1
00:00:06,320 --> 00:00:10,320
तो सभी को जय श्री राम। अभी हम आए हैं माघ मेले

2
00:00:10,320 --> 00:00:15,440
में और यहां पर इस का

3
00:00:15,440 --> 00:00:20,640
एक कैंप लगा हुआ है प्रयागराज स्कॉन का और

4
00:00:20,640 --> 00:00:25,040
मेरे साथ यहां पर एक ब्रह्मचारी हैं स्कॉन के। थोड़ा

5
00:00:25,040 --> 00:00:29,840
सा आप अपना परिचय दे दीजिए हमारे दर्शकों को परिचय। हरे कृष्णा।

6
00:00:29,840 --> 00:00:34,240
मेरा नाम विष्णुराज दास। मैं इस प्रयागराज से बिलोंग करता हूं।

7
00:00:34,240 --> 00:00:38,240
मैं पिछले ढाई साल से इस प्रयागराज मंदिर से कनेक्ट हूं और यहां

8
00:00:38,240 --> 00:00:42,960
मंदिर में रह के मंदिर परिसर में रह के भक्तों के साथ रह के भक्ति का अभ्यास

9
00:00:42,960 --> 00:00:47,120
कर रहा हूं और अपना पूरा प्रयास कर रहा हूं। जिससे अच्छे से भगवान का

10
00:00:47,120 --> 00:00:51,280
भक्ति और भगवान का जो दर्शन है, शास्त्र है उसको समझ

11
00:00:51,280 --> 00:00:55,440
करके अपने जीवन में भगवत कृपा को अनुभव

12
00:00:55,440 --> 00:01:00,080
कर सकूं और भगवत साक्षात्कार कर सकूं। जी जी बहुत अच्छा

13
00:01:00,080 --> 00:01:04,160
मतलब आप ढाई साल से ब्रह्मचारी हैं या इस

14
00:01:04,160 --> 00:01:08,160
ढाई साल से इस से जुड़े हैं या उससे पहले भी आप इस से जुड़े हुए थे? नहीं मुझे

15
00:01:08,160 --> 00:01:12,720
ढाई साल प्रॉपर ढाई साल ही हुआ इस से जुड़े हुए हैं। अच्छा उसी में आप एज ए ब्रह्मचारी

16
00:01:12,720 --> 00:01:17,040
डायरेक्टली एज ए ब्रह्मचारी ही कनेक्ट हुए हैं। नहीं नहीं पहले मैं एज अ

17
00:01:17,040 --> 00:01:21,840
सर्च करते हुए घूमते-घूमते आया था। ढूंढते हुए रिसर्च करते हुए कि

18
00:01:21,840 --> 00:01:25,920
सुप्रीम ट्रुथ क्या है? परम सत्य क्या है? आखिर मृत्यु क्यों होती है? तो ये खोजते

19
00:01:25,920 --> 00:01:30,000
खोजते आया था। तो बाद में यहां पे आ के जब मुझे इसका आंसर मिला कि हम

20
00:01:30,000 --> 00:01:34,400
ये शरीर नहीं हम आत्मा है। शरीर का मृत्यु होता है। आत्मा का मृत्यु नहीं होता है। जब ये सारी

21
00:01:34,400 --> 00:01:38,400
सारी चीजें क्लियर हुई तो मैंने डिसीजन लिया कि हां मुझे एज अ ब्रह्मचर्य रहना चाहिए ताकि मैं इस जन्म

22
00:01:38,400 --> 00:01:42,480
मृत्यु जरादी वाला जो प्रॉब्लम है सबसे बड़ा प्रॉब्लम है। इससे बाहर निकल के भगवान के धाम जा

23
00:01:42,480 --> 00:01:47,760
सकूं। जहां पे जीवन शाश्वत है वहां जहां पे जन्म मृत्यु जरा व्याधि नहीं है।

24
00:01:47,760 --> 00:01:52,000
अच्छा मतलब क्योंकि आप आपको पता चला कि आप एक आत्मा

25
00:01:52,000 --> 00:01:56,400
है और आपकी जो है वो जन्म मृत्यु से आपकी मुक्ति हो जाएगी।

26
00:01:56,400 --> 00:02:00,480
यह कांसेप्ट आपको पता चला कि भगवान के धाम पहुंच के जो

27
00:02:00,480 --> 00:02:04,720
है आप क्लियर हो जाएंगे। तो इसमें प्रभु जी एक इसमें जो

28
00:02:04,720 --> 00:02:08,720
भगवान का कांसेप्ट है भगवान के धाम में पहुंचकर

29
00:02:08,720 --> 00:02:12,880
के ऐसा होगा तो एक भगवान

30
00:02:12,880 --> 00:02:16,960
के लिए एक बात आती है कि वो सर्वशक्तिमान है। है ना? तो भगवान

31
00:02:16,960 --> 00:02:21,520
के विषय में ऐसा क्या बताया गया कि मतलब आपको यह लगा आपको उनसे प्रेम हुआ

32
00:02:21,520 --> 00:02:25,680
जिसके कारण आपने सोचा कि मैं भगवान की भक्ति करके उनके धाम पहुंच

33
00:02:25,680 --> 00:02:31,440
के ये जो जन्म वो जन्म जरा मृत्यु वाली जो व्याधि वाली जो

34
00:02:31,440 --> 00:02:35,440
स्थिति है उससे उभ पाऊं। जैसे इस संसार में

35
00:02:35,440 --> 00:02:37,120
हम देख सकते हैं कि यहां पे जो

36
00:02:37,120 --> 00:02:41,280
भी चीजें हैं वो क्षणिक है। टेंपरेरी है। आपको भी चीज अब जैसे अभी

37
00:02:41,280 --> 00:02:45,280
आप हैं आपका एज होगा कितना होगा? लगभग कितना

38
00:02:45,280 --> 00:02:49,520
आपका एज होगा? 36 36 बट आप यह सोच सकते हो कि एक

39
00:02:49,520 --> 00:02:54,080
समय आप जब 5 साल के थे आप ना पांच साल के छोटे बच्चे थे

40
00:02:54,080 --> 00:02:58,240
तो उस वक्त आपके आसपास जो एटमॉस्फियर

41
00:02:58,240 --> 00:03:02,320
था है ना और उसमें जब आप रह रहे थे तो आपके फैमिली आपसे

42
00:03:02,320 --> 00:03:06,320
बहुत प्रेम करते थे। आपके पेरेंट्स आपसे बहुत प्रेम करते थे। आपके घर

43
00:03:06,320 --> 00:03:10,480
वाले आपसे बहुत प्रेम करते थे। आपके आसपास के लोग आपको जानते थे। बहुत प्रेम करते थे। क्योंकि

44
00:03:10,480 --> 00:03:14,720
आपका बॉडी जो था वो छोटा था। है ना? इसलिए बहुत स्वीट और बहुत सॉफ्ट

45
00:03:14,720 --> 00:03:18,720
बहुत प्यारा था ना लेकिन आप देखिए जैसे-जैसे आप बड़ा बड़े

46
00:03:18,720 --> 00:03:23,200
होते चले गए आप पर्सन तो वही है लेकिन शरीर में डिफरेंस आया

