1
00:00:00,480 --> 00:00:04,560
आप जो वीडियो अभी देखने जा रहे हैं इन वीडियोस में आहान के द्वारा आयोजित की जाने

2
00:00:04,560 --> 00:00:08,800
वाली जो ऑनलाइन मीटिंग्स हैं उसमें आने वाले लर्नर्स के भाव

3
00:00:08,800 --> 00:00:12,800
भी व्यक्त किए गए हैं। तो

4
00:00:12,800 --> 00:00:17,040
इन वीडियोस को स्वाविवेक के द्वारा ही देखें। कही

5
00:00:17,040 --> 00:00:21,040
जाने वाली किसी भी बात को आह्वान के द्वारा निर्गत बात समझकर ही

6
00:00:21,040 --> 00:00:25,040
ना देखें। यह देखें कि उस मीटिंग में वह बात किसके द्वारा कही जा

7
00:00:25,040 --> 00:00:29,040
रही है। क्या मेरे द्वारा कही जा रही है या फिर वहां मीटिंग से जुड़ने वाले

8
00:00:29,040 --> 00:00:33,200
किसी ऐसे व्यक्ति के द्वारा कही जा रही है जो अभी केवल लर्नर है जो अभी-अभी जुड़ा

9
00:00:33,200 --> 00:00:37,280
है या फिर जिसे अभी सार्वभौम सिद्धांतों में जिसकी

10
00:00:37,280 --> 00:00:41,360
बहुत ज्यादा गति नहीं है। तो इन वीडियोस को आप प्रेरणा

11
00:00:41,360 --> 00:00:45,360
के लिए अवश्य देखें। परंतु कही जाने वाली सभी बातों को प्रमाण्य बुद्धि

12
00:00:45,360 --> 00:00:49,440
से ना देखें। उसमें देखें कि कौन सी बात आवाहान के द्वारा कही जा

13
00:00:49,440 --> 00:00:53,680
रही है और कौन सी बात वहां पर जुड़ने वाले किसी सामान्य व्यक्ति के द्वारा कही

14
00:00:53,680 --> 00:00:57,680
जा रही है। इन वीडियोस में सामान्य चर्चाएं हैं जिनको बिना किसी

15
00:00:57,680 --> 00:01:01,680
फिल्ट्रेशन के आप तक पहुंचाया जा रहा है जिससे कि उन्हें देखकर

16
00:01:01,680 --> 00:01:05,840
के जन सामान्य प्रेरित हो और उन अभियानों से जुड़े

17
00:01:05,840 --> 00:01:10,000
जिनसे जुड़कर के सामान्य जन आत्म कल्याण व धर्म

18
00:01:10,000 --> 00:01:16,000
उत्थान में दोनों में अपनी भूमिका प्रस्तुत कर सकता है। जय श्री राम।

19
00:01:26,000 --> 00:01:30,080
ठीक है। तो ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता

20
00:01:30,080 --> 00:01:34,720
है कि पक्ष से कौन-कौन है?

21
00:01:34,720 --> 00:01:37,440
जी मैम

22
00:01:37,440 --> 00:01:41,520
हम भी है इसी पक्ष से अवनीश जी

23
00:01:41,520 --> 00:01:47,520
आप भी हैं। अच्छा मैं भी उसी पक्ष अच्छा

24
00:01:47,520 --> 00:01:51,760
और विश्वजीत जी किरण जी सुजीत जी करण

25
00:01:51,760 --> 00:01:54,640
दास जी

26
00:01:54,640 --> 00:01:59,520
और

27
00:01:59,520 --> 00:02:04,880
नयन पक्ष नयन जी ये खंडन करेंगे ना इसका

28
00:02:04,880 --> 00:02:10,880
ठीक है भैया मैं तो समर्थन करूंगा आप

29
00:02:10,960 --> 00:02:15,920
खंडन वाले पक्ष पक्ष से नहीं है। मैं विश्वजीत नहीं

30
00:02:15,920 --> 00:02:20,160
मैं समर्थन के पक्ष हूं। अच्छा आप समर्थन करेंगे

31
00:02:20,160 --> 00:02:24,560
ना तो समर्थन वाले हो गए अवनीश जी, विश्वजीत

32
00:02:24,560 --> 00:02:30,400
जी, सरस्वती जी, स्वर्णिम जी है ना

33
00:02:30,400 --> 00:02:34,480
और नयन जी भी हैं। नयन जी किधर से

34
00:02:34,480 --> 00:02:37,040
हैं?

35
00:02:37,040 --> 00:02:41,440
जी मैं खंडन के रूप से हूं। अच्छा विश्वजीत जी विश्वजीत

36
00:02:41,440 --> 00:02:46,160
जी नहीं किरण जी नयन जी करण दास जी और

37
00:02:46,160 --> 00:02:50,560
सुजीत जी सुजीत और संभवत आवश्यकता

38
00:02:50,560 --> 00:02:54,560
पड़ी तो मैं तो हम लोग खंडन करेंगे नहीं मैं

39
00:02:54,560 --> 00:02:59,920
सर्वशक्तिमान के तरफ हूं किरण जी आप

40
00:02:59,920 --> 00:03:04,160
हां सर्वशक्तिमान है इसके तरफ हूं मैं तो

41
00:03:04,160 --> 00:03:08,320
एक बार सब लोग वो सर्वशक्तिमान सब कुछ कर सकता है इस

42
00:03:08,320 --> 00:03:12,320
पक्ष में जो लोग हैं वह अपने हाथ ऊपर हाथ हैंड

43
00:03:12,320 --> 00:03:14,560
रेज कर दें। उससे मैं एक बार में

44
00:03:14,560 --> 00:03:19,120
ही देख लूं।

45
00:03:19,120 --> 00:03:23,280
अवनीश जी हो गए, विश्वजीत जी हो गए, सरस्वती जी हो गई

46
00:03:23,280 --> 00:03:27,280
और

47
00:03:27,280 --> 00:03:31,760
अ स्वर्णिम जी, किरण जी पांच

48
00:03:31,760 --> 00:03:35,680
तो यहीं पे दिख रहे हैं।

49
00:03:35,680 --> 00:03:40,160
तो सुजीत जी, नयन जी

50
00:03:40,160 --> 00:03:44,640
और करण दास जी केवल तीन लोग हैं सर्वशक्तिमान

51
00:03:44,640 --> 00:03:48,720
के वो सर्व खंडन करने के लिए किरण जी आपको उधर होना

52
00:03:48,720 --> 00:03:52,400
चाहिए था

53
00:03:52,400 --> 00:03:56,560
खंडन वाले हम

54
00:03:56,560 --> 00:04:01,440
अभी हो जाइए आप

55
00:04:01,440 --> 00:04:06,640
किरण जी भी खंडन करेंगे हाथ नीचे कर लीजिए आप

56
00:04:06,640 --> 00:04:11,680
हम ठीक है। अब ठीक लग रही है। बैलेंस दिख रही है थोड़ा।

57
00:04:11,680 --> 00:04:17,680
ठीक है। सब लोग हाथ नीचे कर लीजिए।

58
00:04:17,680 --> 00:04:21,280
अवनीश

59
00:04:21,280 --> 00:04:26,240
जी आप भी हाथ नीचे कर लीजिए। तो

60
00:04:26,240 --> 00:04:30,000
हमारा क्लेम यह है।

61
00:04:30,000 --> 00:04:34,000
क्लेम सबसे पहले क्लेम अ जो समर्थन

62
00:04:34,000 --> 00:04:38,560
टीम है वह रख दे। आप में से कौन कौन है जो क्लेम रखना चाहता है?

63
00:04:38,560 --> 00:04:44,560
ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है। किस पक्ष में?

64
00:04:50,720 --> 00:04:54,880
समर्थन वालों में से कोई ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता

65
00:04:54,880 --> 00:05:00,880
है। इसके संबंध में अपना जो दावा है वह प्रस्तुत करें।

66
00:05:08,560 --> 00:05:12,720
अरे चारों में से कोई भी यहां सभी को जय श्री राम। जी जी जय

67
00:05:12,720 --> 00:05:16,880
श्री राम। सभी को जय श्री राम। हमारा पक्ष यह

68
00:05:16,880 --> 00:05:20,960
है कि सर्वशक्तिमान ईश्वर जो

69
00:05:20,960 --> 00:05:25,040
है वो स्वयं ब्रह्मांड बनाते

70
00:05:25,040 --> 00:05:29,040
भी हैं और बनते भी हैं। अवतरित भी होते हैं।

71
00:05:29,040 --> 00:05:33,120
वो सारे कार्य सिद्ध कर सकते हैं। ऐसा कोई कार्य नहीं है जो वो सिद्ध ना कर

72
00:05:33,120 --> 00:05:38,080
सके।

73
00:05:38,080 --> 00:05:42,160
इसका खंडन कीजिए। ठीक है। तो

74
00:05:42,160 --> 00:05:46,240
खंडन वाले पक्ष से

75
00:05:46,240 --> 00:05:50,560
किरण जी आप बोले

76
00:05:50,560 --> 00:05:54,880
जी तो एक बात मतलब एक बात बताइए कि ईश्वर एक ऐसा

77
00:05:54,880 --> 00:06:00,880
दंड बना सकता है जो एक ही टाइम पे लंबा भी हो रहा हो और छोटा भी हो रहा हो

78
00:06:01,280 --> 00:06:07,280
एक ही समय पे

79
00:06:09,360 --> 00:06:13,280
बताइए

80
00:06:13,280 --> 00:06:17,520
हां हां बिल्कुल बना सकते हैं। समझाइए इस विषय को

81
00:06:17,520 --> 00:06:23,520
कैसे?

82
00:06:28,240 --> 00:06:32,320
हां कैसे बना सकते हैं? लेकिन आप मुझे एक बात बताइए क्यों बनाए

83
00:06:32,320 --> 00:06:36,320
इसको? अरे वो तो सर्वशक्तिमान है ना तो क्या यहां

84
00:06:36,320 --> 00:06:40,880
पर प्रश्न भी ना पूछूं क्या? नहीं नहीं एक एक बात पहले तो भगवान

85
00:06:40,880 --> 00:06:45,280
ईश्वर सर्वशक्तिमान है। सर्वशक्तिमान

86
00:06:45,280 --> 00:06:49,600
है क्योंकि यह दुनिया में जो कुछ हो रहा है चाहे

87
00:06:49,600 --> 00:06:53,840
बुरा अच्छा दोनों कॉम्बिनेशन ये ईश्वर

88
00:06:53,840 --> 00:06:58,160
ही के वजह से हो रहा है। तो ईश्वर का प्रेजेंस उसी से पता चलता

89
00:06:58,160 --> 00:07:02,320
है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है। जैसे कि कि दुनिया

90
00:07:02,320 --> 00:07:06,400
में आप अपने आप को ज़ूम आउट करके देखेंगे। ठीक है? जो

91
00:07:06,400 --> 00:07:10,560
किया धरा कर्म फल सबको इतना बराबर इतना

92
00:07:10,560 --> 00:07:15,200
सूक्ष्म तरीके से सब कुछ भगवान ही कर रहे हैं।

93
00:07:15,200 --> 00:07:19,360
हम तो ये तो कर ही रहे हैं ना भगवान रियल लाइफ में अपने

94
00:07:19,360 --> 00:07:23,600
आप को अब सिर्फ हम हमारी कमी है कि हम देख नहीं पाते हैं।

95
00:07:23,600 --> 00:07:27,760
लेकिन दुनिया में जो कुछ हो रहा है वो किसी मानव के हाथ से

96
00:07:27,760 --> 00:07:28,480
हो ही नहीं

97
00:07:28,480 --> 00:07:32,480
सकता है। हम इतने कैपेबल नहीं है कि हम एक दूसरे के आप तो

98
00:07:32,480 --> 00:07:36,560
यहां पर ईश्वर को सिद्ध कर रहे हो कि ईश्वर नामक कोई सत्ता है उसके अस्तित्व को

99
00:07:36,560 --> 00:07:40,800
सिद्ध कर रहे हो। मैंने यह नहीं पूछा। मैंने पूछा है कि ईश्वर एक ऐसा दंड बना

100
00:07:40,800 --> 00:07:44,800
सकते हैं जो एक ही टाइम पर लंबा भी हो और छोटा भी हो रहा हो। अगर कर

101
00:07:44,800 --> 00:07:48,880
सकते हैं तो कैसे कर सकते हैं? यह बताइए। आप अब मैंने पहले इसको बोला तो आप

102
00:07:48,880 --> 00:07:53,680
मुझे उसका काउंटर दीजिए। मैंने बोला कि सर्वशक्तिमान है क्योंकि

103
00:07:53,680 --> 00:07:57,920
जो इस दुनिया में पूरे ब्रह्मांड में जो जो किया धरा

104
00:07:57,920 --> 00:08:02,240
है उनको सब कुछ ठीक- ठीक ना 1% ऊपर

105
00:08:02,240 --> 00:08:06,400
ना 1% नीचे सब कुछ सबको मिल रहा है। चाहे वो

106
00:08:06,400 --> 00:08:10,960
दुख हो सुख हो। हम दुख सुख अपने जीव की दृष्टि के वजह

107
00:08:10,960 --> 00:08:15,120
से कहते हैं ना तो कि भगवान की दृष्टि से तो अगर

108
00:08:15,120 --> 00:08:19,200
उसको देखा जाए तो कर तो रहे हैं तभी तो सर्वशक्तिमान है

109
00:08:19,200 --> 00:08:23,920
क्या आप कर सकते हैं क्या अपने आप अपने

110
00:08:23,920 --> 00:08:27,920
ठीक है ठीक है मैं मानता हूं कि मैं आपके ही बात को

111
00:08:27,920 --> 00:08:32,000
कह रहा हूं कि ठीक है चलो ईश्वर सब कुछ कर सकता है आप जब क्लेम कर

112
00:08:32,000 --> 00:08:36,080
रहे हो तो मैंने भी एक उदाहरण रखा कि यह कार्य ईश्वर कर सकता है

113
00:08:36,080 --> 00:08:39,360
तो आप मुझे समझाइए ना वो

114
00:08:39,360 --> 00:08:43,360
हां तो कर हर एक प्रश्न का उत्तर हर एक प्रश्न का उत्तर यही दे

115
00:08:43,360 --> 00:08:43,860
दीजिए

116
00:08:43,680 --> 00:08:47,680
कि इस बार ही सब कुछ कर रहे हैं इसलिए इस बार ही सब कुछ कर सकता है फिर हर एक प्रश्न

117
00:08:47,680 --> 00:08:51,680
का उत्तर यही दे दीजिए डंडा छोटा बड़ा तो वो

118
00:08:51,680 --> 00:08:56,640
जी आप ही जो मॉडरेटर है वही अब निश्चय करे कि ये कोई उत्तर हुआ या नहीं मॉडरेटर

119
00:08:56,640 --> 00:09:02,560
है अवनीत जी आप बताएंगे मैं इसमें समस्या को सुलझा दू थोड़ा

120
00:09:02,560 --> 00:09:06,000
मैं सुलझा

121
00:09:06,000 --> 00:09:10,000
अभी तो उत्तर ही नहीं हुआ है। मैं मैं इस बात को सुलझा

122
00:09:10,000 --> 00:09:14,320
देता हूं। उत्तर तो दीजिएगा। मैं इस बात को सुलझा देता हूं।

123
00:09:14,320 --> 00:09:19,120
दोनों पक्षों में किस बात को लेकर के वो अटक रहा है मामला?

124
00:09:19,120 --> 00:09:23,920
प्रश्न ये किया गया कि अ

125
00:09:23,920 --> 00:09:28,240
यदि ईश्वर सब कुछ कर सकता है तो क्या वह एक ही समय में

126
00:09:28,240 --> 00:09:32,240
एक वह डंडा है जिसको वह लंबा भी कर सकता है और छोटा भी कर सकता

127
00:09:32,240 --> 00:09:36,720
है। यह प्रश्न किया गया। तो उसमें जब

128
00:09:36,720 --> 00:09:41,600
सरस जी ने कहा कि वह सब कुछ कर रहा है।

129
00:09:41,600 --> 00:09:45,840
सब कुछ करने वाला वही तो है। तो

130
00:09:45,840 --> 00:09:49,840
सब कुछ करने वाला वही तो है। मैं उन्होंने यह कहा कि जो भी कुछ घटित हो रहा है

131
00:09:49,840 --> 00:09:55,680
वह ईश्वर की कारण ही हो रहा है। इससे सिद्ध होता है कि वो सब कुछ कर सकता है।

132
00:09:55,680 --> 00:09:58,800
पर जब हम यह कहते हैं जैसे कि

133
00:09:58,800 --> 00:10:03,040
जैसे सरस जी ने एक बात और कही कि उसको आवश्यकता क्या है करने की?

134
00:10:03,040 --> 00:10:07,120
तो आवश्यकता वाली बात तो वहां चली जाएगी जो आर्य समाजी कहते हैं

135
00:10:07,120 --> 00:10:11,200
अवतार लेने की आवश्यकता शिवा जी सो सॉरी टू करती हूं ऑफ

136
00:10:11,200 --> 00:10:15,280
करण जी आप बिल्कुल बहुत आसान है करण जी बिल्कुल

137
00:10:15,280 --> 00:10:19,440
कर सकते हैं डंडा छोटा बड़ा जो आप बोलोगे वो सब कुछ कर सकते हैं

138
00:10:19,440 --> 00:10:23,680
अरे बहन जी आप थोड़ा शांत होकर बात कीजिए हम झगड़ने नहीं आए आप अरे

139
00:10:23,680 --> 00:10:27,760
वो उनका नहीं वो झगड़ नहीं रही है उनकी जो आवाज

140
00:10:27,760 --> 00:10:31,840
है वो ऐसी ऐसी आवाज है तो शायद आपको लग रहा होगा कि वो झगड़ने

141
00:10:31,840 --> 00:10:35,840
के गुस्से कर रही है वो केवल अपना पक्ष ही रख रही है और बड़े ही शांत के

142
00:10:35,840 --> 00:10:41,600
शांति के साथ रख रही है। तो अ

143
00:10:41,600 --> 00:10:45,840
बात यह है यहां पर कि जब हम कहते

144
00:10:45,840 --> 00:10:50,160
हैं मैं इसका उत्तर दूं मैं पक्ष को

145
00:10:50,160 --> 00:10:54,240
स्पष्ट कर दूं कि समझ में आ जाए। वो उत्तर तो अभी मैं नहीं दे रहा हूं।

146
00:10:54,240 --> 00:10:59,440
बात बाकी रहेगा। हम तो इसमें बात ये है कि

147
00:10:59,440 --> 00:11:03,520
जैसे कई बार आर्य समाज ये क्लेम करता है

148
00:11:03,520 --> 00:11:07,840
कि जो सब जगह है वो

149
00:11:07,840 --> 00:11:11,920
जो सर्वव्यापक है वो एक देशीय कैसे हो सकता है? यानी

150
00:11:11,920 --> 00:11:15,040
जो सर्व निराकार रूप में यदि

151
00:11:15,040 --> 00:11:19,120
निराकार रूप में यदि ईश्वर सर्वव्यापक है तो एक देश कैसे हो सकता

152
00:11:19,120 --> 00:11:23,280
है? तो हमें वहां पर उसको समझाना होता है कि भगवान का जो अवतार

153
00:11:23,280 --> 00:11:27,360
होता है वह किस प्रकार से एक देश दिखाई देता मात्र

154
00:11:27,360 --> 00:11:31,920
है। वस्तुत वो सब निराकार नहीं रहते। सर्वव्यापक

155
00:11:31,920 --> 00:11:36,160
होते हुए भी वो किसी एक देश काल परिस्थिति

156
00:11:36,160 --> 00:11:40,640
में स्वयं को एक निश्चित आकार स्वरूप में

157
00:11:40,640 --> 00:11:44,880
कुछ आंखों का विषय बना देते हैं। है ना? जैसे

158
00:11:44,880 --> 00:11:49,120
ईश्वर मान लीजिए जब बोलेगा ईश्वर जब बोलेगा

159
00:11:49,120 --> 00:11:53,440
तो क्योंकि वह सर्वव्यापक है तो सब जगह आवाज आएगी आएगी

160
00:11:53,440 --> 00:11:57,600
ना तो फिर कोई सुन पाएगा क्या ईश्वर को नहीं सुन

161
00:11:57,600 --> 00:12:02,160
पाएगा क्योंकि वो आवाज समझ में ही नहीं आएगी हां

162
00:12:02,160 --> 00:12:06,720
तो तो ईश्वर किनी अपने

163
00:12:06,720 --> 00:12:11,600
जो अपना जो सर्वव्यापक स्वरूप है उसको कंट्रोल कर सकता है कि उसको

164
00:12:11,600 --> 00:12:16,000
कहां पर किसकी इंद्रियों का विषय बनाना है। कहां पर नहीं बनाना

165
00:12:16,000 --> 00:12:20,080
है। कई यह बात तो आर्य समाज जी भी मानते हैं कि कई

166
00:12:20,080 --> 00:12:24,320
आकाशवाण फलाने ने सुनी और फलाने ने नहीं सुनी। ऐसा कैसे हो गया?

167
00:12:24,320 --> 00:12:28,640
भाई जब ईश्वर सर्वव्यापक था तो सब लोग सुनते। तो उन्होंने

168
00:12:28,640 --> 00:12:30,080
अपने आप को कंट्रोल किया

169
00:12:30,080 --> 00:12:34,160
और कुछ कुछ मनुष्यों की या कुछ प्राणियों की इंद्रियों का विषय

170
00:12:34,160 --> 00:12:38,720
तो बनाया मगर सब मगर बाकियों का नहीं बनाया। तो इस तरीके से सर्व्यापक

171
00:12:38,720 --> 00:12:42,960
होते हुए भी उसको कुछ लोगों ने सुना। ऐसे ही कुछ

172
00:12:42,960 --> 00:12:47,040
ऋषियों के हृदय में अंतःकरण में या जहां पर भी वह मानते

173
00:12:47,040 --> 00:12:51,280
हैं वहां पर उन्होंने वेद का ज्ञान प्रकाशित किया तो यह भी नहीं हो सकता

174
00:12:51,280 --> 00:12:55,600
क्योंकि वह तो सर्वव्यापक है। तो उसने अपने आप को कंट्रोल किया।

175
00:12:55,600 --> 00:12:59,840
उसने कहीं-कहीं पर इंद्रियों का विषय बना दिया। मतलब

176
00:12:59,840 --> 00:13:04,480
अभी वो इंद्रियों का विषय नहीं है। सर्व्यापक होते हुए भी फिर कहीं-कहीं

177
00:13:04,480 --> 00:13:08,560
पर वो अपनी इच्छा अनुसार आंखों का या कानों का या

178
00:13:08,560 --> 00:13:12,960
हृदय का या सोच का मस्तिष्क का मन का विषय

179
00:13:12,960 --> 00:13:17,040
बना देता है। तो इस तरह से सर्व्यापक

180
00:13:17,040 --> 00:13:21,120
होते हुए भी उसका एक देश रूप वाला जो अवतार है वह

181
00:13:21,120 --> 00:13:25,280
सिद्ध होता है। तो एक तो यह तरीका रहा बताने का कि

182
00:13:25,280 --> 00:13:29,360
हां वह अवतार लेता है तो अवतार लेता है। हमारा यह

183
00:13:29,360 --> 00:13:33,440
क्लेम था हां वह अवतार ले सकता है। तो हमने उसे समझाया तो अभी

184
00:13:33,440 --> 00:13:37,440
सरसद जी क्या हो रहा है कि आप यह तो कह रही हैं कि हां वो कर सकता है।

185
00:13:37,440 --> 00:13:41,680
मगर वो थोड़ा सा एक्सप्लेन नहीं हो पा रहा है कि कैसे कर सकता है।

186
00:13:41,680 --> 00:13:45,200
उसके पक्ष में उदाहरण तर्क नहीं आ रहे हैं। अब उदाहरण और

187
00:13:45,200 --> 00:13:49,600
तर्क जो आपने दिए हैं कि वह सब कुछ करता है। तो

188
00:13:49,600 --> 00:13:53,680
संसार में जो कुछ भी हो रहा है वो कुछ वो करता है तो हां वो सब

189
00:13:53,680 --> 00:13:58,000
कुछ करता है तो वो ये सब करने वाले से सृष्टि का रचयिता सिद्ध हो रहा है

190
00:13:58,000 --> 00:14:02,080
सृष्टि का संचालन उत्पत्ति स्थिति संहार करने वाला सिद्ध

191
00:14:02,080 --> 00:14:06,160
हो रहा है मगर जब हम सर्व विशेषण लगाएंगे सर्व विशेषण जो कुछ

192
00:14:06,160 --> 00:14:10,480
भी मनुष्य सोच सकता है या जो कुछ भी सृष्टि में हो रहा है

193
00:14:10,480 --> 00:14:14,720
वो ईश्वर करने वाला है कि नहीं तो वहां पर हमको उसके

194
00:14:14,720 --> 00:14:18,720
वस्तुनिष्ठता के साथ जब प्रश्न किया गया कि

195
00:14:18,720 --> 00:14:23,280
क्या वो वो एक ही समय में भेद को लंबा छोटा कर सकता है। तो उसके संबंध में हमें

196
00:14:23,280 --> 00:14:27,600
कुछ थ्योरी थोड़ा सा एक्सप्लेनेशन देना पड़ेगा कि ईश्वर यह कार्य कैसे

197
00:14:27,600 --> 00:14:31,600
करेगा। जैसे हमने अवतार के पक्ष में एक एक्सप्लेनेशन दिया। चाहते

198
00:14:31,600 --> 00:14:35,920
तो हम यह कह सकते हैं वो ले सकता है। दैट्स इट। मगर उसको एक्सप्लेन

199
00:14:35,920 --> 00:14:40,000
करना भी आवश्यक हो गया। जिससे कि समझ में आ जाए कि हां भाई भगवान

200
00:14:40,000 --> 00:14:44,080
अवतार कैसे लेते हैं। तो यह जो बेत को छोटा और बड़ा कर रहे

201
00:14:44,080 --> 00:14:50,080
हैं तो कैसे कर पा रहे हैं। तो इस संबंध में प्रश्न है। कैसे करेंगे?

202
00:14:50,160 --> 00:14:54,320
है ना? सही कह रहे हैं।

203
00:14:54,320 --> 00:14:58,560
मैं कुछ पूछ सकता हूं तो भैया मैं इसका उत्तर दे।

204
00:14:58,560 --> 00:15:02,800
इसका उत्तर हो जाए पहले क्योंकि अभी ईश्वर वही है जो सब कुछ

205
00:15:02,800 --> 00:15:06,880
अच्छे से उत्तर है। जी विश्वजीत जी बोलिए। तो भैया इसका

206
00:15:06,880 --> 00:15:10,880
उत्तर ये प्रश्न वैसे भी बहुत आसान था। इसका उत्तर यही होगा

207
00:15:10,880 --> 00:15:14,960
कि अगर ईश्वर एक ही चीज को एक ही वक्त पर बड़ा और छोटा दोनों कर रहे तो वह स्थाई

208
00:15:14,960 --> 00:15:19,120
रहेगा। कांस्टेंट रहेगा। ना वह बड़ा होगा ना छोटा होगा।

209
00:15:19,120 --> 00:15:23,200
तो जो स्थाई है उसको ऐसा मान सकते हैं कोई इंसान हो चाहे जो भी हो एक वक्त पे

210
00:15:23,200 --> 00:15:27,200
या फिर कोई निर्जीव चीज हो वो तो एक वक्त पे ऐसा मान सकते

211
00:15:27,200 --> 00:15:31,360
हैं बड़ा भी हो रहा है छोटा भी हो रहा है तो वो कांस्टेंट है ना बड़ा हो रहा है अल्टीमेटली ना छोटा

212
00:15:31,360 --> 00:15:35,360
हो रहा है उसका जो सारांश लास्ट में तो यही निकलेगा

213
00:15:35,360 --> 00:15:39,360
ना हां काफी हद तक सही है जी और कोई जो

214
00:15:39,360 --> 00:15:45,360
देना चाहे इस प्रश्न का उत्तर

215
00:15:47,600 --> 00:15:52,240
आप प्रश्न का उत्तर देना चाहेंगे कोई नयन जी आप बोले ना

216
00:15:52,240 --> 00:15:56,400
समर्थन में है ना आप तो फिर मेरा एक प्रश्न था नहीं खंडन में

217
00:15:56,400 --> 00:16:00,720
अच्छा अच्छा तो रुक जाइए तो रुक जाइए तो किरण जी इनका उत्तर

218
00:16:00,720 --> 00:16:04,800
आया है वो आप संतुष्ट है नहीं तो काउंटर करिए

219
00:16:04,800 --> 00:16:08,960
या फिर जो भी काउंटर कर हां इसका उत्तर

220
00:16:08,960 --> 00:16:14,960
यही हो सकता है कि वह कांस्टेंट रहेगा यही उत्तर है नयन जी

221
00:16:15,280 --> 00:16:19,680
जी नहीं तो पूछिए प्रश्न पूछिए

222
00:16:19,680 --> 00:16:24,160
जी तो मैं जो प्रश्न पूछना था कि पहले स्वर्णिन

223
00:16:24,160 --> 00:16:28,720
जी आपने शुरू किया था तो आप अपना पक्ष जरा एक और बार कहेंगे

224
00:16:28,720 --> 00:16:32,880
कि आपने क्या कहा था पहले नहीं नहीं नहीं नयन जी किसके तरफ

225
00:16:32,880 --> 00:16:36,960
से है मतलब खंडन का मैं खंडन में

226
00:16:36,960 --> 00:16:40,960
हूं खंडन में है नयन जी ठीक है ठीक है नयन जी एक ये कह रहा हूं पहले ये

227
00:16:40,960 --> 00:16:45,200
जो इन्होंने विश्वजीत जी ने जो आंसर दिया है इसका कोई

228
00:16:45,200 --> 00:16:49,520
काउंटर है आपके पास या नहीं करना चाहते?

