1
00:00:02,960 --> 00:00:07,040
देखिए कुछ लोग कहते हैं कि शंकर मत वाले ज्ञान मार्गी

2
00:00:07,040 --> 00:00:11,200
होते हैं। शंकराचार्य शंकर

3
00:00:11,200 --> 00:00:15,200
मत वाले हैं और उनके हिसाब से ज्ञान मार्गी

4
00:00:15,200 --> 00:00:19,600
है। भक्ति मार्ग के विरोधी हैं। और शंकराचार्य

5
00:00:19,600 --> 00:00:23,680
दास बोध पढ़ने को दे रहे हैं। और दास बोध कह रहा है कि इसमें भक्ति मार्ग के

6
00:00:23,680 --> 00:00:28,000
द्वारा मुक्ति बताई गई है। क्या इस वाले कभी कहते हैं

7
00:00:28,000 --> 00:00:32,080
दास बोध पढ़ो जाकर के? नहीं कहते। क्या इस वाले

8
00:00:32,080 --> 00:00:36,320
कभी कहते हैं कि ज्ञानेश्वरी गीता पढ़ो। जो डायरेक्ट उनके संप्रदाय से संबंध

9
00:00:36,320 --> 00:00:40,560
ग्रंथ नहीं है उनको पढ़ने के लिए कभी इस वाले कहते हैं मैं

10
00:00:40,560 --> 00:00:44,880
पहली बार जब शंकराचार्य भगवान के दर्शन करने गया था। उनके दर्शन मुझे सुलभ

11
00:00:44,880 --> 00:00:48,960
हुए थे तो उन्होंने जब मैंने अपनी शंका उनको व्यक्त की थी तो

12
00:00:48,960 --> 00:00:53,600
उन्होंने मुझको शंकर परंपरा का ग्रंथ पढ़ने के लिए नहीं कहा था।

13
00:00:53,600 --> 00:00:58,880
उन्होंने मुझे कहा था कि रामानुज संप्रदाय के

14
00:00:58,880 --> 00:01:04,240
महान शास्त्रार्थ के मर्मज्ञ महान शास्त्रार्थी

15
00:01:04,240 --> 00:01:08,400
पंडित माधवाचार्य शास्त्री जी का ग्रंथ क्यों और पुराण

16
00:01:08,400 --> 00:01:14,400
दिग्दर्शन आप ले लीजिए और उसका अध्ययन करिए। बताइए

17
00:01:14,800 --> 00:01:18,880
ये इस वाले करते हैं क्या जाकर के उनका ग्रंथ ले लो इस कार्य

18
00:01:18,880 --> 00:01:23,360
के लिए करते हैं क्या? यहां होता है। रामानुजियों

19
00:01:23,360 --> 00:01:27,600
के यहां होता है। शंकराचार्यों के यहां होता है। जहां

20
00:01:27,600 --> 00:01:31,680
एक दूसरे के ग्रंथ पढ़ने को दिए जाते हैं। इसलिए

21
00:01:31,680 --> 00:01:35,920
कहते हैं कि इस वाले तोड़ रहे हैं हिंदुओं को आपस में बांट

22
00:01:35,920 --> 00:01:40,240
रहे हैं। इसलिए ये कहा जाता है। वैष्णवता

23
00:01:40,240 --> 00:01:44,480
के नाम पर एक दूसरे से दूर कर दो। भाई को भाई से अलग

24
00:01:44,480 --> 00:01:48,880
कर दो।

25
00:01:48,880 --> 00:01:52,880
आज भी मेरे पास वह ग्रंथ जो गुरुदेव के द्वारा बताया गया

26
00:01:52,880 --> 00:01:56,960
पहला ग्रंथ वो यह है और कोई ग्रंथ नहीं बताया था गुरुदेव ने यह

27
00:01:56,960 --> 00:02:01,680
बताया था इसको कहते हैं सिद्धांत

28
00:02:01,680 --> 00:02:06,080
उनको सत्य की रक्षा थी सत्य की चिंता थी कि सत्य बोलना

