1
00:00:03,520 --> 00:00:08,000
सर्वशक्तिमान को लोग अधिक समझ रहे हैं कि वह इतना सर्व शक्तिमान

2
00:00:08,000 --> 00:00:12,080
है कि सब कुछ कर सकता है। ईश्वर भी सब कुछ

3
00:00:12,080 --> 00:00:16,720
नहीं कर सकता। यहां लोग भूल रहे हैं। सब कुछ नहीं कर सकता। सर्वशक्तिमान

4
00:00:16,720 --> 00:00:20,800
तो है। सर्वशक्तिमान इसलिए है कि वह अपने कार्यों में किसी की

5
00:00:20,800 --> 00:00:25,440
सहायता नहीं लेता। तो फिर आत्मनिर्भर किसे कहेंगे?

6
00:00:25,440 --> 00:00:29,440
तो फिर सर्वशक्तिमान और आत्मनिर्भर क्या एक दूसरे के पर्यायवाची

7
00:00:29,440 --> 00:00:33,600
माने जाए? हां मान भी सकते हैं। हम मान भी सकते हैं। नहीं अनंत

8
00:00:33,600 --> 00:00:37,760
सामर्थ्यमान इसलिए है कि उसके अनंत ऐसे कार्य जिसको हम समझ नहीं पा रहे हैं। देख

9
00:00:37,760 --> 00:00:41,840
नहीं पा रहे हैं। अभी जान नहीं पा रहे हैं। कहा गया है। मतलब एक फैक्ट यहां पे निकल के आ

10
00:00:41,840 --> 00:00:45,840
रहा है कि वो और क्या-क्या कर सकता है ये कहा नहीं जा सकता है। मगर

11
00:00:45,840 --> 00:00:50,000
वो क्या-क्या नहीं कर सकता है ये हमें पता चल चुका है। जी ऐसा तो नहीं

12
00:00:50,000 --> 00:00:54,080
कि वो और क्या-क्या जो कर सकता है उसमें ये वाली चीज भी आ जाए कि हमने

13
00:00:54,080 --> 00:00:58,080
जिसको लगाम लगा दी है कि वो ये नहीं कर सकता। ये शायद और क्या-क्या

14
00:00:58,080 --> 00:01:02,080
कर सकता है मैं इंक्लूडेड हो जाए जो हमें नहीं पता चल रहा है। अभी

15
00:01:02,080 --> 00:01:06,160
हां बिल्कुल सही ऐसा भी हो सकता है क्योंकि उसकी व्यवस्था को वही जान सकता है। हम लोग पूर्ण

16
00:01:06,160 --> 00:01:10,400
नहीं जान सकते। उसके विषय में कभी हम पूर्ण घोषणा कर ही नहीं सकते हैं।

17
00:01:10,400 --> 00:01:14,400
जी ना करने की ना करने की। तो ये ना करने की है ना

18
00:01:14,400 --> 00:01:18,400
कि वो कुछ कार्य है जो वो नहीं कर सकता है। जैसे अवतार नहीं ले सकता।

19
00:01:18,400 --> 00:01:18,900
तो

20
00:01:18,800 --> 00:01:22,800
कुछ है लेकिन हम उसके विषय में घोषणा नहीं कर सकते। मतलब यह

21
00:01:22,800 --> 00:01:26,960
निर्णय नहीं है। बिल्कुल निश्चय आप लेने का अधिकारी नहीं हो ना आपकी सामर्थ है।

22
00:01:26,960 --> 00:01:31,280
अच्छा नहीं कुछ विषय में तो है उसमें जैसे अवतार

23
00:01:31,280 --> 00:01:35,360
की बात लें जी अवतार में हम निर्णय हम ले सकते हैं। हम कह सकते हैं कि

24
00:01:35,360 --> 00:01:39,600
अवतार नहीं ले सकता ना लेगा ना लिया है। ऐसा देश कौन

