1
00:00:03,120 --> 00:00:08,880
शिव जी मेरा मतलब आपसे एक छोटा सा विरोधाभास था मतलब

2
00:00:08,880 --> 00:00:12,960
किस बात कहूं मैं वो कुछ दिनों पहले

3
00:00:12,960 --> 00:00:17,360
जो आपका चर्चा हुआ था ना निर्भय आर्य के साथ हां

4
00:00:17,360 --> 00:00:23,360
वहां से एक विषय को लेकर बताएं

5
00:00:23,360 --> 00:00:27,520
अच्छा तो मतलब ईश्वर के स्वरूप को लेकर है तो बताऊं

6
00:00:27,520 --> 00:00:31,600
यहां पर तो जब बोल दिया तो बताइए नहीं तो बोलते नहीं

7
00:00:31,600 --> 00:00:34,560
तो बात अलग थी।

8
00:00:34,560 --> 00:00:38,720
अच्छा ठीक है। तो मतलब जो आपने कहा था ना कि

9
00:00:38,720 --> 00:00:42,880
ईश्वर जो है आंखों का विषय बन जाता है तो जैसे खिड़की है और

10
00:00:42,880 --> 00:00:47,120
बाहर का आकाश है तो फिर दोनों में ही तो ईश्वर मतलब जो

11
00:00:47,120 --> 00:00:51,200
दिख रहा है वो तो ईश्वर नहीं मतलब जो शरीर ही शरीर

12
00:00:51,200 --> 00:00:55,520
ही दिख रहा है। ईश्वर तो नहीं दिख रहा।

13
00:00:55,520 --> 00:01:00,480
माया ही दिख रहा है। दोनों के साथ प्रतीत हो रहा है कि नहीं ईश्वर जैसा?

14
00:01:00,480 --> 00:01:06,000
अब वो तो ईश्वर ही हमें आकर ज्ञान दे रहे हैं। उसका मैं खंडन नहीं करता। लेकिन वो

15
00:01:06,000 --> 00:01:10,080
वो जो प्रतीत होना है तात्विक रूप से वो वो प्रतीत

16
00:01:10,080 --> 00:01:14,560
हो रहा है और व्यवहारिक रूप से वो दिख रहा है। जैसे

17
00:01:14,560 --> 00:01:19,840
व्यवहारिक रूप से आपको कोई माता दिख रही है। हम

18
00:01:19,840 --> 00:01:24,240
और वो मुक्तिदायक है इसलिए उसे ईश्वर कहा जाना उचित

19
00:01:24,240 --> 00:01:28,320
है। हम नहीं आपने जो कहा था ना कि जो खिड़की

20
00:01:28,320 --> 00:01:32,320
से जो हमें आकाश दिख रहा है वो आकाश भी तो मतलब माया

21
00:01:32,320 --> 00:01:36,400
ही है। अरे भाई तो मैंने आपको कम शब्दों में ज्यादा बात कह दी है।

22
00:01:36,400 --> 00:01:40,480
उसको आप अच्छे से समझने का प्रयास करिए। मैंने कहा

23
00:01:40,480 --> 00:01:44,480
प्रतीत हो रहा है। मैंने कब कहा कि वही दिख रहा है। मैंने कहा प्रतीत हो रहा है ना?

24
00:01:44,480 --> 00:01:48,560
तो तात्विक समझ गया। तात्विक अर्थ क्या है? प्रतीत हो रहा है। व्यवहारिक

25
00:01:48,560 --> 00:01:53,280
अर्थ क्या है? पारमार्थिक अर्थ क्या है? प्रतीत हो रहा है।

26
00:01:53,280 --> 00:01:57,360
और व्यवहारिक अर्थ क्या है? ब्रह्म की दृष्टि से क्या है? कि इसको भैया मेरा जो

27
00:01:57,360 --> 00:02:01,520
है जो है ऐसा लग रहा है कि भगवान ने अवतार ले लिया।

28
00:02:01,520 --> 00:02:05,760
भगवान है हम ये ब्रह ये ब्रह्म की दृष्टि से और हमारी

29
00:02:05,760 --> 00:02:09,760
दृष्टि से क्या है कि हम भगवान ने अवतार लिया तो हमने भी तो कहा

30
00:02:09,760 --> 00:02:11,200
कि जितना

31
00:02:11,200 --> 00:02:15,360
जितना किसी की माता किसी की बहन इत्यादि सब वो है तो उतना

32
00:02:15,360 --> 00:02:19,600
ही भगवान का अवतार लेना भी क्या कहते हैं हमने

33
00:02:19,600 --> 00:02:23,680
भी तो यही कहा है ना कि व्यवहार के व्यवहार में आता है और व्यवहारिक जगत तो है

34
00:02:23,680 --> 00:02:27,760
ही है प्रपंच का दूसरा नाम रूपी संसार का दूसरा नाम

35
00:02:27,760 --> 00:02:32,080
तो इतने दिन हो गए आपको जुड़े हुए व्यवहार और परमार्थ के हिसाब हिसाब से तो आपको समझ

36
00:02:32,080 --> 00:02:36,960
लेना चाहिए था। ये तो नहीं मुझे पता तो है

37
00:02:36,960 --> 00:02:40,960
लेकिन फिर भी थोड़ा सा मतलब कंफर्म कर लेते हैं। आप ये

38
00:02:40,960 --> 00:02:44,960
कहना चाहते हैं कि हम परमार्थ की दृष्टि से बता रहे हैं कि भगवान जो है एक देश

39
00:02:44,960 --> 00:02:49,200
जो व्यवहार में आते हैं लोगों के। हां हां हां परमार्थ

40
00:02:49,200 --> 00:02:53,200
की दृष्टि से हम यह कह रहे हैं वहां पर नहीं मतलब

41
00:02:53,200 --> 00:02:57,280
क्या है मैं आपको मैं पूरा ही बता देता हूं कि मैंने

42
00:02:57,280 --> 00:03:01,280
गुरुदेव के एक वीडियो में सुना था कि जैसे पानी है ना पानी

43
00:03:01,280 --> 00:03:05,520
जमकर बर्फ बन जाता है ठीक वैसे ही निर्गुण निराकार ब्रह्म तत्व

44
00:03:05,520 --> 00:03:09,680
ही साक्षात मतलब स्वयं को ठोस बनाकर एक जगह पर आ जाते

45
00:03:09,680 --> 00:03:13,760
हैं। तो यही चीज मुझे थोड़ा सा गलत लगा था कि आकाश को जैसे आप

46
00:03:13,760 --> 00:03:19,760
कभी भी जमा नहीं सकते। वैसे निर्गुण को भी आप डायरेक्ट कभी जमा नहीं सकते।

47
00:03:20,480 --> 00:03:25,440
आकाश अगर आएगा आकाश अगर आएगा

48
00:03:25,440 --> 00:03:30,080
तो आकाश छूने वाली चीज तो है नहीं जैसे पानी छूने वाली चीज है।

49
00:03:30,080 --> 00:03:34,400
पानी तो हमारे स्पर्श का विषय हो जाएगा ना। तो

50
00:03:34,400 --> 00:03:38,480
यही मेरा सवाल था कि पानी बर्फ बनने से पहले भी आंखों का विषय

51
00:03:38,480 --> 00:03:42,480
और छूने का विषय दोनों है। तभी वह बर्फ बनने के बाद छुआ भी जा सकता है और देखा भी

52
00:03:42,480 --> 00:03:46,640
जा सकता है। लेकिन निर्गुण जम जाने के बाद भी देखा

53
00:03:46,640 --> 00:03:50,720
नहीं जाएगा और छुआ भी नहीं जा सकता। इसलिए निर्गुण का जमना भी

54
00:03:50,720 --> 00:03:54,960
सिद्ध नहीं होगा। नहीं तो हम बता रहे हैं आपको कैसे होगा।

55
00:03:54,960 --> 00:04:00,720
कि निर्गुण पहले सगुण का अवतार लेता है। ठीक है?

56
00:04:00,720 --> 00:04:04,720
उधर से देखेंगे तो वो निर्गुण जो है सगुण नहीं हुआ है। मगर उसने

57
00:04:04,720 --> 00:04:09,120
सगुण रूपी अवतार लिया है और सगुण होना ही

58
00:04:09,120 --> 00:04:13,200
अवतार का निरूपक है। हम अन्यथा

59
00:04:13,200 --> 00:04:17,440
जो है अ आप जो है अगर

60
00:04:17,440 --> 00:04:21,840
निर्गुण को सगुण बनाएंगे तो वो तो नित्यता उसकी भंग हो गई। शाश्वतता

61
00:04:21,840 --> 00:04:26,400
भंग हो गई। बदल रहा है उसका रूप परिवर्तनशील हो गया।

62
00:04:26,400 --> 00:04:31,920
जी जी तो उसकी तो निर्गुण निर्गुण रहते हुए भी

63
00:04:31,920 --> 00:04:35,680
एक और रूप बदलता है जो सगुण है। निर्गुण

64
00:04:35,680 --> 00:04:39,760
सगुण में परिवर्तित नहीं होता है। समझ रहे हैं? निर्गुण

65
00:04:39,760 --> 00:04:43,920
सगुण में परिवर्तित नहीं होता है। वो एक और रूप बनता है जो सगुण

66
00:04:43,920 --> 00:04:48,000
है। हम तो यानी कि जब वो सगुण हुआ तब ऐसा नहीं है कि

67
00:04:48,000 --> 00:04:52,160
उसका जो निर्गुण वाला रूप था वो खत्म हो गया। समझ रहे हैं?

68
00:04:52,160 --> 00:04:56,320
निर्गुण यही तो विपवाद है हां तो निर्गुण जो है अपनी जगह

69
00:04:56,320 --> 00:05:00,480
पर है और तब सगुण सगुण जो है अवतरित अब जो सगुण

70
00:05:00,480 --> 00:05:04,640
अवतरित हुआ तो जो सगुण अवतरित हुआ है तो सगुण अपना

71
00:05:04,640 --> 00:05:09,520
कार्य में एक जगह इकट्ठा होने से पहले अथवा

72
00:05:09,520 --> 00:05:13,680
कुछ भी कार्य करने से पहले वो भी तो निर्गुण की तरह ही हुआ समझ

73
00:05:13,680 --> 00:05:18,000
रहे हैं जैसे कि ये मान लीजिए ये निर्गुण है।

74
00:05:18,000 --> 00:05:22,320
ठीक। इसने अपनी स्थिति को बिना छेड़े हुए

75
00:05:22,320 --> 00:05:26,400
एक और पहले रूप लिया पूरे संसार में फैला हुआ। तो यह भी तो सबसे पहले एक

76
00:05:26,400 --> 00:05:30,400
रस ही है। सबसे पहले क्या है? ये भी एक रस है। उसके बाद

77
00:05:30,400 --> 00:05:34,960
यह ऐसा रूप है जो कहीं पे जम जाए और कहीं पे ना जमे।

78
00:05:34,960 --> 00:05:39,120
ठीक। कहीं पे पृथ्वी इत्यादि के लिए धक्के का विषय बन जाए। वो समझाया कई

79
00:05:39,120 --> 00:05:43,120
बार। प्रकाश के मार्ग में प्रकाश के मार्ग को

80
00:05:43,120 --> 00:05:47,280
बाधित करने योग्य बन जाए और कहीं पे ना बने। तो

81
00:05:47,280 --> 00:05:50,800
अब यह जो सगुण है सगुण क्यों है? क्योंकि यह कहीं

82
00:05:50,800 --> 00:05:54,880
पर अपने आप को इकट्ठा कर रहा है। कहीं पर नहीं कर रहा। इसलिए सगुण

83
00:05:54,880 --> 00:05:58,880
है। मगर वो इकट्ठा इत्यादि अगर ना हो तो ये भी तो एक पहले एक

84
00:05:58,880 --> 00:06:03,600
रस है सबसे पहले। मगर ये परिवर्तनशील है। समझ रहे हैं?

85
00:06:03,600 --> 00:06:07,760
ये परिवर्तनशील वो तो माया के वजह से परिवर्तनशील है। हां हां तो वो एक अलग बात

86
00:06:07,760 --> 00:06:12,000
है कि वो कैसे है परिवर्तनशील? वो एक अलग बात है। डायमेंशन चेंज किया।

87
00:06:12,000 --> 00:06:16,080
माया रूपी डायमेंशन बनाई पहले। ठीक है? वो कैसे लिया अवतार वह उस

88
00:06:16,080 --> 00:06:20,320
पे आएगा कि अवतार कैसे लिया तो माया से लिया है ना

89
00:06:20,320 --> 00:06:24,400
मगर जब हम यह व्यवहारिकता देख रहे हैं ना कि पृथ्वी को धक्का कैसे

90
00:06:24,400 --> 00:06:28,640
लगा तो धक्का ऐसे ही लगा कि शक्ति शक्ति पूरे में विराजमान है सगुण

91
00:06:28,640 --> 00:06:33,040
साकार की अब वो सगुण साकार अब सगुण निराकार अब वो सगुण निराकार

92
00:06:33,040 --> 00:06:37,440
कहीं पर विषय कहीं पर व्यवहार का विषय बना और कहीं पे नहीं बना

93
00:06:37,440 --> 00:06:41,600
अभी तक वो अदृश्य रहते हुए उसने ऐसा किया ठीक है

94
00:06:41,600 --> 00:06:46,160
अब वो क्या किया अब वो वो प्रकाश के मार्ग को बाधित करने लगा।

95
00:06:46,160 --> 00:06:50,320
वो उसने अपना ऐसा इकट्ठा हुआ कि अब वो प्रकाश

96
00:06:50,320 --> 00:06:54,640
के मार्ग को बाधित कर रहा है। जब वो प्रकाश के मार्ग को बाधित कर रहा है तो प्रकाश

97
00:06:54,640 --> 00:06:58,880
तो वहां पर हमको कुछ तो आंखों से रोशनी उसप पड़ेगी

98
00:06:58,880 --> 00:07:02,880
और वापस आएगी। अब बस इतनी बात रह गई कि उसमें नाक,

99
00:07:02,880 --> 00:07:05,840
कान, आंख ये सब कैसे दिखाई दे

100
00:07:05,840 --> 00:07:10,000
रहा है? चलो ठीक है। प्रकाश वहां से टकरा के वापस आएगा। ठीक है? मगर उसमें

101
00:07:10,000 --> 00:07:14,000
ये जो डिजाइनिंग दिख रही है, मतलब ये शरीर के अवयव दिख रहे हैं, यह सब कैसे

102
00:07:14,000 --> 00:07:18,240
दिख रहे हैं? तो यहां पूरा शरीर का त्वचा जो दिख रहा है,

103
00:07:18,240 --> 00:07:22,240
शरीर का जो पूरा त्वचा दिख रहा है एक त्वचा दिख रही है, रंग दिख रहा

104
00:07:22,240 --> 00:07:26,400
है, उनके वस्त्र दिख रहे हैं, आभूषण दिख रहे हैं। ये सब दिख रहा है ना

105
00:07:26,400 --> 00:07:30,640
भगवान के तो वो कैसे वो विशुद्ध माया से स्वरूप होता है।

106
00:07:30,640 --> 00:07:34,800
तो भगवान कह रहे मैं योग माया का वो लेकर के नॉर्मल माया नहीं

107
00:07:34,800 --> 00:07:38,960
भटकाने वाली माया नहीं छुड़ाने वाली माया। जो निकालने

