1
00:00:06,080 --> 00:00:10,160
आप कमेंट तो भरभ के करते थे। आज आप भरवात्म कह रहे हैं कि मुझे नहीं

2
00:00:10,160 --> 00:00:14,240
पता मुझे नहीं पता। खैर अब आप ये बताइए मुझे कि

3
00:00:14,240 --> 00:00:20,240
क्या काल तत्वदर्शी है?

4
00:00:20,800 --> 00:00:23,360
क्या?

5
00:00:23,360 --> 00:00:28,000
ये क्लेम किया जाता है कि भैया काल ने कहा कि तू तत्वदर्शी

6
00:00:28,000 --> 00:00:32,480
की शरण में जा। ठीक है। और 1866

7
00:00:32,480 --> 00:00:35,680
में भी कहा कि तू जा।

8
00:00:35,680 --> 00:00:39,760
ठीक है। चार 34 में कहा कि तत्वदर्शी की शरण में

9
00:00:39,760 --> 00:00:44,080
जा। 1866 में था कहा कि तू और किसी दूसरे

10
00:00:44,080 --> 00:00:50,080
प्रभु की शरण में जा। आपके अनुसार है ना?

11
00:00:50,320 --> 00:00:54,960
इसका मतलब वो जिस चीज के लिए भेज रहा है वो चीज उसके पास नहीं है।

12
00:00:54,960 --> 00:01:00,960
हेलो क्या काल तत्वदर्शी है?

13
00:01:02,000 --> 00:01:06,000
नहीं काल तत्वदर्शी नहीं है। काल तत्वदर्शी होते तो

14
00:01:06,000 --> 00:01:10,240
दूसरे के शरीर में जाने के लिए क्यों कहते? बस गुड।

15
00:01:10,240 --> 00:01:14,640
और आपके रामपाल ने भी यही माना है। ठीक है?

16
00:01:14,640 --> 00:01:18,640
तो इसका मतलब 1866 में तत्वदर्शी

17
00:01:18,640 --> 00:01:23,040
की 434 में तत्वदर्शी की शरण में जाने को कहा जा रहा है। तत्वदर्शी

18
00:01:23,040 --> 00:01:26,960
की शरण में जाने पर मोक्ष मिल जाएगा। पक्का

19
00:01:26,960 --> 00:01:32,960
पक्का।

20
00:01:36,480 --> 00:01:42,480
तो आपके पास भगवत गीता है

21
00:01:42,640 --> 00:01:45,440
गीता है ना

22
00:01:45,440 --> 00:01:51,440
तो दूसरे अध्याय का 16वा श्लोक खोलिए

23
00:02:06,720 --> 00:02:12,720
हम

24
00:02:15,120 --> 00:02:19,360
खोला खोलना खोला पढ़िए

25
00:02:19,360 --> 00:02:22,320
क्या लिखा है

26
00:02:22,320 --> 00:02:27,360
इसमें इसमें लिखा है कि असत भाव न विद्यते

27
00:02:27,360 --> 00:02:31,360
तू सत अभाव अरे हिंदी पढ़ लो भैया

28
00:02:31,360 --> 00:02:35,600
संस्कृत मत पढ़ो हिंदी पढ़ लो आप असत की सत्ता

29
00:02:35,600 --> 00:02:40,000
नहीं है और सत्य का अभाव नहीं है।

30
00:02:40,000 --> 00:02:44,000
इस प्रकार इन दोनों का तत्व तत्व ज्ञानी

31
00:02:44,000 --> 00:02:47,760
पुरुषों द्वारा देखा गया है।

32
00:02:47,760 --> 00:02:51,040
यहां पे

33
00:02:51,040 --> 00:02:54,400
असत का

34
00:02:54,400 --> 00:02:59,520
भाव नहीं है और सत का अभाव नहीं है। ठीक है?

35
00:02:59,520 --> 00:03:03,360
हम ठीक है ना?

36
00:03:03,360 --> 00:03:07,360
असत का भाव नहीं है और सत का अभाव नहीं है।

37
00:03:07,360 --> 00:03:11,520
इस प्रकार इस बात को जानने वाले को ऊपर संस्कृत

38
00:03:11,520 --> 00:03:15,200
में देखिए क्या लिखा है?

39
00:03:15,200 --> 00:03:20,240
नीचे तो तत्व ज्ञानी लिखा हुआ होगा। ऊपर क्या लिखा है? संस्कृत में क्या शब्द है?

