1
00:00:06,480 --> 00:00:10,640
तो सभी को जय श्री राम। अरुण पांडे नामक एक

2
00:00:10,640 --> 00:00:14,640
व्यक्ति ने एक बहुत मूर्खता पूर्ण प्रलाप किया है इस

3
00:00:14,640 --> 00:00:19,120
विषय में कि भागवतानंद से जो मेरी चर्चा हुई थी उसके स्थल पर जाकर के

4
00:00:19,120 --> 00:00:23,120
उसमें मैं किस-किस प्रकार से गलत था और उसने लगभग दो घंटे का

5
00:00:23,120 --> 00:00:27,520
वीडियो बनाया है तो उसका वीडियो सुन सुन करके

6
00:00:27,520 --> 00:00:32,320
उसका जो पक्ष है वो आपको प्रस्तुत करके मैं

7
00:00:32,320 --> 00:00:36,400
यहां पर उत्तर दूंगा आपको इसमें वह पार्ट जिसमें मैं उसका

8
00:00:36,400 --> 00:00:40,720
वीडियो सुनूंगा वह काट देंगे क्योंकि कि उसने खुद ही प्रलाप

9
00:00:40,720 --> 00:00:44,720
करते हुए दो घंटे तक खींचा है वीडियो को तो हम उतना नहीं खींचेंगे। इसलिए

10
00:00:44,720 --> 00:00:48,720
वो हिस्सा कट कर दिया जाएगा। जिस हिस्से में मैं वीडियो

11
00:00:48,720 --> 00:00:53,600
को सुनूंगा। तो सबसे पहले हम उसका पहला भाग सुन लेते हैं।

12
00:00:53,600 --> 00:00:57,600
तो इसने सबसे पहले कुछ दो-तीन बातें कही है जो

13
00:00:57,600 --> 00:01:01,840
अपने आप में ही उलझी हुई है कि भागवतानंद ने इसको अधिकार दिया बोलने

14
00:01:01,840 --> 00:01:05,920
के लिए। मैं इसको बोलने नहीं दे रहा था। यह ऐसा नहीं

15
00:01:05,920 --> 00:01:10,000
है बोलना नहीं चाह रहा था। परंतु दो लोगों के बीच में बोलना उचित नहीं है।

16
00:01:10,000 --> 00:01:14,320
फिर भी इसने बोला, अरे भाई, पहले तू तय तो कर ले कहना क्या चाहता है। सीधी

17
00:01:14,320 --> 00:01:18,640
सी बात है दो लोगों के बीच में तीसरा तब बोलता है जब जो पहला

18
00:01:18,640 --> 00:01:22,160
वाला है उसके पक्ष का व्यक्ति वो असामर्थ्यवान

19
00:01:22,160 --> 00:01:26,240
है। और दिख रहा है ना वहां बृजेश पांडे को यह जाहिलियत इत्यादि शब्दों का

20
00:01:26,240 --> 00:01:30,240
उपयोग करना और तुम्हें वहां बैठकर के खुजली होना कि कुछ असंतुष्टि रह गई है।

21
00:01:30,240 --> 00:01:34,400
अभी भागवतानंद जी ने वो बात नहीं बोली है जो बोलनी

22
00:01:34,400 --> 00:01:38,480
चाहिए जिससे निरुत्तर हो के जाए। तभी तो तुम्हारे मन में चुल उठी बोलने

23
00:01:38,480 --> 00:01:42,560
की। अब इसका कहना है कि भागवतानंद ने क्या कहते

24
00:01:42,560 --> 00:01:46,720
हैं? यह प्रश्न उठाया कि भाई तुमने शक्ति संगम तंत्र के आधार पर उसको पाखंड

25
00:01:46,720 --> 00:01:50,800
घोषित किया है। ठीक है? इसका कहना है कि भाई जब तुम पहले उसको

26
00:01:50,800 --> 00:01:54,960
पाखंड कह चुके हो। भागवतानंद जब जो है ये कह रहा है तो तुम

27
00:01:54,960 --> 00:01:59,120
उस विषय से भागे क्यों? जो तुम्हारे द्वारा उठाया गया विषय है। पहले

28
00:01:59,120 --> 00:02:03,920
वाला। सबसे पहली बात है कि जिज्ञासा करने कौन गया है?

29
00:02:03,920 --> 00:02:07,920
तो मैं गया हूं जिज्ञासा करने तो वहां पर प्रश्न कौन पूछेगा

30
00:02:07,920 --> 00:02:12,240
कि किस विषय में प्रकाश डालना है? मुझे पूछना है। जिज्ञासा मेरी

31
00:02:12,240 --> 00:02:16,240
है। भागवतानंद ने कोई सॉफ्ट कॉर्नर जिसका उत्तर आसानी

32
00:02:16,240 --> 00:02:20,640
से दिया जा सकता है वो ढूंढते हुए उसको आधार बना करके अपना वर्चस्व

33
00:02:20,640 --> 00:02:24,640
पहले ही स्थापित करने का प्रयास अगर किया। तो हालांकि

34
00:02:24,640 --> 00:02:28,880
उसमें भी मेरे पास उत्तर है पर मैं उन हल्के विषयों पर अपना

35
00:02:28,880 --> 00:02:33,440
समय क्यों व्यर्थ करूं जिन हल्के विषयों से एक निष्कर्ष

36
00:02:33,440 --> 00:02:37,280
प्राप्त होने में बहुत समय लगे। इसलिए मेरा मंतव्य था कि

37
00:02:37,280 --> 00:02:41,760
भैया मैं तो वो मूल जगह चोट करूंगा। मूल जगह और

38
00:02:41,760 --> 00:02:45,840
अगर बात रही कि मैंने पहले कौन सा विषय उठाया है तो इसका मतलब कि

39
00:02:45,840 --> 00:02:50,000
तुम अर्ध ज्ञानी भयंकर वाली स्थिति से गुजर रहे हो।

40
00:02:50,000 --> 00:02:54,000
सबसे पहले हमने निग्रह निकासिका नामक एक पुस्तक भी लिखी है

41
00:02:54,000 --> 00:02:58,080
और निग्रह निकासिका नामक एक सीरीज बनाई है। उस पूरी छह एपिसोड की

42
00:02:58,080 --> 00:03:02,320
सीरीज में उस पूरी 60 से 70 या जो भी जितने भी प्रश्न में वो लिखा

43
00:03:02,320 --> 00:03:06,480
हुआ है। उस पूरे सीरीज में कहीं पर भी हमने

44
00:03:06,480 --> 00:03:10,880
शक्ति संगम तंत्र के आधार पर पाखंड तंत्र घोषित नहीं किया। निग्रह संप्रदाय

45
00:03:10,880 --> 00:03:15,040
को कहीं भी। बाद में जब हमने वो सीरीज जो लिपिबद्ध करके हमने

46
00:03:15,040 --> 00:03:19,360
उसका लेख भी डाला। बाद में किसी चर्चा

47
00:03:19,360 --> 00:03:23,520
के समय हमें वह चीज दिखाई दी जब हम किसी से बात कर रहे थे तब हमने

48
00:03:23,520 --> 00:03:27,520
यह प्रश्न किया था कि भाई यहां से आगे पाखंड तंत्रों की यदि बात

49
00:03:27,520 --> 00:03:31,600
की जा रही है तो इसके आगे आने वाले जो तंत्रों के नाम है आगमों के नाम है

50
00:03:31,600 --> 00:03:35,600
उसको पाखंड क्यों ना माना जाए इस संबंध में यदि कोई पक्ष हो तो प्रस्तुत कर ये भी

51
00:03:35,600 --> 00:03:39,920
कहा था वहां पर हमने अपनी निग्रह निकासी का सीरीज में यह नहीं कहा कि नहीं नहीं इसमें जो

52
00:03:39,920 --> 00:03:44,080
कोई उत्तर हो सकता है क्योंकि उसमें जितने भी पूर्वाग्रह थे पूर्व पक्ष थे

53
00:03:44,080 --> 00:03:48,080
उन सबको लेकर के हमने उसका खंडन किया था तो

54
00:03:48,080 --> 00:03:52,400
सबसे पहली बात तो यह है कि पहला सबसे पहले मैंने कौन से प्रश्न पूछे?

55
00:03:52,400 --> 00:03:56,640
अगर पहले पर जाओगे तो निग्रह निकासिका में पूछे हैं। तो वहां से क्यों नहीं प्रश्न

56
00:03:56,640 --> 00:04:00,720
लिया गया? दूसरी बात यह है कि जिज्ञासु यदि मैं हूं तो मैं वहां पर गया हूं

57
00:04:00,720 --> 00:04:04,720
तो मेरा प्रश्न वहां पर होगा ना कि कौन सा प्रश्न होना चाहिए। अब विषय विषय से

58
00:04:04,720 --> 00:04:08,800
भागना तो तब कहते हैं ना जब मुझसे पूछा ही नहीं गया। मुझे किस संबंध में आंसर

59
00:04:08,800 --> 00:04:12,880
चाहिए। अपने आप मेरा कोई एक वक्तव्य लेकर के जिसके

60
00:04:12,880 --> 00:04:17,040
बारे में मैं कह भी चुका हूं कि भाई वो एक मैंने प्रश्न मात्र पूछा है

61
00:04:17,040 --> 00:04:21,120
और जिसमें कि मैंने यह भी संभावना व्यक्त की थी कि इसमें हो सकता है भाई कि तुम्हारा कोई

62
00:04:21,120 --> 00:04:25,280
पक्ष निकल आए। हालांकि उसमें भी हम रगड़ सकते हैं पर देर

63
00:04:25,280 --> 00:04:29,520
लगेगी। हम देर वाले कार्य क्यों करें? विलंब वाले कार्य क्यों करें? तुम्हारा

64
00:04:29,520 --> 00:04:33,680
तो आदमी तैनात है ना गालीबाजी करने के लिए। अगर हम ज्यादा व्यर्थ

65
00:04:33,680 --> 00:04:37,680
के विषयों में समय अपना खर्च करेंगे तो वो

66
00:04:37,680 --> 00:04:41,760
व्यक्ति आधे से एक घंटे में जो पर बौखला गया था कि भैया

67
00:04:41,760 --> 00:04:45,920
मेरे बाबा जी तो निरुत्तर हो रहे हैं तो गालीबाजी शुरू करनी है

68
00:04:45,920 --> 00:04:50,000
जाहिलियत मूर्खता इत्यादि शुरू करनी है हम तो बौखला करके

69
00:04:50,000 --> 00:04:54,400
वो जब ये करने लगा तो हम अपना समय व्यर्थ क्यों गवाए जब हमारे पास हथौड़े

70
00:04:54,400 --> 00:04:58,640
वाले प्रश्न है अकाट्य प्रश्न है हमारे पास

71
00:04:58,640 --> 00:05:02,720
है ना तो इसलिए पहली बात मैं जिज्ञासु था प्रश्न प्रश्न मुझे करना था।

72
00:05:02,720 --> 00:05:07,360
वो क्यों चुन रहा है कि मेरे बहुत सारे प्रश्नों में से कौन सा प्रश्न लिया जाए। पहली बात।

73
00:05:07,360 --> 00:05:07,860
दूसरी

74
00:05:07,760 --> 00:05:11,760
बात यह है कि अगर उसको कुछ कहना था तो जब हमने कहा था कि कुछ चर्चा आपको करनी है तो

75
00:05:11,760 --> 00:05:15,760
उसने अरुचि दिखाई थी तो फिर वो जो मुझे मैंने जो विषय चुना है मुझे

76
00:05:15,760 --> 00:05:19,840
उस पर प्रश्न करना है। तो वो कौन होता है मेरे प्रश्न को चयन करने वाला? और

77
00:05:19,840 --> 00:05:23,920
यदि पहले और बाद वाली चीजें भी देखनी है तो पहले प्रश्न मैंने निग्रह निकासि

78
00:05:23,920 --> 00:05:28,160
में उठा चुका हूं। बाद में मैंने वो प्रश्न उठाया है पाखंड तंत्र वाला

79
00:05:28,160 --> 00:05:32,240
तब भी तुम तब भी उस अर्थ से भी पहले वाली कि पहले क्या

80
00:05:32,240 --> 00:05:36,400
उठाया गया उस अर्थ से भी ये पाखंड तंत्र वाला प्रश्न उचित सिद्ध

81
00:05:36,400 --> 00:05:41,760
नहीं होता और तुम लगे अपनी मूर्खता करने चलो

82
00:05:41,760 --> 00:05:45,840
पहली बात यह है कि संप्रदाय का निग्रह नहीं है

83
00:05:45,840 --> 00:05:50,240
अगर इस पर हम अगर बात करें तो किस संप्रदाय में क्या मान्यता

84
00:05:50,240 --> 00:05:54,560
है उसका निर्णायक कौन होगा हम जो

85
00:05:54,560 --> 00:05:58,800
उस संप्रदाय की प्रामाणिक गुरु गद्दी होगी, सर्वोच्च गुरु गद्दी

86
00:05:58,800 --> 00:06:03,040
होगी, वह बताएगा कि इस संप्रदाय की यह मान्यता है। प्रामाणिक

87
00:06:03,040 --> 00:06:07,360
रूप से तो वही बताएगा। बाकी कोई कुछ भी कहता रहे। ठीक है?

88
00:06:07,360 --> 00:06:12,640
अब यदि तुम उस प्रामाणिक गुरु गद्दी के वचनों को ध्वस्त कर रहे हो।

89
00:06:12,640 --> 00:06:16,720
या उस प्रामाणिक गुरु गद्दी के वचनों का तुम विरोध कर रहे हो। तो

90
00:06:16,720 --> 00:06:21,040
तुम उस संप्रदाय का ही विरोध कर रहे हो। यदि शंकराचार्य

91
00:06:21,040 --> 00:06:23,680
के पद पर बैठने वाला व्यक्ति

92
00:06:23,680 --> 00:06:27,680
तुम कह रहे हो कि वह झूठ बोल रहा है। वह अज्ञानी है।

93
00:06:27,680 --> 00:06:31,680
तो यानी कि जो भगवत पाद आदि शंकराचार्य जी ने घोषणा की है

94
00:06:31,680 --> 00:06:35,760
कि मेरी इस गुरु इस मेरे द्वारा स्थापित पीठ पर बैठने वाला जो व्यक्ति है वो

95
00:06:35,760 --> 00:06:39,760
मुझ शिव का स्वरूप ही मान्य होगा। तो यदि उस उस उनकी इस

96
00:06:39,760 --> 00:06:44,080
घोषणा के अनुसार जो उनकी गद्दी पर बैठने वाले व्यक्ति हो

97
00:06:44,080 --> 00:06:48,320
व्यक्ति है उस पर यदि तुम उंगली उठा रहे हो तो इसका मतलब है तुम उसके

98
00:06:48,320 --> 00:06:52,320
रूप में भगवत पाद आदि शंकराचार्य जी पर ही उंगली उठा रहे हो। क्योंकि वही

99
00:06:52,320 --> 00:06:56,400
उस उन उनके संप्रदाय का निर्वाहक है।

100
00:06:56,400 --> 00:07:00,400
तुमने किसी केवल एक शिष्य मात्र पर उंगली नहीं उठाई है उस संप्रदाय

101
00:07:00,400 --> 00:07:04,640
के। शंकराचार्य पद पर बैठे हुए व्यक्ति के सिद्धांतों को या

102
00:07:04,640 --> 00:07:08,640
शास्त्रीय अर्थ को तुमने चुनौती दी है। तो उस हिसाब से

103
00:07:08,640 --> 00:07:12,640
तुमने संप्रदाय का विरोध किया है क्योंकि उनके रूप में भगवत पाद

104
00:07:12,640 --> 00:07:16,800
आदि शंकराचार्य का तुमने विरोध किया है। दूसरी बात अगर तुम ये कहो नहीं भगवत

105
00:07:16,800 --> 00:07:20,880
पाद को तो हम मानते हैं तो भगवत पाद ने क्या कहा है और क्या नहीं कहा है

106
00:07:20,880 --> 00:07:24,880
इस संबंध में शंकराचार्य निर्णायक हैं। तुम कौन होते

107
00:07:24,880 --> 00:07:29,120
हो निर्णायक वाले? निर्णायक होने वाले। अभी मैं अगर रामानुज संप्रदाय

108
00:07:29,120 --> 00:07:33,440
पर ये अपना मत थोपने लगूं कि नहीं नहीं रामानुज रामानुज रामानुजाचार्य

109
00:07:33,440 --> 00:07:37,600
जी ने तो पांचों पंच देवोपासना मानी है तो तुम मानोगे

110
00:07:37,600 --> 00:07:38,880
उस बात को

111
00:07:38,880 --> 00:07:42,880
तब तो राघवाचार्य जी और ये जो विद्या भास्कर जी महाराज हैं सभी

112
00:07:42,880 --> 00:07:46,880
रामानुजाचार्य जो जितने भी वैष्णवाचार्य हैं वो सब इस बात का खंडन करते हैं कि नहीं नहीं

113
00:07:46,880 --> 00:07:50,880
शिवजी का रूप जो है भगवान नहीं है तो मैं अगर थोप दूं नहीं रामानुजाचार्य जी

114
00:07:50,880 --> 00:07:55,040
ने तो माना है वो तो शंकर संप्रदाय को ही माना वो तो अद्वैतवादी थे तो मान लोगे

115
00:07:55,040 --> 00:07:59,120
कैसे मानोगे तुम किताबें लाओगे मैं कहूंगा किताबें तो तुमने अपने मन से छपवा रखी है। फिर

116
00:07:59,120 --> 00:08:03,120
क्या करोगे? फिर क्या करोगे? एक गवाह

117
00:08:03,120 --> 00:08:07,120
नहीं मिलेगा फिर भी मैं कहूंगा नहीं यही बात है। तो तुम अगर यह बात कहोगे

118
00:08:07,120 --> 00:08:11,200
कि शंकराचार्य शंकर संप्रदाय में यह माना गया ये मैं बताऊंगा। शंकराचार्य

119
00:08:11,200 --> 00:08:15,680
नहीं बताएगा। तो उस हिसाब से तुम्हारी प्रमाणिकता

120
00:08:15,680 --> 00:08:19,840
सिद्ध नहीं होगी। शंकराचार्य को जानने के विषय में और अगर तुम उनके अगर

121
00:08:19,840 --> 00:08:23,840
शंकराचार्य को जानने के विषय में वर्तमान शंकराचार्य को प्रमाणिक मानते

122
00:08:23,840 --> 00:08:28,240
हो तो वर्तमान शंकराचार्य का अगर तुम विरोध कर रहे हो शास्त्रीय विषयों में

123
00:08:28,240 --> 00:08:32,320
तो उनके रूप में तुम आदि शंकराचार्य जी का ही विरोध कर रहे हो। पहली बात।

124
00:08:32,320 --> 00:08:36,640
दूसरी बात मैंने ये मान लिया। मैंने ये बात मान ली कि संप्रदाय

125
00:08:36,640 --> 00:08:40,720
का विरोध नहीं है। दुर्जन तोष न्याय से जिससे कि

126
00:08:40,720 --> 00:08:45,280
बात जो है ना मूल विषय से भटके ना। इसमें ये वाली बात आएगी कि मैंने

127
00:08:45,280 --> 00:08:49,360
मूल विषय को बचाने के लिए कितने सारे वहां पर त्याग किए हैं। उस

128
00:08:49,360 --> 00:08:53,520
पर भी अभी बात करेंगे। तो मैंने तुरंत उस बात को मानता चला गया

129
00:08:53,520 --> 00:08:54,080
जिस जो

130
00:08:54,080 --> 00:08:58,080
बात जो है मूल विषय से भटका सकती है। ऐसी एक बात थी भागवतानंद के द्वारा

131
00:08:58,080 --> 00:09:02,240
उठाई गई कि पाखंड तंत्र तुमने कहा है तो मूल विषय मेरा वहां था। परंपरा

132
00:09:02,240 --> 00:09:06,240
शास्त्र कैसे प्राप्त हुए। तो इसलिए मैंने तुरंत उस बात को छोड़ा।

133
00:09:06,240 --> 00:09:10,320
भाई तुम क्यों चयन कर रहे हो प्रश्न का? मैं करने आया हूं ना प्रश्न। तुमने मुझसे कहा है पूछो।

134
00:09:10,320 --> 00:09:15,120
तो मैं पूछ रहा हूं। इसने इस व्यक्ति ने दूसरी बार हमको

135
00:09:15,120 --> 00:09:19,280
भ्रांति मूलक प्रश्न करने वाला होने के संबंध में एक

136
00:09:19,280 --> 00:09:23,520
हमारी जो हमसे जो वाकलन हुआ है उसके कारण

137
00:09:23,520 --> 00:09:27,520
जो है हमको जो है ये सिद्ध करना चाहता है। भ्रांति मूलक प्रश्न के

138
00:09:27,520 --> 00:09:31,920
रूप में हमको वहां पर उपस्थित कर रहा है। भाग भगवती का वरदान

139
00:09:31,920 --> 00:09:36,080
भागवतानंद को प्राप्त है। फिर भी वो ये बोल देता है कि भैया देखो एक

140
00:09:36,080 --> 00:09:40,240
जो है अमुक अमुक तरह की जो लड़की है वो मंच पर मंच साझा

141
00:09:40,240 --> 00:09:44,480
कर रही है। पूरी के शंकराचार्य जी के साथ और एक बार नहीं कम से कम पांच

142
00:09:44,480 --> 00:09:48,720
से छह बार अपने एक ही वीडियो में वो इस बात को दोहराता है तो भगवती

143
00:09:48,720 --> 00:09:52,720
का वरदान प्राप्त होने के बाद भी उससे तो वाकलन हो सकता है

144
00:09:52,720 --> 00:09:56,960
मगर शिवश नारायण द्विवेदी से वाकलन नहीं हो सकता है। फिर भी

145
00:09:56,960 --> 00:10:01,680
बुद्ध के विषय की बात आ जाने पर हमने उसका त्याग इसीलिए किया

146
00:10:01,680 --> 00:10:05,680
क्योंकि हमको विषय को बचाना था। विषय यह नहीं था

147
00:10:05,680 --> 00:10:09,200
कि बुद्ध के विषय में पूरी के शंकराचार्य जी सही है या फिर

148
00:10:09,200 --> 00:10:13,200
भागवतानंद सही है। कर्पात्री जी सही है या फिर भागवतानंद जी सही

149
00:10:13,200 --> 00:10:17,360
है? हम पूछ रहे हैं यदि तुम सबका निग्रह कर रहे हो। सबका निग्रह मतलब

150
00:10:17,360 --> 00:10:21,520
सभी आचार्यों में दोष दृष्टि रख रहे हो तो फिर तुम्हारा शब्द प्रमाण कौन है?

