1
00:00:00,160 --> 00:00:04,320
फाइनली इस जाइन किया। एक रूप में शिव जी वैष्णव

2
00:00:04,320 --> 00:00:08,960
हैं। शिव की कृपा से यहां के जो जीव हैं कई मुक्त हो गए। [संगीत] वैष्णव

3
00:00:08,960 --> 00:00:12,320
व्यक्ति भगवान विष्णु की भक्ति

4
00:00:12,320 --> 00:00:16,320
हमारे यहां ऐसा मैंने सुना नहीं अभी तक ऐसा नहीं जो आपके यहां के

5
00:00:16,320 --> 00:00:18,240
प्रामाणिक लोग हैं जो अगर जो कह रहे

6
00:00:18,240 --> 00:00:22,320
हैं मैं तो आचार्य नहीं हूं ना पर इस पर मैं जो हमारे वैष्णव

7
00:00:22,320 --> 00:00:26,640
ने जो हमको बताया है आचार्य ने अपने की अपनीपनी टीका है भागवत

8
00:00:26,640 --> 00:00:30,790
लोगों के लिए यही है ना कि शिवाज द्विवेदी ने अपना नाम बताया शिवाजी नारायण द्विवेदी

9
00:00:30,790 --> 00:00:34,800
[संगीत] भगवान बुद्ध आए क्यों बोल रहे हैं तो मैं मानता हूं इस

10
00:00:34,800 --> 00:00:38,320
बात को

11
00:00:38,320 --> 00:00:42,320
सभी को जय श्री राम। इस समय हम बैठे हैं ईस्ट

12
00:00:42,320 --> 00:00:46,320
ऑफ कैलाश इस मंदिर में और हमारे साथ यहां के एक

13
00:00:46,320 --> 00:00:50,320
ब्रह्मचारी जी हैं। अ इस को लेकर के आज तक कई

14
00:00:50,320 --> 00:00:54,480
सारे वाद विवाद आपने हमारे चैनल पर देखे

15
00:00:54,480 --> 00:00:58,640
होंगे और कई सारे प्रश्न हैं जो इस द्वारा प्रचारित की

16
00:00:58,640 --> 00:01:02,800
जाने वाली शिक्षाओं पर जाते हैं। तो उन्हीं सब

17
00:01:02,800 --> 00:01:07,440
शिक्षाओं के बीच में मेरे पास एक बार एक महानुभाव

18
00:01:07,440 --> 00:01:12,080
है। इनका कॉल आया। उन्होंने कहा कि कई बातें ऐसी हैं जो

19
00:01:12,080 --> 00:01:16,080
कुछ लोगों के द्वारा बदल करके प्रचारित की जा रही है प्रभुपाद जी के ही नाम से

20
00:01:16,080 --> 00:01:20,240
अथवा इस के ही नाम से। तो आप उन बातों को मैं आपको

21
00:01:20,240 --> 00:01:24,400
बताना चाहता हूं कि वो कौन सी बातें हैं और वो

22
00:01:24,400 --> 00:01:28,800
बात भी आप अपने चैनल से बताइए लोगों को जिससे कि लोगों में भ्रम दूर हो।

23
00:01:28,800 --> 00:01:34,800
शिव और विष्णु की जो लड़ाई चल रही है उसको लेकर के चीजें

24
00:01:35,280 --> 00:01:39,440
लोग समझ पाए कि वास्तविकता क्या है। तो आज हम इनके पास पहुंचे

25
00:01:39,440 --> 00:01:43,760
हैं इनके कहने पर तो प्रभु जी आप सबसे पहले थोड़ा सा परिचय

26
00:01:43,760 --> 00:01:47,920
दे दीजिए हमारे दर्शकों मैं आपको एक बात बता दूं

27
00:01:47,920 --> 00:01:52,000
कि आज हम कुछ पर्टिकुलर विषयों पर ही बात करने वाले हैं और कुछ

28
00:01:52,000 --> 00:01:56,320
विषयों पर हम आने वाले समय में बात करेंगे। जैसे कि चैतन महाप्रभु

29
00:01:56,320 --> 00:02:00,640
जी की परंपरा को लेकर के जो बात है और और भी जो दार्शनिक

30
00:02:00,640 --> 00:02:04,720
पक्ष हो सकते हैं इस को के वो बातें हम फिर किसी दूसरे

31
00:02:04,720 --> 00:02:08,800
अंश में करेंगे मगर फिलहाल आज हम कुछ सीमित विषयों पर बात करने

32
00:02:08,800 --> 00:02:13,600
वाले हैं तो प्रभु जी सर्वप्रथम आप थोड़ा सा परिचय दे दीजिए अपना

33
00:02:13,600 --> 00:02:18,000
हरे कृष्णा जय श्री राम आवाहन चैनल वालों को

34
00:02:18,000 --> 00:02:22,000
मेरी तरफ से जय श्री राम तो मेरा सौभाग्य

35
00:02:22,000 --> 00:02:25,840
है कि आप जैसे ब्राह्मण

36
00:02:25,840 --> 00:02:29,840
हमारे समक्ष से आए हैं और शास्त्रों में कहा गया

37
00:02:29,840 --> 00:02:34,000
नमो ब्राह्मण देवाय कि ब्राह्मण तो भगवान को बहुत प्रिय

38
00:02:34,000 --> 00:02:38,160
है और मेरा परिचय यह है कि मेरा नाम है लक्ष्मी नरसिंह

39
00:02:38,160 --> 00:02:42,720
दास। मैं पिछले 13 सालों से इस नई दिल्ली में

40
00:02:42,720 --> 00:02:47,760
स्टॉप कैलाश इस मंदिर में सेवा कर रहा हूं। प्रचार कर रहा हूं

41
00:02:47,760 --> 00:02:50,960
और भगवान का भजन कर रहा हूं।

42
00:02:50,960 --> 00:02:55,200
तो आप आए यहां पर आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

43
00:02:55,200 --> 00:02:59,200
आपका बहुत-बहुत स्वागत है। नहीं नहीं आपने आमंत्रित किया तभी

44
00:02:59,200 --> 00:03:03,280
हम पहुंच पाए हैं और एक अच्छे व्यक्ति के

45
00:03:03,280 --> 00:03:07,280
रूप में मेरे मन में आपकी एक छवि बन गई क्योंकि

46
00:03:07,280 --> 00:03:11,280
आपने ऐसी बातें कुछ मुझे बताई जो मैं भी चकित रह गया कि आज तक इस

47
00:03:11,280 --> 00:03:15,280
कौन का ये पक्ष तो हमें पता ही नहीं था भाई। इस कौन ऐसी बातें भी

48
00:03:15,280 --> 00:03:20,160
कह रहा है। तो सबसे पहली बात हम लोग अगर शुरू करेंगे

49
00:03:20,160 --> 00:03:24,240
थोड़ा सा मैं यह पूछ रहा था कि आपने अपना आध्यात्मिक जीवन में आने के बाद का

50
00:03:24,240 --> 00:03:28,400
नाम बताया थोड़ा सा पूर्व का नाम क्या था? कहां

51
00:03:28,400 --> 00:03:32,560
से बिलोंग? थोड़ा सा परिचय दे सकते हैं। मेरा जन्म हुआ था उत्तराखंड

52
00:03:32,560 --> 00:03:36,560
राज्य के पिथौरागढ़ जिले में हम और

53
00:03:36,560 --> 00:03:40,720
मेरे पिताजी जो हैं इंडियन आर्मी में थे

54
00:03:40,720 --> 00:03:44,720
और मैं क्षैत्रिय परिवार में मेरा जन्म हुआ है। अच्छा

55
00:03:44,720 --> 00:03:49,600
और मेरा नाम है पूर्व आश्रम का नाम है लक्ष्मण रावल।

56
00:03:49,600 --> 00:03:53,760
लक्ष्मण रावल। अह हम लोग क्षत्रिय हैं। वर्णाश्रम

57
00:03:53,760 --> 00:03:57,760
धर्म के दृष्टि से देखा जाए और

58
00:03:57,760 --> 00:04:02,000
मेरे पिताजी क्षत्रिय धर्म निभाते हुए आर्मी में रहे हैं। अभी

59
00:04:02,000 --> 00:04:06,160
रिटायर हो चुके हैं। वो भी आ इस्कॉन

60
00:04:06,160 --> 00:04:10,240
से काफी पहले से जुड़े हुए हैं। तो वो जुड़े थे। फिर हम

61
00:04:10,240 --> 00:04:14,240
भी बचपन से इस से जुड़ने का सौभाग्य मिला। हम्।

62
00:04:14,240 --> 00:04:18,960
93 में मेरा जन्म हुआ। और फिर

63
00:04:18,960 --> 00:04:23,040
2013 में मैं दिल्ली आ गया। इस मंदिर ज्वाइन

64
00:04:23,040 --> 00:04:27,200
किया और मन में यह भाव आया कि अब

65
00:04:27,200 --> 00:04:31,360
पूरी तरह भगवान के भजन में निमग्न रहना है। जैसे

66
00:04:31,360 --> 00:04:35,440
प्रहलाद महाराज जी कहते हैं दुर्लभम मानुषम जन्म

67
00:04:35,440 --> 00:04:39,600
ये मनुष्य जीवन बड़ा दुर्लभ है। क्षणभंगुर है। कोमारम

68
00:04:39,600 --> 00:04:43,600
आश्रित प्रज्ञ प्रहलाद महाराज जी का यही उपदेश है

69
00:04:43,600 --> 00:04:47,760
कि पांच वर्ष की उम्र से भगवान का भजन किया जाए। तो

70
00:04:47,760 --> 00:04:51,920
प्रह्लाद महाराज जी के इन उपदेशों को भगवत गीता के उपदेशों से

71
00:04:51,920 --> 00:04:56,320
प्रभावित होकर मुझे भी कृष्ण भक्ति

72
00:04:56,320 --> 00:04:59,680
करने का एक

73
00:04:59,680 --> 00:05:03,760
उत्साह आया मन में। यद्यपि उत्तराखंड जो

74
00:05:03,760 --> 00:05:07,920
है देवभूमि है। वहां देवताओं का बड़ा बोलबाला है।

75
00:05:07,920 --> 00:05:12,000
बलि प्रथा बहुत है उत्तराखंड में और

76
00:05:12,000 --> 00:05:16,080
वहां भगवत गीता भगवान कृष्ण के संदेश के

77
00:05:16,080 --> 00:05:20,480
विषय में लोग नहीं जानते हैं। बचपन में जब मैंने भगवत

78
00:05:20,480 --> 00:05:21,360
गीता पढ़ी

79
00:05:21,360 --> 00:05:25,360
तो भगवत गीता का वह श्लोक मुझे बहुत मेरे मन को

80
00:05:25,360 --> 00:05:29,840
भाया। जिसमें भगवान कहते हैं याती देवता देवान पित्त

81
00:05:29,840 --> 00:05:35,440
पितृता भूतान याती भूतजाज्या याती मध्य जिनोपिमा

82
00:05:35,440 --> 00:05:39,520
भगवान इस श्लोक में बता रहे हैं कि जो देवताओं की पूजा करते हैं वह देवताओं

83
00:05:39,520 --> 00:05:43,520
के पास जाते हैं। जो पितरों की पूजा करते हैं वो पितरों के पास जाते

84
00:05:43,520 --> 00:05:47,840
हैं। जो भूतों की पूजा करते हैं उन्हीं के पास जाते हैं और या मध्या

85
00:05:47,840 --> 00:05:51,920
जिनोपमा और जो मेरा भजन करते हैं वह मेरे धाम को आते

86
00:05:51,920 --> 00:05:56,160
हैं। तो उत्तराखंड में देवताओं का बोलबाला था तो मुझे बड़ा

87
00:05:56,160 --> 00:06:00,240
प्रभावित किया कि भगवान यहां पर

88
00:06:00,240 --> 00:06:04,880
उपासना पद्धति का इतना भेद कर रहे हैं कि देवताओं के उपासक

89
00:06:04,880 --> 00:06:08,960
स्वर्ग लोक जाएंगे। पितरों के उपासक पितरलोक जाएंगे और

90
00:06:08,960 --> 00:06:13,120
मेरे उपासक मेरे धाम को आएंगे। स्पष्ट भगवान ने कहा गीता में। फिर

91
00:06:13,120 --> 00:06:17,200
गीता का दूसरा श्लोक मुझे और भाया। वो क्या था? मन

92
00:06:17,200 --> 00:06:21,360
मना भव मद भक्तो मध्याजीमाम नमरु कि मेरे भक्त

93
00:06:21,360 --> 00:06:25,440
बनो मुझे नमस्कार करो मेरी पूजा करो गीता

94
00:06:25,440 --> 00:06:29,840
के इस संदेश से फिर मैं बचपन से कृष्ण भक्ति भगवान

95
00:06:29,840 --> 00:06:33,920
के नामों का जप ये सब करना प्रारंभ किया और

96
00:06:33,920 --> 00:06:36,560
कॉलेज में जब जॉइ हुआ तो

97
00:06:36,560 --> 00:06:40,720
फिर संसार के प्रति तीव्र वैराग्य हुआ कि यह मृत्यु कभी भी आ

98
00:06:40,720 --> 00:06:44,880
सकती है। जातस्य ही ध्रुव मृत्यु भगवान कहते हैं गीता में कि

99
00:06:44,880 --> 00:06:48,880
जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है। तो बार-बार यह मन में

100
00:06:48,880 --> 00:06:53,120
बार-बार यह मेरे मन में आता था कि मृत्यु कभी भी आ सकती है। तो इसलिए

101
00:06:53,120 --> 00:06:57,200
मैंने सोचा क्यों ना मैं हर समय भगवान का भजन

102
00:06:57,200 --> 00:07:01,440
में लगूं। नाम जप करूं। क्योंकि भगवान गीता में कहते हैं अंतकाले

103
00:07:01,440 --> 00:07:05,440
च मामेव स्मरण मुक्त कलेवरम। अंत समय में भगवान का

104
00:07:05,440 --> 00:07:09,600
नाम ही काम आएगा। तो उसी के अभ्यास के लिए फिर मैं फाइनली

105
00:07:09,600 --> 00:07:14,080
इस जाइन किया श्री प्रभुपाद जी के ग्रंथों को पढ़कर

106
00:07:14,080 --> 00:07:18,880
अपने गौ वैष्णव आचार्यों के ग्रंथों को पढ़कर हम

107
00:07:18,880 --> 00:07:22,960
तो यही छोटा सा परिचय है मेरा नहीं बहुत अच्छा लगा बस इसमें

108
00:07:22,960 --> 00:07:27,360
से ही हमारा जो पहला विषय है वो निकल के बाहर आ गया

109
00:07:27,360 --> 00:07:28,080
जैसे आपने

110
00:07:28,080 --> 00:07:30,560
कहा कि

111
00:07:30,560 --> 00:07:34,560
देवताओं में की जो पूजा करते हैं तो एक बात देखने

112
00:07:34,560 --> 00:07:39,360
में आती है कि शिव जी को भी देवता माना गया है। है ना?

113
00:07:39,360 --> 00:07:43,360
हम् अह अह क्या कहते हैं शिव जी की

114
00:07:43,360 --> 00:07:47,360
जो तो वहां पर कहा गया एक तरीके से इसको भी मना किया

115
00:07:47,360 --> 00:07:51,440
जाता है कि शिव जी के नाम को जो है कृष्ण के नाम के समान

116
00:07:51,440 --> 00:07:55,600
समझने वाले मूर्ख हैं और ऐसा करना अपराध बताया गया है।

117
00:07:55,600 --> 00:07:59,760
तो सबसे पहली बात तो यह है कि इस

118
00:07:59,760 --> 00:08:03,760
शिव जी को भगवान के रूप में स्वीकार नहीं करता जबकि

119
00:08:03,760 --> 00:08:07,920
हमारे शास्त्र करते हैं। और यदि यह कहा जाए कि कहीं-कहीं पर देवता

120
00:08:07,920 --> 00:08:12,000
कहा गया है तो कहीं-कहीं पर तो सभी को देवता कहा गया है। है ना?

121
00:08:12,000 --> 00:08:16,000
परंतु उन्हीं शास्त्रों में जिनमें इनको देवता कहा गया है वो कार्य कारण के

122
00:08:16,000 --> 00:08:20,000
भेद से कहा गया है। है ना? कारण के रूप में वो कारण ब्रह्म है और

123
00:08:20,000 --> 00:08:24,160
कार्य करने वाले के रूप में वो देवता है कि फलाना डिपार्टमेंट में वो दिखाई दे रहे हैं किसी एक

124
00:08:24,160 --> 00:08:29,360
में। तो इस बारे में इस का क्या पक्ष है? क्या

125
00:08:29,360 --> 00:08:33,360
इस मानता है कि शिव की पूजा करने पर भी कृष्ण जैसा

126
00:08:33,360 --> 00:08:37,600
जैसा कृष्ण का परमधाम प्राप्त हो रहा है वैसा ही परमधाम प्राप्त हो जाएगा

127
00:08:37,600 --> 00:08:41,680
अथवा नहीं आपका बहुत अच्छा प्रश्न है

128
00:08:41,680 --> 00:08:43,120
जी

129
00:08:43,120 --> 00:08:47,280
शिव जी के विषय में शिव जी के विषय

130
00:08:47,280 --> 00:08:51,440
में हमारे शास्त्रों ने हमारे वैष्णव आचार्यों ने

131
00:08:51,440 --> 00:08:55,440
गौ वैष्णव आचार्यों ने शीला प्रभुपाद ने

132
00:08:55,440 --> 00:08:59,600
बहुत विस्तार से बताया आया है। हम

133
00:08:59,600 --> 00:09:03,680
दो पक्ष हैं। एक रूप में शिव जी वैष्णव हैं।

134
00:09:03,680 --> 00:09:08,640
एक रूप में शिव जी परम भगवान है। हमारे शास्त्रों में

135
00:09:08,640 --> 00:09:12,960
युगल जोड़ी उपासना का विधान है। कोई चाहे तो राधा

136
00:09:12,960 --> 00:09:17,200
कृष्ण की उपासना कर सकता है। कोई चाहे तो सीता राम की उपासना

137
00:09:17,200 --> 00:09:21,200
कर सकता है। कोई चाहे तो लक्ष्मी नारायण की उपासना कर सकता

138
00:09:21,200 --> 00:09:25,520
है। कोई चाहे तो शिव पार्वती की उपासना कर सकता है।

139
00:09:25,520 --> 00:09:30,320
तो यह युगल जोड़ी की उपासना शास्त्रों में दिया गया है।

140
00:09:30,320 --> 00:09:34,480
तो जो वैष्णव आचार्य हैं या जो वैष्णव परंपरा है उन

141
00:09:34,480 --> 00:09:38,480
वैष्णव परंपरा में अनन्यता रखते हुए एक निष्ठता

142
00:09:38,480 --> 00:09:42,560
रखते हुए जी या तो राधा कृष्ण की उपासना की जाती है।

143
00:09:42,560 --> 00:09:46,960
जो राधा कृष्ण के उपासक हैं। जो सीताराम के उपासक हैं वो सीताराम

144
00:09:46,960 --> 00:09:50,960
की उपासना करते हैं। जैसे तुलसीदास जी महान भक्त हुए भगवान राम

145
00:09:50,960 --> 00:09:55,040
के उन्होंने भी राम से मानस में

146
00:09:55,040 --> 00:09:58,320
और दोहावली इत्यादि ग्रंथों में शिव जी को गुरु

147
00:09:58,320 --> 00:10:02,320
रूप में ही स्वीकार किया है और उनसे भगवान राम की भक्ति को ही मांगा

148
00:10:02,320 --> 00:10:06,320
है। तो वैष्णव आचार्यों ने शिव जी को गुरु रूप में वैष्णव

149
00:10:06,320 --> 00:10:10,320
रूप में देखा है और अगर कोई उनको भगवान के रूप में देख रहा

150
00:10:10,320 --> 00:10:14,400
है। कोई भगवान के रूप में उनकी उपासना कर रहा है। सदा शिव रूप

151
00:10:14,400 --> 00:10:18,480
में तो यह बिल्कुल शास्त्रीय आधार है। शास्त्र के

152
00:10:18,480 --> 00:10:22,480
अनुसार है। और वैष्णवों के अनुसार शिव जी भगवान भी हैं।

153
00:10:22,480 --> 00:10:26,480
एक रूप में और दूसरे रूप में वह वैष्णव भी है। जैसे भागवत

154
00:10:26,480 --> 00:10:30,720
इत्यादि में कहा गया कि वैष्णवा नाम यथाशंभू शास्त्रों

155
00:10:30,720 --> 00:10:34,720
में ऐसे वचन भी हैं और दूसरे वचन भी है कि शिव जी स्वयं

156
00:10:34,720 --> 00:10:39,200
भगवान हैं। तो दोनों विचार ठीक है और जो वैष्णव

157
00:10:39,200 --> 00:10:43,520
की बात है क्योंकि वो अनन्यता रखने के लिए वो शिव जी से गुरु

158
00:10:43,520 --> 00:10:47,600
भाव में वैष्णव भाव में क्या करते हैं? अह आशीर्वाद लेते

159
00:10:47,600 --> 00:10:51,600
हैं। जैसे हम लोग अह हमारे संप्रदाय के एक महान आचार्य

160
00:10:51,600 --> 00:10:55,680
हुए हैं। सनातन गोस्वामी जी। उन्होंने शिव जी को गुरु रूप

161
00:10:55,680 --> 00:11:00,400
में माना है। श्री धाम वृंदावन में गोवर्धन के तट पर चकलेश्वर

162
00:11:00,400 --> 00:11:04,480
महादेव के पास रहकर वो हरि नाम लेते थे। जी तो

163
00:11:04,480 --> 00:11:08,560
उनको वहां मच्छर काटने लगे। तो उस स्थान को छोड़कर वो

164
00:11:08,560 --> 00:11:12,640
कहीं और जाने लगे। तो रात्रि में शिव जी उनके सपने में

165
00:11:12,640 --> 00:11:13,680
प्रकट हुए।

166
00:11:13,680 --> 00:11:17,840
बोले सनातन तुम इस स्थान को छोड़कर मत जाओ।

167
00:11:17,840 --> 00:11:21,840
जी मैं तुम्हारा संग चाहता हूं। कल से तुम्हें

168
00:11:21,840 --> 00:11:25,920
यहां मच्छर नहीं लगेंगे। तो शिव जी के साथ ऐसा संबंध रहा है हमारे

169
00:11:25,920 --> 00:11:30,320
वैष्णव आचार्यों का उन्होंने वैष्णव रूप में देखा है। और

170
00:11:30,320 --> 00:11:34,560
जो वैष्णव नहीं है वो अगर साक्षात भगवान के रूप में उनकी उपासना

171
00:11:34,560 --> 00:11:38,720
कर रहे हैं। वो निश्चित रूप से मुक्त होंगे। जैसा कि सनातन गोस्वामी

172
00:11:38,720 --> 00:11:43,120
जी ही ब्रद भागवतामृति में कह रहे हैं कि कृष्णा विचस

173
00:11:43,120 --> 00:11:47,200
भेदक्षा महा दोषकारी मता आगो भगवता

174
00:11:47,200 --> 00:11:51,440
स्वामिन क्षमतेन शिव कृतम भगवान श्री कृष्ण

175
00:11:51,440 --> 00:11:56,160
से श्री शिव को प्रथक देखना भी महा दोष है

176
00:11:56,160 --> 00:12:00,560
ऐसा बोल रहे हैं सनातन गोस्वामी जी वृद भागवतामृत में

177
00:12:00,560 --> 00:12:04,560
और जहां तक कई लोग कहते हैं कि शिव की भक्ति करने से मुक्त

178
00:12:04,560 --> 00:12:08,640
नहीं होंगे उनके लिए भी सनातन गोस्वामी जी ब्रद भागवतामृति में कह

179
00:12:08,640 --> 00:12:13,520
रहे हैं अहो सर्वो अपीते मुक्त शिव लोक निवासिन

180
00:12:13,520 --> 00:12:17,920
मुक्तस कृपया कृष्ण भक्तस कति नाभवन श्रीपाद

181
00:12:17,920 --> 00:12:21,920
सनातन गोस्वामी कह रहे हैं कि जो शिवलोक में वास करते हैं

182
00:12:21,920 --> 00:12:26,160
वे सभी मुक्त हैं। शिव की कृपा से न जाने कितने जीव

183
00:12:26,160 --> 00:12:28,800
मुक्त हो गए और कितनों को कृष्ण भक्ति

184
00:12:28,800 --> 00:12:33,120
प्राप्त हो गई। ऐसा सनातन गोस्वामी जी वर्णन कर रहे हैं।

185
00:12:33,120 --> 00:12:37,280
तो शिव जी कौन है? अह भगवान भी हैं सदा शिविव रूप

186
00:12:37,280 --> 00:12:41,520
में और वैष्णव भी हैं। क्योंकि शिव जी

187
00:12:41,520 --> 00:12:45,680
अपने एक स्वरूप में वैष्णव जैसे हनुमान जी हैं वो भक्त

188
00:12:45,680 --> 00:12:49,760
रूप में हैं। तो भगवान की उपासना सिखाते हैं। जी तो शिव जी क्या है?

189
00:12:49,760 --> 00:12:54,400
महाजन है। 12 महाजनों में शिव जी का नाम भी आता है। शंभू

190
00:12:54,400 --> 00:12:58,880
नारद शंभ शंभू कुमारो कपिलो मनु प्रहलादो

191
00:12:58,880 --> 00:13:03,040
जनको भीष्मो बलि वया सखिर वयं जो बार महाजन

192
00:13:03,040 --> 00:13:07,600
है उसमें शिव जी भी हैं। शिव जी ने भी एक परंपरा शुरू की है।

193
00:13:07,600 --> 00:13:11,600
और किसकी परंपरा शुरू की? भगवान राम की भक्ति

194
00:13:11,600 --> 00:13:15,680
की। भगवान कृष्ण की भक्ति की। इसीलिए तो तुलसीदास जी कहते

195
00:13:15,680 --> 00:13:19,760
हैं कि महामंत्र जे जपत महेशु काशी

196
00:13:19,760 --> 00:13:23,760
मुक्ति हेतु उपदेशु तो राम का नाम शिव जी लेते

197
00:13:23,760 --> 00:13:28,080
हैं जी तो इसीलिए इसमें कोई संशय नहीं है। अगर कोई शिव पार्वती

198
00:13:28,080 --> 00:13:32,160
की उपासना करता है वो शिवलोक जाएगा और मुक्त होगा। परव्यम

199
00:13:32,160 --> 00:13:36,640
बिरजा नदी के उस पार है शिवलोक जहां से कभी उसको लौट के

200
00:13:36,640 --> 00:13:41,040
नहीं आना पड़ेगा। मतलब शिवलोक भी परमधाम है। परमधाम है। बिल्कुल परमधाम

201
00:13:41,040 --> 00:13:44,160
है। जो आपने अभी यहां पे वर्ष कोट किया है ना गोस्वामी

202
00:13:44,160 --> 00:13:48,160
जी का तो उसमें क्या है कि जो इस वाले लोग हैं

203
00:13:48,160 --> 00:13:52,480
कई ऐसे दुष्प्रचारक भी मैं कहूंगा आप सज्जन हैं जो आप साफ-साफ

204
00:13:52,480 --> 00:13:56,640
बात बता रहे हैं कि नहीं भाई जो

205
00:13:56,640 --> 00:14:00,720
क्या कहते हैं कि शिव की भक्ति से भी मुक्ति प्राप्त होगी। उसके सनातन गोस्वामी

206
00:14:00,720 --> 00:14:04,880
सनातन गोस्वामी जी का आप कोट कर रहे हैं। मगर वो इसका अर्थ यह लेते

207
00:14:04,880 --> 00:14:08,960
हैं कि भाई वहां जाकर जैसे आपने जो पढ़ा है ना कि मुक्त वहां से

208
00:14:08,960 --> 00:14:13,040
वो मुक्त होने के लिए वहां जाएंगे। तो वो लोग परमधाम ना मान करके

209
00:14:13,040 --> 00:14:17,040
जैसे इसमें भी आया है ना कि वो लोग वहां नहीं जाएंगे। नहीं इसमें ऐसा नहीं आया है। इसमें

210
00:14:17,040 --> 00:14:21,040
कहा कि शिव लोक में वास करते हैं वो सभी मुक्त हैं। क्यों? आगे क्या लिखा

211
00:14:21,040 --> 00:14:25,200
है? शिव की कृपा से यहां के जो जीव हैं, कई मुक्त हो गए। कईयू

212
00:14:25,200 --> 00:14:29,520
को कृष्ण भक्ति मिल गई। ऐसा मतलब कृष्ण भक्ति यहां के अगली स्टेज है ना

213
00:14:29,520 --> 00:14:33,520
नहीं यहां के लोगों को वहां तो मुक्त है शिव लोक में जो शिव जी के अनन्य भक्त हैं

214
00:14:33,520 --> 00:14:37,680
वो शिव शिव धाम में वहां पे दो बातें हो रही है एक वो कह रहे हैं वो शिव धाम में मुक्त

215
00:14:37,680 --> 00:14:41,680
है क्यों है तो वहां आशय ये नहीं मुझे लग रहा है शायद आप इसको समझ नहीं पाए

216
00:14:41,680 --> 00:14:45,680
होंगे मैं एक बार मैं एक प्रश्न पूछ लूं क्योंकि वहां पर वो ये कहते हैं

217
00:14:45,680 --> 00:14:50,080
कह रहे हैं जो मैंने सुना कि वो शिव धाम में है वो भी मुक्त है क्योंकि

218
00:14:50,080 --> 00:14:54,160
शिव की कृपा से कई लोगों को कृष्ण भक्ति प्राप्त हुई

219
00:14:54,160 --> 00:14:58,320
है वो इस संसार की बात हो रही है वहां की बात नहीं हो रही है। इस संसार में

220
00:14:58,320 --> 00:14:59,280
जीव है जो शिव जी

221
00:14:59,280 --> 00:15:03,440
से कृष्ण भक्ति मांग रहे हैं। तो इस की किसी बुक में जैसे कि परमधाम

222
00:15:03,440 --> 00:15:07,520
माना गया है इस गोलोक को श्री कृष्ण को ऐसे शिवलोक

223
00:15:07,520 --> 00:15:11,680
को परमधाम माना गया है। जहां से वो वापस नहीं आएंगे। बिल्कुल माना गया है। हमारे हमारे

224
00:15:11,680 --> 00:15:15,840
जो इस में एक गोलोक चार्ट आपको मिलेगा

225
00:15:15,840 --> 00:15:20,320
जिसमें पूरा सिद्धांत समझाया गौ वैष्णव परंपरा का

226
00:15:20,320 --> 00:15:24,480
इस से पब्लिश है वो भक्ति वेदांत बुक ट्रस्ट से उसमें विजा

227
00:15:24,480 --> 00:15:28,560
नदी के उस पार परब्यम में शिवलोक को दिखाया है यानी इस

228
00:15:28,560 --> 00:15:32,560
में वो चार्ट मिलता है चार्ट मिलेगा आपको तो उसमें क्या लिखा गया है परबम यानी

229
00:15:32,560 --> 00:15:36,800
वो शिव धाम जो है बैकुंठ में है वीरजा नदी को

230
00:15:36,800 --> 00:15:40,880
से नीचे है बराबर में है या केवल इतना है कि अभी भी गोलोक

231
00:15:40,880 --> 00:15:44,960
बाकी है। ऐसा तो नहीं है। उसमें हमारे शास्त्रों में तो ये क्रम है।

232
00:15:44,960 --> 00:15:48,960
पहले बिरजा नदी के उस पार नहीं नहीं गोलोक अभी भी बाकी

233
00:15:48,960 --> 00:15:52,960
है या नहीं बाकी है? बाकी है। गोलोक है। वैकुंठ है। मथुरा द्वार

234
00:15:52,960 --> 00:15:57,120
भेद नहीं है। उपासना का भेद है केवल लक्ष्य का भेद है। चलिए

235
00:15:57,120 --> 00:16:01,120
ठीक है। तो वो बैकुंठ है। इसमें एक एक बात तो ये हम समझ गए कि आप कहना नहीं चाह रहे

236
00:16:01,120 --> 00:16:05,200
हो। मगर थोड़ा सा है। अभी बिल्कुल भेद नहीं है। नहीं तो और शिवलोक

237
00:16:05,200 --> 00:16:09,360
में गोलोक बाकी है कि नहीं? नहीं गोलोक बाकी

238
00:16:09,360 --> 00:16:13,600
मैं समझा नहीं शिवलोक पहुंचने के बाद भी गोलोक बाकी है कि नहीं

239
00:16:13,600 --> 00:16:14,320
यह प्रश्न करो

240
00:16:14,320 --> 00:16:18,560
ना आप जो शिवलोक जा रहा है जो शिव जी का भक्त है वो गोलोक

241
00:16:18,560 --> 00:16:22,560
क्यों जाएगा वो तो शिव जी का भक्त है ना वो वही रहेगा तो शिव की कृपा से

242
00:16:22,560 --> 00:16:26,640
फिर जो शिव की भक्ति करेगा उनकी कृपा से फिर भक्ति शिव कृष्ण की क्यों प्राप्त

243
00:16:26,640 --> 00:16:30,720
होगी वो तो उनकी भक्ति रहेगी नहीं होगी ना कौन बोल रहा है ऐसा आप ही तो ये ये कह

244
00:16:30,720 --> 00:16:34,800
रहे हैं कि अगर कोई शिव जी से प्रार्थना करे कि मुझे कृष्ण की भक्ति दे दो

245
00:16:34,800 --> 00:16:38,800
तब शिव जी उनको कृष्ण की भक्ति दे देते हैं। ये कह रहे हैं। यह नहीं कह रहे हैं

246
00:16:38,800 --> 00:16:42,800
कि शिव जी मतलब कि शिव जी को प्राप्त कर लेने पर मुक्ति है।

247
00:16:42,800 --> 00:16:46,800
हां जी मुक्ति है। उसमें फिर और अगली कोई स्टेज स्टेज नहीं है। चलो ये

248
00:16:46,800 --> 00:16:50,880
बात बहुत अच्छी लगी। आपने बताई किसके लिए जो शिव जी के अनन्य भक्त

249
00:16:50,880 --> 00:16:54,880
हैं उनके लिए शिव जी के जो अनन्य भक्तों के लिए आगे

250
00:16:54,880 --> 00:16:58,880
जाने की आवश्यकता नहीं है। नहीं है। हां। जैसे राम के अनन्य भक्त हैं

251
00:16:58,880 --> 00:17:03,040
वो अयोध्या ही जाएंगे। स्वाभाविक बात है जो कृष्ण के साकेत अयोध्या

252
00:17:03,040 --> 00:17:07,120
एक ही है और जो कृष्ण के उपासक है वो ब्रज में

253
00:17:07,120 --> 00:17:11,280
जाएंगे वृंदावन गोलोक तो स्वाभाविक है जो जिसका भक्त होगा

254
00:17:11,280 --> 00:17:15,440
वो उसी धाम में जाएगा उसके लिए वो सर्वस्व है तो शिव जी की भक्ति करने पर भी मुक्ति

255
00:17:15,440 --> 00:17:19,440
है मुक्ति है निश्चित है तो इस के जो भक्त है जो आजकल कार्य

256
00:17:19,440 --> 00:17:23,520
काफी सोशल मीडिया इत्यादि पर जो फेमस हो रहे हैं और वो लोग कहते हैं कि नहीं

257
00:17:23,520 --> 00:17:27,520
शिव जी की भक्ति करने पर आपको मुक्ति उनका ज्ञान अधूरा हो सकता है उनको जरूरत