40
00:03:20,240 --> 00:03:24,560
तत्वदर्शी भी। हां क्या

41
00:03:24,560 --> 00:03:29,280
लिखा है? तत्वदर्शी भी मतलब

42
00:03:29,280 --> 00:03:33,360
तत्वदर्शी संतों के द्वारा देखा जाता है। यानी

43
00:03:33,360 --> 00:03:38,160
कि तत्वदर्शी कौन है? जो यह बात जानता है कि

44
00:03:38,160 --> 00:03:42,800
सत्य का कभी अभाव नहीं होता और असत का कभी

45
00:03:42,800 --> 00:03:46,320
भाव नहीं होता।

46
00:03:46,320 --> 00:03:51,360
है ना?

47
00:03:51,360 --> 00:03:57,120
तत्वदर्शी कौन है?

48
00:03:57,120 --> 00:04:00,240
का

49
00:04:00,240 --> 00:04:04,720
अरे इस श्लोक के हिसाब से कौन है? जो ये जानता

50
00:04:04,720 --> 00:04:06,480
है कि सत्य का

51
00:04:06,480 --> 00:04:12,480
कभी अभाव नहीं होता और असत का कभी भाव नहीं होता। ठीक है?

52
00:04:15,360 --> 00:04:19,840
तो

53
00:04:19,840 --> 00:04:22,320
अब बात ये आती है कि

54
00:04:22,320 --> 00:04:26,320
जो व्यक्ति यह बता रहा है कि तत्वदर्शी कौन

55
00:04:26,320 --> 00:04:30,640
है जिसको यह पता है कि सत्य का कभी अभाव नहीं होता

56
00:04:30,640 --> 00:04:34,800
और असत का कभी भाव नहीं होता। जो व्यक्ति

57
00:04:34,800 --> 00:04:38,880
ये बता रहा है उसको यह बात मालूम है ना कि सत्य का कभी अभाव नहीं होता और

58
00:04:38,880 --> 00:04:44,640
असत का कभी सत का कभी अभाव नहीं होता और असत का कभी भाव नहीं होता।

59
00:04:44,640 --> 00:04:49,600
जो व्यक्ति जो व्यक्ति यह बता रहा है

60
00:04:49,600 --> 00:04:53,600
कि भैया जो भी व्यक्ति यह जानता है कि सत

61
00:04:53,600 --> 00:04:58,400
और असत का ये होता है वो व्यक्ति तत्वदर्शी है। जो व्यक्ति ये बता रहा है

62
00:04:58,400 --> 00:05:04,400
उसको ये मालूम है ना कि सत और असत का क्या मामला है?

63
00:05:04,720 --> 00:05:08,960
किसी ने तो आदेश दिया है ना कि तत्वदर्शी के द्वारा

64
00:05:08,960 --> 00:05:14,320
देखा जाता है। किस प्रकार देखा जाता है?

65
00:05:14,320 --> 00:05:17,040
सत्य और असत

66
00:05:17,040 --> 00:05:21,280
सत्य और असत्य क्या है? तत्वदर्शी ही बताता है।

67
00:05:21,280 --> 00:05:25,520
हां। मगर वो क्या है कि सत्य का कभी

68
00:05:25,520 --> 00:05:29,760
अभाव नहीं होता। वहां लिखा है ना इस प्रकार क्या लिखा

69
00:05:29,760 --> 00:05:32,800
है?

70
00:05:32,800 --> 00:05:38,560
क्या लिखा है? हम इस प्रकार

71
00:05:38,560 --> 00:05:42,560
हम यानी कि मैं एग्जांपल ले

72
00:05:42,560 --> 00:05:46,800
लूं जैसे कि मान लीजिए कि मैं ये बता रहा

73
00:05:46,800 --> 00:05:51,280
हूं कि जो व्यक्ति ये जानता है

74
00:05:51,280 --> 00:05:55,840
कि कुर्सी को इंग्लिश में चेयर कहते हैं। ठीक है?

75
00:05:55,840 --> 00:06:00,080
मैं ये कह रहा हूं कि जो व्यक्ति ये जानता है कि कुर्सी को इंग्लिश में चेयर कहते

76
00:06:00,080 --> 00:06:05,440
हैं उसको इंग्लिश जानने वाला माना जाता है।

77
00:06:05,440 --> 00:06:09,440
ठीक है? तो मेरा मेरे ऐसे बताने से ये

78
00:06:09,440 --> 00:06:13,600
सिद्ध हो गया ना कि मैं जानता हूं कि कुर्सी को इंग्लिश में चेयर कहते

79
00:06:13,600 --> 00:06:17,040
हैं।

80
00:06:17,040 --> 00:06:20,640
नहीं समझे?