151
00:10:21,520 --> 00:10:25,680
जिसके आधार पर तुमने वेद नामक ग्रंथ को वेद माना है। ठीक है?

152
00:10:25,680 --> 00:10:29,920
विषय ये था। तो जितनी बार जैसे ही कोई भी हल्की बात आएगी

153
00:10:29,920 --> 00:10:34,080
जिससे कि विषय से दूर जा रहे हैं तो उतनी बार मैं कहूंगा कि भाई विषय

154
00:10:34,080 --> 00:10:38,240
पर वापस आओ। अगर बुद्ध की बात मेरे मुख से निकल गई है तो उसको छोड़ो। मूल

155
00:10:38,240 --> 00:10:42,240
प्रश्न यह है तुम्हारे पास शास्त्र कैसे आए? अब यहां पर इसने एक बात और कही

156
00:10:42,240 --> 00:10:46,320
है कि व्यक्ति के बारे में जब तुम्हें पता ही नहीं है तो तुम वहां पर तुम्हारा वहां पर उस पर

157
00:10:46,320 --> 00:10:50,320
वक्तव्य निर्गत करना मूर्खता ही है ना? तो यही बात तो मैं भी तुमसे कह रहा

158
00:10:50,320 --> 00:10:54,560
हूं। जब तुमने मेरा निग्रह निकासिका वाली सीरीज देखी नहीं है तो मेरे ऊपर वक्तव्य

159
00:10:54,560 --> 00:10:58,640
वक्तव्य देना तुम्हारी मूर्खता नहीं है क्या? भाई देखो

160
00:10:58,640 --> 00:11:02,800
अगर रामानुजाचार्य परंपरा से ये माना जा रहा है कि दो प्रकार

161
00:11:02,800 --> 00:11:06,880
के बुद्ध हैं तो आप खूब मानो। आप जो है भगवान

162
00:11:06,880 --> 00:11:10,880
श्री राम को ही चार शादियां करने वाला मान लो। आप भगवान

163
00:11:10,880 --> 00:11:14,960
के अवतार को जो है मूर्ख स्वरूप मान लो। हमें उस पर

164
00:11:14,960 --> 00:11:18,960
कोई आपत्ति नहीं है। पर यदि भागवतानंद यह बात

165
00:11:18,960 --> 00:11:23,040
बोल रहा है कि दो बुद्ध हैं और दोनों बुद्ध जो

166
00:11:23,040 --> 00:11:24,320
है भगवान का ही स्वरूप

167
00:11:24,320 --> 00:11:28,640
है तो वहां पर हम प्रश्न पुट अप कर सकते हैं कि जो शुद्धोधन पुत्र

168
00:11:28,640 --> 00:11:32,640
है उसको माया मोह स्वरूप कहा गया है।

169
00:11:32,640 --> 00:11:36,800
तो आपने इस बात ये माया मोह स्वरूप होने वाली बात मैंने अपने वीडियो

170
00:11:36,800 --> 00:11:40,880
में बाद में कही भी है। मैंने वहां मौके पे इसीलिए नहीं कही। क्योंकि फिर माया मोह

171
00:11:40,880 --> 00:11:45,120
स्वरूप के कारण वहां पर फिर दूसरी जगह बात चली जाएगी और

172
00:11:45,120 --> 00:11:50,000
जो मूल विषय है एक निश्चित समय सीमा के अंदर

173
00:11:50,000 --> 00:11:54,080
कट्टर विरोधी के प्रांगण के अंदर बैठे हुए मूल विषय पर उसको

174
00:11:54,080 --> 00:11:58,240
निरुत्तर करना जो मूल विषय था वो था भागवतानंद

175
00:11:58,240 --> 00:12:02,240
की परंपरा विषय से कौन भागा विषय से कौन भागा सबसे पहले

176
00:12:02,240 --> 00:12:06,480
तो उसने ही विषय खोद दिया कि तुमने हमारे को पाखंड कहा है मैंने वहां पर कहा था क्या पाखंड

177
00:12:06,480 --> 00:12:10,560
मैंने तो बहुत कुछ कहा है उसने सब कुछ क्यों नहीं खोदा वही क्यों खोदा क्योंकि उसको

178
00:12:10,560 --> 00:12:14,640
वहां पर लग रहा है कि उसकी वहां पर जीत हो सकती है इसलिए वह खोदा दूसरी बातें

179
00:12:14,640 --> 00:12:18,640
क्यों नहीं खोद दी उसने बहुत सारी बातें थी अगर पहले और बाद की

180
00:12:18,640 --> 00:12:22,800
वजह से खोद रहा है तो पहले तो मैंने कुछ और कहा है सबसे क्रम से चलो

181
00:12:22,800 --> 00:12:26,800
फिर क्रम से चलना है तो तो विषय कौन कर रहा है ध्यान दो

182
00:12:26,800 --> 00:12:30,880
और रही बात बुद्ध की तो बुद्ध के विषय में कहा

183
00:12:30,880 --> 00:12:35,120
गया है जो शुद्धोधन पुत्र बुद्ध है वो

184
00:12:35,120 --> 00:12:39,360
माया मोह स्वरूप है तो रामानुज संप्रदाय घोषित करे कि भगवान के अवतार

185
00:12:39,360 --> 00:12:43,440
सच्चिदानंद स्वरूप नहीं माया मोह स्वरूप होते हैं। हमें उस पर कोई आपत्ति नहीं

186
00:12:43,440 --> 00:12:47,600
है। उस पर तो तुमने बात बोली ही नहीं। क्यों नहीं बोली भाई? अग्नि पुराण

187
00:12:47,600 --> 00:12:51,680
में जहां पे शुद्धोधन पुत्र दिया हुआ है वहीं पे माया मोह स्वरूप लिखा हुआ है। और

188
00:12:51,680 --> 00:12:55,760
इस बुद्ध पे शबरी पे एक विस्तृत वीडियो अलग चलाएंगे। वरना यह वीडियो लंबा हो

189
00:12:55,760 --> 00:13:01,440
जाएगा। फिलहाल बात ये है इस बात को ध्यान में रखो। अरुण पांडे

190
00:13:01,440 --> 00:13:05,440
कि यह जो चर्चा हो रही है भागवतानंद की प्रामाणिकता के विषय

191
00:13:05,440 --> 00:13:09,440
में हो रही है। ये चर्चा इस विषय में नहीं हो रही है। कि भागवतानंद

192
00:13:09,440 --> 00:13:13,440
ने गुरु विरोध क्यों किया या फिर भागवतानंद और कर्पात्री जी

193
00:13:13,440 --> 00:13:17,440
के बीच में कौन सही है कौन गलत है शंकराचार्य और भागवतानंद के बीच में कौन सही

194
00:13:17,440 --> 00:13:22,160
है कौन गलत है और जो तुम एक बात कह रहे हो ना कि

195
00:13:22,160 --> 00:13:26,240
यदि जो आचार्य गण है वो अपने अपने मंच से बैठकर के अगर कुछ बोल

196
00:13:26,240 --> 00:13:30,240
देंगे उनसे करोड़ों लोग प्रभावित होते हैं तो प्रश्न वहां भी पूछ लिया जाएगा कि

197
00:13:30,240 --> 00:13:34,320
राघवाचार्य जी महाराज विद्या भास्कर जी महाराज क्यों हरिहर में भेद करते

198
00:13:34,320 --> 00:13:38,320
हैं क्यों बोलते हैं और ये वहां निग्रह क्यों नहीं करेगा उससे तो पूरा समाज प्रभावित ित

199
00:13:38,320 --> 00:13:44,320
हो रहा है। फूट डल रही है। इस वालों को आधार मिलता है।

200
00:13:44,480 --> 00:13:48,560
जब हरिहर में भेद नहीं है। भागवतानंद सही है तो क्यों बोलते हैं स्टेज

201
00:13:48,560 --> 00:13:52,640
से? और भागवत उनका निग्रह क्यों नहीं करता है? ठीक है? तो यह सवाल भी

202
00:13:52,640 --> 00:13:57,280
आएगा कि भैया वो क्यों कह रहे हैं मंच से? अब इस मूर्ख ने यहां पर

203
00:13:57,280 --> 00:14:01,440
तीन चार प्रलाप एक साथ किए हैं कि भैया

204
00:14:01,440 --> 00:14:05,840
इसने प्रश्न किया है। मैंने प्रश्न किया कि भाई जिस संप्रदाय में आप अपनी

205
00:14:05,840 --> 00:14:09,840
जिससे आप अपना सिद्धांत लेंगे जिस परंपरा को मानेंगे उसका आप खंडन

206
00:14:09,840 --> 00:14:13,920
नहीं कर सकते। ठीक है? एक तो इसने यह कहा। फिर इसके बाद कहा कि

207
00:14:13,920 --> 00:14:18,000
भाई शबरी के विषय में जो है अगर पूरी शंकराचार्य जी बोल रहे हैं तो किस शास्त्र के आधार

208
00:14:18,000 --> 00:14:22,240
पर बोल रहे हैं और काक भुसुंडी को रामायण को अगर

209
00:14:22,240 --> 00:14:26,800
क्या कहते हैं करपात्री जी ने प्रामाणिक माना है

210
00:14:26,800 --> 00:14:31,280
तो फिर वो उसी का खंडन कैसे कर रहे हैं ठीक है पहले तो ये जो करपात्री

211
00:14:31,280 --> 00:14:35,840
जी वाली बात है इस बात का मैंने वहीं पर जवाब दिया था

212
00:14:35,840 --> 00:14:40,240
हालांकि मेरा जो फोकस है वो इस बात पे है कि बार-बार

213
00:14:40,240 --> 00:14:44,320
जो विषय बदला जा रहा है वो वो ना बदले। जितनी बार इधर-उधर

214
00:14:44,320 --> 00:14:48,400
जाएं तो कम से कम चीजें करते हुए वापस उसको विषय पर लाएं। फोकस मेरा

215
00:14:48,400 --> 00:14:52,560
इस बात पे है। और इसके लिए मैं आपको दो बड़ी चीजें बताऊंगा जिसमें वहां पर मैंने

216
00:14:52,560 --> 00:14:57,360
त्याग कहा त्याग किया और मौन रहा। जैसे कि चर्चा के बीच में

217
00:14:57,360 --> 00:14:59,600
जब कोई उसने बोला कि

218
00:14:59,600 --> 00:15:03,600
ये आपके ही गुरु भाई हैं और ये भी परिकरों के उससे त्रस्त है। व्यवहार से

219
00:15:03,600 --> 00:15:07,920
त्रस्त है। मैंने वहां पर उसका खंडन क्यों नहीं किया? उसका भी खंडन करता।

220
00:15:07,920 --> 00:15:11,920
फिर उसने एक जगह कहा कि तुम सब पर सब पर आरोप लगाते रहो पर अपने मठ

221
00:15:11,920 --> 00:15:16,080
में होने वाले व्यभचार पर बात मत करो। मैंने उसका खंडन नहीं किया।

222
00:15:16,080 --> 00:15:20,160
फिर इसने हेमंत पालीवाल जोधपुर वाली बात जो जिसका विषय से कोई मतलब नहीं

223
00:15:20,160 --> 00:15:24,320
है कि तुमने मेरे मेरे ऊपर आरोप लगाया है यौन उसका

224
00:15:24,320 --> 00:15:28,800
हम मैंने उसका भी कोई जवाब नहीं दिया। फिर इसने ब्रह्मदंड

225
00:15:28,800 --> 00:15:33,040
इत्यादि बहुत सी चीजें करनी चाही जिनका विषय से कोई मतलब नहीं था। मगर मैंने

226
00:15:33,040 --> 00:15:37,280
वहां पर या तो मौन रहा या फिर संक्षिप्त से संक्षिप्त

227
00:15:37,280 --> 00:15:41,360
बात करते हुए मैं जल्दी से वापस इसको बैक टू द पॉइंट लाया क्योंकि

228
00:15:41,360 --> 00:15:45,360
इसका काम ही यही है। इसके पास सवालों का जवाब नहीं है। अब ये व्यक्ति जो

229
00:15:45,360 --> 00:15:49,680
यहां पर इसकी मीमांसा कर रहा है। ये शबरी वाला प्रकरण आया कैसे?

230
00:15:49,680 --> 00:15:53,760
इससे ये पूछो ना। अरे मूर्ख जब मैं उससे ये पूछ रहा हूं कि तुम्हे

231
00:15:53,760 --> 00:15:58,000
तुमने शास्त्र कहां से प्राप्त किए हैं? तो इससे इस बात का क्या संबंध

232
00:15:58,000 --> 00:16:02,160
है कि तुम्हारे गुरु ने शबरी का शबरी को ब्राह्मणी कैसे कहा है?

233
00:16:02,160 --> 00:16:06,400
इस बात का क्या संबंध है? शबरी को ब्राहणी जो पूरी

234
00:16:06,400 --> 00:16:10,800
के शंकराचार्य जी है उन्होंने शबरी को ब्राहणी कहने के लिए अपने ग्रंथ में पर्याप्त विवेचना

235
00:16:10,800 --> 00:16:14,880
दी है। उस पर मैं वीडियो भी बनाऊंगा। अभी मोटे रूप में बता दे रहा हूं। शबरी

236
00:16:14,880 --> 00:16:19,040
को कृष्ण मृग चर्म धारणी बताया गया है। जो ब्राह्मणों

237
00:16:19,040 --> 00:16:23,040
के लिए होता है। शबरी को तपस्वनी बताया गया है। तपस्या

238
00:16:23,040 --> 00:16:27,040
करने पर समुख का वध हुआ था शूद्र का। तो यह कैसी

239
00:16:27,040 --> 00:16:31,120
तपस्वी है जो शूद्र होते हुए जिसको दोष नहीं लग रहा है तपस्या

240
00:16:31,120 --> 00:16:35,200
करने पर। इसके अलावा शबरी कहीं से भी बहिष्कृत

241
00:16:35,200 --> 00:16:39,280
नहीं थी। तो गुरुदेव ने पर्याप्त चीजें दी हैं। आनंद रामायण का भी

242
00:16:39,280 --> 00:16:43,440
वहां पर उन्होंने कोट किया है अपने ग्रंथ में कि किस प्रकार से आनंद

243
00:16:43,440 --> 00:16:47,600
रामायण के अनुसार भी जो शबरी हैं वो

244
00:16:47,600 --> 00:16:51,680
क्या कहते हैं? ब्राह्मण सिद्ध होती हैं। और एक मीमांसा दर्शन

245
00:16:51,680 --> 00:16:56,800
के भाषिकार हुए हैं। शबराचार्य उनका नाम था। उनके ही सदस्य

246
00:16:56,800 --> 00:17:00,880
उनके नाम में वो शब्द आ रहा है शबरी

247
00:17:00,880 --> 00:17:04,960
परंतु वो शबरी केवल शीर्षक है उनका

248
00:17:04,960 --> 00:17:09,200
ना कि वो शबरी जाति की ही मानी गई है अब बात आती है काग

249
00:17:09,200 --> 00:17:13,200
भुसंडी रामायण को प्रमाण माना जाता है करपात्री जी के द्वारा लिखा

250
00:17:13,200 --> 00:17:17,600
दिखा भाई तू यही तो है मूर्खों की फौज तुम्हें पता ही नहीं है करपात्री

251
00:17:17,600 --> 00:17:21,760
जी ने क्या कहा लगे मेंढकों की तरह उछलने करपात्री

252
00:17:21,760 --> 00:17:26,320
जी ने कहीं पर भी यह नहीं कहा है कि वो प्रमाण है, आर्ष ग्रंथ है।

253
00:17:26,320 --> 00:17:29,920
लोकाचार की दृष्टि से उसकी भी चीजों को स्वीकार किया है। किस सीमा

254
00:17:29,920 --> 00:17:34,080
में? वाल्मीकि रामायण की सीमा में। क्यों? क्योंकि वाल्मीकि रामायण

255
00:17:34,080 --> 00:17:38,640
अपने शुरुआत होते ही यह घोषणा करती है कि वो वेदों का अवतार

256
00:17:38,640 --> 00:17:42,640
है। अपौषय वेद हैं। उनका अवतार है। ये

257
00:17:42,640 --> 00:17:46,720
घोषणा करती है वाल्मीकि रामायण। तो जितने भी भ्रम फैलाए जाएंगे

258
00:17:46,720 --> 00:17:51,280
या फिर जितनी भी ऐसी बातें होंगी जो क्या कहते हैं?

259
00:17:51,280 --> 00:17:55,280
वाल्मीकि रामायण के इत जा रही होंगी। उनको उन्होंने नहीं माना है। तो पहली बात

260
00:17:55,280 --> 00:17:59,280
तो तुम्हारी यही चीज गलत हो गई कि भाई करपात्री जी ने उन्हें प्रमाण

261
00:17:59,280 --> 00:18:04,800
माना है। दिखा कहां पर प्रमाण माना है। और दूसरी बात यह है कि करपात्र

262
00:18:04,800 --> 00:18:09,120
तुम यही बता दो कि भुसुंडी रामायण को लिखने वाले कौन है?

263
00:18:09,120 --> 00:18:13,360
बता दो। आज तक कोई नहीं बता पाया है। कौन है रचयिता

264
00:18:13,360 --> 00:18:17,680
भुसुंडी रामायण के? मगर लोकाचार में वो सनातनियों

265
00:18:17,680 --> 00:18:22,560
के द्वारा ग्रहण की जाती है। तो ग्रहण की गई है। कृपात्री जी के द्वारा परंतु

266
00:18:22,560 --> 00:18:26,640
वाल्मीकि रामायण के आलोक में जहां इत जाएगी तो वहां उसे

267
00:18:26,640 --> 00:18:30,720
अमान्य मानना पड़ेगा और हम अमान्य मानने को भी नहीं कह रहे। हम तो यह

268
00:18:30,720 --> 00:18:34,800
कहेंगे कि भैया अगर उसका सम्मान आपको रखना है उसके वचनों का तो

269
00:18:34,800 --> 00:18:39,120
वहां पर रामो विग्रहवान धर्म का सम्मान रखते हुए उसका सम्मान रखिए।

270
00:18:39,120 --> 00:18:43,200
उसको दिव्य दृष्टि मान लीजिए। दिव्य दृष्टि से घटित होने वाली घटना।

271
00:18:43,200 --> 00:18:45,120
जो रामानंद संप्रदाय है उसमें

272
00:18:45,120 --> 00:18:49,200
श्री राम जी के द्वारा रास लीला होना भी स्वीकार किया जाता है। मगर दिव्य दृष्टि

273
00:18:49,200 --> 00:18:53,360
से व्यवहारिक रूप से नहीं कि श्री राम जी ने भी रास लीला

274
00:18:53,360 --> 00:18:57,440
रचाई हो वहां पर भी रस है। परंतु दिव्य दृष्टि से व्यावहारिक

275
00:18:57,440 --> 00:19:01,760
रूप से वह मर्यादा पुरुषोत्तम राम है। तो अगर

276
00:19:01,760 --> 00:19:05,840
किसी भी वाल्मीकि रामायण से इतर जाते हुए किसी भी

277
00:19:05,840 --> 00:19:11,120
स्मृति के द्वारा उनकी मर्यादा पुरुषोत्तम होने पर प्रश्न चिन्ह उठेगा।

278
00:19:11,120 --> 00:19:15,280
तो वहां पर उसको नहीं माना जाएगा। ये कर्पात्री जी ने घोषणा की है। तो तुम

279
00:19:15,280 --> 00:19:19,280
करपात्री जी के पक्ष से तो कम से कम ये नहीं कह सकते हो ना कि भैया वो क्यों नहीं मानेंगे

280
00:19:19,280 --> 00:19:23,360
उसको? कहां प्रमाण उन्होंने माना उनको? यह व्यक्ति अभी थोड़ी

281
00:19:23,360 --> 00:19:27,440
देर पहले कह रहा था ना कि जो है पहले उसके बारे में बोलने से पहले जान तो

282
00:19:27,440 --> 00:19:31,680
लो उसका पक्ष क्या है तो भाई तू करपात्री जी को पढ़ा तूने

283
00:19:31,680 --> 00:19:35,840
कि बस अपने बुग्गू बाबा के वो सपने में आने वाली परी जिसको वो भगवती मान

284
00:19:35,840 --> 00:19:39,840
बैठा है उसके द्वारा ही मान लिया तो

285
00:19:39,840 --> 00:19:44,240
मूर्ख कौन सिद्ध हुआ यहां पर अब ये व्यक्ति आरोप लगा रहा है कि जब शबरी

286
00:19:44,240 --> 00:19:48,480
का विषय ही चल रहा है उसी में भागवतानंद बात कर रहा है शबरी के विषय में

287
00:19:48,480 --> 00:19:52,560
तो फिर मैंने क्यों कहा कि भैया विषयंतर हो रहा है तो देखिए कैसे साक्षात तरीके

288
00:19:52,560 --> 00:19:56,640
से विषयंतर की बात कहकर जो है बचने का प्रयास कर रहा है। भाई

289
00:19:56,640 --> 00:20:00,240
विषय क्या है? विषय है कि तुम्हारे को शास्त्र

290
00:20:00,240 --> 00:20:04,240
कैसे प्राप्त हुए? कौन सी परंपरा से प्राप्त हुए?