47
00:03:23,200 --> 00:03:27,360
जी शरीर में डिफरेंस आने के आया जिसके कारण हम 5 साल

48
00:03:27,360 --> 00:03:31,440
के जब थे उस समय जो हम हैप्पीनेस एक्सपीरियंस किए थे वो उसके बाद वाले

49
00:03:31,440 --> 00:03:35,520
बॉडी में एक्सपीरियंस नहीं कर पाए करेक्ट ना यानी कि जो 5 साल के

50
00:03:35,520 --> 00:03:39,600
ऐज में हम थे उस समय जो हमको हैप्पीनेस मिला था जो प्रेम मिला था वो

51
00:03:39,600 --> 00:03:43,840
टेंपरेरी था ना उसके बाद ऊपर आके किया हुआ है या 15 साल

52
00:03:43,840 --> 00:03:48,000
20 साल जैसे बॉडी बढ़ता गया बढ़ता गया तो हमने क्या एक्सपीरियंस किया

53
00:03:48,000 --> 00:03:52,240
कि हम पर्सन तो वही है लेकिन ये शरीर बढ़ता चला जा रहा है ऐसे

54
00:03:52,240 --> 00:03:56,480
करते-करते 20 साल 25 साल फिर उसके बाद डेथ हो जाएगा

55
00:03:56,480 --> 00:04:00,480
ना तो यहां पे हमने जितना भी चीज एक्सपीरियंस किया हम पांच साल के थे तो

56
00:04:00,480 --> 00:04:04,640
दूसरा चीज एक्सपीरियंस किए दूसरा प्रेम एक्सपीरियंस किए थोड़ा बड़े हुए युवा अवस्था में तो दूसरा प्रेम एक्सपीरियंस किए

57
00:04:04,640 --> 00:04:08,720
दूसरा चीज एक्सपीरियंस किए अलग-अलग जैसे एज हमारा बढ़ता गया हम अलग-अलग चीजों

58
00:04:08,720 --> 00:04:13,040
को एक्सपीरियंस किए लेकिन हम चेक करेंगे कि हम पर्सन तो वही लेकिन ये शरीर

59
00:04:13,040 --> 00:04:17,520
और हमारा अनुभव ये बदलता गया। यहां पे जो भी चीजें हैं टेंपरेरी है।

60
00:04:17,520 --> 00:04:22,160
चाहे हम शरीर का देख लें शरीर भी छूट जाएगा एक दिन। ना

61
00:04:22,160 --> 00:04:26,160
जन्म हो रहा दोबारा होगा और मृत्यु हमारा होगा। मैं समझ गया मैं समझ गया। अब इसमें

62
00:04:26,160 --> 00:04:30,720
एक बात यह वैसे मेरा मुख्य क्वेश्चन नहीं है। वैसे एक जिज्ञासा

63
00:04:30,720 --> 00:04:34,720
आपने बोला है क्योंकि जन्म जरा मृत्यु व्याधि वाली बात तो

64
00:04:34,720 --> 00:04:38,720
जैसे आपने बोला मैं पांच साल का था तो तब जो एक्सपीरियंस था वो अब नहीं है।

65
00:04:38,720 --> 00:04:42,800
तो इसमें एक ऐसे ही एक जनरली एक प्रश्न आता है कि यहां

66
00:04:42,800 --> 00:04:46,800
से मुक्ति होकर के आप धाम जाएंगे। है ना? तो जो

67
00:04:46,800 --> 00:04:50,960
धाम जाएंगे आप तो यहां से पहले भी तो आप धाम में ही

68
00:04:50,960 --> 00:04:55,440
थे ना। हां। है ना? हम तो यहां मतलब

69
00:04:55,440 --> 00:04:59,440
यहां धाम में कुछ ऐसा था जो आपके पास नहीं था जिसके कारण आप यहां

70
00:04:59,440 --> 00:05:03,520
आए हो यहां से मुक्त हो के भी आप वहीं जाओगे तो फिर

71
00:05:03,520 --> 00:05:07,280
ये गारंटी कैसे ले सकते हैं कि आपको जो है वो नहीं आएगा

72
00:05:07,280 --> 00:05:11,360
दोबारा वो जो प्यास थी बहुत अच्छा क्वेश्चन आपका है जी ये

73
00:05:11,360 --> 00:05:15,440
आपका जो क्वेश्चन है कि हम भगवान के धाम में पहले भी

74
00:05:15,440 --> 00:05:19,440
थे तो भगवान के धाम से यहां पे मतलब जैसे आपने बताया ना जो 5 साल में जो था वो

75
00:05:19,440 --> 00:05:23,440
अब नहीं है तो भगवान के धाम में भी तो आप ऐसे ही थे भगवान के धाम

76
00:05:23,440 --> 00:05:27,680
में हम शाश्वत थे, अमर थे। हमारा कोई भौतिक शरीर नहीं था।

77
00:05:27,680 --> 00:05:32,240
आपके आपके मन में कुछ ऐसी प्यास आई ना कि वो मुझे मिले। अज्ञानता

78
00:05:32,240 --> 00:05:36,480
जिसको बोलते हैं अज्ञानता। हमें इस भौतिक संसार का अनुभव नहीं था।

79
00:05:36,480 --> 00:05:40,480
अच्छा जैसे हम भगवान के धाम में थे। जैसे मान लीजिए एक बच्चा है। मेले

80
00:05:40,480 --> 00:05:45,120
में पिताजी के साथ में गया। पिताजी के साथ थे बहुत खुश है। ना

81
00:05:45,120 --> 00:05:49,200
अब वो जब मेले में या कहीं अलग-अलग जगह गया ना।

82
00:05:49,200 --> 00:05:53,440
मान लीजिए आग है वो आग में उंगली डालने का प्रयास कर रहे हैं। जैसे

83
00:05:53,440 --> 00:05:57,520
हम भगवान के धाम में थे भगवान के साथ खुश थे। हैप्पीनेस थे। पूरा एकदम

84
00:05:57,520 --> 00:06:01,920
ग्लिच में थे। किसी चीज का कोई कमी नहीं था। जन्म मृत्यु जरा व्याधि से परे थे।

85
00:06:01,920 --> 00:06:06,240
क्योंकि हमारा कोई भौतिक शरीर था ही नहीं वहां पे। मगर चित्त नहीं थे। नहीं नहीं भौतिक शरीर

86
00:06:06,240 --> 00:06:10,240
था ही नहीं हमारा कोई। क्योंकि हम तो भगवान के आत्मा थे। उनके अंश थे। उनके दास थे। उनके

87
00:06:10,240 --> 00:06:14,560
धर्म में उनकी सेवा कर रहे थे। लेकिन क्या हुआ कि हम इंडिपेंडेंट

88
00:06:14,560 --> 00:06:18,560
जैसे हुआ ना कि हम खुद ट्राई करना चाह रहे थे। खुद ट्राई कर रहे थे कि हम

89
00:06:18,560 --> 00:06:22,640
खुद ही सोच रहे थे कि हम शायद हम भी कुछ इंडिपेंडेंट रह के देखते हैं कि