258
00:17:27,520 --> 00:17:29,600
है कि शास्त्रों को पढ़े अच्छा

259
00:17:29,600 --> 00:17:33,920
और हमारे जो सनातन गोस्वामी जी हैं हम

260
00:17:33,920 --> 00:17:38,080
या जो गौ वैष्णव हैं हम या जो मूल ग्रंथ है उनको पढ़ने

261
00:17:38,080 --> 00:17:42,720
की आवश्यकता है। अच्छा एक चीज़ और आपने कही है कि शिवजी अह

262
00:17:42,720 --> 00:17:46,960
को जो है जो भेद वाली बात है ना कि भेद करता है वह गलत है।

263
00:17:46,960 --> 00:17:51,120
शिव और विष्णु है। मगर बात वहां पे ये लिखी है कि ना एक मानो इनको ना अलग

264
00:17:51,120 --> 00:17:55,200
मानो ना अलग मानो। तो आपने आधी बात बोली है तो एक मानना है या

265
00:17:55,200 --> 00:17:59,440
अलग मानना है। मतलब बहुत अच्छा प्रश्न किया। श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती

266
00:17:59,440 --> 00:18:03,520
ठाकुर हमारे एक महान आचार्य हुए हैं जिन्होंने श्रीमद् भागवतम

267
00:18:03,520 --> 00:18:07,680
पर सार्थ दर्शनी टीका लिखा हुआ है। बहुत भगवत गीता

268
00:18:07,680 --> 00:18:11,760
पे भी लिखा है। भगवत गीता पर सार्थ वर्ष टीका लिखा हुआ है।

269
00:18:11,760 --> 00:18:16,160
तो ऐसे विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर जी ने एक ग्रंथ लिखा है माधुर्य

270
00:18:16,160 --> 00:18:20,160
कादंबरी। हम्म। उस ग्रंथ में इस प्रश्न का वो उत्तर

271
00:18:20,160 --> 00:18:24,160
दे रहे हैं कि शिव ब्रह्मा शिव को और

272
00:18:24,160 --> 00:18:28,160
विष्णु को एक माने तब भी अपराध हो रहा है।

273
00:18:28,160 --> 00:18:32,400
अलग माने तब भी अपराध हो रहा है। तो क्या माने? हम ये प्रश्न

274
00:18:32,400 --> 00:18:37,040
उठाया उन्होंने। वहां पर ये प्रश्न किया गया कि शिव ब्रह्मा को

275
00:18:37,040 --> 00:18:41,120
भगवान विष्णु से अलग मानना ये भी अपराध है। तत्व की दृष्टि से

276
00:18:41,120 --> 00:18:44,640
एक मानो। व्यवहार रसगत नहीं नहीं मैं इसको पूरा करना चाहता हूं।

277
00:18:44,640 --> 00:18:48,640
जी इस प्रश्न को जैसा उन्होंने समझाया है। शिव ब्रह्मा को

278
00:18:48,640 --> 00:18:52,640
भगवान विष्णु के समान मानना यह अपराध अलग

279
00:18:52,640 --> 00:18:57,280
मानना तब तब भी अपराध तो माने क्या अब विश्वनाथ

280
00:18:57,280 --> 00:19:01,680
चक्रवर्ती ठाकुर उत्तर देते हैं कि

281
00:19:01,680 --> 00:19:05,680
किसी किसी कल्प में ब्रह्मा जी की

282
00:19:05,680 --> 00:19:10,560
पोस्ट पर जीव बैठता है। कोई पुण्यवान जीव

283
00:19:10,560 --> 00:19:14,640
जिनको वैराज ब्रह्मा कहते हैं। और

284
00:19:14,640 --> 00:19:18,800
किसी किसी महाकल्पों में ब्रह्मा जी की पोस्ट पर स्वयं भगवान

285
00:19:18,800 --> 00:19:22,880
बैठते हैं। जिनको हिरण्यकर्भ ब्रह्मा कहते हैं। हम

286
00:19:22,880 --> 00:19:27,040
जब ब्रह्मा और शिव के पोस्ट पर स्वयं भगवान विराजमान

287
00:19:27,040 --> 00:19:31,040
है। उनको अलग समझना वो

288
00:19:31,040 --> 00:19:35,040
अपराध है। जब इनके पदों पर कोई जीव बैठा पुण्य

289
00:19:35,040 --> 00:19:39,200
कर्म के बल पर शास्त्रों में आपको पता होगा ऐसे विधान है जो ब्रह्मा के पद

290
00:19:39,200 --> 00:19:43,280
को प्राप्त कर सकता है। जैसे 100 असमद यज्ञ करने से ब्रह्मा का पद

291
00:19:43,280 --> 00:19:47,280
प्राप्त होता है। तो किसी ने ऐसे पुण्य कर्म कर लिए कुछ ऐसा

292
00:19:47,280 --> 00:19:51,360
विधान कर लिया शास्त्रों का जिसको ब्रह्मा का पद प्राप्त हो गया। ऐसे

293
00:19:51,360 --> 00:19:55,360
जीव ब्रह्मा को भगवान के समान समझना वो अपराध

294
00:19:55,360 --> 00:19:59,760
होगा। ऐसा विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर वर्णन करते हैं।

295
00:19:59,760 --> 00:20:03,840
जब किसी किसी कल्प में भगवान को नहीं दिखता कि कोई पुण्यवान

296
00:20:03,840 --> 00:20:07,920
जीव ब्रह्मा के पद पर बैठने योग्य नहीं मिल रहा है तो खुद संभालते

297
00:20:07,920 --> 00:20:11,920
हैं उस पद को फिर ब्रह्मा। इसीलिए शास्त्रों में भगवान ब्रह्मा शब्द

298
00:20:11,920 --> 00:20:16,080
प्रयोग होता है उनके लिए किन के लिए जो हिरण्य गर्भ ब्रह्मा है। बहुत अच्छी

299
00:20:16,080 --> 00:20:20,160
बात बताई है आपने। अच्छा इसमें एक यह वाली बात आती है कि कोई भी

300
00:20:20,160 --> 00:20:24,320
व्यक्ति जब भगवान की बात कर रहा होता है कोई भी सामान्य व्यक्ति

301
00:20:24,320 --> 00:20:28,400
जिसको हम ये बात बता रहे हैं सामान्य व्यक्ति है हम तो कोई भी

302
00:20:28,400 --> 00:20:32,640
सामान्य व्यक्ति जब शिव और विष्णु की बात कर रहा होता है तो कभी नहीं सोचता

303
00:20:32,640 --> 00:20:36,960
है कि पता नहीं कौन सा जीव यहां का महापुरुष वो बन गया है ब्रह्मा

304
00:20:36,960 --> 00:20:40,960
और अब मैं ब्रह्मा और शिव विष्णु को एक कर रहा हूं तो ये बात तो होती नहीं वो जब

305
00:20:40,960 --> 00:20:45,760
भी वो जब भी सोचता है वो सरस्वती माता के जो अह अधिष्ठान

306
00:20:45,760 --> 00:20:50,080
अधिष्ठान यानी ब्रह्मा जी उनहीं के बारे में सोच रहा होता है जो

307
00:20:50,080 --> 00:20:54,240
क्या कहते हैं उनका जो लोक है वहां पर बैठते हैं जो उन्हीं के बारे में सोच

308
00:20:54,240 --> 00:20:58,400
रहा होता है जब भी ब्रह्मा की बात करता है या फिर जब भी वो शिव जी की बात करता है तो वो जो पार्वती

309
00:20:58,400 --> 00:21:02,480
वाले जो शिव जी हैं उनकी बात कर रहा होता है ना कि शिव जी के पद को प्राप्त करने वाले

310
00:21:02,480 --> 00:21:06,480
यहां के किसी महापुरुष जो मुक्त होने के बाद वहां पहुंच गए हैं उसकी बात कर

311
00:21:06,480 --> 00:21:10,640
रहा होता है। अच्छा दूसरी बात एक ये आती है कि

312
00:21:10,640 --> 00:21:15,360
जैसे कई बार ये होता है कि वैष्णव हैं इसलिए वो ऐसा मानते हैं।

313
00:21:15,360 --> 00:21:20,160
कौन? जैसे वो वैष्णव है इसलिए वह तो उनको वो देखते हैं

314
00:21:20,160 --> 00:21:24,800
शिव जी को। अच्छा शिव जी को क्या कहते हैं ये

315
00:21:24,800 --> 00:21:28,880
जो वैष्णव जन है वो वैष्णव के रूप में परम वैष्णव मानते हैं। तो

316
00:21:28,880 --> 00:21:33,760
इसमें एक ये बात आती है कि वैष्णव व्यक्ति

317
00:21:33,760 --> 00:21:37,840
भगवान विष्णु की भक्ति चालू करने के बाद वैष्णव माना

318
00:21:37,840 --> 00:21:41,920
जाएगा या उस पे कोई बाउंडेशन होती है कि तुमने वैष्णव कुल में जन्म लिया है। इसलिए

319
00:21:41,920 --> 00:21:46,000
तुम वैष्णव हो। जो भगवान विष्णु का उपासक है। यानी जब

320
00:21:46,000 --> 00:21:50,080
उसने उपासना शुरू कर दी उपासना जब उसने स्वीकार कर ली तब वैष्णव

321
00:21:50,080 --> 00:21:54,240
है ना उससे पहले तो उस पर वैष्णवता का वो नहीं ठोक सकते कि तुम वैष्णव हो इसलिए तुम्हें

322
00:21:54,240 --> 00:21:58,320
ये करना है। नहीं तो फिर जो हमारी शिक्षा होनी चाहिए वो तो स्वतंत्र

323
00:21:58,320 --> 00:22:02,320
रूप से होनी चाहिए ना कि भाई शिव और विष्णु शिव जी भी जो

324
00:22:02,320 --> 00:22:06,400
है भगवान ही है। वो यहां रोल निभा रहे हैं दास का। हमारी

325
00:22:06,400 --> 00:22:10,400
शिक्षा जो है वो स्वतंत्र रूप से होनी चाहिए। फिर इसमें इस हिसाब से नहीं होनी

326
00:22:10,400 --> 00:22:14,800
चाहिए कि वैष्णव की क्या शिक्षा है। शास्त्रों में जो चार वैष्णव

327
00:22:14,800 --> 00:22:19,200
संप्रदाय दिए हुए हैं संप्रदाय विहीनाय मंत्र

328
00:22:19,200 --> 00:22:24,000
निष्फला मता श्री ब्रह्म रुद्र सनका वैष्णवा पावन

329
00:22:24,000 --> 00:22:28,000
पद्म पुराण का ये वचन है तो चार वैष्णव परंपरा

330
00:22:28,000 --> 00:22:30,640
हमारे शास्त्रों में वर्णन है और

331
00:22:30,640 --> 00:22:34,720
चारों वैष्णव परंपरा में भगवान विष्णु की उपासना

332
00:22:34,720 --> 00:22:39,040
है। उनके नाम लेने की उपासना उनके उनका

333
00:22:39,040 --> 00:22:43,040
लक्ष्य यानी विष्णु पद प्राप्त करने का लक्ष्य है।

334
00:22:43,040 --> 00:22:47,680
तो अब जो वैष्णव हैं वो क्या करेंगे?

335
00:22:47,680 --> 00:22:51,760
वो विष्णु भक्ति का ही प्रचार करेंगे। नहीं आप वो

336
00:22:51,760 --> 00:22:55,760
मैं जो शैव हैं वो शिव जी का प्रचार करेंगे। जैसे हम सिद्धांत दे

337
00:22:55,760 --> 00:22:59,760
रहे हैं। सिद्धांत इस रूप में दे सकते हैं कि अगर आप शिव जी की उपासना

338
00:22:59,760 --> 00:23:03,760
आप शिव जी की भक्ति करना चाहते हो आप करिए। हम् आपकी

339
00:23:03,760 --> 00:23:07,760
इच्छा है। आप राम की उपासना करना चाहे तो आप करिए। यह तो इस रूप में हम

340
00:23:07,760 --> 00:23:11,920
शिक्षा दे सकते हैं। वह तो उसके ऊपर निर्भर है कि वह किसकी उपासना करना

341
00:23:11,920 --> 00:23:15,920
चाहता है। तो इस के द्वारा छापी गई कौन सी किताब है जिसमें ये लिखा हो?

342
00:23:15,920 --> 00:23:20,320
प्रभुपाद जी या हमारे आचार्यों ने तो एक

343
00:23:20,320 --> 00:23:24,560
निष्ठता दिखाई है। मैं इस की बात कर रहा हूं। इस के द्वारा कोई छपी हुई पुस्तक हो जिसमें

344
00:23:24,560 --> 00:23:28,560
इसन के द्वारा तो मैं तो प्रभुपाद जी के अलावा और जो

345
00:23:28,560 --> 00:23:32,640
नए ग्रंथ हैं उनको तो पढ़ा नहीं। मैं इस की बात कर रहा हूं।

346
00:23:32,640 --> 00:23:36,880
क्या इस के द्वारा कोई पुस्तक प्रभुपाद जी के नाम से ही सही ऐसी है जिसमें

347
00:23:36,880 --> 00:23:40,960
ये लिखा है? इसकी जानकारी मुझे नहीं है क्योंकि

348
00:23:40,960 --> 00:23:45,040
प्रभुपाद जी के ग्रंथ के अलावा मैंने इस में जो नए ग्रंथ छपे हैं

349
00:23:45,040 --> 00:23:45,760
उनका अध्ययन

350
00:23:45,760 --> 00:23:49,760
मैंने तो प्रभुपाद जी का कोई ग्रंथ है जिसमें ये लिखा हो जो इस से प्राप्त

351
00:23:49,760 --> 00:23:53,760
है। बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल भगवत गीता में उन्होंने बोला है। भागवतम में बोला

352
00:23:53,760 --> 00:23:57,840
है। चैतन्य चरितामृत में बोला है। वो मैं अभी

353
00:23:57,840 --> 00:24:02,240
मुझे इसका स्मरण नहीं है। लेकिन प्रभुपाद जी बोले हैं कि राम कृष्ण

354
00:24:02,240 --> 00:24:06,400
नरसिंह किसी एक की हम उपासना कर सकते हैं।

355
00:24:06,400 --> 00:24:10,400
नहीं नहीं शिव जी की भी कर सकते हैं। शिव जी की भी उपासना कर सकते हैं। सनातन गोस्वामी

356
00:24:10,400 --> 00:24:14,400
जी लिखे हुए हैं। ब्रद भागवतामृत्य में हमारे परंपरा के आचार्य हैं। अगर

357
00:24:14,400 --> 00:24:18,400
कोई शिव जी प्रभुपाद जी ने बोला है क्योंकि कुछ अंशों

358
00:24:18,400 --> 00:24:22,400
में मुझे लगता है कि हमारे जो इस या

359
00:24:22,400 --> 00:24:26,640
जो हमारा वैष्णव परंपरा है वो अनन्यता दिखाता है। तो हम

360
00:24:26,640 --> 00:24:30,880
लोग क्या करते हैं कि नहीं अनन्यता दिखाता है वो ठीक है मगर सिद्धांत तो बताना पड़ेगा ना

361
00:24:30,880 --> 00:24:34,960
हां सिद्धांत बता सकते हैं आप जैसे हम देखिए मैं अपनी बात बताऊं शंकराचार्य जी का शिष्य

362
00:24:34,960 --> 00:24:39,120
हूं मुझे क्या बताया गया हां पांचों रूप एक है अन्यता के

363
00:24:39,120 --> 00:24:43,360
लिए क्या करिए कि एक को आप ईश्वर के रूप में देखिए अन्यों को उनके परिकर

364
00:24:43,360 --> 00:24:47,440
के रूप में देखिए अन्यों से उनकी भक्ति मांग लीजिए अन्यों में भी अपने ही

365
00:24:47,440 --> 00:24:51,440
भगवान को देखिए कि देखिए यहां पर मेरे राम भगवती बनकर

366
00:24:51,440 --> 00:24:55,520
प्रकट हो गए यहां पे मेरे राम शिवजी बनकर प्रकट हो गए ये भाव रखिए भगवान

367
00:24:55,520 --> 00:24:59,520
के प्रति तत्वत सब एक हैं। है ना? पांचों एक हैं। तो

368
00:24:59,520 --> 00:25:01,200
ये तो हमें सिखाया गया। अनन्यता

369
00:25:01,200 --> 00:25:04,240
की रक्षा भी हो गई कि अपने भगवान को ही सब में देखो।

370
00:25:04,240 --> 00:25:08,400
अब मैं एक बार आलोपी मंदिर है वहां पर। मुझे आज की वो घटना याद है।

371
00:25:08,400 --> 00:25:12,480
बहुत थकने चूरने थक के चूरचूर हो गया था और उसके बाद

372
00:25:12,480 --> 00:25:16,800
जो है मैं पहुंचा वहां पर प्रयागराज में। गंगा

373
00:25:16,800 --> 00:25:21,040
स्नान करने के बाद। इतना थकान हो गई थी। मैं कई दिनों से यात्रा पे था।

374
00:25:21,040 --> 00:25:26,080
तो थकान हो गई थी। शरीर का रोम रोम मेरा कांप रहा था। और

375
00:25:26,080 --> 00:25:30,480
अब वहां पर आलोपी माता का मंदिर है वो जो शक्तिपीठ है वो हां

376
00:25:30,480 --> 00:25:34,480
तो किसी ने कहा आलोपी माता के दर्शन कर लो आए हो इतनी पास में खड़े हो

377
00:25:34,480 --> 00:25:38,480
वहीं पर चौराहे पर ही बाईपास पर आदि शंकराचार्य जी की वो भी है

378
00:25:38,480 --> 00:25:42,480
विग्रह लगा हुआ है वहां पर हम तो मैंने कहा चलो दर्शन कर

379
00:25:42,480 --> 00:25:46,560
लेते हैं तो आप विश्वास नहीं करेंगे कि वो ढम ढम ढम

380
00:25:46,560 --> 00:25:50,640
डम डम डम उनके मंदिर के पास जाते-जाते वहां आरती हो रही थी तो

381
00:25:50,640 --> 00:25:54,800
वहां वो नगाड़े बजने की आवाज शुरू हुई कि वो जो सारा सारा दर्द था

382
00:25:54,800 --> 00:25:59,280
मिटने लगा ढम ढम ढम ढम ढम ढम ऐसी गजब की

383
00:25:59,280 --> 00:26:03,360
वो स्वर सुनाई दिया दिव्यमय हो गया वातावरण एकदम सब बदलने

384
00:26:03,360 --> 00:26:07,600
लगा और जब मैंने माता मां भगवती के दर्शन किए इतने मतलब

385
00:26:07,600 --> 00:26:11,760
इतने मतलब वहां पर ऐसे दर्शन पाए मैंने एकदम ऐसा ही लग रहा था राम

386
00:26:11,760 --> 00:26:15,760
जी खड़े हो गए माता के रूप में और अश्रुत तक निकल आए थे उस दिन उनको देख

387
00:26:15,760 --> 00:26:19,440
के अब वो क्यों हुआ था वो मैं नहीं जानता मगर उस दिन ऐसी शांति

388
00:26:19,440 --> 00:26:23,680
मिली थी मां भगवती के दर्शन करके इतनी शांति यद्यपि वो मेरी ईस्ट

389
00:26:23,680 --> 00:26:27,920
नहीं है। मगर उन्होंने भी मुझ पर कृपा की और एक जो मां वाला उनका

390
00:26:27,920 --> 00:26:31,120
पार्ट होता है भगवती मां का तो उन्होंने वो निभाया। तो

391
00:26:31,120 --> 00:26:35,200
यह शिक्षा हमको मिलती है भगवतपाद आदि शंकराचार्य जी से प्राप्त

392
00:26:35,200 --> 00:26:39,200
होती है। मगर जब हम यह कहते हैं ना कि तुम वैष्णव

393
00:26:39,200 --> 00:26:43,200
हो इसलिए ऐसा मानो। तो वैष्णव भगवान विष्णु

394
00:26:43,200 --> 00:26:47,200
को स्वीकार करने से पहले हो तो ऐसा मानना है

395
00:26:47,200 --> 00:26:51,280
या फिर पहले हमें पूरी शिक्षा प्राप्त करनी है। फिर अपना चयन करना है कि हम वैष्णव

396
00:26:51,280 --> 00:26:55,280
बनेंगे कि शैव बनेंगे कि राम भक्त बनेंगे कि हनुमान भक्त बनेंगे। तो ये

397
00:26:55,280 --> 00:26:59,760
एक दिक्कत आती है। मतलब वैष्णवता को वैष्णव होने से पहले हम किसी पर कैसे

398
00:26:59,760 --> 00:27:03,920
थोप सकते हैं? हां थोप नहीं सकते। जैसे सामान्य व्यक्ति आ रहा है। अभी ना वह वैष्णव

399
00:27:03,920 --> 00:27:08,160
है ना शैव है। फिर भी हम कहे नहीं जो है शिव

400
00:27:08,160 --> 00:27:12,320
जी को तो भगवान का दास मानो। ऐसा उपदेश नहीं दे सकते हैं किसी सामान्य

401
00:27:12,320 --> 00:27:16,320
व्यक्ति को। हां क्योंकि अभी बन गया है। अभी तो उसको कुछ ज्ञान ही नहीं है।

402
00:27:16,320 --> 00:27:20,400
उसने उसने स्वीकार कर लिया है। जब वो आपकी परंपरा में दीक्षित हो

403
00:27:20,400 --> 00:27:24,480
जाए तब आप कहो कि अब आपका कर्तव्य है इस रूप में इस रूप में ही शिव जी

404
00:27:24,480 --> 00:27:28,720
को देखो। तब तो ठीक है मगर स्वतंत्र रूप से जो व्यक्ति है उसको सनातन

405
00:27:28,720 --> 00:27:33,120
ज्ञान देने की बजाय किसी देश काल परिस्थिति से प्रभावित ज्ञान देना

406
00:27:33,120 --> 00:27:37,120
ये तो ठीक नहीं है। देखो अपने संप्रदाय करते हैं। हां अपने संप्रदाय

407
00:27:37,120 --> 00:27:41,600
का विचार उसका प्रचार जी हर संप्रदाय का एक

408
00:27:41,600 --> 00:27:46,320
कर्तव्य है। जैसे रामानुज जी वैष्णव का वो अपने संप्रदाय अपने उपासना

409
00:27:46,320 --> 00:27:51,040
अपनी पद्धति का प्रचार करेंगे। आदि जगतगुरु शंकराचार्य जी अपने

410
00:27:51,040 --> 00:27:55,120
उसका प्रचार करेंगे। सिद्धांतों का अपने उपासना पद्धति का तो

411
00:27:55,120 --> 00:27:59,200
हर वैष्णव आचार्य की क्या है प्रचार करने का

412
00:27:59,200 --> 00:28:03,600
वो है अधिकार है करने से अब इसमें क्या है ना शुरुआत

413
00:28:03,600 --> 00:28:08,160
में पहले तो अपने ही संप्रदाय के विचार बताए जाएंगे

414
00:28:08,160 --> 00:28:12,320
अब व्यक्ति अगर जिज्ञासा करेगा मान लीजिए वो जिज्ञासा करता है कि

415
00:28:12,320 --> 00:28:16,560
मुझे क्या मैं शिव जी की उपासना कर सकता हूं हां फिर उसको बता देगा

416
00:28:16,560 --> 00:28:20,640
आप कर सकते हो ये आपकी इच्छा है आप देखो ये हमारे वैष्णव

417
00:28:20,640 --> 00:28:25,360
संप्रदाय हैं मतलब मतलब कहना चाहिए कि शिव जी और विष्णु जी में भेद बुद्धि

418
00:28:25,360 --> 00:28:29,360
ना रखना या ये कहना चाहिए कि शिव जी और विष्णु

419
00:28:29,360 --> 00:28:33,680
जी में भेद बुद्धि रखना ये सनातन सिद्धांत नहीं है। नहीं है बिल्कुल अपराध

420
00:28:33,680 --> 00:28:37,840
और ये हम तब कर रहे हैं जब कोई वैष्णव बन गया है। वैष्णव नहीं

421
00:28:37,840 --> 00:28:41,920
उसके बाद भी हम भेद नहीं रख रहे हैं। केवल हम उनको अरे व्यवहारिक

422
00:28:41,920 --> 00:28:46,080
रसगत भेद तो कर ही रहे हैं ना। रसत रसगत भेद तो कर ही रहे तो जो

423
00:28:46,080 --> 00:28:50,080
शिव और विष्णु में भेद करना ये सनातन सिद्धांत नहीं है

424
00:28:50,080 --> 00:28:54,160
ये पर्टिकुलर देश काल परिस्थिति से प्रभावित वैष्णव संप्रदाय का सिद्धांत है

425
00:28:54,160 --> 00:28:58,240
वो जब आपने वैष्णवता हासिल कर ली है वैष्णव आप हो गए हो डिसिप

426
00:28:58,240 --> 00:29:01,360
वो क्या कहते हैं डिसाइपल कहते हैं जब आप डिसाइपल हो गए

427
00:29:01,360 --> 00:29:05,440
हो तब जो है आप उस चीज को ग्रहण करो वरना आप सनातन सिद्धांत लो तो

428
00:29:05,440 --> 00:29:09,520
सनातन सनातन सिद्धांत यही है कि आप राधा कृष्ण की उपासना करना चाहते

429
00:29:09,520 --> 00:29:13,840
हो करो आप सीताराम की उपासना करना चाहते हो करो आप लक्ष्मी

430
00:29:13,840 --> 00:29:17,840
नारायण की उपासना करना चाहते हो करो। आप शिव पार्वती की उपासना

431
00:29:17,840 --> 00:29:21,840
करना चाहते हो करो। अरे सनातन सिद्धांत तो और भी है। भगवान कहते हैं गीता

432
00:29:21,840 --> 00:29:26,080
में याती देवता देवाने पित्त पितवता। अरे आप देवताओं

433
00:29:26,080 --> 00:29:30,160
की उपासना करते हो वो भी करो। नहीं मगर वो वहां ये तो बता रहे हैं कि करो वो भी मगर

434
00:29:30,160 --> 00:29:34,320
ये भी बता रहे हैं कि देवताओं से आपको मोक्ष प्राप्त। यस बिल्कुल वो करने को तो आप

435
00:29:34,320 --> 00:29:38,400
अब देखो भगवान ने सब कुछ बता दिया भगवत गीता में। उसके बाद का तो मैं अपनी मर्जी से लेकिन

436
00:29:38,400 --> 00:29:42,400
मूल बात यही है अगर मैं सार रूप में कहूं तो अगर कोई शिव पार्वती

437
00:29:42,400 --> 00:29:46,480
की उपासना करता है जी वो मुक्ति प्राप्त करेगा शिवलोक

438
00:29:46,480 --> 00:29:50,480
जाएगा कैलाश धाम जाएगा वहां से आगे कुछ बाकी तो नहीं कुछ

439
00:29:50,480 --> 00:29:54,560
वो आगे जाएगा नहीं क्योंकि उसकी अनन्यता उसकी निष्ठा शिव जी

440
00:29:54,560 --> 00:29:58,560
पर है नहीं मतलब वो मुक्त हो गया मुक्त हो गया मुक्त हो गया तो वो तो नहीं गोलोक

441
00:29:58,560 --> 00:30:02,720
की सेवा अभी बाकी नहीं नहीं मुक्त हो गया उसके लिए वही सर्वस्व है ना मतलब गोलोक की सेवा के बिना

442
00:30:02,720 --> 00:30:06,800
भी मुक्ति है बिल्कुल है जैसे हनुमान जी तो अयोध्या वासी है ना साक्षात उसके

443
00:30:06,800 --> 00:30:10,800
लिए जो है शिवलोक ही गोलोक है। सब कुछ है उसके लिए। सर्वस्व

444
00:30:10,800 --> 00:30:14,800
है। जैसे हनुमान जी के लिए अयोध्या सर्वस्व है। जी और गोपियों के लिए

445
00:30:14,800 --> 00:30:16,560
वृंदावन सर्वस्व है। जी जी

446
00:30:16,560 --> 00:30:20,800
और गरुड़ जी के लिए वैकुंठ सर्वस्व है। एक ड्रॉबैक रह गया कि इसन के द्वारा

447
00:30:20,800 --> 00:30:24,800
कौन सी किताब ऐसी है। प्रभुपाद जी की कौन सी चीज ऐसी है जिसमें उन्होंने

448
00:30:24,800 --> 00:30:29,040
कहा है कि शिव जी को भी मान सकते हो। शिव जी के द्वारा मुक्ति होगी। ये कहीं स्वीकार

449
00:30:29,040 --> 00:30:33,200
किया हो। ये नहीं। दूसरी बात आपने कहा कि सब नहीं मुझे अभी उन्होंने

450
00:30:33,200 --> 00:30:37,360
बताया। मैं आपको प्रमाण दूंगा। अभी मुझे स्मरण नहीं है। तो ये आप लोग ध्यान रखिएगा कि

451
00:30:37,360 --> 00:30:41,360
भैया जो है प्रभु जी हमें वो प्रमाण देंगे और हम उसको यहां पे

452
00:30:41,360 --> 00:30:45,520
लगा आपको मैंने सनातन गोस्वामी का तो प्रमाण दे दिया जो हमारे

453
00:30:45,520 --> 00:30:49,760
परंपरा के आचार्य हैं। वो कई मामलों में इस और गौडियम

454
00:30:49,760 --> 00:30:53,760
में ये भी गौ वो अलग विषय है। भेद है तो और

455
00:30:53,760 --> 00:30:57,920
दूसरी बात थोड़ा सा प्रभुपाद जी कहां पर ये बोले हैं मैं उसका प्रमाण

456
00:30:57,920 --> 00:31:02,000
आपको वो आप देंगे तो उससे थोड़ा मैच हो जाएगा क्योंकि इसके क्या है ना दोहरे अर्थ निकल

457
00:31:02,000 --> 00:31:06,160
रहे हैं। दोहरे अर्थ में दूसरा वाला व्यक्ति जो है नहीं सनातन गोस्वामी तो हमारे परंपरा

458
00:31:06,160 --> 00:31:10,160
के हैं। जीव गोस्वामी हमारे परंपरा के हैं। परपाजी के परंपरा के हैं ना कहते हो

459
00:31:10,160 --> 00:31:14,160
कि हम गौडिया वैष्णव हैं। मगर कई गौडिया वैष्णव ऐसे हैं जो कहते हैं कि इस

460
00:31:14,160 --> 00:31:18,160
हमसे नहीं है भाई। मैं तो मैंने कभी नहीं सुना ऐसा आज तक

461
00:31:18,160 --> 00:31:22,320
गौडिय वैष्णव हमारे हमसे बहुत परिचित हैं। कई लोग हैं। नहीं तो परिचित

462
00:31:22,320 --> 00:31:26,560
हमसे भी हैं। हां इसीलिए [हंसी] गौर हमारे हमारा

463
00:31:26,560 --> 00:31:30,640
जो इस संस्था है वो गौ मठ से प्रकट हुआ है। क्या

464
00:31:30,640 --> 00:31:32,080
है कि जैसे

465
00:31:32,080 --> 00:31:36,160
गौड़िया मठ की बात तो ऐसे सुनने में आई थी कि गौड़िया वैष्णव संप्रदाय से मिलती जुलती

466
00:31:36,160 --> 00:31:40,400
एक संस्था डाली गई थी। गौ वैष्णव मठ गड मठ

467
00:31:40,400 --> 00:31:44,400
जो गौ मठ की स्थापना शपाद मतलब वो इसलिए डाला

468
00:31:44,400 --> 00:31:48,480
गया था कि लोग यह सोचना भूल जाए कि प्रामाणिक है कि नहीं समझ रहे हैं गौडिया

469
00:31:48,480 --> 00:31:52,640
वैष्णव परंपरा है और गौडिया वैष्णव मठ एक संस्था डाल दी गई

470
00:31:52,640 --> 00:31:56,800
अब उस पर कोई क्लेम नहीं कर पाया नहीं उसने ध्यान दिया सोचा कि अच्छा है प्रचार कर

471
00:31:56,800 --> 00:32:00,800
गौ अब आज ये लोग भूल ही गए कि भैया अब हम लोग गौडिया वैष्णव

472
00:32:00,800 --> 00:32:04,960
मठ से निकल के आ रहे हैं ना कि गौडिया वैष्णव परंपरा से नहीं नहीं गौ मठ

473
00:32:04,960 --> 00:32:09,120
और गौ वैष्णव परंपरा दोनों दोनों एक ही है अलग एक नित्यानंद वो

474
00:32:09,120 --> 00:32:13,200
नित्यानंद परिवार शाखाएं हैं बहुत सारी नित्यानंद परिवार के हैं गौडिया वैष्णव

475
00:32:13,200 --> 00:32:17,200
जैसे राधा रमण वाले हैं गौडिया वैष्णव परंपरा के नित्यानंद परिवार के एक

476
00:32:17,200 --> 00:32:20,320
हैं

477
00:32:20,320 --> 00:32:24,640
रघुनाथ दास शास्त्री जी आचार्य जी उन्होंने बहुत स्पष्ट कहा है कि इस

478
00:32:24,640 --> 00:32:28,880
जो है बहुत सारी शास्त्री वो उनका विचार हो सकता है बट

479
00:32:28,880 --> 00:32:33,280
गौ मठ प्रामाणिक आचार्य ये आपके लिए शोध का विषय है बाकी

480
00:32:33,280 --> 00:32:38,000
गौ मठ इस्कॉन और गौ वैष्णव परंपरा एक ही है।

481
00:32:38,000 --> 00:32:42,080
जी ने यह बात स्वीकार है कि नहीं यह जो

482
00:32:42,080 --> 00:32:46,160
शिव जी की भक्ति पर भी मोक्ष है। तो इस बारे में आप मुझे प्रमाण दे दीजिएगा।

483
00:32:46,160 --> 00:32:50,640
मैं इस वीडियो में लगा दूंगा। अब आगे बात ये आती है कि जैसे केशवदास जी हैं।

484
00:32:50,640 --> 00:32:54,800
मोहन प्रभु हैं कोई आपके यहां के अमोग लीला है। ये लोग बहुत

485
00:32:54,800 --> 00:32:58,800
हास्य वाला वातावरण इस पर टिप्पणी नहीं करो। नहीं मैं वो

486
00:32:58,800 --> 00:33:02,880
नहीं कह रहा। ये लोग कई बार इनमें भेद करते हैं और कहीं ना कहीं शिव जी की

487
00:33:02,880 --> 00:33:07,120
चीजों को जो है उपहास पूर्वक बताते हैं कि भाई वो दास हैं या उन

488
00:33:07,120 --> 00:33:11,120
और एक बार तो मैंने देखा था कि अमुक लीला जी का एक इंटरव्यू आया था जिसमें वो

489
00:33:11,120 --> 00:33:15,120
कह रहे थे कि भाई अगर शिव और विष्णु एक हैं तो क्या पार्वती

490
00:33:15,120 --> 00:33:19,200
पार्वती के पति वही है क्या विष्णु जी तो फिर मैंने उनको कहा था कि

491
00:33:19,200 --> 00:33:23,200
ऐसे तो कृष्ण और राम भी एक हैं तो सीता माता के पति कृष्ण

492
00:33:23,200 --> 00:33:27,200
कहोगे क्या आप मतलब वो ये कहने लगे थे अगर शिव और विष्णु एक है तो पार्वती

493
00:33:27,200 --> 00:33:31,200
के पति आप विष्णु को कहने लगोगे तो वो व्यवहार में

494
00:33:31,200 --> 00:33:35,920
वो जो आध्यात्मिक वो उनका विचार है। उनका विचार का समर्थन

495
00:33:35,920 --> 00:33:40,400
उनके विचार की व्याख्या वो स्वयं कर पाएंगे।

496
00:33:40,400 --> 00:33:44,800
आप सहमत नहीं है। मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं कर पाऊंगा।

497
00:33:44,800 --> 00:33:48,800
अगर वो अगर वो शिव जी को भगवान नहीं मान रहे हैं या शिव जी

498
00:33:48,800 --> 00:33:52,800
की भक्ति करने से मोक्ष नहीं मिलता। मुक्ति दाता नहीं मान मुक्तिदाता नहीं मान रहे

499
00:33:52,800 --> 00:33:56,800
तो हम इसके पक्ष में नहीं है। हम हम इसके समर्थन में नहीं

500
00:33:56,800 --> 00:34:00,960
है। हां तो कई बार कई लोग हैं केशवदास जी हैं और भी खैर

501
00:34:00,960 --> 00:34:05,040
अच्छा जो एक इस के हमारा वो हुआ था इस

502
00:34:05,040 --> 00:34:09,440
के ही वो थे वो इंदौर के जोनल सेक्रेटरी उनका

503
00:34:09,440 --> 00:34:13,440
नाम नहीं याद है। महामना दास हम काफी वृद्ध

504
00:34:13,440 --> 00:34:16,880
थे वो सीधे प्रभुपाद जी के नहीं नहीं वो मुझे उस पर चर्चा नहीं करनी है।

505
00:34:16,880 --> 00:34:20,960
अब ये तो इसका हो गया ना चलिए ठीक है। तो इसमें अब क्योंकि क्या

506
00:34:20,960 --> 00:34:25,200
है ना उन लोगों का विषय उनसे पूछोगे तो ज्यादा क्लियर होगा जो

507
00:34:25,200 --> 00:34:29,280
ऐसे बयान दे रहे हैं या जो ऐसी बातें कर रहे हैं आएगी ना मैं वही उसी

508
00:34:29,280 --> 00:34:34,240
पे आ रहा हूं देखो मैं भी इस को सी हूं तो आप मुझसे जो पूछ रहे हो हम

509
00:34:34,240 --> 00:34:38,240
शायद मुझे लग रहा है कि आप मेरी बातों से विचारों से सहमत होंगे हम तो मैं

510
00:34:38,240 --> 00:34:42,400
अपने विचार अपना कुछ बातें हैं सहमत है कुछ बातें ऐसी है जो अभी बाकी

511
00:34:42,400 --> 00:34:43,920
है और कुछ बातों से सहमत भी हैं

512
00:34:43,920 --> 00:34:48,080
जो जो मेरा अनुभव है जो मेरा अध्ययन है जो

513
00:34:48,080 --> 00:34:52,160
मेरा विचार है। मैंने प्रस्तुत किया। हां। अब मैं अपने विचारों

514
00:34:52,160 --> 00:34:56,240
की व्याख्या तो कर सकता हूं। हम लेकिन जो दूसरा व्यक्ति कब क्या कहां

515
00:34:56,240 --> 00:35:00,720
क्या बोल रहा है हम उसकी सफाई उसका इसमें एक दिक्कत आएगी

516
00:35:00,720 --> 00:35:04,800
हम कि आप भी स्कॉन से हो। हां और अमोग लीला भी स्कॉन से

517
00:35:04,800 --> 00:35:09,040
है। मान लीजिए वो कह रहे हैं ए। आप कह रहे हो बी। मैंने सुना नहीं है ना।

518
00:35:09,040 --> 00:35:13,040
क्लियर नहीं सुना है उनके लेक्चरों को। मैं सुन नहीं पाता हूं। तो मैं आपको बता रहा हूं

519
00:35:13,040 --> 00:35:17,520
ना कि वो ऐसा कह रहे हैं। अब कैसे कह रहे हैं? क्या कह रहे हैं? कब कह रहे हैं?

