1
00:00:02,560 --> 00:00:05,840
सभी को जय श्री राम।

2
00:00:05,840 --> 00:00:10,960
वर्तमान के श्रीमद जगुरु शंकराचार्य पूरी पीठाधीश्वर भगवान

3
00:00:10,960 --> 00:00:14,960
अपने कई वक्तव्यों में अपना एक संस्मरण बताते हैं

4
00:00:14,960 --> 00:00:18,960
जब उनके पूज्य गुरुदेव धर्म सम्राट स्वामी श्री करपात्री

5
00:00:18,960 --> 00:00:23,600
जी महाराज ने उनसे कहा था कि लोग आएंगे और तुमसे कहेंगे

6
00:00:23,600 --> 00:00:27,680
यह कलयुग है। कुछ नहीं होने वाला। कितना भी एड़ी चोटी

7
00:00:27,680 --> 00:00:31,920
का जोर लगा लो किसी की बात मत सुनना लोग आएंगे तुमसे कहेंगे

8
00:00:31,920 --> 00:00:36,240
कुछ नहीं होगा तुम्हारे धर्म को धर्म की रक्षा करने के प्रयासों से

9
00:00:36,240 --> 00:00:40,640
कुछ भी बचने नहीं वाला है धर्म नष्ट होकर ही रहेगा

10
00:00:40,640 --> 00:00:44,640
तो करपात्री जी महाराज ये बताते हुए कहते थे पूज्य गुरुदेव

11
00:00:44,640 --> 00:00:49,120
जी से वर्तमान पूरी पीठाधीश्वर जी से किसी की बात मत सुनना

12
00:00:49,120 --> 00:00:53,760
बीज की रक्षा भगवान को अभीष्ट है करते रहना

13
00:00:53,760 --> 00:00:57,760
तो ऐसा उन्होंने अपने अनेक जो कर्मठ शिष्य

14
00:00:57,760 --> 00:01:02,000
थे, समर्पित शिष्य थे, उनको कहा और इसी संदर्भ

15
00:01:02,000 --> 00:01:06,000
में इस वर्ष आने वाला जो वर्ष है 2026 में फरवरी

16
00:01:06,000 --> 00:01:10,160
के माह में माघ मेले के ठीक बाद में

17
00:01:10,160 --> 00:01:14,240
अह पूज्य आचार्य श्री रामशंकर शुक्ल

18
00:01:14,240 --> 00:01:17,920
जी कृपात्री जी महाराज के कृपा पात्र शिष्य और श्रीमद

19
00:01:17,920 --> 00:01:21,920
जगदगुरु शंकराचार्य जी के गुरु भाई इनके द्वारा

20
00:01:21,920 --> 00:01:25,920
यज्ञ पवित का आयोजन हो रहा है और पूरे भारतवर्ष

21
00:01:25,920 --> 00:01:30,240
से जो बटुक हैं वह इसमें अपना

22
00:01:30,240 --> 00:01:34,480
यज्ञ संस्कार करवाने के लिए पहुंच रहे हैं

23
00:01:34,480 --> 00:01:38,560
और जिनके जीवन में अतिक्रमण हो

24
00:01:38,560 --> 00:01:42,800
गया है जो आयु सीमा का वो भी यहां पहुंच रहे हैं। तो इसी संदर्भ में कुछ

25
00:01:42,800 --> 00:01:46,880
महाराज जी के वचन हमें प्राप्त होंगे आज।

26
00:01:46,880 --> 00:01:51,520
तो महाराज जी सबसे पहले आपको प्रणाम निवेदित आपके चरणों में।

27
00:01:51,520 --> 00:01:55,520
थोड़ा सा ये यज्ञ पवित्र संस्कार की महत्ता थोड़ा सा बताएं

28
00:01:55,520 --> 00:01:59,680
जिससे कि हमारा जो युवा वर्ग है द्विज है और

29
00:01:59,680 --> 00:02:03,840
शूद्रों के लिए कंठी माला धारण का भी उसमें आयोजन किया गया है जो शूद्र

30
00:02:03,840 --> 00:02:08,080
वर्ण से आते हैं हमारे भाई चतुर्थ वर्ण वाले तो महाराज जी थोड़ा सा

31
00:02:08,080 --> 00:02:12,320
यज्ञ प्रवी तो कंठी माला दोनों के बारे में ही थोड़ा सा उनकी महत्ता के बारे में

