1
00:00:06,720 --> 00:00:10,880
सभी को जय श्री राम। आज हम आए हैं गुरु महाराज जी के

2
00:00:10,880 --> 00:00:15,200
पावन सानिध्य में। इनके सानिध्य में थोड़ा सा जो ज्ञान

3
00:00:15,200 --> 00:00:19,440
का प्रकाश है वो प्राप्त करने का प्रयास करेंगे गुरु महाराज जी से। गुरु जी गुरु

4
00:00:19,440 --> 00:00:23,760
महाराज जी के चरणों में सबसे पहले आपके चरणों में मैं प्रणाम

5
00:00:23,760 --> 00:00:27,280
निवेदित करता हूं। जी

6
00:00:27,280 --> 00:00:31,520
महाराज जी थोड़ा सा अपने बारे में थोड़ा सा बताएंगे मतलब कि आपकी

7
00:00:31,520 --> 00:00:35,600
यात्रा जो आपकी निजी जीवन की यात्रा जो आप हम

8
00:00:35,600 --> 00:00:41,600
अभी अखिल भारतवर्षीय धर्म संघ

9
00:00:42,000 --> 00:00:47,360
अर्थात धर्म संघ का तात्पर्य है परम पूज्य प्रातः स्मरणीय

10
00:00:47,360 --> 00:00:51,520
धर्म सम्राट स्वामी श्री कृपात्री जी महाराज के द्वारा संस्थापित वो

11
00:00:51,520 --> 00:00:53,680
संस्थान

12
00:00:53,680 --> 00:00:56,720
जिसने अपने

13
00:00:56,720 --> 00:01:01,840
प्रारंभिक काल से ही

14
00:01:01,840 --> 00:01:06,240
राष्ट्रवाद का पोषण किया है। शास्त्रवाद का पोषण किया है।

15
00:01:06,240 --> 00:01:10,880
धर्म के संरक्षण में गौ संरक्षण में

16
00:01:10,880 --> 00:01:15,120
वर्णाश्रम स्वरूप के संरक्षण में अपना अतुल्य योगदान

17
00:01:15,120 --> 00:01:17,920
दिया है।

18
00:01:17,920 --> 00:01:22,160
उसी क्रम में पूज्यपाद वीरवती श्री प्रबल

19
00:01:22,160 --> 00:01:26,960
जी महाराज जिनके पावन आश्रय में

20
00:01:26,960 --> 00:01:31,120
हम लोगों को यह पवित्र प्रकल्पों को संचालित करने का प्रशिक्षण भी

21
00:01:31,120 --> 00:01:35,520
मिला, प्रेरणा भी मिली।

22
00:01:35,520 --> 00:01:40,480
जहां तक शिक्षा आदि का विषय है तो अतीत है।

23
00:01:40,480 --> 00:01:44,720
परंतु यह सौभाग्य है कि जिस भूमि पर पूज्यपाद धर्म सम्राट स्वामी

24
00:01:44,720 --> 00:01:48,800
श्री कृपात्री जी महाराज को

25
00:01:48,800 --> 00:01:53,120
जिस भूमि को शिक्षा स्थली के रूप में धर्म सम्राट

26
00:01:53,120 --> 00:01:57,280
जी महाराज की शिक्षा स्थली के रूप में जाना जाता है। वह गंगा

27
00:01:57,280 --> 00:02:02,480
के तट पर पूज्यपाद अनंत श्री विभूषित

28
00:02:02,480 --> 00:02:06,560
ऋषिक कल्प पुण्य श्लोक पूज्य श्री जीवन दत्त जी महाराज

29
00:02:06,560 --> 00:02:10,720
के द्वारा संस्थापित वो नरवर पाठशाला हमको

30
00:02:10,720 --> 00:02:14,960
भी सौभाग्य से उस रज में खेलने का अवसर मिला

31
00:02:14,960 --> 00:02:19,360
और वहां से एक अध्यापक के रूप में धर्म संघ में प्रविष्ट

32
00:02:19,360 --> 00:02:24,880
हुए और ब्रह्मचर्य आश्रम के

33
00:02:24,880 --> 00:02:29,760
एक सोपान को पार करते हुए अवतरी आश्रम में

34
00:02:29,760 --> 00:02:34,720
हम और आप एक साथ प्रयाग की धरती पर बैठे हैं।

35
00:02:34,720 --> 00:02:38,960
बड़ा सुंदर व्याख्यान मिला महाराज जी आपसे

36
00:02:38,960 --> 00:02:43,280
महाराज जी इसमें एक कई बार हम लोगों के सुनने में आता है कि ब्रह्मचर्य जो ब्रह्मचर्य

37
00:02:43,280 --> 00:02:47,280
आश्रम होता है वो जब पूर्ण हो जाता है उसके बाद हम आगे सन्यासत्व की

38
00:02:47,280 --> 00:02:51,360
ओर बढ़ सकते हैं तो क्या दो एक दो कई प्रकार के ब्रह्मचर्य होते हैं

39
00:02:51,360 --> 00:02:55,440
कि एक होता है कि उसके बाद गृहस्ती में जाता है व्यक्ति तो इसको

40
00:02:55,440 --> 00:03:00,560
थोड़ा सा प्रकाश डालिए जैसे जैसे सनातन धर्म का

41
00:03:00,560 --> 00:03:04,800
स्वरूप चार वर्णों के रूप में देखने में आता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय,

42
00:03:04,800 --> 00:03:08,960
वैश्य और शूद्र तद्वत चार आश्रमों

43
00:03:08,960 --> 00:03:12,960
के रूप में उसका एक स्वरूप परिलक्षित

44
00:03:12,960 --> 00:03:17,120
होता है। पहला ब्रह्मचर्य है, दूसरा गृहस्थ है, तीसरा

45
00:03:17,120 --> 00:03:21,440
वानप्रस्थ है और चौथा सन्यास। शास्त्र यह कहते

46
00:03:21,440 --> 00:03:25,920
हैं कि आश्रमात आश्रमम ब्रजेत। उसका

47
00:03:25,920 --> 00:03:31,680
विभाजन जीवन के चार भाग किए गए हैं।

48
00:03:31,680 --> 00:03:35,840
पूरे जीवन को यदि कदाचित कोई 100 वर्ष की अवधि में विभाजित

49
00:03:35,840 --> 00:03:39,920
करें तो 25-25 वर्ष के चार भाग होते हैं।

50
00:03:39,920 --> 00:03:44,480
और आज 100 वर्ष का ऐसा संभावित नहीं लगता

51
00:03:44,480 --> 00:03:48,640
तो जैसा जिसको अनुकूल लगता है। परंतु मैं सिर्फ यह कहूं कि चार भागों

52
00:03:48,640 --> 00:03:52,720
में पहला भाग प्रशिक्षित होने का है।

53
00:03:52,720 --> 00:03:56,800
शिक्षार का है। संस्कारित होने का वो ब्रह्मचर्य आश्रम है।

54
00:03:56,800 --> 00:04:01,200
जब तक कोई व्यक्ति शिक्षित ना होगा, प्रशिक्षित ना होगा, संस्कारित ना होगा

55
00:04:01,200 --> 00:04:05,280
तब तक समाज को अवदान क्या करेगा? जी इसलिए

56
00:04:05,280 --> 00:04:09,760
शिक्षा आश्रमात आश्रम ब्रजेत माने पहले शिक्षित संस्कारित

57
00:04:09,760 --> 00:04:13,760
प्रशिक्षित कुछ योग्यताएं अर्जित करे व्यक्ति पहली

58
00:04:13,760 --> 00:04:18,160
जीवन के पहले भाग में तो उसका योगदान देने के लिए गृहस्थ

59
00:04:18,160 --> 00:04:22,480
आश्रम में उसको परिपक्वता के साथ में उसका सद प्रयोग करना आवे।

60
00:04:22,480 --> 00:04:26,640
जी जिस भी विधा की योग्यता पाई है, जिस

61
00:04:26,640 --> 00:04:30,720
भी कला को उसने अर्जन किया है, उसके माध्यम से समाज की सेवा

62
00:04:30,720 --> 00:04:35,040
करें और पारिवारिक परिवेश में

63
00:04:35,040 --> 00:04:39,040
उस विद्या के प्रकाश को फैलाता हुआ और जब गृहस्थ

64
00:04:39,040 --> 00:04:43,120
आश्रमोचित जो दायित्व है उनको पूर्ण कर ले तो चौथा

65
00:04:43,120 --> 00:04:47,600
तीसरा था वानप्रस्थ अर्थात धीरे से

66
00:04:47,600 --> 00:04:51,680
अभी तक आपने शिक्षा किया था धनार्जन किया परिवार

67
00:04:51,680 --> 00:04:55,840
को संस्कार दिया। वानप्रस्थ होना माने सन्यास

68
00:04:55,840 --> 00:04:59,200
होने से पहले की भूमिका।

69
00:04:59,200 --> 00:05:03,280
आज की परिस्थितियों में वानप्रस्थ संभव नहीं है। तो

70
00:05:03,280 --> 00:05:08,320
घर में ही रहो परंतु घर के एक कोने को एकांत मानो।

71
00:05:08,320 --> 00:05:12,400
वन के जैसा बनाओ। भवन में रह के भी वन के जैसा कैसे रहा

72
00:05:12,400 --> 00:05:16,800
जा सकता है भवन में रहते हुए वन में? क्योंकि वन तो आजकल है कहां?

73
00:05:16,800 --> 00:05:21,200
हमारे विकासवाद की अंधी दौड़ ने सबसे पहले वनों को सरोवरों

74
00:05:21,200 --> 00:05:25,280
को खाया है। तो उस परिस्थिति में वन कहां?

75
00:05:25,280 --> 00:05:29,760
तो भवन में वन की परिकल्पना कैसे होगी? जब

76
00:05:29,760 --> 00:05:34,000
अगली पीढ़ी अपने समग्र दायित्वों को पूर्ण करने में सक्षम

77
00:05:34,000 --> 00:05:38,560
लगने लग जाए। व्यापार संभाल लिया है। परिवार के दायित्व संभालने लगे हैं।

78
00:05:38,560 --> 00:05:42,560
और आप सब देख रहे हैं वर्तमान कालिक परिस्थितियों में उपाय

79
00:05:42,560 --> 00:05:46,960
समझ में आता है। जब घर में बहू आ जाए अर्थात

80
00:05:46,960 --> 00:05:51,360
अपना पुत्र जब पिता बन जाए तो व्यक्ति को बाबा के जैसा संयमित

81
00:05:51,360 --> 00:05:54,560
जीवन जीना चाहिए।

82
00:05:54,560 --> 00:05:58,640
एक घर में एक ही पति रहे ठीक रहता है। एक घर में एक ही पिता रहे वह

83
00:05:58,640 --> 00:06:03,200
ठीक रहता है। जब नया पिता आ गया है तो पुराना पिता गौण हो जाएगा।

84
00:06:03,200 --> 00:06:07,440
जैसे नया जामाता आ जाता है तो पुराना जामाता फूफा गौ

85
00:06:07,440 --> 00:06:10,080
हो जाता है।

86
00:06:10,080 --> 00:06:11,120
जब घर में नई

87
00:06:11,120 --> 00:06:15,120
मालकिन आ जाए, बहू आ जाए तो जो पुरानी बहू है ना म जोस हो

88
00:06:15,120 --> 00:06:19,600
गई है उनको थोड़ा संयमित सात्विक हो जाना चाहिए।

89
00:06:19,600 --> 00:06:25,200
घर में रहते हुए बहुत अनावश्यक विक्षेप ना करें।

90
00:06:25,200 --> 00:06:30,800
उपासना में विशेषित दें। जब घर के लोग पूछे

91
00:06:30,800 --> 00:06:35,520
कि इस प्रकरण में क्या करना चाहिए तो मांगने परामर्श

92
00:06:35,520 --> 00:06:39,840
दिया जाए, सलाह दी जाए। बिना मांगे परामर्श देंगे

93
00:06:39,840 --> 00:06:43,920
तो उपेक्षित हो जाएंगे। तो घर भवन में रहते

94
00:06:43,920 --> 00:06:47,920
हुए भी वन में रहने का जैसा वानप्रस्थ और ब्राह्मण मात्र के

95
00:06:47,920 --> 00:06:52,160
लिए चतुर्थ अवस्था आने पर सन्यास का अधिकार

96
00:06:52,160 --> 00:06:56,480
है तो सन्यासी हो जाए। ब्राह्मण को तो घर में बिस्तर पर पड़े

97
00:06:56,480 --> 00:07:00,960
पड़े प्राण त्यागना महापाप है। एक अपराध है।

98
00:07:00,960 --> 00:07:05,200
ब्राह्मण तो तुर्या अवस्था में तुर्या आश्रम में ही जाते

99
00:07:05,200 --> 00:07:09,440
हुए अपने इस जीवन की यात्रा को पूर्ण करें। मैंने

100
00:07:09,440 --> 00:07:13,520
थोड़ी कड़ी बात कह दी है और बहुत आवश्यक है। ब्राह्मण में

101
00:07:13,520 --> 00:07:17,520
भी लिप्सा रही, ब्राह्मण में मोह रहा, आसक्ति रही तो ब्राह्मण शरीर में आने का अर्थ

102
00:07:17,520 --> 00:07:21,600
क्या हुआ? इसलिए यथासंभव प्रत्येक ब्राह्मण

103
00:07:21,600 --> 00:07:26,160
को चतुर्थ अवस्था आने पर चतुर्थ

104
00:07:26,160 --> 00:07:30,320
आश्रम में प्रवेश करना ही चाहिए। ब्राह्मण को ही करना चाहिए।

105
00:07:30,320 --> 00:07:34,880
किसी दूसरे के लिए तो सन्यास है ही नहीं। जी जी नारायण

106
00:07:34,880 --> 00:07:39,040
महाराज जी मैं ये पूछ रहा था इससे अलग हटके थोड़ा सा कि क्या

107
00:07:39,040 --> 00:07:43,280
ब्रह्मचर्य के समय भी हम ये तय कर सकते हैं कि हमें हां ये रह गया

108
00:07:43,280 --> 00:07:47,360
आप जो आप जो वाले ब्रह्मचारी मतलब आप जो कहना चाह रहे थे तो एक हम