229
00:16:49,520 --> 00:16:53,760
नहीं ये मेरे पास नहीं है। इसका काउंटर

230
00:16:53,760 --> 00:16:58,160
है मैं दे देता हूं काउंटर

231
00:16:58,160 --> 00:17:00,640
कि

232
00:17:00,640 --> 00:17:02,800
वो कांस्टेंट रहेगा।

233
00:17:02,800 --> 00:17:08,240
है ना? आपने ये कहा जो एक ही समय में घटेगा बढ़ेगा वो कांस्टेंट रहेगा।

234
00:17:08,240 --> 00:17:12,320
है ना? जी भैया। इसका मतलब ये माना जा सकता है ना कि ऐसा नहीं

235
00:17:12,320 --> 00:17:16,160
कर सकता।

236
00:17:16,160 --> 00:17:20,160
क्यों भैया दोनों काम तो एक ही साथ हो रहा है। हम बड़ा और

237
00:17:20,160 --> 00:17:25,520
छोटा ईश्वर तो कर ही रहे हैं। तो आप तो कह रहे हो ना कि वो कांस्टेंट रहेगा।

238
00:17:25,520 --> 00:17:29,600
कांस्टेंट रहेगा कि नहीं? कांस्टेंट रहेगा इस विषय में। अगर

239
00:17:29,600 --> 00:17:33,760
भैया मान लीजिए मैं एक ही वक्त पे आपको कुछ दे रहा हूं और आपसे उतना

240
00:17:33,760 --> 00:17:37,920
ही ले ले रहा हूं। तब तो आपके पास कुछ बचा नहीं। आपको ऐसा लगेगा कि

241
00:17:37,920 --> 00:17:42,320
ईश्वर ना तो हमको कुछ दिए ना लिए। बट दोनों कार्य एक साथ हो रहा है।

242
00:17:42,320 --> 00:17:46,480
आपको पता नहीं चल रहा है वो चीज तो आप क्योंकि उसका जो

243
00:17:46,480 --> 00:17:50,480
पता नहीं चलेगा जो आपको ये कहना चाहिए ना कि पता नहीं

244
00:17:50,480 --> 00:17:55,520
चलेगा मगर ईश्वर करता है

245
00:17:55,520 --> 00:17:59,760
तो करने के करने के विषय में आपने पक्ष नहीं रखा ना कि कैसे

246
00:17:59,760 --> 00:18:04,400
करेगा ये तो आप रिजल्ट बताया आपने कैसे करेगा

247
00:18:04,400 --> 00:18:08,560
उसके संबंध में कुछ हमें समझाया नहीं आपने वह तो आपने परिणाम बता

248
00:18:08,560 --> 00:18:12,880
दिया कि जब वह ऐसा करेगा तो वह कांस्टेंट रहेगा तो इसलिए पता नहीं चलेगा यानी

249
00:18:12,880 --> 00:18:16,880
ईश्वर कर तो सकता है मगर वह किसी को पता नहीं चलेगा

250
00:18:16,880 --> 00:18:21,280
मगर कैसे करेगा यह नहीं समझ में आया शिवश

251
00:18:21,280 --> 00:18:25,520
मैं कहना चाहती हूं डंडा कास्टेंट काफी हद तक वो जादूगर वाले

252
00:18:25,520 --> 00:18:29,920
जवाब पे मिल सकता है क्या जो जादूगर वाला जवाब होता है जब कोई एक्टर एक्टिंग

253
00:18:29,920 --> 00:18:34,080
करता है वो तो खुद जैसे कोई भी एक्टर होता है वो खुद

254
00:18:34,080 --> 00:18:38,400
पता है उसको कि मैं एक्टर हूं हां पहुंच रहे हैं दूसरों

255
00:18:38,400 --> 00:18:42,480
को दर्शाने के लिए हम जी भैया दूसरों के लिए तो

256
00:18:42,480 --> 00:18:46,480
वो ऐसा लगता है कि ये मूर्ख बन रहा है या फिर हंस रहा है, रो रहा है लेकिन अंदर

257
00:18:46,480 --> 00:18:50,800
से उसको पता है मैं अभिनेता हूं। अभिनेता का काम कर रहा हूं। बस

258
00:18:50,800 --> 00:18:54,880
सरस जी आप क्या कह रहे हैं? हां शिवा मैं कह रही थी दोनों चेंज कर रहे

259
00:18:54,880 --> 00:18:59,360
हैं। ओके मैं कह रही थी कि डंडा वो एट ए टाइम

260
00:18:59,360 --> 00:19:03,520
लंबा और छोटा भी हो रहा है। दुनिया भी एक्सपेंड हो

261
00:19:03,520 --> 00:19:07,760
रहा है। बड़ा हो रहा है। और डंडा जो है वह भी

262
00:19:07,760 --> 00:19:11,040
वो उस उस स्पीड पर बड़ा नहीं हो रहा है।

263
00:19:11,040 --> 00:19:15,040
तो क्योंकि दुनिया बड़ी हो रही है तो उसकी दृष्टि से वो छोटा हो रहा है

264
00:19:15,040 --> 00:19:19,280
तो लेकिन वो उसी इक्वल स्पीड से डंडा भी बड़ा हो रहा है

265
00:19:19,280 --> 00:19:24,640
तो एक्सपेंड भी हो रहा है। बहुत बढ़िया

266
00:19:24,640 --> 00:19:30,640
बहुत बढ़िया लेकिन ये तो

267
00:19:32,720 --> 00:19:37,280
जी हमारा मत ये है कि जैसे एक स्थान पे

268
00:19:37,280 --> 00:19:41,840
कितने ही परमाणु होते हैं उन परमाणुओं में भी

269
00:19:41,840 --> 00:19:47,840
इतना ही स्थान है जितना हमें बाहर दृष्टिकोण दृष्टि से दिख रहा है

270
00:19:48,160 --> 00:19:52,240
तो उस पर यदि उस स्थान में उस परमाणु में भी वही कोई कार्य हो रहा हो

271
00:19:52,240 --> 00:19:56,240
जो बाहर हो रहा है तो उसके अंदर वो छोटा हो रहा हो

272
00:19:56,240 --> 00:20:00,240
और बाहर बड़ा हो रहा है तो एक साथ उसी स्थान पर वह बड़ा भी हो रहा

273
00:20:00,240 --> 00:20:04,240
है छोटा भी हो रहा है तो इसमें तो काउंटर ही बन जाएगा ना कि

274
00:20:04,240 --> 00:20:08,240
बाहर से हमको लंबा छोटा दिखाइए अंदर क्या हो रहा है

275
00:20:08,240 --> 00:20:11,040
डजंट मैटर

276
00:20:11,040 --> 00:20:15,040
हमें हम लोग वो वाले नहीं है ना कि हम अंदर वो मॉलिक्यूल्स वगैरह

277
00:20:15,040 --> 00:20:21,040
देखें इलेक्ट्रॉन प्रोटॉन न्यूट्रॉन ये सब देखें हमें तो डंडा बड़ा

278
00:20:21,040 --> 00:20:25,040
अगर अंधे को दिखाने के लिए कहेंगे नहीं यहां पर मेरा पक्ष कट रहा

279
00:20:25,040 --> 00:20:26,160
है परंतु अगर अंधे

280
00:20:26,160 --> 00:20:30,560
को अगर कहेंगे ये दिखाने का तो कैसे वो महाभारत में हो चुका

281
00:20:30,560 --> 00:20:34,640
है ऐसा है इसमें एक गढ़ बात है जो आप लोग ध्यान नहीं दे रहे हैं वो मैं डाल

282
00:20:34,640 --> 00:20:38,960
देता हूं प्रकाश एक ही समय में डंडा बड़ा

283
00:20:38,960 --> 00:20:44,480
छोटा हो रहा है ये

284
00:20:44,480 --> 00:20:48,800
इसका साक्षी कौन बनेगा

285
00:20:48,800 --> 00:20:52,960
ये आपने सोचा इसका साक्षी, इसका दृष्टा, इसकी

286
00:20:52,960 --> 00:20:56,960
गवाही देने वाला कौन बनेगा? हमने तो कह दिया कि

287
00:20:56,960 --> 00:21:01,200
हम कर देंगे। साक्षी कौन बनेगा?

288
00:21:01,200 --> 00:21:05,840
कि लंबा एक ही डंडा एक ही बार में बड़ा छोटा हुआ। क्योंकि

289
00:21:05,840 --> 00:21:09,840
जब वो बड़ा हो रहा होगा तो साक्षी उसे देखेगा। जब वो छोटा हो रहा होगा

290
00:21:09,840 --> 00:21:14,000
तो साक्षी उसे देखेगा। क्योंकि वह स्थिर अवस्था

291
00:21:14,000 --> 00:21:18,160
में रहेगा। उसको पता ही नहीं चलेगा। जो भी साक्षी इसका अर्थ है

292
00:21:18,160 --> 00:21:22,240
कि यहां पर कुछ भी करने वाली

293
00:21:22,240 --> 00:21:26,480
स्थिति है ही नहीं। यहां पर केवल इंफॉर्मेशन प्रोवाइड करानी

294
00:21:26,480 --> 00:21:31,440
है ईश्वर को कि मैंने डंडा लंबा छोटा किया।

295
00:21:31,440 --> 00:21:35,840
यहां पर करना कुछ नहीं है। क्योंकि वह तो रिजल्ट क्या है? कांस्टेंट

296
00:21:35,840 --> 00:21:39,920
रहेगा क्योंकि लंबा भी हुआ, छोटा भी हुआ। रिजल्ट क्या है? कांस्टेंट रहा। तो

297
00:21:39,920 --> 00:21:41,680
क्रिया तो है ही नहीं।

298
00:21:41,680 --> 00:21:46,000
तो फिर क्या है कि हमें केवल सामने वाले को

299
00:21:46,000 --> 00:21:50,480
इंफॉर्मेशन उसके माइंड में देनी है कि

300
00:21:50,480 --> 00:21:54,560
वह हुआ कि नहीं हुआ। तो होने के पक्ष में इंफॉर्मेशन

301
00:21:54,560 --> 00:21:58,960
देने के लिए हमें गवाह चाहिए। जो जिस पर वह विश्वास

302
00:21:58,960 --> 00:22:03,040
करता हो जो परीक्षा ले रहा है। है ना? या फिर

303
00:22:03,040 --> 00:22:07,120
उसको स्वयं को हम कंट्रोल कर लें। उसको

304
00:22:07,120 --> 00:22:12,320
यह फीड करा दें कि अह

305
00:22:12,320 --> 00:22:16,880
भाई तुमने देखा कि डंडा जो है बड़ा छोटा हुआ

306
00:22:16,880 --> 00:22:20,960
है ना तो ये हमें केवल

307
00:22:20,960 --> 00:22:26,960
उसको विश्वास दिलाने वाली बात है। इसमें क्रिया है ही नहीं।

308
00:22:27,120 --> 00:22:31,280
जी करण दास जी जी भैया भैया एक

309
00:22:31,280 --> 00:22:35,520
काउंटर क्वेश्चन था अगर हो सके तो इसी बात पे

310
00:22:35,520 --> 00:22:40,240
जी इसी से मतलब डंडे के विषय में ही एक अलग ही मतलब जैसे गुरुत्वाकर्षण

311
00:22:40,240 --> 00:22:44,400
का विषय हुआ जैसे ईश्वर ने गुरुत्वाकर्षण का नियम दिया और बनाया

312
00:22:44,400 --> 00:22:48,560
इस सृष्टि पर लागू करा तो क्या ऐसा कुछ कर सकते हैं कि

313
00:22:48,560 --> 00:22:52,960
किसी वस्तु पे वो ना लगे क्योंकि अगर उस वस्तु पे वो ना लगेगा तो फिर गुरुत्वाकर्षण

314
00:22:52,960 --> 00:22:57,360
का नियम तो खंडन हो जाएगा क्योंकि वो तो सभी वस्तु के लिए समान रूप से लगने की

315
00:22:57,360 --> 00:23:01,680
का विषय है। तो क्या ईश्वर इसको करने में संभव है? क्योंकि अगर संभव

316
00:23:01,680 --> 00:23:06,000
है तो इससे फिर गुरुत्वाकर्षण की जो बात है वो उसका

317
00:23:06,000 --> 00:23:10,000
नियम यहां पे उलट जाएगा। नहीं तो प्राकृतिक

318
00:23:10,000 --> 00:23:14,720
नियम जो भगवान ने बनाए हैं तो उसको तोड़ने वाले ही तो ईश्वर है।

319
00:23:14,720 --> 00:23:18,720
कई ऐसे चमत्कार किए हैं जो बिना किसी साइंटिफिक

320
00:23:18,720 --> 00:23:23,760
प्रूवन के और जो है वो उड़ सकते हैं। वो बहुत कुछ कर सकते हैं।

321
00:23:23,760 --> 00:23:28,400
इवन जैसे सृष्टि का एक नियम है उठा लिए।

322
00:23:28,400 --> 00:23:32,400
एक मिनट इवन जैसे सृष्टि का एक नियम भगवान कृष्ण ने जब पहाड़ उठा लिए थे तो

323
00:23:32,400 --> 00:23:37,040
वो तो सृष्टि का एक नियम है कि मनुष्य माता-पिता

324
00:23:37,040 --> 00:23:41,040
के गर्भ से ही मनुष्य जन्म लेगा तो इतना तो आर्य समाजी भी मानते

325
00:23:41,040 --> 00:23:42,160
हैं कि पहला मनुष्य जो है

326
00:23:42,160 --> 00:23:46,720
आलू से हुआ हम चमत्कार

327
00:23:46,720 --> 00:23:51,600
को मान लिया ना तो यह तो पृथ्वी का नियम सृष्टि का नियम

328
00:23:51,600 --> 00:23:57,600
टूटा हुआ माना खैर अभी थोड़ा सा सीक्वेंस में चलेंगे

329
00:23:58,240 --> 00:24:02,400
तो अभी ये बात समझ में आई कि यहां पे कोई क्रिया नहीं है। यहां पे केवल

330
00:24:02,400 --> 00:24:06,400
कुछ कार्य हुआ। ये सोने के विषय में सामने वाले को विश्वास

331
00:24:06,400 --> 00:24:10,400
दिलाना है। इंफॉर्मेशन प्रोवाइड करानी है। ये इसका और

332
00:24:10,400 --> 00:24:15,200
इसमें दृष्ट यहां से शुरू करना था इस कोच को। इसका दृष्टा कौन बनेगा?

333
00:24:15,200 --> 00:24:21,200
ठीक है। खैर अब जो है आप अपनी आगे की कंटिन्यू करें।

334
00:24:21,440 --> 00:24:26,560
किरण जी आप या नयन जी आप

335
00:24:26,560 --> 00:24:32,400
नयन जी पूछ लीजिए हां नयन जी का

336
00:24:32,400 --> 00:24:36,480
एक भैया थे ना जो पहले शुरू किए थे हां

337
00:24:36,480 --> 00:24:40,720
वो है नहीं अभी हां स्वर्णिम जी तो

338
00:24:40,720 --> 00:24:45,120
स्वर्णिम भैया आप पहले जो कहा था जरा एक और बार दोहराएंगे

339
00:24:45,120 --> 00:24:49,280
परमाणु वाला ना परमाणु नहीं पहला जो उनका पहला जो

340
00:24:49,280 --> 00:24:54,640
पक्ष था उन्होंने तो यही कहा था

341
00:24:54,640 --> 00:24:59,040
उनके पक्ष आपने कुछ कहा था ना ऐसा कि ईश्वर जगत

342
00:24:59,040 --> 00:25:03,120
बना भी सकता है, बन भी सकता है।

343
00:25:03,120 --> 00:25:07,280
जी जी जी हां तो वहीं पर मेरा प्रश्न था तो ईश्वर क्या

344
00:25:07,280 --> 00:25:11,520
जगत बन सकता है?

345
00:25:11,520 --> 00:25:15,520
जी बिल्कुल बन सकते हैं। मैं आप लोगों को एक बात कहूंगा

346
00:25:15,520 --> 00:25:19,680
जो ऐसे क्वेश्चंस हैं जिनसे इस विषय

347
00:25:19,680 --> 00:25:23,760
में जो आंसर है वो आ जाने के बाद हर

348
00:25:23,760 --> 00:25:28,080
चीज का आंसर वो हो सकता है। ऐसे जो गढ़ वर्थ वाले क्वेश्चंस

349
00:25:28,080 --> 00:25:32,160
हैं वो थोड़ा बाद में करें। पहले शुरुआत वाले क्वेश्चंस करें।

350
00:25:32,160 --> 00:25:36,480
हल्के वाले कि क्या वह पाप कर सकता है? जो प्रासंगिक

351
00:25:36,480 --> 00:25:40,560
क्वेश्चंस है पहले उनको यहां पर क्लियर करवाइए। है

352
00:25:40,560 --> 00:25:44,800
ना? और जो गुण अर्थ वाले क्वेश्चन है उनको बाद के लिए रखिए क्योंकि

353
00:25:44,800 --> 00:25:49,040
अगर उसको हमने यहां पे दे दिया तो ये समाप्त हो जाएगा सेशन।

354
00:25:49,040 --> 00:25:53,280
अभी भी मैंने जो यह जो डंडे वाली बात बताई है इसमें कुछ चीजें हैं जो रोक

355
00:25:53,280 --> 00:25:57,360
दी। हालांकि आप काउंटर कर सकते थे तो काउंटर नहीं किया।

356
00:25:57,360 --> 00:26:01,440
मैंने रोकी हुई हैं। तो वह अंत के लिए रोकी हुई है। यहां पर दे दूंगा

357
00:26:01,440 --> 00:26:06,800
तो अभी हर प्रश्न के जवाब में उससे आपको मदद मिलने लगेगी।

358
00:26:06,800 --> 00:26:10,960
ठीक है? तो वो वाले प्रश्न करिए जो प्रासंगिक पहले शुरू में वह

359
00:26:10,960 --> 00:26:15,200
वाले प्रश्न करिए जो प्रासंगिक है कि अच्छा क्या वो ये पाप

360
00:26:15,200 --> 00:26:21,200
कर सकता है? क्या वो बुरा कर सकता है? बहुत सारी चीजें हैं।

361
00:26:21,360 --> 00:26:25,600
ठीक है? तो धीरेधी उसप आइए जिसका जवाब वन एंड

362
00:26:25,600 --> 00:26:26,640
ओनली फिर अद्वैत के

363
00:26:26,640 --> 00:26:32,320
पास होता है। ठीक है। ठीक है भैया।

364
00:26:32,320 --> 00:26:36,320
जी पूछिए। प्रासंगिक वाले बिल्कुल जो आपको बिल्कुल

365
00:26:36,320 --> 00:26:40,400
वैसे लगे ना जो आर्य समाधि के द्वारा उठाए जाते हैं सबके

366
00:26:40,400 --> 00:26:45,120
द्वारा वो सब आप जो है क्या मैं एक बार बोल सकता हूं पहला

367
00:26:45,120 --> 00:26:49,120
हां नारायण जी बोलिए अच्छा तो मैं दूसरा ही बोल

368
00:26:49,120 --> 00:26:53,280
रहा हूं तो एक जो पैराडॉक्स होते हैं ना बहुत सारे

369
00:26:53,280 --> 00:26:57,280
पैराडॉक्स मींस सेल्फ कंट्राडिक्टरी स्टेटमेंट्स तो एक पैराडॉक्स

370
00:26:57,280 --> 00:27:01,600
आया है कि ओमनी प्रेजेंट पैराडॉक्स जिसको कहते हैं कि एक पत्थर

371
00:27:01,600 --> 00:27:05,680
है क्या ईश्वर ऐसा एक पत्थर बना सकते हैं जिसको कोई

372
00:27:05,680 --> 00:27:09,680
नहीं उठा सकता। खुद ईश्वर भी नहीं। तो इस प्रश्न

373
00:27:09,680 --> 00:27:13,840
को अगर हम पूछेंगे इसका उत्तर हां या ना आ सकता है। अगर

374
00:27:13,840 --> 00:27:18,000
हम कहेंगे कि कोई भी नहीं उठा सकता। ऐसा पत्थर वो बना सकते हैं

375
00:27:18,000 --> 00:27:22,240
तो इसका मतलब ईश्वर खुद भी नहीं उठा सकता। तो यहां पर उसका सर्वशक्तिमत्ता

376
00:27:22,240 --> 00:27:26,560
तो खत्म हो गया। अब अगर वह उठा सकता है।

377
00:27:26,560 --> 00:27:30,560
ठीक है? फिर तो वह ऐसा पत्थर बना ही नहीं पाया जिसको कोई नहीं उठा सकता। तो यहां

378
00:27:30,560 --> 00:27:34,720
पर भी उसका सर्वशक्तिमानता तो खत्म हो ही गया। तो इसका

379
00:27:34,720 --> 00:27:38,720
उत्तर क्या होगा कि क्या वो ऐसा पत्थर बना सकते हैं जिसका कोई वाला प्रश्न

380
00:27:38,720 --> 00:27:41,840
है ये आना ही है। ये तो होना ही था। ये

381
00:27:41,840 --> 00:27:45,840
ये सबके मेरे ख्याल से हम में से ऐसा कोई नहीं होगा जिसने

382
00:27:45,840 --> 00:27:50,080
सुना। मगर ये बाद वाला प्रश्न है।

383
00:27:50,080 --> 00:27:54,160
बाद वाला प्रश्न है। इसमें भी वही आंसर

384
00:27:54,160 --> 00:27:58,240
आएंगे जो खत्म कर देंगे। सारी डिबेट को ही बंद

385
00:27:58,240 --> 00:28:03,440
कर देंगे। ठीक है तो तो आप

386
00:28:03,440 --> 00:28:07,760
शुरुआत में थोड़ा शुरुआती लेवल वाले प्रश्नों को कहिए

387
00:28:07,760 --> 00:28:13,760
तो पूछूंगा

388
00:28:13,920 --> 00:28:18,080
कौन पूछेगा सरलता मैं पूछू जी हां किरण

389
00:28:18,080 --> 00:28:20,960
जी आप पूछिए

390
00:28:20,960 --> 00:28:25,200
एक बात बताइए जो साकार ईश्वर है वो बिना स्पेस के साकार

391
00:28:25,200 --> 00:28:30,640
हो सकता है अरे आप सब

392
00:28:30,640 --> 00:28:34,640
सारे ऐसे ही पूछ रहे हो कि उसमें जो है

393
00:28:34,640 --> 00:28:38,720
कह चलिए ईश्वर कोई बुरा कार्य कर सकता है। हां इस तरह से

394
00:28:38,720 --> 00:28:42,720
पूछिए यह जो भैया सभी यहां पर इंटेलेक्चुअल्स है तो प्रश्न

395
00:28:42,720 --> 00:28:46,160
तो

396
00:28:46,160 --> 00:28:50,640
हां ये बताइए वह बुरा कार्य

397
00:28:50,640 --> 00:28:54,880
ये उन्होंने कोई कार्य किया वो बुरा है इसकी पुष्टि करेगा

398
00:28:54,880 --> 00:28:58,960
कौन इसका पुष्टि हम ही करेंगे जो कि हमारे साथ कर रहे

399
00:28:58,960 --> 00:29:01,680
हैं आके

400
00:29:01,680 --> 00:29:06,400
हां ये करो ना तो फिर इसका इसका उदेश

401
00:29:06,400 --> 00:29:10,560
जो एक एक मिनट इसका उद्देश्य क्या है इसका सेशन का

402
00:29:10,560 --> 00:29:14,560
कि हमें प्रैक्टिस हो कि हम मतलब तर्कों को

403
00:29:14,560 --> 00:29:18,880
रखने में अपने पक्ष को मजबूती के साथ रखने में निपुण हो जाए।

404
00:29:18,880 --> 00:29:23,040
इसका उद्देश्य ये है तो ये प्रश्न अच्छा है। इसमें आपने किया है ये

405
00:29:23,040 --> 00:29:27,200
क्योंकि बहुत प्रासंगिक रेलेवेंट चीजें हैं ना। कई जगह हम लोग खड़े

406
00:29:27,200 --> 00:29:33,200
होते हैं या सामने से ऐसी बातें आ जाती हैं। जी बताइए

407
00:29:35,440 --> 00:29:39,760
स्वर्णिम जी बता दीजिए दोबारा से। जी हां कर सकते हैं। तो

408
00:29:39,760 --> 00:29:45,360
कर सकते हैं कि संबंध में वो तो बताओ। तो यानी कि ईश्वर पापी हो गया।

409
00:29:45,360 --> 00:29:49,520
आपने कहा इसका दृष्टा कौन होगा? इसका दृष्टा तो जो

410
00:29:49,520 --> 00:29:55,520
ईश्वर ने कहा है कि क्या अच्छा है? क्या बुरा है?

411
00:29:56,640 --> 00:30:00,640
जी पर शास्त्री यह भी तो कहता है कि ईश्वर पर कुछ लागू नहीं तो ईश्वर कुछ भी कर

412
00:30:00,640 --> 00:30:06,640
सकते हैं। वह किसी नियम का पालन नहीं भी करें तो भी उनको पाप पुण्य कुछ नहीं लगेगा।

413
00:30:06,800 --> 00:30:11,280
बताइए भाई किरण जी और बुरा कार्य कर सकते हैं भैया

414
00:30:11,280 --> 00:30:17,120
और आगे का प्रश्न

415
00:30:17,120 --> 00:30:21,280
इस ब्रह्मांड में जितने भी लोग हैं मानव है

416
00:30:21,280 --> 00:30:26,160
प्राणी है चराचर जो भी है सब भगवान ही है

417
00:30:26,160 --> 00:30:30,400
तो जब बुरा मानव या जो कोई बुरा कार्य करता

418
00:30:30,400 --> 00:30:34,480
है उसमें भी भगवान विद्यमान है हां

419
00:30:34,480 --> 00:30:38,480
तो इससे तो यही सिद्ध हो है ना कि आपका जो ईश्वर है वो बुरा कार्य भी कर

420
00:30:38,480 --> 00:30:42,720
सकता है। वो तो वो तो उनसे परे है ना आत्मा रूप में विद्यमान

421
00:30:42,720 --> 00:30:46,720
है शरीर से कार्य कैसे परे है क्यों माना जाए कि उन पर नियम

422
00:30:46,720 --> 00:30:51,280
लागू नहीं होगा वो बताइए ना क्योंकि भैया

423
00:30:51,280 --> 00:30:55,520
जो भी बुरा कार्य करेंगे हम इस जगत में करेंगे और यह जगत उन्हीं का बनाया

424
00:30:55,520 --> 00:30:59,760
हुआ है और वह फिर से विनाश करके फिर से जगत

425
00:30:59,760 --> 00:31:04,000
बनाने की क्षमता उनमें है। जैसे हम किसी को मार नहीं सकते क्योंकि हम उसका

426
00:31:04,000 --> 00:31:08,000
जैसे मान लीजिए किसी को मार दिया किसी का उंगली को काट लिए तो हमारे पास इतनी

427
00:31:08,000 --> 00:31:12,160
क्षमता नहीं है कि उसका उंगली फिर से जोड़ दे या लगा दे तो ऐसा करना पाप माना

428
00:31:12,160 --> 00:31:16,240
जाता है कि जब हम किसी का भला नहीं कर सकते तो क्यों बुरा करें लेकिन ईश्वर तो

429
00:31:16,240 --> 00:31:20,480
खुद अपना संसार बना रहे हैं फिर विनाश कर रहे फिर से बना रहे उनके पास वो क्षमता

430
00:31:20,480 --> 00:31:24,560
है तो वो बुरा कैसे माना जाए मतलब उन्होंने अगर जगत बनाया है तो

431
00:31:24,560 --> 00:31:28,720
फिर उन्हें अधिकार मिल जाता है कि वो हमारे साथ कुछ भी करते रहे हम उनसे कुछ कहे

432
00:31:28,720 --> 00:31:32,160
ना जगत कभी जगत का विनाश

433
00:31:32,160 --> 00:31:36,160
भी तो कर अधिकार है। विश्वजीत जी यहां पर एक बात है। हां तो यही

434
00:31:36,160 --> 00:31:40,160
तो मैं पूछ रहा हूं ना। उन्हें अधिकार किसने दिया हमारे साथ

435
00:31:40,160 --> 00:31:44,160
क्या करेंगे या नहीं? किरण जी एक मिनट विश्वजीत जी आपने कहा

436
00:31:44,160 --> 00:31:48,400
ईश्वर ये अच्छे बुरे सब कुछ से परे है। ठीक है वो परे

437
00:31:48,400 --> 00:31:52,480
है। उनके ऊपर शास्त्र का कोई नियम लागू नहीं होता। परंतु हमारे ऊपर तो लागू होता है

438
00:31:52,480 --> 00:31:56,720
ना। तो हम क्यों ऐसे ईश्वर को माने? हमारे सापेक्ष

439
00:31:56,720 --> 00:32:01,040
में हमारे ऊपर तो शास्त्र का नियम लागू होता है। हम तो उनको ही फॉलो करेंगे ना।

440
00:32:01,040 --> 00:32:06,800
अब देखिए ईश्वर जब अच्छा काम करते हैं तो राम कहते हैं

441
00:32:06,800 --> 00:32:10,960
जी मुझे कंप्लीट करने दीजिए। अगर वो अच्छा काम कर रहे हैं तो हम कहते हैं राम

442
00:32:10,960 --> 00:32:15,040
विग्रह धर्म। अगर बुरे काम शास्त्र विरुद्ध काम करते हैं तो उनको बुद्ध कह रहे हैं।

443
00:32:15,040 --> 00:32:19,120
आप एक तरफ राम को मानते हैं परंतु बुद्ध को नहीं मानते। तो ऐसा क्यों? अगर शास्त्र

444
00:32:19,120 --> 00:32:23,200
से परे कुछ सब कुछ एक है तो आप दोनों को ही मानिए ना। हमें

445
00:32:23,200 --> 00:32:27,360
तो कोई बुरा कार्य करते हैं उससे भी सही

446
00:32:27,360 --> 00:32:31,680
कार्य सिद्ध होता है। हम तो यहां पर वो क्योंकि शास्त्र

447
00:32:31,680 --> 00:32:35,840
विरुद्ध काम कर रहे हैं इसलिए हम बुद्ध को नहीं मानते। हम राम को मानते हैं। है ना?

448
00:32:35,840 --> 00:32:39,920
तो हमारे सापेक्ष में अगर हमारे तरफ से अगर देखेंगे तब

449
00:32:39,920 --> 00:32:44,000
तो अच्छा बुरा है ना? वो कर रहे हैं वो तो हो

450
00:32:44,000 --> 00:32:48,160
रहा है ना काम। अगर अच्छा अगर हम कहेंगे बुरा काम तो क्या बुरा

451
00:32:48,160 --> 00:32:52,240
काम करेंगे? चोरी डकैती ऐसा ही कुछ करेंगे। वो तो व्यवहारिक दृष्टि से ही होगा

452
00:32:52,240 --> 00:32:56,800
ना पारमासिक दृष्टि से तो कुछ भी नहीं है सब कुछ वेदों का खंडन किया तो

453
00:32:56,800 --> 00:33:02,800
वेदों का खंडन किया तो उन्होंने बुद्ध रूप में

454
00:33:03,440 --> 00:33:07,440
तो वेदों का खंडन वेदों की निंदा कर दी

455
00:33:07,440 --> 00:33:11,600
शक्ति तो प्राप्त नहीं हुई ना जैसे रामचंद्र जी को हुई और ना ही हम किसी

456
00:33:11,600 --> 00:33:15,760
भी प्रकार की स्तुतियां गाते हैं महात्मा बुद्ध की आपका प्रश्न यह है

457
00:33:15,760 --> 00:33:20,000
कि क्या ईश्वर पाप कर सकता है हमने इसका उत्तर

458
00:33:20,000 --> 00:33:24,480
कोई ऐसी ऐसा उदाहरण दीजिए इनको

459
00:33:24,480 --> 00:33:28,720
ईश्वर के एक मिनट भैया मैं इसका जवाब देता हूं सकते हैं और

460
00:33:28,720 --> 00:33:32,720
उसी के अनुसार हम ईश्वर का उस रूप को स्वागत भी

461
00:33:32,720 --> 00:33:36,880
करेंगे जैसे मान लीजिए कोई अपराधी

462
00:33:36,880 --> 00:33:40,880
के रूप में सुनिए सुनिए हमारी टीम में से कोई ऐसा उदाहरण

463
00:33:40,880 --> 00:33:44,880
प्रस्तुत करिए जिसको स्वीकार करने में सामने वाले पक्ष

464
00:33:44,880 --> 00:33:49,280
को परेशानी हो समस्या हो जाए

465
00:33:49,280 --> 00:33:53,680
ऐसा उदाहरण दीजिए क्या ईश्वर ऐसा कर सकता है तो उसको बोलने में ही तकलीफ हो जाए

466
00:33:53,680 --> 00:33:57,760
शरद जी अच्छा शरद जी क्या सुन लीजिए शरद जी हैंड रेज किए हुए हैं काफी देर तक

467
00:33:57,760 --> 00:34:01,920
जीर हां शशिवांश जी तो मैं कह रही

468
00:34:01,920 --> 00:34:05,920
हूँ कि जैसे सूरज है सूरज के होते

469
00:34:05,920 --> 00:34:10,160
हुए भीतर ही सब कुछ हो रहा है पाप पुण्य

470
00:34:10,160 --> 00:34:14,160
सब कुछ जो नहीं होना चाहिए वो भी हो रहा है जो हो रहा है वो भी

471
00:34:14,160 --> 00:34:18,160
हो रहा है तो क्या ये सूरज उसके कारण

472
00:34:18,160 --> 00:34:18,660
बनते

473
00:34:18,640 --> 00:34:22,640
है इनडायरेक्टली यस ठीक है लेकिन क्या वो अटैच्ड है

474
00:34:22,640 --> 00:34:26,880
उस चीज का नहीं है तो वैसे ही तो इनडायरेक्टली वो कारण

475
00:34:26,880 --> 00:34:30,880
है भी लेकिन प्रतीत हमको होता है कि हम कर रहे हैं यू

476
00:34:30,880 --> 00:34:34,880
नो एक दूसरे के ऊपर जो भी होता है यू नो अच्छा बुरा एक्सट्रा सो द सेम

477
00:34:34,880 --> 00:34:39,040
वे तो भगवान भी वैसे ही है वो बिल्कुल डिटच्ड है

478
00:34:39,040 --> 00:34:43,200
ठीक है लेकिन है जरूर उनके भीतर ही है मतलब उनके आमने

479
00:34:43,200 --> 00:34:47,360
सामने ही हो रहा है जो भी हो रहा है तो पाप भी हो रहा है पुण्य भी

480
00:34:47,360 --> 00:34:51,840
हो रहा है लेकिन लेकिन हमने अपना अपना डेफिनेशन बना दिया है। वी गेट अटैच

481
00:34:51,840 --> 00:34:56,000
टू इट। है ना? हम अटैच हो जाते हैं। लेकिन सूरज कभी अटैच नहीं होते। वो कभी

482
00:34:56,000 --> 00:35:00,080
बोलते नहीं कि मेरे वजह से पाप हुआ। मेरे होते हुए ये हुआ।

483
00:35:00,080 --> 00:35:04,160
मेरे होते हुए अच्छा हुआ। आई थिंक दैट्स द एग्जांपल। किसी को काउंटर करना

