1
00:00:07,680 --> 00:00:11,680
तो सभी को जय श्री राम।

2
00:00:11,680 --> 00:00:15,840
एक चर्चा हुई है हाल ही में नास्तिक और

3
00:00:15,840 --> 00:00:20,000
आस्तिक के बीच में। हालांकि वह अगर वैदिक दृष्टि

4
00:00:20,000 --> 00:00:24,240
से देखें, सनातन की दृष्टि से देखें तो जो आस्तिकता के पक्ष में खड़े हैं

5
00:00:24,240 --> 00:00:28,320
और तार्किकता की दृष्टि से भी जो हम आगे बात करेंगे तो उनकी

6
00:00:28,320 --> 00:00:33,040
भी आस्तिकता सिद्ध नहीं होती। अ

7
00:00:33,040 --> 00:00:37,200
लल्लन टॉप पर ये चर्चा हुई है। एक मुफ्ती हैं उनके और जावेद अख्तर

8
00:00:37,200 --> 00:00:42,640
के बीच में। अच्छा चर्चा को लेकर के

9
00:00:42,640 --> 00:00:46,880
चर्चा को लेकर के मेरे पास कई सारे फोन कॉल्स आए और मैसेजेस

10
00:00:46,880 --> 00:00:50,960
आए मुझे। कई प्रबुद्ध जनों ने मुझसे संपर्क किया

11
00:00:50,960 --> 00:00:55,040
और कई समर्थकों ने प्रशंसकों ने भी कहा कि आप इस पर अवश्य

12
00:00:55,040 --> 00:00:59,120
अपनी समीक्षा भी प्रस्तुत करें। तो उसी

13
00:00:59,120 --> 00:01:03,280
के लिए वीडियो बनाया जा रहा है। हो सकता है वीडियो थोड़ा लंबा हो जाए तो हो सकता है दो भाग में हम

14
00:01:03,280 --> 00:01:07,360
इसको डालें और अगर ज्यादा लंबा नहीं लगा या फिर सहजता

15
00:01:07,360 --> 00:01:11,600
रही तो एक ही भाग में पूरा वीडियो डाल देंगे। सबसे

16
00:01:11,600 --> 00:01:15,920
पहली बात तो मैं बधाई से शुरू करूंगा क्योंकि आस्तिकता

17
00:01:15,920 --> 00:01:19,920
के पक्ष से भले ही जो मुफ्ती थे

18
00:01:19,920 --> 00:01:23,040
जो खड़े थे उन्होंने कम से कम आस्तिकता

19
00:01:23,040 --> 00:01:27,040
का झंडा वहां पर तो झुकने नहीं दिया और जब भी कभी नास्तिक

20
00:01:27,040 --> 00:01:31,040
और आस्तिक के बीच के भेद की बात आएगी तो हम वहां पर आस्तिक

21
00:01:31,040 --> 00:01:35,040
के समक्ष आस्तिक के पक्ष में ही हमें खड़े होना होगा

22
00:01:35,040 --> 00:01:39,600
क्योंकि कम से कम नास्तिकता के कंपैरेटिवली

23
00:01:39,600 --> 00:01:43,760
जो अह जिसका ईश्वर ईश्वर सिद्ध नहीं होता है

24
00:01:43,760 --> 00:01:47,840
या फिर जो किसी भी प्रकार से एक तृतीय सत्ता को स्वीकार

25
00:01:47,840 --> 00:01:51,840
करता है। है ना कि कि भाई क्या करना

26
00:01:51,840 --> 00:01:56,000
है और क्या नहीं करना है। इस संबंध में थोड़ा बहुत भी जितना भी वह

27
00:01:56,000 --> 00:02:00,000
स्वीकार करता है कि कोई है हमारे ऊपर भी जो हमें यह बताए

28
00:02:00,000 --> 00:02:04,400
कि सही क्या है और गलत क्या है तो उस स्थिति में हमें नास्तिकता

29
00:02:04,400 --> 00:02:08,640
के नास्तिकता से जब भी बात हो रही होती है तो हमें आस्तिकता के

30
00:02:08,640 --> 00:02:12,640
साथ में ही खड़े खड़े होना होता है। तो सबसे पहले

31
00:02:12,640 --> 00:02:16,640
मैं बधाई दूंगा कि वहां पर उन्होंने जो आस्तिकता का ध्वज था वह झुकने नहीं दिया।

32
00:02:16,640 --> 00:02:20,800
कई मामलों में अह जो है जो जावेद अख्तर जी

33
00:02:20,800 --> 00:02:24,880
थे नास्तिक पक्ष से उनका जो है मोरल डाउन होता हुआ

34
00:02:24,880 --> 00:02:28,960
दिखा और उनके तर्क भी वीक दिख रहे थे

35
00:02:28,960 --> 00:02:33,040
कई जगहों पर। अच्छा इस क्रम में आगे

36
00:02:33,040 --> 00:02:37,760
बढ़ने से पहले मैं यह बात भी बोल दूं कि यह चर्चा मुझे जो है सुनियोजित

37
00:02:37,760 --> 00:02:39,120
ढंग से

38
00:02:39,120 --> 00:02:43,120
पक्षपाती चर्चा भी मतलब आयोजन ये जो था वो पक्षपात विहीन

39
00:02:43,120 --> 00:02:47,120
नहीं था। पक्षपाती आयोजन था। क्यों था?

40
00:02:47,120 --> 00:02:51,280
क्योंकि जब आप अह आस्तिकता के पक्ष से

41
00:02:51,280 --> 00:02:55,360
या इस्लाम के पक्ष से किसी पक्षकार को आप लेकर के आ रहे हैं तो

42
00:02:55,360 --> 00:02:59,360
वह अपने यहां का मर्मज्ञ है। ऐसा नहीं है कि वहां के

43
00:02:59,360 --> 00:03:03,920
किसी आप बस जो जुम्मे की नमाज पढ़ता है उसको ले आए या जो मदरसा

44
00:03:03,920 --> 00:03:07,920
जाता है उसको ले आए आप। ऐसा नहीं है। आप वहां के किसी मर्मज्ञ को

45
00:03:07,920 --> 00:03:12,080
पकड़ के लाए इस सेगमेंट के जो इस्लाम को मानने वाले हैं। यानी

46
00:03:12,080 --> 00:03:16,320
कि इस्लाम को ईश्वर को मानने वाले हैं। हालांकि व्यापक दृष्टि

47
00:03:16,320 --> 00:03:20,960
से देखेंगे तो वो वहां पर मर्मज्ञ भी सिद्ध नहीं होंगे। मगर

48
00:03:20,960 --> 00:03:25,040
जब नास्तिक और आस्तिक की दृष्टि से देखेंगे तो आस्तिकता में जिस

49
00:03:25,040 --> 00:03:29,280
तंत्र से वो जुड़े हुए हैं अपने तंत्र के मर्मज्ञ हैं। ठीक है? वहीं

50
00:03:29,280 --> 00:03:33,360
पर दूसरी ओर क्या दिखाया? क्या देख रहे हैं हम लोग? कि जावेद

51
00:03:33,360 --> 00:03:37,600
अख्तर जी जो हैं वह एक सामान्य नास्तिक हैं। कोई उन्होंने

52
00:03:37,600 --> 00:03:41,600
उसमें मर्मज्ञता प्राप्त नहीं की है। जिनके जिन्होंने कोई

53
00:03:41,600 --> 00:03:45,840
अपने दार्शनिक विचार दिए हो समाज को और समाज

54
00:03:45,840 --> 00:03:49,840
जिससे प्रभावित होकर उनको फॉलो कर रहा हो। जावेद अख्तर जी मर्मज्ञ

55
00:03:49,840 --> 00:03:54,080
हैं। गीतकार हैं। गीत लिखते हैं। जो उनका लेखन

56
00:03:54,080 --> 00:03:54,580
है

57
00:03:54,240 --> 00:03:58,400
जो जो भी कह लें कवि हैं या जो भी उनको कह दिया जाए

58
00:03:58,400 --> 00:04:02,400
साहित्यिक दृष्टि से तो उनकी पहचान वो है। वो

59
00:04:02,400 --> 00:04:06,800
गीत लिखने के मर्मज्ञ हैं और संभवत

60
00:04:06,800 --> 00:04:11,520
अगर ये गीत लिखने की प्रतियोगिता होती तो उसमें पल्ला

61
00:04:11,520 --> 00:04:15,760
किसका भारी रहता? जावेद अख्तर जी का। परंतु क्योंकि

62
00:04:15,760 --> 00:04:20,560
यह नास्तिक और आस्तिक मतलब एक दार्शनिक

63
00:04:20,560 --> 00:04:24,560
विषय पर चर्चा हो रही थी तो दार्शनिकता के मामले में कोई उनका ऐसा

64
00:04:24,560 --> 00:04:28,560
कोई ठोस बैकग्राउंड मुझे नहीं मिला है जावेद अख्तर जी का

65
00:04:28,560 --> 00:04:32,720
तो पहली बात तो यह है कि एक ओर से आप इस्लाम की तरफ से

66
00:04:32,720 --> 00:04:37,040
ला रहे हो एक मर्मज्ञ व्यक्ति को और दूसरी ओर से ला रहे हो एक

67
00:04:37,040 --> 00:04:41,600
नॉर्मल व्यक्ति को एक सामान्य फॉलोअर को नास्तिकता का फॉलोअर यही कहेंगे उसे

68
00:04:41,600 --> 00:04:45,600
तो उसको आप लेकर के आ रहे हो तो पहली बात तो यह दूसरी बात कुछ वहां पर यह

69
00:04:45,600 --> 00:04:50,800
भी रहा। खैर यह बहुत ज्यादा मायने नहीं रखता कि

70
00:04:50,800 --> 00:04:54,880
जो जावेद अख्तर जी थे वृद्ध होने के कारण या किसी किसी भी कारण

71
00:04:54,880 --> 00:04:59,120
से जो बात करने का तरीका था जावेद अख्तर जी के

72
00:04:59,120 --> 00:05:03,440
पास जो है एनर्जी कम दिख रही थी। एनर्जी नहीं थी उनकी। कहीं-कहीं

73
00:05:03,440 --> 00:05:07,600
पे उनके हाथ भी कांप रहे थे। अब वो हो सकता है मोरल डाउन होने की वजह से कांपने लगते हैं। जब

74
00:05:07,600 --> 00:05:09,440
व्यक्ति को असहज

75
00:05:09,440 --> 00:05:13,440
स्थिति महसूस होने लगती है तब भी ऐसा होता है। तो उस उस पर तो बहुत ज्यादा

76
00:05:13,440 --> 00:05:18,960
बात नहीं करेंगे। इसके बाद फिर और ज्यादा ये पक्षपाती चर्चा कैसे दिख रही है

77
00:05:18,960 --> 00:05:23,200
कि चर्चा में मुफ्ती जी की

78
00:05:23,200 --> 00:05:27,360
ओर से एक पक्ष रखा गया था। वो क्या पक्ष

79
00:05:27,360 --> 00:05:29,760
था कि

80
00:05:29,760 --> 00:05:34,240
जो भी चीज किसी और पर निर्भर है। है ना? मतलब

81
00:05:34,240 --> 00:05:38,800
वो कार्य कारण वाला कि दुनिया में जो भी कुछ हो रहा है उसका एक मूल कारण है।

82
00:05:38,800 --> 00:05:42,880
तो जब उन्होंने पक्ष रखा था तो

83
00:05:42,880 --> 00:05:47,360
यह जो थ्योरी है इसको क्या नाम दिया था उन्होंने?

84
00:05:47,360 --> 00:05:51,360
कंटेंजेंसी थ्योरी है ना कुछ ऐसा ही शब्द था। मेरा अभी बहुत आंग्ल भाषा

85
00:05:51,360 --> 00:05:55,440
में बहुत अच्छी पकड़ नहीं है। तो आप लोग उसको इग्नोर करिएगा। ऐसी कोई त्रुटि हो जाए

86
00:05:55,440 --> 00:05:59,440
शब्द के उच्चारण में तो उन्होंने जब यह

87
00:05:59,440 --> 00:06:03,680
थ्योरी दी थी तो लल्लन टॉप इस थ्योरी को लेकर के

88
00:06:03,680 --> 00:06:07,760
यह फैला रहे हैं कि जो थ्योरी है यह ग्रीक से आई है। यह फला

89
00:06:07,760 --> 00:06:11,920
से आई है। वहां से आई है। मगर यह नहीं बता रहे कि भैया सनातन धर्म ग्रंथों

90
00:06:11,920 --> 00:06:16,320
में भी ये थ्योरी दी गई है। क्यों नहीं बता रहे? भाई चलो सनातन

91
00:06:16,320 --> 00:06:20,320
धर्म ग्रंथों में नहीं बता रहे। तो सनातन के इतने सारे विचारक हैं जिन्होंने आदि

92
00:06:20,320 --> 00:06:25,120
शंकराचार्य जी से लेकर रामानुजाचार्य जी से लेकर के मधवाचार्य जी अपने

93
00:06:25,120 --> 00:06:29,840
ग्रंथों में कहीं ना कहीं इस थ्योरी को दिया है। हम

94
00:06:29,840 --> 00:06:34,160
मगर उसको आप प्रेजेंट ना करके और उनके कई सालों

95
00:06:34,160 --> 00:06:38,320
के बाद आने वाले लोगों के नाम उल्लेख मिला रहे हैं। तो जाहिर सी बात है इसमें

96
00:06:38,320 --> 00:06:42,800
वो जो जेएनयू जेएनयू का जो एजेंडा है और जो एक नास्तिकवादिता

97
00:06:42,800 --> 00:06:46,800
है या फिर धर्म से दूर ले जाने वाली बात है या

98
00:06:46,800 --> 00:06:51,200
फिर वो सेकुलर जो विचारधारा है तथाकथित सो कॉल्ड तो उसको पोषित

99
00:06:51,200 --> 00:06:56,400
करने के लिए किया जा रहा है और इस्लाम को ग्लोरिफाई करके

100
00:06:56,400 --> 00:07:00,720
करने के लिए किया जा रहा है कि एक पक्ष का व्यक्ति मजबूत वाला लाए मर्मज्ञ

101
00:07:00,720 --> 00:07:04,720
और एक पक्ष का जो हल्का और फिर बाद में आप जो उस थ्योरी को जिस

102
00:07:04,720 --> 00:07:07,920
थ्योरी के कारण जो है उसमें

103
00:07:07,920 --> 00:07:12,000
जो जीत दिखाई दे रही है आस्तिकता के पक्ष की तो उस थ्योरी से भी आप अन्यों को

104
00:07:12,000 --> 00:07:16,240
जोड़ रहे हो। आप वहां पर सत्यता नहीं बता रहे हो कि जिन लोगों का आपने नाम लिया

105
00:07:16,240 --> 00:07:20,240
उनसे कई वर्ष पूर्व का इतिहास मिलता है। वो इतिहास

106
00:07:20,240 --> 00:07:24,320
जिसको जो सामान्य जो आधुनिक विज्ञान है उसने भी

107
00:07:24,320 --> 00:07:29,040
स्वीकार किया है। वेद इत्यादि वेद जो वेद हैं ऋग्वेद हैं

108
00:07:29,040 --> 00:07:33,040
उनको यूनेस्को द्वारा प्रमाणित किया गया है कि वह जो

109
00:07:33,040 --> 00:07:37,280
है ईसा से भी अह करीब

110
00:07:37,280 --> 00:07:40,160
1500 1800 वर्ष पूर्व की उनकी लिपि मिली

111
00:07:40,160 --> 00:07:44,240
है अस्तलिपि तो ये सब बातों बातें जो ये दिखा रही प्रस्तुत

112
00:07:44,240 --> 00:07:48,320
कर रही हैं कि चर्चा सुनियोजित ढंग से एक पर्टिकुलर एक

113
00:07:48,320 --> 00:07:52,320
सेक्ट को या इस्लाम को कहें उसको ग्लोरिफाई करने के

114
00:07:52,320 --> 00:07:56,400
लिए कि एक एक चीज इसमें और आती है कि जावेद अख्तर

115
00:07:56,400 --> 00:08:00,800
जी ने बार-बार जब यह कहा कि भाई अगर ईश्वर है तो बुरा क्यों हो रहा है

116
00:08:00,800 --> 00:08:04,880
दुनिया में हम तो जो बुरा हो रहा है गाजा में तो

117
00:08:04,880 --> 00:08:09,440
उसके उदाहरण के लिए उन्होंने गाजा का उदाहरण दिया तो यह भी एक

118
00:08:09,440 --> 00:08:13,760
वो वाली चीज है कि सिंपैथी जब हासिल करनी है तो किसके लिए आप हासिल

119
00:08:13,760 --> 00:08:19,120
कर रहे हो जावेद अख्तर जी को बांग्लादेश में जो दीपपूस

120
00:08:19,120 --> 00:08:23,120
मारा जा रहा है जलाया जा रहा है त्रिपुरा में स्त्रियों को नग्न

121
00:08:23,120 --> 00:08:27,520
किया जा रहा है और भी बहुत सी चीजें हो रही हैं हमारे आसपास नजदीक

122
00:08:27,520 --> 00:08:31,920
वह नहीं आपको दिखाई दे रहा है या फिर कश्मीरी पंडित

123
00:08:31,920 --> 00:08:36,000
मारे जा रहे हैं लोग हैं उसमें वो सब आपको नहीं दिखाई दे रहा है आपको गाजा

124
00:08:36,000 --> 00:08:40,160
ही दिखाई दे रहा है तो एनी हाउ चाहे नास्तिकता

125
00:08:40,160 --> 00:08:45,200
की ओर से चाहे आस्तिकता की ओर से टू द पॉइंट एक सेंटर एक

126
00:08:45,200 --> 00:08:49,200
इस्लाम मतलब इस्लाम को ग्लोरिफाई करने के सेंट्रिक ये जो

127
00:08:49,200 --> 00:08:53,360
है चर्चा पूरी दिखाई देती है। वह बात और है कि

128
00:08:53,360 --> 00:08:56,720
इस चीज का ध्यान रखा गया कि भाई

129
00:08:56,720 --> 00:09:00,720
पर्टिकुलर किसी एक अगर आप कहेंगे उसको रिलीजन

130
00:09:00,720 --> 00:09:04,960
मजहब क्योंकि धर्म तो वो सिद्ध नहीं होता है तो आपके हिसाब से रिलीजन या मजहब

131
00:09:04,960 --> 00:09:08,960
कह दें और लोकाचार की दृष्टि से क्योंकि आपको मेरी बात समझ में आ जाए तो

132
00:09:08,960 --> 00:09:13,120
धर्म भी कह सकते हैं। हालांकि धर्म सिद्ध नहीं होता है। तो

133
00:09:13,120 --> 00:09:17,600
पर्टिकुलर

134
00:09:17,600 --> 00:09:23,600
इस्लाम को ग्लोरिफाई करने वाली चर्चा दिखाई दी।

135
00:09:25,280 --> 00:09:29,520
अब आगे बढ़ते हैं। इसकी जो समीक्षा

136
00:09:29,520 --> 00:09:33,440
है मैंने कुछ

137
00:09:33,440 --> 00:09:38,080
पांच पार्ट में तैयार की है। पहला पार्ट है

138
00:09:38,080 --> 00:09:43,280
छह पार्ट में सॉरी पह शुरुआत के जो दो पार्ट है कि

139
00:09:43,280 --> 00:09:47,360
अह जो मुफ्ती हैं उन्होंने किन पॉइंट्स के आधार

140
00:09:47,360 --> 00:09:51,360
पर किन दो पॉइंट्स के आधार पर ईश्वर की ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध

141
00:09:51,360 --> 00:09:55,520
किया है? क्या वह जो पॉइंट्स हैं जिनके आधार पर ईश्वर का अस्तित्व

142
00:09:55,520 --> 00:09:59,760
सिद्ध हो रहा है। क्या उनसे इस्लाम रिलेट

143
00:09:59,760 --> 00:10:03,840
कर पाता है? इस्लाम सिद्ध होता है इस्लाम का कनेक्शन कि नहीं सिद्ध होता

144
00:10:03,840 --> 00:10:08,320
है? जिस जिन सिद्धांतों के द्वारा नास्तिकता

145
00:10:08,320 --> 00:10:12,320
को हराया गया है। है ना? क्या उनसे इस्लाम का कनेक्शन

146
00:10:12,320 --> 00:10:16,480
सिद्ध होता है? क्या मुफ्ती जी ने इस्लाम के सिद्धांतों

147
00:10:16,480 --> 00:10:20,800
के द्वारा नास्तिकता का खंडन किया है? या फिर

148
00:10:20,800 --> 00:10:24,960
इस्लाम के ठीक विपरीत जिन सिद्धांतों को इस्लाम नहीं मानता है और

149
00:10:24,960 --> 00:10:29,520
अगर उसके मूल में चले जाए तो सनातन सिद्धांतों के आधार पर नास्तिकता

150
00:10:29,520 --> 00:10:33,600
का खंडन किया है। तो ये हम देखेंगे शुरू

151
00:10:33,600 --> 00:10:38,080
के दो पॉइंट्स में और इसके बाद के जो चार पॉइंट्स हैं

152
00:10:38,080 --> 00:10:42,400
उसमें एक जो कुतर्क किए गए हैं जावेद अख्तर जी के द्वारा भी

153
00:10:42,400 --> 00:10:46,640
और मुफ्ती जी के द्वारा भी और वहीं पर जा जो

154
00:10:46,640 --> 00:10:48,720
कुछ अच्छी चीजें की गई हैं। अच्छी

155
00:10:48,720 --> 00:10:52,960
चीजें कही गई है, उठाई गई हैं। तो जावेद अख्तर जी के द्वारा भी और मुफ्ती

156
00:10:52,960 --> 00:10:58,960
जी के द्वारा भी। ये चार चीजें भी हम देख लेंगे।

157
00:10:59,040 --> 00:11:03,440
तो सबसे पहली बात है कि मुफ्ती जी का कहना यह था कि

158
00:11:03,440 --> 00:11:07,440
यदि इस संसार में नष्ट होने वाली चीजें

159
00:11:07,440 --> 00:11:11,440
हैं तो उनका कोई ना कोई मूल है। उसी मूल

160
00:11:11,440 --> 00:11:15,840
को हम ईश्वर कहते हैं। और वो जो मूल है वो

161
00:11:15,840 --> 00:11:20,480
सर्वशक्तिमान है। ओमनीपोटेंट सर्वज्ञ है। ऑल नोइंग है।

162
00:11:20,480 --> 00:11:24,640
ओमनी प्रेजेंट इस्लाम नहीं मानता है। मगर

163
00:11:24,640 --> 00:11:28,640
ओमनी प्रेजेंट ना होने के कारण उसमें क्या-क्या दिक्कतें आएंगी वह भी

164
00:11:28,640 --> 00:11:32,720
है। अच्छा इसमें एक बात और है कि उन्होंने अपनी स्पीच को शुरू होने

165
00:11:32,720 --> 00:11:37,200
से पहले उन्होंने अपनी स्पीच को शुरू करने से पहले कहा

166
00:11:37,200 --> 00:11:41,440
कि भाई वो जो इस संसार को बनाने

167
00:11:41,440 --> 00:11:46,000
वाले रचयिता को मतलब उन्होंने

168
00:11:46,000 --> 00:11:51,200
अभिवादन किया उसका। तो सबसे पहली बात है क्या

169
00:11:51,200 --> 00:11:55,280
जो इस्लाम का ईश्वर है वह संसार

170
00:11:55,280 --> 00:11:59,280
को बनाने वाला सिद्ध होता है? क्या जो इस्लाम का ईश्वर

171
00:11:59,280 --> 00:12:03,680
है वो इस संसार का मूल कारण सिद्ध होता है? क्या

172
00:12:03,680 --> 00:12:04,180
जो

173
00:12:03,920 --> 00:12:08,000
इस्लाम का ईश्वर है वह सर्वशक्तिमान सिद्ध होता है? क्या जो

174
00:12:08,000 --> 00:12:12,320
इस्लाम का ईश्वर है वह सर्वज्ञ सिद्ध होता है? नहीं होता है।

175
00:12:12,320 --> 00:12:16,400
इनमें से कोई भी चीज वहां लागू नहीं होती। पहली बात संसार

176
00:12:16,400 --> 00:12:22,000
को बनाने वाला सिद्ध क्यों नहीं होता है? क्योंकि

177
00:12:22,000 --> 00:12:26,000
वह कहीं पर है और जहां वो है

178
00:12:26,000 --> 00:12:30,080
वहां एक स्थान पर वो बैठा हुआ है या खड़ा है जो भी है जो भी

179
00:12:30,080 --> 00:12:35,280
उसकी स्थिति है। मगर वो स्थान उसने नहीं बनाया। हम

180
00:12:35,280 --> 00:12:39,440
जहां वो है वो स्पेस उसने नहीं बनाया। उसने उस स्पेस

181
00:12:39,440 --> 00:12:43,680
में जो जो मटेरियल है

182
00:12:43,680 --> 00:12:47,920
मतलब जैसे सूरज, चंद्रमा, धरती इत्यादि यह सब जरूर

183
00:12:47,920 --> 00:12:52,320
बनाया मगर वो जो स्पेस है जहां पे वो है वो उसने नहीं बनाया।

184
00:12:52,320 --> 00:12:56,320
और यह जो सूर्य, चंद्रमा इत्यादि उसने बनाया है

185
00:12:56,320 --> 00:13:00,880
इस इसमें जो मटेरियल यूज़ होता है यानी कि जैसे मिट्टी

186
00:13:00,880 --> 00:13:05,760
धरती को बनाने के लिए मिट्टी चाहिए ना। और भी जो जो कुछ भी मटेरियल

187
00:13:05,760 --> 00:13:09,840
यूज होता हो वह मटेरियल उसने

188
00:13:09,840 --> 00:13:14,640
बनाया है कि नहीं बनाया या फिर पढ़ा हुआ था उसने यूज़ कर लिया तो

189
00:13:14,640 --> 00:13:18,720
इन चीजों से जो वो इस्लाम का ईश्वर है

190
00:13:18,720 --> 00:13:19,220
वो

191
00:13:19,040 --> 00:13:23,840
सर्वशक्तिमान सिद्ध नहीं होता है। वो रचयिता सिद्ध नहीं होता है। सर्वशक्तिमान

192
00:13:23,840 --> 00:13:27,920
तो अभी आगे के स्टेप में आएगा। वह रचयिता सिद्ध नहीं होता। तो आप जो कह रहे हो ना

193
00:13:27,920 --> 00:13:32,000
कि सब कुछ बनाने वाले को हम प्रणाम करते हैं। आपकी भाषा में जो भी अभिवादन

194
00:13:32,000 --> 00:13:36,000
किया वो अभिवादन आपने इस्लाम के ईश्वर को नहीं किया।

195
00:13:36,000 --> 00:13:40,720
अगर आप उसको सर्वोच्च रचयिता मान रहे हैं क्योंकि इस्लाम का ईश्वर

196
00:13:40,720 --> 00:13:44,720
यहां पर एक कुम्हार की तरीके से प्रस्तुत हो रहा है। जो कि एक मिट्टी

197
00:13:44,720 --> 00:13:49,600
लेके घड़ा बनाता है। मगर मिट मिट्टी को उसने नहीं बनाया।

198
00:13:49,600 --> 00:13:53,600
मिट्टी पर उसका कंट्रोल नहीं है। मिट्टी का रचयिता वह

199
00:13:53,600 --> 00:13:58,000
नहीं है। इसलिए वह सब कुछ बनाने वाला सिद्ध नहीं होता है। दूसरी

200
00:13:58,000 --> 00:14:02,320
बात आपने कही कि वो सर्वशक्तिमान है।

201
00:14:02,320 --> 00:14:06,320
अब सर्वशक्तिमान है तो इसमें सबसे पहले तो एक वही आ जाता है कि

202
00:14:06,320 --> 00:14:10,480
अगर सर्वशक्तिमान है और वह सब कुछ कर सकता है तो वह अवतार क्यों

203
00:14:10,480 --> 00:14:14,880
नहीं ले सकता है? वह मनुष्यों के बीच में क्यों नहीं आ सकता है? मनुष्यों

204
00:14:14,880 --> 00:14:18,880
के बीच में ना आने वाली अगर बात कहें तो वहां पर आपके दो चीजें आती कि जो

205
00:14:18,880 --> 00:14:22,960
क्रिएशन उसने खुद बनाई है वह उसमें खुद कैसे आ जाएगा। है ना? तो अब यह

206
00:14:22,960 --> 00:14:27,200
जो क्रिएशन उसने बनाई है अगर आपके इस बात पर हम बात करें

207
00:14:27,200 --> 00:14:31,200
तो क्या उसने सृष्टि में किसी एक जगह पर खड़े होकर के

208
00:14:31,200 --> 00:14:34,160
अपने से दूर क्रिएशन बनाई है? पहली नंबर

209
00:14:34,160 --> 00:14:38,240
बात यह हो सकता है कि भाई जैसे आज हम पृथ्वी पर हैं और यहां से हजारों करोड़ों

210
00:14:38,240 --> 00:14:42,400
किलोमीटर दूर कहीं पर जो इस्लाम का ईश्वर है वह बैठा हुआ है। उसने अपने

211
00:14:42,400 --> 00:14:46,480
से हजारों करोड़ों किलोमीटर दूर जो है

212
00:14:46,480 --> 00:14:50,640
ये क्रिएशन बनाई है। ठीक है? तो अगर ऐसा है तो क्या ये दूरी

213
00:14:50,640 --> 00:14:54,640
वो तय नहीं कर सकता है? पहली बात। और यदि डायमेंशन

214
00:14:54,640 --> 00:14:58,720
की बात है जैसे आप कहते हैं कि मेटाफिजिकल यदि डायमेंशन

215
00:14:58,720 --> 00:15:02,800
की बात है कि मेटाफिजिकल जो रियलिटी है और एक

216
00:15:02,800 --> 00:15:07,120
है फिजिकल रियलिटी तो अगर डायमेंशन की बात है कि जिस डायमेंशन

217
00:15:07,120 --> 00:15:11,360
में वो है उसने दूसरे डायमेंशन में अ सृष्टि

218
00:15:11,360 --> 00:15:15,360
बनाई है तो तब भी आप एक क्या वो एक डायमेंशन से दूसरे डायमेंशन में

219
00:15:15,360 --> 00:15:19,440
जा सकता है कि नहीं यह वाला भी आ जाएगा सवाल

220
00:15:19,440 --> 00:15:23,840
जब आप उसके अवतार या उसकी मूर्ति पूजा या उसके स्वरूप रूप लेने को

221
00:15:23,840 --> 00:15:27,920
बाधित करते हैं। कुल मिलाकर के वह बाध्य सिद्ध होता है

222
00:15:27,920 --> 00:15:33,920
क्योंकि वह यहां पर मूर्ति पूजा का आपके यहां पर खुलकर विरोध किया गया है।

223
00:15:34,720 --> 00:15:38,800
मेटाफिजिकल की एक बात मैं आपको बता दूं कि आपने जब ये क्लेम किया ना कि मेटा

