1
00:00:03,270 --> 00:00:07,440
[संगीत] ठीक है। अब आते हैं अवतार वाले विषय पर। तो अवतार वाले

2
00:00:07,440 --> 00:00:11,600
विषय में जैसा कि मैंने आपको बता ही दिया है कि हम जैसे मैंने बताया कि अवतार फिट नहीं होता

3
00:00:11,600 --> 00:00:15,840
इसीलिए। ठीक है? अब अवतारवाद की चर्चा हम शुरू करते हैं सबसे पहले।

4
00:00:15,840 --> 00:00:19,840
तो एक तो अब ये करना है कि मैं अवतार मान नहीं रहा हूं। क्योंकि मैं जो ईश्वर की

5
00:00:19,840 --> 00:00:23,920
व्याख्या मान रहा हूं उसके अकॉर्डिंग फिट नहीं हो रहा। आप अवतार मानते हो। आपके अकॉर्डिंग वहां पे फिट हो रहा है। अगर मैं सही

6
00:00:23,920 --> 00:00:28,000
समझ पा रहा हूं तो। मुझे लग रहा है कि स्वरूप में कोई विशेष मतभेद नहीं है। आप क्योंकि

7
00:00:28,000 --> 00:00:32,000
व्यवहारिक वाले को आप स्वीकार कर व्यवहारिक वाले को मैं मैं मान ही रहा हूं। उसमें कोई इशू नहीं

8
00:00:32,000 --> 00:00:36,160
है। आप उसी व्यवहारिक के द्वारा अवतार लेना सिद्ध कर रहे हो। मैं उसी व्यवहारिक के द्वारा

9
00:00:36,160 --> 00:00:40,320
पूछ रहा हूं कि कैसे सिद्ध हो रहा है। मुझे करवा दो मैं मान लूंगा। मेरा इतना ही आग्रह है। ठीक है? अब

10
00:00:40,320 --> 00:00:44,400
उसमें पॉइंट ये है कि अब सिद्ध करना है आपको। अच्छा सिद्ध करने

11
00:00:44,400 --> 00:00:48,400
से पहले जो अवतार सिद्धि का पॉइंट आता है वो करने से पहले मुझे

12
00:00:48,400 --> 00:00:52,400
थोड़ा अवतारवाद की धारणा स्पष्ट कर दीजिए। कि अवतार से मैं समझूं क्या? जिसे आप

13
00:00:52,400 --> 00:00:56,400
सिद्ध करना चाहते हैं। मुझे पता हो कि वो धारणा है क्या? वैष्णव भी है उसी

14
00:00:56,400 --> 00:01:00,560
में बहुत सारे मत मतांतर हैं। सबके अपने-अपने परम शक्ति जिस प्रकार

15
00:01:00,560 --> 00:01:04,720
एक परम शक्ति जो है जीव जगत और जगदीश्वर

16
00:01:04,720 --> 00:01:08,880
बन के प्रकट होती है सृष्टि का निर्माण करती है व्यवहारिक

17
00:01:08,880 --> 00:01:13,760
जगत का निर्माण होता है जिस प्रकार तो वही शक्ति अपने

18
00:01:13,760 --> 00:01:17,920
जो अचिंत शक्ति है उसकी उसके द्वारा अपने आप को मनुष्य की

19
00:01:17,920 --> 00:01:18,420
आंखों

20
00:01:18,320 --> 00:01:22,400
का विषय बनाती है यही उसका अवतार होता है उस शक्ति

21
00:01:22,400 --> 00:01:26,480
का कैसे कर दिया कि मतलब कैसे फॉर एग्जांपल

22
00:01:26,480 --> 00:01:30,560
जैसे कि अ जैसे कि

23
00:01:30,560 --> 00:01:34,560
आपने आजकल एप्लीकेशनेशंस वगैरह देखी होंगी। क्या

24
00:01:34,560 --> 00:01:38,800
कहते हैं ये कंप्यूटर इत्यादि में आती है जो एक्सिस बैंक की होती

25
00:01:38,800 --> 00:01:42,880
है या या फिर ये रेलवे इंक्वायरी की

26
00:01:42,880 --> 00:01:47,360
भी होती है। हेलो आई एम ईला करके आती है। है ना?

27
00:01:47,360 --> 00:01:51,760
तो ये एप्लीकेशन क्या है? ये पूरे जगत में फैली हुई है इंटरनेट के द्वारा।

28
00:01:51,760 --> 00:01:56,080
उसमें जो इंफॉर्मेशन दे रही है ना आपको वो जो जो एक कार्टून

29
00:01:56,080 --> 00:02:00,160
कररेक्टर आता है और आपसे बात करता है वो कररेक्टर तो

30
00:02:00,160 --> 00:02:04,320
वो कहने का तो ये है कि वो केवल कंप्यूटर की किसी एक जगह पे दिखाई दे

31
00:02:04,320 --> 00:02:08,560
रहा है। है ना? मगर वो मगर उसमें वो सारी

32
00:02:08,560 --> 00:02:12,560
क्वालिटीज हैं। वो सारी क्वालिटीज है जो पूरे जगत में है।

33
00:02:12,560 --> 00:02:16,720
मतलब आप उसको कहोगे कि जो इस समय जो इंफॉर्मेशन अमेरिका में हो तो वो वहां पर दे देगी।

34
00:02:16,720 --> 00:02:21,280
मतलब जो भी वो रिलेटेड जो वो सिस्टम जो काम कर सकता है वो सारा काम वो

35
00:02:21,280 --> 00:02:26,320
लीला से कहोगे तो वो कर देगी। यही उस सिस्टम का अवतार है।