32
00:02:12,320 --> 00:02:15,840
बता दें

33
00:02:15,840 --> 00:02:20,160
बाद तोषित विश्वेषम धर्म मार्ग प्रवर्तकम

34
00:02:20,160 --> 00:02:25,040
वंदे हरिहरंदम करपात्रम जगत गुरु

35
00:02:25,040 --> 00:02:29,520
विश्वेश माधव दंडपाणि भैरव वंदे काशी गुहाम

36
00:02:29,520 --> 00:02:34,160
गंगाम भवानी मणिकर्णिकाम शंकरम शंकराचार्यम

37
00:02:34,160 --> 00:02:38,880
केशवम बायम सूत्र भाष वंदे

38
00:02:38,880 --> 00:02:44,000
भगवंतो पुनः पुनः नारायण

39
00:02:44,000 --> 00:02:47,120
वास्तव में

40
00:02:47,120 --> 00:02:52,160
आप श्री के मन में शास्त्रों के प्रति

41
00:02:52,160 --> 00:02:56,480
जिज्ञासा एवं उनके प्रचार प्रसार का जो सद्भाव

42
00:02:56,480 --> 00:03:01,680
है देखने को मिल रहा है।

43
00:03:01,680 --> 00:03:06,560
यज्ञपवि संस्कार के संबंध में आपने बात कही।

44
00:03:06,560 --> 00:03:09,920
यह परंपरा प्राप्ति

45
00:03:09,920 --> 00:03:14,400
संस्कार प्रजा प्रते सहजम पुरस्ता

46
00:03:14,400 --> 00:03:19,520
भगवान ब्रह्मा जी ने सहज में इस यज्ञ पवित को

47
00:03:19,520 --> 00:03:23,840
ऋण मोचन की दृष्टि से पितृ ऋण देव

48
00:03:23,840 --> 00:03:27,840
ऋण ऋषि ऋण इन ऋणों से मुक्ति

49
00:03:27,840 --> 00:03:30,960
पाने की दृष्टि से इस वेद

50
00:03:30,960 --> 00:03:36,320
सूत्र को इसे वेद सूत्र कहा गया।

51
00:03:36,320 --> 00:03:40,880
इसमें 80 हजार कर्मकांड के मंत्र

52
00:03:40,880 --> 00:03:45,840
और 16000 उपासना मंत्र के संयोग

53
00:03:45,840 --> 00:03:49,680
96 चौवे का

54
00:03:49,680 --> 00:03:53,760
दाहिनी तरफ से बाई तरफ जाता अपभ्य और

55
00:03:53,760 --> 00:03:58,400
बाई तरफ से दाहिनी तरफ आता सभ्य दो प्रकार से

56
00:03:58,400 --> 00:04:02,560
पितृ कार्यों में अपशब्य देव कार्यों में सभ्य इस

57
00:04:02,560 --> 00:04:06,880
दृष्टि से उपवेद का धारण करना शास्त्र

58
00:04:06,880 --> 00:04:11,120
सम्मत शास्त्र की आज्ञा आचार्यों के अनुबंध

59
00:04:11,120 --> 00:04:16,080
में गहित है और द्विजात

60
00:04:16,080 --> 00:04:21,360
संस्कार की सिद्धि के लिए उपनयन

61
00:04:21,360 --> 00:04:25,520
उप का अभिप्राय है समीप नयन का अभिप्राय है वेद

62
00:04:25,520 --> 00:04:29,520
तो शास्त्रों के समीप जाने की दृष्टि से किया

63
00:04:29,520 --> 00:04:33,840
जाता है ताकि हम शास्त्र का आलोन कर पढ़कर

64
00:04:33,840 --> 00:04:38,800
समझकर श्रवण कर अपने जीवन में उतार सके

65
00:04:38,800 --> 00:04:42,880
जहां तक उपनयन के विधान है वेदों

66
00:04:42,880 --> 00:04:46,320
के आधार पर अलग-अलग

67
00:04:46,320 --> 00:04:50,800
पंडित हैं। शिखूत्र और प्रवर

68
00:04:50,800 --> 00:04:54,880
आदि के आधार पर गोत्र के आधार पर वेदों

69
00:04:54,880 --> 00:04:58,880
की शाखाओं के आधार पर इनमें भेद प्रतीति

70
00:04:58,880 --> 00:05:03,840
है। कर्मकांड की विधा में शुक्

71
00:05:03,840 --> 00:05:08,000
रखा गया है। शास्त्रों ने संतों

72
00:05:08,000 --> 00:05:13,280
ने वैदुष संपन्न आचार्यों ने मान्यता दी है।

73
00:05:13,280 --> 00:05:17,760
उनके आधार पर वेद सम्मत

74
00:05:17,760 --> 00:05:21,760
यजुर्वेद के आधार पर यजु पवित श्रेष्ठतम

75
00:05:21,760 --> 00:05:25,840
कहा गया। इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते

76
00:05:25,840 --> 00:05:30,080
हुए हमारे परम आचार्य धर्म सम्राट अभिनव

77
00:05:30,080 --> 00:05:34,320
शंकर कारक ब्रह्म श्री स्वामी करपात्र महाभाग

78
00:05:34,320 --> 00:05:39,280
ने अपने अनुबंधों के साथ

79
00:05:39,280 --> 00:05:43,280
संस्कार सत्र को महत्व देते हुए अखिल भारतीय उपनयन संस्कार

80
00:05:43,280 --> 00:05:47,520
समिति का गठन किए थे।

81
00:05:47,520 --> 00:05:52,320
बहुत दिनों तक उसके आधार पर उपनयन होता चला आया।

82
00:05:52,320 --> 00:05:56,560
1980 से उसी परंपरा का अनुगमन कर

83
00:05:56,560 --> 00:06:01,600
हम यज्ञ पवित का निबंधन ब्राह्मण

84
00:06:01,600 --> 00:06:05,840
क्षत्रिय वैश्य जो अधिकारी हैं उनके उत्कर्ष

85
00:06:05,840 --> 00:06:11,840
के लिए करते चले आ रहे हैं। हमारे पूज्य परमाचार्य