90
00:06:22,640 --> 00:06:26,800
हम कैसे लगता है एक्सपीरियंस नया एक्सपीरियंस करना चाह रहे थे स्वतंत्र रहना जैसे मान

91
00:06:26,800 --> 00:06:31,120
लीजिए तो हमको भग हम भगवान से बोले कि हमको जाना है लेकिन भगवान बोले

92
00:06:31,120 --> 00:06:35,200
कि वो जगह अच्छा नहीं है भौतिक संसार अच्छा नहीं है जैसे

93
00:06:35,200 --> 00:06:39,200
बेटा है उंगली डालने का प्रयास कर रहा है आग में आग में उंगली डालने का प्रयास कर रहा है मतलब भौतिक

94
00:06:39,200 --> 00:06:43,360
संसार था हां उंगली डालने का प्रयास कर रहा है उस समय भी था भौतिक

95
00:06:43,360 --> 00:06:47,440
संसार भौतिक संसार शाश्वत है शाश्वत मतलब है कि लेकिन यहां पे चीज़ ये टेंपरेरी

96
00:06:47,440 --> 00:06:51,680
है। ये भौतिक जगत जो है ये सत्य है और ये शाश्वत है। लेकिन ये टेंपरेरी

97
00:06:51,680 --> 00:06:55,760
है चीज़ यहां पे। रूप बदलता है। हां। क्योंकि यहां पे चीजें होती हैं फिर खत्म होती

98
00:06:55,760 --> 00:06:59,760
हैं। फिर होती है फिर खत्म होती है। लेकिन आध्यात्मिक जगत में क्या है कि एक है मगर इसमें

99
00:06:59,760 --> 00:07:04,160
चीजें बनती बिगड़ती रहती है। मतलब इसका रूप चेंज होता रहता है। हां बहुत ही तत्व से है।

100
00:07:04,160 --> 00:07:08,320
तत्व से शाश्वत है मगर रूप चेंज होता रहता है। टरेरी यहां पे हर चीज टेंपरेरी है।

101
00:07:08,320 --> 00:07:12,400
बनता बिगड़ता रहता है। जैसे कुल मिलाकर के जो सुख है वो शाश्वत नहीं

102
00:07:12,400 --> 00:07:16,880
है। हां वहां पे जो है शाश्वत सुख है आध्यात्मिक जगत में। दिक्कत दिक्कत

103
00:07:16,880 --> 00:07:20,880
यहां पर ये आती है कि जैसे आपने कहा कि अज्ञानता से ऐसा हुआ।

104
00:07:20,880 --> 00:07:24,880
यानी कि वहां पर जब आप थे तो आप ज्ञानी नहीं थे। फुल प्रूफ वहां पे हम

105
00:07:24,880 --> 00:07:28,880
फुल प्रूफ ज्ञानी थे। हां ना तो फिर ये अज्ञानता कैसे आ गई कि

106
00:07:28,880 --> 00:07:32,960
भाई हम भौतिक जगत में ज्यादा जैसे आग में उंगली है ना आग तो उंगली

107
00:07:32,960 --> 00:07:37,200
का हमको एक्सपीरियंस आग का एक्सपीरियंस है नहीं अगर बच्चे को तो नहीं है ना मतलब अज्ञानी

108
00:07:37,200 --> 00:07:37,840
थे उतने अंश

109
00:07:37,840 --> 00:07:41,840
में अज्ञानी थे। यानी कि हमको भौतिक जगत कंप्लीट नॉलेज नहीं था। मतलब चित

110
00:07:41,840 --> 00:07:46,080
नहीं थे। भगवान के धाम में होते हुए भी आप हां शाश्वत

111
00:07:46,080 --> 00:07:50,240
रूप से ज्ञानी नहीं थे थे कुछ था जो अभाव था थे हमारी इच्छा

112
00:07:50,240 --> 00:07:54,240
ही मैटर करता है डिपेंड जैसे कि आपने कहा ना अज्ञानी होने के

113
00:07:54,240 --> 00:07:58,320
कारण जैसे अग्नि को हमने छुआ नहीं तो हम जानेंगे कैसे हमारे

114
00:07:58,320 --> 00:08:02,480
इंडिपेंडेंट नेचर पे डिपेंड करता है हमारा जो स्वतंत्र इच्छा है ना उस पे डिपेंड

115
00:08:02,480 --> 00:08:06,960
करता है हम तो यानी कि भगवान में जाने भगवान के धाम में जाने के बाद भी

116
00:08:06,960 --> 00:08:11,200
स्वतंत्र इच्छा हो सकती है। हां स्वतंत्र इच्छा रहेगी ना क्योंकि

117
00:08:11,200 --> 00:08:15,200
प्रेम जो है फोर्सफुली नहीं कर सकते किसी को आप अच्छा जैसे मुझे आपको प्रेम करना

118
00:08:15,200 --> 00:08:19,200
है तो फोर्सफुली मैं आपको प्रेम नहीं कर सकता। एक इच्छा है जब आप खुद से प्रेम

119
00:08:19,200 --> 00:08:23,280
करेंगे तो वो प्रेम प्रबल होता है। तो यानी कि मतलब जब हम भगवान

120
00:08:23,280 --> 00:08:27,520
के धाम में पहुंचेंगे तो एक स्वतंत्र इच्छा हो सकती है। दोबारा से कोई कमी हमें लग सकती है।

121
00:08:27,520 --> 00:08:31,600
आप कभी भी अपनी इच्छा से आज आ सकते हो जा भी सकते हो।

122
00:08:31,600 --> 00:08:35,920
कहां जा पा रहे हैं आप? इच्छा डेवलप करेंगे। प्रगाढ़ इच्छा होगा तो उसके अकॉर्डिंग

123
00:08:35,920 --> 00:08:39,920
जो शास्त्रों में दिया रहेगा। इच्छा तो आज आपकी हो गई है ना वो। फिर भी आप आज नहीं

124
00:08:39,920 --> 00:08:44,160
जा पा रहे हो। हां तो समय लगेगा। यानी कि

125
00:08:44,160 --> 00:08:48,240
यानी कि शादी होता है बेबी बेबी का नहीं नहीं कहने का मतलब यह है एक

126
00:08:48,240 --> 00:08:52,400
मिनट शादी होता है पति पत्नी का शादी होता है तो पत्नी शादी के तुरंत बाद

127
00:08:52,400 --> 00:08:52,900
डिजायर करे कि

128
00:08:52,880 --> 00:08:57,200
मुझे बच्चा हो जाए तो ऐसा पॉसिबल है क्या समय लगेगा पॉसिबल नहीं है मगर इसीलिए

129
00:08:57,200 --> 00:09:01,280
तो इसको शाश्वत सुख नहीं कहते भौतिक दुनिया को मगर भगवान का शाश्वत

130
00:09:01,280 --> 00:09:05,360
सुख है एक मैं वही उदाहरण बता रहा हूं ऐसा है

131
00:09:05,360 --> 00:09:09,600
जैसे हम कह रहे हैं कि वहां का शाश्वत सुख है मगर हम ये बता रहे हैं कि वहां पर भी अभाव