484
00:35:04,160 --> 00:35:08,160
है तो कर सकते हैं। हम करिए मैडम। सूरज क्या

485
00:35:08,160 --> 00:35:12,320
पाप कर रहा है? सूरज के होते हुए ही हो रहा है ना नयन जी? मतलब

486
00:35:12,320 --> 00:35:16,640
ना दिन में चोरी होती है कर सकते हैं जैसे

487
00:35:16,640 --> 00:35:20,160
डेजर्ट रेगिस्तान

488
00:35:20,160 --> 00:35:24,320
एक अब अभी शरद जी और नयन जी में होने दीजिए फिर आवश्यकता

489
00:35:24,320 --> 00:35:29,280
पड़ने पे जिसका पक्ष हल्का होगा तो उसकी टीम का दूसरा मेंबर आ जाएगा ठीक है

490
00:35:29,280 --> 00:35:33,680
अच्छा तो हां एक सेकंड मैं कंप्लीट कर लूं

491
00:35:33,680 --> 00:35:38,880
हां जी नयन जी सूरज के सामने ही हो रहा है ना गाली गलौज मारपीट

492
00:35:38,880 --> 00:35:44,240
एक दूसरे का जो भी जो भी हम सोच सकते हैं ना बुरा

493
00:35:44,240 --> 00:35:48,240
तो आप कह रहे उसका दोष उन पर नहीं लगेगा हां तो

494
00:35:48,240 --> 00:35:52,400
उनको दोष कहां लगती है अच्छा तो ऐसे तो

495
00:35:52,400 --> 00:35:56,400
अच्छा अच्छा चलिए आप रास्ते से जा रहे हैं कहीं पर किसी लोग

496
00:35:56,400 --> 00:36:00,480
किसी इंसान ने और किसी व्यक्ति को खून कर दिया तो आप सामने खड़े थे आप कुछ

497
00:36:00,480 --> 00:36:04,640
कर सकते थे नहीं परंतु नहीं किया तो उसका दोष आप पर नहीं लगेगा कि आपने ऐसा

498
00:36:04,640 --> 00:36:08,880
क्यों नहीं किया या फिर शास्त्रों में तो ऐसा भी आया है कि

499
00:36:08,880 --> 00:36:12,960
जो केवल मांस खाता है उसका दोष केवल उसे नहीं लगता जो उसको काटता है,

500
00:36:12,960 --> 00:36:17,040
जो उसको बनाता है, जो उसको देखता है, जो उसका समर्थन करता है, सभी के ऊपर समान पाप लगता

501
00:36:17,040 --> 00:36:21,200
है। हां नयन जी दोष लगता है जीव के पर्सपेक्टिव

502
00:36:21,200 --> 00:36:25,680
से ना तो कि ब्रह्म के पर्सेक्टिव से या ईश्वर के

503
00:36:25,680 --> 00:36:29,840
पर्सेक्टिव से। हां तो अगर पाप करेगा वो तो उसके पर्सेक्टिव से थोड़ी होगा।

504
00:36:29,840 --> 00:36:33,840
पाप तो हमारे पर्सेक्टिव से ही होगा। हां। तो हम मानव को थोड़ी ना ईश्वर कह रहे

505
00:36:33,840 --> 00:36:37,840
हैं। हम तो आम आदमी को ईश्वर नहीं कह रहे हैं। हम तो जो कार्य हो रहा है

506
00:36:37,840 --> 00:36:41,920
जिसका दृष्टा जैसे शिवश ने भी बोला जैसे सूरज है जो दृष्टा

507
00:36:41,920 --> 00:36:46,400
है जो सब कुछ उनको पता है उनके भीतर उनके आम सामने ही हो रहा है।

508
00:36:46,400 --> 00:36:48,800
ठीक है? लेकिन वो दूषित नहीं है। दूषित नहीं

509
00:36:48,800 --> 00:36:52,880
है क्योंकि वो अटैच्ड नहीं है। वो खुद कर भी रहे हैं लेकिन नहीं

510
00:36:52,880 --> 00:36:56,880
भी कर रहे हैं। लेकिन मानव तो सीधा-सीधा वो तो मुक्त पुरुष नहीं

511
00:36:56,880 --> 00:37:01,200
है ना। वो तो सूरज नहीं है। वो तो लेगा ही ब्लेम। उसको तो पड़ेगा ही ब्लेम।

512
00:37:01,200 --> 00:37:05,200
और वैसे भी हम जगत में एक दूसरे को तो नहीं पूछ रहे हैं। अच्छा पहली बात मैम

513
00:37:05,200 --> 00:37:09,440
आप दीदी आप ये मत कहिए कि सूरज के उदाहरण को आप

514
00:37:09,440 --> 00:37:13,600
क्योंकि हम जो कि मैं क्या उदाहरण

515
00:37:13,600 --> 00:37:17,920
दू आप पहले सुनिए ना देखिए देखिए सूरज

516
00:37:17,920 --> 00:37:22,000
जो है आपने जो सूरज का उदाहरण दिया तो उसको तो हम फॉलो नहीं कर सकते जैसे कि राम कृष्ण

517
00:37:22,000 --> 00:37:26,240
कोई विग्रह है तो आप उसका उदाहरण दीजिए जिसको हम फॉलो कर सकते हैं जो मनुष्य बनकर

518
00:37:26,240 --> 00:37:30,720
आया है जो कार्य कर रहा है

519
00:37:30,720 --> 00:37:34,720
अगर आप कहेंगे सूर्य चंद्र तो उनका हम कैसे फॉलो करेंगे वो पाप करेंगे पुण्य करेंगे

520
00:37:34,720 --> 00:37:38,960
सूरज को हम पूजते हैं कैसी बात कर रहे हैं नयन जी सूर्य आदित्य को हम पूजते

521
00:37:38,960 --> 00:37:43,040
हैं वो राम से कम नहीं है वो भी ईश्वर ही है जो पूरे

522
00:37:43,040 --> 00:37:47,040
जगत को चला रहे हैं अच्छा तो आप एक बात में एक लाइन में मुझे बताइए

523
00:37:47,040 --> 00:37:51,120
क्या सूरज पाप कर सकता है कि नहीं नयन जी

524
00:37:51,120 --> 00:37:55,120
उनके प्रेजेंस में ही तो हो रहा है सब कुछ पाप कर

525
00:37:55,120 --> 00:37:59,520
सकता है कि नहीं हो तो रहा है पाप तो

526
00:37:59,520 --> 00:38:03,520
जिसके समक्ष में पाप हो रहा है वो कुछ नहीं कर सकता

527
00:38:03,520 --> 00:38:07,600
है तो ऐसे पापी या पाप ईश्वर इसमें

528
00:38:07,600 --> 00:38:13,120
साक्षी कौन बनेगा कि ईश्वर पाप कर इसका साक्षी कौन बनेगा

529
00:38:13,120 --> 00:38:17,840
सूरज ही तो है मैं वही इसका उत्तर तो शिवश भैया ने दिया था ना

530
00:38:17,840 --> 00:38:22,720
वेद पुराण ही बोल

531
00:38:22,720 --> 00:38:25,040
आप

532
00:38:25,040 --> 00:38:30,160
देखता हूं मैं वेद पुराण में तो ईश्वर सब चीज

533
00:38:30,160 --> 00:38:34,320
है तो फिर उनको उनके ऊपर कैसे दोष लगेगा परमार्थ के दृष्टि

534
00:38:34,320 --> 00:38:39,680
से जी यहां पर प्रश्न ये है

535
00:38:39,680 --> 00:38:43,680
उनको रुकिए रुकिए ये तो हमारा भ्रम हो सकता है कि

536
00:38:43,680 --> 00:38:47,920
हां ईश्वर हो रहा है लेकिन ऐसा ऐसा

537
00:38:47,920 --> 00:38:52,800
है ना जी आप नयन जी मैं आपको एक बात कहूंगा

538
00:38:52,800 --> 00:38:56,800
आप ना प्रश्न बदल दीजिए ना जैसे सूरज को ले बात हो रही

539
00:38:56,800 --> 00:39:01,360
है और उसमें आपको दिक्कत हो रही तो आप प्रश्न ये कर दीजिए क्या

540
00:39:01,360 --> 00:39:06,000
ईश्वर साकार स्वरूप लेकर के एक छोटी बच्ची के साथ

541
00:39:06,000 --> 00:39:10,080
बलात्कार कर सकता है? ऐसे करिए ना मैंने आपको पहले भी

542
00:39:10,080 --> 00:39:14,320
इस तरह का उदाहरण पूछने के लिए कहा था। ऐसा प्रश्न करिए

543
00:39:14,320 --> 00:39:18,720
जिसमें सामने वाले को उसको स्वीकार करने में ही छटपटाहट

544
00:39:18,720 --> 00:39:23,600
हो जाए। हां तो यही यही वाला प्रश्न

545
00:39:23,600 --> 00:39:26,640
इसको ऐसे

546
00:39:26,640 --> 00:39:30,640
और एक एक चीज मैं और कहूंगा कि अभी एक बात चल रही

547
00:39:30,640 --> 00:39:34,800
है कि जिसके समक्ष जो कार्य हो रहा होता है तो यदि

548
00:39:34,800 --> 00:39:38,960
किसी के समक्ष हो रहा है तो उसको

549
00:39:38,960 --> 00:39:43,520
वह कार्य करने वाला माना जाता है। तो

550
00:39:43,520 --> 00:39:47,520
यदि मैं मैं कहीं पर बैठा हूं और चींटी कोई

551
00:39:47,520 --> 00:39:51,760
कार्य कर रही है जो मैं नहीं कर सकता। वो बिल में घुस रही है

552
00:39:51,760 --> 00:39:54,960
तो क्या चींटी में बिल में चींटी के द्वारा बिल को बिना तोड़े

553
00:39:54,960 --> 00:39:58,960
उसमें घुसना मैंने किया तो इस तरह का काउंटर

554
00:39:58,960 --> 00:40:03,040
करिए ना ठीक है शिवाजी सॉरी लेकिन

555
00:40:03,040 --> 00:40:07,040
मेरे उसका किसी ने कुछ जवाब नहीं दिया मतलब सूरज के आपको समझ

556
00:40:07,040 --> 00:40:11,840
में आया उदाहरण नयन जी जी

557
00:40:11,840 --> 00:40:16,000
समझ में आया आपको मतलब मैं कहना क्या चाह रही हूं कि सूरज इनडायरेक्टली

558
00:40:16,000 --> 00:40:21,280
कारण है भैया अगर जैसा कि आपने सवाल पूछा

559
00:40:21,280 --> 00:40:23,840
आपने क्या

560
00:40:23,840 --> 00:40:27,440
होगा

561
00:40:27,440 --> 00:40:31,760
सरस्वती जी आपने क्या कहा सूरज इनडायरेक्टली आपका कारण है नहीं नहीं सूर्य

562
00:40:31,760 --> 00:40:36,000
सुनिए सूरज के प्रेजेंस में प्रेजेंस में ही हो रहा है हम एक दिन दूसरे

563
00:40:36,000 --> 00:40:40,000
को देख पा रहे हैं गाली गलौज चलता है मारपीट चलती है बहुत

564
00:40:40,000 --> 00:40:44,160
कुछ अच्छा भी होता है बहुत कोई लोग कल्याण भी कर रहे हैं सब कुछ

565
00:40:44,160 --> 00:40:48,720
ही कर रहे हैं आप सोच लीजिए एक हफ्ता सूरज नहीं निकला कितना

566
00:40:48,720 --> 00:40:53,120
कुछ नुकसान हो सकता है। धरती इधर की उधर हो जाएगी। खानपीन

567
00:40:53,120 --> 00:40:57,200
इधर की उधर हो जाएगी। हमारा जीना मुश्किल हो जाएगा। ऑक्सीजन

568
00:40:57,200 --> 00:41:01,280
आना बंद हो जाएगा। प्लांट नहीं ग्रो करेगा। सुनिए

569
00:41:01,280 --> 00:41:05,440
सुनिए मेरा कहना है कि सूरज होते हुए ही सब कुछ

570
00:41:05,440 --> 00:41:09,520
हो भी रहा है। पाप भी हो रहा है। सब कुछ हो रहा है। तो सूरज इज नॉट लेस देन एनी

571
00:41:09,520 --> 00:41:13,600
गॉड। है ना? वो साकार भी है। हम देख पाते हैं उठ के।

572
00:41:13,600 --> 00:41:17,600
है ना? तो उनकी पूजा भी करते हैं। हम में जब गर्मी होती है हम उनको

573
00:41:17,600 --> 00:41:21,760
दोष भी देते हैं कि भाई इतनी गर्मी हो रही है करके तो इनडायरेक्टली

574
00:41:21,760 --> 00:41:25,760
वो कारण बने हुए हैं या फिर जो अलग मतलब जो ग्रो किया है

575
00:41:25,760 --> 00:41:29,840
अपने यू नो आध्यात्मिक में उसकी दृष्टि अलग हो सकती है। इसका कुछ काउंटर

576
00:41:29,840 --> 00:41:34,240
है आपका तो पाप हो तो रहा है पाप भी हो रहा है पुण्य भी हो रहा है। एक मिनट

577
00:41:34,240 --> 00:41:38,560
मुझे बोलने दीजिए थोड़ा सा निष्कर्ष क्या निकला सूरज

578
00:41:38,560 --> 00:41:43,120
जो है वो जगत का कारण है और जगत में जो भी पाप आप दे रहे हो उदाहरण

579
00:41:43,120 --> 00:41:47,120
तो इसका आप किस तरह से रीजन सूरज को

580
00:41:47,120 --> 00:41:51,120
बता रहे हो सूरज तो जगत के निर्माण का कारण आप बता रहे

581
00:41:51,120 --> 00:41:55,200
हो ना उसमें इनका सीधा सा प्रश्न है जानबूझ के ईश्वर पाप कर

582
00:41:55,200 --> 00:41:59,440
सकते हैं या नहीं कर सकते हैं बस

583
00:41:59,440 --> 00:42:03,600
जानबूझ के कर सकते हैं यस बिल्कुल कर सकते जानबूझ के

584
00:42:03,600 --> 00:42:08,240
बस अब काउंटर कीजिए नयन जी आप तो आपका निष्कर्ष क्या निकला

585
00:42:08,240 --> 00:42:13,520
इनडायरेक्टली आपका कारण है

586
00:42:13,520 --> 00:42:17,600
देखिए दुनिया में क्राइम्स हो रहे हैं ना क्या

587
00:42:17,600 --> 00:42:21,680
आप बार-बार उदाहरण दे आप सीधी बात कहे ना वो इनडायरेक्टली पाप का कारण है या

588
00:42:21,680 --> 00:42:27,680
नहीं अरे हम कोई बुरा कार्य कर सकते

589
00:42:28,160 --> 00:42:32,160
है पुण्य का निष्ठा हो जाए तो वो पाप आचरण कर दे

590
00:42:32,160 --> 00:42:36,400
तो उसको हम समर्थन दे देंगे कि अगर वो दृष्टा स्वरूप में पाप कर रहा है

591
00:42:36,400 --> 00:42:40,640
सीधा सा बात है भगवान या सूरज जो भी कहेंगे

592
00:42:40,640 --> 00:42:45,120
इनडायरेक्टली पाप का कारण है हां या नहीं

593
00:42:45,120 --> 00:42:49,120
जैसे एग्जांपल के तौर पर राम जी

594
00:42:49,120 --> 00:42:53,200
ने बाली को पीछे से मारा वो नियम के तो

595
00:42:53,200 --> 00:42:59,120
विरोधी था

596
00:42:59,120 --> 00:43:03,120
विश्वजीत जी एक प्रश्न मैं पूछ रहा था आपसे कि जिस तरह से आप कह रहे हो कि

597
00:43:03,120 --> 00:43:07,440
पाप आचरण अगर दृष्टा स्वरूप में वो करे तो पाप आचरण स्वीकार है।

598
00:43:07,440 --> 00:43:11,440
तो यह पाप आचरण करने के लिए क्या उसके दृष्टा स्वभाव में ऐसा

599
00:43:11,440 --> 00:43:15,520
नहीं आ रहा कि ये पाप और पुण्य में क्या भेद है और पाप करना चाहिए कि पुण्य करना

600
00:43:15,520 --> 00:43:21,520
चाहिए। उनके लिए सब एक बराबर है।

601
00:43:23,360 --> 00:43:27,440
क्योंकि उनको ना तो पाप लगता है ना पुण्य लगता है। वो कुछ भी करें।

602
00:43:27,440 --> 00:43:31,520
यह परमार्थ की दृष्टि से अगर हमारे दृष्टि से देखा जाए तो फिर यह सवाल हो सकता

603
00:43:31,520 --> 00:43:36,400
है तो दृष्टि हमारी होगी ना पाप और पुण्य तो हमारे

604
00:43:36,400 --> 00:43:40,400
हां आपके क्वेश्चन का तो मैंने जवाब दे दिया जो आप लोगों ने काउंटर किया कि पाप कर सकते

605
00:43:40,400 --> 00:43:44,560
हैं तो मैंने बोला हां शॉर्टकट में अगर आंसर दिया जाए एक बात में तो

606
00:43:44,560 --> 00:43:48,880
फिर दूसरा सवाल उठ रहा है ना कि पाप और पुण्य तो

607
00:43:48,880 --> 00:43:52,880
साधारण व्यक्ति भी भेद कर सकता है तो वो किस प्रकार से भेद नहीं कर पा रहे हैं और पाप

608
00:43:52,880 --> 00:43:56,880
कर दे रहे हैं नहीं आपने उनके शक्ति

609
00:43:56,880 --> 00:44:01,040
व्यक्तिमत्ता पे सवाल उठाया ना कि क्या कर सकते हैं? तो मैंने बोला हां

610
00:44:01,040 --> 00:44:05,440
चाहे तो कर सकते हैं। तो फिर आप इसका

611
00:44:05,440 --> 00:44:09,600
बताइए कि अगर कर सकता है तो फिर ऐसा अगर हो जाए तो

612
00:44:09,600 --> 00:44:13,600
कैसे कर पा रहा है कि अगर सात समत वो कार्य नहीं

613
00:44:13,600 --> 00:44:17,680
है तो उसको कर भी रहा है और दृष्टा भाव भी है कि मैं

614
00:44:17,680 --> 00:44:21,760
ईश्वर ने इसलिए बनाया ताकि मानव का कल्याण हो सके ना कि

615
00:44:21,760 --> 00:44:26,400
उन्होंने अपने ऊपर नियम लागू करने के लिए वो शास्त्र का निर्माण किए थे। ईश्वर

616
00:44:26,400 --> 00:44:30,400
वो मानव के कल्याण का एक रास्ता था शास्त्र कि उसका पालन

617
00:44:30,400 --> 00:44:34,720
करके हम ईश्वर तक पहुंच सके तो मोक्ष मिल सके

618
00:44:34,720 --> 00:44:38,560
टेररिस्ट है जिसका एक ऐम है कि पर्टिकुलर एरिया में हमको

619
00:44:38,560 --> 00:44:42,800
जो है सबका विनाश करना है और उसको अंतत पता है कि शरीर तो है नहीं शरीर का तो विनाश

620
00:44:42,800 --> 00:44:46,800
ही हो जाना है तो हम अपने मकसद को पूरा करने के लिए मार देते हैं सभी को

621
00:44:46,800 --> 00:44:50,880
तो रूह ही अंतिम सत्य है तो उस विचार से तो फिर वो

622
00:44:50,880 --> 00:44:54,960
भी दृष्टा ही है और उस कार्य को आप समर्थन दोगे क्योंकि वो ईश्वर का ही

623
00:44:54,960 --> 00:44:58,640
कार्य कर रहा है यहां नहीं मैं

624
00:44:58,640 --> 00:45:02,800
अगर उसका अंत हो गया मतलब उसके

625
00:45:02,800 --> 00:45:06,880
कर्मों पे भी फल देते हैं भगवान ऐसा बात बट उसका जब अंत हो गया जैसे

626
00:45:06,880 --> 00:45:10,880
किसी का देहांत हो जाता है ना उसके लिए पाप पुण्य परिवार कोई मायने नहीं

627
00:45:10,880 --> 00:45:16,800
रखता क्योंकि उसका बहुत बार बहुत

628
00:45:16,800 --> 00:45:21,120
अभी तक की चर्चा से एक चीज क्लियर हो जाए आदित्य जी मैं आपको लूंगा

629
00:45:21,120 --> 00:45:25,120
इसके बाद एक चीज मैं क्लियर कर दूं देखिए यहां पर प्रश्न

630
00:45:25,120 --> 00:45:29,200
ये हो रहा कि जैसे कि क्या ईश्वर पाप कर सकता है?

631
00:45:29,200 --> 00:45:33,280
तो हां यह समझ में आ रहा है कि क्योंकि

632
00:45:33,280 --> 00:45:37,520
सर्व सबका कारण वही है। उसके बिना किसी भी चीज का अस्तित्व

633
00:45:37,520 --> 00:45:41,520
ही नहीं है। तो हम यह नहीं कह सकते है। पाप का कारण भी वही

634
00:45:41,520 --> 00:45:45,600
है। ठीक है? मगर जब उसको और वस्तुनिष्ठता

635
00:45:45,600 --> 00:45:49,760
में जाएंगे कि क्या वो किसी निर्दोष की हत्या कर सकता है चाकुओं से गोद

636
00:45:49,760 --> 00:45:53,840
गोद कर? हम या फिर और

637
00:45:53,840 --> 00:45:58,240
भी इसी तरीके जैसे अभी थोड़ी देर पहले मैंने एक एग्जांपल दिया था उसको नहीं लेते चाकुओं

638
00:45:58,240 --> 00:46:02,800
से गोदने वाली बात को ले लेते हैं तो क्या वो किसी निर्दोष

639
00:46:02,800 --> 00:46:08,560
को चाकुओं से गोदगो गोद कर हत्या कर सकता है क्या वो किसी निर्दोष

640
00:46:08,560 --> 00:46:12,720
के साथ जो है और कुछ अन्याय पूर्वक कार्य कर सकता

641
00:46:12,720 --> 00:46:16,960
है तो यदि हम यह कहते हैं ना हां हां ठीक है हां

642
00:46:16,960 --> 00:46:20,960
कर सकता है ये तो एक अलग बात है कि हां ठीक है? यह तो

643
00:46:20,960 --> 00:46:25,200
हमको पता ही है ना कि आप हां ही कह कहेंगे जो समर्थन में आए हैं हां तो कहेंगे

644
00:46:25,200 --> 00:46:29,680
ही मगर फिर जब वो ऐसा कर सकता है

645
00:46:29,680 --> 00:46:31,920
तो उसको क्यों

646
00:46:31,920 --> 00:46:36,000
ना माना जाए पापी उसके प्रति अच्छे

647
00:46:36,000 --> 00:46:40,880
अच्छा दृष्टिकोण क्यों रखा जाए सम्मान का दृष्टिकोण क्यों रखा जाए

648
00:46:40,880 --> 00:46:45,840
पाप करने वाला होते हुए भी उसको पापी क्यों ना माना जाए ठीक है

649
00:46:45,840 --> 00:46:49,840
तो ये बात आएगी इसका उत्तर देता हूं हम तो अभी पहले

650
00:46:49,840 --> 00:46:55,120
जरा आदित्य जी को सुन ले वो काफी देर से वेट कर रहे थे हम

651
00:46:55,120 --> 00:46:59,280
जय श्री राम भैया जय श्री राम बताइए जी मैं

652
00:46:59,280 --> 00:47:03,520
इसी प्रश्न का उत्तर देना चाहता था नयन जी ने जो पूछा कि क्या ईश्वर

653
00:47:03,520 --> 00:47:08,160
पाप कर सकता है हम तो सबसे पहले पाप के लिए हमें

654
00:47:08,160 --> 00:47:12,240
यहां पर दो लोग चाहिए कम से कम द्वैत होना चाहिए इसमें क्योंकि

655
00:47:12,240 --> 00:47:17,200
अगर पाप होगा तो दूसरे के साथ कुछ ना कुछ ऐसा घटित होगा

656
00:47:17,200 --> 00:47:21,520
जो कि सही नहीं है इसीलिए उसे पाप कहा जाएगा। जैसे चोरी,

657
00:47:21,520 --> 00:47:25,840
चकारी या किसी को मारना या किसी के साथ अहित करना तो वो दूसरा

658
00:47:25,840 --> 00:47:29,840
किस में होना चाहिए? हम तो अब जैसे

659
00:47:29,840 --> 00:47:34,080
हम सब जानते हैं नयन जी सबको पता है कि यह जगत है

660
00:47:34,080 --> 00:47:38,160
ईश्वर ईश्वर ने बनाया है। इसमें जितने भी जीव हैं वस्तुएं जो

661
00:47:38,160 --> 00:47:42,880
जो कुछ भी है सब ईश्वर ही है। तो हम

662
00:47:42,880 --> 00:47:47,040
जीव रूप में भी या रावण या कंस के रूप में भी

663
00:47:47,040 --> 00:47:51,680
जितने भी जीव या जितने भी मनुष्य हैं वो सब ईश्वर ही हैं।

664
00:47:51,680 --> 00:47:55,760
आप यह बात तो मानते ही हैं। तो ईश्वर

665
00:47:55,760 --> 00:48:00,080
जीव रूप में या मनुष्य रूप में जो भी पाप कर रहा है मान लीजिए कि किसी मनुष्य

666
00:48:00,080 --> 00:48:04,160
ने जैसे अभी भैया ने कहा कि किसी को चाकू घोद के मार दिया तो

667
00:48:04,160 --> 00:48:08,320
जो मारने वाला था वो भी ईश्वर ही है और जो मरने वाला है वो भी ईश्वर

668
00:48:08,320 --> 00:48:12,800
ही है। तो इसमें ईश्वर ने

669
00:48:12,800 --> 00:48:17,360
किसी ना किसी रूप में वो पाप करके दिखा ही दिया।

670
00:48:17,360 --> 00:48:21,600
पाप किया है यहां पे। तो अब उसको आपका दूसरा प्रश्न

671
00:48:21,600 --> 00:48:25,680
है कि ईश्वर पाप कर सकता है लेकिन हम उस पापी क्यों ना माने

672
00:48:25,680 --> 00:48:30,560
तो शास्त्रों के अनुसार रामो विग्रह धर्मा पूजन

673
00:48:30,560 --> 00:48:34,640
या ईश्वर को मानना हमें केवल उसी रूप में मानना चाहिए

674
00:48:34,640 --> 00:48:38,640
जो धर्म का प्रतीक है जो पाप और पुण्य से

675
00:48:38,640 --> 00:48:42,640
जो शास्त्रों में लिखा है उसी है जी

676
00:48:42,640 --> 00:48:46,960
बिल्कुल ऐसे भगवान बुद्ध भगवान बुद्ध है उनको

677
00:48:46,960 --> 00:48:51,040
ईश्वर है तो ईश्वर का ही अवतार लेकिन उनकी पूजा नहीं करनी चाहिए। नहीं

678
00:48:51,040 --> 00:48:55,040
करते हैं। ऐसा विधान नहीं है। राम की कृष्ण की पूजा करनी चाहिए। शिव जी

679
00:48:55,040 --> 00:48:59,040
की पूजा करनी चाहिए। तो तो आदित्य जी जैसे

680
00:48:59,040 --> 00:49:02,240
अगर आप कह रहे सर्वशक्तिमान है और पाप और पुण्य

681
00:49:02,240 --> 00:49:06,320
समान रूप से कर ही रहा है और उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है तो क्या ईश्वर ये भी कर सकता है

682
00:49:06,320 --> 00:49:10,560
कि हमारे सामने पाप और अधर्म का ही उदाहरण प्रस्तुत करें और हम अधर्म का

683
00:49:10,560 --> 00:49:14,800
जो है पूजन करने लगे जैसे धर्म की करते हैं क्योंकि ईश्वर तो इसको भी करने में हां बिल्कुल

684
00:49:14,800 --> 00:49:18,800
ऐसा ऐसा हुआ भी है रावण जो था वो पाप ही करता था

685
00:49:18,800 --> 00:49:23,040
और उसके पूजन भी करते थे उसके अनुय

686
00:49:23,040 --> 00:49:28,880
उसके अनुय नहीं चार भम दृष्टि से बताइए

687
00:49:28,880 --> 00:49:33,520
भैया मैं इसका उत्तर देता हूं अगर किसी का कोई भी

688
00:49:33,520 --> 00:49:37,760
कर सकता है जो उसके अनुय होते हैं वैसे का

689
00:49:37,760 --> 00:49:41,760
काउंटर ये हो सकता है बहुत सरल कि भाई आपने जो

690
00:49:41,760 --> 00:49:46,720
कुछ बताना शुरू किया वो अद्वैत से किया है तो उसके लिए तो पहले

691
00:49:46,720 --> 00:49:51,840
वो पहले सबको अद्वैत को मानने वाला होना चाहिए

692
00:49:51,840 --> 00:49:55,840
जी भैया यही बात वहां जाना पड़ेगा ना अद्वैत तत

693
00:49:55,840 --> 00:50:01,680
के आधार पर किया आपने ना शुरू में ही बोला कि सब कुछ ईश्वर ही है तो फिर ईश्वर

694
00:50:01,680 --> 00:50:07,200
क्या कहते हैं फिर ऐसा कह ही नहीं सकते कि कोई कार्य नहीं

695
00:50:07,200 --> 00:50:13,120
ले लीजिए इंद्रजीत

696
00:50:13,120 --> 00:50:17,280
भैया इंद्रजीत का एग्जांपल ले लीजिए उन्होंने अपने पिता का बात

697
00:50:17,280 --> 00:50:21,280
ही माना था तो उनको पाप नहीं लग सकता उस वक्त उन्होंने वही किया जो

698
00:50:21,280 --> 00:50:25,280
उनके पिता ने कहा उनको पता था कि गलत है नारायण

699
00:50:25,280 --> 00:50:29,360
भगवान के अवतार से मैं युद्ध कर रहा हूं। बट फिर भी उन्होंने वो किया जो

700
00:50:29,360 --> 00:50:33,840
उनका धर्म था पिता का आज्ञा पालन करना। हम तो

701
00:50:33,840 --> 00:50:39,440
इसमें क्या पर युद्ध से जाने से पहले

702
00:50:39,440 --> 00:50:43,920
जैसे वो बोल रहे ना कि गलत कार्य को भी मतलब अपना बना सकते हैं मोरल।

703
00:50:43,920 --> 00:50:48,560
तो उसका एक एग्जांपल था कि हां उस वक्त भी पाप नहीं लगेगा।

704
00:50:48,560 --> 00:50:52,800
क्योंकि उनको पाप नहीं लगा था। इंद्रजीत जो थे इंद्रजीत को पाप

705
00:50:52,800 --> 00:50:56,960
लगा पाप नहीं लगा था। वो तो अपने पिता के उस व्यवस्था के कारण युद्ध में जा

706
00:50:56,960 --> 00:51:01,680
रहे थे पर इसका मतलब जैसे जैसे कोई गलत काम करते हैं उनका कोई अनुयाई

707
00:51:01,680 --> 00:51:05,680
बन जाता है ना तो वो अपना एक तरह से धर्मी कर रहे होते अपने अकॉर्डिंग

708
00:51:05,680 --> 00:51:10,080
बट गलत वो जिनको सब कुछ पता रहे कि हां मैं गलत कर रहा हूं उनके

709
00:51:10,080 --> 00:51:16,080
ऊपर दोष लगेगा चलिए भैया इनको काउंटर दीजिए

710
00:51:17,760 --> 00:51:21,760
मतलब किसी भी प्रकार के दोष को अगर हम अवगत कराने के लिए कोई है और

711
00:51:21,760 --> 00:51:25,840
अगर अवगत करवाने के लिए अगर कोई करे तब पाप लगेगा। अवगत

712
00:51:25,840 --> 00:51:30,480
अगर वो हुआ ही नहीं तो उसके ऊपर क्या पाप लगेगा? मैं एक मैं एक जो है मैं

713
00:51:30,480 --> 00:51:34,560
एक एक विनोद पूर्ण बात यहां पे कहना चाहूंगा।

714
00:51:34,560 --> 00:51:38,880
पाप वाले कांसेप्ट हमारे क्लियर है नहीं जो शुरुआती

715
00:51:38,880 --> 00:51:42,880
स्तर पर किए जाते हैं विरोधियों के द्वारा और आप

716
00:51:42,880 --> 00:51:47,360
लोग जो है ईश्वर पत्थर और डंडा ये सब गुल्ली ये सब करने लगे।

717
00:51:47,360 --> 00:51:51,600
[हंसी] बताइए पाप वाला

718
00:51:51,600 --> 00:51:55,840
कांसेप्ट ही क्लियर नहीं है। मैंने तो बोल ही दिया था कि हां कर

719
00:51:55,840 --> 00:51:59,840
सकते हैं तो फिर काउंटर प्रश्न ही ऐसा कर रहे हैं उसके अकॉर्डिंग तो फिर

720
00:51:59,840 --> 00:52:04,000
डायवर्ट हो रहा है। अच्छा मैं एक बात कहूं आदित्य जी ने आपने जो कहा

721
00:52:04,000 --> 00:52:08,320
था कि ईश्वर पाप कर सकता है क्योंकि वो सभी प्राणियों में है। यह आपने अद्वैत

722
00:52:08,320 --> 00:52:14,320
के नजरिए से कहा। आप ये द्वैत के नजरिए से कहिए।

723
00:52:15,200 --> 00:52:19,360
के ठीक है ठीक है परमार्थ की दृष्टि

724
00:52:19,360 --> 00:52:23,840
से सब कुछ है मगर हम व्यवहार की दृष्टि से पूछ रहे हैं व्यवहार

725
00:52:23,840 --> 00:52:28,240
में ईश्वर गलत कर सकता है आके सामने

726
00:52:28,240 --> 00:52:32,480
से और सरल कर देता हूं मानव का

727
00:52:32,480 --> 00:52:36,480
रूप लेकर के क्या वो किसी की हत्या कर सकता है यदि कर रहा है

728
00:52:36,480 --> 00:52:42,480
मानवीय रूप में तो भी उसको दोषी क्यों ना माना जाए

729
00:52:44,080 --> 00:52:48,160
निर्दोष की हत्या भैया। अच्छा चलिए एक और बात इसके साथ

730
00:52:48,160 --> 00:52:52,400
मैं जोड़ देता हूं। रामोग्रह धर्म है। एक मिनट रामो विग्रह

731
00:52:52,400 --> 00:52:58,400
वान धर्म है ना? राम धर्म के विग्रहवान है तो राम क्या अधर्म कर सकते हैं?

