840 --> 00:23:12,400
की मदद क्या प्रकृति तो उसी के नियंत्रण में तो है नियंत्रण में तो वो भी है चतुरासी

335
00:23:12,400 --> 00:23:17,200
ऐसे तो वो बहुत सारे प्रकृति की मदद ली है उसने हम और

336
00:23:17,200 --> 00:23:21,200
प्रकृति के द्वारा इसमें जीव भी है और प्रकृति भी है दोनों से शरीर

337
00:23:21,200 --> 00:23:25,360
बना है ये प्रकृति का नहीं मैं कह रहा हूं जैसे वहां पर प्रकृति और जीव

338
00:23:25,360 --> 00:23:29,520
के अलावा कुछ है ही नहीं जो ईश्वर किसी की मदद ले पाए और जो है उसकी

339
00:23:29,520 --> 00:23:33,600
वो मदद ले रहा है मतलब मतलब उससे उसका भी यूज़ कर रहा है। और अगर ये कहें कि नियंत्रण

340
00:23:33,600 --> 00:23:38,880
में है तो नियंत्रण में तो चपरासी भी है, प्यून भी है। जी।

341
00:23:38,880 --> 00:23:42,880
अच्छा छोड़िए दूसरा करते हैं। एक ये वाला सवाल

342
00:23:42,880 --> 00:23:47,520
ले लेते हैं। एक बहुत जिज्ञासा आती है कि ईश्वर सब जगह सर्वव्यापक

343
00:23:47,520 --> 00:23:51,600
है। एक रस है। जो सब जगह है वो एक जगह कैसे आ सकता है? अवतार में

344
00:23:51,600 --> 00:23:55,840
है ना? ईश्वर तो एक रस है। तो यह दिक्कत आती है कि जैसे

345
00:23:55,840 --> 00:23:59,840
ईश्वर जब सब जगह समान रूप से है तो किसी एक

346
00:23:59,840 --> 00:24:04,400
जगह पर वह मूवमेंट यानी कि बल कैसे लगाता है?

347
00:24:04,400 --> 00:24:08,400
कहने का मतलब यह है कि बल में और ईश्वर में कोई

348
00:24:08,400 --> 00:24:12,400
अंतर तो है नहीं। शक्ति और ईश्वर एक ही है। है ना? तीसरा तत्व तो है

349
00:24:12,400 --> 00:24:16,480
नहीं। एक एक जड़ है प्रकृति। है ना?

350
00:24:16,480 --> 00:24:20,480
तो शक्ति और शक्तिमान एक है। तो जैसे कि मान

351
00:24:20,480 --> 00:24:24,720
लीजिए यह मान लीजिए पृथ्वी का वह है पिंड है ना तो इसमें बल

352
00:24:24,720 --> 00:24:29,120
लगा। इसके अंदर भी ईश्वर है। इसके बाहर भी ईश्वर है। है ना?

353
00:24:29,120 --> 00:24:32,720
तो ईश्वर ने अपने आप को एडजस्ट

354
00:24:32,720 --> 00:24:36,960
किया कि अंदर वाला जो हिस्सा है वो एक्टिवेट ना हो। बाहर वाला एक्टिवेट

355
00:24:36,960 --> 00:24:41,120
हो। तभी तो पृथ्वी में बल लगेगा। है ना? तो ईश्वर

356
00:24:41,120 --> 00:24:45,200
जब सब जगह बराबर रूप से है तो कहीं पर कम कहीं पर ज्यादा कहीं पर

357
00:24:45,200 --> 00:24:49,200
बिल्कुल बल ना लगाना यह कैसे हो रहा है का हो रहा

358
00:24:49,200 --> 00:24:53,360
है भाई पृथ्वी जब यह है पृथ्वी ये है

359
00:24:53,360 --> 00:24:57,360
और ईश्वर ऐसे बल लगा रहा है तो इसके इधर जो ईश्वर है वो तो बल नहीं लगा रहा ना

360
00:24:57,360 --> 00:25:01,520
वो भी बल लगाएगा वो भी बल लगाएगा तो इधर ही लगेगा बल ईश्वर इधर अलग

361
00:25:01,520 --> 00:25:05,920
है इधर अलग है कोई नहीं अलग नहीं कह रहा हूं मैं बराबर ईश्वर

362
00:25:05,920 --> 00:25:10,080
ईश्वर बराबर है ईश्वर तो ठसाठस प्रोग्राम ठसा

363
00:25:10,080 --> 00:25:14,080
हिरण्य गर्भ समवर्ता उसके गर्भ में सारा संसार है जी

364
00:25:14,080 --> 00:25:18,080
जी जी जी तो उसकी तो कोई ऐसी जगह है ही नहीं जहां विद्यमानता ना

365
00:25:18,080 --> 00:25:22,160
हो हां तो वो जब कहां बल कहां से वो जब इधर से

366
00:25:22,160 --> 00:25:26,160
लगा रहा है वो जब एक रस है तो वो अपने आप को कहीं पे चालू कर रहा है

367
00:25:26,160 --> 00:25:30,400
ना जैसे कि मान लीजिए यह पृथ्वी है और पृथ्वी के बगल में जुपिटर

368
00:25:30,400 --> 00:25:34,640
है मान लीजिए ठीक है वो यहां पे धक्का दे रहा है यहां नहीं दे रहा है

369
00:25:34,640 --> 00:25:38,880
यहां तो धक्का दे रहा है यहां नहीं दे रहा तो यानी कि जो उसकी एक रास्ता

370
00:25:38,880 --> 00:25:42,880
यहां पे एक्टिवेट है। यहां पे नहीं एक्टिवेट है। ये तो भंग हो रही है एक रास्ता। मेरी