86
00:06:12,720 --> 00:06:17,360
गोवर्धन पीठाधीश्वर श्री जगुरु शंकराचार्य भगवान के

87
00:06:17,360 --> 00:06:19,920
निर्देशानुसार

88
00:06:19,920 --> 00:06:23,920
यह यज्ञ पवित्र बहद रूप में महाराज

89
00:06:23,920 --> 00:06:27,920
श्री के मन में एक उत्कंठा जगी कि ब्राह्मण क्षत्रिय

90
00:06:27,920 --> 00:06:32,000
वैश्य संस्कारों से लुप्त हो रहे हैं। कौन कहे 16

91
00:06:32,000 --> 00:06:36,160
संस्कार में गर्भाधान संस्कार से लेकर आज तक के

92
00:06:36,160 --> 00:06:40,480
इस संस्कार का अनुपालन हो तो कम से कम ब्राह्मण क्षत्रिय

93
00:06:40,480 --> 00:06:44,560
वैश्य शूद्र की रक्षा के लिए यद्यपि प्राप्त

94
00:06:44,560 --> 00:06:48,800
होते चले जा रहे हैं। फिर भी प्रायश्चित करा करके भगवन नाम

95
00:06:48,800 --> 00:06:53,120
प्रायश्चित करा करके क्योंकि जो

96
00:06:53,120 --> 00:06:57,760
प्रात्यस्तम आदि यज्ञ है प्रायश्चित के लिए वो कठिन है।

97
00:06:57,760 --> 00:07:02,000
अर्थ साध्य तो है ही है कठिन पर मंत्र साध्य भी

98
00:07:02,000 --> 00:07:06,720
आचार साध्य भी नहीं कहे जा सकते। इसलिए

99
00:07:06,720 --> 00:07:11,120
ध्यान में रखते हुए इस यज्ञ पवित्र को सामूहिक

100
00:07:11,120 --> 00:07:15,840
क्रम में पथक पृथक रूपों में सबको बैठा के अलग-अलग

101
00:07:15,840 --> 00:07:17,200
और यहां तक कि आचार्यों

102
00:07:17,200 --> 00:07:21,280
का भी उनके साथ संयोजन करके

103
00:07:21,280 --> 00:07:25,760
इस उपनयन कार्यक्रम को सिद्धस्थ किया जा रहा है

104
00:07:25,760 --> 00:07:29,760
और इसी परंपरा में इसी कड़ी में 5

105
00:07:29,760 --> 00:07:34,000
फरवरी को क्योंकि जनवरी में शुक्रास्त होने के कारण

106
00:07:34,000 --> 00:07:38,160
यह संस्कार संभव नहीं है। अन्यथा हम लोग प्रयाग

107
00:07:38,160 --> 00:07:42,240
क्षेत्र में भगवान बेणी माधव के धाम में जहां सारा का सारा

108
00:07:42,240 --> 00:07:46,480
पर्व मंडप माना जाता है। वहां ना मंडप की आवश्यकता है

109
00:07:46,480 --> 00:07:50,640
ना अन्य किसी बहत कर्मकांड की आवश्यकता है।

110
00:07:50,640 --> 00:07:55,920
प्रायश्चित करा करके शौर आदि के बाद

111
00:07:55,920 --> 00:08:00,240
बटों एवं ब्रात्यों का यज्ञोपवी संस्कार संपन्न

112
00:08:00,240 --> 00:08:04,400
किया जाता है। तो इस भावना से इसी

113
00:08:04,400 --> 00:08:09,280
क्रम से श्री स्वामी सदानंद आश्रम प्रयागराज में

114
00:08:09,280 --> 00:08:14,240
इस उपनयन का विधान फरवरी 5

115
00:08:14,240 --> 00:08:18,560
2026 को उपनयन धारक व्रत अथवा

116
00:08:18,560 --> 00:08:22,640
बटुक सभी इकट्ठे होंगे उनके पुनः प्रायश्चित होंगे छर कर्म

117
00:08:22,640 --> 00:08:26,960
होंगे भगवन नाम प्रायश्चित का श्रेष्ठतम

118
00:08:26,960 --> 00:08:31,120
उपाय है हमारे पूरी पीठाधीश्वर महाराज श्री के द्वारा

119
00:08:31,120 --> 00:08:33,360
ये निर्देशित ित है।

120
00:08:33,360 --> 00:08:37,840
भगवान के नाम से सकल प्रकार के प्रायश्चित हो ही जाते हैं।

121
00:08:37,840 --> 00:08:42,320
इस दृष्टि से प्रायश्चित कराकर उपनयन का विधान पथक

122
00:08:42,320 --> 00:08:46,480
प्रथक पटको के लिए अलग-अलग आचार्य और व्रात्यों

123
00:08:46,480 --> 00:08:50,480
के लिए समष्टि रूप में इसका आयोजन किया जा रहा

124
00:08:50,480 --> 00:08:54,800
है। कारण है यदि उपनयन संस्कार

125
00:08:54,800 --> 00:08:58,800
ही लुप्त कर दिया जाए अथवा लुप्त हो ही रहा है।

126
00:08:58,800 --> 00:09:03,520
विवाह की सीमा 30 वर्ष से 40 के भीतर पहुंच चुकी है।

