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00:00:06:12 सभी को जय श्री राम। जिस प्रकार से इस वाले शंकराचार्य से बचने के लिए कहते हैं मायावादी मायावादी इमोशनल कार्ड खेलते हैं। सिंपैथी गेम अरे ये तो भगवान के रूप को माया समझते हैं। उसी तरीके से जो आर्य समाज वाले शंकराचार्य से बचने के लिए जातिवादी जाति अरे स्त्रियों का जनेऊ नहीं होने देते। अरे शूद्र को मंदिर में नहीं जाने देते। इमोशनल कार्ड खेलते हैं। उसी तरीके से भागवतानंद भी हमसे बचने के लिए इमोशनल कार्ड खेलता है। अरे यह तो शास्त्रों को नहीं मानता है। यह तो अपने गुरु के प्रति अनन्यता के चलते जो है शास्त्रों को मानने से मना कर देता है। यह इमोशनल कार्ड।
00:00:48:24 आज जो यह वीडियो में बना रहा हूं और जो मेरा विषय है वह मेरे उन वर्णाश्रमी भाइयों के लिए है जो इस निग्रह संप्रदाय के चक्कर में इस भागवतानंद के चक्कर में स्वयं प्रमाणिक पीठों से जुड़ी जुड़े होने के बावजूद विशेष तौर पर रामानुज पीठों से जुड़े होते हुए भी सभी रामानुजियों की बात नहीं कर रहा हूं पर वह जो इसके चक्कर में जो है इस धारणा का पोषण कर रहे हैं कि अपने गुरु के प्रति भी प्रमाण्य बुद्धि ना रखना इस धारणा का पोषण कर रहे हैं। वह इसके चक्कर में इसको सही ठहराने के चक्कर में उनकी बात कर रहा हूं। और जो भी जिस भी संप्रदाय से ऐसा व्यक्ति है जो भागवतानंद में भागवतानंद को सही सिद्ध करने के चक्कर में इस भावना का पोषण कर रहा है कि गुरु भी कहीं-कहीं धर्म की व्याख्या करते समय गलत बता सकता है। गुरु भी कहीं-कहीं पर अज्ञानी हो सकता है। शास्त्र व्याख्या देते समय। इस धारणा का पोषण कर रहे हैं। तो मुझे बड़ा दुख हो रहा है यह वीडियो बनाते समय कि मुझे अपने वर्णाश्रमी भाइयों के लिए परंपरा निष्ठ भाइयों के लिए यह वीडियो बनाना पड़ रहा है। तो सबसे पहले मैं एक बात बता दूं जिस चर्चा से निकल कर के ये वीडियो आ रहा है।
00:02:05:03 चर्चा जो मेरे और भागवतानंद के बीच में हुई है और उसमें जो है लोग आकर के कह रहे हैं कि तुम्हारा एक ही सवाल था। परंपरा परंपरा परंपरा अरे भाई चर्चा का प्रारंभ सुनिए उसमें क्या कहा जा रहा है सबसे पहले मैंने भागवतानंद को अवसर दिया क्या तुम्हें हमसे कोई चर्चा करनी है उसने कहा नहीं फिर उसने कहा कि यदि आपको कोई चर्चा करनी हो तो कर लीजिए तब मैंने कहा कि आप परंपरा की आपकी परंपरा की प्रामाणिकता पर प्रकाश डालिए तो चर्चा का विषय यह नहीं था कि भागवतानंद के कौन से आक्षेप हैं शंकर पीठ पर या रामानुज पीठ या मुझ पर या किन-किन विषयों में भागवतानंद विरोध कर रहा है। उन विषयों में भागवतानंद सही है या मेरा पक्ष सही है। यह नहीं था चर्चा का विषय। चर्चा का विषय था निग्रह संप्रदाय की प्रामाणिकता। भागवतानंद यदि किसी गुरु परंपरा से संबंधित है तो उसकी प्रामाणिकता। ये विषय था चर्चा का। और जिसमें कि उसने चार बार में चार तरह के उत्तर दिए। सबसे पहले तो यही समझ लेना चाहिए। यह आचार्य है। एक बार कह रहे हैं कि मुझे गुरु परंपरा गुरु आचार्य से प्राप्त हुआ। जब उसमें प्रश्न किया किस-किस परंपरा तो उसमें बुद्धि ठन की? अरे यह क्या हो
00:03:20:04 गया? परंपरा क्यों बोल दिया मैंने? तो फिर बोले नहीं मुझे स्वाध्यायन से प्राप्त हुए। अरे भाई स्वाध्यायन शास्त्र का होता है। शास्त्र स्वाध्यन से प्राप्त होते हैं। फिर वहां भी माता ठंडका। फिर अतीत जन्मांतर से प्राप्त है। तो मोबाइल क्यों देखते हो भाई? जब अतीत जन्मांतर से तुम्हें शास्त्र प्राप्त है तो मोबाइल क्यों देखते हो? फिर माता ठनका कि नहीं भगवती कृपा से प्राप्त है। फिर मोबाइल क्यों देखते हो भाई? तुम्हें अगर सब कुछ दिव्य तरीके से प्राप्त है शास्त्र तो तुम सुना क्यों नहीं सकते हो कि नहीं सुनाऊंगा? फिर मां भगवती का वरदान मान भी लिया जाए। मां भगवती की कृपा मान भी ली जाए तो उसका वरदान तो झूठा सिद्ध हो रहा है। कि नहीं नहीं न्यूनतम अधर्मी न्यूनतम अधर्म हुआ है। न्यूनतम अधर्मी है भाई साहब। ये इनको ऐसा वरदान प्राप्त हुआ है जिसमें न्यूनतम अधर्म करेंगे। उन्होंने कहा ना न्यूनतम गलत होगा। गलत यानी अधर्म। तो न्यूनतम अधर्मी भाई साहब फिर कहने लगे फिर हमें फिर जब ये पूछा गया कि भाई न्यूनतम की लिस्ट क्या है? क्या पैरामीटर है? किसके आधार पर किसको न्यून माना जाएगा? कि नहीं नहीं नहीं वो नहीं बताएंगे। तो नहीं बताना कहां पर चालू हुआ? जब जो भी उल्टे सीधे जवाब दे रहे थे उनको कुरेदा गया और कुरेदते कुरेदते जब पीक पर आ गया तब नहीं बताएंगे। अरे नहीं
00:04:35:06 बताना था। अनाधिकारी थे या तुम जो क्या कहते हैं हम तुम्हारे में विश्वास नहीं रखते दीक्षित नहीं है इसलिए नहीं बताना चाहिए तो तुम शुरू में ही मना कर देते कि नहीं नहीं आप आप अनाधिकारी को हम नहीं बता सकते ये हमें श्रुति का वचन प्राप्त है प्रयास किया आपने जवाब देने का पर वो सटीक नहीं बैठे तब आपको कहना पड़ा ठीक है तो ये सारी बातें वहां उस चर्चा में हुई इसके साथ ही साथ यह भी कहना है कि भाई स्वयं आए थे स्वयं से चले गए अरे भैया जब तुम सामने से जिस चर्चा का जो विषय है उस विषय में जवाब देने से मना कर दोगे तो तुम वहां बैठकर के तुम्हारी आरती उतारें जाएंगे ही ना जब तुम मना कर दोगे नहीं देंगे जवाब हां और उस विषय से भटकाने के लिए केवल यही नहीं हुआ है गलत उत्तर दिए गए और जब उत्तर की पुष्टि नहीं हो पा रही है तो यह कह दिया गया कि नहीं बताएंगे और साथ ही साथ विषयांतर करने के लिए दूसरे दूसरे दूसरे बिंदु भी उखाड़े गए। जिन बिंदुओं की कोई आवश्यकता नहीं थी। आपकी परंपरा सिद्ध करने के विषय में इस बात की आवश्यकता क्या है? कि अग्नि पुराण में क्या लिखा है? क्या नहीं लिखा है। हालांकि इन बातों पर भी आज बाद में आएंगे। पर सबसे पहली
00:05:50:28 बात है कि निग्रह संप्रदाय की प्रामाणिकता क्या है? अब मान लीजिए मेरे पास एक ग्रंथ है। यह रामानुज भाष्य भगवत गीता का। हां। मेरे पास एक ग्रंथ है। यह भगवत गीता ही है। रामानुजाचार्य जी का भाष्य तो छोड़ दीजिए। यह भगवत गीता ही है। मैं यह कैसे मान लूं? बताइए। कैसे मानूं कि यह भगवत गीता है। तो या तो मैं यह कह दूं कि मुझे गीता परस्पर विश्वास है। उसने यदि कहा है कि वही भगवान के वचन है जो महाभारत में अर्जुन को उन्होंने दिए थे तो मैं मान लूं। शब्द प्रमाण बना लूं उसे अपना। और या फिर मैं यह कह दूं कि भाई मुझे किसी परंपरा प्राप्त आचार्य ने बताया है कि यह भगवत गीता है। यह जो श्लोक है यही श्लोक भगवान ने अर्जुन को कहे थे। तो यदि मैं गीता प्रेस को आधार बनाता हूं कि गीता प्रेस झूठ नहीं बोलती है तो फिर मैं गीता प्रेस का खंडन नहीं कर पाऊंगा कि अमुक विषय में गीता प्रेस धर्म के मामले में धर्म की व्याख्या झूठी कर रही है। शास्त्रीय निर्णय झूठा दे रही है। और यदि मैं किसी गुरु का आलंबन लूंगा तो मैं उसका निग्रह नहीं कर पाऊंगा। तो पॉइंट ये था कि अगर आप शास्त्रों