25
00:01:39,600 --> 00:01:44,000
सा है? ऐसा काल कौन सा है? ऐसा स्थान कौन सा है जो परमपिता परमात्मा

26
00:01:44,000 --> 00:01:48,160
उस जगह पर उस समय पे है नहीं। सब तो कहां से जाएगा? कहां

27
00:01:48,160 --> 00:01:52,160
जाएगा? क्योंकि जब न्यून और अधिक होगा तभी तो जाना आना संभव हो

28
00:01:52,160 --> 00:01:56,400
सकेगा। जी। जब वो प्रलय जैसी व्यवस्था को करता है। प्रलय

29
00:01:56,400 --> 00:02:00,960
इस संसार को जब प्रलय में बदलता है तब किसी अवतार के माध्यम से नहीं बदलता।

30
00:02:00,960 --> 00:02:04,960
तो क्या छोटे-छोटे जो दुष्ट प्रवृत्ति के लोग हैं जैसे रावण हुए,

31
00:02:04,960 --> 00:02:09,120
कंस हुए क्या इनको मारने के लिए इनको खत्म करने के लिए क्या

32
00:02:09,120 --> 00:02:13,120
उसको अवतार लेने की आवश्यकता पड़ेगी? नहीं उसके वो ले सकता

33
00:02:13,120 --> 00:02:17,200
है कि नहीं? नहीं ले सकता है जब वो उसे जरूरत ही

34
00:02:17,200 --> 00:02:21,200
नहीं है भाई जरूरत ही नहीं है और लेगा तो वो सीमित

35
00:02:21,200 --> 00:02:25,200
हो जाएगा क्योंकि फिर वो सर्वदेशी नहीं रहेगा जी अवतार वाला एक

36
00:02:25,200 --> 00:02:29,280
देसी हो जाएगा तो उसकी शक्ति सामर्थ घटी क्षेत्र घटा कि बढ़ा है तो

37
00:02:29,280 --> 00:02:33,440
हमें अब देखिए चार अवतार वहां हुए धर्म बढ़ना चाहिए था नहीं बढ़ना

38
00:02:33,440 --> 00:02:33,940
चाहिए अगर

39
00:02:33,840 --> 00:02:37,920
स्थापना का नया धर्म बढ़ना चाहिए था लेकिन अगले युग में क्या हुआ त्रेता

40
00:02:37,920 --> 00:02:42,000
आया तो धर्म की हानि और हुई बढ़ा नहीं भाई सतयुग

41
00:02:42,000 --> 00:02:46,080
में चार डॉक्टर आए चार वैद आए, चार धर्म की स्थापना करने वाले

42
00:02:46,080 --> 00:02:50,080
महापुरुष आए या भगवान आए कहे उनको तो धर्म बढ़ना चाहिए नहीं बढ़

43
00:02:50,080 --> 00:02:54,640
अगला युग हमारा उससे बेहतर होना चाहिए नहीं होना चाहिए लेकिन नहीं हुआ

44
00:02:54,640 --> 00:02:59,040
थोड़ा महापुरुष जन्म लेकर युग युग में आते हैं आकर भूमंडल

45
00:02:59,040 --> 00:03:03,040
का वो भार हटाते हैं। ठीक इसी तरह समय-समय पर महापुरुषों को

46
00:03:03,040 --> 00:03:07,520
परमपिता परमात्मा भेजता है और इस राष्ट्र की व्यवस्था को समाज की व्यवस्था को परिवर्तन

47
00:03:07,520 --> 00:03:11,680
करते हैं। आए हैं भी उससे पहले भी आए हैं। लेकिन ईश्वर स्वयं

48
00:03:11,680 --> 00:03:15,680
में नहीं आता। ईश्वर आता है तो धर्म की स्थापना होती है। मगर

49
00:03:15,680 --> 00:03:19,760
धर्म की स्थापना हुई नहीं और पतन हुआ। मगर वहीं पर आपने यह