291
00:20:04,240 --> 00:20:08,400
विषय यह है। तो यदि विषय घूम करके इधर जा रहा है कि शबरी के विषय

292
00:20:08,400 --> 00:20:12,480
में शंकराचार्य जी सही है, करपात्री जी सही है या फिर भागवतानंद सही है। तो

293
00:20:12,480 --> 00:20:16,480
जैसे ही मुझे इस बात को बार-बार याद आएगा तो मैं बोलूंगा ना भैया यहां पर क्यों आ गए

294
00:20:16,480 --> 00:20:20,720
हो तुम? मुख्य विषय है तुम्हारे पास शास्त्र कैसे आए? शास्त्रों

295
00:20:20,720 --> 00:20:24,800
के लिए तुम किस पर निर्भर हो? कौन है तुम्हारा शब्द प्रमाण? मैंने

296
00:20:24,800 --> 00:20:28,800
वहां छाती ठोक के बोला ना मेरे शब्द प्रमाण शंकराचार्य हैं। शास्त्रों के

297
00:20:28,800 --> 00:20:33,040
विषय में कौन सा शास्त्र शास्त्र है? कौन सा शास्त्र शास्त्र नहीं है? इस विषय

298
00:20:33,040 --> 00:20:37,200
में परंपरा प्राप्त आचार्य हमारे प्रमाण हैं। अगर हम स्वतंत्र

299
00:20:37,200 --> 00:20:41,200
रूप से शास्त्रों को ग्रहण करेंगे तो वो जो पब्लिकेशन

300
00:20:41,200 --> 00:20:45,360
है, वो जो इंटरनेट का पोर्टल है या फिर वो गीता, प्रेस, चौखंबा

301
00:20:45,360 --> 00:20:49,520
इत्यादि ये सब हमारे शब्द प्रमाण हो जाएंगे। हम नहीं कह सकते कि ये झूठ बोल सकते हैं, झूठ

302
00:20:49,520 --> 00:20:53,520
बोल सकते हैं तो फिर वो हमें को शास्त्र भी झूठे दे सकते हैं। इतनी सी बात भेजे में

303
00:20:53,520 --> 00:20:57,520
घुस नहीं रही है। भाई विषयंतर जो मैं कह रहा हूं वो इसलिए कह रहा हूं कि

304
00:20:57,520 --> 00:21:01,760
मूल विषय था निग्रह संप्रदाय पर प्रकाश डालना। अब

305
00:21:01,760 --> 00:21:06,000
उसने पूछा कि किन विषयों में मैंने जो है परंपरा प्राप्त आचार्यों

306
00:21:06,000 --> 00:21:10,080
का खंडन किया। यद्यपि ये सवाल भी अपने आप में गलत ही था। जब वो एक अपनी

307
00:21:10,080 --> 00:21:14,160
दोष दृष्टि वो बता रहा है कि मैं किसी पर विश्वास नहीं करता पूर्णतया

308
00:21:14,160 --> 00:21:15,280
मेरा शब्द प्रमाण कोई नहीं

309
00:21:15,280 --> 00:21:19,760
है क्योंकि वो कह रहा है कि मैं सबका निग्रह करूंगा और वो ये भी नहीं बता रहा है व्यवहारिक

310
00:21:19,760 --> 00:21:24,000
रूप से ये मेरा गुरु है जिसका मैं निग्रह नहीं करूंगा जिसका मैं खंडन नहीं करूंगा

311
00:21:24,000 --> 00:21:28,400
यानी कि उसका शब्द प्रमाण कोई नहीं है यानी कि उसकी दोष दृष्टि सब में है। जब वो स्वतंत्र

312
00:21:28,400 --> 00:21:32,640
रूप से ये कह ही रहा है तो उसमें ये पूछने की आवश्यकता क्या है कि मैंने किसका

313
00:21:32,640 --> 00:21:36,640
शास्त्रीय या सैद्धांतिक विरोध किया है। फिर भी उसने पूछा

314
00:21:36,640 --> 00:21:40,720
और हमने दो जगह बता दिया कि भैया यहां यहां पे तुमने किया है। तो

315
00:21:40,720 --> 00:21:44,880
यहां पर ये कहने लगा वहां मापे तुम्हारे आचार्य गलत है इसलिए किया है। प्रश्न

316
00:21:44,880 --> 00:21:48,960
ये नहीं है कि कौन गलत है कौन सही है प्रश्न ये था कि तुमने

317
00:21:48,960 --> 00:21:53,200
विरोध किया है कि नहीं किया है? पहली बात तो विरोध करना तुमने खुद स्वीकार

318
00:21:53,200 --> 00:21:57,360
कर रखा है। फिर भी तुम्हारे पूछने पर व्यर्थ का प्रश्न था। फिर भी तुम्हारे पूछने

319
00:21:57,360 --> 00:22:01,600
पर जब तुमको बता दिया गया तो तुमने अगला प्रश्न खोदा कि उसमें तो मैं सही हूं। अरे भैया

320
00:22:01,600 --> 00:22:05,680
प्रश्न ये है ही नहीं कि शबरी के मामले में कौन सही है कौन गलत प्रश्न

321
00:22:05,680 --> 00:22:09,680
ये था कि तुमने विरोध किया कि नहीं किया परंपरा प्राप्त आचार्य

322
00:22:09,680 --> 00:22:14,080
का तो मैंने बताया तुमने किया अब तुम अपने वापस विषय पर आना चाहिए था

323
00:22:14,080 --> 00:22:18,160
विषय क्या था कि तुम शास्त्रों के लिए किस पर निर्भर करते हो क्या तुम्हारा

324
00:22:18,160 --> 00:22:22,240
शब्द प्रमाण है तो जब ये एक्सप्लोर करने के चक्कर में कि कौन सही

325
00:22:22,240 --> 00:22:26,480
है कौन गलत एक्सप्लोर करने के चक्कर में वो मूल विषय खो रहा था

326
00:22:26,480 --> 00:22:30,320
तो मैंने वहां पर ध्यान दिलाया कि विषयांतर हो रहा है तो यह मूर्ख व्यक्ति क्या

327
00:22:30,320 --> 00:22:34,320
प्रलाप कर रहा है कि देखो देखो वो सबरी वाले विषय पे ही है तब भी जो है विषयंतर

328
00:22:34,320 --> 00:22:38,400
कह रहा है और मूर्ख यह भूल गया कि मुख्य विषय था कि

329
00:22:38,400 --> 00:22:42,480
भागवतानंद का जो भागवतानंद का जो तथाकथित निग्रह संप्रदाय

330
00:22:42,480 --> 00:22:46,800
है उसकी प्रमाणिकता राम जी के विषय में हमें

331
00:22:46,800 --> 00:22:50,800
कोई दिक्कत नहीं है रामानुज संप्रदाय के अंतर्गत आप खूब मानो की वो

332
00:22:50,800 --> 00:22:54,960
मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं है वो खूब मानो आप लोग

333
00:22:54,960 --> 00:22:58,960
कि जो है राम राम जी जो है मर्यादा का अमुक अमुक जगह पर

334
00:22:58,960 --> 00:23:02,960
ब्रह्म भाव से उल्लंघन करने लगे। आप खूब मानो रामानुज संप्रदाय से हमें

335
00:23:02,960 --> 00:23:06,960
कोई आपत्ति नहीं होगी। परंतु जब कोई परंपरा विहीन व्यक्ति ऐसी बात बोलेगा तो

336
00:23:06,960 --> 00:23:10,960
हम उसको काउंटर कर रहे हैं। आप खूब उनको मानो कि वो भी नाचते थे। वो भी

337
00:23:10,960 --> 00:23:15,200
रास रचाते थे। वो हमारे आदर्श नहीं है। वो अनुकरणीय नहीं है। भले ही स्कंद पुराण

338
00:23:15,200 --> 00:23:19,280
में रामायण महात्म में उनका जो चरित्र है वो अनुकरणीय बताया

339
00:23:19,280 --> 00:23:23,680
गया हो। कितनी बार पूरी के शंकराचार्य

340
00:23:23,680 --> 00:23:28,240
जी और अन्य वैष्णवाचार्य भी यह बात स्वीकार कर चुके हैं कि

341
00:23:28,240 --> 00:23:32,560
जो भगवान श्री कृष्ण है वो अनुसरणीय हैं

342
00:23:32,560 --> 00:23:37,200
पूजनीय हैं प्राप्तव्य हैं मगर अनुकरणीय

343
00:23:37,200 --> 00:23:41,520
नहीं है और श्री राम अनुसरणीय और अनुकरणीय दोनों

344
00:23:41,520 --> 00:23:45,360
हैं। तो अनुकरणीय वो जैसा जैसा कर रहे हैं वैसा वैसा हम कर सकते

345
00:23:45,360 --> 00:23:49,520
हैं। पुल बनाना, मरे हुए को जिंदा कर देना।

346
00:23:49,520 --> 00:23:53,520
यह सब सामर्थ्य का क्या कहते हैं? सामर्थ्य के आधार पर है।

347
00:23:53,520 --> 00:23:58,160
यदि हमारे पास सामर्थ्य है किसी को जिंदा करने की कर सकते हैं। रोक नहीं है।

348
00:23:58,160 --> 00:24:02,400
किसी भी शास्त्रीय मर्यादा का उल्लंघन करना स्वीकार नहीं किया जा सकता। प्रभु

349
00:24:02,400 --> 00:24:06,560
श्री राम के द्वारा व्यवहारिक स्वरूप से। आप आदि

350
00:24:06,560 --> 00:24:10,720
दैविक जगत में खूब मानो कि राम जी ऐसे कर रहे हैं। रामानंद संप्रदाय का मैंने उदाहरण

351
00:24:10,720 --> 00:24:14,960
दिया। हां। भागवत पुराण में जो स्त्रियां वहां

352
00:24:14,960 --> 00:24:19,200
रास में गई थी वह सब अपने अपने घर पर सो रही थी। व्यवहारिक घटना नहीं थी। वो आदिविक घटना

353
00:24:19,200 --> 00:24:23,280
थी। और यदि ब्रह्म भाव से भगवान श्री राम जो है मर्यादा

354
00:24:23,280 --> 00:24:27,520
का उल्लंघन कर सकते हैं तो क्यों 16,000 स्त्रियों को उन्होंने अगले जन्म

355
00:24:27,520 --> 00:24:31,600
के लिए छोड़ दिया? क्यों सुपनखा का जो प्रस्ताव था

356
00:24:31,600 --> 00:24:36,240
वो ठुकरा दिया? क्यों वैष्णो देवी का प्रस्ताव था वो ठुकरा दिया? इसका जवाब कब दोगे?

357
00:24:36,240 --> 00:24:40,320
और जवाब देना तब देना। सबसे पहले तो ये घोषित कर दो रामानुज संप्रदाय के

358
00:24:40,320 --> 00:24:44,480
अनुसार जो है मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं है वो

359
00:24:44,480 --> 00:24:48,640
हमारे आदर्श नहीं है सैकड़ों वर्षों से सदियों

360
00:24:48,640 --> 00:24:52,720
से पूरा जमाना इसी बात पर तुला हुआ है कि इनसे

361
00:24:52,720 --> 00:24:56,720
इनका आदर्श छीन लो और आज स्वयं प्रामाणिक संप्रदाय के

362
00:24:56,720 --> 00:25:00,720
लोग एक तुच्छ से मंतव्य की पुष्टि करने के लिए

363
00:25:00,720 --> 00:25:04,960
हमसे हमारा आदर्श छीनने की बात कर रहे हैं। छीन

364
00:25:04,960 --> 00:25:09,200
लो आदर्श। दुनिया की किसी विचारधारा में

365
00:25:09,200 --> 00:25:13,280
प्रभु श्री राम के जैसा कोई उनकी विचारधारा का पालन करने वाला

366
00:25:13,280 --> 00:25:17,520
कोई आदर्श नहीं है। ना मोहम्मद ना जीसस

367
00:25:17,520 --> 00:25:21,840
कोई नहीं है। केवल हमारे पास एक आदर्श है राम।

368
00:25:21,840 --> 00:25:26,000
उसको भी इस तुच्छ मानसिकता वाले व्यक्ति की धारणा को पोषित

369
00:25:26,000 --> 00:25:30,000
करने के लिए छीन लो। हमारे आदर्श को। पर हम ऐसा नहीं होने

370
00:25:30,000 --> 00:25:34,240
देंगे। ठीक है? मत मानो

371
00:25:34,240 --> 00:25:38,640
तुम आदर्श रामो विग्रह वान धर्मा को काट के रख दो तुम मर्यादा पुरुषोत्तम

372
00:25:38,640 --> 00:25:43,520
श्री राम को काट के रख दो तुम उनको लीला पुरुषोत्तम बना दो

373
00:25:43,520 --> 00:25:47,600
अलौकिक घटनाएं हैं मगर वहां पर उन्होंने साध्य कोटि

374
00:25:47,600 --> 00:25:51,600
के धर्म का उल्लंघन नहीं कर दिया पुल बना के कि धर्म ने बताया हो

375
00:25:51,600 --> 00:25:56,640
कि भैया पुल नहीं बना सकते उन्होंने पुल बना दिया उन्होंने अपनी सामर्थ्य से बनाया

376
00:25:56,640 --> 00:26:00,880
उन्होंने अहिल्या को जो है श्राप मुक्त किया अपनी सामर्थ्य

377
00:26:00,880 --> 00:26:04,960
से किया व्यवहारिक दृष्टि से तो उन्होंने एक शिला को छुआ अपने पैर

378
00:26:04,960 --> 00:26:09,600
से और रही बात क्या कहते हैं

379
00:26:09,600 --> 00:26:13,920
ब्राह्मण ब्राह्मण के द्वारा जो है सत्कार करने की पैर धुलाने की

380
00:26:13,920 --> 00:26:15,760
तो विश्वामित्र जी के

381
00:26:15,760 --> 00:26:20,640
पैर नहीं धुलाए थे वशिष्ठ जी ने ये आतित्य सत्कार होता है

382
00:26:20,640 --> 00:26:25,360
विश्वामित्र जी क्षत्रिय थे वशिष्ठ जी जो है ब्राह्मण थे

383
00:26:25,360 --> 00:26:29,520
तो वहां पर पैर नहीं धुलाए गए यदि हमारे

384
00:26:29,520 --> 00:26:33,840
यहां पर कोई द्विज आएगा तो हम हम भी उसके पैर धुलाएंगे। भले ही हम ब्राह्मण

385
00:26:33,840 --> 00:26:38,400
है और वो क्षत्रिय वैश्य है। और यदि कोई शूद्र भी आएगा आतित

386
00:26:38,400 --> 00:26:42,480
आतिथ्य की सीमा में आएगा यदि वो तो वहां पर अपने आगे शूद्र से हम उसके

387
00:26:42,480 --> 00:26:46,640
उसका सत्कार करवाएंगे। यदि वहां पर स्पष्टता इत्यादि की मर्यादा

388
00:26:46,640 --> 00:26:50,800
होगी तो। इतनी सी बात नहीं समझ में आ रही है।

389
00:26:50,800 --> 00:26:55,040
लगे अपने ही आदर्श को चुनौती देने। कैसे लोग हो तुम लोग?

390
00:26:55,040 --> 00:26:59,040
तरस आता है। [हंसी] जिस डाल पर बैठे हो उसी को काट रहे हो।

391
00:26:59,040 --> 00:27:03,440
रामायण में मानसा और जो शास्त्रार्थ

392
00:27:03,440 --> 00:27:05,600
महारथी

393
00:27:05,600 --> 00:27:09,760
माधवाचार्य शास्त्री जी लड़ लड़ के मर गए

394
00:27:09,760 --> 00:27:14,000
कि हमारे राम ने कोई गलती नहीं की। हमारे राम ने कोई गलती नहीं की।

395
00:27:14,000 --> 00:27:18,160
वो बुलके ने किताब लिख दी। जैनियों ने किताबें लिख दी। बौद्धों ने किताबें

396
00:27:18,160 --> 00:27:22,240
लिख दी। कि नहीं राम ने भी बाली को छुप के मारा। सबका जवाब दे दे

397
00:27:22,240 --> 00:27:26,240
के वो मरे जा रहे हैं और यहां ये खुद ही उनको मर्यादा का

398
00:27:26,240 --> 00:27:30,400
उल्लंघन करने वाला सिद्ध करने पर तुले हुए हैं ब्रह्म भाव से। अरे ब्रह्म

399
00:27:30,400 --> 00:27:30,900
भाव से

400
00:27:30,800 --> 00:27:34,880
अगर वो दूसरी चीजें कर सकते हैं तो एक से ज्यादा स्त्रियों को ग्रहण क्यों

401
00:27:34,880 --> 00:27:39,040
नहीं कर सकते हैं? अपने वचन से मुकर क्यों नहीं सकते हैं? क्यों

402
00:27:39,040 --> 00:27:43,200
सत्य प्रतिज्ञ होना ना? मुकर जाए अपने वचन से ब्रह्म

403
00:27:43,200 --> 00:27:47,040
भाव से। क्यों?

404
00:27:47,040 --> 00:27:52,560
श्री राम के आदर्श को छीनोगे तुम। इस भागवत आनंद के चक्कर में

405
00:27:52,560 --> 00:27:56,640
शबरी के विषय में सहमत हो गया। किस रूप से सहमत हुआ भाई?