00:07:06:02 पर विश्वास रखते हैं तो वो शास्त्र शास्त्र है। वो शास्त्र भगवत भगवान के वचन है। अपुषय वेद ग्रंथ हैं। तो आप किस पर विश्वास रखते हैं जिसने यह सत्यापित किया है कि यह वही ग्रंथ हैं जो सदियों पहले से चले आ रहे हैं परंपरागत तरीके से। तो इस विषय में उसका कोई जवाब ही नहीं था। कुल मिलाकर के यह है कि यदि पब्लिकेशन अगर तुम गुरु विहीन हो तो तुम्हें उस पब्लिकेशन को गुरु मानना पड़ेगा जिस पब्लिकेशन के द्वारा प्रचारित किया गया ग्रंथ तुम पढ़ रहे हो उस स्थिति में क्या होगा तुम्हारे धर्म का निर्णायक वो पब्लिकेशन होगा अगर उसको श्लोक कोई बढ़ाना है तो बढ़ाया जाएगा घटाना है तो घटाया जाएगा तुम उसमें ये नहीं कह सकते नहीं नहीं ये वाला श्लोक मैं नहीं मानूंगा क्यों क्यों नहीं कह सकते क्योंकि वो तुम्हारा अंतिम प्रमाण है ना वो ग्रंथ वो पब्लिकेशन अगर वह बढ़ा रहा है तो यह नहीं कह सकते कि भाई हम नहीं मानेंगे। अच्छा अगर आपने कहा कि नहीं मानेंगे तो इसका मतलब आपने वह शास्त्र और कहीं पर से भी पढ़ा है तो यही तो मेरा मुख्य विषय है कि हम किस आधार पर किसी
00:08:21:06 शास्त्र को प्रामाणिक अथवा किसी शास्त्र को अप्रामाणिक मानेंगे क्योंकि हमने वही शास्त्र उन शास्त्रों की प्रामाणिकता के विषय में मार्ग निर्देशन किसी परंपरा प्राप्त गुरु से लिया है। पहली बात तो यही सिद्ध हो जाती है कि आप अपना शब्द प्रमाण किसी पब्लिकेशन को मानेंगे या फिर परंपरा प्राप्त जो अंतिम निर्णायक बताया गया है शास्त्रों के अनुसार वो किसी विरक्त को बताया गया है। है ना? जो श्रेष्ठतम आश्रम है वह क्या है? सन्यासी। तो धर्म का अंतिम निर्णायक कौन होगा? सन्यासी। तो शास्त्रों के वचन के अनुसार ही सन्यासी को निर्णायकता प्राप्त है। धर्म अधर्म की। उसके साथ ही साथ वह परंपरा प्राप्त है। उसके पूर्वाचार्यों से उसने वह ग्रंथ पढ़ा है। तो अगर आप स्वतंत्र रूप से किसी ग्रंथ को पढ़ रहे हैं और उसमें कोई भी बात मिला दी जाएगी तो आपके पास उसका विरोध करने का कोई आधार नहीं होगा। परंतु यदि आपके पास कोई गुरु हैं जिन्होंने अपने पूर्वाचार्य से उस ग्रंथ को पढ़ा है तो वह आपको बताएंगे कि नहीं यह वाली बात जो है पब्लिकेशन गलत कर रहा है और इस को हम कैसे पकड़ते और आर्य समाज को कैसे पकड़ते हैं। रामपाल को कैसे पकड़ते हैं? जब वह मिलावट करता है,
00:09:36:12 अड़गड़ आनंद को कैसे पकड़ते हैं? जब वह मिलावट करते हैं और नहीं हमारे पूर्वाचार्यों ने इस श्लोक का यह अर्थ बताया था। अब इसमें कुछ कुतर्की कुतर्क करते हैं। क्या भाई तुम्हें सारे शास्त्र एक एक शास्त्र क्या आचार्य ने पढ़ाए हैं? नहीं। आचार्य हमें परंपरा प्राप्त सिद्धांत देते हैं। उन सिद्धांतों के आलोक में हम शास्त्र को पढ़ते हैं। और कोई भी वचन शास्त्र का यदि उन सिद्धांतों के विपरीत जाता दिखाई देता है तो हम जाकर के आचार्य से सत्यापित करवाते हैं कि भाई यहां पर ये ऐसा क्या हो रहा है तो आचार्य ज्यादातर अधिकांश रहा तो उसका सही अर्थ बताते हैं जो हम समझने में सामर्थ्यवान नहीं थे और या फिर ऐसा हो सकता है यदि गीता प्रेस से चौखंबा ने ही वो श्लोक या वो मंत्र गलत उसमें छाप दिया होगा तो आचार्य बताएंगे कि यह पूर्वाचार्यों से हमें प्राप्त नहीं हुआ है। यह यहां पर प्रक्षिप्त है। तो कोई भी शास्त्र प्रक्षिप्त होगा ही नहीं। यह हम नहीं कह सकते हैं। हो सकता है। किसी के भी दिमाग में कभी भी विकृति आ सकती है। बस बात यह है कि आप प्रमाण्य बुद्धि किस में रखना चाहते हो? पब्लिकेशन में या परंपरा प्राप्त आचार्यों में?
00:10:52:28 तो आचार्य के पास बैठकर के एक एक शास्त्र नहीं पढ़ा जाता है। आचार्यों के द्वारा प्राप्त सिद्धांतों के आलोक में शास्त्रों का स्व अध्ययन किया जाता है। और यदि कोई ऐसी बात आती है जो आचार्यों के द्वारा दिए गए सिद्धांत के विपरीत जाती हुई दिखाई दे रही है तो वहां पर आचार्य हमारा मार्गदर्शन करते हैं कि इस वचन का अर्थ यह लेना है अथवा यह लेना है। जैसे हनुमान जी वाले विषय में वाल्मीकि रामायण का आप स्वा अध्ययन करिए। आचार्य कोई नहीं है तो क्या होगा वहां स्वा अध्ययन करते समय आपको आएगा अरे हनुमान जी तो ब्रह्मचारी है सीता माता उनकी मां माता के तुल्य है फिर भी उनके अंग प्रत्यंगियों के बारे में इतना खुल खुल के वो विचार विमर्श कर रहे हैं कैसे कर पा रहे हैं भाई जिनके प्रति माता की दृष्टि है वो भी ब्रह्मचारी होते हुए तब वहां आचार्य के पास जाएंगे आचार्य के यदि सिद्धांत होंगे तो या तो खुद ही मनन कर करके कर करके उसका सही अर्थ प्राप्त कर लेंगे या फिर आचार्यों के पास चले जाएंगे कि भाई अगर हनुमान जी ब्रह्मचारी हैं और सीता माता के लिए जो है वो माता की दृष्टि रखते हैं तो फिर यहां पर ऐसा वर्णन क्यों है तब आचार्य बताएंगे या तो मनन से प्राप्त होगा और
00:12:08:02 यदि वह सिद्धांत नहीं होगा परंपरा प्राप्त बजरंगबली के जो है ब्रह्मचारी होने का माता जी के माता की तुल्य दृष्टि रखने का उनके सिद्धांत नहीं प्राप्त होंगे तो आपके मन में क्यों आएगा कि हम इसमें जो है हनुमान जी के लिए मनन करें चिंतन करें। सिद्धांतों के कारण हम उसकी सीमा में आएंगे कि नहीं इसका ऐसा अर्थ हमें मनन करके निकालना है जो इसके साथ मेल खाए। अन्यथा गुरु के पास जाकर के इस बात का सत्यापन कराना है कि यह क्या कह रहा है श्लोक तब आंसर मिलेगा कि यदि हम किसी भी स्त्री को ढूंढने जाते हैं भले ही हम अपने घर की ही माताओं और बहनों को ढूंढने जाते हैं तो कहीं पर भी जब ढूंढने जाएंगे तो सबसे पहला जो परिमाप है कि हम किसको ढूंढने आए एक स्त्री को तो उसकी जो शारीरिक बनावट है वो भी एक स्त्री के तुल्य ही होगी एक स्त्री की भांति ही उसकी बनावट होगी और भले ही ऊपरी सतह में नहीं परंतु कई परतों के बाद एक अंदरूनी सतह में यह विचार होता है कि जिसको हम ढूंढने आए हैं उसके अंग इस प्रकार के होने चाहिए होंगे। तब हम यह अपने मन में निर्णय कर पाते हैं कि वह एक स्त्री है। तो वह जो अंदरूनी सतह
00:13:23:03 के विचार विमर्श थे एक स्त्री होने के लिए जो सबसे पहले शारीरिक संरचना आवश्यक है वो वहां पर हनुमान जी के मन में जो विचार चल रहे हैं और जिसको जो है नग्न सत्य के रूप में वाल्मीकि जी ने लिखा है। तब हम समझ पाएंगे ना। इसमें एक चीज और हो सकती है कि भाई आपको भगवती ने आकर के या भगवान के किसी रूप ने आकर रूप ने आकर के स्वप्न में दीक्षा दे दी या स्वप्न में ग्रंथों को सत्यापित कर दिया। स्वप्न में जो है सिद्धांत दे दिए या फिर किसी दैय घटना के द्वारा वह आपको दर्शन दे दिए और उन्होंने आपको सिद्धांत दे दिया। उन्होंने आपको ग्रंथ दे दिया तब भी उसका सत्यापन किसी व्यवहारिक परंपरा प्राप्त आचार्य से कराना पड़ेगा। नहीं कराना पड़ेगा। नहीं कराओगे तो भगवान तो छल भी करते हैं। मोहिनी के रूप में छल किया कि नहीं किया?