36
00:02:26,320 --> 00:02:30,320
यही कैसे होता है? थोड़ा सा इसको यही धारणा जो है ना ये कैसे होता है? इसको थोड़ा

37
00:02:30,320 --> 00:02:33,440
स्पष्ट कर दीजिए। दो तीन मैंने शब्द

38
00:02:33,440 --> 00:02:37,680
सुने हुए हैं आपसे कि एक तो आप बोलते हो कि चीरा

39
00:02:37,680 --> 00:02:41,680
लगा देता है जैसे पर्दे में कुछ दिखता है एक वो बोलते हो। अच्छा एक बार आपने बोला

40
00:02:41,680 --> 00:02:45,840
था कि स्वयं का सृजन कर लेता है। एक बार आपने बोला था शरीर धारण कर लेता है।

41
00:02:45,840 --> 00:02:49,920
तो मुझे थोड़ा स्पष्ट कर दिया कि यह जो आप उसको रूप का विषय कह रहे हो तो

42
00:02:49,920 --> 00:02:54,400
वो रूप का विषय कैसे बन रहा है? क्या उसमें

43
00:02:54,400 --> 00:02:58,400
जैसे वो प्रकृति जैसे जैसे

44
00:02:58,400 --> 00:03:02,960
जैसे वो पृथ्वी सूर्य इत्यादि बनाते समय हम

45
00:03:02,960 --> 00:03:06,960
लोगों के व्यवहार का विषय बनता है ना वहां धक्का लगता है ना मिट्टी

46
00:03:06,960 --> 00:03:10,960
उठाई गई दिखाई नहीं देता लेकिन दिखाई नहीं देता मगर मगर जो

47
00:03:10,960 --> 00:03:15,120
स्पर्श इंद्रिय है इत्यादि का तो विषय बनता है ना वहां क्योंकि जैसे मिट्टी है

48
00:03:15,120 --> 00:03:19,440
मिट्टी के कण चारों ओर फैले हुए अब ये प्रकृति तो फैली हुई है

49
00:03:19,440 --> 00:03:23,920
हम अब प्रकृति खुद से खुद से होती है इकट्ठा

50
00:03:23,920 --> 00:03:28,160
यानी मिट्टी कण खुद से इकटठा होते हैं ईश्वर का धक्का ईश्वर है उसका

51
00:03:28,160 --> 00:03:32,240
अनिमित ईश्वर है तो ईश्वर का धक्का लगा ना हम ठीक

52
00:03:32,240 --> 00:03:36,240
है तो ईश्वर का धक्का लगा तो जैसे ईश्वर धक्के का विषय बन रहा

53
00:03:36,240 --> 00:03:40,800
है ऐसे ही ऐसे ही ईश्वर नेत्रों का विषय बनता है

54
00:03:40,800 --> 00:03:45,520
कैसे बनता है तो कैसे धक्के का विषय कैसे बनता है

55
00:03:45,520 --> 00:03:49,040
अपने बल से बनता है अपने बल से बनता है

56
00:03:49,040 --> 00:03:53,040
हम तो आंखों का विषय कैसे बनता है अपने

57
00:03:53,040 --> 00:03:57,200
बल से आपने कहा ना बल से तो बल से तो यह वस्तु

58
00:03:57,200 --> 00:04:01,360
यहां से यहां जाएगी ना आंखों का विषय कैसे बन रहा है जैसे वहां पर

59
00:04:01,360 --> 00:04:05,360
एक अचिंत शक्ति काम कर रही है कि वो जो है धक्के का विषय नहीं था धक्के

60
00:04:05,360 --> 00:04:09,360
का विषय बन रहा है एक अचिंत शक्ति को आपने माना ठीक है

61
00:04:09,360 --> 00:04:13,360
तो वैसे ही मैं बता रहा हूं कि यहां पे भी अचिंत शक्ति को मान लीजिए अब पॉइंट इसके अंदर

62
00:04:13,360 --> 00:04:17,440
ये आता है कि अभी खाली हम हेतु पे बात ही नहीं कर रहे अभी हम जा रहे हैं इसके ऊपर

63
00:04:17,440 --> 00:04:21,440
किसके धारणा के ऊपर ठीक है अवतारवाद की धारणा क्या है अब धारणा में हमें

64
00:04:21,440 --> 00:04:25,440
यह समझना है कि कोई वस्तु मेरे आंखों का विषय बन रही है।

65
00:04:25,440 --> 00:04:30,160
अगर कोई वस्तु मेरे आंखों का विषय बन रही है अर्थात उसके अंदर रूप गुण है।

66
00:04:30,160 --> 00:04:34,400
रूप गुण है तभी तो आंखों का विषय बन रही है। अच्छा रूप गुण जो हमें

67
00:04:34,400 --> 00:04:38,400
पता है वो तो रूप गुण जिसमें है वो तो प्रकृति में है।

68
00:04:38,400 --> 00:04:42,400
जैसे सारा ब्रह्मांड। ठीक है? प्रकृति से बना हुआ है। इसके अंदर रूप गुण है। हम इसे

69
00:04:42,400 --> 00:04:46,400
आंखों से देख भी पाते हैं। ठीक है? तो पॉइंट ये है कि अब मुझे

70
00:04:46,400 --> 00:04:50,960
थोड़ा सा ये समझा दिया क्योंकि अभी मैं धारणा पे ही हूं। अभी मैं समझ रहा हूं कि अवतारवाद है क्या। ठीक है?