132
00:09:09,600 --> 00:09:13,600
है। अभाव क्या है कि हमें भौतिक सुख की अनुभूति नहीं है। यह अभाव

133
00:09:13,600 --> 00:09:17,760
है वहां पर। जब हम शाश्वत हैं तो वहां पर अभाव है कि

134
00:09:17,760 --> 00:09:21,920
हमें भौतिक सुख की अनुभूति नहीं है। तो हम वह अनुभूति करने के लिए भगवान से लड़

135
00:09:21,920 --> 00:09:26,160
के और यहां आ गए हैं। भगवान को मालूम था कि यहां पर ऐसे ऐसे होगा। उन्होंने

136
00:09:26,160 --> 00:09:30,240
भेज दिया कि इसको अनुभूति हो जाए। यानी कि इस अनुभूति की कमी हो सकती है

137
00:09:30,240 --> 00:09:34,400
भगवान के धाम में। और अगर स्वतंत्र इच्छा की बात करें तो फिर तो वह आ जाएगा कि

138
00:09:34,400 --> 00:09:38,400
यानी कि हम जैसे सुख भोग रहे भगवान के धाम में फिर भी स्वतंत्र इच्छा के

139
00:09:38,400 --> 00:09:44,400
कारण हमारा दूसरा कुछ ऐसा मन कर सकता है कि हम भोग भोगे।

140
00:09:44,800 --> 00:09:48,880
हमको फ्री व्हील दिया गया है। भगवान ने हमको एक गिफ्ट दिया है

141
00:09:48,880 --> 00:09:52,880
फ्री यानी कि नहीं नहीं वो वो आप सही कह रहे हैं। मैं स्वतंत्र इच्छा को एक्सेप्ट करने

142
00:09:52,880 --> 00:09:56,880
के बाद ये कह रहा हूं कि लेकिन सेकंड चीज क्या है कि जब बच्चा आग में उंगली डालने

143
00:09:56,880 --> 00:10:00,880
का प्रयास कर रहा है। पिताजी उसको मना कर रहे हैं मत डालो मत डालो। तो डाल के देख ले। लेकिन जब

144
00:10:00,880 --> 00:10:04,880
कई बार बोलता है नहीं डालूंगा डालूंगा। तो पिताजी बोलते हैं ठीक है डाल के देख लो। वो

145
00:10:04,880 --> 00:10:09,040
वही वही वही बात हो गई ना कि भगवान के धाम में रहने वाले को भी

146
00:10:09,040 --> 00:10:13,120
अज्ञानता हो सकती है। यानी कि ज्ञान का जो सुख

147
00:10:13,120 --> 00:10:17,360
है वो कहीं ना कहीं से बाधित हो सकता है। ऐसे मतलब शाश्वतता

148
00:10:17,360 --> 00:10:21,600
भंग हो रही है। बस इतनी सी बात है जिसके कारण आना पड़ा। आग में जब एक बार उंगली

149
00:10:21,600 --> 00:10:25,600
डाल देगा तो दोबारा आग में उंगली उंगली डालेगा। क्योंकि उसको एक्सपीरियंस हो

150
00:10:25,600 --> 00:10:29,600
गया ना। जैसे मान लीजिए वो आग में उंगली डालने का प्रयास कर रहा है। पिताजी

151
00:10:29,600 --> 00:10:33,760
ने मना किया। नहीं माना डाल दिया। एक बार डाल दिया दोबारा डालेगा वो आग

152
00:10:33,760 --> 00:10:37,920
में क्योंकि उसको एक्सपीरियंस हो गया ना दोबारा होता है ऐसा कई बार एक चोर चोरी

153
00:10:37,920 --> 00:10:41,920
करता है उसको एक्सपीरियंस तो अलग है सुनिए तो एक चोर चोरी करता है उसको एक्सपीरियंस

154
00:10:41,920 --> 00:10:46,400
हो गया जेल का जेल में क्या-क्या होता है डंडे पड़ते हैं होता है फिर कर लेता है चोरी

155
00:10:46,400 --> 00:10:50,480
वो अपनी इंद्रियों पे अपनी इच्छाओं पे कंट्रोल नहीं कर पाता लेकिन एक बार नहीं

156
00:10:50,480 --> 00:10:54,720
10-10 बार कर लेता है तो ये भौतिक जगत का नेचर है वो कहीं नहीं कर पा रहा है

157
00:10:54,720 --> 00:10:58,880
लेकिन जब एक बार उंगली डाला वो एक्सपीरियंस किया आग का ऐसा है ना आध्यात्मिक जगत चला गया

158
00:10:58,880 --> 00:11:00,000
वहां पे वहां से दोबारा

159
00:11:00,000 --> 00:11:04,560
यहां झांकेगा नहीं क्योंकि उसको यहां का एक्सपीरियंस यह असल में

160
00:11:04,560 --> 00:11:09,200
यहां पर एक अभाव के कारण आना कि अभाव है इसलिए मैं आया।

161
00:11:09,200 --> 00:11:13,360
यही यह बात पे क्वेश्चन उठा रहा है कि फिर वहां जाकर के अभाव क्यों नहीं होगा? अब

162
00:11:13,360 --> 00:11:17,920
वो अभाव का कारण ही कुछ भी बना बन सकता है। जैसे उसको एक्सपीरियंस

163
00:11:17,920 --> 00:11:22,320
हो गया मत नहीं बहुत बहुत टाइम हो गया। अब वो जो दर्द है वो जो परेशानियां

164
00:11:22,320 --> 00:11:26,400
है वो उससे अरे बेकार का है। चाहता हूं भोग करके आता हूं। जैसे चोर हां

165
00:11:26,400 --> 00:11:30,400
वो रहा। आपका जो क्वेश्चन है कि मतलब वो भगवान के धाम में गया।

166
00:11:30,400 --> 00:11:34,400
दोबारा उसका इच्छा डेवलप हो गया यहां पे आने का क्योंकि जाके देख के आता

167
00:11:34,400 --> 00:11:38,480
हूं। बट जैसे मान लीजिए आपके पास अबकी बार मैं बहुत कदम फूंक

168
00:11:38,480 --> 00:11:42,560
फूंक के रखूंगा। नहीं नहीं वो चीज ठीक है। जैसे चोर होता है ना सोचता है कि अबकी बार पुलिस

169
00:11:42,560 --> 00:11:46,880
पकड़ नहीं पाएगी। ये प्रैक्टिकल नहीं है। प्रैक्टिकल क्या है? जैसे पेड़ा है। हां

170
00:11:46,880 --> 00:11:51,200
पेड़ा है। वो उतना टेस्टी नहीं है। लेकिन आप वही खा रहे हो। वही खा रहे हो।

171
00:11:51,200 --> 00:11:55,600
आपको सर रसगुल्ला रख देंगे। पेड़ा आप छोड़ दोगे ना? तो आध्यात्मिक

172
00:11:55,600 --> 00:11:59,680
जगत में जो है वो हायर टेस्ट मिलता है। हायर टेस्ट उनको प्राप्त था

173
00:11:59,680 --> 00:12:03,680
ना उसको छोड़ के आए ना हायर टेस्ट एक होता है ब्रह्म एक होता

