1
00:00:06,320 --> 00:00:10,400
कुल मिलाकर के इनके लिए अंतिम प्रमाण इनकी अपनी खोज है जो

2
00:00:10,400 --> 00:00:14,800
ये आत्मचिंतन के नाम पे बता रहे हैं और इसको प्रस्तुत कर रहे हैं। है ना?

3
00:00:14,800 --> 00:00:18,960
वो ना ही अंतिम प्रमाण ब्रह्मा कुमारी है। और फिर अभी हम लोग सिद्ध करेंगे

4
00:00:18,960 --> 00:00:23,200
कि वेद और गीता भी कैसे इनका अंतिम प्रमाण नहीं है। वो अभी हम बात करेंगे। आपका

5
00:00:23,200 --> 00:00:27,440
अंतिम प्रमाण है कि मेरे को अपने अनुभव अपने तर्क शक्ति इत्यादि

6
00:00:27,440 --> 00:00:31,680
जो लॉजिक्स इत्यादि हैं उनसे जो निष्कर्ष निकल के आ रहा है वही

7
00:00:31,680 --> 00:00:35,680
वह है और फिर इसके साथ में जो है वह ब्रह्माकुमारी हो तो मान्य है।

8
00:00:35,680 --> 00:00:39,760
वह कुरान हो तो मान्य है। बाइबल हो तो मान्य है। ठीक है? जितने अंश में वो जो मेरा

9
00:00:39,760 --> 00:00:43,840
अनुभव कह रहा है वो सही कह रहा है आत्मचिंतन अगर हमारे

10
00:00:43,840 --> 00:00:47,840
वेद है वेदों के कुछ विरुद्ध है और वेद यदि भगवत गीता

11
00:00:47,840 --> 00:00:51,920
के कुछ विरुद्ध है तो हम उसके बर खिलाफ है भगवान आता

12
00:00:51,920 --> 00:00:56,160
है आ के आदि सनातन देवी देवता धर्म की पवित्र प्रवृत्ति

13
00:00:56,160 --> 00:01:00,240
मार्ग की स्थापना करता ठीक है अब आप वेद के विरुद्ध मार्ग की स्थापना नहीं करते अब देखिए अब

14
00:01:00,240 --> 00:01:04,240
यहां तक जो बात हुई है वो एक मिनट अब यहां तक जो बात हुई है वो

15
00:01:04,240 --> 00:01:08,240
इस परिपेक्ष में थी कि ब्रह्मा कुमारी

16
00:01:08,240 --> 00:01:12,400
सही है या गलत है क्योंकि अब यहां पे मामला थोड़ा सा अलग हो रहा है। इन्होंने ब्रह्मा

17
00:01:12,400 --> 00:01:16,400
कुमारीज की उंगली भी छोड़ दी है कि हम ब्रह्मा कुमारीज के क्योंकि इन्होंने मान लिया

18
00:01:16,400 --> 00:01:20,480
ब्रह्मा कुमारीज भी कई जगह गलत कहती है और फिर मैंने क्वेश्चन भी किया है कि अगर आप यह

19
00:01:20,480 --> 00:01:21,680
क्लेम कर रहे हैं कि मुरली

20
00:01:21,680 --> 00:01:25,680
जो है आ रही है आपके पास एक मिनट आप जो अर्थ बता रहे हैं

21
00:01:25,680 --> 00:01:29,840
वो मुरली का ही अर्थ बता रहे हैं तो इन्होंने ये भी कह दिया कि मुरली भी कहीं-कहीं पे गलत है। इसका मतलब

22
00:01:29,840 --> 00:01:34,000
इनका अंतिम प्रमाण मुरली भी नहीं है। अब हम इस पे बात करेंगे कि इनका

23
00:01:34,000 --> 00:01:38,080
अंतिम प्रमाण क्या वेद और गीता है। ठीक है? इस पे बात करेंगे।

24
00:01:38,080 --> 00:01:42,400
तो सबसे पहले आप ये बताइए आपने एक बात कही कि सभी धर्मों से ज्ञान

25
00:01:42,400 --> 00:01:46,560
आता है। है ना? सभी धर्म सही है। ठीक। सभी धर्म

26
00:01:46,560 --> 00:01:51,040
सही है। मतलब जो तो अब मुझे अब देखिए अब बहुत

27
00:01:51,040 --> 00:01:55,120
बिल्कुल आत्मज्ञान आत्मज्ञान की बात ही करेंगे। बिल्कुल पक्की बात

28
00:01:55,120 --> 00:01:59,200
करेंगे। उसको ले मैं उसी की बात कर रहा हूं। मैं उसी की बात कर रहा हूं। मैं

29
00:01:59,200 --> 00:02:03,680
उसी की बात कर रहा हूं। मैं उसी काउंटर करने की पक्ष विपक्ष भाई साहब मैं

30
00:02:03,680 --> 00:02:08,080
कोई गुलदस्ता नहीं। मैं मैं बता रहा हूं। अब आप मुझे यह बता दीजिए धर्म किसे

31
00:02:08,080 --> 00:02:12,160
कहते हैं आप? आपने कहा ना सभी धर्म यानी कि सनातन के अलावा

32
00:02:12,160 --> 00:02:16,400
और भी धर्म धर्म ही है आपके हिसाब। नहीं नहीं और कोई है ही नहीं। आप ही तो कह रहे हो। आत्मा

33
00:02:16,400 --> 00:02:20,480
को ही धर्म कहा जाता है। कहां पे लिखा है? कहां पे लिखा है? आत्मा

34
00:02:20,480 --> 00:02:24,640
को धर्म कहा जाता है। आत्मा तो एक तत्व है। धर्म के द्वारा प्राप्त किया जाने वाला।

35
00:02:24,640 --> 00:02:29,200
धर्म के द्वारा प्राप्त अथातो धर्म जिज्ञासा अर्थातो ब्रह्म जिज्ञासा।

36
00:02:29,200 --> 00:02:33,440
धर्म से ब्रह्म तत्व आया कहां से? धर्म से ब्रह्म प्राप्त होता है। आत्मा धर्म

37
00:02:33,440 --> 00:02:37,200
नहीं है। आत्मा-आत्मिक उच्चतम स्तर तक पहुंचना

38
00:02:37,200 --> 00:02:41,280
पहुंचने का प्रयास करने हेतु धर्म आत्मा से भिन्न नहीं है तो

39
00:02:41,280 --> 00:02:45,600
अभिन्न भी नहीं है। आप भिन्न करके दिखाओ। अरे दिखा तो रहा हूं भाई। धर्म

40
00:02:45,600 --> 00:02:49,680
क्रिया है। और जो क्या कहते हैं जो वो है

41
00:02:49,680 --> 00:02:54,080
ब्रह्म आत्मा वो परिणाम है। हां। समझ रहे हैं?

42
00:02:54,080 --> 00:02:58,080
धर्म क्रिया है। क्रिया व्हाट टू डू व्हाट क्या करना

43
00:02:58,080 --> 00:03:02,240
है? क्या नहीं करना है? इसलिए भगवत गीता 16 24 में कहा है तेरे लिए कर्तव्य

44
00:03:02,240 --> 00:03:06,480
और अकर्तव्य के विषय में एकमात्र शास्त्र प्रमाण है। यानी क्रिया का नाम धर्म

45
00:03:06,480 --> 00:03:10,560
है कि ये करना है ये नहीं करना है। इससे विवाह करना है इससे नहीं करना है। ये धर्म

46
00:03:10,560 --> 00:03:14,560
है। अब इस ये ऐसा करने से होगा क्या? हमको अपने आत्मज्ञान

47
00:03:14,560 --> 00:03:18,560
मिलेगा। आत्मा तक पहुंचेंगे। वो प्राप्तव्य है। ठीक है? तो

48
00:03:18,560 --> 00:03:22,720
धर्म माना जिस धर्म के रास्ते पे हम चल रहे हैं। जिसको

49
00:03:22,720 --> 00:03:26,800
उसका लक्ष्य उसका लक्ष्य है धर्म। उसका लक्ष्य है आत्मा। उसका लक्ष्य

50
00:03:26,800 --> 00:03:30,880
है ब्रह्म। आपने कहा ना आत्मा ही धर्म है। आत्मा ही धर्म नहीं है।

51
00:03:30,880 --> 00:03:35,200
प्राप्त हो जाता है तब धर्म की शुरुआत होती है। अगर आप

52
00:03:35,200 --> 00:03:39,440
आत्मा की स्थिति से आत्मनिष्ठ से नीचे हैं। मन की

53
00:03:39,440 --> 00:03:43,760
मुझे आप मुझे थोड़ा सा उदाहरण दीजिए। आपके अनुसार धर्म क्या है? जो आप कह रहे है सनातन

54
00:03:43,760 --> 00:03:47,840
के अलावा ये कुरान इत्यादि भी धर्म है। देह के आधार से कोई

55
00:03:47,840 --> 00:03:51,920
काला है, कोई गोरा है। मैंने पूछा कुरान इत्यादि भी धर्म है। मैंने पूछा कुरान

56
00:03:51,920 --> 00:03:52,420
इत्यादि

57
00:03:52,320 --> 00:03:56,400
भी धर्म है। ये सब दैहिक धर्म है। दैहिक मान्यता है। धर्म है। तो यानी कि आपने जो

58
00:03:56,400 --> 00:04:00,560
कहा सभी धर्मों में ये बात होती है। वो सभी धर्म कौन-कौन से हैं? फिर

59
00:04:00,560 --> 00:04:04,880
सभी धर्म सभी नहीं धर्म एक हैं। आपने अभी कहा थोड़ी देर पहले सभी धर्म की बात

60
00:04:04,880 --> 00:04:08,960
ये सभी संप्रदाय हैं। मान्यताएं हैं। तो इसका मतलब आप उन्हें धर्म नहीं मानते

61
00:04:08,960 --> 00:04:13,760
ना? मतलब मानसिक व्यवस्था है। मनुसकृत व्यवस्था है। एक जो समाज

62
00:04:13,760 --> 00:04:18,000
मन से उत्पन्न जो व्यवस्था है वो मनुष्य आप धर्म मानते हैं उनको