109
00:07:47,360 --> 00:07:52,080
क्रम बताएं आश्रमात आश्रमम ब्रजेत एक स्वाभाविक सामान्य

110
00:07:52,080 --> 00:07:56,320
नियम है जी ऐसा ही होना चाहिए परंतु कदाचित

111
00:07:56,320 --> 00:08:00,960
ब्रह्मचर्य आश्रम में रहते-रहते जन्मांतरीय संस्कार के उद्बुद्ध

112
00:08:00,960 --> 00:08:04,960
होने पर जी वैसा अनुभव होने लगे कि नहीं ये नाशवान संसार

113
00:08:04,960 --> 00:08:09,200
का कितना सेवन करना है और कब तक करना है। कितने

114
00:08:09,200 --> 00:08:14,640
जन्मों तक इसी एक ही ढर्रे पर लगातार भटकना है। तो फिर

115
00:08:14,640 --> 00:08:18,880
शास्त्र कहते हैं कि जिस समय चित्त में वैराग्य का भाव उदित

116
00:08:18,880 --> 00:08:24,880
हो उसी समय सन्यस्त हो जाए। ब्राह्मण

117
00:08:24,960 --> 00:08:29,360
माने यह जो लैंगिक सन्यास है यह केवल ब्राह्मण के लिए है

118
00:08:29,360 --> 00:08:33,760
और कोई विद्वत सन्यास के क्रम में सन्यास के उस

119
00:08:33,760 --> 00:08:37,760
भाव को जीना चाहता है कि जहां समाज से कुछ

120
00:08:37,760 --> 00:08:41,280
अपेक्षा नहीं है कुछ चाहिए नहीं देना ही देना है सन्यास का मतलब लेना

121
00:08:41,280 --> 00:08:46,240
नहीं है इसलिए सन्यासी को स्वर्णाधिक लेना

122
00:08:46,240 --> 00:08:50,320
ये स्वीकार्य नहीं है जी वो बातें कह कोई आचार्य होने

123
00:08:50,320 --> 00:08:55,760
के नाते कहे कि हम आचार्य को अधिकृत है सब चलता है। परंतु मूलत

124
00:08:55,760 --> 00:09:01,760
ये ठीक नहीं है। तो जिस समय

125
00:09:01,920 --> 00:09:05,920
जिस समय चित्त में वैराग्य का उदय हो जाए उसी समय

126
00:09:05,920 --> 00:09:10,640
सन्यस्त हो जाए तो ब्रह्मचर्य आश्रम साक्षात सन्यास में भी जाया जाता है।

127
00:09:10,640 --> 00:09:14,800
जैसे जैसे आद्य जगतगुरु शंकराचार्य ब्रह्मचर्य आश्रम की

128
00:09:14,800 --> 00:09:20,800
भी अत्यंत कोमल पूर्व भूमिका में ही सीधे सन्यस्त हो गए।

129
00:09:21,200 --> 00:09:25,280
ठीक है महाराज जी इसमें थोड़ा सा एक आध्यात्मिक प्रश्न एक आ रहा

130
00:09:25,280 --> 00:09:29,360
था कि जैसे भगवत अवतार

131
00:09:29,360 --> 00:09:33,440
जो होता है उसको हम नित्य

132
00:09:33,440 --> 00:09:37,600
मानते हैं या नहीं मानते हैं यदि नित्य नहीं मानते तो फिर उसमें

133
00:09:37,600 --> 00:09:42,560
ईश्वरत्व कैसे घटित होता है ये थोड़ा सा एक दार्शनिक

134
00:09:42,560 --> 00:09:46,560
प्रश्न ये थोड़ा उलझी हुई बात हो जाएगी और कक्षा से

135
00:09:46,560 --> 00:09:51,120
थोड़ी ऊपर हो जाएगी दो प्रकार की पद्धति पद्धतियां है विवेचना

136
00:09:51,120 --> 00:09:55,440
की और ये प्राय चली आ रही है।

137
00:09:55,440 --> 00:09:59,600
हम जिस पद्धति का आलंबन करके विचार करते हैं उसे

138
00:09:59,600 --> 00:10:02,080
कहते हैं विवर्तवाद

139
00:10:02,080 --> 00:10:06,720
और एक दूसरी भाव प्रस्थान की पद्धति जहां परिणामवाद

140
00:10:06,720 --> 00:10:10,720
चलता है। तो वेदांत विधा के दो पारिभाषिक

141
00:10:10,720 --> 00:10:14,720
शब्द हैं। विवर्तवाद और परिणामवाद। जी तो जब

142
00:10:14,720 --> 00:10:18,800
आप विवर्तवाद की बात करते हैं तो ब्रह्म सत्यम जगन मिथ्या जीवो

143
00:10:18,800 --> 00:10:22,800
ब्रह्म ना परह ब्रह्म सत्यम जगन मिथ्या तो यहां

144
00:10:22,800 --> 00:10:27,040
फिर कुछ भी शेष नहीं रह जाता है।

145
00:10:27,040 --> 00:10:31,760
जब आप निर्विशेष ब्रह्म की बात करते हैं तो फिर आपको

146
00:10:31,760 --> 00:10:36,160
कुछ भी जैसे विवर्तवाद क्या है?

147
00:10:36,160 --> 00:10:36,800
रस्सी

148
00:10:36,800 --> 00:10:39,120
में

149
00:10:39,120 --> 00:10:44,320
असर्प भूत रज्जु में असर्प भूतायाम रज्ज

150
00:10:44,320 --> 00:10:48,720
वो सर्प नहीं वहां सर्प नहीं है रस्सी में केवल रस्सी है

151
00:10:48,720 --> 00:10:53,280
पर भ्रांति के कारण आपको वहां सर्प का आभास होने लगा

152
00:10:53,280 --> 00:10:57,360
तो है क्या बोले है तो रस्सी तो ये सर्पत्व कहां से आया

153
00:10:57,360 --> 00:11:01,680
सर्प प्रतीति कहां से आई

154
00:11:01,680 --> 00:11:05,840
बोले भ्रम के कारण भ्रांति के कारण अज्ञान के कारण हुआ तो

155
00:11:05,840 --> 00:11:10,240
वस्तुत ब्रह्म सत्ता में जो जगत की प्रतीति

156
00:11:10,240 --> 00:11:14,480
हो रही है, जगत का आभास हो रहा है, इसलिए वेदांतियों के

157
00:11:14,480 --> 00:11:18,560
यहां पर तीन प्रकार से विचार किया जाता है। एक

158
00:11:18,560 --> 00:11:22,640
व्यावहारिक सत्ता है और एक प्रातिभाषिक सत्ता है

159
00:11:22,640 --> 00:11:27,200
और एक पारमार्थिक सत्ता है। तो

160
00:11:27,200 --> 00:11:31,520
यदि हम विवर्तवाद की दृष्टि से विचार करें तो एक ब्रह्म के अतिरिक्त

161
00:11:31,520 --> 00:11:35,120
कुछ भी शेष है ही नहीं।

162
00:11:35,120 --> 00:11:39,280
पारमार्थिक सत्य हो गया। हां हां व्यवहारिक की दृष्टि से तो फिर

163
00:11:39,280 --> 00:11:43,360
होता ही है। अज्ञान की निवृत्ति से पूर्व तक

164
00:11:43,360 --> 00:11:47,360
यह भाषित होता है। ज्ञानोत्तर दशा में

165
00:11:47,360 --> 00:11:51,680
कुछ शेष नहीं रह जाता है। परंतु हम परिणामवाद

166
00:11:51,680 --> 00:11:52,180
की दृष्टि

167
00:11:52,160 --> 00:11:56,320
से विचार करते हैं। तो परिणाम का तात्पर्य परिणामवाद का तात्पर्य दूध का

168
00:11:56,320 --> 00:12:00,400
दधी के रूप में परिणत हो जाना। तो उस भाव

169
00:12:00,400 --> 00:12:04,400
प्रस्थान का सौंदर्य यह है कि अधिष्ठान दोनों का एक

170
00:12:04,400 --> 00:12:08,480
ही है। विवर्तवाद में भी अधिष्ठान के

171
00:12:08,480 --> 00:12:13,040
रूप में ब्रह्म को स्वीकार किया गया है। और परिणामवाद में भी आधार

172
00:12:13,040 --> 00:12:17,200
हेतु निमित्त कारण उपादान जो भी आप कहे अधिष्ठान

173
00:12:17,200 --> 00:12:21,760
वही ब्रह्म ही है। परंतु अंतर इतना है

174
00:12:21,760 --> 00:12:26,480
कि वेदांतियों ने कहा कि ब्रह्म का विवर्त है यह प्रपंच यह जगत

175
00:12:26,480 --> 00:12:30,480
पर भाव प्रस्थान के मानने वाले परिणामवादियों ने कहा कि नहीं नहीं

176
00:12:30,480 --> 00:12:34,720
ब्रह्म ही परिणत होकर के परमात्मा ही परिणत होकर के ईश्वर

177
00:12:34,720 --> 00:12:38,720
ही भगवान ही परिणत होकर के जगत के रूप में परिलक्षित हो

178
00:12:38,720 --> 00:12:42,720
रहा है। तो जब आप विवर्तवाद

179
00:12:42,720 --> 00:12:46,880
की बात करते हैं तो वहां उपासना

180
00:12:46,880 --> 00:12:51,280
के लिए अंगीकृत द्वैत को आदर द्वैत को आदर देते हुए भी

181
00:12:51,280 --> 00:12:55,360
अद्वैत में परिनिश्चित होना ही अभीष्ट है। जब भी आप कहोगे

182
00:12:55,360 --> 00:12:59,680
राम सविशेष की बात करोगे, पुस्तक की बात करोगे,

183
00:12:59,680 --> 00:13:03,760
वस्तु की बात करोगे, व्यक्ति की बात करोगे तो तीनों कालों का प्रयोग होने

184
00:13:03,760 --> 00:13:07,200
लग जाएगा। आपको महाराज दशरथ थे तो थे

185
00:13:07,200 --> 00:13:11,360
तो बोलते बोलते हां राम यहां गए थे राम वहां गए थे

186
00:13:11,360 --> 00:13:16,560
जब भी आपने थे किया या होगा कहेंगे तो सब

187
00:13:16,560 --> 00:13:20,880
कालकृत परंतु ब्रह्म तो

188
00:13:20,880 --> 00:13:24,880
त्रिकाला बाध्य है इसलिए सत कहने का

189
00:13:24,880 --> 00:13:29,200
तात्पर्य अस्ति ब्रह्म के लिए सदा अस्ति प्रयोग होगा

190
00:13:29,200 --> 00:13:33,200
भविष्यति नहीं हो सकता अभूत नहीं हो सकता अभवत

191
00:13:33,200 --> 00:13:37,280
नहीं हो था ऐसा जिसके लिए प्रयोग हो

192
00:13:37,280 --> 00:13:41,440
रहा है वह चिंतनीय हो जाएगा। इसलिए

193
00:13:41,440 --> 00:13:46,320
भाव प्रस्थान की सुंदरता का समा

194
00:13:46,320 --> 00:13:50,400
यही कहेंगे कि विवर्तवाद की दृष्टि से ब्रह्म के अतिरिक्त कुछ भी

195
00:13:50,400 --> 00:13:54,560
नहीं है। और परिणामवाद की दृष्टि

196
00:13:54,560 --> 00:13:59,840
से कहेंगे कि हर कुछ सब कुछ परमात्मा ही है। भगवान ही है।

197
00:13:59,840 --> 00:14:03,920
तो महाराज जी तो इसको ये मान ले कि भाव प्रस्थान व्यवहार हो गया कि

198
00:14:03,920 --> 00:14:07,920
व्यवहार की दृष्टि से भगवान नित्य है। इस तरह से मतलब जो अवतार है

199
00:14:07,920 --> 00:14:12,000
हां ये सुंदरता है विचार की ये सुंदरता है विचार

200
00:14:12,000 --> 00:14:16,480
जब तक हम जैसे उसमें नहीं जाएंगे पारमार्थिक

201
00:14:16,480 --> 00:14:20,640
दृष्टि हमें प्राप्त नहीं है जब तक तो तब तक तो भगवान जितनी

202
00:14:20,640 --> 00:14:22,640
बार भी अप्रकट हो गए

203
00:14:22,640 --> 00:14:26,800
और फिर प्रकट हो सकते हैं। फिर तो उनका वो विनाश तो सिद्ध हो नहीं रहा है। इसलिए

204
00:14:26,800 --> 00:14:31,200
भगवान का आना और जाना उतरना माने आविर्भूत

205
00:14:31,200 --> 00:14:35,200
होना और तिरोभूत होना तिरोहित होना भगवान के

206
00:14:35,200 --> 00:14:39,280
अवतार आदि का जो जितना भी उल्लेख किया जाता है उसका तात्पर्य ये नहीं है कि

207
00:14:39,280 --> 00:14:43,360
भगवान आए और फिर चले गए कहां से आए कहां चले गए जो सर्वव्यापक

208
00:14:43,360 --> 00:14:47,520
परमात्मा है उसका कहां से आना जाना सधेगा वो धरा

209
00:14:47,520 --> 00:14:51,760
धाम को त्याग करके भगवान अपने लोक को चले गए ऐसा उसका तात्पर्य

210
00:14:51,760 --> 00:14:55,920
ऐसा नहीं है चले गए तो मंदिरों में फिर यहां कौन है बिल्कुल भगवान कहीं

211
00:14:55,920 --> 00:15:00,000
जाते नहीं है। भगवान हो गए। एक कालावधि में

212
00:15:00,000 --> 00:15:04,000
जिस उद्देश्य के लिए सगुण होकर के साकार होकर के अवतरित

213
00:15:04,000 --> 00:15:08,160
हुए उस उद्देश्य को पूर्ण करते ही भगवान दृष्टि से ओझल हो गए।

214
00:15:08,160 --> 00:15:12,480
जी इन चर्म चक्षुओं को नहीं दिखते। हृदय की चक्षुओं को दिखने लग जाते हैं।

215
00:15:12,480 --> 00:15:16,800
अवतार काल में भगवान चर्म चक्षुओं को भी दिखते हैं।

216
00:15:16,800 --> 00:15:21,840
परंतु जब भगवान के अवतार का उद्देश्य पूर्ण हो जाता है