50
00:03:19,760 --> 00:03:23,920
मान लिया कि महापुरुष आते हैं भार हटाने के लिए भार हटा दिया।

51
00:03:23,920 --> 00:03:27,920
कि भगवान के आने पर तो आपने पतन माना। मगर महापुरुष

52
00:03:27,920 --> 00:03:32,000
के आने पे आपने भार हटाना मान लिया। तो एक तरफ कह रहे हैं कि पतन हुआ। एक तरफ

53
00:03:32,000 --> 00:03:36,000
महापुरुष के रूप में ये मान रहे हैं कि नहीं पतन नहीं हुआ। धर्म की रक्षा हो

54
00:03:36,000 --> 00:03:40,320
गई। तो ये दो बातें हो गई। वामन अवतार में भी राजा बलि

55
00:03:40,320 --> 00:03:44,400
के साथ छल किया गया। छल करने वाला तीन कदम

56
00:03:44,400 --> 00:03:48,560
उसकी जमीन मांगी। जमीन के साथ उसका पूरा राज्य ही नाप लिया। अंत में जब

57
00:03:48,560 --> 00:03:49,060
उसका

58
00:03:48,960 --> 00:03:53,120
तीसरा कदम उस भगवान का नहीं पूरा हुआ तो उसने कहा आप कहां रखें? इसको बताओ स्थान

59
00:03:53,120 --> 00:03:57,200
तुम्हारा तो ढाई कदम में पूरा नप गया। तो राजा बलि धर्मात्मा अपने आप लेट गया।

60
00:03:57,200 --> 00:04:01,440
साहब मैं नापता हूं। मुझे नाप लीजिए। इसको छल कहेंगे।

61
00:04:01,440 --> 00:04:05,440
ईश्वर छल द्वेष रहित है। वो किसी के साथ छल नहीं करता। साथ

62
00:04:05,440 --> 00:04:09,600
कपट नहीं करता। मगर व्यक्ति एक ऐसी जगह खड़ा

63
00:04:09,600 --> 00:04:13,600
है जहां पर उल्का पिंड आकर के गिर गया। जी तो यह ईश्वरीय माना जाएगा

64
00:04:13,600 --> 00:04:17,600
या व्यक्ति को माना जाएगा? ये भी ये उसके पूर्व जन्मों का जैसे मान लिया जाए कर्म का

65
00:04:17,600 --> 00:04:21,680
फल है ये। ये कर्म का फल है। मतलब ईश्वर के द्वारा हत्या की है उसको एक

66
00:04:21,680 --> 00:04:26,240
दंड मिला कि भाई वो कहीं खड़ा हुआ और उसके ऊपर उल्कापिंड आकर के गिर गया। जी

67
00:04:26,240 --> 00:04:30,400
तो ये ईश्वर द्वारा प्रदत कार्य। इसमें तो उसका कोई हस्तक्षेप है ही नहीं। कि उल्का पिंड

68
00:04:30,400 --> 00:04:34,400
गिरता है कि नहीं। तो क्या ये ईश्वर के द्वारा उसके साथ छल हुआ

69
00:04:34,400 --> 00:04:39,280
कि नहीं? जैसा छल आपने बताया कि बाली के साथ हुआ था। बलि के साथ हुआ था।

70
00:04:39,280 --> 00:04:43,360
जी इसको भी तो छल माना जाएगा। कैसे छल माना जाए? उसको नहीं पता था कि उल्लका पिंड मेरे ऊपर गिर

71
00:04:43,360 --> 00:04:47,440
सकता है। उसको नहीं पता था। लेकिन ईश्वर न्यायकारी है। यानी कि

72
00:04:47,440 --> 00:04:51,680
जिसके जो छल कर रहा है उसके साथ छल हो सकता है। ईश्वर के द्वारा छल हो सकता है।

73
00:04:51,680 --> 00:04:55,760
क्यों नहीं हो सकता? तो तो बलि ने कुछ हो सकता है ऐसा किया हो जो उसके साथ छल पूर्वक