29
00:02:06,080 --> 00:02:10,480
है भले ही वह रामानुजाचार्य जी का ग्रंथ क्यों ना पढ़ने को कहना पड़े

30
00:02:10,480 --> 00:02:14,560
रामानुज परंपरा का ग्रंथ क्यों ना पढ़ने को कहना पड़े पर उनको

31
00:02:14,560 --> 00:02:18,720
सत्य बोलना था सत्य निष्ठ थे। ठीक है? वहां

32
00:02:18,720 --> 00:02:22,720
ये भेदभाव नहीं था कि नहीं रामानुज परंपरा का ग्रंथ हम क्यों बताएं भाई? अपने ही

33
00:02:22,720 --> 00:02:26,720
आचार्यों का बताएं। जो सबसे उनको सुलभता से दिखाई दिया।

34
00:02:26,720 --> 00:02:30,880
मेरे लिए अनुकूल हो सकता है। वो ये ग्रंथ था।

35
00:02:30,880 --> 00:02:36,880
वो पुराण दिग्दर्शन था जो पीछे रखा हुआ है। ये

36
00:02:37,120 --> 00:02:41,200
ग्रंथ मुझे मेरे गुरुदेव ने सबसे पहले पढ़ने को दिए। इस वाले

37
00:02:41,200 --> 00:02:45,840
इस वालों की तरह नहीं किया उन्होंने कि नहीं नहीं दूसरे के ग्रंथ मत पढ़ो

38
00:02:45,840 --> 00:02:50,080
दूसरे संप्रदाय के ग्रंथ मत पढ़ो इसको कहते हैं सिद्धांत

39
00:02:50,080 --> 00:02:54,960
और इसको कहते हैं निडरता अभय

40
00:02:54,960 --> 00:02:59,040
इसको ये भी कहते हैं कि पढ़ लेने दो

41
00:02:59,040 --> 00:03:03,040
पुराणिक दर्शन पढ़ लेने दो जिसको अपने सिद्धांत

42
00:03:03,040 --> 00:03:07,040
पर विश्वास होता है वो ये नहीं सोचता कि ये व्यक्ति कहीं भटक ना जाए कहीं यहां

43
00:03:07,040 --> 00:03:11,120
ना चला जाए कहीं वहां ना चला जाए ऐसे ही रामानुज परंपरा वाले वाले भी बताते हैं कि अमुक कार्य

44
00:03:11,120 --> 00:03:15,280
के लिए आप अमुक ग्रंथ पढ़ लीजिए। शंकर परंपरा बताते हैं। कई जगह

45
00:03:15,280 --> 00:03:19,680
संदर्भ देते हैं शंकराचार्य का और सभी परंपरा प्राप्त आचार्य अपने

46
00:03:19,680 --> 00:03:23,920
वक्तव्यों में अपनी वाणी में कहीं ना कहीं दूसरे संप्रदाय के आचार्यों का

47
00:03:23,920 --> 00:03:28,240
संदर्भ देते हुए बात करते हैं। क्यों? रामानुज परंपरा वाले क्या रामानंद परंपरा

48
00:03:28,240 --> 00:03:33,120
का संदर्भ देते हुए रामचरितमानस का संदर्भ देते हुए बात नहीं करते। कई बार

49
00:03:33,120 --> 00:03:37,200
करते हैं शंकर संप्रदाय वाले क्या रामचरितमानस जो रामानंदी परंपरा का

50
00:03:37,200 --> 00:03:41,520
ग्रंथ है उसका संदर्भ देते हुए बात नहीं करते हैं इस वाले नहीं

51
00:03:41,520 --> 00:03:45,760
करेंगे कभी भी वो हमेशा वही चिल्लाएंगे जीव गोस्वामी