520
00:35:17,520 --> 00:35:21,840
किस आप इसलिए हां मैं अगर एक सिद्धांत बोलूं

521
00:35:21,840 --> 00:35:25,920
शिव जी को अगर वह मुक्ति दाता नहीं मानते हैं

522
00:35:25,920 --> 00:35:30,080
हम तो मैं उसका समर्थन नहीं करता तो दिक्कत दिक्कत ये है कि

523
00:35:30,080 --> 00:35:34,160
देखिए शिव जी को अगर वैष्णव मान रहे हैं एक पक्ष में वो तो ठीक है वो

524
00:35:34,160 --> 00:35:38,320
अच्छा है हां लेकिन मुक्ति दाता नहीं मान रहे हैं हां वो कह रहे हैं कि शिव जी की पूजा

525
00:35:38,320 --> 00:35:42,480
करने से मुक्ति प्राप्त नहीं होगी वो मेरे मैं उसका समर्थन इस विचार में नहीं

526
00:35:42,480 --> 00:35:48,480
करता हूं तो फिर इसमें एक दिक्कत आती है कि इस से ही वो भी हैं

527
00:35:56,400 --> 00:36:00,480
किसकी बात को मान लिया जाए कि स्कॉन यह मानता है कि यह मानता है क्या

528
00:36:00,480 --> 00:36:04,800
कहता है इस कैसे माना जाए जो प्रभुपाद जी बोलते हैं जो हमारे गौ

529
00:36:04,800 --> 00:36:09,040
वैष्णव बोलते हैं वो हमको मानना है तो प्रभुपाद जी तो अभी नहीं है ना यहां पे बताने के लिए

530
00:36:09,040 --> 00:36:13,360
उनके ग्रंथों में है उनके उनके ग्रंथों के आधार पे ही वो कुछ बोल रहे हैं ना

531
00:36:13,360 --> 00:36:17,440
प्रमाण अगर वो ऐसा बोल रहे हैं तो कुछ प्रमाण दें तब ना माने तो या

532
00:36:17,440 --> 00:36:21,600
हमारे गौ आचार्यों के ग्रंथों से या प्रभुपाद के ग्रंथों से कुछ

533
00:36:21,600 --> 00:36:25,680
ऐसा प्रमाण दे तो चीज के ना होने का प्रमाण नहीं आवश्यक होता है किसी चीज

534
00:36:25,680 --> 00:36:29,680
के होने का प्रमाण आवश्यक होता है। अगर वो कह रहे हैं कि शिव की वो जब

535
00:36:29,680 --> 00:36:33,760
कह रहे हैं ना अगर वो कह रहे हैं किस आधार पर कह रहे हैं मैं बता

536
00:36:33,760 --> 00:36:37,760
तो रहा हूं जैसे शिव की भक्ति से मोक्ष नहीं मिलेगा। किस आधार

537
00:36:37,760 --> 00:36:41,920
पर कह रहे हैं? सुनिए तो तो वहां पर विष्णु की भक्ति कृष्ण की भक्ति से मोक्ष

538
00:36:41,920 --> 00:36:46,000
तो लिखा है। ग्रंथों में साफ-साफ वो तो वैष्णव तो बोलेंगे ही। सुनिए तो शास्त्र

539
00:36:46,000 --> 00:36:50,080
ही बोल रहे हैं। नहीं उनके ग्रंथों में लिखा है तो वो उस बोल रहे हैं। मगर यदि कोई कह

540
00:36:50,080 --> 00:36:54,160
रहा है कि शिव की भक्ति से भी मिलेगा। हां तो उसको प्रमाण देना होगा

541
00:36:54,160 --> 00:36:58,240
कि शिव की भक्ति से मिलने के प्रमाण ये है। तो प्रमाण वो प्रमाण तो मैंने आपको

542
00:36:58,240 --> 00:37:02,480
दे दिया सनातन गोस्वामी जी का हमारे ग वैष्ण के ये मानता है कि नहीं

543
00:37:02,480 --> 00:37:06,640
इस मतलब प्रभुपाद जी मैं तो प्रभुपाद जी को मानता हूं। इस

544
00:37:06,640 --> 00:37:10,720
को नहीं मानते नहीं इस के फाउंडर सारे प्रभुपाद जी है ना नहीं तो भाई

545
00:37:10,720 --> 00:37:11,600
हमें क्या पता

546
00:37:11,600 --> 00:37:16,640
इस का कोई व्यक्ति विशेष क्या बोल रहा है वो मेरे लिए प्रमाण सुनिए इस

547
00:37:16,640 --> 00:37:20,720
के द्वारा ही हम प्रभुपाद जी को जान रहे हैं इस की किताबों के द्वारा ही हम उनको जान

548
00:37:20,720 --> 00:37:24,720
रहे हैं इस आपको प्रोवाइड करा रहा है तो इस मानता है कि नहीं ये आपको

549
00:37:24,720 --> 00:37:28,800
बताना पड़ेगा क्योंकि इस के माध्यम से हम प्रभुपाद जी को जान रहे हैं। बिल्कुल

550
00:37:28,800 --> 00:37:32,960
इस के कोई व्यक्ति विशेष अ अगर अपूर्ण अध्ययन किया

551
00:37:32,960 --> 00:37:37,120
हो या कुछ ऐसे बोल रहे हैं तो उसका समर्थन मैं नहीं करता आपको वो प्रमाण

552
00:37:37,120 --> 00:37:41,200
देना होना होगा ना कि इस यहां पे क्लेम कर रहा है कि शिव की भक्ति से भी

553
00:37:41,200 --> 00:37:45,520
मुक्ति मिलेगी हां मैं दूंगा मैं दूंगा आपको मैं प्रभुपाद के ग्रंथों

554
00:37:45,520 --> 00:37:49,760
से आपको दूंगा और एक बात ये भी आती है कि यदि आपको

555
00:37:49,760 --> 00:37:53,840
आपका ये मानना है कि जो ऐसे लोग हैं जो ये गलत

556
00:37:53,840 --> 00:37:57,840
बात बोलते हैं इसकी ओर से मंचों पे खड़े हो करके बोलते

557
00:37:57,840 --> 00:38:02,160
हम तो इस इनको प्रोत्साहित क्यों कर रहा है? उसे इनको हटाना

558
00:38:02,160 --> 00:38:06,240
चाहिए इनके पद से। जैसे कि देखो सुनिए तो जैसे कि विवेकानंद के बारे

559
00:38:06,240 --> 00:38:10,320
में इन्होंने अमोग लीला जी ने एक टिप्पणी कर दी थी विवेकानंद जी के बारे

560
00:38:10,320 --> 00:38:14,320
में। ठीक है? तो इस ने संज्ञान लिया हम और इस ने उन्हें

561
00:38:14,320 --> 00:38:18,480
एक महीने के लिए लगा दिया लगाम। हम अब इस इस

562
00:38:18,480 --> 00:38:22,560
इन्होंने अमोग लीला ने आदि शंकराचार्य जी

563
00:38:22,560 --> 00:38:26,640
की मरती हुई मां पर एक्टिंग की। हम ठीक है? हम् और वह

564
00:38:26,640 --> 00:38:30,640
एक्टिंग कर करके बता रहे हैं कि शंकर तू आ गया शंकर तू

565
00:38:30,640 --> 00:38:34,640
मुझे भगवान के स्वरूप का वर्णन कर दे तो पहले मजाक

566
00:38:34,640 --> 00:38:39,040
बना रहे हैं हंस रहे हैं। वहां लोग बैठ के ठाके लगा रहे हैं। नहीं मेरा विषय वो नहीं है।

567
00:38:39,040 --> 00:38:43,040
पर वो या कोई और नहीं देखिए मेरा विषय यह है कि इस क्या सही

568
00:38:43,040 --> 00:38:47,120
चीजें फैला रहा है कि नहीं फैला रहा है। अब वो प्रभुपाद जी की चीजें हैं कि नहीं है

569
00:38:47,120 --> 00:38:51,520
वो डजंट मैटर मेरे लिए। मैं ये कह रहा हूं कि क्या इस शास्त्र है सनातन

570
00:38:51,520 --> 00:38:55,520
धर्म फैला रहा है या कुछ और फैला रहा है? अधिकतर लोग इस के जो अनुयाय

571
00:38:55,520 --> 00:38:59,840
हैं वो सनातन धर्म का ही वास्तविक प्रचार कर रहे हैं। अधिकतर लोग

572
00:38:59,840 --> 00:39:04,160
कुछ अपवाद हो सकते हैं। कुछ ऐसे लोग हो सकते हैं जो जिनका अपूर्ण

573
00:39:04,160 --> 00:39:08,240
ज्ञान हो जो कर जो कर रहे हैं उस पे इस कौन संज्ञान

574
00:39:08,240 --> 00:39:12,560
क्यों नहीं ले रहा है? वो तो मैनेजमेंट का विषय है। वो मेरा विषय है।

575
00:39:12,560 --> 00:39:16,960
यदि नहीं ले रहा है तो उतने अंश में तो फिर वो गलत कर रहा है ना। हां गलत है। अगर कोई गलत प्रचार

576
00:39:16,960 --> 00:39:21,040
कर रहा है, कोई गलत फिलोसफी बोल रहा है, अगर उस पर कोई संज्ञान नहीं ले रहा है

577
00:39:21,040 --> 00:39:25,200
तो गलत है। वो तो है ही। तो इस को ऐसा नहीं करना चाहिए। ये चीजें

578
00:39:25,200 --> 00:39:29,440
आपको समझ में आ रही होंगी। खैर अब थोड़ा सा आगे बढ़ते हैं। अच्छा कई

579
00:39:29,440 --> 00:39:33,520
बार ये भी सुनने में आता है कि इस द्वारा जो है राम और कृष्ण

580
00:39:33,520 --> 00:39:38,000
में भी भेद किया जाता है। यद्यपि मैंने वो वीडियो देखा है जिसमें

581
00:39:38,000 --> 00:39:41,840
प्रभुपाद जी ऐसा बोल रहे हैं। अच्छा इस पे आने से पहले मैं एक बात पूछूंगा।

582
00:39:41,840 --> 00:39:46,400
श्रीमद् भागवतम में स्पष्ट रूप से लिखा है कि

583
00:39:46,400 --> 00:39:50,640
जो लोग शिव के नाम को भगवान श्री कृष्ण के नाम के समान समझते

584
00:39:50,640 --> 00:39:54,720
हैं वो लोग मूर्ख हैं और वो लोग ऐसा करना

585
00:39:54,720 --> 00:39:58,720
10 अपराधों में से एक अपराध है। तो क्या ये लाइन गलत है? यह तो मैंने

586
00:39:58,720 --> 00:40:03,040
आपको समझा दिया विश्वनाथ चौथी ठाकुर जी के माध्यम से हां

587
00:40:03,040 --> 00:40:07,040
अह जो दसनामा अपराध है पद्म पुराण में इसका वर्णन है उसी

588
00:40:07,040 --> 00:40:11,360
की तो व्याख्या हमने पहले की है ना वो जो जीव अगर शिव शिव के रूप में है

589
00:40:11,360 --> 00:40:15,440
हां अगर उस पोस्ट में है मगर आपके यहां तो कहा जाता है कि कोई भी जीव ब्रह्मा बन

590
00:40:15,440 --> 00:40:19,440
सकता है मगर शिव नहीं बन सकता बट विश्वनाथ ठाकुर ऐसा वर्णन किए हैं

591
00:40:19,440 --> 00:40:23,840
नहीं नहीं आपके यहां ये कहा जाता है गलत कहा जाता है कि सही हमारे

592
00:40:23,840 --> 00:40:28,080
यहां ऐसा मैंने सुना नहीं अभी तक ऐसा नहीं जो आपके यहां आगे प्रामाणिक

593
00:40:28,080 --> 00:40:32,240
लोग हैं जो अगर जो कह रहे हैं वो गलत होंगे इस मामले में

594
00:40:32,240 --> 00:40:36,400
क्योंकि विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर जो जो बता रहे हैं

595
00:40:36,400 --> 00:40:40,400
आपको नहीं आप ऐसी संस्था का साथ दे रहे हो जो कई गलत लोगों का साथ दे रही

596
00:40:40,400 --> 00:40:44,560
है अपने मन में अध्यक्ष बना करके बिठा रही हो देखो मेरा वो विषय

597
00:40:44,560 --> 00:40:48,800
नहीं है कोई कौन क्या कर रहा है इस में बहुत सारे अच्छे प्रचारक भी हैं

598
00:40:48,800 --> 00:40:52,800
अच्छे सिद्धांत जानने वाले इस के बनार भी तो है भाई साहब और अच्छा बोलने वाले

599
00:40:52,800 --> 00:40:56,880
हैं हम भी इस में तो मुझे लगता है कि शायद आप भी मेरी

600
00:40:56,880 --> 00:41:00,880
बातों से सहमत हो ही रहे होंगे कुछ बहुत जी जी तो

601
00:41:00,880 --> 00:41:05,040
नहीं मेरा कहने का मतलब है कि फिर इस ही क्यों फिर तो इस के बाहर भी बहुत कुछ

602
00:41:05,040 --> 00:41:09,040
है अच्छा अच्छा इसलिए है ना कि इस एक गौ वैष्णव संप्रदाय का

603
00:41:09,040 --> 00:41:13,200
ब्रांच है तो इसीलिए वो गलत कर रहा है ना जो गलत कर रहा है वो

604
00:41:13,200 --> 00:41:17,280
गलत है उसका विरोध होना चाहिए और उसको रोकना चाहिए जो विरोध

605
00:41:17,280 --> 00:41:21,520
कर रहे हैं वो ठीक मानते हो आप अब आप किस रूप में विरोध कर रहे हो क्या विरोध

606
00:41:21,520 --> 00:41:25,520
जिन बातों का आपसे पूछ रहे हैं आप कह रहे हैं जो आपका विरोध है जो मान लो

607
00:41:25,520 --> 00:41:29,520
आपका विरोध है जी जिनसे भी आपका विरोध है एक बार आप उनके

608
00:41:29,520 --> 00:41:32,640
पास जाकर ना और अच्छे से इसको वो कर सकते हो

609
00:41:32,640 --> 00:41:37,120
आप आप अमोग लीला जी से हमको समय दिलवा दीजिए हां मैं मैं कोशिश करूंगा

610
00:41:37,120 --> 00:41:41,200
बताने का जी जी कि ताकि क्योंकि वो उन्होंने अपना विचार रखा

611
00:41:41,200 --> 00:41:45,280
हुआ है। अपने तरीके से उन्होंने आपको समझाया है। लोगों को समझाया है।

612
00:41:45,280 --> 00:41:49,440
तो मुझे लगता है कि वो अपनी बात को ज्यादा अच्छे से आपको हम

613
00:41:49,440 --> 00:41:50,640
समझा पाएंगे।

614
00:41:50,640 --> 00:41:55,040
और आप मेरे पास आए तो मैं तो जो प्रभुपाद के सिद्धांत

615
00:41:55,040 --> 00:41:59,120
हैं जो हमारे गौ वैष्णव के सिद्धांत हैं मैं अपने

616
00:41:59,120 --> 00:42:03,200
अनुभव अपने अध्ययन अपने उससे आपको बता अपने से कुछ

617
00:42:03,200 --> 00:42:07,360
मत बताइए आप प्रमाण दीजिए प्रमाण ही वो शिव जी को कहां उन्होंने मुक्ति

618
00:42:07,360 --> 00:42:11,840
वाला माना प्रमाण ही दे रहा हूं आपको एक प्रमाण तो आपको मैंने दिया ही सनातन गोस्वामी

619
00:42:11,840 --> 00:42:16,080
इसमें इसमें ये फेल हो गया ना मामला आप जो ये कह रहे हैं कि जो ब्रह्मा

620
00:42:16,080 --> 00:42:20,320
जी की पोस्ट पे चला जाएगा उसके लिए मना किया है मगर शिव जी की पोस्ट

621
00:42:20,320 --> 00:42:24,320
पे तो कोई जा ही नहीं सकता। ऐसा बताया जाता है इस में हमें शिव जी की पोस्ट पे

622
00:42:24,320 --> 00:42:28,720
अच्छा इस [हंसी] की दृष्टि से फेल हो गया है। ऐसा बोल रहे हो? हां देखो विश्वनाथ

623
00:42:28,720 --> 00:42:32,880
जी हमारे लिए प्रमाण है। हमारे आचार्य है ना गौ वैष्णव में वो क्या

624
00:42:32,880 --> 00:42:36,960
बोल रहे हैं वो महत्वपूर्ण है। कोई आलतू-फा फालतू व्यक्ति क्या बोल रहा है वो महत्वपूर्ण नहीं है मेरे लिए।

625
00:42:36,960 --> 00:42:40,960
इस बोल रहा है ना? अब वो अज्ञानी होंगे जो बोल रहे होंगे ऐसा। उन्होंने पढ़ा नहीं होगा।

626
00:42:40,960 --> 00:42:45,120
यानी कि इतने अंशों में आप इस के उन लोगों के साथ नहीं है। हां अगर वो शास्त्र

627
00:42:45,120 --> 00:42:49,120
के हटकर कुछ बोल रहे हैं तो मैं उनके पक्ष में कैसे हो सकता? अगर नहीं वो यह

628
00:42:49,120 --> 00:42:53,200
बोल रहे हैं यह वाली बात मैंने आपको बता दी वो बोल रहे हैं नहीं वो ठीक है लखनऊ

629
00:42:53,200 --> 00:42:57,280
का एक व्यक्ति है पर श्यामदार कोई भी हो वो बोल रहे हैं शिव जी की पोस्ट पे कोई

630
00:42:57,280 --> 00:43:01,680
नहीं जा सकता कोई भी व्यक्ति अच्छा विष्णु की पोस्ट पे लोग जा सकते नहीं जा सकते विष्णु

631
00:43:01,680 --> 00:43:05,680
के पोस्ट को कोई नहीं ले सकता शिव जी की पोस्ट पे जा सकते हैं विश्वनाथ जी ऐसा वर्णन

632
00:43:05,680 --> 00:43:09,680
किए हैं शिव जी की पोस्ट पे जा सकते हैं कभी-कभी शिव के पद पर जीव भी

633
00:43:09,680 --> 00:43:13,680
बैठता है बहुत डिटेल में वर्णन नहीं किया हुआ है वो प्रमाण मैं आपको

634
00:43:13,680 --> 00:43:17,840
भेज दूंगा उसको स्क्रीन में आप लगा देना जी और नहीं मुख्य मुझे

635
00:43:17,840 --> 00:43:22,000
चाहिए होगा कि प्रभुपाद जी ने माना है कि नहीं क्योंकि वैष्णव संप्रदाय और

636
00:43:22,000 --> 00:43:26,000
इस में काफी सारे अंतर आ कोई अंतर नहीं है अगर आप ग्रंथों

637
00:43:26,000 --> 00:43:30,000
को देखिए आज आपने मना किया है कि वर्णाश्रम पर बात नहीं करेंगे नहीं तो

638
00:43:30,000 --> 00:43:34,160
मैं अभी वर्णाश्रम दूंगा तो [हंसी] आप आपको जो गौ वैष्णव संप्रदाय से अंतर

639
00:43:34,160 --> 00:43:38,160
समझ में आ जाएगा नहीं नहीं ऐसा कुछ नहीं है वर्णाश्रम पर मैं इसलिए चर्चा नहीं करना चाहता हूं कि

640
00:43:38,160 --> 00:43:42,240
उस पर बहुत सारे कंट्रोवर्सी विरोधाभास हो

641
00:43:42,240 --> 00:43:46,480
जाते हैं बाकी जो ये विषय है जो

642
00:43:46,480 --> 00:43:50,800
शिव जी का विषय है। हां जी। तो मैंने आपको समझा दिया है।

643
00:43:50,800 --> 00:43:55,040
हां प्रमाण आप दीजिएगा कि प्रभुपाद जी ने कहां माना है। उनको मुक्ति दाता

644
00:43:55,040 --> 00:43:59,280
हम और और ये वाली लाइन में भी आप ये कह रहे हैं कि वहां पे

645
00:43:59,280 --> 00:44:03,280
जीव रूप वाले शिव जी के लिए मना किया गया है। मतलब आपका कहने का

646
00:44:03,280 --> 00:44:07,280
मतलब दूसरा प्रश्न था एक तो भेद अभेद वाला। मैंने लास्ट बात ये पूछी

647
00:44:07,280 --> 00:44:11,600
ना आपसे कि अलग मानना और एक मानना। नहीं नहीं लास्ट बात मैंने यही पूछी

648
00:44:11,600 --> 00:44:16,160
आपसे कि भागवतम में भाष्य करते समय जो उन्होंने ये

649
00:44:16,160 --> 00:44:20,320
भागवतम में कहां पर लिखा 25 तीन 1525 में ऐसा लिखा हुआ

650
00:44:20,320 --> 00:44:24,240
है

651
00:44:24,240 --> 00:44:30,240
श्रीमद् भागवतम

652
00:44:30,400 --> 00:44:34,560
हिंदी वाला खुल गया हां यहां पर नेट चल नहीं पा रहा

653
00:44:34,560 --> 00:44:39,440
है

654
00:44:39,440 --> 00:44:43,440
अरे सीधे Google पे डाल देते। Google नहीं Google में कई सारे वो वेदाभेश आता है

655
00:44:43,440 --> 00:44:49,440
ना? नहीं नहीं इसमें आपका ही है वो वेदाभेश इसमें आ जाएगा वो

656
00:44:50,480 --> 00:44:51,680
उसमें क्या लिखा है?

657
00:44:51,680 --> 00:44:55,760
क्या लिखा है उसने बोला? 10 अपराध बताए जा रहे हैं। ऐसे 10 अपराध हैं जिनको

658
00:44:55,760 --> 00:44:59,760
नहीं करना चाहिए। उसमें से शिव और विष्णु को शिव

659
00:44:59,760 --> 00:45:03,920
काली या दुर्गा के नाम को श्री कृष्ण के नाम के समान समझना क्योंकि ये सभी

660
00:45:03,920 --> 00:45:07,920
समान है। ऐसा सोचने वाले मूर्ख हैं। ऐसा करना अपराध है। हां मूर्खता तो है। अगर

661
00:45:07,920 --> 00:45:11,920
कोई जीव वहां बैठा है जो विश्वनाथ जी बोल रहे हैं कि उनको भगवान के समान समझ रहे

662
00:45:11,920 --> 00:45:16,560
हो वो तो मूर्खता है। वो तो जीव है ना। अगर वो भगवान बैठे हैं। ये जीव वाली बात

663
00:45:16,560 --> 00:45:20,560
प्रभुपाद जी ने मानी है। ये कहां से प्रमाण मिलेगा? परपाद जी जो लिख

664
00:45:20,560 --> 00:45:24,800
रहे हैं ना वो वहां पर एक पक्ष लिख रहे हैं। इतना विस्तार से

665
00:45:24,800 --> 00:45:28,800
उन्होंने नहीं समझाया। भाष्य करते समय भी विस्तार से नहीं

666
00:45:28,800 --> 00:45:32,960
लिखेंगे तो कब लिखेंगे? वो भक्तों के लिए वो व्याख्या है प्रभुपाद जी की।

667
00:45:32,960 --> 00:45:37,280
अगर विस्तार से समझना है। प्रभुपाद जी अपने ग्रंथों में लिखे हुए हैं। किसी को बहुत विस्तार

668
00:45:37,280 --> 00:45:42,000
से समझना है तो सनातन गोस्वामी जी की ग्रंथ पढ़ें। विश्वनाथ

669
00:45:42,000 --> 00:45:46,000
ठाकुर जी के ग्रंथों को पढ़ें विस्तार से। क्योंकि प्रभुपाद जी का इतना समय नहीं

670
00:45:46,000 --> 00:45:50,000
था। वो प्रचार भी कर रहे थे। नहीं मगर उन्होंने सारे ग्रंथों

671
00:45:50,000 --> 00:45:54,080
पर नहीं किया मगर जिस पर किया है तो उन्होंने 18 भागों में किया।

672
00:45:54,080 --> 00:45:58,160
इसमें जो उन्होंने अनुवाद किया ना सबसे वृहद व्याख्या तो उन्होंने ही की है भागवतम की।

673
00:45:58,160 --> 00:46:02,160
नहीं नहीं बहुत विस्तार से भी नहीं किया है। उनसे बड़ी व्याख्या है कोई? हां हां

674
00:46:02,160 --> 00:46:06,160
विश्वनाथ ठाकुर जी की है। कितनी है? कितना? सारा अर्थ दर्शनीय टीका है।

675
00:46:06,160 --> 00:46:06,800
बहुत विस्तार से

676
00:46:06,800 --> 00:46:10,800
भागवत पे है। भागवत पर है। अच्छा विश्वनाथ। उन्होंने ये माना है कि

677
00:46:10,800 --> 00:46:14,800
जीव रूप वाले शिव जी जो होते हैं उनको जीव रूप वाले शिव ब्रह्मा को

678
00:46:14,800 --> 00:46:19,040
अगर समान समझेंगे तो वो अपराध है। ये स्वीकार किया है।

679
00:46:19,040 --> 00:46:21,760
और जो

680
00:46:21,760 --> 00:46:25,760
जीव रूप वाले शिव जी नहीं है उनको अलग समझेंगे

681
00:46:25,760 --> 00:46:30,240
तो वो अपराध है। अच्छा एक चीज और आ रही थी शिव जी वाली आप कह रहे हैं कि शिवजी

682
00:46:30,240 --> 00:46:34,480
को जो है मत समझो। सदा शिव जो है वो तो भगवान है। ही विश्वनाथ

683
00:46:34,480 --> 00:46:38,560
जी जैसा बोल रहे हैं। सदा शिव स्वयं भगवान है। यहां हां तो सदा शिव जी के कई रूप है। तो सदा

684
00:46:38,560 --> 00:46:43,200
शिव किस सदा शिव की बात कर रहे हैं? जो परम भूम में है यानी बैकुंठ में

685
00:46:43,200 --> 00:46:47,200
जो बिरजा के उस पार जो सदाशिव धाम है। शिव पार्वती

686
00:46:47,200 --> 00:46:51,200
सदा शिव धाम मतलब पार्वती वाले जो शिव जी हैं सदा वो

687
00:46:51,200 --> 00:46:55,520
मुक्ति दाता हैं। वो मुक्ति कौन से वाले नहीं है? नहीं मुक्ति

688
00:46:55,520 --> 00:46:59,600
दाता वही है। एक ही थे शिव और दो शिव कहां से आ गए? नहीं आपने कहा ना कि जो वो

689
00:46:59,600 --> 00:47:03,680
वाले जो शिव जी हैं नहीं सुनिए आपने ये कहा ना कि जो शिव और सदा शिव

690
00:47:03,680 --> 00:47:08,000
दो रूप तो शिव को अगर आप मुक्ति दाता नहीं मानते

691
00:47:08,000 --> 00:47:12,080
भगवान नहीं मानते सदा शिव को मानते हैं नहीं शिव जी जो शिव

692
00:47:12,080 --> 00:47:16,240
है वो सदा शिव रूप में मुक्ति दाता है ये वही सदा

693
00:47:16,240 --> 00:47:20,240
शिविव है वही एक रूप में शिव जी है कैलाश में इस भोम

694
00:47:20,240 --> 00:47:22,000
वो जो उनका कार्य वाला

695
00:47:22,000 --> 00:47:26,000
जो रूप है जो वैष्णव वाला रूप जो त्रिगुण अवतार है वो

696
00:47:26,000 --> 00:47:30,240
अलग है जो परव्यम में सदा सदा शिव है शिव पार्वती उस रूप में वो भगवान है भगवान

697
00:47:30,240 --> 00:47:34,240
है साक्षात भगवान है उनको अलग समझना वो अपराध है वो साक्षात

698
00:47:34,240 --> 00:47:38,320
भगवान है तो ठीक है तो वो आप प्रमाण में दीजिएगा और मैं चाहूंगा

699
00:47:38,320 --> 00:47:42,320
कि इस बारे में भी खुल के सामने चीजें आनी चाहिए कि प्रभुपाद

700
00:47:42,320 --> 00:47:46,480
जी अगर ये कह रहे हैं कि भैया शिव दुर्गा काली के नाम को कृष्ण

701
00:47:46,480 --> 00:47:50,560
के नाम के समान समझना मूर्खता है पाप है पाप नहीं मूर्खता है पाप

702
00:47:50,560 --> 00:47:51,060
नहीं

703
00:47:50,880 --> 00:47:55,040
पाप भी है 10 अपराध है ना नहीं पाप 10 अपराध में अपराध और पाप

704
00:47:55,040 --> 00:47:59,360
में अंतर होता है अंतर होता है पाप पाप पाप का संबंध शरीर

705
00:47:59,360 --> 00:48:03,520
और मन से होता है। अपराध का संबंध आत्मा से होता है।

706
00:48:03,520 --> 00:48:07,840
तो ये विवरण कहां से ये है विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर माधुर्य कादमनी

707
00:48:07,840 --> 00:48:11,840
में बड़े विस्तार से इसको समझाते हैं। का संबंध हां पाप का फल कौन

708
00:48:11,840 --> 00:48:16,160
भोगता है? ये शरीर मन शरीर में बीमारी आना

709
00:48:16,160 --> 00:48:20,320
मन में चिंताएं मन पागल होना ये पाप का परिणाम है। हम अपराध

710
00:48:20,320 --> 00:48:24,320
क्या होता है? अपराध तब होता है जब भगवान के प्रति, उनके

711
00:48:24,320 --> 00:48:28,800
परिकरों के प्रति, उनके भक्तों के प्रति जब हम कोई

712
00:48:28,800 --> 00:48:33,360
निंदा करते हैं, उनको मारते हैं, उनको पीटते हैं, उनकी हिंसा करते हैं,

713
00:48:33,360 --> 00:48:37,440
वो अपराध कहलाता है। चोरी करना अपराध नहीं है। चोरी करना पाप है।

714
00:48:37,440 --> 00:48:41,440
अपराध नहीं अपराध नहीं कहा जाएगा। उसको पाप कहा जाएगा। अच्छा और

715
00:48:41,440 --> 00:48:45,600
जितना भी ये शारीरिक संसार में जितनी भी चीजें हैं वो सब पाप में आएगा।

716
00:48:45,600 --> 00:48:49,760
भगवान से संबंधित जो भी चीजें हैं समझना उनको

717
00:48:49,760 --> 00:48:53,760
गलत। गलत समझना, उनकी निंदा करना, उनकी हिंसा करना हम

718
00:48:53,760 --> 00:48:58,160
वह अपराध में आएगा। अच्छा अपराध का अर्थ ही होता है अप यानी

719
00:48:58,160 --> 00:49:02,320
शास्त्रों तो वर्णन में भी है। हां मतलब विश्वनाथ विश्वनाथ जी के अलावा

720
00:49:02,320 --> 00:49:05,920
और जगह भी होगा बट विश्वनाथ जी ने इसको विस्तार से उन्होंने बताया

721
00:49:05,920 --> 00:49:10,160
विस्तार से समझाते हुए ये दिया होगा वहां कहां पे है ये? उन्होंने

722
00:49:10,160 --> 00:49:14,240
जैसे हमारे जो आचार्य होते हैं वो कोई भी सिद्धांत बता रहे होते तो वो बताते हैं मैं इसके

723
00:49:14,240 --> 00:49:18,320
आधार पे बता रहा हूं। उन्होंने प्रमाण तो नहीं दिया है। उन्होंने समझाया

724
00:49:18,320 --> 00:49:22,320
है अपराध और पाप खुद की एक बुद्धि हो सकती है। हो सकता है शास्त्र में

725
00:49:22,320 --> 00:49:26,640
होगा। आचार्य होता है। वो शोध का विषय कई बार आचार्य जो है अपनी भाई अपराध

726
00:49:26,640 --> 00:49:30,640
को ऐसे देखो पाप को ऐसे देखो ऐसा हो सकता है। हां देखो इसमें क्या

727
00:49:30,640 --> 00:49:34,800
है ना सार्वभौम सिद्धांत नहीं मान सकते। नहीं शास्त्रों में भी होगा क्योंकि आचार्य

728
00:49:34,800 --> 00:49:38,880
जो बोलते हैं वो शास्त्रों के आधार के लिए बोलते हैं। फिर वो हमें चाहिए क्योंकि देखिए आपके

729
00:49:38,880 --> 00:49:42,960
लिए विश्वनाथ जी [हंसी] विश्वनाथ देखो विश्वनाथ ठाकुर

730
00:49:42,960 --> 00:49:47,440
का परमार्थ मैं आपको भेज सकता हूं। जहां तक शास्त्रों का प्रमाण है

731
00:49:47,440 --> 00:49:51,520
उसको अगर आप स्वयं ढूंढो तो ज्यादा अच्छा रहेगा क्योंकि जो प्रमाण

732
00:49:51,520 --> 00:49:55,520
मेरे पास उपलब्ध है नहीं मैं तो ये मानता हूं ना कि इस कौन जब गलत कर रहा है तो मुझे

733
00:49:55,520 --> 00:49:59,760
उसके समर्थन में कुछ क्यों ढूंढना वो तो जो उसको समर्थन करता हो

734
00:49:59,760 --> 00:50:03,760
वो ढूंढ के लाके देगा ना हां बट मैं तो जो ये बता रहा हूं पाप

735
00:50:03,760 --> 00:50:07,760
अपराध का विचार वो तो विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के आधार बता रहा हूं खैर अपराध

736
00:50:07,760 --> 00:50:11,920
तो बोला ही गया एक कॉमन भाषा में ऐसा बोल दिया जाता है लेकिन जैसे

737
00:50:11,920 --> 00:50:16,080
बुद्धिमान और विवेकवान दो शब्द हैं। नहीं नहीं मैं वो

738
00:50:16,080 --> 00:50:16,880
नहीं कह रहा। मैं कह

739
00:50:16,880 --> 00:50:20,880
रहा हूं कि अपराध तो बोला गया। पाप नहीं बोला गया तो अपराध तो बोला गया। किस चीज को?