63
00:04:18,000 --> 00:04:22,160
कि नहीं? उनमें धर्म है पर धर्म उनमें धर्म है।

64
00:04:22,160 --> 00:04:26,240
उनमें धर्म है। पूरे प्रॉपर धर्म नहीं है। पहले समझो

65
00:04:26,240 --> 00:04:30,560
बात को समझो। हां हां हां अगर शरीर है हां तो बिना आत्मा

66
00:04:30,560 --> 00:04:34,960
के नहीं है। हां आ जहां शरीर है वहां आत्मा है। हां

67
00:04:34,960 --> 00:04:39,040
जीव आत्मा में आत्मा का ही धर्म है। हम्म अगर कोई अपने

68
00:04:39,040 --> 00:04:43,360
को देह के कॉन्शियस में लेकर चल रहा है हम्म तो वो

69
00:04:43,360 --> 00:04:47,520
धर्म से विरुद्ध है। दैहिक धारणा में है कि मैं हिंदू हूं।

70
00:04:47,520 --> 00:04:51,920
टीका लगा लिया तो मैं पंडित हूं। मोच कटा ली तो मैं मुसलमान हूं।

71
00:04:51,920 --> 00:04:55,920
ये फला एक आडंबर जो भी मान लो देह की क्रिया कर्म लेकिन

72
00:04:55,920 --> 00:05:00,240
वास्तव में जो आत्मनिष्ठ है जो आत्मा का धर्म है

73
00:05:00,240 --> 00:05:04,720
वहां सभी के अंदर वो आत्मा है जिसको कोई रूह कहता है

74
00:05:04,720 --> 00:05:07,360
कोई फॉल कहता है कोई आत्मा

75
00:05:07,360 --> 00:05:11,440
कहता है है ना तो ये भिन्नता नहीं एक ही

76
00:05:11,440 --> 00:05:15,440
तत्व वो अविनाशी तत्व है मैंने मैंने प्रश्न ये कहां कहा है कि भैया

77
00:05:15,440 --> 00:05:19,680
सब में समानता क्या है मेरा प्रश्न ये है मेरा प्रश्न ये है सबसे

78
00:05:19,680 --> 00:05:23,760
पहले कि आपकी धर्म धर्म की परिभाषा क्या है और उसकी अपने को

79
00:05:23,760 --> 00:05:28,080
आत्मा समझ अपने आराध्य को याद करो ये तो लक्षण है ये लक्षण है

80
00:05:28,080 --> 00:05:32,160
जैसे मैंने पूछा कि भैया मोटरसाइकिल क्या है तो आपने ये नहीं

81
00:05:32,160 --> 00:05:36,240
बताया दो पहियों से चलने वाली पेट्रोल डालकर चलने वाली या एक जगह

82
00:05:36,240 --> 00:05:40,560
से दूसरी जगह तक पहुंचाने वाली ये नहीं आपने बताया आपने आपने क्या बताया

83
00:05:40,560 --> 00:05:45,040
वो नीली कलर की बुलेट जो है वो मोटरसाइकिल है हमने

84
00:05:45,040 --> 00:05:49,120
टैग नहीं लगाया है मैंने मैंने क्या पूछा है आपने टैग नहीं लगाया जहां टैग लग जाता

85
00:05:49,120 --> 00:05:53,200
है वहां धर्म आपने आपने वस्तुनिष्ठ कर दिया ना वस्तु आप अपने आप को

86
00:05:53,200 --> 00:05:57,200
आत्मा मानो यह धर्म है मैं लक्षण नहीं पूछ रहा हूं मैं उसकी उपयोगिता के

87
00:05:57,200 --> 00:06:03,200
अनुसार परिभाषा पूछ रहा हूं जो अविनाशी तत्व है जिसका कभी विनाश नहीं होता

88
00:06:03,440 --> 00:06:07,920
मैंने क्या पूछा कुछ भी मैंने क्या पूछा मैंने आपसे क्या पूछा धर्म की उपयोगिता

89
00:06:07,920 --> 00:06:12,000
के अनुसार उसकी परिभाषा क्या है जिसका कभी विनाश नहीं होता है अरे

90
00:06:12,000 --> 00:06:16,080
भैया ये जिसका कभी विनाश नहीं होता ये परिभाषा है अधर्म की उसी

91
00:06:16,080 --> 00:06:20,240
से ये मैंने उपयोग मैंने अगर वो मैंने

92
00:06:20,240 --> 00:06:25,440
उपयोगिता के अनुसार उपयोगिता क्या है धर्म की क्या मिलेगा हमको

93
00:06:25,440 --> 00:06:29,440
ईश्वर द्वारा नियत किए हुए जो भी कर्तव्य कर्म है वो उसकी उपयोगिता

94
00:06:29,440 --> 00:06:33,760
है उस धर्म अर्थात आत्मा की शक्त आत्मा का पर्यायवाची

95
00:06:33,760 --> 00:06:37,920
शब्द शक्ति की उपयोगिता है वो शक्ति भिन्न-भिन्न रूपों में जीवन के

96
00:06:37,920 --> 00:06:42,000
फिर आप उसके लक्षण बता रहे हो यूटिलाइज होते फिर आप उसके लक्षण बता रहे हो मैं

97
00:06:42,000 --> 00:06:46,480
पूछ रहा हूं कि धर्म से हमें प्राप्त क्या होगा इस विषय में धर्म की परिभाषा बताइए

98
00:06:46,480 --> 00:06:50,720
की ही तो बात कर रहे हैं आवश्यकता आविष्कार की जननी है तो बताइए ना क्या मिलेगा धर्म

99
00:06:50,720 --> 00:06:54,880
से जैसे सुबह है धर्म से क्या मिलेगा पूछ रहा हूं धर्म

100
00:06:54,880 --> 00:06:59,120
से आपको सुख शांति आनंद प्रेम मिलेगा मुक्ति जीवन मुक्ति मिलेगी अच्छा

101
00:06:59,120 --> 00:07:03,440
यानी कि यानी कि भगवत प्राप्ति होगी यानी कि रूप में

102
00:07:03,440 --> 00:07:07,760
यानी कि भगवान की प्राप्ति होगी ये धर्म है ठीक है

103
00:07:07,760 --> 00:07:11,760
सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर की प्राप्ति होगी परम सुख मिलेगा अनंत

104
00:07:11,760 --> 00:07:16,000
जीवन है ना सच्चिदानंद अमृत ठीक है ये आपने अब आए

105
00:07:16,000 --> 00:07:19,360
यहां पर कि धर्म से आपको ये प्राप्त होता जो

106
00:07:19,360 --> 00:07:23,360
प्राप्त है। अब यह बताइए हमें जो

107
00:07:23,360 --> 00:07:27,600
आपने लक्षण बताए कि जो है जो ईश्वर

108
00:07:27,600 --> 00:07:31,600
द्वारा बताए गए तो ये ईश्वर द्वारा बताया गया जो धर्म है ये

109
00:07:31,600 --> 00:07:36,320
आप किसे मान रहे हैं? कहां पे लिखा हुआ है? क्या है? देखो हां

110
00:07:36,320 --> 00:07:40,800
अगर आप अपनी दृष्टि से देखते हैं हम

111
00:07:40,800 --> 00:07:44,960
अपनी खुद की दृष्टि से। जी तो यहां पर हो सकता है कि आपकी

112
00:07:44,960 --> 00:07:48,960
मन की बात है, मनगढ़ंत बात हो सकती है। हम्म दृष्टि

113
00:07:48,960 --> 00:07:53,200
भी कई तरह की होती है। तो किस कैसे पता लगाएं क्या धर्म है? वो निश्चित

114
00:07:53,200 --> 00:07:57,520
कहां से हो रहा है? जो ईश्वर तक पहुंचाएगा। जी जी। जो आत्म

115
00:07:57,520 --> 00:08:01,760
दृष्टि होती है, परमात्म दृष्टि होती है। उस दृष्टि से

116
00:08:01,760 --> 00:08:05,840
अगर सभी देखना शुरू करें जिसको उसकी पहचान

117
00:08:05,840 --> 00:08:09,920
क्या है? बिल्कुल प्रैक्टिकल थोड़ा सा बताइए। जैसे कि मान लीजिए मेरे सामने मतलब

118
00:08:09,920 --> 00:08:14,160
मैं बता मैं पूछ रहा हूं। मैं पूछ रहा हूं। जैसे कि मेरे सामने एक महिला खड़ी है। जी

119
00:08:14,160 --> 00:08:18,160
ठीक। मुझे उसके साथ किस प्रकार का व्यवहार करना है? व्यवहार करना ही धर्म

120
00:08:18,160 --> 00:08:22,160
और अधर्म है। अगर मैं सही व्यवहार का व्यवहार हां तो अब आप मुझे बताइए

121
00:08:22,160 --> 00:08:26,320
किस दृष्टि से पता चलेगा कैसे पता चलेगा कि उसके साथ क्या व्यवहार करना है? उस

122
00:08:26,320 --> 00:08:30,560
पहली बात उसकी आवश्यकता क्या है? और फिर आ ईश्वर

123
00:08:30,560 --> 00:08:34,560
ने हमें सिखाया क्या है? हमारे आराध्य ने हमें सिखाया क्या है? तो बताइए ना कैसे

124
00:08:34,560 --> 00:08:39,120
आपने पता किया कि किसी स्त्री के साथ क्या व्यवहार क्यों करना है? आत्मीयता से अगर

125
00:08:39,120 --> 00:08:43,360
स्त्री है, मां है तो एक बच्चे बच्चे का तो ये आपको किसने

126
00:08:43,360 --> 00:08:48,800
बताया? आत्मा ने बताया आपके माता-पिता ने बताया है? ये हमारे

127
00:08:48,800 --> 00:08:52,880
ईश्वर द्वारा अरे ईश्वर ने कान में आ के कहा है। कैसे कहा है? मैं प्रैक्टिकली

128
00:08:52,880 --> 00:08:57,120
पूछ रहा हूं। हमने हमें गीता, वेद, पुराण,

129
00:08:57,120 --> 00:09:01,440
माता-पिता, बुजुर्गों से, अपने पूर्वजों से, अपने देवी देवताओं

130
00:09:01,440 --> 00:09:05,600
से, अपने फ्रेंड सर्किल से सीखी है। अच्छा मतलब बहुत

131
00:09:05,600 --> 00:09:09,840
सारे लोगों से सीखी है। बहुत सारे लोगों ने बहुत सारे लोगों मतलब उन्होंने गलत

132
00:09:09,840 --> 00:09:14,400
नहीं सिखाया है। अरे ये आपको पता कैसे लगा उन्होंने गलत सिखाया कि नहीं सिखाया?