732
00:52:58,560 --> 00:53:02,560
चलिए ये बताइए। राम जी भगवान है तो वो अधर्म

733
00:53:02,560 --> 00:53:06,560
कर सकते हैं कि भैया इसका उत्तर दे दूं। हम

734
00:53:06,560 --> 00:53:10,960
तो भैया जैसे कि पूछा आपने कि क्या वो

735
00:53:10,960 --> 00:53:14,960
अवतार लेकर के गलत काम कर सकते हैं कि नहीं तो धर्म के विरुद्ध

736
00:53:14,960 --> 00:53:19,120
भी तो कार्य कुछ किए थे भगवान जैसे कि एग्जांपल अगर ले लिया जाए तो वो वाला

737
00:53:19,120 --> 00:53:23,840
जैसे बाली को पीछे से मारे थे तीर चला के

738
00:53:23,840 --> 00:53:27,920
यही तो मुझे सबसे ज्यादा खराब लगा कि आप बाली को पीछे से मारने को धर्म के

739
00:53:27,920 --> 00:53:30,400
विरुद्ध क्यों मानते हैं? अच्छा हुआ ना

740
00:53:30,400 --> 00:53:34,720
कि यहां पर बात ही है क्षत्रिय धर्म तो

741
00:53:34,720 --> 00:53:38,960
क्षत्रिय धर्म ऐसा अल नहीं करता उनको चलिए इनको

742
00:53:38,960 --> 00:53:43,680
समझाएंगे या फिर मैं ही बताऊं सरस जी आप समझाने

743
00:53:43,680 --> 00:53:48,000
के लिए एक मिनट पहले तो ये जो पक्षकार टीम है उनकी

744
00:53:48,000 --> 00:53:52,480
तरफ से देख लीजिए उसके बाद जो खंडन वाली टीम है उससे देखेंगे है ना

745
00:53:52,480 --> 00:53:56,720
तो सरद जी आप बताएंगे इन्हें कि बाली

746
00:53:56,720 --> 00:54:00,880
हां फिर से रिपीट कर इनका कहना कहना है कि देखिए राम जी ने बाली

747
00:54:00,880 --> 00:54:04,880
को पीछे से मारा था तो वो धर्म नहीं था फिर भी उनको हम लोग

748
00:54:04,880 --> 00:54:09,200
नहीं मानते दो ये विश्व जी ने कहा है ना

749
00:54:09,200 --> 00:54:13,280
हम विश्वजीत जी ने कहा है अच्छा तो आपका ये मानना है कि बाकी को

750
00:54:13,280 --> 00:54:17,440
जो उन्होंने पीछे हम लोग खंडन वाले हैं ना पहले सरस जी

751
00:54:17,440 --> 00:54:21,680
जो उनहीं की टीम की है वो अगर बताना चाहे तो बता दे इनका इनका

752
00:54:21,680 --> 00:54:25,920
कहना ये है इस संबंध में कि ईश्वर

753
00:54:25,920 --> 00:54:30,160
पाप भी करता है पर हम उसे दोषी नहीं मानते हैं। तो इस संबंध में

754
00:54:30,160 --> 00:54:34,320
इनका कहना यह है कि देखिए राम जी ने भी पाप किया पर हम उन्हें पापी

755
00:54:34,320 --> 00:54:40,240
नहीं मानते बल्कि धार्मिक ही मानते हैं।

756
00:54:40,240 --> 00:54:44,560
तो क्या आप मानती हैं कि राम जी ने पाप किया बाली को पीछे से मारने

757
00:54:44,560 --> 00:54:48,560
में? क्या आप सहमत हैं? आपकी टीम के जो कि ये कह

758
00:54:48,560 --> 00:54:52,640
रहे हैं। ये यहां पर है विषय। हां

759
00:54:52,640 --> 00:54:56,640
जी। हां जी। पाप हुआ राम जी से और उनको उसका

760
00:54:56,640 --> 00:55:00,800
फल भी मिला। जब श्री कृष्ण बन के आए थे तो उसका

761
00:55:00,800 --> 00:55:05,120
यू नो बाद में उनको वो भोगना भी पड़ा। उनके पैर में भी तीर लगा था।

762
00:55:05,120 --> 00:55:08,800
एक्सक्टली यस

763
00:55:08,800 --> 00:55:12,720
तो राम जी ने अधर्म किया था।

764
00:55:12,720 --> 00:55:16,800
व्यवहारिक दृष्टि से किया था। किया था तो हम उसे धर्म का

765
00:55:16,800 --> 00:55:20,800
विग्रह क्यों कहे? तब तो शास्त्र मिथ्या हो गया। तो शास्त्र मिथ्या

766
00:55:20,800 --> 00:55:25,200
देखिए कर्म सिद्धांत कर्म सिद्धांत ही यही है। अगर भगवान

767
00:55:25,200 --> 00:55:29,760
को अलग से हम देखने लग गए तो पार्शलिटी हो जाएगा। तो शास्त्र

768
00:55:29,760 --> 00:55:33,760
सुनिए एक सेकंड विश्वजीत जी एक सेकंड तो नयन जी

769
00:55:33,760 --> 00:55:37,760
तो यही तो है हम भगवान को पार्शियलिटी नहीं

770
00:55:37,760 --> 00:55:41,760
कर सकते। कर्म सिद्धांत तभी है चाहे वो भगवान हो राक्षस हो

771
00:55:41,760 --> 00:55:46,160
असुर हो मानव हो कोई भी हो जिससे अगर वह कार्य हो गया

772
00:55:46,160 --> 00:55:50,240
तो उसको भोगना ही पड़ेगा लेकिन ईश्वर मुक्त मुक्त एक

773
00:55:50,240 --> 00:55:54,400
सेकंड ईश्वर मुक्त है उनको कुछ फर्क नहीं पड़ता है कि वो

774
00:55:54,400 --> 00:55:55,360
भोग रहे हैं कि नहीं

775
00:55:55,360 --> 00:55:59,440
क्योंकि ना वो भोगता है ना भोगने वाले है ना कुछ है ना

776
00:55:59,440 --> 00:56:03,440
लेकिन मानव अनफॉर्चुनेटली उस साइकिल में फस चुका है है ना तो राम

777
00:56:03,440 --> 00:56:07,600
जी को दोष लगी पाप किया उन्होंने उन्होंने भी भोगा उन्होंने भी सब

778
00:56:07,600 --> 00:56:11,680
कुछ किया लेकिन वो मुक्त पुरुष है तो हमें

779
00:56:11,680 --> 00:56:16,080
उस लेवल पर पहुंचना शास्त्र को हां जी हां जी सॉरी

780
00:56:16,080 --> 00:56:20,160
जी आपने यहां पर दो बात कही पहली बात पार्शियलिटी नहीं हो सकती भगवान

781
00:56:20,160 --> 00:56:24,160
के साथ दूसरी बात वो मुक्त पुरुष है तो मैं ये कहूंगा क्या

782
00:56:24,160 --> 00:56:28,160
कृष्ण मुक्त पुरुष नहीं है नरसिम नरसिम नहीं

783
00:56:28,160 --> 00:56:32,240
है वराह नहीं है तो उनको क्यों नहीं कहते राम को क्यों कहते हैं कि

784
00:56:32,240 --> 00:56:36,480
विग्रह वान है धर्म का जी मैं इसका उत्तर देना चाहता हूं

785
00:56:36,480 --> 00:56:40,640
बहुत बढ़िया नयन जी बहुत बढ़िया चरक जी आपने

786
00:56:40,640 --> 00:56:44,960
भी अच्छा बोला जी तो

787
00:56:44,960 --> 00:56:49,120
आप नयन जी आप ये मानते हैं कि ब्रह्म हत्या पाप होती है

788
00:56:49,120 --> 00:56:53,520
ब्राह्मण हत्या गौ हत्या जी होती है

789
00:56:53,520 --> 00:56:57,680
जी तो श्री राम ने राम के रूप में रावण

790
00:56:57,680 --> 00:57:01,680
का वध किया और रावण को कहा जाता है कि वो ब्राह्मण थे तो ब्राह्मण हत्या

791
00:57:01,680 --> 00:57:05,840
का लगा था और

792
00:57:05,840 --> 00:57:10,480
कहा कि जी ईश्वर अगरता है तो उनके ऊपर कोई पाप नहीं लगता।

793
00:57:10,480 --> 00:57:14,720
एक मिनट एक मिनट मैं एक मैं एक पॉइंट दे दूं। शायद आदित्य

794
00:57:14,720 --> 00:57:18,880
जी भी नहीं जानते हैं। इनकी टीम से ही कोई व्यक्ति

795
00:57:18,880 --> 00:57:22,960
इस बात का उत्तर पहले ही दे चुका है कि

796
00:57:22,960 --> 00:57:27,120
यह जो अभी विषय चल रहा है ना इससे संबंधित उत्तर दे चुका है। मगर संभवत

797
00:57:27,120 --> 00:57:31,120
वो भूल गया है कि इस वो जो उसने बात कही थी वो यहां

798
00:57:31,120 --> 00:57:35,280
जो इस विषय के संबंध में भी वो बात हो सकती है। वो मैं बाद में बताऊंगा।

799
00:57:35,280 --> 00:57:39,440
जो ये बोले तो जी बात कर रहे हैं आदित्य जी और नयन

800
00:57:39,440 --> 00:57:43,440
जी इस समय बात कर रहे हैं जी तो

801
00:57:43,440 --> 00:57:47,520
जैसे श्री राम को पाप लगा था ब्राह्मण हत्या का और उन्होंने

802
00:57:47,520 --> 00:57:52,960
उसका प्रायश्चित भी किया था ऐसा भी हमने शास्त्रों में देखा है तो

803
00:57:52,960 --> 00:57:57,280
और तो आप इससे तो सिद्ध हो गया कि श्री राम जी भी उनसे भी अब

804
00:57:57,280 --> 00:58:01,440
पाप हुआ था ब्राह्मण हत्या की थी दूसरा उनको भगवान क्यों मानना चाहिए

805
00:58:01,440 --> 00:58:05,440
उनको पाप क्यों नहीं मानना चाहिए क्योंकि उन्होंने जो कर्म किया ब्राह्मण

806
00:58:05,440 --> 00:58:09,680
को मारने कहा वो धर्म की रक्षा के लिए गया। इसीलिए राम को रामो विग्रहान

807
00:58:09,680 --> 00:58:13,920
धर्मा कहा जाता है। क्योंकि धर्म की रक्षा करने के लिए वह आते से पाप हुआ

808
00:58:13,920 --> 00:58:18,000
वो वो भी सही है। लेकिन वो क्यों किया? क्योंकि उन्होंने धर्म की

809
00:58:18,000 --> 00:58:22,000
रक्षा करनी थी। इसलिए वो पूजनीय है। तो ये मेरा

810
00:58:22,000 --> 00:58:26,160
उत्तर है। मतलब ईश्वर को भी कर्म का फल मिलता है। मेरा प्रश्न रहेगा कि

811
00:58:26,160 --> 00:58:31,040
तो जो अच्छा जो अकर्ता है उसको कर्म का फल कैसे मिल गया? ये जरा समझाइए।

812
00:58:31,040 --> 00:58:35,120
परमार्थ की दृष्टि से यह सवाल पूछ रहे हैं। आपने अभी की दृष्टि से

813
00:58:35,120 --> 00:58:37,680
पूछा था

814
00:58:37,680 --> 00:58:42,080
रावण के प्रश्न का

815
00:58:42,080 --> 00:58:44,480
भगवान

816
00:58:44,480 --> 00:58:48,560
जैसे आपने कहा था राम जी ने तो क्या

817
00:58:48,560 --> 00:58:52,640
रावण का शरीर जो था जन ब्राह्मण इस प्रकार से व्यवहारिक दृष्टि

818
00:58:52,640 --> 00:58:56,800
से उसने प्रायश्चित किया उसका अर्थ ये थोड़ी हो जाता है कि रावण को जो उन्होंने वध

819
00:58:56,800 --> 00:59:00,880
किया वो गलत किया है। रावण के वध के लिए आप कैसे ठहरा रहे

820
00:59:00,880 --> 00:59:04,960
हैं कि उन्होंने जो है हमने यह नहीं कहा कि गलत किया है। हमने यह कहा कि

821
00:59:04,960 --> 00:59:08,960
उनसे जो रावण का शरीर था वो ब्राह्मण शरीर था और उसका वध करने के लिए

822
00:59:08,960 --> 00:59:13,280
उनको पाप लगा जिसका प्रायश्चित भी उन्होंने किया। अच्छा

823
00:59:13,280 --> 00:59:17,360
हमने ये नहीं कहा कि गलत किया। उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए ब्राह्मण रावण का वध किया

824
00:59:17,360 --> 00:59:21,760
तो उन्होंने सही किया। गलत थोड़ी किया। तो ईश्वर अकर्ता है। उसको

825
00:59:21,760 --> 00:59:26,960
कर्म का फल कैसे मिल गया? ये बताइए। की दृष्टि सेवा

826
00:59:26,960 --> 00:59:31,040
ईश्वर जब मानव रूप में है इस संसार

827
00:59:31,040 --> 00:59:35,280
में है तो कर्म तो करेगा और शरीर को

828
00:59:35,280 --> 00:59:39,440
कर्म के जो भी कर्म के जो फल है

829
00:59:39,440 --> 00:59:41,280
पाप हो या पुण्य हो वो लगेंगे ही

830
00:59:41,280 --> 00:59:45,280
यानी कुछ क्षणों के लिए ही सही ईश्वर पापी

831
00:59:45,280 --> 00:59:49,280
भी कहलाएगा ईश्वर नहीं कहलाएगा वो भैया

832
00:59:49,280 --> 00:59:53,360
यहां पे कहलाएगा हमारे दृष्टि से परमार्थ की दृष्टि से दृष्टि से हम राम

833
00:59:53,360 --> 00:59:57,600
को कुछ देर अगर ईश्वर को आप जिस अंश में ईश्वर

834
00:59:57,600 --> 01:00:01,600
को कर्ता मान रहे हो और करने वाला भी वही है और उनके साथ ही हो

835
01:00:01,600 --> 01:00:06,960
रहा है। जिस अंश में आप यह मान लेते हैं ना तो फिर पाप का सवाल ही नहीं रहता।

836
01:00:06,960 --> 01:00:10,960
पापी हो सकते हैं ना राम हम कह सकते हैं ना राम भी पापी थे। कुछ घंटों

837
01:00:10,960 --> 01:00:13,600
के लिए ही सही

838
01:00:13,600 --> 01:00:17,600
हमारी दृष्टि से हां हमारी दृष्टि से कह सकते हैं। क्या बात है?

839
01:00:17,600 --> 01:00:21,760
अच्छी बात [हंसी] शिवशी वही वो पाप

840
01:00:21,760 --> 01:00:25,840
उनको तो उनको तो भोगना भी पड़ा था ना हम

841
01:00:25,840 --> 01:00:29,920
बताइए कृष्ण भगवान वो तो सभी भोगते हैं जो पाप करता है

842
01:00:29,920 --> 01:00:34,000
मतलब वो भी कर्म बंधन के अंदर है हम बड़ी

843
01:00:34,000 --> 01:00:38,080
खिचड़ी हो गई यहां पर व्यवहार परमार्थ परमार्थिक

844
01:00:38,080 --> 01:00:42,320
दृष्टि से ऐसा नहीं हो रहा हमारी दृष्टि से ऐसा हो रहा है अच्छा अच्छा

845
01:00:42,320 --> 01:00:46,400
एक बात बताइए राम जी ने जो पाप किया था उसके लिए उनको

846
01:00:46,400 --> 01:00:50,640
फल भोगना पड़ा ना जी ठीक है तो मनुष्य बनकर

847
01:00:50,640 --> 01:00:55,440
आए थे उसके बाद उनका पुनर्जन्म नहीं हुआ

848
01:00:55,440 --> 01:00:57,760
हुआ

849
01:00:57,760 --> 01:01:01,280
बहुत बार हुआ

850
01:01:01,280 --> 01:01:05,360
अनेक बार हो चुका है उनका जन्म पुनर्जन्म एक चीज और बच रही

851
01:01:05,360 --> 01:01:10,320
है जो इन्होंने कही है नयन जी ने कि

852
01:01:10,320 --> 01:01:14,400
अ यदि श्री राम

853
01:01:14,400 --> 01:01:18,560
ने भी ऐसे कर कार्य किए जो धर्म से धर्म की सीमा

854
01:01:18,560 --> 01:01:22,880
के बाहर थे। फिर भी उन्हें

855
01:01:22,880 --> 01:01:26,960
और श्री कृष्ण ने भी किए। तो फिर ऐसा क्यों है

856
01:01:26,960 --> 01:01:31,040
कि श्री राम जी को रामो विग्रहवान धर्मा कहा गया मगर कृष्ण के लिए

857
01:01:31,040 --> 01:01:35,120
नहीं कहा गया। ये क्यों है? भैया इसका प्रश्न ये है राम जी को हम ईश्वर के

858
01:01:35,120 --> 01:01:39,120
रूप में मानते हैं। नाम तो उनका अलग-अलग है बट ईश्वर ऐसा नहीं बोल सकते

859
01:01:39,120 --> 01:01:43,280
कि नरसिंह जी धर्म के विग्रह नहीं है वो भी है शिव जी वे

860
01:01:43,280 --> 01:01:47,440
सभी जो हम पंच देवों को मानते हैं को ले लीजिए वो भी धर्म

861
01:01:47,440 --> 01:01:51,680
के विग्रह है बुद्ध भी है बुद्ध

862
01:01:51,680 --> 01:01:55,680
बुद्ध का आईडिया नहीं है उनके बारे में उनको पता नहीं पांच

863
01:01:55,680 --> 01:02:00,640
का बता सकते हैं आपको कौन है इनकी साइड जो देगा आंसर

864
01:02:00,640 --> 01:02:04,800
जितना आपसे सीखा है उतना बता सकते होगी उसको क्षमा करिएगा जी

865
01:02:04,800 --> 01:02:09,280
आशुतोष जी बताएं भैया जय श्री राम नारायण सभी को जय श्री राम

866
01:02:09,280 --> 01:02:10,640
भैया पूज्य गुरुदेव से

867
01:02:10,640 --> 01:02:15,200
सुना है और आपके भी द्वारा कई बार सीखा है साकी

868
01:02:15,200 --> 01:02:20,160
ब्रह्मसूत्र में एक बात आई है भैया शास्त्र योनित्वाच हम

869
01:02:20,160 --> 01:02:24,240
इसका अर्थ ये है कि हमको भगवान मानना किसको चाहिए ये हम तय

870
01:02:24,240 --> 01:02:28,560
कैसे करेंगे अपने मनमुखी तरीके से तय करेंगे या किस तरीके से तो इसका अर्थ

871
01:02:28,560 --> 01:02:32,800
यही है कि शास्त्रों की सीमा के द्वारा बताए गए

872
01:02:32,800 --> 01:02:36,960
जो ईश्वर होंगे जो लक्षण होंगे हम ईश्वर उनहीं

873
01:02:36,960 --> 01:02:41,120
को मानेंगे ना कि जो शास्त्र के सीमा के बाहर जाकर के

874
01:02:41,120 --> 01:02:45,360
कार्य करेंगे उनको हम ईश्वर मानेंगे। जैसे कि बुद्ध भगवान जो है वो

875
01:02:45,360 --> 01:02:49,520
शास्त्र की सीमा के विरोध पर ईश्वर बनते हैं तो वो

876
01:02:49,520 --> 01:02:53,760
भगवान है भी फिर भी हम उनको भगवान नहीं मानेंगे। और

877
01:02:53,760 --> 01:02:58,000
श्री राम इत्यादि जो है उनके लिए वर्णन आया है। वो शास्त्र

878
01:02:58,000 --> 01:03:02,000
वहां पर हिंदी में क्या लिखा है जो आपने बोला है? जी

879
01:03:02,000 --> 01:03:06,160
भैया ब्रह्म सूत्र में हिंदी में क्या लिखा है?

880
01:03:06,160 --> 01:03:10,960
मैंने पढ़ा तो नहीं है। गुरुदेव के श्री मुख से सुना हुआ है। ऐसा है

881
01:03:10,960 --> 01:03:15,360
ऐसा है इसका अर्थ हम यही ले सकते हैं जी

882
01:03:15,360 --> 01:03:19,440
कि शास्त्र ने जिस पर ठप्पा लगा दिया मोहर लगा

883
01:03:19,440 --> 01:03:23,680
दी कि ये भगवान का स्वरूप है। भगवान का अवतार

884
01:03:23,680 --> 01:03:25,680
है। जी हमें

885
01:03:25,680 --> 01:03:29,840
उसी को भगवान का अवतार मानना पड़ेगा। यह नहीं वहां पर दृष्टि रख सकते कि वो शास्त्र

886
01:03:29,840 --> 01:03:33,920
की सीमा में रह के कार्य कर रहा है या फिर शास्त्र की सीमा के

887
01:03:33,920 --> 01:03:38,000
बाहर जा रहा है। है ना? भैया क्योंकि वह मानव कल्याण

888
01:03:38,000 --> 01:03:42,160
के लिए शास्त्र ईश्वर बहुत सारे कार्य ऐसे करते हैं

889
01:03:42,160 --> 01:03:46,160
जो शास्त्र की सीमा से बाहर है क्योंकि शास्त्र में वर्णित नियम

890
01:03:46,160 --> 01:03:51,280
हमारे लिए है ईश्वर के लिए नहीं है तो

891
01:03:51,280 --> 01:03:55,680
शास्त्र जिस पर आपका पहला जो वो है ना पंक्ति वो सही है।

892
01:03:55,680 --> 01:04:00,160
शास्त्र जिस पर मोहर लगा देंगे वो ईश्वर है। है ना?

893
01:04:00,160 --> 01:04:04,720
उसको ईश्वर के रूप में स्वीकार करना है। पूजनीय जी

894
01:04:04,720 --> 01:04:08,720
सम्माननीय अच्छा एक प्रश्न है मेरा आप आशुतोष

895
01:04:08,720 --> 01:04:12,800
जी अब आप अपनी बात पूरी कर लीजिए। जी तो यही यही कह रहे

896
01:04:12,800 --> 01:04:17,120
थे कि बुद्ध भगवान को हम ईश्वर इसी वजह से नहीं मान सकते हैं कि वो शास्त्रों

897
01:04:17,120 --> 01:04:21,280
का विरोध करते थे। शास्त्र प्रमाणित कार्य नहीं करते थे। दूसरी

898
01:04:21,280 --> 01:04:25,440
बात जो ये श्री राम का जो बात हो रहा है देखिए यहां पे जो

899
01:04:25,440 --> 01:04:29,600
मैंने एग्जांपल दिया है ना वो यहीं पे ऐसे हो जाता है कि जैसे हम मान नहीं सकते हैं और

900
01:04:29,600 --> 01:04:33,760
शास्त्रों की सीमा के बाहर कार्य करते थे तो इस तरीके के कार्य तो कृष्ण

901
01:04:33,760 --> 01:04:37,760
जी के भी सिद्ध हो रहे हैं मगर हम उनको तो पूजनीय मान रहे हैं वैदिक

902
01:04:37,760 --> 01:04:41,840
मान रहे हैं भैया एक और प्रश्न मैं कर सकूं

903
01:04:41,840 --> 01:04:46,080
बुद्ध को हमने ईश्वर माना है ईश्वर का अवतार माना है हमने बुद्ध को

904
01:04:46,080 --> 01:04:50,640
कहां लिखा ईश्वर का अवतार नहीं माना पूजनीय वो अनुगम

905
01:04:50,640 --> 01:04:54,960
अनुकरणीय नहीं माना अनुकरणीय अनुकरणीय

906
01:04:54,960 --> 01:04:58,960
हां ईश्वर तो माना है तो वही बात आ गई वही

907
01:04:58,960 --> 01:05:03,440
बात आ गई कि ईश्वर होते हुए भी वो अनुकरणीय नहीं होंगे हां अनुकरणीय

908
01:05:03,440 --> 01:05:07,440
तो बहुत सारे नहीं है ब्रह्मा जी नहीं है अनुकरणीय अनुकरणीय शिव जी नहीं

909
01:05:07,440 --> 01:05:12,400
है विष्णु भगवान राम को छोड़ के सारे रूप अनुकरणीय नहीं है अनुसरणीय

910
01:05:12,400 --> 01:05:16,480
है और अनुसरणीय बुद्ध भी नहीं है बुद्ध अनुसरणीय भी नहीं

911
01:05:16,480 --> 01:05:20,560
है अनुकरणीय भी नहीं है बुद्ध तो केवल ईश्वर

912
01:05:20,560 --> 01:05:24,880
का अवतार है। भगवत कार्य की पूर्ति के लिए जो उन्होंने लिया मगर ना अनुसरणीय

913
01:05:24,880 --> 01:05:29,520
है ना अनुकरणीय है। है ना? जी

914
01:05:29,520 --> 01:05:33,920
ठीक है। तो अच्छा

915
01:05:33,920 --> 01:05:37,920
आशुतोष भैया को एक प्रश्न है मेरा। नयन जी अभी एक बात हुई थी ना

916
01:05:37,920 --> 01:05:42,560
भैया अब हम लोगों की तरफ से एक सवाल करने दो। एक मिनट

917
01:05:42,560 --> 01:05:46,800
विश्वजीत जी एक मिनट जी अभी एक बात हुई थी ना जब आपने क्लपिंग

918
01:05:46,800 --> 01:05:50,880
भी की थी जब कुछ कुछ कुछ घंटों के लिए राम जी

919
01:05:50,880 --> 01:05:54,880
को पापी माना था ऐसा कुछ था क्या बात थी वो यही

920
01:05:54,880 --> 01:05:56,960
था कि कुछ क्षण के लिए वो पापी

921
01:05:56,960 --> 01:06:01,360
थे सिद्ध हो जाते हैं हां ठीक है विश्वजीत

922
01:06:01,360 --> 01:06:05,360
जी भैया अब आप लोग मतलब

923
01:06:05,360 --> 01:06:09,360
सवाल तो पूछ लिए खंडन के लिए तो अब ये बताइए ऐसा कौन

924
01:06:09,360 --> 01:06:13,360
सा कार्य है जो ईश्वर नहीं कर सकते। ठीक है हम बताएंगे। अभी ये

925
01:06:13,360 --> 01:06:17,360
चैप्टर क्लोज हो जाए जरा जो पाप वाला चल रहा है। सरस जी

926
01:06:17,360 --> 01:06:19,840
बताएं।

927
01:06:19,840 --> 01:06:24,400
शिवश जी मैं कह रही हूं कि हम थोड़ा मिक्स कर दे रहे हैं।

928
01:06:24,400 --> 01:06:28,480
पाप, पुण्य, धर्म है ना तीनों को बहुत हम

929
01:06:28,480 --> 01:06:32,800
मिक्स कर दे रहे हैं। पाप पुण्य जीव की दृष्टि से है। धर्म

930
01:06:32,800 --> 01:06:37,120
तभी पिक्चर में आता है ना पाप ना पुण्य जो सही मतलब सही

931
01:06:37,120 --> 01:06:41,280
कह कहना भी मतलब मेरा बस एक्सप्लेनेशन का एक हेल्पिंग वर्ड है।

932
01:06:41,280 --> 01:06:45,280
लेकिन उस वक्त जो मतलब वो वो करना पड़ता है। उनके

933
01:06:45,280 --> 01:06:49,360
लिए सही पाप पुण्य नहीं लागू होता है। धर्म की स्थापना जैसे श्री

934
01:06:49,360 --> 01:06:53,520
कृष्ण ने अर्जुन को पूरी तरीके से तैयार कर दिया कि युद्ध करो।

935
01:06:53,520 --> 01:06:57,600
है ना? अब हम पाप पुण्य की बात करें तो मैदान में कितने लोग मरे, कितने

936
01:06:57,600 --> 01:07:01,920
लोग लड़े, कितना कुछ हो गया उधर है ना? अब राम जी को भी घर से जाना

937
01:07:01,920 --> 01:07:06,000
पड़ा क्योंकि वहां राम जी बैठकर बोल सकते थे आप मेरे साथ पाप कर रहे हो। मेरे

938
01:07:06,000 --> 01:07:10,240
को निकाल दे रहे हो। नहीं बोला उन्होंने उन्होंने क्या किया? धर्म कि मतलब

939
01:07:10,240 --> 01:07:12,000
नहीं पुत्र होने का धर्म है

940
01:07:12,000 --> 01:07:16,000
ना। उन्होंने वो निभाया। तो हमें पाप पुण्य धर्म इन तीनों का

941
01:07:16,000 --> 01:07:20,000
डेफिनेशन पहले क्लियर करना पड़ेगा। फिर हम उसके हिसाब से हम डिस्कशन

942
01:07:20,000 --> 01:07:24,400
को आगे बढ़ा सकते हैं क्योंकि हां रावण

943
01:07:24,400 --> 01:07:28,640
रावण के भी बहुत सारे अवगुण गिनाए जाते हैं लेकिन रावण के बहुत सारे गुण

944
01:07:28,640 --> 01:07:32,640
भी है उन्होंने बहुत कुछ लिखा बहुत कुछ यू नो वर्णन किया बहुत शिव के बहुत

945
01:07:32,640 --> 01:07:36,880
बड़े भक्त थे सारा सब कुछ था ठीक है पाप पुण्य तो हमारे दृष्टि से

946
01:07:36,880 --> 01:07:40,880
अब बात आती है मानव कल्याण हमारा उद्धार जीवन

947
01:07:40,880 --> 01:07:45,040
का अल्टीमेट डेस्टिनेशन गोल क्या है मोक्ष है मोक्ष प्राप्ति

948
01:07:45,040 --> 01:07:49,280
के लिए क्या सब कुछ लागू होता है नहीं लागू होता है क्योंकि

949
01:07:49,280 --> 01:07:53,440
धर्म पाप पुण्य पाप पुण्य यह करोगे तो यह मिलेगा यह नहीं करोगे

950
01:07:53,440 --> 01:07:57,680
तो यह नहीं मिलेगा हम इसी के इर्द-गिर्द घूमते हैं लेकिन मोक्ष

951
01:07:57,680 --> 01:08:01,840
इनके परे है ना हम इसको हम फिर ग्रो

952
01:08:01,840 --> 01:08:06,320
करके इसको एक अलग ज्ञान की दृष्टि से देखते हैं जो कि

953
01:08:06,320 --> 01:08:10,640
कृष्ण जी एग्जैक्टली वही ज्ञान अर्जुन को दिया तो हमें यह सब क्लियर

954
01:08:10,640 --> 01:08:14,640
करना पड़ेगा कि यू नो उन्होंने यह किया तो यह क्यों नहीं किया क्या वो पापी है