406
00:27:56,640 --> 00:28:00,640
आदि दैविक दैवीय घटना के रूप में यदि आप उसको मान रहे

407
00:28:00,640 --> 00:28:04,720
हैं कि प्रभु श्री राम ने झूठे बैर खाए शबरी के तो

408
00:28:04,720 --> 00:28:08,800
मान लो कोई दिक्कत नहीं है। खूब मानो। कुछ भी मान लो

409
00:28:08,800 --> 00:28:13,120
आदि दैविक स्वरूप से। व्यवहारिक रूप से वो मर्यादा पुरुषोत्तम

410
00:28:13,120 --> 00:28:17,200
श्री राम है। कहीं नहीं माना मैंने कि व्यवहारिक रूप से उन्होंने बेर खाए

411
00:28:17,200 --> 00:28:21,360
थे। फिर से देख लेना उसको घुमा करके और ज्यादा उस बात को खींचा

412
00:28:21,360 --> 00:28:25,360
इसलिए नहीं कि मूल विषय मेरा है निग्रह परंपरा की प्रामाणिकता

413
00:28:25,360 --> 00:28:29,440
यह व्यक्ति भी वो चीजें काट काट के दिखा रहा है जहां

414
00:28:29,440 --> 00:28:33,520
उसका मुंह इतना सा हुआ है उसकी बातें दिखा ही नहीं रहा है

415
00:28:33,520 --> 00:28:37,760
कि वो स्वा अध्ययन से मिला बोल रहा है शास्त्र कहां से मिले स्वा अध्ययन से किसका अध्ययन

416
00:28:37,760 --> 00:28:42,080
किया भाई शास्त्र यदि स्वा अध्ययन से मिले हैं किसका

417
00:28:42,080 --> 00:28:45,680
अध्ययन किया था तुमने

418
00:28:45,680 --> 00:28:49,680
जो शास्त्र मिल गए तुमको को टपक पड़े तुम्हारे पास स्वास ध्यान से शास्त्र

419
00:28:49,680 --> 00:28:53,920
में ले वाह अच्छा अब ये कह रहा है हंसते हुए

420
00:28:53,920 --> 00:28:57,920
कि देखो देखो अब ये प्रश्न करेगा कि भैया वो भुसिंडी रामायण कहां

421
00:28:57,920 --> 00:29:02,160
से प्राप्त हुई क्यों ये प्रश्न कहां से गलत है कौन से शास्त्रीय आधार से प्रश्न गलत

422
00:29:02,160 --> 00:29:07,040
है यहां पे तुम्हारी खिल्ली है ना वही तुम्हारी कमजोरी

423
00:29:07,040 --> 00:29:11,040
प्रस्तुत कर रही है वसुंडी रामायण कहां से प्राप्त हुई देखो क्या प्रश्न

424
00:29:11,040 --> 00:29:15,120
करेगा क्यों प्रश्न नहीं कर सकते क्या प्रामाणिकता है पुसुंडी रामायण की बोलो

425
00:29:15,120 --> 00:29:19,440
ना बिना परम परंपरा के कैसे तुमने मान लिया कि भसुंडी रामायण एक शास्त्र

426
00:29:19,440 --> 00:29:23,520
है। किससे माना? प्रश्न तो यह है ही

427
00:29:23,520 --> 00:29:27,760
नहीं कि तुम किसी का विरोध कर रहे हो या नहीं। प्रश्न तो यह है ही नहीं

428
00:29:27,760 --> 00:29:31,760
कि किस विषय में तुम शास्त्रीय पक्ष तुम्हारा सही है या

429
00:29:31,760 --> 00:29:35,920
दूसरे का सही है। प्रश्न तो यह है कि तुम्हें

430
00:29:35,920 --> 00:29:39,920
शास्त्र, सिद्धांत और मंत्र यह कहां से प्राप्त हुआ

431
00:29:39,920 --> 00:29:44,000
है? उस विषय में तुम्हारा प्रमाण कौन है? यह

432
00:29:44,000 --> 00:29:48,080
व्यक्ति कह रहा है यह जो सवाल है यह गलत है। और फिर आगे क्या कह रहा है? मूर्खता की

433
00:29:48,080 --> 00:29:52,560
पराकाष्ठा आप देखिए। मैं अगर वहां पर एक उदाहरणार्थ

434
00:29:52,560 --> 00:29:56,560
बोल रहा हूं तो फिर गीता प्रेस आपका शब्द प्रमाण हो जाएगा। तो ये व्यक्ति उस शब्द को

435
00:29:56,560 --> 00:30:00,560
पकड़ रहा है। जो मैं सैद्धांतिक प्रश्न कर रहा हूं वो नहीं पकड़ रहा है।

436
00:30:00,560 --> 00:30:01,200
सिद्धांतिक

437
00:30:01,200 --> 00:30:05,360
प्रश्न क्या है? कि यदि भुसुंडी रामायण तुम्हें किसी आचार्य से

438
00:30:05,360 --> 00:30:09,440
प्राप्त नहीं हुई है। तुम स्वतंत्र रूप से मोबाइल इत्यादि से प्राप्त कर रहे हो तो

439
00:30:09,440 --> 00:30:13,440
वह उपलब्ध कराने वाली जो इंटरनेट का जो पोर्टल है, वेबसाइट

440
00:30:13,440 --> 00:30:17,520
है, पीडीएफ है, वो तुम तक पहुंचाने वाला तुम्हारा

441
00:30:17,520 --> 00:30:21,680
शब्द प्रमाण हो जाएगा ना। तुम्हें क्या पता काग भुसुंडी रामायण में क्या लिखा था, क्या नहीं लिखा

442
00:30:21,680 --> 00:30:26,000
था उसको पढ़ने से पहले? यदि तुम मान रहे हो कि प्रमाण

443
00:30:26,000 --> 00:30:30,080
है तुमने किसी से उसको सत्यापित नहीं कराया है तो का बुसनी रामायण में

444
00:30:30,080 --> 00:30:34,400
भेजने वाले ने दो श्लोक बढ़ा दिए हो घटा दिए हो तुमको कैसे पता

445
00:30:34,400 --> 00:30:38,560
भाई मैं तो ये पूछ रहा हूं ना कि बुसुंडी रामायण

446
00:30:38,560 --> 00:30:42,640
तुम्हें प्राप्त कहां से हुई तो हंस रहा है फिर कह रहा है कि गीता प्रेस से अरे गीता

447
00:30:42,640 --> 00:30:46,800
प्रेस से हुई हो गीता प्रेस का कोई छपा हुआ ग्रंथ हो या चौकंबा का हो

448
00:30:46,800 --> 00:30:50,800
या फिर स्वतंत्र रूप से किसी ने और ने कहीं किसी और पब्लिकेशन से के नाम

449
00:30:50,800 --> 00:30:55,120
से वहां डाला हो इंटरनेट पे तुमको तुमको मिल रहा है जिससे भी वो तुम्हारा प्रमाण

450
00:30:55,120 --> 00:30:59,200
सिद्ध हो रहा है ना तो ये व्यक्ति कह रहा है देखो देखो इसको यही नहीं पता है कि वो गीता प्रेस नहीं

451
00:30:59,200 --> 00:31:03,200
छापता है अरे बेवकूफ व्यक्ति मैं वहां पर प्रश्न

452
00:31:03,200 --> 00:31:07,280
ये कर रहा हूं कि वो जिसने भी छापा है जिसने भी उपलब्ध कराया है वो आपका शब्द

453
00:31:07,280 --> 00:31:11,520
प्रमाण हो जाएगा वो चाहेगा तो भुसुंड रामायण के नाम पे आपको

454
00:31:11,520 --> 00:31:15,840
रावण को भी वो चरित्रवान बना देगा तब क्या करोगे क्यों रावण को चरित्रवान

455
00:31:15,840 --> 00:31:16,560
नहीं मानोगे

456
00:31:16,560 --> 00:31:20,560
क्योंकि और किसी ने नहीं माना अच्छा वो जो ग्रंथ है

457
00:31:20,560 --> 00:31:24,720
उसमें भी पब्लिकेशंस पर निर्भर हो जाओगे तो वो

458
00:31:24,720 --> 00:31:28,720
जो चाहेंगे पब्लिकेशन वाले वो लिखेंगे। अच्छा दो में से एक को क्यों किस आधार

459
00:31:28,720 --> 00:31:32,800
पर मान लोगे? सीधी सी बात है पूर्वाचार्यों का समर्थन जिसको प्राप्त

460
00:31:32,800 --> 00:31:37,840
होगा वो तुम्हारे लिए प्रमाणिक शास्त्र होगा।

461
00:31:37,840 --> 00:31:41,840
यह बात तो करनी ही नहीं है। जहां-जहां वो अटक रहे हैं। चार बार में चार उत्तर दे

462
00:31:41,840 --> 00:31:46,080
रहे हैं वहां पे बात करनी नहीं। उसको कट करना है। यहां लिख रहा है। यहां भागवतानंद

463
00:31:46,080 --> 00:31:50,080
ने कहा था कि स्वाधन से शास्त्र प्राप्त हुए हैं। यहां भगवतानंद ने कहा था आचार परंपरा

464
00:31:50,080 --> 00:31:54,080
से हुए तो आचार्य परंपरा पूछी तो चुप हो गए थे। पांच 10 सेकंड का

465
00:31:54,080 --> 00:31:58,160
मौन हो गया था पूरे वातावरण में। धागा लपेटते

466
00:31:58,160 --> 00:32:02,400
हुए मुंह इतना सा बना के बातों का जवाब दे रहे थे। पता चल रहा था कि उत्तर नहीं है इनके पास।

467
00:32:02,400 --> 00:32:06,720
घबराए हुए हैं। विषयंतर करने के अलावा उस चर्चा में भागवतानंद

468
00:32:06,720 --> 00:32:10,720
के पास कुछ नहीं था। कि अगर मैं गलत

469
00:32:10,720 --> 00:32:15,200
हूं तो तुम भी तो गलत हो। तो कहां गया तुम्हारा मतानुज्ञा निग्रह स्थान

470
00:32:15,200 --> 00:32:19,280
अगर दुर्जन तोष न्याय से मान भी लिया जाए शबरी के विषय में बुद्ध के विषय में सब में

471
00:32:19,280 --> 00:32:23,360
मैं गलत हूं तो तुम्हारी प्रमाणिकता सिद्ध हो गई मैंने ये बात बोली भी है इस व्यक्ति ने

472
00:32:23,360 --> 00:32:27,440
यहां पर एक बात और कही है क्या तुम्हारे आचार्यों के हाथ में देवता वो दे जाते हैं नहीं

473
00:32:27,440 --> 00:32:31,600
दे जाते हमारे आचार्य भी पब्लिकेशंस पर या छपे हुए ग्रंथों

474
00:32:31,600 --> 00:32:35,760
पर निर्भर होते हैं। परंतु उन्होंने उनकी प्रामाणिकता को सत्यापित

475
00:32:35,760 --> 00:32:39,840
कराया होता है। अपने पूर्वाचार्यों से अपने पूर्वाचार्यों से उस ग्रंथ को

476
00:32:39,840 --> 00:32:43,840
पढ़ा होता है। तो अगर वो स्वतंत्र रूप से किसी का आह प्रेस से

477
00:32:43,840 --> 00:32:47,840
छपा हुआ ग्रंथ लाएंगे और उनके पूर्वाचार्यों ने मना किया होगा कि

478
00:32:47,840 --> 00:32:51,840
भैया ये सिद्धांत जो है इसके आलोक में तुम कोई भी ग्रंथ पढ़ना तो हम

479
00:32:51,840 --> 00:32:55,840
आराम से वहां देख सकते हैं कि ये विपरीत जा रहा है भाई ये तो पूर्वाचार्य ने मना किया था

480
00:32:55,840 --> 00:32:59,840
ये सिद्धांत है नहीं तो या तो उसका अपने समर्थन में अर्थ निकालेंगे और या फिर

481
00:32:59,840 --> 00:33:04,080
उसको प्रक्षिप्त घोषित करना पड़ेगा कोई भी छाप सकता है ग्रंथ रामपाल

482
00:33:04,080 --> 00:33:08,240
छाप रहा है ग्रंथ वो भी ग्रंथ छाप रहा है

483
00:33:08,240 --> 00:33:12,400
जो अभी जिसको जिसकी किताब का विमोचन जो है प्रधानमंत्री

484
00:33:12,400 --> 00:33:16,880
ने किया है। वह भी ग्रंथ छाप रहा है। उसको भी मान लो तुम छपा हुआ है बस।

485
00:33:16,880 --> 00:33:21,040
अभी वह उसके यहां गए थे। क्या कहते हैं? सत्यम योगी के यहां वो भी दिखा रहा था। मेरा

486
00:33:21,040 --> 00:33:25,120
ग्रंथ मान लो। बुद्ध के विषय में जो इसमें लिखा है वो सत्य है। तो कोई भी अगर कुछ

487
00:33:25,120 --> 00:33:29,520
लिख देगा तो उसको मान ले बिना आचार्यों के द्वारा सत्यापित किए हुए।

488
00:33:29,520 --> 00:33:33,600
और तुम खुद ही कह रहे हो कि हमारी गीता प्रेस में दोष दृष्टि है। इसका मतलब गीता

489
00:33:33,600 --> 00:33:38,000
प्रेस झूठ लिख सकती है। तो जब तक आप उसके ग्रंथ को सत्यापित

490
00:33:38,000 --> 00:33:42,080
नहीं कराओगे स्वतंत्र रूप से अगर ग्रंथ लोगे तो उसकी प्रमाणिकता पर सवाल

491
00:33:42,080 --> 00:33:46,160
बना रहेगा। तो सवाल यह था कि अगर तुमने ग्रंथ प्राप्त अगर

492
00:33:46,160 --> 00:33:46,660
तुम ग्रंथ

493
00:33:46,640 --> 00:33:50,640
को प्रमाणिक मान रहे हो तो किस आधार पर मान रहे हो? अगर तुम्हारा कोई आधार

494
00:33:50,640 --> 00:33:54,640
है तो तुम उसका निग्रह नहीं कर पाओगे क्योंकि जो एक जगह झूठ बोल सकता है वो

495
00:33:54,640 --> 00:33:58,800
गलत ग्रंथ को सत्यापित भी कर सकता है और अगर कोई आधार नहीं

496
00:33:58,800 --> 00:34:03,520
है तो फिर प्रामाणिकता बताओ इसकी सीधी सी बात निग्रह संप्रदाय खत्म

497
00:34:03,520 --> 00:34:07,600
सीधी सी बात थी चर्चा में ही खत्म हो गया और यह व्यक्ति क्या कर रहा है

498
00:34:07,600 --> 00:34:11,680
उसके अंशों को काट रहा है जहां उसकी फालतू की जहां वो निरुत्तर हुआ है ना बिल्ली जैसा

499
00:34:11,680 --> 00:34:15,760
उसका मुंह बना है जहांजहां पर उतने हिस्सों को काट रहा है अब इसने कहा कि मेरे मन

500
00:34:15,760 --> 00:34:19,840
की बात मेरे मुख पर आ ही गई कि भैया जो है तुम अगर खंडन करोगे

501
00:34:19,840 --> 00:34:24,080
तो जो है जो आचार्य गण है उनके

502
00:34:24,080 --> 00:34:28,080
प्रति जो है आस्था कम हो जाएगी यह हो जाएगा वो हो जाएगा ठीक है अब

503
00:34:28,080 --> 00:34:32,320
इसमें क्या कह रहा है मेरे मन की बात है तो क्यों ना हो भाई जब हम

504
00:34:32,320 --> 00:34:36,400
किसी विधर्मी से सामना करते हैं ना आर्य समाजियों से सामना करते हैं

505
00:34:36,400 --> 00:34:40,480
ना तब गुरुओं के प्रति प्रमाण बुद्धि रखना ही

506
00:34:40,480 --> 00:34:44,880
वहां पर काम आता है और देख लो तुमने जो वीडियो बनाया है तुरंत उसको समर्थन

507
00:34:44,880 --> 00:34:48,960
करने लगे आज आर्य समाज वाले क्यों करने लगे क्योंकि

508
00:34:48,960 --> 00:34:53,200
उनका रास्ते का कांटा रामानुज संप्रदाय नहीं है। उनका रास्ते का कांटा

509
00:34:53,200 --> 00:34:57,200
शिवा नारायण द्विवेदी है। जो पूछ रहा है कि वेद मंत्र कहां से मिले?

510
00:34:57,200 --> 00:35:01,280
जिनके मंत्रों पर विश्वास है उनके अर्थ पर विश्वास क्यों नहीं है? जिनके अर्थ पर विश्वास नहीं

511
00:35:01,280 --> 00:35:01,840
है उनके मंत्र

512
00:35:01,840 --> 00:35:05,840
पर विश्वास। क्यों? क्यों? क्यों? शिवश नारायण द्विवेदी खाल उदेड़

513
00:35:05,840 --> 00:35:10,000
रहा है ना इनकी। इसलिए वो तुम्हारा समर्थन करने चले आए। बहुत बढ़िया वीडियो

514
00:35:10,000 --> 00:35:14,240
बनाया भैया। बहुत बढ़िया। स्वतंत्र रूप से व्याख्या कर सकते हैं हम लोग। शास्त्र

515
00:35:14,240 --> 00:35:18,240
कहीं से भी उठाएं उसको शास्त्र का ठप्पा लगा दे और स्वतंत्र रूप से हम लोग उसकी

516
00:35:18,240 --> 00:35:22,320
व्याख्या करेंगे। कह देंगे वैदिक है। ऐसे थोड़ी ना होगा।

517
00:35:22,320 --> 00:35:26,320
आएंगे मैं चला जाऊंगा दूसरा कोई आएगा। पूछेंगे शास्त्रों

518
00:35:26,320 --> 00:35:30,320
की प्रमाणिकता क्या है? मैंने कभी अपने वक्तव्यों में ये नहीं कहा

519
00:35:30,320 --> 00:35:34,320
केवल गुरु केवल गुरु गुरु गोविंद और ग्रंथ। मेरे हर

520
00:35:34,320 --> 00:35:38,400
वीडियो के एंड में एक चित्रपट आता है जिसमें कि मिशन गुरु गोविंद ग्रंथ लिखा

521
00:35:38,400 --> 00:35:42,480
रहता है। उसमें कभी नहीं लिखा कि मिशन गुरु मिशन गोविंद गुरु

522
00:35:42,480 --> 00:35:46,480
गोविंद और ग्रंथ इन तीनों के सामंजस्य से जो प्राप्त होगा वो

523
00:35:46,480 --> 00:35:50,480
धर्म है। अगर सामंजस्यता नहीं है गुरु शास्त्र के विरुद्ध जा रहा

524
00:35:50,480 --> 00:35:54,800
है तो गुरु को भी हटाया हटाना पड़ेगा। शास्त्र यदि गुरु के विरुद्ध जा रहा है तब भी हटाना

525
00:35:54,800 --> 00:35:58,880
पड़ेगा। मगर ये सब तुम्हारे भेजे में तब उतरेगा जब सामने आमने सामने

526
00:35:58,880 --> 00:36:02,880
से बात होगी ना जब आमने सामने से जब बात होगी तब तुम्हारी

527
00:36:02,880 --> 00:36:05,440
जो ये

528
00:36:05,440 --> 00:36:09,600
जो तुच्छ बुद्धि है ना उसका प्रमाण लोगों को दिखाई देगा हम

529
00:36:09,600 --> 00:36:13,760
होने वाली है ना वेट कर रहा हूं मैं है कि यदि हम

530
00:36:13,760 --> 00:36:17,680
सभी आचार्यों में दोष दृष्टि रखेंगे

531
00:36:17,680 --> 00:36:22,160
तो फिर हम किस ये कैसे कह पाएंगे किसी से कि जाकिर

532
00:36:22,160 --> 00:36:26,160
नायक तुम हमारे शास्त्रों का अर्थ नहीं कर सकते हो जब हम वहां पर

533
00:36:26,160 --> 00:36:30,400
यह कहेंगे कि भैया तुम श्वेता शत्रुपनिषद का अर्थ नहीं बताओगे। तुम नातस

534
00:36:30,400 --> 00:36:34,560
प्रतिमा अस्ति का अर्थ नहीं बताओगे बल्कि हमारे परंपरा प्राप्त आचार्य

535
00:36:34,560 --> 00:36:38,720
बताएंगे उसका अर्थ तो वो ये कहेगा कि भैया परंपरा प्राप्त आचार्य

536
00:36:38,720 --> 00:36:42,880
तो शबरी के विषय में अभी झूठ बोल रहे हैं या उनका तो निग्रह

537
00:36:42,880 --> 00:36:46,880
कर रहा है ना निग्रह संप्रदाय वाला यानी कि वो सबके प्रति उनमें

538
00:36:46,880 --> 00:36:50,960
कोई ऐसा नहीं है जिसके प्रति प्रमाण बुद्धि हो तुम्हारी तो मुझसे क्यों कह रहे हो

539
00:36:50,960 --> 00:36:55,360
कि मैं नहीं कर सकता मैं भी करूंगा तो वहां पर अकाट रूप से हम जाकिर

540
00:36:55,360 --> 00:36:59,440
नायक जैसों को उत्तर दे पाएंगे क्या तुम जैसे लोगों की बातें मान लेंगे

541
00:36:59,440 --> 00:37:03,600
तो मैं दूंगा उत्तर वहां कि जो जिनके हम शास्त्र

542
00:37:03,600 --> 00:37:07,920
प्राप्त हुए उन्हीं का अर्थ भी मान्य होगा। जिनके द्वारा शास्त्र प्राप्त हुए हैं

543
00:37:07,920 --> 00:37:12,160
उनका ही अर्थ भी मान्य होगा शास्त्र का। ठीक है? तो शास्त्रों

544
00:37:12,160 --> 00:37:16,320
की अवेलना की बात तो मैंने की ही नहीं कहीं पे। मैं तो यहां पर

545
00:37:16,320 --> 00:37:20,480
यह सवाल उठा रहा हूं कि भैया जब वो बात को जबकि विषय वो चल ही नहीं

546
00:37:20,480 --> 00:37:24,720
रहा है। कि तुमने किसी का विरोध किया कि नहीं किया जो मैंने पहले क्लियर कर दिया।

547
00:37:24,720 --> 00:37:28,720
मगर यदि वहां पर बात आ भी गई है तो वहां मैं क्लियर कर रहा हूं की इससे दिक्कत क्या होती

548
00:37:28,720 --> 00:37:32,720
है जब यह सवाल आ रहा है तुम भागवतानंद का विरोध क्यों कर रहे हो तो

549
00:37:32,720 --> 00:37:36,880
क्योंकि भागवतानंद स्वयं किसी प्रामाणिक संप्रदाय से नहीं है।

550
00:37:36,880 --> 00:37:41,200
ऐसे में वो जब प्रामाणिक आचार्यों के विरुद्ध बोलेगा तो वहां

551
00:37:41,200 --> 00:37:45,360
पर ये दिक्कत आएगी कि भैया वो तो सभी प्रामाणिक संप्रदायों के आचार्यों

552
00:37:45,360 --> 00:37:49,440
में से किसी के प्रति भी प्रमाण बुद्धि नहीं रख रहा है और उसके इस निग्रह

553
00:37:49,440 --> 00:37:53,520
को स्वीकार किया जा रहा है प्रामाणिक आचार्यों के द्वारा प्रमाणिक लोगों

554
00:37:53,520 --> 00:37:57,760
के द्वारा तो फिर मुझसे क्यों कह रहे हो कि मैं भी उनकी सीमा में रहकर के अर्थ करूं नातस

555
00:37:57,760 --> 00:38:01,840
प्रतिमा का या श्वेता शत्रुपनिषद का या मनु स्मृति का

556
00:38:01,840 --> 00:38:05,920
क्यों करूं भाई बिना परंपरा के करूंगा मैं क्यों करूं मैं

557
00:38:05,920 --> 00:38:10,240
उनकी सीमा में रह के अर्थ तब तुम्हारी बत्ती सी खुल जाएगी तब याद आएगी शिवश

558
00:38:10,240 --> 00:38:14,160
भैया बचा लो आ के

559
00:38:14,160 --> 00:38:18,640
कभी भिड़े नहीं हो ना दूसरों से कभी युद्ध में तो निकले नहीं हो

560
00:38:18,640 --> 00:38:22,720
इसलिए ये सब है कोई बात नहीं जो सीख नहीं

561
00:38:22,720 --> 00:38:27,120
पाए मैं सिखा दूंगा तो यहां पर निष्कर्ष क्या निकला अगर संप्रदाय