224
00:15:38,800 --> 00:15:43,600
मेटाफिजिकल क्योंकि वो है

225
00:15:43,600 --> 00:15:47,600
इसलिए जो है जो साइंटिफिक या प्रैक्टिकल ये सब चीजें उस

226
00:15:47,600 --> 00:15:51,680
पर लागू नहीं होंगी तो उसके लिए ये वाले सबूत नहीं मांगे जाएंगे। साइंस

227
00:15:51,680 --> 00:15:56,000
डजंट हैव द प्रोसेससेस टू प्रूव और डिस्प्रूव

228
00:15:56,000 --> 00:16:00,240
द एकिस्टेंस ऑफ़ गॉड। व्हाई? क्योंकि साइंस का ताल्लुक

229
00:16:00,240 --> 00:16:04,400
एंपेरिकल एविडेंस से है और एंपेरिकल एविडेंसेस का ताल्लुक हमारे

230
00:16:04,400 --> 00:16:09,040
नेचुरल और फिजिकल वर्ल्ड से है। जबकि गॉड नॉन फिजिकल

231
00:16:09,040 --> 00:16:13,120
और सुपर नेचुरल रियलिटी है। लिहाजा नॉन फिजिकल

232
00:16:13,120 --> 00:16:17,360
रियलिटी को आप उस टूल के साथ नहीं चेक कर सकते जिसका

233
00:16:17,360 --> 00:16:17,860
काम

234
00:16:17,600 --> 00:16:21,760
फिजिकल रियलिटी को तलाश करना है। लिहाजा आज इस

235
00:16:21,760 --> 00:16:25,920
डिबेट में गॉड की एग्ज़िस्टेंस को साबित करने या उसे

236
00:16:25,920 --> 00:16:30,160
डिनाई करने में साइंटिफिक एविडेंस को एक्सेप्ट नहीं किया

237
00:16:30,160 --> 00:16:34,320
जाएगा। हालांकि इस चीज को काउंटर किया है आगे चलकर के जावेद अख्तर

238
00:16:34,320 --> 00:16:38,400
जी ने जो काउंटर अच्छा था कि भाई मेटाफिजिकल है क्या

239
00:16:38,400 --> 00:16:42,800
जो हम मान लें कि भाई ये क्योंकि ये जो है हमारा जो खुदा

240
00:16:42,800 --> 00:16:47,440
है या हमारा जो ईश्वर है इस्लाम का वो मेटाफिजिकल

241
00:16:47,440 --> 00:16:51,520
रियलिटी है। नॉन फिजिकल रियलिटी है। इसलिए उस

242
00:16:51,520 --> 00:16:55,520
पर जो है ये साइंस वाली चीजें साइंस वाले सवाल नहीं किए जाएंगे। साइंस

243
00:16:55,520 --> 00:16:59,840
के प्रमाण नहीं मांगे जाएंगे। तो पहले आपको उसका

244
00:16:59,840 --> 00:17:03,920
मेटाफिजिकल रियलिटी का अस्तित्व सिद्ध करना होगा ना। आप यहीं

245
00:17:03,920 --> 00:17:08,720
से शुरू कर रहे हो कि वह जो है हमारा इस्लाम का ईश्वर वो मेटाफिजिकल

246
00:17:08,720 --> 00:17:12,800
रियलिटी है। आपने मेटाफिजिकल रियलिटी को सिद्ध नहीं किया है। आप सीधे

247
00:17:12,800 --> 00:17:16,800
यहीं से शुरू कर रहे हो। तो आपको सिद्ध करना चाहिए था। तो इस बारे में उन्होंने पूछा भी आगे

248
00:17:16,800 --> 00:17:21,040
चलकर के तो आपने कोई ऐसा जवाब नहीं दिया। अब उसको वहां पर

249
00:17:21,040 --> 00:17:25,280
बातें जो है छूट गई। अधूरी नहीं। कि मेटाफिजिकल रियलिटी सिद्ध

250
00:17:25,280 --> 00:17:29,520
कैसे होती है? यह भी तो हो कि जो हम ये

251
00:17:29,520 --> 00:17:32,400
संसार देख रहे हैं, प्रपंच रूपी संसार हम देख रहे हैं,

252
00:17:32,400 --> 00:17:36,880
जो ये जड़ देख रहे हैं, क्या इससे विपरीत कोई रियलिटी

253
00:17:36,880 --> 00:17:41,280
है? यह जो संसार हम देख रहे हैं, जो हमारी इन कर्मेंद्रियों का इन ज्ञानेंद्रियों

254
00:17:41,280 --> 00:17:45,360
का विषय है। क्या इसके विपरीत कोई ऐसी रियलिटी है जो हमारी

255
00:17:45,360 --> 00:17:49,360
कर्मेंद्रियों और हमारी ज्ञानेंद्रियों का विषय ना हो। समझ रहे हैं? तो इस बारे

256
00:17:49,360 --> 00:17:53,440
में आपने बात नहीं की। आपने तो यहीं से शुरू किया कि हमारा जो है वो मेटाफिजिकल

257
00:17:53,440 --> 00:17:57,440
रियलिटी है। अच्छा दूसरी एक बात यह भी आती है कि वो मेटाफिजिकल रियलिटी सिद्ध

258
00:17:57,440 --> 00:18:01,920
भी नहीं होता। मेटाफिजिकल रियलिटी को अगर हम

259
00:18:01,920 --> 00:18:07,920
सरल शब्दों में हिंदी में अगर कहें तो वो

260
00:18:08,000 --> 00:18:12,320
व्यवहार में ना आ सकने वाली स्थिति है। मतलब वो एक ऐसी रियलिटी

261
00:18:12,320 --> 00:18:16,480
है जो हमारे व्यवहार में नहीं आ सकती। वो हो गई मेटाफिजिकल रियलिटी।

262
00:18:16,480 --> 00:18:20,560
ठीक है? मगर आपने यह व्यवहार में ना आ सकने वाली बात ना ही सिद्ध

263
00:18:20,560 --> 00:18:24,560
की और ना ही आप जिस ईश्वर को मानते हैं वो मेटाफिजिकल

264
00:18:24,560 --> 00:18:28,720
सिद्ध होता है क्योंकि आखि रात में भी जो लोग यहां से मोक्ष प्राप्त

265
00:18:28,720 --> 00:18:33,120
करते हैं आपके अनुसार जो मोक्ष है या जो भी है

266
00:18:33,120 --> 00:18:37,440
कुछ कहते होंगे आप उसे आखी रात कहते हैं क्या कहते हैं तो आपके

267
00:18:37,440 --> 00:18:41,760
अनुसार जब व्यक्ति यहां से जाता है तो वहां पर व्यवहार कर रहा होता है

268
00:18:41,760 --> 00:18:46,320
वो वहां पर भी व्यवहारिक है हम तो वो व्यवहारिक

269
00:18:46,320 --> 00:18:50,480
कैसे हो रहा है वहां पर? और अभी भी जब यहां पर हैं तो कुछ उसने ऐसी

270
00:18:50,480 --> 00:18:54,480
चीजें की हैं आपके यहां पर जो व्यवहार में आ रही हैं। तो फिर

271
00:18:54,480 --> 00:18:58,720
वो मेटाफिजिकल सिद्ध नहीं होता है।

272
00:18:58,720 --> 00:19:02,800
पहली बात कि मेटाफिजिकल इस्लाम का ईश्वर सिद्ध नहीं होता है

273
00:19:02,800 --> 00:19:06,960
और कुम्हार जैसा सिद्ध होता है जो कि मिट्टी लेकर के घड़ा

274
00:19:06,960 --> 00:19:11,200
बना रहा है। और तीसरी बात कि आपने मेटाफिजिकल रियलिटी को सिद्ध

275
00:19:11,200 --> 00:19:15,600
ही नहीं किया। आपने सीधे क्लेम कर दिया कि वह मेटाफिजिकल रियलिटी

276
00:19:15,600 --> 00:19:19,600
है। अब इस इसके बाहर जाकर के आप जो है साइंस को लाकर के सवाल

277
00:19:19,600 --> 00:19:23,440
नहीं कर सकते।

278
00:19:23,440 --> 00:19:29,040
अब आ जाते हैं अपने मूल विषय पे जो कंटेंजेंट

279
00:19:29,040 --> 00:19:33,120
वाली थ्योरी दी आपने कंटिंजेंसी वाली। तो उसमें आपने

280
00:19:33,120 --> 00:19:38,080
कहा कि जो सबका मूल है वही ईश्वर है।कि

281
00:19:38,080 --> 00:19:42,320
ये यूनिवर्स और इस यूनिवर्स की तमाम चीजें कॉनंटिंजेंट है। कंटिंजेंट

282
00:19:42,320 --> 00:19:46,480
होने का मतलब यह होता है कि जो अपने एक्सिस्टेंस पे किसी के ऊपर डिपेंड करती हो। तो

283
00:19:46,480 --> 00:19:50,800
फिलॉसोफर्स की इस्तिला के मुताबिक हम उस टर्मिनोलॉजी

284
00:19:50,800 --> 00:19:54,880
के मुताबिक हम उस जगह तक पहुंचते हैं और उस हस्ती तक पहुंचते हैं जिसे

285
00:19:54,880 --> 00:19:59,120
नेसेसरी बीइंग कहा जाता है कि ये वो नेसेसरी बीइंग है जिसका मौजूद

286
00:19:59,120 --> 00:20:03,120
ना होना नामुमकिन हो। चूंकि अगर ये मौजूद ना हो तो सारी चीजें एक्सिस्टेंस

287
00:20:03,120 --> 00:20:07,200
में आएंगी ही नहीं। और ये सारी डिप कंटिंजेंट चीजें उसी के ऊपर डिपेंड

288
00:20:07,200 --> 00:20:11,680
करती है। ठीक है? है जो सबका मूल है वही ईश्वर है। परंतु जहां पर

289
00:20:11,680 --> 00:20:15,840
इस्लाम का ईश्वर बैठा है वो एक तख्त पे है, सातवें आसमान

290
00:20:15,840 --> 00:20:20,000
पे है। तो उसका मूल क्या है? वहां जो वहां जो इस्लाम के ईश्वर के अलावा

291
00:20:20,000 --> 00:20:24,000
जो दूसरी चीजें हैं उसका मूल क्या है? क्योंकि ईश्वर तो वहां स्वयं वहीं से स्टार्ट कर रहे हो

292
00:20:24,000 --> 00:20:28,000
चीजें। तो वो तो उसका मूल हुआ नहीं। अगर मूल हुआ तो वो

293
00:20:28,000 --> 00:20:32,160
चीजें भी उसी से निकलनी चाहिए थी। स्पेस भी उसी से निकलना चाहिए था।

294
00:20:32,160 --> 00:20:36,880
स्पेस पे उसका कंट्रोल होना चाहिए था। क्या है ऐसा? क्या इस बारे में कोई विवेचना है?

295
00:20:36,880 --> 00:20:38,640
मुझे अभी तक प्राप्त नहीं है।

296
00:20:38,640 --> 00:20:43,280
अच्छा दूसरी बात कि अगर हम सबका मूल माने

297
00:20:43,280 --> 00:20:47,520
आपकी थ्योरी के हिसाब से तो इतनी बात तो तय है कि उसका सर्वज्ञ

298
00:20:47,520 --> 00:20:51,600
होना सर्वशक्तिमान होना बहुत आवश्यक है। और इन दोनों

299
00:20:51,600 --> 00:20:55,600
चीजों के लिए उसका सर्वव्यापक होना बहुत आवश्यक है। और जबकि इस्लाम

300
00:20:55,600 --> 00:20:59,600
का ईश्वर जो है वो सर्वव्यापक नहीं है। इसलिए ना वह सर्वशक्तिमान

301
00:20:59,600 --> 00:21:03,600
सिद्ध होता है ना ही वह सर्वज्ञ सिद्ध होता है। यहां पर एक बात

302
00:21:03,600 --> 00:21:07,600
मैं बताता चलूं कि जो सनातन ईश्वर की व्याख्या की गई

303
00:21:07,600 --> 00:21:11,600
है, वहां पर यह जो मेटाफिजिकल वाली बात है वह लागू होती

304
00:21:11,600 --> 00:21:15,840
है कि वो स्टार्ट होती है कि एक स्थिति

305
00:21:15,840 --> 00:21:19,920
ऐसी है जो व्यवहार में नहीं आ सकती स्पष्ट शास्त्रों में लिखा हुआ है। कोई व्यवहार नहीं हो

306
00:21:19,920 --> 00:21:23,920
सकता उसके लिए और फिर वह ऐसा रूप लेती है जो व्यवहार में

307
00:21:23,920 --> 00:21:27,920
आ सकती है। ठीक है? मतलब व्यवहार में ना आ सकने वाली भी बात कही गई है

308
00:21:27,920 --> 00:21:31,920
और फिर उसके बाद वो अपने को प्रकट करती है या किसी के व्यवहार

309
00:21:31,920 --> 00:21:36,160
में आ सकने लायक बनाती है। वो उस पर हम बात करेंगे। अभी आ जाएगा

310
00:21:36,160 --> 00:21:40,240
अभी। तो इसको थोड़ा सा यह जो मूल पीछे

311
00:21:40,240 --> 00:21:44,400
जाने वाले मामले को थोड़ा सा इस तरह से देखते हैं कि अगर हम यह

312
00:21:44,400 --> 00:21:48,640
सोचें कि आपके वाले ईश्वर से इस्लाम

313
00:21:48,640 --> 00:21:53,040
वाले ईश्वर से अगर हम यह सोचना शुरू करें कि क्योंकि सबके पीछे मूल कारण

314
00:21:53,040 --> 00:21:53,760
है तो

315
00:21:53,760 --> 00:21:57,840
इससे ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध होता है। वही ईश्वर है। वही इस्लाम का भी ईश्वर है। तो

316
00:21:57,840 --> 00:22:01,840
इस्लाम का ईश्वर सब जगह नहीं है। इस्लाम का ईश्वर एक जगह बैठा हुआ

317
00:22:01,840 --> 00:22:06,000
है और वहां से उसका कहना है कि मैं पूरी दुनिया को कंट्रोल करता हूं। ठीक है?

318
00:22:06,000 --> 00:22:10,400
अच्छा दूसरी बात यह है कि इसमें हम लोग इधर से अगर चलना शुरू करें

319
00:22:10,400 --> 00:22:14,480
तो इसमें एक बात कही जा सकती है कि सबके पीछे मूल में

320
00:22:14,480 --> 00:22:18,560
हम ईश्वर है या कोई मूल कारण है उसी का नाम

321
00:22:18,560 --> 00:22:22,800
ईश्वर है तो ऐसा भी तो हो सकता है कि 5 किलोमीटर के एरिया

322
00:22:22,800 --> 00:22:26,880
का मूल कोई और हो फिर उसके बगल के 5 किमी के एरिया का मूल कोई

323
00:22:26,880 --> 00:22:30,960
और हो फिर उसके बगल के 5 किमी के एरिया का मूल

324
00:22:30,960 --> 00:22:35,200
कोई और हो तो ये अलग-अलग ईश्वर हो गए मगर ऐसा तो आप मानते नहीं कोई भी नहीं मानता

325
00:22:35,200 --> 00:22:39,280
उसका उसका कारण है। उसका कारण क्या है कि ये जो 5-प किलोमीटर के

326
00:22:39,280 --> 00:22:43,600
भाग बने हुए हैं, यह एक 5 कि.मी. वाला भाग दूसरे

327
00:22:43,600 --> 00:22:47,600
5 कि.मी. वाले भाग पर आपत्ति या फिर व्यवधान

328
00:22:47,600 --> 00:22:51,840
ना डाले। और अगर व्यवधान डालेगा तो फिर वहां की जो

329
00:22:51,840 --> 00:22:56,000
अह पूरा सुप्रीम कंट्रोल है, या तो वह उसके हाथ में नहीं रहेगा

330
00:22:56,000 --> 00:23:00,560
अगर व्यवधान पड़ रहा है। और नहीं तो वह व्यवधान नहीं डालेगा। इसका मतलब दोनों में सामंजस्य

331
00:23:00,560 --> 00:23:04,640
होगा। और सामंजस्य होगा बिल्कुल भी अंतर नहीं होगा। तो वहां पर एकत्व

332
00:23:04,640 --> 00:23:08,800
सिद्ध हो गया। यानी कि पूरे पर एक ही

333
00:23:08,800 --> 00:23:14,720
का कंट्रोल होना बहुत आवश्यक है। यह तो हमें समझ में आ गया।

334
00:23:14,720 --> 00:23:19,360
अब बात ये आती है कि क्या जो इस्लाम का ईश्वर है

335
00:23:19,360 --> 00:23:23,920
उस उसकी जो ये जो ओमनीपोटेंट वाली बात है

336
00:23:23,920 --> 00:23:28,400
और पूरे पे सर्व नियंता वाली बात है। वो सिद्ध होती है।

337
00:23:28,400 --> 00:23:32,800
नहीं होती। क्यों नहीं होती? क्योंकि वह यह कहता है कि ईश्वर कण-कण में नहीं है।

338
00:23:32,800 --> 00:23:36,960
वह सर्वव्यापक नहीं है। वह किसी एक जगह बैठा हुआ है और

339
00:23:36,960 --> 00:23:41,040
उसकी शक्ति पूरे जगत में है। यानी कि उसने ये मान लिया कि

340
00:23:41,040 --> 00:23:45,040
उसमें और उसकी शक्ति में अंतर है। इसीलिए तो वो यह कह रहे हैं कि वो वहां नहीं है

341
00:23:45,040 --> 00:23:49,040
जहां पर उसकी शक्ति है। तो जब हम यह कह देंगे कि भैया

342
00:23:49,040 --> 00:23:53,120
शक्ति है वह वहां नहीं है तो कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ अंतर आ गया।

343
00:23:53,120 --> 00:23:57,120
उसकी शक्ति और उसमें और जब शक्ति और उसमें अंतर आ गया

344
00:23:57,120 --> 00:24:01,360
तो यह मानना पड़ेगा कि जहां पर इस्लाम का ईश्वर स्वयं

345
00:24:01,360 --> 00:24:05,360
बैठा है जितना कंट्रोल जो कंट्रोल वहां पर है उसका

346
00:24:05,360 --> 00:24:09,360
उतना ही कंट्रोल वहां पर नहीं है जहां पर उसकी शक्ति है तो यहां

347
00:24:09,360 --> 00:24:13,520
पर उसका जो क्या कहते हैं बाधित हो गया

348
00:24:13,520 --> 00:24:17,600
जो उसका सर्व नियंता होने वाली बात थी वो यहां पर बाधित हो गई दोबारा

349
00:24:17,600 --> 00:24:21,760
से एक और तरीके से क्यों क्योंकि जितना कंट्रोल वो जहां पर स्वयं

350
00:24:21,760 --> 00:24:23,920
है वहां कर रहा है उतना कंट्रोल वहां नहीं

351
00:24:23,920 --> 00:24:28,880
कर पा रहा है जहां पर उसकी शक्ति है। और अगर वह यह कहेगा कि मेरा कंट्रोल

352
00:24:28,880 --> 00:24:32,960
वहां जो शक्ति है वह भी मेरे बराबर की शक्तिशाली

353
00:24:32,960 --> 00:24:37,040
है तो फिर शक्ति और उसमें अंतर क्या रहा? कुछ तो अंतर मानना पड़ेगा। जो

354
00:24:37,040 --> 00:24:41,920
अंतर हो जाएगा जैसे ही जरा सा भी अंतर हो जाएगा शक्ति और उसमें हम

355
00:24:41,920 --> 00:24:46,160
वैसे ही अ शक्ति कम हो जाएगी

356
00:24:46,160 --> 00:24:50,480
और जो है जहां वो बैठा हुआ है वहां पर उसका कंट्रोल ज्यादा हो जाएगा। तो क्योंकि

357
00:24:50,480 --> 00:24:55,120
आपने उसको सर्वव्यापक नहीं माना है। इसलिए

358
00:24:55,120 --> 00:24:59,120
उसकी वो सर्व नियंता सिद्ध नहीं होता है।

359
00:24:59,120 --> 00:25:03,200
और वहीं पर सनातन ईश्वर क्या है कि वो अपनी शक्ति के रूप

360
00:25:03,200 --> 00:25:07,200
में सब जगह विद्यमान है और पूर्ण रूप से विद्यमान है।

361
00:25:07,200 --> 00:25:11,520
तो शक्ति पूर्ण रूप से विद्यमान होने के कारण वो एक तो

362
00:25:11,520 --> 00:25:15,600
अभी मैं इसको और थोड़ा और सर्व्यापकता को और

363
00:25:15,600 --> 00:25:19,600
मैं थोड़ा सा क्लियर कर दूंगा। तो मगर

364
00:25:19,600 --> 00:25:24,320
यह है कि सनातन ईश्वर अपनी शक्ति के रूप में सर्व्यापक है। हम

365
00:25:24,320 --> 00:25:28,560
जहांजहां उसकी शक्ति वहां वहां शक्ति के रूप में वही है। अभिन्न

366
00:25:28,560 --> 00:25:32,640
जो सनातन ईश्वर है। और एक बात और कि शक्ति शक्तिमान को कभी

367
00:25:32,640 --> 00:25:37,040
द्वैत भाव में नहीं डालती है। मतलब हम शक्ति को शक्तिमान

368
00:25:37,040 --> 00:25:38,960
से अलग करके नहीं देख सकते हैं। यह

369
00:25:38,960 --> 00:25:43,200
हमारी थ्योरी है। आप देख रहे हैं कि भैया वो नहीं है उसकी शक्ति है।

370
00:25:43,200 --> 00:25:47,280
तो वह द्वैत भाव में नहीं डालती। तो द्वैत भाव में ना डालने का मतलब

371
00:25:47,280 --> 00:25:52,560
क्या है कि भैया यह तो दो चीजें हो गई अलग-अलग तो हो गई

372
00:25:52,560 --> 00:25:56,560
तो जैसे कि मैं कहूं कि मेरा नाम शिवश नारायण द्विवेदी है। अब

373
00:25:56,560 --> 00:26:00,720
कोई गए अब मैं एक व्यक्ति हूं मगर कोई गए नहीं है। यहां पर तो दो हैं।

374
00:26:00,720 --> 00:26:04,960
एक से ज्यादा एंटिटी है कि क्या शिवश के हाथ भी तो हैं। आंख भी तो हैं।

375
00:26:04,960 --> 00:26:09,120
तो जैसे ये मेरे अभिन्न अंग है। इनको मिलकर के मैं बनता हूं। ऐसे ही जो

376
00:26:09,120 --> 00:26:13,200
शक्ति है वो ईश्वर का अभिन्न अंग है। उसको मिलकर के वो स्वरूप भूत

377
00:26:13,200 --> 00:26:17,360
है। ईश्वर के स्वरूप भूता है। तो ईश्वर की शक्ति के रूप में

378
00:26:17,360 --> 00:26:22,240
ईश्वर भी स्वयं सब जगह विद्यमान है पूर्ण रूप से। और इसीलिए

379
00:26:22,240 --> 00:26:26,960
वो वहां पर सुप्रीम कंट्रोलर है हर जगह का।

380
00:26:26,960 --> 00:26:30,960
जैसे हम कई बार कह देते हैं कि भाई उसने अपने फ्री विल से किया। किसी व्यक्ति

381
00:26:30,960 --> 00:26:35,120
ने फ्री विल से किया। आगे चलकर के ये बात भी आएगी कि फ्री विल से हुआ। तो

382
00:26:35,120 --> 00:26:39,120
क्या वहां पर ईश्वर का कंट्रोल नहीं है क्या? और कंट्रोल

383
00:26:39,120 --> 00:26:43,280
है तो कैसे कर पा रहा है वह कंट्रोल? किस माध्यम से कर पा रहा है? कनेक्शन क्या

384
00:26:43,280 --> 00:26:47,360
है? तो हमें वहां पर कहना पड़ेगा ना कि भैया वह अपनी शक्ति

385
00:26:47,360 --> 00:26:51,680
के रूप में वहां पर फुली कंट्रोल कर रहा है। तो क्योंकि वह अपने क्योंकि

386
00:26:51,680 --> 00:26:55,120
ये जो अ

387
00:26:55,120 --> 00:26:59,200
इस्लाम का ईश्वर है यह सर्वव्यापक नहीं है।

388
00:26:59,200 --> 00:27:03,280
इसलिए यह समान रूप से

389
00:27:03,280 --> 00:27:07,360
सब जगह सर्व नियंता सिद्ध नहीं होता। और कई जगह कह भी रखा है इसने कि

390
00:27:07,360 --> 00:27:11,360
मैं यह नहीं कर सकता, मैं वो नहीं कर सकता। हम आगे चलकर के भी यह बातें

391
00:27:11,360 --> 00:27:15,440
कुछ आएंगी। क्या नहीं कर सकते? जैसे कि कंट्रोल नहीं कर सकते। यह मान रहा है। क्या

392
00:27:15,440 --> 00:27:19,520
इस्लाम का ईश्वर किसी व्यक्ति के मन को कंट्रोल कर सकता है? अगर कर सकता

393
00:27:19,520 --> 00:27:23,920
है तो जावेद अख्तर जी ने जब यह सवाल पूछा था कि

394
00:27:23,920 --> 00:27:27,920
वो जो है कत्ल क्यों कर रहे हैं लोग? यह क्यों हो रहा है? वो क्यों हो रहा है?

395
00:27:27,920 --> 00:27:32,000
तो वहां पर आपने सटीक उत्तर नहीं दिए थे। है ना? जो टू

396
00:27:32,000 --> 00:27:36,400
स्टॉप द ट्रेन पुल द चैन हो जाता है। वह उत्तर हमें प्राप्त नहीं हुए थे।

397
00:27:36,400 --> 00:27:41,120
वह उत्तर हम देंगे। अब

398
00:27:41,120 --> 00:27:43,840
तो

399
00:27:43,840 --> 00:27:47,920
कुल मिलाकर के कहने की बात कहने का अर्थ यह है

400
00:27:47,920 --> 00:27:52,880
कि हमें अनलिमिटेड ईश्वर की आवश्यकता है।

401
00:27:52,880 --> 00:27:57,200
अगर ईश्वर है तो वह अनलिमिटेड होना चाहिए। देश

402
00:27:57,200 --> 00:28:01,440
काल परिस्थिति से बाधित नहीं होना चाहिए। और आप

403
00:28:01,440 --> 00:28:05,440
जिस ईश्वर की परिभाषा को दे रहे हैं, वह काल से तो बाधित नहीं है। एटरर्नल कह

404
00:28:05,440 --> 00:28:09,760
रहे हैं काल से। मगर देश से बाधित है, परिस्थिति से बाधित है। देश से क्या बाधित

405
00:28:09,760 --> 00:28:13,760
है? देश से बाधित यह है कि यहां है वहां नहीं है तो यहां बाधित है

406
00:28:13,760 --> 00:28:17,840
और फिर परिस्थिति से क्या बाधित है कि भैया जिसने वह सृष्टि बनाई वह

407
00:28:17,840 --> 00:28:21,840
उसमें कैसे आ सकता है अच्छा जब आप एक जगह

408
00:28:21,840 --> 00:28:26,320
पर यह कह देते हैं कि भैया ये मेटाफिजिकल रियलिटी है ये हमको कहीं-कहीं

409
00:28:26,320 --> 00:28:30,560
पर ऐसा मानना पड़ेगा कि भैया ये चीजें हमारी जो ये जो इंद्रियां हैं

410
00:28:30,560 --> 00:28:35,200
उसके बाहर की चीजें हैं। तो हम प्रैक्टिकली चीजों को नहीं समझ सकते। मगर फिर भी

411
00:28:35,200 --> 00:28:39,360
क्योंकि मैं बताऊंगा कि उसके अवतार ले सकने

412
00:28:39,360 --> 00:28:43,440
वाली क्षमता होने की भी आवश्यकता कैसे सिद्ध होती है। है ना

413
00:28:43,440 --> 00:28:47,520
वो आवश्यकता भी कैसे सिद्ध होती है। हालांकि सर्व्यापकता से तो अभी

414
00:28:47,520 --> 00:28:51,920
सिद्ध किया अ सर्व्यापकता से और सिद्ध करेंगे। मगर वो उसकी भी आवश्यकता

415
00:28:51,920 --> 00:28:56,000
है। अगर उसे ईश्वर सिद्ध करना है कि वो क्या कहते हैं? अवतार भी

416
00:28:56,000 --> 00:28:56,500
ले

417
00:28:56,160 --> 00:29:00,560
सके। उसकी मूर्ति पूजा भी हो सके। उसकी भी आवश्यकता है।

418
00:29:00,560 --> 00:29:04,880
तो कहने का अर्थ यह है कि वह जो है लिमिटेड देश

419
00:29:04,880 --> 00:29:08,880
से और परिस्थिति से वह बाधित है और

420
00:29:08,880 --> 00:29:12,960
सनातन ईश्वर वह है जो देश कृत कालकृत और

421
00:29:12,960 --> 00:29:17,120
परिस्थिति कृत किसी भी बाधा से बाधित नहीं है। तो अब आप

422
00:29:17,120 --> 00:29:21,280
सोचो कि आप यह सब सवाल आपसे किए नहीं गए वहां पर जावेद

423
00:29:21,280 --> 00:29:25,360
अक्सर जी के द्वारा। परंतु यदि आप जीत रहे हैं वहां पर

424
00:29:25,360 --> 00:29:29,360
तो वहां पर कौन सा ईश्वर जीत रहा है? मूल कौन सा ईश्वर सिद्ध हो रहा है?

425
00:29:29,360 --> 00:29:33,440
क्या इस्लाम का ईश्वर मूल सिद्ध हो रहा है सभी जगह का? क्या वह सबका रचयिता

426
00:29:33,440 --> 00:29:37,520
सिद्ध हो रहा है? क्या वह सर्वशक्तिमान सिद्ध हो रहा है? और

427
00:29:37,520 --> 00:29:41,600
सर्वज्ञ भी सिद्ध नहीं होगा। आपकी एक दलील है। सर्वज्ञ

428
00:29:41,600 --> 00:29:46,480
क्यों नहीं सिद्ध हो रहा है?