52
00:03:45,760 --> 00:03:49,920
श्री प्रभुपाद जी और कुछ और नाम

53
00:03:49,920 --> 00:03:52,240
होंगे गौरंग दास जी और

54
00:03:52,240 --> 00:03:56,320
चैतन्य महाप्रभु इनहीं सबके इर्दगिर्द बाकी गाड़ी

55
00:03:56,320 --> 00:04:02,320
घूमती रहेगी खैर कम टू द पॉइंट

56
00:04:03,120 --> 00:04:07,840
तो

57
00:04:07,840 --> 00:04:12,160
भक्ति मार्ग की निंदा करने वाले उसकी स्तुति करने लगते हैं। संसार

58
00:04:12,160 --> 00:04:16,160
के बंधन में पड़े हुए लोग मोक्ष की कामना करने लगते हैं। मूर्ख

59
00:04:16,160 --> 00:04:20,240
भी दक्ष हो जाते हैं और भक्ति मार्ग पर चलकर

60
00:04:20,240 --> 00:04:24,480
अभक्त भी मोक्ष प्राप्त करते हैं। इससे अनेक दोषों का नाश

61
00:04:24,480 --> 00:04:28,880
होता है और पतित लोग पावन हो जाते हैं। श्रवण मात्र से प्राणी

62
00:04:28,880 --> 00:04:32,880
प्राणी को उत्तम गति प्राप्त होती है। इसे सुनने से शारीरिक बुद्धि

63
00:04:32,880 --> 00:04:36,960
के अनेक भ्रम और संदेह तथा संसार के अनेक प्रकार

64
00:04:36,960 --> 00:04:41,040
के उद्वेग नष्ट हो जाते हैं। अधोगति का अंत हो जाता है और

65
00:04:41,040 --> 00:04:45,040
उनको शांति तथा समाधान मिलता है। जिसका जैसा भाव होता

66
00:04:45,040 --> 00:04:49,120
है उसे वैसा ही लाभ भी प्राप्त होता है। जो मन के मन

67
00:04:49,120 --> 00:04:53,440
में मत्सर रखकर प्रश्न करता है उसे मत्सर की ही प्राप्ति होती है।

68
00:04:53,440 --> 00:04:59,280
देखिए अगर वास्तविकता में देखा जाए

69
00:04:59,280 --> 00:05:03,600
तो लोग ज्ञान मार्ग के नाम पर भक्ति का विरोध करना कि

70
00:05:03,600 --> 00:05:07,440
भाई सिर्फ मतलब हमारे जो हमारी जो मुक्ति

71
00:05:07,440 --> 00:05:11,600
वो ज्ञान से है इसलिए हम भक्ति नहीं करेंगे। तो यह

72
00:05:11,600 --> 00:05:15,600
तो ठीक नहीं है। परंतु भक्ति का नाम लेकर

73
00:05:15,600 --> 00:05:19,600
के ज्ञान की प्राप्ति होने के विषय में काउंटर करना

74
00:05:19,600 --> 00:05:24,160
या मना करना यह अपने आप में एक बहुत बड़ा कुचेष्टा

75
00:05:24,160 --> 00:05:29,120
कहेंगे इसे। क्यों? क्यों कहेंगे कुचेष्टा? क्योंकि

76
00:05:29,120 --> 00:05:33,280
परलोक की बात कहे या फिर इस्लोक की बात कहे। व्यक्ति

77
00:05:33,280 --> 00:05:38,240
ढूंढ तो ज्ञान ही रहा है। ज्ञान का मतलब समझ रहे हैं आप?

78
00:05:38,240 --> 00:05:42,640
यदि आपको रसगुल्ला खाना है, गुलाब जामुन खाना है

79
00:05:42,640 --> 00:05:47,120
तो क्या आपको वह जो मटेरियल है उससे मतलब है या उससे

80
00:05:47,120 --> 00:05:51,680
मिलने वाली जो सूचना है इंफॉर्मेशन ये मीठा है गुदगुदा

81
00:05:51,680 --> 00:05:55,760
है उससे मतलब है आपका मूल विषय क्या है कि

82
00:05:55,760 --> 00:05:59,760
आपके दिमाग को आपके मस्तिष्क को वो खोवा है

83
00:05:59,760 --> 00:06:04,400
जो उसके अंदर जो उसके अंदर मिठास है वह सूचना मिलनी चाहिए।