133
00:09:14,400 --> 00:09:18,480
जब बच्चे थे तो बच्चे की बात अलग लेकिन अभी जब बच्चा बड़ा

134
00:09:18,480 --> 00:09:23,120
होता है तो माता-पिता गुरु होते हैं। आपके लिए माता-पिता प्रमाण हैं। माता-पिता

135
00:09:23,120 --> 00:09:27,440
माता-पिता गलत बात तो नहीं बोलते? नहीं बोलते। किसी के भी नहीं बोलते।

136
00:09:27,440 --> 00:09:31,440
तो वो माता-पिता कौन है जो हत्या कर देते हैं अपने बच्चे की? ये

137
00:09:31,440 --> 00:09:35,680
फालतू की बातें मत करो भाई। जी अखबार में कितनी न्यूज़

138
00:09:35,680 --> 00:09:39,680
आ रही मां मां ने अपने बेटे की हत्या कर दी। पत्नी ने अपने पति की हत्या कर दी। वो

139
00:09:39,680 --> 00:09:44,320
माता नहीं होती है। वो कुमाता होती है। माता माता है ना उसमें भी कुमाता में

140
00:09:44,320 --> 00:09:48,320
है। हां माता के बिना कु हो गया क्या? देखो आत्मा होती है।

141
00:09:48,320 --> 00:09:49,600
आज सुनिए मेरी बात।

142
00:09:49,600 --> 00:09:53,600
देखिए हम लोग गलत डायरेक्शन हम लोग गलत डायरेक्शन में जा रहे हैं। तो हम

143
00:09:53,600 --> 00:09:57,600
लोग गलत हम लोग गलत डायरेक्शन में जा रहे हैं। आत्मा सिर्फ आत्मा होती है। हम लोग गलत हम लोग गलत

144
00:09:57,600 --> 00:10:01,680
डायरेक्शन में जा रहे हैं। बात ये है कि आपका धर्म निश्चित कहां से हो रहा है? यह

145
00:10:01,680 --> 00:10:05,760
बता दीजिए मुझे। कैसे निश्चित कर रहे हैं कि क्या करना है और क्या नहीं करना बस अपने

146
00:10:05,760 --> 00:10:09,760
आप को आत्मा समझकर आराध्य को याद करना अरे वह

147
00:10:09,760 --> 00:10:13,840
आराध्य कहां से आ रहा है आपका कहां पे उसका वर्णन है कहां

148
00:10:13,840 --> 00:10:18,080
पे उसका वर्णन है वो जो आराध्य है आपका वो कहां से आ रहा है कहां से निश्चित हो रहा है ये

149
00:10:18,080 --> 00:10:22,400
वाला आराध्य है मेरा ये अभिव्यक्ति की आजादी है। अभिव्यक्ति

150
00:10:22,400 --> 00:10:26,640
की आजादी मतलब किसी को भी आराध्य मान लो किसी को मतलब यही आजादी तो

151
00:10:26,640 --> 00:10:30,640
चाहे कोई हनुमान [हंसी] हनुमान को मानने वाला है हनुमान को भी

152
00:10:30,640 --> 00:10:34,720
अगर कोई हनुमान का भी भक्त हो सकता है उसके लिए हनुमान ही उसके भगवान है

153
00:10:34,720 --> 00:10:38,720
उसके लिए हनुमान ही अब आप कहो नहीं राम ही भगवान है मैंने

154
00:10:38,720 --> 00:10:42,800
कब कहा मैंने कहा कि शास्त्रों से आ रहे हैं आपके भगवान मैं

155
00:10:42,800 --> 00:10:47,040
पूछ रहा हूं शास्त्रों से आ रहे हैं आपके भगवान अगर मैं हूं एक छोटी सी बात

156
00:10:47,040 --> 00:10:51,360
आप जिस बात का मतलब एक कर रहे हैं देखो मैं हूं मैं

157
00:10:51,360 --> 00:10:55,440
एक अकेला हूं। पर मैं किसी का भाई हूं। आप

158
00:10:55,440 --> 00:10:59,440
मेरी बात को आप मेरी बात को कुछ और समझ रहे हैं। मैं पूछ रहा हूं।

159
00:10:59,440 --> 00:11:03,440
आप जिसको आराध्य कह रहे हैं वो हमारे सनातन शास्त्रों से आराध्य है या कहीं

160
00:11:03,440 --> 00:11:05,600
से भी आपने कुछ चुन लिया है।

161
00:11:05,600 --> 00:11:09,760
सनातन की परिभाषा को आप क्या मानते हो? इस सृष्टि में सनातन परिभाषा

162
00:11:09,760 --> 00:11:14,080
जो सनातन शास्त्र वो है जो वैदिक शास्त्र हैं। अपौरुषय शास्त्र हैं। बृहधारणिक

163
00:11:14,080 --> 00:11:18,240
उपनिषद के साथ उनको ईश्वर ने भी नहीं रचा है। वो है सनातन शास्त्र। उनको

164
00:11:18,240 --> 00:11:22,400
मानने वाला सनातनी है। सनातनी हर कोई है। सुनिए सनातन हर

165
00:11:22,400 --> 00:11:26,880
कोई है। जो था है और रहेगा। हर कोई है। मीरा की दृष्टि क्या है? मैं बता रहा हूं। मैं

166
00:11:26,880 --> 00:11:30,880
बता रहा हूं। मैं बता रहा हूं। मैं बता रहा हूं। एक ही सनातन शाश्वत

167
00:11:30,880 --> 00:11:34,880
परम तत्व अपने आप को विभिन्न रूपों में प्रकट करता है। वो कहीं

168
00:11:34,880 --> 00:11:38,960
मीरा का श्याम बन जाता है। कहीं तुलसीदास का राम बन जाता है। और कहीं पे

169
00:11:38,960 --> 00:11:43,040
हनुमान बन जाता है। ठीक है। वो एक ही परम तत्व ये सब बन रहा है। तो मैं ये

170
00:11:43,040 --> 00:11:47,200
नहीं कह रहा कि इनमें से आप किसको मान रहे हैं। मैं ये कह रहा हूं रुको। यहीं पे रुको, आप

171
00:11:47,200 --> 00:11:51,280
यहीं पे रुको। एक ही वो परम तत्व है। जो किसी के

172
00:11:51,280 --> 00:11:55,440
लिए कहीं एक्टिव अह प्रत्यक्ष हो जाता है। किसी के लिए कहीं कुछ

173
00:11:55,440 --> 00:11:59,680
बनकर प्रत्यक्ष हो जाता है। तो भगवान आकर के सभी की

174
00:11:59,680 --> 00:12:03,840
सर्व मनोकामनाएं कहते हैं ना दाता एक राम भिखारी। अरे यार मुझको ये सब

175
00:12:03,840 --> 00:12:07,920
आप क्यों बता रहे हैं? ये सब तो मैं मानता ही नहीं। बता रहा हूं इसलिए बता रहा हूं कि आप उसको

176
00:12:07,920 --> 00:12:12,080
पर्टिकुलर करने की कहां पर्टिकुलर किया? मैंने पूछा आप जिसको आराध्य

177
00:12:12,080 --> 00:12:16,080
कह रहे हैं वो कहां से आते बाइबल से आते हैं। बाइबल

178
00:12:16,080 --> 00:12:20,160
कहां से आते हैं? उसकी निश्चितता है कि नहीं है? आप उसके

179
00:12:20,160 --> 00:12:20,660
विराट

180
00:12:20,640 --> 00:12:24,640
रूप को देखो। मैं विराट रूप में भी आऊंगा। मैं विराट

181
00:12:24,640 --> 00:12:28,880
ठीक है। ठीक है। तो अब आप ये बता दीजिए। विराट में यानी कि शास्त्रों

182
00:12:28,880 --> 00:12:32,960
यानी कि ठीक है। ठीक है। ठीक है। अब मैं पूछ रहा हूं। यानी कि शास्त्रों की सीमा

183
00:12:32,960 --> 00:12:37,040
के बाहर भी ईश्वर के स्वरूप को स्वीकार किया जा सकता है। हां। बहुत अच्छी

184
00:12:37,040 --> 00:12:41,120
बात। इतनी देर से बोलो ना। यह क्यों नहीं बोल रहे? अब अब देखिए अब मैं

185
00:12:41,120 --> 00:12:45,440
अब मैं अब आगे बढ़े युक्त हो मैं संप्रदाय पे ही लाऊंगा आपको

186
00:12:45,440 --> 00:12:49,600
मैं ला ले आऊंगा मुझे बोलने दीजिए बताइए अब ये बताइए कि

187
00:12:49,600 --> 00:12:53,840
शास्त्रों की सीमा के बाहर भी किसी भी ईश्वर के स्वरूप को ग्रहण किया जा सकता है

188
00:12:53,840 --> 00:12:58,720
तो किसी का मन कर रहा है कि मैं जो है मल को ईश्वर मानू तो मान ले

189
00:12:58,720 --> 00:13:02,720
मान ले है देखो मल को ईश्वर मानने का मतलब ये कि

190
00:13:02,720 --> 00:13:06,720
सूअर है हम प्रकृति सूअर नहीं सीधे मल उसको

191
00:13:06,720 --> 00:13:10,720
ईश्वर मानना ठीक है जिसकी जो जरूरत होती है। उसका ही

192
00:13:10,720 --> 00:13:14,880
यानी कि यानी कि अपने अनुसार जो जो मान रहा है वो सही है। इस

193
00:13:14,880 --> 00:13:18,880
सृष्टि में गलत क्या है? मैं बता रहा हूं। निठारी ने कुकर में डाल के बच्चे खाए

194
00:13:18,880 --> 00:13:23,360
थे कि नहीं खाए थे? वो गलत था कि नहीं? गलत। वो आवाज कहां से आ रही थी?