955
01:08:14,640 --> 01:08:18,960
क्या वो पुण्य कर रहे हैं या क्या कर रहे वहां पर धर्म की धर्म पिक्चर

956
01:08:18,960 --> 01:08:23,200
में आता है। तो यह मैं बस कहना चाह रही थी। ठीक है। अभी

957
01:08:23,200 --> 01:08:27,120
मैं ये राम जी वाली जो बात उठी है उसको

958
01:08:27,120 --> 01:08:31,280
एक्सप्लेन कर दूं। और देखिए सबसे पहली बात

959
01:08:31,280 --> 01:08:35,520
है कि श्री राम ने जो बाली का वध किया था वह शास्त्र

960
01:08:35,520 --> 01:08:40,240
की सीमा के बाहर नहीं है। इसलिए उसे पाप नहीं कहा जाएगा। मनुस्मृति

961
01:08:40,240 --> 01:08:45,200
में लिखा हुआ है कि जिस

962
01:08:45,200 --> 01:08:49,440
असत्य से जिस असत्य से किसी ब्राह्मण, क्षत्रिय,

963
01:08:49,440 --> 01:08:54,800
वैश्य अथवा शूद्र की मृत्यु हो रही हो। जिस सत्य से

964
01:08:54,800 --> 01:08:58,800
यदि आपके सच बोलने से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र की अब यहां

965
01:08:58,800 --> 01:09:03,200
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र कौन है? जो अपने कर्म का पालन

966
01:09:03,200 --> 01:09:07,760
करता है उसकी बात हो रही है। ऐसा नहीं कि किसी भी दोषी की नहीं निर्दोष

967
01:09:07,760 --> 01:09:11,760
की जो एक सदाचारी व्यक्ति है उसकी यदि मृत्यु हो

968
01:09:11,760 --> 01:09:15,840
रही है तो वहां पर असत्य बोलना ही धर्म है।

969
01:09:15,840 --> 01:09:21,040
वहां पर असत्य आपका सत्य हो जाता है। यह शास्त्र की सीमा

970
01:09:21,040 --> 01:09:25,280
ये शूद्रों पे भी लागू होगा। हां शूद्रों पर भी लागू होगा। ब्राह्मण,

971
01:09:25,280 --> 01:09:30,160
क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र चारों में से कोई भी अगर

972
01:09:30,160 --> 01:09:34,720
मृत्यु होने वाली है और उसकी मृत्यु को बचाया जा सकता है

973
01:09:34,720 --> 01:09:38,960
असत्य बोलकर तो वहां पर आपका असत्य सत्य बन जाएगा और सत्य

974
01:09:38,960 --> 01:09:42,560
आपका असत्य बन जाएगा। यह शास्त्र का नियम।

975
01:09:42,560 --> 01:09:46,720
क्षत्रियों के अनुसार पशुओं का आखेट करने

976
01:09:46,720 --> 01:09:52,080
का अधिकार क्षत्रियों को शास्त्र से प्राप्त है।

977
01:09:52,080 --> 01:09:56,160
ठीक है? भैया तो ब्राह्मण तो बहुत सारे आज

978
01:09:56,160 --> 01:10:00,240
के आज के टाइम में देखा जाए तो किसी ने अगर कुछ गलत

979
01:10:00,240 --> 01:10:04,320
किया हो उसको बचाने के लिए हम झूठ बोल दे तो क्या वो धर्म होगा या अधर्म

980
01:10:04,320 --> 01:10:08,480
होगा क्योंकि मैं तो ब्राह्मण का रक्षा कर रहा हूं मतलब

981
01:10:08,480 --> 01:10:12,640
असत्य बोल के उसको ब्राह्मण अगर ब्राह्मण अगर वो

982
01:10:12,640 --> 01:10:16,800
दोषी नहीं है उसकी हत्या हो रही है यहां मैं उदाहरण दे

983
01:10:16,800 --> 01:10:20,880
दूं जैसे कि मान लीजिए कोई ब्राह्मण है उसको

984
01:10:20,880 --> 01:10:24,880
मारने के लिए कोई अधर्मी आया है कि मैं इस ब्राह्मण की जान

985
01:10:24,880 --> 01:10:28,960
ले लूंगा और आप संयोग से वहीं पर पहुंच गए। ब्राह्मण छुप गया आपके

986
01:10:28,960 --> 01:10:32,960
सामने कहीं पर गुफाओं के अंदर या अपने घर के अंदर या कहीं

987
01:10:32,960 --> 01:10:37,040
पर भी जहां पर वो जो मारने आया है आक्रांता वो नहीं

988
01:10:37,040 --> 01:10:41,120
पहुंच पा रहा है। हां तो उसको जैसे असत्य बोल देंगे कि मुझको पता नहीं

989
01:10:41,120 --> 01:10:45,120
कि वो कहां छुपे हैं। तो उसको वहां पर आपका

990
01:10:45,120 --> 01:10:49,600
असत्य बोलना ही सत्य है। वहां पर वही धर्म है।

991
01:10:49,600 --> 01:10:53,840
ठीक है? और अगर दोषी हो तो दोषी हो तो फिर क्यों

992
01:10:53,840 --> 01:10:58,240
बचाओगे उसे? ठीक है भैया। ठीक है।

993
01:10:58,240 --> 01:11:02,720
कर्म नहीं है ना उसके तो आप बचाओगे तो आपको पर ही दोष लगेगा।

994
01:11:02,720 --> 01:11:06,800
तो शिवश जी वही वही ना जैसे आपने अभी कहा कि सत्य असत्य हो

995
01:11:06,800 --> 01:11:10,960
जाता है असत्य असत्य हो जाता है तो वही वो पाप पुण्य के बीच

996
01:11:10,960 --> 01:11:15,040
में वो धर्म का मेन पिक्चर ही वही है कि कि ये सब उन पे नहीं

997
01:11:15,040 --> 01:11:19,120
लागू होता है जो उस वक्त जैसे क्षत्रिय धर्म ब्राह्मण क्वेश्चन ये

998
01:11:19,120 --> 01:11:23,200
आ जाएगा सरसद जी कि उन पर लागू नहीं होता है फिर उनको क्यों धर्म के पैरामीटर

999
01:11:23,200 --> 01:11:27,280
से आप नाप के लोगों को बता रहे हैं कि यह राम विग्रह धर्म फिर

1000
01:11:27,280 --> 01:11:31,440
आप मत बताइए आप कहिए कि ये धर्म से बाहर की चीजें हैं ईश्वर

1001
01:11:31,440 --> 01:11:35,440
आप धर्म में मत लाइए ना उन्हें किसी और को एग्जांपल बनाइए मगर हम तो कहते हैं कि

1002
01:11:35,440 --> 01:11:39,680
हमारे आदर्श है श्री राम फिर धर्म धर्म

1003
01:11:39,680 --> 01:11:43,680
के वो है ना वो है मतलब आइडल है ना तो

1004
01:11:43,680 --> 01:11:47,840
धर्म के आइडल है तो वो धर्म में आ गए ना धर्म का पालन अथवा ना करने

1005
01:11:47,840 --> 01:11:52,000
वाले पालन करने वाले अथवा ना करने वाले हो गए ना फिर वो

1006
01:11:52,000 --> 01:11:56,000
फिर उनको उस दृष्टि में नहीं रखा जा सकता कि वो जो ब्रह्म वाली दृष्टि है सब

1007
01:11:56,000 --> 01:12:00,000
कुछ करते हुए भी मैं करता हूं फिर तो वहां चेक किया जाएगा कि उन्होंने पाप

1008
01:12:00,000 --> 01:12:04,000
किया कि नहीं क्योंकि उनको धर्म के पैरामीटर पर नापा जा

1009
01:12:04,000 --> 01:12:07,040
रहा है।

1010
01:12:07,040 --> 01:12:11,360
मतलब कहने का यह है कि हम जो यह कहते हैं कि

1011
01:12:11,360 --> 01:12:16,480
हमें राम को फॉलो करना है। श्री राम को हमें फॉलो करना है।

1012
01:12:16,480 --> 01:12:21,760
तो जब हम यह कहते हैं तो हम उन्हें देखेंगे ना कि उन्होंने क्या किया और क्या नहीं किया।

1013
01:12:21,760 --> 01:12:25,760
तो वो जो यह वाली बात है कि उनको इस द सृष्टि से नहीं देखना चाहिए।

1014
01:12:25,760 --> 01:12:29,760
धर्म अथवा अधर्म पाप अथवा पुण्य। तो वो वाली बात मैं धर्म नहीं

1015
01:12:29,760 --> 01:12:33,760
कह रही हूं। मैं कह रही हूं कि पाप पुण्य अलग है। वो हो चुका है।

1016
01:12:33,760 --> 01:12:37,920
उन्होंने भी भोगा है। उन्होंने भी उनका भरपाई का मैं उन सारी बातों की बात

1017
01:12:37,920 --> 01:12:41,920
बोल दे रहा हूं कि उन्होंने भोगा या नहीं भोगा। तो

1018
01:12:41,920 --> 01:12:46,560
अब बात आती है कि अ

1019
01:12:46,560 --> 01:12:50,560
पहली बात तो यह ना बाली को मार के उन्होंने कोई पाप किया।

1020
01:12:50,560 --> 01:12:54,800
उन्होंने शास्त्र की सीमा में किया और ना ही उन्होंने जो है

1021
01:12:54,800 --> 01:12:58,960
दूसरा कोई प्रकरण था क्या? नहीं था। रावण रावण

1022
01:12:58,960 --> 01:13:02,960
रावण हां रावण को मार के भी कोई पाप नहीं किया। क्यों नहीं

1023
01:13:02,960 --> 01:13:07,360
किया? क्योंकि शास्त्र ही यह बताते हैं कि व्यष्टि

1024
01:13:07,360 --> 01:13:11,520
और समष्टि का धर्म होता है। एक धर्म होता है

1025
01:13:11,520 --> 01:13:15,600
व्यष्टि और एक होता है समष्टि। आत्म कल्याण के लिए की जाने

1026
01:13:15,600 --> 01:13:19,680
वाली सारी चीजें जो डायरेक्ट आत्म कल्याण के लिए हैं।

1027
01:13:19,680 --> 01:13:22,640
वो सब हमारे व्यक्तिगत उत्थान के लिए है।

1028
01:13:22,640 --> 01:13:26,800
और एक हो जाता है समष्टि। उसमें मुझे मीनिंग में थोड़ा कहीं

1029
01:13:26,800 --> 01:13:30,960
पर फर्क हो सकता है। समष्टि यानी जो आप समाज

1030
01:13:30,960 --> 01:13:35,280
के हित के लिए जब समष्टि वाला जो आपका कर्तव्य है वह व्यष्टि

1031
01:13:35,280 --> 01:13:39,280
वाले कर्तव्य पर हावी हो तो वहां पर व्यष्टि को नहीं चुनते

1032
01:13:39,280 --> 01:13:43,360
हैं। वहां पर समष्टि को चुनते हैं। वही आपके लिए आत्म कल्याणकारी हो जाता

1033
01:13:43,360 --> 01:13:48,000
है। तो क्योंकि एक

1034
01:13:48,000 --> 01:13:52,000
ब्राह्मण की हत्या करना जो है आत्म कल्याण

1035
01:13:52,000 --> 01:13:56,800
में बाधक है। ठीक है। परंतु एक

1036
01:13:56,800 --> 01:14:00,800
दुराचारी राक्षस प्रवृत्ति वाले किसी एंटिटी

1037
01:14:00,800 --> 01:14:04,800
की एंटिटी का वध करना वो समष्टि के लिए

1038
01:14:04,800 --> 01:14:08,880
हितकारक था। इसलिए उन्होंने अपनी चीज को छोड़ के अपने

1039
01:14:08,880 --> 01:14:13,040
आत्म कल्याण वाली बात को छोड़ के और जो है उसको चुना।

1040
01:14:13,040 --> 01:14:19,040
तो यहां पर भी उन्हें पापी नहीं कहा जाएगा। और

1041
01:14:19,360 --> 01:14:23,360
रही बात यह वाली कि उन्होंने दूसरा जन्म लेकर के जो उन्होंने

1042
01:14:23,360 --> 01:14:27,520
वह भोगा यह जो कहा जा रहा है तो हम यहां पर जो देख

1043
01:14:27,520 --> 01:14:31,600
रहे हैं ना जो यह धर्म और अधर्म का निर्णय कर रहे

1044
01:14:31,600 --> 01:14:35,920
हैं वो किस किस दृष्टि से कर रहे हैं

1045
01:14:35,920 --> 01:14:37,680
धर्म और अधर्म का निर्णय किस दृष्टि

1046
01:14:37,680 --> 01:14:41,840
से होगा व्यवहारिक दृष्टि से व्यवहारिक दृष्टि से तो आपको

1047
01:14:41,840 --> 01:14:47,840
यह व्यवहारिक दृष्टि से ज्ञात हुआ है क्या कि राम जी ने फल को भोगा

1048
01:14:48,800 --> 01:14:52,560
दृष्टि से प्राप्त हुआ है क्या?

1049
01:14:52,560 --> 01:14:56,640
नहीं राम जी ने दूसरा जन्म जो लिया वो आपको दिव्य दृष्टि से

1050
01:14:56,640 --> 01:15:00,640
प्राप्त हुआ है कि दूसरा जन्म कृष्ण के रूप में लेकर के उन्होंने फल को भोगा।

1051
01:15:00,640 --> 01:15:05,360
मगर व्यवहारिक दृष्टि से राम जी ने उसको फल को नहीं भोगा। मतलब

1052
01:15:05,360 --> 01:15:09,520
जो आप फल भोगने मेरे को पूरा कर लेने दीजिए। श्री राम

1053
01:15:09,520 --> 01:15:14,880
पर बात आई है ना तो मुझे पूरा कर लेने दीजिए। तो

1054
01:15:14,880 --> 01:15:20,400
कहने का अर्थ यह है कि

1055
01:15:20,400 --> 01:15:24,640
श्री राम जी ने जो आपके

1056
01:15:24,640 --> 01:15:29,440
हिसाब से वह पापी थे या अधर्मी थे है ना तो

1057
01:15:29,440 --> 01:15:33,840
उसको पु उसकी पुष्टि के लिए आप यह कह रहे हैं कि उन्होंने फल को भोगा था।

1058
01:15:33,840 --> 01:15:38,000
जो फल को भोगना है वह आपको शास्त्र के वचनों से प्राप्त है।

1059
01:15:38,000 --> 01:15:42,320
जो फल को भोगना है वह आपको मनुष्य दृष्टि से प्राप्त नहीं है। दिव्य

1060
01:15:42,320 --> 01:15:46,640
दृष्टि से प्राप्त है। जिन्होंने दो सारे युग देखे उन्होंने बताया किसी मनुष्य

1061
01:15:46,640 --> 01:15:52,560
ने नहीं लिख दिया कि राम ही कृष्ण बन के जन्मे। समझ रहे हैं?

1062
01:15:52,560 --> 01:15:56,880
है ना? कोई आकाशवाणी ये आकाशवाणी या दिव्य दृष्टि

1063
01:15:56,880 --> 01:16:00,880
आध्या जो हमारा शास्त्रीय पक्ष है आध्यात्मिक दृष्टि से उससे आपको बताया

1064
01:16:00,880 --> 01:16:05,200
गया। तो आप उसके द्वारा यहां पर आप पुष्टि नहीं कर सकते। तो मनुष्य

1065
01:16:05,200 --> 01:16:09,360
को धर्म के रूप में क्या मिला कि हां व्यष्टि को पीछे किया

1066
01:16:09,360 --> 01:16:13,520
गया और समष्टि को आगे किया गया तो भगवान ने जो है क्या

1067
01:16:13,520 --> 01:16:17,600
किया? पुण्य किया पाप नहीं किया राम

1068
01:16:17,600 --> 01:16:21,600
के रूप में। अब यहां पर एक बात आ जाती है जहां से ये प्रश्न उठा

1069
01:16:21,600 --> 01:16:25,680
था। वो बात क्या थी? प्रश्न उठा

1070
01:16:25,680 --> 01:16:29,920
ऐसे था कि क्या श्री राम के रूप में आकर के भगवान

1071
01:16:29,920 --> 01:16:34,000
अधर्म कर सकते हैं? क्या श्री राम के रूप में भगवान अधर्म कर सकते हैं?

1072
01:16:34,000 --> 01:16:35,520
मतलब राम जी क्या अधर्म कर

1073
01:16:35,520 --> 01:16:40,480
सकते हैं? यह प्रश्न पुट अप किया गया था। तो आपने मान लिया था कि

1074
01:16:40,480 --> 01:16:44,560
हां वो कर सकते हैं और फिर आपने राम को पापी पापी

1075
01:16:44,560 --> 01:16:48,640
मतलब पापी के सम पक्ष में उनसे क्या-क्या पाप हुए उस

1076
01:16:48,640 --> 01:16:52,720
पक्ष में आपने वह दे दिए और जो है अधर्म वाली बातें भी

1077
01:16:52,720 --> 01:16:56,880
मान ली। इसीलिए यह डिबेट मतलब सेशन जरूरी है।

1078
01:16:56,880 --> 01:17:00,880
इससे क्या आता है कि हमारी जो माइनर माइनर चीजें

1079
01:17:00,880 --> 01:17:05,120
हैं ना जो कहीं पर बची हुई है वो क्लियर होती हैं इससे

1080
01:17:05,120 --> 01:17:09,840
क्योंकि जब तक विरोध नहीं होगा तब तक हम लोग उस तरह से खुल के सामना नहीं आएंगे।

1081
01:17:09,840 --> 01:17:13,840
वो मन में ही रह जाएंगी बातें। जैसे आज आपने ये चीजें बोली शायद ही आपने आज से

1082
01:17:13,840 --> 01:17:17,840
पहले बोली हो श्री राम जी के लिए विश्वजीत जी आपसे कह रहा हूं।

1083
01:17:17,840 --> 01:17:21,840
जी भैया नहीं बोली होंगी ना? पर आज आपको बोलना पड़ गया अपने पक्ष

1084
01:17:21,840 --> 01:17:25,920
को बचाने के लिए। सर्वशक्तिमत्ता को बचाने के लिए

1085
01:17:25,920 --> 01:17:29,040
हां तो

1086
01:17:29,040 --> 01:17:33,040
तो श्री राम का अर्थ हां आशुतोष जी आप सही कह रहे हैं श्री

1087
01:17:33,040 --> 01:17:37,040
राम तो यहां पर क्या होता है आपको यह समझना

1088
01:17:37,040 --> 01:17:41,280
होगा कि श्री राम के रूप में आकर

1089
01:17:41,280 --> 01:17:45,360
के भी भगवान ऐसी चीजें कर सकते

1090
01:17:45,360 --> 01:17:49,360
हैं जो शास्त्र की सीमा में ना आए। ठीक है? मगर

1091
01:17:49,360 --> 01:17:50,640
हम उन्हें श्री राम

1092
01:17:50,640 --> 01:17:54,960
का रूप नहीं मानेंगे। अब इसका मैं उत्तर दे रहा हूं आपको कैसे?

1093
01:17:54,960 --> 01:18:00,160
जैसे कि मान लीजिए हम सबके जानकारी में हनुमान जी

1094
01:18:00,160 --> 01:18:04,160
बाल ब्रह्मचारी थे। ठीक है? अब

1095
01:18:04,160 --> 01:18:09,520
अभी आकाश से कोई हनुमान जी के रूप में उतरे गधा लेकर के।

1096
01:18:09,520 --> 01:18:13,760
ठीक। और वो जो है विवाह कर ले आपके

1097
01:18:13,760 --> 01:18:17,840
समक्ष स्त्री संग कर ले। तो क्या आप मानेंगे कि वो हनुमान जी

1098
01:18:17,840 --> 01:18:22,080
हैं। वो उड़ के दिखा दे। वो अपना सारा परिचय दे दे। सब

1099
01:18:22,080 --> 01:18:26,240
कर दें। मगर यदि उन्होंने यह कर दिया कि उन्होंने

1100
01:18:26,240 --> 01:18:31,600
विवाह कर लिया तो आप यह नहीं मानेंगे कि वाल्मीकि रामायण वाले वो हैं। वानर

1101
01:18:31,600 --> 01:18:35,680
बिल्कुल मानेंगे नहीं मानेंगे। नहीं मानेंगे।

1102
01:18:35,680 --> 01:18:39,680
और भैया इसका अर्थ क्या है कि ईश्वर तो सब कुछ कर सकता

1103
01:18:39,680 --> 01:18:44,000
है। वो हमारी प्रॉब्लम है कि हम उन्हें जब वो राम के रूप में जब वो

1104
01:18:44,000 --> 01:18:48,080
शास्त्र की सीमा से बाहर जा रहे हैं तो हम उन्हें मान नहीं रहे कि नहीं ये राम ही

1105
01:18:48,080 --> 01:18:52,080
है। हम उनको कुछ और मान ले रहे हैं। जैसे कि ईश्वर ने तो कृष्ण के

1106
01:18:52,080 --> 01:18:56,080
रूप में आकर के शास्त्र की सीमा से कई बार लीला पूर्वक बाहर गए।

1107
01:18:56,080 --> 01:19:00,080
मगर हमने फिर क्या मान लिया कि हां भैया यह जो है कृष्ण है।

1108
01:19:00,080 --> 01:19:04,080
ठीक है? और और मैं बताऊं आपको

1109
01:19:04,080 --> 01:19:06,080
कि हनुमान जी

1110
01:19:06,080 --> 01:19:10,400
अ बाल ब्रह्मचारी हैं। मगर जब भगवान

1111
01:19:10,400 --> 01:19:14,640
श्री कृष्ण अपना विराट स्वरूप दिखाते हैं जो इस समय आपकी उसमें डीपी

1112
01:19:14,640 --> 01:19:18,720
में भी दिख रहा है मुझे तो उस समय उनका एक मुख हनुमान जी

1113
01:19:18,720 --> 01:19:22,720
का भी होता है कि नहीं होता है? जी भैया। होता है। इसका

1114
01:19:22,720 --> 01:19:27,360
मतलब कृष्ण यह कह रहे हैं कि हनुमान भी मैं ही हूं।

1115
01:19:27,360 --> 01:19:32,160
यही कह रहे हैं ना तो कृष्ण के रूप में तो उन्होंने क्या कहते हैं

1116
01:19:32,160 --> 01:19:36,480
विवाह भी किया तो इसका अर्थ ये हुआ कि भगवान

1117
01:19:36,480 --> 01:19:41,120
राम के रूप में आकर के भी शास्त्रों की सीमा के परे जाकर के आपको व्यवहारिक

1118
01:19:41,120 --> 01:19:45,440
रूप से दिखा देंगे मगर आप उन्हें राम नहीं मानोगे क्योंकि शास्त्र

1119
01:19:45,440 --> 01:19:49,520
ने कहा है कि राम कौन है? रामो विग्रह वान धर्म

1120
01:19:49,520 --> 01:19:53,600
इसलिए ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता को बचाने के

1121
01:19:53,600 --> 01:19:59,600
लिए हमें श्री राम को अधर्मी कहने की आवश्यकता नहीं है।

1122
01:19:59,680 --> 01:20:03,840
ठीक है? तो भैया शिव जी को ऐसा नहीं कह सकते शिव विग्रवा धर्म क्योंकि

1123
01:20:03,840 --> 01:20:07,920
भगवान मेरी मेरी जानकारी में शास्त्र की दृष्टि में आया नहीं है।

1124
01:20:07,920 --> 01:20:12,000
बात यह है कि धर्म विषय क्या है? पहले तो आप यह समझिए धर्म विषय

1125
01:20:12,000 --> 01:20:16,000
क्या है? धर्म विषय द्वैत का है। धर्म विषय व्यवहार का है।

1126
01:20:16,000 --> 01:20:20,960
धर्म की आवश्यकता कहां पर है आपको? व्यवहार में कि परमार्थ में?

1127
01:20:20,960 --> 01:20:21,460
व्यवहार

1128
01:20:21,440 --> 01:20:26,880
में। हां। तो धर्म विषय व्यवहार का है। तो

1129
01:20:26,880 --> 01:20:30,960
क्या कहते हैं? जब धर्म व्यवहार का विषय है

1130
01:20:30,960 --> 01:20:35,360
तो शिव जी के जो कार्य है वो पारमार्थिक भी है, आध

1131
01:20:35,360 --> 01:20:39,360
प्रातिभाषिक भी हैं और व्यवहारिक भी है। तीनों तरह के कार्य हैं शिव

1132
01:20:39,360 --> 01:20:43,760
जी के। तो इसलिए उनको सीधेसीधे क्योंकि

1133
01:20:43,760 --> 01:20:49,200
उनके क्या कहते हैं व्यवहारिक दृष्टि से बाहर के भी उनके कार्य रहे

1134
01:20:49,200 --> 01:20:53,280
मतलब शिव मतलब हम राम जी को इसीलिए बोलते हैं क्योंकि वो सिर्फ मानव

1135
01:20:53,280 --> 01:20:57,360
के कल्याण के लिए उन्होंने जो भी बताया परिकुलर राम रूप में उन्होंने

1136
01:20:57,360 --> 01:21:01,600
धर्म का उल्लंघन धर्म की सीमा के बाहर या शास्त्र की सीमा के बाहर

1137
01:21:01,600 --> 01:21:06,400
वो नहीं गए इसलिए राम विग्रह धर्म

1138
01:21:06,400 --> 01:21:10,480
का वास्तविकता तो यह है कि शिव जी ही तो राम जी के रूप में कर

1139
01:21:10,480 --> 01:21:14,560
रहे हैं। धर्म की स्थापना समझ रहे हैं?

1140
01:21:14,560 --> 01:21:18,720
मगर क्योंकि शिव सृष्टि की रचना भी कर रहे हैं। शिव

1141
01:21:18,720 --> 01:21:22,800
तो बिना विवाह के जो है सृष्टि उत्पन्न कर दे

1142
01:21:22,800 --> 01:21:26,800
रहे हैं। तो इसलिए उनका पारमार्थिक दृष्टि से भी

1143
01:21:26,800 --> 01:21:30,880
स्वरूप है। प्रातिभाषिक दृष्टि से भी स्वरूप है और व्यवहारिक दृष्टि से भी

1144
01:21:30,880 --> 01:21:34,880
स्वरूप है। तो इसलिए उनको डायरेक्टली शिव

1145
01:21:34,880 --> 01:21:36,800
नाम से शिव शिव विग्रह

1146
01:21:36,800 --> 01:21:41,040
धर्मा ऐसी पंक्ति मैंने अभी तक नहीं पढ़ी है। तो वो हमारे

1147
01:21:41,040 --> 01:21:45,040
लिए पूजनीय है। सम्मान नहीं है क्योंकि वह ईश्वरीय स्वरूप में हमको प्राप्त

1148
01:21:45,040 --> 01:21:49,200
हो रहे हैं और श्री राम ईश्वरीय स्वरूप में होते हुए भी

1149
01:21:49,200 --> 01:21:53,360
मानवीय रूप में सभी समस्त धार्मिक मर्यादाओं का पालन

1150
01:21:53,360 --> 01:21:57,360
करने वाले हमको उदाहरण के रूप में प्राप्त हुए जिस जिनको हम आदर्श

1151
01:21:57,360 --> 01:22:02,480
मानकर उनका अनुगमन अनुसरण अनुकरण सब कुछ कर सकते हैं।

1152
01:22:02,480 --> 01:22:05,200
ठीक है

1153
01:22:05,200 --> 01:22:10,000
जी जब हम कह रहे हैं कि रामो विग्रह धर्म

1154
01:22:10,000 --> 01:22:14,080
तो वहां पर शिव शिव के लिए ही तो कह रहे हैं तो वहां शिव

1155
01:22:14,080 --> 01:22:18,160
का अपमान कैसे हो गया है ना मगर

1156
01:22:18,160 --> 01:22:22,240
राम रूप के लिए इसलिए कहा जाएगा क्योंकि व्यवहार की दृष्टि

1157
01:22:22,240 --> 01:22:26,880
से राम ये हैं शिव ये है तो इस तरह से वहां पर राम के लिए पर्टिकुलरली

1158
01:22:26,880 --> 01:22:30,880
ये लाइन आएगी तो अब मैं दोबारा से अपनी बात को पूरा कर

1159
01:22:30,880 --> 01:22:34,880
दूं कि ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता को सिद्ध करने के

1160
01:22:34,880 --> 01:22:38,880
लिए हमें अह श्री राम को अधर्मी या पापी कहने

1161
01:22:38,880 --> 01:22:43,120
की आवश्यकता नहीं है। इतना तो आप लोगों को समझ में आई मतलब अह क्लियर

1162
01:22:43,120 --> 01:22:47,520
हुआ होगा। जी है ना? और ये

1163
01:22:47,520 --> 01:22:51,680
जो मैंने कहा था ना कि आप आप में से किसी ने इसके संबंध में

1164
01:22:51,680 --> 01:22:52,180
बात

1165
01:22:51,920 --> 01:22:56,080
कही है जो इसका उत्तर है तो वो आपने ही दिया था वो उत्तर।

1166
01:22:56,080 --> 01:23:00,240
ईश्वर तो सब जगह है मगर हम ईश्वर उसी को मानते हैं जो

1167
01:23:00,240 --> 01:23:04,240
शास्त्र के अनुसार जिसको कहा गया होता है ये ईश्वर है तो हम

1168
01:23:04,240 --> 01:23:08,240
मानेंगे हां ये ईश्वर है तो यह उत्तर तो आपने कहा था कि अद्वैत की दृष्टि से

1169
01:23:08,240 --> 01:23:12,480
हो गया तो राम जी किसी और रूप में कोई पाप

1170
01:23:12,480 --> 01:23:16,560
कर सकते हैं जैसे आपने कहा वो राम के रूप में नहीं कर सकते हैं या

1171
01:23:16,560 --> 01:23:20,640
अद्वैत की दृष्टि से हो गया लेकिन नयन जी का जो प्रश्न था वो ये था कि राम के

1172
01:23:20,640 --> 01:23:24,640
ही रूप में क्योंकि रामो विग्रहान धर्म तो वो उसी रूप में कोई पाप कर

1173
01:23:24,640 --> 01:23:28,640
सकते हैं तो इसका आंसर आपका वाला ही था ना कि हां कर सकते हैं। मगर

1174
01:23:28,640 --> 01:23:32,720
तब हम उसे शास्त्र की क्योंकि शास्त्र में नहीं कहा गया कि राम ऐसा

1175
01:23:32,720 --> 01:23:36,720
करते थे तो हम नहीं मानेंगे कि राम है। हम मानेंगे कि कोई बैरुपिया

1176
01:23:36,720 --> 01:23:40,720
है। जैसे कि सीता माता के पास रावण जब

1177
01:23:40,720 --> 01:23:44,880
सर काट के ले गए। है ना? श्री राम का सर काट

1178
01:23:44,880 --> 01:23:48,960
के ले गया था रावण। तो क्योंकि सीता माता को राम जी की

1179
01:23:48,960 --> 01:23:53,040
यह मर्यादा पता थी कि उनको कोई वध नहीं कर सकता। ठीक है?