127
00:09:03,520 --> 00:09:08,240
लोग उपनय रहित होते जा रहे हैं। तो

128
00:09:08,240 --> 00:09:12,960
आस परंतम सावित्री ना विधते शद्र

129
00:09:12,960 --> 00:09:16,960
अन सर्वकर 16 वर्ष के

130
00:09:16,960 --> 00:09:21,040
भीतर ब्राह्मण 20 वर्ष अथवा 22 वर्ष

131
00:09:21,040 --> 00:09:25,120
के भीतर क्षत्रिय 22 अथवा 24 वर्ष के भीतर

132
00:09:25,120 --> 00:09:29,120
वैश्य उपनयन के अधिकारी हैं। यदि समय का

133
00:09:29,120 --> 00:09:33,360
उल्लंघन हुआ तो प्रायश्चित करके वात संज्ञों का भी

134
00:09:33,360 --> 00:09:37,600
उपनयन किया जा रहा है। इसमें शास्त्र

135
00:09:37,600 --> 00:09:41,760
की कोई अवहेलना शास्त्र के विपरीत कोई आचरण नहीं

136
00:09:41,760 --> 00:09:46,000
है। धर्म की रक्षा बीज की रक्षा धर्म

137
00:09:46,000 --> 00:09:49,040
सम्राट महाराज श्री कहा करते थे।

138
00:09:49,040 --> 00:09:53,760
यहां भी कर्म ना सो प्रत्यय विजते विद्यते

139
00:09:53,760 --> 00:09:57,760
थोड़ा भी किया हुआ पुण्य नष्ट प्राय नहीं होता। इसलिए

140
00:09:57,760 --> 00:10:01,840
बीज का संरक्षण आवश्यक है। जब ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य नहीं

141
00:10:01,840 --> 00:10:06,000
रह पाएंगे तो वर्णाश्रम धर्म

142
00:10:06,000 --> 00:10:10,400
कैसे उित होगा, कैसे उत्कर्षित होगा?

143
00:10:10,400 --> 00:10:14,800
और फिर सनातन धर्म की मूल शाखा

144
00:10:14,800 --> 00:10:18,960
ही संस्कार है और

145
00:10:18,960 --> 00:10:21,120
वही

146
00:10:21,120 --> 00:10:25,520
संस्कार के रूप में प्रतिष्ठित है। इसलिए हम लोग

147
00:10:25,520 --> 00:10:29,840
इस कार्यक्रम को वैदिक शास्त्रों के आधार पर

148
00:10:29,840 --> 00:10:34,160
संतों के निर्देश पर अब आप कहेंगे सामूहिक

149
00:10:34,160 --> 00:10:38,320
तो हम सामूहिक एक जनेऊ में कई लोगों को नहीं बैठाते वो

150
00:10:38,320 --> 00:10:43,200
अलग-अलग जनेऊ दिया जाता अलग-अलग उनके हवन के लिए आचार्य होते हैं। अलग-अलग

151
00:10:43,200 --> 00:10:47,360
पर प्रायश्चित तो अलग-अलग किए जाता है। प्रायश्चित करके

152
00:10:47,360 --> 00:10:51,520
और फिर इस विधि का पालन हम लोग कर रहे हैं। यदि किसी के मन

153
00:10:51,520 --> 00:10:55,600
में कोई अनौचित भाव आवे भी अथवा शास्त्र की विधा

154
00:10:55,600 --> 00:10:59,920
का परिज्ञान ना हो अथवा सुरक्षा संरक्षण

155
00:10:59,920 --> 00:11:04,080
और दुजात को बचाने का प्रयास ना हो तो फिर अनर्गन

156
00:11:04,080 --> 00:11:08,160
भी लोग कह सकते हैं लाभ कर सकते हैं उन बातों

157
00:11:08,160 --> 00:11:12,160
को ध्यान में ना रखा जाए ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य को

158
00:11:12,160 --> 00:11:16,640
अग्रसारित करके वर्णाश्रम धर्म की रक्षा करना हमारा स्वधर्म

159
00:11:16,640 --> 00:11:21,680
है इनहीं मान्यताओं शास्त्रों के आदेश संतों के निर्देश

160
00:11:21,680 --> 00:11:25,680
और स्वयं बौद्धिक क्षमता के आधार पर

161
00:11:25,680 --> 00:11:29,840
इस कार्यक्रम को अग्रसारित कर विगत वर्षों

162
00:11:29,840 --> 00:11:34,240
से हम लोग चल रहे हैं। इस वर्ष का आयोजन श्री स्वामी सदानंद

163
00:11:34,240 --> 00:11:38,240
आश्रम में है। जैसा कि अभी पूर्व में हमने बताया पांच तारीख को सभा