81
00:06:20,640 --> 00:06:24,720
तो यहां तो आत्मा परमात्मा की बात चल रही है। चेयर कहां से भाई साहब? में

82
00:06:24,720 --> 00:06:28,720
एक एक करके बात करिए। मैंने अभी ये पूछा है

83
00:06:28,720 --> 00:06:33,120
कि अगर कुर्सी को इंग्लिश में चेयर जानने वाला

84
00:06:33,120 --> 00:06:37,680
मैं कह रहा हूं कि तत्वदर्शी है तो मैं

85
00:06:37,680 --> 00:06:41,920
यह बात जानने के कारण कि कुर्सी को इंग्लिश में चेयर कहते हैं। मैं

86
00:06:41,920 --> 00:06:46,160
भी तत्वदर्शी सिद्ध हो रहा हूं ना। जब मुझे

87
00:06:46,160 --> 00:06:50,240
पता है कि कुर्सी को इंग्लिश में क्या कहना चाहिए तभी तो

88
00:06:50,240 --> 00:06:56,240
मैं यह बता रहा हूं कि जो यह बात जानता है वह तत्वदर्शी है।

89
00:06:57,440 --> 00:07:01,840
ये भी जो चीज है कि कुर्सी बनी किस पे है? कुर्सी

90
00:07:01,840 --> 00:07:06,720
बनने की बात वहां आ रही है क्या? खाली कुर्सी पे ही क्यों?

91
00:07:06,720 --> 00:07:11,280
नहीं भाई श्लोक में क्या लिखा है? श्लोक में

92
00:07:11,280 --> 00:07:15,280
खाली कुर्सी की बात जानने वाले को तत्वदर्शी कहा गया कि

93
00:07:15,280 --> 00:07:19,040
नहीं कहा गया?

94
00:07:19,040 --> 00:07:23,280
हा ये चीज ठीक है। लिखा है यहां पे लेकिन ये चीज लिखा है।

95
00:07:23,280 --> 00:07:27,440
एक मिनट भाई साहब भाई साहब भाई साहब एक मिनट भाई साहब एक एक करके

96
00:07:27,440 --> 00:07:31,600
चलिए वहां पर केवल सत्य और

97
00:07:31,600 --> 00:07:35,600
असत के बारे में सही से जानकारी रखने वाले को

98
00:07:35,600 --> 00:07:40,640
तत्वदर्शी कहा गया है कि सत्य का कभी

99
00:07:40,640 --> 00:07:44,720
सत्य का कभी अभाव नहीं होता और असत का कभी भाव

100
00:07:44,720 --> 00:07:48,720
नहीं होता। इसका मतलब जो इस बात को बता

101
00:07:48,720 --> 00:07:52,880
रहा है कि जो लोग यह जानते हैं वह तत्वदर्शी है वह बताने वाला भी

102
00:07:52,880 --> 00:07:57,520
तत्वदर्शी सिद्ध हो रहा है। तो इस श्लोक के अनुसार

103
00:07:57,520 --> 00:08:02,480
इस श्लोक के अनुसार काल भी तत्वदर्शी सिद्ध हुआ।

104
00:08:02,480 --> 00:08:07,200
ठीक है? अब दूसरी एक बात आती है कि आपके अनुसार

105
00:08:07,200 --> 00:08:11,520
जो रामपाल है, वो तत्वदर्शी है।

106
00:08:11,520 --> 00:08:12,880
ठीक है? इसके अनुसार

107
00:08:12,880 --> 00:08:17,920
इसके अनुसार काल कैसे तत्वदर्शी संत हुए सिद्ध हुए

108
00:08:17,920 --> 00:08:22,560
इस श्लोक में तो ये खुद कह रहे हैं कि तत्वज्ञानी

109
00:08:22,560 --> 00:08:27,600
पुरुषों द्वारा देखा गया है। वो अपने आप को थोड़ी बता रहे हैं यहां पे।

110
00:08:27,600 --> 00:08:33,040
अरे भाई क्या देखा गया है?

111
00:08:33,040 --> 00:08:37,200
क्या देखा गया है? इसमें जब श्लोक में खुद

112
00:08:37,200 --> 00:08:41,600
कह रहे हैं कि

113
00:08:41,600 --> 00:08:47,520
तत्व ज्ञानियों तत्व ज्ञानियों के द्वारा क्या देखा गया भाई साहब

114
00:08:47,520 --> 00:08:51,840
तो जब ये कह रहे हैं कि सत्य का भाव नहीं और असत का अभाव

115
00:08:51,840 --> 00:08:56,080
नहीं और ये तत्व्ञानियों के द्वारा देखा ये तत्वज्ञानियों