84
00:06:04,400 --> 00:06:08,640
अच्छा यदि आपको जो रसगुल्ले की सूचना

85
00:06:08,640 --> 00:06:12,960
है वह किसी कुछ ऐसा इंतजाम कर दिया जाए कि आपको जो है किसी

86
00:06:12,960 --> 00:06:16,960
और टेक्नोलॉजी के द्वारा वह सूचना प्राप्त होने लग जाए रसगुल्ले की

87
00:06:16,960 --> 00:06:20,960
तो क्या आपको रसगुल्ले की नीड रह जाएगी? नहीं रह जाएगी। तो हम

88
00:06:20,960 --> 00:06:22,480
आफ्टर ऑल एट दी एंड

89
00:06:22,480 --> 00:06:26,800
हर चीज में ढूंढ क्या रहे हैं? इंफॉर्मेशन तो आप ज्ञान मार्ग

90
00:06:26,800 --> 00:06:30,880
को सर्वदा कि भाई ये ज्ञान मार्ग ही है या इस इस तरह की बातें

91
00:06:30,880 --> 00:06:34,960
करके ज्ञान मार्ग को सर्वदा खंडित नहीं कर सकते। क्योंकि एट द एंड भगवान

92
00:06:34,960 --> 00:06:39,040
को सामने देख के भी आपको सोचना चाहिए कि भगवान मेरे

93
00:06:39,040 --> 00:06:43,120
सामने हैं। इस बात की सूचना अंतिम लक्ष्य आपका

94
00:06:43,120 --> 00:06:47,200
क्या है? सूचना ज्ञान इंफॉर्मेशन

95
00:06:47,200 --> 00:06:51,360
आजकल देखो बहुत ये पूरा अद्वैत दर्शन आपको

96
00:06:51,360 --> 00:06:56,320
दिखेगा। इसमें फोन पे से लोग पैसे दे रहे हैं। लोग ले रहे हैं।

97
00:06:56,320 --> 00:07:00,480
बने बेवकूफ चले जा रहे हैं। ये क्या हुआ भाई कि भैया मुझे

98
00:07:00,480 --> 00:07:04,560
₹50 चाहिए। व्यक्ति ने कुछ किया। एक आवाज आई टिंग टिटिंग

99
00:07:04,560 --> 00:07:08,880
टिटिंग और पैसे उसमें चले गए। सामने वाला खुश हो गया।

100
00:07:08,880 --> 00:07:13,200
अब हुआ क्या? केवल इंफॉर्मेशन मिली कि हां तुम्हारे पास पैसे आ गए।

101
00:07:13,200 --> 00:07:17,520
केवल इंफॉर्मेशन मिली कि तुम्हारे पैसे कट गए। इतना ही तो हुआ। इंफॉर्मेशन

102
00:07:17,520 --> 00:07:21,520
का आदान प्रदान हुआ। उसके अलावा उस व्यक्ति को भौतिक रूप से कुछ मिला

103
00:07:21,520 --> 00:07:25,840
क्या? वहां पर इंफॉर्मेशन मिल गई। व्यक्ति संतुष्ट हो गया। इसी

104
00:07:25,840 --> 00:07:30,160
प्रकार से यदि इंफॉर्मेशन अमुक अमुक चीजों में हमें ठंड लग रही है। हमें गर्मी

105
00:07:30,160 --> 00:07:34,320
लग रही है। हमें सुख हो रहा है। सुख मिल रहा है। यदि हमें इंफॉर्मेशन मिलने लग

106
00:07:34,320 --> 00:07:38,080
जाएगी तो क्या हमें भौतिक भौतिकता की आवश्यकता रह जाएगी?