71
00:04:50,960 --> 00:04:55,200
यह जो रूप गुण है, यह ईश्वर के अंदर आप मान रहे हो। निराकार सगुण ईश्वर

72
00:04:55,200 --> 00:04:59,280
के अंदर रूप गुण मान रहे हो। या फिर आप यह कह रहे हो कि ईश्वर क्या

73
00:04:59,280 --> 00:05:03,520
करता है? स्वयं की रचना कर लेता है। स्वयं का सृजन कर लेता है। या फिर आप ये कह रहे हो कि ईश्वर

74
00:05:03,520 --> 00:05:04,400
ये जिस प्रकृति

75
00:05:04,400 --> 00:05:08,400
में रूप गुण है उसी प्रकृति से अपने लिए एक शरीर निर्मित करता है। आप ये कह रहे हो।

76
00:05:08,400 --> 00:05:13,120
क्या कह रहे हो? थोड़ा सा इसको स्पष्ट कर दो आप।

77
00:05:13,120 --> 00:05:17,680
जो परम तत्व है वह ऐसा प्रभाव उत्पन्न करता है

78
00:05:17,680 --> 00:05:21,840
प्रकृति के अंदर एक जगह पर जहां पर आप जो

79
00:05:21,840 --> 00:05:25,840
है प्रकृति की जो बाकी चीजें दिख रही है वो ना दिख के

80
00:05:25,840 --> 00:05:30,000
जहां प्रकृति ना दिखे जहां जो एक तरीके

81
00:05:30,000 --> 00:05:34,240
से जो सत्य का वो परम तत्व है मतलब एक तरीके से वो ऐसा प्रभाव

82
00:05:34,240 --> 00:05:38,560
उत्पन्न करे जिससे कि आपकी आंखें जो उसके आरपार देख सकती है प्रकृति

83
00:05:38,560 --> 00:05:42,560
को वो आरपार ना देख के एक तत्व आपको बीच में टकरा

84
00:05:42,560 --> 00:05:46,800
जाए वहीं से आपको जो है उसके दर्शन प्राप्त हो जाए। तो अगर आप यह कह रहे हो कि प्रकृति जो

85
00:05:46,800 --> 00:05:50,880
सामने है ठीक है? जैसे मेरे सामने वायु है नहीं दिख रहा। मान लो मेरे सामने ऑक्सीजन

86
00:05:50,880 --> 00:05:54,880
है नहीं दिख रहा। मैंने इसको कंडेंस कर दिया लिक्विड में आ गया वो। कंडेंस लिक्विड ऑक्सीजन होता है। वो

87
00:05:54,880 --> 00:05:58,960
मेरे को दिख रहा है। क्या आप ये कह रहे हो कि ईश्वर भी इसी प्रकार से ऐसे सामने होता

88
00:05:58,960 --> 00:06:02,960
है। बिखरा होता है और वो अपने आप को संयोग कर लेता है। कंडेंस कर लेता

89
00:06:02,960 --> 00:06:07,040
है। फिर आंखों का विषय क्या आप ये कह रहे हो? मैं यह कह रहा हूं कि

90
00:06:07,040 --> 00:06:11,360
जो परम सत्य है वह अविद्या के कारण माया

91
00:06:11,360 --> 00:06:16,080
के कारण छिपा हुआ है। अविद्या माया प्रकृति

92
00:06:16,080 --> 00:06:19,920
हां तो ईश्वर एक ईश्वर एक जगह ऐसा

93
00:06:19,920 --> 00:06:23,920
प्रभाव उत्पन्न करता है जहां पे आपकी आंखें प्रकृति को

94
00:06:23,920 --> 00:06:28,240
ना प्रकृति आपकी आंखों के सामने से हट जाती है स्ट्रक्चर में वो ईश्वर का अवतार

95
00:06:28,240 --> 00:06:32,320
होता है। यानी आप यही कह रहे हो। देखो इस चीज को समझो

96
00:06:32,320 --> 00:06:36,320
क्योंकि मैं इस चीज को समझना चाहता हूं रियल में। है ना? यानी मेरे सामने कह रहे हो कि मान लो

97
00:06:36,320 --> 00:06:40,320
धूल मिट्टी उड़ रही है और धूल मिट्टी में से एक बीच में एक कोई गैप ऐसा

98
00:06:40,320 --> 00:06:44,560
कुछ बन गया। मान लो बुध के आकार का कुछ बन गया। तो ये जो बुध के आकार का बन रहा है उसमें भले ही मेरे को आउटलाइन

99
00:06:44,560 --> 00:06:48,560
दिख रही है। आंखें नाक वहां कुछ नहीं दिख रहा। आउटलाइन दिख रही है। तो ये जो बीच में हल्का सा हवा की वजह से

100
00:06:48,560 --> 00:06:52,720
किसी गैप है यही अवतार है। भले उसमें कुछ दिखे ना वो। यही यही

101
00:06:52,720 --> 00:06:56,800
अवतार है परंतु वो इस पर ऐसी कवरिंग करते हैं कि आपको जो

102
00:06:56,800 --> 00:07:00,800
है उसके प्रति वो पूरा वैसा ही मनुष्य रूप वाला चीजें दिखाई दे कवरिंग

103
00:07:00,800 --> 00:07:05,600
किस चीज की होती है वो अपनी माया शक्ति अचिंत शक्ति

104
00:07:05,600 --> 00:07:09,920
नहीं माया का मतलब तो प्रकृति होता है ना पूरी शंकराचार्य का तो वीडियो है इसके ऊपर पूरी शंकराचार्य

105
00:07:09,920 --> 00:07:14,160
ने बोला हुआ है ना इसके ऊपर कि माया का मतलब प्रकृति होता है प्रगति वही जिससे संसार

106
00:07:14,160 --> 00:07:18,560
बना हुआ है ये ब्रह्मांड बना हुआ है अचंत माया का मतलब अचंत शक्ति भी है

107
00:07:18,560 --> 00:07:22,560
ये भी पूरी शंकराचार्य ने बोला है वो है लेकिन लेकिन जब हम उससे किसी

108
00:07:22,560 --> 00:07:26,720
वस्तु का बनना बताते हैं कार्य रूप क्या है? मैं बताऊं आपको बात क्या है? मैं

109
00:07:26,720 --> 00:07:30,800
सरल शब्दों में आपको बताऊं कि कोई व्यक्ति अभी देख रहा है कि मेरे

110
00:07:30,800 --> 00:07:34,880
सामने आसमान है। ठीक है? अब भगवान ने क्या किया? ईश्वर ने क्या

111
00:07:34,880 --> 00:07:35,440
किया?