195
00:13:23,360 --> 00:13:27,360
तो जो कुछ हो रहा है। हां। नहीं वो आवाज उसकी आत्मा से आई थी। वो

196
00:13:27,360 --> 00:13:31,440
कह रहा है। तो उसने सही किया। जो कुछ हो रहा है टैग ही क्यों लगाते हो?

197
00:13:31,440 --> 00:13:35,600
अरे मैं पूछ रहा हूं। आपने कहा कि शास्त्रों के बाहर भी ईश्वर के स्वरूप को ग्रहण किया।

198
00:13:35,600 --> 00:13:36,100
एक

199
00:13:35,920 --> 00:13:40,160
भाई साहब बात मत पलटिए। नहीं ये बात नहीं। बात एक बात ये चल रही सुनिए बात ये

200
00:13:40,160 --> 00:13:44,240
बात ये चल रही है बात ये चल रही है निठारी का जो ईश्वर था वो

201
00:13:44,240 --> 00:13:48,320
कुकर में बच्चों का पकाया हुआ मांस था तो इसका

202
00:13:48,320 --> 00:13:52,560
मतलब आप अपने मन से जो कुछ भी किसी को भगवान मान ले वो मान लेना चाहिए

203
00:13:52,560 --> 00:13:56,880
आपने अभी कहा ना कि शास्त्रों के बाहर भी वो है भगवान का स्वरूप सुनिए

204
00:13:56,880 --> 00:14:01,040
अब मैं बताता हूं आपकी आपकी आपकी विराट आपकी विराट आपकी

205
00:14:01,040 --> 00:14:05,440
विराट स्वरूप वाली आपकी विराट स्वरूप वाली बात का जवाब देता हूं ईश्वर अनंत

206
00:14:05,440 --> 00:14:09,520
है। ठीक है सर मैं मैं बता रहा हूं आप सुनके संतुष्ट हो जाओगे

207
00:14:09,520 --> 00:14:13,600
रुको मुझे बोलने दो आप बता रहे हो लेकिन जो निठारे की बात मैं मैं गलत

208
00:14:13,600 --> 00:14:17,600
फिर उदाहरण दे कर के उसको सही करना मैं फिर नहीं दूंगा नहीं

209
00:14:17,600 --> 00:14:21,600
मैं मैम उस आपका जवाब आपका जवाब आपका जवाब दे रहा हूं

210
00:14:21,600 --> 00:14:25,440
आपका जवाब दे रहा हूं जी बताइए सुनिए

211
00:14:25,440 --> 00:14:29,520
ईश्वर अनंत है उसकी कोई सीमा नहीं है सब कुछ ईश्वर है

212
00:14:29,520 --> 00:14:34,640
ठीक सब कुछ ईश्वर है मगर हम ईश्वर के उस स्वरूप को भजते हैं

213
00:14:34,640 --> 00:14:38,640
ईश्वर के उस स्वरूप रूप का अनुकरण अनुसरण करते हैं। पूजा वंदना

214
00:14:38,640 --> 00:14:43,040
करते हैं। जो हमारे शास्त्र की सीमा में आता है। अब क्यों करते हैं?

215
00:14:43,040 --> 00:14:47,440
पानी हर जगह है। नमी इत्यादि के रूप में हवा में भी है।

216
00:14:47,440 --> 00:14:51,120
मगर हम पानी के उस स्वरूप को ग्रहण करते हैं जो हमारे व्यवहार

217
00:14:51,120 --> 00:14:55,280
की सीमा में आ जाए। उसी प्रकार से ईश्वर हर जगह

218
00:14:55,280 --> 00:14:59,360
है। कुछ भी ईश्वर के बिना है ही नहीं। ईश्वर अनंत है। वो वाणी का विषय नहीं

219
00:14:59,360 --> 00:15:03,360
है। मगर हम ईश्वर के उस स्वरूप को भजते हैं, वंदना करते हैं

220
00:15:03,360 --> 00:15:07,680
जो वेद रूपी व्यवहार की सीमा में हमारे आ जाए। वो हमारे लिए ग्रहण

221
00:15:07,680 --> 00:15:12,080
करने योग्य है। ये सिर्फ आप करते हो। ये सिर्फ आप करते हो। आपको

222
00:15:12,080 --> 00:15:16,160
तो मैंने अभी मैंने अभी क्या पूछा? कि मल को मानना चाहिए ईश्वर कि नहीं?

223
00:15:16,160 --> 00:15:20,160
आप शिक्षा दोगे मल को मानने की? अगर चराचर जगत परमात्मा का

224
00:15:20,160 --> 00:15:24,480
विराट रूप है। अगर ये प्रकृति पति परमात्मा

225
00:15:24,480 --> 00:15:28,480
मैंने आपसे क्या पूछा? कोई व्यक्ति अगर मल की पूजा आपके घर में लाके मल

226
00:15:28,480 --> 00:15:32,560
की पूजा करेगा आप मानोगे उसको सही करोगे या रोकोगे कम कमल क्या

227
00:15:32,560 --> 00:15:36,560
है मैं आप मैं आपसे क्या पूछा भाई साहब मैंने क्या पूछा कोई

228
00:15:36,560 --> 00:15:40,640
मैंने क्या पूछा आपसे कोई मल को ला के आप आप मल से

229
00:15:40,640 --> 00:15:44,720
भिन्न नहीं हो मैं क्या पूछ रहा हूं आप पूजा करने दोगे वो आपके यहां

230
00:15:44,720 --> 00:15:48,800
पूजा के मंदिर में ला के मल को रखेगा और उसकी पूजा करना चाहेगा आप रोकोगे

231
00:15:48,800 --> 00:15:52,800
उसको को प्रायोरिटी क्यों दे रहे हो मैं वो प्रकृति है ना सब कुछ है ना वो मल में

232
00:15:52,800 --> 00:15:56,880
अपना ईश्वर देख रहा है अगर दूध है दूध मैंने क्या कहा? देखिए

233
00:15:56,880 --> 00:16:00,960
भाई साहब भाई साहब देखिए बहुत दही भी मैंने आपसे पूछा है। मैंने आपसे

234
00:16:00,960 --> 00:16:05,120
पूछा है कि लेकिन हमारा गोल मतलब मैंने आपसे पूछा है कोई

235
00:16:05,120 --> 00:16:06,320
मल की पूजा करेगा

236
00:16:06,320 --> 00:16:11,680
आपके यहां घर में ला के करने दोगे रोकोगे? तो कह रहे हैं रोकोगे कि नहीं?

237
00:16:11,680 --> 00:16:15,840
भाई यही तो कह रहे हैं। मैं पूछ रहा हूं रोकोगे कि नहीं? रोकोगे। इसका

238
00:16:15,840 --> 00:16:20,000
मतलब वो पूरे सबको वो नहीं मान सकते भगवान। तो यही तो कह रहे हैं

239
00:16:20,000 --> 00:16:24,160
यथार्थ की बात। इसका मतलब कोई सीमा है जिस जिसके बाहर भगवान के स्वरूप

240
00:16:24,160 --> 00:16:28,160
को नहीं स्वीकार कर सकते। सिंपल, अब आप मुझे ये बता दीजिए।

241
00:16:28,160 --> 00:16:33,520
हां। अब आप मुझे ये बता दीजिए। ईश्वर है ये सिद्ध कैसे होता है?

242
00:16:33,520 --> 00:16:38,080
ईश्वर है ये सिद्ध कैसे होता है? हां। ईश्वर निस्वार्थ

243
00:16:38,080 --> 00:16:42,160
होता है। हम्म। निष्पक्ष होता है। नहीं मैं पूछ रहा हूं सिद्ध कैसे होता

244
00:16:42,160 --> 00:16:46,320
है इस दुनिया में कोई ईश्वर? उससे

245
00:16:46,320 --> 00:16:50,480
प्रेम हम सुख शांति हम आनंद की

246
00:16:50,480 --> 00:16:54,560
मतलब एक जो अविनाशी खुशबू है ईश्वर की जो खुशबू

247
00:16:54,560 --> 00:16:58,880
है वो उसके आत्मा को मिलती है अनुभव होती है ये उसकी

248
00:16:58,880 --> 00:17:03,040
ये तो पहचान है ईश्वर की खुशबू मुझे नहीं आ रही

249
00:17:03,040 --> 00:17:07,120
मुझे नहीं आ रही अभी फिर आपको ईश्वर नहीं है तो आपको क्या

250
00:17:07,120 --> 00:17:11,120
मेरे समक्ष सिद्ध करो ना ईश्वर है आपके समक्ष एक नास्तिक

251
00:17:11,120 --> 00:17:15,360
बैठा हुआ है सिद्ध करिए ईश्वर है तो नास्तिक बैठा है। देखो

252
00:17:15,360 --> 00:17:19,360
परम अगर कोई कहता है कि परमात्मा कहां है? आप उसे ऐसे मैं कहां कह रहा

253
00:17:19,360 --> 00:17:21,440
हूं कहां है? मैंने कहा परमात्मा है पहले ये

254
00:17:21,440 --> 00:17:25,520
सिद्ध तो करो। कोई सुप्रीम कंट्रोलर सुनिए आराध्य को अपने दिल

255
00:17:25,520 --> 00:17:29,600
में याद कर कोई सुप्रीम कंट्रोलर है इस दुनिया में। वो सिद्ध कर सकते हैं

256
00:17:29,600 --> 00:17:33,840
आप? सुप्रीम कंट्रोलर है वो सिद्ध कर सकता है। बताइए

257
00:17:33,840 --> 00:17:37,840
हमारे आराध्य ही हमारे लिए सुप्रीम कंट्रोलर

258
00:17:37,840 --> 00:17:41,920
है। मैंने नहीं पूछा कि कौन है सुप्रीम कंट्रोलर? मैं पूछ

259
00:17:41,920 --> 00:17:46,240
रहा हूं कोई सुप्रीम कंट्रोलर है। ये हम विश्वास कैसे करें?