217
00:15:21,840 --> 00:15:26,000
उनका तिरोधान होने का तात्पर्य है कि अब इसके बाद

218
00:15:26,000 --> 00:15:30,160
जिनके हृदय पावन है उनको वो हृदय के नेत्रों से दिखाई देंगे।

219
00:15:30,160 --> 00:15:34,320
इन चर्म चक्षुओं से नहीं दिखाई देंगे। किसी किसी सत्पात्र को दिखेंगे। ये

220
00:15:34,320 --> 00:15:37,680
तात्पर्य है। ठीक है महाराज। अच्छा

221
00:15:37,680 --> 00:15:41,680
महाराज जी इसमें एक एक हम गुरु परंपरा का एक प्रश्न

222
00:15:41,680 --> 00:15:46,880
ले लेते हैं। गुरु परंपरा की महत्व क्या है और

223
00:15:46,880 --> 00:15:50,880
मतलब कैसे हमारे जो सिद्धांत हैं क्योंकि आजकल

224
00:15:50,880 --> 00:15:55,040
क्या है ना बहुत सारी संस्थाएं हो गई हैं स्वयं को गुरु विहीन है उनका

225
00:15:55,040 --> 00:15:59,040
पीछे की कोई परंपरा नहीं है और वो कोई भी सिद्धांत जो है हमारे जो सनातन

226
00:15:59,040 --> 00:16:03,200
सिद्धांत है उनके विरुद्ध जो है भाषित कर रही हैं तो गुरु परंपरा के महत्व पर

227
00:16:03,200 --> 00:16:07,200
थोड़ा सा प्रकाश डालिए ये कुछ वर्षों से ऐसा चला मुझे

228
00:16:07,200 --> 00:16:11,360
लगता है कि पहले भी होगा थोड़ा बहुत परंतु कबीर

229
00:16:11,360 --> 00:16:15,360
के समय में एक बात कही गई

230
00:16:15,360 --> 00:16:20,080
उन्होंने कहा कि

231
00:16:20,080 --> 00:16:24,880
मैं कहता आंख की देखी तुम कहते

232
00:16:24,880 --> 00:16:29,040
पुस्तक की लेखी और मैं कहता आंख की देखी। ये कुछ बात थोड़ी इधर उधर

233
00:16:29,040 --> 00:16:33,040
भी हो सकती है। पर कबीर की दूसरी वाली बात तो पक्की है। वो कहते हैं

234
00:16:33,040 --> 00:16:37,440
कि मैं कहता आंख की देखी। और इस धारा

235
00:16:37,440 --> 00:16:42,240
का आश्रय लेकर के बहुत अनेक प्रकार के

236
00:16:42,240 --> 00:16:46,480
जड़ बौद्धवाद के माने बौद्धवाद का तात्पर्य बहुत

237
00:16:46,480 --> 00:16:51,200
महात्मा बुद्ध वाले संप्रदाय की बात नहीं कर रहा हूं। बौद्धिकवाद

238
00:16:51,200 --> 00:16:55,440
का तथाकथित बुद्धिजीवियों का एक क्रम तैयार

239
00:16:55,440 --> 00:16:59,600
होता चला गया। उसी में ओशो भी आ जाते हैं।

240
00:16:59,600 --> 00:17:03,920
उसी में आजकल के अनेक प्रकार के इनके नाम लेने की कोई आवश्यकता नहीं है।

241
00:17:03,920 --> 00:17:08,320
अनेक प्रकार के तथाकथित ज्ञानी गुरु आचार्य न जाने कौन-कौन तैयार

242
00:17:08,320 --> 00:17:11,360
हो जा रहे हैं।

243
00:17:11,360 --> 00:17:14,560
हमारे यहां

244
00:17:14,560 --> 00:17:19,120
निर्मूल चिंतन का कोई आधार नहीं है। कोई आदर नहीं है।

245
00:17:19,120 --> 00:17:23,120
हमारे सनातन की सुंदरता यह है। आप भागवत जी देखें चाहे उपनिषद

246
00:17:23,120 --> 00:17:25,280
देखें।

247
00:17:25,280 --> 00:17:29,360
जब किसी जिज्ञासु ने किसी सक्षम समर्थ आचार्य से प्रश्न

248
00:17:29,360 --> 00:17:33,680
किया तो प्रश्न सुनते ही वो जो उत्तर देने के

249
00:17:33,680 --> 00:17:35,280
निमित्त निर्धारित किए

250
00:17:35,280 --> 00:17:39,280
गए हैं समझे गए हैं जैसे उदाहरण के लिए

251
00:17:39,280 --> 00:17:43,360
देवर्षि नारद भगवान नारायण से प्रश्न करते हैं नर नारायण

252
00:17:43,360 --> 00:17:47,840
में से नारायण से प्रश्न करते हैं तो जो भी प्रश्न किया जा रहा है

253
00:17:47,840 --> 00:17:52,320
मान लीजिए सोनक जी महाराज सूत जी से प्रश्न कर रहे हैं अथवा

254
00:17:52,320 --> 00:17:56,320
विदुर जी महाराज मैत्रे से प्रश्न कर रहे अथवा अन्यत्र जहां

255
00:17:56,320 --> 00:18:00,480
कहीं भी हम उपलक्षण के रूप में दो तीन नाम ले रहे हैं। तो प्रश्न

256
00:18:00,480 --> 00:18:04,480
को सुनते ही सबसे पहले उत्तर देने वाले ये

257
00:18:04,480 --> 00:18:08,800
नहीं कहते कि मेरा मौलिक चिंतन है। यह मेरा मौलिक

258
00:18:08,800 --> 00:18:12,960
विचार है। यह मेरे मेरा अपना विचार है। वो सध्या

259
00:18:12,960 --> 00:18:16,960
सनातन धर्म की सुंदरता बता रहे हैं। वो कहते हैं अरे यह प्रश्न तो

260
00:18:16,960 --> 00:18:21,040
अमुक अमुक महापुरुष ने अमुक अमुक महापुरुष से अमुक

261
00:18:21,040 --> 00:18:25,200
अमुक स्थान पर तब किया था। जी वो समय भी बता रहे हैं। वो स्थान भी

262
00:18:25,200 --> 00:18:30,080
बता रहे हैं। पूछने वाला भी बता रहे हैं और बताने वाला भी बता रहे हैं।

263
00:18:30,080 --> 00:18:33,120
इससे हमारा अहंकार

264
00:18:33,120 --> 00:18:37,120
हर्ट नहीं होगा। अभी तो मेरी प्रामाणिकता मेरे

265
00:18:37,120 --> 00:18:41,120
ज्ञान की प्रामाणिकता सिद्ध होगी। कि मैं जो बताने जा रहा हूं वो मेरा

266
00:18:41,120 --> 00:18:45,360
नहीं है। ये हजारों लाखों वर्ष पहले अमुक महापुरुष

267
00:18:45,360 --> 00:18:49,520
ने अमुक महापुरुष से अमुक स्थान पर अमुक तीर्थ में और यह प्रश्न किया था।

268
00:18:49,520 --> 00:18:50,320
उन्होंने जो बताया

269
00:18:50,320 --> 00:18:54,480
मैं तुमको बताने जा रहा हूं। ऐसा कहने से एक

270
00:18:54,480 --> 00:18:58,640
तो कृतज्ञता हो गई। जहां से मुझे प्रश्न का उत्तर मिला है।

271
00:18:58,640 --> 00:19:02,720
उस आर्ष परंपरा, ऋषि परंपरा, उस गुरु परंपरा, कुल परंपरा,

272
00:19:02,720 --> 00:19:07,280
आचार्य परंपरा के प्रति मैंने कृतज्ञता ज्ञापित कर दी तो मैं निर्दोष हो गया।

273
00:19:07,280 --> 00:19:11,440
दूसरा मैं बताने जा रहा हूं तो मेरे चित्त में कोई अभिमान नहीं आएगा कि मैंने कुछ

274
00:19:11,440 --> 00:19:15,520
बताया है। मेरे पास तो रखी थी वस्तु मैंने उठा के दे दी है। मेरे पास फूल था

275
00:19:15,520 --> 00:19:19,520
मैंने फूल दिया। फल था फल दिया। नहीं होता तो आजकल के

276
00:19:19,520 --> 00:19:23,760
तथाकथित बुद्धिजीवी ऐसे तैयार होते हैं। बोले नहीं नहीं ये नहीं जी

277
00:19:23,760 --> 00:19:28,160
मैं बता रहा हूं। यह मेरा अपना पर्सनल मेरा अपना मेरा

278
00:19:28,160 --> 00:19:32,400
अपना ज्ञान है। जी ऐसा कहने से एक तो आपकी

279
00:19:32,400 --> 00:19:36,640
अप्रामाणिकता हो जाती है। दूसरी

280
00:19:36,640 --> 00:19:40,800
आपको उस सामान यद्यपि ऐसा दुनिया में कोई ज्ञान नहीं है जो आप अपने

281
00:19:40,800 --> 00:19:45,040
से उधार लेके आए उतार करके लाएंगे। आएगा ग्रंथों से आएगा

282
00:19:45,040 --> 00:19:49,120
आचार्यों से आएगा किसी और से परंतु आपका

283
00:19:49,120 --> 00:19:53,200
अभिमान परिपुष्ट हो गया कि मैं यह मेरा है

284
00:19:53,200 --> 00:19:57,280
ये मैं हूं इससे अहंकार हो जाएगा और अहंकार

285
00:19:57,280 --> 00:20:01,600
ही पतन का कारक है। इसलिए मैं समग्र

286
00:20:01,600 --> 00:20:05,520
सनातन धर्म के प्रति आस्था रखने वाली वो चाहे भारत के

287
00:20:05,520 --> 00:20:09,680
अंदर रहती हुई धर्म प्राण प्रजा हो चाहे भारत के बाहर

288
00:20:09,680 --> 00:20:14,160
रहने वाली भारत के प्रति आस्था रखने वाली प्रजा हो भारतीय

289
00:20:14,160 --> 00:20:18,160
भावों के प्रति आस्था रखने वाली प्रजा हो सनातन संस्कृति से प्रेम करने

290
00:20:18,160 --> 00:20:22,240
वाली प्रजा हो ऐसा हो सकता है भारत के भावना से भरा वो भारत में नहीं रह पा

291
00:20:22,240 --> 00:20:26,320
रहा है भारत से दूर जाना पड़ा है जीविका के लिए किसी अन्य कारण के

292
00:20:26,320 --> 00:20:30,560
लिए कारण से उन सबसे कहना चाहूंगा कि

293
00:20:30,560 --> 00:20:34,720
आचार्य परंपरा के रूप में, गुरु परंपरा के रूप में, आचार्य के रूप में,

294
00:20:34,720 --> 00:20:38,800
गुरु के रूप में यह तथाकथित कोई 100 वर्ष का,

295
00:20:38,800 --> 00:20:43,040
कोई 200 वर्ष का, कोई 400 वर्ष का, कोई हजार वर्ष का, कोई 2000

296
00:20:43,040 --> 00:20:47,200
वर्ष का इनके चक्कर में नहीं पड़ना है। और ना ही

297
00:20:47,200 --> 00:20:51,360
यह विश्वास करने योग्य बात है कि वेद 5,000 साल पहले

298
00:20:51,360 --> 00:20:55,440
लिखे गए हैं। हमारी ये 10,000 साल पुराना है। आप

299
00:20:55,440 --> 00:20:59,440
सनातन धर्मियों जो सनातन धर्म में आस्था रखते हैं

300
00:20:59,440 --> 00:21:03,520
जो भगवान के अवतारवाद में आस्था रखते हैं जो वेदों के प्रति श्रद्धा

301
00:21:03,520 --> 00:21:07,520
रखते हैं उनका करोड़ों करोड़ों नहीं अरबों अरबों वर्षों का जीवन

302
00:21:07,520 --> 00:21:11,680
है उनके पास में अरबों वर्षों की परंपरा है तो अरबों वर्षों

303
00:21:11,680 --> 00:21:15,840
की परंपरा वाले ये हजार दो हजार वर्षों की वालों की नकल

304
00:21:15,840 --> 00:21:21,360
करेंगे तो दीन ही माने जाएंगे हिंदू सनातन धर्मी हिंदू

305
00:21:21,360 --> 00:21:25,360
यदि वो ईसाइयों का अनुकरण करें इस्लाम का अनुकरण करे या

306
00:21:25,360 --> 00:21:29,680
किसी और का अनुकरण करें तो ऐसा लगेगा जैसे कोई सिंह

307
00:21:29,680 --> 00:21:33,680
का बच्चा किसी सियार से मार्गदर्शन पाने की चाह रख

308
00:21:33,680 --> 00:21:38,080
रहा है। किसी स्वान से मार्गदर्शन पाने की चाह रख रहा है।

309
00:21:38,080 --> 00:21:42,240
अच्छा महाराज जी इसी क्रम में क्या हो गया है? अब कुछ लोग तो ऐसे

310
00:21:42,240 --> 00:21:46,320
हैं जो सीधे-सीधे कहते थे कि भाई हमें हमारी कोई गुरु परंपरा नहीं है। हम

311
00:21:46,320 --> 00:21:50,640
यह वेद है और जो वेद का अर्थ हम अपने मन से कर रहे हैं। तो इसमें हमारा

312
00:21:50,640 --> 00:21:54,720
हम उनसे वही प्रश्न करते हैं कि भाई ये वेद आपको

313
00:21:54,720 --> 00:21:58,720
कहां से मिले हैं जिससे मिले हैं? यदि आप उसके अर्थ पर विश्वास

314
00:21:58,720 --> 00:22:02,880
नहीं करते तो फिर उसके द्वारा दिए गए वेद मंत्रों पर विश्वास कैसे?