108
00:07:38,960 --> 00:07:43,360
वाली विशुद्ध सत्वगुणी माया विशुद्ध सत्वगुणी माया उसका आलंबन

109
00:07:43,360 --> 00:07:47,360
लेकर के वो अपना यह स्वरूप तैयार। ठीक है? तो इसमें

110
00:07:47,360 --> 00:07:51,920
जो आकाश का जो मामला था

111
00:07:51,920 --> 00:07:56,320
वो सिर्फ उदाहरण देना गोचर और अगोचर

112
00:07:56,320 --> 00:08:00,480
के लिए था। गोचर और अगोचर के लिए उदाहरण देना

113
00:08:00,480 --> 00:08:04,720
था कि जैसे कि क्या

114
00:08:04,720 --> 00:08:08,720
कहते हैं पूरे व्यवहारिक रूप से वास्तविकता तो ये

115
00:08:08,720 --> 00:08:13,040
है कि आकाश जो है दिख ही नहीं रहा है। मगर व्यवहारिक रूप से हम लोग व्यवहार

116
00:08:13,040 --> 00:08:17,280
में ये आता है कि हां हमने आकाश को देखा। ठीक है? हम आकाश को निहार

117
00:08:17,280 --> 00:08:21,200
रहे हैं। तो व्यवहारिक रूप से जो आकाश को निहार रहे हैं जब हमने उसको निहारना

118
00:08:21,200 --> 00:08:25,520
मान लिया तब हम उदाहरण दे रहे हैं कि जब हम पूरे जो

119
00:08:25,520 --> 00:08:29,520
पूरी तरफ चारों तरफ जो आकाश फैला हुआ है उसको जब हम एक

120
00:08:29,520 --> 00:08:33,680
बंद कमरे की खिड़की से देख रहे हैं तो वो चौकोर दिख रहा है। मतलब जब

121
00:08:33,680 --> 00:08:37,680
हमने ये मान लिया कि आकाश दिख रहा है। अगर आकाश का दिखना ही

122
00:08:37,680 --> 00:08:41,760
नहीं माना तो हम वो उदाहरण हटा देंगे। दूसरा दिखाएंगे। दूसरा उदाहरण देंगे।

123
00:08:41,760 --> 00:08:45,760
मगर हम ये उदाहरण दे कब रहे हैं? जब हमने हमें हमने आकाश का नीला

124
00:08:45,760 --> 00:08:49,760
नीला आकाश का दिखना स्वीकार कर लिया वो दिखता है कि नहीं दिखता वो एक अलग बात

125
00:08:49,760 --> 00:08:53,920
है। हमने हमने क्या किया कि हमने मान लिया कि मान लो कोई ऐसी

126
00:08:53,920 --> 00:08:57,920
चीज है पूरी दुनिया में फैली हुई है। ठीक हम जो आंखों का

127
00:08:57,920 --> 00:09:02,080
विषय मैं आपको एक चीज मैं आपको एक चीज बताता हूं। सुनिए तो पूरी

128
00:09:02,080 --> 00:09:06,080
दुनिया में फैली हुई है कोई चीज। आकाश हटा दीजिए। मान लीजिए एक साड़ी है

129
00:09:06,080 --> 00:09:10,080
जो पूरी दुनिया में फैली हुई है। ठीक। तो अब वो साड़ी हमें

130
00:09:10,080 --> 00:09:14,160
चौकोर दिख सकती है क्या? नहीं दिख सकती। मगर हम बंद कमरे की खिड़की से देखेंगे तो वो क्या

131
00:09:14,160 --> 00:09:18,560
दिखेगी? चौकोर दिखेगी। ये उस उस सर्व्यापी

132
00:09:18,560 --> 00:09:22,560
साड़ी का चौकोर अवतार है। ये कहने का अभिप्राय था वहां

133
00:09:22,560 --> 00:09:26,880
पर। समझ रहे मेरी बात? वहां पर नहीं मैं

134
00:09:26,880 --> 00:09:30,880
आपको थोड़ा सा बताऊं। हां। मैं अपनी बात मैं अपनी

135
00:09:30,880 --> 00:09:35,280
बात पूरी कर कि वहां पर ये जो उदाहरण देना था

136
00:09:35,280 --> 00:09:36,400
ये तब तब

137
00:09:36,400 --> 00:09:40,560
दिया हमने जब हमने क्या कहते हैं? आकाश को देखना

138
00:09:40,560 --> 00:09:44,560
स्वीकार कर लिया। अगर देखना स्वीकार नहीं करेंगे तो हम और कुछ ले

139
00:09:44,560 --> 00:09:48,560
लेंगे वहां पर। किसी और को मानक रूप में फैला देंगे सब जगह। जैसे अभी मैंने

140
00:09:48,560 --> 00:09:52,720
साड़ी को फैलाया और तब कहेंगे कि अब मान लो पूरी दुनिया में एक साड़ी फैली

141
00:09:52,720 --> 00:09:56,880
हुई है। पूरे संसार में फैली हुई है जो सब तरफ है। तो क्या उसका तो

142
00:09:56,880 --> 00:10:00,960
आप जो है रूप देख सकते हैं? नहीं देख सकते क्योंकि वो तो सब तरफ फैली हुई

143
00:10:00,960 --> 00:10:05,120
है। तो कैसे उसका उसका अवतार क्या होगा? कि हम अगर बंद

144
00:10:05,120 --> 00:10:09,360
कमरे की खिड़की से देखेंगे तो जो चौकोर साड़ी दिखेगी वह उसका अवतार

145
00:10:09,360 --> 00:10:13,360
है। उसमें उसमें साड़ी के उस अवतार में

146
00:10:13,360 --> 00:10:17,600
और उसमें जो साड़ी पूरे संसार में फैली हुई है उसमें और उसमें साड़ी

147
00:10:17,600 --> 00:10:21,760
क्या अंतर है कि वो गोचर और अगोचर ये

148
00:10:21,760 --> 00:10:25,920
जो है ये केवल जो है क्या कहते हैं हमें

149
00:10:25,920 --> 00:10:30,080
दिख रहा है चौकोर रूप में और बाकी का ढका हुआ है।

150
00:10:30,080 --> 00:10:34,320
यह जुड़ा हुआ उसी से है। मगर बाकी का ढका होने के कारण हमें यह एक

151
00:10:34,320 --> 00:10:38,640
रूप रंग में एक निश्चित रूप आकार में दिख रहा है। अब बस अवतार

152
00:10:38,640 --> 00:10:42,880
हो उसमें बात ये आ जाती है कि सर्वशक्तिमान

153
00:10:42,880 --> 00:10:47,280
अब बात ये आ जाती है कि भाई तुमने पूरा ईश्वर तो देखा नहीं। पूरी साड़ी तो देखी नहीं।

154
00:10:47,280 --> 00:10:51,840
ठीक है? तो ये काउंटर आ जाता है कि पूरी साड़ी नहीं देखी।

155
00:10:51,840 --> 00:10:56,160
एक मिनट विनीत जी। अभी मैसेज वगैरह अभी रोक दीजिए। आपने

156
00:10:56,160 --> 00:11:00,160
पूरी साड़ी तो देखी नहीं तो फिर आप इसको जो है साड़ी का अवतार क्यों कह रहे हो?

157
00:11:00,160 --> 00:11:04,320
तो बात यह इसलिए है कि इसको हम साड़ी इसलिए कह रहे हैं। पूरी साड़ी नहीं देखी

158
00:11:04,320 --> 00:11:08,320
है। फिर भी हमने इसको साड़ी इसलिए कहा हां साड़ी का अंश क्यों नहीं कह रहे हो?

159
00:11:08,320 --> 00:11:12,400
है ना या अपूर्ण क्यों नहीं कह रहे हो। तो इसलिए कह रहे हैं

160
00:11:12,400 --> 00:11:16,800
क्योंकि ये जो साड़ी का हिस्सा जो हमें दिख रहा है, ये वो सब कुछ कर सकता

161
00:11:16,800 --> 00:11:21,600
है जो जो पूरी साड़ी कर सकती है।

162
00:11:21,600 --> 00:11:26,000
ठीक है? इस कारण से अवतार के रूप में उसके स्वीकार किया गया।

163
00:11:26,000 --> 00:11:30,480
अगर ये वो कुछ ना कर सकता होता जो पूरी साड़ी कर सकती है तो फिर हम उसको

164
00:11:30,480 --> 00:11:34,480
केके अवतार के रूप में स्वीकार ना करते। इसके लिए मैंने वहां पर उदाहरण भी दिया था

165
00:11:34,480 --> 00:11:38,880
कि इंटरनेट के जरिए जो ये एप्लीकेशनेशंस वगैरह हैं वेबसाइट्स

166
00:11:38,880 --> 00:11:43,040
वगैरह पूरी दुनिया में फैली हुई है। फिर एक ईरा इत्यादि के रूप में इनका

167
00:11:43,040 --> 00:11:47,120
अवतार होता है। जो वो सारे कार्य कर सकता है जो वो वेबसाइट पूरी

168
00:11:47,120 --> 00:11:51,280
दुनिया में फैली हुई कर सकती है। तो उसको उसका अवतार माना जाएगा। अगर उसको

169
00:11:51,280 --> 00:11:55,280
वो नॉलेज नहीं हुई जो पूरी दुनिया में फैली हुई वेबसाइट को जो नॉलेज है तो

170
00:11:55,280 --> 00:11:59,280
फिर उसको उसका अवतार नहीं मान सकते आप। तो जो भगवान का अवतार होता है उससे

171
00:11:59,280 --> 00:12:03,600
आप कहो कि अमेरिका में इस समय बारिश करवा दो वो करवा देगा क्योंकि वो उससे कनेक्टेड

172
00:12:03,600 --> 00:12:07,200
है। है ना? हम ये चीज

173
00:12:07,200 --> 00:12:11,280
तो आप क्या कहते? जी बताइए हां हां

174
00:12:11,280 --> 00:12:15,360
कि मैंने अब तक जो समझा आपके इस कथन को कि जैसे

175
00:12:15,360 --> 00:12:19,440
निर्गुण निराकार रूप में आकाश जो स्पेस है हम आपके सभी के आसपास

176
00:12:19,440 --> 00:12:23,840
है लेकिन जो नीला आसमान दिखता है वो सगुण निराकार रूप है और खिड़की

177
00:12:23,840 --> 00:12:28,800
आ जाने से वो सगुण साकार दिखता है ऐसा ही ना हम

178
00:12:28,800 --> 00:12:33,040
ठीक है बस क्लियर हो गया ये ये भी तब है जब हमने ये माना

179
00:12:33,040 --> 00:12:37,200
कि आकाश दिख रहा है अगर आप आकाश का दिखना ही नहीं मानते जैसे उस दिन निर्भय

180
00:12:37,200 --> 00:12:41,200
ने काउंटर किया यदि आप आकाश का दिखना ही नहीं मानते तो उसको हटा

181
00:12:41,200 --> 00:12:45,440
दो। एक दूसरा उदाहरण ले लेते हैं। साड़ी को फैला दो। पूरी

182
00:12:45,440 --> 00:12:49,680
दुनिया में एक साड़ी से कवर कर दो। पृथ्वी से 50

183
00:12:49,680 --> 00:12:53,680
क्या कहते हैं? दो-ती लाख किलोमीटर

184
00:12:53,680 --> 00:12:57,680
दूर। ठीक? या जो भी कुछ किलोमीटर मान लो। उसमें एक साड़ी से

185
00:12:57,680 --> 00:13:01,840
कवर कर दो पृथ्वी के चारों ओर। हम अब वो साड़ी

186
00:13:01,840 --> 00:13:05,840
पूरी पूरी पृथ्वी के चारों ओर फैली हुई है। तो हम उस पूरी साड़ी को तो देख

187
00:13:05,840 --> 00:13:09,840
नहीं सकते। मगर जब हम अपने बंद कमरे की खिड़की से देखेंगे

188
00:13:09,840 --> 00:13:14,320
उस साड़ी को तो क्या होगा? साड़ी का अवतार चौकोर

189
00:13:14,320 --> 00:13:18,400
हम बस उस अवतार में भगवान के अवतार में अंतर ये

190
00:13:18,400 --> 00:13:22,400
होगा कि जो पूरी दुनिया को कवर किए हुए जो साड़ी है

191
00:13:22,400 --> 00:13:26,960
वो जो सब कुछ कर सकती है वो चौकोर साड़ी जो अंश मात्र है वो नहीं कर सकती

192
00:13:26,960 --> 00:13:30,960
है ना हम क्योंकि हम वो अवतार वो

193
00:13:30,960 --> 00:13:34,960
नहीं है मगर क्योंकि भगवान वो कर सकते हैं इसलिए वो

194
00:13:34,960 --> 00:13:39,440
हम जो है उनके अवतार कहलाते हैं। अगर वो ये कहे नहीं नहीं पूरे के पूरे

195
00:13:39,440 --> 00:13:43,600
ईश्वर ने वो काम नहीं किया उनके एक अंश ने वो काम किया है तो भैया पूरा का

196
00:13:43,600 --> 00:13:48,000
पूरा ईश्वर तो कभी काम करता ही नहीं है सगुण निराकार

197
00:13:48,000 --> 00:13:52,080
भी तो किसी एक जगह पर विषय बनता है व्यवहार का किसी दूसरी जगह नहीं करता फिर

198
00:13:52,080 --> 00:13:56,080
तो आप ये कह दो कि ईश्वर ने दुनिया भी नहीं बनाई क्योंकि पृथ्वी

199
00:13:56,080 --> 00:14:00,240
की ईश्वर है ही नहीं हां फिर तो ये कह दो ना ईश्वर है ही नहीं देखो मैं

200
00:14:00,240 --> 00:14:05,120
बता रहा हूं जब भी हमारा विरोध किया जाएगा उसके अ

201
00:14:05,120 --> 00:14:09,200
मूल में नास्तिकता निकल आएगी जैसे जैसे

202
00:14:09,200 --> 00:14:13,840
मान लीजिए हमारी परंपरा का विरोध करना शुरू किया। अब मान लीजिए हमने जो कहा

203
00:14:13,840 --> 00:14:17,920
कि भाई तुम्हारे पास वेद कहां से आए? अब उन्होंने कहा कि भाई हमारे पास जो

204
00:14:17,920 --> 00:14:22,160
है हमारी दो गुरुओं से पहले की वो नहीं है।

205
00:14:22,160 --> 00:14:26,160
ठीक। अब वो क्या पलट के कहेंगे तुम्हारे पास भी तो गोविंदपाद,

206
00:14:26,160 --> 00:14:30,160
गॉड पाचार्य इत्यादि या सुखदेव जी तुम्हें आए। ये सब तो तुम लीला बताते हो। उसका

207
00:14:30,160 --> 00:14:34,240
प्रमाण बताओ। वो भी तो ये कहेंगे। मगर बात

208
00:14:34,240 --> 00:14:37,760
यह है कि हमारी हिस्ट्री जो

209
00:14:37,760 --> 00:14:42,000
प्राप्त हिस्ट्री प्रमाणिक हिस्ट्री तुमसे पुरानी है। तुमसे

210
00:14:42,000 --> 00:14:47,040
पुरानी है। तो वेदों के लिए तुम किस पर आश्रित हो गए? अगर तुम्हें