260
00:17:46,240 --> 00:17:50,400
सुप्रीम कंट्रोलर मतलब जो अविनाशी है जिसका कभी विनाश नहीं होता है। जो स्थिति

261
00:17:50,400 --> 00:17:54,560
प्रज्ञ है, अचल है, अडोल है। हां। है वो कैसे पता? वो

262
00:17:54,560 --> 00:17:58,640
ऐसे पता कि सब कुछ जो श्री

263
00:17:58,640 --> 00:18:02,800
कृष्ण के रूप में आया था। जो श्री कृष्ण के रूप में आया भी था। हां आया

264
00:18:02,800 --> 00:18:07,040
था। हां ठीक। ठीक है। अब कैसे श्री कृष्ण के रूप में

265
00:18:07,040 --> 00:18:11,360
मतलब विराट रूप में सब कुछ आ जाता है। आप भी आ जाते। अरे भैया मैंने क्या कहा

266
00:18:11,360 --> 00:18:15,600
विराग ये पत्ते ये दीवार ये बैग ये कैमरा

267
00:18:15,600 --> 00:18:19,600
ये सब कुछ ब्रह्म है सुनो वही तो अरे मेरे को बोलने दो मगर

268
00:18:19,600 --> 00:18:24,400
ये सब सावरण ब्रह्म है इसने माया के कपड़े पहने हैं स्वरूप है

269
00:18:24,400 --> 00:18:28,400
मुझे बोलने दो ना जब मैं बोल रहा हूं ये सावरण ब्रह्म है जिसने माया के

270
00:18:28,400 --> 00:18:32,560
कपड़े पहने हैं मगर श्री राम कृष्ण इत्यादि जो भगवान अवतार लेते

271
00:18:32,560 --> 00:18:36,560
हैं वो निरावरण ब्रह्म होता है वो माया के कपड़े ओढ़ के नहीं माया

272
00:18:36,560 --> 00:18:40,720
के कपड़े हटा के आता है हमारे सामने इसलिए वो हमारे लिए भजनीय और

273
00:18:40,720 --> 00:18:44,720
पूजनीय होता है। अगर हम यह मान लेंगे कि सब कुछ ब्रह्म है इसलिए किसी की

274
00:18:44,720 --> 00:18:48,880
भी पूजा करो तो मैंने आपसे पूछा मल की पूजा करो। आपने मना कर दिया नहीं करेंगे। रोक देंगे हम।

275
00:18:48,880 --> 00:18:53,520
हटा के हटा के मतलब वो होता है। सब कुछ ब्रह्म है।

276
00:18:53,520 --> 00:18:57,760
मैंने क्या कहा? निरावरण ब्रह्म मतलब उसकी निराकारी स्थिति होती है। निरावरण ब्रह्म

277
00:18:57,760 --> 00:19:01,760
मतलब स्टेज होता है। मैं बता रहा हूं। जैसे आपके सामने माया का ये

278
00:19:01,760 --> 00:19:06,000
पर्दा है। इसके उधर परम सत्य है। आपको कुछ नहीं दिख रहा। उसके उधर।

279
00:19:06,000 --> 00:19:10,160
आपको यह दुनिया दिख रही है व्यवहारिक प्रपंच रूपी संसार दिख रहा है। पेड़ पौधे एक मिनट एक

280
00:19:10,160 --> 00:19:14,160
मिनट ठीक है अब इसमें भगवान क्या करते हैं एक चीरा लगाते हैं मनुष्य की

281
00:19:14,160 --> 00:19:18,240
आकृति का ठीक और अब क्या दिख रहा है उस चीरे से जब हम देख

282
00:19:18,240 --> 00:19:22,480
रहे हैं तो वो उधर का परम तत्व एक आकार में दिख रहा है हमें जैसे हम बंद कमरे

283
00:19:22,480 --> 00:19:26,880
से आसमान को देखे ना खिड़की के द्वारा तो चौकोर

284
00:19:26,880 --> 00:19:31,280
आसमान दिखता है जबकि आसमान तो अनंत है मगर हमको वो चौकोर दिखता है तो

285
00:19:31,280 --> 00:19:35,360
आसमान का वो अवतार होता है खिड़की के रूप में उसी तरीके से जब

286
00:19:35,360 --> 00:19:39,440
हम जो ब्रह्म जो हमारे समक्ष जो देख रहा है सिर्फ उसी तरीके से

287
00:19:39,440 --> 00:19:43,520
हां तो भगवान ये चीज निश्चित करते भगवान ने कहा ना भगवत गीता में कि जो लोग मुझे

288
00:19:43,520 --> 00:19:47,600
मनुष्य के रूप में जानते हैं मैं अपनी योग माया से छिपा रहता हूं तो ये सब कहा

289
00:19:47,600 --> 00:19:52,320
ना उन्होंने यही तो अपन अभी जो शुरुआत में हम कह रहे थे यही तो कह रहे थे भगवान आकर

290
00:19:52,320 --> 00:19:56,480
सभी की सर्व मनोकामनाएं पूर्ण करता है भगवान है ये कैसे सिद्ध होता है पॉइंट

291
00:19:56,480 --> 00:20:00,560
से भटकिए मत सिद्ध कैसे होता है सिद्ध

292
00:20:00,560 --> 00:20:04,640
होता है मतलब वो अचल है अोल है अरे भाई आप उसके फीचर्स बता रहे हो

293
00:20:04,640 --> 00:20:09,360
मैं कह रहा हूं आप सिद्ध कैसे करोगे किसी को भगवान है उसकी

294
00:20:09,360 --> 00:20:13,600
जो सिद्ध मतलब जहां इच्छाएं होती हैं

295
00:20:13,600 --> 00:20:17,760
वहां परमात्मा नहीं होता है। अरे यार जो इच्छा

296
00:20:17,760 --> 00:20:21,840
मात्रम अविद्या होता है। जहां इच्छाएं होती है वहां परमात्मा नहीं होता है। परमात्मा

297
00:20:21,840 --> 00:20:26,720
का स्वरूप होता है। परमात्मा कहता है ये मेरा स्वरूप है। मैं

298
00:20:26,720 --> 00:20:30,720
मैं और मेरा ठीक है मैं समझ गया वो। ब्रह्मा कुमारीज के बारे में

299
00:20:30,720 --> 00:20:34,880
आपको बात करनी नहीं है। अच्छा एक लास्ट वो ये ले लेते हैं। जी ये ईश्वर

300
00:20:34,880 --> 00:20:39,280
है। ये सिद्ध करने के विषय में आप कोई बात कर नहीं रहे हैं। नहीं सिद्ध करने का मतलब परमा

301
00:20:39,280 --> 00:20:43,600
जो चीज है उसको अलग से सिद्ध करना। आप आप समझाओगे

302
00:20:43,600 --> 00:20:47,600
ना किसी को आप समझाओगे ना कि जैसे कि मान लीजिए कि सेब

303
00:20:47,600 --> 00:20:51,600
है। अब अब कोई कहे कि सेब है तो सिद्ध कर। मैंने कहा देखो इसको छू के

304
00:20:51,600 --> 00:20:55,600
देखो छूने से सिद्ध हो रहा है कि नहीं? अच्छा इसको देखो ये आपकी आंखें इसके उस पार देख

305
00:20:55,600 --> 00:20:59,920
रहे इसका। आत्मा को सिद्ध करने का पैरामीटर क्या है? मैं दूंगा पैरामीटर

306
00:20:59,920 --> 00:21:04,000
आप पहले बैठे हो आप बैठे हो जो कुछ भी दिख रहा है

307
00:21:04,000 --> 00:21:07,600
आप इसमें अपने आराध्य को देखो परमात्मा को देखो अरे

308
00:21:07,600 --> 00:21:11,920
भैया परमात्मा को देखूंगा तब ना जब मैं मानूं कि परमात्मा है हां

309
00:21:11,920 --> 00:21:16,240
कैसे मानूं तो जो अनुभव जिसकी आपको आवश्यकता

310
00:21:16,240 --> 00:21:20,480
है जिससे [हंसी] आप खुश हैं संतुष्ट हैं उसमें चलो हटाओ

311
00:21:20,480 --> 00:21:24,560
अब मैं समझ गया इस पर बात करना व्यर्थ था ये और बता दूं मुझे कि

312
00:21:24,560 --> 00:21:29,040
आपके लिए कर्तव्य और अकर्तव्य के विषय में निर्धारित

313
00:21:29,040 --> 00:21:33,280
कहां से होता है कि यही कर्तव्य है मेरा। कर्तव्य का मतलब यह है कि

314
00:21:33,280 --> 00:21:37,440
जो कुछ हम करते हैं इसको क्रिया आपकी क्रिया कहां से निर्धारित

315
00:21:37,440 --> 00:21:41,440
होगा? क्रियाएं अंतिम प्रमाण क्या है? जिसमें आप खोट ना देख सको। जैसे आपने मुरली में भी

316
00:21:41,440 --> 00:21:45,440
खोट देख लिया। अंतिम प्रमाण क्या है? खोट मतलब मतलब जिस

317
00:21:45,440 --> 00:21:50,080
पे आप ये हो ये कह रहा है तो सही होगा। सब कुछ मेरे आराध्य कर रहे हैं।

318
00:21:50,080 --> 00:21:54,320
जो कुछ मैं पूछ रहा हूं प्रमाण आराध्य आपसे बात करते हैं क्या?

319
00:21:54,320 --> 00:21:58,400
हम हम बात करते हैं। मन ही मन बात करते हैं। दिल से

320
00:21:58,400 --> 00:22:02,400
बात करते हैं। आप अपने इरादे से बात करते हैं। वो जो कहते हैं वो आप करते हैं। जी

321
00:22:02,400 --> 00:22:06,480
कंफर्म ना? कंफर्म। अच्छा ठीक। अब इस पे आपको फंसाते हैं। चलिए आपने कहा था ना

322
00:22:06,480 --> 00:22:10,480
कि वो मैं वो क्या कहा था शुरू में आपने कुछ कहा था? कि

323
00:22:10,480 --> 00:22:15,200
वो लोग कुछ हो जाते हैं। मैंने कहा था मैं अभी आपको जो है करूंगा। ठीक। अब ये बताइए

324
00:22:15,200 --> 00:22:19,360
इस संसार में जो लोग बुराई कर रहे हैं, झूठ बोल

325
00:22:19,360 --> 00:22:23,920
रहे हैं। उनका निमित्त कौन है?