116
00:08:56,080 --> 00:09:00,480
के द्वारा देखा गया तो काल जो काल है जो

117
00:09:00,480 --> 00:09:04,560
जो इस श्लोक को बोल रहा है उसको को पता चल गया

118
00:09:04,560 --> 00:09:09,040
ना कि सत्य का भाव अभाव नहीं होता है

119
00:09:09,040 --> 00:09:15,040
और जिसको पता चल गया उसको तत्वदर्शी माना उन्होंने

120
00:09:15,920 --> 00:09:20,000
तो फिर वो दूसरे के पास जाने के लिए क्यों कहे ये तो

121
00:09:20,000 --> 00:09:24,080
आप बताओगे ना मुझे आपने कहा है ना काल तत्वदर्शी नहीं है मैंने

122
00:09:24,080 --> 00:09:28,240
तो नहीं कहा और आप दूसरे एक मिनट

123
00:09:28,240 --> 00:09:32,320
एक मिनट भाई साहब ये क्लेम हम नहीं करते हैं कि दूसरे के

124
00:09:32,320 --> 00:09:36,640
पास जाने को कहा ये आप करते हो। हम गीता का परंपरा से प्राप्त

125
00:09:36,640 --> 00:09:40,640
अर्थ लेते हैं। जिसमें जाने की बात को नहीं कहा गया है। हमने वहां कहा है कि

126
00:09:40,640 --> 00:09:44,880
आ जाने की बात को वहां कहा गया है। मगर आप कहते हो कि नहीं जाने को कहा गया है।

127
00:09:44,880 --> 00:09:49,280
तो अगर जाने को कहा गया है तो यहां तो तत्वदशी सिद्ध हो रहे हैं।

128
00:09:49,280 --> 00:09:54,560
काल आपके अनुसार अब दूसरी बात अब

129
00:09:54,560 --> 00:09:58,640
दूसरी बात भाई साहब। दूसरी बात ये है कि हमने एक बात

130
00:09:58,640 --> 00:10:03,680
जान ली कि सच का कभी अभाव नहीं होता।

131
00:10:03,680 --> 00:10:08,800
सत का कभी कभी अभाव अभाव नहीं होता।

132
00:10:08,800 --> 00:10:12,400
जीवन मरण से

133
00:10:12,400 --> 00:10:15,120
छूट जाना

134
00:10:15,120 --> 00:10:20,720
क्या उसे सत स्वरूप हो जाना कह सकते हैं?

135
00:10:20,720 --> 00:10:24,960
जीवन मरण से छूट जाना। क्या उसे सत स्वरूप हो जाना

136
00:10:24,960 --> 00:10:29,040
कह सकते हैं? सत स्वरूप मतलब सत जो कभी बदलता

137
00:10:29,040 --> 00:10:33,200
नहीं है। इस शरीर का अगर मृत्यु हो

138
00:10:33,200 --> 00:10:37,360
गई, शरीर खत्म हो गया इसका मतलब यह नहीं हुआ कि

139
00:10:37,360 --> 00:10:42,080
हमारी हमारी मुक्ति हो गई। मैं कहां कह रहा हूं?

140
00:10:42,080 --> 00:10:46,320
मैं कह रहा हूं क्या जो आत्मा है वह छूट

141
00:10:46,320 --> 00:10:50,320
के कभी सत स्वरूप हो सकती है सतलोक में पहुंचने के बाद

142
00:10:50,320 --> 00:10:54,560
वो सत स्वरूप हो जाएगी कि नहीं जिसको कभी जो

143
00:10:54,560 --> 00:10:58,080
सत स्वरूप हो जाएगी

144
00:10:58,080 --> 00:11:04,080
अच्छा पक्का पक्का हां

145
00:11:04,320 --> 00:11:08,560
तो इसका मतलब आत्मा एक ऐसा तत्व है

146
00:11:08,560 --> 00:11:14,560
जिसका कभी अभाव नहीं हो सकता

147
00:11:15,680 --> 00:11:20,960
क्योंकि वो सत है ना सत हो जाएगी ना सतलोक जा के

148
00:11:20,960 --> 00:11:25,600
तो अभाव तो हो नहीं सकता उसका

149
00:11:25,600 --> 00:11:29,680
तो आपके बाबा जी तो यहां पर लिख रहे हैं कि उसका

150
00:11:29,680 --> 00:11:35,600
अभाव था आत्मा का

151
00:11:35,600 --> 00:11:38,720
पहले

152
00:11:38,720 --> 00:11:42,880
यानी कि तत का भी किसी समय अभाव हो सकता

153
00:11:42,880 --> 00:11:46,800
है।

154
00:11:46,800 --> 00:11:50,960
ये पहले की बात है और पहले या बाद में तत

155
00:11:50,960 --> 00:11:55,200
का अभाव माना जा सकता है कि नहीं?