174
00:12:03,680 --> 00:12:08,560
है परमात्मा यानी कि उन्हें एक तो यहां पे दो बातें आती है। एक तो भगवान पे अविश्वास

175
00:12:08,560 --> 00:12:12,800
भगवान की बात पर अविश्वास हुआ तो आ गए हम यहां। भगवान

176
00:12:12,800 --> 00:12:15,120
ने कहा कि वहां पे कष्ट है। फिर भी हमें

177
00:12:15,120 --> 00:12:19,360
उनकी बात पर भरोसा नहीं हुआ। तो हम यहां आ गए। मगर मतलब भगवान पे भरोसा

178
00:12:19,360 --> 00:12:23,360
नहीं था। हम इंडिपेंडेंट यानी हम खुद ट्राई कर रहे थे भगवान बनने के

179
00:12:23,360 --> 00:12:28,480
लिए। हां। इस जगत में आकर के हर कोई भगवान बनने का ही प्रयास कर रहा है।

180
00:12:28,480 --> 00:12:32,480
लेकिन वो पॉसिबल है नहीं। मतलब वहां पर यह वाली यह वाली कमी ये

181
00:12:32,480 --> 00:12:36,720
वाली चीज़ ये वाली कमी थी। ये वाली कमी थी कि हम भगवान बन जाए। हां क्योंकि आध्यात्मिक

182
00:12:36,720 --> 00:12:40,800
जगत में भगवान के धाम में हम भगवान बनना चाहें कि हम स्वतंत्र रहना चाहे

183
00:12:40,800 --> 00:12:45,200
कि हम खुद भोगता बन के देखते हैं कैसा लगता है। तो वहां पे हम भोगता बन नहीं सकते। मतलब कि

184
00:12:45,200 --> 00:12:49,280
जीव के अंदर ये वाली प्यास भी आ सकती है कि वो भगवान जैसा भगवान ही

185
00:12:49,280 --> 00:12:53,280
बन जाना है। भगवान ही बन जाना चाहता है। अच्छा अच्छा। तो वो आध्यात्मिक जगत में पॉसिबल है नहीं।

186
00:12:53,280 --> 00:12:57,280
ये वाली प्यास की वो नहीं है निराकरण वहां वहां पे है ही नहीं। क्योंकि आध्यात्मिक जगत में

187
00:12:57,280 --> 00:13:01,360
भगवान भगवान एक ही है। कृष्ण तो कुल मिलाकर के शाश्वतता तो भंग हो गई ना किसी भी

188
00:13:01,360 --> 00:13:05,440
कारण से हुई। क्या चीज? जो सुख है जैसे जैसे

189
00:13:05,440 --> 00:13:09,520
मैं कहूं कि मैं वहां पर नहीं हूं उस समय। जैसे मैं मैं

190
00:13:09,520 --> 00:13:13,600
सोचूं कि मैं काश इस समय वहां क्यों नहीं खड़ा होता? क्योंकि मैं वहां नहीं खड़ा

191
00:13:13,600 --> 00:13:18,080
हो सकता क्योंकि मैं सर्वशक्तिमान तो हूं नहीं। यहां बैठा हूं फिर भी वहां खड़ा हो जाऊं। भगवान

192
00:13:18,080 --> 00:13:22,320
भगवान यहां बैठे हैं फिर भी वहां खड़े हो सकते हैं मगर मैं नहीं हो सकता क्योंकि मैं भगवान

193
00:13:22,320 --> 00:13:26,400
नहीं हूं। अब यह वाली जो चाह आ रही है क्योंकि इसमें मैं

194
00:13:26,400 --> 00:13:32,080
वहां खड़ा नहीं हो सकता या दूसरे लफ्जों में कह लीजिए इस तरह की और भी

195
00:13:32,080 --> 00:13:36,080
उधर मत जाइए आप या दूसरे शब्दों शब्दों में अगर कहें

196
00:13:36,080 --> 00:13:38,320
कि

197
00:13:38,320 --> 00:13:42,480
कई ऐसी चीजें हमारे मन में आती हैं कि भाई मैं ये क्यों नहीं कर पा रहा ये क्यों नहीं कर पा रहा

198
00:13:42,480 --> 00:13:46,480
और वो उसमें ये होता है कि अगर भगवान चाहे तो कर सकते हैं

199
00:13:46,480 --> 00:13:50,560
तो ये जो प्यास है ये आप मान रहे हो कि ये है तो ये प्यास तो

200
00:13:50,560 --> 00:13:54,720
बुझेगी नहीं ये एक्सपीरियंस के वहां चले भी जाएंगे वहां फिर भोगेंगे फिर

201
00:13:54,720 --> 00:13:58,800
ऐसा हो सकता है कि जो है फिर प्यास लगाए लेकिन एक बार जब समझ में

202
00:13:58,800 --> 00:14:02,800
आ जाएगा कि हम वो चीज नहीं बन सकती भगवान पहली बात तो ये

203
00:14:02,800 --> 00:14:06,880
है कि अगर भगवान के धाम में है भगवान सामने है तो हमारे मन में वो प्यास

204
00:14:06,880 --> 00:14:10,880
आनी ही नहीं चाहिए और अगर आ रही है और आप जो तर्क दे रहे

205
00:14:10,880 --> 00:14:14,960
हैं कि एक बार में समझ में आ जाएगा फिर उसमें तो ये वाली बात है कि एक बार में समझ में आ जाता

206
00:14:14,960 --> 00:14:19,120
है चोर को फिर भी वो चोरी करता है 10 बार करता है 25 बार करता है ये वाली

207
00:14:19,120 --> 00:14:23,520
बात अच्छा इसमें एक दूसरी तरीके से एक कहते देखते हैं। जैसे

208
00:14:23,520 --> 00:14:27,520
आपके लिए भगवान के धाम में पहुंचकर जो महसूस

209
00:14:27,520 --> 00:14:31,600
होता है वो सबसे प्रमुख चीज है या भगवान प्रमुख चीज है? मतलब

210
00:14:31,600 --> 00:14:35,760
भगवान सबसे साध्य हैं या फिर जो

211
00:14:35,760 --> 00:14:39,760
है जो भगवान का धाम साध्य है क्या

212
00:14:39,760 --> 00:14:44,800
भगवान मेन साध्य है। है ना? मेन सबसे भगवान ही है। अच्छा

213
00:14:44,800 --> 00:14:47,280
तो जैसे आप भगवान के धाम

214
00:14:47,280 --> 00:14:51,360
में पहुंच गए। आपने कहा हम सेवा करते हैं। ठीक है? भगवान के धाम में पहुंच

215
00:14:51,360 --> 00:14:55,360
गए तो जैसे सेवा करते हैं भगवान की जैसे मान लीजिए क्या होता है सेवा करने

216
00:14:55,360 --> 00:14:59,440
में मंजरी बनके करते हैं जो सेवा करते हैं ना जैसे क्या करते

217
00:14:59,440 --> 00:15:03,680
हैं? क्या सेवा करते हैं? अलग-अलग दास्य भाव में सक्ष भाव में वात्सल्य भाव में