164
00:11:38,240 --> 00:11:42,320
जाएंगे। छोर कर्मा आदि अनेक प्रायश्चित होंगे।

165
00:11:42,320 --> 00:11:45,760
6 फरवरी को

166
00:11:45,760 --> 00:11:50,480
2026 इसी ईवी में यह उपनयन संस्कार

167
00:11:50,480 --> 00:11:54,720
संपन्न किया जाएगा। इसकी सूचना हमारे द्विवेदी

168
00:11:54,720 --> 00:11:58,960
जी पहले से दे रहे हैं। हमारे प्रथम सिंह काशी

169
00:11:58,960 --> 00:12:03,280
हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र हैं। वे भी लगे हैं। लोगों के मन

170
00:12:03,280 --> 00:12:07,600
मस्तिष्क में बातें जा रही हैं। श्री जगुरु शंकराचार्य पुर पीठाधीश्वर

171
00:12:07,600 --> 00:12:11,600
महाराज श्री का आशीर्वचन प्राप्त है। और इसी आधार पर हम

172
00:12:11,600 --> 00:12:16,000
ब्राह्मण बने, क्षत्रिय बने, वैश्य बने और शूद्र बने। इसीलिए शूद्रों

173
00:12:16,000 --> 00:12:19,360
के लिए भी कंठी की व्यवस्था की गई है। वे लोग कठी

174
00:12:19,360 --> 00:12:24,080
धारण करेंगे। उपनयन के धारक अधिकारी लोग उपनयन धारण करेंगे

175
00:12:24,080 --> 00:12:28,080
और संस्कार संपन्न होंगे ताकि वेदाद शास्त्रों

176
00:12:28,080 --> 00:12:32,400
में प्रवेश पा सके। इन सब बातों को प्रसारित

177
00:12:32,400 --> 00:12:36,560
प्रचारित करना आप सजनों का ही

178
00:12:36,560 --> 00:12:40,640
धर्म है। भाग लेना ब्रात्यों बटों का धर्म

179
00:12:40,640 --> 00:12:44,800
है। इसलिए उपस्थिति देकर अपने जीवन को कृतार्थ करते

180
00:12:44,800 --> 00:12:49,040
हुए वर्णाश्रम सनातन धर्म की रक्षा हेतु आगे

181
00:12:49,040 --> 00:12:53,680
बढ़े। यही हमारे देश हमारी धर्म नीति

182
00:12:53,680 --> 00:12:58,080
शास्त्र की आज्ञा यही कहती है हरिश

183
00:12:58,080 --> 00:13:02,160
अच्छा महाराज जी जैसे कई बार एक प्रश्न आता है कि जैसे जब सामूहिक कर

184
00:13:02,160 --> 00:13:06,320
रहे होते हैं तो वहां पर जो विधिविधान होता है तो पर्टिकुलर किसी एक शाखा

185
00:13:06,320 --> 00:13:10,560
के अनुसार होता है शायद आपने बताया यजुर्वेद की शाखा

186
00:13:10,560 --> 00:13:14,560
है शुक्ल शाखा जी तो उसमें एक प्रश्न ये आता है कि मतलब जैसे

187
00:13:14,560 --> 00:13:18,560
अभी आपने बता दिया फिर भी मैं प्रश्न रख रहा हूं कोई एक सामान्य आ जाता

188
00:13:18,560 --> 00:13:22,640
है प्रश्न कि भाई शाखा स्व शाखा में ही हो तो वो उत्तम

189
00:13:22,640 --> 00:13:26,800
होता है। तो मतलब यह वाला क्या कम

190
00:13:26,800 --> 00:13:30,880
से कम आत्म कल्याण विधियां प्राय वही है। शाखाओं के

191
00:13:30,880 --> 00:13:34,480
आधार पर जी मंत्रों में वेदों के

192
00:13:34,480 --> 00:13:39,280
विभाग हो जाते हैं। जी हवन आदिक प्रक्रिया वही है। जी कर्म

193
00:13:39,280 --> 00:13:43,360
वही है। 96 चौबे का यज्ञप सब को धारण

194
00:13:43,360 --> 00:13:47,760
करने के लिए है। अच्छा क्षत्रियों के लिए 94 और वैश्यों

195
00:13:47,760 --> 00:13:51,920
के लिए 92 पर साधारण दृष्टि से

196
00:13:51,920 --> 00:13:56,160
सामान्य दृष्टि से वो यज्ञ पवित आजकल बनाने में भी

197
00:13:56,160 --> 00:14:00,240
लोगों को सुविधा हो रही है तो बाजार में हमारे सीतापुर कई जिलों के

198
00:14:00,240 --> 00:14:04,720
ब्राह्मण गोवित बनाते हैं वही लोग धारण कर लेते हैं अन्यथा

199
00:14:04,720 --> 00:14:09,200
ये गोपी धारण करने की जो शुद्ध विशुद्ध वैज्ञानिक

200
00:14:09,200 --> 00:14:13,360
विधि है और नाभ्यात कट पर्यंतम उपतम धारे

201
00:14:13,360 --> 00:14:17,680
उधा नाभि से कमक तक की [संगीत] धारण करने का विधान है।

202
00:14:17,680 --> 00:14:22,080
पर जिस विधि का उचित पालन

203
00:14:22,080 --> 00:14:26,480
दूर दिख पड़ रहा है तो जितनी विधियां जितने शास्त्र

204
00:14:26,480 --> 00:14:30,880
सुविधा दे सके उसी आधार पर हम लोगों को धारण करना आवश्यक

