1
00:00:02,160 --> 00:00:06,240
आप जो वीडियो अभी देखने जा रहे हैं, इन वीडियोस में आहान के द्वारा आयोजित की जाने

2
00:00:06,240 --> 00:00:10,240
वाली जो ऑनलाइन मीटिंग्स हैं, उसमें आने वाले लर्नर्स के

3
00:00:10,240 --> 00:00:14,480
भाव भी व्यक्त किए गए हैं। तो

4
00:00:14,480 --> 00:00:18,800
इन वीडियोस को स्ववेक के द्वारा ही देखें। कही

5
00:00:18,800 --> 00:00:22,880
जाने वाली किसी भी बात को आह्वान के द्वारा निर्गत बात समझकर ही ना

6
00:00:22,880 --> 00:00:26,880
देखें। यह देखें कि उस मीटिंग में वह बात किसके द्वारा कही जा रही

7
00:00:26,880 --> 00:00:31,040
है। क्या मेरे द्वारा कही जा रही है या फिर वहां मीटिंग से जुड़ने वाले किसी

8
00:00:31,040 --> 00:00:35,280
ऐसे व्यक्ति के द्वारा कही जा रही है जो अभी केवल लर्नर है जो अभी-अभी जुड़ा है

9
00:00:35,280 --> 00:00:39,520
या फिर जिसे अभी सार्वभौम सिद्धांतों में जिसकी बहुत ज्यादा

10
00:00:39,520 --> 00:00:43,760
गति नहीं है। तो इन वीडियोस को आप प्रेरणा के लिए अवश्य

11
00:00:43,760 --> 00:00:48,000
देखें। परंतु कही जाने वाली सभी बातों को प्रमाण्य बुद्धि से ना देखें।

12
00:00:48,000 --> 00:00:52,000
उसमें देखें कि कौन सी बात आहान के द्वारा कही जा रही है और

13
00:00:52,000 --> 00:00:56,000
कौन सी बात वहां पर जुड़ने वाले किसी सामान्य व्यक्ति के द्वारा कही जा रही है।

14
00:00:56,000 --> 00:01:00,080
इन वीडियोस में सामान्य चर्चाएं हैं जिनको बिना किसी फिल्ट्रेशन

15
00:01:00,080 --> 00:01:04,320
के आप तक पहुंचाया जा रहा है जिससे कि उन्हें देखकर के जन सामान्य

16
00:01:04,320 --> 00:01:08,480
प्रेरित हो और उन अभियानों से जुड़े जिनसे जुड़कर

17
00:01:08,480 --> 00:01:12,560
के सामान्य जन आत्म कल्याण व धर्म उत्थान में

18
00:01:12,560 --> 00:01:15,200
दोनों में अपनी भूमिका प्रस्तुत कर सकता है। जय

19
00:01:15,200 --> 00:01:19,600
श्री राम। जय श्री राम सभी को

20
00:01:19,600 --> 00:01:23,600
जी भैया जय श्री राम जो अपना टॉपिक चुना

21
00:01:23,600 --> 00:01:27,680
है राम रामा विग्रहान धर्मा तो उसमें

22
00:01:27,680 --> 00:01:32,320
यही है कि जैसे श्री राम भगवान जी थे तो

23
00:01:32,320 --> 00:01:36,320
जैसे वो रावण पे रावण को अगर वह हराना

24
00:01:36,320 --> 00:01:40,640
चाहते तो वह अपनी अयोध्या के वो भी अयोध्या के राजा थे। अपनी सेना लेके

25
00:01:40,640 --> 00:01:44,720
उनका वध कर सकते थे। लेकिन उन्होंने एक धर्म को स्थापित

26
00:01:44,720 --> 00:01:49,520
करने के लिए सभी वर्गों को एक साथ किया। माता सबरी के यहां भी गए