429
00:29:46,480 --> 00:29:50,480
सर्वज्ञ इसलिए नहीं सिद्ध हो रहा है क्योंकि आपने वीडियो में एक

430
00:29:50,480 --> 00:29:54,560
जगह कहा है कि छुरी बनाने

431
00:29:54,560 --> 00:29:58,560
वाले को दोष नहीं आता है। छुरी के गलत इस्तेमाल करने वाले पर दोष

432
00:29:58,560 --> 00:30:02,560
आता है। है ना? क्रिएटर ने इविल को बनाया है टेस्ट

433
00:30:02,560 --> 00:30:06,560
के लिए वो इविल नहीं है। इविल वो होगा वो होगा जो उसे इख्तियार

434
00:30:06,560 --> 00:30:10,560
करेगा। छुरी को बनाने वाला गलत नहीं होता है। छुरी का गलत इस्तेमाल करने

435
00:30:10,560 --> 00:30:14,720
वाला गलत होता है। क्या जो छुरी बनाने वाला है

436
00:30:14,720 --> 00:30:18,720
जब उसको ये मालूम है अगर वो सर्वज्ञ है तो उसे मालूम होना चाहिए कि इस

437
00:30:18,720 --> 00:30:22,800
छुरी का क्या उपयोग होने वाला है। तो तो वो उसको रोक देगा और वो कंट्रोलर

438
00:30:22,800 --> 00:30:26,960
भी है। मगर नहीं रोक रहा है तो दोष आएगा ना। आपको मालूम भी है

439
00:30:26,960 --> 00:30:31,040
और आप में रोकने का सामर्थ्य भी है। आपको पाप का बोध भी हो रहा है

440
00:30:31,040 --> 00:30:35,040
और आपके पास सामर्थ्य भी है क्योंकि आप स्वयं को सुप्रीम कंट्रोलर भी कह रहे

441
00:30:35,040 --> 00:30:39,520
हो। फिर भी आप नहीं रोक रहे हो तो आप कर आप पर दोष आएगा ना। सनातन

442
00:30:39,520 --> 00:30:43,520
ईश्वर पर नहीं आएगा। वो जो डेफिनेशन है वो आपको स्वीकार करनी पड़ेगी। पर वो तो आपने

443
00:30:43,520 --> 00:30:47,680
स्वीकार नहीं की है। तो आपके इस तर्क से आपके इस्लामिक

444
00:30:47,680 --> 00:30:51,520
ईश्वर का खंडन हो जाता है।

445
00:30:51,520 --> 00:30:55,600
उसकी सर्वज्ञता को आपने छीन लिया। जब आप यह कह दिया कि छुरी बनाने वाले

446
00:30:55,600 --> 00:31:00,000
को दोष लगता है। छुरी का गलत इस्तेमाल करने वाले को नहीं। अगर छुरी

447
00:31:00,000 --> 00:31:01,600
बनाने वाला यह जानता है कि

448
00:31:01,600 --> 00:31:05,600
मैं जो बम बना रहा हूं बम बनाने वाला जो जानता है मैं जो बम बना रहा

449
00:31:05,600 --> 00:31:10,560
हूं देश की रक्षा के लिए नहीं स्कूल में बम

450
00:31:10,560 --> 00:31:14,560
या जो दिल्ली में अभी हुआ है ना कार के अंदर बम लगा करके

451
00:31:14,560 --> 00:31:19,360
या जो भी लगाया हो उसके लिए यूज़ होने वाला है। तो जब वो यह जानता है

452
00:31:19,360 --> 00:31:23,360
और प्लस उसके पास सामर्थ्य है कि वो चाहे तो चुटकी बजा के

453
00:31:23,360 --> 00:31:27,360
सब रोक सकता है। मगर फिर भी वह जब नहीं रोक रहा है तो उस पर दोष आता

454
00:31:27,360 --> 00:31:32,000
है। अब सनातन ईश्वर पर क्यों नहीं आ रहा है आता है वह भी मैं आगे बताऊंगा

455
00:31:32,000 --> 00:31:35,840
हम

456
00:31:35,840 --> 00:31:39,840
तो कंटिंजेंसी वाली थ्योरी अर्थात सर्वाधार वाली

457
00:31:39,840 --> 00:31:44,000
थ्योरी या फिर ईश्वर को जीव मात्र की चाह

458
00:31:44,000 --> 00:31:48,000
का एकमात्र अंतिम विषय बनाने के आधार पर

459
00:31:48,000 --> 00:31:52,000
कंटिंजेंसी वाली थ्योरी के आधार पर या फिर जीव की चाह के

460
00:31:52,000 --> 00:31:56,800
वास्तविक विषय के आधार पर ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए

461
00:31:56,800 --> 00:32:00,960
ईश्वर का सर्व नियंता होना बहुत आवश्यक है।

462
00:32:00,960 --> 00:32:04,960
और सर्व नियंता होने के लिए ईश्वर का सर्वशक्तिमान होना

463
00:32:04,960 --> 00:32:09,120
अत्यंत आवश्यक है। और सर्वशक्तिमान सिद्ध होने के

464
00:32:09,120 --> 00:32:13,360
लिए ईश्वर का सर्वव्यापक होना भी अत्यंत आवश्यक

465
00:32:13,360 --> 00:32:17,520
है। और सर्वव्यापक सिद्ध होने के लिए अब

466
00:32:17,520 --> 00:32:21,520
यहां पर एक नई चीज इंट्रोड्यूस होती है कि संसार का

467
00:32:21,520 --> 00:32:26,080
ईश्वर से अभिन्न रूप से रचित होना आवश्यक है। हां,

468
00:32:26,080 --> 00:32:30,320
संसार ईश्वर से अलग से कहीं पर रचित होना आवश्यक नहीं है।

469
00:32:30,320 --> 00:32:34,480
अगर अलग से कहीं पर रचित होगा तो फिर ईश्वर वहां पर बाधित होगा। वो सर्व

470
00:32:34,480 --> 00:32:38,560
नियंता सिद्ध नहीं होगा क्योंकि वो सर्व्यापक नहीं सिद्ध होगा। तो सर्वव्यापक

471
00:32:38,560 --> 00:32:42,640
होने के लिए संसार का अभिन्न रूप से रचित होना आवश्यक है

472
00:32:42,640 --> 00:32:46,640
ईश्वर के साथ। ठीक है? अब बात यहां पर ये आती

473
00:32:46,640 --> 00:32:50,640
है कि जब ईश्वर सब जगह बिल्कुल बराबर मात्रा में है तो वहां पर

474
00:32:50,640 --> 00:32:51,140
कौन

475
00:32:50,880 --> 00:32:55,360
सा स्पेस काटा जाएगा छुरी के द्वारा? विवेक चूड़ामणि पढ़िएगा शंकराचार्य

476
00:32:55,360 --> 00:32:59,680
जी की शंकराचार्य जी का जो ग्रंथ है उसमें उन्होंने एक उदाहरण दिया है कि मान

477
00:32:59,680 --> 00:33:03,680
लीजिए एक सेब है उस सेब में अगर आपको कुछ

478
00:33:03,680 --> 00:33:07,760
बनाना है तो आपको सेब के बाहर से या छुरी चाहिए जो उसको

479
00:33:07,760 --> 00:33:11,760
काटेगी तब जाकर के और फिर सेब के बाहर स्पेस भी

480
00:33:11,760 --> 00:33:15,920
होना चाहिए तब तो वो छुरी कोई आएगी और उसमें घुसेगी और वो

481
00:33:15,920 --> 00:33:20,000
खांचा बना करके बाहर निकालेगी थोड़ा सा स्टफ तब वहां पे स्पेस होगा तब वहां कुछ

482
00:33:20,000 --> 00:33:24,240
नया कल्पित होगा तो मगर यदि यदि हमने हमें

483
00:33:24,240 --> 00:33:28,240
उसको सर्व नियंता सर्व रचयिता सर्वोच्च रचयिता इत्यादि

484
00:33:28,240 --> 00:33:32,400
सिद्ध करना है जो कि जीव की चाह का एकमात्र विषय अन्यथा अगर

485
00:33:32,400 --> 00:33:36,560
वो यह सब सिद्ध नहीं होगा तो जीव की चाह का विषय सिद्ध नहीं होगा और

486
00:33:36,560 --> 00:33:40,800
ना ही वो सर्वाधार सिद्ध होगा तो अगर सर्वाधार सिद्ध

487
00:33:40,800 --> 00:33:45,120
करना है तो हमें यह इससे दूर हटना

488
00:33:45,120 --> 00:33:49,200
पड़ेगा कि ईश्वर से अतिरिक्त कुछ स्पेस है तो जब स्पेस नहीं है तो छुरी

489
00:33:49,200 --> 00:33:53,280
कहां से होगी जो आकर के उस सेब को कट करेगी तो कहने का

490
00:33:53,280 --> 00:33:57,360
अर्थ है कि जब ईश्वर में ही संसार को बनाएंगे जहां पर ईश्वर कहीं भी

491
00:33:57,360 --> 00:34:01,520
कम ज्यादा है ही नहीं तो कैसे बनाएंगे? यहीं पर आती है ईश्वर

492
00:34:01,520 --> 00:34:05,520
की माया शक्ति। साधारण भाषा में कहें तो वीडियो गेम

493
00:34:05,520 --> 00:34:06,020
की वह

494
00:34:05,920 --> 00:34:10,080
कैसेट जो सदैव हमारे पास रखी है। हम कभी

495
00:34:10,080 --> 00:34:14,160
भी उस कैसेट को या फिर अपने मोबाइल को जो हमारे पास रखा हुआ

496
00:34:14,160 --> 00:34:18,160
है उस उससे स्वयं को कनेक्ट करके उस कैसेट के जरिए

497
00:34:18,160 --> 00:34:22,640
एक संसार क्रिएट करते हैं। इसी प्रकार से भगवान स्वयं

498
00:34:22,640 --> 00:34:26,640
में ही अपने से भिन्न नहीं अभिन्न रूप से अपनी

499
00:34:26,640 --> 00:34:31,520
माया शक्ति के द्वारा संसार को रचते हैं। इसीलिए

500
00:34:31,520 --> 00:34:35,600
ईश्वर को सनातन में कहा गया है हिरण्य गर्भा सियाराम मय

501
00:34:35,600 --> 00:34:40,000
सब जग जाना और जब इस तरीके से संसार निर्मित होता है तब

502
00:34:40,000 --> 00:34:44,720
ईश्वर उस संसार का सर्व नियंता सिद्ध होता है क्योंकि ईश्वर वहां पर सर्वशक्तिमान

503
00:34:44,720 --> 00:34:49,760
सिद्ध होता है क्योंकि ईश्वर वहां पर सर्वव्यापक सिद्ध होता है।

504
00:34:49,760 --> 00:34:53,840
ठीक है? तो इस प्रकार से हमने देखा कि ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध

505
00:34:53,840 --> 00:34:58,320
करने के लिए उसका सर्वाधार होना मनुष्य जीव की चाह का वास्तविक

506
00:34:58,320 --> 00:35:02,400
विषय होना अति आवश्यक है और इसके लिए उसका सर्वशक्तिमान

507
00:35:02,400 --> 00:35:06,560
सर्वनियंता होना अति आवश्यक है और इसके लिए उसका सर्वव्यापक होना

508
00:35:06,560 --> 00:35:10,880
अति आवश्यक है और ईश्वर की सर्वव्यापकता के लिए

509
00:35:10,880 --> 00:35:14,880
संसार का उससे अभिन्न रूप से रचित होना आवश्यक है और

510
00:35:14,880 --> 00:35:20,160
संसार का अभिन्न रूप से रचित होने के लिए

511
00:35:20,160 --> 00:35:21,200
ईश्वर की माया

512
00:35:21,200 --> 00:35:25,520
शक्ति का आलंबन लेना, अविद्या का आलंबन लेना

513
00:35:25,520 --> 00:35:29,600
आवश्यक है। उसके अस्तित्व को स्वीकार करना आवश्यक है। और जब हम ये करते

514
00:35:29,600 --> 00:35:33,680
हैं तब बाकी के जितने भी बाय प्रोडक्ट के रूप में जो जावेद अख्तर जी ने

515
00:35:33,680 --> 00:35:37,760
बहुत सारे सवाल किए ना ये अगर ईश्वर अच्छाई वो वहां

516
00:35:37,760 --> 00:35:41,840
मर क्यों रहा है कोई तो वो आगे इस वीडियो में आपको सारे सवालों के जवाब

517
00:35:41,840 --> 00:35:45,760
प्राप्त हो जाएंगे।

518
00:35:45,760 --> 00:35:49,920
अब क्या है कि अब हम थोड़ा सा बात कर लें कि

519
00:35:49,920 --> 00:35:54,480
कैसे ईश्वर जो है सर्वव्यापक सिद्ध होता है। सर्वव्यापक

520
00:35:54,480 --> 00:35:58,480
होने के साथ-साथ वो अवतार ले सकने

521
00:35:58,480 --> 00:36:02,560
वाला, प्रकट हो सकने वाला, व्यवहार में आ सकने वाला सिद्ध होता है। आपने क्या किया

522
00:36:02,560 --> 00:36:06,880
ना? आधी अधूरी बातें की हैं। इस्लाम की बात कर रहा हूं मैं आपकी नहीं।

523
00:36:06,880 --> 00:36:11,120
इस्लाम में आधी अधूरी बातें की गई है। इस्लाम में पूर्ण

524
00:36:11,120 --> 00:36:15,120
रूप से जो अव्यवहारिक ईश्वर है, व्यवहार में ना आ सकने वाला ईश्वर वो बोला ही नहीं

525
00:36:15,120 --> 00:36:19,360
गया है। वो तो बाद में भी मनुष्य यहां से फ्री हो जाएगा। उसके बाद मतलब वहां जब पहुंचेगा

526
00:36:19,360 --> 00:36:23,440
तो बाद में भी व्यवहार में आ सकता है। है ना? आप उसको देखेंगे ये होगा

527
00:36:23,440 --> 00:36:27,760
वो होगा। वहां पे क्रियाएं हो रही हैं। और जहां क्रियाएं हो रही हैं, वहां व्यवहार हो रहा है। व्यवहार

528
00:36:27,760 --> 00:36:31,840
हो रहा है तो वह फिर अव्यवहारिक नहीं रहा। और फिर आप उसको कहीं-कहीं

529
00:36:31,840 --> 00:36:35,840
पे अव्यवारिक भी कह रहे हो कि वो यहां कैसे आ सकता है? यहां व्यवहार का विषय है ही नहीं। तो

530
00:36:35,840 --> 00:36:36,340
पहले आप

531
00:36:36,320 --> 00:36:40,400
सेट कर लो कि वह अव्यवहारिक है कि नहीं है या फिर अव्यवहारिक

532
00:36:40,400 --> 00:36:44,400
होते हुए भी वह व्यवहारिक बन सकता है। है ना? एक डायमेंशन में वो

533
00:36:44,400 --> 00:36:48,400
अव्यवहारिक है और अपने द्वारा बनाई गई दूसरी डायमेंशन में वो व्यवहारिक हो

534
00:36:48,400 --> 00:36:52,400
जाता है। ठीक है? अब हमने जब यह तय कर

535
00:36:52,400 --> 00:36:56,400
लिया कि भैया ईश्वर यदि सबका कोई मूल कारण

536
00:36:56,400 --> 00:37:00,480
है तो सबका मूल कारण सर्वव्यापक

537
00:37:00,480 --> 00:37:04,720
होना भी आवश्यक है। यह हमने देख लिया। अब जो

538
00:37:04,720 --> 00:37:09,760
सबका मूल कारण वह है संसार के चलने का मूल मूल कारण

539
00:37:09,760 --> 00:37:13,920
ईश्वर है और उसके लिए उसका सर्वव्यापक होना आवश्यक है। इसका

540
00:37:13,920 --> 00:37:17,920
मतलब यह है कि वो समान रूप से पूर्ण

541
00:37:17,920 --> 00:37:21,920
रूप से पूरे संसार में जो भी कुछ एक्सिस्ट कर रहा है

542
00:37:21,920 --> 00:37:25,920
वहां पर वो विद्यमान है। ठीक है? अब दिक्कत यह आती है कि

543
00:37:25,920 --> 00:37:30,160
यदि वो समान रूप से विद्यमान है बिल्कुल बराबर से हमारी तरह नहीं

544
00:37:30,160 --> 00:37:34,160
कि मेरा यहां पर सर है और यहां पे हाथ है। यानी यहां पे मैं समान रूप से विद्यमान

545
00:37:34,160 --> 00:37:38,240
नहीं हूं। कहीं पे मेरा सर है जो कुछ और काम कर सकता है। कहीं पे मेरे हाथ है जो

546
00:37:38,240 --> 00:37:42,400
कुछ और काम कर सकते हैं। पर ईश्वर ऐसा नहीं है। ईश्वर समान रूप से

547
00:37:42,400 --> 00:37:46,400
बराबर रूप से सब जगह विद्यमान है। तभी वह सर्वशक्तिमान सर्वज्ञ

548
00:37:46,400 --> 00:37:50,560
इत्यादि और सबका मूल कारण सिद्ध हो पाएगा। तो जब

549
00:37:50,560 --> 00:37:51,440
वो समान रूप

550
00:37:51,440 --> 00:37:55,600
से सब जगह विद्यमान है तो ऐसा कैसे है कि किसी

551
00:37:55,600 --> 00:37:59,760
एक जगह पर वह पृथ्वी बनाता है जो कि साइज में छोटी होती है और

552
00:37:59,760 --> 00:38:04,000
किसी एक जगह पर वह सूर्य बनाता है जो कि साइज में बड़ा होता है। ये कैसे? जब

553
00:38:04,000 --> 00:38:08,720
वो सब जगह अह वो है

554
00:38:08,720 --> 00:38:12,880
सर्वव्यापक। अच्छा दूसरी बात यह है कि जब हम ये कह देते हैं ना समान रूप

555
00:38:12,880 --> 00:38:17,360
से सब जगह विद्यमान है। तो फिर हम ये कहते हैं

556
00:38:17,360 --> 00:38:21,360
कि भैया ईश्वर ही है सब कुछ। क्योंकि उसमें जरा सा भी अगर

557
00:38:21,360 --> 00:38:25,360
हम अंतर करेंगे जैसे हमने कह दिया उसकी फ्री विल है तो जब हम जरा सा भी

558
00:38:25,360 --> 00:38:29,440
अंतर करेंगे तो उसका पूर्ण कंट्रोल वहां सिद्ध नहीं कर पाएंगे कुछ ना

559
00:38:29,440 --> 00:38:33,920
कुछ अंतर आ जाएगा फिर वो सर्वशक्तिमान सिद्ध नहीं हो पाएगा तो अगर हमको

560
00:38:33,920 --> 00:38:38,000
यहां से मूल उसको सिद्ध करना है ना तो उसको सर्वशक्तिमान सिद्ध करना

561
00:38:38,000 --> 00:38:42,160
होगा और यदि सर्वशक्तिमान उसको सिद्ध करना है तो हमें ये मानना

562
00:38:42,160 --> 00:38:46,240
पड़ेगा कि जर्राजर्रा ईश्वर का ही रूप है। ठीक है?

563
00:38:46,240 --> 00:38:50,400
अब क्या है कि वह एक डायमेंशन की बात है कि एक डायमेंशन में ईश्वर अपना

564
00:38:50,400 --> 00:38:54,400
जो है तत्व के रूप में विद्यमान है और दूसरे डायमेंशन में उसने अपने

565
00:38:54,400 --> 00:38:58,800
आप को जीव जगत और जगदीश्वर के रूप में प्रकट कर दिया। ठीक है?

566
00:38:58,800 --> 00:39:02,960
हां तो ये शंकराचार्य जी की फिलॉसफी है। थोड़ा सा पढ़िएगा

567
00:39:02,960 --> 00:39:06,480
आपको पता चल जाएगा। खैर अभी हम लोग ईश्वर को

568
00:39:06,480 --> 00:39:10,800
सिद्ध और असिद्ध के रूप में देख रहे हैं। तो एक बात और हमने जान ली अभी जो मैंने आपको बताया

569
00:39:10,800 --> 00:39:14,880
डायमेंशन के द्वारा कि भाई जैसे एक वीडियो गेम खेल रहे हैं हम और उस वीडियो

570
00:39:14,880 --> 00:39:19,840
गेम में वीडियो गेम को हमने ही बनाया है तो उस वीडियो गेम के अंदर का संसार

571
00:39:19,840 --> 00:39:23,920
भी बनाने वाला कौन सिद्ध होता है? वो स्वयं ईश्वर

572
00:39:23,920 --> 00:39:28,160
ही सिद्ध होता है। वीडियो गेम को बनाने वाला भी। है ना? जिसने वीडियो

573
00:39:28,160 --> 00:39:32,320
गेम को बनाया है तो वीडियो गेम का संसार जो है वह भी ईश्वर ने बनाया। यानी

574
00:39:32,320 --> 00:39:36,800
कि वहां का स्पेस भी उसी ने बनाया। तो वह जो स्पेस वाली बात है ना

575
00:39:36,800 --> 00:39:40,880
यहां पर मिल जाती है कि स्पेस यानी कि अब यहां

576
00:39:40,880 --> 00:39:45,040
वाला जो ईश्वर है वो मिट्टी लेकर घड़ा बनाने वाला सिद्ध नहीं हो रहा है। क्यों?

577
00:39:45,040 --> 00:39:49,040
क्योंकि उसने स्पेस को भी क्रिएट किया है। बल्कि स्पेस के रूप में वो खुद

578
00:39:49,040 --> 00:39:53,040
ही है वहां पर। और तब यहां पर आती है माया वाली बात कि

579
00:39:53,040 --> 00:39:57,200
ईश्वर जो है अपनी माया शक्ति के द्वारा जो है संसार को उसमें

580
00:39:57,200 --> 00:40:01,200
रचते हैं। यही है जीव जगत और जगदीश्वर। तो इस

581
00:40:01,200 --> 00:40:05,360
कांसेप्ट से हमारा जो ईश्वर है सनातन ईश्वर वो सर्वशक्तिमान

582
00:40:05,360 --> 00:40:09,520
सिद्ध हुआ। सर्वव्यापक सिद्ध हुआ, सर्वज्ञ सिद्ध हुआ। और यह

583
00:40:09,520 --> 00:40:13,520
वाला जो ईश्वर है मैं साथ-साथ आपको इसलिए बताता चल रहा हूं कि यह वाला जो ईश्वर है वो

584
00:40:13,520 --> 00:40:17,520
सबका मूल सिद्ध होता है। मूल कारण सर्वाधार वो

585
00:40:17,520 --> 00:40:21,200
सिद्ध होता है।

586
00:40:21,200 --> 00:40:25,360
तो अभी मैं आपको बता रहा हूं कि अब वो जो है अवतार वाली बात कैसे आती

587
00:40:25,360 --> 00:40:29,760
है। मैं उस पे आ जाता हूं कि जब

588
00:40:29,760 --> 00:40:33,920
ईश्वर सर्वव्यापक है। जब ईश्वर कहीं भी कम

589
00:40:33,920 --> 00:40:38,080
ज्यादा नहीं है तो फिर एक दिक्कत आएगी। कहीं ज्यादा पावर वाला काम कहीं

590
00:40:38,080 --> 00:40:42,080
पे कम पावर वाला काम कैसे हो रहा है? जैसे कि मान लीजिए कि मेरे पास इस

591
00:40:42,080 --> 00:40:48,000
समय एक टेबल है और उस पे बहुत सारी चीजें पड़ी हुई हैं। कहीं पे बड़ा

592
00:40:48,000 --> 00:40:52,080
डब्बा है और कहीं पे छोटा डब्बा है। तो अगर मेरी

593
00:40:52,080 --> 00:40:56,240
शक्ति सब जगह समान रूप से व्यापक है तो

594
00:40:56,240 --> 00:41:00,320
जब मैं कोई अपनी पावर यूज़ करूंगा तो

595
00:41:00,320 --> 00:41:04,320
समान रूप से होने के कारण सब चीजें एक साथ लुढ़क जाएंगी। अगर

596
00:41:04,320 --> 00:41:08,480
मुझे वहां से मेज को खाली करना है, तो वहां समान रूप से शक्ति होने

597
00:41:08,480 --> 00:41:12,640
के कारण जब मैं उसको यूज़ करूंगा, हरकत करूंगा, तो वो सारी जो क्या

598
00:41:12,640 --> 00:41:16,720
कहते हैं, डब्बे, ढक डब्बे, ढक्कन है, सब कुछ एक साथ गिर जाएंगे।

599
00:41:16,720 --> 00:41:21,040
तो, ऐसे में क्या करें? ऐसे में क्या मैं अपनी शक्ति को रेगुलेट

600
00:41:21,040 --> 00:41:25,040
कर सकता हूं? कि मुझे कौन सा डब्बा नीचे गिराना है, कौन सा नहीं गिराना

601
00:41:25,040 --> 00:41:29,040
है। अगर मैं शक्ति को रेगुलेट कर सकता हूं, तब तो यह हो पाएगा फलाना

602
00:41:29,040 --> 00:41:33,520
वाला डब्बा जो है, नीचे गिरेगा और फलाना वाला डब्बा नीचे नहीं गिरेगा।

603
00:41:33,520 --> 00:41:36,400
ठीक है? इसी तरीके से ईश्वर

604
00:41:36,400 --> 00:41:40,800
अपने आप को रेगुलेट कर सकते हैं। सब जगह सर्वव्यापक

605
00:41:40,800 --> 00:41:44,800
होने के बावजूद भी ईश्वर अपने आप को रेगुलेट कर सकते हैं कि कहां

606
00:41:44,800 --> 00:41:48,800
पर उनकी फोर्स कितनी मात्रा में काम करनी है, कहां पर ज्यादा करनी है, कहां पर

607
00:41:48,800 --> 00:41:52,880
कम करनी है और कहां पर नहीं भी करनी। अन्यथा संसार में कोई

608
00:41:52,880 --> 00:41:57,360
भी रचना हो ही नहीं पाएगी। क्योंकि ईश्वर तो सर्वव्यापक

609
00:41:57,360 --> 00:42:01,520
है एक रस के रूप में। तो क्या ईश्वर में अपनी चीजों को

610
00:42:01,520 --> 00:42:05,920
रेगुलेट कर सकता है? अच्छा एक चीज और है कि जब वो मिट्टी के कणों को इकट्ठा

611
00:42:05,920 --> 00:42:10,080
करके जब वो पृथ्वी का निर्माण कर रहा है ईश्वर है ना तो वहां

612
00:42:10,080 --> 00:42:14,720
पर पृथ्वी पर एक धक्का लग रहा है या कोई फोर्स वहां पर यूज हो रही है।

613
00:42:14,720 --> 00:42:18,720
यानी कि वो पृथ्वी के लिए या मिट्टी के लिए व्यवहार में आ

614
00:42:18,720 --> 00:42:23,440
रहा है। उस समय अब वो बात अलग है। वो दूसरे डायमेंशन

615
00:42:23,440 --> 00:42:27,520
की बात है कि वही पृथ्वी भी है। वो ये भी है। मगर एक माया

616
00:42:27,520 --> 00:42:31,920
रूपी संसार में वो जीव जगत और जगदीश्वर के रूप में प्रकट है। अब वो जो है सृष्टि

617
00:42:31,920 --> 00:42:36,320
बना रहा है। तो सृष्टि बनाने के रूप में जब हम और उसको प्रैक्टिकल

618
00:42:36,320 --> 00:42:40,320
ये खोल रहे हैं चीजों को तब वहां पर यह वाली बात आ

619
00:42:40,320 --> 00:42:44,400
रही है कि जब वो मिट्टी के कणों को

620
00:42:44,400 --> 00:42:48,640
इकट्ठा कर रहा है तो वहां पर मिट्टी के कणों के लिए वो व्यवहारिक

621
00:42:48,640 --> 00:42:51,440
हो रहा है। क्या हो रहा है? व्यवहारिक। यानी

622
00:42:51,440 --> 00:42:55,680
कि मिट्टी के कणों को फोर्स फील हो रही है वहां पर। मतलब

623
00:42:55,680 --> 00:42:59,920
उसके तो कोई प्रज्ञा शक्ति नहीं है। हमारे भौतिक जगत के अनुसार उसमें

624
00:42:59,920 --> 00:43:04,160
प्रज्ञा शक्ति नहीं है। परंतु वहां उसको व्यवहार प्राप्त हो रहा है कि वो धक्के

625
00:43:04,160 --> 00:43:08,240
के कारण वो आगे खिसक रही है। वो व्यवहार उसको प्राप्त हो रहा है। यह हम जानते हैं क्योंकि उसमें

626
00:43:08,240 --> 00:43:12,320
प्रज्ञा शक्ति नहीं है। भौतिक जगत के अनुसार वो नहीं जानती। मिट्टी नहीं जानती। मगर

627
00:43:12,320 --> 00:43:16,480
वहां व्यवहार हो रहा है मिट्टी के साथ। ऐसा ही व्यवहार पूरे संसार के साथ

628
00:43:16,480 --> 00:43:20,560
हो रहा है कि भैया कहीं पर धक्का लग रहा है और वह कुछ कर रहे हैं या कहीं पर

629
00:43:20,560 --> 00:43:24,640
उसको उठाया जा रहा है। यह सब चीजें हो रही हैं या कहीं पर कुछ तोड़ा भी जा रहा है। तो यहां पर

630
00:43:24,640 --> 00:43:28,640
क्या हो रहा है? ईश्वर व्यवहारिक हो रहा है। इसका अर्थ क्या

631
00:43:28,640 --> 00:43:31,680
हुआ कि

632
00:43:31,680 --> 00:43:35,760
ईश्वर कहीं पर किसी जगह पर व्यवहार का विषय बन रहा है।

633
00:43:35,760 --> 00:43:39,760
कहीं पर नहीं भी बन रहा है। कहीं पर ज्यादा बन रहा है और

634
00:43:39,760 --> 00:43:43,920
कहीं पर कम भी बन रहा है। दूसरी बात यह भी है अगर इसको ऐसे मान

635
00:43:43,920 --> 00:43:47,920
के चलें कि अगर एक हम छू के किसी चीज को मटके को

636
00:43:47,920 --> 00:43:51,920
बना रहे हैं। छू के तो कम से कम जो ये छूने

637
00:43:51,920 --> 00:43:56,000
वाली जो इंद्रिय है, है ना? उसका विषय तो बन ही रहा है ना ईश्वर कि

638
00:43:56,000 --> 00:44:00,320
कहीं पर वो पृथ्वी बना रहा है, कहीं पर वो जो है ah सूर्य

639
00:44:00,320 --> 00:44:04,320
बना रहा है तो वहां पर वो जो है उतने हिस्से में जब वो कोई क्रिया

640
00:44:04,320 --> 00:44:06,480
हो रही है तो वहां पर वो

641
00:44:06,480 --> 00:44:10,560
व्यवहारिक हो रहा है। और उसने यह भी तय कर रखा है कि वह कहां

642
00:44:10,560 --> 00:44:14,560
पर कितनी मात्रा में व्यवहारिक हो, कहां पर कम मात्रा में हो, कहां पर ज्यादा

643
00:44:14,560 --> 00:44:19,200
मात्रा में हो, कहां पर ना भी हो। बस यहीं से

644
00:44:19,200 --> 00:44:23,360
अच्छा पहली बात तो यह है कि जो तीन डायमेंशंस है ना ईश्वर

645
00:44:23,360 --> 00:44:27,600
के निर्गुण निराकार था जो सब जगह सर्वव्यापक था।

646
00:44:27,600 --> 00:44:31,920
अब वो जब कहीं पर कम कहीं पर ज्यादा अपनी

647
00:44:31,920 --> 00:44:36,000
शक्ति यूज करने वाले के रूप में जब वो

648
00:44:36,000 --> 00:44:40,400
ईश्वर काम कर रहा है तो यहां पर वो सगुण निराकार हो गया। पहले वह निर्गुण निराकार