00:14:15:25 बुद्ध के रूप में छल किया कि नहीं किया? तुमको कैसे पता कि वैदिक ज्ञान ही दे रहे हैं। वैदिक ज्ञान उस वैदिक उसको वैदिक ज्ञान कहने के लिए वेद ग्रंथों से वैदिक ग्रंथों से उसका मिलान करना पड़ेगा। मिलान करने के लिए जिस वैदिक ग्रंथ के पास आप जाओगे उसको प्रदान करने वाला जो होगा वह आपका शब्द प्रमाण मानना पड़ेगा आपको नहीं तो पब्लिकेशन को मान लो उसको छापने वाले या फिर उसको सत्यापित करने वाले किसी गुरु को मान लो ये चॉइस तुम्हारी है कि एक जो आधुनिक आधार पर बनी हुई कोई संस्था इत्यादि आपका शब्द प्रमाण है और या फिर परंपरा प्राप्त कोई सन्यासी आपका शब्द प्रमाण है मानना तो पड़ेगा शब्द प्रमाण नहीं तो वैदिक वेदों को मानने वाले स्वयं को सिद्ध कैसे करोगे? वेदों से मिलान नहीं किया तो आपने कैसे मान लिया सिद्धांत वैदिक है। अच्छा उस शक्ति ने कहा तो भगवान तो कुछ भी कर सकते हैं। सर्वसामर्थन है। तभी तो अपषय ग्रंथ हमारा वो है क्योंकि भगवान कुछ भी कर सकते हैं। हमारा शब्द प्रमाण अपशय ग्रंथ क्यों है? वेद क्यों है हमारा? बुद्ध को क्यों नहीं माना? इसीलिए कि भगवान तो दुनिया में जो भी कुछ घटित हो रहा है सतसत सब कुछ सबके नियामक वही है।
00:15:31:01 तो इसलिए केवल किसी दिव्य घटना के आधार पर स्वप्न में मिलने के कारण मिल मिलने वाले सिद्धांत मंत्र को हम वैदिक नहीं मान सकते जब तक उसे हम किसी प्रामाणिक आचार्य से सत्यापित नहीं करवा लेते और सत्यापित यदि करवाया तो अब उसके प्रति हमारी निग्रह की दृष्टि नहीं रहेगी। ये सवाल इसीलिए था कि आप वो तो उसने वहां कहा नहीं बचने के लिए। उसने कहा मैं बताऊंगा ही नहीं। अगर मंत्र में मंत्र सपने में प्राप्त हुआ है। ये वो कहता तो मैं कहता सत्यापित कहां से कराया? कैसे पता कि भगवान ने आपको छलने के लिए नहीं किया है। आपको कैसे पता? भगवान ने यह सपना भगवान ने ही दिया है या फिर किसी अनिष्ट शक्ति ने दिया है। यह आपको कैसे पता?
00:16:15:13 तो वो आपको किसी प्रामाणिक आचार्य से आप सत्यापित कराएंगे। जब सत्यापित कराएंगे तो जो आप प्रामाणिक जिस आचार से अपने सपने को सत्यापित करवा रहे हैं वह आपका शब्द प्रमाण सिद्ध होगा। यदि उसके प्रति भी आप निग्रह की दृष्टि रखते हो तो फिर उसके द्वारा आपका मंत्र सत्यापित होना सिद्ध नहीं होगा। समझ रहे हैं? जैसे मान लीजिए आपने कहा अमृतानंद सरस्वती जो हैं उनसे मैंने अपने सपने के प्राप्त होने वाले मंत्र को सत्यापित करवा लिया जाकर के। ठीक है? अब अमृतानंद सरस्वती तुम्हारे शब्द प्रमाण है। यदि उनके बताए हुए मंत्र पर तुम्हें बिल्कुल अक्षरस भरोसा है। क्यों? क्योंकि यदि वह तुम्हारे तुम्हें कहीं भी किसी भी जगह धर्म की व्याख्या गलत कर सकते हैं तो वह तुम्हारा गलत मंत्र भी सत्यापित कर सकते हैं। तो क्या तुम अमृतानंद सरस्वती के लिए या उस परंपरा के लिए प्रमाण्य बुद्धि रखते हो शब्द प्रमाण की बुद्धि रखते हो नहीं रखते हो। क्यों? क्योंकि उसके जो जो जिनका तुम नाम ले रहे हो अमृतानंद सरस्वती उनके जो गुरु हैं निगमंद सरस्वती वह तो भगवान ईसा को बता चुके हैं। ईसा
00:17:30:14 मसीह भगवान है। तो इतने अंश में तो तुम्हें दोष बुद्धि लानी ही पड़ेगी। जाहिर सी बात है। सही बात है। ईसा भगवान थोड़ी ना है। ईसा तो क्या हुआ? तुम्हारी उसमें दोष दृष्टि आ गई। तो जो तुम्हें गलत प्रतिबिंब को ईसा को भगवान बता सकता है। वह तुम्हारे गलत मंत्र को सत्यापित भी कर सकता है। इसको अर्ध कुकुट न्याय कहते हैं। अर्ध कुकुट न्याय तो इसलिए जिससे आप ग्रंथ ले रहे हो उसके प्रति दोष दृष्टि नहीं रख सकते। उसकी एक बात पर भरोसा और दूसरी बात पर आप जो है अविश्वास एक बात पर विश्वास और दूसरी बात पर अविश्वास नहीं कर सकते। हां उसके आचरण संबंधित जैसे उसने कहा कि मदिरापान गलत है। अब इसके बाद वो स्वयं मदिरापान कर रहा है तो उसी ने तुमको धर्म अधर्म की व्याख्या दी है। उसी ने बताया है कि मदिरापान गलत है। उसी ने शास्त्र भाष्य सहित शास्त्र दिया है जिसके अनुसार उसके द्वारा स्वीकार सिद्धांतों के अनुसार वो कुछ ऐसा कर रहा है जो कि गलत है। तब तुम उसके आचरण का विरोध कर सकते हो। आचरण का विरोध करो। मगर उसकी धर्म की व्याख्या पर उसकी कथनी पर आप अविश्वास प्रकट नहीं कर सकते क्योंकि जो एक जगह भी झूठ बोल सकता है वो
00:18:45:18 सब जगह झूठ बोल सकता है तो वो आपका शब्द प्रमाण सिद्ध नहीं होगा तो आपका जो सपने में या दिव्य घटना के द्वारा प्राप्त होने वाला मंत्र है सिद्धांत है शास्त्र है वो उसके द्वारा सत्यापित होना सिद्ध नहीं होगा फिर से वही बात आ जाएगी फिर वैदिक कैसे पता चला कि वैदिक सिद्धांत है कैसे पता चला है वैदिक मंत्र है। ठीक है? तो गुरु गोविंद और ग्रंथ केवल ग्रंथ नहीं केवल गोविंद नहीं और केवल गुरु भी नहीं। गुरु का सत्यापन ग्रंथ से होगा। ग्रंथ में इतने सारे सिद्धांत दिए हैं। वो सब लक्षण घटित होंगे आचार्य पर। वही आचार्य आचार्य है। ये कैसा आचार्य जिससे पूछा जाता है शास्त्र कैसे प्राप्त हुए? कुछ भी बोल रहा है। जो मन में आया वो बोल रहा है। हमको सिद्धांत इन्होंने दिए। हमें अतीत जन्मांतर से प्राप्त है। कुछ भी बोल रहा है। यह आचार्य हैं। रामो दुरनाभि भाषेते राम को तो खैर इसने क्या बना दिया है वो अभी आगे बात करेंगे। तो इतनी बात आपको समझ में आ गई कि स्वतंत्र रूप से शास्त्र का कोई अस्तित्व नहीं है। वो हमारा प्रमाण नहीं बन सकता स्वतंत्र रूप से। क्यों? क्योंकि अगर हम स्वतंत्र रूप से किसी भी ग्रंथ को छपे हुए ग्रंथ को या लिपिबद्ध ग्रंथ
00:20:00:21 को प्रमाण मान रहे हैं तो वो उस रूप में जिसने हमको दिया है वो हमारा प्रमाण हो रहा है। फिर हमको यह कहना पड़ेगा गीता प्रेस झूठ नहीं बोल सकती। फिर भविष्य पुराण का तो खंडन करते हो आप। तो क्योंकि आपने कह भी रखा है कि हम सभी संप्रदायों में जो भी शास्त्रीयता होगी शास्त्रार्थ के द्वारा उसका निग्रह करेंगे। तो यह निग्रह करने की दृष्टि ही सबसे बड़ी दुश्मन है निग्रह संप्रदाय की। निग्रह कैसे करोगे? एक को तो छोड़ना पड़ेगा। एक को शब्द प्रमाण बनाना पड़ेगा। जैसे ही बनाया किसी को शब्द प्रमाण निग्रह संप्रदाय समाप्त। इस दिशा में मेरा प्रश्न था। यदि आप उसको उत्तर देंगे तो फंस जाएंगे। तो क्या हुआ? कि यदि आपको सपने में मंत्र प्राप्त हुआ है तो वह आपने अगर सत्यापित किसी से नहीं कर पाया तो उसकी वैदिकता सिद्ध नहीं होती है। और अगर किसी से सत्यापित करवाया है तो जिससे सत्यापित करवाया है उसके प्रति दोष दृष्टि नहीं रख सकते। उसके व्याख्यानों के लिए उसके भाष्य के लिए उसके शास्त्रीय अर्थ के लिए आप दोष दृष्टि नहीं रख सकते। जो एक जगह भी झूठ बोल सकता है वो सब जगह झूठ बोल सकता है। वो आपको गलत शास्त्र दे सकता है। वो गलत किसी व्यक्तित्व को भगवान बता सकता है। तो जब वो ईसा को भगवान बता रहा है