1180
01:23:53,040 --> 01:23:57,200
जी। पता थी ना? तो इसलिए सीता माता ने उस कटे

1181
01:23:57,200 --> 01:24:01,280
हुए सर को राम जी का नहीं माना। राम जी वाला मुख होते हुए

1182
01:24:01,280 --> 01:24:04,720
भी नहीं माना।

1183
01:24:04,720 --> 01:24:06,960
ठीक है? तो यहां पे जो सवाल

1184
01:24:06,960 --> 01:24:11,280
आता है कि राम जी मतलब भैरोपिया मान लेंगे बट जो प्रश्न

1185
01:24:11,280 --> 01:24:15,280
वहां पे यही रहा ना कि कर सकते हैं अपनी इच्छा से कि नहीं? राम जी

1186
01:24:15,280 --> 01:24:19,360
कर तो रहे हैं ना। कर तो रहे हैं ना। ये आपकी प्रॉब्लम है कि

1187
01:24:19,360 --> 01:24:23,680
आप मान रहे हैं। अच्छा हां समझ गए। मतलब कर रहे हैं बट हम उस उस मतलब उस

1188
01:24:23,680 --> 01:24:29,440
सीन को मतलब भगवान का नहीं मानेंगे। हां हम लोग नहीं मानेंगे। नहीं नहीं

1189
01:24:29,440 --> 01:24:33,520
भगवान नहीं है। हां हां कर तो रहे हैं जिसको

1190
01:24:33,520 --> 01:24:37,600
शास्त्र जिसको प्रमाणित नहीं करेंगे उसको हम नहीं मानेंगे। हां हम लोग उसे

1191
01:24:37,600 --> 01:24:41,600
राम नहीं कहेंगे। बस इतनी सी बात है तो भैया वो जो पहले बात चल रही

1192
01:24:41,600 --> 01:24:45,600
थी कि शास्त्रों के परे भी अगर ईश्वर रहता है उस जगह पर मैं एक

1193
01:24:45,600 --> 01:24:49,680
बात कहूं इसमें यही उत्तर रहेगा कि शास्त्र के ही परिधि में वो कुछ करेगा

1194
01:24:49,680 --> 01:24:54,320
तो ही ईश्वर अनुकरणीय रहेगा एक बात है जी

1195
01:24:54,320 --> 01:24:58,400
वो शास्त्र में तो राम जी का जितना वर्णन आया है

1196
01:24:58,400 --> 01:25:02,400
रामायण में हम तो उतने कहानियों को जानते हैं परंतु ऐसा तो हो सकता

1197
01:25:02,400 --> 01:25:06,400
है ना मतलब राम जी तो 11000 वर्ष तो शासन

1198
01:25:06,400 --> 01:25:10,400
किए थे सभी का तो विवरण नहीं हर दिन वो क्या किए थे तो कुछ ना कुछ

1199
01:25:10,400 --> 01:25:15,120
पाप ऐसा हो भी सकता है जो उसका वर्णन नहीं है शास्त्र में परंतु किए थे

1200
01:25:15,120 --> 01:25:19,120
मगर शास्त्र ने जब उनको धर्मकार स्वरूप कह दिया तो हम ये क्यों

1201
01:25:19,120 --> 01:25:22,320
मानेंगे उन्होंने उल्लंघन किया होगा भैया

1202
01:25:22,320 --> 01:25:26,320
मैं बोलू इस पे राम जी का जो परिचय

1203
01:25:26,320 --> 01:25:30,720
है वो हमको शास्त्र ही उससे प्राप्त होता है ना और कहीं से तो प्राप्त होता नहीं है

1204
01:25:30,720 --> 01:25:34,720
इसलिए जितना शास्त्र में उतना ही मानना पड़ेगा हर रोज का दिनचर्या क्या

1205
01:25:34,720 --> 01:25:39,120
था उससे क्या मतलब मानव कल्याण के लिए जो जितना

1206
01:25:39,120 --> 01:25:43,120
आशुतोष जी वाली बात को मैं और क्लियर कर दूं कि

1207
01:25:43,120 --> 01:25:47,200
जब राम को हम जानते ही शास्त्र से हैं तो हम यह

1208
01:25:47,200 --> 01:25:51,200
नहीं कह सकते हो शास्त्र में नहीं बताया होगा उन्होंने अधर्म भी किया हो राम राम

1209
01:25:51,200 --> 01:25:55,360
के लिए शास्त्र ने यह कह दिया कि वह विग्रहवान धर्म थे

1210
01:25:55,360 --> 01:25:59,680
तो हमें फिर यह मानना पड़ेगा कि उन्होंने कभी भी कुछ भी ऐसा नहीं किया

1211
01:25:59,680 --> 01:26:03,760
जो धर्म की सीमा के बाहर हो तो आज कितनी अच्छी चीज क्लियर हुई

1212
01:26:03,760 --> 01:26:07,840
है ना हां सर जी बताइए

1213
01:26:07,840 --> 01:26:12,080
और भैया वो मेरा एक प्रश्न मेरा एक प्रश्न

1214
01:26:12,080 --> 01:26:16,400
एक मिनट एक मिनट सरस जी बताएं हां शिवश जी शास्त्र

1215
01:26:16,400 --> 01:26:20,800
एक हेल्पिंग हैंड है हम हम उसको जानने

1216
01:26:20,800 --> 01:26:24,880
के लिए हम उसी को लेके उसको जानने की उसकी परे जानने की

1217
01:26:24,880 --> 01:26:28,960
कोशिश कर रहे हैं ठीक है जो वो कहते हैं आंखें बंद करके

1218
01:26:28,960 --> 01:26:33,120
मानो ये शास्त्र खुद मना करता है ठीक है तो वो जो कह रहे

1219
01:26:33,120 --> 01:26:37,280
हैं राम जी आते हैं जाते हैं जो भी करते

1220
01:26:37,280 --> 01:26:37,780
और

1221
01:26:37,440 --> 01:26:41,440
वैसे भी शिवश जी हमने राम जी को अधर्मी नहीं कहा है। हम पाप

1222
01:26:41,440 --> 01:26:45,440
और पुण्य की डेफिनेशन में उनको लाना पड़ा। ठीक है? खैर तो

1223
01:26:45,440 --> 01:26:49,680
हां तो लेकिन खैर हम ये कह रहे हैं कि शास्त्र एक हेल्पिंग हैंड है।

1224
01:26:49,680 --> 01:26:54,640
हम आंखें बंद के बस शास्त्र कह रहा है। हम हमारा कभी उद्धार नहीं होगा।

1225
01:26:54,640 --> 01:26:57,440
उद्धार के लिए

1226
01:26:57,440 --> 01:27:01,440
बोली है क्या? किसी ने बोली है क्या आंख बंद करके और

1227
01:27:01,440 --> 01:27:05,520
जो है वो वही हो रहा है ना शिव जी मैं क्या

1228
01:27:05,520 --> 01:27:09,520
कह रही हूं? कि रामो विग्रह जो भी है ना स्टेटमेंट है ठीक

1229
01:27:09,520 --> 01:27:13,920
है तो वो कह रहे हैं ठीक है एक उपासना हो सकता है कि तुम अपने कल्याण

1230
01:27:13,920 --> 01:27:18,480
के लिए तुम ही राम हो तुम ही रावण हो तुम ही सीता हो तुम ही शिव हो

1231
01:27:18,480 --> 01:27:22,800
तुम ही से ब्रह्मांड शुरू होती है तुमसे ही खत्म होती है ठीक है

1232
01:27:22,800 --> 01:27:27,200
जब वो इस इस रास्ते में चलने लग जाता है ठीक है वो शास्त्र

1233
01:27:27,200 --> 01:27:31,280
इतना डीप है कि वो डॉट कनेक्ट करते करते करते

1234
01:27:31,280 --> 01:27:35,440
बात अपनी तरफ ही आ जाती है रिवर्स इंजीनियरिंग करते करते है ना

1235
01:27:35,440 --> 01:27:40,800
शास्त्र को मैं एक वो बताऊं शास्त्र का उदाहरण दूं तो गुलेल होती है ना गुलेल

1236
01:27:40,800 --> 01:27:45,440
गुलेल मतलब गुलेल होती है ना वो जो पहले

1237
01:27:45,440 --> 01:27:49,520
निशाना लगाने के लिए निशाना लगाने के लिए शॉट स्लिंग

1238
01:27:49,520 --> 01:27:52,480
शॉट कहते हैं उसको स्लिंग शॉट कहते हैं पता नहीं क्या

1239
01:27:52,480 --> 01:27:56,560
है तो गुलैल में नहीं हम लोग ये कुछ अपना जो

1240
01:27:56,560 --> 01:28:01,840
क्या होता है उसको गोली या गिट्टी या पत्थर का कंकड़

1241
01:28:01,840 --> 01:28:06,000
तो उसको रख के उसको उसमें में रख के उसमें

1242
01:28:06,000 --> 01:28:10,000
छोड़ते तो शास्त्र उसी तरह की एक गुलैल जैसे हैं

1243
01:28:10,000 --> 01:28:14,080
जो आपको उस गंतव्य तक पहुंचाते

1244
01:28:14,080 --> 01:28:18,080
हैं। मगर ऐसा नहीं है कि उस गंतव्य जब आप पहुंचो तो वहां भी शास्त्र

1245
01:28:18,080 --> 01:28:22,080
आपके हाथ में हो। वो यहां से एक ऐसा धक्का देते हैं आपको जो

1246
01:28:22,080 --> 01:28:26,160
आपका परमार्थ सिद्ध हो जाए। अब बात यह आती है

1247
01:28:26,160 --> 01:28:30,160
कि आंख बंद करके विश्वास करने की बात नहीं की जा रही है। वहां तर्क दिया जा

1248
01:28:30,160 --> 01:28:34,480
रहा है कि राम जी अपने डेली लाइफ में कहीं-कहीं पर कुछ कुछ

1249
01:28:34,480 --> 01:28:38,720
गल अमर्यादा कर देते थे। ऐसा हम क्या मान नहीं

1250
01:28:38,720 --> 01:28:42,720
सकते? क्योंकि शास्त्र में तो सब कुछ वर्णित नहीं है तो वर्णित तो यह भी

1251
01:28:42,720 --> 01:28:46,800
नहीं है कि वह करते थे। तो यह क्यों मान ले कि वह करते थे। इसके संबंध

1252
01:28:46,800 --> 01:28:51,040
में कहा कि शास्त्र ने यदि शास्त्र ने यदि उनको विग्रहवान धर्म

1253
01:28:51,040 --> 01:28:55,440
कहा है तो हमें यही मानना होगा कि उन्होंने अपने

1254
01:28:55,440 --> 01:28:59,600
जीवन में कभी भी धर्म का उल्लंघन नहीं किया क्योंकि यदि

1255
01:28:59,600 --> 01:29:03,600
हम शास्त्र पर डाउट करेंगे तो राम जी का अस्तित्व

1256
01:29:03,600 --> 01:29:07,520
ही सिद्ध नहीं होगा फिर हमें ये हम शास्त्र की किसी बात पर

1257
01:29:07,520 --> 01:29:11,520
डाउट करने से सबसे पहली दिक्कत ये आ जाती है फिर हम शास्त्र को

1258
01:29:11,520 --> 01:29:16,080
पूर्णतया मानने वाले सिद्ध नहीं होते हमारे लिए परम प्रमाण नहीं रह जाता है शास्त्र

1259
01:29:16,080 --> 01:29:20,080
यह नहीं कहा जा रहा है कि उनकी किसी बात को आंख बंद करके मान लो। आपको

1260
01:29:20,080 --> 01:29:24,080
हर तरह से तर्क दिया जाएगा, संतुष्ट किया जाएगा। मगर हम

1261
01:29:24,080 --> 01:29:28,080
यह कहे कि हम शास्त्र की इस बात को तो प्रमाण के रूप में मानते

1262
01:29:28,080 --> 01:29:32,080
हैं कि राम थे। भाई राम थे ये सिद्ध कहां से हुआ?

1263
01:29:32,080 --> 01:29:36,160
हो सकता है जो राम ने किया वो रावण रावण के नाम से लिखा हो और

1264
01:29:36,160 --> 01:29:40,560
जो रावण ने किया वो राम के नाम से लिखा हो। जब शास्त्र ये झूठ बोल सकते हैं

1265
01:29:40,560 --> 01:29:44,800
कि वह विग्रहवान धर्म थे। तो बाकी बातें भी तो झूठ बोल सकते हैं।

1266
01:29:44,800 --> 01:29:49,040
तो यहां यह कहा जा रहा है कि शास्त्र को अर्ध

1267
01:29:49,040 --> 01:29:53,040
कुकुट न्याय से मानने वाले आप नहीं हो सकते। पहले आप फिर शास्त्र को मानने

1268
01:29:53,040 --> 01:29:57,280
वाला ना होने की बात को स्वीकार करिए। फिर हम आपको स्वीकार करवाएंगे

1269
01:29:57,280 --> 01:30:01,280
कि शास्त्र को क्यों मानना है। उसके बाद फिर आप आइए। ये कहा जा

1270
01:30:01,280 --> 01:30:05,360
रहा है। जी वही है ना कि शास्त्र तभी मानेंगे जब

1271
01:30:05,360 --> 01:30:09,440
हम जानेंगे। है ना? नाम को हम सिर्फ नाम

1272
01:30:09,440 --> 01:30:13,600
रूप से धर्म अधर्म सो एंड सो वर्ड जब तक हम शब्दों से खेलते

1273
01:30:13,600 --> 01:30:17,760
रहेंगे हम यही घूमते रहेंगे है ना ठीक है लेकिन हम शास्त्र ये भी क्लेम

1274
01:30:17,760 --> 01:30:21,920
कर रहा है कि वो इस शास्त्र से परे है इस ब्रह्मांड से परे है एक्सट्रा

1275
01:30:21,920 --> 01:30:22,640
है ना

1276
01:30:22,640 --> 01:30:26,880
जब तक हम राम को अपने से अलग देखते रहेंगे तब तक हम कभी उद्धार

1277
01:30:26,880 --> 01:30:31,120
हो ही नहीं सकते राम क्योंकि वो वो भी वो

1278
01:30:31,120 --> 01:30:35,440
तो एक है ही कि देखिए ऐसा है कि दादा मेरा

1279
01:30:35,440 --> 01:30:39,520
एक निजी प्रश्न ये जो है थोड़ा सा ये ये बात जो है ना डिफरेंट

1280
01:30:39,520 --> 01:30:43,680
वे में जा रही है। अभी आज हमें जो ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है के

1281
01:30:43,680 --> 01:30:47,760
संबंध में बात करनी थी जिसमें पाप की बात चल रही थी वो पाप की बात

1282
01:30:47,760 --> 01:30:51,920
में बीच में राम जी की बात आई मगर आपने जो बात उठाई है वो मैं एक

1283
01:30:51,920 --> 01:30:56,000
छोटा सा कुछ कह करके क्लियर कर दूं कि राम जी को परे भी कहा

1284
01:30:56,000 --> 01:31:00,080
गया है तो वहां पर भगवान के शास्त्रीय वचनों द्वारा

1285
01:31:00,080 --> 01:31:04,240
भगवान के भगवत स्वरूप होने की बात की जा रही है और जो ये वाली बात है कि जब तक हम राम

1286
01:31:04,240 --> 01:31:08,480
को अपने से अलग मानेंगे तो अपने से अलग मानना

1287
01:31:08,480 --> 01:31:12,800
पड़ेगा जब तक हम मुक्त नहीं है। मुक्ति प्राप्त करने के लिए ही

1288
01:31:12,800 --> 01:31:17,360
अपने से अलग मानना है। मतलब जैसे धरती

1289
01:31:17,360 --> 01:31:21,840
पर गिरे हुए हैं तो धरती से उठने के लिए ही धरती का सहारा लेना है।

1290
01:31:21,840 --> 01:31:26,000
इसी प्रकार से क्या कहते हैं? भेद में फंसे हुए

1291
01:31:26,000 --> 01:31:30,080
हैं तो भेद से निर्भेद तक पहुंचने के लिए ही भेद का सहारा

1292
01:31:30,080 --> 01:31:34,080
लेना है। तो भेद का सहारा कैसे लेना है? भेद का सहारा ऐसे लेना है कि

1293
01:31:34,080 --> 01:31:37,840
राम जी वो रहे और मैं यह रहा। तो यह भेद करते हुए

1294
01:31:37,840 --> 01:31:41,840
ही आप क्योंकि चलिए इस यहां पर हम मान लेंगे कि राम जी

1295
01:31:41,840 --> 01:31:46,000
जो है हमसे अलग नहीं है। मगर हमारे अभी भी

1296
01:31:46,000 --> 01:31:50,720
जीवन के 99% अंश ऐसे हैं जिसमें हम बार-बार

1297
01:31:50,720 --> 01:31:54,720
भले ही थ्योरिकली हम मानते हैं कि सब कुछ एक है। मगर बार-बार हम काम उसी

1298
01:31:54,720 --> 01:31:58,880
के अनुसार कर रहे हैं कि यह सब कुछ एक नहीं है। तो उस सब कुछ एक नहीं

1299
01:31:58,880 --> 01:32:02,960
है। 99% वाले अंश में भी यह जानने के लिए कि सब

1300
01:32:02,960 --> 01:32:07,040
कुछ एक है और उसी के अनुसार आचरण फील करने के लिए हमको यहां पर

1301
01:32:07,040 --> 01:32:11,200
भी राम जी को भी अपने से अलग मान करके द्वैत भाव रखते हुए उनका

1302
01:32:11,200 --> 01:32:15,360
अनुगमन अनुसरण पूजा वगैरह करनी होगी जिससे कि हमारा वो

1303
01:32:15,360 --> 01:32:19,360
99% वाला भी सुधर जाए तो हम हमारा जो है परमार्थ हमें

1304
01:32:19,360 --> 01:32:23,360
प्राप्त हो सके। मैं छोटा सा बोल देती हूं शिवश जी वही मैं कह

1305
01:32:23,360 --> 01:32:28,080
रही हूं कि अलग देखते रहेंगे तो अलग होता रहेगा। कि

1306
01:32:28,080 --> 01:32:32,080
क्या बोलते हैं विवेक चूड़ामणि में भी शंकराचार्य यही कह रहे हैं शिष्य को कि

1307
01:32:32,080 --> 01:32:36,480
गुरु कह रहा है कि तुम आज तय कर लो कि तुम ब्रह्म हो

1308
01:32:36,480 --> 01:32:40,560
आज तुम तय कर लो अभी वो वो शिष्य मुक्त भी नहीं हुआ वो ज्ञान के लिए आया

1309
01:32:40,560 --> 01:32:44,560
है और उसको बोल दिया कि तुम तय कर लो कि तुम ब्रह्म हो अब इस जर्नी को

1310
01:32:44,560 --> 01:32:48,880
तुम डॉट्स कनेक्ट करो एक सेकंड एक सेकंड शिवाजी तो

1311
01:32:48,880 --> 01:32:53,200
जब तत्व मसीह मैं ही राम सब कुछ आता है तो मैं

1312
01:32:53,200 --> 01:32:57,360
चिंतन करूंगी मैं राम कैसे मैं तो इतनी दुष्ट हूं हूं। मैं तो ऐसे

1313
01:32:57,360 --> 01:33:01,360
बोलती हूं। मैं तो ऐसे करती हूं। मैं राम कैसे हो सकती हूं? है ना?

1314
01:33:01,360 --> 01:33:05,360
तो मैं ऐसे डॉट्स कनेक्ट करते करते एक

1315
01:33:05,360 --> 01:33:09,600
दिन मुझे उसका अनुभूति हो ही जाएगा। उसके अलावा जिस दिन मैं निश्चय

1316
01:33:09,600 --> 01:33:13,600
कर लूंगी कि मैं राम कैसे? राम मेरे से अलग ये चलता

1317
01:33:13,600 --> 01:33:17,760
रहेगा। ये नेवर एंडिंग है। जिस दिन मैं सवाल करूंगी। मैं राम कैसे? उस

1318
01:33:17,760 --> 01:33:22,320
दिन मेरी डेस्टिनेशन के दरवाजे खुल जाएंगे। बिल्कुल

1319
01:33:22,320 --> 01:33:26,560
आपको जो है जो शंकराचार्य जी ने विवेक चूड़ामणि में कहा

1320
01:33:26,560 --> 01:33:30,720
है उसको आपको शब्द प्रमाण के रूप में तुरंत स्वीकार कर लेना चाहिए।

1321
01:33:30,720 --> 01:33:34,800
आपकी थ्योरिकली आपको जान लेना चाहिए कि आप ही राम

1322
01:33:34,800 --> 01:33:38,960
हो। मगर अभी अभी आपको क्या

1323
01:33:38,960 --> 01:33:43,120
करना है? व्यवहार करना बाकी है। आपने थ्योरिकली

1324
01:33:43,120 --> 01:33:47,200
ये जान लिया है कि आप ही राम हो। मगर आपको अभी वह

1325
01:33:47,200 --> 01:33:51,520
फील नहीं है। नैन चिनती शस्त्राण नैन दति पावक

1326
01:33:51,520 --> 01:33:55,520
यह आपने जान लिया है कि हां आत्मा को आपको कोई कुछ नहीं कर सकता

1327
01:33:55,520 --> 01:33:59,520
है। मगर आपको उस जानने को उसमें एक बाधा आ

1328
01:33:59,520 --> 01:34:03,920
रही है कि आप जो प्रपंच रूपी संसार में फंसे हुए हो आपकी जो ज्ञानेंद्रियां

1329
01:34:03,920 --> 01:34:08,160
और आपकी जो कर्मेंद्रियां जो प्रकृति से जुड़ी हुई है वह आपको बार-बार मैसेज

1330
01:34:08,160 --> 01:34:08,660
दे

1331
01:34:08,320 --> 01:34:12,400
रही है कि आपको कुछ भी हो सकता है। तो आपने थ्योरिकली जब यह जान

1332
01:34:12,400 --> 01:34:16,480
लिया है कि मुझे कुछ नहीं हो सकता है। अगर आपको प्रकृति से मैसेज आ रहा है

1333
01:34:16,480 --> 01:34:20,480
कि आपको कुछ भी हो सकता है तो आपको अपने शरीर के

1334
01:34:20,480 --> 01:34:24,800
द्वारा अपनी वाणी के द्वारा अपनी कर्मेंद्रियों ज्ञानेंद्रियों के द्वारा ऐसा व्यवहार

1335
01:34:24,800 --> 01:34:28,800
ऐसा आचरण करना है कि आपने जो वो परम सत्य जान लिया है ना

1336
01:34:28,800 --> 01:34:33,680
नैन छिन्नति शस्त्राणी वाला या तत्व मसीह वाला वो आपको

1337
01:34:33,680 --> 01:34:37,920
स्वरूप भूत हो जाए। हां एक्सक्टली वही शिव जैसे

1338
01:34:37,920 --> 01:34:42,000
कि मैं सुनिए मैं जैसे जॉब जॉब मैं उसको पूरा

1339
01:34:42,000 --> 01:34:46,000
कर दूं पूरा कर दूं। हां जी हां जी वो स्वरूप भूत होने तक की यात्रा में

1340
01:34:46,000 --> 01:34:50,000
आपको व्यवहार आपको व्यवहार वैसा ही रखना पड़ेगा

1341
01:34:50,000 --> 01:34:54,160
जो आप इधर फंसे हुए हो वो वाला जैसे कि पृथ्वी गोल है यह

1342
01:34:54,160 --> 01:34:58,400
सेटेलाइट के द्वारा अपनी किताबों में या अपने टीचर्स की वाणी

1343
01:34:58,400 --> 01:35:02,560
के द्वारा हमने जान लिया कि पृथ्वी गोल है। हमारे मन में फिट हो गया।

1344
01:35:02,560 --> 01:35:06,800
तो इस रूप में हम यह जानते हैं कि पृथ्वी गोल है। मगर वास्तविकता

1345
01:35:06,800 --> 01:35:11,120
में यदि हमको पृथ्वी को गोल फील भी करना है तो हमें

1346
01:35:11,120 --> 01:35:15,200
एक सेटेलाइट एक स्पेसशिपिप की आवश्यकता है जो हम पृथ्वी की पर्दी से बाहर

1347
01:35:15,200 --> 01:35:19,360
निकल सके और पृथ्वी को देख सकें। तो उसके लिए हमें सेटेलाइट

1348
01:35:19,360 --> 01:35:23,520
बनाने की आवश्यकता है। उसके लिए हमें उसमें बैठने की आवश्यकता है।

1349
01:35:23,520 --> 01:35:27,600
सेटेलाइट बनाने के लिए उसमें बैठने जाने के लिए हमें धरती

1350
01:35:27,600 --> 01:35:31,600
पर इधर से उधर यात्रा करनी पड़ेगी और उस दौरान यह मानना पड़ेगा, व्यवहार

1351
01:35:31,600 --> 01:35:35,840
करना पड़ेगा कि पृथ्वी फ्लैट है। है ना?

1352
01:35:35,840 --> 01:35:39,840
भैया नहीं शिवश जी मैं वही कह रही हूं। आप जो बोल रहे

1353
01:35:39,840 --> 01:35:44,080
हो जो भी है परमार्थ मुझे नहीं समझ में आता क्योंकि अध्यात्म

1354
01:35:44,080 --> 01:35:48,080
एक ही कहता है कि अद्वैत वही कह रहा है कि परमार्थ परमार्थ कुछ नहीं

1355
01:35:48,080 --> 01:35:52,240
है। जैसे कि मैं आपको बताती हूं। ठीक है? दुष्ट काम करना बहुत आसान

1356
01:35:52,240 --> 01:35:56,400
है। है ना? मुश्किल वही होता है जो धर्म सही करना

1357
01:35:56,400 --> 01:36:00,480
होता है। जैसे कि मैं मुश्किल घड़ी में हूं। मेरे लिए इजी वे बहुत है। बहुत सारे

1358
01:36:00,480 --> 01:36:04,720
मैं एक्सक्यूसेस देती हूं। लेकिन ये अवगुण है। ये राक्षस ये रावण के अवगुण

1359
01:36:04,720 --> 01:36:08,720
है मेरे अंदर। क्योंकि मैं ही राम हूं मैं ही रावण हूं। तो मैं शास्त्र

1360
01:36:08,720 --> 01:36:12,720
को मैं रेफर करूंगी कि मैं इस सिचुएशन में हूं। मुझे क्या करना चाहिए?

1361
01:36:12,720 --> 01:36:16,720
शास्त्र तो कह रहा है कि तुम ही राम हो। अगर मैं राम हूं तो मैं इस सिचुएशन में

1362
01:36:16,720 --> 01:36:20,800
क्या करूं? क्या कर कर सकते हैं राम जी इस सिचुएशन में? तो मैं शास्त्र को

1363
01:36:20,800 --> 01:36:24,880
रेफर करूंगी। है ना? फिर मैं डॉट्स कनेक्ट करूंगी कि अच्छा लोक

1364
01:36:24,880 --> 01:36:29,200
व्यवहार में भी राम जी होते हुए मैं इस इस डेस्टिनेशन को कैसे

1365
01:36:29,200 --> 01:36:33,280
कैसे पहुंच सकती हूं? क्योंकि अल्टीमेटली जीव को मुक्त होना है। जीव

1366
01:36:33,280 --> 01:36:37,440
ही ढूंढेगा रास्ता। जीव ही शास्त्र रेफर करेगा। जीव ही

1367
01:36:37,440 --> 01:36:38,640
परमार्थिक व्यवहारिक जो

1368
01:36:38,640 --> 01:36:42,800
भी है जो भी व्यवहार है वही करेगा। इवेंचुअली सब कुछ वही होगा।

1369
01:36:42,800 --> 01:36:47,120
तो हमें जब तक हम अपने से अलग देखेंगे भगवान को

1370
01:36:47,120 --> 01:36:51,280
हमारे लिए दिक्कत होती रहेगी। जब तक हम अपने पर लागू नहीं करेंगे

1371
01:36:51,280 --> 01:36:56,000
तो शास्त्र को हम अंधे भक्त की तरह जैसे आपने बोला कि हां

1372
01:36:56,000 --> 01:37:00,160
जानना एक नॉलेज है। रियलाइजेशन होना अलग बात है।

1373
01:37:00,160 --> 01:37:04,640
क्या मैं राम हूं? इसका रियलाइजेशन नहीं है। शास्त्र कह रहा है बस।

1374
01:37:04,640 --> 01:37:08,800
ठीक है। मैं बस इसको मान करके चलूं। इससे मेरा कभी उद्धार नहीं होगा। लेकिन

1375
01:37:08,800 --> 01:37:13,520
मैं वशी भी तो वही कर रही है। वो जानें

1376
01:37:13,520 --> 01:37:18,080
हां जान रही हूं। करेक्ट शिवशी उपनिषद

1377
01:37:18,080 --> 01:37:22,160
शास्त्र ये सब कुछ वही वो तो कर चुके हैं स्टेटमेंट। है ना? वो तो कर चुके

1378
01:37:22,160 --> 01:37:26,160
हैं कि आप ही ब्रह्म हो। आप ही ब्रह्मांड है। एक्सेट्रा वो कर चुके

1379
01:37:26,160 --> 01:37:30,160
हैं। तो हो गया ना। बात खत्म हो गई। फिर हमें करना क्या है? परमार्थ की दृष्टि

1380
01:37:30,160 --> 01:37:34,240
से परमार्थ की दृष्टि से आप

1381
01:37:34,240 --> 01:37:39,360
लेकिन उस को प्राप्त करने के लिए खैर मैं इसको बता रहा हूं

1382
01:37:39,360 --> 01:37:43,360
कह रही है मैं समझ रहा हूं यहां पे थोड़ा सा गु्थमगु

1383
01:37:43,360 --> 01:37:47,440
हो रही है बातों की उसकी वजह से थोड़ा कंफ्यूजन है इसको

1384
01:37:47,440 --> 01:37:51,440
हम रखेंगे अद्वैत और द्वैत पे बात करेंगे कब मानना है कब नहीं मानना है ये

1385
01:37:51,440 --> 01:37:53,920
अलग चैप्टर है मगर पूरी तरीके

1386
01:37:53,920 --> 01:37:57,920
से हम अब अभी इसलिए नहीं मान सकते कि आपको अभी के अभी अप्लाई

1387
01:37:57,920 --> 01:38:01,920
कर देना है कि मैं नहीं रहा हूं क्योंकि अगर यह अद्वैत को

1388
01:38:01,920 --> 01:38:06,000
अप्लाई कर दें व्यवहार में वैसे मुझे नहीं लगता कि आप कह रही हैं कि

1389
01:38:06,000 --> 01:38:10,080
व्यवहार में अप्लाई कर दो अद्वैत को मगर अद्वैत को यदि अप्लाई कर

1390
01:38:10,080 --> 01:38:14,080
देंगे तो कुछ भी करना बाकी नहीं रह जाएगा क्योंकि अद्वैत का अर्थ है

1391
01:38:14,080 --> 01:38:18,560
जहां पे क्रिया भी नहीं है ज्ञान स्वरूप कोई

1392
01:38:18,560 --> 01:38:23,040
है ही नहीं स्वयं सिद्ध हो जाएंगे कि मैं ही ब्रह्म हूं तो

1393
01:38:23,040 --> 01:38:27,680
ये जानकारी है सेल्फ जो आपने कहा ना सेल्फ रियलाइजेशन

1394
01:38:27,680 --> 01:38:31,920
वो हमें प्राप्त करनी है तो जानकारी होने से लेकर के सेल्फ

1395
01:38:31,920 --> 01:38:36,080
रियलाइजेशन के बीच की जो यात्रा है उसमें यह जानने

1396
01:38:36,080 --> 01:38:40,400
वाला होते हुए भी कि सेल्फ रियलाइजेशन में मुझे क्या प्राप्त

1397
01:38:40,400 --> 01:38:44,720
होगा मैं ही राम हूं यह जानने वाला होते हुए भी

1398
01:38:44,720 --> 01:38:49,680
आपको राम से अलग रह के ही उनकी पूजा करनी पड़ेगी।

1399
01:38:49,680 --> 01:38:53,760
शिवश जी अद्वैत वेरी मच एप्लीकेबल होता है। लोक व्यवहार में भी

1400
01:38:53,760 --> 01:38:57,840
मैं आपको एग्जांपल देती हूं। जैसे सब स्वप्न है। स्वप्न में

1401
01:38:57,840 --> 01:39:01,920
हम बहुत कुछ कर जाते हैं। हम हम ही सब कुछ बने होते हैं अपने

1402
01:39:01,920 --> 01:39:06,000
स्वप्न में स्वप्न में। जैसे भगवान ही सब कुछ है। हमारे स्वप्न में

1403
01:39:06,000 --> 01:39:09,520
मैं ही पानी बनी हूं। मैं ही राक्षस बनी हूं। मैं ही मर रही हूं।

1404
01:39:09,520 --> 01:39:13,760
कोई और है ही नहीं मेरे स्वप्न में। मेरे ही बहुत रूप है। मेरे ही बहुत नाम

1405
01:39:13,760 --> 01:39:17,760
है। ठीक है? लेकिन जब मैं उठ जाती हूं तो मुझे रियलाइज होता है कि

1406
01:39:17,760 --> 01:39:21,760
वो तो स्वप्न था। मैं तो मुक्त मतलब उससे मैं जुड़ी तो नहीं हूं ना। मैं उस चिंता में

1407
01:39:21,760 --> 01:39:25,840
तो नहीं हूं। तो अद्वैत फिलोसफी लोक व्यवहार में यही करेगा जैसे

1408
01:39:25,840 --> 01:39:30,160
मेरी आपकी झगड़ा हो गई। ठीक है? लेकिन मैं सोचूंगी शिवश मैं ही हूं।

1409
01:39:30,160 --> 01:39:34,160
शिवश मैं शिवश हूं। शिवश ही मैं हूं। है ना? वहां

1410
01:39:34,160 --> 01:39:38,640
पे द्वैत है ही नहीं। मैं लड़ूं किस बात की? शिवश जी से तो मैं उनसे

1411
01:39:38,640 --> 01:39:42,800
यू नो जो धर्म की बात आती है कि मैं आराम से बात करके आपसे सॉर्ट आउट

1412
01:39:42,800 --> 01:39:46,800
करने की कोशिश करूंगी। तो मैं ऐसे करती रहूंगी तो मेरे

1413
01:39:46,800 --> 01:39:50,960
मैं वही कह रहा हूं जो आप कह रही हैं जैसे आप मैं इसको एंडिंग करूंगा क्योंकि

1414
01:39:50,960 --> 01:39:53,680
यह दूसरा टॉपिक

1415
01:39:53,680 --> 01:39:57,680
का दूसरा टॉपिक खड़ा है। मैं उसको हैंडिंग करूंगा। मैं बस यह कह

1416
01:39:57,680 --> 01:40:02,640
रहा हूं कि जिस दिन आप यह समझने लग गए ना

1417
01:40:02,640 --> 01:40:06,720
क्या कि शिवश मैं ही हूं उस दिन आपको धर्म

1418
01:40:06,720 --> 01:40:11,040
की आवश्यकता ही नहीं रह गई। आप मुक्त है उस समय। जी भैया। समझ

1419
01:40:11,040 --> 01:40:16,560
रही है? कह रहे लेकिन मुझे पड़ेगा

1420
01:40:16,560 --> 01:40:21,840
लोक व्यवहार में अप्लाई होता है। तो व्यवहार कहां से आ गया?