649
00:44:40,400 --> 00:44:44,480
क्योंकि वह अब एक रस है बस। दैट्स इट। मगर जब उसने

650
00:44:44,480 --> 00:44:48,640
अपने आप को रेगुलेट किया कहीं कम ज्यादा किया तो अब उसमें गुण आ गया

651
00:44:48,640 --> 00:44:52,640
सगुण निराकार और बस यहीं से वह चीज आती है कि

652
00:44:52,640 --> 00:44:56,640
जब वो अपने आप को इतना रेगुलेट कर सकता है कि कहीं पर वो धक्के

653
00:44:56,640 --> 00:45:00,720
का विषय बने हां और कहीं पर धक्के का विषय ना

654
00:45:00,720 --> 00:45:05,120
बने। कहीं पे वो फोर्स बनके किसी के लिए व्यवहारिक

655
00:45:05,120 --> 00:45:09,200
हो पाए और कहीं पे वो फोर्स बनके किसी के लिए व्यवहारिक ना हो पाए। जब वह अपने

656
00:45:09,200 --> 00:45:13,360
आप को इतना रेगुलेट कर रहा है तो फिर

657
00:45:13,360 --> 00:45:17,680
वह अपने आप को आगे एक जगह और रेगुलेट करता है कि इतने

658
00:45:17,680 --> 00:45:21,520
हिस्से में जो मैंने एक आकृति बनाई है मनुष्य के जैसी इतने

659
00:45:21,520 --> 00:45:25,680
हिस्से में मुझको वो देख पाए मैं आंखों का विषय बनूं और बाकी

660
00:45:25,680 --> 00:45:29,680
के हिस्से में ना बनूं। तो यह वो वाली बात हो गई कि जो सब जगह वो एक जगह

661
00:45:29,680 --> 00:45:33,680
कैसे दिख रहा है? सब जगह है मगर उसका

662
00:45:33,680 --> 00:45:37,840
उतना ही हिस्सा आपको दिखाई दे रहा है। तो यह हो गया अवतार।

663
00:45:37,840 --> 00:45:41,840
यह हो गया सर्वशक्तिमान ईश्वर। अब इससे आगे चलते

664
00:45:41,840 --> 00:45:45,040
हैं।

665
00:45:45,040 --> 00:45:49,200
तो कहने का अर्थ यह है कि यहां से हमने दो चीजें निकाल

666
00:45:49,200 --> 00:45:53,360
ली कि सनातन ईश्वर सर्वशक्तिमान सर्वज्ञ और सर्वव्यापक

667
00:45:53,360 --> 00:45:57,440
सिद्ध होता है। और वो सर्वम खलविदम ब्रह्म वाली बात जो कही गई

668
00:45:57,440 --> 00:46:01,520
थी इस चर्चा के बीच में एक शायद पूरी तरीके से उनको

669
00:46:01,520 --> 00:46:05,520
जानकारी नहीं होगी। या फिर उनको मौका नहीं दिया गया जो एक वृद्ध जन उन्होंने

670
00:46:05,520 --> 00:46:09,680
उठाई थी वाली बात कि भाई सब कुछ ईश्वर ही है तो उन्होंने कह दिया था कि सब कुछ ईश्वर

671
00:46:09,680 --> 00:46:13,840
है तो वो वहां पर सब कुछ ईश्वर कैसे हो सकता है भाई

672
00:46:13,840 --> 00:46:18,080
सब कुछ ईश्वर ऐसे हो सकता है कि जब कोई व्यक्ति स्वप्न देखता है

673
00:46:18,080 --> 00:46:22,160
तो उस स्वप्न के अंदर जो

674
00:46:22,160 --> 00:46:26,480
सृष्टि होती है जो खाली स्पेस होता है वह स्पेस भी वही व्यक्ति

675
00:46:26,480 --> 00:46:30,560
होता है उसके अंदर जो प्राणी देखता है वह प्राणी भी वही

676
00:46:30,560 --> 00:46:34,960
होता है और उसके अंदर यदि उन प्राणियों की मदद करने के लिए वह अपनी कल्पना

677
00:46:34,960 --> 00:46:36,800
के या अपने स्वप्न

678
00:46:36,800 --> 00:46:41,040
के अंदर जब किसी रूप में पहुंचता है तो वह उनका

679
00:46:41,040 --> 00:46:45,600
ईश्वर कहलाता है और वह ईश्वर भी वही होता है। इसी को कहते हैं

680
00:46:45,600 --> 00:46:49,680
ईश्वर जीव जगत और जगदीश्वर के रूप में प्रकट होते हैं।

681
00:46:49,680 --> 00:46:53,680
व्यवहारिक होते हैं। तो इस यह जो दुनिया है

682
00:46:53,680 --> 00:46:57,680
स्वप्न की दुनिया एक व्यक्ति की उसको आप ईश्वर के दृष्टिकोण से

683
00:46:57,680 --> 00:47:01,760
एक डायमेंशन दूसरी डायमेंशन जो ईश्वर ने बनाई है एक डायमेंशन वो कह सकते

684
00:47:01,760 --> 00:47:05,760
हो या फिर ईश्वर का वीडियो गेम कह सकते हो या फिर ईश्वर की माया

685
00:47:05,760 --> 00:47:09,920
शक्ति भी कह सकते हो माया शक्ति के द्वारा निर्मित संसार तो कुल मिलाकर

686
00:47:09,920 --> 00:47:15,280
के क्या है कि जो इस्लाम का ईश्वर है वो

687
00:47:15,280 --> 00:47:19,280
सर्वव्यापक तो क्या वो तो सर्वशक्तिमान भी सिद्ध नहीं हो रहा

688
00:47:19,280 --> 00:47:23,280
है और थोड़ा सा चोट आपने वो छुरी वाला एग्जांपल दे के उसकी सर्वज्ञता पर भी

689
00:47:23,280 --> 00:47:27,280
कर दी। तो फिर क्या इस्लाम के ईश्वर के द्वारा नास्तिकता

690
00:47:27,280 --> 00:47:32,080
को पराजित किया गया है? नहीं किया गया। क्योंकि अगर ये क्वेश्चंस

691
00:47:32,080 --> 00:47:36,480
वहां पर रेज किए जाते कि भाई वो अगर सब पर कंट्रोल

692
00:47:36,480 --> 00:47:40,720
कर रहा है मगर वह तो एक जगह बैठा हुआ है तो कंट्रोल कैसे कर रहा है? किस

693
00:47:40,720 --> 00:47:44,720
रूप में? कैसे कर रहा है? के ईश्वर की जो माया शक्ति है, अविद्या शक्ति

694
00:47:44,720 --> 00:47:48,720
है, प्रकृति है, उसके अस्तित्व को और उस पर पूरी

695
00:47:48,720 --> 00:47:52,400
तरीके से अभिन्नता को स्वीकार करने के बाद ही

696
00:47:52,400 --> 00:47:57,200
ईश्वर सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सर्व नियंता और सर्वसामर्थ्यवान

697
00:47:57,200 --> 00:48:02,160
सिद्ध होता है। और ऐसा नहीं है। अ

698
00:48:02,160 --> 00:48:06,400
कई ऐसे सेक्स हैं तथाकथित जो कई मामलों में

699
00:48:06,400 --> 00:48:10,800
ईश्वर को बाधित करते हैं सनातन के नाम से भी और हम उनके शोधन के लिए प्रयासरत

700
00:48:10,800 --> 00:48:14,880
हैं। तो ऐसा विचार मन में लाना है कि आपका तो वह वाला सेक्ट ऐसा नहीं मानता। हो सकता है आपके

701
00:48:14,880 --> 00:48:19,440
यहां भी कई सारे सेट हैं तो वह भी आपकी कई बातों से

702
00:48:19,440 --> 00:48:23,760
वो नहीं होंगे। तो वहां पर यह देखा जाता है कि फिर भैया कौन सी बात को वास्तविक

703
00:48:23,760 --> 00:48:27,840
सनातन धर्म के रूप में देखा जाए तो उसके बारे में भी हमारे

704
00:48:27,840 --> 00:48:31,840
पास पर्याप्त चीजें हैं। संभवत आपको क्यों देखा जाए इस बारे में आपके पास है

705
00:48:31,840 --> 00:48:36,320
कि नहीं मुझे नहीं लगता। है क्योंकि उस पर भी एक चोट है कि वह

706
00:48:36,320 --> 00:48:40,960
आपकी चेन ऑफ नरेशन की बात क्यों मानी जाए वह एक अलग विषय हो जाएगा। खैर

707
00:48:40,960 --> 00:48:44,960
हमारे पास उसे परंपरा कहते हैं। यह जो सनातन

708
00:48:44,960 --> 00:48:49,040
का अर्थ हम आपके सामने प्रस्तुत कर रहे हैं। यह प्रामाणिक रूप से प्रामाणिक जो

709
00:48:49,040 --> 00:48:53,120
परंपरा है जो वेद लेकर के आती है जो परंपरा जो शास्त्रों को

710
00:48:53,120 --> 00:48:57,760
लेकर के आती है जो परंपरा उस परंपरा के द्वारा बताया गया अर्थ है।

711
00:48:57,760 --> 00:49:01,760
ठीक है? तो यहां पर उसकी प्रामाणिकता भी सिद्ध होती

712
00:49:01,760 --> 00:49:05,760
है कि सनातन के नाम से जो हम प्रस्तुत कर रहे हैं उस पर यदि और कोई यह कह रहा है नहीं

713
00:49:05,760 --> 00:49:07,600
नहीं ऐसा नहीं है तो उस और

714
00:49:07,600 --> 00:49:11,840
कोई पर जो है हम ये कह सकते हैं ये सनातन नहीं है। इतने अंश में है जो सनातन विरोधी

715
00:49:11,840 --> 00:49:17,760
है। तो यह वाली बात में भी आप ना जाएं।

716
00:49:17,760 --> 00:49:21,760
इसी क्रम में जावेद जी द्वारा एक जो है सवाल किया गया

717
00:49:21,760 --> 00:49:25,840
कि भैया अगर ईश्वर है तो फिर बच्चे मर क्यों रहे हैं? यह क्यों

718
00:49:25,840 --> 00:49:30,080
हो रहा है? वह क्यों हो रहा है? बुराई क्यों है? हम

719
00:49:30,080 --> 00:49:34,160
तो सबसे पहली बात तो यहां पर पहला उदाहरण यही

720
00:49:34,160 --> 00:49:38,160
है कि जब हम यह कहते हैं कि इस दुनिया में सबका

721
00:49:38,160 --> 00:49:42,240
मूल कारण ईश्वर है तो हमें यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि हमको

722
00:49:42,240 --> 00:49:46,320
जो बुराई लग रही है उसका भी मूल कारण ईश्वर ही है। तो इसका अर्थ

723
00:49:46,320 --> 00:49:50,400
क्या हुआ कि ईश्वर के होने का अर्थ यह नहीं है कि दुनिया में बुराई ना हो। पहले तो

724
00:49:50,400 --> 00:49:54,400
एक तार्किक चीज है कि ईश्वर के अर्थ ईश्वर के

725
00:49:54,400 --> 00:49:58,400
होने का अर्थ यह नहीं है कि दुनिया में बुराई ना हो। क्योंकि सब

726
00:49:58,400 --> 00:50:02,560
चीजों का कारण ईश्वर ही है। मूल कारण ईश्वर ही सिद्ध

727
00:50:02,560 --> 00:50:06,560
होगा हर चीज का। तो अब यह बुराई का दोष

728
00:50:06,560 --> 00:50:10,640
ईश्वर पर जाता है कि नहीं? नहीं जाता तो क्यों नहीं जाता? यह सब चीजें सनातन

729
00:50:10,640 --> 00:50:14,800
इसके उत्तर देता है। इस्लाम इसके उत्तर नहीं देता है। यद्यपि वो प्रश्न वहां

730
00:50:14,800 --> 00:50:18,880
पूछे नहीं गए। और इसीलिए मैंने शुरू में कहा था कि भाई वहां मर्मज्ञ होना

731
00:50:18,880 --> 00:50:23,680
चाहिए था कोई। वो उत्तर देता। तो

732
00:50:23,680 --> 00:50:28,400
इसमें एक बात और कही गई कि भाई जब बुरा

733
00:50:28,400 --> 00:50:32,400
वक्त बुरा विकल्प आपको दिया जाएगा और आप सही विकल्प के साथ खड़े रहोगे।

734
00:50:32,400 --> 00:50:33,120
मतलब क्या होता

735
00:50:33,120 --> 00:50:37,120
अगर मैं अपने स्टूडेंट को एमसीक्यूस दूं और उसमें सिर्फ राइट आंसर लिख कर दे

736
00:50:37,120 --> 00:50:39,440
दूं और कहूं तुम्हारा टेस्ट हो गया। ये मीनिंगलेस है।

737
00:50:39,440 --> 00:50:44,880
इस दुनिया में अगर हम टेस्ट के लिए आए हैं तो जाहिर है गुड एंड इविल दोनों मौजूद है।

738
00:50:44,880 --> 00:50:48,880
बहुत ही वीक यहां पर ये तर्क दिया गया मुफ्ती के

739
00:50:48,880 --> 00:50:52,960
द्वारा। क्यों वीक तर्क था कि जब आपको हम बुराई

740
00:50:52,960 --> 00:50:56,960
की चीजें भी देंगे और आपको अच्छाई की चीजें भी देंगे। उन विकल्पों में से आप

741
00:50:56,960 --> 00:51:01,840
जब अच्छाई के साथ खड़े रहेंगे तब जाकर के

742
00:51:01,840 --> 00:51:05,920
आप जो है परीक्षा में पास होंगे, उत्तीर्ण होंगे। इसलिए

743
00:51:05,920 --> 00:51:10,480
एक सही उसके साथ तीन गलत विकल्पों की तरह

744
00:51:10,480 --> 00:51:14,560
जो है अच्छाई और बुराई दोनों चीजें दी जा रही है। यहां पर आप बहुत बुरा फर्ज

745
00:51:14,560 --> 00:51:19,040
गए ये बात कह के और यह बात मुझसे पहले भी कही गई है। मैं

746
00:51:19,040 --> 00:51:23,040
इनके ही एक मुफ्ती जो इस चर्चा में भी जुड़े हुए थे वो अलवजीदी शायद नाम है।

747
00:51:23,040 --> 00:51:27,120
उनसे ये प्रश्न आज से शायद तीन चार साल पहले कर चुका हूं। यही प्रश्न

748
00:51:27,120 --> 00:51:31,120
थे मेरे ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं है। और यह जो विकल्प वाली बात

749
00:51:31,120 --> 00:51:35,280
आई यहां फंस गए थे मुफ्ती तब भी फंस गए थे। क्या था मामला? इन्होंने मुझको वहीं

750
00:51:35,280 --> 00:51:39,280
पर यह कहा कि भैया यह तो एक खेल चल एक परीक्षा चल रही है

751
00:51:39,280 --> 00:51:43,360
और परीक्षा में आपको जैसे विकल्प दिए जाते हैं तीन ये विकल्प और एक

752
00:51:43,360 --> 00:51:47,600
सही वाला विकल्प उसी तरीके से आपको बुराई भी दी गई है यानी शैतान

753
00:51:47,600 --> 00:51:52,000
भी दिया गया है और जो है आपको अच्छाई भी दी गई है। अच्छा भाई

754
00:51:52,000 --> 00:51:56,000
जो विकल्प होते हैं ना परीक्षा के समय हम उसमें

755
00:51:56,000 --> 00:52:00,640
से किसी कौन सा सही है और कौन सा गलत है

756
00:52:00,640 --> 00:52:04,880
यह जानने के लिए उस परीक्षा से पहले हमको एक पढ़ाई कराई

757
00:52:04,880 --> 00:52:08,880
जाती है। है ना? जिसमें हमको सही-सही चीजें बताई

758
00:52:08,880 --> 00:52:12,880
जाती हैं। तो अगर इस्लाम के द्वारा

759
00:52:12,880 --> 00:52:17,360
मिलने वाली जो शिक्षा है वह परीक्षा के विकल्पों

760
00:52:17,360 --> 00:52:21,120
की तरह है। है ना? तो पढ़ाई कहां पर हुई है?

761
00:52:21,120 --> 00:52:25,280
अगर कुरान सही विकल्प है। इस्लाम के अनुसार

762
00:52:25,280 --> 00:52:29,440
जो बताया जा रहा है, अगर कुरान सही वाला विकल्प है और

763
00:52:29,440 --> 00:52:33,440
जो उसके अगेंस्ट जो चीजें हैं, बुराइयां हैं वो वो गलत

764
00:52:33,440 --> 00:52:38,720
विकल्प है जिन्हें आपको नहीं सेलेक्ट करना है तो कुरान को सेलेक्ट करने का आधार

765
00:52:38,720 --> 00:52:42,720
हमारी जो पढ़ाई है वो कहां पर पढ़ाई गई है भाई? वो

766
00:52:42,720 --> 00:52:47,760
होएगी ना प्रमाण। तो कुरान प्रमाण नहीं हो गई ना। फिर

767
00:52:47,760 --> 00:52:52,480
कुरान को तो वहां परीक्षा के समय सही विकल्प के रूप में चुनना है।

768
00:52:52,480 --> 00:52:56,560
मगर कुरान सही है। यह हमें कौन सी पढ़ाई में बताया

769
00:52:56,560 --> 00:53:00,560
गया है? कुरान स्वयं जो बता रही है, कुरान

770
00:53:00,560 --> 00:53:04,720
स्वयं जो बता रही है, हम उसको प्रमाण मान रहे हैं। जबकि वह तो विकल्प के रूप में आई है।

771
00:53:04,720 --> 00:53:08,800
कहने का मतलब यह है सरल भाषा में कि जब आप यह

772
00:53:08,800 --> 00:53:12,960
कह रहे हैं कि आपको जो है विकल्प दिए गए हैं।

773
00:53:12,960 --> 00:53:16,960
एक सही है, तीन गलत। तो एक चीज सही है जैसे कुरान इस्लाम मान

774
00:53:16,960 --> 00:53:21,120
लिया और बाकी तीन गलत है बुराई मान ली नास्तिकता मान ली और आपके अनुसार जो आपके

775
00:53:21,120 --> 00:53:25,760
विरोधी जो तंत्र है या सनातन इत्यादि हैं वो

776
00:53:25,760 --> 00:53:29,760
उसमें दिक्कत यह आती है भाई साहब कि जब परीक्षा कराने

777
00:53:29,760 --> 00:53:33,840
वाला ही आपको दोनों चीजें दे रहा है तो उसमें से सही चीज

778
00:53:33,840 --> 00:53:36,240
चुनने के लिए आपके पास एक तृतीय पक्ष होना

779
00:53:36,240 --> 00:53:40,560
चाहिए तो पक्ष क्या है इस्लाम का वेद

780
00:53:40,560 --> 00:53:44,560
वेदों से तय करोगे कौन सही है कौन गलत या फिर वेद नहीं है

781
00:53:44,560 --> 00:53:48,800
तो कौन सा पक्ष है आपका जिसमें हम यह तय कर पाए कि भैया इनमें से कौन सा हमें

782
00:53:48,800 --> 00:53:52,800
चुनना है कुरान चुननी है या दूसरी चीजें चुननी है कहां से तय कर रहे हो वो

783
00:53:52,800 --> 00:53:56,880
तृतीय पक्ष क्या है क्योंकि जो आपका जो भी कुछ है एंड वो तो

784
00:53:56,880 --> 00:54:00,960
कुरान स्वयं है तो कुरान का आधार क्या है हम वहां पर कुरान को

785
00:54:00,960 --> 00:54:05,120
किस आधार पर चुनेंगे वो पढ़ाई हमें कहां पर कराई जा रही है

786
00:54:05,120 --> 00:54:09,520
कि कुरान सही है कुरान आपको पढ़ाई करा रही है

787
00:54:09,520 --> 00:54:13,680
तो यानी कि कुरान के आधार आधार

788
00:54:13,680 --> 00:54:17,760
पर आपसे जब एक वह लिया जाए कि कुरान के अंदर यह लिखा है कि नहीं लिखा

789
00:54:17,760 --> 00:54:21,840
है। उस आधार पर आपको विकल्प दिए जाए तब तो ठीक है। मगर यहां तो

790
00:54:21,840 --> 00:54:26,080
कुरान स्वयं ही विकल्प में आ गई ना। हम

791
00:54:26,080 --> 00:54:30,080
तो कहने का अर्थ यह है कि यदि कुरान एक विकल्प

792
00:54:30,080 --> 00:54:34,080
है तो फिर कुरान को विकल्प बताने वाली कुरान

793
00:54:34,080 --> 00:54:38,240
को सही विकल्प बताने वाली पढ़ाई कहां पर है? छुरी बनाने वाला

794
00:54:38,240 --> 00:54:42,240
जो तर्क था वह भी कितना वीक था कि भैया जो बम बना रहा

795
00:54:42,240 --> 00:54:46,560
है उसका दोष नहीं है। वह तो देश की रक्षा के लिए बना सकता है। जो उसका उपयोग

796
00:54:46,560 --> 00:54:50,880
कर रहा है गलत उसका दोष है। नहीं यहां पर सीन दूसरा

797
00:54:50,880 --> 00:54:51,440
है जो बम

798
00:54:51,440 --> 00:54:55,920
बना रहा है उसको पता भी है कि बम क्यों बनाया जा क्यों जा रहा है और

799
00:54:55,920 --> 00:54:59,920
साथ ही साथ उस वो उस बम को गलत उपयोग से रोक भी

800
00:54:59,920 --> 00:55:04,320
सकता है। मगर वो नहीं रोकता है। और ऐसे में आप जावेद

801
00:55:04,320 --> 00:55:08,400
जी के इन प्रश्नों के सटीक उत्तर नहीं दे पाए। वह बात और है कि जावेद जी किस कारण

802
00:55:08,400 --> 00:55:12,480
से आपके समक्ष वह जो स्ट्रांग आर्गुममेंट है वह आप प्रस्तुत

803
00:55:12,480 --> 00:55:16,480
नहीं कर सके। खैर आगे चलते हैं। कुल मिलाकर के यह है

804
00:55:16,480 --> 00:55:22,400
कि जब इस तरह के आरोप लगते हैं कि भाई वो भी

805
00:55:22,400 --> 00:55:26,480
क्या कहते हैं? इस तरह के आरोप लगते हैं कि दुनिया में बुरा क्यों हो रहा है? यह क्यों हो रहा है? वह क्यों

806
00:55:26,480 --> 00:55:31,120
हो रहा है? तो अगर हम इसमें माया के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करेंगे।

807
00:55:31,120 --> 00:55:35,200
इसको रियलिटी स्वीकार करेंगे। यही है

808
00:55:35,200 --> 00:55:39,600
सत्य। वास्तविक सत्य है। यह सब कुछ जो हो रहा है रियलिटी

809
00:55:39,600 --> 00:55:44,480
है। तो हम इन बातों का जवाब नहीं दे सकते। हमको माया, विद्या, प्रकृति

810
00:55:44,480 --> 00:55:48,560
इस इन रूपों में यहां होने वाली चीजों को स्वीकार करना ही

811
00:55:48,560 --> 00:55:52,640
पड़ेगा। अगर हमको किसी मूल कारण

812
00:55:52,640 --> 00:55:56,800
का अस्तित्व स्थापित करना है तो और उसको मूल कारण, सर्वशक्तिमान,

813
00:55:56,800 --> 00:56:01,680
सर्वज्ञ और सर्वनियंता इत्यादि सिद्ध कर सकना है तो

814
00:56:01,680 --> 00:56:06,640
सिद्ध करना है तो अब इसके बाद एक बात और आती है

815
00:56:06,640 --> 00:56:10,720
कि यहां पर मैं अब अपनी परिभाषा लाने वाला हूं

816
00:56:10,720 --> 00:56:14,960
कि क्यों आवश्यकता है यह माया को स्वीकार करने की माया को स्वीकार

817
00:56:14,960 --> 00:56:18,960
करने की आवश्यकता क्यों है? जैसे कि भगवत गीता में कहा गया नैन छिनती शस्त्राण

818
00:56:18,960 --> 00:56:23,040
नैन दति पावका ना चैनम क्लेप ना शोषति मारुता

819
00:56:23,040 --> 00:56:27,040
तो यदि यानी यहां पर बताया गया है कि जो वास्तविकता में शरीर को धारण

820
00:56:27,040 --> 00:56:31,280
करने वाला शरीर है यानी आत्मा है वो जो है

821
00:56:31,280 --> 00:56:35,360
उसको कुछ नहीं हो रहा है और यहां पर होने वाली चीजें ये सब माया है। ये सब

822
00:56:35,360 --> 00:56:39,600
तुम अज्ञानता को प्राप्त हो इसलिए तुम्हें ऐसा लग रहा है। ऐसे की

823
00:56:39,600 --> 00:56:45,280
कई बार ऐसा होता है कि जो बड़े होते हैं उनको

824
00:56:45,280 --> 00:56:49,360
वो चीजें दिख रही होती है छोटा बच्चा जिन चीजों के लिए रो रहा है जैसे आपने बताया

825
00:56:49,360 --> 00:56:53,600
ना डॉक्टर वाला उदाहरण कि डॉक्टर ने इंजेक्शन लगाया तो जिसका

826
00:56:53,600 --> 00:56:57,760
पर्सपेक्टिव छोटा है उसके लिए तो वो बुरा काम हुआ है ना मगर डॉक्टर

827
00:56:57,760 --> 00:57:02,080
को मालूम है कि वो सही काम कर रहा है। तो यह जो पर्सपेक्टिव है ना

828
00:57:02,080 --> 00:57:06,560
यही माया वाला पर्सपेक्टिव है कि हमें

829
00:57:06,560 --> 00:57:10,560
लग रहा है कि हमें जो सुई चुभई जा रही है हमारी हम मर रहे हैं। हमें लग रहा है

830
00:57:10,560 --> 00:57:14,720
कि हम मर रहे हैं। और रियलिटी यह है कि हम नहीं मर रहे हैं। हमको

831
00:57:14,720 --> 00:57:18,720
यहां पर अज्ञानता के कारण ऐसा लग रहा है कि हम मर रहे हैं। और

832
00:57:18,720 --> 00:57:22,320
इस अज्ञानता से छूट जाना ही इस अज्ञानता

833
00:57:22,320 --> 00:57:26,560
से पृथक हो जाना ही अपने स्वरूप भूत अपने भगवान

834
00:57:26,560 --> 00:57:30,560
में लय हो जाना ही मोक्ष है। हम्?

835
00:57:30,560 --> 00:57:34,960
खैर, इस पे अभी और आगे बात करेंगे। अभी यहां पे बात कर लेते हैं कि मैं अपनी परिभाषा लने

836
00:57:34,960 --> 00:57:39,440
वाला हूं। और एक बात और है। यह परिभाषा क्यों है? आवश्यक

837
00:57:39,440 --> 00:57:43,680
इस पर भी बात करनी होगी। परिभाषा इसलिए आवश्यक है क्योंकि चलो

838
00:57:43,680 --> 00:57:48,000
मान लिया कि वह जो ईश्वर

839
00:57:48,000 --> 00:57:52,080
है वह सबका मूल कारण है। हालांकि आपका वह सिद्ध नहीं होता। मगर वो मूल

840
00:57:52,080 --> 00:57:56,080
कारण सिद्ध कर लिया आपने। मगर वह मूल कारण है। मगर वह

841
00:57:56,080 --> 00:58:00,320
मनुष्य के लिए प्रतिपाद्य भी है। यह कैसे?

842
00:58:00,320 --> 00:58:04,640
मनुष्य का उद्देश्य भी है, प्राप्तव्य भी है। वह कैसे?

843
00:58:04,640 --> 00:58:08,720
वह तो आपने सिद्ध किया ही नहीं ना। यानी कि मान लो दुनिया में

844
00:58:08,720 --> 00:58:13,200
कोई बहुत पैसे वाला है तो उस पैसे वाला वाले का अनुगमन

845
00:58:13,200 --> 00:58:17,840
अनुसरण अनुकरण मैं क्यों करूं? क्यों करूं भाई?

846
00:58:17,840 --> 00:58:21,840
जब तक मुझे उसके पैसे की आवश्यकता सिद्ध नहीं

847
00:58:21,840 --> 00:58:26,080
होगी और यह सिद्ध नहीं होगा कि वह मुझे पैसा दे सकता है।

848
00:58:26,080 --> 00:58:30,080
देगा तब तक मैं उसका अनुकरण अनुगमन क्यों करूं

849
00:58:30,080 --> 00:58:34,320
तो तार्किक दृष्टि से आपने वो सिद्ध नहीं किया। आपके जो स्क्रिप्चर्स

850
00:58:34,320 --> 00:58:37,840
हैं वह यह कहेंगे कि हम देंगे। मगर तार्किकता

851
00:58:37,840 --> 00:58:41,840
से आपने उसको सिद्ध नहीं किया कि हम क्यों उसका

852
00:58:41,840 --> 00:58:46,080
अनुगमन करें। क्यों उसके पीछे पीछे जाए। हम क्यों अट्रैक्ट हो उसके लिए

853
00:58:46,080 --> 00:58:50,320
हमारी चाह का विषय आपने सिद्ध ही नहीं किया उसको

854
00:58:50,320 --> 00:58:54,800
तो सिद्ध क्या-क्या नहीं किया आपने एक तो मेटाफिजिकल

855
00:58:54,800 --> 00:58:58,800
का अस्तित्व सिद्ध नहीं किया आपका जो ईश्वर है

856
00:58:58,800 --> 00:59:02,960
वो मेटाफिजिकल सिद्ध नहीं होता है क्योंकि वह अंत

857
00:59:02,960 --> 00:59:07,520
में भी व्यवहारिक है अंततो कत्वा सर्वशक्तिमान

858
00:59:07,520 --> 00:59:11,920
सर्वज्ञ सर्वज्ञ तो खैर आपकी वह भूल है को तर्क देना

859
00:59:11,920 --> 00:59:15,920
नहीं तो सर्वज्ञ तो आप मानते होगे परंतु यहां पर कुतर्क देकर के फंस

860
00:59:15,920 --> 00:59:21,440
रहे हो। तो यह भी भूल है।

861
00:59:21,440 --> 00:59:25,840
अ सर्वज्ञ चलो हटा देते हैं। सर्वज्ञ मानते हो आप सर्वज्ञ

862
00:59:25,840 --> 00:59:30,000
कहते हो उसे और यह जो आपने तर्क दिया है वो गलत दे दिया। गलती से दे दिया। ये

863
00:59:30,000 --> 00:59:34,000
मान लेते हैं। मगर फिर जब गलती से दे दिया तो वो वाला दोष मुक्त नहीं हो

864
00:59:34,000 --> 00:59:38,080
पाओगे। हमारे ईश्वर को माने बिना। यह भी दिक्कत है कि जो छुरी

865
00:59:38,080 --> 00:59:42,400
को बनाने वाला जो होता है उसको दोष नहीं लगता। छुरी का गलत इस्तेमाल करने वाले को दोष लगता है।

866
00:59:42,400 --> 00:59:46,400
तो अगर आप यह बात मैंने मुफ्ती से भी पूछी थी जो मुफ्ती जी इसमें खड़े हुए

867
00:59:46,400 --> 00:59:50,640
हैं ना अंत में उनसे पूछी थी कि क्या बुराई को बनाने वाला

868
00:59:50,640 --> 00:59:52,880
बुराई को बनाना बुराई नहीं है। तो मुफ्ती जी बोले नहीं

869
00:59:52,880 --> 00:59:56,880
बुराई नहीं है। यहां अटक गए थे मुफ्ती जी। देखिएगा आप

870
00:59:56,880 --> 01:00:00,880
तो इन्होंने कह दिया था बुराई को बनाना बुराई नहीं है। उस सूरत में बुराई नहीं जब

871
01:00:00,880 --> 01:00:04,880
बुराई को बना बुराई को बनाने वाला ना जानता हो बुराई है। उस सूरत

872
01:00:04,880 --> 01:00:09,120
में बुराई नहीं है जब बुराई को बनाने वाला बुराई को रोक ना सकता हो। बुरा

873
01:00:09,120 --> 01:00:13,200
होने से मगर तब बुराई है जब वह

874
01:00:13,200 --> 01:00:19,200
रोक सकता है तब बुराई है जब वह जानता है कि बुराई है।

875
01:00:19,360 --> 01:00:23,440
तो कहने का मतलब यह है कि आपने ईश्वर

876
01:00:23,440 --> 01:00:27,600
को मूल के रूप में हालांकि वो सनातन ईश्वर का ही आलंबन लेना पड़ेगा। इस्लाम का ईश्वर

877
01:00:27,600 --> 01:00:31,760
मूल सिद्ध नहीं होगा। हमने बता दिया और तो और अगर मूल

878
01:00:31,760 --> 01:00:36,080
भी सिद्ध कर दिया तो आपने वह विवेचना नहीं की जिससे कि वो मनुष्य

879
01:00:36,080 --> 01:00:40,240
के लिए अनिवार्य हो जाए। वह अनिवार्य कैसे सिद्ध होता है?