211
00:14:47,040 --> 00:14:51,120
हमारे अनुसार तुम जो है वेद का गलत अर्थ करते हो। मगर तुम खुद को वैदिक तो

212
00:14:51,120 --> 00:14:55,200
कह रहे हो ना। तो वेदों के लिए तुम्हें आश्रित तो हम पर

213
00:14:55,200 --> 00:14:59,680
ही होना है। अब यदि तुम हमारी भी परंपरा को खंडित कर दोगे

214
00:14:59,680 --> 00:15:03,680
और प्रश्न उठा दोगे तो ज्यादा ज्यादा क्या होगा? देखो हम अपने आप

215
00:15:03,680 --> 00:15:07,680
को निकाल लेंगे। मगर तुम्हारे दृष्टिकोण से अगर देखा जाए तो

216
00:15:07,680 --> 00:15:11,760
तुमने वेदों पर अप्रामाणिक होने का कि यह ईश्वर के हैं। इसमें कोई

217
00:15:11,760 --> 00:15:15,920
प्रमाण नहीं है। बस हम मान रहे हैं। ठीक है? जब आप शंकराचार्य

218
00:15:15,920 --> 00:15:20,080
पर भी उंगली उठा देते हो तो क्या हुआ? आपने अपनी वेदों की प्रमाणिकता पर

219
00:15:20,080 --> 00:15:24,160
उंगली उठा दी। और जब आपने शंकराचार्य पर उंगली उठा दी, वेदों की प्रमाणिकता पर

220
00:15:24,160 --> 00:15:28,160
उंगली उठा दी और आपसे कहा जाए भाई तुम तो हमारे ऊपर निर्भर कर रहे हो। तो आदमी सामने वाला

221
00:15:28,160 --> 00:15:32,160
कहेगा नहीं। अब जब तुमने हमारा छेड़ा तो हम भी तुम्हारा छेड़ेंगे। तो क्या

222
00:15:32,160 --> 00:15:36,160
कर रहे हो तुम? वैदिक धर्म को नष्ट करने का प्रयास कर रहे हो ना वह बात

223
00:15:36,160 --> 00:15:40,160
और है हम होने नहीं देंगे वह बात एक अलग है कर तो तुम यही रहे हो

224
00:15:40,160 --> 00:15:44,320
ना वैदिक वैदिक धर्म को नष्ट करने का प्रयास कर रहे हो क्योंकि तुम्हारे पास

225
00:15:44,320 --> 00:15:49,760
अपनी परंपरा नहीं है इसलिए जिसकी है उसको भी तुम नष्ट करोगे

226
00:15:49,760 --> 00:15:52,880
हां बिल्कुल है कि नहीं तुम्हारे पास अपने 10

227
00:15:52,880 --> 00:15:57,840
गुरुओं के नाम नहीं है पीछे के इसलिए जिसके पास 1450

228
00:15:57,840 --> 00:16:01,840
गुरुओं के नाम है पीछे के तुम उसके और पहले जाकर के उसकी

229
00:16:01,840 --> 00:16:05,840
परंपरा को नष्ट करने का प्रयास करोगे तो क्या करोगे तुम कि तुम

230
00:16:05,840 --> 00:16:10,080
जो है अगर तुम्हारी प्रामाणिकता पर बात आएगी तो तुम्हें

231
00:16:10,080 --> 00:16:14,240
कोई मतलब नहीं है तुम पूरे सनातन पर प्रहार करो तुम्हें कोई मतलब नहीं तुम पूरे

232
00:16:14,240 --> 00:16:18,240
वैदिक धर्म पर प्रहार करो तुम जो है उसको नष्ट करने के पीछे पड़ जाओगे

233
00:16:18,240 --> 00:16:22,480
तो यह होता है कि जब भी हमारे जो किसी भी विरोधी

234
00:16:22,480 --> 00:16:27,120
के उसमें आप मूल में जाएंगे वो नास्तिकता पर उतर आएगा जी

235
00:16:27,120 --> 00:16:31,120
हम ठीक है जी मैं एक छोटा सा बात कह दूं एक छोटा

236
00:16:31,120 --> 00:16:33,920
सा बात

237
00:16:33,920 --> 00:16:38,560
यही चीज आपने बहुत अच्छा कहा। यही चीज मैं उनके सिद्धांतों में भी देखता हूं

238
00:16:38,560 --> 00:16:42,720
कि वो अपने सिद्धांत से दूसरों का बस खंडन कर पाते हैं। लेकिन उनके

239
00:16:42,720 --> 00:16:46,880
सिद्धांतों से ईश्वर की सिद्धि ही नहीं होती। ना नहीं होगी। नहीं

240
00:16:46,880 --> 00:16:51,040
होगी ना। जब मैंने कितनी बार उसी लाइव में पूछा था कि निर्गुण सगुण

241
00:16:51,040 --> 00:16:55,200
कैसे बना? आज तक उत्तर नहीं है। निर्गुण सगुण

242
00:16:55,200 --> 00:16:59,360
कैसे बस खंडन मूलक है या फिर आपके सिद्धांत से इस बार भी

243
00:16:59,360 --> 00:17:03,360
सिद्धांतों की आवश्यकता है ही इसलिए कि वो ईश्वर को

244
00:17:03,360 --> 00:17:07,440
बात आगे नहीं बढ़ी है। अभी तो आप लिखते जाइए कि पूजा

245
00:17:07,440 --> 00:17:07,940
क्यों करनी

246
00:17:07,920 --> 00:17:11,920
है? भक्ति क्यों करनी है? ईश्वर की ये तो बताओ। क्यों करें भक्ति? तुम तो

247
00:17:11,920 --> 00:17:16,400
कह रहे हो कि कुछ देगा नहीं। तो वो तो एक बिल्कुल

248
00:17:16,400 --> 00:17:21,200
भाई बौद्धों के यहां क्या मान्यता है? ये करोगे तो ये होगा। ये नहीं करोगे तो वो होगा।

249
00:17:21,200 --> 00:17:25,520
ईश्वर की कोई आवश्यकता ही नहीं है। इनके यहां भी तो ईश्वर रखा तो है। आवश्यकता

250
00:17:25,520 --> 00:17:29,840
तो नहीं दिख रही कोई। क्योंकि ईश्वर कुछ देगा नहीं।

251
00:17:29,840 --> 00:17:34,400
अच्छा। फिर एक जगह लिख दिया है कि निराभिमानता आएगी।

252
00:17:34,400 --> 00:17:38,720
अगर भक्ति करोगे तो निराभिमानता आएगी। तो क्या चाहते हो? व्यक्ति पहले

253
00:17:38,720 --> 00:17:42,720
सोचे कि मुझे करने से ही कुछ मिलेगा। ठीक? उसके

254
00:17:42,720 --> 00:17:46,720
बाद फिर वो निराभिमानता सोचे कि मुझे मैंने कुछ नहीं किया। ईश्वर ने दिया तो

255
00:17:46,720 --> 00:17:50,800
तुम पहले तय कर लो कि करना क्या है? सोचना क्या है? ईश्वर ने दिया

256
00:17:50,800 --> 00:17:55,120
है कि नहीं दिया है। हां बिल्कुल। भाई निरभमानता

257
00:17:55,120 --> 00:17:59,760
के लिए अगर भक्ति करनी है तो ये मानना पड़ेगा ना सब कुछ ईश्वर से आ रहा है।

258
00:17:59,760 --> 00:18:03,760
मैंने कुछ नहीं किया। तो हम जब ऐसा सोच रहे हैं तो तुम उस पर अंकुश लगा

259
00:18:03,760 --> 00:18:07,920
रहे हो। हम जी है

260
00:18:07,920 --> 00:18:11,920
ना जब हम ऐसा सोच रहे हैं कि सब कुछ भगवान ही

261
00:18:11,920 --> 00:18:16,160
दे रहे हैं। हम कुछ नहीं दे रहे। यही तो सुवाया जा रहा है भक्ति से हमें। हम

262
00:18:16,160 --> 00:18:20,400
तो आप उसका खंडन कर रहे हो। फिर कह रहे हो नहीं निराभिमानता होनी चाहिए। निरभिमानता

263
00:18:20,400 --> 00:18:23,600
यानी कि अहमभाव नहीं होना चाहिए। मैंने कुछ किया।

264
00:18:23,600 --> 00:18:27,680
हम तो तुम तुम किसी एक बात पे ठहर ही

265
00:18:27,680 --> 00:18:31,920
नहीं रहे हो। मतलब जो चीज हम सोचे तो वो गलत

266
00:18:31,920 --> 00:18:36,400
लेकिन वो सोचे तो वो सही। हां उसी को दूसरे शब्दों में तुमने कह दिया तो ठीक है।

267
00:18:36,400 --> 00:18:40,640
खंडन क्यों कर रहे हो? मत करो ना भाई भगवान से ही मिलता है। व्यवहारिकता

268
00:18:40,640 --> 00:18:44,800
यही है कि हमने भगवान की भक्ति की तो हमें कुछ मिला। वो

269
00:18:44,800 --> 00:18:49,040
अंदर गुण अर्थ है, तात्विक विवेचना है। आदि दैविक आदि आध्यात्मिक अर्थ

270
00:18:49,040 --> 00:18:53,200
अलग है। मगर व्यवहारिक अर्थ क्या है? आदि भौतिक अर्थ क्या है?

271
00:18:53,200 --> 00:18:57,200
हमने भगवान से मांगा। हमको मिला। जी ये बात है।

272
00:18:57,200 --> 00:19:01,200
जी। ठीक है। धन्यवाद। आवाज आ

273
00:19:01,200 --> 00:19:05,200
रही है जी। अभी जी जैसे आप आप पढ़ रहे

274
00:19:05,200 --> 00:19:09,280
थे उसमें ये लिखा हुआ था कि जो यहां पे सबसे सुख समझता

275
00:19:09,280 --> 00:19:13,280
है वो सबसे बड़ा मूर्ख है। तो क्या हम यही ले चले कि यहां पे सिर्फ दुख ही

276
00:19:13,280 --> 00:19:16,160
दुख है।

277
00:19:16,160 --> 00:19:21,360
नहीं पूरी बात आप नहीं बता रहे हैं। क्या जो एक सुख समझता है

278
00:19:21,360 --> 00:19:27,360
वो पाप का कुछ बात को लेकर कह रहे हैं कि आपने पहले कहा था कि

279
00:19:27,520 --> 00:19:31,920
क्या कहा था? संसार में दुख ही दुख है।

280
00:19:31,920 --> 00:19:36,720
संसार में दुख तो हम इसी दृष्टिकोण

281
00:19:36,720 --> 00:19:40,960
इसी दृष्टिकोण को ले चले। देखिए

282
00:19:40,960 --> 00:19:45,040
दुख का नाम संसार है। इस बात से कोई मुकर नहीं सकता है। जब

283
00:19:45,040 --> 00:19:49,200
तक आपको भेद बुद्धि प्राप्त है। तो कुछ नहीं होगा तो अपने वहां

284
00:19:49,200 --> 00:19:53,200
ना होने का दुख हो जाएगा। कुछ नहीं होगा तो अपने तब ना होने का दुख

285
00:19:53,200 --> 00:19:57,360
हो जाएगा। कोई मर नहीं रहा है, भूखे नहीं मर रहे हैं। कोई

286
00:19:57,360 --> 00:20:01,360
तकलीफ नहीं है। कोई मार नहीं रहा, कोई पीट नहीं रहा, कुछ नहीं हो रहा। तो

287
00:20:01,360 --> 00:20:05,360
बैठे-बैठे मैं वहां क्यों नहीं हूं? इसी बात का दुख हो जाएगा। दुख का

288
00:20:05,360 --> 00:20:09,600
नाम संसार है। ये बात तो सत्य है। मगर करें क्या? इसको

289
00:20:09,600 --> 00:20:13,600
आपको एक ताले में बंद करना होगा। जैसे कि अहम ब्रह्मास्मि

290
00:20:13,600 --> 00:20:18,640
इसको आपको एक ताले में बंद करना होगा। इसको आपने जान लिया

291
00:20:18,640 --> 00:20:22,640
जो परम तत्व है उसकी सत्ता को समझने के लिए। मगर इसको फिर एक ताले में बंद

292
00:20:22,640 --> 00:20:26,720
करना पड़ता है। जैसे बिटिया कल ब्याह के जाएगी। इसको आपको एक

293
00:20:26,720 --> 00:20:30,880
ताले में बंद करना पड़ेगा। पृथ्वी गोल है। इसको आपको एक ताले में बंद करना पड़ेगा।

294
00:20:30,880 --> 00:20:35,920
फिर क्या काम कैसे करें कि भैया पृथ्वी चपटी काम ऐसे।

295
00:20:35,920 --> 00:20:40,160
बिटिया को बिटिया का पालन पोषण कैसे करें?

296
00:20:40,160 --> 00:20:42,720
भावनाएं कैसे व्यक्त करें बिटिया को? कि बिटिया तो हमारी

297
00:20:42,720 --> 00:20:46,960
है। कहीं नहीं जाएगी। ठीक है? उसी प्रकार से संसार

298
00:20:46,960 --> 00:20:50,960
में दुख ही दुख है। मगर उसको तो हमने ताले बंद कर दिया।

299
00:20:50,960 --> 00:20:55,040
जो सत्य है उसके बाद जो है इन चीजों पर ग्रहण इन

300
00:20:55,040 --> 00:20:59,360
चीजों को ग्रहण करें कि भक्ति करने से सुख प्राप्त हो सकता है इसी जीवन में।

301
00:20:59,360 --> 00:21:03,600
तो एक सत ही स्तर पर हमारी परतें जो होती है ना कई परतें होती हैं सोच

302
00:21:03,600 --> 00:21:07,760
की जैसे कि हमारे मूल में यह

303
00:21:07,760 --> 00:21:11,760
है कि भाई हम जो भी कार्य कर रहे हैं मोक्ष के लिए ही कर रहे हैं। सच्चिदानंद के

304
00:21:11,760 --> 00:21:15,760
लिए ही कर रहे हैं। जो धर्म को कर रहे हैं हम लोग सच्चिदानंद के लिए। पर शंकराचार्य

305
00:21:15,760 --> 00:21:19,760
जी ने इसको ही मना किया है। यह भी नहीं सोचना है कि हम मोक्ष के लिए कर

306
00:21:19,760 --> 00:21:23,840
रहे हैं। सोचना नहीं है। यानी कि ऊपरी सतह में

307
00:21:23,840 --> 00:21:28,000
जो सबसे ऊपर की सतह उसको यह नहीं बताना है। अपने मन को यह नहीं कहना

308
00:21:28,000 --> 00:21:32,560
है कि हम मोक्ष के लिए कर रहे हैं। क्यों कर रहे हैं? ईश्वर ने कहा है।

309
00:21:32,560 --> 00:21:36,560
एक जैसे नहीं किसी कप्तान ने कहा कि वो बरगद का पेड़

310
00:21:36,560 --> 00:21:40,560
उखाड़ो। तुम उखाड़ पाओगे चाहे नहीं उखाड़ पाओगे। कप्तान ने कहा है

311
00:21:40,560 --> 00:21:45,360
उखाड़ना है तो उखाड़ना है तो हम उस बुद्धि से वह पेड़ उखाड़ रहे हैं।

312
00:21:45,360 --> 00:21:49,440
बस अगर इस तरह से चलोगे तो आप इस भवसागर को पार

313
00:21:49,440 --> 00:21:53,520
कर पाओगे। तो वो जो आपके जो अंतिम लेयर में जो मोक्ष बैठा हुआ है