1421
01:40:21,840 --> 01:40:24,720
जब जब हम जब हम मुक्त हो गए हैं

1422
01:40:24,720 --> 01:40:29,200
जब हम मुक्त हो गए हैं तो वहां पर पूरी तरीके से अद्वत

1423
01:40:29,200 --> 01:40:33,360
जो आपने कहा ना लोक व्यवहार में पूरी तरीके से अद्वैत अप्लाइड हो सकता है। पूरी

1424
01:40:33,360 --> 01:40:37,360
तरीके से नहीं हो सकता है। हां अपनी चीजों को सुधारने के लिए हम

1425
01:40:37,360 --> 01:40:41,440
लोग थोड़ा थोड़ा थोड़ा थोड़ा उसका सहारा ले सकते हैं। बिल्कुल ले सकते हैं।

1426
01:40:41,440 --> 01:40:45,520
मगर शंकराचार्य भगवान ने भज गोविंदम भज गोविंदम क्यों किया?

1427
01:40:45,520 --> 01:40:49,840
एक एक नहीं वो वो भी मानती है भज गोविंदम वो भी मानती

1428
01:40:49,840 --> 01:40:54,080
है यहां समझने में कंफ्यूजन हो रही है कि हम क्या कह रहे हैं वो क्या कह रही है

1429
01:40:54,080 --> 01:40:58,480
तो कहने का अर्थ है कि जिस दिन पूरी तरीके से अद्वैत

1430
01:40:58,480 --> 01:41:02,720
हो जाएगा मामला उस दिन व्यवहार की आवश्यकता ही नहीं रहेगी तो ये पंक्ति

1431
01:41:02,720 --> 01:41:07,360
जो है ना कि लोक व्यवहार में भी अप्लाई होता है ये पंक्ति आपस में कंट्राडिक्टिंग

1432
01:41:07,360 --> 01:41:12,400
है व्यवहार है ही नहीं ना अद्वैत है जब किसके साथ व्यवहार

1433
01:41:12,400 --> 01:41:16,640
और व्यवहार क्रिया भी मैं हूं है ना वह चार 24

1434
01:41:16,640 --> 01:41:20,720
भगवत गीता यज्ञ जो हो रहा है उसमें होने वाली क्रिया भी मैं हूं

1435
01:41:20,720 --> 01:41:24,720
यानी व्यवहार है ही नहीं तो फिर लोक व्यवहार में अद्वैत

1436
01:41:24,720 --> 01:41:28,800
के आने की वो ही नहीं है। हां ये है कि थोड़ा थोड़ा

1437
01:41:28,800 --> 01:41:32,800
ये हम उसका सहारा ले सकते हैं। जैसे कि मान लीजिए मैं यह बात अपनी उदाहरण

1438
01:41:32,800 --> 01:41:37,600
में कई बार कहता हूं कि मैं गाड़ी चला रहा हूं और गाड़ी चलातेचलाते

1439
01:41:37,600 --> 01:41:39,840
मैंने किसी व्यक्ति को देखा। वो मुझे बिना

1440
01:41:39,840 --> 01:41:43,840
हाथ दिए बिना इंडिकेटर दिए उसने अपनी गाड़ी हमारे आगे से

1441
01:41:43,840 --> 01:41:47,920
पूरा रास्ता हमारा काट दिया तो हमें गुस्सा आता है। क्यों आता

1442
01:41:47,920 --> 01:41:52,000
है कि भाई यार ये देखो ये व्यक्ति कई बार लोग गाली वाली भी देने

1443
01:41:52,000 --> 01:41:56,320
लगते हैं उसको। मगर जब हम जब हम अद्वैत ये जो भगवान

1444
01:41:56,320 --> 01:42:00,480
की वाली जो लाइन है कि देखो जब वो जो ज्ञान है

1445
01:42:00,480 --> 01:42:04,560
चार 35 में कहा कि तू जो तत्वदर्शी से जो तुझे ज्ञान प्राप्त

1446
01:42:04,560 --> 01:42:08,880
होगा तो तू पहले समस्त संसार को स्वयं में

1447
01:42:08,880 --> 01:42:13,680
और पीछे मुझ में देखेगा कहा है ना चार 35

1448
01:42:13,680 --> 01:42:17,760
तो वो जो ज्ञान है समस्त संसार में खुद को या

1449
01:42:17,760 --> 01:42:21,840
समस्त संसार को खुद में देखेगा तो क्या होता है जब आपके सामने से बिना

1450
01:42:21,840 --> 01:42:26,080
हाथ दिए बिना इंडिकेटर दिए जब कोई विश्वजीत जी आप अपना बंद

1451
01:42:26,080 --> 01:42:30,320
कर लीजिए म्यूट कर लीजिए बिना हाथ दिए बिना इंडिकेटर दिए जब कोई निकल

1452
01:42:30,320 --> 01:42:34,320
रहा होता है तो वहां पर गुस्सा आने की बजाय यह लगता है यह भी तो राम

1453
01:42:34,320 --> 01:42:38,640
ही जा रहे हैं यह भी तो राम ही है लीला कर रहे हैं

1454
01:42:38,640 --> 01:42:42,800
तो वहां गुस्सा गुस्सा आने की बजाय वहां गुस्सा आने की बजाय

1455
01:42:42,800 --> 01:42:46,880
क्रोध आने की बजाय गाली निकलने की बजाय वहां पर आप

1456
01:42:46,880 --> 01:42:50,880
जो है अपने व्यवहार को साध पाते हैं। अपनी सात्विकता को बचा पाते हैं।

1457
01:42:50,880 --> 01:42:54,880
अपने धर्म पथ पर ज्यादा अिकता से टिक पाते हैं।

1458
01:42:54,880 --> 01:42:58,880
ठीक है? अब हम लोग पाप पे मामला

1459
01:42:58,880 --> 01:43:03,280
चल रहा है। जिसको भी पाप वाली बात पे कुछ और कहना हो तो वो

1460
01:43:03,280 --> 01:43:08,640
कह दे। फिर आज को हम इसको वो करेंगे। सवाल पूछूंगा

1461
01:43:08,640 --> 01:43:12,880
ब्रेक लेंगे अगले अगला जो सेशन होगा वो यहीं से स्टार्ट

1462
01:43:12,880 --> 01:43:17,120
होगा आज पाप वाली बात पे ही काफी देर हो गई जी सर

1463
01:43:17,120 --> 01:43:21,120
एक सवाल पूछना था मेरे को रिलेटेड नहीं होगा

1464
01:43:21,120 --> 01:43:25,600
ना पाप वाले पे मैं कहना चाहूंगा भैया पाप वाले पे बोलिए

1465
01:43:25,600 --> 01:43:29,760
पाप वाले में ये है भैया कि जरूरी नहीं है कि जो चीज हमको अपनी दृष्टि

1466
01:43:29,760 --> 01:43:33,760
से पाप वाला लग रहा है अधर्म लग रहा है और जो चीज

1467
01:43:33,760 --> 01:43:37,840
हमको अपनी दृष्टि से धर्म लग रहा है वही अंतिम धर्म हो या वही अधर्म हो

1468
01:43:37,840 --> 01:43:42,240
उसके लिए हमको शास्त्र का ही आलंबन लेना पड़ेगा। जैसे श्री राम ने जो सम्मुख

1469
01:43:42,240 --> 01:43:46,560
वध किया था वो सभी को मतलब तर्कसंगत

1470
01:43:46,560 --> 01:43:50,560
नहीं लगता है या फिर न्यायसंगत नहीं लगता है। कई लोगों

1471
01:43:50,560 --> 01:43:54,640
को लेकिन क्या हां मतलब हां सभी को नहीं कह सकते कई लोगों

1472
01:43:54,640 --> 01:43:58,720
को। लेकिन क्या है कि जब उसके मूल में जाएंगे तो पता चलता है कि वो

1473
01:43:58,720 --> 01:44:03,040
शास्त्रीय मर्यादा के अंदर रह के राम जी ने उनका वध किया था

1474
01:44:03,040 --> 01:44:07,120
और उसके जो दुष्प्रभाव थे उस दुष्प्रभाव का भी अंत हुआ।

1475
01:44:07,120 --> 01:44:10,000
तो इसलिए जो है कि पाप और पुण्य का

1476
01:44:10,000 --> 01:44:14,240
या धर्म और अधर्म का निर्णय जो है हम अपने मन से नहीं लेंगे।

1477
01:44:14,240 --> 01:44:18,240
जो शास्त्र कहते हैं उस शास्त्र के हिसाब से ही लेना पड़ेगा।

1478
01:44:18,240 --> 01:44:22,400
इसीलिए जो धर्म का जो अंतिम निर्णय है वो जो परंपरा

1479
01:44:22,400 --> 01:44:27,840
प्राप्त आचार्य हैं उनके लिए छोड़ा गया है। हम यही कहना

1480
01:44:27,840 --> 01:44:31,920
अच्छा एक क्फजन और हो रही थी वो सरद जी का वो भी मैं

1481
01:44:31,920 --> 01:44:35,920
क्लियर कर दूं कि शास्त्र को अंधा बन के अनुकरण के लिए नहीं कहा जा रहा

1482
01:44:35,920 --> 01:44:39,920
है। ये कहा जा रहा है यदि आप शास्त्र को प्रमाण के रूप में

1483
01:44:39,920 --> 01:44:44,080
स्वीकार कर रहे हैं तो करिए तो पूरा करिए। नहीं कर रहे हैं तो बिल्कुल

1484
01:44:44,080 --> 01:44:48,800
मत करिए। तो अगर नहीं करने वाले हैं तो भी संतुष्ट किया जाएगा।

1485
01:44:48,800 --> 01:44:52,880
मगर यदि करने वाले हैं तो अर्ध कुकुट न्याय नहीं हो सकता

1486
01:44:52,880 --> 01:44:57,120
कि आप थोड़ी सी चीज माने और थोड़ी चीज ना माने। ये नहीं कहा जा रहा है कि अंधाई

1487
01:44:57,120 --> 01:45:01,200
बने। और एक बात और है कि

1488
01:45:01,200 --> 01:45:05,360
जैसे ये जो ये वाली बात है ना कि राम भी हम ही हैं

1489
01:45:05,360 --> 01:45:09,760
तो शास्त्र का शास्त्र से बाहर निकलना पड़ेगा। तो बात यह है कि

1490
01:45:09,760 --> 01:45:14,080
राम भी हम ही है। इस स्टेज तक पहुंचने के लिए ही शास्त्र है।

1491
01:45:14,080 --> 01:45:18,160
इस स्टेज तक पहुंच जाएंगे तब शास्त्र की आवश्यकता ही नहीं है। तब तो मुक्ति हो

1492
01:45:18,160 --> 01:45:22,320
गई। तो धर्म की आवश्यकता काहे के लिए है? ब्रह्म को साधने के लिए। ब्रह्म

1493
01:45:22,320 --> 01:45:25,040
तक पहुंचने के लिए मुक्ति के लिए। ठीक

1494
01:45:25,040 --> 01:45:29,360
है। शिवश जी वही है ना मुक्त होने के बाद भी तो बस हमें

1495
01:45:29,360 --> 01:45:33,440
रियलाइजेशन हो जाता है ना कि हम जीव नहीं है। जीव को पता चल जाता है। सॉरी

1496
01:45:33,440 --> 01:45:37,520
जीव को पता चल जाता है कि जो मैं बने बैठा हूं वो मैं नहीं हूं। मेरा

1497
01:45:37,520 --> 01:45:41,680
कोई अस्तित्व नहीं है। है ना? ठीक है। लेकिन उसके बाद भी

1498
01:45:41,680 --> 01:45:45,840
हमारा शरीर कार्य सब कुछ चलता रहेगा। लेकिन बस उस इंसान

1499
01:45:45,840 --> 01:45:50,000
को रियलाइजेशन हो चुका है कि दूध का दूध पानी का पानी उसके लिए हो चुका

1500
01:45:50,000 --> 01:45:54,000
है। है ना? लेकिन व्यवहार तो चलता रहेगा क्योंकि बहुत सारे

1501
01:45:54,000 --> 01:45:58,080
बुक्स में मतलब आध्यात्मिक बुक में भी आया है कि उस जो मुक्त पुरुष

1502
01:45:58,080 --> 01:46:02,160
है उस पे कुछ भी लागू नहीं होता है। वो कुछ भी कर सकता है। है

1503
01:46:02,160 --> 01:46:07,840
ना? हम लोग इसको इसको किसी दिन ले लेंगे। पाप वाली बात पे और कुछ

1504
01:46:07,840 --> 01:46:12,000
भैया मेरा एक प्रश्न है अभी जो आशुतोष जी ने और आपने अभी

1505
01:46:12,000 --> 01:46:16,400
जो कहा उसका सार सब यही निकला बाद में कि शास्त्र

1506
01:46:16,400 --> 01:46:20,480
ही प्रमाण है। अंत में शास्त्र को ही मानना चाहिए और गीता 16 24 में

1507
01:46:20,480 --> 01:46:24,640
भी ऐसा ही लिखा है। तो शास्त्र में तो ये भी लिखा है कि ईश्वर

1508
01:46:24,640 --> 01:46:28,720
अकर्ता है। वो कर्म नहीं करता। उसके उसके ऊपर कर्म या

1509
01:46:28,720 --> 01:46:32,720
कर्म का फल का बंधन उसको नहीं लगता है। तो कर्म का फल तो या

1510
01:46:32,720 --> 01:46:36,880
तो पाप होगा या पुण्य होगा। तो कर्म ही नहीं लगता करता है तो फल

1511
01:46:36,880 --> 01:46:40,160
कैसे लग जाएगा उसको ना पाप लगेगा ना पुण्य लगेगा तो यह

1512
01:46:40,160 --> 01:46:44,160
प्रश्न फिर क्यों आता है कि ईश्वर यह पाप कर सकता है या ये पुण्य कर

1513
01:46:44,160 --> 01:46:48,320
सकता है ये प्रश्न ही क्यों आते हैं मैं बता रहा हूं प्रमाण

1514
01:46:48,320 --> 01:46:52,400
है इसको मैं इसको पूरा कर दू नयन जी आपको बोलना

1515
01:46:52,400 --> 01:46:56,800
है कुछ भैया मैं अभी मेरा

1516
01:46:56,800 --> 01:47:00,800
दो प्रश्न था तो अभी ज्यादा समय नहीं है आपको दो बता

1517
01:47:00,800 --> 01:47:04,960
आइए पाप वाली बात को आज पूरा कर लेते हैं फिर अगली बार का रखते हैं ना 10

1518
01:47:04,960 --> 01:47:10,160
बार एक बार में एक मेरा निजी प्रश्न है। मैं आपसे पूछ सकता हूं मुझसे

1519
01:47:10,160 --> 01:47:14,160
हां पूछिए कि राम जी को लेकर जो था तो आपने कहा था

1520
01:47:14,160 --> 01:47:18,400
कि क्योंकि शास्त्र में नहीं आया तो वो कभी पाप नहीं किए ऐसा ही मानना पड़ेगा।

1521
01:47:18,400 --> 01:47:22,400
तो क्या ऐसा भी मान ले कि जो वो निश्वास में जो कीड़े मकोड़े

1522
01:47:22,400 --> 01:47:27,840
मरते हैं या फिर बैठने चलने से तो उसको भी मान ले कि उससे भी कोई पाप नहीं हुआ था।

1523
01:47:27,840 --> 01:47:31,840
वो शास्त्र की सीमा के अंदर है ना। हम लोग संध्या वंदन क्यों करते हैं पता है

1524
01:47:31,840 --> 01:47:35,840
आपको? हां जी वो बड़ी वैश्वदेव वाला

1525
01:47:35,840 --> 01:47:39,920
संध्या वंदन करते ही इसलिए है कि जो अभी पिछले तीन चार घंटे में हमने जो पाप

1526
01:47:39,920 --> 01:47:45,440
किए हो वो नष्ट होते हैं संध्या वंदन से तो शास्त्र की सीमा के अंदर में

1527
01:47:45,440 --> 01:47:49,600
जो इस तरह के पाप होते हैं कि रसोई घर में खाना बनाते समय कुछ ना कुछ कीटाणु

1528
01:47:49,600 --> 01:47:55,360
मरते होंगे तो वो शास्त्र की सीमा के अंदर है।

1529
01:47:55,360 --> 01:47:55,860
शास्त्र

1530
01:47:55,760 --> 01:48:00,000
का उल्लंघन नहीं है वहां। ठीक है। ठीक है। धन्यवाद।

1531
01:48:00,000 --> 01:48:04,080
अच्छा अच्छा मैं एक और अच्छा ठीक है। आप पाप का निराकरण कर लीजिए। उसके बाद बस

1532
01:48:04,080 --> 01:48:08,160
एक बात कह कर मैं अभी मतलब पाप की बात ऐसी है। सबसे

1533
01:48:08,160 --> 01:48:12,160
पहली बात तो एक गुण बात है जिस पर किसी ने बात ही नहीं

1534
01:48:12,160 --> 01:48:17,760
की। कि जब हम यह कहते हैं

1535
01:48:17,760 --> 01:48:20,240
कि

1536
01:48:20,240 --> 01:48:24,240
ईश्वर सब कुछ कर सकता है तो क्या वह पाप कर सकता है या कोई बुराई कर सकता

1537
01:48:24,240 --> 01:48:28,160
है। ठीक है?

1538
01:48:28,160 --> 01:48:32,240
तो वहां पर एक सबसे पहली बात आती है कि क्या

1539
01:48:32,240 --> 01:48:37,920
तुम ईश्वर को मानने वाले हो कि नहीं कि इस दुनिया में कोई ईश्वर है।

1540
01:48:37,920 --> 01:48:42,080
सबसे पहली बात क्या आएगी कि ईश्वर को मानने वाले हो कि नहीं

1541
01:48:42,080 --> 01:48:46,160
आप? है ना? क्योंकि यह जो लड़ाई है कि ईश्वर

1542
01:48:46,160 --> 01:48:51,120
सब कुछ कर सकता है। यह ईश्वर की सिद्धि के लिए है।

1543
01:48:51,120 --> 01:48:55,200
ईश्वर है यह सिद्ध करो। अब वो कैसे है?

1544
01:48:55,200 --> 01:48:59,520
कि हम कहते हैं इस दुनिया में कोई सर्वशक्तिमान

1545
01:48:59,520 --> 01:49:04,240
सत्ता है तो नास्तिक क्या कहता है वो यह कर सकता है वो वो कर सकता है

1546
01:49:04,240 --> 01:49:08,400
तो यदि आप पहले ही ईश्वर को मानने वाले हैं तो आपका

1547
01:49:08,400 --> 01:49:12,560
ये प्रश्न उचित ही नहीं ठहरता कि क्या ये कर सकता है कि नहीं कर सकता

1548
01:49:12,560 --> 01:49:16,720
है तो ईश्वर को ना मानने वाले होने के दृष्टिकोण से ये पूछा

1549
01:49:16,720 --> 01:49:20,880
जाता है कि क्या ईश्वर कर सकता है कि नहीं कर सकता है

1550
01:49:20,880 --> 01:49:24,960
ये वाले जो प्रश्न आते हैं। ठीक है? अब क्या होता है कि

1551
01:49:24,960 --> 01:49:29,040
इसमें जैसे आर्य समाजी जो ईश्वर है, आर्य समाज के अनुसार

1552
01:49:29,040 --> 01:49:33,280
जो ईश्वर होता है, वह क्या करते हैं कि ईश्वर क्योंकि

1553
01:49:33,280 --> 01:49:37,840
ईश्वर ने सृष्टि बनाई है तो उसके हम लोग कई बार बात कर चुके हैं। फिर कभी बात करेंगे इसलिए

1554
01:49:37,840 --> 01:49:41,840
ईश्वर है परंतु यह नहीं कि वह सब कुछ कर सकता है। अच्छा वहां पर एक बात

1555
01:49:41,840 --> 01:49:43,280
आती है कि वो सर्वव्यापक

1556
01:49:43,280 --> 01:49:47,280
है। तो ऐसा ऐसी कोई जगह नहीं है जहां वो ना हो। तो

1557
01:49:47,280 --> 01:49:51,360
यहां पे सर्व का अर्थ क्या लिया? आर्य समाजियों ने

1558
01:49:51,360 --> 01:49:55,360
जहां जिससे शेष कुछ ना बचे क्या वह वो सर्वज्ञ

1559
01:49:55,360 --> 01:49:59,360
है जिसके जिसकी जानकारी से कुछ भी बाहर ना हो। परंतु जब

1560
01:49:59,360 --> 01:50:04,240
सर्वशक्तिमान की बात आती है तो हां कुछ कार्य ऐसे हैं जो ईश्वर नहीं कर सकता। ठीक है?

1561
01:50:04,240 --> 01:50:10,160
तो अब यहां पर यह आ जाता है कि जब वो ईश्वर को मानने वाले हैं

1562
01:50:10,160 --> 01:50:14,560
तो जब यह बात वो कह रहे हैं कि क्या वो पाप कर सकता है?

1563
01:50:14,560 --> 01:50:18,560
तो ऐसा कई बार हो सकता है जब भगवान हमको ऐसे

1564
01:50:18,560 --> 01:50:22,640
कार्य करते हुए दिख जाए जो प्रथम दृष्ट्या में

1565
01:50:22,640 --> 01:50:27,040
हमको जो है पाप जैसे फील हो दिखाई दे

1566
01:50:27,040 --> 01:50:31,120
जैसे कि मान लीजिए इसको छोड़ दीजिए कि वो किसी साकार स्वरूप में

1567
01:50:31,120 --> 01:50:36,160
आकर के जो है वो किसी का वध करेंगे निर्दोष का इसको छोड़ दीजिए

1568
01:50:36,160 --> 01:50:40,160
अभी आर्य समाज का ईश्वर ही ले लेते हैं उनके हिसाब से

1569
01:50:40,160 --> 01:50:44,160
ईश्वर पाप नहीं कर सकता इसीलिए वह प्रश्न कर रहे हैं ना कि वो पाप नहीं

1570
01:50:44,160 --> 01:50:49,120
कर सकता। उनके हिसाब से उनका ईश्वर जो है बुराई नहीं कर सकता।

1571
01:50:49,120 --> 01:50:53,120
अच्छा जो भी दुनिया में कुछ हो

1572
01:50:53,120 --> 01:50:57,600
रहा है जिसको भी कर्मों का फल दे रहा है तो वह ईश्वर ही दे रहा है। ठीक है?

1573
01:50:57,600 --> 01:50:58,400
तो अगर

1574
01:50:58,400 --> 01:51:02,480
कोई नवजात शिशु ने अभी-अभी जन्म लिया है और

1575
01:51:02,480 --> 01:51:06,480
उसको किसी प्राकृतिक आपदा के द्वारा या

1576
01:51:06,480 --> 01:51:10,720
फिर किसी मनुष्य के द्वारा मार दिया गया तो ईश्वर की सत्ता

1577
01:51:10,720 --> 01:51:15,120
में हुआ ना यह कार्य। तो यह मानना पड़ेगा ना कि ईश्वर ने पाप कर दिया नवजात

1578
01:51:15,120 --> 01:51:19,200
शिशु को मार के तो वहां पर यह मानना पड़ेगा उनको

1579
01:51:19,200 --> 01:51:23,200
भी कि हां उसको उसका कर्म फल मिला तो प्रथम दृष्ट्या में

1580
01:51:23,200 --> 01:51:27,280
क्या दिखा कि हां ईश्वर ने ऐसा कर दिया ये अभी उनके ईश्वर

1581
01:51:27,280 --> 01:51:31,600
की बात हो रही है। प्रथम दृष्ट्या में क्या हुआ कि उनको

1582
01:51:31,600 --> 01:51:35,680
हमें ऐसा दिखा कि अरे क्या अनहोनी हो गई। नवजात

1583
01:51:35,680 --> 01:51:39,920
शिशु को अभी मृत्यु को प्राप्त नहीं होना चाहिए था। मगर जब उसके

1584
01:51:39,920 --> 01:51:44,080
उसमें गढ़ अर्थ में गए जब हमने जानकारी की तो हां

1585
01:51:44,080 --> 01:51:48,080
भाई कोई ऐसी आत्मा थी जिसको विधि के विधान के अनुसार जिसने

1586
01:51:48,080 --> 01:51:52,320
कुछ ऐसे पाप कर्म किए थे जिसको इस शरीर में डाला गया और

1587
01:51:52,320 --> 01:51:56,320
जो है जिससे कि उसको कम समय में ही अल्प आयु में ही उसकी मृत्यु हो

1588
01:51:56,320 --> 01:52:00,480
गई। ठीक है? तो तब हमें पता चला कि ईश्वर

1589
01:52:00,480 --> 01:52:04,720
ने ईश्वर पाप करने वाला दिखाई देते हुए भी

1590
01:52:04,720 --> 01:52:08,880
पाप करने वाला नहीं है। अब बात यह आती है कि जब वह पाप करने वाला नहीं

1591
01:52:08,880 --> 01:52:13,680
है तो फिर पाप करने वाला दिखाई देते हुए भी जब आप नास्तिक हो

1592
01:52:13,680 --> 01:52:17,680
तो हमें आपको यह बताना होगा कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है

1593
01:52:17,680 --> 01:52:21,680
और सर्वशक्तिमान को सिद्ध करने के लिए शास्त्रों को आपके ऊपर लागू करने

1594
01:52:21,680 --> 01:52:25,760
के लिए ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता को अनुमान प्रमाण से प्रातिभाषिक

1595
01:52:25,760 --> 01:52:29,840
प्रमाण से हमें सिद्ध करना होगा। और उसके बाद जब आप

1596
01:52:29,840 --> 01:52:33,840
यह वाली बात को स्वीकार कर लेंगे कि हां ईश्वर है शास्त्र को मैं मानता

1597
01:52:33,840 --> 01:52:38,000
हूं तब ईश्वर और शास्त्र को मानने वाला होने के रूप में

1598
01:52:38,000 --> 01:52:42,000
आपको यह मानना पड़ेगा कि यहां यहां ये जो लिखा है इस जन्म में जो ये हुआ

1599
01:52:42,000 --> 01:52:46,880
पुनर्जन्म का यह फल है वो फल है ये सारी चीजें माननी पड़ेंगी।

1600
01:52:46,880 --> 01:52:50,960
अच्छा अब इसमें पाप वाले विषय में एक बात और

1601
01:52:50,960 --> 01:52:55,120
आती है कि क्या कहते हैं? बहुत

1602
01:52:55,120 --> 01:52:59,760
सारी एक तो बातें हो गई ना तो मैं कुछ मिस मैंने प्रश्न लिखा हां

1603
01:52:59,760 --> 01:53:01,920
बताइए

1604
01:53:01,920 --> 01:53:05,920
भैया अगर किसी पुत्र को यह पता हो कि उसका पिता पाप कर रहा है फिर भी वो

1605
01:53:05,920 --> 01:53:10,000
अपने पिता को समझा रहा है वो समझ नहीं रहे हैं तो उसको पुत्र धर्म का

1606
01:53:10,000 --> 01:53:14,080
पालन करते हुए पिता का साथ देना चाहिए उस बारे में या फिर उनको त्याग देना

1607
01:53:14,080 --> 01:53:18,240
चाहिए अपने पिता को प्रह्लाद अच्छे थे या मेघनाथ

1608
01:53:18,240 --> 01:53:22,480
अच्छा था पुत्र धर्म तो दोनों

1609
01:53:22,480 --> 01:53:28,320
पुत्र धर्म में अच्छे थे मतलब मतलब प्रह्लाद सही थे। प्रह्लाद

1610
01:53:28,320 --> 01:53:28,880
है या

1611
01:53:28,880 --> 01:53:33,200
मेघनाथ कौन प्रह्लाद तो

1612
01:53:33,200 --> 01:53:37,440
बस आपको आंसर आपका मिल गया। परंतु भैया इसमें

1613
01:53:37,440 --> 01:53:41,440
पुत्र का क्या गलती है वहां पे? क्योंकि मेघनाथ वहां पर बोल रहा है कि आप गलत कर

1614
01:53:41,440 --> 01:53:45,760
रहे हो। फिर भी उसने पुत्र धर्म का चयन किया। गलती है कि उसने समष्टि

1615
01:53:45,760 --> 01:53:49,840
के धर्म पर अपने व्यष्टि के धर्म को हावी होने दिया। अच्छा

1616
01:53:49,840 --> 01:53:54,320
हां ठीक है भैया समझ गए। समझ गए?

1617
01:53:54,320 --> 01:53:58,560
जी भैया भैया पाप कर्म का निराकरण हो गया। पाप कर्म

1618
01:53:58,560 --> 01:54:02,800
का निराकरण नहीं हुआ क्योंकि बात बहुत घूम गई ना तो मैं भी कुछ

1619
01:54:02,800 --> 01:54:06,480
स्मृति भ्रम हो गया मुझे भी।

1620
01:54:06,480 --> 01:54:10,560
तो मैं एक बात रखूं अपना कोई एक प्रश्न ये भी कर सकता

1621
01:54:10,560 --> 01:54:15,360
है कि क्या भगवान ऐसा रूप धारण कर सकते हैं जो

1622
01:54:15,360 --> 01:54:19,440
नियम के नीचे आके दिखा सके? तो उनके लिए हमको

1623
01:54:19,440 --> 01:54:23,840
राम जी का उदाहरण लेना पड़ेगा। हम अच्छा एक बात मैं कहूं

1624
01:54:23,840 --> 01:54:28,560
सुभाष भैया ने अभी कहा कि वह नैन छिनती शस्त्राण वाला

1625
01:54:28,560 --> 01:54:32,720
आत्मा को कोई काट नहीं सकता शस्त्रों से जल से भिगो नहीं सकता हवा से सुखा

1626
01:54:32,720 --> 01:54:37,360
नहीं सकता तो क्या ईश्वर आत्मा को मार सकते हैं ईश्वर

1627
01:54:37,360 --> 01:54:41,440
को हां ये वाला प्रश्न बाकी रह गया था अच्छा हुआ पाप और पुण्य के

1628
01:54:41,440 --> 01:54:44,080
बीच में ईश्वर आत्मा को मार सकते

1629
01:54:44,080 --> 01:54:48,560
हैं वाली बात आत्मा है ये आपने मान लिया है क्या?