00:21:16:19 तो तुम्हारे स्वप्न में आने वाली गलत शक्ति को भगवान नहीं मान सकता है। इतनी सी बात नहीं समझ में आ रही है। और लगे वर्णाश्रमी अंधे बने उसका पीछा कर रहे हैं। अरे नहीं नहीं जीत गए जीत गए जीत गए। वह वाली बात है ना कि व्यक्ति को सारे प्रत्यक्ष प्रमाण दिखा दो भैया देखो यह चरित्रहीन है यह है वह है तब भी उनको समझ में नहीं आता क्यों ये दिल लगा गधी से तो परी क्या चीज है वही हाल है तुम लोगों का किसी एक समय में उसने कुछ ऐसा किया जो आप लोगों के क्या कहते हैं मन में आस्था आ गई उसके लिए तो अब जो उसकी कुछ विषयों में जहां पर वो जो है शास्त्र विरुद्ध सिद्ध हो रहा है तर्क विरुद्ध सिद्ध हो रहा है वहां पर भी उसका आंख मूंद कर समर्थन करोगे और वो लोग जिनको जो है अपने प्रारब्ध से परंपराएं प्राप्त हो गई है। वर्णाश्रम प्राप्त हो गया है। वो लोग ऐसा कर रहे हैं। यह दुख की बात है। बिना सोचे समझे आकर के कह रहे हैं कि नहीं नहीं तुम्हारा एक ही प्रश्न है। परंपरा अरे भाई परंपरा पे ही तो चर्चा थी तो वही तो प्रश्न करेंगे। उसमें तो कुछ बताया नहीं व्यक्ति ने। तो अभी तक की बातचीत का सार क्या है? कि भागवतानंद का जो सिद्धांत मंत्र और शास्त्र है उसकी वैदिकता सिद्ध नहीं होती है। यदि वह किसी गुरु परंपरा
00:22:31:27 पर आश्रित आश्रित नहीं होता है और यदि आश्रित होता है तो उसमें दोष दृष्टि ना रख पाने के कारण निग्रह संप्रदाय का अस्तित्व सिद्ध नहीं होता है। ठीक है? और यदि वह स्वतंत्र रूप से कहता है कि मैंने जो है शास्त्र जो शास्त्रों के आधार पर चलूंगा तो उन शास्त्रों को छापने वाली कंपनी इत्यादि उसका शब्द प्रमाण सिद्ध होंगी। उसका भी वह खंडन नहीं कर पाएगा। जबकि वह तो कर रहा है तो निग्रह संप्रदाय का अस्तित्व वहां भी सिद्ध नहीं होगा क्योंकि वह खंडन कर रहा है उनका। तो जिस संस्था इत्यादि पर आपको विश्वास ही नहीं है कि ये गलत कर सकती है। धर्म की गलत व्याख्या कर सकती है। उसके छपे हुए किसी ग्रंथ को तुम कैसे कह सकते हो? इसमें वही श्लोक है जो भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को कहे थे। प्रमाण बुद्धि दिखानी पड़ेगी ना। तो यह सबसे पहली बात है। दूसरी बात क्या है कि यदि पब्लिकेशन पर हम लोग आ जाएंगे, पब्लिकेशन को अपना शब्द प्रमाण मान लेंगे, छापने वाले को मान लेंगे तो वो हमारे धर्म का निर्णय करेगा। वो जो चाहेगा वो छापेगा। हम यह नहीं कह सकते अब तुमने गलत छापा है। कहा अगर यह मान लिया कि उसने गलत छापा है तो उसने पहले जो दिया था वह भी तो गलत हो सकता है। जब आज वह अपने श्लोकों को बदल रहा है। वो दोष दृष्टि देख रहे हैं तो पहले जो दिया था वो भी तो गलत हो सकता है।
00:23:49:10 तो प्रमाण बुद्धि का थोड़ा सा अध्ययन करें। प्रमाण बुद्धि किसे कहते हैं? जैसे वेद वेद के एक भी अक्षर को हम यह नहीं कह सकते कि नहीं नहीं ये वाला हम नहीं मानेंगे। जैसे ही कहा तो जो एक जगह गलत हो सकता है वह सब जगह गलत हो सकता है। इसी को कहते हैं अर्ध कुकुट न्याय जो ज्यादातर आर्य समाजी और यह सब लोग किया करते हैं और उनको हम परंपरा वाली बात ला के समझाते हैं। मगर जो स्वयं परंपरा से सद्ध है जो स्वयं वर्णाश्रमी है वो यह करेंगे तब तो दुख होगा ना। अब एक अगली बात आती है कि मान लीजिए कि कोई गुरु ऐसा मिल ही नहीं रहा है जिसको हम जिसमें हम प्रमाण्य बुद्धि रख सके जिसमें दोष दृष्टि ना होने की धारणा को हम धारण ना कर सके ऐसा कोई गुरु हो ही नहीं वो मिल ही नहीं रहा है तो पहली बात तो यह अहंकार है गुरुदेव कहते हैं पूरी के शंकराचार्य जी वो कहते हैं कि जो व्यक्ति यह कहने लगे ना मुझे गुरु बनाने लायक कोई मिल ही नहीं रहा है समझ लो बहुत बड़ा अहंकारी है। दूसरी बात यह है कि भगवान ने शास्त्रों में कब कहा है कि मैं आता हूं। जब जब धर्म की हानि होगी यदा धर्मस भवती भारत अभान
00:25:04:12 अधर्मस तदात नाम सजाम में हम साधु भक्तों के उद्धार के लिए परित्राणाय साधु नाम साधु भक्तों के उद्धार के लिए आता है ना कोई ना कोई साधु भक्त बचेगा तब ना आएंगे भगवान यानी कि आपका यह कहना ही गलत है कि साधु भक्त सारे खत्म हो गए हैं कोई मिल ही नहीं रहा है यह कहना आपका गलत है धर्म का अस्तित्व तभी तक है जब तक उसको धारण करने वाला कोई ना कोई विद्यमान है। महापुरुष तो यह कहना गलत है कि कोई मिल ही नहीं रहा है जिसमें मैं प्रमाण बुद्धि रख सकूं। पहली बात तो यह है। दूसरी बात यह है कि मान लेते हैं कि खत्म हो गया। दुर्जन न्याय से सब मर गए। सारे ब्राह्मण, सारे सन्यासी सब कुछ गलत है। तुम कोई नहीं बचा जिसमें हम प्रमाण्य बुद्धि रख सके। और हमारे पास दिव्य शक्तियों के द्वारा जो है ऐसी धारणा से आ रहा है कि भैया हमारे पास धर्म और अधर्म का ज्ञान है। तो हम यह तो कह सकते हैं कि यह मोक्ष को प्राप्त करने की बातें यद्यपि असंभव है। फिर भी हम यह तो कह सकते हैं कि सद्गति को प्राप्त करने के नियम यह हैं। मोक्ष को प्राप्त करने के नियम यह है। पर हम यह नहीं कह सकते वो जो शय भाष्य वाले वेद मंत्र है ना यह उन्हीं का अर्थ है।
00:26:20:24 ना यह नहीं क्लेम कर सकते। क्यों नहीं कर सकते? क्योंकि वो वेद मंत्र आए किससे उस पर तुम्हें विश्वास है नहीं। तो आपको अपना एक स्वतंत्र ताना-बाना बुनना पड़ेगा। स्वतंत्र ताना-बाना बुनने का मतलब समझ रहे हो ना? स्वतंत्र ताना-बाना ही होता है इस्लाम। स्वतंत्र ताना-बाना ही होता है बाइबल। मैं नहीं मानता वेद को। भगवान के पास पहुंचने का यह रास्ता है। मैं नहीं मानता वेद को भगवान के पास पहुंचने का, सद्गति प्राप्त करने का, खिरात प्राप्त करने का यह कुरान रास्ता है। तब बनते हैं। ठीक है? तो यदि आप कह रहे हैं कि ऐसा कोई है ही नहीं जिस पर विश्वास ना किया जा सके और आपको दिव्य दिव्य योजना के द्वारा जो है प्राप्त हो रही चीजें जैसे मोहम्मद को प्राप्त हुई थी वैसे ही आपको प्राप्त हो रही चीजें। तो आप उनको उनके दिव्यता का तो कर सकते हो दावा। यद्यपि उसमें दर्शन का इतना अभाव होगा कि पूछो नहीं। फिर भी उनकी दिव्यता का दावा तो ठोक पाओगे। मगर उनके वैदिक होने का वो वैदिक जो वैदिक किसी परंपरा से यहां तक पहुंचे। उन वेदों के अर्थ में उसका पर्यावसान नहीं कर पाओगे। ये तुम नहीं कह