740
00:50:20,880 --> 00:50:25,120
कि शिव, दुर्गा, काली इनके नामों को समान समझना अपराध है।

741
00:50:25,120 --> 00:50:29,200
अपराध है। है ना? और ऐसा करने वाले मूर्ख हैं। हां। तो फिर अब जो

742
00:50:29,200 --> 00:50:33,200
नाम है वो तो शिव का ही नाम है ना? जैसे

743
00:50:33,200 --> 00:50:37,280
जो नाम है वो तो शिव का ही नाम है ना? उसमें तो कोई ये वाली बात है नहीं कि

744
00:50:37,280 --> 00:50:41,280
भाई जो क्या कहते हैं? जीव जो शिव पद को प्राप्त कर

745
00:50:41,280 --> 00:50:45,440
लिया मैं उसके नाम की बात कर रहा हूं। शिव का नाम तो शिव का ही नाम है। हां शिव उसको एक

746
00:50:45,440 --> 00:50:49,600
समझने के बारे में क्यों लिखा हुआ है कि शिव के नाम की बात नहीं कर रहे हैं। शिव

747
00:50:49,600 --> 00:50:53,760
जी की बात नहीं वहां शिव के नाम की बात है। शिव के नाम हरे कृष्ण करो या शिव

748
00:50:53,760 --> 00:50:57,760
दुर्गा काली के नाम का जप करो। नाम आया है वहां। अंतर है। अंतर क्या है कि

749
00:50:57,760 --> 00:51:01,840
भाव का अंतर है। भाव का बहुत बड़ा अंतर है। फिर वही वाली

750
00:51:01,840 --> 00:51:06,000
बात है। क्या आप वैष्णव पहले हो या पहले एक जिज्ञासु हो क्या

751
00:51:06,000 --> 00:51:10,080
हो पहले। भाई कोई भी व्यक्ति जब जन्म लेता है तो यह डंका पीटा

752
00:51:10,080 --> 00:51:14,080
जाता है। मैं तो आपके सामने वही पक्ष रखूंगा जो

753
00:51:14,080 --> 00:51:18,240
हमारे वैष्णव आचार्यों ने दिया है जो उन्होंने माना है जो उन्होंने स्वीकार

754
00:51:18,240 --> 00:51:22,320
किया तो मैं आपसे ये पूछ रहा हूं ना ये वाली जो लाइन है ये गलत है कि सही है कि शिव

755
00:51:22,320 --> 00:51:26,400
दुर्गा काली को काली के नाम को भगवान कृष्ण के नाम के समान

756
00:51:26,400 --> 00:51:30,480
समझना अपराध है ये सही बात है सही बात है तो फिर यहां तो शिव

757
00:51:30,480 --> 00:51:31,920
के नाम शिव का ही भेद हो गया

758
00:51:31,920 --> 00:51:36,080
ना भेद शिव सुनिए शिव पद को किसी जीव ने प्राप्त किया

759
00:51:36,080 --> 00:51:40,240
हो या स्वयं शिव जी आके शिव पद पे बैठे हो ठीक है?

760
00:51:40,240 --> 00:51:44,320
उनका नाम तो वही रहेगा ना। नाम तो वही रहेगा। देखो तो

761
00:51:44,320 --> 00:51:48,480
शिव के नाम कृष्ण के नाम के ऐसा नहीं होगा क्योंकि जैसे मेरा

762
00:51:48,480 --> 00:51:52,480
नाम भी लक्ष्मी नरसिंह है। तो क्या मैं भगवान हो गया? नहीं मैं क्या कह रहा

763
00:51:52,480 --> 00:51:56,800
हूं? मैं यही तो कह रहा हूं भगवान होने की बात नहीं कर रहे। वहां नाम को ही मना कर दिया गया।

764
00:51:56,800 --> 00:52:00,880
नाम को मना वो वो जो विषय है वो थोड़ा गहराई से देखने का विषय

765
00:52:00,880 --> 00:52:04,960
है वहां पर। क्या विचार दिया और भी डिटेल में आचार्यों ने।

766
00:52:04,960 --> 00:52:09,760
लेकिन ठीक है। एक तो आप प्रभुपाद जी का प्रमाण देंगे। हां। एक

767
00:52:09,760 --> 00:52:13,920
कौन ऐसा क्यों कर रहा है कि उनका प्रोत्साहन कर रहा है तो इस पे हम

768
00:52:13,920 --> 00:52:18,000
लोग खुद बात करेंगे आप संपर्क स्थापित करेंगे और एक

769
00:52:18,000 --> 00:52:22,240
जो है ये गहराई का विषय ये वाला जो क्योंकि मैं तो

770
00:52:22,240 --> 00:52:26,480
मैं तो आपके सामने वही पक्ष रखा है कि जो हमारे आचार्य बोले हैं बाकी

771
00:52:26,480 --> 00:52:30,560
तो उसमें बहुत सारे विचार हो गया ना कि गहराई से हां वो गहराई फिर

772
00:52:30,560 --> 00:52:34,800
शोध का विषय है और भी देखने का विषय है वो उसमें क्या और क्या है

773
00:52:34,800 --> 00:52:38,960
तो अब आगे बात आती है कि जो श्री राम जी

774
00:52:38,960 --> 00:52:43,200
हां और इनको लेकर के भी काफी सारे लोग इस के ही हैं जो भेद

775
00:52:43,200 --> 00:52:46,960
करते हैं। बताते हैं कि पूर्णिमा का चांद और यह चांद और वो

776
00:52:46,960 --> 00:52:51,200
चांद बहुत सारी बातें करते हैं। भाई वो वो पूर्णिमा में पूरा दिखता

777
00:52:51,200 --> 00:52:55,200
है। तो यहां पे जब पूर्णिमा में दिखता है मतलब एक वो है केशवदास जी

778
00:52:55,200 --> 00:52:59,200
करके हैं। वो बड़ा बोलते हैं उनका एक वीडियो। हम बोलते हैं कि जैसे

779
00:52:59,200 --> 00:53:03,440
पूर्णिमा में पूरा चांद होता है और बाकी सारे टाइम पे चांद जो है अधूरा दिखता

780
00:53:03,440 --> 00:53:07,680
है ऐसे ही यह जो राम राम है नरसिं है ये सब जो है

781
00:53:07,680 --> 00:53:11,920
वो पूर्ण नहीं है वो पूर्णिमा का चांद तो श्री कृष्ण है एक एक मिनट

782
00:53:11,920 --> 00:53:16,240
तो अब इसमें क्या कर दिया इन्होंने इन्होंने स्वयं ही

783
00:53:16,240 --> 00:53:20,240
जो शंकराचार्य जी की शिक्षा है ना उसका ही समर्थन कर दिया वो

784
00:53:20,240 --> 00:53:24,240
कैसे किया वो ऐसे किया कि चांद तो हमेशा

785
00:53:24,240 --> 00:53:28,400
चांद ही था तुम्हारी दृष्टि भ्रम भ्रमवश उस

786
00:53:28,400 --> 00:53:32,400
चांद को अलग-अलग देख रही है तो भ्रम आ गया ईश्वर के अन्य रूपों

787
00:53:32,400 --> 00:53:36,800
को ही सही माया तो समझ लिया ना माया के कारण तो देख लिया ना आपने तो

788
00:53:36,800 --> 00:53:40,800
वो खुद ही उनको नहीं पता है कि उन्होंने इस तरीके से शंकराचार्य के सिद्ध

789
00:53:40,800 --> 00:53:45,120
अच्छा दूसरी बात ये भी है कि किसी का मन ही लगता है ईश्वर के उसी

790
00:53:45,120 --> 00:53:49,360
रूप में जो दूसरा रूप है धनुषधारी वाला किसी का मन ही लगता है

791
00:53:49,360 --> 00:53:53,440
ईश्वर के बांसुरी वाले रूप में इसीलिए तो ईश्वर ने इतने सारे रूप

792
00:53:53,440 --> 00:53:57,520
लिए तो फिर भी वो कहते हैं कि नहीं राम जी वगैरह जो है ये तो एक्सप सस्पेंशन

793
00:53:57,520 --> 00:54:02,320
है। मैं आपको बता रहा हूं लखनऊ के इस मंदिर के

794
00:54:02,320 --> 00:54:06,560
अध्यक्ष के द्वारा गीता सेशन होता है। हर हफ्ते 500 से 600

795
00:54:06,560 --> 00:54:10,560
लोग मुझे लगता है अब ज्यादा जुड़ते होंगे और वहां पर यही शिक्षा दी जा

796
00:54:10,560 --> 00:54:14,640
रही है कि राम की राम के नाम का जाप करने पर आपको जो है मुक्ति नहीं

797
00:54:14,640 --> 00:54:18,960
मिलेगी। बहुत बड़ा अपराध है। बहुत बड़ा अपराध है। मैं समझ रहा हूं। मैं आऊंगा आपके पास।

798
00:54:18,960 --> 00:54:23,360
तो मैं एक बार मुझे किसी मेरे परिचित ने जोड़ दिया था उसमें

799
00:54:23,360 --> 00:54:27,440
और मैं हरे कृष्ण महामंत्र का जप करता हूं क्योंकि शंकराचार्य जी ने कहा है कि जिनका

800
00:54:27,440 --> 00:54:31,520
दोष हो गया हो यज्ञ इत्यादि से हुआ हो भ्रात संध्या लगी

801
00:54:31,520 --> 00:54:35,680
हो वो इस नाम का जप करें महामंत्र का जप करें यद्यपि भगवान की अन्य

802
00:54:35,680 --> 00:54:39,680
नामों का जप करने से भी भ्रात दोष से मुक्ति मिलती परंतु गुरु मुख से

803
00:54:39,680 --> 00:54:43,760
मैंने वो सुना हरे कृष्णा तो मैं हरे कृष्णा का जप करता हूं हरे कृष्णा हरे राम

804
00:54:43,760 --> 00:54:47,840
का तो मैं कर रहा था और मेरे किसी परिचय के कारण मैं

805
00:54:47,840 --> 00:54:52,000
उसमें गया आज से 5 छ साल पहले की बात है। तो मैं उसमें जब गया तो मैंने

806
00:54:52,000 --> 00:54:56,000
वहां पर अपने भाव बता दिए कि मैं हरे कृष्ण का जो जप करता हूं वो

807
00:54:56,000 --> 00:55:00,160
तो मैं राम को देख के करता हूं। कृष्ण को देख के नहीं करता हूं। तो भाई वहां

808
00:55:00,160 --> 00:55:04,400
के मंदिर के अध्यक्ष बोल रहे हैं मुझसे क्या बोल रहे हैं? अच्छा तुम ऐसा

809
00:55:04,400 --> 00:55:08,480
करते हो तीन महीने बाद देख लेना तुम्हारे साथ क्या होगा? मैंने कहा क्या होगा

810
00:55:08,480 --> 00:55:13,280
भाई? राम की भक्ति करने पे एक्सीडेंट हो जाएगा मेरा। [हंसी]

811
00:55:13,280 --> 00:55:17,280
ये ये थोड़ी सी इस बारे में बताइए। ये तो अज्ञानता है। इस बारे में तो

812
00:55:17,280 --> 00:55:17,780
मैं

813
00:55:17,440 --> 00:55:21,440
भी ये समझता हूं कि प्रभुपाद जी का पक्ष कुछ और रहा होगा और ये जो

814
00:55:21,440 --> 00:55:25,760
मूर्ख लोग हैं ऐसी बातें और उस व्यक्ति ने बोला भी ये महामूर्ख की पराकाष्ठा

815
00:55:25,760 --> 00:55:29,840
है। ऐसा बोलना ये ऐसे मूर्खों को मंदिर का कार्य वो तो बात का

816
00:55:29,840 --> 00:55:34,240
वाद है। सिद्धांत पक्ष में आते हैं जब राम और कृष्ण की बात आपने

817
00:55:34,240 --> 00:55:38,480
किया। राम और कृष्ण में कोई अंतर नहीं है। स्वयं

818
00:55:38,480 --> 00:55:42,480
भगवान है। वो परम भगवान है। इसलिए हमारे इस मंदिरों में शीला

819
00:55:42,480 --> 00:55:46,880
प्रभुपाद जी ने सीताराम की स्थापना करवाई

820
00:55:46,880 --> 00:55:51,040
इस मुंबई दिल्ली और अन्य मंदिरों में

821
00:55:51,040 --> 00:55:55,120
यहां तक कि हमारे इस के कई मंदिर रामनवमी के दिन ही उसका उद्घाटन

822
00:55:55,120 --> 00:55:59,280
हुआ है। तो भगवान राम स्वयं भगवान है। राम कृष्ण में

823
00:55:59,280 --> 00:56:03,440
कोई भी अंतर नहीं है। भगवान के जितने स्वरूप हैं भगवान

824
00:56:03,440 --> 00:56:07,680
के जितने नाम हैं उनमें कोई अंतर नहीं है। नाम कार्य बहुदा

825
00:56:07,680 --> 00:56:11,840
निज सर्व शक्ति चैतन्य महाप्रभु कहते हैं राम नरसिंह

826
00:56:11,840 --> 00:56:17,120
वामन कुर्म ये सब भगवान के नाम है कोई अंतर नहीं है केवल

827
00:56:17,120 --> 00:56:21,200
रसगत विचार से अंतर है तत्वगत दृष्टि से इनमें

828
00:56:21,200 --> 00:56:22,800
कोई भी भेद नहीं है

829
00:56:22,800 --> 00:56:26,800
कोई सीताराम की जिसको सीताराम की भक्ति करनी है

830
00:56:26,800 --> 00:56:30,880
भाई किसी को राम जी पसंद आ गए जैसे तुलसीदास जी राम के अनन्य भक्त

831
00:56:30,880 --> 00:56:34,880
हैं जब वृंदावन आए तो वृंदावन आकर क्या बोलते हैं तुलसी

832
00:56:34,880 --> 00:56:39,520
मस्तक तब नवे जब धनुष बाण लो हाथ यह तुलसीदास

833
00:56:39,520 --> 00:56:43,760
तो आपको तब नमस्कार करेगा जब आप बंसी को छोड़कर

834
00:56:43,760 --> 00:56:48,000
धनुष बाण हाथ में लेंगे ऐसी अनन्यता जी तो

835
00:56:48,000 --> 00:56:52,160
राम कृष्ण में अंतर ही नहीं है केवल भाव से भक्तों

836
00:56:52,160 --> 00:56:56,240
की तरफ से अंतर है भगवान भाव ग्राही जनार्दन अब किसी को

837
00:56:56,240 --> 00:57:00,320
अनार का जूस पसंद है तो वो अनार जूस खाए किसी को आम का

838
00:57:00,320 --> 00:57:04,640
जूस पसंद है वो आम का खाए है तो फलों का ही जूस वो है तो फल ही

839
00:57:04,640 --> 00:57:06,400
तो भगवान दास

840
00:57:06,400 --> 00:57:10,400
वगैरह ये जो बोलते हैं गलत बोलते हैं। गलत है। रामकृष्ण में भेद करना

841
00:57:10,400 --> 00:57:14,480
ये गलत है। देख लो भैयागत दृष्टि से स्कॉन के

842
00:57:14,480 --> 00:57:18,480
जो प्रामाणिक ये ब्रह्मचारी हैं यहां पर निवास भी है इनका

843
00:57:18,480 --> 00:57:20,400
वो ये बोल रहे हैं केशवदास जी के लिए है

844
00:57:20,400 --> 00:57:24,640
ये बात सुन लीजिए क्या बोल रहे हैं आपकी बात रसगत दृष्टि से हमारे

845
00:57:24,640 --> 00:57:28,640
आचार्यों ने बहुत विस्तार से अंतर किया है। रूप गोस्वामी जी ने

846
00:57:28,640 --> 00:57:32,880
लघु भागवतामृत में बड़े विस्तार से वर्णन किया है कि राम

847
00:57:32,880 --> 00:57:37,360
कृष्ण नरसिंह वामन इनमें क्या तारतम्य है इनमें क्या

848
00:57:37,360 --> 00:57:41,680
भेद है रस की दृष्टि से तत्व दृष्टि से कोई भेद नहीं है

849
00:57:41,680 --> 00:57:43,360
रस की दृष्टि से भेद है तो

850
00:57:43,360 --> 00:57:47,680
उपासना की दृष्टि से से भेद है और तत्व की दृष्टि से नहीं है

851
00:57:47,680 --> 00:57:51,680
ये बात हमारे शास्त्रों में मतलब इस से छपने वाली किताबों में है बिल्कुल है

852
00:57:51,680 --> 00:57:55,840
परपाद के ग्रंथों में है कहां पर भगवत गीता में भागवतम में चैतन्य

853
00:57:55,840 --> 00:58:00,000
में दो बार मैं आपको भेजूंगा भगवत गीता में 2.2 में लिखा हुआ है

854
00:58:00,000 --> 00:58:04,000
कि विष्णु भगवान नारायण भी स्वयं को भगवान नहीं कह

855
00:58:04,000 --> 00:58:07,200
सकते क्योंकि वो पूर्ण ऐश्वर्यवान नहीं है।

856
00:58:07,200 --> 00:58:11,280
वो रस की दृष्टि से ये विचार किया गया तत्व की नहीं रस की रस की

857
00:58:11,280 --> 00:58:16,160
दृष्टि से तो अगर जैसे रस की दृष्टि से भगवान राम ने

858
00:58:16,160 --> 00:58:20,400
एक गुण मानो प्रकट नहीं किया वेणु माधुर्य वेणु बजाना

859
00:58:20,400 --> 00:58:24,720
लेकिन वो गुण भगवान कृष्ण ने प्रकट किया लेकिन वही कृष्ण जब

860
00:58:24,720 --> 00:58:28,960
मथुरा में होते हैं या द्वारिका में होते हैं वहां भी वो बंसी नहीं बजाते हैं।

861
00:58:28,960 --> 00:58:33,200
तो इसलिए द्वारका के कृष्ण क्या है? पूर्ण और मथुरा के कृष्ण

862
00:58:33,200 --> 00:58:38,160
क्या है? पूर्णतर और वृंदावन के कृष्ण क्या है? पूर्णतम। ये भी आपका परंपरा

863
00:58:38,160 --> 00:58:42,240
के अंतर्गत अंतर्गत है। ये स्वतंत्र व्यक्ति के लिए नहीं है।

864
00:58:42,240 --> 00:58:46,400
तो इसमें अब एक बात आती है। तो कहने का अर्थ ये है कि जैसे ये ये

865
00:58:46,400 --> 00:58:50,560
बातें तब के लिए है जब व्यक्ति आपका हो गया। हां जो परंपरा में जुड़ गया

866
00:58:50,560 --> 00:58:54,880
जो आ गया। पब्लिक में ये बात नहीं करनी चाहिए। नहीं करनी चाहिए। उनके लिए अब

867
00:58:54,880 --> 00:58:59,360
इसी पे बात आ रही है कि आपकी जो बात वो भगवत गीता है

868
00:58:59,360 --> 00:59:03,520
उसमें ही यह 262 में लिखा हुआ है कि ऐसासा है दो

869
00:59:03,520 --> 00:59:07,520
62 में हम और तो आपने अभी पहले भी ये बात

870
00:59:07,520 --> 00:59:11,600
कही थी कि जैसे आपने अभी बोला कि भाई

871
00:59:11,600 --> 00:59:15,600
पब्लिक में ये बात नहीं करनी जो आपसे जुड़ गया जो वैष्णव हो गया जो इस

872
00:59:15,600 --> 00:59:19,600
वाला हो गया उससे बात करो तो आप फिर भगवत गीता

873
00:59:19,600 --> 00:59:23,760
ऐसी जिसमें कि वो बातें लिखी हुई जो अंदर आने के बाद की है वो आप क्यों

874
00:59:23,760 --> 00:59:27,760
रोते हो? हमें तो अपनी परंपरा के सिद्धांत का प्रसार करना ही

875
00:59:27,760 --> 00:59:31,760
है। जिसको स्वीकार करना है वह करे। इसमें दिक्कत यह है कि वो नहीं जानता ना कि आपकी

876
00:59:31,760 --> 00:59:35,760
परंपरा वो नहीं जानता है तो आके पूछे वो। सुनिए तो वो ये नहीं जानता है कि

877
00:59:35,760 --> 00:59:39,840
ये परंपरा के अंतर्गत वाले सिद्धांत है या फिर सनातन सिद्धांत हैं। वही उसको आके

878
00:59:39,840 --> 00:59:44,000
पूछना है। यहां आके पूछिए जैसे आप आके पूछ रहे हो।

879
00:59:44,000 --> 00:59:48,000
हां। तो वैसे वही पूछ सकता है। कोई अगर जिज्ञासा बात आप उसमें लिखते हो कि इसमें कई

880
00:59:48,000 --> 00:59:52,240
सिद्धांत हमारे कई सारी चीजें ऐसी जैसे मैंने गीता पढ़ी। मैं

881
00:59:52,240 --> 00:59:56,320
इसमें देखिए थोड़ा सा झोल आ रहा है। मैं स्पष्ट बात करूं थोड़ा थोड़ा सा अगर आप मेरी बात मेरी सुनना

882
00:59:56,320 --> 00:59:57,520
चाह एक मिनट 1 मिनट

883
00:59:57,520 --> 01:00:01,600
इसमें क्या है कि हमने क्या किया कि बड़े ही तरीके से उसको

884
01:00:01,600 --> 01:00:05,600
अपनी परंपरा के अंतर्गत वाली बातें सनातन सिद्धांत के नाम

885
01:00:05,600 --> 01:00:10,000
पे दे दी ठीक है और उसको ये बताया ये आरोप जो है ना हम विश्वनाथ

886
01:00:10,000 --> 01:00:14,000
चक्रवर्ती ठाकुर पे भी लगा सकते हैं। उन्होंने भी ऐसे ही लिखा हुआ 1 मिनट 1 मिनट भाई साहब

887
01:00:14,000 --> 01:00:18,320
हमने दे दी रोड पे जा के जबकि उसमें कई ऐसी बातें हैं जिसके लिए

888
01:00:18,320 --> 01:00:22,560
उसको उन बातों को समझना होगा यहां आ करके कि वो परंपरा के अंतर्गत है।

889
01:00:22,560 --> 01:00:27,120
तो यदि ऐसी बातें हैं तो आपको अपनी भगवत गीता में लिखना चाहिए कि इसमें कई बातें

890
01:00:27,120 --> 01:00:31,440
सनातन धर्म के अनुसार हमारे किसी ने आचार्य ने शंकराचार्य

891
01:00:31,440 --> 01:00:35,520
जी जैसे उन्होंने भी गीता पर भाष्य दिया है। उन्होंने उन्होंने कहीं पर भी

892
01:00:35,520 --> 01:00:39,600
परंपरा के अंतर्गत होने की वजह से कोई सिद्धांत नहीं दिया। ऐसे माधवाचार्य उन्होंने वो

893
01:00:39,600 --> 01:00:43,600
सिद्धांत दिया जो सार्वभौम है। सार्वभौम हमें कहीं पर

894
01:00:43,600 --> 01:00:47,760
यह नहीं कहना पड़ता कि हम ऐसे हैं इसलिए ऐसा कर रहे हैं। हम

895
01:00:47,760 --> 01:00:52,160
तो वह वही बात करते हैं जो सार्वभौम है। भगवत गीता

896
01:00:52,160 --> 01:00:56,240
धर्म की धर्म की व्याख्या करते समय हम कहीं ये नहीं कहते कि भैया हमारे

897
01:00:56,240 --> 01:01:00,720
आचार्य ने कहा है इसलिए या फिर हमारी परंपरा में कहा गया इसलिए

898
01:01:00,720 --> 01:01:04,720
हम ये कहते हैं। देखो हर व्यक्ति को क्या है ना अपनी परंपरा अपनी

899
01:01:04,720 --> 01:01:08,800
परंपरा के विचार नहीं आपने कहा ना शंकराचार्य जी भी

900
01:01:08,800 --> 01:01:12,800
ऐसा करते हैं। नहीं हर परंपरा के आचार्य ने भाष्य दिया श्रीचार

901
01:01:12,800 --> 01:01:16,800
ने भाष्य दिया आप समझ नहीं तो उनके उसमें कमेंट्री विचार भाष्य तो दिया

902
01:01:16,800 --> 01:01:21,200
है मगर ये वाला नहीं है कहीं पे भी क्योंकि हमारी परंपरा में ऐसा है अब जैसे प्रभुपाद

903
01:01:21,200 --> 01:01:25,280
जी ने जो गीता लिखी है ना भगवत गीता एज इट इज उसके दो

904
01:01:25,280 --> 01:01:29,760
आधार है एक तो श्री बलदेव विद्या भूषण जी एक विश्वनाथ चक्रवर्ती

905
01:01:29,760 --> 01:01:33,920
ठाकुर जी हम उनके आधार पर उन्होंने भगवत गीता का भाष्य

906
01:01:33,920 --> 01:01:38,080
किया है अपने अनुसार नहीं जो पूर्ववर्ती आचार्य वो ठीक है वो ठीक है

907
01:01:38,080 --> 01:01:42,160
और अब उसमें इसमें क्या है ना प्रभुपाद जी ने अनुवाद तो

908
01:01:42,160 --> 01:01:46,320
दे दिया अब जो तात्पर्य है जो भाष्य है भाष्य

909
01:01:46,320 --> 01:01:50,400
तो अपनी परंपरा के आधार पर ही किया जाएगा ना अनुवाद तो मूल

910
01:01:50,400 --> 01:01:54,560
रखा जाएगा जो सार्वभौम है जो भाष्य है जो कमेंट्री

911
01:01:54,560 --> 01:01:58,560
है वो अपने परंपरा के आधार पर ही किया जाएगा उस

912
01:01:58,560 --> 01:02:02,800
पर हम यही विशेषता है गीता परंपरा के अनुसार

913
01:02:02,800 --> 01:02:06,800
अनुसार ही होता है हां ये नियम है वो बात ठीक है भाष्य आप करो मगर यदि

914
01:02:06,800 --> 01:02:10,880
आप में अगर उसमें उसमें यह बात आ रही है कि उसमें सनातन

915
01:02:10,880 --> 01:02:15,120
नहीं सार्वभौम नहीं परंपरा के अंतर्गत आने वाले भेद

916
01:02:15,120 --> 01:02:19,120
युक्त बातें हैं तो या तो उसको आप क्लेरिफाई करते हुए दो सामने वाले को ये

917
01:02:19,120 --> 01:02:23,360
तो ये तो किसी भी आचार्य ने ऐसा नहीं किया है तो इस पर हम क्या बोल सकते हैं

918
01:02:23,360 --> 01:02:27,360
किसी और के ना करने से हमारे द्वारा की जाने वाली गलत चीज सही नहीं हो जाती मैं तो

919
01:02:27,360 --> 01:02:27,860
आचार्य नहीं

920
01:02:27,840 --> 01:02:31,920
हूं ना प्रभुपाद जी आचार्य हैं विश्वनाथ जी आचार्य हैं बलदेव विद्यार जी

921
01:02:31,920 --> 01:02:36,080
आचार्य हैं तो फिर ऐसे तो रामपाल भी कह सकता है कि भैया कबीर ने कहा है ये

922
01:02:36,080 --> 01:02:40,080
चीजें मैंने थोड़ी ना इसमें अंतर है उसके कहने में और इसके कहने में अंतर

923
01:02:40,080 --> 01:02:44,480
है वो अंतर जो आचार्य जो भाष्य लिख रहे हैं ना हम उनका

924
01:02:44,480 --> 01:02:48,480
भगवान के साथ गुरु परंपरा के साथ संबंध है वो वो

925
01:02:48,480 --> 01:02:52,560
इसलिए लिख पा रहे अच्छा भैया एक और दूसरा भाष्य लिखने

926
01:02:52,560 --> 01:02:56,640
का अधिकार उसी को है जो भागवतीय परंपरा में प्रमाणिक संप्रदाय

927
01:02:56,640 --> 01:03:00,720
के अंतर्गत जो दीक्षित हो जो उस परंपरा में हो। अब रामपाल तो

928
01:03:00,720 --> 01:03:04,800
किसी परंपरा में नहीं है। अच्छा एक बात बताइए परंपरा की बात आपको करनी नहीं

929
01:03:04,800 --> 01:03:08,800
तो मैं फिर वो करता। चार वैष्णव आचार्य तो है ही नहीं परंपरा में चार वैष्णव

930
01:03:08,800 --> 01:03:13,200
आचार्य हैं। उसमें बात ये है कि आप किसी को भी किसी परंपरा

931
01:03:13,200 --> 01:03:17,280
का प्रामाणिक आचार्य किस आधार पर मानेंगे? जैसे कि

932
01:03:17,280 --> 01:03:21,440
जैसे कि शंकर आचार्य उसको कहा गया है परंपरा में जो तीन प्रस्थान

933
01:03:21,440 --> 01:03:25,520
पर भाष्य देता हो। श्रृति प्रस्थान यानी लिख देगा नहीं

934
01:03:25,520 --> 01:03:29,920
लिख पाएगा। और लिख भी लेगा तो उसका आधार होना चाहिए। बेस होना चाहिए।

935
01:03:29,920 --> 01:03:33,920
तो बेस होना चाहिए। हां अब मैं ये पूछ रहा हूं किसी भी परंपरा का प्रामाणिक

936
01:03:33,920 --> 01:03:38,320
प्रतिनिधि के रूप में हम किसी को तब स्वीकारते हैं जब पूर्वाचार्य ने उसको

937
01:03:38,320 --> 01:03:42,320
जैसे विद्या भूषण जी हैं वो तो ब्राह्मण नहीं थे विश्वनाथ जी ब्राह्मण नहीं

938
01:03:42,320 --> 01:03:42,960
थे

939
01:03:42,960 --> 01:03:47,520
मुझे करने दीजिए ना तो किसी भी परंपरा का प्रामाणिक प्रतिनिधि

940
01:03:47,520 --> 01:03:51,520
तब किसी को माना जाएगा जब उसको उसके पूर्वाचार्य के द्वारा नियुक्त किया

941
01:03:51,520 --> 01:03:55,520
नियुक्त किया जाएगा बिल्कुल ठीक है तो अब मुझे आप ये बताइए कि प्रभुपाद जी

942
01:03:55,520 --> 01:03:59,520
को किसने नियुक्त किया उनके गुरुदेव ने क्या नाम था इनका नाम श

943
01:03:59,520 --> 01:04:03,600
भक्ति सिद्धांत सरस्वती ठाकुर प्रभुपाद नियुक्त किया और उनको उनके

944
01:04:03,600 --> 01:04:08,000
गुरु ने नियुक्त किया वो क्या नाम भक्ति विनोद ठाकुर अच्छा उनके

945
01:04:08,000 --> 01:04:12,080
उनके गुरु थे श्री जगन्नाथ दास बाबा जी महाराज अच्छा ठीक है

946
01:04:12,080 --> 01:04:16,240
उनके गुरु थे श्री विश्वनाथ चतुर्व बलदेव विद्याभूषण मधवाचार्य से कनेक्शन

947
01:04:16,240 --> 01:04:20,320
कहां पे आ रहा है ईश्वरपुर पाद ईश्वर पुरपाद माधुनपुर पाद

948
01:04:20,320 --> 01:04:24,560
लक्ष्मी तीर्थ एक मिनट ईश्वरपुर पाद से पहले कौन है माधुनपुर

949
01:04:24,560 --> 01:04:28,880
पाद जी हां उससे पहले कौन है लक्ष्मी तीर्थ लक्ष्मी तीर्थ लक्ष्मी तीर्थ

950
01:04:28,880 --> 01:04:32,880
के समय में जो आनंद तीर्थ थे आनंद तीर्थ

951
01:04:32,880 --> 01:04:38,480
की गद्दी पे बैठे थे यानी कि मधवाचार्य जी की गद्दी पर बैठे थे हम वो कौन थे

952
01:04:38,480 --> 01:04:43,040
माधवाचार्य के आज मैं मैं आपको बताता हूं जैसे आज के टाइम में शंकराचार्य

953
01:04:43,040 --> 01:04:47,120
हैं ठीक है पूरी के शंकराचार्य मान मैं उनसे दीक्षित भी हूं हम

954
01:04:47,120 --> 01:04:51,440
परंतु क्या मैं बिना शंकराचार्य की परमिशन के

955
01:04:51,440 --> 01:04:55,520
हम है ना शंकराचार्य का प्रतिनिधित्व कर सकता हूं क्या

956
01:04:55,520 --> 01:04:58,240
शंकर परंपरा का बिल्कुल नहीं कर सकता

957
01:04:58,240 --> 01:05:02,240
वो तो गुरु तो आगे नियुक्त करता उस समय मधवाचार्य की

958
01:05:02,240 --> 01:05:03,360
गद्दी थी ना

959
01:05:03,360 --> 01:05:07,440
माधवाचार्य ने अपनी गद्दी दिया पद्मनाभ तीर्थ को पद्मनाथ

960
01:05:07,440 --> 01:05:11,600
तीर्थ ने अपनी गद्दी दी नरहरी तीर्थ को नरहरी तीर्थ ने अपनी गद्दी

961
01:05:11,600 --> 01:05:15,920
दी माधव तीर्थ को और माधव तीर्थ ने अपनी

962
01:05:15,920 --> 01:05:20,000
गद्दी दिया अक्षोभ तीर्थ को उन्होंने जय तीर्थ को फिर

963
01:05:20,000 --> 01:05:24,000
उन्होंने ज्ञान सिंधु को फिर दयानिधि को फिर विद्यानिधि को