27
00:01:49,520 --> 00:01:53,520
और केवट जी के भी उन्होंने वो भी संवाद आता है।

28
00:01:53,520 --> 00:01:57,680
उसके बाद सभी उसको लेके वो साथ में चले और उसके

29
00:01:57,680 --> 00:02:01,440
बाद एक

30
00:02:01,440 --> 00:02:05,680
मतलब एक धर्म स्थापित किया। तो सर

31
00:02:05,680 --> 00:02:09,840
इतना ही अभी

32
00:02:09,840 --> 00:02:13,840
अच्छा बोल रहे हैं भैया आप कंटिन्यू रहिए तो वही

33
00:02:13,840 --> 00:02:18,080
सर हमें यही प्रेरणा मिलती है कि इसी

34
00:02:18,080 --> 00:02:22,320
यही मेरे को लगता है रामू विग्रहान धर्मा की एक धर्म के साथ सभी

35
00:02:22,320 --> 00:02:26,320
लोगों को साथ में लेकर उन्होंने इस चीज के लिए किया तो वही

36
00:02:26,320 --> 00:02:30,400
हमें प्रेरणा मिलती है और वही सर हमें अह जब भी कोई काम करते हैं

37
00:02:30,400 --> 00:02:34,560
कुछ भी है तो तो वही हमारे प्रेरणा स्रोत रहते हैं कि हमें भी ऐसा

38
00:02:34,560 --> 00:02:38,640
मतलब ऐसा नहीं है कि हम अगर सामर्थ्यवान भी हैं तो

39
00:02:38,640 --> 00:02:43,040
हम तुरंत वो कर सकते हैं। लेकिन एक धर्म के साथ और अपने जो हमारे मर्यादाएं

40
00:02:43,040 --> 00:02:47,040
हैं जो हमारे गुरुजनों ने या किसी ने भी हमें दे रखा

41
00:02:47,040 --> 00:02:51,120
है। किस हिसाब से हमें अपने शास्त्रों के अनुसार और वेदों

42
00:02:51,120 --> 00:02:55,280
के अनुसार चलना है। उस हिसाब से हमें कार्य करना चाहिए। तो

43
00:02:55,280 --> 00:02:59,280
हम [संगीत] सफल होंगे और समाज में

44
00:02:59,280 --> 00:03:03,440
एक प्रेरणा का स्रोत धन्यवाद। राम

45
00:03:03,440 --> 00:03:07,760
रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे

46
00:03:07,760 --> 00:03:13,200
सहस्र नाम ततुल्यम राम नाम वरानने

47
00:03:13,200 --> 00:03:17,520
मेरा नाम अभिषेक गड है। मैं अभी वर्तमान में केंद्रीय

48
00:03:17,520 --> 00:03:21,840
संस्कृत विश्वविद्यालय श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर देवप्रयाग

49
00:03:21,840 --> 00:03:25,360
उत्तराखंड में वेद विद्या का अध्ययन

50
00:03:25,360 --> 00:03:29,440
कर रहा हूं। अभी शास्त्री तृतीय वर्ष का छात्र

51
00:03:29,440 --> 00:03:32,000
हूं।

52
00:03:32,000 --> 00:03:36,000
आपके द्वारा प्रदत्त विषय पर अपने विचार प्रस्तुत करने जा रहा

53
00:03:36,000 --> 00:03:40,080
हूं। अर्थात हमें हिंदू राष्ट्र की आवश्यकता क्यों

54
00:03:40,080 --> 00:03:44,720
है? हम जानते ही हैं पुरा

55
00:03:44,720 --> 00:03:50,560
काल में इस भारतवर्ष के भूमंडल पर

56
00:03:50,560 --> 00:03:56,240
बहुत आक्रांताओं का राज रहा। जिसमें

57
00:03:56,240 --> 00:04:00,880
हमारे अनेक शाखाओं का लोप हो गया।

58
00:04:00,880 --> 00:04:06,480
आपको आश्चर्य होगा कि हमारे चारों वेदों की शाखाएं