107
00:07:38,080 --> 00:07:42,640
नहीं रह जाएगी। तो हम मूल रूप से किसे ढूंढ रहे हैं? इंफॉर्मेशन को।

108
00:07:42,640 --> 00:07:47,120
तो सतही स्तर पर भी जब हमारे संशय

109
00:07:47,120 --> 00:07:51,120
निराकरण होने लगता है तो वह हृदय में संतोष पहुंचता है कि फिर

110
00:07:51,120 --> 00:07:55,360
वो जो भौतिक ताप हमें दिख रहे होते हैं वो कम होने लगते हैं। सामान्य व्यक्ति

111
00:07:55,360 --> 00:07:59,600
के स्तर से भी मैं आपको दिखा रहा हूं। बता रहा हूं। जब

112
00:07:59,600 --> 00:08:03,680
हमारे अंतःकरण से हमारी अंतरात्मा से निकलने वाले

113
00:08:03,680 --> 00:08:07,680
जो प्रश्न है और वो प्रश्न कौन से हैं वो मैं कई बार अपने वक्तव्यों में आपको

114
00:08:07,680 --> 00:08:12,640
बता चुका हूं। असतो मा सदगमया तमसो मा ज्योतिर्गमया मृत्यम

115
00:08:12,640 --> 00:08:16,800
गमया जब हम इस पर बात करने लगते हैं इसका जब

116
00:08:16,800 --> 00:08:22,000
हमें निराकरण प्राप्त होने लगता है तो हम बहुत संतोषमय हो जाते हैं। बहुत संतोषमय

117
00:08:22,000 --> 00:08:26,320
इतने संतोषमय हो जाते हैं कि धीरे-धीरे उस संतोष के कारण

118
00:08:26,320 --> 00:08:30,400
हमारे पास वो क्षमता भी आ जाती है कि कोई समसी लेकर

119
00:08:30,400 --> 00:08:34,640
के हमारी आंख निकाल रहा है ना आंख तब भी

120
00:08:34,640 --> 00:08:39,040
हम लोग उस समय विचलित नहीं होते। क्योंकि

121
00:08:39,040 --> 00:08:43,440
हमारे हृदय में वह संतोष होता है।

122
00:08:43,440 --> 00:08:47,520
एक बस इसमें कुल मिलाकर बात यह है कि

123
00:08:47,520 --> 00:08:51,600
हम अपने अंतरात्मा की अपने जो अंतःकरण से निकलने

124
00:08:51,600 --> 00:08:53,280
वाली वो आवाज है अथातो धर्म

125
00:08:53,280 --> 00:08:58,480
जिज्ञासा अथातो ब्रह्म जिज्ञासा आत्म जिज्ञासा

126
00:08:58,480 --> 00:09:02,480
उस आवाज को हम कब सुन रहे हैं? जैसे भगवत गीता में एक बात

127
00:09:02,480 --> 00:09:06,720
आती है और कई शास्त्रों में एक बात आती है कि

128
00:09:06,720 --> 00:09:10,800
अश्रद्धावान को इसका श्रवण ना कराया जाए। जिसकी

129
00:09:10,800 --> 00:09:14,800
श्रद्धा नहीं है उसको इसका श्रवण ना कराया जाए। यह शास्त्रों

130
00:09:14,800 --> 00:09:18,800
में कई बार आया है। अच्छा तर्क तर्क की बात क्या होती है?

131
00:09:18,800 --> 00:09:22,800
अब जैसे हम लोग क्वेश्चन करते हैं स्कॉन वालों से तो हम

132
00:09:22,800 --> 00:09:27,040
कहते हैं कि भाई ये सवाल क्या है? ये सवाल क्या है? कि नहीं नहीं तुम अवक्त हो। तुमसे बात करना बेकार

133
00:09:27,040 --> 00:09:31,280
है। अश्रद्धावान इसलिए तुमसे बात करना बेकार है। आजकल निग्गू फॉलोवर्स

134
00:09:31,280 --> 00:09:36,160
निग्गू एंड कंपनी भी वही कर रही है। तो

135
00:09:36,160 --> 00:09:40,320
यदि अश्रद्धावान को उत्तर नहीं

136
00:09:40,320 --> 00:09:44,720
देना है, श्रद्धावान से बात करना व्यर्थ है तो

137
00:09:44,720 --> 00:09:48,800
किससे बात की जाएगी? क्योंकि जो भी व्यक्ति जब तक