964
01:05:24,000 --> 01:05:29,360
फिर राजेंद्र तीर्थ को उसके पश्चात फिर

965
01:05:29,360 --> 01:05:33,440
आपके पास कौन आया है? मधवाचार्य परंपरा से सीधे माधुन पाद जी आए हैं।

966
01:05:33,440 --> 01:05:38,000
वो वो उस समय जगतगुरु मधवाचार्य की गद्दी पर थे। देखो

967
01:05:38,000 --> 01:05:42,240
वैष्णव परंपरा क्या नियम है कि एक वैष्णव के कई शिष्य हैं।

968
01:05:42,240 --> 01:05:46,400
एक शिष्य नहीं है। तो शिष्य कई है तो और वही वो गुरु उनको

969
01:05:46,400 --> 01:05:50,480
नियुक्त करते हैं। मैं आपको बता रहा हूं। मेरा प्रश्न ये है कि जो आपके पास आए

970
01:05:50,480 --> 01:05:54,560
हैं क्या बताया आपने? श्रीपाद माधुन्य पुरपाद माधुन्य पुरपाद तो

971
01:05:54,560 --> 01:05:58,560
ये स्वयं तो आनंद तीर्थ की गद्दी पे नहीं थे। जगतगुरु मधवाचार्य

972
01:05:58,560 --> 01:06:02,960
की गद्दी पे जो मधवाचार्य भाई साहब मैं प्रश्न पूछ रहा हूं जो जगतगुरु

973
01:06:02,960 --> 01:06:07,040
मधवाचार्य उनकी गद्दी पे ये नहीं थे। ठीक है अब बात ये है कि अगर ये

974
01:06:07,040 --> 01:06:11,280
नहीं थे तो क्या मधवाचार्य जी के प्रतिनिधि के रूप में ख्यापित

975
01:06:11,280 --> 01:06:15,920
होने के लिए इन्होंने उस समय के जगतगुरु मधवाचार्य जी की परमिशन

976
01:06:15,920 --> 01:06:20,000
ली थी कि नहीं? हां बिल्कुल जो जिन जिन आचार्य

977
01:06:20,000 --> 01:06:24,160
से उन्होंने दीक्षा लिया उन्हीं आचार्यों ने इनको नियुक्ति किया कि आप देखिए

978
01:06:24,160 --> 01:06:28,240
मैं इसमें सवाल ये क्यों कर रहा हूं समझ लीजिए मैंने शंकराचार्य जी से दीक्षा

979
01:06:28,240 --> 01:06:32,480
शंकर परंपरा में थोड़ा अलग नियम हो सकता है नहीं मैं नहीं वो नहीं कह रहा हूं मैं तर्कपूर्ण

980
01:06:32,480 --> 01:06:36,480
बात कर रहा हूं मैं शंकर परंपरा का नियम नहीं पूछ रहा हूं मैंने शंकराचार्य जी

981
01:06:36,480 --> 01:06:40,560
से दीक्षा ले ली अभी मैं शंकर का प्रतिनिधित्व कर सकता हूं कि

982
01:06:40,560 --> 01:06:44,560
नहीं और मैं सही चीजें कर सकता हूं नहीं इसकी मुझे परमिशन

983
01:06:44,560 --> 01:06:48,800
लेनी होगी लेनी होगी बिल्कुल और जब परमिशन शिवश नारायण

984
01:06:48,800 --> 01:06:53,280
द्विवेदी हमारा प्रतिनिधित्व करेंगे तब मैं शिवश नारायण द्विवेदी

985
01:06:53,280 --> 01:06:57,280
के रूप में करूंगा। अच्छा ये हो तो ये भी सकता है कि

986
01:06:57,280 --> 01:07:01,520
मैंने दीक्षा ले ली उसके बाद मैं अपने मन की बात करूंगा ये नहीं होगा तो तो इसलिए

987
01:07:01,520 --> 01:07:05,520
परमिशन अनिवार्य है परमिशन वो परमिशन कहां है? वो परमिशन दिया

988
01:07:05,520 --> 01:07:09,680
माधवीपुर पाद जी को फिर माधवी नहीं वो परमिशन कहां है जो परमिशन

989
01:07:09,680 --> 01:07:13,840
हुई है मधवाचार्य वाले वो परमिशन लेटर है कोई अपने पास नहीं ये

990
01:07:13,840 --> 01:07:18,000
तो या मधवाचार वाले आपको बता रहा हूं वो तो मैं अपनी परंपरा से

991
01:07:18,000 --> 01:07:22,160
जो चली आ रही हमारी प्रणाली है और जो हमारे गौ

992
01:07:22,160 --> 01:07:26,160
वैष्णव अभिया ग्रंथ में जो लिखा हुआ है मैं तो उसके अनुसार बता

993
01:07:26,160 --> 01:07:30,560
रहा हूं नहीं अब उसमें क्या है उन्होंने आपको ये परमिशन बताई

994
01:07:30,560 --> 01:07:34,720
है कि नहीं ये वाली हां बिल्कुल बताइए परमिशन

995
01:07:34,720 --> 01:07:39,200
अब जैसे हम ही लोग हैं अब हम लोग गुरु नहीं हो सकते हैं जब तक हमारे गुरुदेव हमें अथुराइज

996
01:07:39,200 --> 01:07:43,360
हां तो इसी प्रकार से जो माधुन्यपुरी तीर्थ हैं इन्होंने तत्कालीन

997
01:07:43,360 --> 01:07:47,520
जगतगुरु मधवाचार्य जी से परमिशन िशन ली थी कि नहीं? बिल्कुल लिया था। वो

998
01:07:47,520 --> 01:07:51,520
परमिशन कहां है? अब वो परमिशन तो मेरा काम नहीं ढूंढना। वो तो

999
01:07:51,520 --> 01:07:55,520
आप लोग ढूंढो। लेकिन जो हमें बताया गया है परंपरा बताया गया मगर आपको

1000
01:07:55,520 --> 01:07:59,520
वो परमिशन लेटर दिखाया नहीं है। लेटर हर चीज का क्या है ना गुरु शिष्य परंपरा

1001
01:07:59,520 --> 01:08:00,020
होता

1002
01:07:59,680 --> 01:08:03,840
है। जैसे मैं मैं बता मैं उसके लिए भी बता रहा हूं। अगर परमिशन लेटर नहीं है।

1003
01:08:03,840 --> 01:08:07,920
आज के जो वर्तमान के प्रामाणिक मधवाचार्य की गद्दी

1004
01:08:07,920 --> 01:08:12,080
पर बैठे हुए हैं। क्या वो ये परमिशन दे रहे हैं। उन्होंने हमारे गुरुदेव को तो आचार्य

1005
01:08:12,080 --> 01:08:16,160
स्वीकार किया जब हम उड़ीपी गए थे। कहां लिखा है? अब उन्होंने

1006
01:08:16,160 --> 01:08:20,160
लिख के तो नहीं दिया लेकिन उन्होंने सामने बोला हमारे हम लोग सब बैठे थे वो आए थे

1007
01:08:20,160 --> 01:08:24,160
बात तो यहां तक कि वो आज के जो वर्तमान माधवाचार्य में जो बैठे हैं

1008
01:08:24,160 --> 01:08:28,800
गद्दी में वो हमारे मंदिर भी आ चुके हैं गौम भी जा चुके हैं मंदिर राघवाचार्य

1009
01:08:28,800 --> 01:08:32,880
जी भी आ चुके हैं मगर राघवाचार्य जी ने नहीं मतलब वो स्वीकार करते हैं मंदिर तो

1010
01:08:32,880 --> 01:08:36,880
आज मैं भी आया हूं नहीं तो आप कल को ये भी कहने लगोगे शिवा नारायण भी ऐसा

1011
01:08:36,880 --> 01:08:41,200
नहीं मेरा उद्देश्य ये है कहने का कि वो हमारी परंपरा को

1012
01:08:41,200 --> 01:08:45,200
हमारे आचार्यों को उन्होंने एक्सेप्ट किया है नहीं नहीं किया मेरी जानकारी में

1013
01:08:45,200 --> 01:08:49,360
नहीं किया है। लेना देखिए मैं आपको एक बात बता मैं कंफर्म भी करूंगा

1014
01:08:49,360 --> 01:08:53,680
मगर देखिए मैं फिर बता रहा हूं। किसी के ना होने का प्रमाण देने की आवश्यकता

1015
01:08:53,680 --> 01:08:57,680
नहीं होती है। किसी के होने का प्रमाण देखो मैं जो बोल सकता हूं ना मैं

1016
01:08:57,680 --> 01:09:02,000
अपनी परंपरा का जो हमारी परंपरा चली आ रही है उसका बोल सकता हूं। कहीं पे तो स्टेटमेंट

1017
01:09:02,000 --> 01:09:06,080
आज के उनके द्वारा दे दिया जाए। ऑफिशियली वो

1018
01:09:06,080 --> 01:09:10,160
रूप से वो आपका विषय है। मेरा विषय तो अपनी परंपरा को बता मेरे पास ऐसे

1019
01:09:10,160 --> 01:09:14,640
लेटर मुझे प्राप्त है जहां पर मधवाचार्य परंपरा जैसे आपने पूछा कि परपाद

1020
01:09:14,640 --> 01:09:15,140
को

1021
01:09:14,800 --> 01:09:18,800
आचार्य कृष्ण ने घोषित किया उनके गुरु ने किया उनके गुरु को उनके गुरु ने

1022
01:09:18,800 --> 01:09:22,960
किया तो ये परंपरा चली आ रही मधवाचार्य परंपरा जो आज के प्रामाणिक

1023
01:09:22,960 --> 01:09:27,200
वो हैं आनंद तीर की गद्दी पे बैठने वाले उन्होंने

1024
01:09:27,200 --> 01:09:31,360
ऑफिशियली स्टेटमेंट दिया है कि इस हमारे से जुड़ा हुआ नहीं है।

1025
01:09:31,360 --> 01:09:35,440
हां उपासना में अंतर है। नहीं हमारा वो नहीं है वो परंपरा में नहीं है

1026
01:09:35,440 --> 01:09:39,600
इसको नहीं ऐसा नहीं है आचार्य वैष्णव संप्रदाय की एक उपशाखा भी

1027
01:09:39,600 --> 01:09:43,600
हुई है चारों वैष्णवों की नहीं तो हमें सुनिए तो हमें यह प्राप्त

1028
01:09:43,600 --> 01:09:47,840
है कि आप उनकी परंपरा में नहीं हो अब हो अब यदि हो तो आपको प्रोवाइड

1029
01:09:47,840 --> 01:09:52,000
करानी चाहिए हमें वो चीज हां परंपरा मैं आपको गिना रहा हूं आप अगर स्वीकार करो

1030
01:09:52,000 --> 01:09:56,000
नाम बोलने से नहीं आज के जो वो वो ढूंढना आपका काम है मैं तो नाम गिना

1031
01:09:56,000 --> 01:10:00,000
सकता समर्थक आप हो ना इसको मैं तो नाम नहीं गिना सकता हूं आपको तो यानी कि हमारे

1032
01:10:00,000 --> 01:10:04,400
पास कोई ऐसा प्रमाण नहीं है जिसके कारण हम मान सके मधवाचार परंपरा

1033
01:10:04,400 --> 01:10:09,120
इसको अपना मानती है। बहुत सारे प्रमाण है। मैं आपको प्रमाण दे दूंगा। अच्छा यह बताइए कि यदि

1034
01:10:09,120 --> 01:10:13,200
आज के जो आनंद तीर्थ की गद्दी पर बैठने वाले मैं आज की बात नहीं कर रहा हूं।

1035
01:10:13,200 --> 01:10:17,200
माधव संप्रदाय से गौ वैष्णव सुनिए सुनिए

1036
01:10:17,200 --> 01:10:21,280
मधवाचार्य जी ने क्या माना है क्या नहीं माना है ये हमें कौन बताएगा

1037
01:10:21,280 --> 01:10:25,360
आज के टाइम में? उनका जो प्रामाणिक गद्दी पे बैठा होगा

1038
01:10:25,360 --> 01:10:29,520
वही तो बोलेगा। मैं ये इसको और क्लियर करता हूं। जो मधो

1039
01:10:29,520 --> 01:10:30,020
संप्रदाय

1040
01:10:30,000 --> 01:10:34,000
है ना उसकी उपशाखा है गीय संप्रदाय जैसे

1041
01:10:34,000 --> 01:10:38,080
बिना बिना मधवाचार के आपकी गौ संप्रदाय का

1042
01:10:38,080 --> 01:10:42,080
अस्तित्व भी सिद्ध नहीं होगा चैतन्य महाप्रभु ने इसको स्थापित किया ऐसे तो बुद्ध को भी मान

1043
01:10:42,080 --> 01:10:46,240
लो फिर अगर भगवान के नाम पे मानना है तो बुद्ध को मान लो चैतन्य महाप्रभु

1044
01:10:46,240 --> 01:10:50,320
यज्ञ का ही विरोध हो गया नहीं चैतन्य महाप्रभु ने जो हमको बताया

1045
01:10:50,320 --> 01:10:54,320
है जो अच्छा इसमें भी एक दिक्कत है कि चैतन्य महाप्रभु ने क्या बताया क्या

1046
01:10:54,320 --> 01:10:58,320
नहीं बताया इस पे भी बहुत सारी बातें हो सकती है क्योंकि उनका [हंसी] खुद का चैतन्य

1047
01:10:58,320 --> 01:11:02,320
चरितामृत चैतन्य उन्होंने खुद लिखा है उनके शिष्य हैं वृंदा दास

1048
01:11:02,320 --> 01:11:06,320
ठाकुर तो फिर हमें पहले शिष्यों पर विश्वास करना होगा उनके परिकर हैं जैसे

1049
01:11:06,320 --> 01:11:10,400
उनके एक उनके साथ में ही है परबंद

1050
01:11:10,400 --> 01:11:14,400
सरस्वती सरो दामोदर राम राय चलिए परंपरा

1051
01:11:14,400 --> 01:11:18,480
परंपरा वाली बात तो अभी हमारी होनी है ना नहीं अब इसमें तो हम इतना ही

1052
01:11:18,480 --> 01:11:22,480
बोल सकते हैं क्योंकि आपने कहा इसको और डिटेल दी स्टडी तो किया ही हुआ

1053
01:11:22,480 --> 01:11:26,640
है स्वामी से भी आए हैं ना चेतन प्रभु नहीं नहीं उनसे नहीं आए हैं श्रीधर स्वामी

1054
01:11:26,640 --> 01:11:30,720
से नहीं आए हैं अच्छा ठीक शेर स्वामी से कोई संबंध नहीं उनका इस पे भी बात करें अगली

1055
01:11:30,720 --> 01:11:35,120
बार करेंगे कर सकते हैं इस बार तो आपने कहा कि चैतन महाप्रभु

1056
01:11:35,120 --> 01:11:39,520
हां तो चैतन्य महाप्रभु ने भागवतम कहां से पढ़ी चैतन्य

1057
01:11:39,520 --> 01:11:43,520
महाप्रभु ने भागवत जो सुनते थे वो सुनते थे गदाधर पंडित जी

1058
01:11:43,520 --> 01:11:45,200
के मुख से ये

1059
01:11:45,200 --> 01:11:49,360
में चैतन्य चरितमृत में अच्छा और उन्होंने ये कहा है कि मैं भगवान

1060
01:11:49,360 --> 01:11:53,440
कृष्ण को जान पाया हूं भागवत को जान पाया हूं श्रीधर

1061
01:11:53,440 --> 01:11:57,520
स्वामी के कारण हां इसमें गलत क्या है ये इसके पीछे रहस्य है

1062
01:11:57,520 --> 01:12:02,080
ना वो क्या रहस्य श्रीपाद वल्लभाचार्य हम अपनी सुबोधनी

1063
01:12:02,080 --> 01:12:06,080
टीका लेकर गए थे चैतन्य महाप्रभु के पास हम तो

1064
01:12:06,080 --> 01:12:10,240
उन्होंने महाप्रभु को अपनी सुबोधनी टीका दिखाई हम और उन्होंने

1065
01:12:10,240 --> 01:12:14,320
यह वचन बोल दिया कि मैंने पूर्ववर्ती आचार्यों से मतलब उन्होंने ऐसे

1066
01:12:14,320 --> 01:12:18,400
ही बोल दिया था ये वो वो मानते नहीं थे ऐसा मगर उन्होंने बोल दिया था

1067
01:12:18,400 --> 01:12:22,480
उन्होंने बोला कि हे महाप्रभु देखो मैंने श्रीधर स्वामी से भी और अच्छी व्याख्या

1068
01:12:22,480 --> 01:12:26,720
से भी नहीं हां श्रीधर स्वामी जी से भी अच्छा उन्होंने

1069
01:12:26,720 --> 01:12:30,720
लिखा वल्लभाचार्य जी ने तो ऐसा कहा मगर मैं यह कह रहा हूं नहीं इसको पूरा

1070
01:12:30,720 --> 01:12:35,120
सुनोगे तब कनेक्ट कर पाओगे आप तो श्रीधर स्वामी तो प्रमाणिक

1071
01:12:35,120 --> 01:12:39,360
है ना भागवत के प्रथम टीकाकार हैं श्रीधर स्वामी उनको तो कोई उनका

1072
01:12:39,360 --> 01:12:43,680
तो कोई विरोध ही नहीं कर सकता है वो तो मतलब भागवत के प्रथम

1073
01:12:43,680 --> 01:12:47,680
टीकाकार है श्रीधर स्वामी श्रीधर स्वामी ने भागवत पर भावार्थ

1074
01:12:47,680 --> 01:12:52,000
दीपिका नामक टीका लिखी हुई है अब वल्लभाचार्य

1075
01:12:52,000 --> 01:12:56,480
जी ने ऐसे वचन बोले तो तब महाप्रभु बोले कि श्रीधर स्वामी अनुगत

1076
01:12:56,480 --> 01:13:00,240
कर भागवत श्रवण जगतगुरु श्रीधर गुरु कर

1077
01:13:00,240 --> 01:13:04,400
मानी कि श्रीधर स्वामी के अनुग में अगर भागवत सीख

1078
01:13:04,400 --> 01:13:08,720
रहे हो समझ रहे हो तो वही प्रमाण है उसी को मैं प्रमाण मानता

1079
01:13:08,720 --> 01:13:12,960
हूं क्योंकि श्रीधर स्वामी जगतगुरु हैं वो भागवत पर उन्होंने सबसे

1080
01:13:12,960 --> 01:13:17,760
पहले भाष्य दिया है नहीं उन्होंने कहा कि मैं उनकी वजह से ही भागवत को जान पाया हूं

1081
01:13:17,760 --> 01:13:21,760
उनके उनसे ही ऐसा ही पढ़ा है ऐसा भी कहा है तो गलत नहीं कहा है वो

1082
01:13:21,760 --> 01:13:25,760
ब्रह्मांड के गुरु हैं हां हां बिल्कुल जगत गुरु बोला श्रीधर स्वामी अनुगत कर

1083
01:13:25,760 --> 01:13:30,080
भागवत श्रवण जगुरु बोला यानी शंकराचार्य को जगतुगुरु बोला नहीं

1084
01:13:30,080 --> 01:13:34,240
अब ये तो आप बोल रहे हो लेकिन चैतन्य चरितामृत में जो लिखा है वो मैं

1085
01:13:34,240 --> 01:13:38,240
बता रहा हूं वहां पर ये तो आपका मानना है श्रीधर स्वामी का बैकग्राउंड क्या है

1086
01:13:38,240 --> 01:13:42,240
नहीं पहले मैं इसको डिटेल कर लेता हूं श्रीधर स्वामी जी के लिए महाप्रभु ने ऐसा

1087
01:13:42,240 --> 01:13:46,480
कब बोला क्यों बोला वही मैं आपको बता रहा हूं क्योंकि श्रीधर स्वामी तो सबके

1088
01:13:46,480 --> 01:13:50,640
लिए आदरणीय है हम भी उनकी टीका पढ़ते हैं भावार्थ दीपिका आदरणीय होना गुरु मानने

1089
01:13:50,640 --> 01:13:54,880
में अंतर गुरु भी हैं आदरणीय भी हैं आचार्य भी हैं सब कुछ हमारे लिए वो

1090
01:13:54,880 --> 01:13:58,960
उनकी कृपा से हम भागवत समझ सकते हैं। वो तो हम भी स्वीकार करते हैं। हम भी

1091
01:13:58,960 --> 01:14:02,960
मानते हैं। हम भी इसको मानेंगे। क्योंकि श्रीधर स्वामी

1092
01:14:02,960 --> 01:14:06,960
का यानी यानी विरोध करेंगे। मतलब जो श्रीधर स्वामी

1093
01:14:06,960 --> 01:14:11,200
से जो भागवत है वो नहीं ली उन्होंने। किन्होंने?

1094
01:14:11,200 --> 01:14:15,280
चैतन्य महाप्रभु। चैतन्य महाप्रभु ने भागवत लिखा ही नहीं। लेने की क्या बात है?

1095
01:14:15,280 --> 01:14:19,520
श्रीधर स्वामी चैतन्य महाप्रभु के समय में मुख्य रूप से श्रीधर

1096
01:14:19,520 --> 01:14:23,520
स्वामी जी की ही भागवत अवेलेबल थी। उसके बाद अनेक आचार्यों

1097
01:14:23,520 --> 01:14:27,600
ने भाषण दिया भागवत पर। श्रीधर स्वामी से ही पढ़ा भागवत हां बिल्कुल

1098
01:14:27,600 --> 01:14:31,760
श्रीधर स्वामी के आप ये कह रहे हो कि गिरधर जी से लिया था किनसे लिया था गिरधर

1099
01:14:31,760 --> 01:14:35,840
जी से सुना था नहीं गदाधर पंडित के मुख से सुनते थे मगर थी वो श्रीधर स्वामी

1100
01:14:35,840 --> 01:14:40,720
की श्रीधर स्वामी ने जो भाष्य लिखा था वो उनके

1101
01:14:40,720 --> 01:14:44,720
मुख से सुना था गदाधर पंडित बात वही हो गई श्रीधर स्वामी से ही हां हां इसमें

1102
01:14:44,720 --> 01:14:49,040
विरोध किया है इस विरोध ये है कि जिससे हम श्री कृष्ण को तात्विक

1103
01:14:49,040 --> 01:14:53,280
रूप से समझ पा रहे हैं तो वही तो हमारा गुरु सिद्ध हुआ हां श्रीधर

1104
01:14:53,280 --> 01:14:57,600
स्वामी सबके गुरु इस क्या है सबके तो चैतन महाप्रभु के गुरु हुए ना शिक्षा

1105
01:14:57,600 --> 01:15:01,680
गुरु हुए ना दीक्षा गुरु कहां हुए दीक्षा गुरु तो माधुनिपाद हुए आप जो कहते अब मैं

1106
01:15:01,680 --> 01:15:05,680
कहता हूं जैसे मेरे गुरु माधवाचार्य भी मेरे गुरु वल्लभाचार्य जी भी हैं

1107
01:15:05,680 --> 01:15:10,320
जिनसे मैं शिक्षा ले रहा हूं जिनसे मैं सीख रहा हूं वो मेरे गुरु हैं सर

1108
01:15:10,320 --> 01:15:14,320
यही हमारे क्या बताया गया है गुरु चार प्रकार के हैं शास्त्रों में जीव

1109
01:15:14,320 --> 01:15:18,320
गोस्वामी लिखते हैं पहले हैं दीक्षा गुरु शिक्षा गुरु श्रवण

1110
01:15:18,320 --> 01:15:22,320
गुरु पथ प्रदर्शक गुरु चेत गुरु पांच प्रकार के गुरु का

1111
01:15:22,320 --> 01:15:26,320
वर्णन शास्त्रों में दिया आप सीधा उनको जीव गोस्वामी

1112
01:15:26,320 --> 01:15:30,560
जीव गोस्वामी के शास्त्र अब मैं आपको तीन गुरुओं का वर्णन बता रहा हूं हां हो सकता है सुनिए सुनिए

1113
01:15:30,560 --> 01:15:34,560
भागवत में लिखा है होगा भागवत में दसव स्कंध में लिखा है तीन प्रकार के गुरु

1114
01:15:34,560 --> 01:15:38,720
पहले माता-पिता जो जन्म दे हां दूसरे जो संस्कार करें वो और

1115
01:15:38,720 --> 01:15:42,800
तीसरे वो गुरु जो आपको तात्विक ज्ञान दे ज्ञान दे भी ठीक है तो परम

1116
01:15:42,800 --> 01:15:46,800
गुरु कौन कहा गया है जो तात्विक ज्ञान दे तात्विक ज्ञान दे ठीक है तो तात्विक ज्ञान

1117
01:15:46,800 --> 01:15:50,880
किसने दिया गुरु देते हैं नहीं उनको किसने दिया चैतन्य महाप्रभु

1118
01:15:50,880 --> 01:15:54,880
चैतन्य महाप्रभु को ज्ञान दिया ईश्वर पुरपाद जी नहीं श्रीधर स्वामी

1119
01:15:54,880 --> 01:15:58,880
की टीका से तात्विक ज्ञान आया उनके पास वो भी गुरु बोला किसी ने भी हो वो

1120
01:15:58,880 --> 01:16:02,960
भी गुरु हैं तात्विक ज्ञान उन्हीं से आया श्रीधर स्वामी भी गुरु हैं तत्व

1121
01:16:02,960 --> 01:16:07,120
का ज्ञान किससे आया कौन से तत्व का ज्ञान भागवत तत्व श्रीधर

1122
01:16:07,120 --> 01:16:11,280
स्वामी भाई श्रीधर स्वामी तो सबके गुरु है सब उन्हीं से सीख रहे हैं वो तत्व

1123
01:16:11,280 --> 01:16:15,280
का ज्ञान किससे आया तत्व शिक्षा गुरु के रूप में

1124
01:16:15,280 --> 01:16:19,280
उनको स्वीकार किया शिक्षा गुरु नहीं पूछ रहे हैं मैं पूछ रहा हूं तत्व का ज्ञान किससे

1125
01:16:19,280 --> 01:16:23,360
आया नहीं आप वो ये कह रहे हैं मैं तो शास्त्र के अनुसार बोलूंगा ना आपको

1126
01:16:23,360 --> 01:16:27,360
शिक्षा गुरु बोल रहे हो आप दीक्षा गुरु बोल रहे हो मैं ये नहीं बोल रहा पथ गुरु बोल क्या

1127
01:16:27,360 --> 01:16:31,520
बोल रहे हो मैं ये बोल रहा हूं कि भागवत में कहा गया है जो तत्व का ज्ञान

1128
01:16:31,520 --> 01:16:35,680
दे ब्रह्म का ज्ञान दे तो तत्व का ज्ञान भागवत

1129
01:16:35,680 --> 01:16:40,160
से आता है और भागवत श्रीधर स्वामी जी से आया इसमें गलत क्या है हां तो आया

1130
01:16:40,160 --> 01:16:44,320
ठीक है इसमें गलत श्रीधर स्वामी का बैकग्राउंड क्या है वो कौन देखो उनका

1131
01:16:44,320 --> 01:16:45,760
जो बैकग्राउंड है वो

1132
01:16:45,760 --> 01:16:50,320
तो बहुत विस्तार का विषय है उसमें विद्वानों के मतभेद है वो अलग विषय है

1133
01:16:50,320 --> 01:16:54,320
आपके अनुसार क्या है मेरे अनुसार श्रीधर स्वामी वैष्णव संप्रदाय में है

1134
01:16:54,320 --> 01:16:58,480
और वैष्णव है। ठीक है। तो वो जीव गोस्वामी और हमारे आचार्य के अनुसार

1135
01:16:58,480 --> 01:17:02,960
कहां रहते थे? इस पर मैं विस्तार से आपको

1136
01:17:02,960 --> 01:17:07,440
अभी नहीं बता पाऊंगा क्योंकि मुझे याद नहीं है। आपके संप्रदाय में भी उनको शंकराचार्य

1137
01:17:07,440 --> 01:17:11,600
की गद्दी पे बैठा हुआ माना गया है कि नहीं? नहीं माना गया है। माना गया है। आपके यहां पर लिखा

1138
01:17:11,600 --> 01:17:15,600
हुआ है। कहां पे लिखा हुआ है? मैं आपको ये यहां स्क्रीन पे लगा दूं। मुझे लगा देना आप।

1139
01:17:15,600 --> 01:17:19,680
ठीक है। मुझे दिखा देना। कि ये वाली कई सारी चर्चाएं हैं कि भाई

1140
01:17:19,680 --> 01:17:23,680
मायावादी के सिद्धांत को क्यों माना? ऐसे टाइटल है उन चर्चाओं का

1141
01:17:23,680 --> 01:17:27,760
और वो यहां पे मैं लगाऊंगा। मुझे हमारे गौ वैष्णव जो आचार्य है ना उनके

1142
01:17:27,760 --> 01:17:31,920
ग्रंथोचार एक बार दिखा। मैं इस से दिखाऊंगा ना इस क्या कह रहा है? इस के कई

1143
01:17:31,920 --> 01:17:36,160
सारे लेख प्राप्त है मुझे। आपकी दृष्टि में स्कॉन और घोड़े वैष्णव अलग हो सकते हैं।

1144
01:17:36,160 --> 01:17:40,320
लेकिन मेरी दृष्टि में दोनों वर्णाश्रम को लेकर के तो बिल्कुल अलग हैं। वो आपकी दृष्टि में

1145
01:17:40,320 --> 01:17:44,320
शिव जी वाली बात आपने मान ली है। शिव जी वाली बात आपने मान ली है तो बात अलग

1146
01:17:44,320 --> 01:17:48,720
है। नहीं तो आपके यहां के लोग ही कहते हैं चातुर वर्ण मया सष्टम और विवाह

1147
01:17:48,720 --> 01:17:52,800
तो कर्म के हिसाब से जो जो करेंगे नहीं नहीं आप जो है ना विषय को ऐसे घुमा

1148
01:17:52,800 --> 01:17:56,880
रहे हो। मूल बात ये है कि श्रीधर स्वामी को हमारे आचारों ने क्या

1149
01:17:56,880 --> 01:18:00,880
माना है वो मैंने आपको बताया। ठीक है ठीक और चैतन्य महाप्रभु ने उनको

1150
01:18:00,880 --> 01:18:04,960
क्यों बोला स्वामी को आपने वैष्णव मान लिया वैष्णव है वो शंकराचार्य नहीं

1151
01:18:04,960 --> 01:18:09,280
थे वैष्णव थे शंकराचार्य कुछ विद्वान उनको शंकर संप्रदाय

1152
01:18:09,280 --> 01:18:13,280
मानते हैं अरे भैया आपके विद्वान प्रामाणिक विद्वान हमारे विद्वान तो गौ जो

1153
01:18:13,280 --> 01:18:17,280
हमारे विद्वान है उनको वैष्णव मानते हैं तो आपके इस के

1154
01:18:17,280 --> 01:18:21,680
कौन लोग नहीं यार इस तो जानता ही नहीं उनको

1155
01:18:21,680 --> 01:18:25,760
इसन नहीं जानता इस में उनको कौन जान रहा है इसन सीधा स्वामी

1156
01:18:25,760 --> 01:18:29,920
को नहीं जानता कितने लोग जान रहे हैं प्रभुपाद को जान ले वो बहुत बड़ी बात है। आप यह बताइए

1157
01:18:29,920 --> 01:18:34,080
कि कि गौडिया वैष्णो मैं तो गड़िया वैष्णव की बात कर रहा हूं। यहां हमारे

1158
01:18:34,080 --> 01:18:38,080
आचार्य हैं। तो अभी मैं कहां बैठा हूं? स्कॉन में बैठा हूं। गौ वैष्णव आप गय परंपरा

1159
01:18:38,080 --> 01:18:42,320
और इस दोनों में बैठे हो। स्कॉन ही गण इसन है ना? हां तो इस

1160
01:18:42,320 --> 01:18:46,320
मतलब अलग क्यों कर रहे हो? इसन मतलब प्रभुपाद जी। तो अभी मैं कहां बैठा हूं? प्रभुपाद

1161
01:18:46,320 --> 01:18:50,400
के पास, गौ वैष्णव के पास कि इस के पास? तीनों के पास। तीनों के पास। तो फिर मैं इस

1162
01:18:50,400 --> 01:18:54,720
से रिलेटेड सवाल कर सकता हूं ना? हां जब तीनों यहां पे लेकिन जो इस से रिलेटेड

1163
01:18:54,720 --> 01:18:58,960
सवाल आप कर रहे हो जो मैं बता रहा हूं उसको आपको

1164
01:18:58,960 --> 01:19:03,040
एक्सेप्ट करने का प्रयास करना चाहिए। अरे भैया जब आप जब कोई

1165
01:19:03,040 --> 01:19:07,040
दूसरा कुछ बोल रहा है ना उससे प्रमाण मांग लो आप जाके कोई अगर कुछ बोल रहा है इस कौन

1166
01:19:07,040 --> 01:19:11,120
क्या नहीं मैंने प्रमाण मांगा उसने दिया है भाई किसने दिया कि हम उस उनके जो है प्रमाणिक

1167
01:19:11,120 --> 01:19:15,120
लोग हैं वही तो मैंने आपसे शुरू में प्रश्न कर रहा था आपने उसको छोड़ दिया मैं प्रश्न

1168
01:19:15,120 --> 01:19:16,000
कर रहा था कि भाई

1169
01:19:16,000 --> 01:19:20,240
जब दो लोग हैं दोनों कह रहे हैं मैं इस कौन का हूं दोनों कह रहे हैं मैं गौ वैष्णव

1170
01:19:20,240 --> 01:19:24,240
हूं तो हम किसी एक की बात को कैसे मानेंगे जो प्रमाण दे सके तो आपने प्रमाण

1171
01:19:24,240 --> 01:19:28,240
क्या दिया दूंगा आपको इस बारे में कि वो शंकराचार्य नहीं थे मैं ये प्रमाण

1172
01:19:28,240 --> 01:19:32,480
दूंगा कि वो वैष्णव थे शंकराचार्य नहीं थे इस बारे में क्या प्रमाण है इस पर मैं

1173
01:19:32,480 --> 01:19:36,560
जो हमारे वैष्णव ने जो हमको बताया मैं वो दे सकता हूं ठीक है दुर्जन तो उसने फिर वही

1174
01:19:36,560 --> 01:19:40,560
वाली बात है कि [हंसी] जो वैष्णवों ने बताया वो मैं आपको बता रहा हूं जो हमारे

1175
01:19:40,560 --> 01:19:44,720
आचार्य नेता वही बात हो जाएगी रामपाल कह देगा जो कबीर ने बताया वो मैं आपको बता रहा हूं

1176
01:19:44,720 --> 01:19:48,880
फिर आप कहोगे प्रस्थान पे जो भाष्य लिखेगा वो होगा अब मैं आपसे प्रश्न कर रहा हूं

1177
01:19:48,880 --> 01:19:52,880
कि आप बात अब जो मेरे पास ज्ञान आ रहा है 1 मिनट 1 मिनट

1178
01:19:52,880 --> 01:19:57,120
अब ये बताइए कि प्रभुपाद जी ने प्रस्थान त्रय पर

1179
01:19:57,120 --> 01:20:01,120
भाष्य लिखा है या नहीं लिखा है लिखा हुआ है किस-किस पर लिखा है बताइए शीशोपनिषद

1180
01:20:01,120 --> 01:20:05,200
पर भगवत गीता पर मतलब मतलब किसी भी एक उपनिषद

1181
01:20:05,200 --> 01:20:09,200
में लिख दें कि वो प्रस्थान में भाष्य में हां बिल्कुल हां बिल्कुल होता है किसी भी

