1
00:00:04,800 --> 00:00:10,000
आपने हमारा एक फॉर्म भरा था। हां जी।

2
00:00:10,000 --> 00:00:14,160
तो आप चर्चा करना चाहते हैं ना? हां मैं

3
00:00:14,160 --> 00:00:18,400
डिबेट करना चाहता था। हम हां बट

4
00:00:18,400 --> 00:00:22,480
अभी आ सकते हैं आप? अभी देखिए मैं

5
00:00:22,480 --> 00:00:26,560
डिबेट कर लूंगा लेकिन जैसे कि मैं आपको बता दूं कि अपना थोड़ा बहुत आपके

6
00:00:26,560 --> 00:00:30,640
पास अभी थोड़ा 5 मिनट का टाइम है। हम हां तो जैसे कि मैं

7
00:00:30,640 --> 00:00:34,640
यह बताना चाहूंगा कि जैसे लाइक मैं ये नहीं रिवील करूंगा कि

8
00:00:34,640 --> 00:00:38,800
जैसे कि लाइक जैसे कि जैसे

9
00:00:38,800 --> 00:00:42,880
आप जितने आप क्वेश्चन पूछे पूछना चाह सकते हैं लेकिन पहले मैं यह बताऊंगा कि लाइक मेरी क्या

10
00:00:42,880 --> 00:00:46,880
आईडियोलॉजी है। हो सकता है कि पहले मैं हिंदूइज़्म को भी मानता हूं। ठीक है अभी भी मैं

11
00:00:46,880 --> 00:00:51,120
उसकी कुछ अच्छी चीजें ले लेता हूं। लेकिन अब मेरी आईडियोलॉजी ये है कि मैं देखिए पुनर्जन्म

12
00:00:51,120 --> 00:00:55,680
में थोड़ा बहुत मानता हूं और स्पिरिचुअलिटी में भी मानता हूं कि हां

13
00:00:55,680 --> 00:00:59,680
सुपर किस चीज से तकलीफ है वो बताइए अच्छा मैं

14
00:00:59,680 --> 00:01:03,920
जिस विरोधाभास है वो बता ठीक है तो मैं ये बता देता हूं मैं इस तरीके

15
00:01:03,920 --> 00:01:08,080
को इस चीज को पूरी तरह मानता हूं कि वेद जो है वो ह्यूमन मेड है जैसे

16
00:01:08,080 --> 00:01:12,320
कहा जाता है कि मंत्र दृष्टा ऋषि है जहां की निरुक्त में भी आता है और जहां आता है ये ये आपके

17
00:01:12,320 --> 00:01:16,320
तकलीफ का विषय नहीं है ना आपको तकलीफ इससे होनी चाहिए कि हम ये

18
00:01:16,320 --> 00:01:19,840
बात गलत बोल रहे हैं वो वो लिखी किसने किसने नहीं ये तकलीफ

19
00:01:19,840 --> 00:01:24,080
का विषय थोड़ी ना है। हां तो आप आप भी तो यही बोल रहे हैं कि वेद जो है वो

20
00:01:24,080 --> 00:01:28,160
प्रकृति के और ईश्वर स्वरूप है वो मैनमेड नहीं है। मैं ये कह रहा हूं कि वो मैनमेड ही

21
00:01:28,160 --> 00:01:33,280
है क्योंकि कोई भी मंत्र दृष्टा ऋषि आज के टाइम पर उपलब्ध भी नहीं है परंपरा से।

22
00:01:33,280 --> 00:01:37,520
देखिए जैसे कि मैंने कहा कि मैं फलाने

23
00:01:37,520 --> 00:01:41,680
का पुत्र हूं। जैसे आपने कहा फलाने के पुत्र हूं। ठीक है? हम्म

24
00:01:41,680 --> 00:01:46,560
तो उस विषय में प्रमाण क्या हो सकता है?

25
00:01:46,560 --> 00:01:50,640
जी प्रमाण तो मतलब पुत्र की तो अलग बात हो गई ना यह तो हम वेदों

26
00:01:50,640 --> 00:01:54,880
पर तो बहुत लंबी लीनियर नहीं अलग बात नहीं हुई इन विषयों में तो शब्द ही प्रमाण

27
00:01:54,880 --> 00:01:59,520
हो सकता है ना अब आपको शब्द पे यदि भरोसा नहीं है तो वो आपका विषय है एक अलग

28
00:01:59,520 --> 00:02:03,600
शब्द प्रमाण पे चीजें होती है ना कई सारी कि भाई किसी ने कहा

29
00:02:03,600 --> 00:02:07,760
है इसलिए हम मानते हैं तो वेद वेद जो है

30
00:02:07,760 --> 00:02:12,000
अपौरुष है या प्रकृति ने बनाए हैं या मैनमेड है ये शब्द

31
00:02:12,000 --> 00:02:16,240
प्रमाण की बात है आपको सनातन धर्म की किस किस शिक्षा से दिक्कत है?

32
00:02:16,240 --> 00:02:20,320
भगवान को लेकर के की गई व्याख्या से दिक्कत है। धर्म को लेकर के की

33
00:02:20,320 --> 00:02:24,960
गई व्याख्या से दिक्कत है। यह इस पे आप बात करिए ना।

34
00:02:24,960 --> 00:02:29,120
समझ रहे मेरी बात? क्योंकि शब्द प्रमाण जो है अगर आपको हमारे बताए

35
00:02:29,120 --> 00:02:33,200
हुए शब्द प्रमाण पे यकीन नहीं है तो आपकी प्रॉब्लम है। और आपके बताए हुए

36
00:02:33,200 --> 00:02:34,880
शब्द प्रमाण पे यदि हमें यकीन नहीं है

37
00:02:34,880 --> 00:02:38,880
तो हमारी प्रॉब्लम है। जिस विषय में शब्द ही प्रमाण हो सकता

38
00:02:38,880 --> 00:02:42,960
है उस विषय में दूसरा प्रमाण कैसे लाएंगे? जैसे कि मान

39
00:02:42,960 --> 00:02:47,360
लीजिए कि मैं बताऊं कि भैया इस गुब्बारे का कलर क्या है?