880
01:00:40,240 --> 01:00:44,320
प्राप्तव्य मनुष्य का एकमात्र प्राप्तव्य अंतिम विकल्प कैसे सिद्ध

881
01:00:44,320 --> 01:00:48,800
होता है? वह आपने सिद्ध नहीं किया। तो अब हम

882
01:00:48,800 --> 01:00:53,120
तार्किक निरुत्तर कर देने वाली ईश्वर

883
01:00:53,120 --> 01:00:57,360
के अस्तित्व को सिद्ध करने वाली व्याख्या और नास्तिकों को निरुत्तर कर देने

884
01:00:57,360 --> 01:01:02,080
वाली व्याख्या प्रस्तुत करते हैं। संसार का प्रत्येक मनुष्य

885
01:01:02,080 --> 01:01:06,240
भगवान को ही ढूंढ रहा है। फिर वह भले ही स्वयं को नास्तिक

886
01:01:06,240 --> 01:01:08,720
ही क्यों ना कहता हो। दोबारा सुनिए।

887
01:01:08,720 --> 01:01:12,720
संसार का प्रत्येक मनुष्य अपने अंदर

888
01:01:12,720 --> 01:01:16,800
सतचित आनंद की चाह के रूप में भगवान को ही

889
01:01:16,800 --> 01:01:21,280
खोज रहा है। फिर वह भले ही नास्तिक ही क्यों ना कहता हो अपने आप

890
01:01:21,280 --> 01:01:25,360
और जैसे कि जो

891
01:01:25,360 --> 01:01:29,360
आपके जावेद जावेद जी हैं वहां पर वो कह रहे हैं कि दुनिया

892
01:01:29,360 --> 01:01:34,160
में यह क्यों हो रहा है अगर भगवान है तो वह भी परफेक्शन को ढूंढ रहे हैं।

893
01:01:34,160 --> 01:01:38,160
यह जो पूर्णता को ढूंढ रहे हैं ना वो कि कहीं भी कुछ गड़बड़ ना हो। कहीं पर भी

894
01:01:38,160 --> 01:01:42,160
कुछ अभाव ना हो। यह जो उनके अंदर लगातार चल रहा है, भले ही वह ईश्वर

895
01:01:42,160 --> 01:01:46,240
के अस्तित्व को स्वीकार करें या ना करें। मगर पूर्णता के अस्तित्व को वो ढूंढ रहे

896
01:01:46,240 --> 01:01:50,480
हैं और ढूंढने के अंश में वो ये मान रहे हैं कि दुनिया में पूर्णता

897
01:01:50,480 --> 01:01:55,360
है। तभी कोई उसकी खोज शुरू करता है। हम

898
01:01:55,360 --> 01:01:59,440
तो कहने का मतलब यह है कि जीव की चाह

899
01:01:59,440 --> 01:02:04,800
का वास्तविक विषय ही ईश्वर है। और

900
01:02:04,800 --> 01:02:09,040
यह बात सनातन धर्म ग्रंथों में कई जगह कही गई है। जैसे कि असतो

901
01:02:09,040 --> 01:02:13,120
मा सद्गमया तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्युमा मृतमय यहां पर जीव की

902
01:02:13,120 --> 01:02:17,200
चाह बताई जा रही है अमर अमर हो जाना चाहता है अखंड ज्ञानी हो जाना

903
01:02:17,200 --> 01:02:21,680
चाहता है सदा आनंदित रहने वाला हो जाना चाहता है तो

904
01:02:21,680 --> 01:02:23,920
यहां से जीव की चाह के रूप में

905
01:02:23,920 --> 01:02:28,160
ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध होता है हमारे अंदर जितनी भी इनबिल्ट इच्छाएं हैं

906
01:02:28,160 --> 01:02:32,160
उनका विषय दुनिया में मौजूद है इसलिए वह इच्छा है

907
01:02:32,160 --> 01:02:36,240
यानी इच्छा मात्र होने से डंके की चोट पर उस इच्छा के विषय का अस्तित्व

908
01:02:36,240 --> 01:02:40,400
सिद्ध होता है जैसे हमारे अंदर प्यास है तो दुनिया में पानी है।

909
01:02:40,400 --> 01:02:44,480
हमारे अंदर सुनने की क्षमता है तो दुनिया में आवाज है। हमारे अंदर देखने की

910
01:02:44,480 --> 01:02:48,640
क्षमता है तो उसका जो विषय है दृश्य वो दुनिया में है। इसी प्रकार से हमारे

911
01:02:48,640 --> 01:02:52,640
अंदर जो सच्चिदानंद हो जाने की चाह है तो इसका मतलब दुनिया

912
01:02:52,640 --> 01:02:57,040
में सच्चिदानंद है। और इस डिबेट के लास्ट में एक व्यक्ति ने

913
01:02:57,040 --> 01:03:01,200
कुछ अभी आ गया होगा यह नया जो खोज है। कुछ बता रहे थे रिसर्च

914
01:03:01,200 --> 01:03:05,440
आया कि लोगों के अंदर ईश्वर की चाह है। जावेद अख्तर जी के

915
01:03:05,440 --> 01:03:10,000
अंदर भी है। हम वह मैं अभी बताऊंगा कैसे है।

916
01:03:10,000 --> 01:03:14,160
तो यहां से हमने सिद्ध किया कि ईश्वर है। अब जो ईश्वर

917
01:03:14,160 --> 01:03:18,640
है वह क्योंकि चाह का विषय है इसलिए मनुष्य का अंतिम विकल्प

918
01:03:18,640 --> 01:03:23,520
है।

919
01:03:23,520 --> 01:03:28,480
और यहां पे एक कनेक्शन हम और स्थापित करते हैं। इस्लाम

920
01:03:28,480 --> 01:03:32,640
के अनुसार जो जीव है यानी जो

921
01:03:32,640 --> 01:03:36,640
प्राणी है जो भी है वो ईश्वर का अंश नहीं है। मगर हमने तो

922
01:03:36,640 --> 01:03:40,640
सिद्ध किया ईश्वर जो है सर्व्यापक हो गया। सब जगह बराबर मात्रा

923
01:03:40,640 --> 01:03:44,640
में वह उपस्थित हो गया। तभी वह सब जगह सबका कंट्रोलर है। है ना? नहीं तो

924
01:03:44,640 --> 01:03:48,960
आप उसको सुप्रीम कंट्रोलर सिद्ध नहीं कर पाएंगे। कोई हो तो आ जाइएगा। बात कर लेंगे इत्मीनान

925
01:03:48,960 --> 01:03:52,960
से बैठ के। तो कोई हो तो आ जाए। तो आप उसको सुप्रीम कंट्रोलर सिद्ध

926
01:03:52,960 --> 01:03:57,040
नहीं कर पाएंगे। जब तक उसको सब जगह सर्वव्यापक बराबर रूप से उपस्थित नहीं। और जब

927
01:03:57,040 --> 01:04:01,200
वो बराबर रूप से उपस्थित है सब जगह तो फिर आप उसको जरा सा भी अलग नहीं कर पाएंगे।

928
01:04:01,200 --> 01:04:05,600
फिर आपको मानना पड़ेगा कि एक ही परम तत्व जीव जगत और जगदीश्वर

929
01:04:05,600 --> 01:04:09,440
के रूप में परिलक्षित हो रहा है। केवल

930
01:04:09,440 --> 01:04:13,520
हम जैसे एक व्यक्ति वीडियो गेम जिसने बनाया

931
01:04:13,520 --> 01:04:18,080
है तो वीडियो गेम को बनाने वाले के रूप में वो वीडियो गेम के अंदर की जो

932
01:04:18,080 --> 01:04:22,240
सृष्टि है उसके रूप में भी वही है और वीडियो गेम

933
01:04:22,240 --> 01:04:26,240
में जो प्यादा खेल रहा है उसके रूप में भी वही है और प्यादे की मदद करने जो पहुंच रहा है उसके

934
01:04:26,240 --> 01:04:30,480
रूप में भी वही है। या फिर स्वप्न का उदाहरण अगर मान लें माया शक्ति

935
01:04:30,480 --> 01:04:35,280
के लिए स्वप्न का उदाहरण अगर मान लें तो जो स्वप्न का संसार है उसमें

936
01:04:35,280 --> 01:04:38,640
जो संसार है वह भी वही है यानी जगत और वहां के

937
01:04:38,640 --> 01:04:42,800
जो सामान्य जीव हैं वो भी वही है और यदि कोई

938
01:04:42,800 --> 01:04:46,800
वहां पर ऐसा आपका रूप वहां पहुंचता है जो रूप

939
01:04:46,800 --> 01:04:50,800
यह जानता है कि मेरा स्वप्न है तो वह वहां के लिए वहां

940
01:04:50,800 --> 01:04:55,040
का ईश्वर है तो जीव जगत और जगदीश्वर के रूप में परिलक्षित

941
01:04:55,040 --> 01:04:59,040
होता है। अब दूसरी बात ये है कि हमने माना कि भाई अंश

942
01:04:59,040 --> 01:05:03,440
है तो अंश में अपने अंशी की तरफ आकर्षण

943
01:05:03,440 --> 01:05:07,520
होता है। जैसे अग्नि जो होती है अग्नि की लपट

944
01:05:07,520 --> 01:05:11,760
आकाश में स्थित सूर्य की ओर भागती है। सूर्य

945
01:05:11,760 --> 01:05:15,840
आकाश में स्थित है तो अग्नि जो है हमेशा भागती है। जो ये

946
01:05:15,840 --> 01:05:19,920
जो फल फूल हैं ये सदैव इसर यात्रा कर रहे होते हैं कि

947
01:05:19,920 --> 01:05:24,160
मिट्टी से निकले मिट्टी में ही समा जाए। तो अंश

948
01:05:24,160 --> 01:05:28,320
सदैव अपने अंशी की ओर आकृष्ट होता है। लॉ ऑफ अट्रैक्शन यह तो आप जानते ही होंगे।

949
01:05:28,320 --> 01:05:32,560
उसी प्रकार से हमारे अंदर जो मुख्य आकर्षण

950
01:05:32,560 --> 01:05:36,720
है हम एसी में, टीवी में, फ्रिज में, पंखे में, कूलर में या

951
01:05:36,720 --> 01:05:41,840
तमाम चीजों में हम जो है अपने अंशीभूत

952
01:05:41,840 --> 01:05:46,080
ईश्वर की ओर ही आकृष्ट हो रहे हैं। परंतु क्योंकि इतना हमें बोध

953
01:05:46,080 --> 01:05:50,320
नहीं है कि हम हमारी मूल चाह ईश्वर है। इसलिए हम लोग इनमें फंसे रहते हैं और परेशान

954
01:05:50,320 --> 01:05:54,800
होते रहते हैं। जब हम इस रास्ते पर आते हैं कि हमारी मूल चाह वही है तब हमें संतुष्टि

955
01:05:54,800 --> 01:05:59,280
मिलती है। जो हमारे अंदर की वो जो प्यास है आत्मा की असतो मा सदगया तमसो मागमया

956
01:05:59,280 --> 01:06:03,360
मृत्युमा मतम गमया तब वो संतुष्टि मिलने लगती है

957
01:06:03,360 --> 01:06:07,200
उसको

958
01:06:07,200 --> 01:06:11,280
तो अब जब हमने क्या किया कि ना ही सिर्फ ईश्वर के अस्तित्व

959
01:06:11,280 --> 01:06:15,520
को सिद्ध किया बल्कि साथ ही साथ ईश्वर के साथ

960
01:06:15,520 --> 01:06:19,520
रिलेशन भी सिद्ध किया कि आपका अंतिम विकल्प भी वही है। आप

961
01:06:19,520 --> 01:06:23,520
इसका इसका उत्तर नहीं दे सकते। नहीं तो सवाल

962
01:06:23,520 --> 01:06:27,600
यह आएगा कि दुनिया में अगर एलन मस्क

963
01:06:27,600 --> 01:06:32,080
है तो मैं क्या करूं? अच्छा दूसरी बात यह है कि एलन मस्क है

964
01:06:32,080 --> 01:06:36,080
यह हमको किसी और ने बताया। जबकि ईश्वर के

965
01:06:36,080 --> 01:06:40,080
बारे में हमें कोई बताता नहीं है। हम उसे ईश्वर नाम दें या परफेक्शन

966
01:06:40,080 --> 01:06:44,160
परफेक्शन नाम दें, पूर्णता का नाम दें। हमें यह कोई बताता नहीं

967
01:06:44,160 --> 01:06:48,320
है। हम तब भी मौत से भागते हैं। अमरता ढूंढते हैं। हमें

968
01:06:48,320 --> 01:06:52,480
कोई बताता नहीं है। अमरता क्या एक्सिस्ट करती है ईश्वर के रूप में। हमें कोई

969
01:06:52,480 --> 01:06:56,640
बताता नहीं है। फिर भी हमारी पलकें झपकती है जब हम पर कोई वार करता है। तो यह

970
01:06:56,640 --> 01:06:57,140
हमारे

971
01:06:57,040 --> 01:07:01,520
अंदर इनबिल्ट है। इससे पता लग रहा है कि हमारी जो प्रकृति है स्वाभाविक

972
01:07:01,520 --> 01:07:05,920
रूप से हम उसकी ओर आकर्षित है। तो यह है इससे

973
01:07:05,920 --> 01:07:09,920
पता लगता है कि हम जो हमारा प्राप्तव्य क्या है? ईश्वर। और

974
01:07:09,920 --> 01:07:14,160
इसीलिए हम इस संसार यह जो संसार जो दुखप्रद है जो जड़ता

975
01:07:14,160 --> 01:07:19,120
प्रद है जो क्या कहते हैं

976
01:07:19,120 --> 01:07:23,760
आपको सच्चिदानंद के विपरीत है ठीक

977
01:07:23,760 --> 01:07:27,920
तो इसीलिए हम सच्चिदानंद के तरफ आकर्षित

978
01:07:27,920 --> 01:07:32,160
होते हैं क्योंकि हम उसके अंश हैं। और वह हमारा

979
01:07:32,160 --> 01:07:35,760
अंश।

980
01:07:35,760 --> 01:07:38,960
अच्छा।

981
01:07:38,960 --> 01:07:43,280
यहां से हमने रिलेशन भी सिद्ध किया और ईश्वर के ईश्वर को अकाट

982
01:07:43,280 --> 01:07:47,280
रूप से सिद्ध कर दिया। वो आपने कहा था ना अकल से सिद्ध करें। वो अकल से ही सिद्ध हुआ है। हां वो

983
01:07:47,280 --> 01:07:51,280
बात अलग है कि ये चीजें भी हमारे सनातन धर्म ग्रंथों में हमें दी गई

984
01:07:51,280 --> 01:07:55,360
है। ऐसा नहीं कि हमने अपने मन से कहीं से इतनी इसकी पढ़ ली, इतनी उसकी पढ़ ली। ऐसे

985
01:07:55,360 --> 01:07:59,440
हमें नहीं करना पड़ता। है ना? जैसे आपने कई कुछ चीजें कही हैं।

986
01:07:59,440 --> 01:08:03,440
आगे चर्चा होगी उन चीजों की। अ उसमें आप

987
01:08:03,440 --> 01:08:07,520
आपने अपने इस्लाम से बाहर की चीजों का आलंबन लेकर के जावेद

988
01:08:07,520 --> 01:08:12,000
जी को चुप कराया। इस्लाम से बाहर की चीजों अब क्या हुआ? जब हमने सनातन

989
01:08:12,000 --> 01:08:16,160
ईश्वर को सर्वशक्तिमान सिद्ध कर लिया। सर्वज्ञ सर्व्यापक सिद्ध कर लिया।

990
01:08:16,160 --> 01:08:20,640
और क्योंकि हमारे मन में सर्वशक्तिमान

991
01:08:20,640 --> 01:08:24,720
ईश्वर की ही चाह है। अबाध्य ईश्वर की ही चाह है। और अबाध्य वो तभी

992
01:08:24,720 --> 01:08:28,720
सिद्ध हो पाएगा जब वो देश कृत कालकृत और परिस्थिति कृत किसी भी तरह की

993
01:08:28,720 --> 01:08:32,720
बाधा से रहित हो। तो इसीलिए इस संसार

994
01:08:32,720 --> 01:08:36,880
का मायाकृत होना, माया से बना होना, अविद्या से बना होना

995
01:08:36,880 --> 01:08:41,120
जिसको हम प्रकृति भी कहते हैं इत्यादि इत्यादि थोड़े-थोड़े से भेद से कहा

996
01:08:41,120 --> 01:08:45,920
जाता है। सनातन धर्म दर्शन है उनमें। तो जब हम

997
01:08:45,920 --> 01:08:49,920
जब हमारे अंदर की जो प्यास है वह अबाध्य हो जाने की प्यास है तो हमारा ईश्वर भी

998
01:08:49,920 --> 01:08:50,880
अबाध्य होगा।

999
01:08:50,880 --> 01:08:54,880
वह देशत देशत कालकृत और परिस्थिति

1000
01:08:54,880 --> 01:08:59,520
ग्रत किसी भी प्रकार की बाधा से रहित होगा। तभी

1001
01:08:59,520 --> 01:09:03,600
तो ऐसा सिद्ध करने के लिए हमें माया का आलंबन

1002
01:09:03,600 --> 01:09:07,600
लेना आवश्यक होगा और जब माया का आलंबन लेगा तो वह फिर अपनी माया

1003
01:09:07,600 --> 01:09:12,080
में अपने अपने द्वारा रचित संसार में कहीं पर भी किसी भी रूप में प्रकट हो सकेगा।

1004
01:09:12,080 --> 01:09:16,480
इसी को अवतार कहते हैं।

1005
01:09:16,480 --> 01:09:20,560
अब बात आती है कि जो गाजा में जो लोग मर रहे हैं यद्यपि गाजा का

1006
01:09:20,560 --> 01:09:24,560
उदाहरण लेना आवश्यक नहीं था तो उसका ईश्वर पर दोष क्यों

1007
01:09:24,560 --> 01:09:28,560
नहीं जाता है जाहिर सी बात है क्यों नहीं जाता है क्योंकि ईश्वर

1008
01:09:28,560 --> 01:09:32,560
को मालूम है कि तुम्हें कुछ नहीं हो रहा है ये जो भी कुछ हो

1009
01:09:32,560 --> 01:09:36,880
रहा है वो माया मात्र है वो तुम्हारी अज्ञानता है

1010
01:09:36,880 --> 01:09:40,880
जो तुम इस वीडियो गेम की दुनिया को रियल समझ रहे हो और तुम सोच रहे हो कि

1011
01:09:40,880 --> 01:09:45,200
भैया यह गड्ढा है और मैं मर रहा हूं वास्तविक िकता क्या है कि तुम्हें

1012
01:09:45,200 --> 01:09:50,080
कुछ नहीं हो सकता। ईश्वर यह जानता है इसलिए

1013
01:09:50,080 --> 01:09:54,160
ईश्वर प्रभावित नहीं होता। अच्छा ईश्वर की एक जो व्याख्या है,

1014
01:09:54,160 --> 01:09:58,800
है ना? ईश्वर की एक जो व्याख्या है जो

1015
01:09:58,800 --> 01:10:02,320
अ

1016
01:10:02,320 --> 01:10:06,480
यह भी तो है कि वह सदा सुखी रहने वाला है। तो फिर आप यह कैसे कह

1017
01:10:06,480 --> 01:10:10,720
सकते हो कि गाजा में चीजें होने के कारण वो दुखी होगा। तो दुखी क्यों नहीं होगा? अगर

1018
01:10:10,720 --> 01:10:14,880
इस गाजा में होने वाले कष्ट को आप रियल मानोगे और ईश्वर को आप दयालु

1019
01:10:14,880 --> 01:10:18,880
मानोगे तो उसको दया आएगी। दुखी होगा वह। तो इसका मतलब आपको

1020
01:10:18,880 --> 01:10:22,880
मानना पड़ेगा कि ईश्वर जानता है कि यहां पे ये सब माया है। इसलिए

1021
01:10:22,880 --> 01:10:27,440
ईश्वर को कुछ नहीं होता है। मगर ईश्वर व्यवहार में आकर के वो वो दयालुता

1022
01:10:27,440 --> 01:10:31,520
वाला रूप भी धारण करता है। मगर वस्तुतः वो सच्चिदानंद

1023
01:10:31,520 --> 01:10:35,520
है। उसको कोई फर्क नहीं है। क्योंकि उसको मालूम है कि अज्ञानता में फंसा हुआ है सब कुछ।

1024
01:10:35,520 --> 01:10:39,760
हां वो व्यवहारिक जब होता है रूप लेता है श्री रामकृष्ण

1025
01:10:39,760 --> 01:10:43,920
आदि के रूप में आकर के तो वह तरह-तरह की वहां अंदर उस स्वप्न की दुनिया

1026
01:10:43,920 --> 01:10:48,080
में अंदर आकर के वीडियो वहां अंदर उस वीडियो गेम की दुनिया के अंदर आकर

1027
01:10:48,080 --> 01:10:52,160
के वो जब अवतार लेता है तो वह तरह-तरह के वहां पर रोल भी निभाता

1028
01:10:52,160 --> 01:10:56,320
है। आपको आपके जैसा प्रतीत होने के लिए वह दयालुता भी दिखाता है। जिससे

1029
01:10:56,320 --> 01:11:00,480
कि आप उसकी ओर आकृष्ट हो सको। उसका आलंबन लेकर के उसके साथ एक

1030
01:11:00,480 --> 01:11:04,480
ही भूत हो करके उस वीडियो गेम की दुनिया से मुक्त हो सको।

1031
01:11:04,480 --> 01:11:08,320
हम चलिए खैर

1032
01:11:08,320 --> 01:11:12,400
कहने का मतलब यह है कि गाजा इत्यादि जैसी जो चीजें हो रही हैं ईश्वर

1033
01:11:12,400 --> 01:11:16,720
के दृष्टिकोण से वह सारी चीजें काल्पनिक है। वो सारी चीजें

1034
01:11:16,720 --> 01:11:17,440
माया है,

1035
01:11:17,440 --> 01:11:21,520
अविद्या है और जिससे जुड़ा होने के कारण उसका जो अंश है वो परेशान

1036
01:11:21,520 --> 01:11:25,520
है और वह परेशान नहीं क्योंकि वह जानता है कि माया है। ठीक है?

1037
01:11:25,520 --> 01:11:29,600
यानी कि वह अज्ञानी है जो जुड़ा हुआ है और वह जो मुक्त है

1038
01:11:29,600 --> 01:11:33,680
प्रभावित नहीं है वह ज्ञानी है। ज्ञान स्वरूप ईश्वर

1039
01:11:33,680 --> 01:11:37,920
हो गए। तो अब यहां से क्या हुआ कि

1040
01:11:37,920 --> 01:11:42,080
इसीलिए भगवत गीता में कहा गया कि समस्त कर्मों को करते हुए भी तू मुझे

1041
01:11:42,080 --> 01:11:46,240
अकर्ता जान। क्योंकि वो समस्त कर्मों के मूलाधार

1042
01:11:46,240 --> 01:11:50,320
तो हैं। मूल तो है वो। दुनिया में जो भी कुछ हो

1043
01:11:50,320 --> 01:11:54,880
रहा है। मगर क्योंकि वह वहां के जो हो रहा है उसके परिणाम

1044
01:11:54,880 --> 01:11:59,120
में लिप्त नहीं है। मतलब परिणाम से प्रभावित नहीं है। मतलब मान लीजिए कि

1045
01:11:59,120 --> 01:12:03,680
हवा चल रही है। अब उनको अगर यह अपेक्षा नहीं है कि हवा चलने से मुझे

1046
01:12:03,680 --> 01:12:07,760
ठंडक मिलेगी। तो कर्म फल से वह प्रभावित नहीं है। इस कारण

1047
01:12:07,760 --> 01:12:12,080
से कर्मों में लिप्त ना होने के कारण और वह जानते हैं सर्वज्ञ

1048
01:12:12,080 --> 01:12:16,400
होने के कारण वह जानते हैं कि माया की दुनिया है अविद्या है। इसलिए वो

1049
01:12:16,400 --> 01:12:20,720
सब कुछ करने वाले होते हुए भी उन दोषों से मुक्त हैं जिन दोषों

1050
01:12:20,720 --> 01:12:24,880
से किसी सामान्य व्यक्ति को जब करते हुए हम देखते

1051
01:12:24,880 --> 01:12:29,040
हैं जुड़ा जुड़ा हुआ हम देखते हैं तो उसको हम दोषी मानते हैं। क्यों? अब उसको

1052
01:12:29,040 --> 01:12:32,720
क्यों दोषी मान रहे हैं? क्योंकि उसकी जानकारी में उसके पर्सपेक्टिव

1053
01:12:32,720 --> 01:12:36,720
में वह सब झूठ नहीं है। ठीक है? अब यह पर्सपेक्टिव की बात

1054
01:12:36,720 --> 01:12:40,880
है। हमारे लिए जो रियलिटी है ईश्वर के लिए वह रियलिटी नहीं है।

1055
01:12:40,880 --> 01:12:45,040
तो इसलिए ईश्वर पर वह दोष नहीं लगता है। हम हम पर वो दोष लगता

1056
01:12:45,040 --> 01:12:49,040
है क्योंकि हमारे लिए वो रियलिटी है। तो जितना

1057
01:12:49,040 --> 01:12:53,120
भी दुनिया में बुरा कार्य हो रहा है ऐसा नहीं है कि उसके मूल कारण कोई और है। दूसरे

1058
01:12:53,120 --> 01:12:57,360
खुदा है। उसका भी ईश्वर ही है। मगर क्योंकि ईश्वर

1059
01:12:57,360 --> 01:13:01,440
जानता है कि यह सब कुछ नाटक है। यह सब कुछ अविद्या है। यह

1060
01:13:01,440 --> 01:13:05,520
सब कुछ अज्ञान है। इसलिए सब कुछ का कारण होते हुए भी

1061
01:13:05,520 --> 01:13:09,680
उस पर दोष नहीं लगता है। किस पर लगता है? जो ये नहीं जानता है कि अविद्या

1062
01:13:09,680 --> 01:13:13,760
है। जो जानता है कि रियलिटी है। जो जानता है कि रेप करने से जो ऐसा सोच

1063
01:13:13,760 --> 01:13:17,840
रहा है कि रेप करने से मुझे सुख मिलेगा। तो वो जब रेप में लिप्त

1064
01:13:17,840 --> 01:13:22,080
होगा तो वो दोषी है। क्योंकि वो सुख प्राप्त करने के लिए उसको

1065
01:13:22,080 --> 01:13:26,240
रियलिटी मान करके वह कार्य कर रहा है।

1066
01:13:26,240 --> 01:13:29,440
ठीक है? अब

1067
01:13:29,440 --> 01:13:33,600
अब यह ठीक इस तरीके से है जैसे कि इसको एक तरीके से समझ लें

1068
01:13:33,600 --> 01:13:37,760
जैसे पृथ्वी को गोल माना गया है विज्ञान के द्वारा पृथ्वी गोल है

1069
01:13:37,760 --> 01:13:41,760
तो बाहर से पृथ्वी गोल है मगर हमारे पर्सपेक्टिव से

1070
01:13:41,760 --> 01:13:45,760
पृथ्वी क्या है चपटी तो हमारा जो व्यवहार होता है कैसा होता है पृथ्वी के

1071
01:13:45,760 --> 01:13:47,920
साथ कैसा होता है पृथ्वी

1072
01:13:47,920 --> 01:13:52,080
के साथ हमारा व्यवहार हमारा व्यवहार होता है चपटेपन के अनुसार

1073
01:13:52,080 --> 01:13:56,240
हम किसी को यह नहीं कहते कि ऐसे जाओ ऐसे कहते हैं सीधे जाओ

1074
01:13:56,240 --> 01:14:00,320
चप चपेटेपन के अनुसार व्यवहार होता है। इसी में एक बात और ले लेता हूं। जावेद जी ने एक बात

1075
01:14:00,320 --> 01:14:04,560
उठाई थी कि भैया दुआ क्यों मांग रहे हैं? जब वो अपने

1076
01:14:04,560 --> 01:14:08,960
हिसाब से ही कुछ भी करता है तो हमारे दुआ मांगने से क्या होगा? तो

1077
01:14:08,960 --> 01:14:13,280
दुआ मांगने से हमारे अंदर जो हम उसके प्रति जो आकर्षण

1078
01:14:13,280 --> 01:14:18,480
आकर्षित हो रहे हैं ना। तो दुआ मांगने से जब हम

1079
01:14:18,480 --> 01:14:22,480
क्या कहते हैं? हमारे यहां पर जो दुआ का कांसेप्ट है वो है ईश्वर

1080
01:14:22,480 --> 01:14:26,960
का चिंतन करना। ईश्वर कौन है? जो सच्चिदानंद

1081
01:14:26,960 --> 01:14:31,040
है। जब हम इस दुखप्रद इस माया के संसार को

1082
01:14:31,040 --> 01:14:35,280
छोड़कर इसके ठीक विपरीत सच्चिदानंद को स्मरण स्मरण करते

1083
01:14:35,280 --> 01:14:39,360
हैं तो हमारे लिए यहां पर वो जो भौतिक चीजें होती हैं बदलती

1084
01:14:39,360 --> 01:14:43,520
नहीं है। वो होते हुए भी हमको उसका कष्ट

1085
01:14:43,520 --> 01:14:47,520
कम होने लगता है। जैसे संभाजी की आंखें निकाली जा रही हैं।

1086
01:14:47,520 --> 01:14:51,520
मगर वह जगदंबा कह रहे हैं। उनकी आंखें निकाली जा रही हैं। तो जब

1087
01:14:51,520 --> 01:14:55,600
हम जितना ज्यादा ईश्वर में जा अपने प्राप्तव्य की ओर आकर्षित

1088
01:14:55,600 --> 01:14:59,760
होते जाते हैं तो हमें यहां से मिलने वाली जो इंफॉर्मेशन है जो हमको बेवकूफ बना

1089
01:14:59,760 --> 01:15:02,960
रही हैं वो उनका प्रभाव हमारे ऊपर कम होने लगता

1090
01:15:02,960 --> 01:15:07,040
है। है ना? जितना कम होने लगता है उतना

1091
01:15:07,040 --> 01:15:11,280
ही ज्यादा हम उन परिस्थितियों में होते हुए भी दुखी नहीं होते।

1092
01:15:11,280 --> 01:15:15,440
तो क्या हुआ? इसको एक्सेस समझिए एग्जांपल से कि जैसे

1093
01:15:15,440 --> 01:15:19,520
दुआ क्यों करते हैं? तो दुआ से इसमें आर्य समाज भी आ जाता है। वह कह देता

1094
01:15:19,520 --> 01:15:24,240
है कि ईश्वर जो है वह क्षमा नहीं करता।

1095
01:15:24,240 --> 01:15:28,640
तो क्षमा कैसे होता है? उसको आप समझ लीजिए। ईश्वर क्षमा कैसे करते हैं?