205
00:14:30,880 --> 00:14:34,960
है। अन्यथा ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य कहा पड़ तो

206
00:14:34,960 --> 00:14:39,520
इसमें क्या हम यह माने कि सबसे उत्तम तो यही है कि व्यक्ति का जो व्यक्तिगत

207
00:14:39,520 --> 00:14:43,680
रूप से हो यदि नहीं होता है तो फिर इस तरह से हो जाए

208
00:14:43,680 --> 00:14:48,240
वो भी व्यक्तिगत ही है क्योंकि जो ब्राह्मण बैठेगा जी वो

209
00:14:48,240 --> 00:14:49,680
हवन करेगा तो

210
00:14:49,680 --> 00:14:54,000
उसमें बटुक की दृष्टि से अलग-अलग आचार्य रखे जाते हैं। अच्छा अच्छा और सामूहिक

211
00:14:54,000 --> 00:14:58,480
दृष्टि से एक आचार्य कहतेशा नाम उपनयन धारणार्थम

212
00:14:58,480 --> 00:15:02,640
तो शास्त्र कहते हैं भाई ना करने दोष सूत्र

213
00:15:02,640 --> 00:15:06,640
अगर नहीं कोई धारण कर रहा है तो बहुत बड़ा दोष इसलिए कर लेना ही

214
00:15:06,640 --> 00:15:10,720
लेना ही आवश्यक है स्वशाखा नहीं मिल पा रही तो नहीं मिल पा रही लोप हो गया कई

215
00:15:10,720 --> 00:15:15,680
कई शाखाओं का तो लोप में भी प्राय शाखाओं में भी प्राय

216
00:15:15,680 --> 00:15:19,840
बहुत से विवाद बन जाते हैं जी तो उन विवादों के शमन

217
00:15:19,840 --> 00:15:23,920
के लिए जिसके गोत्र का कोई पता नहीं कश्यप ऋषि का गोत्र कश्यप गोत्र कह

218
00:15:23,920 --> 00:15:28,000
ही सकता शाखाएं नहीं मिल पाती वेद नहीं पता चलता तो

219
00:15:28,000 --> 00:15:32,000
शुक् उसी के आधार पर पाठों पर लिया जाता

220
00:15:32,000 --> 00:15:36,160
है सारे वेद उनकी शुक्लवेद शुद्ध यजुर्वेद

221
00:15:36,160 --> 00:15:40,480
की प्रतिष्ठा करते हैं। यज्ञ जागाद में शुक् अथवा

222
00:15:40,480 --> 00:15:46,000
यजुर्वेद कह लीजिए यजुर्वेद ही प्राधान्य है। इस दृष्टि से

223
00:15:46,000 --> 00:15:50,080
गौ पक्ष को भी मुख्य पक्ष माना जाता है। जी जी आवश्यकता एक

224
00:15:50,080 --> 00:15:54,560
एक वो वाली बात भी है कि जब सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो सूक्ष्म

225
00:15:54,560 --> 00:15:58,880
बीज रूप वेद जो तो प्रणव है प्रणव से ही चारों वेद फूटे हैं तो वहां पे एकत्व

226
00:15:58,880 --> 00:16:02,880
मान करके उस तरह से उसके आधार पर भी सर्वे वेदा

227
00:16:02,880 --> 00:16:04,800
पद्मा मनती सर्वे वेद एक

228
00:16:04,800 --> 00:16:09,280
ही पद की प्रतिष्ठा करते हैं तो वो विष्णु पद है ओमकार

229
00:16:09,280 --> 00:16:13,360
पद है तो उसी से सबका व्यवहार चलता है लेकिन

230
00:16:13,360 --> 00:16:17,440
जो सामथर्व वेदों का प्राकट भी प्रणवत्मक है इसलिए

231
00:16:17,440 --> 00:16:21,760
प्रणव वेदों के पिता हैं गायत्री वेद की माताओं जी अच्छा

232
00:16:21,760 --> 00:16:25,760
महाराज जी इसमें एक और चीज है जैसे आपने बताया ना व्रत जो है प्रायश्चित पूर्वक कर

233
00:16:25,760 --> 00:16:29,760
लेंगे तो फिर उनका जो पर्यवसान है क्योंकि व्रत

234
00:16:29,760 --> 00:16:33,920
तो हो ही गए हैं तो मेरे ख्याल से उनका परवसान इसमें तो हो नहीं सकता कि वो कभी

235
00:16:33,920 --> 00:16:37,920
शंकराचार्य के पद तक भी पहुंचे मतलब उनका उनके आत्म कल्याण

236
00:16:37,920 --> 00:16:42,000
हेतु वो भ्रात हो ही गए हैं तो गायत्री के पुरुष चरण

237
00:16:42,000 --> 00:16:46,160
में भी उनको अधिकार नहीं है शास्त्र कहता है संध्या

238
00:16:46,160 --> 00:16:50,400
के क्रम में गायत्री जपे और पौराणिक अथवा तांत्रिक मंत्रों को जप

239
00:16:50,400 --> 00:16:54,400
करके फला देश में शौर्य नहीं है। महाराज श्री कहते हैं