315
00:22:02,880 --> 00:22:06,880
और यदि वेद मंत्रों पर विश्वास है तो उसके द्वारा दिए गए अर्थ पर

316
00:22:06,880 --> 00:22:11,200
विश्वास दावना सिद्ध नहीं होता। मतलब किसी से आप आधी चीज बांधे

317
00:22:11,200 --> 00:22:15,520
आधी चीज ना बांधे ऐसा तो कर नहीं सकते। अब वेद आपको किसी परंपरा से मिले हैं। अगर

318
00:22:15,520 --> 00:22:19,600
जैसे जो लोग ये दावा करते हैं 20,000 साल पहले वेद उतरे तो 20,000 साल

319
00:22:19,600 --> 00:22:23,680
पुराना भी उनका इतिहास प्राप्त नहीं है। तो फिर वो वेद उनके पास

320
00:22:23,680 --> 00:22:27,920
आए कैसे? तो जिनका इतिहास प्राप्त है उनहीं से बांधना पड़ेगा। तो जब आपका

321
00:22:27,920 --> 00:22:32,080
वेद मंत्र आ उससे रहा है परंपरा से तो आप परंपरा के विरुद्ध

322
00:22:32,080 --> 00:22:36,080
जाकर के सिद्धांतों की वो सिद्धि नहीं कर सकते। तो ये हमारा

323
00:22:36,080 --> 00:22:36,580
थोड़ा सा

324
00:22:36,400 --> 00:22:40,640
होता है। मगर अभी क्या करने लगे हैं कुछ लोग? जैसे कई ऐसे स्वषित

325
00:22:40,640 --> 00:22:44,640
गुरु आचार्य वगैरह हैं। वो यह दावा करने लगते हैं कि हमको जो है

326
00:22:44,640 --> 00:22:48,880
स्वप्न में आकर के या जो है जैसे रामपाल इत्यादि

327
00:22:48,880 --> 00:22:52,960
कि हमको वहां दर्शन दे दिए उन्होंने है ना ऐसे कई स्वाभूषित इस

328
00:22:52,960 --> 00:22:57,120
समय आचार्य बन रहे हैं। गुरु बन रहे हैं। तो वो कह देते हैं कि हमको जो है स्वप्न में आकर

329
00:22:57,120 --> 00:23:01,360
के अब प्रश्न लंबा होता चला जाएगा। रामपाल का नाम लिया आपने बहुत अच्छा भगवान

330
00:23:01,360 --> 00:23:05,360
का नाम आ गया। पर मुझे बहुत आश्चर्य इस

331
00:23:05,360 --> 00:23:09,520
बात का होता है। जी उस व्यक्ति को लेकर के मुझे

332
00:23:09,520 --> 00:23:13,520
बहुत ज्यादा चिंता नहीं और बहुत ज्यादा विचार करने का मुझे दया आती है। मैं महाराज

333
00:23:13,520 --> 00:23:18,000
जी एक बस पूरा कर लूं अपना एक छोटी सी बात रह गई तो उसमें फिर ये होता है

334
00:23:18,000 --> 00:23:22,240
कि ऐसा सिद्धांत सुन पूरी के शंकराचार्य जी ने भी बताया था यदि आपको स्वप्न

335
00:23:22,240 --> 00:23:26,240
में भी कुछ प्राप्त हो जाए फिर भी उसको किसी प्रामाणिक

336
00:23:26,240 --> 00:23:30,560
जो परंपरा आचार्य परंपरा उससे जाकर के उसको सत्यापन करवाना है।

337
00:23:30,560 --> 00:23:35,040
अगर नहीं करवाया तो वह आपका जो ज्ञान आपको प्राप्त हो रहा है

338
00:23:35,040 --> 00:23:39,040
जो आप दावा कर रहे हो कि हमको जैसे ब्रह्मा कुमारी वाले हैं वो कहते

339
00:23:39,040 --> 00:23:43,280
हैं हमको ब्रह्मा जी आ करके स्वयं ज्ञान देते हैं तो उसकी उन्होंने सत्यापन नहीं कराया

340
00:23:43,280 --> 00:23:47,360
इसलिए उसको प्रामाणिक नहीं माना जा सकता और ये नहीं माना जा सकता कि ब्रह्मा जी ही आए जब

341
00:23:47,360 --> 00:23:51,520
तक मतलब गुरु परंपरा पे किसी ना किसी पे आपको आश्रित होना ही पड़ेगा जो प्रामाणिक

342
00:23:51,520 --> 00:23:55,600
गुरु परंपरा है और जब आप आश्रित हो गए तो आपको मानना

343
00:23:55,600 --> 00:24:00,080
पड़ेगा कि मैं इस गुरु परंपरा का हूं। ठीक है? तब आप अपनी स्वतंत्र गुरु परंपरा

344
00:24:00,080 --> 00:24:04,560
शिवश भैया इसमें प्रश्न भी आपका और उत्तर भी आपका। सारा आपने कह दिया।

345
00:24:04,560 --> 00:24:08,880
बहुत अच्छे ढंग से सारी बात आपने कह दी। सही बात ये है

346
00:24:08,880 --> 00:24:12,960
कि आप ये हमको बताना चाहते हैं आप

347
00:24:12,960 --> 00:24:17,200
हमको बताना चाहते हैं कि ये मुझे सपने में स्वप्न

348
00:24:17,200 --> 00:24:21,200
में आदेश प्राप्त हुए हैं। मान लेंगे तुम्हारी बात। मान लेंगे। हमारे यहां

349
00:24:21,200 --> 00:24:26,160
स्वप्न विज्ञान है। परंतु जो

350
00:24:26,160 --> 00:24:30,560
आप इस भाव को हमें मनवाने के लिए

351
00:24:30,560 --> 00:24:34,560
इतना उद्यम कर रहे हो तो जिस सत्ता ने आपको स्वप्न में

352
00:24:34,560 --> 00:24:38,640
आदेश दिया उस सत्ता को कृपया यह कह दो कि इन हजारों लोगों को लाखों लोगों को यह

353
00:24:38,640 --> 00:24:42,800
बात बता दो। ये स्वप्नादेश आप बता रहे

354
00:24:42,800 --> 00:24:47,040
हो। स्वप्नाभास बता रहे हो। स्वप्न के माध्यम से कुछ विशिष्ट विद्या प्राप्त

355
00:24:47,040 --> 00:24:51,200
तो उस प्रयत्न को तुम कर रहे हो कि साहब मुझे सपने में प्राप्त हुआ है। तुम मानो

356
00:24:51,200 --> 00:24:55,200
इस बात को ऐसा कर सकते हो ना तुम तो बहुत पहुंचे हुए हो

357
00:24:55,200 --> 00:24:59,440
कि जिनजिन लाखों लोगों को करोड़ों लोगों को

358
00:24:59,440 --> 00:25:03,440
हम इस स्वप्न के द्वारा प्राप्त अपूर्व ज्ञान विज्ञान

359
00:25:03,440 --> 00:25:06,560
को बताने में मेहनत कर रहे हैं। कोशिश कर रहे

360
00:25:06,560 --> 00:25:10,800
हैं। द्रविड़ प्राणायाम कर रहे हैं। फिर भी लोग मान नहीं रहे हैं। तो ऐसा

361
00:25:10,800 --> 00:25:14,880
करो ना जो नहीं मान रहे हैं। प्रभु आप उनके सबके सपने में आकर बता दो तो

362
00:25:14,880 --> 00:25:19,440
झंझट ही खत्म हो जाएगा पर बात यह है कि अपनी

363
00:25:19,440 --> 00:25:24,560
अप्रामाणिकता को अपनी

364
00:25:24,560 --> 00:25:28,720
उच्च श्रृंखलता कोत्वाकांक्षा को अपने तर्कों

365
00:25:28,720 --> 00:25:32,960
के द्वारा समाज पर थोपना यह ना

366
00:25:32,960 --> 00:25:37,680
तुम्हारे हित में है और ना ही समाज के हित में है। यह उचित नहीं है।

367
00:25:37,680 --> 00:25:42,240
हम ये मानते हैं स्वप्न विज्ञान है। शास्त्रों में इसका विषद वर्णन है।

368
00:25:42,240 --> 00:25:46,240
परंतु जिस व्यक्ति के लिए स्वप्नादेश है वो उसका गोपन करे। जी

369
00:25:46,240 --> 00:25:50,480
स्वप्न का प्रकाशन भी वो आत्म कल्याण के लिए उसका प्रयोग पहले

370
00:25:50,480 --> 00:25:54,640
करो। लोक कल्याण की बात बाद में अपने आप हो जाएगी। जी जी तो लोक

371
00:25:54,640 --> 00:25:58,800
में तो स्थापित तभी कर सकते हैं जब कोई हमारी प्रामाणिक गुरु परंपरा बस यही बात है। बिल्कुल बिल्कुल

372
00:25:58,800 --> 00:26:03,200
जो स्वप्न के द्वारा प्राप्त स्वप्न के द्वारा प्राप्त जो ज्ञान विज्ञान है उसका भी सत्यापन

373
00:26:03,200 --> 00:26:07,200
कराने के लिए जो प्रतिस्थापित प्रामाणिक आचार्य परंपराएं हैं उनकी आश्रित होना चाहिए। अनुगत होना ही चाहिए। मैं

374
00:26:07,200 --> 00:26:11,440
इसलिए कहना चाहता हूं आपने रामपाल का नाम लिया था। जी तो मुझे बहुत आश्चर्य इस बात का होता है जो व्यक्ति अपने जीवन

375
00:26:11,440 --> 00:26:15,520
में पूरे जीवन में आज तक एक श्लोक शुद्ध नहीं बोल सकता एक किसी श्लोक का शुद्ध अर्थ नहीं

376
00:26:15,520 --> 00:26:19,600
कर सकता और थोड़े श्लोक की तो कोई बात नहीं देव वाणी है उस देव वाणी तो बिना पूर्व जन्म के पुण्य

377
00:26:19,600 --> 00:26:21,760
के किसी को प्राप्त नहीं हो सकती मान लीजिए जिस हिंदी भाषा

378
00:26:21,760 --> 00:26:25,760
में जिस सामान्य भाषा में जिन कबीर जी के बारे में वो लोग बोलते हैं उनके द्वारा रचित दोहे

379
00:26:25,760 --> 00:26:30,080
शुद्ध सुना दे एक दोहा कोई शुद्ध बोल दे तो तभी तो समझ में आवे यहां कुछ है पर ऐसे

380
00:26:30,080 --> 00:26:34,160
लोगों के अनुसरण करने वाले भी लाखों की संख्या में है तो दया के पात्र वो नहीं है जो बरगला

381
00:26:34,160 --> 00:26:38,160
रहे दया के पात्र वो है जो भेड़ चाल चलते हुए पीछे पीछे भाग रहे हैं भगवान राम भगवान कृष्ण

382
00:26:38,160 --> 00:26:42,320
भगवान भगवान सदा शिव भगवान विष्णु भगवान सूर्य भगवान गणपति भगवान भगवती

383
00:26:42,320 --> 00:26:46,560
मां जगदंबा के रूप ये तुम्हारा कल्याण नहीं करेंगे अब भगवान हनुमान जी कल्याण करने में सक्षम नहीं है ये नए-नए

384
00:26:46,560 --> 00:26:50,560
जो पीर पैगंबर फकीर देवता और लोक देवता ये जो तैयार किए जा रहे हैं ना मरे जा रहे हैं ये धर्म के नाम पर धंधा है

385
00:26:50,560 --> 00:26:54,640
दुकानें हैं ये प्राइवेट लिमिटेड है जी इसलिए सनातन धर्मावलंबी जो प्रजा

386
00:26:54,640 --> 00:26:58,720
है धर्म प्राण जो जनता है हम तो यही कहना चाहेंगे भैया मूल देखो परंपरा देखो

387
00:26:58,720 --> 00:27:02,960
भाषण और आचरण दोनों में एक हो ऐसा तो कुछ चुनो ऐसा तो कुछ देखो अच्छा

388
00:27:02,960 --> 00:27:07,040
महाराज जी ये लोग क्या करने लगे हैं अब ऐसे खुद को इस तरह से स्वप्नादेश

389
00:27:07,040 --> 00:27:11,040
से आचार्य स्थापित ित करके अच्छा यह तो है कि अगर मान लीजिए

390
00:27:11,040 --> 00:27:15,120
सत्यापन कराया उसने अगर कि जिस परंपरा से तो उसको उसी परंपरा का माना जाएगा

391
00:27:15,120 --> 00:27:19,360
कि उस परंपरा से क्योंकि उसके स्वप्नादेश का सत्यापन हो रहा है तो उसी

392
00:27:19,360 --> 00:27:23,440
परंपरा का उसे मानना पड़ेगा। इसके बाद में कुछ ऐसे

393
00:27:23,440 --> 00:27:27,440
स्वयं को बता रहे हैं जैसे कि हमने अपने आप स्वप्नादेश से अपने को किसी परंपरा

394
00:27:27,440 --> 00:27:31,440
से जोड़ लिया सत्यापन कराया नहीं या खुद से अपना कुछ

395
00:27:31,440 --> 00:27:35,440
गढ़ लिया। अब उसके बाद जो है मुसलमानी पूजा पद्धति

396
00:27:35,440 --> 00:27:36,960
हो गई, इस्लामिक

397
00:27:36,960 --> 00:27:41,040
या क्रिश्चियन पूजा पद्धति हो गई। इसको भी मिक्स कर रहे हैं वो हमारे सनातन धर्म

398
00:27:41,040 --> 00:27:45,200
के साथ। जैसे मतलब मैं ये पूछना चाहता हूं क्या कोई भी वैदिक

399
00:27:45,200 --> 00:27:49,280
आचार्य कभी जो मुसलमानी पूजा पद्धति इत्यादि वो किसी को देगा

400
00:27:49,280 --> 00:27:51,840
क्या?