74
00:04:55,760 --> 00:04:58,560
किया। हो सकता है। हम ये भी नहीं कह सकते। सकता। हम

75
00:04:58,560 --> 00:05:03,040
देखते हैं कि ईश्वर पृथ्वी सृष्टि की जब रचना करते हैं

76
00:05:03,040 --> 00:05:07,280
तो कहीं पे वो सूर्य बना रहे हैं। जी कहीं पे वो क्या

77
00:05:07,280 --> 00:05:11,280
कहते हैं? चंद्रमा बना रहे हैं। पृथ्वी बना रहे हैं। तो अब

78
00:05:11,280 --> 00:05:15,520
इसमें बात ये आती है कि सूर्य को बनाने में फोर्स ज्यादा चाहिए।

79
00:05:15,520 --> 00:05:19,680
और पृथ्वी को बनाने में फोर्स कम चाहिए। जी। जो ईश्वर

80
00:05:19,680 --> 00:05:23,680
है अपनी शक्ति के रूप में कार्य कर रहा है, चंद्रमा को बना रहा है, सूर्य

81
00:05:23,680 --> 00:05:28,160
को बना रहा है। तो वह खुद को जो एक रस था

82
00:05:28,160 --> 00:05:31,520
अब वो कहीं पर कम ज्यादा होकर के कार्य कर रहा

83
00:05:31,520 --> 00:05:35,520
है या नहीं? नहीं। जैसे जीव आत्मा शरीर के माध्यम से क्रिया करता

84
00:05:35,520 --> 00:05:39,760
है। कार्य करता है। ठीक? विविध प्रकार कार्य करता है। ऐसे ही परमपिता परमात्मा

85
00:05:39,760 --> 00:05:44,160
इस प्रकृति के माध्यम से सारे कार्य करता है। ईश्वर स्वयं

86
00:05:44,160 --> 00:05:48,400
कार्य नहीं करता। पृथ्वी के माध्यम से वो प्रकृति के माध्यम

87
00:05:48,400 --> 00:05:52,480
से कार्य करता है। जी तो यहां पे तो सहायता हो गई। नहीं सहायता कहां

88
00:05:52,480 --> 00:05:56,640
हो गई? प्रकृति की ऋषिवर देवदयाल ने कोई अपनी बात नहीं

89
00:05:56,640 --> 00:06:00,880
लिखी। सत्यार्थ प्रकाश उसका मूल ग्रंथ है। आपने पढ़ा हो नहीं पढ़ा हो पढ़ के देख लेना। कहीं

90
00:06:00,880 --> 00:06:04,960
पर भी उन्होंने कोई बात कही। वो प्राचीन ग्रंथों से लेकर के कही है। और उसका

91
00:06:04,960 --> 00:06:08,960
उन्होंने प्रमाण दिया है। एक ऐसे ऋषि हुए जिन्होंने अपनी बात का प्रमाण दिया कि मैं

92
00:06:08,960 --> 00:06:13,040
कहां से कह रहा हूं। ये फला ग्रंथ में देखिए जाकर। ये तो सभी आचार्यों ने दिया है।

93
00:06:13,040 --> 00:06:17,040
सबने नहीं दिया है। सबने अपनी भी बात रामानुजाचार्य सब ने दिया कोई प्रमाण

94
00:06:17,040 --> 00:06:21,280
नहीं दिया उन्होंने। अपनी बात की बल्कि उनके ग्रंथों के प्रमाण नहीं होंगे। होंगे तो बहुत कुछ

95
00:06:21,280 --> 00:06:25,680
ग्रंथों को होंगे। कुछ नहीं अब जैसे शंकर शंकर जी लिख रहे हैं। ठीक है

96
00:06:25,680 --> 00:06:30,160
ये विषय नारी नरक सुधार बताओ कहां से प्रमाणित किया उन्होंने? मैं देखूंगा