562
00:38:27,120 --> 00:38:31,200
वाला कोई हमारे आचार्य की कही हुई किसी बात पहली बात तो

563
00:38:31,200 --> 00:38:35,360
संप्रदाय वाले जब खंडन करते हैं तो सैद्धांतिक खंडन करते हैं व्यक्ति

564
00:38:35,360 --> 00:38:39,440
व्यक्तिनिष्ठ को केंद्रित करते व्यक्तिनिष्ठता को केंद्रित करके खंडन नहीं करते वो

565
00:38:39,440 --> 00:38:43,520
कहते हैं भाई मान लो कुछ लोग जो है शबरी को जो है ब्राहणी कह रहे हैं मगर

566
00:38:43,520 --> 00:38:47,520
ब्राह्मणी नहीं वो भीलनी थी का भुसुंडी रामायण के आधार पे इस तरह से करते नाम लेके

567
00:38:47,520 --> 00:38:51,600
तो करते ही नहीं है ये होती है एक मर्यादा फिर भी अगर कर भी देते हैं तो भाई

568
00:38:51,600 --> 00:38:55,600
हम ये मान लेते की भाई वो स्वमत की पुष्टि कर रहे है ठीक है अपने संप्रदाय को मान रहे है ऐसा

569
00:38:55,600 --> 00:38:59,920
वो मान रहे है भैया राम राम जी का जो अवतार था वो लीला पुरुषोत्तम

570
00:38:59,920 --> 00:39:04,000
था मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं था हमारे यहां तो राम जी को मर्यादा

571
00:39:04,000 --> 00:39:08,240
पुरुषोत्तम माना जाता है और यदि यदि वो सामना करेंगे तो वहां पर प्रतिकार

572
00:39:08,240 --> 00:39:13,840
कर देंगे हम रखेंगे भगवान राम के चरित्र के लिए लड़ेंगे

573
00:39:13,840 --> 00:39:18,240
भगवान राम ने कभी मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया व्यवहारिक रूप से

574
00:39:18,240 --> 00:39:23,680
ब्रह्म भाव से वही कृष्ण के रूप में सब कुछ कर रहे हैं ये है धर्म

575
00:39:23,680 --> 00:39:27,920
ठीक है तो अगर संप्रदाय विहीन व्यक्ति

576
00:39:27,920 --> 00:39:29,360
ये करेगा तो उससे

577
00:39:29,360 --> 00:39:33,840
दिक्कत ये आएगी कि हम ये नहीं कह पाएंगे भैया वो स्वमत की पुष्टि के लिए ऐसा कर रहा है

578
00:39:33,840 --> 00:39:37,840
उसका सहारा लेकर हर समाजी आएंगे कहेंगे वो भी तो निग्रह कर

579
00:39:37,840 --> 00:39:42,160
रहा है उसका तुमने कैसे स्वीकार कर लिया

580
00:39:42,160 --> 00:39:46,480
ठीक है जाकिर नायक भी आएगा ये मेरी बात

581
00:39:46,480 --> 00:39:50,560
थी कि अगर वो ऐसा कर रहा है परंपरा प्राप्त प्रमाणिक आचार्यों के विषय

582
00:39:50,560 --> 00:39:54,560
में अनास्थावान बना रहा है हम अगर वो कह

583
00:39:54,560 --> 00:39:58,640
रहा है कि शंकराचार्य जी झूठ बोलते हैं मोह में आसक्त हो गए हैं तो उनका

584
00:39:58,640 --> 00:40:03,200
सन्यासत्व सिद्ध होता है क्या सन्यासी सिद्ध होते हैं क्या वो

585
00:40:03,200 --> 00:40:07,200
और उसने साचारों पीठों के लिए कुछ ना कुछ बोला अन्गल तो

586
00:40:07,200 --> 00:40:11,360
कोई भी शंकराचार्य वर्तमान में है ही नहीं सन्यासी है ही नहीं क्योंकि

587
00:40:11,360 --> 00:40:16,480
ये सब बातें तुम जैसे तुच्छ दिमाग वालों को कहां समझ में आएंगी

588
00:40:16,480 --> 00:40:20,880
अगर तुम किसी पर मोह में आसक्ति का बोध लगा रहे हो आरोप कि वो आसक्त

589
00:40:20,880 --> 00:40:24,880
है अपने परिकरों के प्रेम में या फिर वो कुंठा में है ज्योतिष पीठ

590
00:40:24,880 --> 00:40:30,880
वाले या शंगेरी वाले अमुक्त कारण से है तो

591
00:40:31,040 --> 00:40:35,040
क्या वो सन्यासी सिद्ध हो रहे हैं तो लक्षण

592
00:40:35,040 --> 00:40:40,000
संप सन्यासी सिद्ध नहीं होंगे तो चारों पीठे खा लिए खत्म हो गया

593
00:40:40,000 --> 00:40:44,080
आदि शंकराचार्य का संप्रदाय उनके विषय में कौन प्रमाणिक है क्या बात प्रमाणिक

594
00:40:44,080 --> 00:40:44,580
है क्या

595
00:40:44,400 --> 00:40:48,400
नहीं है कौन बताएगा किस पे क्या भरोसा करें सब अपनी मन मर्जी चलाएंगे नहीं नहीं आदि

596
00:40:48,400 --> 00:40:52,400
शंकराचार्य जी ने ये कहा था मेरी मान लो आदि शंकराचार्य जी ने वो कहा था वो मान लो फिर तो उसको ही

597
00:40:52,400 --> 00:40:56,480
मान लेना सत्यम योग को जो कह रहा है कि विशिष्टा

598
00:40:56,480 --> 00:41:00,640
द्वैत बकवास है उसको ही मान लेना

599
00:41:00,640 --> 00:41:05,200
चलो अब बात आती

600
00:41:05,200 --> 00:41:09,440
कि इसने कहा कि थोड़ा आत्मनिरीक्षण करो बालक।

601
00:41:09,440 --> 00:41:13,440
ठीक है? वो बालक कौन है और व्ययस्क कौन

602
00:41:13,440 --> 00:41:17,920
है? ये सब तो जब सामना आमनासामना होगा तो पता चलेगा ही। मैं

603
00:41:17,920 --> 00:41:22,000
इस तरीके से निर्णायक नहीं बनता हूं। पर इसने

604
00:41:22,000 --> 00:41:26,480
एक बात कही कि भाई तुम्हारी अपनी व्यक्तिगत श्रद्धा के कारण क्या जो है पूर्वाचार्यों

605
00:41:26,480 --> 00:41:30,480
ने व्यास इत्यादि सरीखे जो आचार्यों ने लिख लिखा है उसमें श्रद्धा

606
00:41:30,480 --> 00:41:34,480
बंद कर दें। मैंने वहां कहा है कि उसमें सिद्धा मत रखो। मैं

607
00:41:34,480 --> 00:41:38,960
प्रश्न यह कह रहा हूं कि यदि तुम काउंटर कर रहे हो तो तुम्हारे पास काउंटर

608
00:41:38,960 --> 00:41:43,040
करने का जो आधार है तुम शास्त्र जिसको बता रहे हो उस शास्त्र के लिए तुम

609
00:41:43,040 --> 00:41:47,120
किस पर निर्भर करते हो? क्योंकि मैं तुम्हें वहां लाना चाह रहा हूं जहां पर तुम्हारा निग्रह

610
00:41:47,120 --> 00:41:51,200
समाप्त होगा और जहां पर तुम्हारे निग्रह संप्रदाय की प्रमाणिकता खत्म होगी। जब

611
00:41:51,200 --> 00:41:55,360
तुम निग्रह नहीं कर सकते किसी भी एक आचार्य का यदि तुम निग्रह नहीं करोगे तो

612
00:41:55,360 --> 00:41:59,520
निग्रह संप्रदाय समाप्त हो जाएगा। कैसे करोगे?

613
00:41:59,520 --> 00:42:03,600
तुमने खुद ही भूक के रखा है ना तो यह व्यक्ति कह रहा है तुम्हारी

614
00:42:03,600 --> 00:42:07,680
अपनी मैंने कब कहा भाई शास्त्रों में ना रखो भाई मैं शास्त्रों का तुम्हें उदाहरण

615
00:42:07,680 --> 00:42:12,160
दूंगा शास्त्रों के तुम्हें प्रमाण दूंगा मगर अभी विषय चल रहा है निग्रह

616
00:42:12,160 --> 00:42:16,240
संप्रदाय की प्रामाणिकता इसलिए मैं उन विषयों को छेड़ नहीं

617
00:42:16,240 --> 00:42:21,520
रहा हूं और भी मैंने बहुत से विषयों को नहीं छेड़ा उसने खूब कोशिश की

618
00:42:21,520 --> 00:42:25,520
उसने भी आरोप लगाया कि तुमने मेरे ऊपर ये जोधपुर गए वो कहे मैंने इन सब

619
00:42:25,520 --> 00:42:30,080
बातों में क्यों नहीं छुआ इन सब बातों को फिर और भटकता मामला

620
00:42:30,080 --> 00:42:34,080
तो इसलिए मैं बार-बार मूल प्रश्न पर आ रहा हूं और यह व्यक्ति उसके उन दृश्यों को

621
00:42:34,080 --> 00:42:38,960
काट दे रहा है जब मैं मूल प्रश्न पे आ रहा हूं। शास्त्र मिले कहां से आपको?

622
00:42:38,960 --> 00:42:43,120
अब इसने एक बात और कही है कि श्रद्धाहीन जो होता है उसको जो है प्रश्न नहीं

623
00:42:43,120 --> 00:42:47,440
प्रश्न का जवाब नहीं दिया जाता है। तो क्या मेरे वहां आने से पहले भागवतानंद

624
00:42:47,440 --> 00:42:51,680
को नहीं मालूम था कि मैं निग्रह संप्रदाय में श्रद्धा नहीं रखता हूं। कैसी मूर्खों

625
00:42:51,680 --> 00:42:55,760
वाली बातें कर रहा है भाई। और फिर मुझे बालक कह रहा है।

626
00:42:55,760 --> 00:42:59,920
अच्छा दूसरी बात यह है कि भगवत गीता में भी कहा गया है कि भगवत गीता श्रद्धा

627
00:42:59,920 --> 00:43:04,000
श्रद्धावान को ही सुनाएं। श्रद्धावान का मतलब क्या होता है? एक

628
00:43:04,000 --> 00:43:08,080
बच्चा जो जन्म लिया है क्या वो श्रद्धावान होता है? तो उसको क्यों सुनाते

629
00:43:08,080 --> 00:43:12,160
हैं हम भगवान के दृश्य क्यों बताते हैं? भगवत वचन क्यों

630
00:43:12,160 --> 00:43:14,720
बताते हैं? भगवान की लीलाएं क्यों बताते

631
00:43:14,720 --> 00:43:18,720
हैं उसको? श्रद्धाहीन और श्रद्धावान होने

632
00:43:18,720 --> 00:43:22,960
के विषय में केवल इतना अर्थ ग्रहण किया जा सकता है कि जो व्यक्ति

633
00:43:22,960 --> 00:43:28,240
अपनी आत्मा के अंदर से उठने वाले सवाल है असतो मा सद्गमया तस ज्योतिर्गमया

634
00:43:28,240 --> 00:43:32,640
जो व्यक्ति इन सवालों को सुन रहा है अपनी आत्मा की आवाज को सुन रहा है उसको शास्त्रीय

635
00:43:32,640 --> 00:43:36,800
विषय या उसको जो है आध्यात्मिक विषय बताने चाहिए और जो

636
00:43:36,800 --> 00:43:40,800
व्यक्ति अपनी आत्मा की आवाज को ही नजरअंदाज कर रहा है मुझे तो एसी लाना है टीवी लाना है फ्रिज

637
00:43:40,800 --> 00:43:45,120
लाना है मुझे मत बता भाई तू असुतोमा सद में वो व्यक्ति श्रद्धावान

638
00:43:45,120 --> 00:43:49,200
है क्योंकि वो अपनी आत्मा की आवाज को ठुकरा रहा है। क्योंकि हर व्यक्ति भगवान के विषय में

639
00:43:49,200 --> 00:43:53,440
जानने से पहले भगवान के प्रति अश्रद्धावान होता है। फिर किसको पढ़ाओगे

640
00:43:53,440 --> 00:43:57,600
गीता? किसको पढ़ाओगे गीता बताओ?

641
00:43:57,600 --> 00:44:02,320
हर व्यक्ति भगवान को जानने से पहले तक भगवान के प्रति अश्रद्धावान

642
00:44:02,320 --> 00:44:06,320
ही होता है। कोई प्रारब्ध के कारण कोई दिव्यता

643
00:44:06,320 --> 00:44:10,400
के कारण कोई अगर जन्म ले लिया तो बात अलग है। मगर जिसके अगर वो जन्म लिया

644
00:44:10,400 --> 00:44:14,560
है तो वो जो दिव्यता उससे जुड़ी हुई है उससे पूर्व तक वो भी उस हिस्से में भी

645
00:44:14,560 --> 00:44:18,720
वो अश्रद्धावान ही सिद्ध होगा। जब तक उसे भगवत चर्चा

646
00:44:18,720 --> 00:44:22,800
नहीं करोगे तो ये वाला कुतर्क है। सबसे

647
00:44:22,800 --> 00:44:26,960
पहली बात तो कि श्रद्धावान को ही बताया जाए। दूसरी बात श्रद्धावान मैं

648
00:44:26,960 --> 00:44:29,920
पहले से ही नहीं था। जब चर्चा में तुम प्रश्नों

649
00:44:29,920 --> 00:44:34,160
में अटक रहे हो तब जो है कह रहे हो कि तुम श्रद्धावान नहीं हो। क्यों?

650
00:44:34,160 --> 00:44:38,880
जब मैंने शुरुआत में कहा था कि भैया जिज्ञासा शांत करो।

651
00:44:38,880 --> 00:44:43,120
जिज्ञासा बोला था ना कि उसमें प्रकाश डालो। जिज्ञासाएं दूसरी है। जिज्ञासा

652
00:44:43,120 --> 00:44:47,280
मैं नहीं दूंगा जवाब। तुम श्रद्धावान नहीं हो। और दूसरी

653
00:44:47,280 --> 00:44:51,360
बात भागवतानंद ने कहा है अपने वीडियो में कि मैं तो पूरी शंकराचार्य

654
00:44:51,360 --> 00:44:55,520
जी के संबंध में जो है अपना शिष्य होने का कर्तव्य निभा रहा हूं। क्या कर्तव्य

655
00:44:55,520 --> 00:44:59,760
निभाया भाई तूने? तू गया उनके पास श्रद्धावान एक शिष्य की तरीके

656
00:44:59,760 --> 00:45:03,760
से ह तुझे मिलने नहीं दिया गया तो तू

657
00:45:03,760 --> 00:45:06,800
बागी हो गया।

658
00:45:06,800 --> 00:45:12,480
करत करत अभ्यास जड़मति हो सुजान रस आवत जात ते सिल परान

659
00:45:12,480 --> 00:45:16,480
श्रद्धावान शिष्य बन के दिखाता वहां क्यों नहीं बनाता

660
00:45:16,480 --> 00:45:20,480
फिर तू क्यों चाहता है कि तेरे विषयों का जो पूरी के शंकराचार्य जी खंडन करें जिससे

661
00:45:20,480 --> 00:45:24,880
तेरा और चमक जाए वो तेरा जो तथाकथित कपोल

662
00:45:24,880 --> 00:45:29,120
कल्पित संप्रदाय है हं वो अपने स्तर से उतर

663
00:45:29,120 --> 00:45:33,440
आए नीचे तेरे जैसों को मुंह लगाएं

664
00:45:33,440 --> 00:45:37,520
अच्छा अब इसने कहा कि जो मजाक उड़ाने के लिए आया है, जो विरोध

665
00:45:37,520 --> 00:45:41,680
करने के लिए आया है या जो श्रद्धावान नहीं है, उसको क्यों दिया जाए?

666
00:45:41,680 --> 00:45:45,120
उपदेश क्यों किया जाए? तो भाई शुरू के उपदेश क्यों किए

667
00:45:45,120 --> 00:45:49,360
गए? जो शुरुआत में उपदेश दिए गए मैंने पहले भी बताया कि उपदेश

668
00:45:49,360 --> 00:45:53,520
क्यों किए गए? अब इसमें एक बात इसने और कही है कि उनको याद है

669
00:45:53,520 --> 00:45:57,680
शास्त्र पर तुम्हारे कहने पर वो क्यों सुनाएं। पहली बात तो उसका याद

670
00:45:57,680 --> 00:46:01,680
होना सिद्ध नहीं होता क्योंकि वो मोबाइल में देख- देख के उसके बहुत सारे वीडियोस है।

671
00:46:01,680 --> 00:46:06,000
मोबाइल में देख- देख के वो शादी कर रहा था। अपनी फेरे ले रहा था। उसको तो याद

672
00:46:06,000 --> 00:46:10,320
थे शास्त्र। क्यों मोबाइल में देखदेख के फेरे लिए भैया उसने? अच्छा

673
00:46:10,320 --> 00:46:14,480
दूसरी बात तो ये ये अपने आप में एक हंसी की बात है।

674
00:46:14,480 --> 00:46:18,560
यहां पर ये जो है इस बात का पोषण कर रहा है कि उसको सारे शास्त्र याद

675
00:46:18,560 --> 00:46:22,720
है। वाह भाई वाह। उसको महाभारत ये छह छह खंडों में जो रखी हुई

676
00:46:22,720 --> 00:46:26,800
है। ये सब श्लोक क्रमांक सहित उसको याद है। बहुत बढ़िया। बहुत बढ़िया। अच्छा जा रहे हो।

677
00:46:26,800 --> 00:46:31,200
ये अच्छा तुमने किया। यहां पर अपनी मूर्खता को यहां प्रदर्शित कर दिया। भागवतानंद

678
00:46:31,200 --> 00:46:35,200
को अपने तमाम जितना भी वैदिक वांगम में है सब रटा डाला है भगवती की

679
00:46:35,200 --> 00:46:39,440
कृपा से हां बहुत बढ़िया अच्छी बात है तभी वो मोबाइल

680
00:46:39,440 --> 00:46:43,440
में देख देख कर जो है वीडियो बनाता है अच्छा दूसरी बात क्या कह रहा है कि

681
00:46:43,440 --> 00:46:47,440
श्रद्धावान जो नहीं है उसको क्यों सुना दें तो भाई वहां पर ये नहीं कहा

682
00:46:47,440 --> 00:46:51,520
गया कि शास्त्र मत सुनाना उसके कहने पर वहां तो यह कहा जा रहा है उपदेश

683
00:46:51,520 --> 00:46:55,680
ही मत करना तो क्यों कर रहे हो उपदेश बात सीधी सी यह

684
00:46:55,680 --> 00:46:59,920
है कि जब तक तुम्हारे अंदर भूता रहा तथा

685
00:46:59,920 --> 00:47:00,420
तब

686
00:47:00,240 --> 00:47:04,240
तक तुम भूकते रहे और उसके बाद जहां तुम देखा

687
00:47:04,240 --> 00:47:08,800
हमारा मामला तो फेल हो रहा है तो भैया जो है यहां क्या करते हैं

688
00:47:08,800 --> 00:47:13,040
ना कुरियात सस भाषणम जो है हम

689
00:47:13,040 --> 00:47:17,120
जो है जो श्रद्धावान नहीं है उसको जो है वो बताने के लिए मना किया गया

690
00:47:17,120 --> 00:47:22,240
है ठीक है अच्छा जो श्रद्धावान नहीं है उससे शास्त्रार्थ क्यों किया जाए

691
00:47:22,240 --> 00:47:26,400
शास्त्रार्थ तो होता ही उससे है जो आपके मत में श्रद्धा नहीं रखता है

692
00:47:26,400 --> 00:47:30,480
तो शास्त्रार्थ होगा ही नहीं कभी फिर तुम शास्त्रार्थ की बात क्यों कह रहे हो कि

693
00:47:30,480 --> 00:47:34,640
हम शास्त्रार्थ करेंगे जाकर के निग्रह करेंगे

694
00:47:34,640 --> 00:47:40,640
चर्चा क्यों करोगे तुम किसी से पक्ष विपक्ष की बात क्यों करोगे

695
00:47:41,040 --> 00:47:45,120
यह सब बातें नहीं करनी है अब यह व्यक्ति कह रहा है कि वो जो भी बोल रहे हैं

696
00:47:45,120 --> 00:47:49,440
शास्त्र का संदर्भ देते हुए ही तो बोल रहे हैं तो शास्त्र को क्यों सुना है

697
00:47:49,440 --> 00:47:53,520
बात ये नहीं है कि वो शास्त्रों से बोल रहे हैं कि नहीं बोल रहे हैं बात ये है

698
00:47:53,520 --> 00:47:57,600
कि उसको शास्त्र क्या भगवती की कृपा से सारे शास्त्र उसको या

699
00:47:57,600 --> 00:48:01,680
अतीत जन्मांतर से सारे शास्त्र उसको रटे हुए हैं कि नहीं रटे हुए हैं

700
00:48:01,680 --> 00:48:06,080
क्योंकि वो कह रहा है कि मैं शास्त्रों के विषय में जो है अतीत जन्मांतर पर निर्भर हूं। शास्त्रों

701
00:48:06,080 --> 00:48:10,320
के विषय में भगवती पर निर्भर हूं। तो उसके पास पहले से वो शास्त्र है। तो फिर वो मोबाइल