401
00:27:51,840 --> 00:27:55,840
जैसे ये आपका आपका लक्ष्य बहुत विराट है। बड़ा

402
00:27:55,840 --> 00:28:00,240
है। आपकी अभिव्यक्ति में उदारता

403
00:28:00,240 --> 00:28:05,040
है। जी आप

404
00:28:05,040 --> 00:28:08,800
छोटे दायरे में आने लग रहे हैं।

405
00:28:08,800 --> 00:28:12,800
इस बात को ऐसे समझे कि व्यक्ति

406
00:28:12,800 --> 00:28:17,440
परिस्थितियों में फंसा हुआ किस-किस पद्धति से

407
00:28:17,440 --> 00:28:21,520
आवे आज किस-किस पद्धति से अपना

408
00:28:21,520 --> 00:28:25,600
लक्ष्य साधन कर सकता है। वो उसकी अपनी परिस्थितियां हैं।

409
00:28:25,600 --> 00:28:29,680
मैं कहता हूं कि जो जो वेद परंपरा

410
00:28:29,680 --> 00:28:34,160
का जो वेद परंपरा का उपासक है उसको

411
00:28:34,160 --> 00:28:38,400
तुच्छ विद्याओं में अपनी मति नहीं लगानी चाहिए मन नहीं लगाना

412
00:28:38,400 --> 00:28:42,400
चाहिए वहां प्रवृत्त नहीं होना चाहिए ये एक सिद्धांत की बात

413
00:28:42,400 --> 00:28:46,560
है जी जो वेदोपासक है देवोपासक है

414
00:28:46,560 --> 00:28:50,800
वेद में ऐसा क्या है जो वेदों के द्वारा सिद्ध

415
00:28:50,800 --> 00:28:52,160
ना होगा ऐसा क्या

416
00:28:52,160 --> 00:28:56,240
है देवानुग्रह से सिद्ध ना होगा जी और फिर भी किसी को

417
00:28:56,240 --> 00:29:00,560
ऐसा लगता है कि जिनके अपने निजी व्यक्तिगत अनुभव है तो वो उनकी समस्या

418
00:29:00,560 --> 00:29:04,800
जी हैं। मेरी मेरी समझ में मैं समझता हूं जो स्वयं को वैदिक

419
00:29:04,800 --> 00:29:09,360
मानता है देवोपासक मानता है उसको विशुद्ध सात्विक आचार से

420
00:29:09,360 --> 00:29:13,760
सात्विक आचार का आलंबन लेते हुए जो अपनी आस्तिकता

421
00:29:13,760 --> 00:29:18,240
और सात्विकता है जो सनातन स्वरूप है आस्तिकता और सात्विकता

422
00:29:18,240 --> 00:29:22,640
का उसका संरक्षण करना चाहिए तो ही उनका आचार्यत्व प्रतिष्ठित

423
00:29:22,640 --> 00:29:26,880
होगा और प्रमाणित होगा और आदरणीय होगा और यदि कदाचित

424
00:29:26,880 --> 00:29:31,680
धारा से विरुद्ध जाते हैं तो फिर

425
00:29:31,680 --> 00:29:35,760
लांछन भी लगता है, आक्षेप भी होता है, उपेक्षा भी होती है और उपहास

426
00:29:35,760 --> 00:29:39,920
भी होता है। तो जो सक्षम हैं उनको

427
00:29:39,920 --> 00:29:44,080
अपनी आस्तिकता, सात्विकता, दैवी उपासना का, देवी

428
00:29:44,080 --> 00:29:48,080
उपासना का आदर करना चाहिए। तो महाराज जी जो स्वयं को कह तो

429
00:29:48,080 --> 00:29:52,240
रहे हैं कि मैं प्रामाणिक हूं। परंतु समय आने पर जो

430
00:29:52,240 --> 00:29:56,240
है फलानी इस्लामिक पूजा किसी को दे दी तो

431
00:29:56,240 --> 00:30:00,960
ऐसे में उनकी प्रामाणिकता पर प्रश्न चिन्ह तो उठ जाएगा। बिल्कुल लगेगा और

432
00:30:00,960 --> 00:30:05,360
मेरी जानकारी में ऐसे कोई लोग विशेष रूप से मेरी जानकारी में है नहीं कि वैदिक

433
00:30:05,360 --> 00:30:07,680
होकर के कोई उपासना

434
00:30:07,680 --> 00:30:11,760
पद्धतियों में ऐसा नकारात्मक भाव लाएगा। हमारे यहां बहुत अवकाश

435
00:30:11,760 --> 00:30:16,720
है। आवश्यकता नहीं है 1400 साल पुरानी किसी

436
00:30:16,720 --> 00:30:20,880
तथाकथित उपासना का आलंबन लेने की। हमारे यहां अनादि

437
00:30:20,880 --> 00:30:25,040
काल से बाम मार्ग की पद्धतियों में इतनी सशक्त उपासना है।

438
00:30:25,040 --> 00:30:29,040
क्या करेगा कोई और? तो इस्लामी पद्धति की कोई उपासना यदि चल रही

439
00:30:29,040 --> 00:30:33,200
है तो कितने साल पुरानी हो गई? 1400 साल पुरानी। जहां

440
00:30:33,200 --> 00:30:37,840
से मोहम्मद साहब शुरू हुए हैं। जहां से

441
00:30:37,840 --> 00:30:41,840
कौन? मोहम्मद जी आरंभ हुए हैं जहां से तो इतना

442
00:30:41,840 --> 00:30:46,000
काहे 14 साल पे काहे अटकते हो? हमारी बाम मार्ग की उपासना तो अरबों साल पुरानी

443
00:30:46,000 --> 00:30:50,080
है। उपासना पद्धति में दक्षिण मार्ग बाम मार्ग दोनों है ना। करना

444
00:30:50,080 --> 00:30:54,160
ही है तो अपनी प्रामाणिक उपासनाओं में जाना चाहिए। तो ये ये

445
00:30:54,160 --> 00:30:59,120
किसी की व्यक्तिगत समस्या होगी। इसका सार्वजनिक स्वीकार्यता

446
00:30:59,120 --> 00:31:03,520
जी अच्छा महाराज जी इसमें एक चीज है कि

447
00:31:03,520 --> 00:31:07,840
क्या जैसे हमारी कई प्रामाणिक परंपराएं हैं जैसे श्री संप्रदाय

448
00:31:07,840 --> 00:31:11,920
है। एक मधु संप्रदाय है। शंकराचार्य परंपरा

449
00:31:11,920 --> 00:31:16,000
है हमारी। ऐसे कई हमारी प्रामाणिक परंपराएं हैं।

450
00:31:16,000 --> 00:31:20,080
तो क्या ऐसा संभव है कि कोई एक

451
00:31:20,080 --> 00:31:22,800
ऑथराइज्ड कोई सेंटर हो जहां से

452
00:31:22,800 --> 00:31:26,880
इन सभी परंपराओं का नियंत्रण किया जाए। जब

453
00:31:26,880 --> 00:31:31,360
भी नियंत्रण करने की बात आएगी तब अधिनायकता बात आएगी, अभिमान

454
00:31:31,360 --> 00:31:35,520
आएगा और जैसे ही नियंत्रण की बात आएगी तो नियंत्रित होने

455
00:31:35,520 --> 00:31:40,240
वालों में एक समय के बाद में आक्रोश पनपेगा, विद्रोह पनपेगा।

456
00:31:40,240 --> 00:31:44,560
नियंत्रण का तात्पर्य ऐसा नहीं हो कि मेरे अनुसार चलो। नियंत्रण

457
00:31:44,560 --> 00:31:48,640
का तात्पर्य एक अवसर सनातन एक अवसर देता है। हमारे यहां

458
00:31:48,640 --> 00:31:52,800
हमारे सनातन धर्म की सुंदरता है कि यहां सामूहिक

459
00:31:52,800 --> 00:31:57,920
रूप से कोई उपासना का प्रकल्प ऐसा नहीं है कि तुमको करना ही होगा।

460
00:31:57,920 --> 00:32:02,320
एक घर में यदि 10 लोग हैं तो दसों के दसों अपनी अभिरुचि

461
00:32:02,320 --> 00:32:06,400
के अनुसार इष्ट देव का चयन कर सकते हैं। दसों

462
00:32:06,400 --> 00:32:10,720
के दसों जी। और एक घर में रह रहे हैं। एक राम का उपासक

463
00:32:10,720 --> 00:32:14,880
है, एक कृष्ण को मानता है। एक महादेव का उपासक है और एक भगवती की पूजा

464
00:32:14,880 --> 00:32:18,960
करता है। और सारे सनातनी है। तो एक सेंट्रलाइज करने की

465
00:32:18,960 --> 00:32:23,040
जब भी चाह होगी अधिनायिकता अधिनायिकतावाद

466
00:32:23,040 --> 00:32:27,600
आएगा और वो विद्रोह का कारण बनेगा। यहां परिवर्तन

467
00:32:27,600 --> 00:32:31,920
स्वतः हो। जी। परिवर्तन प्रेरणा से हो। परिवर्तन

468
00:32:31,920 --> 00:32:35,920
आपके अवलोकन से हो। परंतु कह करके कि

469
00:32:35,920 --> 00:32:37,920
एक साथ फिर

470
00:32:37,920 --> 00:32:42,000
कठिन हो जाएगा। तो महाराज जी फिर मतलब जैसे एक इसमें तार

471
00:32:42,000 --> 00:32:46,160
तारतम्य यह है जैसे किसी ने पीएचडी कर रखी है

472
00:32:46,160 --> 00:32:51,200
तो पीएचडी करने वाला आज डॉक्टरेट की उपाधि लिए हुए व्यक्ति है उसने

473
00:32:51,200 --> 00:32:55,360
आज छुपाया है एक उसी के साथ में बैठा हुआ कोई पंचम

474
00:32:55,360 --> 00:32:59,600
कक्षा का या अष्टम कक्षा का अथवा जो भी दसवीं कक्षा का है

475
00:32:59,600 --> 00:33:03,600
तो आज जो पीएचडी होल्डर है डिग्री धारी है वो भी कभी

476
00:33:03,600 --> 00:33:07,600
पंचम कक्षा का अष्टम कक्षा का दशम कक्षा का व्यक्ति रहा है जी तो

477
00:33:07,600 --> 00:33:12,000
कक्षा वाइज कक्षा ऐसा समझे सोपान है सब पथिक हैं

478
00:33:12,000 --> 00:33:16,560
और अदृष्ट जितने उपासना के प्रसंग हैं सारे सारे अदृष्ट हैं।

479
00:33:16,560 --> 00:33:21,040
अदृष्ट में किसकी कितनी गति है ये भी सबकी भिन्न-भिन्न

480
00:33:21,040 --> 00:33:25,280
हो जाती है। उपासना पद्धतियां भी कक्षा के क्रम से समझी

481
00:33:25,280 --> 00:33:29,360
जाए। जी जी तो महाराज जी इसमें जैसे मान लीजिए एक एक

482
00:33:29,360 --> 00:33:33,520
तार्किक मैंने वो देखा था तार्किक दृष्टि से। आपने भी तार्किक ही दिया है।

483
00:33:33,520 --> 00:33:37,600
एक और मतलब देखने का एक दृष्टिकोण हो सकता है। जैसे कोई

484
00:33:37,600 --> 00:33:42,080
ये अगर ये दावा करे कोई कि मतलब अगर वो नियंत्रण

485
00:33:42,080 --> 00:33:46,080
करने वाला है मान लीजिए सभी परंपराओं में तो सबसे पहले तो

486
00:33:46,080 --> 00:33:50,080
उन सारी परंपराओं को उसका विधिवत गुरुगम्य विद्या से ज्ञान होना चाहिए।

487
00:33:50,080 --> 00:33:52,960
होना चाहिए। होना चाहिए। अब बात ये आ जाएगी कि उसमें से

488
00:33:52,960 --> 00:33:57,200
उसका मत क्या है? क्योंकि सभी परस्पर कहीं ना कहीं तो एक जगह जाकर के एक दूसरे

489
00:33:57,200 --> 00:34:01,600
का विरोध है। तभी तो परंपरा दूसरी है। तो पहली बात तो यह उसकी अपनी परंपरा

490
00:34:01,600 --> 00:34:05,760
की बात आएगी कि उसका सिद्धांत क्या है? दूसरी बात सारे सिद्धांत उसको

491
00:34:05,760 --> 00:34:10,000
परंपरा से होने चाहिए। अब जब उसके सारे सिद्धांत उसे परंपरा से प्राप्त

492
00:34:10,000 --> 00:34:14,080
हैं तो फिर वो उन सब का शिष्य भी हो गया। अब जब शिष्य हो गया

493
00:34:14,080 --> 00:34:18,080
तो फिर गुरु पर प्रश्न कैसे उठा सकते हैं? यह भी एक बात है

494
00:34:18,080 --> 00:34:22,160
ना। या तो फिर स्वयं भगवान से ही उसको सारा ज्ञान मिल

495
00:34:22,160 --> 00:34:26,160
जाएगा। असहमति के जी असहमति के बहुत

496
00:34:26,160 --> 00:34:30,240
सारे कारण पनप जाते हैं आगे बढ़ते-बढ़ते

497
00:34:30,240 --> 00:34:34,240
और यह लगे कि आचार्य जैसे कुमारिल भट्ट

498
00:34:34,240 --> 00:34:38,640
हैं यही प्रतिष्ठानपुरम को

499
00:34:38,640 --> 00:34:43,200
केंद्र बना करके कुमारिल भट्ट ने अपना प्रायश्चित

500
00:34:43,200 --> 00:34:48,080
साधन किया वो बौद्ध मत का

501
00:34:48,080 --> 00:34:52,160
जो भी आमूलचूल ज्ञान विज्ञान रहा जो जो भी

502
00:34:52,160 --> 00:34:56,160
विचार रहा उसको सीखने के लिए नालंदा

503
00:34:56,160 --> 00:35:00,480
गए हैं। तो जिन आचार्यों से उन्होंने उनके मत को जाना

504
00:35:00,480 --> 00:35:04,720
है उन्हीं आचार्यों को उन्होंने अपने वैदिक

505
00:35:04,720 --> 00:35:08,000
मत के आधार पर पराजित भी किया है। आचार्य का

506
00:35:08,000 --> 00:35:12,080
तिरस्कार करने का जो दोष है उस दोष के निमित्त

507
00:35:12,080 --> 00:35:17,360
उन्होंने प्रायश्चित करना चाहा और किया ही है। आचार्य

508
00:35:17,360 --> 00:35:21,520
यदि मार्ग से भटक रहे हैं जी

509
00:35:21,520 --> 00:35:26,160
तो अवलिप्त आचार्य के निग्रह का नियंत्रण का

510
00:35:26,160 --> 00:35:30,000
अधिकार शास्त्र देता है।

511
00:35:30,000 --> 00:35:34,000
उस आचार्य से पृथक होने का अधिकार इस विषय में

512
00:35:34,000 --> 00:35:38,080
मुझे जो बहुत सुंदर बात लगती है मुझे

513
00:35:38,080 --> 00:35:43,600
आदर्श के रूप में प्रह्लाद जी महाराज बहुत अच्छे लगते हैं।