97
00:06:30,160 --> 00:06:34,400
एक भी अगर कहीं ऋषि ने ऐसी बात लिखी हो जिसका प्रमाण नहीं दिया। जैसे जैसे उन्होंने

98
00:06:34,400 --> 00:06:38,480
ये बात कही रहने दीजिए। अह जैसे उन्होंने यह बात कही जी

99
00:06:38,480 --> 00:06:42,560
कि अगर जो जीवात्मा है मुक्त हो जाती है जब जी तो मुक्त

100
00:06:42,560 --> 00:06:46,560
होने के बाद वो इतने इतने लाख जो वर्ष होते हैं

101
00:06:46,560 --> 00:06:51,360
कुछ एक अवधि वहां बताई है परांत काल जी उसके बाद वो वापस आती है जी

102
00:06:51,360 --> 00:06:55,600
तो वहां पर उन्होंने एक तर्क दिया है जी वो तर्क ये है कि बहुत लंबे

103
00:06:55,600 --> 00:06:59,760
समय तक अच्छा भोजन भी करते रहेंगे तो उससे भी मन आपका ऊब

104
00:06:59,760 --> 00:07:03,840
जाएगा अपनी भाषा में दिया उन्होंने तर्क दिया इस तर्क का कोई प्रमाण नहीं

105
00:07:03,840 --> 00:07:08,000
है जी ऐसा ऐसा सत्यार्थ प्रकाश में नहीं

106
00:07:08,000 --> 00:07:12,160
लिखा है आनंद को लेकर के आनंद को लेकर के क्योंकि सुख

107
00:07:12,160 --> 00:07:16,160
तो संसार का है और सुख एक मिनट नहीं सुख है

108
00:07:16,160 --> 00:07:20,240
लेकिन सुख संसार उसको सुख नहीं कहा सकता जो ब्रह्मानंद है जो मुक्ति

109
00:07:20,240 --> 00:07:24,400
का आनंद होने के बाद दयानंद जी ये कह रहे हैं कि उस मुक्ति

110
00:07:24,400 --> 00:07:28,400
से आप ऊब जाओगे इसलिए वापस आना उचित है। नहीं वापस इसलिए

111
00:07:28,400 --> 00:07:32,560
भी आना है क्योंकि मैं ये नहीं कह रहा उन्होंने इस बात का प्रमाण नहीं दिया ऐसी हजारों बातें

112
00:07:32,560 --> 00:07:36,560
मिल जाएंगी जिसका उन्होंने प्रमाण नहीं दिया नहीं नहीं ऐसा नहीं है चलिए इसको छोड़

113
00:07:36,560 --> 00:07:40,640
अगर अगर वो परमानंद की उभने वाली बातें ही नहीं है वो वहां

114
00:07:40,640 --> 00:07:44,880
तो उभने वाली बात तो वहां तो वहां तो जीवात्मा

115
00:07:44,880 --> 00:07:48,880
निरंतर चाहता हमें यही मिला रहे कि उसको सर्व स्वतंत्रता प्राप्त

116
00:07:48,880 --> 00:07:53,040
होती है। दयानंद सरस्वती जी कहा है डूबने का। चलो मैं

117
00:07:53,040 --> 00:07:57,040
मान लिया कह भी लेकिन वहां कोई स्वतंत्रता वहां इतनी स्वतंत्रता उसे हमें

118
00:07:57,040 --> 00:08:01,120
जीवन काल मिल ही नहीं सकती। जीवन काल में नहीं मुक्ति के बाद मुक्ति का

119
00:08:01,120 --> 00:08:01,760
वो आनंद

120
00:08:01,760 --> 00:08:05,760
है वो स्वतंत्रता है कि अन्य किसी क्षेत्र में अन्य किसी अवस्था में प्राप्त नहीं

121
00:08:05,760 --> 00:08:09,840
हो सकता। मगर दयानंद जी लिख रहे हैं कि आप ऊब जाओगे। नहीं उसके लिए मैंने विचार