702
00:48:10,320 --> 00:48:14,400
क्यों देख रहा है? इसलिए कहा जा रहा है कि शास्त्र तुम सुना दो अगर तुमको

703
00:48:14,400 --> 00:48:18,480
मालूम है तो है ना? तो वहां पर बात को कहां ले जा रहा है कि जो वो बोल रहे हैं

704
00:48:18,480 --> 00:48:22,800
वो जो है शास्त्रों में है नहीं क्या? विषय यह नहीं है कि वो शास्त्रों में है कि नहीं। विषय

705
00:48:22,800 --> 00:48:27,040
यह है कि शास्त्रों के लिए तुमने बताया है कि मैं अपने अतीत जन्मांतर

706
00:48:27,040 --> 00:48:31,120
से मेरे को प्राप्त है शास्त्र मैं कहीं नहीं लेने गया। तुम्हारी इस बात को काउंटर

707
00:48:31,120 --> 00:48:35,120
करने के लिए वहां पूछा जा रहा है और ये लगे वहां पर जो

708
00:48:35,120 --> 00:48:39,600
फिल्मी दुनिया के साइड हीरो आते थे ना

709
00:48:39,600 --> 00:48:43,600
वो आए अपना साइड रोल निभाने के लिए। चलिए अब इसने फिर मेरे उस शब्द को

710
00:48:43,600 --> 00:48:47,760
पकड़ा कि तुम परंपरा का विरोध कर रहे हो। अरे भैया वहां पर मेरा

711
00:48:47,760 --> 00:48:51,840
कहने का तात्पर्य यही है कि परंपरा का विरोध कर रहे हो। परंपरा प्राप्त आचार्यों का

712
00:48:51,840 --> 00:48:55,920
विरोध कर रहे हो। विषय वो है ही नहीं। विषय तो यह

713
00:48:55,920 --> 00:48:56,420
है

714
00:48:56,080 --> 00:49:00,640
कि तुम शास्त्र के लिए किस पर निर्भर करते हो। मैं यहां भी वही बात बार-बार बोल रहा हूं।

715
00:49:00,640 --> 00:49:04,640
ठीक है? फिर ये कह रहा है कि भैया इसको जब पूर्व में बता दिया गया है कि

716
00:49:04,640 --> 00:49:08,800
परंपरा का विरोध नहीं। परंपरा से जुड़े हुए लोगों का विरोध हो रहा है।

717
00:49:08,800 --> 00:49:13,040
तो मैंने समझा दिया है कि शंकराचार्य का रामानुजाचार्य की गद्दी

718
00:49:13,040 --> 00:49:17,040
पर बैठने वाला मधवाचार्य की गद्दी पर बैठने वाले का अगर तुम विरोध कर रहे हो तो परंपरा

719
00:49:17,040 --> 00:49:21,120
का विरोधी माना जाएगा। तुम उसके किसी अनुयाई का विरोध नहीं कर

720
00:49:21,120 --> 00:49:25,120
रहे हो। उसके निर्णायक का विरोध कर रहे हो। जो उसका ब्रेन है उसका

721
00:49:25,120 --> 00:49:29,120
विरोध कर रहे हो। जो उसका सीपीयू है उसका विरोध कर रहे हो। उसके रूप में तुम

722
00:49:29,120 --> 00:49:33,280
भगवत आदि शंकराचार्य का विरोध कर रहे हो। तो या तो तुम यह कह रहे हो कि इस

723
00:49:33,280 --> 00:49:37,280
समय जो संप्रदाय है वो खत्म हो चुका है। अगर वो सन्यासी

724
00:49:37,280 --> 00:49:41,360
ही नहीं है और यदि वो सन्यासी हैं। ये तुम मान रहे हो कि वो सन्यासी

725
00:49:41,360 --> 00:49:45,840
हैं तो फिर तुम्हें मानना पड़ेगा कि उनके रूप में भगवत पाद आदि शंकराचार्य

726
00:49:45,840 --> 00:49:49,920
जी ही हैं। तो तुम जो विरोध कर रहे हो वो उनका विरोध कर रहे हो। उनकी परंपरा का विरोध

727
00:49:49,920 --> 00:49:54,160
सिद्ध हो जाता है। फिर भी मैंने वहां पर जो परंपरा शब्द का विरोध का उपयोग किया था

728
00:49:54,160 --> 00:49:58,400
वह इस रूप में किया था कि तुम परंपरा प्राप्त आचार्यों का विरोध कर रहे हो।

729
00:49:58,400 --> 00:50:02,480
मगर वहां पे इस पर ध्यान ना देते हुए देखो देखो इसको समझा दिया गया फिर से वही बात बोल

730
00:50:02,480 --> 00:50:06,560
रहा है। अरे भैया विरोध कर रहे हो ना परंपरा प्राप्त आचार्य का

731
00:50:06,560 --> 00:50:10,800
शास्त्र के आधार पे वो शास्त्र शास्त्र है। तुमने कैसे तय किया?

732
00:50:10,800 --> 00:50:11,300
प्रश्न

733
00:50:11,200 --> 00:50:15,440
यह है क्योंकि जब तुम जैसे ही बोलोगे ऐसे तय किया वो ऐसे

734
00:50:15,440 --> 00:50:19,520
के चक्कर में तुम्हारा निग्रह हो जाएगा। खत्म। और निग्रह खत्म

735
00:50:19,520 --> 00:50:23,760
निग्रह संप्रदाय खत्म। यह बात मैंने भी वीडियो में वहां पर कही

736
00:50:23,760 --> 00:50:28,400
कि भाई तुम उसका विरोध मैंने जब परंपरा का विरोध पूछा गया तो मैंने वहां समझाया

737
00:50:28,400 --> 00:50:32,480
कि तुम उसका विरोध कर रहे हो जो परम जो शंकराचार्य की गद्दी पर बैठने वाला

738
00:50:32,480 --> 00:50:36,480
जिसका समर्थन कर रहे हैं। तो तुम उसका विरोध कर रहे हो तो तुम शंकराचार्य का विरोध कर

739
00:50:36,480 --> 00:50:40,560
रहे हो। शंकराचार्य का विरोध कर रहे हो। शंकराचार्य परंपरा का विरोध कर रहे हो। अब ये व्यक्ति

740
00:50:40,560 --> 00:50:44,640
यहां पर हमें यह भी बताएगा आकर के कि भैया तुम्हारे वो आपस में वो चीजें मान्य है

741
00:50:44,640 --> 00:50:48,640
कि नहीं। तो इस हिसाब से रामानुज में रामानुज रामानुजाचार्यों में

742
00:50:48,640 --> 00:50:52,800
रामानुज संप्रदाय के जितने भी प्रमाणिक आचार्यों में जरा जरा सा भी भेद हो तो किसी

743
00:50:52,800 --> 00:50:56,880
भी बात को वहां की को प्रामाणिक मानेंगे ही नहीं। चाहे भले ही वो रामानुजाचार्य कह

744
00:50:56,880 --> 00:51:00,880
रहे हो यानी कि चाहे भले ही वो विद्या भास्कर जी कह रहे हो राघवाचार्य जी कह रहे हो मानेंगे

745
00:51:00,880 --> 00:51:04,880
ही नहीं। क्योंकि भेद है ना उसमें तो अरे भैया

746
00:51:04,880 --> 00:51:09,280
वस्तुनिष्ठ चीजों में वर्तमान की जानकारियों को लेकर के भेद है।

747
00:51:09,280 --> 00:51:13,600
सिद्धांतिक भेद नहीं है। शास्त्रीय अर्थ के रूप में भेद नहीं है। और यदि भेद

748
00:51:13,600 --> 00:51:17,760
होगा भी तो उसमें वहां माना जाएगा कि एक ही तत्व ने अपना ही

749
00:51:17,760 --> 00:51:21,760
खंडन किया है। शंकराचार्य ने खंडन किया है तो वहां स्वीकार कर लिया जाएगा कि

750
00:51:21,760 --> 00:51:26,000
भैया जो जिसका गुरु जो जिसका शिष्य है वो अपने क्या कहते

751
00:51:26,000 --> 00:51:27,280
हैं

752
00:51:27,280 --> 00:51:31,600
उसमें श्रद्धा रखे। जैसे कि भागवतानंद ने कहा मधवाचार्य

753
00:51:31,600 --> 00:51:35,600
मधवाचार्य जी ने इनका खंडन किया। उनका खंडन किया तो भागवतानंद ने कहा कि भैया

754
00:51:35,600 --> 00:51:39,760
भगवत अवतार आपस में एक ही तत्व दूसरे अपने दूसरे रूप का खंडन कर रहा है। उसमें

755
00:51:39,760 --> 00:51:42,800
हम कैसे बोले?

756
00:51:42,800 --> 00:51:46,880
अब इस व्यक्ति ने कहा है कि भाई अपया दीक्षित जी ने भी

757
00:51:46,880 --> 00:51:51,120
विष्णु धर्मत्तर पुराण के एक श्लोक को कोट किया है और उसको

758
00:51:51,120 --> 00:51:55,200
जो है माना है कि वो भीलनी है। तो

759
00:51:55,200 --> 00:51:59,360
सबसे पहली बात तो यह आती है कि एक तरफ ये

760
00:51:59,360 --> 00:52:03,600
ये खुद कह रहा है कि जो है पूर्वाचार्यों वो आचार्यों से गलती

761
00:52:03,600 --> 00:52:07,760
हो सकती है। फिर हमको एक प्रयास कर रहा है। हमको

762
00:52:07,760 --> 00:52:12,240
मजबूर कर रहा है कि हम जो है उसके द्वारा जिस रूप में भी हमारे किसी पूर्वाचार्य

763
00:52:12,240 --> 00:52:16,320
का कथन है उसी रूप में उसको मान लें क्योंकि वो पूर्वाचार्य का कथन है। जबकि खुद

764
00:52:16,320 --> 00:52:20,640
ही आचार्यों में दोष दृष्टि रख रहा है। दूसरी बात ये है कि अपया दीक्षित

765
00:52:20,640 --> 00:52:24,640
जी ने क्या कहा है? क्या नहीं कहा है? ये तो हमें कोई उनकी परंपरा

766
00:52:24,640 --> 00:52:28,640
से जिन्होंने उनसे प्रामाणिक रूप से गुरुगम्य विद्या के द्वारा अध्ययन किया

767
00:52:28,640 --> 00:52:32,800
होगा। वही बताएगा ना। मेरा यही यही प्रश्न था वहां पर। तुमको कैसे

768
00:52:32,800 --> 00:52:37,040
पता पाया दीक्षित जी ने क्या कहा है? क्या नहीं कहा है? तीन बेर खाती

769
00:52:37,040 --> 00:52:41,200
थी वो तीन बेर खाती है बैरन बास की बांसुरिया गिरजा मुख चूमत बनवारी

770
00:52:41,200 --> 00:52:42,320
गिरजा अर्थ गिरजा

771
00:52:42,320 --> 00:52:46,480
का अर्थ है उमा गिरजा मुख चूमत बनवारी इसका अर्थ

772
00:52:46,480 --> 00:52:50,640
ले लिया जाए कि गिरजा जो है मुमा जो है मनारी का मुख चूम रही है या

773
00:52:50,640 --> 00:52:56,640
इसका अर्थ ये लिया जाएगा कि जो बैरन बास की बांसुरिया वो गिरजा

774
00:52:56,720 --> 00:53:00,880
इसके लिए हमको अपनी बात को प्रामाणिक दोनों अर्थ निकल रहे हैं मगर

775
00:53:00,880 --> 00:53:04,960
प्रामाणिक मानने के लिए किसी परंपरा प्राप्त आचार्य का सहारा लेना

776
00:53:04,960 --> 00:53:08,960
पड़ेगा तो उन्होंने पहली बात तो वहां पर उसको

777
00:53:08,960 --> 00:53:13,520
भीलनी माना ही नहीं है। और दूसरी बात अगर

778
00:53:13,520 --> 00:53:17,600
मैं इस बात के लिए वहां पर लडूंगा तो जो मुख्य विषय है कि

779
00:53:17,600 --> 00:53:21,600
तुम शास्त्रों के लिए किस पर निर्भर करते हो वो तो गौण होता चला जा रहा है और

780
00:53:21,600 --> 00:53:25,760
यही उसका मंतव्य था और यही ये व्यक्ति यहां कर रहा है। उसके जो दृश्य

781
00:53:25,760 --> 00:53:30,960
है विफल होने वाले असफलता वाले उनको काटता चला जा रहा है।

782
00:53:30,960 --> 00:53:35,360
और जो विषयांतर कर करके वो जो लाद रहा है विषय से भटकाने

783
00:53:35,360 --> 00:53:39,360
के लिए उन पर केवल बात कर रहा है। हां और

784
00:53:39,360 --> 00:53:43,600
जो यह इसका कहना है कि अरे भाई अगर वह ब्राह्मण

785
00:53:43,600 --> 00:53:47,840
थी भीनी नहीं थी तो उस विषय में शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध क्यों करूं वहां पर वहां

786
00:53:47,840 --> 00:53:51,840
तो विषय चल रहा है ना निग्रह संप्रदाय की प्रमाणिकता पांच मिनट

787
00:53:51,840 --> 00:53:56,160
की बहस है वो केवल पांच मिनट की और खत्म है उसमें उसका संप्रदाय

788
00:53:56,160 --> 00:53:57,440
केवल इधर उधर भटकाव

789
00:53:57,440 --> 00:54:01,440
के लिए दूसरी बातें की गई है निग्रह संप्रदाय की प्रामाणिकता के विषय में

790
00:54:01,440 --> 00:54:06,080
क्या बात हुई भाई वहां पर तुम अलग से वीडियो बना करके खूब बोल लो प्रामाणिकता

791
00:54:06,080 --> 00:54:10,240
के विषय में वहां पर क्या-क्या बातें हुई है और अगर श्रद्धावान के सामने

792
00:54:10,240 --> 00:54:14,960
बातें होनी नहीं थी तो फिर क्यों वहां पर शुरू की गई बात

793
00:54:14,960 --> 00:54:19,040
व्यक्ति कह रहा है कि स्वतंत्र रूप से जो है ग्रंथ पढ़ के उसका अर्थ समझ में

794
00:54:19,040 --> 00:54:23,040
आ सकता है यही तो आर्य समाज जी कहते हैं क्या

795
00:54:23,040 --> 00:54:28,160
अंतर है आर्य समाज जी और तुम में क्या फायदा परंपरा का सहारा लेने का

796
00:54:28,160 --> 00:54:32,160
जो संप्रदाय विहीन हो गुरु परंपरा विहीन हो उसको

797
00:54:32,160 --> 00:54:36,240
त्याग देना चाहिए शंकराचार्य जी ने कहा 13वा अध्याय दूसरा श्लोक अपने

798
00:54:36,240 --> 00:54:40,240
भगवत गीता भाष्य में अच्छा तुमने कहा कि मैंने चार

799
00:54:40,240 --> 00:54:44,400
अध्याय पढ़े हैं और मैं जो है आगे जो है और पढ़ लेता हूं तो उसमें मेरी चीज को संदिग्ध

800
00:54:44,400 --> 00:54:48,800
माना जाएगा क्या? तो मेरे भाई तुम गुरुदेव

801
00:54:48,800 --> 00:54:53,040
के द्वारा दिए गए सिद्धांत के अंदर रहकर के खुद पढ़ो बाकी

802
00:54:53,040 --> 00:54:57,040
के अध्याय खुद स्वाध्याय करो। मगर गुरुदेव का जब विरोध करोगे

803
00:54:57,040 --> 00:55:01,120
कि नहीं गुरुदेव इस जगह पर गलत है। जबकि गुरुदेव कह रहे होंगे

804
00:55:01,120 --> 00:55:05,120
नहीं तुम यहां पर गलत अर्थ ले रहे हो। यहां पर बेर का अर्थ जो है

805
00:55:05,120 --> 00:55:09,120
तीन बेर है। उन्होंने दोनों बार यह नहीं कहा तीन बर खाती थी

806
00:55:09,120 --> 00:55:12,640
वह तीन बर खाती तो उन्होंने दोनों बार नहीं कहा कि तीन बर खाती थी वह तीन बर खाती

807
00:55:12,640 --> 00:55:16,880
है। पहले बार जो शब्द आया है तीन बर खाती थी वो उस

808
00:55:16,880 --> 00:55:21,120
उसका अर्थ था थ्री टाइम्स इन ए डे। दूसरी बार जो शब्द आया है तीन बर

809
00:55:21,120 --> 00:55:25,760
खाती है उसका मतलब है थ्री फ्रूट्स इन ए डे।

810
00:55:25,760 --> 00:55:29,760
थ्री टाइम्स इन ए डे। वो दिन भर में तीन बार भोजन करती थी।

811
00:55:29,760 --> 00:55:33,920
और अब थ्री फ्रूट्स इन ए डे। अब वो दिन भर में सिर्फ तीन बेर

812
00:55:33,920 --> 00:55:37,920
खाती है। बेर नामक फल खाती है। तीन इतनी उसकी दशा खराब हो चुकी

813
00:55:37,920 --> 00:55:42,160
है। तो फल का अर्थ यहां पर समझ में आ रहा है कि बेर है।

814
00:55:42,160 --> 00:55:46,320
फिर भी अलग-अलग अर्थ हो गया। ठीक है? तो अगर

815
00:55:46,320 --> 00:55:50,400
तुम गुरु से स्वतंत्र होकर के पढ़ोगे तो वहां पर तुम निर्णायक

816
00:55:50,400 --> 00:55:55,040
रूप से नहीं कह सकते कि नहीं इसका अर्थ यही लेना है। नहीं तो मैंने पूछा है। जनते

817
00:55:55,040 --> 00:55:59,120
शूद्रा उसका अर्थ क्या लोगे तुम? स्वतंत्र रूप से

818
00:55:59,120 --> 00:56:03,680
अगर पढ़ोगे तो उसका अर्थ लेना पड़ेगा। कि भैया उसका अर्थ तो वही है

819
00:56:03,680 --> 00:56:07,680
कि जन्म से सब शूद्र होते हैं। तो फिर काहे के लिए बोलोगे कि

820
00:56:07,680 --> 00:56:12,240
शूद्रवत होते हैं। क्योंकि तुमने किसी परंपरा प्राप्त आचार्य से

821
00:56:12,240 --> 00:56:16,240
उसको जाना होगा कि भैया क्या है सिद्धांत कि नहीं जन्म से सब जो है

822
00:56:16,240 --> 00:56:20,320
शूद्र नहीं वो जन्म से वो जो वर्ण व्यवस्था है वो जन्म से होती है। कर्म

823
00:56:20,320 --> 00:56:24,320
से नहीं होती है। तो फिर वहां पर शूद्र क्यों कहा जा रहा है? जन्म से सब

824
00:56:24,320 --> 00:56:27,680
शूद्र है। तो वहां पर शूद्रव बोला जा रहा है। शूद्र

825
00:56:27,680 --> 00:56:31,760
के जैसे होते हैं। फिर संस्कार से वो जो है द्विज आचरण से

826
00:56:31,760 --> 00:56:35,840
भी द्विज हो जाते हैं। ठीक है? तो ये सब बातें वो

827
00:56:35,840 --> 00:56:40,480
तब बात आती है ना जब सामने से बात हो। मजा तब आता है।

828
00:56:40,480 --> 00:56:45,360
अब ये व्यक्ति मुझसे कह रहा है कि होमवर्क करके आया करो। तो बालक

829
00:56:45,360 --> 00:56:49,600
होमवर्क तुम्हारा इनकंप्लीट है। है ना? और

830
00:56:49,600 --> 00:56:54,240
तुम हमें कह रहे हो कि जो है होमवर्क करके आया करो। तो होमवर्क क्यों नहीं

831
00:56:54,240 --> 00:56:58,800
कंप्लीट है तुम्हारा? वो भी बता देते हैं। भागवतानंद का वीडियो सुनो।

832
00:56:58,800 --> 00:56:59,300
और

833
00:56:58,960 --> 00:57:03,120
भगवती ने मुझे यही वरदान दिया। इस बात की भी मैं शपथ कर सकता हूं

834
00:57:03,120 --> 00:57:07,360
कि यदि तुम्हारी बुद्धि कभी अधर्म में लग रही होगी

835
00:57:07,360 --> 00:57:11,520
तो क्रिया पर तुम्हारा नियंत्रण होगा। बुद्धि खराब होने से तुम्हारा कर्म खराब

836
00:57:11,520 --> 00:57:15,520
नहीं होने दूंगी। और यदि कभी तुम क्रिया ही गलत करने जा

837
00:57:15,520 --> 00:57:19,520
रहे हो तो बुद्धि भ्रष्ट नहीं होगी। तुम्हारा विवेक तुम्हें रोक लेगा। यदि

838
00:57:19,520 --> 00:57:23,680
कभी कलयुग के प्रभाव से बुद्धि गड़बड़ा रही हो तो क्रिया नियंत्रित रह जाएगी। कभी क्रिया

839
00:57:23,680 --> 00:57:27,680
ही गड़बड़ होने जा रही हो तो बुद्धि वहां तुम्हें बचा लेगी। बहुत बड़ा एक रक्षा

840
00:57:27,680 --> 00:57:31,440
कवच माणसा हमें प्रदान किया है ऋग संप्रदाय के अंतर्गत

841
00:57:31,440 --> 00:57:37,200
इसमें वो कह रहा है कि यदि तुम्हारी बुद्धि कहीं पर बिगड़ रही होगी

842
00:57:37,200 --> 00:57:41,360
यदि तुम्हारी बुद्धि कहीं पर बिगड़ रही होगी तो तुम्हारा जो जो क्रिया

843
00:57:41,360 --> 00:57:45,360
नहीं बिगड़ेगी यानी कि बुद्धि खराब हो रही है पर कर्मेंद्रियों से

844
00:57:45,360 --> 00:57:49,360
गलती नहीं होगी। ये उसने कहा है बिगड़ रही होगी तो

845
00:57:49,360 --> 00:57:54,000
क्रिया नहीं बिगड़ेगी और यदि क्रिया बिगड़ रही होगी

846
00:57:54,000 --> 00:57:59,040
तो विवेक उसे रोक लेगा। यानी कि गलती होगी ही नहीं।

847
00:57:59,040 --> 00:58:03,040
गलती होगी ही नहीं। और यदि होने के बाद शोधन करने की चीज है

848
00:58:03,040 --> 00:58:07,120
तो इसमें वरदान का काम क्या है फिर? इसमें वरदान की क्या विशेषता

849
00:58:07,120 --> 00:58:11,360
रह गई? फिर तो फिर सब जितने भी लोग हैं शास्त्र सम्मत आचार्यों

850
00:58:11,360 --> 00:58:16,800
के पास जो जा रहे हैं वो सब अपनी चीजों का पश्चाताप कर रहे हैं। शोधन कर रहे हैं लोग।

851
00:58:16,800 --> 00:58:21,440
और वो तो खुद कह रहा है ना कि न्यूनतम अधर्मी होगी। उसको तो सुन लो।

852
00:58:21,440 --> 00:58:25,680
क्रिया गलत नहीं होगी। बहुत न्यूनतम गलत तो होगी। बड़ी गलत नहीं होगी। मतलब

853
00:58:25,680 --> 00:58:29,680
कि उसका कहने का अर्थ है वाक स्कलन जैसी इत्यादि जो न्यूनतम

854
00:58:29,680 --> 00:58:33,680
गलतियां हैं वह तो हो जाएंगी। उस पर वरदान काम नहीं

855
00:58:33,680 --> 00:58:37,840
करेगा। बड़ी गलतियों पर काम करेगा। बड़ी गलतियां होंगी ही नहीं। ये वो कह

856
00:58:37,840 --> 00:58:42,000
रहा है। बड़ी क्रिया गलत होगी ही नहीं। अपने बाबा जी को तो सुन ले

857
00:58:42,000 --> 00:58:46,320
भाई। और फिर मुझको बालक कह रहा है। क्या चेचिस

858
00:58:46,320 --> 00:58:46,820
की

859
00:58:46,480 --> 00:58:50,560
तरह जैसे शरीर में हड्डी हड्डी है वैसे दिमाग भी खाली है क्या?