240
00:16:54,400 --> 00:16:58,400
कि उसमें कोई किसी प्रकार का शौर्य नहीं है। फल तो मिलेगा

241
00:16:58,400 --> 00:17:02,560
ही जो मंदिर के भीतर गर्भगृह में नहीं जा सकते। गर्भ के बाहर

242
00:17:02,560 --> 00:17:06,640
प्रणाम करेंगे। जो गर्भ के प्रणाम करने के स्थान

243
00:17:06,640 --> 00:17:10,640
पर नहीं पहुंच पाते वो बाहर से त्रिशूल चक्र दर्शन का ही

244
00:17:10,640 --> 00:17:14,640
फल प्राप्त करेंगे। जी फल में किसी प्रकार की कटौती

245
00:17:14,640 --> 00:17:18,960
नहीं है। कल्याण से कोई भी वंचित नहीं है। यह कहने का अर्थ है। हां।

246
00:17:18,960 --> 00:17:19,920
कल्याण सबको

247
00:17:19,920 --> 00:17:23,920
होगा। सबकी विधियां अलग-अलग हैं। उसमें इस

248
00:17:23,920 --> 00:17:28,000
एक कंपटीशन वाला या प्रतियोगिता वाला भाव लाने की आवश्यकता नहीं है।

249
00:17:28,000 --> 00:17:32,080
अच्छा एक चीज और है मैं क्लियर कर दूं। व्रत वाली जो

250
00:17:32,080 --> 00:17:36,320
बात है मतलब जिनकी आयु निकल चुकी है और उसके बाद वह यज्ञोपवीत करा रहे हैं

251
00:17:36,320 --> 00:17:40,480
तो ऐसा ऐसे लोगों का यज्ञपवित हो रहा है उनके आत्म कल्याण हेतु

252
00:17:40,480 --> 00:17:45,120
कि अब जो बच गया उसको बचा लिया जाए मगर इसका मतलब ये नहीं कि व्रात

253
00:17:45,120 --> 00:17:49,120
व्रात हो के जनेऊ कराने की विधा को प्रोत्साहित किया जा रहा है

254
00:17:49,120 --> 00:17:53,200
ऐसा नहीं है उसका प्रोत्साहन नहीं है केवल जो बचा है वो

255
00:17:53,200 --> 00:17:57,440
बचा रहे उसकी दृष्टि से व्रात्यों के लिए भी बीज की रक्षा

256
00:17:57,440 --> 00:18:01,440
के लिए कम से कम आपकी जो अगली पीढ़ी है उसका का जनेऊ हो जाए आप

257
00:18:01,440 --> 00:18:05,760
अपने आप जब स्वयं परंपरा में आपकी जनेऊ बचा रहेगा यज्ञ

258
00:18:05,760 --> 00:18:09,920
बचा रहेगा तो अपने पुत्र और पौत्र को देंगे और बहुत

259
00:18:09,920 --> 00:18:14,160
सी चीजें होती है जो पिता से प्राप्त होती हैं गुरुजनों के पास नहीं रह पाते उतने

260
00:18:14,160 --> 00:18:18,320
समय तक तो पिता से प्राप्त होती है इसलिए उसको रक्षित करने की दृष्टि

261
00:18:18,320 --> 00:18:22,400
से जा रहा है जाने का उपक्रम समाज

262
00:18:22,400 --> 00:18:26,400
में दिया जा रहा है। इसी आधार पर हमारा अनुमान यह है कि महाराज

263
00:18:26,400 --> 00:18:30,640
श्री के निर्देश से और उनके उपदेश

264
00:18:30,640 --> 00:18:34,800
से उनके कहे गए वचनों के आधार पर हमारा

265
00:18:34,800 --> 00:18:35,300
ये

266
00:18:35,040 --> 00:18:39,280
अंदाज है अनुमान है कि उत्तर प्रदेश उत्तराखंड

267
00:18:39,280 --> 00:18:43,600
हरियाणा यहां तक कश्मीर के भी बच्चे और महाराष्ट्र,

268
00:18:43,600 --> 00:18:48,320
छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, बंगाल और आसाम

269
00:18:48,320 --> 00:18:52,400
जी बिहार अन्य इन सब प्रांतों से बहुत

270
00:18:52,400 --> 00:18:56,400
से बच्चे सब हो गए थे। कम से कम उन्हें पता तो चला कि हम

271
00:18:56,400 --> 00:19:00,640
ब्राह्मण बहुत बड़ी बात है। तो इस सब तो बचाने

272
00:19:00,640 --> 00:19:05,280
के लिए अभियान और भी आचार्यों को विद्वानों को करना चाहिए। नहीं करेंगे

273
00:19:05,280 --> 00:19:09,600
तो लुप्तप्प्राय हो जाएगा। जी नकारात्मक विधि को पकड़

274
00:19:09,600 --> 00:19:13,760
लेने से सकारात्मक विधि नहीं आ पाएगी। इसलिए हमें बचाना

275
00:19:13,760 --> 00:19:18,640
है और ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य बिल्कुल। शूद्र

276
00:19:18,640 --> 00:19:22,880
माताएं इनकी रक्षा भी करनी। तो आप सभी से निवेदन है जो