59
00:04:06,480 --> 00:04:10,480
10131 शाखाएं उपलब्ध थी।

60
00:04:10,480 --> 00:04:14,640
आज उनमें से केवल केवल 10

61
00:04:14,640 --> 00:04:19,120
शाखाओं का

62
00:04:19,120 --> 00:04:22,640
को हम देख पा रहे हैं।

63
00:04:22,640 --> 00:04:26,720
इसका कारण हमारे आक्रांताओं का इस भारतवर्ष की

64
00:04:26,720 --> 00:04:30,880
भूमि पर प्रहार होना और हमने

65
00:04:30,880 --> 00:04:34,160
उनको संरक्षण

66
00:04:34,160 --> 00:04:38,240
करने का प्रयास तो किया परंतु हम

67
00:04:38,240 --> 00:04:42,560
उसमें सफल भी नहीं हो पाए। यह भी अत्यंत विचारणीय वार्ता है। क्यों

68
00:04:42,560 --> 00:04:46,720
नहीं सफल हो पाए? और अभी वर्तमान

69
00:04:46,720 --> 00:04:50,880
में हम ऐसी ऐसी वैदेशिक परंपराओं के संभाग

70
00:04:50,880 --> 00:04:53,920
हो रहे हैं।

71
00:04:53,920 --> 00:04:59,200
आप आज वर्तमान की वेशभूषा को देख लीजिए।

72
00:04:59,200 --> 00:05:03,520
हम भारतीय वेशभूषा को धारण करने में अत्यंत

73
00:05:03,520 --> 00:05:07,920
लज्जा की प्रतीति अनुभव करते हैं। हम

74
00:05:07,920 --> 00:05:12,320
अपनी भारतीय संस्कृत के पठनपाठन में अत्यंत

75
00:05:12,320 --> 00:05:17,600
लज्जा की अनुभूति का अनुभूति को

76
00:05:17,600 --> 00:05:22,000
करते हैं। हम यदि कहीं देखेंगे

77
00:05:22,000 --> 00:05:26,000
गुरुकुलों में यह तो केवल पूजा पाठ करता है। यह

78
00:05:26,000 --> 00:05:30,560
क्या करेगा? परंतु आपको यह ज्ञात नहीं है।

79
00:05:30,560 --> 00:05:34,800
आज यदि भारतीय संस्कृति की संरक्षणा हो रही है

80
00:05:34,800 --> 00:05:40,240
तो उसका मुख्य कारण हमारे वैदिक परंपरा का

81
00:05:40,240 --> 00:05:44,640
लक्ष्य है। यह वैदिक परंपराएं

82
00:05:44,640 --> 00:05:48,800
इस राष्ट्र में जब तक सुरक्षित रहेंग

83
00:05:48,800 --> 00:05:54,560
तब तक ही यह भारतवर्ष

84
00:05:54,560 --> 00:05:58,880
नहीं तो नहीं। आज आप आहार

85
00:05:58,880 --> 00:06:03,520
को देख लीजिए। आप वेशभूषा को देख लीजिए। इतना

86
00:06:03,520 --> 00:06:07,920
लुप्तकरण की ओर अग्रस्थित हो रहा है। हमारे शास्त्रों

87
00:06:07,920 --> 00:06:11,920
में प्रतिपादित मैं आप सबसे एक आहार

88
00:06:11,920 --> 00:06:16,960
के विषय में कुछ प्रस्तुत करना चाहूंगा। क्यों आज

89
00:06:16,960 --> 00:06:21,040
हमारी बुद्धि का जो एक

90
00:06:21,040 --> 00:06:26,000
स्तर था जो एक सोचने विचारने की जो क्षमता थी जो हमारे

91
00:06:26,000 --> 00:06:30,000
शरीर में एक रक्त [हंसी] प्रवाह होता था वीर का वो आज

92
00:06:30,000 --> 00:06:34,240
क्यों नहीं हो रहा है? इसका मुख्य कारण है आहार।

93
00:06:34,240 --> 00:06:38,560
क्योंकि आहार सबका बिगड़ गया है। कहते हैं

94
00:06:38,560 --> 00:06:42,560
आहार शुद्ध सत शुद्धि सत शुद्ध

95
00:06:42,560 --> 00:06:47,680
ध्रवा स्मृति अर्थात यदि आहार की शुद्धि हो गई

96
00:06:47,680 --> 00:06:50,000
तो स्मृति की

97
00:06:50,000 --> 00:06:54,640
शुद्धि हो जाएगी और स्मृति की शुद्धि हो जाएगी तो अनेक