156
00:11:55,200 --> 00:12:00,560
यानी पहले वो असत थी। चलो ऐसे मान लो।

157
00:12:00,560 --> 00:12:05,040
पहले असत थी। असत तो बाद में हुई। सत्य पहले

158
00:12:05,040 --> 00:12:09,040
थी। पहले सत्य थी तो सत्य पहले थी तो अभाव

159
00:12:09,040 --> 00:12:13,040
कैसे हो गया? क्योंकि यहां है इसके

160
00:12:13,040 --> 00:12:15,600
लिए

161
00:12:15,600 --> 00:12:20,400
अब आप पहले मान रहे आने से पहले मेरे भाई पहले अपनी पढ़ो

162
00:12:20,400 --> 00:12:24,800
पहले हमारे ग्रंथों को पढ़ने की बजाय अपने बाबा जी के ग्रंथ को पढ़ो

163
00:12:24,800 --> 00:12:30,240
ये देखिए आप दूसरे अध्याय के

164
00:12:30,240 --> 00:12:34,800
16व ही श्लोक का वर्णन करते हुए आपके जो रामपाल जी हैं

165
00:12:34,800 --> 00:12:40,240
कहते हैं कि उत्पत्ति से पहले आत्मा का अभाव था।

166
00:12:40,240 --> 00:12:43,120
दिख रहा है

167
00:12:43,120 --> 00:12:47,280
ठीक है तो यदि आत्मा का अभाव था यानी कि

168
00:12:47,280 --> 00:12:52,400
वो असत हो गई ठीक

169
00:12:52,400 --> 00:12:56,480
परमात्मा के साथ थे ना इसके लिए अरे इधर

170
00:12:56,480 --> 00:13:00,560
उधर देख के झूठ मत बोलो भाई नहीं वो कह रहे हैं

171
00:13:00,560 --> 00:13:06,560
सुनो सुनो आपके बाबा जी क्या लिख रहे हैं सुनिए

172
00:13:06,880 --> 00:13:11,040
परमात्मा से संपूर्ण संपूर्ण संसार व्याप्त है। यानी कि विस्तार को

173
00:13:11,040 --> 00:13:15,120
प्राप्त हुआ है। उस अविनाशी परमात्मा का अभाव किसी भी समय में

174
00:13:15,120 --> 00:13:19,680
नहीं होता है। ठीक है? सही बात है।

175
00:13:19,680 --> 00:13:23,680
परमात्मा के अतिरिक्त कोई भी नित्य नहीं है। यानी

176
00:13:23,680 --> 00:13:29,680
कि आत्मा का अभाव था। परमात्मा से अलग है ना आत्मा?

177
00:13:29,680 --> 00:13:33,120
कोई भी नित्य नहीं है क्योंकि

178
00:13:33,120 --> 00:13:37,280
आत्मा की उत्पत्ति परमात्मा ने अपने वचन से अपने

179
00:13:37,280 --> 00:13:41,600
शरीर से की है। उत्पत्ति से पहले आत्मा का अभाव

180
00:13:41,600 --> 00:13:45,840
था। उत्पत्ति से पहले आत्मा

181
00:13:45,840 --> 00:13:50,880
का अभाव था। तो अभाव किसका होता है?

182
00:13:50,880 --> 00:13:56,240
असत का। जो असत है हां

183
00:13:56,240 --> 00:14:01,040
तो अगर आत्मा अगर आत्मा असत है सुनिए

184
00:14:01,040 --> 00:14:05,040
अगर आत्मा असत है तो दो 16 के अनुसार उसका कभी

185
00:14:05,040 --> 00:14:09,200
भाव नहीं हो सकता वो कभी सत्य नहीं हो सकती

186
00:14:09,200 --> 00:14:13,280
यह ज्ञान यहां पे है 21 ब्रह्मांड के लिए ये

187
00:14:13,280 --> 00:14:17,280
कहां लिखा है काल के काल काल के प्रमाण

188
00:14:17,280 --> 00:14:21,280
कहा है कि ये ज्ञान यहां के लिए है क्योंकि काल खुद

189
00:14:21,280 --> 00:14:22,720
दे रहे हैं ना

190
00:14:22,720 --> 00:14:26,720
अब मैं प्रमाण पूछ रहा हूं इस समय आपसे काल खुद

191
00:14:26,720 --> 00:14:30,720
दे रहे हैं ये ज्ञान तो इसके लिए वो कह रहे हैं भाई साहब ये

192
00:14:30,720 --> 00:14:34,800
कहां लिखा है कि ये असत असत का जो बात है ये किस ब्रह्मांड