112
00:07:35,440 --> 00:07:39,760
यहां पे एक क्या कहते हैं? कैरेक्टर बनाया

113
00:07:39,760 --> 00:07:43,920
जो हमारी आंखों का विषय है। उसके पार हम नहीं देख सकते। उस आसमान को नहीं देख सकते।

114
00:07:43,920 --> 00:07:48,000
वो हमारी आंखों के रास्ते में आ रहा है ऑन द वे। ठीक है? वो

115
00:07:48,000 --> 00:07:52,080
उसने अपनी अचिंत शक्ति से बनाया। जैसे उसने पूरा संसार अत्यंत शक्ति से बनाया

116
00:07:52,080 --> 00:07:56,160
ऐसे उसने वो कररेक्टर बनाया। अब उस कैरेक्टर के माध्यम

117
00:07:56,160 --> 00:08:00,160
से वो कररेक्टर वो कररेक्टर जो है जैसे

118
00:08:00,160 --> 00:08:04,400
क्या कहते हैं ये जो श्रवण इंद्री होती है

119
00:08:04,400 --> 00:08:08,480
उसका अभिवंजक होता है ना कान का ये चमड़ा तो ऐसे ही

120
00:08:08,480 --> 00:08:12,480
वो जो कररेक्टर होता है वो इस सर्वशक्तिमान जो व्यापक ईश्वर है उसका

121
00:08:12,480 --> 00:08:16,560
अभिवंजक संस्थान होता है। देखिए इसमें जो

122
00:08:16,560 --> 00:08:21,200
मैं नहीं समझ पा रहा हूं वो क्या है पॉइंट यही है कि

123
00:08:21,200 --> 00:08:25,280
जैसे ईश्वर है। ठीक है? आपने बोला अचिंत शक्ति से बनाया। यह

124
00:08:25,280 --> 00:08:29,360
जो अचिंत शक्ति है यह क्या है? ये संसार का निमित्त

125
00:08:29,360 --> 00:08:33,360
है। ठीक है? जो उपादान है वो क्या है? वो

126
00:08:33,360 --> 00:08:37,520
माया शक्ति है। ठीक है। उपादान

127
00:08:37,520 --> 00:08:41,760
माया शक्ति है और जो जिसे आप अचिंत शक्ति कह रहे हैं वो उसका निमित्त रूप होता है।

128
00:08:41,760 --> 00:08:46,080
ठीक है? अब इसके अंदर पॉइंट क्या आता है? पॉइंट ये आ रहा है कि जिसे

129
00:08:46,080 --> 00:08:50,160
मैं देख रहा हूं जो मेरी आंखों का विषय बन रहा है। ठीक है? लौकिक दृष्टांत अब जैसे

130
00:08:50,160 --> 00:08:50,660
समझिए

131
00:08:50,480 --> 00:08:54,560
इस चीज को कि लौकिक दृष्टांत में मैं तो देखने की वस्तु किसे जानूंगा?

132
00:08:54,560 --> 00:08:58,560
देखने की वस्तु मैं उसे जानूंगा जैसे अगर मैं किसी इंसान को देखने की बात कर रहा हूं या मैं किसी

133
00:08:58,560 --> 00:09:02,560
जानवर को देखने की बात कर रहा हूं। अल्टीमेटली मैं उस जीव को देखने की बात नहीं कर

134
00:09:02,560 --> 00:09:06,800
रहा हूं। मैं उसके शरीर को देखने की बात कर रहा हूं। है ना? मैं ये बोलता हूं कि भाई मैं मैंने शिवश

135
00:09:06,800 --> 00:09:10,800
जी को देखा। ठीक है? मैं अपनी फोटो देख रहा हूं। तो मैं अपनी फोटो में अपने जीव को थोड़ी देख रहा हूं।

136
00:09:10,800 --> 00:09:14,960
मैं तो आंख ना मुंह देख रहा हूं। अगले जन्म में मैं कोई और बनूंगा। मेरे आंख मुंह चेंज हो जाएंगे। है ना?

137
00:09:14,960 --> 00:09:19,040
मैं शरीर को देख रहा हूं। तो जो मैं ईश्वर को देख रहा हूं या अवतार मान

138
00:09:19,040 --> 00:09:23,040
लो अवतार मेरे सामने है। मैं उस अवतार को देख रहा हूं। तो जिस अवतार को मैं देख रहा हूं क्या ये

139
00:09:23,040 --> 00:09:27,280
ऐसा शरीर धारण करता है या क्या है? वो चीज मैं बता रहा हूं।

140
00:09:27,280 --> 00:09:31,680
देखिए ये जो शरीर है ये भौतिक शरीर है सारे सारे के सारे। ठीक है?

141
00:09:31,680 --> 00:09:35,760
वो जो शरीर है वो परम क्योंकि जहां जहां पूरे में आपको जो भौतिकता

142
00:09:35,760 --> 00:09:40,080
दिख रही ना जहां पे भौतिकता नहीं दिख रही वहां आपको क्या दिखेगा?