40
00:02:47,360 --> 00:02:51,520
ठीक। तो अब कलर क्या है? इस विषय में तो आंख ही प्रमाण

41
00:02:51,520 --> 00:02:55,600
हो सकती है ना कि कान से करेंगे। देखिए एक एक इस पर मैं सवाल कर

42
00:02:55,600 --> 00:02:59,600
सकता हूं कि आप ये कह रहे हैं कि सिर्फ इसमें शब्द प्रमाण हो सकता है क्योंकि ये परंपरा से

43
00:02:59,600 --> 00:03:03,680
प्राप्त आ रहा है। तो ठीक है। हम उतना पहले जा करके प्रूफ नहीं ला सकते। तो शब्द प्रमाण

44
00:03:03,680 --> 00:03:07,760
से हम उसको मान्यता विश्वास पर मान सकते हैं। चलिए बिल्कुल सही बात है। लेकिन जब

45
00:03:07,760 --> 00:03:11,840
ये कहा गया है कि जो मंत्र दृष्टा ऋषि जो वेद के थे वो ह्यूमंस ही थे और

46
00:03:11,840 --> 00:03:15,920
उन्होंने सिर्फ अपने तप से या फिर है ना अध्यात्म से एक्सेस किया

47
00:03:15,920 --> 00:03:20,160
था डायरेक्ट तो आज भी कोई इंसान ऐसा क्यों नहीं कर सकता कि

48
00:03:20,160 --> 00:03:24,240
डायरेक्ट वही वेद संस्कृत में एक्सेस कर रहे हो और ठीक है मैं इस मैं इस पे

49
00:03:24,240 --> 00:03:28,240
जो है आपसे वहां डिबेट कर लेते हैं। ठीक है? जी और

50
00:03:28,240 --> 00:03:32,640
आपकी बात है। इस पर हम कर लेते हैं डिबेट। जी और मेरा थोड़ा बुद्धिज्म की तरफ

51
00:03:32,640 --> 00:03:37,440
थोड़ा मेरा ज्यादा वो मैं आपसे पूछ लूंगा। आपकी चीजों को मैं टटोल लूंगा वन

52
00:03:37,440 --> 00:03:40,800
लाइव स्ट्रीम में ही।

53
00:03:40,800 --> 00:03:44,800
ठीक है जी। और मतलब आप बुक्स कौन-कौन से मानते हैं तो

54
00:03:44,800 --> 00:03:49,360
मैं क्योंकि मैं थोड़ा बहुत प्रमाण भी इकट्ठे करूंगा। थोड़ा फाइव मिनट्स दे दीजिए।

55
00:03:49,360 --> 00:03:50,640
क्या आप रामचरितमानस

56
00:03:50,640 --> 00:03:54,800
में और पुराण में वेदांत में लाइक उपनिषद वगैरह

57
00:03:54,800 --> 00:03:58,960
में आप बुद्ध को मानते हैं ना? जी वैसे

58
00:03:58,960 --> 00:04:02,960
मैं भी कहूं तो पहले हिंदू ही हूं। हिंदू ही था लेकिन मैंने फिर छोड़ दिया था

59
00:04:02,960 --> 00:04:06,960
और उसके बाद मैं थोड़ा नास्तिक बना कुछ सालों के लिए और उसके बाद फिर वापस मैंने

60
00:04:06,960 --> 00:04:11,040
जब सारे धर्मों का अध्ययन किया उसके बाद थोड़ा बुद्धिज्म की तरफ आया। पहले थोड़ा बहुत

61
00:04:11,040 --> 00:04:15,120
अब्राहमिक रिलिजन की तरफ भी मेरा झुकाव हुआ था। फिर मैं बुद्धिज्म की तरफ ज्यादा आया। वह

62
00:04:15,120 --> 00:04:19,120
तो बुद्धिज्म भी तो नास्तिक ही है। नहीं बुद्धिज्म नास्तिक नहीं

63
00:04:19,120 --> 00:04:23,680
है। बुद्धिज्म में भी पुनर्जन्म है। उसमें भी स्पिरिचुअलिटी है और उसमें भी इटरनली

64
00:04:23,680 --> 00:04:27,840
एक्सिस्टिंग कॉन्शसनेस है जिसको कि वो गॉड नहीं कहते। इसलिए बुद्ध मौन हो गए

65
00:04:27,840 --> 00:04:32,160
थे। उसी में मिल जाता है। निर्वाण में जाकर के हम जहां से आए हैं। अज्ञान अविद्या

66
00:04:32,160 --> 00:04:36,160
स्वरूप अह हमारी अविद्या और अज्ञान से जब हम इंडिविजुअल एक्सपीरियंस करना चाहते हैं,

67
00:04:36,160 --> 00:04:40,320
तो हम प्रकृति में शरीर ले से कनेक्ट होते हैं और बार-बार अह अपनी

68
00:04:40,320 --> 00:04:44,320
इच्छाएं, डिजायर्स। ठीक है? और कर्म फल की वजह से कर्म फल का सिद्धांत भी है। जब

69
00:04:44,320 --> 00:04:48,480
जब बुद्धिज्म में कर्म फल का सिद्धांत है, पुनर्जन्म का सिद्धांत है तो वो नास्तिक कैसे?

70
00:04:48,480 --> 00:04:52,800
उसमें भी तो स्पिरिचुअलिटी आ गई ना। नास्तिक ऐसे है कि कोई एक सत्ता

71
00:04:52,800 --> 00:04:56,800
नहीं है जो सनातन हो। बिल्कुल है बुद्धिज्म में। मैं आपको बता देता हूं बुद्धिज्म

72
00:04:56,800 --> 00:05:00,960
में प्रकृति भी सनातन है। क्योंकि जो संसार है वो कल्प-कल्प से बार-बार बार-बार

73
00:05:00,960 --> 00:05:06,160
बनता है और बिगड़ता है। प्रकृति का जो आधिपत्य हो ईश्वर

74
00:05:06,160 --> 00:05:09,680
ईश्वर का कांसेप्ट है क्या वहां?