193
00:14:34,800 --> 00:14:38,880
के लिए है ये बात ये कहां लिखा है जब वो

194
00:14:38,880 --> 00:14:42,880
खुद कहते हैं ना कि हां भाई भाई साहब मैंने कहा अगला शब्द

195
00:14:42,880 --> 00:14:47,200
आप बताएं कि अध्याय नंबर ये श्लोक क्रमांक ये

196
00:14:47,200 --> 00:14:51,280
प्रमाण पूछ रहा हूं प्रमाण आपका पक्ष नहीं दो तीन तीन चीजें हैं

197
00:14:51,280 --> 00:14:55,760
कन्वर्सेशन में पक्ष, तर्क, प्रमाण

198
00:14:55,760 --> 00:14:59,840
तो पक्ष आपने रख दिया कि ये तो 21 ब्रह्मांडों की

199
00:14:59,840 --> 00:15:05,840
बात है। सत असत वाली बात 21 ब्रह्मांडों के लिए है।

200
00:15:06,400 --> 00:15:10,560
ठीक है? तर्क भी मैंने आपसे मांगा नहीं। फिलहाल अब मैं

201
00:15:10,560 --> 00:15:15,680
आपसे प्रमाण मांग रहा हूं। प्रमाण बताइए।

202
00:15:15,680 --> 00:15:19,680
यह जो सतत की व्याख्या की है जिसके कारण तत्वदर्शी कहा

203
00:15:19,680 --> 00:15:24,080
गया व्याख्या को जानने वाले को यह व्याख्या

204
00:15:24,080 --> 00:15:28,880
केवल 21 ब्रह्मांडों के लिए है। ये कहां लिखा है?

205
00:15:28,880 --> 00:15:33,040
आपको कोई मतलब नहीं है क्या सच्चाई से?

206
00:15:33,040 --> 00:15:37,040
क्यों नहीं मतलब है? साफ दिखाई दे रहा है कि यहां पे आप अटक रहे हो। कुछ भी बोलते जा

207
00:15:37,040 --> 00:15:40,640
रहे हो। नहीं नहीं ऐसी बात तो नहीं है। आपके बाप जी ने कहां लिखा

208
00:15:40,640 --> 00:15:45,040
है? कहां लिखी है ये वाली बात? एक यह सत असत वाली बात 21 ब्रह्मांडों

209
00:15:45,040 --> 00:15:51,040
के लिए है। कहां लिखी है?

210
00:15:52,240 --> 00:15:57,680
तो ना ही आपके

211
00:15:57,680 --> 00:15:58,560
बाबा जी ने ये

212
00:15:58,560 --> 00:16:02,800
लिखा है कि असत औसत की जो बात है वो केवल उसके

213
00:16:02,800 --> 00:16:06,960
लिए है 21 ब्रह्मांडों के लिए और ना ही हमारे सनातन शास्त्रों

214
00:16:06,960 --> 00:16:11,200
में कहीं लिखा है और तर्क के अनुसार भी देखेंगे

215
00:16:11,200 --> 00:16:15,520
तो यदि आप आत्मा का अभाव मान लोगे जिसका आपने जवाब नहीं दे पाए

216
00:16:15,520 --> 00:16:20,080
थे कि मटेरियल कहां से आया अभाव अगर मान लोगे

217
00:16:20,080 --> 00:16:24,240
तो जिस चीज का अभाव था उसका कभी शाश्वत सत स्वरूप

218
00:16:24,240 --> 00:16:29,200
नहीं हो सकती। फिर आप उसको मुक्ति नहीं दे सकते।

219
00:16:29,200 --> 00:16:33,360
जो सतलोक वाली अनंत काल की मुक्ति है वो फिर आप क्लेम नहीं कर सकते क्योंकि उसका

220
00:16:33,360 --> 00:16:37,360
अभाव था। वो भाव वाली नहीं हो सकती। फिर सत स्वरूप हो ही

221
00:16:37,360 --> 00:16:42,720
नहीं सकती क्योंकि वो सत स्वरूप थी नहीं। सत स्वरूप तो वही हो सकता है जो सत स्वरूप है।

222
00:16:42,720 --> 00:16:46,480
समझ रहे हैं कुछ?