143
00:09:40,080 --> 00:09:44,240
जहां पर भौतिकता नहीं दिख रही वहां आपको क्या कुछ नहीं जहां भौतिकता

144
00:09:44,240 --> 00:09:48,320
नहीं दिख रही है वहां आपको क्या दिखेगा वहां परम तत्व दिखेगा नहीं

145
00:09:48,320 --> 00:09:52,480
क्यों दिखेगा परम तत्व में कुछ कुछ तब नहीं दिखेगा जब पूरे में ही भौतिकता ना

146
00:09:52,480 --> 00:09:56,640
दिखे मगर जब आसपास बगल में भौतिकता दिख रही होगी तब आपको क्या दिखेगा

147
00:09:56,640 --> 00:10:00,640
जैसे कि हम आकाश को अगर खुले में देखें तो आकाश का कोई

148
00:10:00,640 --> 00:10:04,640
स्ट्रक्चर नहीं दिखेगा हमें परंतु जब हम बंद कमरे से देखेंगे खिड़की

149
00:10:04,640 --> 00:10:05,680
खोल के तो बंद जो

150
00:10:05,680 --> 00:10:09,920
आकाश का एक स्ट्रक्चर दिखेगा चौकोर वो आकाश का अवतार

151
00:10:09,920 --> 00:10:14,080
नहीं दिखेगा दिखेगा ना मैं बताता हूं कैसे नहीं दिखेगा मैं बताता हूं दिखेगा

152
00:10:14,080 --> 00:10:18,080
बताइए आपने जो देखा आपने आकाश का आकार नहीं देखा क्यों क्योंकि आकाश में रूप

153
00:10:18,080 --> 00:10:22,080
गुण है ही नहीं इसको समझिएगा दार्शनिक चर्चा है थोड़ी बहुत दर्शन के टर्मिनोलॉजीस

154
00:10:22,080 --> 00:10:26,080
मैं यूज़ करूंगा आप कोशिश करना अगर आप पूरी शंकराचार्य के शिष्य हो आपको समस्या नहीं होगी इसमें

155
00:10:26,080 --> 00:10:30,160
अब बात आती है कि आकाश में रूप गुण है ही

156
00:10:30,160 --> 00:10:34,240
नहीं ठीक है चाहे मैं उसको टेलीिस्कोप से देखूं माइक्रोस्कोप से देखूं खिड़की से देखूं

157
00:10:34,240 --> 00:10:38,320
बंगले से देखूं कहीं से देखूं उसमें रूप गुण नहीं है वो नहीं दिखाई देगा एक बात ठीक है

158
00:10:38,320 --> 00:10:42,320
अब जो मुझे चौकोर दिख रहा है वो क्या दिख रहा है? वो खिड़की दिख रही है। खिड़की

159
00:10:42,320 --> 00:10:46,400
की आउटलाइन दिख रही है। उस खिड़की की आउटलाइन से जो मैं देख रहा हूं ना वो रियल

160
00:10:46,400 --> 00:10:50,560
में क्या है? वो मेरे को बादल दिख रहा है। वो मेरे को बाहर का स्ट्रक्चर दिख रहा है। है ना? वो

161
00:10:50,560 --> 00:10:54,640
जो मुझे है ना? वो स्पेस वो स्पेस दिख ही नहीं रहा। ये मत बोलिए कि स्पेस दिख रहा है।

162
00:10:54,640 --> 00:10:58,640
स्पेस दिखता ही नहीं है। स्पेस आंखों का विषय नहीं है। जो मुझे दिख रहा है वो क्या दिख रहा

163
00:10:58,640 --> 00:11:02,640
है? वो मुझे क्या दिख रहा है? वो जो लाइट टकरा रही है, रिफ्रेक्शन हो रहा है। वो रिफ्रेक्शन की वजह

164
00:11:02,640 --> 00:11:06,880
से मुझे कलर दिख रहा है। है ना? स्पेस नहीं दिख रहा। आकाश नहीं दिख रहा। क्योंकि

165
00:11:06,880 --> 00:11:11,040
उसमें गुण नहीं है। उसी प्रकार अगर ईश्वर में रूपण नहीं है,

166
00:11:11,040 --> 00:11:15,200
रूप गुण प्रकृति में है। ठीक है? तो इतना ही स्ट्रक्चर बना लो ईश्वर तो फिर भी नहीं दिखेगा

167
00:11:15,200 --> 00:11:19,280
ना। दिखेगा क्या आपको? आपको आपको वो दिखेगा जो आउटलाइन जो आपने प्रकृति से बनाई है। तो वो

168
00:11:19,280 --> 00:11:20,880
जो वो जो है ना वो जो

169
00:11:20,880 --> 00:11:25,120
वो आप तत्व से उसे जो भी माने मगर जहां पे प्रकृति है चारों

170
00:11:25,120 --> 00:11:29,360
ओर और उसमें बीच में एक स्ट्रक्चर से जो हमें दिखाई दे रहा है मनुष्य जैसा वही

171
00:11:29,360 --> 00:11:33,520
ईश्वर का अवतार है। उसको आप उसको क्या है? व्यवहार अब जैसे पृथ्वी भी

172
00:11:33,520 --> 00:11:37,520
वास्तव में तो गोल है मगर हमें चपटी भी दिख रही है और

173
00:11:37,520 --> 00:11:41,520
हमारा व्यवहार भी उसके साथ चपटे जैसा है तो ऐसे ही व्यवहारिक रूप से