860
00:58:50,560 --> 00:58:54,800
बाबा जी स्वयं कह रहे हैं कि बड़ी गलतियां होंगी ही नहीं। तो तुम कैसे

861
00:58:54,800 --> 00:58:58,960
कह रहे हो कि नहीं गलतियां हो सकती है बाद में विवेक ठीक कर

862
00:58:58,960 --> 00:59:03,920
लेगा और फिर इसमें विशेषता क्या रह गई वरदान की फिर

863
00:59:03,920 --> 00:59:08,080
और बाबा जी स्वयं जब कह रहे हैं कि भैया गलतियां छोटी वाली हो जाएंगी बड़ी

864
00:59:08,080 --> 00:59:12,240
वाली नहीं होंगी यानी वो कह रहे हैं ना कि क्रिया गलत नहीं होगी

865
00:59:12,240 --> 00:59:16,480
खुद कह रहे हैं बाबा फिर भी नहीं दिमाग काम कर रहा है इतना पार्शियल व्यक्ति आश्चर्य

866
00:59:16,480 --> 00:59:20,480
हो रहा है ये व्यक्ति ऐसे व्यक्ति पोषित करेंगे हमारे धर्म को

867
00:59:20,480 --> 00:59:24,560
पक्षपाती कहीं के फिर वही बात बोल रहा है भट भटकेगा ना

868
00:59:24,560 --> 00:59:28,640
जबकि वो कह रहा है भटकेगा ही नहीं। बड़ी गलतियों में दिमाग या

869
00:59:28,640 --> 00:59:32,720
बुद्धि एक साथ भटकेगी ही नहीं। क्रिया गलत होगी ही नहीं। बड़े चीजों

870
00:59:32,720 --> 00:59:36,880
में वो भी कह रहा है छोटी चीजें होंगी। बड़ी चीजें होंगी ही नहीं।

871
00:59:36,880 --> 00:59:41,120
तो तू अपने भागवतानंद को ही तो काट रहा है यहां पर।

872
00:59:41,120 --> 00:59:45,280
वो तो कह रहा है ना मुझसे बड़ी गलतियां होंगी ही नहीं। भगवती का

873
00:59:45,280 --> 00:59:50,000
वरदान है। यानी कि क्रिया पर नियंत्रण है। होगा ही नहीं।

874
00:59:50,000 --> 00:59:54,240
यहीं पर तेरी बात गलत हो गई। अब दूसरी बात वहां पर यह था कि भैया भगवती

875
00:59:54,240 --> 00:59:58,400
ने कोई लिस्ट प्रोवाइड कराई है क्या कि यह फलानी

876
00:59:58,400 --> 01:00:01,680
फलानी चीजें न्यूनतम में आती है तो यह नहीं होंगी। कोई वरदान ऐसे देता

877
01:00:01,680 --> 01:00:05,760
है क्या? क्रिया गलत नहीं होगी तो नहीं होगी। ये वरदान होता है।

878
01:00:05,760 --> 01:00:10,160
या तो उन्होंने फर्रा दिया हो तो दिखा दो कौन सा फर्रा है? मैंने पूछा तो उसका पैरामीटर

879
01:00:10,160 --> 01:00:14,400
क्या है? न्यूनतम इत्यादि का। उन्होंने वरदान देते समय दिया था क्या?

880
01:00:14,400 --> 01:00:18,640
तो हम तुम्हें क्यों बताया? आंसर नहीं है तो कहां से बताओगे? यही कहोगे। जब मैं उसमें

881
01:00:18,640 --> 01:00:22,720
चर्चा में कह रहा हूं वाक्य स्कलन होगा ही नहीं। तो ये कह रहा है तुम्हारी मूर्खता है बालक।

882
01:00:22,720 --> 01:00:26,880
अरे मूर्ख तो तू है। जब वो कह रहा है कि न्यूनतम गलतियां हो सकती है। बड़ी गलतियां नहीं

883
01:00:26,880 --> 01:00:31,360
हो सकती है। तो मुझे कह रहा है कि मूर्ख है। फिर कह रहे हो बालक।

884
01:00:31,360 --> 01:00:35,440
वैसे तो इस बात का जवाब मैंने दे दिया है कि शास्त्र कहे

885
01:00:35,440 --> 01:00:39,440
कि शुद्धोधन पुत्र जो है क्षत्रिय था और गुरु कहे कि

886
01:00:39,440 --> 01:00:42,560
क्या कहते हैं?

887
01:00:42,560 --> 01:00:46,720
शास्त्र यदि कहे कि शुद्धोधन पुत्र क्षत्रिय था और गुरु कहे कि नहीं नहीं

888
01:00:46,720 --> 01:00:50,720
शुद्धोधन पुत्र जो है क्षत्रिय तो था मगर वो जो है हमारे बुद्ध के अवतार

889
01:00:50,720 --> 01:00:54,880
नहीं है। हालांकि वहां पर हमें प्रमाण प्राप्त है पर्याप्त और अलग से वीडियो भी बनेगा।

890
01:00:54,880 --> 01:00:59,200
शबरी ब्राहणी के विषय में और झूठे बेर के विषय में

891
01:00:59,200 --> 01:01:03,200
और शुद्धोधन पुत्र वाले जो बुद्ध है उसके विषय में

892
01:01:03,200 --> 01:01:07,200
वीडियो अलग से बनेगा। पर फिलहाल बात यह है कि यदि ऐसी

893
01:01:07,200 --> 01:01:11,440
स्थिति आ भी जाएगी कि शास्त्र में जो लिखा है वो गुरु मना कर रहे हैं।

894
01:01:11,440 --> 01:01:15,520
तो वहां पर हमें मानना पड़ेगा। हमें नहीं मालूम क्या शास्त्र है क्या शास्त्र

895
01:01:15,520 --> 01:01:16,880
नहीं है। वहां धर्म

896
01:01:16,880 --> 01:01:20,960
गलत सिद्ध हो जाएगा। धर्म की असिद्धि हो जाएगी। गुरु

897
01:01:20,960 --> 01:01:24,960
गोविंद और ग्रंथ केवल गुरु नहीं केवल गोविंद

898
01:01:24,960 --> 01:01:28,960
नहीं केवल ग्रंथ नहीं। अगर गुरु की वाणी शास्त्र

899
01:01:28,960 --> 01:01:33,040
से मैच नहीं खा रही है। तो गुरु अगर एक जगह गलत बोल सकते

900
01:01:33,040 --> 01:01:37,040
हैं तो दसियों जगह गलत बोल सकते हैं। और दुख न्याय करोगे क्या? गुरु

901
01:01:37,040 --> 01:01:41,680
ने हमको कहा कि यह शास्त्र है। अगर हम गुरु पर विश्वास करते हैं

902
01:01:41,680 --> 01:01:45,920
तो हमने मान लिया कि शास्त्र है। अब हम ही कह रहे हैं गुरु अमुक अमुक विषय में शास्त्र

903
01:01:45,920 --> 01:01:50,960
संबंधी बातों पर झूठ बोल रहे हैं। अच्छा एक बात और है।

904
01:01:50,960 --> 01:01:55,360
एक बात और है इसने शुरू में भी कही है वो बात में प्रकाश नहीं डाल पाया कि

905
01:01:55,360 --> 01:01:59,600
इसका कहना है कि जो कृत है उन वह भी जो है जो

906
01:01:59,600 --> 01:02:04,800
वचन होते है गुरुओं के उनका भी जो है आ

907
01:02:04,800 --> 01:02:08,880
जो गुरुदेव का वचन होता है वो भी उनका कृत में ही आता है आचरण में

908
01:02:08,880 --> 01:02:12,960
ही आता है। पहली बात जो आचरण संबंधी बात है वो आप भी समझ रहे हो कि

909
01:02:12,960 --> 01:02:17,040
आचरण क्या होते हैं जो उसके व्यक्तिगत जीवन में वो आचरणों को पालन

910
01:02:17,040 --> 01:02:21,040
कर रहा होता है वो आचरण होते हैं। पर यहां पर अगर पूरी तरीके से यह कर

911
01:02:21,040 --> 01:02:25,200
लेंगे कि अगर वचन को भी आचरण मान लेंगे जो गुरु की व्याख्या

912
01:02:25,200 --> 01:02:29,280
है उसको आचरण से बाहर नहीं निकालेंगे तो श्वेता शत्रुपनिषद छह

913
01:02:29,280 --> 01:02:31,920
23 का क्या करेंगे कि गुरु और जो

914
01:02:31,920 --> 01:02:36,240
है भगवान में अंतर नहीं करना चाहिए वहां क्या करोगे गुरु

915
01:02:36,240 --> 01:02:40,240
के उस आचरण का आप विरोध कर सकते हो जिस आचरण को गुरु ने

916
01:02:40,240 --> 01:02:44,320
स्वयं गलत माना हो क्योंकि गुरु वही जो अंधकार को दूर

917
01:02:44,320 --> 01:02:48,400
करे आपका अंधकार उसी ने दूर किया है यदि वो अपने

918
01:02:48,400 --> 01:02:52,640
ही द्वारा बताए गए सिद्धांत के विरुद्ध जा रहा है। वो कह रहा है मेरा यह आचरण गलत

919
01:02:52,640 --> 01:02:56,720
है। तब तुम कह सकते हो कि हां भाई तुम गलत हो यहां पर। यदि वो यह कह

920
01:02:56,720 --> 01:03:02,080
रहा है कि मेरा आचरण गलत नहीं है। तुम शास्त्र का गलत अर्थ समझ रहे हो।

921
01:03:02,080 --> 01:03:06,080
मेरा यह आचरण गलत नहीं है। तुम शास्त्र का गलत अर्थ समझ रहे हो। तो या तो वहां

922
01:03:06,080 --> 01:03:10,160
पर यह मानना छोड़ दो कि हम वैदिक धर्म की बात कर रहे हैं। क्योंकि वैदिक धर्म

923
01:03:10,160 --> 01:03:14,240
आए तो उन्हीं की मध्यस्थता से है। वो वैदिक धर्म के विषय में

924
01:03:14,240 --> 01:03:18,400
हमारा प्रमाण है। गुरु परंपरा प्राप्त आचार्य अगर

925
01:03:18,400 --> 01:03:22,480
तुम उन पर अविश्वास रखते हो तो उनसे प्राप्त होने वाले शास्त्रों पर भी अविश्वास

926
01:03:22,480 --> 01:03:26,800
रखो। और या फिर जिस विषय में वह स्वीकार

927
01:03:26,800 --> 01:03:31,040
करें कि मेरा आचरण गलत है तो उस आचरण को गलत मानो और उसका जो उसको

928
01:03:31,040 --> 01:03:35,200
फॉलो मत करो। उनके विरुद्ध जाकर के धर्म और धर्म की व्याख्या नहीं

929
01:03:35,200 --> 01:03:39,280
कर सकते आप स्वतंत्र रूप से क्योंकि यदि उनके

930
01:03:39,280 --> 01:03:43,360
विरुद्ध जाकर के धर्म और धर्म की व्याख्या करेंगे तो वो आपके प्रमाण सिद्ध

931
01:03:43,360 --> 01:03:46,960
नहीं होंगे। शब्द प्रमाण और जब वो आपके शब्द प्रमाण सिद्ध नहीं होंगे तो

932
01:03:46,960 --> 01:03:51,120
उनके द्वारा प्राप्त होने वाले वेदादि शास्त्र भी आपके प्रमाण सिद्ध नहीं होंगे।

933
01:03:51,120 --> 01:03:55,120
तो यदि ऐसी स्थिति आ जाती है कि गुरु आपके बता देने पर भी या

934
01:03:55,120 --> 01:03:59,200
गुरु का वाक्य कुछ और हो रहा है, शास्त्र का वाक्य कुछ और हो रहा है, गुरु में श्रद्धा नहीं

935
01:03:59,200 --> 01:04:03,200
हो पा रही है तो वहां पे आपकी वैदिकता नष्ट होगी। आप ये क्लेम

936
01:04:03,200 --> 01:04:07,440
नहीं कर सकते मैं वैदिक हूं। आपको भगवती ने सपना दिया। आपका अपने अपने

937
01:04:07,440 --> 01:04:11,520
से आप ये कह सकते हो कि ठीक है भाई स्वतंत्र रूप से जो है मैं एक नया धर्म

938
01:04:11,520 --> 01:04:15,680
और अधर्म की व्याख्या कराने वाला एक निग्रहक कल्ट बना रहा हूं। निग्रहकल्ट क्यों कहोगे

939
01:04:15,680 --> 01:04:19,680
निग्रह तो है ही नहीं किसी का। मैं जो है वो बना रहा हूं। क्या कहते हैं? परी

940
01:04:19,680 --> 01:04:23,920
परिधर्म मैं परी धर्म बना रहा हूं नया जैसे इस्लाम आया था बाइबल आया था

941
01:04:23,920 --> 01:04:28,000
ऐसे ही आया था जब पुराने या पूवाचार्यों द्वारा दिए जाने वाले

942
01:04:28,000 --> 01:04:32,160
शास्त्रों में श्रद्धा नहीं बैठी क्योंकि वो झूठ बोल सकता है तो ये भी झूठ

943
01:04:32,160 --> 01:04:36,320
हो सकता है तो जब मैच नहीं हुआ तो भैया नया धर्म नहीं तो अपने

944
01:04:36,320 --> 01:04:40,560
हिसाब से वेदों का अर्थ तो कोई भी निकाल सकता है फिर उसमें प्रामाणिकता

945
01:04:40,560 --> 01:04:44,880
चाहिए ना कि भैया जो अर्थ मैं ले रहा हूं वो परंपरा से भी है। आचार्य

946
01:04:44,880 --> 01:04:48,880
यास्क ने निरुक्त तक में यह सब बातें कही है कि मैं जो अर्थ दे रहा

947
01:04:48,880 --> 01:04:52,960
हूं, परंपरा से प्राप्त अर्थ है वो मैं दे रहा हूं। श्रुति का

948
01:04:52,960 --> 01:04:57,120
मतलब ही है कि तुमने किसी से सुना यदि वर्तमान में शास्त्र छप

949
01:04:57,120 --> 01:05:01,520
रहे हैं तो हम छपे हुए शास्त्रों को किसी से सुनकर प्रमाणिक

950
01:05:01,520 --> 01:05:02,400
मानेंगे।

951
01:05:02,400 --> 01:05:06,400
तब वो श्रुति शास्त्र कहलाएंगे। प्रामाणिक रूप से। हां।

952
01:05:06,400 --> 01:05:10,400
यहां पर अब इसने अंत में एक बात और कही है कि भैया वो अगर मुझे चार

953
01:05:10,400 --> 01:05:14,400
चीजें बना बताई हैं तो मैं जो है और उसके बाहर एक्सप्लोर एक्सप्लोर करो।

954
01:05:14,400 --> 01:05:18,640
मगर गुरुदेव का विरोध बिना किए हुए खूब एक्सप्लोर करो। अगर विरोध

955
01:05:18,640 --> 01:05:22,640
करोगे उनकी किसी कथनी का तो तुम्हारा प्रमाण सिद्ध नहीं होगा वो शास्त्र जिसका तुम

956
01:05:22,640 --> 01:05:26,720
भाष्य कर रहे हो। अगर तुमने किया है जैसा कि तुमने बताया कि भाई मैंने

957
01:05:26,720 --> 01:05:30,800
अष्टाध्यायी में किया तो अष्टाध्याय में अंतिम प्रमाण तुम्हारा वो नहीं

958
01:05:30,800 --> 01:05:35,040
होगा। कोई और होगा। जिसको भी मानोगे अंतिम प्रमाण उसका तुम खंडन

959
01:05:35,040 --> 01:05:39,120
नहीं कर पाओगे। अंतिम प्रमाण बताओ जिसको भी करो फिर मैं तुम्हें

960
01:05:39,120 --> 01:05:43,120
सिद्ध करूंगा कि वो तुम्हारा प्रमाण या तो अंतिम प्रमाण सिद्ध नहीं होता है या फिर तुम

961
01:05:43,120 --> 01:05:47,120
उसका विरोध नहीं कर पाओगे। हां उसके सिद्धांत का

962
01:05:47,120 --> 01:05:51,200
खंडन किए बिना खूब उसकी व्याख्या करो। खूब उसको एक्सप्लोर

963
01:05:51,200 --> 01:05:55,600
करो। स्वा अध्ययन करो और जो विलुप्त ज्ञान विज्ञान है उसको उद्भाषित

964
01:05:55,600 --> 01:05:59,680
करो। मगर विरोध करके नहीं पूर्वाचार्य का प्रामाणिक पूर्वाचार्य का

965
01:05:59,680 --> 01:06:04,000
ये भी बात ध्यान रखो। जिस बात को उस समय की गुरु गद्दी ने ग्रहण

966
01:06:04,000 --> 01:06:08,080
किया हो उसका विरोध करते हुए वर्तमान की

967
01:06:08,080 --> 01:06:12,080
गुरु गद्दी उसका विरोध करते हुए या फिर जिस बात को जो वर्तमान

968
01:06:12,080 --> 01:06:16,160
की प्रामाणिक गद्दी है उसने ग्रहण किया हो और उसका विरोध करते

969
01:06:16,160 --> 01:06:17,440
हुए तुम अपनी शास्त्र व्याख्या

970
01:06:17,440 --> 01:06:21,680
करो। वो नहीं कर सकते। हां उन्होंने कोई वचन कहा है। अहम

971
01:06:21,680 --> 01:06:25,680
ब्रह्मास्मि उसके समर्थन में तुमने बहुत सारी व्याख्या कर दी। उन्होंने

972
01:06:25,680 --> 01:06:29,760
कोई वचन कहा है विशिष्टाद्वैत वाला वचन कहा हो उसके संबंध में तुमने बहुत

973
01:06:29,760 --> 01:06:33,920
सारी व्याख्या कर दी बहुत सारे तर्क ले आए प्रमाण भी ले आए वो सब तुम्हारा स्वीकार

974
01:06:33,920 --> 01:06:37,920
रहे जो उसके सीमा के अंदर है मगर वो तुम अगर विशिष्टाद्वैत पर ही सवाल

975
01:06:37,920 --> 01:06:41,280
उठाने लगोगे नहीं नहीं

976
01:06:41,280 --> 01:06:45,280
रामानुज रामानुजाचार्य जी ने गलत कहा था भैया वेदों का तात्पर्य

977
01:06:45,280 --> 01:06:49,360
तो ये आ रहा है हां तो बन जाओ फिर शंकर

978
01:06:49,360 --> 01:06:53,440
बन जाओ शंकर संप्रदाय के वेदों का तात्पर्य क्या आ रहा है ये तो तुम भी जानते हो

979
01:06:53,440 --> 01:06:57,440
अब ये आखिर में कह रहा इसको कुछ अपशब्द नहीं बोला गया है। इसको यह जो है

980
01:06:57,440 --> 01:07:01,440
इसको ऐसा नहीं है कि उत्तर नहीं दिया गया है। इसकी किसी भी बात का जो

981
01:07:01,440 --> 01:07:05,440
है और यह उठ के जा रहा है कि ठीक है आप जो है उत्तर नहीं दे रहे तो मैं जा रहा

982
01:07:05,440 --> 01:07:09,440
हूं। बेवकूफ हो क्या? वो व्यक्ति बोला है ना तुम्हारे सामने कि मैं

983
01:07:09,440 --> 01:07:13,600
तुम्हें क्यों बताऊं? वो किसी व्यक्ति का ये

984
01:07:13,600 --> 01:07:17,600
कह देना कि मैं तुम्हें क्यों बताऊं? तुम कहीं के आचार्य हो क्या?