314
00:21:53,520 --> 00:21:57,760
ना तो वहां तक पहुंच पाओगे। तो मोक्ष को हटा भी नहीं सकते और मोक्ष

315
00:21:57,760 --> 00:22:01,840
को ऊपरी सतह सतह ही स्तर पर ला भी नहीं सकते। उसी प्रकार से

316
00:22:01,840 --> 00:22:05,840
यह वाला भी सत्य है कि दुख तो है संसार मगर इसके कारण अपने

317
00:22:05,840 --> 00:22:10,000
आप को निराशावादी हताश निराश नहीं बनाना है। ये आपने जान

318
00:22:10,000 --> 00:22:14,080
लिया क्योंकि आपको तात्विक विवेचना समझनी है संसार की। अब

319
00:22:14,080 --> 00:22:18,080
इसको एक ताले में बंद करिए। निचले स्तर की सतह में ले जाइए और ऊपरी सतह पर

320
00:22:18,080 --> 00:22:22,320
क्या है? नहीं यहां पर भी हम सुखी रह सकते हैं और सुखी रहते हैं।

321
00:22:22,320 --> 00:22:26,400
मन में मालूम है कि हम जब तक हम बंधन में तब तक हम दुख में है। सिंपल

322
00:22:26,400 --> 00:22:30,480
जब तक प्रपंच रूपी माया में तब तक हम दुख में है। मगर यहां पर

323
00:22:30,480 --> 00:22:34,560
भी भगवान का आलंबन ले लेने पर हमको जो है सुख प्राप्त होने लगता है।

324
00:22:34,560 --> 00:22:38,560
और उसी सुखी जीवन के साथ-साथ हम जो है एक दिन मोक्ष

325
00:22:38,560 --> 00:22:43,120
को प्राप्त कर लेते हैं। ठीक है।

326
00:22:43,120 --> 00:22:48,720
हां जी भैया। जी ठीक है। देवांश जी बताएं।

327
00:22:48,720 --> 00:22:53,680
जय जय राम भैया आपके चरण चरणों में दंडवत प्रणाम

328
00:22:53,680 --> 00:22:58,240
मेरा जी मेरा भैया जैसे आप दो हफ्ते से

329
00:22:58,240 --> 00:23:02,240
वो वो नहीं हो पा रहा था प्रश्न उत्तर ही नहीं हो रही थी मेरे दिमाग में

330
00:23:02,240 --> 00:23:06,400
बहुत चल रहा था तो अच्छा हुआ कि आज हो गया मेरा

331
00:23:06,400 --> 00:23:10,720
एक प्रश्न था कि जैसे जैसे कहा जाता है कि

332
00:23:10,720 --> 00:23:15,040
हमारा सनातन धर्म है उसमें वो सबसे पुराना धर्म है इसीलिए

333
00:23:15,040 --> 00:23:19,360
वो सनातन है सनातन का मतलब शाश्वत लेकिन भैया जैसे हम

334
00:23:19,360 --> 00:23:23,600
लोग देखते हैं आजकल जैसे आप देखे होंगे आर्कियोलॉजिकल डिपार्टमेंट

335
00:23:23,600 --> 00:23:27,920
एएसआई ने बहुत सारी रिसर्च करी तो उन्होंने ये पाया कि ऐसे

336
00:23:27,920 --> 00:23:32,320
आदिवासी जो होते हैं ना स्टोन एज वाले वो उन लोगों के अवशेष

337
00:23:32,320 --> 00:23:36,320
दो लाख या एक लाख से एक लाख पुराने हो उनके अवशेष मिले

338
00:23:36,320 --> 00:23:40,640
हैं। लेकिन सनातन धर्म के ऐसे कोई अवशेष नहीं मिले कि जो एटलीस्ट

339
00:23:40,640 --> 00:23:44,720
दो लाख साल से पुराने हो। ठीक है ना? कोई मंदिर ऐसा मिला ना

340
00:23:44,720 --> 00:23:48,720
उसके बजाय बस इसीलिए वो कहते हैं कि सनातन धर्म

341
00:23:48,720 --> 00:23:52,800
ज्यादा से ज्यादा 5000 साल पुराना है। उससे ज्यादा पुराना है नहीं क्योंकि

342
00:23:52,800 --> 00:23:56,800
हमारे पास कोई प्रूफ नहीं है। ना कोई अवशेष है। मैंने आपको इस बारे

343
00:23:56,800 --> 00:23:59,200
में कई बार बताया है

344
00:23:59,200 --> 00:24:04,240
कि आप इनपुट की बजाय आउटपुट पे ध्यान दीजिए। सच्चिदानंद

345
00:24:04,240 --> 00:24:08,240
स्वरूप परमेश्वर की सिद्धि कौन कर सकता है? परम स्वतंत्र मोक्ष की सिद्धि

346
00:24:08,240 --> 00:24:12,320
कौन कर सकता है? मोक्ष किससे प्राप्त होना है? भाई व्यक्ति को

347
00:24:12,320 --> 00:24:16,480
इंटरेस्ट किसमें है? अगर हमारा बहुत पुराना है मगर मोक्ष

348
00:24:16,480 --> 00:24:20,560
नहीं दे रहा है। मोक्ष की बात ही नहीं कर रहा है तो क्या फायदा उसका? अब

349
00:24:20,560 --> 00:24:24,560
जब हमारे मोक्ष की बात वो कर रहा है। सर्वशक्तिमान ईश्वर

350
00:24:24,560 --> 00:24:29,280
की बात वो कर रहा है। हमारे पास शब्द प्रमाण है।

351
00:24:29,280 --> 00:24:33,360
शब्द प्रमाण है जो ये कह रहा है कि वो 1 लाख 1 करोड़ 97 वर्ष

352
00:24:33,360 --> 00:24:37,440
पुराना उसके नहीं मिले। अच्छा दुनिया में जो चीजें नहीं मिली है उन वो है ही

353
00:24:37,440 --> 00:24:41,520
नहीं। भाई अगर किसी

354
00:24:41,520 --> 00:24:45,760
भी आविष्कार का आप नाम ले लीजिए किसी भी अविष्कार का नाम ले लीजिए

355
00:24:45,760 --> 00:24:49,840
तो वह एक समय पर नहीं था बाद में तो हो गया

356
00:24:49,840 --> 00:24:53,920
इसका मतलब उसका ज्ञान पहले था ना कैसे हुआ

357
00:24:53,920 --> 00:24:58,640
तो जो आज नहीं ढूंढ पाई है अगर किसी दिन वो मिल गया अरे मिल गया

358
00:24:58,640 --> 00:25:02,880
अरे यही है पुराना लो तो इस कारण से हम अपनी मान्यताएं

359
00:25:02,880 --> 00:25:07,680
अपने बिलीफ अपने जो मोक्ष मार्ग है उसको प्रभावित करें

360
00:25:07,680 --> 00:25:11,680
तो चीज किस पर पॉइंट किस पर है कि मोक्ष की बात

361
00:25:11,680 --> 00:25:14,400
कौन कर रहा है? पर सर्वशक्तिमान ईश्वर

362
00:25:14,400 --> 00:25:18,400
परम स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत धन नया नई नियमावली आप

363
00:25:18,400 --> 00:25:22,480
बना लो ले आओ हम आपके हैं। अगर कोई लड़ाई हो रही

364
00:25:22,480 --> 00:25:26,480
है कि भाई तुम सनातनी नहीं अपने आप को फलाना कहो कि भैया जो

365
00:25:26,480 --> 00:25:30,720
है देवांश जी के द्वारा निर्मित देव धर्म देवांश

366
00:25:30,720 --> 00:25:34,720
धर्म या और कुछ बना लो। आप ले आओ। हम आपके

367
00:25:34,720 --> 00:25:38,880
विरोधी नहीं रहेंगे। तीनों चीजें हमें दे दो बस विरोध नहीं होना चाहिए

368
00:25:38,880 --> 00:25:43,200
उसमें इन तीन चीजों का यह जो तीन तत्व मगर यह तीन तत्व आप वेद

369
00:25:43,200 --> 00:25:48,560
वैदिक धर्म के बिना ले नहीं पाओगे आपको वेद की कॉपी करना ही पड़ जाएगा

370
00:25:48,560 --> 00:25:53,200
तो इसीलिए जो चीजें सिद्ध नहीं हो सकती ना उनकी तरफ से ना हमारी तरफ से

371
00:25:53,200 --> 00:25:57,280
समझ रहे हो ऐतिहासिक प्रमाणों पे हम अब मान लीजिए उन्होंने कहा कि

372
00:25:57,280 --> 00:26:01,600
भैया ये फलाने साइंस फलाने व्यक्ति ने इस युग में

373
00:26:01,600 --> 00:26:05,760
इस इस पर बात की थी ये हमारे पास वो है हमने कहा कि फलाने

374
00:26:05,760 --> 00:26:09,840
अब हमारे शब्द प्रमाण पर उन्हें नहीं विश्वास है। उनके शब्द प्रमाण पर हमें हमें नहीं

375
00:26:09,840 --> 00:26:14,240
विश्वास है। इसी पर जद्दोजहद करते रहो। कई वर्षों तक

376
00:26:14,240 --> 00:26:18,560
उससे होगा। तीसरी बात

377
00:26:18,560 --> 00:26:23,200
कि भैया सच्चिदानंद कहां है आपके पास?

378
00:26:23,200 --> 00:26:25,840
है ना?

379
00:26:25,840 --> 00:26:29,440
भैया इसी में आपने जो अभी बताया ना इसी में प्रश्न ये

380
00:26:29,440 --> 00:26:34,160
आता है जैसे आप कहते हैं कि ये जो तीन चीज है सचिता ये आपका

381
00:26:34,160 --> 00:26:38,400
हो गया कि हमें ध्यान किस बात पे देना है अब ये दूसरा पॉइंट हो सकता है कि इन

382
00:26:38,400 --> 00:26:42,000
तीन चीजों पे काउंटर हो रहा है शायद

383
00:26:42,000 --> 00:26:46,000
नहीं नहीं नहीं ये दूसरी चीज है कई लोग ऐसा कहते हैं

384
00:26:46,000 --> 00:26:50,000
नहीं ये दूसरी चीज है ना वो क्लियर हो गया ना आपका इनपुट वाला पहला

385
00:26:50,000 --> 00:26:54,320
पहला वाला क्लियर हो गया हां ठीक अब बोलिए तो थोड़ा मुझे मैं मेहनत

386
00:26:54,320 --> 00:26:59,040
करता हूं ना तो थोड़ा बता तो दिया करिए कि भाई मेहनत तुम रंग लाई कि नहीं लाई।

387
00:26:59,040 --> 00:27:03,200
जी बिलकुल दूसरा क्वेश्चन ये था जैसे

388
00:27:03,200 --> 00:27:07,680
कई नास्तिक है उनका ये कहना है जैसे आपने बताया जो फिलोसफी आपने बताई

389
00:27:07,680 --> 00:27:11,760
उन्होंने कहा कि जो वेद है वो 5000 साल पहले आ रहे थे। ठीक है? उनका ये

390
00:27:11,760 --> 00:27:15,760
कहना है तो जो वेद आए वो क्योंकि वेद का कोई रचयता

391
00:27:15,760 --> 00:27:19,760
नहीं है तो बहुत लोगों ने लिखा होगा। जैसे आपने गेम ऑफ थ्रोनस देखा होगा।

392
00:27:19,760 --> 00:27:23,840
गेम ऑफ थ्रोन एक वो नहीं इमेजिनेशन यूनिवर्स बना देता

393
00:27:23,840 --> 00:27:27,840
है। तो इसीलिए किसी ऐसे रचयिता ने ऐसा लिख दिया

394
00:27:27,840 --> 00:27:31,920
वेद को जो कि बिल्कुल होता नहीं कि साइंटिफिक जिसका प्रमाण ही नहीं है। मतलब

395
00:27:31,920 --> 00:27:36,000
इतना ज्यादा होता नहीं मिरेकल जैसे आपने बताया वेद में सच्चिदानंद तो

396
00:27:36,000 --> 00:27:40,080
उन लोगों का कहना है कि ये भगवान की वाणी नहीं है। ये कई लोगों ने लिखा था जो

397
00:27:40,080 --> 00:27:44,640
बहुत ज्यादा ब्रिलियंट लोग थे। इसीलिए कोई इसका खंडन नहीं कर पाता है।

398
00:27:44,640 --> 00:27:48,640
तो इससे क्या हो गया? अगर कोई खंडन नहीं कर पा रहा है तो फिर उसकी शब्द

399
00:27:48,640 --> 00:27:52,880
प्रमाण माना हमने भाई वो तर्क की पराकाष्ठा पे और प्लस हमारी

400
00:27:52,880 --> 00:27:56,960
श्रद्धा है हमारी श्रद्धा यह है कि ये अपौरुषय है ये

401
00:27:56,960 --> 00:28:01,360
दो करोड़ साल पहले के हैं और तर्क ये है कि सर्वशक्तिमान

402
00:28:01,360 --> 00:28:05,440
ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत धर्म अब हमारे अगर आपको हमारी

403
00:28:05,440 --> 00:28:09,440
आस्था पर यकीन नहीं है। आपको हमारे शब्द प्रमाण यकीन नहीं है।

404
00:28:09,440 --> 00:28:13,520
आप इन तीन चीजों को काट के दिखा दो। बस हमने तो

405
00:28:13,520 --> 00:28:17,520
कहा है ना कि आप नई नियमावली ले आओ ना भाई हम कहां मना कर रहे

406
00:28:17,520 --> 00:28:21,760
हैं सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत धर्म ले आओ अभी मुल्ला जी आए

407
00:28:21,760 --> 00:28:25,840
थे कितने घंटों लगे रहे हर चीज में वो यही कह के

408
00:28:25,840 --> 00:28:31,360
गए भैया आगे अगला चैप्टर चालू करो नहीं तो वो अपना रिपीट टेलीकास्ट करते रहेंगे

409
00:28:31,360 --> 00:28:35,440
हम जी देखिए ये जो बात है

410
00:28:35,440 --> 00:28:40,240
जो शब्द प्रमाण से ही सिद्ध हो सकती है उसमें ना हम

411
00:28:40,240 --> 00:28:44,560
कोई ऐसा पॉइंट रख सकते हैं। हमारे पास उसके पक्ष में तर्क

412
00:28:44,560 --> 00:28:48,640
है और हमारे पास उसके पक्ष के लिए यह है कि जो उसके विरुद्ध

413
00:28:48,640 --> 00:28:52,640
लाओगे वह हम खंडित कर देंगे। उसके द्वारा दिया गया जो ज्ञान विज्ञान है जो

414
00:28:52,640 --> 00:28:56,720
स्फुटित हो रहा है जगह वो उसके द्वारा हम कर मगर एक शब्द प्रमाण

415
00:28:56,720 --> 00:28:59,760
जो है कि ये ऐसा ये ऐसा था वो तो

416
00:28:59,760 --> 00:29:03,760
हमें ना हम उनका मानने के लिए तैयार हो सकते हैं ना वो हमारा मानने के लिए

417
00:29:03,760 --> 00:29:07,760
तैयार हो। बहस उस चीज पर की जाए जिस पर वो मानने

418
00:29:07,760 --> 00:29:11,760
मानना पड़ जाए। जैसे कि नास्तिक के अंदर भी सच्चिदानंद की क्या है यह उन्हें

419
00:29:11,760 --> 00:29:15,920
मानना पड़ जाएगा। बहस ऐसी चीजों पर की जाए

420
00:29:15,920 --> 00:29:20,080
जिन विषयों में हम एक जगह निष्कर्ष प्राप्त कर सकते हैं।

421
00:29:20,080 --> 00:29:24,240
जो विश्वास का विषय है उसमें हम निष्कर्ष कैसे प्राप्त करेंगे जो विश्वास

422
00:29:24,240 --> 00:29:28,240
का विषय है। उनका विश्वास है कि वेदों को जो है अभी लिखा गया हमारा

423
00:29:28,240 --> 00:29:32,400
विश्वास है कि दो करोड़ वर्ष हो गए। एक करोड़ 97 लाख की तो हमारी गुरु परंपरा

424
00:29:32,400 --> 00:29:36,480
है। अब वह गुरु परंपरा यदि आप नहीं मानते

425
00:29:36,480 --> 00:29:40,560
हो कि इतनी पुरानी है तो उनके ज्ञान विज्ञान को काटो ना। कौन कह रहा है?