122
00:08:09,840 --> 00:08:13,840
नहीं उसके लिए नहीं कहा होगा। उसके विषय जरूर कोई विषय होगा। मैं अभी दिखा। चलिए मैं देख लूंगा

123
00:08:13,840 --> 00:08:17,840
बाद में। चलिए चलो आगे बात करिए। अच्छा ठीक है मैं होता है तो

124
00:08:17,840 --> 00:08:22,080
अभी ईश्वर जो है वो हमें शब्द प्रमाण से मालूम पड़ रहा है प्रातिभाषिक सत्ता है उसकी

125
00:08:22,080 --> 00:08:26,160
जी पर वो अभी भी हमारी इंद्रियों का विषय नहीं है भौतिक इंद्रियों का

126
00:08:26,160 --> 00:08:30,320
इस कारण से जी एक नास्तिक उसे नकार सकता है ईश्वर को

127
00:08:30,320 --> 00:08:34,320
जी है ना कि भाई नहीं मानता जो मेरे को प्रूफ नहीं हो रहा क्यों प्रूफ नहीं हो

128
00:08:34,320 --> 00:08:38,320
रहा कि वो इंद्रियों का विषय नहीं है वो ठीक है वो एक अलग बात है तो निराकरण

129
00:08:38,320 --> 00:08:42,480
इस बात का ये है कि वो अभी इंद्रियों का विषय नहीं था मगर फिर वो इंद्रियों

130
00:08:42,480 --> 00:08:46,560
का विषय बना तो इसी को कहा गया कि आना जाना सिद्ध होता है। अब इसको एक

131
00:08:46,560 --> 00:08:50,960
उदाहरण है कि ईश्वर सब जगह पहले से ही है।

132
00:08:50,960 --> 00:08:55,440
उस तो जब ईश्वर है सब जगह पहले से ही तो ईश्वर

133
00:08:55,440 --> 00:08:59,520
ऋषियों के मस्तिष्क में भी है। तो ईश्वर के रूप

134
00:08:59,520 --> 00:09:03,520
में उसका ज्ञान भी है। जी। फिर किसी देश काल परिस्थिति में

135
00:09:03,520 --> 00:09:07,680
उसके मंत्रों का आना जाना कैसे सिद्ध होगा? जी। उसके मंत्र

136
00:09:07,680 --> 00:09:11,840
भी तो हैं पहले से ही। जी। मगर वो मंत्र आ जा रहे हैं। तो इसमें हमें ये मानना

137
00:09:11,840 --> 00:09:16,320
पड़ेगा पहले वो मन का विषय नहीं थे। बाद में वह मन रूपी इंद्रिय का विषय

138
00:09:16,320 --> 00:09:16,960
बन गए

139
00:09:16,960 --> 00:09:21,520
तो मंत्रों का प्रकट होना इस तरह से सिद्ध हुआ।

140
00:09:21,520 --> 00:09:25,600
ईश्वर जो मंत्र आप जो हम देख रहे हैं कि अब पहले हम मंत्र

141
00:09:25,600 --> 00:09:29,600
को नहीं जानते थे। मगर हम किसी देश काल परिस्थिति में मंत्र को जान गए।

142
00:09:29,600 --> 00:09:33,840
जबकि हम जब ये कहते हैं कि जब ईश्वर पहले से ही है तो उसके रूप में उसके

143
00:09:33,840 --> 00:09:37,920
मंत्र भी पहले से हैं। पहले से पहले से हैं। मगर फिर भी हम ये कहते हैं कि

144
00:09:37,920 --> 00:09:42,160
हमने मंत्र को पढ़ा देखा। हमें मंत्र हमने जाना। तो ये आना

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जाना क्यों हो रहा है? जब ईश्वर पहले से ही है तो हम मंत्रों का आना जाना

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क्यों स्वीकार कर रहे हैं और अगर मंत्रों का आना-जाना स्वीकार कर रहे हैं तो जिस तरह से मंत्रों