98
00:06:54,640 --> 00:06:59,120
अनेक शुद्ध विचारों का प्रकटीकरण हमारे मस्तिष्क के मस्तिष्क

99
00:06:59,120 --> 00:07:03,120
के पटल में होगा। मित्रों मैं आप सभी

100
00:07:03,120 --> 00:07:07,520
से यही निवेदन करना चाहूंगा कि अपनी संस्कृति

101
00:07:07,520 --> 00:07:12,800
परंपरा का संरक्षण और नहीं करेंगे

102
00:07:12,800 --> 00:07:16,880
तो हम आने वाले काल में ध्वस्त की

103
00:07:16,880 --> 00:07:20,880
ओर अग्रसित हो जाएंगे क्योंकि गीता में भगवान कृष्ण ने कहा

104
00:07:20,880 --> 00:07:25,440
है स्वधर्म निधन श्रेया परधर्मो

105
00:07:25,440 --> 00:07:30,000
भया अर्थात यदि अपने धर्म में

106
00:07:30,000 --> 00:07:34,240
मर मर जाए अपने धर्म का आचरण करते करते यदि हमारे प्राण चले

107
00:07:34,240 --> 00:07:38,240
जाए तब हमारा धर्म श्रेय है परंतु पर धर्म तो भया

108
00:07:38,240 --> 00:07:43,600
भया है वह दूसरा धर्म तो हमको हर समय हमको

109
00:07:43,600 --> 00:07:47,680
प्रतापित करने वाला है इसलिए और मैं

110
00:07:47,680 --> 00:07:52,400
एक विषय को और प्रस्तुत करना चाहूंगा आज

111
00:07:52,400 --> 00:07:57,680
इस आभास पटल पर जुड़े सभी से कहना चाहूंगा आज

112
00:07:57,680 --> 00:08:02,000
इतना अपराध क्यों हो रहा है। यह इसका

113
00:08:02,000 --> 00:08:06,560
मुख्य कारण आज हमारी गौ माता का संरक्षण नहीं है।

114
00:08:06,560 --> 00:08:10,800
आज गौ माता पर इतना अपराध

115
00:08:10,800 --> 00:08:15,520
हो रहा है। आंखों में अश्रु आ जाते हैं।

116
00:08:15,520 --> 00:08:19,680
यदि हिंदुओं यदि एक एक लोग ने गौ माता

117
00:08:19,680 --> 00:08:24,160
का संरक्षण करना प्रारंभ कर दिया तो ये

118
00:08:24,160 --> 00:08:29,520
जो देश में आज ये जो

119
00:08:29,520 --> 00:08:34,480
बुद्धि मलन हो रही है। उसका क्षय

120
00:08:34,480 --> 00:08:38,640
हो सकता है। आप देखिए तो जब तक

121
00:08:38,640 --> 00:08:42,880
हमारा गौ सुरक्षित थी तब तक हमारा राष्ट्र सुरक्षित

122
00:08:42,880 --> 00:08:46,160
था। आज

123
00:08:46,160 --> 00:08:50,880
गौ माता का वृत्तरण हो रहा है। आज देखिए तो आप

124
00:08:50,880 --> 00:08:54,960
हम लोग एसओ में आराम से सोते हैं। परंतु हम गौ माता के लिए

125
00:08:54,960 --> 00:08:59,440
थोड़ा सा अन्य का अन्य का व्यवस्था भी नहीं कर सकते।

126
00:08:59,440 --> 00:09:03,520
आप जानिए या स्थान में अनेक गौशालाओं

127
00:09:03,520 --> 00:09:07,760
का हमारे संत महात्मा लोग प्रबंध करते

128
00:09:07,760 --> 00:09:11,840
हैं। उन गौशालों की संरक्षण कर रहे हैं। यदि आप लोग भी

129
00:09:11,840 --> 00:09:15,920
उनमें अपना सहयोग प्रदान करेंगे तो मुझे लगता है जब गौ माता की