426
00:29:40,560 --> 00:29:44,800
हम लोग इसलिए थोड़ी ना कहीं पर जीते हैं।

427
00:29:44,800 --> 00:29:49,120
इस दम पर थोड़ी ना चलते हैं कि हम पुराने हैं। हम इस दम पर चलते हैं कि हमारे पास सर्वशक्तिमान

428
00:29:49,120 --> 00:29:53,280
ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष और शाश्वत धर्म। और यह

429
00:29:53,280 --> 00:29:57,440
हमारा यह जो उपयोगिता है इसकी कि वेद अपुरुष है

430
00:29:57,440 --> 00:30:01,440
और वेद जो है क्या कहते हैं तर्क की पराकाष्ठा है इसकी

431
00:30:01,440 --> 00:30:05,920
उपयोगिता में हम किस पर विश्वास कर रहे हैं जो तर्क की पराकाष्ठा

432
00:30:05,920 --> 00:30:10,400
पर खड़ा है जिसने ये नहीं कहा कि जो है हमको ईश्वर ने लिखा

433
00:30:10,400 --> 00:30:14,560
लो हम ऐसी किसी नियमावली

434
00:30:14,560 --> 00:30:15,060
के प्रति

435
00:30:15,040 --> 00:30:19,120
श्रद्धावान है वहां पर श्रद्धा है कि वेद ने कहा कि

436
00:30:19,120 --> 00:30:24,080
वो पुरुष है कुरान ने नहीं कहा कुरान ने कहा मुझको अल्लाह ने लिखा

437
00:30:24,080 --> 00:30:28,160
बाइबल को ईश्वर ने सुनाया ठीक है तो

438
00:30:28,160 --> 00:30:32,960
हम तर्क की पराकाष्ठा पे हैं और फिर वहां पर विश्वास है

439
00:30:32,960 --> 00:30:37,120
ठीक जी जय सीताराम धन्यवाद जय

440
00:30:37,120 --> 00:30:41,920
श्री राम

441
00:30:41,920 --> 00:30:47,920
हम बस मुकुल जी

442
00:30:49,280 --> 00:30:53,280
मुकुल जी के बाद वैभव जी है जी आवाज आ रही हो तो बोले नहीं तो श्री

443
00:30:53,280 --> 00:30:57,520
कृष्णा भैया जी जय श्री राम जय श्री राम जी मेरे

444
00:30:57,520 --> 00:31:01,520
दो प्रश्न थे आपसे एक तो मेरा ये

445
00:31:01,520 --> 00:31:05,760
है कि जैसा कि शास्त्रों में भी आता है कि स्त्री और शूद्र

446
00:31:05,760 --> 00:31:09,920
जो है चतुर्थ वर्ण वाले भाई हैं हमें तो उनके मतलब बहुत

447
00:31:09,920 --> 00:31:14,400
चीजें निषेध है जैसे शालिग्राम जी की सेवा नहीं कर सकते हैं स्त्री शूद्र आदि

448
00:31:14,400 --> 00:31:18,640
तो मतलब ऐसा है कि ईश्वर ने सबको एक ही तरीके

449
00:31:18,640 --> 00:31:22,640
से मतलब निर्माण किया तो ऐसा मतलब निषेध क्यों होता

450
00:31:22,640 --> 00:31:26,640
है ये थोड़ा सा करना था और दूसरा

451
00:31:26,640 --> 00:31:30,720
बहुत सारे वीडियोस बना चुके हैं। शॉर्ट में उत्तर दे देता हूं।

452
00:31:30,720 --> 00:31:34,800
यदि पहली बात तो आपकी एक जानकारी गलत है कि स्त्री और

453
00:31:34,800 --> 00:31:39,520
शूद्रों के लिए बहुत सारे निषेध है। सबसे ज्यादा निषेध ब्राह्मणों के लिए है।

454
00:31:39,520 --> 00:31:43,600
ब्राह्मण यदि मदिरापान कर लेगा तो उसको लोहे की सलाख को गर्म

455
00:31:43,600 --> 00:31:48,320
करके उसके साथ आलिंगन करना कि कब तक? जब तक मृत्यु ना हो जाए।

456
00:31:48,320 --> 00:31:53,440
ब्राह्मण को सम्मान का भूखा नहीं, अपमान का भूखा रहना है। शूद्र के लिए नहीं कहा गया।

457
00:31:53,440 --> 00:31:57,680
ब्राह्मण को जरूरत से ज्यादा धन नहीं बटोरना है। केवल इतना धन संचय करना है

458
00:31:57,680 --> 00:32:01,760
कि रोटी खा सके, जीवित रह सके। बस आप इतना भी

459
00:32:01,760 --> 00:32:04,480
धन नहीं ला सकते कि उसको बचा के तिजोरी में रख सके।

460
00:32:04,480 --> 00:32:08,160
यह निषेध नहीं है।

461
00:32:08,160 --> 00:32:12,400
ब्राह्मण के लिए कहा गया है यज्ञ पवित्र हो जाने के बाद आप जो है मूत्र त्याग

462
00:32:12,400 --> 00:32:16,480
करेंगे तो इतनी बार मिट्टी से धोए। कोहनी तक इतनी बार मिट्टी से धोएं

463
00:32:16,480 --> 00:32:20,560
और उसके बाद कुल्ले इतने करें, आचमन इतने करें। यह निषेध नहीं है। पागल

464
00:32:20,560 --> 00:32:24,800
हो जाएगा एक सामान्य व्यक्ति जो ये सब बने फिर रहे हैं ना कि ब्राह्मण

465
00:32:24,800 --> 00:32:28,880
ब्राह्मण ब्राह्मण और ये सब रायता फैला रखा है। एक दो दिन जी के देख

466
00:32:28,880 --> 00:32:32,960
ले जीवन कितना कठिन है। बात बातबात में

467
00:32:32,960 --> 00:32:37,120
पतित हो जाएगा। यह हो जाएगा। इतनी नियमावली है कि व्यक्ति का

468
00:32:37,120 --> 00:32:41,280
पूरा दिन ही उसमें गुजरेगा। यही ध्यान रखने में कि मैं

469
00:32:41,280 --> 00:32:45,280
यज्ञ पवी धारण करने योग्य अपने शरीर को रख पा रहा हूं कि नहीं रख

470
00:32:45,280 --> 00:32:49,440
पा रहा हूं। तो जिस जिसे आप निषेध कह रहे हैं ना

471
00:32:49,440 --> 00:32:54,320
उसको स्वतंत्र किया गया है। यदि सब लोग यही दिन भर सोचेंगे

472
00:32:54,320 --> 00:32:58,800
कि मैं अपने शरीर को यज्ञ पवित्र धारण करने के लिए वेद पाठ और

473
00:32:58,800 --> 00:33:02,800
वेद पाठ करने और पढ़ाने के लिए शुद्ध रख पा रहा

474
00:33:02,800 --> 00:33:08,000
हूं कि नहीं रख पा रहा हूं। तो कोई बाहर से आ जाएगा तो क्या करेगा?

475
00:33:08,000 --> 00:33:12,240
भाई वो तो कुल्ले कर रहा है। बाहर से अटैक हो रहा है तो क्या करें?

476
00:33:12,240 --> 00:33:16,400
कुल्ले कम करो। अच्छा वो तो लड़ रहा है।

477
00:33:16,400 --> 00:33:19,520
अब क्या करें? तो और कुल्ले कम करो। अच्छा

478
00:33:19,520 --> 00:33:23,520
वो तो जो है वैश्य है जो व्यापार कर रहा है। वो तो तराजू पर तौल रहा है। तो क्या

479
00:33:23,520 --> 00:33:27,680
करें? के कुल्ले और कम करो। खत्म कर दो कुल्ले। तो शूद्र

480
00:33:27,680 --> 00:33:31,920
आ गया। अब हम ये कह दे अब हम ये कह दे कि भैया कोई शूद्र

481
00:33:31,920 --> 00:33:36,640
है जो वेद पाठों के लिए उसके पास गुण है। बिल्कुल हो सकते हैं। उसमें कोई दिक्कत नहीं है।

482
00:33:36,640 --> 00:33:40,720
दिक्कत क्या है कि कोई व्यक्ति अगर रॉन्ग साइड जाकर के अच्छी

483
00:33:40,720 --> 00:33:44,800
गाड़ी चला रहा है बिना एक्सीडेंट के तो अलऊ कर दे। जिसका जो मन हो जिसकी

484
00:33:44,800 --> 00:33:48,800
क्वालिटी हो उधर रॉन्ग साइड चलाए। ये होना चाहिए। ये

485
00:33:48,800 --> 00:33:52,960
होना चाहिए कि कोई व्यक्ति अगर रॉन्ग साइड जाकर के अच्छी गाड़ी

486
00:33:52,960 --> 00:33:56,960
चला रहा है तो लेफ्ट में चलने वाला जो नियम है कि नहीं साहब राइट में

487
00:33:56,960 --> 00:34:01,040
नहीं चलाना है। लेफ्ट में ही चलाना है। तो यह नियम खत्म कर दे।

488
00:34:01,040 --> 00:34:05,040
क्योंकि कुछ लोग हैं जो रॉन्ग साइड अच्छी गाड़ी चला

489
00:34:05,040 --> 00:34:09,280
लेते हैं एक्सीडेंट के बिना। तो नियम बनाने के लिए, अनुशासन रखने

490
00:34:09,280 --> 00:34:13,280
के लिए, व्यवस्था रखने के लिए चीजों का पर्यवसान है। देखिए

491
00:34:13,280 --> 00:34:18,000
बात यह है कि आपको इस पर ध्यान देना है

492
00:34:18,000 --> 00:34:22,000
कि हमको जो अधिकार और अनाधिकार दिए गए उसका परवसान किस

493
00:34:22,000 --> 00:34:26,000
में है? मुक्ति में। कहीं पर लिखा है क्या? किसी का ब्राह्मण

494
00:34:26,000 --> 00:34:31,120
बनना वो है जीवन का उद्देश्य। जीवन का उद्देश्य मोक्ष।

495
00:34:31,120 --> 00:34:34,800
ब्राह्मण बनना उद्देश्य नहीं है। तो फिर ब्राह्मणों

496
00:34:34,800 --> 00:34:39,280
वाली चीजें क्यों चाहिए? अच्छा निषेध नहीं है।

497
00:34:39,280 --> 00:34:44,080
पुरुष का मांग भरना निषेध नहीं है। हम

498
00:34:44,080 --> 00:34:48,080
उसको क्यों नहीं सोचा आपने? पुरुष की गोद भराई निषेध नहीं है। उसको क्यों

499
00:34:48,080 --> 00:34:52,320
नहीं सोचा आपने? तो पहली बात तो निषेध की परिभाषा

500
00:34:52,320 --> 00:34:56,480
को जाने कि निषेध किसके ऊपर है? किसके ऊपर नहीं है। अब दूसरी बात एक आती

501
00:34:56,480 --> 00:35:00,720
है हमने बता दिया कि इनका जो पर देखिए जो ईश्वर

502
00:35:00,720 --> 00:35:04,880
है जो ईश्वरीय व्यवस्था है वो यह ध्यान में रखने के लिए नहीं

503
00:35:04,880 --> 00:35:08,960
कि आपको सांसारिक भोग कैसे कराने हैं। सिंपल वो यह

504
00:35:08,960 --> 00:35:13,360
ध्यान में रखकर है कि आप सांसारिक भोगों से गुजरते हुए इसको

505
00:35:13,360 --> 00:35:17,360
पार कैसे करो। उसने इस तरह से व्यवस्था की। अब हम लड़ रहे हैं भैया हमारे

506
00:35:17,360 --> 00:35:21,520
को ये वाला सांसारिक भोग नहीं दिया। हमारे को ये वाला नहीं दिया। दिक्कत ये है। तो जब हम

507
00:35:21,520 --> 00:35:25,600
ऐसा कह रहे हैं तो इसका मतलब हमारा मोक्ष में विश्वास नहीं है। जब हमारा मोक्ष में

508
00:35:25,600 --> 00:35:29,600
विश्वास नहीं है। अगर हम परम सत्य मोक्ष को स्वीकार कर लेंगे तो हम ये काउंटर

509
00:35:29,600 --> 00:35:33,680
कर ही नहीं सकते कि हमें हमें ये वाली सुविधा नहीं मिल रही है। ठीक

510
00:35:33,680 --> 00:35:37,680
है? तो जब हमारा मोक्ष में विश्वास नहीं है तो ईश्वर पर विश्वास सिद्ध नहीं

511
00:35:37,680 --> 00:35:41,680
होता और धर्म पर विश्वास सिद्ध नहीं होता। तब भी हमारा जो है इन बातों का निषेध

512
00:35:41,680 --> 00:35:45,920
अथवा होना अथवा ना होने के विषय में परेशान होना सिद्ध नहीं होता।

513
00:35:45,920 --> 00:35:50,240
क्योंकि हम हम तो धर्म को मानते ही नहीं है। निषेध तो उसके लिए ना जो माने

514
00:35:50,240 --> 00:35:54,480
तो धर्म को मानेगा तो आधा मानेगा क्या? यह भी तो मानना है कि परम लक्ष्य

515
00:35:54,480 --> 00:35:58,480
तो मोक्ष है। परम लक्ष्य ब्राह्मण बनना है ही नहीं। कहां लिखा है धर्म

516
00:35:58,480 --> 00:36:02,960
का लक्ष्य जो है मोक्ष वो ब्राह्मण। ठीक है?