1630
01:54:48,560 --> 01:54:53,200
आत्मा तो परमार्थिक विषय है ना व्यवहार का विषय है ही नहीं नहीं अभी ईश्वर

1631
01:54:53,200 --> 01:54:57,520
ईश्वर का अस्तित्व है आत्मा का अस्तित्व है आपने मान लिया है क्या

1632
01:54:57,520 --> 01:55:01,600
क्योंकि ये लड़ाई तो ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए है ना आपने

1633
01:55:01,600 --> 01:55:06,640
माना कैसे ईश्वर है

1634
01:55:06,640 --> 01:55:10,640
माना कैसे मानने की यात्रा में ये लड़ाई है जब मान लिया तो फिर

1635
01:55:10,640 --> 01:55:15,440
आप क्वेश्चन क्यों उठा रहे हो नहीं समझे

1636
01:55:15,440 --> 01:55:19,440
जैसे कि एक सोतासु से जागा हुआ व्यक्ति यह नहीं कह

1637
01:55:19,440 --> 01:55:23,520
सकता कि वो किसी की आवाज देने के कारण जाग गया। क्यों? क्योंकि

1638
01:55:23,520 --> 01:55:27,600
यदि वो सुन रहा था तो उसका सोना सिद्ध नहीं होता और सो रहा है तो उसका सुनना सिद्ध

1639
01:55:27,600 --> 01:55:31,760
नहीं होता। उसी तरीके से एक ईश्वर को ना मानने वाला

1640
01:55:31,760 --> 01:55:35,840
व्यक्ति ये नहीं कह सकता कि ईश्वर आत्मा को कैसे मार रहा है। क्योंकि अगर वो ईश्वर

1641
01:55:35,840 --> 01:55:39,840
को आत्मा को मारने वाला मारने आत्मा के होने की बात को स्वीकार कर

1642
01:55:39,840 --> 01:55:43,840
रहा है। ईश्वर के होने की बात को स्वीकार कर रहा है तो ईश्वर को ना मानने

1643
01:55:43,840 --> 01:55:47,920
वाला नहीं हो सकता। और ईश्वर को ना मानने वाला है तो ईश्वर के द्वारा कोई क्रिया

1644
01:55:47,920 --> 01:55:52,640
या आत्मा के स्वरूप को स्वीकार करने की बात नहीं कर सकता।

1645
01:55:52,640 --> 01:55:56,720
तो पारमार्थिक सवाल से आप ईश्वर के व्यवहारिक का खंडन नहीं कर

1646
01:55:56,720 --> 01:55:59,280
सकते। यह कह रहा हूं मैं।

1647
01:55:59,280 --> 01:56:03,280
परमार्थ में पहुंचे कैसे आप जैसे वो रैशनलिस्ट आर्य

1648
01:56:03,280 --> 01:56:07,520
भी है। एक दिन वो आकर के वो अपना झूठ बोलबाल के बोला कि

1649
01:56:07,520 --> 01:56:11,760
क्या ईश्वर अपने परमार्थ वाले पता नहीं कुछ ऐसा ही सवाल किया था जिसमें परमार्थ की दृष्टि

1650
01:56:11,760 --> 01:56:16,000
की बात थी। तो परमार्थ की दृष्टि आपको प्राप्त कहां से हुई

1651
01:56:16,000 --> 01:56:20,560
है? ईश्वर ईश्वर से होकर गुजरे बिना

1652
01:56:20,560 --> 01:56:24,880
आप परमार्थ की बात कैसे कर रहे हैं? आत्मा से होकर गुजरे बिना आप परमार्थ

1653
01:56:24,880 --> 01:56:28,960
की बात कर कैसे रहे हैं? यानी कि आपने ईश्वर को ईश्वर माना हुआ है। तो अब बात ये

1654
01:56:28,960 --> 01:56:32,960
आएगी जैसे एक दिन संदीपन रॉय बोला था या पता नहीं

1655
01:56:32,960 --> 01:56:37,360
कौन बोला था कि क्या द्वैत को मानने वाले ईश्वर नहीं होते हैं?

1656
01:56:37,360 --> 01:56:41,600
या क्या हां उस तरीके से आप जाओगे

1657
01:56:41,600 --> 01:56:46,000
अगर अद्वैत का खंडन करते हुए तो ईश्वर सिद्ध ही नहीं होगा तो आपकी परमार्थ

1658
01:56:46,000 --> 01:56:50,240
की दृष्टि आपको प्राप्त होना वही सिद्ध नहीं होगा। आपको

1659
01:56:50,240 --> 01:56:54,240
परमार्थ की दृष्टि मिल ही ईश्वर से रही है ना तो ईश्वर को

1660
01:56:54,240 --> 01:56:58,320
पहले मानना पड़ेगा आपको और जब मान लिया तो खंडन नहीं कर

1661
01:56:58,320 --> 01:57:02,560
पाओगे परमार्थ की दृष्टि से क्या ईश्वर आत्मा को मार सकता है नहीं मार सकता

1662
01:57:02,560 --> 01:57:06,560
कहां नहीं मार सकता परमार्थ में आपको पता कैसे चलेगा कि परमार्थ

1663
01:57:06,560 --> 01:57:10,960
में क्या हुआ आत्मा का क्या नहीं हुआ आपको विश्वास करना पड़ेगा ना किसी की वाणी पे किसकी

1664
01:57:10,960 --> 01:57:14,480
वाणी पे ईश्वर की वाणी पे तो ईश्वर की वाणी

1665
01:57:14,480 --> 01:57:18,480
पे जब आपको विश्वास है तो फिर क्यों मना कर रहे हो ईश्वर है नहीं और दूसरे

1666
01:57:18,480 --> 01:57:22,640
जो ईश्वर है वो ईश्वर सिद्ध नहीं हो सकते तो उनके द्वारा आपको आपके

1667
01:57:22,640 --> 01:57:26,640
द्वारा परमार्थ को जानना पारमार्थिक विषयों पर चर्चा करना

1668
01:57:26,640 --> 01:57:31,040
वो सिद्ध नहीं होता सिद्ध उन विषयों को जानने

1669
01:57:31,040 --> 01:57:36,320
के लिए उन विषयों पर चर्चा करने के लिए पहले आपको

1670
01:57:36,320 --> 01:57:40,560
ईश्वर को मानने वाला होना सिद्ध करना पड़ेगा और ईश्वर को मानने वाला

1671
01:57:40,560 --> 01:57:44,720
सिद्ध होने के लिए आपको पहले व्यवहारिक दुनिया में ईश्वर के द्वारा

1672
01:57:44,720 --> 01:57:49,280
समस्त कर्मों को करने की शक्ति रखने वाला ईश्वर को सिद्ध करना पड़ेगा

1673
01:57:49,280 --> 01:57:53,440
कहना पड़ेगा। यह यह था। यह प्रश्न था जो मैं

1674
01:57:53,440 --> 01:57:58,000
छूट रहा था मेरे से। भैया मरना तो सिर्फ व्यवहार की बात है।

1675
01:57:58,000 --> 01:58:02,320
तो परमार्थ में तो यह सवाल हो ही नहीं सकता प्रश्न। वही वही मैं कह रहा हूं। पारमार्थिक

1676
01:58:02,320 --> 01:58:06,400
आप पहुंच गए आप। इसका मतलब ईश्वर को मानते हैं। पहुंचे कैसे? आर्य समाज

1677
01:58:06,400 --> 01:58:11,840
के ईश्वर से कैसे पहुंच सकते हैं? वो ईश्वर सिद्धि नहीं होगा। हम काट देंगे उसको।

1678
01:58:11,840 --> 01:58:16,000
अद्वैत का अद्वैत के ईश्वर का खंडन करने

1679
01:58:16,000 --> 01:58:20,800
वाला कोई भी फिलोसफी आपको परमार्थ तक नहीं पहुंच पाया पहुंचा पाएगी।

1680
01:58:20,800 --> 01:58:24,880
हम उसको ईश्वर को ईश्वर मानते हुए भी उनको नीचा दिखाया

1681
01:58:24,880 --> 01:58:29,040
जा रहा है। ऐसे में हां स्वीकार कर लिया कि

1682
01:58:29,040 --> 01:58:29,540
ईश्वर है

1683
01:58:29,520 --> 01:58:33,760
उसके बाद तुम जाकर के कह रहे हो अच्छा ईश्वर परमार्थ की दृष्टि वाले सवाल कर रहे हो।

1684
01:58:33,760 --> 01:58:37,760
पहुंचे कैसे? आर समाजी ईश्वर को आर्य समाजी ईश्वर के आलंबन के

1685
01:58:37,760 --> 01:58:41,840
बिना आर्य समाजी ईश्वर के आलंबन से आप परमार्थ तक पहुंच ही

1686
01:58:41,840 --> 01:58:44,520
नहीं सकते ना

1687
01:58:44,520 --> 01:58:48,720
[हंसी] जैसे श्री राम को पापी बता दिया एक और बात

1688
01:58:48,720 --> 01:58:53,040
और मैं वो वाली बात बता दूं कि जो समस्त कर्मों को करते हुए भी अकर्ता

1689
01:58:53,040 --> 01:58:57,280
जान क्यों जान क्योंकि कर्मों के फल में भगवान की आसक्ति

1690
01:58:57,280 --> 01:59:02,320
नहीं होती है इट्स ऑल अबाउट आवर कॉन्शियसनेस अगर और गढ़ में जाएंगे

1691
01:59:02,320 --> 01:59:06,800
हम जो भी कर रहे हैं उसका पाप हमें क्यों लग रहा है? क्योंकि हमारी कॉन्शियसनेस

1692
01:59:06,800 --> 01:59:11,040
हमारे कुछ भी करने से प्रभावित हो रही है। यह छुपा

1693
01:59:11,040 --> 01:59:15,440
हुआ छुपे हुए कार्यों के पर मैंने कई बार बात की है ना। तो जब छिपाने

1694
01:59:15,440 --> 01:59:20,000
का भाव उत्पन्न करने वाले हम कार्य करते हैं तो हमारी कॉन्शियसनेस

1695
01:59:20,000 --> 01:59:24,000
वीक होती है और जब बताने का भाव उत्पन्न करने वाले कार्य हम करते

1696
01:59:24,000 --> 01:59:28,000
हैं तो हमारी कॉन्शसनेस स्ट्रांग होती है। तो जिन

1697
01:59:28,000 --> 01:59:32,160
कामों को करते समय हम लोग छिपाने का भाव आ रहा है कि मैं चोरी कर रहा हूं, व्यभचार

1698
01:59:32,160 --> 01:59:36,160
कर रहा हूं। ये सब पाप कहे गए ना तो इनमें छिपाने का भाव आ रहा है तो

1699
01:59:36,160 --> 01:59:40,240
इसलिए कॉन्शियसनेस हमारी वीक होती है तो

1700
01:59:40,240 --> 01:59:44,240
कॉन्शियसनेस वीक होने के कारण हम और फंसते हैं द्वैत में भेद

1701
01:59:44,240 --> 01:59:45,040
में

1702
01:59:45,040 --> 01:59:50,240
और फंसते हैं प्रपंच रूपी संसार में है ना तो फिर

1703
01:59:50,240 --> 01:59:54,240
क्या कहते हैं ये जो भगवान है उनकी

1704
01:59:54,240 --> 01:59:58,400
कॉन्शियसनेस सबसे ज्यादा होती है। भगवान का अवतार

1705
01:59:58,400 --> 02:00:02,400
उसी को कहा गया है कि जो सुप्रीम कॉन्शियसनेस है जो फ्री है सब

1706
02:00:02,400 --> 02:00:06,400
कुछ जानने वाली है वो जब इस प्रपंच रूपी संसार में

1707
02:00:06,400 --> 02:00:10,720
हमारे समक्ष प्रकट होती है हमें मुक्त कराने

1708
02:00:10,720 --> 02:00:15,040
के निमित्त है ना तो उनकी कॉन्शियसनेस

1709
02:00:15,040 --> 02:00:19,120
के अनुसार जो होता है उनकी कॉन्शियसनेस इतनी स्ट्रांग होती है कि उनको

1710
02:00:19,120 --> 02:00:23,280
मालूम होता है कि कहीं कुछ हो ही नहीं रहा है मैं ही तो हूं उनको यह

1711
02:00:23,280 --> 02:00:27,280
मालूम होने के कारण उनको किसी भी कर्म को करते हुए उसके फलन

1712
02:00:27,280 --> 02:00:31,360
में कोई आसक्ति नहीं होती है। वो बस यह उनके द्वारा यह

1713
02:00:31,360 --> 02:00:35,360
सृष्टि का निर्माण होना यह होना वो होना यह केवल उनकी

1714
02:00:35,360 --> 02:00:39,600
शक्ति का वो है परिणाम कि वो शक्तिमान है

1715
02:00:39,600 --> 02:00:43,920
इसलिए ये हो रहा है। जैसे आंख है तो वो देख रही है। उसमें उनका कोई हेतु

1716
02:00:43,920 --> 02:00:47,920
नहीं है। शत्रुपनिषद ठीक है। तो कर्मों

1717
02:00:47,920 --> 02:00:52,080
के फल में आसक्ति ना होने के कारण समस्त कर्मों को करने वाले

1718
02:00:52,080 --> 02:00:56,560
होते हुए भी हम मनुष्यों के समक्ष वो अकर्ता होते हैं। इसलिए

1719
02:00:56,560 --> 02:01:00,320
उनको पाप पुण्य का वो नहीं लगता है।

1720
02:01:00,320 --> 02:01:05,200
दोष अथवा लाभ ठीक है।

1721
02:01:05,200 --> 02:01:09,360
और भैया वो पत्थर वाला एक प्रश्न था ना जो अब वो अगली बार लेंगे आवाज देखो

1722
02:01:09,360 --> 02:01:13,600
पाक में ही इतना अटके हैं। राम जी भी आए काफी देर तक उन पर भी चर्चा

1723
02:01:13,600 --> 02:01:18,000
चली। अद्वैत अद्वैत पे भी बात हो गई सर जी के साथ।

1724
02:01:18,000 --> 02:01:22,400
मुझे लगता है जी शिव जी एक सवाल है बस कि क्या

1725
02:01:22,400 --> 02:01:26,400
भगवान जगत बनने से रोक सकते हैं? ऐसा सोच

1726
02:01:26,400 --> 02:01:30,160
सकते हैं मतलब कि कैसे

1727
02:01:30,160 --> 02:01:34,240
जगत बनने से बिल्कुल रोक सकते हैं। देखिए मैं ये गुण वाले

1728
02:01:34,240 --> 02:01:38,640
सवाल है। अभी आंसर दे दूंगा तो सोचने के लिए पूछा मैंने।

1729
02:01:38,640 --> 02:01:42,800
हां ये है क्या? नहीं है। अच्छा सवाल सवाल अच्छा

1730
02:01:42,800 --> 02:01:47,040
है। बात ये है कि इसका जवाब अगर मैं आज दे दूंगा तो सारी वो

1731
02:01:47,040 --> 02:01:51,120
खत्म हो जाएंगी। कुछ आर्गुममेंट बाकी नहीं रह जाएगी।

1732
02:01:51,120 --> 02:01:55,200
तो नहीं मुझे मुझे खुद को सोचने के लिए ऐसे बस

1733
02:01:55,200 --> 02:01:59,280
पूछा है कि मतलब कर सकते हैं मैं बताऊंगा कैसे कर सकते हैं

1734
02:01:59,280 --> 02:02:03,360
और अगर वो मैंने अभी बता दिया तो फिर ये अगली बार ये

1735
02:02:03,360 --> 02:02:07,440
जो सेशन होना है वो होगा ही नहीं फिर और जो छोटी छोटी और जो दिक्कतें

1736
02:02:07,440 --> 02:02:11,440
वो सॉल्व नहीं होंगी है ना तो इसलिए क्रम से

1737
02:02:11,440 --> 02:02:15,680
चले नीचे से ऊपर की ओर जाए सीधे ऊपर चले जाएंगे तो हो गया काम

1738
02:02:15,680 --> 02:02:20,000
अभी आपके पास मतलब प्रश्न हुआ है ना अभी पाप वाला

1739
02:02:20,000 --> 02:02:24,000
काफी हद समझ में आ गया ना? जी ठीक

1740
02:02:24,000 --> 02:02:28,720
है। तो आज का सेशन भी अच्छा ही रहा और एक बार

1741
02:02:28,720 --> 02:02:32,720
छोटा सा प्रश्न है हां हां सुन रहा है

1742
02:02:32,720 --> 02:02:36,720
तो सोता सिद्ध नहीं होता है। सो रहा है तो सुनता सुनना उसका सिद्ध नहीं हो

1743
02:02:36,720 --> 02:02:40,720
रहा है। तो इसके पीछे का मतलब रहस्य क्या है? मतलब समझना क्या है? इससे

1744
02:02:40,720 --> 02:02:44,880
थोड़ा सा ये थोड़ा सा बता सरल शब्द में अगर वो ईश्वर को मानने

1745
02:02:44,880 --> 02:02:47,600
वाला है

1746
02:02:47,600 --> 02:02:52,480
तो इस आधार पे के ईश्वर परमार्थ में क्या करते हैं

1747
02:02:52,480 --> 02:02:56,560
इस जैसे परमार्थ में ईश्वर किसी के साथ अन्याय नहीं कर

1748
02:02:56,560 --> 02:03:00,880
सकते व्यवहार में कर सकते हैं। समझ रहे हैं?

1749
02:03:00,880 --> 02:03:04,960
तो यदि उसने मान लिया कि परमार्थ की भी दुनिया है तो इसका मतलब

1750
02:03:04,960 --> 02:03:09,360
उसने पहले माना ना कि ईश्वर है। ईश्वर है। ठीक है?

1751
02:03:09,360 --> 02:03:13,360
तो जब उसने ईश्वर को ईश्वर मान लिया है तो परमार्थ की

1752
02:03:13,360 --> 02:03:17,440
दुनिया पर उसका कुछ ना करने कुछ समथिंग समथिंग वो नहीं कर सकता। इस

1753
02:03:17,440 --> 02:03:22,800
स्थिति के आधार पर उसको ईश्वर को ना मानने वाला वो सिद्ध नहीं होता।

1754
02:03:22,800 --> 02:03:26,960
जी अगर वो परमार्थ अगर वो परमार्थ को जानने वाला

1755
02:03:26,960 --> 02:03:31,040
है यानी कि वो सुन रहा है ठीक है? तो उसका सोना

1756
02:03:31,040 --> 02:03:35,120
सिद्ध नहीं होता। यदि यानी कि वो यदि वह परमार्थ को जानने वाला

1757
02:03:35,120 --> 02:03:39,120
है तो उसका ईश्वर को ना मानने

1758
02:03:39,120 --> 02:03:43,200
वाला सिद्ध नहीं होता। वो नास्तिक सिद्ध नहीं होता। नहीं होता। ठीक है?

1759
02:03:43,200 --> 02:03:47,680
क्योंकि सोना जो है वो व्यवहार का विषय है और वो सो ही नहीं रहा है।

1760
02:03:47,680 --> 02:03:52,080
परमार्थ में नहीं नहीं अगर वो सो रहा है यानी कि वो नास्तिक

1761
02:03:52,080 --> 02:03:56,080
है। ठीक है। वही कह रहा हूं। अब वो बात कह रहा है परमार्थ

1762
02:03:56,080 --> 02:04:00,240
में आत्मा होती है। सिद्ध कैसे हुआ? तुम यह

1763
02:04:00,240 --> 02:04:04,480
वाले प्रश्न करने का वो कैसे कर रहे हो? सिद्ध कैसे हुआ तुमने? वो सिद्ध

1764
02:04:04,480 --> 02:04:08,560
करो ना। पहले आत्मा होती है। सिद्ध करने जाओगे तो तुम्हें मानना पड़ेगा। ईश्वर

1765
02:04:08,560 --> 02:04:12,640
है आत्मा है। मानना पड़ेगा ना। आप यदि ईश्वर को ईश्वर कह रहे हो तो

1766
02:04:12,640 --> 02:04:16,640
सब कुछ सिद्ध हो गया वहीं पे। हां। तो जब तुमने ईश्वर मान लिया है तो

1767
02:04:16,640 --> 02:04:20,640
फिर खंडन मत करो। तो परमार्थ की दुनिया के

1768
02:04:20,640 --> 02:04:24,960
आधार पर यानी सोते सोने वाला होते हुए तुम सुनने

1769
02:04:24,960 --> 02:04:29,120
वाली होने के आधार पर सोने वाला होते हुए सुनने

1770
02:04:29,120 --> 02:04:33,920
वाले होने के आधार पर आप जागने का खंडन नहीं कर सकते

1771
02:04:33,920 --> 02:04:37,840
समझ रहे हो मेरी बात

1772
02:04:37,840 --> 02:04:42,080
और यदि आप क्या कहते हैं जागने

1773
02:04:42,080 --> 02:04:46,800
वो सुनने वाले हैं तो सुनने वाले होते हुए

1774
02:04:46,800 --> 02:04:50,880
सोने के आधार पे आप जागने का खंडन नहीं कर सकते। नहीं

1775
02:04:50,880 --> 02:04:54,480
कर सकते। ठीक है?

1776
02:04:54,480 --> 02:04:59,600
तो इसी प्रकार से ईश्वर को यदि मानने वाले हैं

1777
02:04:59,600 --> 02:05:04,320
तो ईश्वर के पारमार्थिक संसार में होने वाली

1778
02:05:04,320 --> 02:05:08,880
क्रियाओं के आधार पर आप ईश्वर का खंडन नहीं कर सकते।

1779
02:05:08,880 --> 02:05:12,880
उसके लिए पहले आपको ईश्वर को ईश्वर मानना पड़ेगा और अद्वैत के

1780
02:05:12,880 --> 02:05:17,440
विरोध में जितने भी ईश्वर आप लाओगे वह खंडित हो जाएंगे। अद्वैत

1781
02:05:17,440 --> 02:05:21,520
के आधार पर ही आप परमार्थ को जानने वाला होने का दावा कर सकते हो। तब यह कह

1782
02:05:21,520 --> 02:05:25,680
सकते हो क्या वहां आत्मा हो सकती है? और जब आपने ईश्वर को ईश्वर

1783
02:05:25,680 --> 02:05:29,920
मान लिया है तो फिर हमें कुछ भी सिद्ध करने की वहां आवश्यकता नहीं रह जाती

1784
02:05:29,920 --> 02:05:33,920
कि भैया वो वहां आत्मा को मार सकते हैं कि नहीं मार सकते हैं।

1785
02:05:33,920 --> 02:05:37,680
पारमार्थिक सवाल होते हैं ना ये।

1786
02:05:37,680 --> 02:05:41,840
ठीक है। परमार्थ को व्यवहार से कभी मिला नहीं सकते हैं। परमार्थ अलग

1787
02:05:41,840 --> 02:05:46,080
विषय है और व्यवहार अलग विषय है। ईश्वर को सिद्ध

1788
02:05:46,080 --> 02:05:50,160
करने के लिए पारमार्थिक आधार को नहीं ला सकते।

1789
02:05:50,160 --> 02:05:54,320
नहीं ला सकते। ठीक है? पारमार्थिक आधार को लाकर के

1790
02:05:54,320 --> 02:05:58,320
ईश्वर को सिद्ध अथवा असिद्ध करने का प्रयास करना व्यर्थ है। हमें यहीं

1791
02:05:58,320 --> 02:06:01,920
से सिद्ध करना होगा। ठीक है? ये सुनने

1792
02:06:01,920 --> 02:06:05,920
से सोते वाला एक बार और समझ लीजिए आशुतोष जी कि

1793
02:06:05,920 --> 02:06:10,400
जैसे सोता हुआ व्यक्ति यह नहीं कह सकता

1794
02:06:10,400 --> 02:06:14,400
कि मैंने तुझे सुना इसलिए मैं नहीं

1795
02:06:14,400 --> 02:06:19,200
मानता कि मैं जाग रहा हूं। ठीक है? हम

1796
02:06:19,200 --> 02:06:23,760
उसी प्रकार से एक नास्तिक यह नहीं कह सकता

1797
02:06:23,760 --> 02:06:27,920
कि परमार्थ में आत्मा को मारा जा सकता है या परमार्थ में समथिंग

1798
02:06:27,920 --> 02:06:32,160
समथिंग के कारण मैं ईश्वर को नहीं मानता क्योंकि परमार्थ को जानने

1799
02:06:32,160 --> 02:06:36,240
से ही यह सिद्ध हो गया कि आप ईश्वर को मानते हैं। तो माने कैसे? पहले

1800
02:06:36,240 --> 02:06:40,240
यह बताइए। बिना ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता

1801
02:06:40,240 --> 02:06:46,000
के सिद्ध हुए आपने ईश्वर को कैसे मान लिया?

1802
02:06:46,000 --> 02:06:50,160
ठीक है? इसी प्रकार से इसी प्रकार से आपने सुना

1803
02:06:50,160 --> 02:06:54,160
कैसे यह बताइए पहले बिना जागे

1804
02:06:54,160 --> 02:06:58,320
आपने सुन कैसे लिया ये बताइए पहले यहां ये कहने

1805
02:06:58,320 --> 02:07:02,320
का मतलब समझ गए जी जी जी जी जैसे आपने आत्मा के

1806
02:07:02,320 --> 02:07:06,480
विषयक बात की ना जब किसी ने की थी ना आत्मा के विषयक बात

1807
02:07:06,480 --> 02:07:10,480
तो आत्मा है और वहां पर उससे भिन्न ईश्वर भी

1808
02:07:10,480 --> 02:07:14,560
है यह आपने जाना कैसे साइंस ने

1809
02:07:14,560 --> 02:07:18,080
बताया कैसे कैसे जाना कि आत्मा त्मा होती है।

1810
02:07:18,080 --> 02:07:22,160
वहां कैसे पहुंचे उस दुनिया में आप तो आपको मानना पड़ेगा ईश्वर से।

1811
02:07:22,160 --> 02:07:26,240
अच्छा ईश्वर है ईश्वर कैसे माना आपने के आर्य समाज का ईश्वर है।

1812
02:07:26,240 --> 02:07:30,400
आर्य समाज का ईश्वर ईश्वर ही नहीं है। वो तो जन्म नहीं ले सकता। बाधित

1813
02:07:30,400 --> 02:07:34,880
है। सर्वशक्तिमान नहीं है तो ईश्वर कैसे

1814
02:07:34,880 --> 02:07:39,200
के अद्वैत के विरोध में जितने भी ईश्वर है वह सब खंडित हो जाएंगे।

1815
02:07:39,200 --> 02:07:43,280
तो फिर आप कैसे पहुंचे? परमार्थ में तो आपको मानना पड़ेगा

1816
02:07:43,280 --> 02:07:46,640
अद्वैत के ईश्वर को।

1817
02:07:46,640 --> 02:07:50,720
हम तो परमार्थिक बाध्यता के कारण जो हमें शब्दों में

1818
02:07:50,720 --> 02:07:54,960
सुनाई दे रही है भाषिक रूप में सुनाई दे रही है ईश्वर की परमार्थिक

1819
02:07:54,960 --> 02:07:58,960
बाध्यता उसके कारण आप ईश्वर उसका

1820
02:07:58,960 --> 02:08:02,960
ईश्वर का खंडन नहीं कर पाओगे हां व्यवहार

1821
02:08:02,960 --> 02:08:07,040
में ईश्वर मगर इनका ईश्वर क्या है जो अद्वैत के विरोध

1822
02:08:07,040 --> 02:08:11,600
में खड़े किए गए ईश्वर है इनके ईश्वर व्यवहार में ही बाधित है

1823
02:08:11,600 --> 02:08:15,840
समझ रहे हैं वो व्यवहार में कई काम ऐसे कर देते हैं जो

1824
02:08:15,840 --> 02:08:20,000
कई जगह ऐसा कह देते हैं कि वह यह नहीं कर सकते वह नहीं कर सकते। इस कारण

1825
02:08:20,000 --> 02:08:24,080
से एक नास्तिक आराम से उनके ईश्वर का खंडन कर देगा।

1826
02:08:24,080 --> 02:08:28,320
और यहां जो लड़ाई है आर्य समाजियों से या समथिंग समथिंग

1827
02:08:28,320 --> 02:08:32,720
लोगों से नहीं है। लड़ाई मूल रूप से दो ही लोगों में है। नास्तिक

1828
02:08:32,720 --> 02:08:33,680
और आस्तिक

1829
02:08:33,680 --> 02:08:37,760
धर्म और अधर्म। ठीक है? तो नास्तिकों

1830
02:08:37,760 --> 02:08:41,760
को कभी मौका ना मिले। इसलिए जो गलत ईश्वर

1831
02:08:41,760 --> 02:08:45,760
खड़े किए जा रहे हैं संसार में उनका उनको जो है

1832
02:08:45,760 --> 02:08:51,440
शोधन आवश्यक है। इसलिए हम लोग ये बातें करते हैं। ठीक है।

1833
02:08:51,440 --> 02:08:55,520
धर्म की रक्षा के लिए। ठीक है। तो आज आनंद रहा। काफी

1834
02:08:55,520 --> 02:08:59,520
अच्छी चर्चा हुई। शिव जी कुछ एक

1835
02:08:59,520 --> 02:09:03,520
दो प्रश्न थे किसी पाप और पुण्य वाले

1836
02:09:03,520 --> 02:09:07,520
में नहीं नहीं नहीं कुछ अलग विषय में अलग विषय

1837
02:09:07,520 --> 02:09:13,520
फिर अगली बार अब काफी समय हो गया है अब अगली बार बात अरे सुन तो लीजिए

1838
02:09:13,680 --> 02:09:17,840
अब सुन तो लीजिए थोड़ा जी जी जी बताइए मैं

1839
02:09:17,840 --> 02:09:22,000
पूछ रहा था कि मतलब गुरुदेव शंकराचार्य जी अभी होंगे मठ में

1840
02:09:22,000 --> 02:09:28,000
हां मठ में है और कब तक रहेंगे

1841
02:09:28,000 --> 02:09:32,000
पूरा चातुर्मास रहेंगे लगभग लगभग बाकी कुछ डेट आप

1842
02:09:32,000 --> 02:09:36,240
कंफर्म कर लीजिएगा ग्रुप के जो एडमिन है उनसे ठीक है

1843
02:09:36,240 --> 02:09:40,240
अच्छा और दूसरा प्रश्न था कि मतलब इसके बाद

1844
02:09:40,240 --> 02:09:44,320
जब अगली बार जो चर्चा होगा डिबेट होगा तो उसमें विषय क्या रहेगा अब

1845
02:09:44,320 --> 02:09:48,400
विषय यही रहेगा अभी ईश्वर वही है सब कुछ कर सकता है अभी पूरा कहां हुआ अभी इसमें

1846
02:09:48,400 --> 02:09:53,440
डंडा और वो सब बाकी तो रह गया पत्थर

1847
02:09:53,440 --> 02:09:59,440
दो और दो पांच है

1848
02:09:59,760 --> 02:10:03,840
और शिवश ये जो है कि मतलब साकार होना परमार्थ का विषय

1849
02:10:03,840 --> 02:10:09,840
है या फिर व्यवहार का साकार होना व्यवहार

1850
02:10:10,640 --> 02:10:14,880
हां ठीक है भैया जितने भी ऐसे हार्ड क्वेश्चन

1851
02:10:14,880 --> 02:10:19,040
है सबका उत्तर तो एक ही पे आके अटक जाता है कि व्यवहारिक रूप से ऐसा दिखा

1852
02:10:19,040 --> 02:10:23,360
सकते हैं बट परमार्थिक रूप से गलत नहीं कर सकते बिल्कुल बिल्कुल या फिर परमार्थिक

1853
02:10:23,360 --> 02:10:27,520
रूप से ऐसा हो नहीं रहा है क्रिया भैया का उत्तर तो भैया

1854
02:10:27,520 --> 02:10:32,080
एक ही पे अटक जाता है। बिल्कुल इसीलिए तो बहुत गढ़ वाले प्रश्न बाद में करें।

1855
02:10:32,080 --> 02:10:36,080
अब देखिए पाप और पुण्य वाला कितना अच्छा विषय निकला। बहुत कुछ सीखने को

1856
02:10:36,080 --> 02:10:40,160
मिला सभी को। हमें भी काफी कुछ समझ में आया। कैसे बात को रखना है

1857
02:10:40,160 --> 02:10:44,240
क्या करना है। ठीक है? तो आने के लिए सभी का आभार और

1858
02:10:44,240 --> 02:10:48,880
ये फिर तीन संडे तीन रविवार छोड़ के फिर

1859
02:10:48,880 --> 02:10:53,120
अगले मतलब अगले माह के रविवार में ये दोबारा

1860
02:10:53,120 --> 02:10:57,760
से होगा। तब तक आप लोग अपनीप कमर कसे जी भैया

1861
02:10:57,760 --> 02:11:01,840
जी भैया ठीक सभी को जय श्री राम जय श्री

1862
02:11:01,840 --> 02:11:07,440
राम जयघोष कर ले भैया सभी को हां

1863
02:11:07,440 --> 02:11:11,920
जयघोष कर ले भैया धर्म की जय हो

1864
02:11:11,920 --> 02:11:16,560
अधर्म का नाश हो नाश हो प्राणियों में

1865
02:11:16,560 --> 02:11:20,720
सद्भावना विश्व का कल्याण हो गौ

1866
02:11:20,720 --> 02:11:24,960
माता की जय

1867
02:11:24,960 --> 02:11:27,280
बंधु

1868
02:11:27,280 --> 02:11:33,280
अखंड हो अखंड हो हर हिंदू

1869
02:11:35,280 --> 02:11:40,000
हम भारत भव्य बनाएंगे

1870
02:11:40,000 --> 02:11:46,000
बनाएंगे

1871
02:12:00,350 --> 02:12:04,350
[संगीत]