75
00:05:09,680 --> 00:05:13,920
ईश्वर नहीं बोला था। बुद्धिस्ट मौन रह गए थे क्योंकि बुद्ध उस पर कंफ्यूज नहीं करना चाहते थे।

76
00:05:13,920 --> 00:05:17,920
तो ईश्वर नहीं है ना ईश्वर को नहीं मानते ना आप उसी को नास्तिक कहा

77
00:05:17,920 --> 00:05:22,640
जा रहा है ना? नहीं ईश्वर सनातन सर्वशक्तिमान सत्ता

78
00:05:22,640 --> 00:05:26,640
जो सब कुछ कर सकती हो वो आपके यहां नहीं है ना?

79
00:05:26,640 --> 00:05:30,960
जी सर्वशक्तिमान सत्ता है ना। बुद्ध जिससे

80
00:05:30,960 --> 00:05:35,040
हा देखिए इटरनल एक्जिस्टिंग कॉन्शियसनेस ये मैं कह

81
00:05:35,040 --> 00:05:39,120
रहा हूं। तो हम हमारी जो चित्त है धम पद में जो चित्त की बात हुई है

82
00:05:39,120 --> 00:05:43,200
उसमें यही कहा है कि आपका जो सत्त है वो जो चित्त है वो उसी का

83
00:05:43,200 --> 00:05:47,520
उसी का ऐसे मैं उसका किताब का शायद स्क्रीनशॉट भेजूंगा

84
00:05:47,520 --> 00:05:51,600
उसी का पार्ट है तो जब हम उसी का पार्ट है और जैसे कि सागर में लहरें उड़ती

85
00:05:51,600 --> 00:05:55,600
है और वो उसको इंडिविजुअल मान ले तो वो प्रकृति से प्रकृति और पुरुष प्रकृति से

86
00:05:55,600 --> 00:05:59,680
वो में आ जाती है। मतलब शरीर हम धारण कर लेते हैं और बार-बार बार-बार

87
00:05:59,680 --> 00:06:03,920
जब जैसे बुद्ध को एनलाइटनमेंट हो गया। उस उनको अपनी जातक कथाओं में देखेंगे।

88
00:06:03,920 --> 00:06:08,080
मैं ये कह रहा हूं जब बुद्ध को एनलाइटनमेंट हुआ था उस समय

89
00:06:08,080 --> 00:06:12,080
कोई फ्री थी कि नहीं कॉन्शियसनेस

90
00:06:12,080 --> 00:06:16,400
जी उनकी कॉन्शियसनेस भी है और फ्री विल भी है तो जब उनको एनलाइट

91
00:06:16,400 --> 00:06:20,640
एनलाइटनमेंट जो आप कह रहे हैं ना वो साक्षात्कार हुआ था हां बोध

92
00:06:20,640 --> 00:06:21,520
हो गया उससे

93
00:06:21,520 --> 00:06:26,400
पहले जब नहीं हुआ था उस समय कोई कॉन्शियसनेस थी

94
00:06:26,400 --> 00:06:31,040
जो एनलाइटेंड थी

95
00:06:31,040 --> 00:06:35,200
मतलब बुद्ध जिस समय अज्ञानता ता को प्राप्त हो चुके

96
00:06:35,200 --> 00:06:41,200
हैं। उस समय ज्ञान ज्ञान को प्राप्त कौन सी कॉन्शियसनेस थी?

97
00:06:41,360 --> 00:06:45,520
देखिए जो हमारी कॉन्शियसनेस मतलब चित्त को कह रहा हूं मैं। मैं भी चित्त की

98
00:06:45,520 --> 00:06:49,680
बात कर रहा हूं। उस समय कौन सी कॉन्शियसनेस फ्री थी? जो जानती

99
00:06:49,680 --> 00:06:53,680
थी कि मैं जो है मुक्त हूं। निर्वाण में

100
00:06:53,680 --> 00:06:57,840
कौन सी कॉन्शसनेस थी उस समय? जी निर्वाण

101
00:06:57,840 --> 00:07:02,960
तो बुद्ध के महाप्रवाण मरने के बाद होगा ना?

102
00:07:02,960 --> 00:07:07,120
निर्माण मरने यानी कि वो शाश्वत सत्ता नहीं है।

103
00:07:07,120 --> 00:07:11,120
वो बाधित हो रही है ना समय देश काल से वो प्राप्त हो रही

104
00:07:11,120 --> 00:07:15,280
है। वो पहले से नहीं है। वो प्राप्त हो रही है मरने के बाद या इतने

105
00:07:15,280 --> 00:07:19,360
के बाद या उतने के बाद उस समय उसका अस्तित्व नहीं है। जब बुद्ध को

106
00:07:19,360 --> 00:07:23,440
ज्ञान प्राप्त हुआ तब अस्तित्व में आया।

107
00:07:23,440 --> 00:07:27,520
जी आप त्रिपिटक से आप मैं आपको इसका स्क्रीनशॉट

108
00:07:27,520 --> 00:07:31,600
भेजूंगा। नहीं आप मेरी बात समझ नहीं रहे। जिस समय बुद्ध स्वयं को

109
00:07:31,600 --> 00:07:35,840
अज्ञानी मान रहे हैं, हम बाधित हैं, उस समय फ्री कौन

110
00:07:35,840 --> 00:07:36,640
है? बस यह

111
00:07:36,640 --> 00:07:40,800
बताइए क्योंकि सनातन सर्वशक्तिमान ईश्वर सत्ता उसको माना

112
00:07:40,800 --> 00:07:44,800
जाएगा जो सदा एक रस के रूप में स्थापित हो। यह थोड़ी

113
00:07:44,800 --> 00:07:49,280
ना कि आज आज बाधित है और कल जो है मुक्त हुआ। वो थोड़ी ना सनातन है।

114
00:07:49,280 --> 00:07:53,760
वो तो नियमों के अधीन हो गया ना कि जब उसने तप किया तब वह साक्षात्कार

115
00:07:53,760 --> 00:07:57,840
हुआ। जी कहीं आप यह आप अगर मान रहे हैं कि बुद्ध ही वह

116
00:07:57,840 --> 00:08:02,000
सर्वशक्तिमान सत्ता है तो मैं यह नहीं कह रहा। मैं कहां कह रहा हूं? मैं नहीं कह रहा। आप

117
00:08:02,000 --> 00:08:07,920
फिर मुझे बताइए कि कौन सी वो सत्ता है जो उस समय फ्री थी?