371
00:25:42,880 --> 00:25:47,280
समझ नहीं समझ पा रहे। मेरी बात मैं

372
00:25:47,280 --> 00:25:47,920
बताता हूं।

373
00:25:47,920 --> 00:25:52,400
मैं एक्चुअली बिल्कुल स्वस्थ नहीं हूं। आप लंबा खींचते

374
00:25:52,400 --> 00:25:56,400
चले जा रहे हैं। चलिए ठीक है। कोई बात नहीं। आपने इतनी देर बात की अच्छा

375
00:25:56,400 --> 00:26:00,640
लगा। और ठीक है।

376
00:26:00,640 --> 00:26:04,640
जय श्री राम। नमस्कार। हमारा थोड़ा सा वो रहता है कि ना जैसे कि

377
00:26:04,640 --> 00:26:08,800
हम आप लोगों से चर्चा करते हैं तो हम ये सीखते हैं कि हम नास्तिक वो

378
00:26:08,800 --> 00:26:12,880
कैसे हां ना वो तो बात सही है लेकिन मैं एक्चुअली में गोल

379
00:26:12,880 --> 00:26:17,040
ब्लैडर का हुआ ऑपरेशन और उसके टाके कटवा के सीधा चला फिर भी एक काम

380
00:26:17,040 --> 00:26:21,280
और जो दिल्ली से वो दिमाग में यही चलिए कोई नहीं

381
00:26:21,280 --> 00:26:25,360
बिल्कुल मेरा मेरा प्रश्न बस यही था मैं समझा देता हूं आप उसको उत्तर नहीं देना

382
00:26:25,360 --> 00:26:29,920
आपको जैसे कि हमने कहा कि ईश्वर भैया

383
00:26:29,920 --> 00:26:35,280
वो जरा ये ये हेट उठाना जरा टोपी उठाना

384
00:26:35,280 --> 00:26:39,360
इधर लाओ हां जैसे मान लीजिए ये एक

385
00:26:39,360 --> 00:26:43,440
वस्तु है ठीक है ईश्वर इधर भी है और ईश्वर इधर भी है

386
00:26:43,440 --> 00:26:47,680
यहां सब जगह मेरे अंदर भी है बाहर भी है सब जगह है अब अब ईश्वर

387
00:26:47,680 --> 00:26:51,680
को सृष्टि निर्माण करना है मान लीजिए इस हेट का उसमें उपयोग है मान लीजिए

388
00:26:51,680 --> 00:26:55,680
तो ईश्वर को इस दिशा में इसको ले जाना है इस पिंड को ठीक है तो

389
00:26:55,680 --> 00:26:59,680
ईश्वर तो यहां भी है मगर यहां पे उसको नहीं ले जाना है यहां पे मैं हूं

390
00:26:59,680 --> 00:27:03,120
इसको कहीं कुछ नहीं करना इसको ईश्वर को केवल इस इस पिंड

391
00:27:03,120 --> 00:27:08,080
को ही सरकाना है। तो ईश्वर क्या करेगा कि यहां पे तो वो

392
00:27:08,080 --> 00:27:12,560
क्या कहते हैं? कुछ नहीं एक्टिवेट नहीं होगा। यहां पे वो बल लगाएगा।

393
00:27:12,560 --> 00:27:16,800
तभी तो सरकेगा और अगर वो पूरा एक्टिवेट हो गया एक साथ पूरा एक्टिवेट

394
00:27:16,800 --> 00:27:20,960
हो गया तो मैं भी हिलूंगा। आप भी हिलोगे सब कुछ हिलेगा। मगर

395
00:27:20,960 --> 00:27:25,200
उसको सब कुछ नहीं हिलाना है। उसको केवल इस पिंड को हिलाना है। तो जब वह पिंड

396
00:27:25,200 --> 00:27:29,280
को हिलाएगा यानी कि यहां पर ईश्वर एक्टिवेट नहीं है। यहां पर नहीं है। केवल इस पिंड के बाहर

397
00:27:29,280 --> 00:27:33,360
एक्टिवेट है और उसको धक्का मार रहा है। और जब ऐसा है तो उसकी

398
00:27:33,360 --> 00:27:37,440
एक रास्ता भंग हो रही है। क्योंकि कहीं कम कहीं पे ईश्वर निष्क्रिय है। कहीं पे

399
00:27:37,440 --> 00:27:41,600
ईश्वर सक्रिय है। तो उसके एक रास्ता थी। एक समान

400
00:27:41,600 --> 00:27:45,760
बिल्कुल बराबर वो सब जगह है। वह भंग हो रही है। यह सवाल था मेरा।

401
00:27:45,760 --> 00:27:49,760
है ना? चलिए फिर बहुत अच्छी चर्चा रही। आप लोगों को काफी कुछ जानने को मिला

402
00:27:49,760 --> 00:27:53,760
होगा और अभी हम लोग थोड़ा सा उस पर भी बात

403
00:27:53,760 --> 00:27:57,840
करना चाहते थे आचार्य जी से जो क्या

404
00:27:57,840 --> 00:28:01,840
कहते हैं वर्ण व्यवस्था पर आचार्य जी

405
00:28:01,840 --> 00:28:05,920
का स्वास्थ्य खराब है। अभी ऑपरेट हुआ है इनका तो इस

406
00:28:05,920 --> 00:28:10,160
कारण से अभी असमर्थ हैं। संभवत भविष्य

407
00:28:10,160 --> 00:28:16,160
में कभी हमारी फिर से पुनः एक बार चर्चा होगी। जय श्री राम। नमोस्तु।

408
00:28:22,360 --> 00:28:26,360
[संगीत]