218
00:15:03,680 --> 00:15:07,840
तो जैसे कोई एक कोई एक कोई एक उदाहरण दे दीजिए। जैसे ये कर रहे हैं।

219
00:15:07,840 --> 00:15:12,160
जैसे सुदामा मान लीजिए सुदामा के रूप में उनकी पैर दबाना

220
00:15:12,160 --> 00:15:18,160
या क्या करना मतलब कुछ सेवा के रूप में क्या

221
00:15:19,840 --> 00:15:24,240
मतलब मैं समझा नहीं मतलब जैसे सेवा होता है ना कि हमने भगवान का श्रृंगार किया

222
00:15:24,240 --> 00:15:28,320
ये उनकी सेवा हो गई हमने पैर दबाया उनको नहीं चाहिए मगर हमारे मन

223
00:15:28,320 --> 00:15:32,320
का भाव है कि उनकी सेवा में ही हमारा सुख है है ना तो वो

224
00:15:32,320 --> 00:15:36,400
सेवा क्या-क्या क्योंकि आपके लिए भगवान प्रमुख है तो आप सेवा करोगे वहां जाकर

225
00:15:36,400 --> 00:15:40,880
भगवान की तो वो सेवा क्या-क्या हो सकती है एक दो उदाहरण जैसे श्रृंगार करना

226
00:15:40,880 --> 00:15:45,280
उनके लिए भोजन बनाना उनका पैर दबाना अलग तरीके से जैसे यशोदा मैया को दे सकते हैं आप

227
00:15:45,280 --> 00:15:49,360
यशोदा मैया भगवान के लिए क्या करेंगे? मैं वो नहीं कह रहा। मैं कह रहा हूं एक उदाहरण दे दीजिए आप मुझे

228
00:15:49,360 --> 00:15:53,520
कि जैसे सर दबाना, खेलना क्या सेवा क्या हो

229
00:15:53,520 --> 00:15:57,600
सकती है उनकी? अलग-अलग सेवा हो सकती है। कुछ भी सेवा हो सकती है। खेलना भी हो सकता है। जैसे

230
00:15:57,600 --> 00:16:01,680
एक उदाहरण दे दीजिए जैसे खेलना हो सकता है। खेलना हो जैसे गोप बालों को जैसे

231
00:16:01,680 --> 00:16:02,400
खेल रहे हैं तो जैसे

232
00:16:02,400 --> 00:16:06,560
गिल्ली गिल्ली डंडा खेल सकते हैं भगवान के साथ। हां वहां पे होता है ना भगवान

233
00:16:06,560 --> 00:16:10,560
के साथ खेलते हैं गोपाल। अब बात ये है इसमें जैसे हम गिल्ली डंडा खेल रहे हैं तो

234
00:16:10,560 --> 00:16:14,800
ये एक क्रिया है। जब क्रिया होती है तो जैसे

235
00:16:14,800 --> 00:16:18,800
हमने गिल्ली में डंडा मारा मान लीजिए और मार के

236
00:16:18,800 --> 00:16:23,040
वो गिल्ली दूर गई ठीक है फिर उसको उठा के लाए फिर मारा गिल्ली

237
00:16:23,040 --> 00:16:27,200
रख के डंडा तो अब क्या हुआ जब हमने मारा और दूर गई तब तक तो हमको

238
00:16:27,200 --> 00:16:31,280
सुख मिला मगर उठा के लाने में बीच में कि

239
00:16:31,280 --> 00:16:35,280
हम वहां से उठा के ला रहे हैं फिर से गिल्ली पर डंडा मारेंगे फिर उसको तो ये तो

240
00:16:35,280 --> 00:16:39,440
सुख फिर से टूट रहा है बीच में अगर गिल्ली डंडा में हमारा सुख है।

241
00:16:39,440 --> 00:16:43,600
अगर गिल्ली डंडा में हमारा सुख है। एक्चुअली मेरा प्रश्न यह है कि

242
00:16:43,600 --> 00:16:47,840
जो जहां पर क्रिया है ना वहां पर शाश्वतता नहीं हो सकती। क्योंकि

243
00:16:47,840 --> 00:16:52,160
क्रिया है। क्रिया कहीं से शुरू होती है कहीं पे समाप्त

244
00:16:52,160 --> 00:16:56,240
होती है। क्रिया हो रही है ना? हम तो आप सेवा जो है वो एक क्रिया

245
00:16:56,240 --> 00:17:00,320
है। जैसे मान लीजिए एक माता है, एक पिता है, एक पुत्र है। हां

246
00:17:00,320 --> 00:17:04,480
या कोई मित्र है। कोई प्रेमी प्रेमिका भी है। समझ लीजिए। जब उन दोनों में प्रेम

247
00:17:04,480 --> 00:17:08,720
होता है, रगाड़ प्रेम होता है तो क्रिया करते हुए भी पेन का अभाव

248
00:17:08,720 --> 00:17:12,720
होता है। मान लीजिए कोई पिता है, पिता से पुत्र को बहुत प्रेम है। पुत्र को पिता

249
00:17:12,720 --> 00:17:16,720
से बहुत प्रेम होता है। तो पुत्र पुत्र जो है पिता के लिए बहुत सारी

250
00:17:16,720 --> 00:17:17,840
चीजें करता है।

251
00:17:17,840 --> 00:17:21,920
प्रेम के कारण बहुत प्रेम उसको रहता है। क्रिया करता है। लेकिन क्या उसको उतना

252
00:17:21,920 --> 00:17:26,000
तकलीफ होता है? होता है। जैसे मेरा पुत्र है और वो घर

253
00:17:26,000 --> 00:17:30,080
पे है। और मुझे लग रहा है कि मैं जल्दी से पहुंचूं। मगर जाम में फंसा हुआ हूं नहीं पहुंच

254
00:17:30,080 --> 00:17:34,160
पा। जितनी देर में अपने पुत्र को गोद में ले नहीं ले लूंगा। उतनी देर मुझे उसका अभाव

255
00:17:34,160 --> 00:17:38,240
लगेगा। जल्दी से गोद में लूं। है कि नहीं? तो

256
00:17:38,240 --> 00:17:42,320
आपका यह है कि जहां क्रिया है वहां पे कष्ट है।

257
00:17:42,320 --> 00:17:46,800
हां। ठीक है। मान लीजिए आप शाश्वतता भंग हो रही है। आप कह रहे हैं कि ऐसा

258
00:17:46,800 --> 00:17:50,960
प्लेस पे जाना उचित है जहां पे मतलब कोई क्रिया ना हो। बस आप हो। हां।

259
00:17:50,960 --> 00:17:54,960
ब्राह्मण। ना ये कहना चाह रहा हूं। नहीं ब्राह्मण नहीं कह रहा हूं मैं। वो नहीं कह रहा हूं

260
00:17:54,960 --> 00:17:59,120
कि ब्राह्मण ही हो। मगर वहां पे अगर हम क्रिया के कारण कर रहे हैं कि क्रिया हमें

261
00:17:59,120 --> 00:18:03,440
करनी है वहां पर कोई क्रिया हो रही है जैसे आप सेवा कर रहे हैं कुछ भी कर रहे हैं