00:27:36:00 सकते कि नहीं ये जो अर्थ है उसी का है। ठीक है? तो ये दूसरे चैप्टर में बात क्या हो गई? यदि अगर कोई नहीं मिल रहा है और तुम्हारे पास दिव्य ज्ञान आया है तो उसको तुम वैदिक मत नहीं कह सकते हो। उसको तुम्हें कहना होगा मेरा यह नया मत है और कुरान और बाइबल जैसी कुछ जो है निकाल दो भैया नया तंत्र नया कल्ट ऐसे ही बनते हैं नए कल्ट कल्ट नया ऐसे ही बनता है। पुरानी व्यवस्थाओं के विरोध में परंपराओं के विरोध में ठीक है? परंपरा से चले आ रहे ज्ञान विज्ञान के विरोध में आ गई। अब बात आती है कि बुद्ध और आर्य समाज के विषय में अगर हम उनका खंडन करने जाते हैं। बुद्ध का खंडन करने जाते हैं तो क्या हम उनसे दीक्षित होते जो उनका हम खंडन करते हैं? यह भी बहुत बड़ी बेवकूफी भरी बात है। बुद्ध का जब हम खंडन करने जाते हैं तो यह दावा नहीं करते हैं कि हम तुम्हारे शास्त्रों पर विश्वास करने वाले हैं। तुम जिन शास्त्रों में प्रमाण्य बुद्धि रखते हो और जो शास्त्र हमें तुमसे ही प्राप्त हुए हैं उसको तुमसे ज्यादा हम जानते हैं। हम उनके पूरे के पूरे वांगमय को लेकर के उनकी मान्यता पर प्रहार करते हैं। तर्क से मारते हैं। हमारे वेदाद शास्त्रों से प्राप्त जो हमें तर्क है उनसे हम उनको गिराते हैं
00:28:51:22 जो हमें अपने वैदिक वांगमय से प्राप्त है। स्वतंत्र रूप से बुद्ध का खंडन करते हैं। हम यह दावा थोड़ी ना करते हैं कि जो शास्त्र में तुम्हारे ही माध्यम से बुद्ध के शास्त्र प्राप्त हुए हैं वो हम तुमसे ज्यादा जानते हैं। ना और आर्य समाज आर्य समाज में भी हम दयानंद सरस्वती के मत में हम यह दावा नहीं करते हैं कि दयानंद सरस्वती ने जो लिखा है जो कहा है वो दयानंद सरस्वती के फॉलोअर से ज्यादा हम जानते हैं। हम कहते हैं कि उसने क्या कहा है वो इस प्रकार से गलत है और जब वो शब्द प्रमाण का तर्क से खंडन करते हैं जब वो शब्द प्रमाण का सहारा लेता है। तर्क से सिद्धांतों से खंडन करते जब वह शब्द प्रमाण का सहारा लेता है कि मेरी बात तो वेद का अर्थ है तब हम उससे पूछते तेरी परंपरा क्या है? जैसे आज तुमसे पूछ रहे हैं और इसीलिए अपनी तुलना तुमने आर्य समाज से करके अच्छा किया। ठीक है? इसीलिए तुमसे परंपरा पूछी जा रही है। कि तुम तर्क से काटोगे तो हम तुम्हें तर्क से जवाब देंगे। मगर जब तुम ये कहोगे जिस वेद को तुम मानते हो उसका हम तुम्हें अर्थ बता रहे हैं। तो हम तुमसे पूछेंगे वेद तुम तक आए कैसे हमसे हो के आए हैं। तो उस मामले में तो हम तुम्हारे शब्द प्रमाण हो गए। तो तुम हमसे कैसे कह सकते हो कि वेद का अर्थ हम गलत जानते तुम सही जानते हो अगर हम गलत अर्थ बता सकते हैं वेद का तो तुम्हें गलत मंत्र
00:30:06:26 भी तो दे सकते हैं इतना नहीं समझ में आ रहा है और चलो भागवतानंद को तो अपना एक क्रिएट करना है जो पहले से वर्णाश्रमी है उनको देख कर के मुझे तरस आता है इसके चक्कर में अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हो तुम लोग रामानुज परंपरा प्राप्त हो गई है आप लोगों इतने प्रकांड विद्वान की परंपरा में होते हुए इस धारणा का पोषण कर रहे हो कि गुरु में विश्वास मत रखो। गुरु में प्रमाण्य बुद्धि मत रखो। इस धारणा का पोषण कर रहे हो। जानते नहीं हो ना? प्रारब्ध से प्राप्त हो गया है। झोली में आकर डल गई परंपरा वर्णाश्रम। तो मालूम ही नहीं है वो कौन सा हीरा है।
00:30:53:15 संघर्ष से प्राप्त होता ना तब पता चलता। अकाट सिद्धांत है। प्राप्त हो गए तो हल्के में ले रहे हो। बाबा जी को सपने में आके मोहम्मद मोहम्मद ने भी यही कहा था कि मुझे जो है वो जिब्राइल आया था वो दे गया। बस उसने यह बात नहीं कही कि ये वेदों का ही अर्थ है। वो भी आज कोई ऐसा ही निग्रह करने वाला बनके घूम रहा होता। उस उसके यहां के लोग वही घूम रहे होते। जाकिर नायक आपके सामने खड़ा है। विधर्मी यहां से आपको शायद समझ में आ सके प्रैक्टिकल और उसने आपको कहा कि जन्मना जाते शूद्रा। वो साबित करना चाहता है कि जो
00:31:45:03 सनातन धर्म में जो वर्ण व्यवस्था है वो जन्म से नहीं कर्म से है। ठीक है? तो जन्म जाति शद्रा का अर्थ जैसे वहां पर कहा था ना भागवतानंद ने कि फल का अर्थ तो फल होता है और क्या होता है इतना विवेक भी नहीं है तो जन्म जाति शद्रा का अर्थ तो यही है कि जन्म से सब शूद्र है इसमें संस्कृत कर लो कैसे भी कर लो यही अर्थ निकलेगा तो कैसे काटोगे जाकिर नायक की बात को कैसे काटोगे पता है दूसरे शास्त्र लाओगे देखो यहां तो यह लिखा है या और महापुरुषों की वाणी लाओगे तो महापुरुषों की वाणी तो वो वो है नहीं प्रमाण्य बुद्धि है नहीं भाष्य अब तुम शास्त्रों के वचन लाओगे कि दूसरे में तो यह लिखा है। तो वो यह कहेगा कि भाई हम दो शास्त्रों में सामंजस्य की शिक्षा क्यों निकाले? हम यह क्यों ना कहे कि यह जो शास्त्र है सभी गलत है। क्योंकि यह कहीं कुछ कहते हैं और कहीं कुछ कहते हैं। गलत शास्त्र है। ये इनके प्रति अनास्था क्यों ना रखें हम। वो तो यह कहेगा ना। वो तो सनातन धर्म को ही नष्ट करने आया है ना। वो यह थोड़ी ना कहेगा कि नहीं सामंजस्य की शिक्षा निकाल ले। अगर यहां यह लिखा है कि जन्म से है यहां ये दिख रहा है कि कर्म से है तो जन्म से के आधार पर कर्म से को बदल दो। वो तो यह कहेगा दो तरह की