118
00:08:07,920 --> 00:08:12,080
फ्री फ्री का मतलब क्या है? मतलब जो कि कुछ भी कर सकती है। फ्री का मतलब

119
00:08:12,080 --> 00:08:16,640
जो मुक्त थी जिस जो अज्ञानता को प्राप्त नहीं थी वो कौन थी?

120
00:08:16,640 --> 00:08:20,720
जी अज्ञानता को तो बुद्धिज्म में यही कहा गया है ना कि आप क्या है जब इस

121
00:08:20,720 --> 00:08:25,120
संसार में आते हैं तो आप एक तरीके से हिप्नोटाइज हो जाते हैं और आपके जो

122
00:08:25,120 --> 00:08:29,200
अज्ञानता आ जाती है यानी कि आप प्राकृतिक नियमों के अधीन हो गए ना

123
00:08:29,200 --> 00:08:33,200
फिर तो कोई है ही नहीं जो उससे मुक्त है नहीं आप जब निर्वाण की

124
00:08:33,200 --> 00:08:37,280
तरफ जाते हैं तो आप संसार से अपने आप डिस्कनेक्ट तो ये बाधित हो रहा है ना कि जब आप

125
00:08:37,280 --> 00:08:41,280
जब आप यहां आ रहे हैं तो आप बाधित हो रहे हैं वहां जा रहे है तो मुक्त हो रहे है हां

126
00:08:41,280 --> 00:08:45,440
यहां आ रहे है तो हम बाधित हो जाते है बाधित हो रहे हो ना नियमों के अधीन हो रहे

127
00:08:45,440 --> 00:08:49,440
हो ना कि ऐसा होगा तब हम जो है मुक्त है। ऐसा होगा

128
00:08:49,440 --> 00:08:51,680
तब मुक्त नहीं। सदा सदा से

129
00:08:51,680 --> 00:08:55,680
मुक्त का अस्तित्व नहीं है। नहीं तो फिर सनातन और उसमें दार्शनिक

130
00:08:55,680 --> 00:08:59,840
स्तर पर अंतर क्या रह जाएगा? अगर सदा से मुक्त वाला कांसेप्ट

131
00:08:59,840 --> 00:09:03,920
बुद्ध ने मान लिया होता कि हां एक चेतना है जो सदा से मुक्त रहती है। उसको

132
00:09:03,920 --> 00:09:08,560
वो जो भी नाम देते तो सनातन और उसमें अंतर क्या रह जाता।

133
00:09:08,560 --> 00:09:12,640
जी जो चेतना जो सुपर नेचुरल है इस वर्ल्ड से कंप्लीटली परे

134
00:09:12,640 --> 00:09:16,640
हैं वह हमेशा से ही मुक्त है वह पूरा का पूरा सागर तो यहां नहीं आ जाता

135
00:09:16,640 --> 00:09:20,720
उसके अंदर जो उनके जो पार्ट्स हैं जो हम सत्व हैं जो हमारे

136
00:09:20,720 --> 00:09:24,800
चित्त है जो कि अभी मान लो आठ 800 करोड़ लोग यहां पर यानी कि

137
00:09:24,800 --> 00:09:28,800
यानी कि बुद्ध जब बाधित थे उस

138
00:09:28,800 --> 00:09:33,840
समय भी एक जो चेतना को मुक्त माना गया था।

139
00:09:33,840 --> 00:09:37,840
हां मतलब वो एक ही ईश्वर को हम इंसान नहीं मान सकते कि क्या है।

140
00:09:37,840 --> 00:09:41,920
हम उसी के पार्ट हैं। नहीं नहीं मैं ठीक है हम पार्ट हैं

141
00:09:41,920 --> 00:09:46,080
उसी के तो जिस समय जब

142
00:09:46,080 --> 00:09:50,160
बुद्ध के रूप में वो चेतना बाधित थी उस समय वो चेतना

143
00:09:50,160 --> 00:09:54,480
के रूप में मुक्त भी थी। हां मतलब वो

144
00:09:54,480 --> 00:09:58,480
मतलब देखिए है वहीं पर संसार में है लेकिन संसार में आने

145
00:09:58,480 --> 00:10:02,640
के बाद क्योंकि संसारी बंधनों में माया में अविद्या से डिजायर्स

146
00:10:02,640 --> 00:10:06,720
से और आसक्तियों से और कर्मफल के सिद्धांत से जब हम पुनर्जन्म बार-बार लेते

147
00:10:06,720 --> 00:10:10,880
हैं तो हमारे जो पास्ट लाइफ है, पहली बात तो वो सारी की सारी मेमोरीज देखिए मैं

148
00:10:10,880 --> 00:10:15,200
क्या कह रहा हूं? जैसे कि हमारा एक मन मान लीजिए। ठीक है?

149
00:10:15,200 --> 00:10:19,360
हां जी। मन है। अब हम मान लीजिए कि मैं

150
00:10:19,360 --> 00:10:23,600
अह एक कील ठोक रहा हूं। ठीक? लगातार

151
00:10:23,600 --> 00:10:27,680
कील ठोक रहा हूं। तो कील ठोकते समय मेरा जो मन है,

152
00:10:27,680 --> 00:10:31,680
पूरी दुनिया में घूम भी रहा है। घूम रहा है ना? हां जी। और कील ठोकने

153
00:10:31,680 --> 00:10:35,840
के रूप में बाधित भी है कि मुझे बार-बार कील ठोकनी है। तो

154
00:10:35,840 --> 00:10:40,000
क्या आपके बुद्धिज्म ने यह माना है कि जिस समय बुद्ध के रूप में वो

155
00:10:40,000 --> 00:10:44,000
चेतना जो है, बाधित थी, उस समय वही चेतना फ्री

156
00:10:44,000 --> 00:10:48,000
भी थी। जी चेतना बाधित भी थी फ्री तब होगी जब उसको

157
00:10:48,000 --> 00:10:52,480
बोध हो जाएगा तो फिर उसकी शाश्वतता भंग हो रही है ना सनातन

158
00:10:52,480 --> 00:10:56,640
सुख नहीं है ना फिर जी अभी तो बुद्ध ने कहा कि संसार में दुख

159
00:10:56,640 --> 00:11:01,280
है पहला आर्य सत्य क्या था अरे भाई मैं क्या कह रहा हूं बात ये हो रही है कि आपने