517
00:36:02,960 --> 00:36:06,960
और बाकी इस पर बहुत सारी विवेचना कई बार कर चुके

518
00:36:06,960 --> 00:36:11,280
हैं। जब अभी आहान का कोर्स शुरू हो जाएगा तो उसमें एक विधिवत एक चैप्टर है पूरा वर्णाश्रम

519
00:36:11,280 --> 00:36:15,360
को लेकर के। तो यह निषेध करना। अच्छा निषेध ये बताओ

520
00:36:15,360 --> 00:36:19,440
कोई बाहरी व्यक्ति आपके यहां पर आएगा वो कहे कि भैया जो

521
00:36:19,440 --> 00:36:25,280
है आपने निषेध कर रखा है अपने यहां की स्त्रियों को स्पर्श ना करने की कोई बात है क्या

522
00:36:25,280 --> 00:36:29,520
हम नहीं नहीं निषेध निषेध तो होगा

523
00:36:29,520 --> 00:36:33,520
ना विधि निषेध इत्यादि की आवश्यकता है ना जीवन में आपने निषेध कर रखा

524
00:36:33,520 --> 00:36:37,520
है शौच के बाद आप जो है जिस हाथ से आप जो है शौच इत्यादि जिस हाथ को

525
00:36:37,520 --> 00:36:42,240
उपयोग में लेते हैं उसके उससे आप खाना नहीं खाते क्यों निषेध कर रखा है

526
00:36:42,240 --> 00:36:46,960
निषेध विधि निषेध और क्या कहते हैं वो होना

527
00:36:46,960 --> 00:36:51,120
अनुमति प्राप्त होना यह सब एक अंग है सांसारिक व्यवस्था

528
00:36:51,120 --> 00:36:55,120
का लेफ्ट में चलो अच्छा मैं तो मैं क्या अच्छा कोई

529
00:36:55,120 --> 00:36:59,120
आदमी अगर वही वाली बात कि कोई शूद्र अगर गुणवान हो जाए कोई

530
00:36:59,120 --> 00:37:03,120
शूद्र अगर वेद के बहुत विद्वान हो जाए तो उसको नहीं हक मिलना चाहिए तो कोई

531
00:37:03,120 --> 00:37:05,360
आदमी अगर रोंग साइड हो दूसरी राइट

532
00:37:05,360 --> 00:37:09,600
साइड में अच्छी गाड़ी चलाने लगे तो उसको क्यों नहीं हक होना चाहिए

533
00:37:09,600 --> 00:37:13,840
क्योंकि व्यवस्था बिगड़ जाएगी विप्लव होगा सबको छूट

534
00:37:13,840 --> 00:37:17,840
दे दी हम भी हम भी हम भी अच्छी चलाएंगे सब इधर उधर मारे मारे

535
00:37:17,840 --> 00:37:21,840
फिर रहे हैं दे धना धन एक्सीडेंट हो रहे हैं हो ही रहा है हो ही

536
00:37:21,840 --> 00:37:26,000
रहा है ना राम राज्य है क्या आज नहीं नहीं

537
00:37:26,000 --> 00:37:30,560
फिर हवा उतनी ही चलती थी जितनी चलनी चाहिए

538
00:37:30,560 --> 00:37:34,560
पढ़िए आप रामायण को धूप उतनी निकलती थी जितनी निकलनी

539
00:37:34,560 --> 00:37:38,560
चाहिए है क्या आज वैसा क्यों नहीं है क्योंकि

540
00:37:38,560 --> 00:37:42,560
सारी गाड़ियां जिसका जो मन आया वो रॉन्ग साइड जा रही है जिसका जो मन है साइड जा

541
00:37:42,560 --> 00:37:46,800
रही है। कहीं भी कोई भी मोड़ दे रहा है। सबको छूट मिली हुई है। लोकतांत्रिक शासन

542
00:37:46,800 --> 00:37:49,120
है।

543
00:37:49,120 --> 00:37:53,200
रामचंद्र जी के युग में क्या वोट पड़ते थे क्या? कौन बनेगा

544
00:37:53,200 --> 00:37:56,960
करोड़पति?

545
00:37:56,960 --> 00:38:01,120
तो जन्म से नॉमिनेशन और कर्म से सिलेक्शन। ऐसा नहीं

546
00:38:01,120 --> 00:38:06,320
है। कोई ब्राह्मण अगर पतित होगा तो उसको रिजेक्ट किया जाएगा।

547
00:38:06,320 --> 00:38:10,400
मगर नॉमिनेशन के लिए एक स्टार्टिंग पॉइंट तो होना चाहिए ना। वह

548
00:38:10,400 --> 00:38:14,400
वर्णाश्रम जन्म के अनुसार है। उसके बाद उनके कर्मों के हिसाब से उनका

549
00:38:14,400 --> 00:38:18,480
सिलेक्शन होगा। अच्छा जितने विधि निषेध

550
00:38:18,480 --> 00:38:22,800
ब्राह्मण पर लागू है उतने विधि निषेध किसी पर लागू नहीं है। अगर सांसारिक

551
00:38:22,800 --> 00:38:26,800
दृष्टि से देखा जाए तो सबसे दयनीय जीवन ब्राह्मण का

552
00:38:26,800 --> 00:38:30,800
है। हां पारमार्थिक दृष्टि से देखा जाए तो

553
00:38:30,800 --> 00:38:34,800
सबसे उत्कृष्ट जीवन ब्राह्मण का माना जा सकता है। मगर जो भौतिकवादी

554
00:38:34,800 --> 00:38:39,040
व्यक्ति है जिसको इसमें निष्ठा है कि मेरे मेरे को यहां रोक दिया, वहां रोक

555
00:38:39,040 --> 00:38:43,040
दिया उसके लिए तो फिर सांसारिक दृष्टि से तो उसी का जीवन सबसे ज्यादा मुक्त है।

556
00:38:43,040 --> 00:38:47,200
कितने कुल्ले बता दिए शूद्र को? यह कुल्ले करो, वह कुल्ले करो। हालांकि

557
00:38:47,200 --> 00:38:52,240
करने चाहिए उसके भी बताए हैं। मगर ब्राह्मणों के बहुत बताए। बहुत नियम कायदे कानून।

558
00:38:52,240 --> 00:38:56,240
दिनभर मैं बता तो रहा हूं जो व्यक्ति कह रहा है ना कि मुझे शंकराचार्य

559
00:38:56,240 --> 00:39:00,320
बनाओगे। मुझे शूद्र मुझे ब्राह्मण बनाओगे। वो व्यक्ति पागल हो जाएगा।

560
00:39:00,320 --> 00:39:04,400
उसको एक दो दिन बिता दो तो। हम तो आज तक शुद्ध ब्राह्मण बन नहीं पा रहे हैं।

561
00:39:04,400 --> 00:39:08,640
पूरा दिन संघर्ष में बीतता है। लघु शंका से लेकर के कैसे व्यवस्था

562
00:39:08,640 --> 00:39:12,560
करनी पड़ती है। कैसे भागे भागे फिरते? मॉल में है तो कैसे

563
00:39:12,560 --> 00:39:16,640
व्यवस्था करें लघु शंका की कुल्ला कैसे करें मिट्टी लेके साथ में

564
00:39:16,640 --> 00:39:20,960
चलो हैं हम तो बन नहीं पा रहे हैं

565
00:39:20,960 --> 00:39:24,960
और जिसको स्वतंत्रता मिली हुई है कि भाई तुम परेशान ना हो

566
00:39:24,960 --> 00:39:29,040
जाए जिससे कि विप्लव ना फैले तो तुम तुमको मुक्त करते हैं इन चीजों

567
00:39:29,040 --> 00:39:33,120
से अब ये थोड़ी ना है कि हमने जब एक व्यवस्था के लिए किसी को मुक्त

568
00:39:33,120 --> 00:39:37,280
किया तो वो चला आ रहा है नहीं हम तो साहब यही करेंगे

569
00:39:37,280 --> 00:39:41,440
हमारे अंदर गुण है तो व्यवस्था भंग होगी जिसके पास गुण नहीं होगा वो भी आएगा

570
00:39:41,440 --> 00:39:45,600
उसको भी टेस्ट करो एसी में लग जाओ। टेस्ट करने में लग जाओ कि किसके पास गुण

571
00:39:45,600 --> 00:39:49,600
है कप्तान बनने के। किसके पास गुण है विकेटकीपर बनने के। यह टेस्टिंग

572
00:39:49,600 --> 00:39:53,680
मैदान में शुरू कर दो। पाकिस्तान से मैच वो खेलना बंद कर दो।

573
00:39:53,680 --> 00:39:59,360
यह टेस्टिंग सबकी शुरू कर दो। क्या यह उचित है?

574
00:39:59,360 --> 00:40:03,600
मैदान में उतरने के बाद हमारा धेय यह होना चाहिए कि विकेटकीपर के गुण

575
00:40:03,600 --> 00:40:07,760
चेक करो। उसके गुण चेक करो। यह करो, वह करो। या

576
00:40:07,760 --> 00:40:11,920
धेय होना चाहिए कि हम सामने वाली टीम को हमें हराना है।

577
00:40:11,920 --> 00:40:16,240
हम जी तो उसी प्रकार से प्रपंच रूपी संसार

578
00:40:16,240 --> 00:40:21,120
में आने के बाद हमारा देह है मोक्ष सद्गति

579
00:40:21,120 --> 00:40:25,120
ना कि ये कि हम अपना पद परिवर्तित करवा ले ये नहीं होना

580
00:40:25,120 --> 00:40:27,600
चाहिए मैदान से बाहर का काम तो मैदान से

581
00:40:27,600 --> 00:40:32,160
बाहर का काम क्या है कि भगवान सजन करते हैं

582
00:40:32,160 --> 00:40:36,240
चातुर चातुर्वर्ण मया सष्टम मैंने सृष्टि

583
00:40:36,240 --> 00:40:40,320
वो करके भेजते हैं मैदान में उतारते हैं कि तुम कप्तान हो तुम विकेट कीपर

584
00:40:40,320 --> 00:40:44,640
हो तुम ये सिंगल पॉइंट एजेंडा है कि मैच को जीतना है।

585
00:40:44,640 --> 00:40:49,520
व्यवस्था करके व्यवस्था करके नहीं भेजेंगे तो विप्लव होगा मैदान में। हां

586
00:40:49,520 --> 00:40:53,600
जी ये वाली बात। ठीक है। बहुत लंबा लंबा

587
00:40:53,600 --> 00:40:57,920
हो गया है। बताइए और किसी का हो तो अच्छा

588
00:40:57,920 --> 00:41:02,080
ये मैं एक बात कह रहा हूं। यहां पे जो लोग भी आ रहे हैं।

589
00:41:02,080 --> 00:41:06,480
देखिए कई जो टॉपिक होते हैं रिपीट होते हैं। आप लोग

590
00:41:06,480 --> 00:41:10,720
यह सब चीज़ें वहां पर देखिए। आप जैसे वर्णाश्रम का आपके पास सवाल था।

591
00:41:10,720 --> 00:41:15,120
वैसे तो गुरुदेव ने बहुत अच्छे-अच्छे व्याख्यान भी किए हैं। उसके बाद गुरुदेव के व्याख्यानों

592
00:41:15,120 --> 00:41:19,360
को देखने के बाद हमारी कई लोगों से चर्चाएं हैं। वो देखिए

593
00:41:19,360 --> 00:41:23,600
और वर्णाश्रम पर पहले भी बहुत सारे वीडियोस बन चुके हैं। तो वो देखिए। एक एक

594
00:41:23,600 --> 00:41:27,600
व्यक्ति वही रिपीटेड सवाल करेगा। अनावश्यक जो है व्यर्थ

595
00:41:27,600 --> 00:41:31,760
समय होता है। ठीक है मुकुल जी? तो आप लोग कोशिश करिए कि जो

596
00:41:31,760 --> 00:41:35,920
सवाल आप ले आ रहे हैं अगर उसका उत्तर पहले ही दिया जा चुका हो तो उसको भी देखते

597
00:41:35,920 --> 00:41:40,640
रहिए वीडियो इत्यादि। जी

598
00:41:40,640 --> 00:41:44,800
जय श्री राम भैया जी जय श्री प्रणाम

599
00:41:44,800 --> 00:41:48,400
अभी कितने लोगों का बाकी है

600
00:41:48,400 --> 00:41:52,720
बस भैया लास्ट है लास्ट है ठीक है ठीक है बताइए

601
00:41:52,720 --> 00:41:57,040
मुझे ये समझने में थोड़ी परेशानी होती है कि सच्चिदानंद की चाल

602
00:41:57,040 --> 00:42:01,040
सब में है इसे ये कैसे पता लगता है कि सच्चिदानंद सच में

603
00:42:01,040 --> 00:42:05,840
है

604
00:42:05,840 --> 00:42:10,080
इससे ये कैसे पता लगता है जैसे जैसे भूख से पता लगता है कि दुनिया में भोजन है। जैसे

605
00:42:10,080 --> 00:42:14,400
प्यास से पता लगता है कि दुनिया में पानी है। होना

606
00:42:14,400 --> 00:42:18,480
सिद्ध है। अब कोई व्यक्ति अगर फिर भी इंकार करे तो उससे यह

607
00:42:18,480 --> 00:42:22,720
कहना पड़ेगा कि तो तुम मारना छोड़ दो जब वो नहीं है तो ऐसी चीज की आकांक्षा

608
00:42:22,720 --> 00:42:26,720
आप क्यों कर रहे हो जो है ही नहीं। भाई जो चीज है ही

609
00:42:26,720 --> 00:42:31,200
नहीं उसकी आकांक्षा यदि करोगे तो खुद को पागल घोषित कर दो।

610
00:42:31,200 --> 00:42:35,440
मैं अगर आकांक्षा करने लगूं अभी उड़ने

611
00:42:35,440 --> 00:42:39,440
वाला हाथी चाहिए मुझे तो लोग पागल घोषित करेंगे ना

612
00:42:39,440 --> 00:42:43,440
मुझे पागल घोषित कर लो स्वयं को अगर आप मानते हो कि

613
00:42:43,440 --> 00:42:47,440
सच्चिदानंद नहीं है तो क्योंकि आप ढूंढ तो वही रहे हो हां

614
00:42:47,440 --> 00:42:51,600
या तो आप ये सिद्ध कर दो कि सच्चिदानंद है ही नहीं कि आपके

615
00:42:51,600 --> 00:42:56,720
अंदर सच्चिदानंद की चाहत ही नहीं है तो वो फिर हम सिद्ध करेंगे कि है

616
00:42:56,720 --> 00:42:59,360
ठीक है ना

617
00:42:59,360 --> 00:43:04,960
अब भैया भैया बस एक चीज बस थोड़ी सी पूछनी थी हो गया

618
00:43:04,960 --> 00:43:09,120
हां समझ गया भैया ज्यादा समय नहीं दूंगा बस एक एक

619
00:43:09,120 --> 00:43:13,440
मिनट जैसे ये पूछना था जैसे आपने कहा सब समझ में आ गया वस्ता

620
00:43:13,440 --> 00:43:17,440
के ऊपर लेकिन एक डाउट आता है कि जो राजा हरिश्चंद्र के टाइम की

621
00:43:17,440 --> 00:43:21,600
बात थी उसमें जब वो काशी के घाट पर अपने आप को बेच रहे थे

622
00:43:21,600 --> 00:43:25,600
तो उनकी जब अपनी पत्नी पर वो बोली लगा रहे थे तो उनको एक ब्राह्मण ने खरीदा

623
00:43:25,600 --> 00:43:29,600
था। ठीक है? तो ब्राह्मण कैसे खरीद सकता है? जब उसके पास पेट अपने

624
00:43:29,600 --> 00:43:34,240
पेट भरने की पत्नी के दिए पैसे तो किसको पत्नी को उनकी

625
00:43:34,240 --> 00:43:38,640
जी जी जी राजा ब्राह्मण ने अगर खरीद लिया

626
00:43:38,640 --> 00:43:42,720
ब्राह्मण का नियम क्या है कि आप अपनी जरूरत से ज्यादा धन संचय नहीं कर सकते