00:33:00:04 बात करने वाले शास्त्र हैं। गलत है। तो तुम्हारे पास क्या उत्तर होगा? ठेंगा। फिर क्या करोगे? फिर क्या करोगे? ज्यादा से ज्यादा हम भी कुरान में निकाल देते हैं। दो तरह की बातें। यद्यपि वहां भी वही बात आ जाएगी। कि तुमको कुरान मिली कैसे? खैर फिर भी अगर तुमने दो तरह की बातें निकाल दी। तो तुमने क्या किया? मेरे गलत होने से किसी और के गलत होने से तुम्हारा सही होना सिद्ध नहीं होता। भूल गए मतानुज्ञान निग्रह स्थान हा अगर तुमने कुरान में निकाल भी दी दो तरह की बातें तो तुमने सनातन की दो तरह की बातों का जो खंडन कर रहा है वो हो गया। सेट हो गया। भाई जिसकी आस्था है सनातन वैदिक वांगमय में वह तो इस बात को मानेगा कि दूसरे शास्त्र जो है उससे मिलान करते हुए हर शास्त्र आपस में सामंजस्यता से चलने चाहिए। मगर जो यह चैलेंज करने आया है कि सनातन धर्म गलत है। उसके ग्रंथ गलत है। वो थोड़ी ना सामंजस्य निकालेगा। वह ऐसी स्थिति आने पर कहेगा विरोधाभासी है। किसी मानव ने लिखे हैं। क्योंकि ईश्वर से तो गलती हो नहीं सकती। किसी मनुष्य ने बनाए हैं। इसीलिए जो उसमें कहीं पर कुछ कहीं पर कुछ लिखा हुआ है। ठीक है? उस दिन तुम्हें याद आएगी
00:34:16:02 गुरु परंपरा की। क्योंकि तुम्हारी तो दो तुम्हारी तो प्रमाण्य बुद्धि होगी नहीं। मगर वहां पर मैं कहूंगा सीना ठोक के कि जन्म ना जाते। शूद्रा का अर्थ है सभी लोग जन्म से शूद्रवत होते हैं। और यहां पर संक्षिप्त में इस शैली में लिखा गया है। शूद्रवत होते हैं। वो कहेगा क्यों मान ले तुम्हारी बात? यहां ये लिखा है। इसलिए मान लो कि यह शास्त्र जहां से आया है उसने यह कहा है। जिसने यह शास्त्र हमको दिया है उसने इसका अर्थ यही बताया है। तो इसका मतलब क्या हुआ? कि जिससे शास्त्र मिल रहे हैं, जिसके कारण आप शास्त्र का अस्तित्व मान रहे हो, है ना? उसका विरोध आप नहीं कर सकते। ज्यादा से ज्यादा आप यह कह सकते हो कि यह शास्त्र है कि नहीं है हम जानते ही नहीं है। मगर आप यह क्लेम करते हुए हमको बरगला बहका नहीं सकते हैं कि इस शास्त्र में ऐसा ऐसा लिखा है। देखो मेरी बात सही है मान लो क्योंकि तुम जो बात कह रहे हो शास्त्र के अर्थ के रूप में वो बात उस शास्त्र को देने वाले ने स्वीकार नहीं की है। वो उसके विपरीत है तुम्हारा अर्थ। तीन बेर खाती थी वह तीन बेर खाती है। इसमें बेर
00:35:31:03 शब्द दो बार आ रहा है। दोनों बार अलग-अलग उसका अर्थ है। क्या करोगे? जिसने उसको लिखा है वो बताएगा मैंने यहां पर बेर शब्द का अर्थ क्या लिया है और यहां पर बेर शब्द का अर्थ क्या लिया है। इतना भेजा नहीं है। तब तुम्हें याद आएगा ये सिद्धांत गुरु परंपरा का। हम अपने धर्म को सीना चौड़ा करके शाश्वत कहते हैं। उसका कारण है गुरु परंपरा। दो अरब वर्ष पूर्व हमारे ग्रंथ इत्यादि प्रकट होते हैं। वह आज हमें जितने भी प्राप्त है वह वही वैदिक ग्रंथ है। कैसे कह सकते हैं? इसका आधार है गुरु परंपरा।
00:36:10:19 हमारे शास्त्र को शास्त्र समझने का आधार है गुरु परंपरा। हमारे धर्म और अधर्म का निर्णायक है गुरु परंपरा। और उस गुरु परंपरा के प्रति दोष दृष्टि अवेलना अपमानजनक दृष्टि। क्यों? क्योंकि दिल लगा गधी से तो परी क्या चीज है? अरे श्रुति का अर्थ क्या होता है? जिसे सुना गया उसे श्रुति कहते हैं। चलो मान लो आज छप रही है। फिर भी हमने किसी गुरु से सुना उसकी प्रमाणिकता के बारे में। तब वो श्रुति कहलाएगी। प्रमाणिकता तुमने किससे सुनी? अपने वैदिक मंत्रों की।
00:36:54:24 भगवान स्वयं आए थे बुद्ध के रूप में। इनको तो स्वप्न में आए हैं। वह कह रहे धर्म वो नहीं है। क्यों नहीं माननी उनकी बात? क्योंकि परंपरा प्राप्त आचार्यों में निष्ठा थी। परंपरा प्राप्त सिद्धांतों में निष्ठा थी। नया कल्ट मैंने कहा ना नया कल्ट। गुरु परंपरा के विरोध में जाओगे तो नया कल्ट तुम्हें खड़ा करना पड़ेगा। नया कल्ट खड़ा करो। यह चैलेंज मत करो कि हम वैदिक हैं। करो नया कल्ट। और फिर हम तुम्हारा आएंगे सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत धर्म पर बात करने तब आएंगे पहले वैदिकता की लाइन से बाहर निकलो अरे
00:37:32:07 जब गुरु का कोई गुरु की कोई आवश्यकता ही नहीं है स्वतंत्र रूप से सब लोग मनगढ़ंत तरीके से जहां से भी छपी किताबें ले सकते हैं तो फिर गुरु परंपरा का आश्रय क्यों लेते हो मैं श्री संप्रदाय का मैं फलाने संप्रदाय का क्या जरूरत है संप्रदाय की हम संप्रदाय का नाम बता के बताते कि मैं जो बात बोल रहा हूं धर्म के अर्थ के रूप में वह मुझे इस प्रामाणिक परंपरा से प्राप्त हुई है। यह छाती ठोक कर बताते हैं। यह है गुरु परंपरा। चाहे जितना तुम स्वप्न में ले लो दीक्षा ले लो ये कर लो। पूरी के शंकराचार्य जी को भी तो स्वप्न में धनुष धनुर विद्या के मंत्र प्राप्त हुए हैं। अरे तो क्या उस आधार पर वो शंकराचार्य है क्या? शंकराचार्य वह अपने पूर्वाचार्यों से प्राप्त अधिकार और सिद्धांतों के आधार पर हैं।
00:38:26:12 उनको धनु विद्या के वेद में धनु विद्या के मंत्र नहीं प्राप्त है तो क्या वो शंकराचार्य नहीं है? अब उस चर्चा में दो तीन बातें कुछ और हुई थी। यद्यपि वो चर्चा का मुख्य विषय नहीं थी। पर बात को विषय करने के लिए घुमाया गया। एक तो बुद्ध विषय है। एक शबरी वाला विषय है। है ना? एक दो पीठों का विषय है और एक विषय और था कोई दो पीठों का विषय था हां आदि शंकराचार्य जी की जो आदि शंकराचार्य जी का प्राकट्य को लेकर के तो बुद्ध के विषय में भी एक अलग से वीडियो बनाएंगे और शबरी के विषय में भी बनाएंगे। थोड़ा मोटा-मोटा यहां बता देता हूं। बुद्ध शुद्धोधन पुत्र जिसे कहा गया है अग्नि पुराण में उसमें वहीं पर जहां पर उसे शुद्धोधन पुत्र कहा जा रहा है। उसको माया मोह स्वरूप कहा गया है। माया मोह स्वरूप का अर्थ है कि वह सच्चिदानंद स्वरूप नहीं है। सच्चिदानंद अलग हो गया। माया मोह अलग हो गया। क्या तुम लोग रामानुजियों मधवाचार वालों रामानंदों अपने भगवान को अवतार को माया मोह स्वरूप मानते हो? कितना गिरोगे? इस पाखंडी के चक्कर में भगवान का अवतार सच्चिदानंद
00:39:41:22 स्वरूप होता है कि माया मोह स्वरूप होता है? गिर जाओ मत से बदतर हो जाओ। सच्चिदानंद स्वरूप होते हैं भगवान। अरे अपनी आत्मा में देखो, दर्पण में जाकर देखो क्या कर रहे हो। भगवान के अस्तित्व पर ही उंगली उठा रहे हो। माया मोह स्वरूप हो गया। भगवान का अवतार इसलिए वहां मानना पड़ेगा कि तादात्म प से भगवान ने माया मोह के स्वरूप को भेजा था। परंतु वो स्वयं नहीं आए थे। स्वयं वो ब्राह्मण घर में उत्पन्न हुए थे। इस बारे में विस्तृत विवेचन अलग से कर देंगे। मगर अभी मोटा मोटा पकड़ो। शुद्धोधन पुत्र को माया मोह स्वरूप कहा गया है। माया मोह स्वरूप क्यों कहा?