262
00:18:03,440 --> 00:18:07,440
तो वो शुरू होगी और खत्म होगी जैसे ही शुरू होने के बीच में शुरू

263
00:18:07,440 --> 00:18:11,600
हो के खत्म होगी अगली क्रिया शुरू होगी उसके बीच में गैप आएगा टूटन

264
00:18:11,600 --> 00:18:15,680
आएगी जैसे मान लीजिए ये सपोज़ करिए कि हम भगवान का श्रृंगार

265
00:18:15,680 --> 00:18:19,680
कर रहे हैं हमने आइब्रो लगाया कुछ लगाया यहां पर

266
00:18:19,680 --> 00:18:23,760
ठीक है और यहां से चालू किया यहां पे खत्म हुआ अब हमें अगर दोबारा

267
00:18:23,760 --> 00:18:27,760
यहां से चालू करना है इसके बीच में गैप आएगा। इसके बीच में

268
00:18:27,760 --> 00:18:32,160
वो हमारा जो सुख अगर क्रिया से सुख आ रहा है तो बाधित हो जाएगा। मान

269
00:18:32,160 --> 00:18:32,880
क्रिया है ना जैसे

270
00:18:32,880 --> 00:18:37,040
मान लीजिए रूम है ना आप कह रहे हैं कि कोई क्रिया नहीं उसको छोड़िए वो फिर सवाल आता

271
00:18:37,040 --> 00:18:41,520
जाएगा। कोई क्रिया नहीं होना चाहिए ना। कोई क्रिया रहेगा तो जो है उसमें

272
00:18:41,520 --> 00:18:45,600
पेन आएगा या अलग-अलग चीज मैं कह रहा हूं। दूसरा दूसरी बात कर लेते हैं। जी।

273
00:18:45,600 --> 00:18:49,680
तो, रूम के अंदर कोई है, बैठा है। हां। बैठा है। वह बैठा

274
00:18:49,680 --> 00:18:53,680
रहे कोई क्रिया नहीं करेगा, तो फ्रस्ट्रेट हो जाएगा ना वो। लेकिन जीव का जीव

275
00:18:53,680 --> 00:18:57,920
का भगवान भगवान भी क्रिया करते हैं क्या? और क्या?

276
00:18:57,920 --> 00:19:02,240
भगवान भी फ्रस्ट्रेट हो सकते हैं? नहीं। अगर क्रिया नहीं करेंगे तो क्योंकि जो वहां पे आध्यात्मिक

277
00:19:02,240 --> 00:19:06,240
जगत में जो भी कार्य होते हैं वो भौतिक शरीर से नहीं होते। ये फ्रस्ट्रेशन,

278
00:19:06,240 --> 00:19:10,400
ये पेन भौतिक शरीर में आता है। पेन भी नहीं लगा सकते। तो इसका मतलब वहां पर क्रिया

279
00:19:10,400 --> 00:19:14,400
की जरूरत ही नहीं है। नहीं वहां पे आपका आध्यात्मिक स्वरूप रहता है।

280
00:19:14,400 --> 00:19:18,480
भौतिक शरीर नहीं रहता। आध्यात्मिक शरीर रहता है। आध्यात्मिक शरीर भौतिक शरीर में अंतर होता है।

281
00:19:18,480 --> 00:19:22,640
आध्यात्मिक शरीर जो है सच्चिदानंद होता है ना? उसमें आध्यात्मिक शरीर

282
00:19:22,640 --> 00:19:26,800
सच्चिदानंद होता है। तो जब हम सच्चिदानंद है ही है तो हमें कुछ करने की जरूरत

283
00:19:26,800 --> 00:19:31,120
क्या काम रह गई फिर? जब हम सच्चिदानंद हैं। आप मेरी बात समझिए।

284
00:19:31,120 --> 00:19:35,280
बहुत जब हमारा शरीर सच्चिदानंद है यानी कि मुक्त है तो अब हमें कुछ

285
00:19:35,280 --> 00:19:39,360
आवश्यकता थोड़ी ना रह गई करने की। वहां पे

286
00:19:39,360 --> 00:19:43,680
लोग भगवान को प्रसन्न करा जाता है। यूं ही करते हैं। आवश्यकता नहीं होती है। आवश्यकता

287
00:19:43,680 --> 00:19:47,840
नहीं है। वैसे यानी कि हमारा जो मुख्य विषय है वह भगवान नहीं है। वहां

288
00:19:47,840 --> 00:19:48,340
पहुंचना

289
00:19:48,320 --> 00:19:54,160
है। हमारा जो मुख्य विषय है वहां भगवान को आनंद देना भगवान को खुश करना है।

290
00:19:54,160 --> 00:20:00,160
भगवान की सेवा करना आप समझे नहीं।

291
00:20:02,400 --> 00:20:06,400
एक्चुअली थोड़ी सी बात समझ में नहीं आ रही। आपने कहा वो वहां का शरीर सच्चिदानंद

292
00:20:06,400 --> 00:20:10,480
है। हम वहां पहुंच गए तो काम खत्म। फिर वो हमारे ऊपर है। हम दें कि ना दे वो

293
00:20:10,480 --> 00:20:14,720
यूं ही दें तो बात अलग है। मगर कोई आवश्यकता नहीं है देने की।

294
00:20:14,720 --> 00:20:18,800
अगर आप चाहते हैं तो इसको कंटिन्यू करें क्योंकि मैंने तो अलग-अलग एक क्वेश्चन आया था मन में

295
00:20:18,800 --> 00:20:22,800
तो पूछ लिया। अलग-अलग रस में अलग-अलग जो है भाव में सेवा

296
00:20:22,800 --> 00:20:26,800
करते हैं वहां पे। जैसे पेड़ है। आप समझ नहीं रहे। पेड़ है। वहां का पेड़ जैसे जैसे वहां

297
00:20:26,800 --> 00:20:31,040
का पेड़ भी कल्पवृक्ष है। ना वहां का पेड़ भी सच्चिदानंद है।

298
00:20:31,040 --> 00:20:34,720
लेकिन वो कुछ एक्टिविटी कर रहा है क्या?

299
00:20:34,720 --> 00:20:38,800
मतलब है पेट दिया है सच्चिदानंद है लेकिन वो

300
00:20:38,800 --> 00:20:43,040
भी भगवान की सेवा कर रहा है कैसे फ्रूट्स ऑफर करके फ्रूट्स ऑफर

301
00:20:43,040 --> 00:20:47,040
करके कर रहा है ना वो कुछ कर रहा है ना फ्रूट्स ऑफर करके भगवान की सेवा कर रहा है क्योंकि उसका नेचर

302
00:20:47,040 --> 00:20:51,200
है पेड़ का नेचर क्या है वो कुछ उत्पन्न करेगा यानी कि वहां जाकर के हमारा

303
00:20:51,200 --> 00:20:55,440
नेचर होता है भगवान की सेवा करना आवश्यकता नहीं होती हमारा नेचर

304
00:20:55,440 --> 00:20:59,680
आत्मा का स्वरूप ही वो है भगवान का सेवा करना नहीं नहीं आत्मा का स्वरूप सच्चिदानंद