1182
01:20:09,200 --> 01:20:13,680
एक उपनिषद पर क्योंकि उपनिषद क्या है वो प्रस्थान में आता है हां बिल्कुल

1183
01:20:13,680 --> 01:20:18,640
अच्छा चलिए ठीक है तो अब दूसरी एक बात ये आ जाती है

1184
01:20:18,640 --> 01:20:21,200
कि

1185
01:20:21,200 --> 01:20:25,520
ये वाली जो बात चल रही है ना ये क्या कहते हैं ये

1186
01:20:25,520 --> 01:20:29,680
अ क्या चल रही थी अभी बात भाई श्रीधर स्वामी जी की

1187
01:20:29,680 --> 01:20:31,200
श्रीधर स्वामी हां उसमें

1188
01:20:31,200 --> 01:20:35,520
दुर्जन तो उस न्याय पे आते हैं कि आपने आपने कह दिया कि वैष्णव थे।

1189
01:20:35,520 --> 01:20:39,520
मैंने नहीं कहा हमारे गौर वैष्णव देखिए मैंने आपसे चर्चा के पहले ही पूछा था

1190
01:20:39,520 --> 01:20:43,600
कि आप अगर यह कहने वाले हैं कि हमारे आचार्य ने कहा है तो फिर चर्चा करने का कोई मतलब नहीं

1191
01:20:43,600 --> 01:20:47,840
है। आपने नहीं कहा हम आपके आचार्य से बात कर लेंगे।

1192
01:20:47,840 --> 01:20:51,920
फिर आप क्यों हमारे आचार्य आप विश्वनाथ जी तो अभी है नहीं। तो है नहीं तो फिर

1193
01:20:51,920 --> 01:20:56,080
उनकी बात आप उनकी बात बोल रहे हो तो उनकी बात को आपको सार्थक सिद्ध करना पड़ेगा

1194
01:20:56,080 --> 01:21:00,240
ना। मैं प्रमाण दे रहा हूं ना। तो आप ये मत कहो उन्होंने कहा हम तो ये

1195
01:21:00,240 --> 01:21:04,640
आपको प्रमाण दे तो रहा हूं। नहीं तो ये कहां दे रहे हो आप कि वो शंकराचार्य

1196
01:21:04,640 --> 01:21:09,280
हम आपको प्रमाण दे रहे हैं। शंकराचार्य हैं। आपके खुद के इस के लोग कह रहे हैं वो शंकराचार्य

1197
01:21:09,280 --> 01:21:13,600
थे। आप कह रहे हो शंकराचार्य नहीं थे। मगर फिर भी अब मैं एक बात ले लेता हूं आपकी

1198
01:21:13,600 --> 01:21:17,760
कि वो जो है वैष्णव थे। ठीक है? तो अब ये बताइए

1199
01:21:17,760 --> 01:21:21,920
कि उनके गुरु कौन थे वैष्णव में? देखो श्रीधर स्वामी के विषय में

1200
01:21:21,920 --> 01:21:26,320
हम जो हमारे वैष्णव आचार्य ने बोला है ना मैंने उतना ही

1201
01:21:26,320 --> 01:21:30,320
पढ़ा हुआ है। आप डिटेल में पढ़ना है नहीं डिटेल में मैं आपको भेज दूंगा। देखिए

1202
01:21:30,320 --> 01:21:34,320
सुनिए एक बात आ रही है जैसे वैष्णव हैं इसलिए ऐसा मानते हैं। एक

1203
01:21:34,320 --> 01:21:38,720
मिनट आप फोन रख लीजिए तो मेरा ध्यान भटक रहा है तो नहीं नहीं कोई नहीं आप बोल दीजिए। आप वैष्णव हैं

1204
01:21:38,720 --> 01:21:43,120
इसलिए हम ऐसा मानते हैं। वो हमारे आचार्य हैं इसलिए हम ऐसा ये बहुत बड़ा

1205
01:21:43,120 --> 01:21:46,640
ये बहुत बड़ा एक ड्रॉबैक होता है। ऐसा नहीं है। सुन लीजिए।

1206
01:21:46,640 --> 01:21:50,960
दे रहा हूं। मैं मैं क्या कह रहा हूं सुनिए। सुनिए। ड्रॉबक तब होता है जब प्रमाण ना दो।

1207
01:21:50,960 --> 01:21:55,520
मैं एक मिनट आप रख दीजिए। मेरी बात सुन लीजिए। मैं बताता हूं आपको एक चीज। हम हम

1208
01:21:55,520 --> 01:21:59,600
वैष्णव भक्ति करने से पहले कोई वैष्णव नहीं है तो उसको वो बात मत

1209
01:21:59,600 --> 01:22:03,680
कहिए कि वैष्णव है तो ये मान लो। ठीक है? ऐसे ही जब तक

1210
01:22:03,680 --> 01:22:07,920
कोई आचार्य सिद्ध नहीं हो रहा है तब तक उसको आचार्य के रूप में मानकर

1211
01:22:07,920 --> 01:22:11,920
उसका शब्द प्रमाण कैसे जो हमारे वैष्णव आचार्य ने दिया ना प्रमाण आपको मैं

1212
01:22:11,920 --> 01:22:15,920
आपको मैं आपको बता रहा हूं। कोई भी व्यक्ति आचार्य तब हो सकता है जब वो

1213
01:22:15,920 --> 01:22:20,160
आचार शास्त्रों में लिखे हुए आचरण को अपने शिष्य में प्रतिष्ठित

1214
01:22:20,160 --> 01:22:24,160
करे। श्रीधर स्वामी के विषय में प्रभुपाद जी ये लिखे हुए हैं। चैतन्य चरितामृत

1215
01:22:24,160 --> 01:22:28,240
क्या लिखे हुए हैं? आगे पढ़ सकते हो इसको थोड़ा जोर से पढ़ना चाहो। नहीं आप पढ़िए ना आप

1216
01:22:28,240 --> 01:22:32,960
आप पढ़ो ज्यादा अच्छा लगेगा। मैं आपके मुख से सुनना चाहता हूं। मैं आंग्ल भाषा कम पढ़ पाता हूं।

1217
01:22:32,960 --> 01:22:37,040
श्रीमद् भागवतम हैज़ मेनी टीकास और कमेंट्रीज

1218
01:22:37,040 --> 01:22:41,040
फॉलोइंग द परंपरा सिस्टम। हम बट श्रीधर स्वामी

1219
01:22:41,040 --> 01:22:45,600
इज फर्स्ट टू द कमेंट्रीज ऑफ ऑल द अदर आचार्य फॉलो ह

1220
01:22:45,600 --> 01:22:49,920
द परंपरा सिस्टम डज नॉट अलाउ वन टू

1221
01:22:49,920 --> 01:22:53,920
डिवाइडेड फ्रॉम द कमेंट्रीज ऑफ द

1222
01:22:53,920 --> 01:22:58,000
प्रीवियस आचार्य बाय डिपेंडिंग अपॉन द

1223
01:22:58,000 --> 01:23:03,120
प्रीवियस आचार्य वन कैन राइट ब्यूटीफुल कमेंट्रीज

1224
01:23:03,120 --> 01:23:07,520
हॉरवेवर ऑन कैन नॉट डेफी द प्रीवियस आचार्य

1225
01:23:07,520 --> 01:23:11,520
मतलब प्रभुपाद जी बहुत सारे चीज दिए हुए हैं और नहीं वो क्या

1226
01:23:11,520 --> 01:23:15,600
है कि वो क्या था उनका बैकग्राउंड हां वही मैं बता रहा हूं जैसे हमारे

1227
01:23:15,600 --> 01:23:19,600
सुनिए तो सुनिए सुनिए मैं एक बहुत आसान कर देता हूं आप बैकग्राउंड बोल मैं बता रहा हूं

1228
01:23:19,600 --> 01:23:24,000
मैं एक मिनट मैं आसान कर दूं हमने अपनी परंपरा

1229
01:23:24,000 --> 01:23:28,080
प्रभुपाद जी से लेकर कृष्ण तक गिना दी बीच में श्रीधर स्वामी

1230
01:23:28,080 --> 01:23:32,160
आ रहे हैं जो आपको भागवतम का ज्ञान दे रहे हैं। ठीक है तो पहली बात

1231
01:23:32,160 --> 01:23:36,320
तो यह है कि हमें श्रीधर स्वामी के गुरु का नाम क्यों नहीं पता है वह कृष्ण

1232
01:23:36,320 --> 01:23:40,400
उसी परंपरा से तक कैसे जा रहे हैं अगर वैष्णव है तो उसी परंपरा

1233
01:23:40,400 --> 01:23:44,400
में जानी चाहिए ना क्योंकि उनसे हम भागवतम ले रहे हैं तात्विक ज्ञान ले रहे हैं और परम

1234
01:23:44,400 --> 01:23:48,400
गुरु वही है जो तत्व का ज्ञान दे ब्रह्म का ज्ञान दे भागवत के

1235
01:23:48,400 --> 01:23:52,480
अनुसार हां थोड़ा जो हमारे आचार्य बोले मैं थोड़ा आपको सुनाना चाहता हूं हां

1236
01:23:52,480 --> 01:23:56,560
ठीक है सबसे पहले तो चैतन्य महाप्रभु बोलते हैं श्रीधर स्वामी

1237
01:23:56,560 --> 01:24:00,560
प्रसाद भागवत जानी जगतगुरु श्रीधर स्वामी

1238
01:24:00,560 --> 01:24:04,640
गुरु कर मानी हम श्रीधर अनुगत कर भागवत

1239
01:24:04,640 --> 01:24:09,840
व्याख्यान अभिमान छाड़ी भज कृष्ण भगवान हम

1240
01:24:09,840 --> 01:24:13,840
श्री चैतन्य महाप्रभु कह रहे हैं श्रीधर स्वामी की कृपा से ही ये आप

1241
01:24:13,840 --> 01:24:18,000
ना मामले को थोड़ा सा बढ़ा रहे हो आप काफी आप डिटेल में आप सुनना चाह

1242
01:24:18,000 --> 01:24:18,500
रहे

1243
01:24:18,160 --> 01:24:22,160
थे आप हम लोग यहां पे आ चुके हैं कि श्रीधर स्वामी का बैकग्राउंड बताइए

1244
01:24:22,160 --> 01:24:26,480
वहां पे वार्तालाप हो चुका है श्रीधर

1245
01:24:26,480 --> 01:24:30,880
स्वामी का जन्म गुजरात प्रदेश में हुआ था हां उनके के आविर्भाव

1246
01:24:30,880 --> 01:24:35,040
काल के संबंध में कोई प्रमाणिक सामग्री ना होने के

1247
01:24:35,040 --> 01:24:39,040
कारण कुछ अधिक कहने का उपाय नहीं। हम्म फिर भी इतना

1248
01:24:39,040 --> 01:24:43,120
तो अवश्य कहा जा सकता है कि अद्वैतवादियों ने

1249
01:24:43,120 --> 01:24:47,440
उनकी स्थिति काल के संबंध में जो अटकलें लगाई

1250
01:24:47,440 --> 01:24:51,520
हैं वह बिल्कुल निराधार हैं। मध मुनि ने अपने

1251
01:24:51,520 --> 01:24:55,840
ग्रंथों में उनका कहीं भी उल्लेख नहीं किया है। केवल इसी

1252
01:24:55,840 --> 01:25:00,160
के आधार पर उनका समय मध्य के बाद स्थिर करना

1253
01:25:00,160 --> 01:25:04,320
युक्ति युक्त नहीं है। श्रीधर स्वामी ने वेदांत

1254
01:25:04,320 --> 01:25:08,480
या उपनिषद आदि का कोई भाष्य नहीं लिखा है। यही कारण

1255
01:25:08,480 --> 01:25:12,640
है कि माधवाचार्य जी ने अपने ग्रंथों में उनका कहीं

1256
01:25:12,640 --> 01:25:16,640
भी उल्लेख नहीं किया है। अन्यथा वे अवश्य ही श्रीधर स्वामी

1257
01:25:16,640 --> 01:25:20,800
का उल्लेख करते। श्रीधर स्वामी ने अपने गीता भाष्य

1258
01:25:20,800 --> 01:25:24,880
में एक शंकर का ही उल्लेख किया है। इससे प्रतीत

1259
01:25:24,880 --> 01:25:29,200
होता कि वे शंकराचार्य शंकर के पश्चात और माधवाचार्य

1260
01:25:29,200 --> 01:25:33,520
से पूर्व किसी समय में प्रकट हुए शंकराचार्य के पश्चात

1261
01:25:33,520 --> 01:25:37,600
और से पूर्व श्री रामानुजाचार्य

1262
01:25:37,600 --> 01:25:41,600
ने प्रधानतः विष्णु पुराण का अवलंबन कर

1263
01:25:41,600 --> 01:25:45,600
अपने श्री भाष्य की रचना की है। आचार्य श्रीधर स्वामी ने

1264
01:25:45,600 --> 01:25:49,680
भी विष्णु पुराण की एक टीका लिखी है। यदि श्री

1265
01:25:49,680 --> 01:25:53,680
रामानुज को उनकी टीका का पता होता, तो वे अवश्य ही

1266
01:25:53,680 --> 01:25:57,680
अपने ग्रंथों में उनका उल्लेख करते तथा उसके वचनों

1267
01:25:57,680 --> 01:26:01,840
को प्रमाण तथा उनके वचनों को प्रमाण स्वरूप उद्ध्रित

1268
01:26:01,840 --> 01:26:06,640
करते। किंतु देखा जाता है कि ना तो रामानुजाचार्य जी ने

1269
01:26:06,640 --> 01:26:11,360
श्रीधर स्वामी का तथा ना ही श्रीधर स्वामी ने रामानुजाचार्य

1270
01:26:11,360 --> 01:26:15,360
का कहीं उल्लेख किया है। ऐसी अवस्था में यह निश्चित रूप से हम

1271
01:26:15,360 --> 01:26:19,680
कैसे कह सकते हैं कि इनमें कौन आगे व कौन पीछे?

1272
01:26:19,680 --> 01:26:23,760
मायावादी लोग आज भी उनको अपने संप्रदाय के अंतर्भूत बनाने

1273
01:26:23,760 --> 01:26:28,000
के लिए खींचातानी कर रहे हैं। इसका कारण यह है कि श्रीधर

1274
01:26:28,000 --> 01:26:32,080
स्वामी ने पहले पहल किसी अद्वैतवादी के संघ के प्रभाव

1275
01:26:32,080 --> 01:26:36,400
से अद्वैत मत ग्रहण किया था। इस बात का कुछ-कछ आभास

1276
01:26:36,400 --> 01:26:40,880
उनकी रचित टीकाओं से मिलता है। हम उस समय परमानंद

1277
01:26:40,880 --> 01:26:44,960
तीर्थ नामक एक वैष्णव सन्यासी शुद्धा द्वैत मत

1278
01:26:44,960 --> 01:26:48,960
का प्रचार करते थे। यह श्री नरसिंह देव के उपासक

1279
01:26:48,960 --> 01:26:52,960
हम शुद्धा द्वैत के आदि आचार्य श्रीमद् विष्णु स्वामी

1280
01:26:52,960 --> 01:26:57,200
का स्थिति काल शंकराचार्य से बहुत पहले

1281
01:26:57,200 --> 01:27:01,520
है। वे आदि विष्णु स्वामी के नाम से भी प्रसिद्ध है। इन्हीं

1282
01:27:01,520 --> 01:27:05,840
की शिष्य परंपरा में परमानंद तीर्थ एक सन्यासी प्रचारक थे।

1283
01:27:05,840 --> 01:27:09,840
इन्हीं की कृपा से श्रीधर स्वामी ने अद्वैत मत का परित्याग कर

1284
01:27:09,840 --> 01:27:13,840
शुद्धाद्वैत मत में दीक्षा ग्रहण की। अब इनको इस बात

1285
01:27:13,840 --> 01:27:18,000
का विश्वास हो गया था कि अद्वैत ज्ञान द्वारा यथार्थ मोक्ष

1286
01:27:18,000 --> 01:27:22,160
प्राप्त करना कठिन ही नहीं असंभव है तथा भगवत भक्ति

1287
01:27:22,160 --> 01:27:26,320
ही मोक्ष का एकमात्र उपाय है और उपय दोनों हैं। उन्होंने

1288
01:27:26,320 --> 01:27:31,120
गीता की टीका में लिखा हुआ है श्रुति स्मृति पुराण वचनाम

1289
01:27:31,120 --> 01:27:35,520
सती समजानी भवंती तस्माद भक्ति रेव मुक्ति

1290
01:27:35,520 --> 01:27:39,840
हेतु रीति सिद्धम परमानंद श्री पादार रज

1291
01:27:39,840 --> 01:27:45,200
श्री धारणी धना श्रीधर स्वामी यतिना कृता गीता सुबोधना

1292
01:27:45,200 --> 01:27:49,280
यदि मायावादियों का यह कथन सत्य मान भी लिया जाए कि श्रीधर

1293
01:27:49,280 --> 01:27:53,520
स्वामी मायावादी संप्रदाय के हैं तो क्या अद्वैतवादी

1294
01:27:53,520 --> 01:27:57,600
उनके गीता के उपरोक्त सिद्धांत सिद्धांत को स्वीकार कर सकते हैं।

1295
01:27:57,600 --> 01:28:02,320
यदि वे स्वीकार जो मैंने अभी आपको श्लोक सुनाया श्लोक बताइए कि

1296
01:28:02,320 --> 01:28:04,400
परमानंद इसका अर्थ

1297
01:28:04,400 --> 01:28:08,640
यही है कि परमानंद श्रीपाद रजि

1298
01:28:08,640 --> 01:28:12,640
इसमें श्रीदेव स्वामी यही कह रहे हैं कि मैंने उनसे ही उनकी कृपा प्राप्त किया।

1299
01:28:12,640 --> 01:28:17,680
किनसे परमानंद तीर्थ जो उनके संप्रदाय में किनके विष्णु स्वामी

1300
01:28:17,680 --> 01:28:21,840
परमानंद तीर्थ हां इस श्लोक का बाद में अनुवाद करते रहना आप इस श्लोक का बाद

1301
01:28:21,840 --> 01:28:26,000
में अनुवाद करते रहना आप तो उनके गीता के

1302
01:28:26,000 --> 01:28:30,000
उपरोक्त सिद्धांतों को स्वीकार कर सकते हैं। यदि वे स्वीकार नहीं करते

1303
01:28:30,000 --> 01:28:34,080
गीता का सिद्धांत नहीं है तो उनके अपने साथ घटित हुई गीता में जो ये उन्होंने

1304
01:28:34,080 --> 01:28:38,080
लिखा हुआ है ये वचन जो लिखा हुआ है इस विचार को हां वो क्या स्वीकार

1305
01:28:38,080 --> 01:28:42,160
कर पाएंगे या नहीं ऐसा बोल रहे हैं यदि वे स्वीकार नहीं करते

1306
01:28:42,160 --> 01:28:46,400
तो उनको मायावादी संप्रदाय के अंतर्गत घसीटने का व्यर्थ चेष्टा

1307
01:28:46,400 --> 01:28:50,400
ही क्यों करते हैं श्रीधर स्वामी की गीता के टीका के संबंध

1308
01:28:50,400 --> 01:28:54,400
में एक आश्चर्यजनक इतिहास है वह घटना इस प्रकार

1309
01:28:54,400 --> 01:28:58,720
है एक समय श्रीधर स्वामी समस्त तीर्थों का भ्रमण करते-करते

1310
01:28:58,720 --> 01:29:02,800
काशी में पधारे। उन्होंने वहां कुछ दिनों तक ठहर कर गीता

1311
01:29:02,800 --> 01:29:06,960
की सुबोधनी टीका लिखी और सर्वप्रथम वहां के पंडित समाज

1312
01:29:06,960 --> 01:29:10,960
ने उसे चालू करने के लिए प्रयत्न किया। किसने? श्रीधर स्वामी जी

1313
01:29:10,960 --> 01:29:15,040
ने। तो अब टीका के सिद्धांतों को अद्वैतवाद बैकग्राउंड।

1314
01:29:15,040 --> 01:29:19,440
हां गुजरात। वही हां काफी लंबा हो गया। हम बहुत विस्तार से समझाया। ये हमारे आचार्यों

1315
01:29:19,440 --> 01:29:23,600
का तो वही बता रहा हूं। इसमें पहली बात ये कि आ जाती है आचार्य। अब इस पर क्या है ना इस

1316
01:29:23,600 --> 01:29:27,760
पर या तो आप इनकी मानो या उनकी मानो। विद्वानों

1317
01:29:27,760 --> 01:29:32,000
का मतभेद है। नहीं नहीं नहीं ऐसे नहीं है। इसमें हम बहुत सी चीज़ हैं। इन्होंने जो तर्क दिए हैं उसको

1318
01:29:32,000 --> 01:29:36,080
उस पे बात करेंगे। तो पहली बात तो यह है कि किसी ने क्या

1319
01:29:36,080 --> 01:29:40,480
अपने उसमें उनका उल्लेखित किया कि नहीं किया वो तो एक अलग बात है। मगर अब

1320
01:29:40,480 --> 01:29:44,560
उस पे आ जाए कि जो एक कृपा वाली बात उन्होंने कही है कि भाई उनकी कृपा है मुझ

1321
01:29:44,560 --> 01:29:48,640
पर। तो मुझ पे भी जो श्री संप्रदाय के जो माधवाचार्य शास्त्री जी हैं उनकी

1322
01:29:48,640 --> 01:29:52,720
कृपा है। उन्होंने क्यों नामक ग्रंथ ग्रंथ में बहुत मदद की है हम हिंदुओं की। है ना?

1323
01:29:52,720 --> 01:29:56,880
और वो भी कहते हैं कृपात्री जी महाराज जो शंकर संप्रदाय के हैं उन्होंने बहुत मदद

1324
01:29:56,880 --> 01:30:00,960
की है। कई अंशों में वो जो है उनके गुरु हैं तो वो

1325
01:30:00,960 --> 01:30:04,960
कृपा वो कृपा मानते हैं। तो कृपा किसी की भी हो सकती है।

1326
01:30:04,960 --> 01:30:09,280
कई वैदिक संप्रदाय हैं प्रामाणिक हैं। अब आगे की बात ये आती है

1327
01:30:09,280 --> 01:30:13,440
कि हम ये मान लेते हैं कि भाई जो हिस्ट्री वाली बात है कि इसकी हिस्ट्री क्या है? वो शब्द

1328
01:30:13,440 --> 01:30:17,680
प्रमाण पे चलती है। हमारे जो आचार्य हैं वो ये कह रहे हैं कि वो हमारे थे।

1329
01:30:17,680 --> 01:30:21,680
शंकर संप्रदाय के थे। अपने समय के वो शंकराचार्य की गद्दी

1330
01:30:21,680 --> 01:30:25,760
पे बैठे थे। शंकराचार्य। ठीक है? आपका कहना है कि वो गद्दी की बात तो हुई

1331
01:30:25,760 --> 01:30:29,840
नहीं कि वो बैठे थे कि नहीं बैठे थे। गद्दी की बात नहीं हुई ना? अच्छा ठीक है।

1332
01:30:29,840 --> 01:30:33,840
तो दूसरी बात ये है कि अब पहली बात ये आ जाती

1333
01:30:33,840 --> 01:30:34,560
है कि अगर वो

1334
01:30:34,560 --> 01:30:38,800
विष्णु स्वामी संप्रदाय के थे हां। तो आप चैतन्य महाप्रभु

1335
01:30:38,800 --> 01:30:42,800
को विष्णु स्वामी संप्रदाय का क्यों नहीं मानोगे? पहली बात। दूसरी बात। दूसरी

1336
01:30:42,800 --> 01:30:47,120
बात कि आपके पास वह जो अह

1337
01:30:47,120 --> 01:30:51,200
भागवत का ज्ञान आया है यदि सीधा स्वामी का तो आपके यहां वो गीता

1338
01:30:51,200 --> 01:30:55,200
वो भागवत क्यों नहीं रखी है बुक बुक स्टॉल्स में सीधा स्वामी की

1339
01:30:55,200 --> 01:30:59,600
है ना और तीसरी बात कि श्रीधर

1340
01:30:59,600 --> 01:31:04,000
स्वामी ने स्पष्ट कई जगहों पर भगवान शिव को ही

1341
01:31:04,000 --> 01:31:08,640
परमेश्वर के रूप में उसमें स्वीकार किया है और यह बात आप भी कह रहे हो कि कई जगह मायावादी

1342
01:31:08,640 --> 01:31:12,880
टच मिलता है। वह मायावादी टच आपके यहां एज़ इट इज़ क्यों नहीं है?

1343
01:31:12,880 --> 01:31:17,200
अगर आपका ज्ञान एज़ इट इज़ है तो। यह दिक्कत आ जाती है। अह चैतन्य

1344
01:31:17,200 --> 01:31:21,200
महाप्रभु और आपने एक बात और कही थी कि कही संप्रदाय में

1345
01:31:21,200 --> 01:31:25,280
भाष्य में तो अंतर होगा। अनुवाद में नहीं होगा मगर है अनुवाद में अंतर है भगवत

1346
01:31:25,280 --> 01:31:29,280
गीता आपके यहां की जो वो है 4 24 उसमें जो है

1347
01:31:29,280 --> 01:31:33,440
ब्रह्म का अर्थ जो है कृष्ण भावना भावित कर दिया है हां कृष्ण पर व्याख्या करते

1348
01:31:33,440 --> 01:31:37,680
हैं तो तो इसका मतलब वो भाष्य अपने भाष्य को अनुवाद में भी डाल रहे हैं

1349
01:31:37,680 --> 01:31:41,760
आपकी वाली बात वो वाली बात गलत है कि अनुवाद के साथ छेड़छाड़ नहीं होती

1350
01:31:41,760 --> 01:31:43,840
90% नहीं होती है थोड़ा बहुत

1351
01:31:43,840 --> 01:31:47,840
तो अब आप अपनी कही हुई बातों से ढुलमल हो जाते हो नहीं ऐसा नहीं है अपनी कही

1352
01:31:47,840 --> 01:31:52,160
बात नहीं है ये बात है ही नहीं हां तो अब उन दो प्रश्नों का आप जवाब

1353
01:31:52,160 --> 01:31:56,320
चैतन्य महाप्रभु कि अगर वह विष्णु स्वामी संप्रदाय के थे

1354
01:31:56,320 --> 01:32:00,640
तो आप चैतन्य महाप्रभु को विष्णु स्वामी संप्रदाय का मान चैतन्य महाप्रभु गुरु हैं ईश्वरी

1355
01:32:00,640 --> 01:32:04,640
पूरीपाद तो उनको विष्णु स्वामी समझ व्याख्या किसने दी है तात्विक

1356
01:32:04,640 --> 01:32:08,720
व्याख्या ईश्वरी प्रपाद से उन्होंने ये पंडरपुर में ईश्वरी

1357
01:32:08,720 --> 01:32:12,800
प्रभुपाद ने उनको ईश्वरपाद भागवत समझाना

1358
01:32:12,800 --> 01:32:15,440
ही एकमात्र वो नहीं है

1359
01:32:15,440 --> 01:32:19,600
दीक्षा गुरु मंत्र कहां से मिला यह महत्वपूर्ण है मंत्र मिला

1360
01:32:19,600 --> 01:32:23,840
है ईश्वर गुरुपाल जी से हां यानी कि आपका जो परंपरा प्राप्त ज्ञान

1361
01:32:23,840 --> 01:32:28,000
है वो आ रहा है विष्णु स्वामी संप्रदाय से। नहीं हां हमारा ज्ञान सभी वैष्णव

1362
01:32:28,000 --> 01:32:32,000
आचार्य से आ रहा है। हम लोग श्रीधर स्वामी की भी भागवत टीका लेते

1363
01:32:32,000 --> 01:32:36,000
हैं। हम लोग श्रीपाद वल्लभाचार्य की सुबोधनी टीका भी लेते

1364
01:32:36,000 --> 01:32:40,000
हैं। हम क्योंकि वैष्णव के जो भाष्य है मतलब आप आपकी कोई एक परंपरा नहीं

1365
01:32:40,000 --> 01:32:44,000
है। ज्ञान के मामले में यस भागवत की टीका के मामले में। क्योंकि टीका है तो हम सबका

1366
01:32:44,000 --> 01:32:48,160
लेते हैं। भागवत की टीका नहीं ज्ञान के मामले ज्ञान तो बहुत है। गीता का ज्ञान भी है, भागवत

1367
01:32:48,160 --> 01:32:52,720
का ज्ञान भी है। ज्ञान के मामले में आपका ज्ञान किस परंपरा का? कौन से ज्ञान का?

1368
01:32:52,720 --> 01:32:56,800
धर्म का ज्ञान, ईश्वर का ज्ञान। धर्म ब्रह्म का ज्ञान। ऐसा नहीं है।

1369
01:32:56,800 --> 01:33:00,800
टीकाओं की बात जहां की बात हो रही है। भाई आपके आगे दो मुख्य ग्रंथ कौन से

1370
01:33:00,800 --> 01:33:04,880
हैं? हमारे जो मुख्य ग्रंथ है वो श्रीमद् भागवत और भगवत गीता

1371
01:33:04,880 --> 01:33:09,040
है। यही है ना? उसमें से एक जो भगवत गीता है। यानी कि मान लीजिए आधे

1372
01:33:09,040 --> 01:33:13,280
से भी बड़ा हिस्सा क्योंकि वो एक वृहद ठीक है। ग्रंथ है।

1373
01:33:13,280 --> 01:33:17,280
भागवत। तो भागवत जो है आपके यहां आ रही है

1374
01:33:17,280 --> 01:33:21,680
विभिन्न परंपराओं से बल्कि श्री स्वामी से आ रही है। मूल

1375
01:33:21,680 --> 01:33:25,840
भागवत तो सुखदेव गोस्वामी से आ रही है हमारी परंपरा में।

1376
01:33:25,840 --> 01:33:30,160
टीका किसका आ रहा है? सुखदेव गोस्वामी तो सबके हैं। हां। सुखदेव गोस्वामी

1377
01:33:30,160 --> 01:33:30,960
को कौन

1378
01:33:30,960 --> 01:33:34,960
डिनाई कर रहा है? जितने संप्रदाय हैं सब में श्रीधर स्वामी की टीका सबसे पहले आती

1379
01:33:34,960 --> 01:33:38,960
है। उसके बाद अन्य आचार्य ने अपने अपनी-अपनी टीका है

1380
01:33:38,960 --> 01:33:43,040
भागवत पे। वल्लभाचार्य जी की अपनी टीका है भागवत पे। हमारी परंपरा में

1381
01:33:43,040 --> 01:33:47,040
तीन टीकाएं हैं। जीव गोस्वामी की वैष्णवतोषणी विश्वनाथ जी की

1382
01:33:47,040 --> 01:33:51,120
सार्थ दर्शनी हम वो तो बाद में आए ना जीव गोस्वामी महाप्रभु ने उनको

1383
01:33:51,120 --> 01:33:55,280
आदेश दिया महाप्रभु के पास जो आई थी टीका उस समय

1384
01:33:55,280 --> 01:33:59,280
तो एक ही टीका थी श्रीधर स्वामी जी की तो ये कोई सनातन सिद्धांत नहीं है कि वो एक

1385
01:33:59,280 --> 01:34:01,760
ही टीका है तो उसको आपने मान लिया फिर भी वो आपका गुरु नहीं

1386
01:34:01,760 --> 01:34:05,840
माना जाएगा गुरु तो है ही कौन बोल रहा नहीं है वो तो गुरु है सबके क्या होता है सबके

1387
01:34:05,840 --> 01:34:09,840
गुरु है अब कौन से गुरु हम तो शिक्षा गुरु बोलेंगे शिक्षा गुरु नहीं ये शास्त्र

1388
01:34:09,840 --> 01:34:14,080
में कहां दिया है जीव गोस्वामी लिख रहे हैं शास्त्र शास्त्र में भी जीव गोस्वामी

1389
01:34:14,080 --> 01:34:18,080
उधित कर रहे हैं। मैं आपको भेजूंगा प्रमाण। पूछो ना अपने आचार्य से। नहीं भेजूंगा मैं आपको। प्रमाण प्रमाण

1390
01:34:18,080 --> 01:34:21,920
वो वो तो आप जीव गोस्वामी का भेज रहे हैं। उन्होंने जो उध गुरु का अर्थ जो

1391
01:34:21,920 --> 01:34:26,320
शास्त्र में दिया है अद्वैतका उपनिषद में वो है जो आपके

1392
01:34:26,320 --> 01:34:30,480
गुरु बहुत सारे हैं। ऐसे तो उन्होंने 24 गुरु बनाए भागवत में। हम्म

1393
01:34:30,480 --> 01:34:34,720
तो गुरु जो है मैं आपको बता रहा हूं ना जो मुख्य गुरु कौन है? जो आपको तत्व

1394
01:34:34,720 --> 01:34:38,880
की व्याख्या दे और तत्व की व्याख्या है भागवत में। श्रीधर स्वामी जी से डायरेक्ट

1395
01:34:38,880 --> 01:34:43,040
तो नहीं सीखा उन्होंने। तो किससे? तो जिससे भी सीखा वह सीधा स्वामी का

1396
01:34:43,040 --> 01:34:47,600
हुआ। भाई जिससे भी सीखा जैसे उन्होंने जैसे

1397
01:34:47,600 --> 01:34:51,600
देखो आप एक बात आप छोड़ो मत वल्लभाचार्य जी की मैं आप विषय

1398
01:34:51,600 --> 01:34:55,920
मत करो अभी अभी मैं पहले बात नहीं वो आपने बात की

1399
01:34:55,920 --> 01:35:00,480
सुनिए तो आपने कहा श्रीधर स्वामी से नहीं सीखा तो जिससे सीखा

1400
01:35:00,480 --> 01:35:04,640
वो अगर श्रीधर स्वामी का ग्रंथ पढ़ा रहा है तो श्रीधर स्वामी का हुआ तो परंपरा आपकी

1401
01:35:04,640 --> 01:35:08,640
उधर चली गई ऐसा नहीं है वैष्णव आचार्यों की टीकाओं को

1402
01:35:08,640 --> 01:35:12,720
आप प्रमाण के रूप में ले सकते हो कि ये हमारे इन आश्रय

1403
01:35:12,720 --> 01:35:17,040
ने ऐसा कहा है। उन्होंने ऐसा कहा है। जैसे हम श्रीपाद बल्लवाचार्य की टीका

1404
01:35:17,040 --> 01:35:21,040
लेते हैं। तो एक श्लोक पर तो यह बताइए कि इसका मतलब यह माना

1405
01:35:21,040 --> 01:35:25,040
जाए कि आपके पास जो भागवत है सभी आचार्यों की जो भागवत

1406
01:35:25,040 --> 01:35:29,200
का ज्ञान है वो परंपरा प्राप्त नहीं है। वो ऐसे ही किसी से भी ले लिया। ऐसा नहीं है। चारों

1407
01:35:29,200 --> 01:35:33,360
परंपरा चारों परंपरा सुखदेव गोस्वामी जिन्होंने जो भाष्य

1408
01:35:33,360 --> 01:35:37,120
दिया है वो सब हमारे पास है। हम उसी कहां है? श्रीधर स्वामी

1409
01:35:37,120 --> 01:35:41,200
आ गए ना? हां प्रभुपाद ने लिखा हुआ है भागवतम में। श्रीधर स्वामी आ गए ना बीच में।

1410
01:35:41,200 --> 01:35:45,440
श्रीधर स्वामी आए हैं। जीव गोस्वामी आए हैं। वल्लभाचार्य गोस्वामी तो बाद में भैया

1411
01:35:45,440 --> 01:35:49,440
मैं पूछ रहा हूं जो महाप्रभु हैं उनसे पहले की बात हां श्रीधर

1412
01:35:49,440 --> 01:35:53,440
स्वामी तो सबके गुरु हैं। सभी वैष्णवों के हैं वो तो गुरु एक शंकराचार्य के भी गुरु

1413
01:35:53,440 --> 01:35:57,600
हैं। सबके गुरु हैं वो उसमें मायावारी टच है। नहीं वो तो आपने माना है। वो

1414
01:35:57,600 --> 01:36:01,600
तो मैंने नहीं माना है। मैं तो नहीं बोल रहा हूं। माना है जो आप प्रभुपाद जी

1415
01:36:01,600 --> 01:36:06,320
को नहीं मानते। ये तो हमारे गौ वैष्णव लिखा हुआ है। आचार्य आप मानते हो कि नहीं?