00:40:27:10 तो माया मोह स्वरूप के द्वारा भी वह जो है वेदों से दूर करवाते हैं। मगर माया मोह स्वरूप अलग है और सच्चिदानंद स्वरूप अलग है। सच्चिदानंद स्वरूप स्वयं भगवान का अवतार है। तो शुद्धोधन पुत्र जो था वो माया मोह स्वरूप था। भगवान का स्वरूप नहीं था। मधुकेट भी भगवान से ही उत्पन्न है। कान के मैल से तो भगवान हो गए क्या? और शबरी के मामले में तो कहना ही क्या है? युगों युगों से हम लोग लड़ते चले आ रहे हैं कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने कभी भी मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया। मगर यह भाई साहब इस बात पर तुले हुए हैं कि नहीं नहीं वहां पर उन्होंने ब्रह्म भाव से शबरी के झूठे भेर खा लिए। मर्यादा का उल्लंघन कर दिया। है ना? ब्रह्म भाव से खा लिए। इसलिए कहते हैं कि देवताओं का अनुकरण नहीं करना चाहिए। हां नहीं करना चाहिए। मगर देवता विग्रहवान धर्मा नहीं होते। रामो विग्रहान धर्म है धर्म का साक्षात स्वरूप है वो मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं होते हैं देवता मर्यादा पुरुषोत्तम है वो उन पर हम दोष दृष्टि नहीं रख सकते कि वो भी मर्यादा का उल्लंघन करेंगे यही अंतर
00:41:42:16 है कृष्ण अवतार और राम अवतार में वो लीला पुरुषोत्तम है वो ब्रह्म भाव से सब कुछ करके दिखा देंगे मगर ये मर्यादा पुरुषोत्तम है ये धर्म को धारण करके दिखाएंगे इस जन्म का प्रयोजन यही है धर्म को धारण करके दिखाना श्री राम हमारा आदर्श नहीं है। रामायण हमारे लिए अनुकरणीय नहीं है। रामचरित यूं ही रामचरितमानस बन गई। राम का चरित्र यूं ही लिख दिया गया। जब उस चरित्र का पालन ही नहीं करना हम लोगों को। तो अगर ब्रह्म भाव से वो जब शबरी के झूठे बेर खा सकते हैं तो ब्रह्म भाव से सुप से ब्याह नहीं कर सकते। वैष्णो माता को क्यों बोल दिया कि मैं अगले जन्म में आऊंगा उनसे उनको भी स्वीकार कर लेते और वो जो 16800 जो विवाह किए उन्होंने कृष्ण रूप में वो भी कर लेते वही के वही क्यों इंतजार करवाया ब्रह्म भाव से जो भक्त था उसको स्वीकार स्वीकार करते ये सब बातें मुझे बतानी पड़ रही है हां ये दुख की बात है
00:42:51:08 एक भागवतानंद के चक्कर में कितने वर्णाश्रमी कितने रामानुजी कितने परंपरा प्राप्त सिद्धांतों को मानने वाले अपने ही गुरु तत्व में अविश्वास रखने की धारणा का पोषण कर रहे हैं। हां नहीं नहीं गुरु भी गलत कर सकता है। अरे गलत कर सकता है तो गलत सिद्धांत भी तो दे सकता है। गलत मंत्र भी तो दे सकता है। कैसे करोगे विरोध उसका? गुरु का अर्थ होता है गु का मतलब अंधकार रू का मतलब निकालने वाला अद्वैत का उपनिषद जो तुम्हें अंधकार से निकालता है वो गुरु है और जिस पर तुम्हें भरोसा ही नहीं हो रहा कि ज्ञानी है कि नहीं ज्ञानी है तुम्हारा ज्ञान उससे ज्यादा तुम्हें प्रतीत हो रहा है वो गुरु कैसा तुम्हारा गुरु ही सिद्ध नहीं होगा यदि उसकी तात्विक व्याख्या पे आपको विश्वास नहीं है शास्त्रीय अर्थ पर उसको आपको विश्वास नहीं है वो आपका गुरु ही सिद्ध नहीं होगा क्योंकि वो तो अज्ञानी है ना आपकी नजरों में झूठ बोल रहा है वो भी अज्ञानी है
00:43:58:14 जिसका गुरु नहीं वो पशु के समान है विद्या गुरु के मुख में रहती है प्रयत्न करने पर हमें गुरु मुख से प्राप्त करनी चाहिए कहां लिखा है गुरु गीता पशु के समान है जिसका कोई गुरु नहीं है तो यदि कोई गुरु नहीं या तो ये मान लो कि तुम्हारे वो गुरु है ही नहीं जिनको तुम गुरु कह रहे हो क्योंकि यदि वह अज्ञानी सिद्ध हो रहे हैं तुम्हारा अंधकार ना मिटाने वाले सिद्ध हो रहे हैं तुम्हारा अज्ञानता रूपी अंधकार नहीं मिटा पा रहे हैं तो वो तुम्हारे गुरु कहां सिद्ध हो रहे हैं तो या तो ये क्लेम कर दो वो गुरु नहीं है और या फिर उनमें प्रमाण्य बुद्धि रखो मेरे भाइयों प्रमाण्य बुद्धि रखो अब दो विषय बचते हैं कि भाई सुमेरु पीठ तो सुमेरू पीठ के बारे में मैंने बताया भी प्रयास किया मैंने कि भाई करपात्री जी ने गोवर्धन पीठ के अंतर्गत ही सुमेरू पीठ का सुमेरू पीठ की स्थापना की थी और अपने प्रामाणिक शिष्य को बता कर गए हैं सन्यासी को धर्म और अधर्म के निर्णय में निर्णायक कौन होगा? सन्यासी विरक्त मनुस्मृति 12वा अध्याय पढ़िए जाकर के धर्म के विषय में अंतिम निर्णायक कौन है? हर जगह अंतिम निर्णायक विरक्तता को बताया गया। विरक्त
00:45:13:22 होगा। तो उनके जो प्रामाणिक शिष्य हैं और लक्षणों से शास्त्रों द्वारा जो प्राप्त वचन है उनके उनके साथ जिसका सामंजस्य है वह बता रहा है मेरे कृपात्र जी महाराज ने जाते समय मुझे बताया है कि सुमेरु पीठ उनके लिए क्या थी हां लोकाचार की दृष्टि से महात्म के वर्णन करते समय उसे भी उसी के तुल्य रखा जाता है पांचों पीठों के तुल्य परंतु वो एक अपने आप में स्वतंत्र रूप से प्रामाणिक पीठ नहीं है गोवर्धन पीठ के अंतर्गत आने वाली ही पीठ यद्यपि यह और आदि शंकराचार्य जी का जो प्रकट का जो मामला है जिसमें शंगेरी और गोवर्धन पीठ में अंतर दिखाई देता है लोगों को यह दोनों ही विषय क्या धर्म ब्रह्म को प्रभावित करते हैं ये दोनों ही विषय क्या शास्त्रीय विषय हैं नहीं है दोनों ही विषय शास्त्रीय नहीं है और यही कारण था कि हम इन कुछ विषयों को लेकर के वहां पर ज्यादा आगे नहीं बढ़े क्योंकि वो सारी चर्चा इन्हीं में हो के एक दो घंटे में और फिर कोई ना कोई व्यक्ति तो थे ही वहां पर विवाद करने वाले जो लास्ट में बोलने लगे। सुना ना जाहिलियत करने आ गए हो, बैठ गए हो, मूर्खता कर रहे हो, बदतमीजी कर रहे हो। ये क्या होता है कि अगर कोई चर्चा हो रही है तो अगर
00:46:28:28 अपने पक्ष पे नहीं जा रही है तो ऐसे विवादित टिप्पणियां करने लगो जिससे कि मामला भड़क जाए और जो हो सकता है निर्णायक कुछ प्राप्त हो सकता है वो ना हो। तो यदि हम इन प्रश्नों में फस जाते यद्यपि हमने एक संक्षिप्त संक्षिप्त अपना पक्ष रखा परंतु यदि उसमें विस्तृत विवेचना में अगर वही के व अगर हम जाते तो जो मूल विषय था निग्रह संप्रदाय की प्रामाणिकता वो तो कहीं गायब ही हो जाता और ऐसे ही विवाद विवाद हो के चले जाते वहां से वापस ए गाली क्यों दे रहा भाई जाहिल किसको बोला भाई खैर तो ये कुछ जो प्रश्न लाए गए थे विषय अंतर करने के लिए इसमें भी मैंने एक संक्षिप्त रूप से अपना पक्ष रखते हुए सीधे मूल विषय पर बार-बार आने का प्रयास किया और मूल विषय पर जितनी बार आया उतनी बार सामने वाला मुंह ही खाया। दो दो शंकराचार्यों में शंकराचार्य के प्राकट्य को लेकर के अलगाव क्यों है? अंतर क्यों है? इससे धर्म ब्रह्म की व्याख्या कहां परिवर्तित हो गई? मैंने वहां भी ये बात कही। और अगर तुम परम सत्य के विषय में रामानुज संप्रदाय में और शंकर संप्रदाय के अंतर को स्वीकार कर रहे हो और लोगों को यह कह रहे हो जिसकी जिसमें निष्ठा हो उसको मान ले। जो परम सत्य है उसको
00:47:44:04 लेकर के तो तुम स्वीकार कर रहे हो की भाई जिसकी जिसकी जिसमें निष्ठा हो उसको स्वीकार ले। और जो यह जो वस्तुनिष्ठ जानकारियां है जिससे कि धर्म ब्रह्म पर मनुष्य के कल्याण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना है उसको लेकर के तुम अगर दो पीठों के बीच में अंतर आ रहा है तो उसमें सिद्धांत को तुम स्वीकार नहीं कर पा रहे हो कि जिसकी जिस गुरु में निष्ठा हो वो उसके द्वारा दिए गए सिद्धांत को मान ले तब हुआ आदि शंकराचार्य जी का जन्म या फिर तब हुआ जबकि तुम अपने ही वीडियो में कल्पांतर से कल्पांतर भेद से दोनों की बातों को मान चुके हो हां तो विषय को बचाने के लिए भी कई बार अपने ऊपर उठने वाले आक्षेपों के विषय में पर्याप्त उत्तर प्राप्त होने की स्थिति में भी मौन रहना पड़ता है। जो मूल विषय चल रहा है उसको बचाना पड़ता है। एक वो व्यक्ति आया वो रहमान डकैत का भाई लग रहा था देखने में। वो आके बोल रहा है कि क्या कहते हैं? भागवतानंद ने बड़े सटीक उत्तर दिए। यह सटीक उत्तर है। हमारे शास्त्र परंपरा से आए हैं। आचार्य परंपरा से। कौन सी परंपरा? मौन। फिर उत्तर बदल गया।