160
00:11:01,280 --> 00:11:05,360
सनातन सर्वशक्तिमान सत्ता मानी है कोई कि नहीं मानी है बात ये

161
00:11:05,360 --> 00:11:09,520
है तो आपकी [नाक से की जाने वाली आवाज़] चीजें तो प्रकृति के अधीन हो रही है ना कि जब जब

162
00:11:09,520 --> 00:11:13,760
हम ऐसा किए तो मुक्त हो गए फिर नहीं किए तो वो हो गए और अभी आप ही ने थोड़ी देर पहले

163
00:11:13,760 --> 00:11:17,840
कहा कि भाई जो जब सारा का सारा सागर नहीं आ जाता

164
00:11:17,840 --> 00:11:21,920
है बल्कि उसका अंश आता है तो जो सागर है वो अभी बचा

165
00:11:21,920 --> 00:11:26,800
हुआ है ना तो वो आप कह रहे नहीं है देखिए

166
00:11:26,800 --> 00:11:30,880
यहां पर ड्यूलिटी को एक तरीके से बुद्धिज्म में माना जाता है कि यह प्रकृति

167
00:11:30,880 --> 00:11:34,880
जो है यह भी इटरनल है और वो जो सुपर नेचुरल एंटिटी है जो

168
00:11:34,880 --> 00:11:38,960
कि कॉन्शियस जिसमें कॉन्शियसनेस है उसका टाइम फ्लो जो है

169
00:11:38,960 --> 00:11:43,040
वह प्योर कॉन्शियसनेस है इस प्रकृति का जो टाइम होता है वह सिर्फ और सिर्फ पदार्थ के

170
00:11:43,040 --> 00:11:47,280
सिर्फ बदल बदलने की वजह से हम उसको एक टाइम की एंटिटी दे देते हैं। यह भी हमेशा से है। मेरे

171
00:11:47,280 --> 00:11:51,280
भाई आप मेरा प्रश्न नहीं समझ पा रहे हैं। जिस समझ रहा हूं

172
00:11:51,280 --> 00:11:56,080
जिस समय बुद्ध के रूप में या आपके रूप में

173
00:11:56,080 --> 00:12:00,240
वो एक कोई कॉन्शियसनेस है सुप्रीम कॉन्शियसनेस वो बाधित है

174
00:12:00,240 --> 00:12:04,480
आपके रूप में। इस समय भी वह सुप्रीम कॉन्शियसनेस

175
00:12:04,480 --> 00:12:08,640
अपने अस्तित्व में है या नहीं है? है और उसी जगह पर

176
00:12:08,640 --> 00:12:12,720
है। उसी जगह पर है। उसी जगह पे सेम जगह पे यानी कि जब आप

177
00:12:12,720 --> 00:12:16,720
यहां पर फंसे हुए हो एक रूप में तो आप ही एक रूप में मुक्त भी

178
00:12:16,720 --> 00:12:21,120
हो। देखिए ये वैसा ही है जैसे एक बच्चा कंप्यूटर

179
00:12:21,120 --> 00:12:25,280
पे गेम खेलने लग जाए और उसमें खो जाए। अभी उसकी मम्मी आके उसका कंप्यूटर बंद कर

180
00:12:25,280 --> 00:12:29,360
जाए। वापस संसार खो जाए वाली बात अलग है। और वो यह जान रहा है कि

181
00:12:29,360 --> 00:12:33,440
मैं गेम ही खेल रहा हूं। फिर भी वह अंदर की चीजों से प्रभावित भी हो रहा है और मैं वह

182
00:12:33,440 --> 00:12:36,960
यह जान रहा है की मैं गेम खेल रहा हूं। यह बात अलग है। पूरा का पूरा खो

183
00:12:36,960 --> 00:12:41,120
ही गया। अपने अस्तित्व को भूल ही गया यह बात एक अलग है। हां पूरा खो जाता है वह

184
00:12:41,120 --> 00:12:45,120
साम्राज्य की वजह से यही तो यही अंतर है अद्वैत में और बुद्धिज्म में है।

185
00:12:45,120 --> 00:12:49,200
आप हम ये मान रहे हैं। हम यह मान रहे हैं कि फिल्म से कितना

186
00:12:49,200 --> 00:12:53,360
भी हम प्रभावित हो रहे हैं मगर हमारी एक चेतना का भाग ऐसा

187
00:12:53,360 --> 00:12:57,600
है जो उस समय भी यह जानता है कि ये कल्पना है।

188
00:12:57,600 --> 00:13:01,680
जी नहीं। बहुत सारे बहुत सारे मैं आपको लोग ऐसे मिलवा दूंगा जिनको कुछ भी अकल

189
00:13:01,680 --> 00:13:05,680
नहीं है। प्रज्ञा शक्ति डाउन है ना भाई वो एक अलग विषय है।

190
00:13:05,680 --> 00:13:09,680
मैं अलग बात कर रहा हूं। आप पता नहीं कहां जा रहे हो। मैं आपसे यह

191
00:13:09,680 --> 00:13:13,920
पूछ रहा हूं कि जिस समय आप बाधित हैं उस समय भी फ्री

192
00:13:13,920 --> 00:13:18,080
भी होती है सत्ता या नहीं होती है। अगर बाधित है तो वो

193
00:13:18,080 --> 00:13:22,080
सत्ता पूरी की पूरी बाधित है कि नहीं है? नहीं समझ रहे। जी मैं समझ गया

194
00:13:22,080 --> 00:13:26,320
हूं। आप अगर देखो अगर आपने यह मान लिया कि जिस

195
00:13:26,320 --> 00:13:30,400
समय बुद्ध के रूप में जो सत्ता है कॉन्शियसनेस है

196
00:13:30,400 --> 00:13:34,640
वो बाधित है उसी समय वही कॉन्शियसनेस

197
00:13:34,640 --> 00:13:38,640
फ्री भी है पूर्ण तरीके से तो अद्वैत हो गया फिर

198
00:13:38,640 --> 00:13:42,880
बुद्धिज्म खत्म हो गया अगर आपने ये मान लिया और जब आप यह मान लेंगे