326
00:22:23,920 --> 00:22:27,920
कैसे बने वो जो बुराई कर रहे हैं वो निमित्त उनका

327
00:22:27,920 --> 00:22:32,720
निमित्त कौन है किस दृष्टि से परमा हेतु क्या है उनका कैसे कैसे

328
00:22:32,720 --> 00:22:37,120
अस्तित्व में आए वो अगर हम यथार्थ की बात करें हम तो

329
00:22:37,120 --> 00:22:41,280
जो आपको गलत दिखाई दे रहा है हम नेगेटिव पक्ष

330
00:22:41,280 --> 00:22:45,600
दिखाई दे रहा है वो भी सही है वो भी परमात्मा हां यानी कि यानी

331
00:22:45,600 --> 00:22:50,080
कि परमात्मा के ही कारण अच्छाई भी है और बुराई भी है। ना माना आपने

332
00:22:50,080 --> 00:22:54,080
पहले हम गीता में कि गीता में उन्होंने कहा है सत

333
00:22:54,080 --> 00:22:58,160
असत दोनों में हूं कहा है ना असत भी अगर सत्य है जड़ भी

334
00:22:58,160 --> 00:23:02,160
अगर चैतन्य भाषित होता है तो सत्य असत सत्य नहीं है 216 में

335
00:23:02,160 --> 00:23:06,400
कहा है कि असत का कभी भाव नहीं होता और सत का कभी अभाव नहीं होता

336
00:23:06,400 --> 00:23:10,560
असत नहीं है तो दोनों भिन्न नहीं है ना भिन्न क्यों भिन्न क्यों नहीं है

337
00:23:10,560 --> 00:23:14,560
माया अलग है असत और वो जो परमेश्वर अलग है ब्रह्म तो

338
00:23:14,560 --> 00:23:18,880
चलो दोनों को अलग कर दो अगर आप ये भिन्न ये जो अभिनाशाती और अविनाशी

339
00:23:18,880 --> 00:23:22,960
सत और असत ये दोनों जब कंबाइंड होते हैं दोनों का मेल होता

340
00:23:22,960 --> 00:23:27,360
है तभी सृष्टि गतिमान होती है। तो मैं कहां कह रहा हूं कि नहीं होती है। अगर आप

341
00:23:27,360 --> 00:23:31,360
शरीर को अलग-अलग कर दोगे तो मैं नहीं कह रहा मैं नहीं कह रहा। मैं वो नहीं मैं पूछ

342
00:23:31,360 --> 00:23:35,440
रहा हूं कि दुनिया में जो बुराई है उसका मूल कारण कहां से आ रहा है? जब

343
00:23:35,440 --> 00:23:38,960
आपने कहा कि पूरी दुनिया जो है ब्रह्म का ही वो है। सब कुछ भगवान ही

344
00:23:38,960 --> 00:23:42,960
है। एक मिनट जहां से जहां से एक मिनट 1 मिनट मैं अपना मैं अपना

345
00:23:42,960 --> 00:23:47,120
प्रश्न क्लियर कर दूं। आपने अभी कहा था कि सब कुछ भगवान ही अनंत भगवान सब जगह भगवान

346
00:23:47,120 --> 00:23:51,280
है। जो अपना जिसमें ईश्वर देखना चाहे वो देख सकता है। अभी मैं आपसे पूछ रहा हूं।

347
00:23:51,280 --> 00:23:55,680
आपने कहा कि मैं ईश्वर से बातें करता हूं। मेरा धर्म ईश्वर से निर्धारित होता है। ठीक।

348
00:23:55,680 --> 00:23:59,760
अब मैं आपसे ये पूछ रहा हूं कि भैया जो दुनिया में बुराई हो रही है। जो व्यक्ति झूठ

349
00:23:59,760 --> 00:24:04,080
बोल रहा है वो उसके मूल कारण क्या है? मतलब वो कैसे

350
00:24:04,080 --> 00:24:08,400
बोल पा रहा है। हां वो वहां अपने आराध्य को परमात्मा को प्रायोरिटी

351
00:24:08,400 --> 00:24:12,720
ना दे कर के अपने मन को प्रायोरिटी अपनी इच्छाओं को प्रायोरिटी। ठीक है। ठीक है। तो वहां ईश्वर

352
00:24:12,720 --> 00:24:16,720
महा ईश्वर की सत्ता नहीं है क्या? नहीं सत्ता का मतलब विकृत

353
00:24:16,720 --> 00:24:20,720
रूप है। कंट्रोल है कि नहीं? भगवान का वहां विकृत रूप। भगवान चाहे तो रोक सकता है

354
00:24:20,720 --> 00:24:25,680
कि नहीं उसे? इसका मतलब जो झूठ बोल रहा है भगवान की सीमा में है वो।

355
00:24:25,680 --> 00:24:29,840
सब सब कुछ उसी के अंदर घटित हो रहा है। तो भगवान की सीमा में है ना। भगवान चाहे

356
00:24:29,840 --> 00:24:34,000
तो रोक सकता है ना? इसका मतलब भगवान झूठ बोलने दे रहा

357
00:24:34,000 --> 00:24:38,320
है किसी को। नहीं नहीं हम इच्छाएं हैं इच्छाएं

358
00:24:38,320 --> 00:24:42,640
हैं अगर कोई कहता है मैं ऐसा अच्छा अच्छा ये बताइए आपने कहा ईश्वर सर्वशक्तिमान

359
00:24:42,640 --> 00:24:47,760
है वो अबाध्य है जी वो झूठ बोल सकता है कि नहीं कौन ईश्वर

360
00:24:47,760 --> 00:24:51,920
अगर धर्म की रक्षा के लिए मैंने कहा झूठ बोल सकता है कि नहीं धर्म

361
00:24:51,920 --> 00:24:54,000
की रक्षा के लिए वो बोल सकता है बोल सकता है जी

362
00:24:54,000 --> 00:24:58,160
तो हो सकता है अब धर्म की रक्षा के लिए आपको उल्लू बना रहा हो कौन जो आपसे बातें करता

363
00:24:58,160 --> 00:25:02,400
है अगर धर्म की रक्षा के लिए उल्लू बन बनना पड़े या बनाया जाए

364
00:25:02,400 --> 00:25:06,720
यानी कि आप विश्वास से नहीं कहा जा सकता कि वो आपको सही चीज बता रहा है। तो धर्म

365
00:25:06,720 --> 00:25:10,720
अर्थात सही चीज तथ्य तथ्य अरे जो जो झूठ बोल सकता है वो आपसे झूठ नहीं

366
00:25:10,720 --> 00:25:14,720
बोल रहा है। ये कैसे तय किया आपने? देखो धर्म को प्रायोरिटी है। आपको

367
00:25:14,720 --> 00:25:18,720
ये कैसे पता चला कि वो धर्म के लिए नहीं वो धर्म के लिए बोल रहा है आपसे। सत्य और असत्य

368
00:25:18,720 --> 00:25:22,800
का टैग क्यों लगाना है? आपने आपका जो प्रमाण है वो भगवान है ना?

369
00:25:22,800 --> 00:25:26,880
भगवान आपसे बातें करते हैं। वो आपको बताते हैं। सभी सभी आपने भगवान से

370
00:25:26,880 --> 00:25:30,880
बातें। नहीं हम नहीं करते। हमारे लिए वेद अपोरषय ग्रंथ प्रमाण है। हमारे सामने

371
00:25:30,880 --> 00:25:35,200
विष्णु भगवान बुद्ध के रूप में आए। हमने मना कर दिया। उनकी बात को नहीं माना।

372
00:25:35,200 --> 00:25:39,200
भगवान आए थे। तो ग्रंथ क्योंकि ग्रंथों को किसी ने तो लिखा होगा। मैं मैं बता रहा हूं।

373
00:25:39,200 --> 00:25:43,520
मैं बता रहा हूं। मैं बता रहा हूं। क्योंकि भगवान जो हैं वो सत असत

374
00:25:43,520 --> 00:25:47,920
दोनों के नियामक हैं। इसलिए वो हमारे लिए प्राप्तव्य तो हैं। अनुकरणीय

375
00:25:47,920 --> 00:25:52,080
तो हैं। अनुकरणीय नहीं अनुसरणीय तो हैं मगर उतनी हिस्से में जब तक

376
00:25:52,080 --> 00:25:56,160
वो वेद के साथ है। परम प्रमाण वेद है। अब वेद की बात आती है।

377
00:25:56,160 --> 00:26:00,400
वेद क्यों है? ठीक है? मैं बता रहा हूं। आपने अभी सवाल किया है। जी।

378
00:26:00,400 --> 00:26:04,640
वेद इसलिए हैं क्योंकि वेद कभी यह क्लेम नहीं करते कि हमको भगवान

379
00:26:04,640 --> 00:26:08,960
ने लिखा या फलाने मनुष्य ने लिखा। वेद जो है अपौरुषय

380
00:26:08,960 --> 00:26:09,460
हैं।

381
00:26:09,360 --> 00:26:14,080
वो स्वास रूप में वेद जो है प्रकट होते हैं। स्वास रूप क्या है वो समझा देता हूं।

382
00:26:14,080 --> 00:26:18,160
हम दो प्रकार के कार्य करते हैं। ठीक है? एक चाहकर

383
00:26:18,160 --> 00:26:22,240
और एक बिना चाहकर। हम जब हम चाहकर कुछ करते हैं तो

384
00:26:22,240 --> 00:26:26,400
हम यह निर्णय ले सकते हैं कि हमें यह करना है या वो करना है। जैसे