1416
01:36:06,320 --> 01:36:10,480
अब मायावाद टच है कि नहीं है तो फिर यह जो पढ़ा है

1417
01:36:10,480 --> 01:36:14,720
मैंने जो पढ़ा जिसको जिसको प्रमाण के रूप में कर रहे हैं उसी के ऊपर आशंका

1418
01:36:14,720 --> 01:36:18,880
नहीं नहीं जो प्रमाण है मतलब जो हिस्ट्री उसकी हिस्ट्री सही है मगर उसका

1419
01:36:18,880 --> 01:36:19,840
ये वाला बात गलत है

1420
01:36:19,840 --> 01:36:24,000
कि उसमें मायावादी टच पूरी बात नहीं सुनना चाह रहे हो वो गीता की बात कर रहे थे वहां पे

1421
01:36:24,000 --> 01:36:28,000
भागवत की टीका की बात नहीं कर रहे थे मायावा टच वो गीता की टीका की बात यानी

1422
01:36:28,000 --> 01:36:32,000
कि एक व्यक्ति अपने गीता में अलग तात्विक व्याख्या करता है और

1423
01:36:32,000 --> 01:36:36,400
भागवत में अलग तात्विक व्याख्या वो इसलिए कर रहा है बोल रहा है कि पहले वो अतवादी

1424
01:36:36,400 --> 01:36:40,480
थे। बाद में तो ये मेंशन किया है कि गीता पहले लिखा है और भागवत बाद में

1425
01:36:40,480 --> 01:36:43,760
अब ये तो शोध का विषय है। ये तो शोधत का ये गलत बात है। ये

1426
01:36:43,760 --> 01:36:48,000
तो शोध का विषय है। तो उन्होंने कहीं मेंशन किया कि मैंने अपनी गीता में गलत लिख दिया है। ये

1427
01:36:48,000 --> 01:36:52,080
ये तो अब उन आचार्यों से का विषय है। तो ये मानना पड़ेगा ना हमें

1428
01:36:52,080 --> 01:36:56,160
कि उन्होंने अपनी गीता को लास्ट तक गीता रखा। मतलब जैसे मैंने कहीं कुछ कह

1429
01:36:56,160 --> 01:37:00,240
दिया और बाद में मुझे पता चला कि भाई मैंने गलत कह दिया तो फिर बाद में बताऊंगा ना।

1430
01:37:00,240 --> 01:37:04,640
अगर मैं सार रूप में कहूं श्रीधर स्वामी की टीका को

1431
01:37:04,640 --> 01:37:08,800
सभी वैष्णव आचार्य ने ग्रहण किया है। नंबर एक नंबर

1432
01:37:08,800 --> 01:37:13,040
दो नहीं मधवा संप्रदाय में नहीं किया गया और मधवा संप्रदाय वालों

1433
01:37:13,040 --> 01:37:17,200
की एक तरीके से नाराजगी इसीलिए है क्योंकि चैतन महाप्रभु अगर

1434
01:37:17,200 --> 01:37:21,200
मधवा संप्रदाय के हैं यानी कि उनके वो गुरु माधुर्य क्या

1435
01:37:21,200 --> 01:37:25,280
नाम मेरे पास उनका क्या नाम था मेरे पास जितना प्रमाण था मैंने आपको

1436
01:37:25,280 --> 01:37:29,920
दे दिया है नहीं अब इस पर जो डिटेल है जो तर्क वितर्क है

1437
01:37:29,920 --> 01:37:34,080
वो नहीं मधवाचार्य परंपरा की नाराजगी इसीलिए है कि आप

1438
01:37:34,080 --> 01:37:38,080
भैया श्रीधर स्वामी का टीका लिख ले इसका प्रमाण कहां है वो मुझे बताइए आप ये जो

1439
01:37:38,080 --> 01:37:42,640
आप बोल रहे हो आप अपना प्रमाण बताइए मैं तो बता ही रहा हूं आपको ये वाला आनंद तीर्थ जी से कनेक्टेड

1440
01:37:42,640 --> 01:37:46,880
ये तो मैंने गिनाया आपका नाम ये तो आपने फोटो लिखा है उसके नीचे नाम लिखा गिनाया मैंने

1441
01:37:46,880 --> 01:37:51,120
और मैं ये लेटर थोड़ी ना है कि आप जिन आप देखिए मैंने आपसे वो तर्क

1442
01:37:51,120 --> 01:37:55,120
भी किया कि मैं शंकराचार्य जी का शिष्य हूं मगर मैं तब तक

1443
01:37:55,120 --> 01:37:58,800
शंकराचार्य जी का प्रतिनिधि बन के बात नहीं कर सकता जब तक वो अलऊ

1444
01:37:58,800 --> 01:38:02,880
नहीं करे मुझे अलऊ वाला प्रमाण चाहिए होगा वो अलऊ वाला

1445
01:38:02,880 --> 01:38:07,120
प्रमाण कहीं पर हो किसी ने मेंशन किया हो जैसे मेरे गुरुदेव है मान हम

1446
01:38:07,120 --> 01:38:11,120
मेरे गुरुदेव ने मुझे आचार्य पाठ के लिए नहीं किया और

1447
01:38:11,120 --> 01:38:14,160
दीक्षा नहीं मैं बात पूरी कर लेता हूं सुनिए एग्जांपल

1448
01:38:14,160 --> 01:38:18,160
बता रहा हूं एक छोटी सी बात दीक्षा वाली बात आप कह रहे हैं कि दीक्षा गुरु

1449
01:38:18,160 --> 01:38:22,320
कौन है दीक्षा गुरु यदि मधवाचार्य जी है तो फिर आपका गौ वैष्णव अलग से कैसे

1450
01:38:22,320 --> 01:38:26,400
बन जाएगा इसलिए हमारे संप्रदाय का नाम है ब्रह्म मध गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय

1451
01:38:26,400 --> 01:38:30,480
क्यों अंतर क्यों आ रहा है एज इट इज आना चाहिए ना अंतर नहीं आप अपनी गीता भाव के अनुसार

1452
01:38:30,480 --> 01:38:34,480
अंतर आप अपनी गीता को क्या कह रहे हो बताओ हम भाव के अनुसार कह रहे हो कि

1453
01:38:34,480 --> 01:38:38,320
एज इट इज कह रहे हो भाव के अनुसार है तो वो तो लिखा तो एज इट इज है

1454
01:38:38,320 --> 01:38:42,400
हमारे आचार्यों ने हर आचार्यों ने गीता पर भाष्य लिखा है भक्ति में

1455
01:38:42,400 --> 01:38:45,600
ठाकुर जी ने भक्ति सिद्धांत ठाकुर जी ने बलदे

1456
01:38:45,600 --> 01:38:49,680
विद्या भूषण जी ने दूसरा किया विश्वनाथ जी ने सभी ने भाष्य लिखा ने दूसरा

1457
01:38:49,680 --> 01:38:53,680
किया है आप कह रहे हो एज इट इज है जो वहां था वही एज इट इज मतलब होता है

1458
01:38:53,680 --> 01:38:57,920
जो वहां था वो जो वहां था वही आया ठीक है मगर आप क्या कर रहे हो कि वहां से मंत्र

1459
01:38:57,920 --> 01:39:02,160
आया फिर हम लोग हो गए ब्रह्म गौड या वैष्णव संप्रदाय यानी कुछ

1460
01:39:02,160 --> 01:39:06,160
उसमें ऐड ऑन वगैरह किया ऐड ऑन कुछ नहीं किया हुआ है जो मधवाचार

1461
01:39:06,160 --> 01:39:06,800
से आ रहा है वही आ

1462
01:39:06,800 --> 01:39:11,280
रहा है। वही आ रहा है। अच्छा और वह चैतन्य महाप्रभु ने केवल उपासना पद्धति

1463
01:39:11,280 --> 01:39:15,440
भाव पद्धति को ऐड किया बस उसमें। यानी ज्ञानी की कुछ है जो नहीं

1464
01:39:15,440 --> 01:39:19,440
है वहां पे। यस तो एज इट इज़ नहीं है फिर। कुछ चीजें एज

1465
01:39:19,440 --> 01:39:23,520
इट इज़ नहीं है लेकिन अलग भी नहीं है। ये कह सकते हो आप। ऐसे तो दुनिया में कुछ भी

1466
01:39:23,520 --> 01:39:27,520
अलग नहीं है। हां। देखिए जैसे एक स्वान है वो दांतों

1467
01:39:27,520 --> 01:39:30,000
से चबा के खाना खाता है। इसीलिए वर्णन

1468
01:39:30,000 --> 01:39:34,240
आया गया कि चारों वैष्णव संप्रदाय की शाखा हुई है। ये वाली जो जैसे सीताराम

1469
01:39:34,240 --> 01:39:38,320
की उपासना है। सुनिए सुनिए जो जो रामानंद वैष्णव है आपने कहा ना कुछ चीजें

1470
01:39:38,320 --> 01:39:42,400
अलग हैं। कुछ चीजें नहीं भी है। तो उसका कारण है। उसका कारण आप सुनना ही नहीं चाह रहे

1471
01:39:42,400 --> 01:39:46,640
हो। मैं कैसे बताऊंगा? नहीं मैं मैं उस नहीं मैं पहले कारण तो बताऊं क्यों अलग है? हां ठीक है।

1472
01:39:46,640 --> 01:39:50,480
ठीक है। ठीक है। आप वो सुनना ही नहीं चाह रहे हो आप। ठीक ठीक है। रामानंदी

1473
01:39:50,480 --> 01:39:54,480
वैष्णव आपने सुना होगा। जी जिसमें तुलसीदास जी आते हैं। हां

1474
01:39:54,480 --> 01:39:58,480
हां तो राम जींदी वैष्णव किसके उपासक हैं? राम

1475
01:39:58,480 --> 01:40:02,480
जी के। सीताराम के उपासक है ना? हां। और जो रामानुज वैष्णव

1476
01:40:02,480 --> 01:40:06,480
है वो किसके उपासक हैं? विष्णु के। वो लक्ष्मी नारायण के उपासक हैं। हां।

1477
01:40:06,480 --> 01:40:10,560
लेकिन जो रामानुज संप्रदाय है उसी की तो उपशाखा रामानंदी संप्रदाय है।

1478
01:40:10,560 --> 01:40:14,560
वो उन्होंने सिद्ध कर दिया। एक शास्त्रार्थ में उज्जैन में हुआ था। उसमें उन्हें विजय

1479
01:40:14,560 --> 01:40:18,800
प्राप्त हुई थी। उन्होंने अपने आप को अलग कर लिया था। उनकी उत्पत्ति

1480
01:40:18,800 --> 01:40:22,960
बिल्कुल स्वतंत्र रूप से है। वो हो सकता है आजकल ऐसा विचार आया हो

1481
01:40:22,960 --> 01:40:27,200
जो जो संप्रदाय वाले भी स्वीकार किए उस बात को और रामानंदियों

1482
01:40:27,200 --> 01:40:31,280
ने भी स्वीकार किया उस बात को। दोनों ने स्वीकार किया। अलग है। उन्होंने सिद्ध किया।

1483
01:40:31,280 --> 01:40:35,600
एक शास्त्रार्थ हुआ उज्जैन में मेरे ख्याल से अभी कुछ शताब्दियों पहले हुआ होगा।

1484
01:40:35,600 --> 01:40:39,680
उसमें वो सिद्ध कर लिया। वो स्वतंत्र है। अलग है। हो सकता है लेकिन जो हमने पढ़ा जो

1485
01:40:39,680 --> 01:40:43,760
हमारे आचार्य ने बताया मैं आपको बता रहा हूं। उस आधार पर सही ना फिर तो बात ही ये हो जाएगी।

1486
01:40:43,760 --> 01:40:47,760
हमारे आचार्यों ने ये कहा है आपके आचार्यों ने। वो अलग है। वो अलग है। खैर वो

1487
01:40:47,760 --> 01:40:51,760
बात यह हो रही है कि अगर कहीं पे कुछ हो भी गया है उसको हम उदाहरण नहीं

1488
01:40:51,760 --> 01:40:56,320
ले सकते। तस्मा शास्त्र प्रमाण गौर वैष्णव जो चैतन्य महाप्रभु

1489
01:40:56,320 --> 01:41:00,560
को मध्य संप्रदाय में स्वीकार सभी ने किया है। उनके जो अनुगत

1490
01:41:00,560 --> 01:41:04,560
प्रियजन है विशेषकर षट गोस्वामीियों ने षड गोस्वामी

1491
01:41:04,560 --> 01:41:08,560
हमारे परमा देखिए मैं मैं आपको वो लेटर यहां लगा भी दूंगा। वो लेटर हमें

1492
01:41:08,560 --> 01:41:12,640
प्राप्त है जिस लेटर में जो मध्य संप्रदाय उन्होंने स्टेट

1493
01:41:12,640 --> 01:41:16,800
ये बिल्कुल स्टेटमेंट दिया है इस हमारे यहां से नहीं है

1494
01:41:16,800 --> 01:41:21,200
इस हमसे कनेक्टेड नहीं हां उन्होंने एक पत्र और जारी किया है जिसमें उन्होंने इस की प्रशंसा

1495
01:41:21,200 --> 01:41:25,520
की है इतने अंशों में तो हम भी करते हैं प्रभुपाद जी की प्रशंसा कई अंशों में भैया

1496
01:41:25,520 --> 01:41:29,600
अच्छा लगता है कहीं-कहीं पे कुछ कुछ चीजें हैं ऐसी जैसे अभी मैं मंदिर में आया

1497
01:41:29,600 --> 01:41:33,760
तो मंदिर में मुझे आपने बताया कि भाई जहां यहां पे स्त्रियों का यज्ञ पवित

1498
01:41:33,760 --> 01:41:37,840
नहीं होता तो भैया इतनी तो कृपा की ना इस ने वहां वहां आर्य समाज

1499
01:41:37,840 --> 01:41:42,000
वाले तो स्त्रियों का भी जनेऊ करा रहे हैं। है ना? तो उतनी तो कृपा

1500
01:41:42,000 --> 01:41:42,880
की। अब यहां पे

1501
01:41:42,880 --> 01:41:47,120
कम से कम भगवान मेरा सार में यही कहने का तात्पर्य

1502
01:41:47,120 --> 01:41:51,440
है कि जीव गोस्वामी जी जो हमारे गय वैष्णव के तत्वाचार्य

1503
01:41:51,440 --> 01:41:55,520
कहलाते हैं। हम जिन्होंने 4 लाख श्लोक लिखे हुए हैं।

1504
01:41:55,520 --> 01:41:59,600
इतने बड़े विद्वान है वो। उन्होंने चैतन्य महाप्रभु को मध्य

1505
01:41:59,600 --> 01:42:03,680
संप्रदाय में स्वीकार किया है। अब वो हमारे लिए प्रमाण है। अब इस

1506
01:42:03,680 --> 01:42:08,000
पर मैं विस्तार नहीं बोल सकता हूं। बात यह है

1507
01:42:08,000 --> 01:42:12,240
कि अगर श्रीधर स्वामी वैष्णव थे और विष्णु स्वामी

1508
01:42:12,240 --> 01:42:16,240
संप्रदाय के थे तो आपको यह कहना चाहिए कि हमारा भागवत का जो ज्ञान

1509
01:42:16,240 --> 01:42:20,240
है वो विष्णु स्वामी संप्रदाय का ज्ञान है। नहीं हमारा जो भागवत का ज्ञान

1510
01:42:20,240 --> 01:42:24,400
है और और जहां से आप यह मेंशन कर रहे हैं ना यह कहानी खिचड़ी जो सुनी अभी हमने

1511
01:42:24,400 --> 01:42:28,560
उसी में वह व्यक्ति कह रहा है कि मायावादी टच है उसमें भागवत में तो आप

1512
01:42:28,560 --> 01:42:32,720
अपनी भागवत में मायावादी को क्यों नहीं ले रहे मायावादी सिद्धांत को हमारे

1513
01:42:32,720 --> 01:42:36,800
जो भागवत है हमारे भागवत और उनका उनका जो सरनेम है

1514
01:42:36,800 --> 01:42:40,000
तीर्थ हमारे भागवत में चार आचार्य

1515
01:42:40,000 --> 01:42:44,080
गुरु का हां हमारे आ भागवत में ये सन्यासी का जो टैग

1516
01:42:44,080 --> 01:42:48,400
है परमानंद तीर्थ वो दूसरा विषय हिस्टोरिकल उस पर मैं चर्चा नहीं करना चाहूंगा

1517
01:42:48,400 --> 01:42:52,960
तो मैं अपने भागवत की बात बता रहा हूं। मैं विष्णु स्वामी वो अलग विषय है। भागवत

1518
01:42:52,960 --> 01:42:56,960
जो हमारी परंपरा में है उसमें मनगढ़ंत लिखा है क्योंकि ये

1519
01:42:56,960 --> 01:42:59,440
मायावादी वाली बात को तो ये भी नहीं मान रहे हैं।

1520
01:42:59,440 --> 01:43:03,520
पांच आचार्यों के भाष्य उनके विचार लिए

1521
01:43:03,520 --> 01:43:07,840
हैं। श्रीधर स्वामी श्रीपाद वल्लभाचार्य श्री जीव गोस्वामी

1522
01:43:07,840 --> 01:43:11,920
श्री विश्वनाथ चक्र ठाकुर श्रीपाद सनातन गोस्वामी

1523
01:43:11,920 --> 01:43:16,800
जी और माधवाचार्य जी इन आचार्यों के विचारों का समन्वय है

1524
01:43:16,800 --> 01:43:21,600
भागवत की भाष्य में और जो मूल अनुवाद है वो

1525
01:43:21,600 --> 01:43:26,400
पहले से चली आ रही है श्रीधर स्वामी जी ने जो मूल अनुवाद किया है वो

1526
01:43:26,400 --> 01:43:30,560
सार वैष्णव संप्रदाय में वही भागवत पढ़ी उसमें एक बात और लिखी है चैतन्य

1527
01:43:30,560 --> 01:43:34,720
चरितामृत में कि जो कोई भी श्रीधर स्वामी स्वामी के विरुद्ध जाकर

1528
01:43:34,720 --> 01:43:38,800
के हां वो वैश्य वैश्य तो अब यह बताइए कि आपके

1529
01:43:38,800 --> 01:43:39,600
व्यक्ति कह रहे हैं कि

1530
01:43:39,600 --> 01:43:43,600
सीधा स्वामी के भाष में कहीं-कहीं मायावादी टच मिलता है वो उनसे वो इस

1531
01:43:43,600 --> 01:43:47,680
तरह मैं नहीं जाऊंगा डिटेल में आप प्रश्न को घुमाइए मत अभी इस प्रश्न पर

1532
01:43:47,680 --> 01:43:51,760
आइए रखा है ना लेकिन वो प्रस्तुत किया आपने नहीं उनको माने कि नहीं मानते

1533
01:43:51,760 --> 01:43:55,760
वो आपकी मर्जी है अगर मुझसे आप पर आप मानते हैं कि नहीं मानते मैं तो मानता हूं तो मायावादी वाली

1534
01:43:55,760 --> 01:43:59,760
बात को मानते हैं बिल्कुल मानता हूं तो फिर मायावादी टच लिया कि नहीं लिया अब ये मैंने पढ़ा

1535
01:43:59,760 --> 01:44:03,840
नहीं है ना उसमें लिया क्या आपने अपनी भागवत को नहीं पढ़ा नहीं हमारी भागवत में नहीं लिया हुआ

1536
01:44:03,840 --> 01:44:07,920
है। भागवत में तो कहीं भी मायावा वो आप जिसको प्रमाण गीता की बात कर आप

1537
01:44:07,920 --> 01:44:11,920
जिसको प्रमाण मानते हैं वो कह रहा है कि उनके भाषण में मायावादी टच है। वो गीता की बात

1538
01:44:11,920 --> 01:44:16,400
कर रहे हैं। गीता लिखते समय तो वो मायावादी से वो पहले अद्वति बात थी ना पहले मायावा

1539
01:44:16,400 --> 01:44:20,400
ये बात उन्होंने कही है कि वो गीता का भाषण मेरा गलत है। वो थोड़ा डिटेल में शोध का विषय है।

1540
01:44:20,400 --> 01:44:24,400
पहले क्या लिखा? तो अभी तो राइट नाउ तो आप उसकी उनकी गीता को उनका ही

1541
01:44:24,400 --> 01:44:28,400
मानेंगे ना। मतलब जब मैं मेरा जब तक यह नहीं प्राप्त

1542
01:44:28,400 --> 01:44:32,480
है कि मैंने जो पहले कहा था वो गलत कहा था तब तक तो मेरी उस बात को भी मेरी

1543
01:44:32,480 --> 01:44:36,720
बात मानेंगे ना मैं समझा नहीं जैसे मैंने कुछ कह दिया कि मेरा नाम शिवशु

1544
01:44:36,720 --> 01:44:40,720
नारायण द्विवेदी है तो आप जो समझे नहीं मैं समझा तो रहा हूं हां मैंने

1545
01:44:40,720 --> 01:44:44,720
कहा मेरा नाम शिवशु नारायण द्विवेदी है 10 साल बाद मुझे पता लगा मेरे नाम में

1546
01:44:44,720 --> 01:44:48,880
नारायण गलत था नारायण नहीं है तो मैं घोषित घोषित करूंगा ना कि शिवश

1547
01:44:48,880 --> 01:44:52,880
द्विवेदी नाम है पहले मैंने गलत कहा था जब तक मैं घोषित नहीं करूंगा तब तक

1548
01:44:52,880 --> 01:44:57,440
लोगों के लिए यही है ना शिवश द्विवेदी ने अपना नाम बताया शिवाश नारायण द्विवेदी

1549
01:44:57,440 --> 01:45:01,520
इसी प्रकार से क्या उन्होंने कहीं घोषित किया कि मैं अपनी भागवत की जो भगवत

1550
01:45:01,520 --> 01:45:05,760
गीता है वो गलत लिख रहा हूं उसमें मायावादी टच है गलत नहीं लिख रहा हूं का

1551
01:45:05,760 --> 01:45:09,760
अरे मायावादी टच उन्होंने घोषित किया गलत था कि उन्होंने घोषित किया मैंने वो लिखा था गलत

1552
01:45:09,760 --> 01:45:13,840
कर दिया था अब वो तो शोध का विषय है ना तो अभी राइट नाउ तो वही प्रमाण माना जाएगा

1553
01:45:13,840 --> 01:45:17,920
ना कि मैं मैं मानूंगा आप भले मानो ना मानो आप समझे नहीं अभी आपने स्वीकार किया कि

1554
01:45:17,920 --> 01:45:21,200
जो मैंने पहले कह दिया है जब तक मैं घोषित करके उसका खंडन नहीं करता

1555
01:45:21,200 --> 01:45:25,200
हूं तब तक कि मैंने अपना नाम शिवश नारायण द्विवेदी जी का मैं कह रहा हूं कि जो

1556
01:45:25,200 --> 01:45:29,280
मैंने अभी आपको श्रीधर स्वामी जी के इसमें जीता आपने ये बात मानी ना कि मैं

1557
01:45:29,280 --> 01:45:33,280
अगर अपना नाम पूर्व में शिवशना आप मेरा उत्तर मैं

1558
01:45:33,280 --> 01:45:36,880
आपका उत्तर प्रश्न समझ गया मैं ये कह रहा हूं कि श्रीधर स्वामी के

1559
01:45:36,880 --> 01:45:40,960
विषय में जो मैंने आपको प्रमाण दिया हां मैं उसको सत्य मान

1560
01:45:40,960 --> 01:45:43,200
रहा हूं तो उसमें ही लिखा है ना कि

1561
01:45:43,200 --> 01:45:47,280
मायावादी टच लिख रहे थे वो भी सत्य मान रहा हूं तो फिर आपने आपको मानना है कि

1562
01:45:47,280 --> 01:45:51,280
नहीं मानना वो आपके ऊपर है आपने अपने ग्रंथों में मायावादी टच लिया कि नहीं हमारे ग्रंथ में नहीं

1563
01:45:51,280 --> 01:45:55,360
है तो फिर यहां पे गुरु विरोध हो गया अब वो आप आपकी मर्जी है। आप क्या सोच रहे हो? अरे

1564
01:45:55,360 --> 01:45:59,360
गुरु विरोध हो रहा है कि नहीं? नहीं वो आपकी भी विचार है। मैं इसका खुद ही बोलूंगा। तो यहां पे आप

1565
01:45:59,360 --> 01:46:00,640
भी छोड़ रहा हूं मैदान। हां, यहां

1566
01:46:00,640 --> 01:46:04,640
पे छोड़ रहा हूं मैं। मैं तो भैया परंपरा में जो बोला है जो आचार्य बोले

1567
01:46:04,640 --> 01:46:08,640
हैं मैं उसको मान सकता हूं। बाकी आप क्या मान रहे हो, क्या स्वीकार कर रहे

1568
01:46:08,640 --> 01:46:12,720
हो, क्या नहीं कर रहे हो? कुछ नहीं मानिए। आप जो समाज में बताएंगे,

1569
01:46:12,720 --> 01:46:16,720
उस पे हम कुछ समाज में तो हम आप समाज में बता रहे हैं कि हम

1570
01:46:16,720 --> 01:46:19,120
परंपरा से आ रहे हैं। मगर जब आपको देखा जा रहा है

1571
01:46:19,120 --> 01:46:23,280
तो आपकी परंपरा छिन्न-भिन्न हो रही है। फिर आप कह रहे हो कि मैं मानता हूं। वो आपका विचार हो

1572
01:46:23,280 --> 01:46:27,280
सकता है बट हमारे कहीं ना बोले चीज को जो आप क्लेम कर रहे हो उसमें

1573
01:46:27,280 --> 01:46:31,360
आप उत्तर नहीं दे रहे हो ना आप कह रहे हो बस मैं मानता हूं नहीं भाई हम तो मानेंगे ना शेरदेव

1574
01:46:31,360 --> 01:46:35,440
सही पहले अद्यतवादी थे वो तो मान ही रहे हैं हम हां अद्वैतवादी

1575
01:46:35,440 --> 01:46:39,520
थे तो इसलिए उस प्रभाव में आकर उन्होंने मायावाद टच लिखा ये कहां लिखा है कि अब

1576
01:46:39,520 --> 01:46:41,760
ये तो विस्तार में जाने से पता चलेगा कहां

1577
01:46:41,760 --> 01:46:45,920
लिखा है कि उस प्रभाव में आकर के उन्होंने लिखा बाद में उन्होंने वही वो शोध का विषय है

1578
01:46:45,920 --> 01:46:50,240
अभी के लिए मैं इतना मानता हूं ये शोध का विषय है कहां लिखा है विचार इस बात का प्रमाण

1579
01:46:50,240 --> 01:46:54,320
कहां है इस बात का प्रमाण अब विस्तार से देखना पड़ेगा कहां लिखा है

1580
01:46:54,320 --> 01:46:58,320
वह शोध का विषय है। हां तो फिर शोध का विषय तो यह है जो यह व्यक्ति कह रहा है। मेरी

1581
01:46:58,320 --> 01:47:02,400
बात शोध का विषय नहीं है। आपकी बात शोध का विषय है। आपकी बात भी शोध का

1582
01:47:02,400 --> 01:47:06,400
विषय है। मेरी बात भी शोध का विषय है। क्योंकि आपकी बात से ही निकल के आ रहा

1583
01:47:06,400 --> 01:47:10,400
है ना कि मायावादी टच लिखते थे। हम आपकी बात से ही तो निकल के आ रहा है। तो

1584
01:47:10,400 --> 01:47:14,560
बात ये वाली शोध का विषय है। वही मैं कि वो जो कह रहा है वो सत्य है कि

1585
01:47:14,560 --> 01:47:18,560
नहीं। हां वही शोध का विषय है ना। दूसरी बात यह वाली बात रही जा रही है कि

1586
01:47:18,560 --> 01:47:22,720
अगर वह विष्णु स्वामी संप्रदाय के भी थे तब भी वह विष्णु स्वामी

1587
01:47:22,720 --> 01:47:26,720
संप्रदाय का ज्ञान क्यों नहीं माना जाएगा? जब विष्णु स्वामी संप्रदाय की टीका आ

1588
01:47:26,720 --> 01:47:30,800
रही है। मान सकते हैं कि नहीं मान सकते? तो विष्णु स्वामी संप्रदाय का मिक्स आपकी परंपरा मिक्स

1589
01:47:30,800 --> 01:47:35,280
टीका है। मिक्स टीका है। सभी आचार्यों को लिया हुआ है प्रभुपाद जी ने अपने

1590
01:47:35,280 --> 01:47:39,280
तात्पर्यों में। नहीं एक कोई कोट ले लेना और पूरा पूरा ग्रंथ लेना पूरा

1591
01:47:39,280 --> 01:47:44,240
तात्विक विवेचना लेना और उन्होंने प्रभुपाद उन्होंने कहा है मैं

1592
01:47:44,240 --> 01:47:48,320
उनके कारण ही कृष्ण को जान पाया हूं भागवत को समझ पाया हूं तो पूरा

1593
01:47:48,320 --> 01:47:52,800
का पूरा तात्विक विवेचना ही उनसे हो गई चैतन्य महाप्रभु ये जो बात कह रहे हैं ना

1594
01:47:52,800 --> 01:47:56,800
ये जगन्नाथ पुरी में कह रहे हैं उससे पहले भी वो कृष्ण को जान रहे थे

1595
01:47:56,800 --> 01:48:00,880
उससे पहले भी वो कृष्ण की विरे में डूब रहे थे तो वो ये बता रहे हैं ना कि मैं

1596
01:48:00,880 --> 01:48:05,040
जो है जान पा वो अपना पुराना बता रहे उसका जो भाव है ना पुराना

1597
01:48:05,040 --> 01:48:09,040
नहीं पूरा मतलब उससे पहले तो श्रीधर स्वामी का जिक्र ही नहीं किया उन्होंने। वो तो

1598
01:48:09,040 --> 01:48:13,040
वल्लभाचार्य ने ऐसी बात बोल दी तब कहना पड़ा। नहीं तो यानी

1599
01:48:13,040 --> 01:48:17,120
उन्होंने झूठ बोला। झूठ नहीं बोला। वल्लभाचार्य जी हां वल्लभाचार्य

1600
01:48:17,120 --> 01:48:21,120
जी के अहंकार को वो करने के लिए झूठ ही तो हुआ। झूठ नहीं हुआ।

1601
01:48:21,120 --> 01:48:25,200
नहीं अहंकार को करने के लिए सत्य बोला या झूठ बोला? सत्य बोला है क्योंकि आप पूर्ववर्ती

1602
01:48:25,200 --> 01:48:26,640
आचार्य को क्रॉस नहीं कर सकते हो

1603
01:48:26,640 --> 01:48:31,200
ना। आप अब मैं बोल दूं मैंने परपाधि से अच्छे लिखा है। तो मतलब

1604
01:48:31,200 --> 01:48:35,200
ये तो मर्यादा का उल्लंघन हो गया ना। मैं बोलूंगा हां प्रभुपाद जी के

1605
01:48:35,200 --> 01:48:39,280
अनुगति मैंने लिखा है क्योंकि प्रभुपाद जी आपकी परंपरा में है इसलिए नहीं बोलोगे

1606
01:48:39,280 --> 01:48:43,440
ना वो तो उनकी परंपरा में नहीं है ना आचार्य तो है ना नहीं उनकी परंपरा में तो नहीं

1607
01:48:43,440 --> 01:48:47,520
उनकी परंपरा में चैतन्य महाप्रभु की वल्लभाचार्य जी की बात कर रहा हूं मैं चैतन्य महाप्रभु

1608
01:48:47,520 --> 01:48:50,960
की बात उनकी बात अभी नहीं कर रहा हूं ये बात आई क्यों अभी

1609
01:48:50,960 --> 01:48:54,960
क्या कहा कि अगर मैं कह दूं कि मैं जो है प्रभुपाद जी की टीका के विरुद्ध

1610
01:48:54,960 --> 01:48:58,960
लिख रहा हूं यही तो वल्लभाचार्य लिख के गए थे ना उनके

1611
01:48:58,960 --> 01:49:03,280
पास कि मैंने उनसे भी अच्छी टीका लिखी है तो प्रभुपाद जी जो

1612
01:49:03,280 --> 01:49:07,360
श्रीधर स्वामी जी हैं वो चैतन्य महाप्रभु की परंपरा के गुरु नहीं

1613
01:49:07,360 --> 01:49:11,680
थे। हमारी परंपरा के दीक्षा गुरु नहीं। आप प्रभुपाद जी के विरुद्ध इसलिए नहीं जाओगे

1614
01:49:11,680 --> 01:49:15,680
क्योंकि प्रभुपाद जी आपकी परंपरा के आचार्य हैं। आपके हिसाब से प्रभुपाद जी की

1615
01:49:15,680 --> 01:49:16,240
नहीं मैं

1616
01:49:16,240 --> 01:49:20,400
श्रीधर स्वामी किसी के विरुद्ध नहीं जाऊंगा क्योंकि वो आचार्य हैं। आपके

1617
01:49:20,400 --> 01:49:24,400
मायावादी भाष मायावादी भाष्य नहीं नहीं उनके विरुद्ध नहीं जाऊंगा मैं कभी। वो

1618
01:49:24,400 --> 01:49:28,400
तो उनके टीका ले रहे हैं। हम कहां विरुद्ध हैं भैया? नहीं विरुद्ध उनके हम। वो तो वैष्णव हैं।

1619
01:49:28,400 --> 01:49:32,480
वो तो भागवत के जगतगुरु हैं। वो कैसे जाएंगे? शंकराचार्य के विरुद्ध

1620
01:49:32,480 --> 01:49:34,960
जा रहे हो कि नहीं? नहीं जा रहे हैं। शंकराचार्य महान वैष्णव है।

1621
01:49:34,960 --> 01:49:39,200
आप मानते हो अद्वैत है। कौन? अंतिम सत्य अद्वैत है। मानते हो?

1622
01:49:39,200 --> 01:49:43,360
शंकराचार हां वेदों में कहा गया है अद्वैत। आप मानते हो कि नहीं? अद्वैत

1623
01:49:43,360 --> 01:49:47,360
है। अंतिम सत्य हम अद्वैत ही मानते हैं। हमारा ब्रह्म एक हो जाएगा। नहीं हम नहीं मानते। नहीं मानते

1624
01:49:47,360 --> 01:49:51,360
हो ना? तो फिर यहां विरुद्ध हो गए ना। विरुद्ध नहीं हो गए। हां। क्या हुआ? विरुद्ध कैसे हो गए?