514
00:35:43,600 --> 00:35:47,920
पिता की भूमिका में हिरण्यकश्यपु

515
00:35:47,920 --> 00:35:52,080
कितना सही है। यह प्रह्लाद से अच्छा कौन

516
00:35:52,080 --> 00:35:55,760
बता पाएगा? जी

517
00:35:55,760 --> 00:35:59,840
प्रह्लाद जी महाराज जान रहे हैं कि मेरे पिता और इस समय जिनके

518
00:35:59,840 --> 00:36:03,920
हाथ में सत्ता है, शासक है इनका विचार

519
00:36:03,920 --> 00:36:09,520
अच्छा नहीं। अच्छा होता तो अनुकरण करते। इसलिए अनुकरण नहीं किया।

520
00:36:09,520 --> 00:36:13,840
पिताजी को प्रत्यक्षतया जान रहे हैं कि अधार्मिक है, नास्तिक

521
00:36:13,840 --> 00:36:18,080
है, अश्वरवादी है, अधिनायकवादी है। तथापि

522
00:36:18,080 --> 00:36:24,000
पुत्र का क्या कर्तव्य है? इस बात को कभी विस्मृत नहीं करते हैं।

523
00:36:24,000 --> 00:36:28,240
जब भी पुत्र की भूमिका में वो अपने पिता के सामने खड़े होते हैं, दंडवत

524
00:36:28,240 --> 00:36:32,240
प्रणाम करते हैं। उन्होंने कभी नहीं कहा महापापी है, कैसा पिता है मैं

525
00:36:32,240 --> 00:36:36,880
इसे प्रणाम नहीं करूंगा। आजकल के जितने प्रहलाद तैयार हो रहे हैं,

526
00:36:36,880 --> 00:36:42,160
वह अपने पिताओं को हिरण्यकश्यपु से भी अधिक पतित माने बैठे हैं।

527
00:36:42,160 --> 00:36:46,400
और अपने आप को प्रह्लाद जी से भी बड़ा भक्त और ज्ञानी और सदाचारी माने

528
00:36:46,400 --> 00:36:50,800
बैठे हैं। तो मैं यह निवेदन करना चाहूं। मैं निवेदन

529
00:36:50,800 --> 00:36:55,120
करना चाहूं कि यदि प्रह्लाद जैसा भगवान का परम भक्त

530
00:36:55,120 --> 00:37:00,880
भी हिरण्यकशिप जैसे अति अत्याचारी

531
00:37:00,880 --> 00:37:04,880
व्यक्ति को पिता की दृष्टि से देखते हैं तो प्रणाम करते हैं तो तुम

532
00:37:04,880 --> 00:37:09,200
प्रह्लाद से ज्यादा बड़े आस्तिक धार्मिक सदाचारी

533
00:37:09,200 --> 00:37:13,520
और पुण्य आत्मा हो क्या तुम्हारे पिता हिरण्यकश्यप

534
00:37:13,520 --> 00:37:17,760
से भी अधिक पतित है क्या जब वो अपने कर्तव्य व्यक्ति अपने कर्तव्यों

535
00:37:17,760 --> 00:37:21,760
का पालन नहीं कर रहा है दूसरों को सुधारने की चेष्टाएं बहुत

536
00:37:21,760 --> 00:37:25,760
करता है। यह है विप्लव का कारण। हमको हमारे कर्तव्यों

537
00:37:25,760 --> 00:37:29,760
पर सावधानी पूर्वक सजगता पूर्वक आरूढ़ रहना चाहिए

538
00:37:29,760 --> 00:37:33,840
तो समाज अपने आप बहुत अच्छा हो जाएगा। तो महाराज जी जैसे अभी आपने

539
00:37:33,840 --> 00:37:37,920
कुमारिल भट्ट जी का और बौद्ध का बौद्धों का वो आपने उदाहरण एक

540
00:37:37,920 --> 00:37:39,040
दिया तो वहां तो स्थिति

541
00:37:39,040 --> 00:37:43,200
ये आती है कि जब उन्होंने बौद्धों की चीजों को अच्छे से जान लिया है तब वैदिक

542
00:37:43,200 --> 00:37:47,600
सिद्धांतों से उनका खंडन किया है तो वहां पर तो ये आधार

543
00:37:47,600 --> 00:37:51,680
आवश्यक नहीं होता है कि वो उस बात का खंडन कर रहे हैं जो बात उनको उसी

544
00:37:51,680 --> 00:37:55,760
से पता चली है। परंतु जब जैसे हमारे

545
00:37:55,760 --> 00:37:59,920
शास्त्र में भी आज्ञा आई है कि यदि हमारे शास्त्रों

546
00:37:59,920 --> 00:38:04,160
में भी यह आज्ञा हमें प्राप्त हुई है कि यदि गुरु के आचरण जो

547
00:38:04,160 --> 00:38:08,160
है शास्त्रों से विहित मतलब विरुद्ध जाते हुए दिखे तो उतने अंशों में गुरु

548
00:38:08,160 --> 00:38:12,160
का अनुकरण नहीं करना चाहिए। परंतु इसका पहला तो यह

549
00:38:12,160 --> 00:38:16,880
आता है कि अनुकरण नहीं करना चाहिए।

550
00:38:16,880 --> 00:38:21,200
परंतु गुरु की जो व्याख्या है शास्त्रों

551
00:38:21,200 --> 00:38:25,280
की व्याख्या या गुरु के जो सिद्धांत है उसका विरोध हम नहीं कर सकते

552
00:38:25,280 --> 00:38:29,440
क्योंकि अगर उसका विरोध हम करेंगे तो हमारे पास फिर सिद्धांतों का आना हमारी

553
00:38:29,440 --> 00:38:33,520
स्थिति फिर वैसी ही हो जाएगी आर्य समाज ब्रह्माकुमारीज इत्यादि जैसी कि हमारा गुरु

554
00:38:33,520 --> 00:38:37,600
कौन है गुरु गुरु वो है जिसने विद्या दी अब जिसने विद्या दी है

555
00:38:37,600 --> 00:38:41,760
उस पर हमें विश्वास नहीं है क्योंकि वो हमें लग रहा है कि अमुक अमुक सिद्धांत गलत बता

556
00:38:41,760 --> 00:38:45,840
रहा है जब गलत बता रहा है तो हमारा शब्द प्रमाण तो सिद्ध नहीं हुआ तो इस

557
00:38:45,840 --> 00:38:49,840
स्थिति में यह है कि गुरु के आचरण का तो आप अनुकरण मत करो अगर

558
00:38:49,840 --> 00:38:53,920
वो अपनी ही बताई हुई शास्त्र अच्छा जैसे शास्त्र की भी बात तो शास्त्र

559
00:38:53,920 --> 00:38:54,420
कौन

560
00:38:54,160 --> 00:38:58,560
से प्रमाणिक होंगे जो गुरु बताएगा वही शास्त्र प्रमाणिक होंगे। तो आचरण

561
00:38:58,560 --> 00:39:02,560
की भी बात है तो उसमें यह है कि गुरु ने जो शास्त्रों की

562
00:39:02,560 --> 00:39:06,640
व्याख्या की है उसका हम विरोध नहीं कर सकते। गुरु ने जो सिद्धांत

563
00:39:06,640 --> 00:39:11,040
बताए हैं उसका विरोध नहीं कर सकते। हां गुरु के आचरण उन सिद्धांतों

564
00:39:11,040 --> 00:39:15,200
के शास्त्रों के विरुद्ध जा रहे हैं। तो उतने अंशों में गुरु का अनुकरण ना किया जाए।

565
00:39:15,200 --> 00:39:19,280
एक तो ये है अब ये जो शास्त्र की आज्ञा है इसका आलंबन

566
00:39:19,280 --> 00:39:23,360
लेकर के क्या गुरु के सिद्धांतों को गुरु के द्वारा दी जाने वाली विद्या पर

567
00:39:23,360 --> 00:39:27,600
भी प्रश्न चिन्ह उठाया जा सकता है क्योंकि अगर ऐसा करेंगे तो फिर वो हमारा शब्द प्रमाण

568
00:39:27,600 --> 00:39:31,760
सिद्ध नहीं होगा फिर वो हमारी परंपरा सिद्ध नहीं होगी वेदों का हमारे पास आना उसके द्वारा

569
00:39:31,760 --> 00:39:35,760
सिद्ध नहीं होगा वही प्रश्न उठ जाएगा जैसे आर्य समाज पे उठता है तो इस पर थोड़ा

570
00:39:35,760 --> 00:39:39,840
सा बिल्कुल बहुत आपने लगभग लगभग प्रश्न के गर्भ में

571
00:39:39,840 --> 00:39:44,080
ही यद्यपि उत्तर रहता ही है तो अभी आपने बहुत स्पष्टता

572
00:39:44,080 --> 00:39:48,160
के साथ में प्रश्न का अंश छोटा रह गया। उत्तर आपने दे दिया है। मेरी

573
00:39:48,160 --> 00:39:52,320
भी भावना यही है और प्रत्येक सनातनी की भावना भी यही होगा

574
00:39:52,320 --> 00:39:56,560
कि आचार्य यह बात हमारे यहां तैत्रीय तैतरीय उपनिषद

575
00:39:56,560 --> 00:40:00,720
में एक अंतिम अर्थात जब वो जैसे

576
00:40:00,720 --> 00:40:05,120
समावर्तन कहते हैं समावर्तन बेला में

577
00:40:05,120 --> 00:40:09,280
जिसको दीक्षांत आजकल कहने लगे हैं। उस बेला में ये कहा जाता

578
00:40:09,280 --> 00:40:13,440
है कि आचार्य उपदेश के रूप में कहते हैं सत्यम वद

579
00:40:13,440 --> 00:40:17,600
धर्मम चर स्वाध्याय स्वाध्यायन मा

580
00:40:17,600 --> 00:40:21,600
प्रमद मातृ देवो पितृ देवो भव उसी क्रम में एक उपदेश

581
00:40:21,600 --> 00:40:26,240
देते हैं कि यानी अस्माकम सुचरितानी

582
00:40:26,240 --> 00:40:29,920
तान एव त उपास्यानी

583
00:40:29,920 --> 00:40:34,080
मानवीय धरातल पर जीवन जीतेजीते कदाचित ऐसा लगा हो कि मेरे जीवन

584
00:40:34,080 --> 00:40:38,160
में कुछ अप्रामाणिक हो गया शास्त्रीय हो गया वो

585
00:40:38,160 --> 00:40:42,160
मानवचित जीवन के कारण तो वो तुम्हारे लिए

586
00:40:42,160 --> 00:40:46,720
अनुकरणीय नहीं है। जो हमारे सुचरित

587
00:40:46,720 --> 00:40:50,800
हैं। सुचरित का तात्पर्य शास्त्रोक्त हमारे आचरण

588
00:40:50,800 --> 00:40:54,880
में शास्त्रीयता जहांजहां सुरक्षित रही है

589
00:40:54,880 --> 00:40:59,040
वो वो तुम्हारे लिए परम प्रमाण है। कदाचित कभी ऐसा लगे किसी

590
00:40:59,040 --> 00:41:03,120
अवसर पर कि शास्त्र ऐसा कहते हैं और आचार्य

591
00:41:03,120 --> 00:41:07,120
का आचरण ऐसा है। दोनों में भिन्नता दिखाई

592
00:41:07,120 --> 00:41:11,120
दे तो कृपया वहां हमको प्रमाण ना माना जाए। शास्त्र को ही प्रमाण माना

593
00:41:11,120 --> 00:41:15,120
जाए। इस दृष्टि से बिल्कुल सही है।

594
00:41:15,120 --> 00:41:19,280
आचार्य के आचरण का तभी

595
00:41:19,280 --> 00:41:23,360
तक समादर और अनुकरण अपेक्षित है जब तक कि उसको

596
00:41:23,360 --> 00:41:24,320
शास्त्रीयता का

597
00:41:24,320 --> 00:41:28,400
संरक्षण प्राप्त है। शास्त्र और आचार्य दोनों

598
00:41:28,400 --> 00:41:32,480
समेकित हो, सहकृत हो तो हमारे लिए परम प्रमाण होते हैं।

599
00:41:32,480 --> 00:41:36,960
बिना आचार्य मुख से प्राप्त शास्त्र और बिना शास्त्र

600
00:41:36,960 --> 00:41:41,680
के सिद्धांतों से अनुप्राणित हुए आचार्य

601
00:41:41,680 --> 00:41:45,920
अर्थात आचार्य चाहिए वो शास्त्रज्ञ होने चाहिए और जो

602
00:41:45,920 --> 00:41:50,000
शास्त्र है वो आचार्य मुख से होने चाहिए। ये दोनों का सामंजस्य दोनों

603
00:41:50,000 --> 00:41:54,480
का सामंजस्य होना चाहिए। बहुत सही है। जी तो बात यही आ गई आचरण को तो हम

604
00:41:54,480 --> 00:41:58,560
इतर जा सकते हैं। परंतु हम उसके सिद्धांत सिद्धांत नहीं जा सकते।

605
00:41:58,560 --> 00:42:02,640
धर्म व्याख्या से विमुख नहीं जा सकते। नहीं जा सकते। लेकिन वहां फिर हमारी अप्रामाणिकता हो। बिल्कुल

606
00:42:02,640 --> 00:42:06,720
यही बात है। जी। तो इसी का आलंबन लेकर के कई लोग आजकल के अपने

607
00:42:06,720 --> 00:42:11,120
ही गुरु का या अपने ही उन्हीं आचार्यों का जिनसे विद्या प्राप्त हुई है उन्हीं का

608
00:42:11,120 --> 00:42:17,040
भाई ये जो दयानंद इत्यादि ये भी तो वही थे। समय क्या है?त्वाकांक्षा

609
00:42:17,040 --> 00:42:21,600
जब असीमित हो जाती है। वैसेत्वाकांक्षा महापाप

610
00:42:21,600 --> 00:42:25,680
नहीं है। जी कोई बहुत बुरी बात नहीं। महत्व सबसे बड़ी

611
00:42:25,680 --> 00:42:29,760
महत्वाकांक्षा है कि जो सामान्य जीव शिवत्व पाना चाहता है। जो नर

612
00:42:29,760 --> 00:42:33,840
है वो नारायण होना चाहता है। जो अणु है वह महत्व होना चाहता है। बुरा

613
00:42:33,840 --> 00:42:37,360
नहीं है। परंतु अधकचरीत्वाकांक्षा

614
00:42:37,360 --> 00:42:41,360
परंपरा को दाब पर लगा देना। अपने अनुवत्तियों को दाब पर लगा

615
00:42:41,360 --> 00:42:45,760
देना। अपनी सारी की सारी जो सनातनी मान्यता

616
00:42:45,760 --> 00:42:49,760
उनको दाब पर लगाकर केवल मैं बड़ा हो जाऊं और मैं ही बड़ा हो जाऊं।

617
00:42:49,760 --> 00:42:54,240
सबसे ऊपर खड़ा हो जाऊं। यह जो मनोवृत्ति है यह विकार है।

618
00:42:54,240 --> 00:42:58,320
यह मानस रोग है। इस इसका तो कोई उपाय नहीं है। उपचार

619
00:42:58,320 --> 00:43:02,640
नहीं है। ये विभाजक

620
00:43:02,640 --> 00:43:06,800
रेखा खींच पाना भी बहुत कठिन है। जी कहीं अंश रूप में, कहीं

621
00:43:06,800 --> 00:43:11,120
अंशांश रूप में, कहीं विशेष रूप में सब जगह कुछ ना कुछ विकार हैं।

622
00:43:11,120 --> 00:43:15,760
तो ये विकार ना होते तो फिर ये कैसे कलयुग का प्राधान्य कैसे होता?