385
00:26:26,400 --> 00:26:30,480
फॉर एग्जांपल मैं आपको बताऊं कि अगर मैं चाहता हूं कुछ

386
00:26:30,480 --> 00:26:34,560
उठाना तो मैं चाहूं तो ये लिफाफा उठाऊं और

387
00:26:34,560 --> 00:26:38,720
या मैं चाहूं तो एक मोबाइल उठाऊं क्योंकि मैं चाहता हूं मेरा इसमें बुद्धि

388
00:26:38,720 --> 00:26:42,800
है। ठीक है। मगर कुछ कार्य हम ऐसे भी करते हैं जिसमें हमारी चाहत नहीं

389
00:26:42,800 --> 00:26:46,800
होती है। वृद्ध उपनिषद में लिखा हुआ है। इच्छा मात्र में अविद्या है। नहीं

390
00:26:46,800 --> 00:26:51,360
जिसमें हमारी इच्छा नहीं होती है। वो हमारे शुद्ध जो जो स्वभाव है ना

391
00:26:51,360 --> 00:26:55,440
एक मिनट भाई भाई साहब एक मिनट भाई साहब एक मिनट मुझे कंप्लीट करने दीजिए तो कुछ कार्य

392
00:26:55,440 --> 00:26:59,760
हम ऐसे भी करते हैं जिस वो इच्छा पूर्वक नहीं होते बुद्धि पूर्वक नहीं होते वो हमारे स्वभाव

393
00:26:59,760 --> 00:27:03,760
के कारण होते हैं नैसर्गिक होता है सुनिए सुनिए सुनिए तो अब जो

394
00:27:03,760 --> 00:27:07,840
है जैसे बच्चा सांस ले रहा है ठीक है तो बच्चा सांस ले रहा है छोटा सा

395
00:27:07,840 --> 00:27:11,840
बच्चा है वो भी सांस ले रहा है उसमें ना तो उसकी कोई बुद्धि है ना कोई इच्छा है वो सांस ले

396
00:27:11,840 --> 00:27:15,920
रहा है इसी प्रकार से जो वेद है भगवान की स्वास के रूप में है भगवान ने

397
00:27:15,920 --> 00:27:19,920
वेद रचे नहीं है इच्छा पूर्वक रचेंगे तो यह आ जाएगा भैया माया भी तो

398
00:27:19,920 --> 00:27:24,000
इन्होंने बनाई संसार भी तो इन्होंने बनाया तो वेद पर विश्वास कैसे करें तो वेद

399
00:27:24,000 --> 00:27:24,500
उन्होंने

400
00:27:24,400 --> 00:27:28,720
रचे नहीं है वेद अपौषय ग्रंथ है किसी ने नहीं रचे मतलब संकल्प किया

401
00:27:28,720 --> 00:27:32,960
संकल्प उठा संकल्प नहीं वो वो स्वास रूप में प्रकट होते हैं भगवान

402
00:27:32,960 --> 00:27:37,040
केत है हां प्रकृति नहीं है प्रकृतिग्रत है मायाकृत

403
00:27:37,040 --> 00:27:41,840
हो जाएंगे प्रकृति होंगे वो अपारुषय ग्रंथ है इसलिए इसलिए

404
00:27:41,840 --> 00:27:45,840
एक मिनट ईश्वरत है एक मिनट ईश्वरत भी नहीं है अपारषयत

405
00:27:45,840 --> 00:27:50,000
है उनका उनका निर्माण करता कोई नहीं है। करता कोई नहीं है। यही तो बात

406
00:27:50,000 --> 00:27:54,000
है। यहीं पे तो हम इस्लाम की धारा को जो है वो करते हैं खंडित। ठीक है? वो

407
00:27:54,000 --> 00:27:58,160
अनाद अब सुनिए अब अब जब भगवान आपसे इच्छा पूर्वक आकर के कुछ बोल

408
00:27:58,160 --> 00:28:02,160
रहे हैं तो भगवान ने तो भस्मासुर को भी उल्लू बनाया था। बनाया था

409
00:28:02,160 --> 00:28:06,480
कि नहीं? भगवान ने जो है खूब सारी ऐसी लीलाएं की है। काल्यावन को जो है मचकुंद

410
00:28:06,480 --> 00:28:10,560
में ले जाकर के मचकुंद महाराज की जी के द्वारा मरवा दिया था। पर भस्मासुर के द्वारा

411
00:28:10,560 --> 00:28:14,880
कोई धर्म की तो स्थापना नहीं हुई थी। तो यह कैसे पता कि आप

412
00:28:14,880 --> 00:28:18,880
कोई गलत भाई जब कोई भगवान का अनुसरण करता है भगवान के

413
00:28:18,880 --> 00:28:22,880
भगवान की शरणागति में आता है तो माया उसको

414
00:28:22,880 --> 00:28:27,040
विक्षिप्त नहीं करती उसको व्यथित नहीं करती माया उसका सुरक्षा कवच

415
00:28:27,040 --> 00:28:31,280
बन जाती है वो माया पति है लेकिन जब कोई मैंपन में आ कर के

416
00:28:31,280 --> 00:28:35,360
अहम भाव में आ कर के संकल्प करता है मैं भी कुछ कर सकता हूं

417
00:28:35,360 --> 00:28:39,360
तो वहां भिन्नता पैदा होती है वहां गलत और सही काम अरे आप ही तो

418
00:28:39,360 --> 00:28:39,860
कर

419
00:28:39,520 --> 00:28:43,600
रहे हैं कि मैं बात कर रहा हूं डायरेक्ट ना वेद को मान रहे हैं ना उसको को मान रहे हैं गीता को परम प्रमाण

420
00:28:43,600 --> 00:28:47,680
आप अपने आप को मान रहे हैं। भाई आपके आपके पास कोई माया रूपी

421
00:28:47,680 --> 00:28:52,160
कोई अरिष्ट शक्ति आकर के बात कर रही है या भगवान ही बात कर रहे हैं।

422
00:28:52,160 --> 00:28:56,160
मैं कैमरे के सामने आपके माध्यम से मैं

423
00:28:56,160 --> 00:29:00,240
इस बात को फिर से स्पष्ट कर देता हूं। मैं जो कुछ हूं

424
00:29:00,240 --> 00:29:04,400
अपने मैं कुछ नहीं हूं। लेकिन जो कुछ हूं अपने आराध्य मैं जो हूं

425
00:29:04,400 --> 00:29:08,400
जैसा हूं। अपने तो आपने अपने आराध्य के बारे में बताया कि

426
00:29:08,400 --> 00:29:12,400
आपके आराध्य भगवान विष्णु है। शंकर है कौन है? हमारे कौन से

427
00:29:12,400 --> 00:29:16,480
शास्त्र में वर्णित है भगवान शिव है और शिव जो है

428
00:29:16,480 --> 00:29:20,880
वो तो शिव ने कहा है क्या शिव ने कहा है क्या कि मेरी बात मानो

429
00:29:20,880 --> 00:29:24,880
ब्रह्मा विष्णु शंकर माता पिता ऐसा है पूरा वृक्ष

430
00:29:24,880 --> 00:29:28,880
आपकी सब कल्पनाएं हैं ये कल्पनाएं नहीं है तो मैं पूछ तो रहा हूं कि भगवान तो झूठ

431
00:29:28,880 --> 00:29:32,880
भी बोल सकते हैं ना तो उनकी बात कैसे मान रहे हो भगवान झूठ देखो भगवान

432
00:29:32,880 --> 00:29:37,120
झूठ बोल सकते हैं देखो अगर कोई कार्य करना होता गीता

433
00:29:37,120 --> 00:29:41,280
में युद्ध हुआ कौरव पांडव के बीच में युद्ध हुआ आपने

434
00:29:41,280 --> 00:29:45,440
चलो कौरव पांडवों के बीच में युद्ध हुआ अर्जुन

435
00:29:45,440 --> 00:29:49,680
जो था जब भगवान की शरणागति में आया तो भगवान ने उसको दिव्य दृष्टि से अपना विराट

436
00:29:49,680 --> 00:29:53,680
रूप दिखाया और कहा जब उसने दिव्य दृष्टि से अपना रूप

437
00:29:53,680 --> 00:29:54,560
दिखाया तो

438
00:29:54,560 --> 00:29:58,800
वहां पे अर्जुन का नष्टो मोह हो गया अर्जुन का अपना कुछ नहीं बचा

439
00:29:58,800 --> 00:30:02,800
फिर अर्जुन ने कहा कि प्रभु आप जैसे कहोगे वैसे हम चलेंगे हर बात में वो

440
00:30:02,800 --> 00:30:07,360
हां जी करता था उसकी अपनी कोई इच्छा नहीं थी फिर उसके बाद

441
00:30:07,360 --> 00:30:11,360
युद्ध में किसी ने देखा कि पांडव ने कौरवों को मारा कौरवों पांडवों को

442
00:30:11,360 --> 00:30:15,360
मारा। क्या हो रहा? पर बरबरीक ने क्या कहा? क्या हो रहा है? हो रहा है क्या? मैं

443
00:30:15,360 --> 00:30:19,520
पूछ रहा हूं कि भगवान जो आपसे आके बात कर रहे हैं आपको कैसे पता

444
00:30:19,520 --> 00:30:23,600
वो आपसे झूठ नहीं बोल रहे? वही तो बता रहा हूं। बरबरीिक क्योंकि आपने मान लिया है

445
00:30:23,600 --> 00:30:28,000
कि भगवान झूठ भी बोल सकते हैं। गीता का एक ही सत्य साक्षी

446
00:30:28,000 --> 00:30:32,160
था। यथार्थ साक्षी था बरबरीक। उसने देखा कि ना

447
00:30:32,160 --> 00:30:36,320
कौरवों ने पांडवों का मारा ना पांडवों ने कौरवों को मारा। पूरे युद्ध में

448
00:30:36,320 --> 00:30:40,560
एक ही सुदर्शन चक्र चल रहा था। क्या बोल रहे हैं भाई साहब? मैंने पूछा है कि जब भगवान

449
00:30:40,560 --> 00:30:44,560
सत्य और असत दोनों के नियामक हैं तो आपको कैसे पता कि वो आपके कान

450
00:30:44,560 --> 00:30:48,720
में आकर के सत्य बोल रहे हैं? तो अगर वो सत्य

451
00:30:48,720 --> 00:30:52,800
ही है असत्य जब सत्य है तो वहां गलत और सही नहीं है। पक्ष विपक्ष है ना

452
00:30:52,800 --> 00:30:57,200
भगवान असत्य भी तो बोल रहे हैं बुद्ध के रूप में आकर के। तो अगर आप जहां

453
00:30:57,200 --> 00:31:01,360
जहां भगवान है वहां शैतान नहीं। जहां शैतान है वहां भगवान नहीं है। अरे मैं कह रहा हूं कि

454
00:31:01,360 --> 00:31:05,360
शैतान को बनाने वाला कौन है? तो शैतान को बनाने कहां से आया?