1625
01:49:51,360 --> 01:49:55,360
तो क्या हुआ? शंकराचार्य सीमा से बाहर हो गए। हां। तो फिर

1626
01:49:55,360 --> 01:49:59,840
इसका मतलब ये नहीं कि हम उनका अपमान कर रहे हैं या मैं कहां कह रहा हूं? अपमान

1627
01:49:59,840 --> 01:50:04,000
कह रहा हूं। तो बात ये चल रही है जैसे शंकराचार्य का

1628
01:50:04,000 --> 01:50:08,720
बात खत्म ही नहीं होने दे रही शंकराचार्य जी के जैसा हम फिलॉसफी का खंडन कर रहे हैं ना

1629
01:50:08,720 --> 01:50:13,040
श्रीधर स्वामी की फिलोसफी का खंडन हम नहीं कर रहे हैं वो तो महान वैष्णव श्रीधर स्वामी श्रीधर

1630
01:50:13,040 --> 01:50:17,120
स्वामी महान वैष्णव हैं तो उनकी परंपरा क्या थी उनके गुरु का नाम

1631
01:50:17,120 --> 01:50:21,760
क्या था उनकी परंपरा उनके गुरु कौन थे इसकी जानकारी

1632
01:50:21,760 --> 01:50:25,760
मुझे नहीं है लेकिन चैतन्य महाप्रभु के वो गुरु नहीं है वो शिक्षा

1633
01:50:25,760 --> 01:50:29,920
गुरु हैं चैतन्य महाप्रभु के जो दीक्षा गुरु हैं वो ईश्वर प्रिपाद अरे भैया

1634
01:50:29,920 --> 01:50:34,000
आप यह बताइए भागवत को मानेंगे कि नहीं? भागवत को मानेंगे तो

1635
01:50:34,000 --> 01:50:38,000
तो भागवत में लिखा है परम गुरु वो है जो आपको तात्विक ज्ञान दे। अरे यार

1636
01:50:38,000 --> 01:50:42,000
आप किसी भी गौ वैष्णव के पास जाओगे ना चलो आप मुझे मत मानो। देखिए कई लोगों

1637
01:50:42,000 --> 01:50:46,000
के कह देने से वो बात सत्य नहीं होती है। आपको शास्त्रीय प्रमाण देना होगा। नहीं थोड़ी देर

1638
01:50:46,000 --> 01:50:50,480
पहले आपको भागवत दे रहा हूं आप मुझे। कई लोग दे रहे हैं। नहीं गौ वैष्णव

1639
01:50:50,480 --> 01:50:54,560
चैतन्य महाप्रभु को हम ज्यादा जानते हैं कि या और ज्यादा जानते हैं? कौन?

1640
01:50:54,560 --> 01:50:58,800
चैतन्य महाप्रभु को गौ वैष्णव ज्यादा जानेंगे कि या अन्य लोग ज्यादा जानेंगे उनको

1641
01:50:58,800 --> 01:51:03,280
जो लोग चैतन्य महाप्रभु के प्रमाण कर रहे हैं प्रामाणिक षट गोस्वामी प्रमाणिक

1642
01:51:03,280 --> 01:51:07,360
गोस्वामी षट गोस्वामी नहीं जहां से चैतन महाप्रभु जिसको कह रहे हैं कि

1643
01:51:07,360 --> 01:51:09,680
ये प्रमाणिक है उसके रूप

1644
01:51:09,680 --> 01:51:13,680
गोस्वामी सर दामोदर अपना नाम नहीं है चैतन महाप्रभु यस बिल्कुल रात दिन

1645
01:51:13,680 --> 01:51:18,080
उनके संग सनातन शिक्षा लिखा है चैतन महाप्रभु ने चैतन्य चरितामृत

1646
01:51:18,080 --> 01:51:22,240
में चैतन्य चरितामृत को कैसे माना जाए तो अब जब शास्त्री आप प्रमाण नहीं मानते

1647
01:51:22,240 --> 01:51:26,400
आप बोले कैसे आप अपने आचार्य के मतांतर्गत लिखी हुई बातों को शास्त्र

1648
01:51:26,400 --> 01:51:30,480
कह रहे हैं। नहीं ऐसा नहीं है। और हमने तो नहीं कहा शंकर भाष ले लो। नहीं

1649
01:51:30,480 --> 01:51:34,640
हमारे चैतन्य चरितामृत चैतन्य भागवत अगर

1650
01:51:34,640 --> 01:51:38,240
इनको ही आप प्रमाण नहीं मान रहे हो लेकिन मैं किस आधार पर मैं प्रमाण की बात नहीं कर

1651
01:51:38,240 --> 01:51:42,480
रहा हूं। मैं देखो आपने कहा कि वो वैष्णव थे। आपको अपने चैतन्य

1652
01:51:42,480 --> 01:51:46,960
महाप्रभु की परंपरा कृष्ण भगवान तक पता है। ठीक है? मगर जस्ट

1653
01:51:46,960 --> 01:51:50,960
जिसकी आप भागवत पढ़ रहे हो। वो तो हम किसी की पढ़ सकते हैं। वल्लभाचार्य

1654
01:51:50,960 --> 01:51:55,040
की पढ़ सकते हैं। हम लोग राम भैया जिसकी बात आप जिससे

1655
01:51:55,040 --> 01:51:57,760
आप भगवान को जान रहे हो भागवत को जान हम सभी से जान रहे

1656
01:51:57,760 --> 01:52:02,320
हैं। भागवत ये बात चैतन महाप्रभु ने कही है क्या रसोस

1657
01:52:02,320 --> 01:52:06,560
बाद में तारीफ की सुबोधनी टीका की अद्भुत उन्होंने बाद में उन्होंने

1658
01:52:06,560 --> 01:52:10,720
ये बात कही है क्या कि मैं सभी से जान रहा हूं। बाद में सब कुछ उन्होंने उन्होंने यह बात कही

1659
01:52:10,720 --> 01:52:14,720
है क्या कि मैं सभी से जान रहा हूं। भाई जो भी प्रमाणिक आचार्य है जो

1660
01:52:14,720 --> 01:52:19,360
भी प्रमाणिक क्या कह रहा हूं भाई साहब उन्होंने ये कहा कि मैं सभी से जान रहा हूं किन्होंने

1661
01:52:19,360 --> 01:52:23,520
उन्होंने तो कहा मैं ईश्वर प्रपाद जी की कृपा से मैं भगवान को जान पाया गुरु आमी मूर्ख

1662
01:52:23,520 --> 01:52:27,760
देखी करिया सा भागवत को तो उनसे जाने किनसे वो तो सभी जाने उनसे वही

1663
01:52:27,760 --> 01:52:31,760
जाने वो तो सभी जाने श्रीधर स्वामी से हम भी जान रहे हैं किसने कहा मधवाचार्य जी ने कहा

1664
01:52:31,760 --> 01:52:33,280
है कि मैं वो आपका विषय है लेकिन

1665
01:52:33,280 --> 01:52:37,440
मैं मानता हूं कि श्रीधर स्वामी जो चैतन्य महाभू कह रहे हैं सभी

1666
01:52:37,440 --> 01:52:41,440
माने यानी कि आप सनातन सिद्धांत नहीं अपने सिद्धांत

1667
01:52:41,440 --> 01:52:45,520
से चलते चैतन्य महाप्रभु मतलब सनातन सत सिद्धांतों से

1668
01:52:45,520 --> 01:52:49,520
चैतन्य महाप्रभु ने जो बोला वही हमारे लिए प्रमाण है। तो ऐसे तो ब्रह्मा कुमारी वाले भी कहते

1669
01:52:49,520 --> 01:52:53,680
हैं जो ब्रह्मा जी आकर के रोज आप चैतन्य महाप्रभु को नहीं मानते वो आपका विषय है।

1670
01:52:53,680 --> 01:52:57,920
लेकिन नहीं हम मानते हैं तब तक जब तक वो जो परंपरा से वेद चले आ रहे हैं। हम तो पूरा मानते

1671
01:52:57,920 --> 01:53:02,400
हैं आप तब तक लेकिन किंतु ये आपका विषय है। क्यों मानते हो अच्छा उन्हें?

1672
01:53:02,400 --> 01:53:06,560
क्योंकि वो वो भगवान कृष्ण की भक्ति का प्रचार

1673
01:53:06,560 --> 01:53:11,120
किए। हरि नाम का प्रचार ऐसे तो बहुत से अच्छे लोग हैं जो अच्छी काम कर रहे हैं तो उनको क्यों नहीं मानते?

1674
01:53:11,120 --> 01:53:15,200
चैतन्य शंकराचार्य शंकराचार्य ने बौद्धों का खंडन करके सनातन

1675
01:53:15,200 --> 01:53:19,360
धर्म की स्थापना की महाप्रभु ने इसका उनको क्यों नहीं मानते हैं प्रमाण

1676
01:53:19,360 --> 01:53:23,440
क्यों नहीं मानते प्रमाण मानते हैं प्रमाण भाई मानते हैं भैया झूठ बोल

1677
01:53:23,440 --> 01:53:26,800
रहे हो क्या बात कर रहे हो शंकराचार्य को कौन नहीं मानते अभी आप कह रहे हो कि मैं मायावाद को नहीं

1678
01:53:26,800 --> 01:53:30,800
मानता हूं आप कह रहे हो मानते हैं आप बुद्धू को मानते नहीं मानते नहीं मानते भगवान बुद्ध को नहीं

1679
01:53:30,800 --> 01:53:34,880
मानते भगवान मानते हैं उनकी शिक्षा को नहीं मानते वही है फिर शंकराचार्य को मानते हैं

1680
01:53:34,880 --> 01:53:38,880
तो मैं वही कह रहा हूं आप उनकी शिक्षा को मानते हैं सारी शिक्षा को नहीं मानते हां तो

1681
01:53:38,880 --> 01:53:42,880
जो वैष्णव पर है वो मानते हैं तो आप अच्छे काम करने के नाते चैतन्य

1682
01:53:42,880 --> 01:53:46,960
महाप्रभु की सारी शिक्षा को मानते हैं। तो अच्छे काम करने के नाते इसलिए

1683
01:53:46,960 --> 01:53:51,120
मानते हैं कि चैतन्य महाप्रभु की कोई भी शिक्षा में मायावाद नहीं है। इसलिए मानते हैं

1684
01:53:51,120 --> 01:53:55,280
और वो स्वयं भगवान है इसलिए मानते हैं। अच्छा ठीक है। स्वयं भगवान

1685
01:53:55,280 --> 01:53:59,520
भगवान बुद्ध भी स्वयं भगवान है। 1 मिनट 1 मिनट। भगवान बुद्ध स्वयं भगवान है।

1686
01:53:59,520 --> 01:54:03,760
आपने दो बातें कही है क्योंकि वो स्वयं भगवान है। और उनकी में मायावाद

1687
01:54:03,760 --> 01:54:08,160
नहीं है। ठीक है। अच्छा ठीक है। दो बातें हो गई। अब बात आती है

1688
01:54:08,160 --> 01:54:12,160
कि इसको तो मैं ऐसे काट सकता हूं। भगवान है तो भगवान होते हुए

1689
01:54:12,160 --> 01:54:16,480
बुद्ध के रूप में उन्होंने वेदों का ही खंडन कर दिया। उनको मानेंगे क्या?

1690
01:54:16,480 --> 01:54:20,880
लेकिन भगवान बुद्ध आए क्यों? इसका भी तो वर्णन शास्त्र में है ना।

1691
01:54:20,880 --> 01:54:24,880
लेकिन इसका मतलब सारे अवतार इसीलिए आएंगे। नहीं मैं ये नहीं कह रहा।

1692
01:54:24,880 --> 01:54:29,120
भगवान होने के नाते उनकी बात को नहीं माना जा सकता। मैं ये कह रहा हूं।

1693
01:54:29,120 --> 01:54:33,200
भगवान होने के नाते उनकी बात को नहीं माना जा सकता। जब उनकी बात वेद सम्मत होगी

1694
01:54:33,200 --> 01:54:37,280
तभी माना जा सकता। हां तो चैतन्य महाप्रभु की सारी बातें वेद तो जब कभी

1695
01:54:37,280 --> 01:54:41,920
हम क्वेश्चन करेंगे कि यहां पे दिक्कत आ रही है वेदों से मैच नहीं हो रहा तो आपको

1696
01:54:41,920 --> 01:54:46,000
मैच को सिद्ध करना होगा ये नहीं कि चैतन महाप्रभु कह रहे हैं इसलिए मान रहे हैं फिर वहां

1697
01:54:46,000 --> 01:54:50,080
पे उनकी बात को वेद से मैच कराना होगा है ना पहली बात तो ये हुई दूसरी बात ये हो

1698
01:54:50,080 --> 01:54:54,480
गई कि मायावाद नहीं था चैतन महाप्रभु की में इसलिए मानते हैं। अब ये बताइए मायावाद

1699
01:54:54,480 --> 01:54:58,560
क्या है? मायावाद का अर्थ होता है जो भगवान के

1700
01:54:58,560 --> 01:55:02,640
विग्रह को हम भगवान के स्वरूप को भगवान के

1701
01:55:02,640 --> 01:55:06,800
धाम को हम भौतिक मानता है मायिक मानता है इसी

1702
01:55:06,800 --> 01:55:11,120
को मायावाद कहा है वैष्णवा आचार्यों ने अच्छा ये बताइए

1703
01:55:11,120 --> 01:55:15,120
मतलब और शंकराचार्य भी यही कहते हैं कि वो भगवान का भौतिक

1704
01:55:15,120 --> 01:55:17,840
है ये नहीं वो अब क्या कहते हैं

1705
01:55:17,840 --> 01:55:21,920
ये तो पता नहीं जो वैष्णव आचार्य बोले हैं वो मैं बता आपके प्रभुपाद जी ने शंकराचार्य

1706
01:55:21,920 --> 01:55:25,920
जी के बारे में कुछ बताया है कि नहीं उन्होंने यह बताया है कि शंकराचार्य जी

1707
01:55:25,920 --> 01:55:30,240
महान वैष्णव हैं और भाई साहब आप इतना घुमाते हो ना घुमाने की बात ही नहीं

1708
01:55:30,240 --> 01:55:34,240
आप आप कह रहे हो कि मैंने जो सत्य है वही बता रहा हूं मैं मैं बता रहा हूं घुमाने की क्या बात है

1709
01:55:34,240 --> 01:55:34,880
इसमें यार

1710
01:55:34,880 --> 01:55:38,880
उन्होंने शंकराचार्य को मायावादी कहा है कि नहीं कहा है मैं कह रहा हूं कि दोनों चीज

1711
01:55:38,880 --> 01:55:40,880
कहा है ना दोनों कहा है तो मायावादी कहा है कि

1712
01:55:40,880 --> 01:55:45,200
नहीं कहा है दोनों चीज कहा है अरे तो मायावादी को मायावादी भी कहा है वैष्णव

1713
01:55:45,200 --> 01:55:49,520
भी कहा है मायावादी भी कहा है मायावादी भी कहा है वैष्णव भी कहा है तो मायावा मायावादी

1714
01:55:49,520 --> 01:55:53,520
की शिक्षा को आप मानते हो नहीं मानते नहीं मानते तो मायावा तो मायावाद

1715
01:55:53,520 --> 01:55:57,600
होता क्या है वो वो बताओ वही तो मैंने बताया आपको जब भगवान के शरीर को उनके धाम

1716
01:55:57,600 --> 01:56:01,440
को तो यह माना जाएगा ना कि ये शिक्षा शंकराचार्य जी देते हैं तो वो

1717
01:56:01,440 --> 01:56:05,520
गलत है ना वही तो कह रहे हैं वैष्णवाचार्य ये ये शिक्षा शंकराचार्य देते ही मानते

1718
01:56:05,520 --> 01:56:09,760
हैं तो उनकी वो शिक्षा गलत है वैष्णवाचार्य अब आप ये बताओ

1719
01:56:09,760 --> 01:56:14,000
क्या इसके द्वारा प्रतिपादित होने वाला ईश्वर सर्वशक्तिमान है बिल्कुल

1720
01:56:14,000 --> 01:56:18,080
है अच्छा ठीक है तो ये बताइए यदि वो

1721
01:56:18,080 --> 01:56:22,160
सर्वशक्तिमान है हां तो क्या वो अपने स्वरूप का

1722
01:56:22,160 --> 01:56:26,240
नाश कर सकता है जो शरीर है शरीर

1723
01:56:26,240 --> 01:56:30,400
शरीर की बात कर रहा हूं जिस शरीर में भगवान आते हैं लीला करते हैं उस

1724
01:56:30,400 --> 01:56:34,400
शरीर का नाश कर सकते हैं भगवान भगवान तो अघटन घटन पटी जैसी

1725
01:56:34,400 --> 01:56:38,400
कुछ भी कर सकते हैं नाश कर सकते हैं नाश भी कर सकते यानी

1726
01:56:38,400 --> 01:56:42,400
कि उनके उस शरीर के अलावा भी उनका कोई रूप है हां

1727
01:56:42,400 --> 01:56:46,640
भागवत में कहा गया भगवान के तीन स्वरूप है निर्गुण निराकार ब्रह्म स्वरूप मतलब अंतिम

1728
01:56:46,640 --> 01:56:50,800
स्वरूप ये नहीं है गीता के 12वा अध्याय के आप पढ़ो भगवान बोलते हैं सगुण साकार

1729
01:56:50,800 --> 01:56:54,880
की उपासना श्रेष्ठ है मेरा सगुण रूप श्रेष्ठ है स्वयं भगवान खुद बोल रहे

1730
01:56:54,880 --> 01:56:58,880
हैं निर्गुण निराकार स्वरूप क्लेश वाला मैं आपसे क्या पूछ रहा हूं

1731
01:56:58,880 --> 01:57:02,960
कि क्या वो जो भगवान का रूप है भगवान

1732
01:57:02,960 --> 01:57:07,040
का निर्गुण निराकार स्वरूप को मानना ये गलत नहीं

1733
01:57:07,040 --> 01:57:11,360
है भगवान के सगुण साकार स्वरूप को माइक कहना ये गलत है

1734
01:57:11,360 --> 01:57:15,360
ये किसी भी शास्त्र में नहीं बोला है माया माइक होने का अर्थ क्या

1735
01:57:15,360 --> 01:57:16,800
होता है ये माइक

1736
01:57:16,800 --> 01:57:20,320
होने का अर्थ है कि हमारी तरह है भौतिक तो कहां पे कहा

1737
01:57:20,320 --> 01:57:24,560
है उन्होंने कि भौतिक है ये वैष्णो आचार्य बोल रहे हैं मैंने नहीं बोल रहा हूं। ठीक है?

1738
01:57:24,560 --> 01:57:28,560
तो मायक होने का अर्थ आपने बताया कि भौतिक है। भौतिक है। हां। मतलब जैसे

1739
01:57:28,560 --> 01:57:32,960
हम लोगों का है कुल मिलाकर के वो माया नहीं है। वो वो शाश्वत

1740
01:57:32,960 --> 01:57:37,040
रूप है। वो शाश्वत रूप है। तो आप कह रहे हो वो नष्ट हो सकता है। नष्ट नहीं हो सकता। वो तो आप कह रहे हो मैं कहां

1741
01:57:37,040 --> 01:57:39,360
कह रहा हूं। अरे अभी आपने कहा मैंने कहा। तो फिर मैं

1742
01:57:39,360 --> 01:57:43,360
दोबारा पूछ रहा हूं। क्या जो भगवान श्री कृष्ण है वो

1743
01:57:43,360 --> 01:57:47,440
अपने शरीर का नाश कर सकते हैं नाश नहीं कर सकते हैं वो अपने शरीर को

1744
01:57:47,440 --> 01:57:51,680
कई रूपों में प्रकट कर सकते हैं अंतर्दान कर सकते हैं नाश भी कर सकते हैं लेकिन इसका अर्थ

1745
01:57:51,680 --> 01:57:55,760
ये नहीं कि वो रूप शाश्वत नहीं है ऐसा नहीं है नहीं तो नाश भी कर

1746
01:57:55,760 --> 01:57:59,920
सकते नाश किस कंटेंट में कह रहे हो किस कंटेंट में आप बताओ ना मैं तो नाश मतलब नष्ट

1747
01:57:59,920 --> 01:58:03,920
हो जाए नष्ट भगवान का स्वरूप आज तक तो नष्ट नहीं हुआ

1748
01:58:03,920 --> 01:58:08,080
तो मतलब नहीं कर सकते ना अब ये तो आप जब ये तो आप निर्णय

1749
01:58:08,080 --> 01:58:08,880
लो अरे

1750
01:58:08,880 --> 01:58:12,880
फिर वही बात तो आपने ने बुलाया कि मुझे ही निर्णय लेना मैं तो मैं कुछ

1751
01:58:12,880 --> 01:58:16,960
प्रश्न ऐसे होते हैं जिनका शास्त्र आधार हो तो शास्त्र आधार इसका आधार कोई

1752
01:58:16,960 --> 01:58:20,960
शास्त्र आधार है है ना भगवा 12व स्कंध में लिखा है क्या लिखा है कि

1753
01:58:20,960 --> 01:58:25,120
भागवत का एकमात्र उद्देश्य है जीव और ब्रह्म की एकता जीव ब्रह्म की एकता का अर्थ

1754
01:58:25,120 --> 01:58:25,620
क्या

1755
01:58:25,200 --> 01:58:29,200
है वैष्णव ने क्या माना है भगवान देखिए शास्त्र आधार मैंने बता दिया

1756
01:58:29,200 --> 01:58:30,400
अब आपने आचार्यों का आधार

1757
01:58:30,400 --> 01:58:34,400
आप वही उसी को भाष्य कहते हैं नहीं वो भाष्य आपने शास्त्र कहा आप

1758
01:58:34,400 --> 01:58:38,480
कहेंगे तो जब आप शंकराचार्य भाष्य को मान सकते हो तो क्या

1759
01:58:38,480 --> 01:58:42,560
हम वैष्णवा आचार्य के भाष्य को ना मान तो मैं वहां पे ईश्वर को सर्वशक्तिमान सिद्ध करने के

1760
01:58:42,560 --> 01:58:46,560
लिए मान रहा हूं ना आप करिए उनके द्वारा किन के द्वारा मैं कह रहा हूं

1761
01:58:46,560 --> 01:58:50,560
आप ईश्वर को सर्वशक्तिमान सिद्ध शक्तिमान है भगवान हमारे वैष्णवा आचार्य बोल

1762
01:58:50,560 --> 01:58:54,800
रहे हैं नहीं सर्वशक्तिमान है तो ऐसे तो सर्वशक्तिमान मुसलमान भी कहता है कि अल्लाह है

1763
01:58:54,800 --> 01:58:58,800
मगर वो अवतार नहीं ले सकता बाधित है नहीं हमारे वैष्णव आचार्य ऐसा नहीं बोलते हैं

1764
01:58:58,800 --> 01:59:02,880
वो तो कहते हैं अवतार लेते हैं ऐसे ही यहां पे एक जगह आप बाधित कर रहे हो कि

1765
01:59:02,880 --> 01:59:04,240
वो अपने स्वरूप का नाश नहीं कर सकता

1766
01:59:04,240 --> 01:59:08,320
ये प्रश्न जो है शास्त्र पर आधारित नहीं है इसलिए इसका उत्तर मैं नहीं दे सकता हूं

1767
01:59:08,320 --> 01:59:12,560
क्योंकि इसको को मैं बोलूंगा तो फिर उसमें आप मायावाद घुसाओगे। ये कहां लिखा है कि

1768
01:59:12,560 --> 01:59:16,640
शास्त्र पे आधारित प्रश्न का ही जवाब दिया जाए। ये हमारे शास्त्र कहते

1769
01:59:16,640 --> 01:59:20,880
हैं। कहां लिखा है बताइए? शास्त्र में जितने प्रश्न है वो बेतु के नहीं है।

1770
01:59:20,880 --> 01:59:24,960
ये कहां लिखा है? शास्त्र पे आधारित प्रश्न का ही जवाब दिया जाएगा। और अगर दिया

1771
01:59:24,960 --> 01:59:29,120
जाएगा तो इसका मतलब इस के पास नास्तिकता का खंडन है ही नहीं। क्योंकि नास्तिक

1772
01:59:29,120 --> 01:59:33,360
तो शास्त्र के बाहर है। तो उसका जवाब तो दिया ही नहीं जाएगा। तो नास्तिकता का खंडन कौन करेगा?

1773
01:59:33,360 --> 01:59:37,440
नास्तिकता का खंडन जो कर सकते हैं करेंगे। लेकिन मेरा

1774
01:59:37,440 --> 01:59:41,440
जो विचार है तो ईश्वर है ये कैसे सिद्ध होता है प्रभुपाद जी के अकॉर्डिंग ईश्वर है

1775
01:59:41,440 --> 01:59:45,840
वो कैसे सिद्ध होता है यानी कि कुल मिलाकर के आप ईश्वर को सर्वशक्तिमान

1776
01:59:45,840 --> 01:59:50,000
सिद्ध नहीं कर सकते बस टैग दे सकते हो कि हां ईश्वर हमारा सर्वशक्तिमान ईश्वर

1777
01:59:50,000 --> 01:59:51,360
सर्वशक्तिमान क्यों नहीं है

1778
01:59:51,360 --> 01:59:55,440
तो शास्त्र बोल रहे हैं वो अपने शरीर का नाश कर सकते हैं बिल्कुल कर सकते हैं

1779
01:59:55,440 --> 01:59:59,520
कर सकते हैं तो फिर आप क्यों कह रहे हो वो शाश्वत है नाश कर

1780
01:59:59,520 --> 02:00:03,520
आपको मानना पड़ेगा कि वो लीला रूप में आते हैं और वो अपना

1781
02:00:03,520 --> 02:00:07,520
शरीर प्रकट करते हैं और उसी लीला को वो खत्म भी कर सकते इसीलिए और हमारे

1782
02:00:07,520 --> 02:00:11,520
लिए इसीलिए मैं ऐसा नहीं बोलना चाहता क्योंकि आप फिर से मायावाद लाओगे उसमें

1783
02:00:11,520 --> 02:00:15,520
क्योंकि मायावाद को आपको मानना पड़ेगा ना नहीं मान सकते ना कैसे मानेंगे आप

1784
02:00:15,520 --> 02:00:19,760
सर्वशक्तिमान सिद्ध करो अपने वैष्णव आचार्य बोले सब ऐसा तो भगवान अपने

1785
02:00:19,760 --> 02:00:23,840
शरीर को नष्ट करने का मतलब यह नहीं है कि हमारे द्वारा नष्ट हो जाएगा वो शरीर ऐसा

1786
02:00:23,840 --> 02:00:27,840
नहीं है उसका मतलब जो भी हो आप शंकराचार्य के बाहर जाकर के ना

1787
02:00:27,840 --> 02:00:32,000
तो नास्तिकता को हरा पाएंगे ना धर्म की स्थापना विषय को चेंज कर रहे हो आप

1788
02:00:32,000 --> 02:00:36,240
तो आप ही तो कह रहे हो मैं उनको नहीं मानता मायावाद को किनको अगर सर

1789
02:00:36,240 --> 02:00:40,320
मैं मायावाद का खंडन करने यहां नहीं बैठा हूं। मायावाद का खंडन अलग विषय

1790
02:00:40,320 --> 02:00:44,320
है। अच्छा खंडन का अर्थ क्या होता है? खंडन का अर्थ होता है मैंने किसी बात के लिए मना

1791
02:00:44,320 --> 02:00:48,400
कर दिया। वो आप कर चुके हो। फिर कह रहे हो मैं खंडन बैठा हूं। आप मायावाद पर चर्चा

1792
02:00:48,400 --> 02:00:52,560
ही मत करो। आप ही तो लाए हो। नहीं मैं कहां लाया हूं? मतलब आप ही लाए।

1793
02:00:52,560 --> 02:00:56,640
आप लाए। मायावाद पर चर्चा। श्रीधर स्वामी से बात आई थी। श्रीधर स्वामी जी

1794
02:00:56,640 --> 02:01:00,640
को मैं वैष्णव मानता हूं। हमारे आचार्य वैष्णव मानते हैं। अरे भैया आपके में जहां से

1795
02:01:00,640 --> 02:01:05,040
आपने उन्हें वैष्णव माना है उसी में वो कह रहे हैं वो वो मायावादी भाष्य लिख रहे हैं। नहीं

1796
02:01:05,040 --> 02:01:06,480
हां वो बोल रहे हैं तो मैं

1797
02:01:06,480 --> 02:01:10,640
मानता हूं इस बात को। कौन बोल रहे हैं जो हमारे आचार्य बोल फिर आपके यहां पे एज इट इज ज्ञान

1798
02:01:10,640 --> 02:01:14,960
नहीं आ रहा है। क्यों नहीं आ रहा है? मायावादी भाष्य लिख रहे हैं। आपके मायावादी है। श्रीधर स्वामी

1799
02:01:14,960 --> 02:01:18,960
जो भागवत लिख रहे हैं उससे मायावाद नहीं है। उसमें भी है। उसमें तो

1800
02:01:18,960 --> 02:01:22,960
नहीं है। उसमें भी है। पढ़ी है आपने उनकी जो भाष्य हमारे पास तो है।

1801
02:01:22,960 --> 02:01:24,880
हम तो पढ़ते हैं आज भागवत। उसमें भी

1802
02:01:24,880 --> 02:01:29,120
आपकी जो आपकी जो भागवतम है उसमें चौथे स्कंध में लिखा हुआ है

1803
02:01:29,120 --> 02:01:33,120
कि जो है जहां पर वो मायावाद नहीं है वो आपने समझ लिया मायावाद

1804
02:01:33,120 --> 02:01:37,680
वो मायावाद नहीं है नहीं समझने का तरीका अलग है नहीं चौथे स्कंध में

1805
02:01:37,680 --> 02:01:41,920
श्रीधर स्वामी लिख रहे हैं कि भगवान जो शिव है वो परम ब्रह्म है

1806
02:01:41,920 --> 02:01:45,920
बिल्कुल है गलत और यहां पर जो प्रभुपाद जी है वो लिख रहे हैं कि नहीं वो परम

1807
02:01:45,920 --> 02:01:48,240
ब्रह्म नहीं है वही उसी जगह पे हां

1808
02:01:48,240 --> 02:01:53,280
हां हर वैष्णव ने अलग-अलग भाव दिए हैं ना भाव के अनुसार एज इट इज़ नहीं रहा फिर

1809
02:01:53,280 --> 02:01:57,360
ये आरोप फिर आप वल्लभाचार्य जी पर भी लगाओ। यह आरोप लगा किसी और

1810
02:01:57,360 --> 02:02:01,440
के गलत होने से आपका सही होना सिद्ध नहीं होता। आप अपने बारे में आप जब आरोप

1811
02:02:01,440 --> 02:02:05,520
लगा रहे हो तो सारे वैष्णव पर लगाओ ना। वल्लभाचार्य जी वर्णाश्रमी है और

1812
02:02:05,520 --> 02:02:09,600
अगर अगर वो शंकराचार्य का उपास उड़ाएंगे। अरे भैया वर्णाश्रम बात बीच में कहां से

1813
02:02:09,600 --> 02:02:13,600
आ गई? मैं अभी इस बात कह रहा हूं कि जो आप टीका बोले ना चौथे स्कंध में वो बोल रहे

1814
02:02:13,600 --> 02:02:17,600
हो। उसी श्लोक पर और आचार्य ने अलग-अलग भाव दिए हैं। मैं ये कह

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02:02:17,600 --> 02:02:19,200
रहा हूं। ठीक है। वो ये नहीं कह रहे हैं कि

1816
02:02:19,200 --> 02:02:22,960
हमने जो भागवत पढ़ी है वो श्रीधर स्वामी से पढ़ी है। आप कह रहे हो? हम भी नहीं कह

1817
02:02:22,960 --> 02:02:26,960
रहे हैं। आप कह रहे हो? हम कहां कह रहे हैं? चेतन महाप्रभु कह रहे हैं। चैतन्य कहां कह रहे हैं? कह तो रहे

1818
02:02:26,960 --> 02:02:31,120
हैं। मैं भागवत समझ पाया उनसे। अरे इसका मतलब देखिए उन्हीं से ही पढ़ा हुआ उन्होंने

1819
02:02:31,120 --> 02:02:35,200
दूसरे से व्याख्या तो दूसरे से पढ़ा हुआ बताइए। अगर पंडित से पढ़ा उन्होंने आपने तो

1820
02:02:35,200 --> 02:02:39,200
कहा कि वो उन्हीं के मुख से सुनी मगर सीधा स्वामी का भाष्य ऐसा नहीं है। आपने ही तो कहा इसका कोई

1821
02:02:39,200 --> 02:02:43,440
प्रमाण नहीं है। इसमें रिकॉर्ड में आपने कहा है भाई साहब। नहीं इसका प्रमाण उस समय ध्यान नहीं दे पाया।

1822
02:02:43,440 --> 02:02:47,360
इसका कोई प्रमाण नहीं है। आपने सीरियस हो के कहा था। नहीं नहीं उस समय ध्यान नहीं। किसका

1823
02:02:47,360 --> 02:02:51,440
भाष्य था उस समय? उस समय किसका भाष्य था यह भी प्रमाण नहीं

1824
02:02:51,440 --> 02:02:55,760
मिलता। यानी कि आपके यहां पर प्रामाणिक शिक्षा नहीं है। ऐसा भी नहीं कह सकते हैं। [हंसी]

1825
02:02:55,760 --> 02:03:00,080
ऐसा कैसे कह सकते हो आप? चलिए खैर बहुत लंबी चर्चा हो गई। ऐसा नहीं कह सकते। वातावरण

1826
02:03:00,080 --> 02:03:04,240
भी गर्म हो गया है। गरम वाली बात है। बड़ी अच्छी चर्चा हुई लंबी। ठीक है

1827
02:03:04,240 --> 02:03:08,240
फिर आप लोग और आप मुझे कुछ प्रमाण देंगे कि प्रभुपाद

1828
02:03:08,240 --> 02:03:12,320
जी ने जो है शिव जी को मुक्ति दाता माना है उस संबंध में और

1829
02:03:12,320 --> 02:03:16,320
हमारी हो सकता है अब तो वो चैतन महाप्रभु को लेकर के चर्चा हो चुकी

1830
02:03:16,320 --> 02:03:20,320
है आप लोग बताइएगा कि वर्णाश्रम पे आपको हमारी चर्चा देखनी है कि नहीं हो सकता है

1831
02:03:20,320 --> 02:03:24,640
दोबारा हम लोग कभी आए तो वर्णाश्रम पे हमारी चर्चा हो कभी कि वर्णाश्रम

1832
02:03:24,640 --> 02:03:29,520
वर्णाश्रम पर तो मैं कोई चर्चा नहीं करना चाहूंगा क्योंकि

1833
02:03:29,520 --> 02:03:34,080
वो विषय बहुत विरोधाभास वाला है विरोधाभास नहीं वो तो

1834
02:03:34,080 --> 02:03:38,160
क्या कहते हैं? बहुत ही कॉम्प्लिकेटेड विषय है। कॉम्प्लिकेटेड विषय है

1835
02:03:38,160 --> 02:03:42,240
क्योंकि हमारे आचार्यों ने जो बोला है हम

1836
02:03:42,240 --> 02:03:46,320
तो उसको मानते हैं और जहां तक

1837
02:03:46,320 --> 02:03:46,820
बारिश हो

1838
02:03:46,720 --> 02:03:51,120
रही है क्या? चलिए ओके ठीक है। आप सभी को

1839
02:03:51,120 --> 02:03:57,120
जय श्री राम। जय श्री राम। हरे कृष्णा। जय श्री राम।

1840
02:04:05,470 --> 02:04:09,470
[संगीत]