1096
01:15:28,640 --> 01:15:32,720
जैसे कि मान लीजिए कि एक समय था जब मैं लोगों के कपड़े

1097
01:15:32,720 --> 01:15:37,040
चुराया करता था। मुझे जींस बहुत अच्छी लगती थी। मुझे टीशर्ट बहुत अच्छी लगती

1098
01:15:37,040 --> 01:15:41,600
थी और मैं लोगों के कपड़े चुराता था। तो मेरे लिए निर्धारित हो गया

1099
01:15:41,600 --> 01:15:45,600
कि मेरे भी कपड़े किसी दिन मुझसे छीन

1100
01:15:45,600 --> 01:15:49,680
लिए जाएंगे। ठीक है? वो कपड़े जिनसे मुझे प्रेम था वो मुझसे छीन लिए।

1101
01:15:49,680 --> 01:15:53,760
ऐसा कष्ट मेरे लिए निर्धारित था। अगर जावेद जी के दृष्टिकोण से कहें तो

1102
01:15:53,760 --> 01:15:58,000
भैया मेरे ऊपर एक गाज गिरने वाली है कि बिना कारण

1103
01:15:58,000 --> 01:16:03,040
के। मैंने कुछ ऐसा किया नहीं। मगर मेरे ऊपर एक गाज गिरने वाली है जो

1104
01:16:03,040 --> 01:16:07,120
जिसमें कि मेरे कपड़े मुझसे छीन जाएंगे। यह कष्ट मुझे मिलने वाला है।

1105
01:16:07,120 --> 01:16:11,360
तो हम दुआ क्यों मांग रहे हैं? जब ईश्वर को उससे कोई मतलब नहीं है। तो बात

1106
01:16:11,360 --> 01:16:15,440
ऐसी है कि परमार्थिक दृष्टि से क्या हो रहा है कि

1107
01:16:15,440 --> 01:16:18,240
जब हम सच्चिदानंद परमार्थिक दृष्टि वही पर्सेक्टिव

1108
01:16:18,240 --> 01:16:22,320
ईश्वर के डायमेंशन से जब हम उन चीजों को देख रहे हैं तो क्या हो रहा है कि जब हम

1109
01:16:22,320 --> 01:16:26,560
ईश्वर की वंदना कर रहे हैं, ईश्वर का चिंतन मनन कर रहे हैं इस

1110
01:16:26,560 --> 01:16:31,040
भाव से कि भैया वो हमारी परेशानी को दूर कर दे। तो उसके कारण

1111
01:16:31,040 --> 01:16:35,120
मेरे जब कपड़े बाद में छीने गए मुझसे आज मेरे पास जींस

1112
01:16:35,120 --> 01:16:39,280
टीशर्ट नहीं है या आज मैं फिल्में नहीं देख पा रहा हूं या आज मैं गाड़ियों में नहीं घूम

1113
01:16:39,280 --> 01:16:43,920
पा रहा हूं या आज मेरे मेरे भाग्य में था कि मेरा घर टूट जाए या

1114
01:16:43,920 --> 01:16:48,000
ऐसे ही और दूसरे कष्ट इसको आप इसकी जो गंभीरता है उसको बढ़ा

1115
01:16:48,000 --> 01:16:52,080
भी सकते हैं। तो ये जो कष्ट हैं इन कष्टों से प्रभावित

1116
01:16:52,080 --> 01:16:56,160
होना मेरा कम हो जाता है। तो क्या होता है कि इसका मतलब वो रियलिटी तो नहीं बदली। जो

1117
01:16:56,160 --> 01:17:00,400
होनी थी वो तो हो ही रहा है। उसमें ईश्वर का हस्तक्षेप भी नहीं हुआ। यह कौन सी रियलिटी है?

1118
01:17:00,400 --> 01:17:04,400
ईश्वर की रियलिटी कि जो होना था वही हुआ। मगर एक व्यवहारिक रियलिटी

1119
01:17:04,400 --> 01:17:08,720
भी है कि मैंने जब ईश्वर की वंदना की तो ईश्वर ने मुझे क्षमादान

1120
01:17:08,720 --> 01:17:12,880
दिया। मुझे कोई कष्ट नहीं है। जो मुझे कष्ट होना था कपड़ों के जाने

1121
01:17:12,880 --> 01:17:17,120
का है ना? कपड़े तो गए हैं मगर मुझे कष्ट नहीं है तो मुझे ईश्वर

1122
01:17:17,120 --> 01:17:21,280
से क्षमा मिली। यह व्यवहारिक सत्य है। और ईश्वर की डायमेंशन से क्या हुआ है कि

1123
01:17:21,280 --> 01:17:25,440
मेरा वो जो मुझे कपड़े मिलने वाला जो कष्ट था वो

1124
01:17:25,440 --> 01:17:29,920
कम हो गया। इसमें एक बात और आती है सीधे सरल शब्दों में कहें

1125
01:17:29,920 --> 01:17:33,440
कि दुख का नाम ही संसार है। भेद का नाम ही संसार

1126
01:17:33,440 --> 01:17:37,520
है। भाई मान लो किसी को मुझे इसी बात का दुख होने लगे

1127
01:17:37,520 --> 01:17:42,800
मैं वहां क्यों नहीं हूं। तो देश कृत बाधा से मुझे दुख हो गया ना।

1128
01:17:42,800 --> 01:17:46,800
है ना? मैं उस समय वहां क्यों नहीं था। काल कृत बाधा से मुझे दुख हो गया

1129
01:17:46,800 --> 01:17:51,440
ना। तो दुख का नाम ही संसार है। और

1130
01:17:51,440 --> 01:17:55,920
जो ईश्वर का कांसेप्ट है वह आपको दुख से मुक्त कराने के लिए ही है।

1131
01:17:55,920 --> 01:18:00,080
वहीं की वही आपको सही कर देने के लिए नहीं है। हां, वहां पर कुछ हद

1132
01:18:00,080 --> 01:18:04,080
तक आपको सहायता दी जा सकती है कि आप अपने उस मार्ग पर आगे कैसे बढ़

1133
01:18:04,080 --> 01:18:08,160
पाए। वो सहायता आपको मिल रही है। यानी कि आपको जो चीजें प्रभावित हो रही थी कि मेरे पास

1134
01:18:08,160 --> 01:18:12,480
कार नहीं है। मैं जिऊंगा कैसे अब मैं जाप कैसे करूंगा। उसमें आपको सहायता मिलती है भक्ति से।

1135
01:18:12,480 --> 01:18:16,560
मगर एट दी एंड आपकी यात्रा क्या है कि उस चीजों से मुक्त

1136
01:18:16,560 --> 01:18:20,960
होना। जहां पर वह जो बीज बाकी है दुखी होने वाला बीज

1137
01:18:20,960 --> 01:18:25,040
संसार में बाकी है। जब तक आप संसार में हो तो बीज बाकी है।

1138
01:18:25,040 --> 01:18:29,280
आपको यहां से सदा के लिए मुक्त होना ही आपका वो है। तो फिर आप यह कह सकते हो

1139
01:18:29,280 --> 01:18:33,440
ये कैसे कह सकते हो कि ईश्वर है तो दुख क्यों है? भाई ईश्वर का कांसेप्ट

1140
01:18:33,440 --> 01:18:37,760
ही यह है कि आपको दुख से दूर ले जाया जा रहा है। हां ईश्वर को अभी

1141
01:18:37,760 --> 01:18:42,240
जानने मानने से आप वो यात्रा कर पाओगे जहां आपको जाना है। प्लस

1142
01:18:42,240 --> 01:18:46,240
अभी का जो आपका जीवन है वह सरल होने लगेगा। वो दुख कम होने लगे। मैंने

1143
01:18:46,240 --> 01:18:48,480
दोनों पर्सपेक्टिव आपको बता दिए। अब कहने

1144
01:18:48,480 --> 01:18:52,640
का मतलब यह है कि आपको इस पर आपत्ति है कि किसी को दुख क्यों हो रहा है और

1145
01:18:52,640 --> 01:18:56,720
हम उसके दुख को कम कर रहे हैं। मगर आप हमें रोक रहे हो। जावेद जी से

1146
01:18:56,720 --> 01:19:00,720
बात हो रही है। आप हमें रोक रहे हो। क्यों बता रहे हो भाई उसको ईश्वर का

1147
01:19:00,720 --> 01:19:04,880
कांसेप्ट? ईश्वर का कांसेप्ट बताने की वजह से वो जो अपने दुख से प्रभावित

1148
01:19:04,880 --> 01:19:09,600
हो रहा है। क्या आपने ऐसे लोग देखे हैं कि नहीं देखे हैं? जो किसी कारणवश

1149
01:19:09,600 --> 01:19:13,760
अपने चिंतन के कारण अपनी इच्छा शक्ति के कारण उसी भौतिक

1150
01:19:13,760 --> 01:19:18,000
प्रहार से कम दुखी होते हैं। जिस भौतिक प्रहार से कम इच्छा

1151
01:19:18,000 --> 01:19:22,080
शक्ति होने के कारण कम प्रज्ञा शक्ति होने के कारण ज्यादा दुखी होते हैं।

1152
01:19:22,080 --> 01:19:26,240
तो जब हम उसको एक आधार दे रहे हैं दुख से दूर

1153
01:19:26,240 --> 01:19:30,320
उसके दुख कम करने का तो आप बाधा बन रहे हो कि नहीं साहब यह जो आप आधार दे

1154
01:19:30,320 --> 01:19:34,560
रहे हो इसका अस्तित्व ही नहीं है। खैर अस्तित्व हमने सिद्ध कर दिया है। हम अगर अब दूसरे तरीके

1155
01:19:34,560 --> 01:19:38,560
से भी आपको बताएं तो आप हमें रोक रहे हो उसका दुख कम करने

1156
01:19:38,560 --> 01:19:42,720
के लिए जिसका दुख आप कम करना चाहते हो इसको कहते हैं

1157
01:19:42,720 --> 01:19:46,880
सनातन अगर हम आपके दृष्टिकोण से भी देख लें

1158
01:19:46,880 --> 01:19:50,880
कि भाई जो बच्चे मर गए उनका क्या ठीक है भाई

1159
01:19:50,880 --> 01:19:54,880
अगर हम भौतिक वाधिता की दृष्टि से देखें तो जो बच्चे मर गए हम उनका कुछ

1160
01:19:54,880 --> 01:19:59,680
नहीं कर पाएंगे वो बात अलग है कि वो देह के नाश से आत्मा का नाश नहीं होता

1161
01:19:59,680 --> 01:20:03,680
देह के भेद से आत्मा में भेद नहीं होता शरीर का अस्तित्व हमेशा रहता

1162
01:20:03,680 --> 01:20:07,840
है और इसी से रिलेट करके क्या कहते

1163
01:20:07,840 --> 01:20:12,080
हैं यहां पर फिर से इस्लाम की हार है। यहां पर इस्लाम पराजित होता है।

1164
01:20:12,080 --> 01:20:16,240
क्योंकि हमारे यहां पर तो यह कांसेप्ट है कि भैया जो अभी खटाख किसी कारण

1165
01:20:16,240 --> 01:20:20,400
से मर गया तो अभी अगर वो मुक्त नहीं हुआ है। यानी अभी वो दुख से दूर नहीं हुआ है तो उसको फिर दोबारा

1166
01:20:20,400 --> 01:20:24,800
मौका मिलेगा कि वो दुख से दूर दूर होने वाली यात्रा कर सके।

1167
01:20:24,800 --> 01:20:29,040
दुख में ही नहीं रह गया। है ना? हमारे यहां यह है मगर इस्लाम

1168
01:20:29,040 --> 01:20:33,280
में नहीं है। फिर वहां से क्या-क्या चीजें निकलती है वह तो बाद की बात है। अभी मैं बात करूंगा।

1169
01:20:33,280 --> 01:20:37,440
मगर यह तो आपको मानना पड़ेगा कि जो मर गए

1170
01:20:37,440 --> 01:20:41,680
हैं या जिनके साथ हो गया है और जो अब बदला नहीं जा सकता आपके अनुसार

1171
01:20:41,680 --> 01:20:45,840
है ना अगर यह भी मान लें तो क्या इस कारण से

1172
01:20:45,840 --> 01:20:49,920
जिनको हम बचा सकते हैं दुख से उनको भी ना बचाएं। उनको यह ना बताएं कि ईश्वर

1173
01:20:49,920 --> 01:20:53,920
का जाप करो। उसके कारण तुम अपने तुम्हारे साथ यहां की चीजें

1174
01:20:53,920 --> 01:20:58,000
जो हो रही है जो होकर ही रहेंग क्योंकि दुख का नाम ही संसार है।

1175
01:20:58,000 --> 01:21:02,160
उसके कारण आप में वह क्षमता उद्भाषित हो पाएगी जो आप

1176
01:21:02,160 --> 01:21:06,320
वो जो दुखी करने वाली चीजें उनके होने पर भी आप दुखी ना हो। जब

1177
01:21:06,320 --> 01:21:10,320
आपको यह मालूम पड़ता है नैन छिनती शस्त्राण नैन दति पावक

1178
01:21:10,320 --> 01:21:14,480
तो आपके अंदर वह सामर्थ वो बल आता है जिससे कि

1179
01:21:14,480 --> 01:21:20,480
आप यह दुख देने वाली घड़ियों से गुजर पाते हैं।

1180
01:21:21,120 --> 01:21:25,440
अच्छा अब बात करते हैं कि इस्लाम का इसमें क्या दिक्कत है? इस्लाम

1181
01:21:25,440 --> 01:21:29,440
की दिक्कत वही है कि जो कुत्ता है

1182
01:21:29,440 --> 01:21:33,440
जो आज जन्मा और मर गया उसका क्या होना है? इस बारे में इस्लाम का क्या

1183
01:21:33,440 --> 01:21:37,520
कांसेप्ट है? या फिर जो बच्चा है जो अभी जिसको अभी पता ही नहीं चल

1184
01:21:37,520 --> 01:21:42,000
पाया। भाई उसको न्याय मिलेगा जिसने इस्लाम को फॉलो किया होगा।

1185
01:21:42,000 --> 01:21:46,000
सीधी सी बात है। अगर उसको उसने इस्लाम को इस्लाम के

1186
01:21:46,000 --> 01:21:50,000
विपरीत चलने वाले को तो वो नरक मिलेगा। सजाएं मिलेंग। तो

1187
01:21:50,000 --> 01:21:52,160
इस्लाम

1188
01:21:52,160 --> 01:21:56,320
को जो जान ही नहीं पाया और वह फॉलो ही नहीं कर पाया। उससे पहले ही उसकी मृत्यु हो गई।

1189
01:21:56,320 --> 01:22:00,880
इस्लाम तक वो विकल्प भी नहीं आ पाए। यह इस्लाम है और यह दूसरी चीजें जो है

1190
01:22:00,880 --> 01:22:04,880
विरुद्ध है। विकल्प अभी तो प्रमाण वाली बात तो आना दूर की बात है। वो तो आपने दिया ही नहीं

1191
01:22:04,880 --> 01:22:09,360
है दुनिया को। यदि यदि कुरान परीक्षा में आने वाला विकल्प

1192
01:22:09,360 --> 01:22:13,520
है तो उसको विकल्प उसको सही विकल्प के

1193
01:22:13,520 --> 01:22:17,520
रूप में चुनने के लिए पढ़ाई कहां पर कराई जा रही है? इस्लाम में दोबारा में से मैं

1194
01:22:17,520 --> 01:22:21,760
रिपीट कर देता हूं। लल्लन टॉप पर होने वाली जो डिबेट

1195
01:22:21,760 --> 01:22:26,400
है उसमें इस्लाम को मानने वाले मुफ्ती जी द्वारा एक बात कही गई है

1196
01:22:26,400 --> 01:22:30,480
बड़ी ही कुतर्कपूर्ण अपने मत को स्थापित करने के

1197
01:22:30,480 --> 01:22:34,640
चक्कर में कि जो इस्लाम

1198
01:22:34,640 --> 01:22:36,560
इस्लाम का जो पक्ष है इस्लाम

1199
01:22:36,560 --> 01:22:40,560
के द्वारा बताया गया जो खुदा का पक्ष है ईश्वर का पक्ष है

1200
01:22:40,560 --> 01:22:45,040
वो आपको परीक्षा में दिया गया एक विकल्प है

1201
01:22:45,040 --> 01:22:49,040
और जितनी उसके विपरीत चीजें यानी कि बुराई इस्लाम के पर्सेक्टिव

1202
01:22:49,040 --> 01:22:53,040
से जो बुराइयां है उसमें दूसरे ईश्वर को मानने वाले

1203
01:22:53,040 --> 01:22:57,680
भी आ गए। वह सब आपको परीक्षा में दिए गए गलत विकल्प है।

1204
01:22:57,680 --> 01:23:02,240
तो यदि इस्लाम का जो पक्ष है अगर शॉर्ट फॉर्म में कहें कुरान

1205
01:23:02,240 --> 01:23:06,400
यदि इस्लाम का जो पक्ष है कुरान वह परीक्षा में दिया गया एक विकल्प है

1206
01:23:06,400 --> 01:23:10,400
तो इस्लाम के द्वारा वो पढ़ाई कहां पर कराई जा रही है

1207
01:23:10,400 --> 01:23:14,480
जहां पर व्यक्ति यह जान सके सीख सके कि कुरान

1208
01:23:14,480 --> 01:23:18,720
को सही विकल्प लिखना है परीक्षा में जब आएगा तब वह पढ़ाई

1209
01:23:18,720 --> 01:23:22,720
कहां पर कराई जा रही है बेस क्या है कुरान को

1210
01:23:22,720 --> 01:23:27,120
सही विकल्प चुनने के लिए उस परीक्षा से पहले की पढ़ाई कहां पर हो रही है

1211
01:23:27,120 --> 01:23:31,120
यह बताने का कष्ट करें मुफ्ती जी। ठीक। आगे बढ़ते

1212
01:23:31,120 --> 01:23:37,120
हैं। तो अब जो है

1213
01:23:38,800 --> 01:23:44,080
यहां पे हमने क्या किया कि अकाट रूप से

1214
01:23:44,080 --> 01:23:48,160
ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध किया और अकाट रूप से

1215
01:23:48,160 --> 01:23:52,640
सिर्फ अस्तित्व ही सिद्ध नहीं किया कि क्या एलन मस्क है भैया दुनिया में। अरे तो हम क्या करें?

1216
01:23:52,640 --> 01:23:56,800
तुमको उस तक जाना है। तुम्हारा वही विषय है। तुम्हारा वही उद्देश्य है।

1217
01:23:56,800 --> 01:24:00,960
वह सिद्ध किया हमने। वह रिलेशन सिद्ध किया हर

1218
01:24:00,960 --> 01:24:04,960
तरह से। और जब हम उसके अस्तित्व को सिद्ध कर रहे हैं मूल

1219
01:24:04,960 --> 01:24:09,040
वाले रूप में तो उसमें भी उसका सर्वनियंता, सर्वव्यापक और

1220
01:24:09,040 --> 01:24:13,120
सर्वशक्तिमान होना आवश्यक बताते हुए, सिद्ध करते हुए और

1221
01:24:13,120 --> 01:24:17,280
फिर उसको तीनों चीजें सिद्ध भी की। यह हमने किया और जबकि इस्लाम के द्वारा

1222
01:24:17,280 --> 01:24:21,440
प्रतिपादित होने वाला ईश्वर ना ही वह मूल सिद्ध होता है सृष्टि

1223
01:24:21,440 --> 01:24:25,760
का क्यों नहीं होता है? क्योंकि वह सर्व्यापक नहीं है। क्यों नहीं होता? क्योंकि वह सर्वशक्तिमान

1224
01:24:25,760 --> 01:24:30,000
नहीं है और अपने कुतर के कारण उन्होंने उसको सर्वज्ञाता सिद्ध होने से भी

1225
01:24:30,000 --> 01:24:34,160
रोक दिया। इसके साथ ही साथ एक क्वेश्चन यह आ जाता है कि जो बच्चे

1226
01:24:34,160 --> 01:24:38,240
आज जन्मे हैं और आज ही आपकी वो प्रलय आई या फिर इनका क्या होने

1227
01:24:38,240 --> 01:24:42,400
वाला है? क्योंकि इनको तो ऑप्शन मिला ही नहीं। विकल्प के रूप में भी नहीं मिला।

1228
01:24:42,400 --> 01:24:46,480
परीक्षा में विकल्प के रूप में भी इनको नहीं मौका मिल पाया तो इनका क्या होने वाला

1229
01:24:46,480 --> 01:24:50,480
है? ठीक है? यह है हमारे यहां तो कर्म फल है। कर्म फल

1230
01:24:50,480 --> 01:24:53,920
के कारण वो यहां पर उत्पन्न हुआ है। उसके साथ ऐसा होना था। उसके बाद

1231
01:24:53,920 --> 01:24:57,920
यदि वो मुक्त नहीं हुआ है इस जीवन में तो उसको अगला जीवन मिलेगा। आपके यहां तो वो है नहीं। तो

1232
01:24:57,920 --> 01:25:01,920
आपके यहां क्या सिद्धांत है उसका? वह आपने कहीं पर क्लियर

1233
01:25:01,920 --> 01:25:06,560
मेरी जानकारी में नहीं किया है।

1234
01:25:06,560 --> 01:25:10,880
अब जो है जावेद अख्तर जी ने जो कुछ गलत चीजें कही हैं

1235
01:25:10,880 --> 01:25:15,200
उसको मैं बता दूं उन पर थोड़ी सी बात कर कर लेते हैं कि उन्होंने

1236
01:25:15,200 --> 01:25:19,440
कहा कि जुल्म का जो नक्शा आप बनाओगे तो जहां-जहां पर धर्म है वहीं-वहीं

1237
01:25:19,440 --> 01:25:23,520
पर जुल्म का नक्शा आपको प्राप्त होगा। जहां पर धर्म होगा वहीं जुल्म का नक्शा होगा।

1238
01:25:23,520 --> 01:25:27,600
तो आप पहले तो इसके मूल में जाइए। क्या होता है कि सतही स्तर पर

1239
01:25:27,600 --> 01:25:29,760
बात करने के कारण ही यह अज्ञानता फैलती

1240
01:25:29,760 --> 01:25:33,760
है। पहले आप इसके मूल में जाइए कि दुनिया में लड़ाई किन दो पार्टियों

1241
01:25:33,760 --> 01:25:38,640
के बीच में है? लड़ाई किन दो पार्टियों के बीच में है? एक पार्टी है

1242
01:25:38,640 --> 01:25:42,880
जो कंजशन करना चाहती है जो केवल भोग

1243
01:25:42,880 --> 01:25:47,520
करना चाहती है और वो अपने से आसपास

1244
01:25:47,520 --> 01:25:51,840
वालों के साथ भी मतलब अत्याचार करना चाहती है

1245
01:25:51,840 --> 01:25:55,840
और अपने स्वार्थ को देख रही है वो भी भौतिक वादिता के चश्मे

1246
01:25:55,840 --> 01:25:59,920
से क्योंकि वो यह नहीं मान रही है कि नहीं भैया हमारी आत्मा को भी सुख

1247
01:25:59,920 --> 01:26:04,000
देना है अंतत तो कतवा हमारा कारण ईश्वर है वह इन सब पर ध्यान

1248
01:26:04,000 --> 01:26:08,160
नहीं दे रही तो उसने यह बना रखा है कि हमको भोग करना है। लस्ट इन

1249
01:26:08,160 --> 01:26:12,160
सब चीजों को हमें पूर्ति करनी है और उसके कारण हमें अत्याचार करने

1250
01:26:12,160 --> 01:26:16,160
हैं। अत्याचार करने के बीच में क्या चीजें हैं जो

1251
01:26:16,160 --> 01:26:20,320
हमारी बाधा बन रही है? ठीक है? यह नास्तिकता

1252
01:26:20,320 --> 01:26:24,880
है। यहां से सबसे पहला क्या है? नास्तिकता। तो बाधा क्या बन रही है?

1253
01:26:24,880 --> 01:26:28,960
बाधा बन रही है वह

1254
01:26:28,960 --> 01:26:32,960
बातें जो ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करती हैं। वह मान्यताएं जो

1255
01:26:32,960 --> 01:26:37,120
ईश्वर को मानती है जिनके कारण हमें धर्म प्राप्त होता है।

1256
01:26:37,120 --> 01:26:41,200
जिनके कारण हमें क्या सही है और क्या गलत है यह बातें प्राप्त होती

1257
01:26:41,200 --> 01:26:44,960
है। डूस एंड डोंट्स और जब डूस एंड डोंट्स आ जाते हैं ईश्वर

1258
01:26:44,960 --> 01:26:48,960
के कारण। यह भी आगे बात करूंगा जो जिसमें मुफ्ती जी ने अच्छी चीजें कही हैं

1259
01:26:48,960 --> 01:26:53,040
और जावेद जी तो हल्के पढ़ ही चुके थे। तो जो डस

1260
01:26:53,040 --> 01:26:57,040
एंड डोंट्स है वह हमें ईश्वर के कारण प्राप्त होते हैं। धर्म अभी तक

1261
01:26:57,040 --> 01:27:01,840
हमने ब्रह्म पर बात की थी। धर्म कि अगर हमें ईश्वर को प्राप्त करना है

1262
01:27:01,840 --> 01:27:05,920
तो हमें यह करना है और यह नहीं करना है। यह डूस एंड डोंट्स यही धर्म है।

1263
01:27:05,920 --> 01:27:10,400
यही मर्यादा है। ठीक है? और इसी को आप मोरालिटी

1264
01:27:10,400 --> 01:27:13,920
भी कह सकते हैं।

1265
01:27:13,920 --> 01:27:18,240
तो लड़ाई किन दो पक्षों के बीच में? पहले इसको आप समझ लीजिए। एक

1266
01:27:18,240 --> 01:27:22,480
जो यह मानता है कि ईश्वर है और

1267
01:27:22,480 --> 01:27:26,480
वो होने के कारण वो डूस एंड डोंट्स अप्लाई कर रहा है। तो जब

1268
01:27:26,480 --> 01:27:30,720
ये डस एंड डोंट्स अप्लाई होते हैं ना तो जिन लोगों को

1269
01:27:30,720 --> 01:27:34,880
भोग में ज्यादा जिनकी वृत्ति है यह व्यवहारिक सत्ता

1270
01:27:34,880 --> 01:27:39,040
है। सत्य है अब फिर आप मेरे पारमार्थिक सत्य को बीच में मत ले आना। तो

1271
01:27:39,040 --> 01:27:43,200
जिन लोगों के अंदर भोग की चीजें ज्यादा हैं,

1272
01:27:43,200 --> 01:27:47,200
वह उनको तकलीफ होती है ईश्वर के अस्तित्व

1273
01:27:47,200 --> 01:27:51,440
से और ईश्वर को प्राप्त कराने वाली विधा अर्थात धर्म से।

1274
01:27:51,440 --> 01:27:55,440
तो पहली नंबर बात तो वो सीधे खंडन करते हैं। ईश्वर है ही नहीं तो मुझे धर्म को

1275
01:27:55,440 --> 01:27:59,600
नहीं मानना पड़ेगा। जब इससे दाल नहीं गलती है तब दूसरे

1276
01:27:59,600 --> 01:28:00,240
दूसरे धर्म

1277
01:28:00,240 --> 01:28:05,360
स्थापित किए जाते हैं। जिसे हम कहते हैं धर्माभास।

1278
01:28:05,360 --> 01:28:09,360
ठीक है? तो जहां पर भी यह धर्म के नाम पर जो युद्ध हो रहा है ना

1279
01:28:09,360 --> 01:28:13,680
वह युद्ध धर्म के लिए नहीं हो रहा है। वह युद्ध हो रहा है कंजशन के लिए।

1280
01:28:13,680 --> 01:28:17,840
फॉर एग्जांपल किसी व्यक्ति को अपनी बहन से विवाह

1281
01:28:17,840 --> 01:28:22,000
करना है। धर्म उसके आड़े आ रहा है। मां से विवाह करना है। धर्म उसके

1282
01:28:22,000 --> 01:28:26,240
आड़े आ रहा है। क्या करें? मेरे पास तो भैया आ

1283
01:28:26,240 --> 01:28:30,400
गया। ईश्वर का एक भेजा हुआ मैसेंजर।

1284
01:28:30,400 --> 01:28:34,720
उसने बता दिया कि भैया फलानी फलानी

1285
01:28:34,720 --> 01:28:38,720
बहन से विवाह कर सकते हैं। है ना? यह सब

1286
01:28:38,720 --> 01:28:44,400
चीजें हैं। तो किस में हो रही है लड़ाई?