199
00:13:42,880 --> 00:13:46,960
कि फ्री भी है तो वहां पे ईश्वर स्थापित हो जाएगा वो जो फ्री सत्ता

200
00:13:46,960 --> 00:13:51,280
है वही ईश्वर है जो सब कुछ जानती है कि मैं फ्री हूं

201
00:13:51,280 --> 00:13:52,240
और क्योंकि

202
00:13:52,240 --> 00:13:56,240
वो फ्री है तो प्रकृति पर आध वो आधिपत्य है उसका वो कुछ भी कर सकने के

203
00:13:56,240 --> 00:14:00,320
लिए वो हो गई सर्वशक्तिमान हो गई क्योंकि वो फ्री है वो जानती है माया

204
00:14:00,320 --> 00:14:04,640
है तो माया में मैं कुछ भी कर सकता हूं तो वो फिर

205
00:14:04,640 --> 00:14:08,640
ईश्वर के रूप में स्थापित हो गई वो सत्ता समझ रहे हैं आप मेरी

206
00:14:08,640 --> 00:14:12,720
बात तो या तो पहले अंतर सेट कर लो कि हां इतना अंतर है

207
00:14:12,720 --> 00:14:16,880
हमारे और अद्वैत के बीच में और अगर अंतर नहीं है तो फिर अद्वैत से अलग

208
00:14:16,880 --> 00:14:21,280
करके बताओ कैसे होगा जी एक तो अंतर ये यहां पर अलग आ जाता है कि आपके अद्वैत

209
00:14:21,280 --> 00:14:25,280
में ये आप मानते हैं कि जो प्रकृति है आप इसको इटरनल मानते हैं या नहीं मानते

210
00:14:25,280 --> 00:14:29,360
हैं? बिल्कुल मानते हैं। अच्छा तो प्रकृति में आप बार-बार कल्प

211
00:14:29,360 --> 00:14:34,240
मानते हैं कि एक बार पूरा डिस्ट्रॉय हो जाता है फिर उसका रिकक्रिएशन होता है। कल्प

212
00:14:34,240 --> 00:14:38,320
हां रिकक्रिएशन एंड डिस्ट्रक्शन रिकक्रिएशन डिस्ट्रक्शन इनफिनिट साइकिल

213
00:14:38,320 --> 00:14:42,720
ये आप मानते हैं? मानते हैं? ये भी लगभग सेम ही है। बट

214
00:14:42,720 --> 00:14:47,040
मैं ये कह रहा हूं। आप क्या मानते हैं कि जो आप ईश्वर का ही पार्ट है अंश है आपकी चेतना

215
00:14:47,040 --> 00:14:51,040
या फिर आपकी आत्मा जो है वो यहां आ जाती है क्योंकि मैं ये मानता हूं अगर मैं उसको आत्मा नाम दूं जो मैं

216
00:14:51,040 --> 00:14:55,040
नहीं देता तो आत्मा उसी परमात्मा का अंश है और वो वहीं

217
00:14:55,040 --> 00:14:59,200
से जैसे सागर की एक लहर उठ के और ये मान ले कि मैं

218
00:14:59,200 --> 00:15:03,760
वही तो बता रहा हूं। देखिए बुद्धिज्म को आप थोड़ा अध्ययन और कर लीजिए। बुद्धिज्म

219
00:15:03,760 --> 00:15:08,000
ये नहीं मानता है कि कोई भी चेतना शाश्वत

220
00:15:08,000 --> 00:15:12,000
रूप से मुक्त है। ठीक है? वह बार-बार प्रकृति के

221
00:15:12,000 --> 00:15:16,560
अधीन हो रही है और वह फिर मुक्त हो रही है। ऐसा आप मानते हैं और हम यह मानते हैं

222
00:15:16,560 --> 00:15:20,720
कि शाश्वत मुक्त चेतना है वो अपने अस्तित्व में सदा रहती भी

223
00:15:20,720 --> 00:15:24,880
है और अपने ही अंशीभूत के रूप में वो जो है लीला

224
00:15:24,880 --> 00:15:30,880
रूप में प्रकट होती है। जीव जगत और जगदीश्वर के रूप में

225
00:15:32,400 --> 00:15:36,560
समझ रहे हैं? जी मैं तो ये मानता हूं कि सुपर नेचुरल देखिए आप मानते क्या

226
00:15:36,560 --> 00:15:40,640
है? देखिए हमारी बात होनी है मगर अभी

227
00:15:40,640 --> 00:15:44,640
अ आपने यह कहा है ना कि वो नास्तिक दर्शन नहीं है तो मैं वहां पर प्रूफ कर

228
00:15:44,640 --> 00:15:48,720
रहा हूं नास्तिक कैसे है कोई भी सदा सुखी नहीं है आपके

229
00:15:48,720 --> 00:15:53,520
यहां हमारे यहां है सदा सुखी ठीक है

230
00:15:53,520 --> 00:15:57,680
पहले आप इसकी जांच कर लीजिए सदा सुखी है कि नहीं बुद्धिज्म में कोई

231
00:15:57,680 --> 00:16:01,680
अगर आपके वहां कोई सदा सुखी है तो जब आत्मा यहां पर आ गई यह बात की बात है

232
00:16:01,680 --> 00:16:05,840
मेरे भाई पहले आप अपनी मान्यता बताओ फिर हम लोग चेक करेंगे कि सदा सुखी

233
00:16:05,840 --> 00:16:09,920
है कि नहीं हम यह बाद की बात है कि किसका क्लेम वो हो

234
00:16:09,920 --> 00:16:14,160
रहा है कि नहीं पर क्लेम क्या है यह तो पहले तय कर लो जी पहले अंतर

235
00:16:14,160 --> 00:16:18,320
डिसाइड करें तभी तो हम डिबेट पर कहेंगे नहीं तो हां तो बस वो अंतर तो डिसाइड करो आप

236
00:16:18,320 --> 00:16:22,480
आप ये आप ये कह रहे हो कि मेरे यहां सदा सुखी है कि नहीं है ये

237
00:16:22,480 --> 00:16:23,040
बताओ आप

238
00:16:23,040 --> 00:16:27,120
अगर सदा सुखी है तो आपने भी ईश्वर को मान लिया आपके यहां ईश्वर आ गया