130
00:09:15,920 --> 00:09:20,080
संरक्षण क्योंकि गौ माता में ही 33 कोटि देवताओं का निवास है।

131
00:09:20,080 --> 00:09:21,680
एक यजुर्वेद का चौथे अध्याय

132
00:09:21,680 --> 00:09:26,080
का यह मंत्र प्राप्त होता है। जिसमें 33 कोटि देवताओं

133
00:09:26,080 --> 00:09:32,080
का वास गौ में बताया है। यदि गौ माता का संरक्षण

134
00:09:32,080 --> 00:09:36,960
हां किंचित यदि गौ माता का संरक्षण हमने

135
00:09:36,960 --> 00:09:41,200
कर दिया तो अवश्य ही यह हिंदू राष्ट्र एक समय

136
00:09:41,200 --> 00:09:45,440
विश्व गुरु की पदवी को प्राप्त कर सकेगा मैं ज्यादा

137
00:09:45,440 --> 00:09:49,760
नहीं कहूंगा क्योंकि समय का क्योंकि

138
00:09:49,760 --> 00:09:53,840
समय जो होता है वह अधिक मूल्यवान

139
00:09:53,840 --> 00:09:58,400
होता है क्योंकि समय के लिए हमारे शास्त्रों ने कहा है आयुष क्षण

140
00:09:58,400 --> 00:10:03,280
को नलभ्या कल्प कोटि भी तस्मात

141
00:10:03,280 --> 00:10:07,360
सर्व प्रयत्ने क्षण नल अर्थात

142
00:10:07,360 --> 00:10:11,600
आयु का एक क्षण भी हजारों करोड़ों स्वर्ण मुद्राओं से भी प्राप्त नहीं

143
00:10:11,600 --> 00:10:15,600
हो सकता इसलिए हमें हर क्षण का उपयोग

144
00:10:15,600 --> 00:10:19,920
करना चाहिए मैं अपनी वाणी को यही विराम देता हूं अंत में गौ

145
00:10:19,920 --> 00:10:20,960
माता की जय

146
00:10:20,960 --> 00:10:25,360
हो धर्म की जय हो अधर्म का विनाश हो प्राणियों

147
00:10:25,360 --> 00:10:27,840
में सद्भावना हो विश्व का

148
00:10:27,840 --> 00:10:32,080
कल्याण हो। गौ माता की रक्षा हो। गौ हत्या

149
00:10:32,080 --> 00:10:36,800
बंद हो। पार्वती पत हर हर

150
00:10:36,800 --> 00:10:40,400
महादेव।

151
00:10:40,400 --> 00:10:43,040
जी जी सर

152
00:10:43,040 --> 00:10:47,280
नीलाम भुज श्यामलंगम सीता समारोपित

153
00:10:47,280 --> 00:10:51,280
वाम भागम पाणो मासाय चारू छापम नमामि

154
00:10:51,280 --> 00:10:56,480
राम रघुवंश। आप सभी जो इस प्रतियोगिता

155
00:10:56,480 --> 00:11:00,720
में भाग ले रहे हैं। आप सभी मेरे विद्वान जन प्रबुद्ध जन

156
00:11:00,720 --> 00:11:04,960
है। मैं आपके सामने एक छोटा सा हूं और आपको बता देना

157
00:11:04,960 --> 00:11:09,200
चाहता हूं कि प्रथम मंच है जहां मैं अपने विचार प्रकट

158
00:11:09,200 --> 00:11:15,200
करने जा रहा हूं तो कोई त्रुटि हो तो समाप्त होगा।

159
00:11:18,000 --> 00:11:22,160
विषय पर अर्थात हिंदू राष्ट्र आपकी आवाज अच्छे से नहीं आ रही। कृपया

160
00:11:22,160 --> 00:11:26,640
थोड़ा जोर से बोलिएगा। हिंदू राष्ट्र की आवश्यकता क्यों