1287
01:28:44,400 --> 01:28:48,560
एक जो कंजशन करना चाहता है अत्याचार करके भी किसी भी तरह से एनी

1288
01:28:48,560 --> 01:28:52,640
हाउ दूसरी जो लिविंग बीइंग्स है उनको खत्म करके उन पर उनका शोषण करके

1289
01:28:52,640 --> 01:28:56,640
और दूसरा जो ईश्वर को मानने के कारण

1290
01:28:56,640 --> 01:29:00,880
धार्मिक बाधाओं में बंधे होने के कारण ये जो शोषण वाली चीजें हैं उनसे

1291
01:29:00,880 --> 01:29:04,880
वह कम हो रहा है। शोषण तो सभी लोग कर रहे हैं। पेड़ों का शोषण तो शाकाहारी भी कर रहा

1292
01:29:04,880 --> 01:29:09,040
है। कर रहा है ना? मगर उसमें एक कहीं ना कहीं

1293
01:29:09,040 --> 01:29:13,360
वो क्या कहते हैं उसको? अनुशासन है जिसके

1294
01:29:13,360 --> 01:29:15,360
कारण धीरे-धीरे वह शोषण से मुक्त हो रहा है।

1295
01:29:15,360 --> 01:29:19,600
जैसे हमारे यहां जो सबसे वरिष्ठ जो आश्रम

1296
01:29:19,600 --> 01:29:23,760
कहा गया वो सन्यास आश्रम सन्यासी इस सृष्टि का

1297
01:29:23,760 --> 01:29:28,080
सबसे कम शोषण करता है। जो कंजशन है

1298
01:29:28,080 --> 01:29:32,080
धर्म के कारण वो कंजशन जो है नियंत्रित होता है।

1299
01:29:32,080 --> 01:29:36,320
अनुशासित होता है। और क्या है कि अगर हम नियंत्रित और अनुशासित

1300
01:29:36,320 --> 01:29:40,720
नहीं करेंगे उस कंजमप्शन को तो उससे

1301
01:29:40,720 --> 01:29:45,040
उसके गर्भ से और कंजमशन निकलता जाएगा। तो धर्म उसको

1302
01:29:45,040 --> 01:29:49,280
क्योंकि अनुशासित करता है तो वह बढ़ने की बजाय कैंसर की तरह वो कम

1303
01:29:49,280 --> 01:29:53,440
होता है। जैसे कि आध्यात्म

1304
01:29:53,440 --> 01:29:57,600
मार्ग में आने के बाद मैं अपनी बात करूं तो मेरा जो कंजपशन को लेकर के कंजशन

1305
01:29:57,600 --> 01:30:01,760
को लेकर के पर्सपेक्टिव था वो कम हुआ है। और हो सकता है आने वाले सालों में और कम होता

1306
01:30:01,760 --> 01:30:05,760
चला जाए। तो यह हो रहा है। जब धर्म को मानेंगे तो कंजप्शन और

1307
01:30:05,760 --> 01:30:09,840
जो है नियंत्रित होंगे। हमारे पास धर्म होगा। बहन से विवाह नहीं करना है। माताओं को दृष्टि से

1308
01:30:09,840 --> 01:30:13,840
नहीं देखना है। और जब हमारे पास धर्म नहीं होगा तो हम लोग इनमें भी हम

1309
01:30:13,840 --> 01:30:17,840
अपने लिए छूट स्वतंत्र होकर के सबको देखेंगे। और फिर

1310
01:30:17,840 --> 01:30:21,840
जो ये प्रवृत्ति है नग्न देखने की

1311
01:30:21,840 --> 01:30:25,840
कामना है जो पुरुष के मन में स्त्री को वो

1312
01:30:25,840 --> 01:30:30,080
जो प्रवृत्ति है उस प्रवृत्ति से कभी मुक्त नहीं हो पाएंगे। मुक्त मुक्त

1313
01:30:30,080 --> 01:30:30,640
नहीं हो पाएंगे

1314
01:30:30,640 --> 01:30:34,720
तो फिर हमारा अटैचमेंट माया रूपी संसार से बना रहेगा। माया रूपी

1315
01:30:34,720 --> 01:30:38,720
संसार से बना रहेगा तो सदा दुखी रहेंगे। वह सारे कांसेप्ट आपको मैंने क्लियर किए।

1316
01:30:38,720 --> 01:30:43,520
तो कहने का मतलब यह है कि

1317
01:30:43,520 --> 01:30:48,240
अह किन दो लोगों के बीच में लड़ाई है एक

1318
01:30:48,240 --> 01:30:52,720
जो भोग करना चाहते हैं। दूसरे जो मुक्त होना चाहते हैं। जो

1319
01:30:52,720 --> 01:30:56,880
जो ये इस चीज को स्वीकार कर रहे हैं। भैया इस संसार से हमें अंतिम सुख नहीं

1320
01:30:56,880 --> 01:31:00,880
मिलेगा। और दूसरे जो इस अंतिम सुख को मना कर रहे हैं वह नास्तिक

1321
01:31:00,880 --> 01:31:04,880
है। अब क्या होता है? नास्तिक चोला ओढ़ते हैं जब उनकी दाल नहीं गलती

1322
01:31:04,880 --> 01:31:09,280
है। वह नए-नए ईश्वर खड़े करते हैं और उनको कहते हैं धर्माभास।

1323
01:31:09,280 --> 01:31:13,440
वो रियल धर्म नहीं बनाते बताते। रियल ईश्वर नहीं बताते। ईश्वर

1324
01:31:13,440 --> 01:31:17,600
जैसा कुछ बताते हैं। तो सनातन के पर्सपेक्टिव से जब हमने पूर्ण

1325
01:31:17,600 --> 01:31:21,920
ईश्वर को ख्यापित किया, सर्वशक्तिमान को ख्यापित किया, सर्वज्ञ

1326
01:31:21,920 --> 01:31:26,000
को ख्यापित किया, सर्वव्यापक को ख्यापित किया। हां।

1327
01:31:26,000 --> 01:31:30,240
तो उस पर्सेक्टिव से जब यहां पर इस्लाम भी उसी कैटेगरी में दिखाई देगा

1328
01:31:30,240 --> 01:31:34,640
आपको जब आप देखेंगे तो तो

1329
01:31:34,640 --> 01:31:38,880
फिर क्या होता है कि अब भैया हमने अपना एक नया कांसेप्ट बना लिया कि ईश्वर

1330
01:31:38,880 --> 01:31:42,880
ये कर सकता है ये नहीं कर सकता पूर्ण नहीं है यहां बैठा वहां नहीं बैठा और ज्यादा गहराई में

1331
01:31:42,880 --> 01:31:45,680
जाकर बातें मत करो है ना जैसे कि

1332
01:31:45,680 --> 01:31:49,680
एक जगह बोला गया मुफ्ती जी के द्वारा हमारे यहां सवाल करने के लिए मना नहीं किया गया है किया

1333
01:31:49,680 --> 01:31:53,680
गया है कुरान 5 101 कहती है कि ज्यादा सवाल मत

1334
01:31:53,680 --> 01:31:57,680
करो वरना ना जो तुमसे पहले भी कुछ

1335
01:31:57,680 --> 01:32:01,920
लोगों ने ऐसे ही सवाल किए गए थे तो उनके लिए वो आयतें भी खोल दी गई थी जिनका निर्वाह

1336
01:32:01,920 --> 01:32:06,560
करना बहुत कठिन होता है तो तुम्हारे लिए भी खोल दी जाएंगी

1337
01:32:06,560 --> 01:32:11,520
हम इस पर भी आगे बात करेंगे कि अगर

1338
01:32:11,520 --> 01:32:15,680
लोगों को जो कठिन लग रहा है उसके हिसाब से ईश्वर को प्राप्त

1339
01:32:15,680 --> 01:32:21,600
होने वाली विधा में परिवर्तन किया जा रहा है

1340
01:32:21,600 --> 01:32:25,600
तो फिर यह ईश्वर जो है बदल रहा है

1341
01:32:25,600 --> 01:32:29,680
तो एटरर्नल कैसे उसको प्राप्त कराने वाली जो विधा है वह तो बदल रही

1342
01:32:29,680 --> 01:32:33,760
है तो पहले वह किसी और विधा से प्राप्त हो सकता था अब वह किसी और विधा से प्राप्त हो

1343
01:32:33,760 --> 01:32:38,080
रहा है तो वो तो बदल रही है दो 187 में कहा जा रहा है कि भैया

1344
01:32:38,080 --> 01:32:42,160
अभी तक जो है रोजे की रात में अपनी स्त्रियों के साथ जो है संग स्त्री संग

1345
01:32:42,160 --> 01:32:46,160
कर लेना जो है पाप नहीं था पाप था आज से पाप

1346
01:32:46,160 --> 01:32:50,160
नहीं होगा यह क्या है ऑन द स्पॉट हो रहा है पहले से नहीं था पहले से तो कुछ और था पाप

1347
01:32:50,160 --> 01:32:54,240
था आज से पाप मुक्त हो गए तो क्या बदल रहा है आपके यहां

1348
01:32:54,240 --> 01:32:58,480
चीजें चेंज हो रही हैं। तो अगर ईश्वर को प्राप्त कराने

1349
01:32:58,480 --> 01:33:02,480
वाली चीजें चेंज हो रही हैं तो फिर वह ईश्वर भी तो चेंज हो रहा है जिसको प्राप्त करना है।

1350
01:33:02,480 --> 01:33:06,560
वो नहीं हो रहा चेंज। भाई पहले कुछ और तत्व था तभी तो

1351
01:33:06,560 --> 01:33:11,200
उसके लिए विधा दूसरी थी। अब कुछ और तत्व है तभी तो उसके लिए विधा दूसरी है।

1352
01:33:11,200 --> 01:33:15,200
विधा चेंज हो रही है तो ईश्वर का भी चेंज होना उससे परिलक्षित हो रहा

1353
01:33:15,200 --> 01:33:19,360
है। अब आप यह समझ गए

1354
01:33:19,360 --> 01:33:23,440
कि किन दो लोगों के बीच में लड़ाई है। भोग करने वाले और

1355
01:33:23,440 --> 01:33:27,920
मुक्ति के मार्ग पर चलने वाले जो मुक्ति के मार्ग पर चलने वाले लोग हैं।

1356
01:33:27,920 --> 01:33:31,920
वही साधु कहलाते हैं। साधु मेरा मतलब अच्छे लोग सज्जन लोग

1357
01:33:31,920 --> 01:33:36,560
वही साधु कहलाते हैं। और वही जो है धर्म पद पर आगे बढ़ते हैं।

1358
01:33:36,560 --> 01:33:37,060
तो

1359
01:33:36,800 --> 01:33:40,800
वही अनुशासित होते हैं। अब आप कहोगे भैया मैं तो धर्म को नहीं मानता मगर मैं भी

1360
01:33:40,800 --> 01:33:44,800
जो है उन चीजों का पालन करता हूं। तो यह ठीक इस तरीके से है

1361
01:33:44,800 --> 01:33:50,160
जैसे आप थॉमस अलवा एडिसन को नहीं जानते मगर आपके घर में बल्ब जल रहा है।

1362
01:33:50,160 --> 01:33:54,240
बल्ब बल्ब के जितने हिस्से में आपके जीवन में

1363
01:33:54,240 --> 01:33:58,480
बल्ब है ना उतने हिस्से में आप थॉमस अलवा एडिसन से कनेक्टेड हो। उसी

1364
01:33:58,480 --> 01:34:02,560
प्रकार से जितने हिस्से में आपके यहां पर मर्यादा है नास्तिक

1365
01:34:02,560 --> 01:34:06,560
के अंदर उतने हिस्से में आप आस्तिकता से कनेक्टेड हो और

1366
01:34:06,560 --> 01:34:10,720
उसी प्रकार से जितने हिस्से में जो इस्लाम इत्यादि

1367
01:34:10,720 --> 01:34:15,840
जो सनातन के विपरीत धर्म है जितने हिस्से में वो

1368
01:34:15,840 --> 01:34:19,920
सनातन के साथ सामंजस्य देखा जाता है उनमें

1369
01:34:19,920 --> 01:34:24,480
तो उतने हिस्से में उनका भी कनेक्शन हो जाता है सनातन से।

1370
01:34:24,480 --> 01:34:29,200
ठीक है? अब आप इसमें एक तर्क और ले लीजिए कि

1371
01:34:29,200 --> 01:34:33,280
आपने कहा कि आज हम पहली बात तो आपका एक तर्क था कि आज जो है यह वाली बहस

1372
01:34:33,280 --> 01:34:37,280
करने का हमें अवसर प्राप्त हो रहा है। तो यह

1373
01:34:37,280 --> 01:34:41,280
भी बात एक बहुत गलत बात है। हिरण्यकश्यप ने भी यह सब बातें

1374
01:34:41,280 --> 01:34:45,360
कही थी कि अगर ईश्वर है तो इस खंभे से निकल के दिखाए। तो ये सारे तर्क तो हमारे यहां जाने

1375
01:34:45,360 --> 01:34:46,480
कब से हैं।

1376
01:34:46,480 --> 01:34:50,480
चलिए मान लीजिए कि ये तो मानेंगे कि भैया आज से 100

1377
01:34:50,480 --> 01:34:54,560
साल पहले का तो पुराण है। चलो उस पे आप लोग आक्षेप लगा लो। हमारे आर्य समाजियों ने तो बहुत

1378
01:34:54,560 --> 01:34:58,720
फैलाया ही है। है ना? हालांकि वह आर्य समाजी भी क्या क्या

1379
01:34:58,720 --> 01:35:04,720
सिद्ध होते हैं वह भी बात करेंगे हम लोग। मगर अ

1380
01:35:05,360 --> 01:35:09,600
हमारे यहां पर 100 साल से कहीं अधिक

1381
01:35:09,600 --> 01:35:13,600
समय से ये सब कुतर्क चले आ रहे हैं। ऐसे ही नहीं बौद्धों का खंडन किया आदि शंकराचार्य जी

1382
01:35:13,600 --> 01:35:16,000
ने। वो भी तो नास्तिकता थी।

1383
01:35:16,000 --> 01:35:20,080
बौद्धों ने भी तो नास्तिकता ही फैलाई। 2500 साल पहले तो तर्क था।

1384
01:35:20,080 --> 01:35:25,200
ईश्वर के ना होने में ऐसे ऐसे भयंकर तर्क किए गए। जाइए पढ़िए बुद्ध दर्शन।

1385
01:35:25,200 --> 01:35:29,200
मेरे ख्याल से अगर आप बुद्ध को पकड़ लेंगे तो कम से कम

1386
01:35:29,200 --> 01:35:33,200
इस्लाम को मानने वाले जो ये जो मुफ्ती जी हैं आपके समकक्ष खड़े

1387
01:35:33,200 --> 01:35:37,280
हुए हैं। यह तो आपको परास्त नहीं कर पाएंगे। इतनी बात तो मैं कह रहा हूं। उस

1388
01:35:37,280 --> 01:35:41,760
नास्तिकता को वो जो बुद्ध की नास्तिकता है ना उसको हराने के लिए

1389
01:35:41,760 --> 01:35:46,080
सनातनी को आना पड़ेगा। मनुवादी को आना पड़ेगा। शंकर

1390
01:35:46,080 --> 01:35:50,080
परंपरा के व्यक्ति को आना पड़ेगा। ठीक है? वहां तब काम नहीं

1391
01:35:50,080 --> 01:35:54,720
चल पाएगा। यह इस्लाम को मानने वाले जो मुफ्ती इत्यादि हैं।

1392
01:35:54,720 --> 01:35:58,960
खैर तो दो लोगों के बीच में युद्ध है। एक कंसशन

1393
01:35:58,960 --> 01:36:03,440
भोग वाली पार्टी है और एक जो है मुक्ति पाने की चाह रखने वाली पार्टी जो उसके

1394
01:36:03,440 --> 01:36:07,440
प्रति क्रिया उसने स्वीकार किया कि मेरे अंदर वो भूख है। और स्वीकार करके उसके

1395
01:36:07,440 --> 01:36:11,520
अनुसार वो चल रहे हैं। अब क्या है कि पहली नंबर बात ये जो नास्तिक

1396
01:36:11,520 --> 01:36:16,480
पार्टी है वो अपना चोला ओढ़ती चोला उड़ती है धर्म का दूसरे धर्म का विधर्मी

1397
01:36:16,480 --> 01:36:20,560
तो वहां युद्ध होता है। ठीक है? युद्ध कैसे होता

1398
01:36:20,560 --> 01:36:24,640
है कि जो जिसने चोला ओढ़ा है धर्म का जिसने ईश्वर जैसा ईश्वर आभास

1399
01:36:24,640 --> 01:36:28,640
फैलाया है तो फिर वहां उसके साथ जो वास्तविक धर्म है और जो

1400
01:36:28,640 --> 01:36:31,280
कल्पित धर्म है उसके बीच में आपको

1401
01:36:31,280 --> 01:36:35,280
दिखाई देता है युद्ध और क्यों हो रहा है युद्ध

1402
01:36:35,280 --> 01:36:39,360
क्योंकि हमें उन सिद्धांतों को बचाना है जहां पर एक मां को

1403
01:36:39,360 --> 01:36:43,440
मां कहा जाए ईश्वर के अस्तित्व को बचाना है असतो

1404
01:36:43,440 --> 01:36:47,760
मा सद्गमयातम सो मा ज्योतिर्गमया मृत्युमा मृतम गमया को बचाना

1405
01:36:47,760 --> 01:36:51,840
है ईश्वर को सर्वशक्तिमान सिद्ध कर सकने वाले इन

1406
01:36:51,840 --> 01:36:57,360
सिद्धांतों को बचाना है। इसलिए वह युद्ध हो रहा है।

1407
01:36:57,360 --> 01:37:02,080
मानवता के लिए युद्ध हो रहा है। ठीक है ना?

1408
01:37:02,080 --> 01:37:06,320
क्योंकि अगर धर्म नहीं है तो मानवता नहीं है। पशुता है।

1409
01:37:06,320 --> 01:37:10,560
धर्मणी ना पशु भी समाना। अब वो आगे बात करेंगे कि मोरल्टी

1410
01:37:10,560 --> 01:37:14,880
आपने जो कुतर्क किया है वो तो उन कुतर्कों का खंडन तो उन्होंने कर ही दिया मुक्ति

1411
01:37:14,880 --> 01:37:18,800
जी ने। तो

1412
01:37:18,800 --> 01:37:22,800
एक बात अब अब एक चीज और बताता चलूं जब धर्माभास की

1413
01:37:22,800 --> 01:37:26,880
भी दाल नहीं गलती है तो वह फिर बन जाता है सनातनाभास जिनके

1414
01:37:26,880 --> 01:37:31,200
शोधन के लिए हम कार्य कर रहे हैं वो सनातनाभास क्या है जो हमारे दर्शक

1415
01:37:31,200 --> 01:37:36,080
है वो जानते हैं इस आर्य समाज रामपाल ब्रह्माकुमारी

1416
01:37:36,080 --> 01:37:41,600
ये सब सनातनाभास है पहले था धर्माभास अब हो गया सनातनाभास

1417
01:37:41,600 --> 01:37:45,760
और फिर इसके इन इस ये भी और आगे थोड़ा सा एक्सप्लोर हो जाते तो इनसे

1418
01:37:45,760 --> 01:37:49,760
वैचारिक युद्ध चलता वो युद्ध आपको युद्ध जैसा नहीं दिखेगा।

1419
01:37:49,760 --> 01:37:53,840
वैचारिक युद्ध चलता है कि भैया तुम सनातन के नाम से जो जो गलत बातें फैला रहे हो मत

1420
01:37:53,840 --> 01:37:58,160
फैलाओ। वैचारिक युद्ध चलता है और वहां पर जो है व्यवहारिक

1421
01:37:58,160 --> 01:38:02,560
युद्ध भी दिख जाता है सीधे-सीधे वालों में और अंतत

1422
01:38:02,560 --> 01:38:06,640
गतवा किस किस चीज के लिए लड़ाई हो रही है? आपने कहा ना कि बच्चों को मारा ना

1423
01:38:06,640 --> 01:38:10,800
जाए। बच्चे ना मरे, बच्चों के साथ अत्याचार ना हो। यह भी

1424
01:38:10,800 --> 01:38:14,960
एक धर्म है, नैतिकता है। अगर आप

1425
01:38:14,960 --> 01:38:19,040
ईश्वर के अस्तित्व को हटा देंगे तो लोग आपसे क्वेश्चन करेंगे कि भैया तुम्हारे अंदर इन बच्चों को

1426
01:38:19,040 --> 01:38:23,920
ना मारने का भाव है। हमारे अंदर तो खाने का भाव है। निठार ही हैं। हम तो

1427
01:38:23,920 --> 01:38:28,160
क्या कर लोगे? कैसे सिद्ध करोगे वही धर्म?

1428
01:38:28,160 --> 01:38:32,320
और ये बात मुफ्ती जी ने भी आगे कही है। ज्यादा लोगों के कह देने से वही धर्म

1429
01:38:32,320 --> 01:38:34,160
हो जाएगा क्या?

1430
01:38:34,160 --> 01:38:38,160
मुफ्ती यह जो अलवजदी है ना जो इसमें आए हुए हैं

1431
01:38:38,160 --> 01:38:42,160
इनके ही यहां पर इनहीं की टीम थी। वहां पर आया था एक व्यक्ति। इन्होंने प्रश्न

1432
01:38:42,160 --> 01:38:46,240
किया कि भाई फिर बहन को अगर तुम ईश्वर को नहीं मानते, धर्म को

1433
01:38:46,240 --> 01:38:50,240
नहीं मानते तो बहन के साथ बहन के साथ वो

1434
01:38:50,240 --> 01:38:54,240
जो संबंध बना रहा है उससे आप का आपको आपत्ति है। उसने कह दिया नहीं

1435
01:38:54,240 --> 01:38:57,600
आपत्ति। लो

1436
01:38:57,600 --> 01:39:01,600
अगर हम ईश्वर के अस्तित्व को हटा देंगे भाई साहब तो यह जो

1437
01:39:01,600 --> 01:39:05,600
धार्मिक मर्यादा आपको दिख रही है ना छिनभिन्न हो जाएगी और ऐसा हो भी चुका है हिस्ट्री पढ़

1438
01:39:05,600 --> 01:39:09,760
लीजिएगा डार्विन ने जब कह दिया था कि वो नहीं है कोई ईश्वर नहीं

1439
01:39:09,760 --> 01:39:14,880
है वहां का वहां की हिस्ट्री जान लीजिए आप

1440
01:39:14,880 --> 01:39:18,880
अच्छा दूसरी बात क्या है कि आजकल आपने कहा

1441
01:39:18,880 --> 01:39:22,960
कि मेजॉरिटी के पीपल तो आजकल जो हां आपने आधुनिक

1442
01:39:22,960 --> 01:39:27,040
आधुनिकता से जोड़ा कि आधुनिकता हो रही इसलिए आपको आज ये मंच मिल रहा है। आप

1443
01:39:27,040 --> 01:39:31,280
बताइए संस्कार कम हुए हैं पहले से या ज्यादा हुए हैं? आप ही के परिवेश

1444
01:39:31,280 --> 01:39:35,360
में बता दीजिए। संस्कार पहले से कम है या ज्यादा है?

1445
01:39:35,360 --> 01:39:39,760
पोर्न इंडस्ट्री जो आज की डेट में है व्यभचार का अड्डा

1446
01:39:39,760 --> 01:39:43,840
वो पहले ज्यादा सशक्त थी या आज ज्यादा सशक्त है या क्या कहते हैं आज से

1447
01:39:43,840 --> 01:39:48,880
आने वाले भविष्य में? तो जिसको आप आधुनिकता का नाम दे रहे हैं वहां मानवता का

1448
01:39:48,880 --> 01:39:49,380
गला

1449
01:39:49,280 --> 01:39:53,840
घोटा जा रहा है। समझ रहे हैं? और यदि हम लोग

1450
01:39:53,840 --> 01:39:57,920
हम जैसे लोग इतने हिस्से में मुफ्ती जी को भी साथ में लूंगा वो

1451
01:39:57,920 --> 01:40:01,920
बात और है फिर उनका ईश्वर सिद्ध नहीं होता धर्मास सिद्ध होता है वो बात अलग है मगर इतने

1452
01:40:01,920 --> 01:40:05,920
हिस्से में तो उनको साथ में लूंगा हम जैसे लोग अगर नास्तिकता को काउंटर

1453
01:40:05,920 --> 01:40:10,000
नहीं करेंगे तो ये जो रेशियो अभी थोड़ा-थोड़ा दिख रहा है ना आपके घर के बगल में वैशालय

1454
01:40:10,000 --> 01:40:14,080
नहीं है या आपके घर की स्त्रियों को जो है गलत कुदृष्टि से

1455
01:40:14,080 --> 01:40:18,160
नहीं देख रहा है कोई या आपके घर में ही ऐसी संताने नहीं उत्पन्न हो रही हैं

1456
01:40:18,160 --> 01:40:22,160
हमारे आपके घर में ऐसी संताने उत्पन्न नहीं हो रही है जो बहन के ऊपर कोई दृष्टि डालें।

1457
01:40:22,160 --> 01:40:26,160
मां के ऊपर कुद दृष्टि डालें। अगर हम जैसे लोग मैं और मुफ्ती जैसे लोग अगर खड़े

1458
01:40:26,160 --> 01:40:30,240
नहीं होंगे नास्तिकता के विरोध में तो वहां पर आपको यह दृष्टि भी देखने

1459
01:40:30,240 --> 01:40:36,080
को मिल जाएंगे। तब सोचोगे कारण दो ना उसको।

1460
01:40:36,080 --> 01:40:40,080
मां को मां मानने का कारण दो। बहन को बहन मानने का कारण दो। नहीं दे पाओगे

1461
01:40:40,080 --> 01:40:44,080
आप। तो मेजॉरिटी क्या कर रही है? सम सेक्स चेंज ऑपरेशन करा रही है।

1462
01:40:44,080 --> 01:40:48,240
तो आपको तो पसंद होंगे। आपने कहा था ना फतवे जारी हो गए थे। विज्ञान के कारण

1463
01:40:48,240 --> 01:40:52,720
यह है वो वो हुए होंगे। गलत भी होंगे। मगर भाई विज्ञान

1464
01:40:52,720 --> 01:40:57,200
के नाम पर आप गला घोट रहे हो कि नहीं घोट रहे हो?

1465
01:40:57,200 --> 01:41:02,640
प्रकृति का हनन कर रहे हो कि नहीं कर रहे हो? विज्ञान के नाम पे।

1466
01:41:02,640 --> 01:41:06,720
अब आप यह कह दोगे कि उसी विज्ञान का सहारा लेकर के क्यों बोल रहे हो? इसके इसमें भी तर्क

1467
01:41:06,720 --> 01:41:10,800
ले लो। धरती पर गिरा हुआ इंसान धरती का ही सहारा लेकर के उठ

1468
01:41:10,800 --> 01:41:13,600
खड़ा होता है।

1469
01:41:13,600 --> 01:41:17,600
जिस वायुयान को आकाश में उड़ना है वह धरती का

1470
01:41:17,600 --> 01:41:21,760
ही पहले सहारा लेता है। तब जो है अपने आप को उस योग्य बनाता है कि जो आकाश में धरती को छोड़कर

1471
01:41:21,760 --> 01:41:25,840
के आकाश में उड़े। तो उसी प्रकार से यह जो विज्ञान के

1472
01:41:25,840 --> 01:41:29,920
कारण विज्ञान के आधार पर जो मानवता का गला घोटा जा रहा

1473
01:41:29,920 --> 01:41:33,920
है। इन परिस्थितियों से निकलने के लिए इन्हीं परिस्थितियों का सहारा

1474
01:41:33,920 --> 01:41:38,080
ले रहे हैं हम लोग। ठीक है?

1475
01:41:38,080 --> 01:41:42,080
अगर आप कहते कि मोरल्टी अपने अंदर से आती है

1476
01:41:42,080 --> 01:41:46,160
तो क्या निठारी लोगों की मोरल्टी उनके अंदर से नहीं आई थी?

1477
01:41:46,160 --> 01:41:50,240
सेट कैसे करेंगे? निठारी कहेगा मुझे कुकर में उबाल करके बच्चों

1478
01:41:50,240 --> 01:41:54,880
को खाना है। कैसे करोगे मोरल्टी सेट?

1479
01:41:54,880 --> 01:41:58,880
तो यह आपका गलत तर्क है। इसमें उन्होंने बहुत अच्छे से वहां

1480
01:41:58,880 --> 01:42:02,960
पर आपको रिफ्यूट किया। दुआ क्यों मांगते

1481
01:42:02,960 --> 01:42:08,160
हैं? इस पर मैंने आपको बता ही दिया।

1482
01:42:08,160 --> 01:42:12,240
गलत कर्म से तबाही होगी। आपने एक जगह माना कि भाई गलत करेंगे तो तबाही

1483
01:42:12,240 --> 01:42:16,320
होगी। पहली बात तो गलत करेंगे सेट कहां से होगा? आप

1484
01:42:16,320 --> 01:42:20,560
आप धर्म बन जाओगे लोगों का। फिर अगर आप यह सेट करने लगोगे

1485
01:42:20,560 --> 01:42:24,720
हम किसको मानते हैं जावेद अख्तर के धर्म को। वही धर्म जिसको आप कुछ

1486
01:42:24,720 --> 01:42:29,360
और नाम दे दो तो बस धर्म नाम ना दो। बात तो वही हो गई ना घुमा फिरा करके।

1487
01:42:29,360 --> 01:42:33,520
आप एक नियमावली जैसे ही दोगे वैसे ही आपको आपकी उस नियमावली को मानने वाले

1488
01:42:33,520 --> 01:42:37,520
आपके लोग हो जाएंगे। दूसरी बात यह है कि यहां पर आपने

1489
01:42:37,520 --> 01:42:42,080
उस बिलीफ को मान लिया जिसमें आपने यह कहा था शुरू में कि

1490
01:42:42,080 --> 01:42:45,440
क्या कहते हैं वो

1491
01:42:45,440 --> 01:42:49,520
भैया मैं ऐसी किसी चीज को नहीं मानता हूं जिसमें मुझे तर्क के साथ जो है

1492
01:42:49,520 --> 01:42:53,520
उसमें जरा भी बस कह दिया और मान लो आपने यहां मान लिया तबाही

1493
01:42:53,520 --> 01:42:58,000
होगी साइंस ने आपको प्रूफ किया है क्या झूठ बोलने में तबाही होगी

1494
01:42:58,000 --> 01:43:02,480
किया है प्रूफ मगर आप मानते हो झूठ नहीं बोलना चाहिए

1495
01:43:02,480 --> 01:43:06,480
हां कई साइंटिस्ट कहते बहन इत्यादि के साथ जो

1496
01:43:06,480 --> 01:43:10,960
है संभोग नहीं करना चाहिए। कई साइंटिस्ट कहते हैं कर भी सकते हैं।

1497
01:43:10,960 --> 01:43:15,120
हम तो फिर आप कह दोगे

1498
01:43:15,120 --> 01:43:19,440
साइंस की सबसे बड़ी दिक्कत तो यह भी है ना। जैसे आपने एक जगह जब आपसे कहा गया

1499
01:43:19,440 --> 01:43:23,840
कि भैया वो

1500
01:43:23,840 --> 01:43:27,920
एक रिसर्च हुई है जिसमें कि जो है अ ये कहा

1501
01:43:27,920 --> 01:43:31,920
गया कि लोग 90% लोग होते हैं उनके अंदर ईश्वर की चाह है। वो है वो

1502
01:43:31,920 --> 01:43:36,000
तो हम अलग से भी सिद्ध कर रहे हैं। आपके अंदर भी है। एक नास्तिक व्यक्ति भी यह

1503
01:43:36,000 --> 01:43:40,080
सोचता है कि बारिश थोड़ी कम हो जाए। क्यों भाई? क्यों सोच रहे हो बारिश को कम करने के

1504
01:43:40,080 --> 01:43:44,720
बारे में? साइंस ने तो कहा नहीं तुम कम कर सकते हो? तो

1505
01:43:44,720 --> 01:43:48,720
आप साइंस के ठीक विपरीत जाकर के बारिश को कम करने की चाह

1506
01:43:48,720 --> 01:43:52,720
मन में आ रही है। आपके धूप को कम करने की चाह मन में आ रही

1507
01:43:52,720 --> 01:43:56,720
है आपके। इसी से सिद्ध होता है कि आपके मन में

1508
01:43:56,720 --> 01:44:01,120
सतचित आनंद की चाह विद्यमान है। 200 वर्ष के होने पर भी

1509
01:44:01,120 --> 01:44:05,120
आपके माता-पिता आपके प्रियजन यदि बीमार पड़ेंगे, मृत्यु के

1510
01:44:05,120 --> 01:44:09,600
कगार पर पहुंचेंगे, आपके मन में आएगा कि बच जाए। है ना?