627
00:43:42,720 --> 00:43:46,880
अगर किसी ने कर रखा है तो वो गलत कर रखा है पहली बात तो ब्राह्मण

628
00:43:46,880 --> 00:43:51,120
किसी स्त्री को खरीद ही रहा है वहीं पर वो गलत हो गया ब्राह्मण को क्या जरूरत किसी स्त्री

629
00:43:51,120 --> 00:43:55,280
को खरीदने की भाई अगर कोई नियम है

630
00:43:55,280 --> 00:43:59,440
और कोई उसको तोड़ करके कर रहा है तो आदर्श थोड़ी है वो ब्राह्मण लिखा

631
00:43:59,440 --> 00:44:03,440
था क्या रामो विग्रह धर्म वो वाला हरिश्चंद्र के युग

632
00:44:03,440 --> 00:44:07,520
वाला जो ब्राह्मण जो था वह विग्रहवान धर्म था नहीं लिखा ना राम

633
00:44:07,520 --> 00:44:11,680
विग्रहवान धर्म लिखा है तो किसी व्यक्ति ने कुछ

634
00:44:11,680 --> 00:44:12,400
अनियमित

635
00:44:12,400 --> 00:44:16,560
तरीके से नियम को तोड़ते हुए कुछ अगर कर भी दिया तो उसको हम थोड़ी ना

636
00:44:16,560 --> 00:44:21,360
अपना सिद्धांत मानेंगे सिद्धांत वो है जो

637
00:44:21,360 --> 00:44:25,440
शास्त्रों द्वारा स्वीकार किया गया संबंध में वचन है भीष्म पिता मां का युधिष्ठिर

638
00:44:25,440 --> 00:44:29,440
के लिए क्या वचन है कि पूर्व में किसी के कर देने से

639
00:44:29,440 --> 00:44:33,520
वह धर्म नहीं होता है। घटनाओं का घटित होना

640
00:44:33,520 --> 00:44:37,680
धर्म नहीं होता है। उन्हें शास्त्रों द्वारा धर्मोचित रूप में स्वीकार

641
00:44:37,680 --> 00:44:41,760
किया जाना धर्म होता है। ठीक है? करने को तो

642
00:44:41,760 --> 00:44:46,240
रावण ने भी सीता माता का धारण कर दिया था ब्राह्मण होते हुए। फिर उसको

643
00:44:46,240 --> 00:44:50,640
मान ले कि यह धर्म है हमारे यहां का। रावण के कृत्यों

644
00:44:50,640 --> 00:44:55,440
को स्वीकार थोड़ी ना किया गया शास्त्रों द्वारा। अधर्म कहा गया।

645
00:44:55,440 --> 00:44:59,520
तो अगर किसी ने कहीं कुछ किया तो वह हमारा सिद्धांत कैसे

646
00:44:59,520 --> 00:45:03,760
हो जाएगा? सिद्धांत तब होगा जब उसको सिद्धांत कहा जाए। या

647
00:45:03,760 --> 00:45:07,920
तो उसे आप पुरुष कहा जाए, मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाए तब उसको अनुकरणीय

648
00:45:07,920 --> 00:45:12,080
है। और या फिर उस सिद्धांत को सिद्धांत के रूप में बता दिया

649
00:45:12,080 --> 00:45:16,320
जाए। कहीं मनुस्मृति इत्यादि जैसे ग्रंथों में। ठीक है? बाकी भैया

650
00:45:16,320 --> 00:45:20,320
हो सकता है ऐसा भी पॉसिबल है कि किसी मर्यादा की रक्षा की

651
00:45:20,320 --> 00:45:24,800
दृष्टि से कि खरीदा हो या तो वो देखना पड़ेगा। देखना पड़ेगा और

652
00:45:24,800 --> 00:45:27,440
इसमें एक बात और भी है। इसमें एक बात और

653
00:45:27,440 --> 00:45:31,440
भी है कि ब्राह्मण का यह

654
00:45:31,440 --> 00:45:35,600
प्रयास होना चाहिए कि उसके पास धन संचय नहीं हो। मगर

655
00:45:35,600 --> 00:45:39,680
जो क्या कहते हैं जो हमारे राजा

656
00:45:39,680 --> 00:45:45,120
हैं, क्षत्रिय हैं, वैश्य उनका ये कर्तव्य होता है ब्राह्मण का ध्यान रखें।

657
00:45:45,120 --> 00:45:49,760
दान दें। उनको इतना भरा पूरा रखें कि वो अपना जो नियमा

658
00:45:49,760 --> 00:45:53,760
जीवन है वो सुगमता से निकाल पाए। तो

659
00:45:53,760 --> 00:45:58,080
तो ऐसा भी तो उसमें पॉसिबल है कि यदि उन्हें दान दिया गया जरूरत

660
00:45:58,080 --> 00:46:02,160
से ज्यादा धन संचय तो उन्होंने किसी स्त्री के जीवन को बचाने के लिए किसी

661
00:46:02,160 --> 00:46:06,800
से किसी कष्ट से निकालने के लिए उन्होंने अपना वो जो

662
00:46:06,800 --> 00:46:10,960
एक्स्ट्रा धन आया था जरूरत से ज्यादा वो खर्च कर दिया लो तो

663
00:46:10,960 --> 00:46:15,840
बहुत सारी चीजें है ना पॉसिबिलिटीज

664
00:46:15,840 --> 00:46:19,840
जी भैया बहुत-बहुत धन्यवाद ठीक है ना मैंने इस विषय

665
00:46:19,840 --> 00:46:24,560
में एक बात कही है जब भी कोई आपको कभी भी

666
00:46:24,560 --> 00:46:28,800
दोष युक्त दिखाई दे। ठीक है? जब

667
00:46:28,800 --> 00:46:32,800
भी आपको कभी कोई दोष युक्त दिखाई दे तो सबसे पहले

668
00:46:32,800 --> 00:46:36,880
उसके अधिवक्ता बन जाइए।

669
00:46:36,880 --> 00:46:40,800
और वह हर आखिरी कोशिश करिए

670
00:46:40,800 --> 00:46:45,280
जिसके द्वारा आप अपने क्लाइंट को एक कोर्ट में बचाने के लिए दलीलें

671
00:46:45,280 --> 00:46:49,440
पेश कर सकते हैं। आर्गुममेंट रख सकते हैं। और जब एक भी आर्गुममेंट आपको

672
00:46:49,440 --> 00:46:53,680
दिखाई ना दे तब मानिए कि वह दोषी है। भले ही वह आपका मित्र

673
00:46:53,680 --> 00:46:57,840
हो या शत्रु। शत्रु भी यदि दोष युक्त दिख रहा

674
00:46:57,840 --> 00:47:01,840
है तो उसके दोष को दोष मानने से पहले एक वकील की

675
00:47:01,840 --> 00:47:05,920
तरह सोचिए कि वो कटघरे में खड़ा हुआ एक अपराधी है और आपको उसे

676
00:47:05,920 --> 00:47:09,920
बचाना है अंतिम सांस से पहले। और जब कोई

677
00:47:09,920 --> 00:47:13,920
रास्ता ना मिले तब मानिए कि शत्रु ने वो दोष किया है जिस दोष को आप उसमें

678
00:47:13,920 --> 00:47:18,800
देख रहे हैं। ठीक है? तो ऐसे ही

679
00:47:18,800 --> 00:47:24,240
उस ब्राह्मण के विषय में भी आप सोच सकते हैं। कई सारी चीजें पॉसिबिलिटीज

680
00:47:24,240 --> 00:47:29,360
सत्य सनातन जी आप भी पूछ के रहेंगे।

681
00:47:29,360 --> 00:47:33,520
जी भैया थोड़ा सा एक ही प्रश्न है। बताइए पूछ लीजिए

682
00:47:33,520 --> 00:47:39,520
पूछ लीजिए। जी भैया जय श्री राम भैया।

683
00:47:39,760 --> 00:47:43,840
भैया एक प्रश्न था ये कि शास्त्रों में लिखा है कि भगवान परशुराम

684
00:47:43,840 --> 00:47:48,160
ने जो है 21 बार क्षत्रियों का संहार कर दिया था।

685
00:47:48,160 --> 00:47:52,720
ठीक है। और फिर महाभारत में और भी जगह इसका

686
00:47:52,720 --> 00:47:58,480
है प्रसंग है कि ब्राह्मणों के द्वारा नियोग के द्वारा जो भी है

687
00:47:58,480 --> 00:48:02,560
थी। ठीक है तो यहां पे प्रश्न ये उठता

688
00:48:02,560 --> 00:48:06,640
है कि क्या परशुराम जी ने पूरा का पूरा

689
00:48:06,640 --> 00:48:11,760
वो खत्म कर दिया था? नहीं नहीं नहीं ऐसा नहीं है।

690
00:48:11,760 --> 00:48:16,480
पूरे के पूरे क्षत्रियों का नाश नहीं हुआ था। जो

691
00:48:16,480 --> 00:48:20,560
क्या कहते हैं अत्याचार इत्यादि अन्याय से जुड़े हुए जो थे उनका नाश

692
00:48:20,560 --> 00:48:24,640
हुआ था मगर काफी संख्या में हुआ था तो इसलिए उसको कहा जाता है

693
00:48:24,640 --> 00:48:28,640
ऐसा नहीं ऐसा नहीं क्योंकि इसमें प्रश्न ये आ गया था कि भगवान श्री

694
00:48:28,640 --> 00:48:32,640
राम का जो वंशावली है वो तो चलता आया उससे पहले ही वो आए थे ना

695
00:48:32,640 --> 00:48:36,960
हां तो ऐसा नहीं मान सकते ना जी और कृष्ण भगवान का भी चंद्रवंश

696
00:48:36,960 --> 00:48:40,960
ऐसे ही चलता आया तो उसमें भी ऐसा कुछ नहीं है और जब वो राम जी से मिले भी तब

697
00:48:40,960 --> 00:48:44,400
भी उन्होंने वो कहां कि हमने तो क्षत्रियों का नाश कर दिया था तुम

698
00:48:44,400 --> 00:48:48,400
बच कैसे गए?

699
00:48:48,400 --> 00:48:52,560
राम जी ने कहा तो था कि तुमको सही कोई मिला नहीं है अभी तक।

700
00:48:52,560 --> 00:48:56,640
अब बहुत हो गया बस ब्राह्मण हो इसलिए हम जो है वो कर रहे हैं। बहुत बढ़िया

701
00:48:56,640 --> 00:49:01,200
कन्वर्सेशन है वो। घूसभ उन्होंने

702
00:49:01,200 --> 00:49:05,840
उन्होंने सेना इकट्ठा करके क्षत्रियों का नाश किया था या फिर अकेले किया था?

703
00:49:05,840 --> 00:49:10,160
ये तो वस्तुनिष्ठ जानकारियां देखनी पड़ेगी। अकेले

704
00:49:10,160 --> 00:49:14,160
किया था भैया। अकेले किया था। अकेले किया था। और वहां

705
00:49:14,160 --> 00:49:18,320
पर परशुराम जी लक्ष्मण जी को पराजित कर देते हैं। हां हो सकता

706
00:49:18,320 --> 00:49:21,680
है।

707
00:49:21,680 --> 00:49:25,680
मगर मगर जो भी है मगर एक बात है कि आप ये

708
00:49:25,680 --> 00:49:30,000
वाली कन्वर्सेशन जब पढ़ेंगे तो आपको लगेगा कि हमें और ज्यादा इधर उधर दुनियादारी

709
00:49:30,000 --> 00:49:34,080
में फिल्में फिल्में देखने जाने की आवश्यकता नहीं है। ये दो

710
00:49:34,080 --> 00:49:38,080
महावीर जब आपस में टकरा रहे हैं आमनेसामने उस समय उनके डायलॉग बाजी

711
00:49:38,080 --> 00:49:42,800
देखो आप घूस बम्स आएंगे आपको। कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है।

712
00:49:42,800 --> 00:49:47,200
मानस में पढ़ लीजिए उसमें भी बहुत बढ़िया लगता है। परशुराम जी जब आते हैं तब

713
00:49:47,200 --> 00:49:51,200
पहले तो वो लोग जो राजा दशरथ जी हैं और और क्या

714
00:49:51,200 --> 00:49:55,360
कहते म्यूजिक भी बहुत डेंजरस टाइप की है उनकी जो एंट्री वाली है हां राजा

715
00:49:55,360 --> 00:49:59,680
दशरथ जी हैं जो पहले तो वो वैसे करते हैं कि मनाने की कोशिश परशुराम

716
00:49:59,680 --> 00:50:04,240
जी को परशुराम जी ललकार रहे होते फिर राम जी कहते हैं ऐसा है बहुत हो चुका

717
00:50:04,240 --> 00:50:08,560
ब्राह्मण हूं इसलिए सुन रहा हूं इतनी देर से और फिर तुरंत जब वो आवाहन

718
00:50:08,560 --> 00:50:13,120
करते हैं तो बस वो

719
00:50:13,120 --> 00:50:17,120
बहुत रामायण में कई ऐसे ऐसे प्रसंग है वाल्मीकि रामायण में बहुत से ऐसे प्रसंग है

720
00:50:17,120 --> 00:50:21,840
जहां आपको गुज वम्स आएंगे। एक वह भी बहुत अच्छा प्रसंग है जब

721
00:50:21,840 --> 00:50:27,120
मार्मिक भी है वह कि

722
00:50:27,120 --> 00:50:32,720
क्या कहते हैं जब श्री राम को पता चलता है कि उनके पिता

723
00:50:32,720 --> 00:50:37,120
जो है शरीर को त्याग चुके हैं तब बहुत मार्मिक

724
00:50:37,120 --> 00:50:41,280
दृश्य भी है और वहीं पर प्रेरणादायक भी है। जब श्री राम जी कहते

725
00:50:41,280 --> 00:50:45,440
हैं प्रतिज्ञा करते हैं कि अब मैं वही बनकर दिखाऊंगा जो मेरे पिता

726
00:50:45,440 --> 00:50:49,520
मुझे बनाना चाहते थे। मैं वही राम बनूंगा। वह भी बहुत

727
00:50:49,520 --> 00:50:54,320
मार्मिक दृश्य है। आप पढ़ो उसको। है ना?