161
00:11:26,640 --> 00:11:30,880
इस पर विचार करने जा रहा हूं। तो ये तो

162
00:11:30,880 --> 00:11:34,880
एक प्रत्यक्ष बात है कि आज हम संपूर्ण भारत

163
00:11:34,880 --> 00:11:39,600
में जो घटनाएं देख रहे हैं

164
00:11:39,600 --> 00:11:43,600
उनके लिए हम अलग-अलग से इन

165
00:11:43,600 --> 00:11:47,840
सभी विषयों को उठा नहीं सकते। यदि हम इसके मूल पर ध्यान देंगे

166
00:11:47,840 --> 00:11:52,160
जो कि सभी को मालूम है कि यदि भारत हिंदू

167
00:11:52,160 --> 00:11:56,560
राष्ट्र होगा तो भारत की जो प्राचीन संस्कृति है

168
00:11:56,560 --> 00:12:00,560
जो प्राचीन गुरुकुल प्रणाली है प्राचीन जो

169
00:12:00,560 --> 00:12:04,720
गुरु ग्रंथ गोविंद की जो विधाएं चलती आ रही है जिस प्रकार

170
00:12:04,720 --> 00:12:08,960
से समाज यहां की अर्थव्यवस्था राज व्यवस्था

171
00:12:08,960 --> 00:12:13,200
शिक्षा व्यवस्था सभी प्रकार से संचालित होती आ रही है

172
00:12:13,200 --> 00:12:17,680
वो जब भारत पर हिंदू शासकों

173
00:12:17,680 --> 00:12:21,920
का राज्य हुआ करता था। भगवान श्री रामचंद्र जी के समय,

174
00:12:21,920 --> 00:12:26,400
श्री कृष्ण जी के समय किस प्रकार से उनका राज्य चलता था। यदि हम

175
00:12:26,400 --> 00:12:30,880
मनुस्मृति आदि में उनका देखें तो हमें ज्ञात होगा कि

176
00:12:30,880 --> 00:12:33,200
निश्चित रूप से यदि भारत

177
00:12:33,200 --> 00:12:37,360
हिंदू राष्ट्र घोषित होता है तो हम संपूर्ण विश्व को दिखा

178
00:12:37,360 --> 00:12:41,920
सकते हैं कि हिंदू धर्म शास्त्रियों के अनुसार

179
00:12:41,920 --> 00:12:46,000
एक राष्ट्र का संचालन किस प्रकार से होना चाहिए। किस प्रकार से वहां

180
00:12:46,000 --> 00:12:50,160
की शिक्षा व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, वहां की

181
00:12:50,160 --> 00:12:54,320
कृषि आदि सब प्रकार की कार्य किस प्रकार

182
00:12:54,320 --> 00:12:58,480
से संचालित हो और विकास के नाम पर जो आज

183
00:12:58,480 --> 00:13:02,560
विनाश का कार्य किया जा रहा है। हम बता सकते हैं कि प्रकृति के

184
00:13:02,560 --> 00:13:06,720
साथ जुड़कर भी विकास कार्य किए जा सकते हैं और उन्नति को

185
00:13:06,720 --> 00:13:10,720
राष्ट्र को राष्ट्र को उन्नति के मार्ग पर प्रशस्त किया जा सकता

186
00:13:10,720 --> 00:13:13,120
है।

187
00:13:13,120 --> 00:13:17,200
अंत में मैं एक दो वाक्यों के साथ अपनी

188
00:13:17,200 --> 00:13:21,600
वाणी को यह विश्राम देना चाहूंगा। कि जिस दिन मेरा

189
00:13:21,600 --> 00:13:25,600
तीर चलेगा, जिस दिन मेरा तीर चलेगा, सब

190
00:13:25,600 --> 00:13:29,760
बाधाएं चीर चलेगा। इस शुष्क

191
00:13:29,760 --> 00:13:34,160
धरा पर, इस शुष्क धरा पर तब विजय का नेर चलेगा।

192
00:13:34,160 --> 00:13:38,880
तब विजय का नेर चलेगा। जय तू भारतम जय तू संस्कृत

193
00:13:38,880 --> 00:13:44,000
जय श्री राम।

194
00:13:44,000 --> 00:13:48,080
जी रामो विग्रह धर्म मेरा टॉपिक यह नहीं है। मैंने