138
00:09:48,800 --> 00:09:52,800
शास्त्र को नहीं जानता है, जब तक भगवान को नहीं जानता है, जब तक कुछ

139
00:09:52,800 --> 00:09:56,800
नहीं जानता है, उससे पहले तक वो अश्रद्धावान ही तो है।

140
00:09:56,800 --> 00:10:01,760
क्या गीता को जानने से पहले किसी व्यक्ति का गीता के प्रति

141
00:10:01,760 --> 00:10:05,840
भावनाएं होती है? क्या श्रद्धा की? भगवान को जानने से पहले

142
00:10:05,840 --> 00:10:08,640
भगवान के प्रति भावनाएं कैसे होंगी?

143
00:10:08,640 --> 00:10:13,200
नहीं होती। तो इसका मतलब क्या है? फिर शास्त्रों ने क्या गलत कहा है?

144
00:10:13,200 --> 00:10:17,440
क्या शास्त्रों ने यह लाइन गलत लिखी है? कि अश्रद्धावान को मत पढ़ाना

145
00:10:17,440 --> 00:10:21,600
यह शास्त्र नहीं गलत नहीं लिखी है। इस लाइन का

146
00:10:21,600 --> 00:10:26,240
सही मतलब क्या है? सही इस पंक्ति का सही अर्थ क्या हो सकता है?

147
00:10:26,240 --> 00:10:30,480
तो वो अर्थ यह यह है कि

148
00:10:30,480 --> 00:10:34,560
अश्रद्धावान सभी हैं। परंतु ये आत्मा से निकलने

149
00:10:34,560 --> 00:10:38,640
वाले जो प्रश्न है इन प्रश्नों पर कौन ध्यान दे

150
00:10:38,640 --> 00:10:43,520
रहा है? असतो मा सदगमया तमसो गमया

151
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इन पर ध्यान कौन दे रहा है जो इन पर ध्यान दे रहा है उसको

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ये ग्रंथ आप पढ़ा सकते हैं वो श्रद्धावान है यानी कि जो अपनी

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आत्मा की आवाज सुन रहा है वो श्रद्धावान है

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भले ही उसने गीता अभी नहीं जानी है भले ही भगवान के बारे में नहीं जानता है पर

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वो श्रद्धावान है क्यों क्योंकि वो आत्मा की आवाज सुन रहा है

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वो वो खोज रहा है कि पहले मुझे मेरा गंतव्य बताओ

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क्या गंतव्य है अथो ब्रह्म जिज्ञासा उसके बाद उस गंतव्य

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तक किस प्रकार की गति के द्वारा पहुंचा जा सकता है वह बताओ अथो

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धर्म जिज्ञासा तो जो इस प्रकार से अपनी आत्मा

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की आवाज सुन रहा है वो श्रद्धावान है वो कोई

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भी हो सकता है वो मच्छ भी हो सकता है अब

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कोई व्यक्ति है जिसको इससे मतलब ही नहीं है कि भैया ईश्वर सर्वशक्तिमान है

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कि नहीं अगर ईश्वर ने सृष्टि बनाई तो उस समय वो कहां था कहां खड़ा

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था या इन विषयों पर उसका चिंतन नहीं उसके मन से आवाज ही नहीं आ रही है। यह

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सब बातें वह सोच ही नहीं रहा है कि मैं 70 साल का हो जाऊंगा तो भोग कैसे करूंगा?