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का आना जाना स्वीकार कर रहे हैं उस तरह से ईश्वर का क्यों नहीं स्वीकार कर सकते नहीं ईश्वर आता है उसमें आने

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की जरूरत ही नहीं है भाई ईश्वर वो अगला चरण है आवश्यकता है कि नहीं वो

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अगला चरण है हमें हमें ज्ञान देने के लिए उसको कोई साकार रूप लेने की आवश्यकता नहीं है

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नहीं नहीं ईश्वर आत्मा का विषय है ईश्वर आत्मा का विषय है

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इसमें भी एक पॉइंट है कि जैसे आपने कहा कि ईश्वर को ज्ञान देने के

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लिए अवतार साकार रूप लेने की आवश्यकता नहीं है। तो अगर

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ज्ञान ही कराना है, विद्याद का भेद बताना है, केवल ईश्वर अपने मन

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में सोच ले। आपने कहा इच्छा से हो तो हमें ज्ञान हो जाएगा विद्या का। ये

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क्यों इतनी व्यवस्था है कि गायत्री मंत्र पढ़ो। तो फिर प्रश्न यही है ना कि जब उनको

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आपको ज्ञान कराना है जो अविद्या

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से मुक्ति का

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ज्ञान विद्या तो जब ज्ञान कराना है तो डायरेक्ट वो ज्ञान दे सकते

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हैं। मंत्रों का फॉर्म की आवश्यकता क्या है? फिर वो इसलिए थी अगर उन चार

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ऋषियों को तो ऐसे ही बोध करा सकते थे। लेकिन जो आगे परंपरा चलती वो तो किसी

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व्यवस्था से चलती ना। किसी भाषा के माध्यम से किसी व्याकरण के माध्यम से

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जिससे गुरु शिष्य परंपरा में ढलेगी तो गुरु कैसे पढ़ाएगा उसको? ईश्वर ने

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उनको फॉर्म इसलिए दिया जिससे कि क्योंकि फॉर्म है तभी तो हम आगे प्रदान

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कर पाएंगे। जी तो ईश्वर ने वैदिक ज्ञान का जो

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ज्ञान का स्वरूप साकार स्वरूप यानी कि मंत्रों के रूप में वो

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ऋषियों को इसलिए दिया जिससे कि वो आगे किसी को दे पाएं। है ना?

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तो क्या यह मान सकते हैं कि ईश्वर का जो साकार स्वरूप होता है वह इसलिए

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होता है कि उसके बारे में कोई किसी के कोई किसी को बता पाए वो

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वाणी का विषय बन पाए। अब बात इस पर हो रही है कि जो जिस चीज की आवश्यकता नहीं

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है मगर आपने कहा कि जो वैदिक ज्ञान है जिससे कि उसको हम किसी

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को बता सके, किसी को प्रदान कर सके आसानी से इसलिए उसको ऐसा

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रूप दे के भेजा मंत्रों के रूप में। तो हम ये भी कह सकते हैं कि ईश्वर के

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जो ईश्वर के बारे में हम किसी को बता सके हम उसके व्यवहार

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कर सके। व्यवहारिक हो सके। इसलिए ईश्वर ने ऐसा रूप बनाया कि जो

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जो मनुष्य के व्यवहार का विषय बन सके जिससे कि आगे परंपरा चल सके।

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अच्छा जो

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इस पे बात चल रही थी कि वो व्यवहारिक हो सकता है

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व्यवहार करने के लिए जिससे कि ऋषि उस ज्ञान को आगे दे पाए। इसलिए

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मंत्र के रूप में जो ईश्वर है वो अपना ज्ञान देते हैं। तो इसी तरीके से हम

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कह सकते हैं कि ईश्वर को लेकर के लोग व्यवहारिक हो पाए। इसलिए

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ईश्वर अपना दर्शन या ईश्वर अपना स्वरूप बनाते हैं। है ना?

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[संगीत]