195
00:13:48,080 --> 00:13:52,240
यह स्टार्टिंग में सेंटेंस बोला है। मेरा टॉपिक है परंपरा प्राप्त

196
00:13:52,240 --> 00:13:56,640
सिद्धांत और आधुनिक अपरंपरा प्राप्त सिद्धांत जैसे

197
00:13:56,640 --> 00:13:59,760
जी जी करिए

198
00:13:59,760 --> 00:14:04,160
माता राम पिता रामचंद्र स्वामी राम रामचंद्र सर्व रामचंद्र

199
00:14:04,160 --> 00:14:08,560
दयालु जान

200
00:14:08,560 --> 00:14:12,640
तो आज का मेरा विषय है परंपरा प्राप्त और अपरंपरा प्राप्त सिद्धांत

201
00:14:12,640 --> 00:14:16,880
अगर हम परंपरा आज के युग में अगर हम बात करें तो मनुष्य चांद तक पहुंच गया है जबकि

202
00:14:16,880 --> 00:14:21,120
वो आत्म साक्षात्कार से दूर होता जा रहा है क्योंकि वो अपना जो मूल

203
00:14:21,120 --> 00:14:25,840
सिद्धांत है शास्त्र को छोड़कर के विज्ञान को अधिक महत्व देने लगा है।

204
00:14:25,840 --> 00:14:29,920
जैसे विज्ञान में कोई भी सिद्धांत शाश्वत नहीं है और जो

205
00:14:29,920 --> 00:14:34,080
सनातन सिद्धांत शाश्वत सिद्धांत जो हमें शास्त्रों से प्राप्त होते हैं वो विज्ञान से कभी

206
00:14:34,080 --> 00:14:38,800
प्राप्त नहीं हो सकते। क्योंकि विज्ञान का प्रत्येक सिद्धांत खंडनात्मक

207
00:14:38,800 --> 00:14:42,960
है। लेकिन आज अगर परंपरा प्राप्त आचार्यों के शरण को छोड़कर

208
00:14:42,960 --> 00:14:47,120
के जो लोग मॉडर्न आचार्यों जैसे आधुनिक आचार्यों की शरण

209
00:14:47,120 --> 00:14:51,520
में जाने से आचार्य प्रशांत हो गए या स्कन आदि हो गए वो अपने सिद्धांतों को वेरीफाई

210
00:14:51,520 --> 00:14:55,760
करने के लिए गुरु गोविंद और ग्रंथ को छोड़ के विज्ञान की शरण लेते हैं। जैसे

211
00:14:55,760 --> 00:14:59,040
कल को अगर विज्ञान में कोई ऐसा शोध हो गया तो वो उसको मानेंगे।

212
00:14:59,040 --> 00:15:03,920
शास्त्र को नहीं मानेंगे।

213
00:15:03,920 --> 00:15:08,080
जिसको लेकर के बात यह है कि उनके पास सनातन सिद्धांत

214
00:15:08,080 --> 00:15:12,560
की कमी है और जिसकी

215
00:15:12,560 --> 00:15:16,640
वजह से उनका ईश्वर शाश्वत उनका धर्म शाश्वत सिद्ध नहीं होता और ईश्वर

216
00:15:16,640 --> 00:15:20,640
सर्वशक्तिमान सिद्ध नहीं किया जा सकता। इसलिए हमें परंपरा प्राप्त

217
00:15:20,640 --> 00:15:26,640
आचार्य और सिद्धांतों की शरण लेनी चाहिए। जी धन्यवाद।

218
00:15:29,200 --> 00:15:35,200
इसका करता हूं स्वयं विश्व से विश्व में आज

219
00:15:37,840 --> 00:15:40,720
करीब

220
00:15:40,720 --> 00:15:44,880
ये लोगों के जब भी किसी और होती है ये अपने आप

221
00:15:44,880 --> 00:15:50,400
के लोगों को बचाने के लिए तैयार हो जाते हैं। और

222
00:15:50,400 --> 00:15:56,080
भैया आपकी आवाज कट रही है। आपकी आवाज अच्छे से नहीं आ रही है। देख लीजिए एक बार