728
00:50:54,320 --> 00:50:58,480
ठीक है। सभी के प्रश्न हो गए। बहुत-बहुत आभार सबको

729
00:50:58,480 --> 00:51:02,800
समय देने के लिए। इसी इसी कारण से थोड़ा सा सत्संग

730
00:51:02,800 --> 00:51:07,040
हो जाता है आप लोगों के साथ मेरा भी। हम तो

731
00:51:07,040 --> 00:51:11,360
भैया ये जो रामायण सब है वो कितने मतलब कौन-कौन सी रामायण

732
00:51:11,360 --> 00:51:15,360
जो है वो प्रामाणिक है एकदम जो जिस पर पूरा विश्वास होना चाहिए।

733
00:51:15,360 --> 00:51:19,680
क्योंकि कई लोग बोलते हैं सर वाल्मीकि रामायण प्रमाणिक है।

734
00:51:19,680 --> 00:51:23,760
रामायण के विरुद्ध यदि सैद्धांतिक रूप से कोई जा रही है रामायण

735
00:51:23,760 --> 00:51:27,760
तो वो अप्रामाणिक है। सैद्धांतिक जैसे राम जी सत्य

736
00:51:27,760 --> 00:51:32,000
का रामायण अप्रामाणिक है। इस राम राम

737
00:51:32,000 --> 00:51:36,000
जी जो है वो सत्य रामचरितमानस भी प्रमाणिक है। पूर्ण रूप से वो

738
00:51:36,000 --> 00:51:40,560
भी बहुत अच्छी लिखी गई है। बाकी उसमें वो स्पष्ट भी है कि

739
00:51:40,560 --> 00:51:44,640
अपनी बात पूरी कर श्री राम जी सत्य प्रतिज्ञ है।

740
00:51:44,640 --> 00:51:48,640
अब मान लो कहीं पर वो जो है छलिया कृष्ण के जैसे बना दिए गए

741
00:51:48,640 --> 00:51:52,320
है ना भगवान श्री कृष्ण जैसा उनका रूप दिखाया जा रहा है तो वो

742
00:51:52,320 --> 00:51:56,480
जो है उसको आपको अह

743
00:51:56,480 --> 00:52:00,480
उसमें नहीं लेना है कि ये प्रामाणिक है जहां पर सैद्धांतिक विरोध हो

744
00:52:00,480 --> 00:52:05,200
देखो जो घटनाओं का वो है ना तो कल्प वेद से घटनाएं

745
00:52:05,200 --> 00:52:09,360
अलग-अलग कहीं-कहीं पर आपको मिल सकती हैं। है ना?

746
00:52:09,360 --> 00:52:13,360
परंतु जहां पर सिद्धांत का विरोध हो कि राम

747
00:52:13,360 --> 00:52:17,520
जी सत्य प्रति राम जी मर्यादा पुरुषोत्तम और मर्यादा पुरुषोत्तम या एक पत्नी

748
00:52:17,520 --> 00:52:21,520
व्रत धारी इत्यादि ऐसे सिद्धांत खंडित हो रहे हैं। राम जी का स्वरूप ही

749
00:52:21,520 --> 00:52:25,920
चेंज हो रहा है। जहां पर आप राम को रामू विग्रहवान धर्म नहीं कह पाओ।

750
00:52:25,920 --> 00:52:30,240
ईश्वर का स्वरूप तो है परंतु वो राम रामो विग्रहान धर्मा वाली लाइन

751
00:52:30,240 --> 00:52:34,880
जब ना आ पाए तो उस चीज में उसको त्याग देना चाहिए।

752
00:52:34,880 --> 00:52:39,200
ठीक है? अब जैसे काक भुसुंडी रामायण के ऊपर अपने हमारे कालिया

753
00:52:39,200 --> 00:52:43,440
जिन वाले चलते हैं तो काक भसुंडी रामायण में कहा कि शबरी

754
00:52:43,440 --> 00:52:48,000
के भेर झूठे खा लिए जबकि क्षत्रिय के अनुसार उसको नहीं खाना चाहिए था उनको

755
00:52:48,000 --> 00:52:52,080
ठीक है तो यानी कि वहां पर उन्होंने अपनी मर्यादा को तोड़ दिया काक भसुंडी

756
00:52:52,080 --> 00:52:56,160
रामायण के अनुसार तो वहां पर हमें यह मानना पड़ेगा क्योंकि हमारे गर्भ में

757
00:52:56,160 --> 00:53:00,640
क्या है वाल्मीकि रामायण तो काक भसुंडी रामायण का सम्मान रखते हुए

758
00:53:00,640 --> 00:53:05,280
उसके उन वचनों का ऐसा अर्थ हमें निकालना पड़ेगा कि

759
00:53:05,280 --> 00:53:07,360
जो भगवान राम का जो

760
00:53:07,360 --> 00:53:11,600
मर्यादा पुरुषोत्तम वाला व्यक्तित्व है वो खंडित ना हो तो क्या करें कि

761
00:53:11,600 --> 00:53:15,760
उनके जो भक्ति रूपी बेर थी है ना फल

762
00:53:15,760 --> 00:53:19,920
जो भक्ति के रूप में वो निवेदित निवेदित करना चाहती थी वो उन्होंने स्वीकार

763
00:53:19,920 --> 00:53:24,240
कर लिए श्री राम ने बस हो गया

764
00:53:24,240 --> 00:53:28,240
ठीक है जी भैया तो इसमें मतलब कि वो जो झूठे

765
00:53:28,240 --> 00:53:32,480
बैर वाले प्रसंग वो बात अलग है कि वो भक्ति भाव वाला ही केंद्रित उसमें है अधिकतर

766
00:53:32,480 --> 00:53:36,480
हां भाव वो अपने भाव जो उनको को निवेदित करना चाहती थी कि भाई

767
00:53:36,480 --> 00:53:40,800
एक ही भूत हो जाने का भाव होता है ना अंशीभूत जी भगवान

768
00:53:40,800 --> 00:53:44,880
के साथ तो वो जो भाव था वो निवेदित करना चाहती थी जिसे झूठा भी कहा

769
00:53:44,880 --> 00:53:49,120
गया और उस उस भाव को उन्होंने ग्रहण किया है ना

770
00:53:49,120 --> 00:53:53,200
भक्तों की इच्छा पूर्ति करनी है तो अगर वो झूठा बेर खा भी लेंगे तो फिर

771
00:53:53,200 --> 00:53:57,280
वो मर्यादा भंग मतलब कैसे हो सकता है क्योंकि भक्त है ना

772
00:53:57,280 --> 00:54:01,360
वो और भगवान का एक दायित्व होता है कि भक्त जिस भाव से मुझे ध्याए मैं उसे

773
00:54:01,360 --> 00:54:05,520
ग्रहण कर लेता हूं वो लीला स्वरूप नहीं है ना उसमें

774
00:54:05,520 --> 00:54:09,600
उन्होंने भगवान होने से पहले जो मनुष्य

775
00:54:09,600 --> 00:54:14,320
होने का जो रूप है उसे प्राथमिकता से निभाया है। भगवान ने

776
00:54:14,320 --> 00:54:18,400
राम जो स्वरूप है भगवान का वो क्या कहते हैं?

777
00:54:18,400 --> 00:54:22,640
मनुष्य के जो कर्तव्य कर्म होते हैं उसके अनुरूप उन्होंने प्राथमिकता से निभाया

778
00:54:22,640 --> 00:54:26,640
है। ठीक है? उसमें जो ईश्वर

779
00:54:26,640 --> 00:54:30,960
ईश्वरता प्रधान नहीं है उस रूप में उस रूप में मर्यादा मनुष्यता

780
00:54:30,960 --> 00:54:35,280
प्रधान रूप है कि मनुष्य का जीवन वो कैसे जीना है तो उसका अनुकरण

781
00:54:35,280 --> 00:54:39,600
करिए ठीक है और भगवान जो स्वीकार करते हैं पारमार्थिक

782
00:54:39,600 --> 00:54:43,600
रूप से तो स्वीकार करते ही है उसको व्यवहारिक से स्वीकार करना करना जरूरी

783
00:54:43,600 --> 00:54:48,000
है क्या भाई आदि दैविक तरीके से तो स्वीकार करते ही है

784
00:54:48,000 --> 00:54:52,000
भक्त ने झूठा दिया गायब हो गया वहां से लो उसको खाना ही

785
00:54:52,000 --> 00:54:56,720
जरूरी है खा के दिखाना ही जरूरी निवेदित हो गया हो गया गायब

786
00:54:56,720 --> 00:55:00,960
मान लो किसी भक्त ने प्रसाद दिया झूठा दिया ठीक

787
00:55:00,960 --> 00:55:05,040
अब जो है उसको जो है वो वहां से प्रसाद गायब हो गया

788
00:55:05,040 --> 00:55:09,040
तो ये मान लिया गया कि भैया भगवान ने स्वीकार कर लिया अब दूसरी एक बात मैं आपको

789
00:55:09,040 --> 00:55:13,360
कह रहा हूं कि भगवान जो अपनी भक्ति के भाव से प्रस्तुत करे उसको ग्रहण

790
00:55:13,360 --> 00:55:19,360
कर लेना चाहिए तो क्या सूअर का मांस भी ग्रहण कर ले

791
00:55:19,680 --> 00:55:23,840
हां जी ऐसा तो मतलब कोई

792
00:55:23,840 --> 00:55:27,840
कैसे करेगा? नहीं ये बात गलत है। फिर जो

793
00:55:27,840 --> 00:55:32,320
तेरे लिए कर्तव्य और अकर्तव्य के विषय में शास्त्र प्रमाण इसीलिए

794
00:55:32,320 --> 00:55:36,880
ऐसा तो कोई क्यों नहीं करेगा? जो बंगाल में मांस नहीं चढ़ा रहे हैं।

795
00:55:36,880 --> 00:55:40,960
लड्डू गोपाल को मांस चढ़ा रहे हैं तो फिर चढ़ाने देना चाहिए उस हिसाब से

796
00:55:40,960 --> 00:55:44,960
क्योंकि भक्ति में है भाई। नहीं तो वह शास्त्र विरुद्ध हो जाएगा तो

797
00:55:44,960 --> 00:55:49,120
फिर वो नियम भी विरुद्ध झूठे बेर भी हैं। शास्त्र

798
00:55:49,120 --> 00:55:53,280
विरुद्ध झूठे वेर भी हैं। क्षत्रिय को दिए जा रहे हैं। शास्त्र

799
00:55:53,280 --> 00:55:57,520
विरुद्ध झूठे हैं। ठीक है? अच्छा विरुद्ध जी

800
00:55:57,520 --> 00:56:01,680
इसमें थोड़ा मतलब वही डाउट था। ये भी

801
00:56:01,680 --> 00:56:05,760
को प्रधानता देनी पड़ेगी और जो वो वाली बात है कि अगर

802
00:56:05,760 --> 00:56:09,840
कोई कुछ भी मेरे ऊपर को चढ़ाता है तो भगवान ने वहां बताया तो है कि क्या-क्या चढ़ाता

803
00:56:09,840 --> 00:56:13,840
है। ये थोड़ी ना कुछ भी चढ़ाने लोगे। भगवान तो भाव के भूखे हम रोज रोज

804
00:56:13,840 --> 00:56:17,840
यही सिखा रहे हैं सबको कि भैया भगवान तो भाव के भूखे के

805
00:56:17,840 --> 00:56:21,840
नाम पर जो है उनके ही सिद्धांतों का आप खंडन मत करो फिर हम लोग यह कह

806
00:56:21,840 --> 00:56:26,560
दे कि कुछ भी खा लो कुछ भी निवेदित कर दो तो

807
00:56:26,560 --> 00:56:30,960
पारमार्थिक दृष्टि से भगवान ग्रहण करते हैं। आपके जो शुद्ध भाव होते हैं

808
00:56:30,960 --> 00:56:35,120
अशुद्ध भावों को ग्रहण नहीं करते हैं। जो आपके समर्पित समर्पण

809
00:56:35,120 --> 00:56:39,440
शरणागति वाले भाव होते हैं उनको वो एक्सेप्ट करते हैं। पारमार्थिक

810
00:56:39,440 --> 00:56:43,440
और आदि दैविक दृष्टि से हर तरह से करते हैं। मगर फिर उसमें यह आवश्यक

811
00:56:43,440 --> 00:56:47,840
नहीं है कि श्री राम के रूप में ही आ करके वह ऐसा कोई काम कर ले

812
00:56:47,840 --> 00:56:52,080
कि वो जो है जो उनका मर्यादा पुरुषोत्तम वाला जो रूप था वो

813
00:56:52,080 --> 00:56:56,720
जो है खंडित हो जाए। अच्छा दूसरी बात अगर वो कर लेंगे तो हम उन्हें राम नहीं मानेंगे।

814
00:56:56,720 --> 00:57:00,880
बताया ना आपको अब वैष्णो देवी आई। सुपनखा आई

815
00:57:00,880 --> 00:57:05,120
मुझे स्वीकार कर लो। अगर राम के रूप में उन्होंने

816
00:57:05,120 --> 00:57:11,120
कर लिया तो वो कृष्ण हो जाएंगे। उनको हम राम थोड़ी ना कहेंगे। कहेंगे क्या?

817
00:57:12,000 --> 00:57:16,080
क्योंकि शास्त्र के अलग यह प्रसंग हो जाएगा इसलिए नहीं कहे।

818
00:57:16,080 --> 00:57:20,320
शास्त्र के अनुसार राम कौन है? एक पत्नी व्रतधारी तो

819
00:57:20,320 --> 00:57:24,320
यदि वो अन्य स्त्रियों को ग्रहण स्वीकार कर लेंगे अनेक रूप

820
00:57:24,320 --> 00:57:28,560
बना के विवाह कर लेंगे। जैसे भगवान ने किया 16,000 है ना?

821
00:57:28,560 --> 00:57:32,560
तो वो फिर राम उनको राम नहीं कहा जाएगा। उनको कृष्ण कहा

822
00:57:32,560 --> 00:57:37,840
जाएगा। कृष्ण आए थे सतयुग में। राम के रूप में उन्होंने विवाह कर लिया। लो

823
00:57:37,840 --> 00:57:43,200
चलिए ठीक है नारायण हां जी

824
00:57:43,200 --> 00:57:47,280
यदि अगले कल्प में या किसी और अन्य कल्प में अगर भगवान इस प्रकार की

825
00:57:47,280 --> 00:57:51,680
लीला करे राम जी स्वयं आए और अगर इस प्रकार की लीला करें तो

826
00:57:51,680 --> 00:57:56,000
और उस कल्प के जो रामायण होगा वो भी ऐसा ही प्रसंग उसमें लिखा होता

827
00:57:56,000 --> 00:58:00,000
वो तो भगवान जो वा जो राम जो

828
00:58:00,000 --> 00:58:04,080
राम का चरित्र है वो धर्म भी है

829
00:58:04,080 --> 00:58:08,160
और ब्रह्म भी है तो इसलिए इसलिए उसमें धर्म को नहीं कहा धर्म को

830
00:58:08,160 --> 00:58:12,160
नहीं किया जा सकता। ब्रह्म तो लीलाएं कर रहे हैं। कर सकते हैं कृष्ण के रूप में।

831
00:58:12,160 --> 00:58:16,240
अगर कोई ऐसा कल्प आप बताएंगे कि उसमें जो है वह राम के विरुद्ध जा रहे हैं,

832
00:58:16,240 --> 00:58:20,400
वाल्मीकि रामायण के विरुद्ध जा रहे हैं तो उस कल्प की उस रामायण को या

833
00:58:20,400 --> 00:58:24,480
तो नहीं लिया जाएगा कि भैया ये प्रामाणिक बात नहीं है श्री राम के विषय में और या

834
00:58:24,480 --> 00:58:27,440
फिर यह माना जाएगा कि यह जो है राम नहीं है ये भगवान

835
00:58:27,440 --> 00:58:31,600
ने लीला की है। कृष्ण के रूप कृष्ण भगवान ने किया है या अमुक ने किया

836
00:58:31,600 --> 00:58:35,440
है। ठीक है

837
00:58:35,440 --> 00:58:39,520
जी भैया बहुत अच्छे से मेरा डाउट भी क्लियर हो गया आपका बताने

838
00:58:39,520 --> 00:58:45,520
से नारायण समारंभ शंकराचार्य मध्यमादाचार्य

839
00:58:46,720 --> 00:58:49,040
वंदे

840
00:58:49,040 --> 00:58:53,040
सभी को जय श्री राम जय श्री