305
00:20:59,680 --> 00:21:04,800
है ना हम वहां गए और सच्चिदानंद हो गए

306
00:21:04,800 --> 00:21:09,120
आत्मा का स्वरूप है जी स्वरूप है कृष्ण नित्य दास हम भगवान के नित्य

307
00:21:09,120 --> 00:21:13,440
दास हैं सच्चिदानंद नहीं है दास हैं दास मतलब

308
00:21:13,440 --> 00:21:17,520
हमारा स्वरूप है भगवान की सेवा करना तो हमारा जो देखिए भौतिक

309
00:21:17,520 --> 00:21:21,600
जगत में जो लोग हैं अगर हमारा स्वरूप भगवान की सेवा

310
00:21:21,600 --> 00:21:25,760
करना है तो उसमें हमें शाश्वत सुख नहीं मिल पाएगा बाधित होगा

311
00:21:25,760 --> 00:21:29,920
क्यों नहीं मिल पाएगा भगवान की सेवा कहीं से शुरू होगी कहीं पे समाप्त होगी तो भगवान शाश्वत

312
00:21:29,920 --> 00:21:34,240
है ना तो भगवान के साथ रहेंगे भगवान की सेवा करेंगे तो शाश्वत सुख मिलेगा ना नहीं भगवान शाश्वत

313
00:21:34,240 --> 00:21:38,320
हैं। जैसे हमारी जहां पर क्रिया शुरू हुई और क्रिया खत्म हुई उसके बीच में गैप आएगा

314
00:21:38,320 --> 00:21:42,640
दोबारा क्रिया [संगीत] शुरू होने पर। वो गैप में हमें बाधित होगा बंधन आएगा

315
00:21:42,640 --> 00:21:46,640
कि अरे यार दोबारा जल्दी इधर से इधर ले जाओ। जैसे मान लीजिए बहुत छोटा सा एग्जांपल दे रहा

316
00:21:46,640 --> 00:21:50,640
हूं। पेंसिल यहां से यहां तक आ गई। अब यहां से उठा के यहां ले जाना है।

317
00:21:50,640 --> 00:21:54,720
तो ये अगर मेरा इसमें सुख है पेंसिल को यहां से यहां लाने में। तो ये जो उठा

318
00:21:54,720 --> 00:21:59,120
के ले जा रहा हूं ना वापस इसमें मुझे दुख होगा। क्यों दुख होगा?

319
00:21:59,120 --> 00:22:03,200
क्योंकि मैं उठा के वापस ले जा रहा हूं। उसमें मेरा सुख नहीं है ना। आप आपका स्वरूप है भगवान से आप

320
00:22:03,200 --> 00:22:07,200
प्रेम करते हैं, किसी से प्रेम करते हैं तो उसके लिए कोई भी एक्ट करते हैं तो आपको पेन नहीं होता। दूसरी चीज़

321
00:22:07,200 --> 00:22:11,280
कि वहां पे जो शरीर जो हमें करना होता है वो हम करने के लिए अगर

322
00:22:11,280 --> 00:22:15,360
नहीं कर पा रहे होते तो दुख होता है। कैसी बात कर रहे हैं आप? मान लीजिए बर्थडे पे विश करना

323
00:22:15,360 --> 00:22:19,360
है। केक काटना है। अरे नहीं कर पाए टाइम पे नहीं पहुंच पा रहे हैं। गाड़ी का

324
00:22:19,360 --> 00:22:19,920
जाम लग रहा है।

325
00:22:19,920 --> 00:22:23,920
जगत का एग्जांपल ले रहे हैं। भौतिक जगत में क्या है कि वहां भौतिक शरीर है। भौतिक जगत में तो वही

326
00:22:23,920 --> 00:22:27,920
तो मैं कह रहा हूं। जब आध्यात्मिक जगत में सच्चिदानंद शरीर प्राप्त हो गया तो फिर कुछ करना

327
00:22:27,920 --> 00:22:32,480
आवश्यकता नहीं बचेगी। ये बात है। चलिए छोड़िए हटाइए।

328
00:22:32,480 --> 00:22:36,640
अच्छा खैर थोड़े से लाइट चीजों पे आते हैं। काफी गहरा डिस्कशन

329
00:22:36,640 --> 00:22:41,040
हो गया फिलोसफी का। अच्छा मैं आपके गुरु

330
00:22:41,040 --> 00:22:45,040
मतलब कहां से कनेक्टेड है? कैसे वो श्रील प्रभुपाद जी तक पहुंचते हैं? इसमें थोड़ा

331
00:22:45,040 --> 00:22:49,120
सा बताइए। आप यहां के बारे में कुछ पूछिए। अब

332
00:22:49,120 --> 00:22:53,120
इसके ऊपर मैं कुछ डिस्कस नहीं कर सकता। अच्छा। अच्छा। तो

333
00:22:53,120 --> 00:22:58,000
यहां पे कौन-कौन सी बुक्स हैं जो आपके पास यहां रखी हैं?

334
00:22:58,000 --> 00:23:02,000
आप ये वीडियो डिलीट कर दीजिएगा क्योंकि एक्चुअली मेरा हैबिट नहीं है ये सब

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00:23:02,000 --> 00:23:06,080
चीज में वीडियो वगैरह और ये सब चीज का तो आपको पब्लिक करना हो तो कर सकते हैं एज अ

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00:23:06,080 --> 00:23:10,240
अपने लिए कि हां मैं गया था इस में बाकी मुझे उतना कोई इंटरेस्ट है नहीं तो मैं अभी पेश

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00:23:10,240 --> 00:23:14,320
करना चाहता हूं अभी यहां मतलब फ्रस्ट्रेशन हो रहा है यहां की बुक्स के बारे में भी नहीं नहीं

338
00:23:14,320 --> 00:23:18,880
मुझे फ्रस्ट्रेशन हो रहा है मतलब वीडियो वगैरह से तो आप इसको बंद कर सकते हो अच्छा

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00:23:18,880 --> 00:23:23,200
आप डिलीट भी कर सकते हैं क्योंकि मेरा हैबिट नहीं अरे तो आप इतना

340
00:23:23,200 --> 00:23:27,440
फ्रस्ट्रेट क्यों हो रहे हैं मेरा हैबिट नहीं है हां मेरा हैबिट

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00:23:27,440 --> 00:23:31,600
नहीं है इतना वीडियो पे बोलने का। अच्छा देखिए ये सब बातें कोई तय तो होती नहीं।

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00:23:31,600 --> 00:23:35,040
जैसे आपने मुझे बताया कि आप जो है परमधाम क्योंकि

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00:23:35,040 --> 00:23:39,040
आपने शुरू शुरुआत ऐसी नहीं की मुझे पता चला मैं एक आत्मा हूं। आपका कांसेप्ट क्या है ना

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00:23:39,040 --> 00:23:43,040
आपका का्सप्ट ये है कि आप चाहते हो कि कोई क्रिया ना हो और आनंद में रहे।

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00:23:43,040 --> 00:23:49,040
नहीं वो कांसेप्ट की बात नहीं कह रहा मैं। इसको बंद कर दीजिए फिर बात करते हैं।

346
00:23:55,780 --> 00:23:59,780
[संगीत]