174
00:11:41,520 --> 00:11:46,240
जो ये जो हमें आकाश दिख रहा है कि नहीं दिख रहा है वो तात्विक व्याख्या है कि वो रूप रंग

175
00:11:46,240 --> 00:11:50,240
पृथ्वी देता हूं आपको एक एक मिनट एक मिनट एक मिनट

176
00:11:50,240 --> 00:11:54,240
तो जो आप जो खाली स्पेस है ना वो जो जहां से नहीं दिख रहा है

177
00:11:54,240 --> 00:11:58,400
मगर बंद कमरे की खिड़की से जो हमें एक स्ट्रक्चर में वो व्यवहारिक

178
00:11:58,400 --> 00:12:02,480
जो क्या कहते हैं बाहर का आसमान दिख रहा है प्रतीत हो रहा वही ईश्वर का

179
00:12:02,480 --> 00:12:06,640
अवतार है। प्रतीत होना। ईश्वर प्रकट हो गया। ये जो अवतार

180
00:12:06,640 --> 00:12:10,720
दिख रहा है ना आप ये कह सकते हैं कि हां भाई वो क्या कहते हैं वो आकाश नहीं दिख

181
00:12:10,720 --> 00:12:14,800
रहा है क्योंकि आकाश तो है ही ऐसा। मगर जो आकाश को ना आकाश को

182
00:12:14,800 --> 00:12:19,360
देखने में उस बंद कमरे की वजह से जो बाधा आ रही है उसके कारण व्यवहारिक

183
00:12:19,360 --> 00:12:24,160
रूप से जो खिड़की के द्वारा हमें आकाश दिखाई दे रहा है। वही खिड़की

184
00:12:24,160 --> 00:12:28,160
आकाश वो हमें जो है वार्ता व्यवहार में कहना पड़ेगा ना।

185
00:12:28,160 --> 00:12:32,240
मैं अभी आपसे भी कहवा सकता हूं। कई चीजों में व्यवहार

186
00:12:32,240 --> 00:12:36,080
में आप भी कहते हैं। वही मैं कह रहा हूं ना व्यवहारिक सत्य को जो है आप पारमार्थिक सत्य

187
00:12:36,080 --> 00:12:40,080
के आधार पर काटते हैं। आर्य समाज के अभी जैसे अगर आपको जैसे जैसे

188
00:12:40,080 --> 00:12:44,320
जैसे मैं बताऊं जैसे मैं बताऊं जैसे मैं बताऊं जैसे मैं बताऊं मैं आपको उदाहरण

189
00:12:44,320 --> 00:12:49,280
दे रहा हूं ना उदाहरण दे रहा हूं। ये बताइए ईश्वर सर्वव्यापक है।

190
00:12:49,280 --> 00:12:53,360
हम ठीक है। अब ईश्वर सर्वव्यापक है तो इसका मतलब उसका ज्ञान

191
00:12:53,360 --> 00:12:57,440
भी सर्व्यापक है। हां जी। हां जी बिल्कुल। ठीक है। तो फिर वो

192
00:12:57,440 --> 00:13:01,520
किसी देश काल परिस्थिति में क्या उसके अंदर आया?

193
00:13:01,520 --> 00:13:05,920
ऋषि के अंदर ऋषियों के अंदर अंतकरण

194
00:13:05,920 --> 00:13:10,240
दयानंद जी ने तो लिखा कि आया आता है ज्ञान देता है ईश्वर। मगर

195
00:13:10,240 --> 00:13:14,320
वहां पर क्यों कहा कि भैया आता है ज्ञान होता है। ये

196
00:13:14,320 --> 00:13:18,400
क्यों कहा? जब ज्ञान था तो जब ज्ञान से

197
00:13:18,400 --> 00:13:22,560
कोई जगह रिक्त है ही नहीं। तो फिर ज्ञान का आना जाना होना

198
00:13:22,560 --> 00:13:26,640
ये किसी विशेषत्ल की स्थिति में

199
00:13:26,640 --> 00:13:30,720
तो मैं मैं यही तो कह रहा हूं कि मैं यही कह रहा हूं जब

200
00:13:30,720 --> 00:13:34,800
आया के आने आप फिर आप ही बोल रहे हो जब मैं

201
00:13:34,800 --> 00:13:39,120
बोल रहा हूं तो बोलने दो ना मैं मेरा प्रश्न ये है कि जब ज्ञान आया

202
00:13:39,120 --> 00:13:43,360
गया नहीं तो उसके लिए आने जाने वाले शब्दों का व्यवहारिक प्रयोग

203
00:13:43,360 --> 00:13:47,760
क्यों हो रहा है होता है पहली बात तो ग्रंथों में भी होता है

204
00:13:47,760 --> 00:13:51,120
ठीक है मैं बोल देता हूं पहली बात तो ज्ञान होने की बात है ज्ञान के आने

205
00:13:51,120 --> 00:13:56,320
जाने की बात नहीं होती तो आना जाना कैंसिल कर दो अभी मैं पूछ रहा हूं होना

206
00:13:56,320 --> 00:14:00,320
जब वो पहले से ही है तो किसी विशेष देश काल

207
00:14:00,320 --> 00:14:04,560
परिस्थिति में वो हो क्यों रहा है वो तो है व्यक्ति ज्ञान ही होना चाहिए

208
00:14:04,560 --> 00:14:08,720
क्यों हो रहा है

209
00:14:08,720 --> 00:14:12,820
पॉइंट ये नहीं है पॉइंट ये नहीं है पॉइंट मैं समझा देता हूं क्या है पॉइंट