1511
01:44:09,600 --> 01:44:14,800
तो आप मृत्यु से भाग रहे हो, दुख से भाग रहे हो और आप

1512
01:44:14,800 --> 01:44:19,520
अज्ञानता से भाग रहे हो। जबकि मृत्यु, दुख और अज्ञानता

1513
01:44:19,520 --> 01:44:23,520
यही रियलिटी है इस दुनिया की। तो फिर आप भाग क्यों रहे

1514
01:44:23,520 --> 01:44:26,560
हो? यहीं से सिद्ध होता है कि इस रियलिटी के विपरीत

1515
01:44:26,560 --> 01:44:30,640
एक रियलिटी है। जहां दुख नहीं है, जहां अज्ञानता नहीं है और

1516
01:44:30,640 --> 01:44:34,880
जहां मृत्यु नहीं है, उसी का नाम ईश्वर है, वही ईश्वर का स्थान

1517
01:44:34,880 --> 01:44:38,480
है।

1518
01:44:38,480 --> 01:44:42,560
एक बात मैं बता दूं कि मोरल्टी से भगवान के अस्तित्व को सिद्ध नहीं किया जाता है।

1519
01:44:42,560 --> 01:44:46,880
मगर मोरल्टी से भगवान का अस्तित्व सिद्ध नहीं होता है। भगवान का अस्तित्व

1520
01:44:46,880 --> 01:44:50,960
सिद्ध होने से मोरल्टी प्राप्त होती है। मोरल्टी से भगवान का अस्तित्व सिद्ध नहीं

1521
01:44:50,960 --> 01:44:55,200
होता है। ठीक है? यह आप ध्यान रखिए। मोरल्टी एक बाय प्रोडक्ट है कि अब हमें पहले

1522
01:44:55,200 --> 01:44:59,440
पता लगा कि कोई सर्वशक्तिमान सत्ता है और जो हमारी

1523
01:44:59,440 --> 01:45:03,520
चाह का विषय है। अब उसको प्राप्त करने के लिए हमें डूज एंड

1524
01:45:03,520 --> 01:45:08,080
डोंट्स बताए गए हैं। यही मोरल्टी है। ठीक है? मोरल्टी

1525
01:45:08,080 --> 01:45:12,320
होने से यह पता चलता है कि यह भी जाने अनजाने में भगवान को मान रहा है।

1526
01:45:12,320 --> 01:45:16,640
भगवान का अस्तित्व यहां से सिद्ध होता है कि हमारे अंदर चाह है।

1527
01:45:16,640 --> 01:45:20,880
तो इसका मतलब इस दुनिया में उसका अस्तित्व है। ठीक है?

1528
01:45:20,880 --> 01:45:25,760
आपने कहा कि बहुत से साइंटिस्ट हैं जिन्होंने यह बनाया वो बनाया।

1529
01:45:25,760 --> 01:45:29,840
पहले इसका जवाब नहीं दिया उन्होंने मुफ्ती जी ने। उन्होंने बहुत

1530
01:45:29,840 --> 01:45:33,840
से ऐसे चीजें बनाई है जो अच्छी चीजें थी समाज के लिए।

1531
01:45:33,840 --> 01:45:37,920
वो सभी आपने कहा कि वो सभी सवाल करने वाले थे। हां सवाल

1532
01:45:37,920 --> 01:45:41,760
करने वाले थे। मगर आज की डेट में भी 90% जो

1533
01:45:41,760 --> 01:45:46,240
साइंटिस्ट वगैरह हैं वो आस्तिक हैं। जाके देखिए।

1534
01:45:46,240 --> 01:45:50,480
सवाल करने वाले थे। कोई सवाल करने से नहीं रोका जाता सनातन में। इस्लाम और सनातन

1535
01:45:50,480 --> 01:45:54,720
में अंतर है। हमारे यहां तो कहा जा रहा है ना असतो मा सद्गमया सवाल ही तो है यह

1536
01:45:54,720 --> 01:45:59,040
तमसो मा ज्योतिर्गमया मेरी अज्ञानता को दूर करो सवाल ही तो करना है

1537
01:45:59,040 --> 01:46:03,440
अथातो धर्म जिज्ञासा अथातो ब्रह्म जिज्ञासा करो सवाल संशयात्मा

1538
01:46:03,440 --> 01:46:07,920
विनश्यति भगवान ने कहा तेरे संशय को ही दूर करना है मुझे

1539
01:46:07,920 --> 01:46:12,480
यह है सवाल का जवाब

1540
01:46:12,480 --> 01:46:16,560
तो मोरल्टी एक बाय प्रोडक्ट है और मैंने एक मोरल्टी की बहुत अच्छी व्याख्या आपको

1541
01:46:16,560 --> 01:46:21,120
बताई कि किसके बीच में युद्ध है जो धर्म के नाम पर युद्ध हो रहा है वास्तविकता

1542
01:46:21,120 --> 01:46:25,120
मानवता और पशुता के बीच का युद्ध है। अब क्या है? पशुता जो

1543
01:46:25,120 --> 01:46:29,840
है नास्तिकता के रूप में, फिर धर्माभास के रूप में, फिर सनातनाभास

1544
01:46:29,840 --> 01:46:34,240
के रूप में और फिर जो है आगे और जिस तरीके से वो लड़ रही है मानवता

1545
01:46:34,240 --> 01:46:38,240
से। मानवता कहां से आ रही है? ईश्वर के अस्तित्व से। सर्वशक्तिमान

1546
01:46:38,240 --> 01:46:44,240
पूर्ण ईश्वर। बाधित नहीं।

1547
01:46:44,400 --> 01:46:48,880
अब थोड़ा सा मुफ्ती जी के भी कुतर्क है कुछ जो मैंने नोट किए।

1548
01:46:48,880 --> 01:46:53,360
एक उन्होंने कहा कि भाई जो नॉन फिजिकल

1549
01:46:53,360 --> 01:46:57,600
चीज क्योंकि जो वह ईश्वर है वह नॉन फिजिकल

1550
01:46:57,600 --> 01:47:01,920
एंटिटी है इसलिए उस पर जो है उसके लिए साइंटिफिक यानी फिजिकल

1551
01:47:01,920 --> 01:47:06,000
दलीलें नहीं मांगी मांगी जाएंगी और उसी में उन्होंने उसको कहा कि दिखाओ

1552
01:47:06,000 --> 01:47:10,320
ये वाली भी साइंटिफिक दलील मांग ली और या फिर और भी कहा था प्लास्टिक

1553
01:47:10,320 --> 01:47:14,400
से और मतलब उन्होंने उसी चीज को बार-बार कहा मगर सबसे बड़ी बात है कि

1554
01:47:14,400 --> 01:47:18,640
उन्होंने नॉन फिजिकल वो है नॉन फिजिकल चीज का अस्तित्व है इसका

1555
01:47:18,640 --> 01:47:22,720
उन्होंने क्या कहते कहते हैं। इस चीज को प्रूव नहीं किया इन्होंने कि

1556
01:47:22,720 --> 01:47:26,800
वो है उसका अस्तित्व। नॉन फिजिकल चीजें भी हैं। और

1557
01:47:26,800 --> 01:47:30,800
आगे चलकर के उन्होंने क्या किया कि यह कह दिया कि

1558
01:47:30,800 --> 01:47:34,800
आप जो है नॉन फिजिकल यहां पे तो मना कर दिया

1559
01:47:34,800 --> 01:47:38,960
कि आप जो है उसके होने के विषय में सबूत जो है मुझे

1560
01:47:38,960 --> 01:47:42,960
साइंस से नहीं मांगोगे। मगर जब खंडन करना है ईश्वर का तो

1561
01:47:42,960 --> 01:47:47,040
मुझे साइंटिफिक वो चाहिए। यह मुफ्ती जी ने कह दिया आगे चलकर के। मतलब

1562
01:47:47,040 --> 01:47:51,200
अपने लिए बचाव में कह रहे हैं कि उसके होने का सबूत

1563
01:47:51,200 --> 01:47:55,200
मैं साइंटिफिक नहीं दूंगा। मगर ना होने के संबंध

1564
01:47:55,200 --> 01:47:59,360
में आपको साइंटिफिक दलील देनी होगी। गलत कर

1565
01:47:59,360 --> 01:48:00,480
दिया।

1566
01:48:00,480 --> 01:48:04,560
जब आप उसको नॉन जब आप यह बाउंड कर रहे हैं सामने वाले को कि नॉन

1567
01:48:04,560 --> 01:48:08,560
फिजिकल एंटिटी है। इसलिए आप जो है साइंस

1568
01:48:08,560 --> 01:48:12,560
से नहीं मांग सकते। चीजों साइंस के आधार पे नहीं मांग सकते। अह

1569
01:48:12,560 --> 01:48:16,800
दलील। तो फिर आप उसको स्वतंत्रता भी दीजिए ना कि नॉन फिजिकल

1570
01:48:16,800 --> 01:48:21,040
एंटिटी है तो मैं नॉन फिजिकल वाली दलील भी दूं। फिर साइंटिफिक दलील क्यों मांग

1571
01:48:21,040 --> 01:48:25,040
मांग रहे हैं? हालांकि हमारी तो कांसेप्ट ही अलग है। हमारा तो हम तो ये हमारा तो यह

1572
01:48:25,040 --> 01:48:29,120
कहना है कि भाई ये भगवान का भी विज्ञान ही तो है। विज्ञान क्या है

1573
01:48:29,120 --> 01:48:33,280
जो आपको चीजों को पता है ऐसा ऐसे हो रहा है। ऐसा ऐसे हो रहा है। तो उसको

1574
01:48:33,280 --> 01:48:39,280
आप विज्ञान से अलग क्यों करते हैं? अलग अलग नहीं करना चाहिए।

1575
01:48:40,000 --> 01:48:44,080
हां विज्ञान का एक भाग हो सकता है कि भैया हमने विधा

1576
01:48:44,080 --> 01:48:48,400
को जाना ईश्वर को प्राप्त कराने वाली विधा को जाना दार्शनिकता का स्तर

1577
01:48:48,400 --> 01:48:53,120
विज्ञान का एक भाग हो सकता है मगर विज्ञान के विपरीत कहना उचित नहीं है

1578
01:48:53,120 --> 01:48:55,920
अच्छा

1579
01:48:55,920 --> 01:49:00,080
फिर इन्होंने एक कुतर्क ये भी कर दिया कि हमारी जो हम मैं तो जो है सवाल पूछने

1580
01:49:00,080 --> 01:49:04,080
से नहीं रोकता आपकी कुरान रोकती है 5 101 पढ़ लीजिए

1581
01:49:04,080 --> 01:49:08,240
और खुदा तक पहुंचने की चीजें बदल रही हैं तो आपका वो एटरनल सिद्ध नहीं

1582
01:49:08,240 --> 01:49:12,480
हो रहा है। कालकृत कालकृत वाला मामला है ना वह बिगड़

1583
01:49:12,480 --> 01:49:18,480
रहा है। वह भी बिगड़ रहा है।

1584
01:49:18,560 --> 01:49:22,800
अच्छा आपके कुछ अच्छे भी पॉइंट थे इनके मुफ्ती जी के वो

1585
01:49:22,800 --> 01:49:26,960
क्या थे? जैसे कि फॉल्स फेथ वर्सेस

1586
01:49:26,960 --> 01:49:30,960
गुड फेथ वाली जो उन्होंने बात कही थी वो सही बात है। जब भी लोग ऐसे करते

1587
01:49:30,960 --> 01:49:35,360
हैं कि भाई मैं फेथ नहीं मानता। तो उन्होंने अच्छा अच्छी दलील वहां पे दी अच्छा

1588
01:49:35,360 --> 01:49:39,360
तर्क दिया था कि भाई फॉल्स फेथ को मत मानिए मगर जो सही

1589
01:49:39,360 --> 01:49:43,840
फेथ हैं जो तार्किकता की ओर ले जाने वाले फेथ हैं वह तो आपको मानने पड़ेंगे ना

1590
01:49:43,840 --> 01:49:47,920
जैसे कि मेरे दर्द हो रहा है इस विषय में तो मेरा शब्द

1591
01:49:47,920 --> 01:49:52,080
ही प्रमाण है ना कि मुझे कष्ट हो रहा है अगर मान लो मेरा मांस

1592
01:49:52,080 --> 01:49:56,240
भी कटा हुआ है या नहीं कटा हुआ है मान लीजिए तो क्या मेरे

1593
01:49:56,240 --> 01:50:00,400
दर्द हो सकता है कि नहीं मैं बैठा हुआ हूं मेरे दर्द हो रहा है इस विषय में तो शब्द ही प्रमाण

1594
01:50:00,400 --> 01:50:06,400
है तो यहां फेथ करना पड़ेगा कि नहीं मेरे ऊपर

1595
01:50:07,040 --> 01:50:11,440
तो कई जगहों पर शब्द ही प्रमाण होता है। ये आपको मानना पड़ेगा। तो वहां पर

1596
01:50:11,440 --> 01:50:16,640
जो तार्किकता की दृष्टि से या जिसका खंडन ना हो रहा हो

1597
01:50:16,640 --> 01:50:20,720
उसको फेथ को फिर स्वीकार करना पड़ता है। अच्छा दूसरी बात क्या

1598
01:50:20,720 --> 01:50:24,720
है कि इन्होंने मुफ्ती जी ने एक पॉइंट और बढ़िया कहा

1599
01:50:24,720 --> 01:50:30,640
था कि अगर आप उसको लेकर के

1600
01:50:30,640 --> 01:50:34,720
आपको नहीं मालूम है उसके बारे में चीजें तो निर्णय क्यों दे रहे हो? निर्णायक क्यों कर हो रहे

1601
01:50:34,720 --> 01:50:38,720
हो? जावेद जी को सदैव यह कहना चाहिए कि भाई

1602
01:50:38,720 --> 01:50:42,720
मैं न्यूट्रल पोजीशन में हूं। मुझे ना तो ये मैं ना तो यह मान पाया

1603
01:50:42,720 --> 01:50:46,720
हूं कि ईश्वर है ना ही यह मान पाया हूं कि ईश्वर नहीं है। क्योंकि मैंने उस विषय में अभी तक

1604
01:50:46,720 --> 01:50:51,600
कोई ऐसी खोज नहीं कर ली है। आपको यह नहीं कहना चाहिए कि ईश्वर नहीं है।

1605
01:50:51,600 --> 01:50:56,000
तब आप यह कह दो। तब आप यह कह सकते हो कि ईश्वर होने के सबूत आप मुझे दो।

1606
01:50:56,000 --> 01:51:00,080
तो यह भी अच्छा पॉइंट था। और भी बहुत सारे किए हैं और मोरल्टी पर तो

1607
01:51:00,080 --> 01:51:04,080
बहुत अच्छा तोड़ा है मुफ्ती जी ने वहां पर मगर मैं बता दूं

1608
01:51:04,080 --> 01:51:08,240
कि मोरल्टी पर जिन्होंने तोड़ा है मोरल्टी से ईश्वर का अस्तित्व

1609
01:51:08,240 --> 01:51:12,320
सिद्ध नहीं होता है इनकी ही चीजें हैं व्यक्ति आकर के जब आपसे यह

1610
01:51:12,320 --> 01:51:16,400
कह देगा मुझे नहीं चाहिए मोरल्टी फिर

1611
01:51:16,400 --> 01:51:20,400
तो खाऊंगा फिर क्या करोगे निरुत्तर करिए

1612
01:51:20,400 --> 01:51:22,240
सामने वाले को निरुत्तर और ऐसे

1613
01:51:22,240 --> 01:51:26,480
लोग हैं दुनिया में ऐसे लोग हैं निठारी जैसे

1614
01:51:26,480 --> 01:51:30,560
लोग हैं सेक्स चेंज कराने वाले लोग हैं। समलैंगिक लोग हैं जो आपकी दृष्टि

1615
01:51:30,560 --> 01:51:34,720
से भी बुरे हैं। हैं वो आपको कह देंगे ये चीजें मैं

1616
01:51:34,720 --> 01:51:39,760
मोरल्टी को नहीं मानता। तो

1617
01:51:39,760 --> 01:51:44,080
मोरल्टी से ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध नहीं होता है। ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध होने से हमें मोरल्टी

1618
01:51:44,080 --> 01:51:50,080
प्राप्त होती है। इसको ऐसे समझना पड़ेगा।

1619
01:51:50,160 --> 01:51:54,160
एक छोटी सी बहस और हुई थी। इनमें टाइम को लेकर

1620
01:51:54,160 --> 01:51:58,160
के एक आर्गुमेंट था जो कंक्लूजन तक नहीं पहुंच पाया

1621
01:51:58,160 --> 01:52:02,320
था जावेद जी और मुफ्ती जी के बीच में वो क्या था कि जावेद

1622
01:52:02,320 --> 01:52:06,400
जी कह रहे थे कि खुदा इससे पहले क्या कर रहा था और इनका कहना था कि इससे पहले टाइम था

1623
01:52:06,400 --> 01:52:10,480
ही नहीं तो वो प्रश्न ही गलत हो गया तो यह इसका सटीक उत्तर

1624
01:52:10,480 --> 01:52:14,640
नहीं है। इसका सटीक उत्तर यही है कि भाई अगर वह कुछ नहीं कर रहा है प्रलय

1625
01:52:14,640 --> 01:52:18,880
काल चल रहा है तो उससे मतलब क्या हो रहा है? इससे उसका अस्तित्व सिद्ध नहीं होने

1626
01:52:18,880 --> 01:52:23,120
के संबंध में कौन सी दलील आती है? कि वह कुछ नहीं कर रहा है तो

1627
01:52:23,120 --> 01:52:27,120
अब वह नहीं है। इसका मतलब यह कौन सी बात है? दूसरी बात कि

1628
01:52:27,120 --> 01:52:32,000
बार-बार वह यह कह रहे थे उससे पहले टाइम नहीं है। मगर वास्तविकता

1629
01:52:32,000 --> 01:52:36,080
में सही शब्द यह हो सकता था उस बात के लिए कि टाइम की काउंटिंग वहां से शुरू

1630
01:52:36,080 --> 01:52:37,280
होती है जब सृष्टि की रचना

1631
01:52:37,280 --> 01:52:41,360
होती है। काउंटिंग मगर उसको टाइम है ही नहीं। उससे पहले

1632
01:52:41,360 --> 01:52:46,080
यह कह लेना उतना सटीक उत्तर नहीं बैठता है। और

1633
01:52:46,080 --> 01:52:50,720
अ दूसरी बात जावेद अख्तर जी की ओर से क्या दिक्कत हो रही है कि आप

1634
01:52:50,720 --> 01:52:54,800
वो वाले प्रश्न उनसे कर सकते हो जिन जिन प्रश्नों को आप

1635
01:52:54,800 --> 01:52:58,800
बिलीव करते हो जिनका अस्तित्व है। जब आपने ईश्वर के अस्तित्व

1636
01:52:58,800 --> 01:53:03,040
को माना ही नहीं है तो आप उस दुनिया में जाकर के जो ईश्वर के अस्तित्व

1637
01:53:03,040 --> 01:53:07,360
को मानने के बाद आपको प्राप्त हो रही है। उस दुनिया में जाकर के ईश्वर का खंडन

1638
01:53:07,360 --> 01:53:11,600
कैसे करोगे? अगर कर भी दिया मान लो कर भी दिया उस दुनिया में जाकर के

1639
01:53:11,600 --> 01:53:15,600
ईश्वर का खंडन तो आप यह कैसे बताओगे लोगों को कि मैंने इस आधार

1640
01:53:15,600 --> 01:53:19,840
पर ईश्वर का खंडन किया है क्योंकि जब ईश्वर को आप मानते

1641
01:53:19,840 --> 01:53:23,840
नहीं है तो उस दुनिया का अस्तित्व ही सिद्ध नहीं होता जहां जाकर के आप ईश्वर का खंडन कर रहे

1642
01:53:23,840 --> 01:53:28,720
हो तो आपका वो खंडन का अस्तित्व सिद्ध नहीं होगा

1643
01:53:28,720 --> 01:53:32,880
यही रह के आप जो है ईश्वर का खंडन करिए कि ईश्वर

1644
01:53:32,880 --> 01:53:38,880
वहां था तो क्या कर रहा था

1645
01:53:39,200 --> 01:53:41,360
आगे

1646
01:53:41,360 --> 01:53:45,440
जावेद जी की कुछ अच्छी बातें थी उसमें जैसे उन्होंने

1647
01:53:45,440 --> 01:53:49,440
कहा कि भगवान का सबूत आपको देना है मुझे नहीं मगर

1648
01:53:49,440 --> 01:53:53,600
यहां पर उन्हें यह कहना चाहिए कि मैं भगवान को मानता हूं और ना मानते मैं न्यूट्रल हूं।

1649
01:53:53,600 --> 01:53:57,760
मैंने कोई निर्णय नहीं लिया है। मुझे नहीं मालूम। जैसे कि वह

1650
01:53:57,760 --> 01:54:01,920
जैसे कोई आकर के मुझे कहे कि फलानी कोई लेडी है वह तुमसे मिलने आ

1651
01:54:01,920 --> 01:54:05,200
रही है।

1652
01:54:05,200 --> 01:54:09,200
तो भाई मैं इस बारे

1653
01:54:09,200 --> 01:54:13,440
में ना तो यह कह सकता हूं कि वास्तव में वह आ रही है ना ही यह कह सकता हूं। अगर

1654
01:54:13,440 --> 01:54:17,440
मुझे उस कहने वाले पर मतलब वो कहने वाला कहने वाले को

1655
01:54:17,440 --> 01:54:21,680
मैं नहीं जानता हूं। वह मेरे लिए शब्द प्रमाण नहीं है। तो भी मैं उस

1656
01:54:21,680 --> 01:54:25,680
लेडी के आने के विषय में कंठस्थ नहीं हूं। कंफर्म नहीं हूं कि वह नहीं आ रही

1657
01:54:25,680 --> 01:54:29,760
है। और ना ही मैं यह कंफर्म हूं कि वो आ रही है। तो यह जो स्थिति है

1658
01:54:29,760 --> 01:54:33,760
ना न्यूट्रल वाली यह आपको कहनी चाहिए। मगर यह बात आपकी अच्छी

1659
01:54:33,760 --> 01:54:37,840
थी कि भगवान का सबूत आपको देना है। भगवान के ना होने का सबूत मुझे नहीं

1660
01:54:37,840 --> 01:54:41,920
देना है। और आपने वहां पर नास्तिकता नास्तिक

1661
01:54:41,920 --> 01:54:45,920
की वजह जिज्ञासु की भूमिका बनाई है। अगर आपको स्वास सही तर्क और

1662
01:54:45,920 --> 01:54:49,920
डेफिनेशन वगैरह दी जाती तो हो सकता है आपके अंदर भावना उद्भाषित

1663
01:54:49,920 --> 01:54:53,920
हो। आपने एक तर्क बहुत अच्छा दिया था। मेटाफिजिकल

1664
01:54:53,920 --> 01:54:54,480
बाउंड

1665
01:54:54,480 --> 01:54:59,200
कर दिया है मुझे कि मैं मेटाफिजिकल में नहीं जा सकता। तो वो जो बाउंडनेस

1666
01:54:59,200 --> 01:55:03,280
है ना कि बाउंड किया उस बाउंडनेस को उन्होंने सिद्ध नहीं

1667
01:55:03,280 --> 01:55:07,280
किया। बाउंडनेस को सिद्ध करिए। और दूसरी बात फिर यह

1668
01:55:07,280 --> 01:55:12,800
मत कहिए कि साइंस वाली चीजें मुझसे मत मांगिए। और

1669
01:55:12,800 --> 01:55:16,880
टाइम पर भी एक बहुत तगड़ा जवाब इन्होंने दिया था कि भैया अगर वह उससे

1670
01:55:16,880 --> 01:55:20,960
पहले वो नहीं था तो यह क्यों कहते हो कि हमेशा हमेशा का मतलब वहां टाइम था। बस

1671
01:55:20,960 --> 01:55:25,280
वह काउंट नहीं हो रहा था। मुफ्ती जी के अकॉर्डिंग वह काउंट नहीं हो रहा था और बिना काउंट

1672
01:55:25,280 --> 01:55:29,360
की स्थिति थी। मगर वह जो टाइम की एक बहस चली थी उस

1673
01:55:29,360 --> 01:55:33,600
बहस के अनुसार क्या कहते हैं? उसका

1674
01:55:33,600 --> 01:55:37,680
एक सरल सा जवाब हो सकता है कि भाई अगर भगवान कुछ नहीं कर रहा है तो

1675
01:55:37,680 --> 01:55:41,840
इससे उसका अस्तित्व असिद्ध कहां से हो जाता है? अगर वह ऐसी स्थिति

1676
01:55:41,840 --> 01:55:47,840
में है कि जब वह कुछ नहीं कर रहा है तो उससे उसका अस्तित्व असिद्ध नहीं होता है।

1677
01:55:50,560 --> 01:55:54,640
तो कुल मिलाकर के अगर हम मूल

1678
01:55:54,640 --> 01:55:58,640
विषय पे आए तो संसार का मूल आधार बताया मुफ्ती जी ने

1679
01:55:58,640 --> 01:56:03,040
ईश्वर को मगर इस्लाम का ईश्वर मूल आधार सिद्ध नहीं होता क्योंकि वह सर्व्यापक

1680
01:56:03,040 --> 01:56:07,040
नहीं है। सर्वशक्तिमान नहीं है। बहुत से कई जगहों पर वो

1681
01:56:07,040 --> 01:56:11,360
देशकृत और जो है परिस्थिति कृत बाधा से बाध्य

1682
01:56:11,360 --> 01:56:15,360
है। और फिर तीसरी बात यदि उसको प्राप्त कराने वाली

1683
01:56:15,360 --> 01:56:19,920
नियमावली बदल रही है जो कि वह खुद कुरान कहती है तो वहां पर वह

1684
01:56:19,920 --> 01:56:25,920
काल कालकृत बाधा से भी बाध्य हो जाता है।

1685
01:56:26,800 --> 01:56:31,360
शाश्वतता भी भंग हो जाती है उसकी। और इसके साथ ही साथ

1686
01:56:31,360 --> 01:56:35,440
तो कुल मिलाकर के जिस आधार पर ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध किया गया वो

1687
01:56:35,440 --> 01:56:39,760
आधार इस्लाम के पास है नहीं। और अगर बात करें मोरल्टी की

1688
01:56:39,760 --> 01:56:43,760
तो मोरल्टी से ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध नहीं होता। मोरल्टी हमें बाय प्रोडक्ट के

1689
01:56:43,760 --> 01:56:47,840
रूप में ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार और उसे प्राप्त करने की भावना के

1690
01:56:47,840 --> 01:56:52,960
कारण स्वीकार करनी पड़ती है। ठीक है?

1691
01:56:52,960 --> 01:56:57,360
इसके साथ ही साथ जो विकल्प परीक्षा चल रही है, विकल्प

1692
01:56:57,360 --> 01:57:01,760
में आपको मिला है। यह बहुत बड़ा कुतर्क था इनका। मतलब बहुत ही वीक

1693
01:57:01,760 --> 01:57:05,840
अह इन्होंने आर्गुमेंट दिया था वहां पर और जो इन्होंने छुरी

1694
01:57:05,840 --> 01:57:10,320
वाली बात कही थी वह भी बहुत वीक बात कही थी और

1695
01:57:10,320 --> 01:57:14,320
इसी कारण से यह जो है सटीक नृत्तर कर देने

1696
01:57:14,320 --> 01:57:19,120
वाले उत्तर उनको नहीं दे पाए जावेद जी को। क्यों?

1697
01:57:19,120 --> 01:57:23,280
क्योंकि इनके पास सनातन सिद्धांत नहीं था।

1698
01:57:23,280 --> 01:57:28,480
इनके पास सनातन सर्वशक्तिमान ईश्वर नहीं था। इनके पास वेद नहीं थे।

1699
01:57:28,480 --> 01:57:32,560
और अगर ऐसा करते तो वहां पर जावेद जी को निरुत्तर कर देने वाले

1700
01:57:32,560 --> 01:57:37,200
प्रश्न वहां पर सिद्धांत दिए जाते। हालांकि

1701
01:57:37,200 --> 01:57:41,360
क्योंकि वह खुद अपने विषय के मर्मज्ञ नहीं थे जावेद जी तो वह उस तरह

1702
01:57:41,360 --> 01:57:42,400
के

1703
01:57:42,400 --> 01:57:46,560
सवाल खड़े नहीं कर पाए कई कारणों से जिसके कारण

1704
01:57:46,560 --> 01:57:50,800
जो है वहां पर आस्तिकता का पलड़ा भारी रहा। मगर जब

1705
01:57:50,800 --> 01:57:55,360
भारी रहा तो उतने अंश में मुफ्ती जी को भी अपने इस्लाम के ईश्वर

1706
01:57:55,360 --> 01:57:59,360
की सीमा से या तो बाहर निकलना पड़ेगा सनातन ईश्वर का आलंबन लेना

1707
01:57:59,360 --> 01:58:03,600
पड़ेगा और नहीं तो आस्तिकता का पलड़ा भारी

1708
01:58:03,600 --> 01:58:07,760
होना सिद्ध नहीं हो पाएगा तो कैसी लगी आपको यह विवेचना

1709
01:58:07,760 --> 01:58:12,800
सभी लोग बताएं

1710
01:58:12,800 --> 01:58:18,800
जय श्री राम

1711
01:58:21,130 --> 01:58:25,130
[संगीत]