623
00:43:15,760 --> 00:43:19,920
जी जब धर्म नियमों का धर्म सिद्धांतों का शास्त्र

624
00:43:19,920 --> 00:43:23,920
सिद्धांतों का चरण कलयुग में कहा ही गया है। और

625
00:43:23,920 --> 00:43:28,080
जैसा जैसा कहा गया है वैसा वैसा हो रहा है। इससे तो हमारे शास्त्र

626
00:43:28,080 --> 00:43:33,040
और प्रमाणित हो जाते हैं। इसलिए यह होगा

627
00:43:33,040 --> 00:43:37,120
के कारण्वाकांक्षा से भरे हुए अतिवां से

628
00:43:37,120 --> 00:43:41,200
भरे हुए जीवों की अधिकता कलयुग में बढ़ेगी। कहां पचता है?

629
00:43:41,200 --> 00:43:45,200
थोड़ा किसी को बोलना आता है तो कहां रुक रहा है वो? थोड़ा किसी के पास में धन

630
00:43:45,200 --> 00:43:50,400
आता है तो कहां टिकना परंपराओं का सम्मान कहां कर पा रहा है?

631
00:43:50,400 --> 00:43:54,640
तो महाराज जी से हमने जाना कि सबसे पहले अगर स्वप्न

632
00:43:54,640 --> 00:43:58,880
में कोई व्यक्ति कह रहा है मेरे पास कोई चमत्कारिक शक्ति आई है। उसने मुझे ज्ञान

633
00:43:58,880 --> 00:44:03,360
दिया है। स्वप्न में दीक्षा हुई है तो उसका सत्यापन किसी प्रामाणिक

634
00:44:03,360 --> 00:44:07,680
परंपरा से आवश्यक है। क्योंकि हमारे सामने तो स्वयं बुद्ध आ गए विष्णु भगवान

635
00:44:07,680 --> 00:44:11,920
आ गए थे तो हमने क्योंकि हमारी परंपरा प्राप्त जो ज्ञान विज्ञान

636
00:44:11,920 --> 00:44:16,080
था क्योंकि हमने उसको प्राथमिकता देते हम वैदिक है तो हमने उनको

637
00:44:16,080 --> 00:44:17,680
ना मान करके अपनी परंपरा प्राप्त

638
00:44:17,680 --> 00:44:23,360
शिवास जी इस विषय में एक बात और मैं कहूंगा

639
00:44:23,360 --> 00:44:29,200
हम प्रत्यक्ष प्रमाण से भी अधिक

640
00:44:29,200 --> 00:44:33,520
सम्मान शब्द प्रमाण का करने वाले हैं। हम सनातन धर्मी चर्म

641
00:44:33,520 --> 00:44:38,400
चक्षु नहीं हैं। हम शास्त्र दिक हैं। शास्त्र चक्षु हैं।

642
00:44:38,400 --> 00:44:42,720
इसका एक प्रमाण बहुत अच्छा है। भीष्म पितामह अपने पिताजी का श्राद्ध

643
00:44:42,720 --> 00:44:46,720
कर रहे हैं। किसी तीर्थ में जी और बड़े भावुक

644
00:44:46,720 --> 00:44:50,960
हैं। आचार्य जो पद्धति के अनुसार बता रहे हैं वो करते चले जा रहे हैं। तो उन्होंने

645
00:44:50,960 --> 00:44:55,440
कहा कि कुसा पर पिंडदान करना है। भीष्म पितामह श्राद्ध

646
00:44:55,440 --> 00:44:59,840
वेला में आचार्य उपदेश से पिंडदान करने हैं। आचार्य ने कहा कि कुसा

647
00:44:59,840 --> 00:45:03,920
दरभ कुसा पर पिंडदान करो। तो जैसे ही पिंडदान करने

648
00:45:03,920 --> 00:45:08,160
चले अचानक उस बालू में से बहुत सुंदर

649
00:45:08,160 --> 00:45:12,160
वो जिसमें रक्त मा है अंजलि में

650
00:45:12,160 --> 00:45:16,160
और बहुत सुंदर वही रेखाएं वही अंगूठी दिखाई दे रही वही कंकण दिखाई दे

651
00:45:16,160 --> 00:45:20,240
रहा है उनके पिताजी का संतनों का हाथ आ गया और कहा कि

652
00:45:20,240 --> 00:45:24,240
इस पर पिंड रखो भीष्म पितामह अपने पिता का हाथ देख

653
00:45:24,240 --> 00:45:28,400
के एक बार को तो भावुक हो गए जी

654
00:45:28,400 --> 00:45:34,400
बस यही एक पल होता है जब व्यक्ति

655
00:45:35,520 --> 00:45:41,040
यदि धीर नहीं है तो बहक जाएगा। जी

656
00:45:41,040 --> 00:45:45,120
भावुकता के कारण भीष्म पितामह को लगा कि बहक जाएंगे और पिंड

657
00:45:45,120 --> 00:45:50,000
उठाकर के हाथ पर रख देंगे। मन में आया कि साक्षात पिता मांग रहे हैं।

658
00:45:50,000 --> 00:45:54,080
तो उन्होंने पूछा आचार्य से भगवान क्या करना चाहिए?

659
00:45:54,080 --> 00:45:58,240
उन्होंने कहा भगवन शास्त्र में तो लिखा हुआ है कि दर्भ पर ही पिंडदान का विधान

660
00:45:58,240 --> 00:46:02,560
है। हाथ पर तो विधान नहीं है। एक बात और कहीं

661
00:46:02,560 --> 00:46:07,120
कहा हे गंगानंदन आज आप सक्षम हैं।

662
00:46:07,120 --> 00:46:11,600
आपकी इस पवित्रता के कारण आपके पितृग साक्षात प्रकट हो गए हैं।

663
00:46:11,600 --> 00:46:15,680
और सोचो जब कल कलयुग आएगा तब बड़े से बड़े पुण्य

664
00:46:15,680 --> 00:46:19,760
आत्मा के आगे भी हाथ नहीं आ पाएगा। बड़े-बड़े

665
00:46:19,760 --> 00:46:23,840
धर्मात्मा के सम्मुख भी उसके पितर हाथ करके पिंडदान नहीं मांगेंगे तो

666
00:46:23,840 --> 00:46:28,640
ये संसार कहेगा यह पाखंड है। हम इसलिए

667
00:46:28,640 --> 00:46:32,800
आज आप हैं कल नहीं रहेंगे। शास्त्र आज भी है। [संगीत]

668
00:46:32,800 --> 00:46:36,800
शास्त्र कल भी रहेगा। शास्त्र कल भी था। इसलिए अच्छा होगा

669
00:46:36,800 --> 00:46:41,040
कि शास्त्र की आज्ञा का पालन किया जाए। और भीष्म पितामह ने अपने

670
00:46:41,040 --> 00:46:45,040
पिता के प्रत्यक्ष हाथ पर पिंडदान ना रख के कुशा पर रखा। जैसे

671
00:46:45,040 --> 00:46:49,200
ही कुसा पर रखा तो आनंद से भरे हुए उनके पिता ने कहा पुत्र मैं

672
00:46:49,200 --> 00:46:50,720
तुम्हारी शास्त्र निष्ठा से

673
00:46:50,720 --> 00:46:55,120
अत्यंत प्रसन्न हूं। यदि तुम मेरे हाथ पर रखते भावुक हो के तो ये पिंडदान

674
00:46:55,120 --> 00:46:59,120
मुझे नहीं मिलता। मैं भुकर रह जाता हूं। जी

675
00:46:59,120 --> 00:47:03,200
तो अर्थात शास्त्र की अवज्ञा करके कोई

676
00:47:03,200 --> 00:47:07,280
व्यक्ति कुछ भी पाने की बात करता हो उसको बहुत आदर देने

677
00:47:07,280 --> 00:47:11,360
की और बहुत चर्चा करने की आवश्यकता नहीं। अच्छा संख्या इन्हीं

678
00:47:11,360 --> 00:47:15,520
की ज्यादा है। जी मनमानी करने वालों की। जी जी

679
00:47:15,520 --> 00:47:19,520
हम ऐसा समझते हैं भगवान कृष्ण हमारी दृष्टि में अवतारक

680
00:47:19,520 --> 00:47:23,680
क्रम में सबसे समीपस्थ भगवत गीता के माध्यम से उपदेश

681
00:47:23,680 --> 00:47:27,760
कर रहे हैं। और भगवान कृष्ण को छोड़कर के हम किसको आदर्श माने? वो

682
00:47:27,760 --> 00:47:31,760
कहते हैं य शास्त्र विधि उतते काम कारत

683
00:47:31,760 --> 00:47:35,920
कामकार माने मनमानी ढंग से तो न सिद्धिम

684
00:47:35,920 --> 00:47:40,400
अवापनोति न सुखम अवापनोति न पराम गतिपनोति

685
00:47:40,400 --> 00:47:45,440
जी जो मनमाने ढंग से कुछ भी करता है

686
00:47:45,440 --> 00:47:50,080
विधान का परित्याग करके व्यवहार निभाने के लिए कुछ भी करता है जी

687
00:47:50,080 --> 00:47:54,400
उसको ना तो सिद्धि प्राप्त होती है माने सफलता प्राप्त नहीं होती और ना सुखम

688
00:47:54,400 --> 00:47:58,720
माने शांति भी प्राप्ति नहीं होती और ना पराम गतिम कोई मनुष्य

689
00:47:58,720 --> 00:48:02,720
कुछ भी करता है उसके तीन उद्देश्य होते हैं। भाई मैं करूं तो सफलता मिल जाए। मन

690
00:48:02,720 --> 00:48:06,080
को शांति सुकून मिल जाए और अंत में सद्गति हो जाए।

691
00:48:06,080 --> 00:48:10,640
वही तीनों नहीं मिलने हैं तो फिर क्या कर रहे हैं हम? बिल्कुल।

692
00:48:10,640 --> 00:48:15,040
तो अभी हमने एक क्रम से ले लेते हैं। हमने क्या जाना है गुरु परंपरा

693
00:48:15,040 --> 00:48:19,120
के विषय में कि यदि कोई व्यक्ति ये दावा करता है कि उसको

694
00:48:19,120 --> 00:48:23,120
किसी चमत्कारी शक्ति ने आकर के शिक्षा दीक्षा दे दी है। ज्ञान विज्ञान दे

695
00:48:23,120 --> 00:48:27,280
दिया है या स्वप्न इत्यादि में दीक्षा

696
00:48:27,280 --> 00:48:31,440
हो गई है उसकी तब भी उस दीक्षा को उस ज्ञान विज्ञान को किसी

697
00:48:31,440 --> 00:48:35,760
प्रामाणिक गुरु परंपरा से उसका सत्यापन अति आवश्यक है। पहली बात।

698
00:48:35,760 --> 00:48:40,080
दूसरी बात जिस परंपरा से हम उस स्वप्नादेश को सत्यापित

699
00:48:40,080 --> 00:48:44,320
कराएंगे उस परंपरा के हम सिद्धांतों को मानना होगा। मतलब जिससे

700
00:48:44,320 --> 00:48:48,320
सत्यापन कराने जा रहे हैं ऐसा नहीं कर सकते कि उसके विरुद्ध जाकर के कोई सिद्धांत

701
00:48:48,320 --> 00:48:52,480
नए प्रतिपादित करने लग जाए। उस परंपरा के अनुगत हमें रहना होगा। फिर

702
00:48:52,480 --> 00:48:56,640
दूसरी एक बात यह आई थी कि क्या एक कंट्रोल बोर्ड के द्वारा जो

703
00:48:56,640 --> 00:49:00,640
सभी हमारी प्रामाणिक परंपराएं हैं उनका नियंत्रण इत्यादि हो

704
00:49:00,640 --> 00:49:04,640
सकता है? तो नहीं हो सकता क्योंकि पहली बात तो सभी

705
00:49:04,640 --> 00:49:08,880
परंपराओं का जो ज्ञान विज्ञान है भाई वो गलत कर रहे हैं या नहीं कर रहे हैं

706
00:49:08,880 --> 00:49:13,440
ये बताने के लिए उनके यहां का प्रामाणिक गुरुगम्य विद्या के द्वारा हमें प्राप्त होना चाहिए।

707
00:49:13,440 --> 00:49:17,440
सबसे पहले तो यह आवश्यकता जो संभव नहीं है। दूसरी बात यह भी

708
00:49:17,440 --> 00:49:21,280
है कि जब आप उनसे ज्ञान विज्ञान प्राप्त

709
00:49:21,280 --> 00:49:25,600
कर भी लेंगे तो आप उनमें यह दोष नहीं दे सकते कि आप यहां सिद्धांत

710
00:49:25,600 --> 00:49:29,600
का विरुद्ध यहां गलत सिद्धांत बता रहे हैं। उनके आचरण पे आप