210
00:14:12,820 --> 00:14:17,120
[संगीत] ये है पॉइंट ये है इसके अंदर कि वो

211
00:14:17,120 --> 00:14:21,280
रूप का [संगीत] विषय कैसे बन रहा है बात चली ना अवतार की धारणा के

212
00:14:21,280 --> 00:14:25,360
ऊपर भाई पॉइंट आपने एक पॉइंट बताया पॉइंट ये कि वो क्या कहा

213
00:14:25,360 --> 00:14:29,440
आपने आंखों का विषय कैसे बन सकता है? है ना? [संगीत]

214
00:14:29,440 --> 00:14:33,760
ये कहा ना आपने? जबकि पॉइंट यह है कि क्या हम व्यवहार

215
00:14:33,760 --> 00:14:37,840
में वो तात्विक उसके द्वारा तात्विक परिभाषा के कारण क्या

216
00:14:37,840 --> 00:14:42,160
हमारे व्यवहारिक शब्द दूसरे आते हैं कि नहीं? व्यवहार में उसी को हम दूसरी

217
00:14:42,160 --> 00:14:47,040
चीजें बोलते हैं कि नहीं। जैसे कि मैंने फिर वहां पर उदाहरण दिया। जैसे कि ज्ञान पहले

218
00:14:47,040 --> 00:14:52,160
मैं इसको आगे बढ़ाओ। इसको आगे बढ़ाओ। आप रुको।

219
00:14:52,160 --> 00:14:56,240
जो अवतार दिख रहा है ना आप ये कह सकते हैं कि हां भाई वो क्या कहते है आकाश नहीं दिख रहा है क्योंकि आकाश तो यही

220
00:14:56,240 --> 00:15:00,240
है ऐसा मगर जो आकाश को ना आकाश को देखने में उस बंद कमरे की वजह से जो बाधा आ रही है

221
00:15:00,240 --> 00:15:04,400
उसके कारण व्यवहारिक रूप से जो खिड़की के द्वारा हमें आकाश दिखाई दे रहा है वही खिड़की

222
00:15:04,400 --> 00:15:09,440
आकाश वो हमें जो है वार्ता व्यवहार में ये कहना पड़ेगा ना मैं अभी आपसे भी कहवा

223
00:15:09,440 --> 00:15:13,520
मैं इसको आगे बढ़ाओ इसको आगे बढ़ाओ आप रुको अभी आपसे भी कहवा मैं इसको आगे

224
00:15:13,520 --> 00:15:17,520
बढ़ाओ इसको आगे बढ़ाओ रुको अभी आपसे भी कहवाई बंद करो समझ गया मैं इसको आगे बढ़ाओ

225
00:15:17,520 --> 00:15:21,120
इसको आगे बढ़ाओ आप रुको

226
00:15:21,120 --> 00:15:25,440
पीछे खुल गया तो आप आप हेडलाइन बदल के उत्तर दे रहे हो ना [संगीत] पॉइंट

227
00:15:25,440 --> 00:15:29,440
यहां पे कहां अटक रहा है पॉइंट इस अटक रहा है अभी हमारी बात इस पे चल रही है कि अवतारवाद

228
00:15:29,440 --> 00:15:34,880
की धारणा क्या है फिर आप फिर आप चेंज कर रहे हो

229
00:15:34,880 --> 00:15:39,040
उस धारणा उस विषय के अंतर्गत बात करतेकरते हम एक जगह

230
00:15:39,040 --> 00:15:43,760
आकर के अटके हैं मैं आगे हूं मेरे को सुन लो मैं आगे

231
00:15:43,760 --> 00:15:48,400
हूं मेरे को सुन लो मैं आगे हूं मेरे को सुन लो

232
00:15:48,400 --> 00:15:53,120
आगे हां चलिए चलिए बताइए

233
00:15:53,120 --> 00:15:57,280
सेकंड जो मैं समझ पा रहा हूं सेकंड ये आ जाता है कि ईश्वर क्या करता है शरीर धारण

234
00:15:57,280 --> 00:16:01,440
करता है ठीक है जैसे जीव शरीर धारण करता है एक वीडियो में आपने एक लाइव में बोला भी था

235
00:16:01,440 --> 00:16:05,840
एक लाइव में आपने मेरे से बोला भी था कि भाई अगर जीव शरीर धारण कर सकता है तो ईश्वर सर्वशक्तिमान

236
00:16:05,840 --> 00:16:09,920
होकर के शरीर धारण क्यों नहीं कर सकता एक लाइव में आपने ये बात बोला भी था जो आपके सर्वसक्तिमान वाले चैनल पे

237
00:16:09,920 --> 00:16:14,640
डाला हुआ है ना अच्छा और जो गीता से आप प्रमाण देते हो कि सजाम्यामी

238
00:16:14,640 --> 00:16:18,640
जो मैं अपने आप का सृजन करता हूं। ठीक है? तो उसमें पॉइंट कि अगर अपने आप पे सृजन

239
00:16:18,640 --> 00:16:22,640
करेगा तो उसमें फंस जाओगे। भाई जो जिसका सृजन जो सृजित अभी-अभी बना

240
00:16:22,640 --> 00:16:26,720
है यानी बनने से पूर्व नहीं था। तो जो सृजित शरीर हुआ निराकार

241
00:16:26,720 --> 00:16:30,880
रूप में था साकार रूप में सृजित हुआ है। नया नया खुद को बनाया है। तो फिर वो अनादि स्वरूप नहीं रहेगा तो अनादि

242
00:16:30,880 --> 00:16:34,960
नहीं रहा तो अनंत भी नहीं रहा। अनंत नहीं रहा तो फिर नित्य नहीं रहा तो नित्य स्वरूप नहीं। ईश्वर का