985
01:07:17,600 --> 01:07:21,840
तुम अनाधिकारी हो। मैं तुम्हें क्यों बताऊं? ये कहना भी प्रश्न का उत्तर

986
01:07:21,840 --> 01:07:26,160
ना देना नहीं है। ये भी प्रश्न का उत्तर देना है। वाह भाई [प्रशंसा] गजब

987
01:07:26,160 --> 01:07:30,160
आदमी हूं। वाह मजा आ गया तुम्हारी बात सुनकर के। हां।

988
01:07:30,160 --> 01:07:32,560
और रही बात ये के कोई भी

989
01:07:32,560 --> 01:07:36,560
अपशब्द नहीं बोला गया तो ये जो पूरा वृतांत तुमने सुना है

990
01:07:36,560 --> 01:07:40,560
और इस पूरे वृतांत में तुम्हारे लिए जितने भी मैंने ऐसे शब्दों का उपयोग

991
01:07:40,560 --> 01:07:44,960
किया है जो तुम्हें जो है अपने लिए नहीं लगे। अगर लगते हैं तो अच्छी बात है।

992
01:07:44,960 --> 01:07:48,960
अगर ग्रहण कर लेते हो। और अगर यदि नहीं लगे तो समझ लेना कि मैंने तुम्हें इस

993
01:07:48,960 --> 01:07:53,280
योग्य समझा और मेरे द्वारा तुम्हारे को यह सब अह शब्द बोलना गलत

994
01:07:53,280 --> 01:07:57,600
नहीं है क्योंकि मैं ही निर्णायक हूं। तुम्हारे और मेरे विषय में जैसे

995
01:07:57,600 --> 01:08:01,600
मेरे और भागवतानंद के विषय में निर्णायक भागवतानंद का पक्ष ही है और

996
01:08:01,600 --> 01:08:06,000
उस पक्ष से अगर कोई वो ये धारण करते हुए यह व्यक्ति जाहिलियत

997
01:08:06,000 --> 01:08:10,000
मूर्ख इत्यादि शब्दों के योग्य है और बृजेश पांडे ने इतने शब्द तुमने

998
01:08:10,000 --> 01:08:14,000
स्वीकार किए। बोला है वो उचित है। उसी तरीके से अब मैं वीडियो बना

999
01:08:14,000 --> 01:08:18,080
रहा हूं। मेरी जगह है तो मैं निर्णायक हो गया और उस हिसाब से

1000
01:08:18,080 --> 01:08:22,080
मैंने देख लिया कि तुम देख लिया कि तुम किन-किन शब्दों के

1001
01:08:22,080 --> 01:08:26,320
योग्य हो तो तुम सिंगल चेचिस के योग्य हो साइड हीरो के योग्य हो

1002
01:08:26,320 --> 01:08:30,640
हैं और मूर्ख हो मूर्खता की पराकाष्ठा वाले हो रट्टू

1003
01:08:30,640 --> 01:08:34,880
तोते हो ये सब चीजें तुम पे लागू होती है उचित है तुम्हारे

1004
01:08:34,880 --> 01:08:39,360
लिए बिल्कुल उचित है वो तो कटाक्ष है मगर तुम्हारे लिए उचित भी है

1005
01:08:39,360 --> 01:08:43,440
चले आए मुंह उठा के मत पड़ो चक्कर में भैया

1006
01:08:43,440 --> 01:08:47,680
बता रहा हूं मत पड़ो चक्कर में कोई है नहीं टक्कर

1007
01:08:47,680 --> 01:08:51,840
में समझा रहा हूं समझ लो खामखा

1008
01:08:51,840 --> 01:08:56,720
तुम्हारा जो घरौंदा बसाया हुआ है चिड़िया उड़ती हुई नजर आएंगी

1009
01:08:56,720 --> 01:08:59,280
ठीक है

1010
01:08:59,280 --> 01:09:03,360
और फिर आगे जो बात कही है कि वो गाली नहीं दी गई तो इस पर

1011
01:09:03,360 --> 01:09:07,520
तो तुम्हारे बाबा जी ने कहा है ना वो तो शंकराचार्यों से अपेक्षा रखता है कि

1012
01:09:07,520 --> 01:09:11,600
उसके कहने पर वो ज्योतिष पीठ वाले उतर जाए

1013
01:09:11,600 --> 01:09:15,600
गंगा में पूरी पूरी पीठ वाले उतर जाए गंगा में और दोनों हाथ

1014
01:09:15,600 --> 01:09:19,600
में जनेऊ लेकर के कह दे हं कि कौन शंकराचार्य कौन नहीं है तो

1015
01:09:19,600 --> 01:09:23,600
तू कब लेगा भैया जनेऊ हाथ में तेरे तो बाबा जी का काम है जनेऊ हाथ में जनेऊ हाथ

1016
01:09:23,600 --> 01:09:28,320
में हर बात में लेना कब लोगे श्री भाष्य पे हाथ रख कर के बोल

1017
01:09:28,320 --> 01:09:33,440
गाली नहीं दी गई वहां पर जनेऊ हाथ में लेके बोलो

1018
01:09:33,440 --> 01:09:38,320
बोल अपने बाबा जी को गाली नहीं दी गई थी वहां पर

1019
01:09:38,320 --> 01:09:42,400
तुम्हारे द्वारा निर्गत किए गए वीडियो में साफ दिख रहा है कि मैंने

1020
01:09:42,400 --> 01:09:46,400
वहां पर अपना मेरे को जब यह हो गया कि भैया जब तुम उत्तर देने से

1021
01:09:46,400 --> 01:09:51,280
मना कर रहे हो मेरा काम हो गया। शुरू क्यों किया था उत्तर देना?

1022
01:09:51,280 --> 01:09:56,560
जब फंस गए तो उत्तर नहीं देंगे और यहां आकर के तोते की तरह मुंह चला लो।

1023
01:09:56,560 --> 01:10:00,640
तुम्हारे द्वारा निर्गत किए गए वीडियो में साफ दिख रहा है कि मैंने अपना जो मोबाइल है जिससे

1024
01:10:00,640 --> 01:10:02,800
मैं रिकॉर्डिंग कर रहा था उसको मैंने

1025
01:10:02,800 --> 01:10:06,960
ऑफ करके और जो है अपने पास रख लिया। बंद की मैंने अपनी रिकॉर्डिंग।

1026
01:10:06,960 --> 01:10:10,880
तुम्हारे उसमें वीडियो में साफ दिख रहा है। पता है ना? यानी

1027
01:10:10,880 --> 01:10:14,880
यानी कि क्रिया तो होगी मगर बाद में उसका शोधन करेंगे आप। बाद में क्या

1028
01:10:14,880 --> 01:10:16,000
क्रिया बहुत न्यूनतम गलत

1029
01:10:16,000 --> 01:10:20,080
होगी और कदाचित होगा। वो न्यूनतम का पैरामीटर क्या है? कितनी गलत होगी? इसकी सभा हम आपको

1030
01:10:20,080 --> 01:10:24,240
क्यों दें? फिर मतलब आप किस आचार्य पीठ पर हैं। ठीक बस यही चीज है कि आपको शास्त्र कहां

1031
01:10:24,240 --> 01:10:28,960
से मिलेगा? शास्त्र आचार्य परंपरा से मिलेगा। कौन सी?

1032
01:10:28,960 --> 01:10:32,000
करने के लिए बैठ गए हो।

1033
01:10:32,000 --> 01:10:36,000
ग्रंथ से पता चलेगा। अगर केवल गुरु के वचन होते तो

1034
01:10:36,000 --> 01:10:38,400
शास्त्र

1035
01:10:38,400 --> 01:10:42,800
ठीक है। फैला लेने से मस्तिष्क थोड़ी फैल जाती है। शंकराचार्यलियत

1036
01:10:42,800 --> 01:10:45,920
वाला प्रश्न कर रहे हो एकदम

1037
01:10:45,920 --> 01:10:50,080
हमने तो तुम 10 शंकर पीठ बनाओ कहो कि जो आप

1038
01:10:50,080 --> 01:10:54,080
लोग जो आप लोग व्यवहार कर रहे हो ना वो भी वो भी भगवती देख

1039
01:10:54,080 --> 01:10:58,560
रही है। ठीक है। तो मेरी वहां पर रिकॉर्डिंग समाप्त हो जाना

1040
01:10:58,560 --> 01:11:03,040
ये दिखाई दे रहा है। मेरी रिकॉर्डिंग वहां रुक जाना।

1041
01:11:03,040 --> 01:11:07,120
तुम्हारी रिकॉर्डिंग क्यों रुक रही है? क्यों

1042
01:11:07,120 --> 01:11:11,200
रुक रही है यहां पर? जब मैंने कहा कि ये तुम्हारा व्यवहार भगवती भी

1043
01:11:11,200 --> 01:11:15,360
देख रही है। क्यों रुक गई तुम्हारी रिकॉर्डिंग भाई कोई है इस बात का

1044
01:11:15,360 --> 01:11:18,160
जवाब?

1045
01:11:18,160 --> 01:11:22,160
झूठे कहीं के तरस आता है, दुख

1046
01:11:22,160 --> 01:11:26,320
होता है। रामानुजाचार्य परंपरा के जो

1047
01:11:26,320 --> 01:11:30,320
है शिष्य होते हुए और झूठ बोल रहे हो। आंख में हाथ डाल आंख डाल

1048
01:11:30,320 --> 01:11:34,400
के। खाओ जनेऊ हाथ में लेकर के। मैं भी देखूं कितने सच्चे हो तुम लोग।

1049
01:11:34,400 --> 01:11:39,040
श्री भाष्य पर हाथ रख के कसम खाओ। सौगंध खाओ। नीचता

1050
01:11:39,040 --> 01:11:43,520
की पराकाष्ठा पे जा रहे हैं कि जो है वो

1051
01:11:43,520 --> 01:11:47,600
गाली नहीं दी गई। मैं तो अपना नेता हो के आया था ना।

1052
01:11:47,600 --> 01:11:51,600
मैं तो नहीं अपनी सेना दलबल को ले आया था साथ में। तुमने तो

1053
01:11:51,600 --> 01:11:55,600
वो अवसर दिया ही नहीं था। कि समान रूप से बैठकर

1054
01:11:55,600 --> 01:11:59,920
के चर्चा हो पाए। दिया था क्या वो अवसर? अरे

1055
01:11:59,920 --> 01:12:04,480
मैं कह रहा हूं ऊपर नीचे की बात नहीं। कम से कम ऐसा वातावरण

1056
01:12:04,480 --> 01:12:08,640
तो प्राप्त होता जहां पर मुझे टेंशन ना होती कि रिकॉर्डिंग

1057
01:12:08,640 --> 01:12:12,640
के बाद बाहर कैसे जाएंगे?

1058
01:12:12,640 --> 01:12:16,880
बोलने की आवश्यकता क्या थी बृजेश पांडे को बीच में? भागवत

1059
01:12:16,880 --> 01:12:21,120
आनंद पर्याप्त नहीं है क्या? क्या इस मामले में भी उसकी धातु

1060
01:12:21,120 --> 01:12:25,200
नष्ट हो चुकी है? तो बृजेश पांडे का बोलना तुम्हारा

1061
01:12:25,200 --> 01:12:29,200
बीच में उत्सुक होना यह सिद्ध कर रहा है कि वहां तुम संतुष्ट नहीं हो पा रहे थे

1062
01:12:29,200 --> 01:12:33,200
तुम्हारे बाबा जी के उत्तरों से और तुम लोगों को बाबा जी का जो पक्ष है

1063
01:12:33,200 --> 01:12:37,520
वो कमजोर होता हुआ दिखाई दिया था इसीलिए फड़फड़ा रहे थे कि हम भी बोले हम भी बोले

1064
01:12:37,520 --> 01:12:41,520
किसी तरीके से बात को निपटाएं खत्म करें बात को पर हमारे

1065
01:12:41,520 --> 01:12:45,680
हमें जो करना था वो करके आए झूठे की हद तक चोर के घर तक और

1066
01:12:45,680 --> 01:12:49,920
तुमसे भी कह रहे हैं खामखा अपने चीजों को दाब पे मत लगाओ

1067
01:12:49,920 --> 01:12:54,640
वो जो रट्टू तोते वाली चीज से चीजें चल रही है वो कर लो हमसे

1068
01:12:54,640 --> 01:12:58,720
खामखा बैर मोल मत लो क्योंकि हम जब एक तरफ से या तो

1069
01:12:58,720 --> 01:13:02,800
चालू करते नहीं है और चालू करते हैं ना तो पाताल तक प्रहार

1070
01:13:02,800 --> 01:13:07,600
कर जल को तू निकाल दे नृत्य कर बिगुल बजा कर ध्वनि तू ताल दे

1071
01:13:07,600 --> 01:13:11,600
घायल खड़ा पराक्रमी तू आस चाहिए मुझे तेरा अंतिम

1072
01:13:11,600 --> 01:13:15,600
वही प्रयास चाहिए अंतिम प्रयास तक जाते हैं फिर भागवतानंद की देख रहे हो

1073
01:13:15,600 --> 01:13:19,680
ना भाषा शैली सुधर गई ना प्रवचनों में लगा हुआ है वो जो निग्रह करता

1074
01:13:19,680 --> 01:13:23,760
था ना लतखोर तू तू तड़ाक सब बंद हो गया है। अब

1075
01:13:23,760 --> 01:13:27,680
बड़ा सहजता से वो कर रहा है। बोलना बंद कर दिया उसने। देख

1076
01:13:27,680 --> 01:13:32,720
लिया ना इसको कहते हैं निग्रह। और हां

1077
01:13:32,720 --> 01:13:36,800
तो इसके बाद यह चर्चा जब बंद हो गई है उस पर इसने जो मीमांसा की है,

1078
01:13:36,800 --> 01:13:40,880
समीक्षा की है, उसका उत्तर मैंने आपको दे दिया है। अब इससे आगे इसने जो भी प्रलाप

1079
01:13:40,880 --> 01:13:44,880
किया होगा वीडियो बहुत लंबा हो जाएगा। तो मैं उसका उत्तर यहां देना उचित नहीं समझ

1080
01:13:44,880 --> 01:13:48,960
रहा हूं। इसके साथ जो मेरी आमने-सामने की चर्चा सुनिश्चित हो

1081
01:13:48,960 --> 01:13:53,040
चुकी है। आज नहीं तो कल या तो संडे को लाइव होगी या फिर यह लखनऊ

1082
01:13:53,040 --> 01:13:57,040
आएगा तो जो है लखनऊ में इसके साथ वन ऑन वन बात होगी

1083
01:13:57,040 --> 01:14:01,120
और या फिर कहीं ना कहीं अब हो जाएगी जब इसने डन कर दिया। मैं तो प्रस्ताव दे ही

1084
01:14:01,120 --> 01:14:05,280
चुका था और रही बात इसने एक अपनी वीडियो में यह भी कहा है कि भाई इसने हमारे

1085
01:14:05,280 --> 01:14:09,360
चैनल पर आकर के कमेंट किया था तो मैंने इसको कम टू लाइव बोला था

1086
01:14:09,360 --> 01:14:13,600
और फिर मैंने जो है इसका चैनल डिलीट कर दिया। हमने किसी का हम तब तक उसका

1087
01:14:13,600 --> 01:14:17,600
डिलीट नहीं करते हैं जब तक वो गाली गलौज ना करे। इवन गाली गलौज पे भी अब

1088
01:14:17,600 --> 01:14:22,320
तो समय ना होने के कारण उसको डिलीट नहीं कर पाते हैं। मगर

1089
01:14:22,320 --> 01:14:26,320
हमारा जो सिद्धांत यही है कि कोई गाली गलौज करने लगता है तब उसका

1090
01:14:26,320 --> 01:14:30,400
डिलीट करते हैं। या फिर उसके साथ चर्चा हो चुकी है। निरुत्तर हो

1091
01:14:30,400 --> 01:14:34,560
चुका है। उसके बाद आकर के वही जीरो से वो अपने प्रश्न फिर कर रहा है। वहां

1092
01:14:34,560 --> 01:14:38,560
पर चिल्ला रहा है। विधवा विलाप कर रहा है। तब उसको डिलीट करते हैं। हमें जरूरत नहीं पड़ी

1093
01:14:38,560 --> 01:14:42,720
है टुच्चों के प्रश्नों को डिलीट करने की। हैं तो

1094
01:14:42,720 --> 01:14:47,040
डिलीट नहीं किया। हां YouTube में मैंने कई बार देखा है कि कोई कोई कमेंट

1095
01:14:47,040 --> 01:14:51,200
जो होता है बहुत देर के बाद दिखता है या दिखता ही नहीं है तो उसमें अपने हिसाब

1096
01:14:51,200 --> 01:14:55,600
से निर्णायक हो करके ये सब निर्णय लेना भी एक बचकानी

1097
01:14:55,600 --> 01:15:00,160
बुद्धि का ही प्रमाण है कि हमने उसका कमेंट डिलीट किया। दूसरी बात प्रतिक्रिया

1098
01:15:00,160 --> 01:15:04,240
नहीं दी। ये हो सकता है कि हम तुम्हारी प्रतिक्रिया नहीं दे पाए हो क्योंकि बहुत सारे कमेंट

1099
01:15:04,240 --> 01:15:08,640
आ रहे होते हैं तो प्रतिक्रिया नहीं दे पाए भाई। हां, हमने हमसे चर्चा

1100
01:15:08,640 --> 01:15:12,720
करने के लिए ओपन चीजें कह रखी हैं। जिसको भी चर्चा करनी हो, डिस्क्रिप्शन

1101
01:15:12,720 --> 01:15:17,040
में नंबर है। वीडियो के अंत में नंबर है। वहां WhatsApp करके एक फॉर्म

1102
01:15:17,040 --> 01:15:21,040
प्राप्त होगा। उस फॉर्म को भर दो। अगर कोई विशेष व्यक्ति है तो उसको

1103
01:15:21,040 --> 01:15:25,040
फॉर्म भरने की जरूरत भी नहीं है। अगर सामने वाला वो होता है ना वो एक बात

1104
01:15:25,040 --> 01:15:29,120
है झुंड में वार करने वाला शेर नहीं ठग होता है और दुश्मन अगर कायदे का हो ना

1105
01:15:29,120 --> 01:15:33,120
तो उसे मारने का मजा ही अलग होता है। तो यदि

1106
01:15:33,120 --> 01:15:37,120
कोई ठीक-ठाक विरोधी है तो उसको फॉर्म भरने की जरूरत नहीं है। वो अपना फोटो

1107
01:15:37,120 --> 01:15:41,840
भेज देता है। अपना नाम भेज देता है। अपना पक्ष भेज देता है। उससे भी काम चल जाता है।

1108
01:15:41,840 --> 01:15:46,080
मगर चर्चा को सुनिश्चित करने के लिए हमने अपना नंबर इत्यादि पर्याप्त

1109
01:15:46,080 --> 01:15:50,560
इंफॉर्मेशन वहां दे रखी है। तो यदि तुम चर्चा को तैयार थे तो तुम्हें उसको प्रोटोकॉल

1110
01:15:50,560 --> 01:15:54,960
को फॉलो कर लेना होता जो वहां पर वीडियो में दिया गया है। है ना? और

1111
01:15:54,960 --> 01:15:57,760
डिलीट इत्यादि हम करते नहीं है। तो ये सारी बातें

1112
01:15:57,760 --> 01:16:01,760
हैं। अब बाकी का विषय हम नहीं उठाएंगे जो इसने अनर्गल और सारे आगे प्रारलाप

1113
01:16:01,760 --> 01:16:05,840
किए हैं। जो इसने उस चर्चा को लेकर के समीक्षा की थी उसका जवाब दे दिया है।

1114
01:16:05,840 --> 01:16:10,480
अब आगे बहुत जल्द आप लोगों को इसकी और मेरी जो आमने-सामने

1115
01:16:10,480 --> 01:16:14,480
की बातचीत है। यदि संभव हुआ तो अवश्य दिखाई देगी। संभव

1116
01:16:14,480 --> 01:16:18,480
हुआ इसलिए कहता हूं क्योंकि मैं भविष्यवक्ता नहीं बनता हूं और मैं कभी

1117
01:16:18,480 --> 01:16:22,720
भी निर्णायक ये नहीं बनता। प्रयास करेंगे अभी भी। ठीक है? वैसे तो

1118
01:16:22,720 --> 01:16:28,720
जहां तक है होगी ही तो ठीक है। सभी को जय श्री राम।

1119
01:16:34,880 --> 01:16:38,880
[संगीत]