455
00:31:05,360 --> 00:31:09,520
शैतान को बनाने वाला है। कौन है? खुद मैं मेरापन है

456
00:31:09,520 --> 00:31:10,020
रावण

457
00:31:10,000 --> 00:31:14,320
है भगवान नहीं है अब नियामक भगवान नहीं है नियामक मतलब उसकी

458
00:31:14,320 --> 00:31:18,560
मूल में कौन है शक्ति जब उससे विमुख हो की शक्ति जब शिव से विमुख

459
00:31:18,560 --> 00:31:23,280
हो जाती है तो शिव की इच्छा के बिना हो सकती है प्रत्यक्ष

460
00:31:23,280 --> 00:31:27,360
और अप्रत्यक्ष मैं पूछ रहा हूं शिव जी अगर चाहे तो विपक्ष होती

461
00:31:27,360 --> 00:31:31,600
हुई शक्ति को रोक सकते हैं शिव डायरेक्ट

462
00:31:31,600 --> 00:31:35,680
जब शिव डायरेक्ट हस्तक्षेप करता है इंटरफेयर करता है तो शिव के अकॉर्डिंग सब होता

463
00:31:35,680 --> 00:31:39,840
है और यानी की रोक सकते हैं ना रोक सकते हैं तो फिर नहीं रोक

464
00:31:39,840 --> 00:31:43,920
रहे ना तो इसका मतलब उनकी इच्छा की सीमा में है झूठ बोलना और

465
00:31:43,920 --> 00:31:47,920
जब शिव ठीक है बहुत बातें हो गई वैसे भी आप जो है

466
00:31:47,920 --> 00:31:51,920
पर्टिकुलर ब्रह्मा कुमारीज के पक्ष की ओर से बैठे नहीं हो तो हमारा जो है

467
00:31:51,920 --> 00:31:56,000
आपको समय देना बहुत आवश्यक नहीं है कोई ठीक नहीं है लेकिन बात ये है

468
00:31:56,000 --> 00:32:00,000
बात ये है कि वसुदेव कुटुंबकम की वसुदेव कुटुंबकम पे आप नहीं जा रहे

469
00:32:00,000 --> 00:32:04,000
हो आप जो है कुरान को कह रहे हो कि वो भी धर्म है उसमें लिखा हुआ है कुरान को

470
00:32:04,000 --> 00:32:08,080
धर्म नहीं मान रहे हैं तो क्या कह रहे हो धर्म है आपने क्या दैहिक मान्यताएं हैं।

471
00:32:08,080 --> 00:32:12,160
लेकिन अरे तो भैया आप जब ये आप आत्मा की मान्यता मान रहे

472
00:32:12,160 --> 00:32:16,240
हो तो आत्मा से तो निठारी कह रहा है आप निठारी के

473
00:32:16,240 --> 00:32:20,240
क्यों नहीं करेंगे मीरा के जो कृष्ण थे वो वैदिक है वैदिक है तो सिद्ध करो

474
00:32:20,240 --> 00:32:24,480
फिर मीरा सभी अगर वो काली के मंदिर में जाती थी अगर वो विष्णु के मंदिर

475
00:32:24,480 --> 00:32:25,280
में जाती थी

476
00:32:25,280 --> 00:32:29,680
किसी के भी मंदिर में जाती थी तो वो सिर्फ अपने आराध्य का दर्शन तो हमारे शास्त्रों

477
00:32:29,680 --> 00:32:33,760
में लिखा है ना कि सबका एक ही स्वरूप है एक ही स्वरूप श्री श्री कृष्ण के रूप में अवतरित

478
00:32:33,760 --> 00:32:37,920
हुआ यही तो कह रहे हैं कि हर जगह आप वो चर्च में नहीं गई

479
00:32:37,920 --> 00:32:42,320
थी मीरा चर्च में जाके उसने नहीं कहा श्री कृष्ण चर्च को फिर क्यों क्यों ला रहे हो

480
00:32:42,320 --> 00:32:46,400
देखो तू कहां से आया तो वो आया ना वो हर जगह अपने श्री वो देख तो वैदिक रूप

481
00:32:46,400 --> 00:32:50,480
को रही है ना वो ये तो नहीं कह रही ये जो जीसस क्राइस्ट है ये भी मेरा भगवान

482
00:32:50,480 --> 00:32:54,480
है चलो ठीक है बस बस बंद करो भगवान की दृष्टि से चश्मे को लगाना चाहिए

483
00:32:54,480 --> 00:32:58,720
ना भाई देखो अरे भैया शास्त्र की दृष्टि से चश्मा लगता है वरना कोई निठारी

484
00:32:58,720 --> 00:33:02,720
बन जाएगा क्या करोगे आप वो कहेगा भैया मेरी आत्मा में आके भगवान ने कहा है बच्चे

485
00:33:02,720 --> 00:33:07,200
खाओ वो कहेगा भाई कृष्णपुरी कृष्णपुरी मैं पूछ रहा हूं आपसे निठारी

486
00:33:07,200 --> 00:33:11,200
भिखारी के भगवान ने उससे कहा आ के बच्चे खाओ वो खा रहा है

487
00:33:11,200 --> 00:33:15,280
तो फिर उसका धर्म धर्म है नहीं ठीक है लेकिन कहने का मतलब यह है कल्याण की

488
00:33:15,280 --> 00:33:19,440
बात हो कल्याण की बात ये पता कैसे चला कि ये कल्याण की बात है

489
00:33:19,440 --> 00:33:23,440
मैं पूछ रहा हूं ये पता कैसे चला कि कल्याण मैं पूछ रहा हूं कि ये कल्याण

490
00:33:23,440 --> 00:33:27,760
की बात है पता कैसे चला आपको ये फ़ोर्स जो लगी हुई है ना इधर उधर सुनो

491
00:33:27,760 --> 00:33:31,920
सुनो सुनो ये आर्मी सुनो ये आर्मी और सुन लो

492
00:33:31,920 --> 00:33:35,920
ये आर्मी ये पुलिस फ़ ये जो क्षत्रिय इधर-उधर मरम के रक्षा कर रहे हैं

493
00:33:35,920 --> 00:33:40,000
ना तो आराम से ऐसी चिकनी चुपड़ी बातें आप लोग कर लेते हो वरना अभी दो मिनट के

494
00:33:40,000 --> 00:33:40,500
लिए हट

495
00:33:40,400 --> 00:33:44,400
हट जाए ना कहां है भाला आपका दोनों की आप तो कह रहे हो सब कुछ सही

496
00:33:44,400 --> 00:33:48,560
है आप जब दुनिया में दुनिया में

497
00:33:48,560 --> 00:33:52,640
लड़ाई करवाने वाली बात ही यही है कि व्यक्ति के पास अपने भगवान आएंगे वो कहेंगे

498
00:33:52,640 --> 00:33:56,640
वो कर लो काटने की बात नहीं है ये हाथ आशीर्वाद देता है तो यहां थप्पड़ मारता

499
00:33:56,640 --> 00:34:00,640
है अरे कहां मार रहा है भाई आपने कहा मेरे भगवान आपने कहा मेरे

500
00:34:00,640 --> 00:34:04,880
भगवान आपने कहा आपने क्या कहा

501
00:34:04,880 --> 00:34:09,120
आपने क्या कहा आपने आपने क्या कहा? मेरे भगवान आकर के मुझे बताते

502
00:34:09,120 --> 00:34:13,120
वो मैं करूंगा। अब कोई दूसरा व्यक्ति कह रहा है मेरे भगवान आ के कहते हैं बच्चे

503
00:34:13,120 --> 00:34:17,360
खाओ तो वो खा रहा है। कैसे रोकोगे? जब तक तृतीय

504
00:34:17,360 --> 00:34:21,440
सत्ता नहीं होगी ना धर्म और धर्म के लिए शास्त्र काट रहा हूं। काट ही तो रहे हो

505
00:34:21,440 --> 00:34:25,520
नहीं शास्त्र नहीं मेरा मन। नहीं नहीं मैं नहीं कह रहा हूं। मैंने कहा एक बात आपने

506
00:34:25,520 --> 00:34:29,760
कहा मेरे आराध्य आके बताते हैं। जो आराध्य शास्त्र के विरुद्ध आकर के आपको कान

507
00:34:29,760 --> 00:34:33,920
में कुछ कहेगा वो गलत है। कौन ऐसी कौन सी बात है अब आप बताइए

508
00:34:33,920 --> 00:34:37,920
जिसके पक्ष में मैंने कहा। यही बात है। सबसे बड़ी यही बात

509
00:34:37,920 --> 00:34:42,160
है। वेदों के भी पक्ष में हूं। आपने अंतिम प्रमाण क्या बताया? अंतिम

510
00:34:42,160 --> 00:34:46,240
प्रमाण पूछा मुक्ति ना वो तो प्राप्त अंतिम प्रमाण आपने बोला मेरे आराध्य

511
00:34:46,240 --> 00:34:50,240
मुझसे बात करते हैं। मैंने कहा कंफर्म कर दूं? तब हमने कंफर्म किया। ठीक है

512
00:34:50,240 --> 00:34:56,240
हो गया। जय श्री राम। जय श्री राम भैया। जय श्री राम।

513
00:35:01,260 --> 00:35:05,260
[संगीत]