00:48:59:13 स्व अध्ययन से मिले हैं शास्त्र। शास्त्र का स्वा अध्ययन होता है या स्व अध्ययन से शास्त्र मिलता है। फिर बदल गया। यदि तुम केवल स्वतंत्र रूप से शास्त्र को मान रहे हो तो तुम्हारा धर्म का निर्णायक तो गीता प्रेस हो गई या उसको ग्रंथ को इंटरनेट पर डालने वाला व्यक्ति हो गया। उसमें जो लिखेगा वही है तुम्हारा प्रमाण। फिर उत्तर बदल गया। चार बार में चार उत्तर देने वाला व्यक्ति यह बताएगा धर्म और अधर्म क्या होता है। यह कथा कर रहा है बैठ के। रामोदर नाभि भाषित ना पढ़ सका। राम दो प्रकार की बातें नहीं करता। रकुल रीच सदा चली आई। प्राण जाई पर वचन ना जाई यह नहीं पढ़ सका बहुत बड़े विद्वान हो गए अरे भैया तुमने बहुत सारे श्लोक रट लिए तुम्हारे पास बहुत सारी तुम्हें संस्कृत का ज्ञान हो गया मगर उसको तुमने धारण नहीं कर पाए अपने आचरण में तुम अपने धर्म की व्याख्या को अपने खून में नहीं उतार पाए क्या फायदा उसका
00:49:58:12 रावण भी ज्ञानी था तो उसको मान ले धर्म अधर्म का निर्णायक तीसरी बार में क्या कहते हैं? अतीत जन्मांतर से प्राप्त है तो मोबाइल क्यों देख रहे हो? चौथी बार में फिर भगवती की कृपा से प्राप्त है तो मोबाइल क्यों देख रहे हो? मोबाइल देख देख के क्यों बताना पड़ रहा है? वो तो भगवती की कृपा से प्राप्त हो गया तुम्हें। सत्यापित कराया कि नहीं कराया वो तो बाद की बात है। फिर भगवती की कृपा भी झूठी सिद्ध हो रही है। तो क्या हुआ? हम नहीं बताएंगे कैसे प्राप्त हुए। भगवती की भगवती ने कृपा की है। तुम न्यूनतम अधर्म करोगे। न्यूनतम। ज्यादा अधर्म नहीं करोगे। न्यूनतम क्या होगा यह लिस्ट मैं तुम्हें नहीं बताऊंगी जाओ तथास्तु ये वरदान है भगवती का न्यूनतम अधर्मी भागवतानंद न्यूनतम अधर्मी तो उसने स्वीकार किया ना मैंने पूछा क्रिया गलत होगी कि नहीं होगी वरदान के बाद बोला न्यूनतम गलत होगी न्यूनतम अधर्मी ये सटीक उत्तर थे जिस विषय में बात हो रही है उस विषय में चार बार में चार उत्तर फिर आख फिर लास्ट में कह दिया जब उत्तर कुछ नहीं बचा बचा तो कह दिया कि मैं बताऊंगा नहीं। अरे भाई बताना नहीं था। मैं अनाधिकारी था तो शुरू क्यों किया था बताना। कह देते
00:51:13:20 मैं प्रकाश नहीं डालूंगा। तुम अनाधिकारी हो। मैंने शुरू में ही कहा ना निग्रह संप्रदाय की प्रमाणिकता पर प्रकाश डालने की चर्चा है। अनाधिकारी हो नहीं बताऊंगा कुछ भी। और क्या व्यक्ति बिना श्रद्धा के ही बिना उसके सवालों का उत्तर दिए ही वो श्रद्धावान हो जाएगा तुम्हारे प्रति। तुम्हारा यह जीसस क्राइस्ट और तांत्रिक का मिक्सचर स्वरूप देख के हैं इसी से तुम आकर्षित करोगे उसको ढचू टाइप का एक व्यक्ति आकर के निर्णय दे रहा है सटीक उत्तर दिए भाई तू आजा भाई अब तुम ये मत कहना मैंने तुम्हें ढेचू क्यों कहा तो तुमने अपनी ओर से ही निर्णय कर लिया कि तुम्हारे जैसे व्यक्ति के लिए इस तरह के शब्द उपयुक्त हो सकते हैं और जाहिलियत इत्यादि चलो तुमने माना कि गाली नहीं दी गई है वहां पे गाली के लिए तो वो जनेऊ हाथ में लेकर के तुम और तुम्हारे जो बाबा जी हैं और वहां रामानुज संप्रदाय के संस्कृतज्ञ हैं वो जनेऊ हाथ में लेकर कहेंगे ना कि गाली नहीं दी गई है। ठीक है गाली नहीं दी गई तो यह शब्द तुम्हें उपयुक्त लगते हैं। अपने ही आप निर्णय कर लो कि शिवश नारायण द्विवेदी इस योग्य है और इसलिए उसको ये वाले शब्द कहे जाना भी जो है उचित है। तो फिर मैंने भी निर्णय कर लिया है। तुम ढेचू हो। रहमान डकैत के भाई दिखते हो। देख लेना जाकर के
00:52:28:26 माताजी ने निष्ठा पूर्वक किसी जिसको भी दूध पिलाया हो जिसको भी उसकी माता जी ने निष्ठा पूर्वक दूध पिलाया हो उस चर्चा में उठने वाले किसी भी विषय पर बात करने के लिए हमारे समक्ष आ सकता है। हमने द्वार बंद नहीं कर रखे हैं। उसने कर रखे थे कि नहीं आऊंगा नहीं आऊंगा। लखनऊ आकर चले गए। हमने तो कहा था मिलने नहीं आया। जब मिलने गए तो क्या हुआ? उत्तर नहीं देंगे हम।
00:53:01:01 हमने द्वार बंद नहीं कर रखा है। जिसकी माता जी ने भी उसको निष्ठा पूर्वक दूध पिलाया हो तो उसका स्वागत है। हमने द्वार बंद नहीं कर रखे हैं। आओ और सामने से आकर के बात करो। और रही बात गाली की कि वहां गाली नहीं दी गई थी। तो जो यह बात बोल रहा है वो और तांत्रिक और क्राइस्ट मिक्स बाबा जी निग्गू बाबू और वहां पर एक राम संप्रदाय के जो प्रमाणिक वो संस्कृतज्ञ बैठे थे वह इतने लोग तो थे ना और निग्गू का तो आदेश है कोई बात फंसे तुरंत गंगा में उतर के जनेऊ हाथ में ले लेके सौगंध खानी चाहिए तो गंगा में उतरो ना उतरो कम से कम जनेऊ हाथ में लेकर के तो बोल दो कि अश्लील शब्द मेरे लिए वहां नहीं बोला था बृजेश पांडे ने कितने नीचे गिरोगे तुम लोग
00:53:52:12 नीचता की हद अधर्म का पोषण करते हैं। तो रामानुजियों से और जितने भी वर्णाश्रमी हैं, परंपरा प्राप्त हैं, परंपरा प्राप्त आचार्यों से जुड़े हुए हैं। उनसे मेरा निवेदन है कि इस इन बातों पर विचार मंथन करें कि स्वतंत्र रूप से किसी ग्रंथ पर हम आश्रित हो सकते हैं बिना परंपरा के बिना गुरु के और अगर यदि होंगे तो उसी ऐसे ही विप्लव का परिणाम है। स्वतंत्र रूप से मन स्वप्न में आई दीक्षा ही है ब्रह्मा कुमारीज की। किसी दिव्य घटना का आधार लेकर के धर्म अधर्म की व्याख्या करना। और जो परंपरा से चले आ रहे वैदिक अर्थ हैं उनका तिरस्कार करना यह ब्रह्मा कुमारीज बिना किसी दिव्य घटना के आधार पर अपने संस्कृत ज्ञान विज्ञान के आधार पर परंपरा से चल रहे वेदार्थ का तिरस्कार करना यह है आर्य समाज और फिर वेदार्थ का नहीं वेद का ही तिरस्कार कर देना कि हमें सत्यापित किसी से करवाना ही नहीं है कि हम वैदिक है क्योंकि हम वेदों का ही तिरस्कार कर देंगे।
00:55:07:18 हमें यह कहना ही नहीं है कि हम वैदिक है क्योंकि कहने के लिए हमें किसी से सत्यापित कराना पड़ेगा तो हमें यह कहना ही नहीं है कि हम वैदिक हैं क्योंकि ऐसा कोई है ही नहीं जिससे हम सत्यापित कर करा सके। यह है इस्लाम। यह है बाइबल नया कल्ट। ठीक है? यह सारी चीजें हो गई। और भागवतानंद का यदि उसकी दृष्टि सब में निग्रह करने की है तो उसका जो उसकी वैदिकता उसका सिद्धांत और उसका जो उसका जो शास्त्र है उसकी प्रमाणिकता सिद्ध नहीं होती क्योंकि सत्यापन किसी से हो नहीं रहा है। यदि सत्यापन किसी से हो रहा है तो फिर निग्रह की दृष्टि रखना सिद्ध नहीं होता तो फिर निग्रह संप्रदाय का अस्तित्व सिद्ध नहीं होगा। बाकी किसी को यदि इस विषय में इन विषयों में कोई चर्चा करनी हो तो उसके खुला स्वागत है। जिसने भी अपनी मां का दूध पिया हो वह आकर के सामने से बात कर ले। जय श्री राम।
00:56:11:29 [संगीत]
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क्या गुरु के बिना शास्त्र का अस्तित्व है? रामानुजी अवश्य सुनें
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