277
00:19:22,880 --> 00:19:27,040
भी आप ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य हैं अथवा शूद्र हैं तो

278
00:19:27,040 --> 00:19:31,520
आप चारों के लिए यहां पर आयोजन है। ये फरवरी माह में

279
00:19:31,520 --> 00:19:36,080
5 फरवरी को मुख्य आयोजन है। उससे एक दिन पहले जो आएंगे तो कुछ

280
00:19:36,080 --> 00:19:40,480
छौर कर्म छ को यत है। तो एकद दिन पहले से आएंगे तो प्रायश्चित

281
00:19:40,480 --> 00:19:44,480
पूर्वक और छौर कर्म इत्यादि होगा आपका। तो ऐसा समय

282
00:19:44,480 --> 00:19:48,560
लेकर के आए। हमारे चैनल पर पूरी डिटेल्स आपको मिल जाएगी वीडियो में और भी

283
00:19:48,560 --> 00:19:50,080
हम तरह-तरह से प्रचारित कर

284
00:19:50,080 --> 00:19:54,160
रहे हैं और इस अभियान से जुड़े और किसी प्रकार के प्रश्न हो तो

285
00:19:54,160 --> 00:19:58,160
उसमें एक नंबर भी आपको दिया गया संपर्क सूत्र इत्यादि कोई जिज्ञासा हो

286
00:19:58,160 --> 00:20:02,160
कुछ जानना हो अपनी चीजों के बारे में तो उसके लिए वह संपर्क कर सकते हैं और

287
00:20:02,160 --> 00:20:06,160
आचार्य श्री के द्वारा प्रारंभ किया हुआ अभियान नहीं है।

288
00:20:06,160 --> 00:20:10,640
स्वयं श्री कृपात्री जी महाराज के द्वारा प्रारंभ किया हुआ अभियान है।

289
00:20:10,640 --> 00:20:14,960
और स्वयं श्री श्रीमद् जगदगुरु शंकराचार्य पूरी पीठाधीश्वर गुरुदेव

290
00:20:14,960 --> 00:20:18,960
भगवान के सानिध्य से ही ये आगे बढ़ा है। अपने स्वरूप को

291
00:20:18,960 --> 00:20:23,200
धारण किया है। तो इसलिए जब ऐसे महापुरुषों की हमें वाणी प्राप्त

292
00:20:23,200 --> 00:20:27,360
है उसमें तो फिर कहीं से भी दोष दृष्टि रखने का कोई स्थान

293
00:20:27,360 --> 00:20:31,360
रह नहीं जाता है। तो इसी के साथ आचार्य

294
00:20:31,360 --> 00:20:35,360
किसी प्रकार की शंका नहीं करनी चाहिए। बल्कि इसमें सहयोग देना चाहिए। जी जी

295
00:20:35,360 --> 00:20:39,440
सहयोग सहयोग की भावना होनी चाहिए। क्योंकि वैवाहिक और आपको मैं

296
00:20:39,440 --> 00:20:43,920
बता दूं मेरा खुद का एक एक्सपीरियंस जो मैंने अपनी आंखों से देखा है। आचार्य श्री

297
00:20:43,920 --> 00:20:48,160
पूरी तरीके से निशुल्क ये आयोजन करवाते हैं। किसी से भी कोई

298
00:20:48,160 --> 00:20:52,400
ऐसा नहीं है कि कोई मतलब अनिवार्यता के साथ कोई शुल्क वगैरह

299
00:20:52,400 --> 00:20:56,640
लिया जाता हो और यहां तक कि मैंने ऐसा देखा है इनका इतना सहज

300
00:20:56,640 --> 00:21:00,640
भाव है इस आयोजन के लिए कि जो व्यक्ति अपने से

301
00:21:00,640 --> 00:21:04,800
जो उसमें बर्तन इत्यादि की आवश्यकता होती है या जो छोटी कुछ

302
00:21:04,800 --> 00:21:05,300
चीजें

303
00:21:05,120 --> 00:21:09,200
फल होते हैं या फिर भीखी डाली जाती है जो माता-पिता के द्वारा वो

304
00:21:09,200 --> 00:21:13,280
भी नहीं होती है। तो आचार्य श्री स्वयं से प्रयत्न पूर्वक उन सब चीजों

305
00:21:13,280 --> 00:21:17,440
की आवश्यकता करती है। उन्हें केवल अह बटुक चाहिए होते हैं, द्विज चाहिए

306
00:21:17,440 --> 00:21:21,440
होते हैं अथवा शूद्र चाहिए होते हैं। जिनका वह संस्कार होना है। यज्ञ पवित्र संस्कार

307
00:21:21,440 --> 00:21:25,520
या कंठीधार संस्कार। तो वो इतना मतलब क्यों कर

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रहे हैं? क्योंकि वही वाली बात करपाती जी ने कहा था कि

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बीज की रक्षा भगवान को अभीष्ट है। करते रहना। तो आप लोग भी

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इसमें सहयोग दें और आचार्य श्री का बारंबार हमें धन्यवाद साधुवाद

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देते हुए और प्रणाम निवेदित करते हुए सर्वे सुखना भवंतु

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सभी को जय श्री महादेव

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[संगीत]