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रसगुल्ला कैसे खाऊंगा? या जो बॉडी बिल्डिंग मैं आज कर रहा हूं तो अपनी

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बॉडी कैसे मेंटेन करूंगा? या अगर मैं काम वासना से युक्त हूं तो उस समय

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अपनी लालसाओं को पूरा कैसे करूंगा? मेरे दांत टूट जाएंगे। मैं

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वैसा नहीं दिखूंगा। मेरे झुर्रियां आ जाएंगी। वो इन सब बातों पर जब नहीं

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ध्यान दे रहा है कि कुछ इसके पार भी है या यही अंत है।

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जब मैं अकेला पड़ जाऊंगा कोई नहीं होगा मेरे

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पास। उस समय मैं क्या करूंगा इन सब विषयों पर जो चिंतन नहीं कर रहा है और वह

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क्या क्या कर रहा है? वो यह देख रहा है कि भाई एसी है कि नहीं? टीवी

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है कि नहीं? मेरे पास कार है कि नहीं? स्कूटर है कि नहीं?

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वो इन सब चीजों पर ध्यान दे रहा है। तो और फिर आप उससे कहने जाओ

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कि तुम्हें पता है ईश्वर सब शक्तिमान है कि नहीं? तुम तुम क्या

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कहते हैं? तुमको इससे मतलब है? ईश्वर सर्वशक्तिमान से परम स्वतंत्र

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मोक्ष से। तो वो क्या कहेगा भैया मैं एसी लेने जा रहा हूं

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नया एलजी

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का मुझे माफ कर तू ऐसे पकाऊ लोग आपको मिलेंगे कि

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नहीं पकाऊ मतलब जिनके लिए आप पकाऊ ये बातें करने वाले

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जिनके लिए पकाऊ है वो आपको बहुत मिलेंगे

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वो सब अश्रद्धावान है तो पहले उनको टटोलिए कि वो अपनी

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आत्मा की आवाज सुन रहे हैं कि नहीं और यदि वो सुन रहे हैं उनको

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उन सवालों से मतलब है तब उनको बताइए यदा यदा

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धर्मस गन भवती भारत अभसम

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तदन सजा तब उनको बताइए

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भगवान की शक्ति के बारे में ईश्वर के बारे में ग्रंथ के

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बारे में तो इसलिए यह वाला जो एक संशय

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बना रहता है कि अश्रद्धावान को नहीं पढ़ाना ग्रंथ देना

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है या बात बतानी है भगवान की या ये ये है यह वो है ऐसे

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नहीं होता है। आपको यह जानना होगा कि वह अपनी आत्मा की आवाज जान सुन रहा

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है कि नहीं। आपको उसके प्रश्नों से समझ में आ जाएगा। ठीक है?

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तो अश्रद्धावान कौन है वहां पर उस परिपेक्ष में जो अपनी आत्मा की

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आवाज नहीं सुन रहा है। जिसको उन प्रश्नों से कोई सरोकार नहीं

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है। दूसरा समास गणेश स्तुति। गणनायक

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कर्म सिद्धि फलदायक अज्ञान और भ्रांति का नाश करने वाले

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बोध रूप। देखिए बोध रूप यानी ज्ञान रूप। गणेश जी को नमस्कार।

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बस शंकराचार्य भगवान ने क्या किया कि हम जो यह

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कह रहे हैं ना फाइनली हमको इंफॉर्मेशन चाहिए इंफॉर्मेशन। तो शंकराचार्य

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भगवान ने कह दिया फाइनली जो इंफॉर्मेशन आपको मिल रही है यह है ईश्वर

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का अंतिम स्वरूप। उन्होंने इस इस इंफॉर्मेशन

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से अलग नहीं किया भगवान को। नहीं तो नहीं

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तो क्या होता कि ईश्वर से भी बड़ी कोई चीज हो जाती इस दुनिया में।

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समझ रहे हैं? जो लोग कहते हैं ना कि हम बहुत बड़े भक्त

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हैं। वह अपने ईश्वर को छोटा कर रहे हैं। उनसे बड़ा

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ज्ञान है जो व्यक्ति को चाहिए। और ईश्वर मात्र

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एक साधन बन के रह जाता है। तो शंकरा आदि शंकराचार्य जी ने क्या सिद्धांत

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स्थापित किया? ये जो ज्ञान तुम्हें मिल रहा है ये ईश्वर का फाइनल जो रूप

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जो तुमको चाहिए जो ज्ञान स्वरूप प्रबोध रूप गणेश जी

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को नमस्कार।