239
00:16:27,120 --> 00:16:31,280
सदा सुखी है जो देखिए वो जो जो हम जिसका

240
00:16:31,280 --> 00:16:35,360
अंश है वो एज अ होल सदा सुखी है और हम जब उसमें विलीन हो जाते हैं तो भी

241
00:16:35,360 --> 00:16:39,360
हम सदा सुखी रहता है। लेकिन जब हम इंडिविजुअली कारण संसार में आते बुद्ध फंसे हुए

242
00:16:39,360 --> 00:16:43,360
थे तब सदा सुखी सत्ता थी ना वो थी और बुद्ध जब

243
00:16:43,360 --> 00:16:47,520
उसमें मिलेंगे तो बुद्ध भी सदा सुखी हो जाएंगे हां तो वो थी तो वो तो ईश्वर हो गया

244
00:16:47,520 --> 00:16:51,760
फिर सदा सुखी थी यानी कि वो बाधित नहीं थी माया से प्रभावित नहीं

245
00:16:51,760 --> 00:16:55,200
थी कहो हां

246
00:16:55,200 --> 00:16:59,280
हां माया से प्रभावित नहीं थी माया थी तो जब माया से प्रभावित नहीं

247
00:16:59,280 --> 00:17:05,280
थी माया से बाधित नहीं थी तो वो आकर के कुछ भी कर सकती थी माया में

248
00:17:05,280 --> 00:17:09,440
जी बुद्धिज्म में तो ऐसा कभी कहा नहीं गया है कि पूरा आता है। तो फिर

249
00:17:09,440 --> 00:17:13,520
फिर पहले इसको आप जान लीजिए जब वो कुछ भी कर सकती होगी

250
00:17:13,520 --> 00:17:17,600
वो अवतारवाद हो गया। जब वह आकर के वह जो मुक्त

251
00:17:17,600 --> 00:17:21,840
सत्ता आप मान रहे हो जो आप मान रहे हो ना मुक्त के रूप में तो जब

252
00:17:21,840 --> 00:17:26,160
आपने मुक्त मान लिया कि सत्ता अभी मुक्त है जब माया से बाधित नहीं है प्रभावित

253
00:17:26,160 --> 00:17:30,240
नहीं है तो वो फिर कुछ भी करने के लिए फ्री हो गई ना सर्वशक्तिमान हो गई

254
00:17:30,240 --> 00:17:34,240
ना फिर वो फिर वो आके अवतार लेगी कंस को मार देगी लीला में वो जानती है माया

255
00:17:34,240 --> 00:17:38,640
है वो चाहे तो खंभा फाड़ के प्रकट होगी वो है सर्वशक्तिमान

256
00:17:38,640 --> 00:17:42,800
सत्ता तो आपने यह माना ही नहीं तभी तो अलग हो

257
00:17:42,800 --> 00:17:46,880
मान लिया होता तो अलग कैसे वो तो बाद की बातें हैं कि वह प्राप्त करने

258
00:17:46,880 --> 00:17:50,960
के लिए वो क्या कहते हैं नियम कानून क्या है? कर्मकांड क्या है? या

259
00:17:50,960 --> 00:17:55,200
आपके यहां आगे रिचुअल्स क्या है? वो बाद की बातें हैं। पहले सत्ता तो निर्धारित

260
00:17:55,200 --> 00:17:59,280
हो। आपने शाश्वत सत्ता नहीं मानी है। इसीलिए आप बुद्ध हो

261
00:17:59,280 --> 00:18:03,840
और इसीलिए हम अद्वैत है। हमने शाश्वत सत्ता मानी है कि शाश्वत आनंदित

262
00:18:03,840 --> 00:18:08,400
रहने वाली सत्ता है। एक्सिस्ट करती है और आपने नहीं मानी है।

263
00:18:08,400 --> 00:18:12,880
समझ गए? जी सर मतलब ये समझ पा रहा हूं। आप ये कहना चाह रहे हो कि सिर्फ हम अवतारवाद

264
00:18:12,880 --> 00:18:17,360
को नहीं मानते। आप में कि जो ईश्वर है वो अवतार ले भी आ सकता है। बस इतना डिफरेंस आ रहा है।

265
00:18:17,360 --> 00:18:20,320
बहुत कुछ डिफरेंस है। जब शाश्वत

266
00:18:20,320 --> 00:18:24,400
सत्ता ही नहीं मानी तो ईश्वरत्व भंग हो गया। खत्म हो गया। जब ईश्वर नहीं तो वही नास्तिक

267
00:18:24,400 --> 00:18:28,480
है। मैं ही मैं हूं। अलग से कोई वो नहीं

268
00:18:28,480 --> 00:18:32,480
है। ऐसा ईश्वर जो कुछ हमें कुछ कर सकता हो

269
00:18:32,480 --> 00:18:36,560
जिसके भरोसे हम रह सकते हो। जिस पर हम आश्रित हैं जो सब

270
00:18:36,560 --> 00:18:40,640
कुछ संपूर्ण संसार का करता धर्ता है जिसने सृष्टि बनाई

271
00:18:40,640 --> 00:18:44,720
है जो प्रकृति पर अधिपत्य जिसका कंट्रोल है जिसका जी अब

272
00:18:44,720 --> 00:18:48,880
आपने एक एक सवाल अब आपने एक चीज कर दी आपने कंट्राडिक्ट कर दिया खुद को वापस

273
00:18:48,880 --> 00:18:52,880
हम अब आपने बोला जिसने सृष्टि बनाई है तो इसका मतलब पहले सृष्टि एक

274
00:18:52,880 --> 00:18:57,040
समय ऐसा था जब एक्सिस्ट नहीं कर रही थी उससे पहले आपने कहा था में अंतर है ना मेरे

275
00:18:57,040 --> 00:19:01,200
भाई सृष्टि का मतलब सुनो विद्या और अविद्या

276
00:19:01,200 --> 00:19:05,440
ये दोनों ही ब्रह्म में सदा रहती है और सुनो

277
00:19:05,440 --> 00:19:09,520
माया कोई अभाव पदार्थ नहीं है। माया जो है वह अभाव

278
00:19:09,520 --> 00:19:13,600
पदार्थ नहीं है। मतलब अभाव पदार्थ का मतलब है कि

279
00:19:13,600 --> 00:19:18,000
ऐसा नहीं है कि जब अविद्या जब विद्या नहीं होगी तभी अविद्या