223
00:16:46,480 --> 00:16:50,480
सब बातें थोड़ा सोचा करिए। कुछ भी बोल दो चाहे वो अपने बाबा जी से

224
00:16:50,480 --> 00:16:54,480
मैच कर रही है कि नहीं कर रही। आपने 10 बातें अभी तक बोल दी जो आपके बाबा जी

225
00:16:54,480 --> 00:16:58,480
से मैच नहीं कर रही। पहले आप आत्मा को नित्य कह रहे थे। आपके बाबा

226
00:16:58,480 --> 00:17:03,440
जी ने नित्य नहीं माना आत्मा को।

227
00:17:03,440 --> 00:17:08,320
ठीक है। थोड़ा थोड़ा अपने सेंस ऑफ ह्यूमर का इस्तेमाल करो मेरे भाई।

228
00:17:08,320 --> 00:17:12,400
अच्छा बाबा जी ने बाबा जी ने नित्य नहीं माना है कि

229
00:17:12,400 --> 00:17:16,400
परमात्मा के जीव अविनाशी जीव है। अविनाशी अलग हो

230
00:17:16,400 --> 00:17:20,800
गया और फिर वो क्लेम बनता है जो कह रहा है कि पहले

231
00:17:20,800 --> 00:17:25,200
जो है ये नित्य नहीं ये अभाव था और फिर कह रहा है बाद में अविनाशी है।

232
00:17:25,200 --> 00:17:29,920
अच्छा अब दूसरी बात अब यह बताओ

233
00:17:29,920 --> 00:17:33,840
कि

234
00:17:33,840 --> 00:17:37,840
आप कहते हो कि जब आत्मा

235
00:17:37,840 --> 00:17:41,840
ये हम अंतिम अंतिम थोड़ी सी बात कर रहे हैं। फिर उसके बाद किसी और से बात करेंगे। आपके

236
00:17:41,840 --> 00:17:45,840
साथ काफी बातें हो चुकी थी। अर्जुन जब भगवान श्री

237
00:17:45,840 --> 00:17:50,000
कृष्ण के साथ में खड़ा है शरीर से आपके अनुसार उनके उनके

238
00:17:50,000 --> 00:17:55,840
अंदर काल जाकर के बोल रहा था। ठीक है? तो

239
00:17:55,840 --> 00:17:59,840
यदि अर्जुन श्री कृष्ण की शरण में पहले से ही है

240
00:17:59,840 --> 00:18:04,400
तो फिर कृष्ण क्यों कहेंगे कि वह मेरे पास आए

241
00:18:04,400 --> 00:18:07,440
है ना

242
00:18:07,440 --> 00:18:12,960
अर्जुन श्री कृष्ण की शरण में पहले से ही है।

243
00:18:12,960 --> 00:18:17,120
तो फिर ये तर्क नहीं बनता कि भाई मेरे अपने पास आने को क्यों कहेंगे वो

244
00:18:17,120 --> 00:18:21,200
ये क्लेम किया जाता है ना रामपाल रामपाल वालों की तरफ से

245
00:18:21,200 --> 00:18:25,440
हम तो अब बात यहां पर ये आती है

246
00:18:25,440 --> 00:18:28,480
कि क्या

247
00:18:28,480 --> 00:18:32,480
ये जो जीव है उसको जो अविनाशी कहा गया वो किस कारण से कहा

248
00:18:32,480 --> 00:18:37,280
गया है क्यों है जीव अविनाशी परमात्मा

249
00:18:37,280 --> 00:18:43,280
तो अंश है इसके लिए अविनाशी कहा गया नहीं

250
00:18:44,000 --> 00:18:50,000
इसलिए कहा गया है कि वह सदैव परमात्मा के साथ रहती है।

251
00:18:50,880 --> 00:18:56,240
ये आपके बाबा जी ने अपनी किताब में कहा है।

252
00:18:56,240 --> 00:19:00,560
कि सदैव परमात्मा के साथ होने से आत्मा अविनाशी

253
00:19:00,560 --> 00:19:04,240
है।

254
00:19:04,240 --> 00:19:09,200
समझ रहे हैं मेरी बात? परमात्मा

255
00:19:09,200 --> 00:19:13,280
ऐसा लिखे हैं कि परमात्मा के साथ रहती थी। वहां से हम

256
00:19:13,280 --> 00:19:18,080
बिछड़ करके आए। इसके लिए नहीं अविनाशी अविनाशी तो है।

257
00:19:18,080 --> 00:19:22,400
नहीं परमात्मा के साथ है इसलिए अविनाशी है।

258
00:19:22,400 --> 00:19:26,400
साथ में है। जैसे ही वो साथ कट होगा हटेगा वो

259
00:19:26,400 --> 00:19:30,560
अविनाशी नहीं रह जाएगी। वो साथ में है परमात्मा

260
00:19:30,560 --> 00:19:35,360
के इसलिए अविनाशी है। तो

261
00:19:35,360 --> 00:19:41,360
परमात्मा जो है

262
00:19:41,440 --> 00:19:45,200
क्या कहते हैं?