711
00:49:29,600 --> 00:49:33,680
कह सकते हैं प्रश्न उठा सकते कि उनका कोई एक आचरण गलत है। पर उनके द्वारा दी

712
00:49:33,680 --> 00:49:37,840
जाने वाली जो सिद्धांत है, दी जाने वाली जो शिक्षा है, उस पर आप उंगली

713
00:49:37,840 --> 00:49:41,920
नहीं उठाएंगे। उंगली उठाएंगे तो वैसे ही आपके पास वो ज्ञान कहां

714
00:49:41,920 --> 00:49:45,920
से आया उसकी प्रामाणिकता भंग हो जाएगी। और फिर तीसरी बात गुरुदेव ने

715
00:49:45,920 --> 00:49:50,400
कहा बताया कि शास्त्रों की प्रामाणिकता आचार्यों

716
00:49:50,400 --> 00:49:54,640
से गुरु से परंपरा प्राप्त गुरुओं से गुरुओं की प्रामाणिकता

717
00:49:54,640 --> 00:49:58,960
शास्त्रों से। तो ये दोनों में सामंजस्य होना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि

718
00:49:58,960 --> 00:50:02,960
यदि जो शास्त्रों का वचन है कि जितने आचरण गुरु के शास्त्र

719
00:50:02,960 --> 00:50:07,040
के विरुद्ध हो उतने आचरणों का आंशिक रूप से त्याग कर

720
00:50:07,040 --> 00:50:11,120
देना चाहिए। परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि गुरु जो धर्म व्याख्या कर रहा

721
00:50:11,120 --> 00:50:15,280
है या गुरु जो सिद्धांत दे रहा है उसका भी आप खंडन करने लग जाओ क्योंकि

722
00:50:15,280 --> 00:50:19,440
धर्म व्याख्या और क्या कहते हैं सिद्धांतों में यदि आप खंडन

723
00:50:19,440 --> 00:50:23,520
करोगे तो वही बात आ जाएगी गुरु विरोध हो जाएगा फिर आपके पास वो शिक्षा कहां

724
00:50:23,520 --> 00:50:27,600
से आई ये प्रश्न फिर से खड़ा हो जाएगा तो आचरण में गुरु के जाया

725
00:50:27,600 --> 00:50:32,160
जा सकता है एक चीज और है गुरुदेव कि यदि हम आचरण का

726
00:50:32,160 --> 00:50:36,320
विरुद्ध जा भी रहे हैं तो क्या हमें अधिकार है उसकी समीक्षा करने का इत

727
00:50:36,320 --> 00:50:40,560
तो हो गए हम गुरु गुरु के उन आचरणों का हमने त्याग कर दिया तो समीक्षा

728
00:50:40,560 --> 00:50:44,880
करने का अधिकार प्राप्त होता है। मतलब ऐसा कुछ है शास्त्रीय कि जैसे गुरु

729
00:50:44,880 --> 00:50:48,880
के आचरण कुछ-कुछ शास्त्रों से इतर मिल रहे हैं तो फिर हम उसकी समीक्षा

730
00:50:48,880 --> 00:50:52,960
करने लग जाए सार्वजनिक तौर पर जो है जैसे आपने अभी प्रह्लाद जी का उदाहरण दिया

731
00:50:52,960 --> 00:50:57,040
तो उसमें अगर गुरु माने पिता को गुरु तुल्य माने तो वहां

732
00:50:57,040 --> 00:51:01,200
पर प्रह्लाद जी ने आचरणों का तो त्याग किया अपने पिता के मगर कहीं

733
00:51:01,200 --> 00:51:05,280
भी समीक्षा नहीं की भाई वो ऐसे हैं वो वैसे हैं ये वो नहीं किया आपने बताया

734
00:51:05,280 --> 00:51:09,440
कि दंडवत हमेशा प्रणाम तो हमें समीक्षा से बचना चाहिए गुरु

735
00:51:09,440 --> 00:51:13,440
के उन आचरणों यदि कोई व्यक्ति अपने आप को अपने आचार्य

736
00:51:13,440 --> 00:51:18,320
से अधिक समझदार मानता है।

737
00:51:18,320 --> 00:51:22,400
आध्यात्मिक दृष्टि से स्वयं को उनकी अपेक्षा अधिक सक्षम

738
00:51:22,400 --> 00:51:25,840
मानता है।

739
00:51:25,840 --> 00:51:29,920
तो फिर तो स्वतंत्र कुछ भी करें। यदि आचार्य के अनुगत

740
00:51:29,920 --> 00:51:34,080
रहना है, आचार्य से उपकृत हो चुके हैं। उपकृत होना

741
00:51:34,080 --> 00:51:38,160
है जी। तो फिर अनुशासित ही रहना

742
00:51:38,160 --> 00:51:42,400
चाहिए। जिन जिन आचरणों का अनुकरण करना

743
00:51:42,400 --> 00:51:46,400
संभव ना हो उन आचरणों की उपेक्षा करनी चाहिए।

744
00:51:46,400 --> 00:51:50,640
बस समीक्षा नहीं करनी चाहिए। समीक्षा करने का अधिकार आपको

745
00:51:50,640 --> 00:51:54,720
लग रहा है कि आप हो सक्षम हो। उनसे अधिक तप आपका है।

746
00:51:54,720 --> 00:51:58,720
उनसे अधिक ज्ञान विज्ञान आपका है। उनसे अधिक आध्यात्मिक बल आपका है।

747
00:51:58,720 --> 00:52:02,880
और आप कुछ भी करो तुम्हें कौन रोक लेगा? तो फिर जो अपने आचार्य का अतिक्रमण

748
00:52:02,880 --> 00:52:06,880
कर गया है। जी उसे कौन रोक लेगा दुनिया में? जो ये कह रहा है कि साहब

749
00:52:06,880 --> 00:52:12,400
मैं मेरे पिताजी समझदार नहीं है। मेरे पिताजी को निर्णय

750
00:52:12,400 --> 00:52:17,440
क्या जानते हैं मेरे पिताजी? हम उसका उसकी दवा किसी के पास नहीं है। फिर

751
00:52:17,440 --> 00:52:22,000
और आचार्य का

752
00:52:22,000 --> 00:52:26,320
अनुकरण करना यदि संभव नहीं है, अनुसरण करना यदि संभव नहीं है

753
00:52:26,320 --> 00:52:31,200
तो उनको तिरस्कृत करने का भी आपको कोई हक नहीं बनता है।

754
00:52:31,200 --> 00:52:35,280
कोई अधिकार नहीं बनता है। वैसा करना ना समाज की दृष्टि में

755
00:52:35,280 --> 00:52:39,360
समीचीन होगा, ना तुम्हारे व्यक्तिगत जीवन के लिए समीचीन होगा

756
00:52:39,360 --> 00:52:43,600
और ना ही परलोक की दृष्टि से समीचीन होगा। जी जी

757
00:52:43,600 --> 00:52:47,840
हट जाओ ना वहां से जिस जिस पटल पर रह के जिस केंद्र

758
00:52:47,840 --> 00:52:51,920
पर रह के आपके मन को प्रसन्नता नहीं हो रही है आपके

759
00:52:51,920 --> 00:52:56,000
मन को समाधान नहीं हो रहा है उस पटल से हट जाओ तमाशा

760
00:52:56,000 --> 00:53:00,080
क्यों करते हो तमाशा क्यों बनते हो हट जाना

761
00:53:00,080 --> 00:53:04,160
चाहिए तमाशा नहीं बना इसलिए हमने प्रहलाद की बात कही थी

762
00:53:04,160 --> 00:53:08,240
जी आप रहते हैं तो समाधान आपको वहां से नहीं चाहिए

763
00:53:08,240 --> 00:53:12,320
तो तो भी क्या जरूरत है समीक्षा करने की उत्श्रंखलता की मैं

764
00:53:12,320 --> 00:53:16,880
उसे समीक्षा अच्छा नहीं कहता कुछ श्रंखलता कहता हूं क्या आवश्यकता है

765
00:53:16,880 --> 00:53:20,880
और विवेक पूर्ण जीवन होना चाहिए आनंद पूर्ण जीवन होना चाहिए जितना जहां

766
00:53:20,880 --> 00:53:25,440
से मिले सारी सृष्टि में सर्वत्र गुरुत्व बिखरा हुआ है आवश्यकता

767
00:53:25,440 --> 00:53:29,520
शिष्यत्व की पात्रता की पात्र चाहिए जी सब कुछ

768
00:53:29,520 --> 00:53:33,680
भरा पड़ा है एक वृक्ष की डाली का पत्ता भी गुरुत्व से भरा

769
00:53:33,680 --> 00:53:37,200
हुआ है जब दत्तात्रेय भगवान 24

770
00:53:37,200 --> 00:53:41,760
केंद्रों से 24 शिक्षाएं ले सकते हैं तो तुम्हें कौन सी आफत आ रही है

771
00:53:41,760 --> 00:53:45,920
कब देखा उन्होंने दत्तात्रेय भगवान ने कि वेश्या है। इसके

772
00:53:45,920 --> 00:53:50,080
तो जीवन में पवित्रता नहीं है। जितना लेना था ले लिया। आप

773
00:53:50,080 --> 00:53:53,760
जब एक दत्तात्रेय भगवान

774
00:53:53,760 --> 00:53:57,760
पृथ्वी से जल से आकाश से अग्नि से छोटे से बालक से कुंवारी

775
00:53:57,760 --> 00:54:01,840
कन्या से एक लोहार अयस्कार माने लोहार से सीख

776
00:54:01,840 --> 00:54:06,000
सकते हैं। अपने आचार्य से जितना अच्छा लग रहा है उतना सीख लो। और

777
00:54:06,000 --> 00:54:10,560
मैं तो कहता हूं शिक्षा भी दो प्रकार से प्राप्त होती है। विधि मुखेन निषेध मुखे

778
00:54:10,560 --> 00:54:14,880
जो अपने आपको लगता है कि ये सारे आचरण

779
00:54:14,880 --> 00:54:20,080
बहुत अच्छे हैं। सबका अनुकरण कर लो। जो अच्छाइयां है सबका अनुकरण कर लिया है क्या?

780
00:54:20,080 --> 00:54:24,160
जब सबका अनुकरण कर लो और कुछ लगे कि भाई ये तो ये ठीक नहीं है।

781
00:54:24,160 --> 00:54:28,560
तो तुम उसी समय प्रतिज्ञा करो कि जो दोष जो त्रुटि जो असावधानी

782
00:54:28,560 --> 00:54:32,640
मेरे पिता या मेरे गुरु में रह रही है वो असावधानी वो त्रुटि वो दोष

783
00:54:32,640 --> 00:54:36,800
मैं मेरे व्यक्तिगत जीवन में नहीं आने दूंगा। हो गया तुम्हारा भला निषेध मुख से

784
00:54:36,800 --> 00:54:41,840
शिक्षा प्राप्त वैसा जो लग रहा है ठीक नहीं है वैसा हम नहीं करेंगे

785
00:54:41,840 --> 00:54:46,000
तो जीवन का रस बना रहेगा प्रसन्नता बनी रहेगी आनंद बना रहेगा नहीं

786
00:54:46,000 --> 00:54:50,240
तो आग में झुलसे हुए फूल की तरह से बिखरे बिखरे घूमोगे ना

787
00:54:50,240 --> 00:54:52,240
यहां चैन पड़ेगा ना वहां चैन पड़ेगा

788
00:54:52,240 --> 00:54:56,240
ये यहां घर-घर घूम घूमते हैं कि यहां चले गए वहां चले गए तो बड़ा सुख मिल रहा

789
00:54:56,240 --> 00:55:00,560
है तुमको जिनके यहां जाने से आपको झूठी थोड़ी देर की सम्मान और प्रशंसा

790
00:55:00,560 --> 00:55:05,840
मिल रहा है ना वो कुत्ते से ज्यादा कोई कीमत नहीं मानते हैं आपकी

791
00:55:05,840 --> 00:55:09,840
एक दरवाजे से दुत्कारा गया व्यक्ति दूसरे दरवाजे पर

792
00:55:09,840 --> 00:55:13,840
पुचकारा जाता है तो भी वह वैसा ही रहता है। कहते अपने अपने गुरु

793
00:55:13,840 --> 00:55:18,240
का सगा नहीं हो तो हमारा क्या सगा होगा? ये आपके बारे में धारणा रहती है। सावधान

794
00:55:18,240 --> 00:55:22,240
रहना चाहिए। जी कह बुरा ना मानो होली है महाराज जी के [हंसी]

795
00:55:22,240 --> 00:55:26,400
बहुत सुंदर वचन प्राप्त हुए। मार्गदर्शन प्राप्त हुआ महाराज जी का। महाराज

796
00:55:26,400 --> 00:55:30,640
जी बस एक लास्ट छोटा सा प्रश्न है। आजकल एक परंपरा सुनने में आ रही है। निग्रह

797
00:55:30,640 --> 00:55:34,800
परंपरा इसे छोड़ दीजिए। अच्छा अच्छा इसको छोड़ दें

798
00:55:34,800 --> 00:55:38,960
तो मैंने व्यक्ति निष्ठ

799
00:55:38,960 --> 00:55:42,960
मत होइए बहुत अच्छा जी जी जी बिल्कुल बिल्कुल ठीक है मैं उनको अभी

800
00:55:42,960 --> 00:55:46,320
भी

801
00:55:46,320 --> 00:55:50,560
भागवतानंद जी के रूप में जानता हूं ये महाराज जी का बहुत सुंदर मार्गदर्शन हमें

802
00:55:50,560 --> 00:55:54,720
प्राप्त हुआ और कई जो असमंजस की स्थितियां थी उन पर

803
00:55:54,720 --> 00:55:58,720
महाराज जी के गहरे जो वचन थे उनके द्वारा प्रकाश आया तो बहुत

804
00:55:58,720 --> 00:56:02,960
सारे संशय दूर होंगे मुझे लगता है इस वीडियो से आप लोगों के और महाराज

805
00:56:02,960 --> 00:56:08,960
जी के चरणों में प्रणाम निवेदित करते हुए विराम देता हूं। जय श्री राम।

806
00:56:17,220 --> 00:56:21,220
[संगीत]