280
00:19:18,000 --> 00:19:22,080
है। विद्या साथ में है तब भी अविद्या है।

281
00:19:22,080 --> 00:19:27,360
उसका अस्तित्व है अविद्या का वही माया है।

282
00:19:27,360 --> 00:19:31,360
सृष्टि बनाना व्यवहारिक रूप से सूर्य चंद्रमा इत्यादि को गढ़ना

283
00:19:31,360 --> 00:19:35,440
यह व्यवहारिक सृष्टि की रचना और माया के रूप में ईश्वर की

284
00:19:35,440 --> 00:19:39,680
शक्ति माया माया माया में मैं अपने संसार को कल्पित

285
00:19:39,680 --> 00:19:44,000
करता हूं खाई बनाता हूं पुल बनाता हूं पहाड़ बनाता हूं ये सृष्टि की रचना

286
00:19:44,000 --> 00:19:48,000
है ठीक है जी मतलब मैं मेन डिफरेंस

287
00:19:48,000 --> 00:19:52,000
ये समझ रहा था अब तक क्योंकि अधिकतर हिंदू लोग यही कहते हैं कि भाई ईश्वर ने संसार को

288
00:19:52,000 --> 00:19:56,080
बनाया तो इससे मतलब एक समय नहीं था बट मैं बुद्धिज्म में ये हमारा ये माना

289
00:19:56,080 --> 00:20:00,240
जाता है गलत समझ रहे एक वो प्रकृति के

290
00:20:00,240 --> 00:20:04,560
रूप में मतलब वह तत्व है मगर वह किसी तरीके से व्यवहार

291
00:20:04,560 --> 00:20:08,720
में ना आ सकने वाले रूप में है। उसके बाद भगवान

292
00:20:08,720 --> 00:20:12,800
उसको व्यवहारिक रूप से बनाते हैं कि ये पहाड़ बना दिया ये सूर्य बना दिया

293
00:20:12,800 --> 00:20:16,800
यहां चंद्रमा टांग दो। हां फिर हम उसका यूज़ बहुत ज्यादा कर लेंगे तो

294
00:20:16,800 --> 00:20:20,800
वापस डिस्ट्रक्शन करेंगे। वापस उसका पुनर्निर्माण और फिर वो इंफिनिटली चल चल

295
00:20:20,800 --> 00:20:24,960
रहा है हमेशा। यही बुद्धिज्म में कल्प का है कि हां यही मगर आपके

296
00:20:24,960 --> 00:20:28,960
यहां पर शाश्वत सुखी सत्ता नहीं मानी गई दिक्कत ये है मान लेते

297
00:20:28,960 --> 00:20:33,360
तो ईश्वर हो जाता ईश्वर हो जाता तो अवैदिक नहीं होता फिर वो जी वही तो

298
00:20:33,360 --> 00:20:37,440
देखिए बुद्ध के चार आर्य सत्य में पहला ये है कि संसार में दुख है यानी कि जब

299
00:20:37,440 --> 00:20:41,520
वो सत्ता का एक अंश संसार में आता है तो है ना

300
00:20:41,520 --> 00:20:42,400
यानी वो उसमें जो

301
00:20:42,400 --> 00:20:46,480
दुख है वो भी माया है वही तो व्यक्ति को बताना है। हां तो संसार में आता है तो

302
00:20:46,480 --> 00:20:50,640
दुख है बट संसार से जैसे ही बाहर होगा निर्वाण की तरफ तो वापस हमेशा अरे भैया ये बार-बार

303
00:20:50,640 --> 00:20:54,880
आप अपनी जो एक बात आपने पकड़ ली है या रट ली है उसको ही बार-बार

304
00:20:54,880 --> 00:20:58,960
रिपीट करने से मतलब नहीं है अपनी अपनी जो अभी चर्चा हुई है वो इस बारे में हुई

305
00:20:58,960 --> 00:21:03,040
है कि बुद्धिज्म शाश्वत सुख वाली सत्ता को मानता है

306
00:21:03,040 --> 00:21:07,680
कि नहीं शाश्वत है वही ईश्वर है समझिए मेरी बात को आप

307
00:21:07,680 --> 00:21:11,680
शाश्वत है वही ईश्वर है जी शाश्वत में तो मानता है बस ईश्वर का

308
00:21:11,680 --> 00:21:15,760
नाम नहीं दिया बुद्ध से पूछा भी गया तो कहां मान रहे हो आप शाश्वत मैं बोल तो

309
00:21:15,760 --> 00:21:19,840
रहा हूं कि भैया जिस समय बुद्ध के रूप में बाधित थे उस समय फ्री सत्ता थी कि

310
00:21:19,840 --> 00:21:24,000
नहीं और थी तो फिर वो जो फ्री सत्ता है वो तो माया से बाधित

311
00:21:24,000 --> 00:21:28,080
नहीं है वो तो आके माया में कुछ भी करें और जब कुछ भी करे तो फिर अवतार

312
00:21:28,080 --> 00:21:32,560
को भी मान लो और उसकी जो यहां पे बाधित लोग हैं वो पूजा करें हो गया हिंदू

313
00:21:32,560 --> 00:21:36,800
खत्म बुद्धिज्म

314
00:21:36,800 --> 00:21:40,880
हम तो सत्ता मानो पहले या ना मानो पहले तो एक साइड आओ ना

315
00:21:40,880 --> 00:21:43,840
आप समझे

316
00:21:43,840 --> 00:21:48,720
तो आप थोड़ा सा बुद्धिज्म को और वह कर लो। फिर हम लोग किसी दिन रख लेते हैं।

317
00:21:48,720 --> 00:21:53,120
या चाहो तो अगर अभी आना है इनहीं सब चीजों को लेकर के तो आ जाओ।

318
00:21:53,120 --> 00:21:57,200
जी मैं एक काम करता हूं। अद्वैत को फिर से पढ़ता हूं हम और फिर

319
00:21:57,200 --> 00:22:03,200
मैं आपको कांटेक्ट करूंगा तब तक आप देख लीजिए।

320
00:22:09,660 --> 00:22:13,660
[संगीत]