263
00:19:45,200 --> 00:19:49,520
परमात्मा के साथ रहने के कारण आत्मा अविनाशी बताई गई है

264
00:19:49,520 --> 00:19:54,000
आपके रामपाल के द्वारा। ठीक है?

265
00:19:54,000 --> 00:19:59,760
तो अब बात ये आती है कि

266
00:19:59,760 --> 00:20:04,000
यदि आत्मा सदैव परमात्मा के साथ होने

267
00:20:04,000 --> 00:20:08,240
के कारण अविनाशी है तो यानी कि जिस

268
00:20:08,240 --> 00:20:12,640
समय जो अर्जुन है वो काल

269
00:20:12,640 --> 00:20:16,640
की शरण में था श्री कृष्ण की शरण में था

270
00:20:16,640 --> 00:20:20,640
उसी समय अर्जुन परमात्मा की

271
00:20:20,640 --> 00:20:24,160
शरण में भी था

272
00:20:24,160 --> 00:20:30,160
तो फिर किस परमात्मा की शरण में जाने को बोला

273
00:20:34,640 --> 00:20:38,720
यही चीज तो हम आपसे पूछना चाहते हैं। अरे हमारे

274
00:20:38,720 --> 00:20:43,040
अनुसार तो जाने को बोला ही नहीं जा रहा ना भाई। हमारे

275
00:20:43,040 --> 00:20:47,280
अनुसार तो ज्ञान दो तरीके

276
00:20:47,280 --> 00:20:51,360
की गति होती है। एक होती है

277
00:20:51,360 --> 00:20:56,480
ज्ञानार्थक और एक होती है गत्यार्थक।

278
00:20:56,480 --> 00:21:00,560
ज्ञानार्थक गति यह होती है कि मैं भले ही आपके पास

279
00:21:00,560 --> 00:21:04,560
भी खड़ा हूं पर फिर भी मैं मन से आपकी शरणागत नहीं

280
00:21:04,560 --> 00:21:07,280
हुआ हूं।

281
00:21:07,280 --> 00:21:12,400
ज्ञानार्थक गति नहीं है वहां पे। गत्यार्थक गति तो है।

282
00:21:12,400 --> 00:21:16,560
समझ रहे हैं? फिर आपने कहा कि तू

283
00:21:16,560 --> 00:21:20,560
मुझको अपना ले। तू मेरे पास आजा, मेरा हो जा, मेरी

284
00:21:20,560 --> 00:21:24,560
शरण में आजा। तो यह हो गई ज्ञानार्थक गति। वहां होते हुए

285
00:21:24,560 --> 00:21:28,960
भी आप उसकी शरण आपने उसकी सत्ता को स्वीकार नहीं किया था पहले

286
00:21:28,960 --> 00:21:34,320
मन से अब जो है मन से ज्ञानार्थक

287
00:21:34,320 --> 00:21:38,400
गति करने को बोला जा रहा है गत्यार्थक

288
00:21:38,400 --> 00:21:39,200
गति करके तो

289
00:21:39,200 --> 00:21:43,680
तुम आ गए हो मगर ज्ञानार्थक गति अभी नहीं कर पाए हो तो ज्ञानार्थक

290
00:21:43,680 --> 00:21:47,680
गति के लिए वहां बोला गया तो हमारे अनुसार जाने के लिए बोला ही नहीं गया

291
00:21:47,680 --> 00:21:51,760
है आपके अनुसार बोला गया है तो सवाल फिर आपसे है कि

292
00:21:51,760 --> 00:21:55,840
यदि वहां पर परमात्मा भी था तो फिर किसके पास जाने को बोला

293
00:21:55,840 --> 00:22:00,320
गया? क्योंकि परमात्मा के साथ

294
00:22:00,320 --> 00:22:05,520
रहने के कारण ही आत्मा अविनाशी है।

295
00:22:05,520 --> 00:22:09,520
ठीक है? अब इस सब के बाद

296
00:22:09,520 --> 00:22:14,080
एक बात ये आ गई कुल मिलाकर के तत्वदर्शी हम सिद्ध नहीं कर पाए आपका।

297
00:22:14,080 --> 00:22:18,080
ठीक है? आपने आत्मा के बारे में कुछ बताया नहीं। आपने मोक्ष के बारे में

298
00:22:18,080 --> 00:22:22,320
कुछ बताया नहीं। काल के जीवन मरण के बारे में कुछ बताया नहीं।

299
00:22:22,320 --> 00:22:26,560
अब कुल मिलाकर के बात आ जाती है कि

300
00:22:26,560 --> 00:22:30,960
भाई जब आपके द्वारा मिलने वाला मोक्ष

301
00:22:30,960 --> 00:22:34,960
मोक्ष ही नहीं है।