243
00:16:34,960 --> 00:16:38,960
स्वरूप नहीं है। ईश्वर क्यों बोल रहे हो? कुर्सी बोल दो उसे। कुर्सी बोलते हो ना अभी बनी है।

244
00:16:38,960 --> 00:16:43,040
नष्ट हो जाएगी कल परसों। तो उसमें उसमें नित्य वाला भी दे दूर। नित्य वाला

245
00:16:43,040 --> 00:16:47,200
उत्तर दे दू मैं मैं पूरा कर देता हूं। ईश्वर का आभास हो रहा है।

246
00:16:47,200 --> 00:16:50,080
ईश्वर का आभास हो रहा है। सीधे ईश्वर को ही नहीं देख रहे हैं। ये

247
00:16:50,080 --> 00:16:54,160
कह सकते हैं। जैसे जैसे जीव वाले में हो रहा है। हां। जैसे जीव में हो रहा है।

248
00:16:54,160 --> 00:16:58,160
जैसे आसमान में हो रहा है। जैसे सब में हो रहा है। जैसे जीव निराकार है ना? जैसे

249
00:16:58,160 --> 00:17:02,160
जीव आप निराकार हो। जीव आप जीव हो। जीव निराकार है। ठीक है? तो मैं

250
00:17:02,160 --> 00:17:06,320
हां भाई आपका रूप नहीं है। मैं कैसे देखूंगा? मैं आपको देख रहा हूं यानी आपके शरीर को देख रहा हूं।

251
00:17:06,320 --> 00:17:10,400
उस जो अवतार की इस धारणा को जो मैंने समझा है। जैसे एग्जांपल

252
00:17:10,400 --> 00:17:14,480
कहते हैं रामकृष्ण अवतार है। तो मैंने रामकृष्ण में क्या देखा? भाई रामकृष्ण का शरीर

253
00:17:14,480 --> 00:17:20,480
देखा जैसे रामायण में रामायण में वर्ण

254
00:17:20,480 --> 00:17:24,560
सब लिखा हुआ है ना जीव और ईश्वर के रूप में केवल इतना अंतर

255
00:17:24,560 --> 00:17:28,720
है कि जीव जो है अविद्या से ढका

256
00:17:28,720 --> 00:17:33,040
हुआ शरीर है और जो ईश्वर है वो अविद्या से हटा मगर

257
00:17:33,040 --> 00:17:37,040
माया के संयोग के बिना कोई नहीं बना है माया

258
00:17:37,040 --> 00:17:41,040
के माया के संयोग के बिना वो नहीं बना है

259
00:17:41,040 --> 00:17:45,280
माया के संयोग से ही वो भी बना क्योंकि अगर अगल-बगल माया नहीं होगी

260
00:17:45,280 --> 00:17:49,440
तो हमें उसका स्ट्रक्चर नहीं दिखेगा। समझ रहे हैं ना? यानी माया

261
00:17:49,440 --> 00:17:53,520
इक्व प्रकृति। प्रकृति नहीं होगी तो स्ट्रक्चर नहीं दिखेगा। जो दिख रही है

262
00:17:53,520 --> 00:17:57,520
वो माया है। है ना? यानी यानी अगर हम इसे सामान्य

263
00:17:57,520 --> 00:18:01,520
भाषा में बोले इसे ज्यादा कॉम्प्लेक्स ना बनाए। ठीक है? अल्टीमेटली कहने

264
00:18:01,520 --> 00:18:05,120
का अर्थ ये है कि जैसे जीव शरीर धारण करता है वैसे ईश्वर भी शरीर

265
00:18:05,120 --> 00:18:09,120
धारण करता है। उसी को अवतार बोलते हैं। बस इतना है कि वो

266
00:18:09,120 --> 00:18:13,360
माया से बद्ध है। जीव और वो माया से मुक्त है। जो

267
00:18:13,360 --> 00:18:15,360
ईश्वर का अवतार है।

268
00:18:15,360 --> 00:18:19,440
जो ईश्वर का अवतार है वो माया से मुक्त है। जी। ठीक है। ये

269
00:18:19,440 --> 00:18:23,600
एक नोटिसबल। यानी अभी हमारे पास में ये बहुत ही चलिए। इतनी

270
00:18:23,600 --> 00:18:27,600
बातचीत होते इतनी क्लेरिटी स्पष्ट हो चुकी है अवतारवाद में। कि अवतारवाद की धारणा

271
00:18:27,600 --> 00:18:31,600
क्या धारणा ये है कि भैया जैसे जीव धारण कर रहा है तो वो कर्मों के बंधन से

272
00:18:31,600 --> 00:18:35,600
कर रहा है। ठीक है? और वो अविद्या ग्रस्त है। जीव अविद्या ग्रस्त है। जो ईश्वर है

273
00:18:35,600 --> 00:18:39,760
वो अविद्या गग्रस्त है। जीव जो है जीव अपने मन से नहीं कर रहा है। जीव जो है

274
00:18:39,760 --> 00:18:43,920
बद्ध है इसलिए हो रहा है उसका और उसका कंट्रोलर कोई और है और जो

275
00:18:43,920 --> 00:18:48,160
ईश्वर है वो स्वयं से कर रहा है। स्वयं से कर रहा है। ठीक। बहुत बढ़िया बात।

276
00:18:48,160 --> 00:18:52,240
तो यानी इतना स्पष्ट है कि वो भी शरीर धारण करता है। चलिए ठीक है। अब अवतारवाद की धारणा पे हम

277
00:18:52,240 --> 00:18:58,240
आ चुके हैं।

278
00:19:01,020 --> 00:19:05,020
[संगीत]