223
00:15:56,080 --> 00:16:00,080
जैसे कि आज देशों में सूडान और सोमालिया जैसे देशों में अगर क्रिश्चियन

224
00:16:00,080 --> 00:16:04,160
लोगों की मृत्यु हो रही है तो उस अमेरिका और बाकी नेटो के देश अपने आप

225
00:16:04,160 --> 00:16:08,160
के समर्थन में तुरंत उतर सकते हैं। कहते हैं कि हम लोग इनकी रक्षा के लिए

226
00:16:08,160 --> 00:16:12,240
अपने चाहे तो हम लोग इन पर प्रतिकार भी कर सकते हैं। उसी प्रकार आज

227
00:16:12,240 --> 00:16:16,560
भारत एक सेकुलर देश है और उसकी वजह से पाकिस्तान में रहने वाले हिंदुओं

228
00:16:16,560 --> 00:16:20,560
की, बांग्लादेश में रहने वाले हिंदुओं की और विश्व के कई देशों में

229
00:16:20,560 --> 00:16:24,960
जहां पर हिंदू थे उन लोग को संरक्षण नहीं प्राप्त हुआ। आज हम लोग उनको रक्षा

230
00:16:24,960 --> 00:16:29,040
नहीं दे सकते क्योंकि हम लोग एक सेकुलर देश है और हम लोगों के अंदर हम

231
00:16:29,040 --> 00:16:33,600
लोग हिंदू कंट्री नहीं है। ये हम लोगों की बहुत बड़ी कमी है। दूसरा सनातन

232
00:16:33,600 --> 00:16:38,000
आज की नहीं विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता है। ये जो कुछ धर्म जो 1500

233
00:16:38,000 --> 00:16:42,160
साल पहले या फिर 2000 वर्ष पहले आए थे। इन्होंने अपने नाम पर कई

234
00:16:42,160 --> 00:16:46,240
देशों को बना लिया और यह अपने आप की पहचान बहुत समय से करते हैं कि हमारी

235
00:16:46,240 --> 00:16:50,720
संस्कृति बहुत अच्छी है। इनकी संस्कृति में एक से एक फोट भरे हैं। लेकिन हमारी इकलौती

236
00:16:50,720 --> 00:16:52,960
संस्कृति है जो कि सारे जीवन को

237
00:16:52,960 --> 00:16:57,040
बचाना चाहती है। सारे जीवन मूल्यों को बचाना चाहती है। मनुष्य की रक्षा करना

238
00:16:57,040 --> 00:17:01,040
चाहती है। यदि शत्रु के परिवार कभी कोई आए जैसे स्वयं राम

239
00:17:01,040 --> 00:17:05,440
जी के शत्रु रावण के भाई स्वयं विभीषण जी राम जी के शरण

240
00:17:05,440 --> 00:17:09,440
में आए थे। लेकिन हम लोग का हम लोग का मानना

241
00:17:09,440 --> 00:17:13,440
है वसुदेव कुटुंबकम और हम लोग उनकी रक्षा करते हैं। शरण में आए की रक्षा हम लोग

242
00:17:13,440 --> 00:17:17,520
ने करी है। स्वयं पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गोरी के भाई की रक्षण करी

243
00:17:17,520 --> 00:17:21,600
है। ये एक हमारा सिद्धांत है। सबकी रक्षा करना। प्रकृति की हम

244
00:17:21,600 --> 00:17:25,680
लोग रक्षा करते हैं। नदियों की रक्षा करते हैं। जो नदियां गंदी रहती है साल

245
00:17:25,680 --> 00:17:29,680
भर उन्हें जब हमारे हिंदू संस्कृति के त्यहार होते हैं उनके नाम

246
00:17:29,680 --> 00:17:34,000
पर ही उनकी सफाई होती है। नहीं तो उनकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता है। जितने एक्टिविस्ट

247
00:17:34,000 --> 00:17:38,560
है ये सब छिप जाते हैं। जितनी महिलाएं हैं उनको भी कोई नहीं देखता है। आज अफगानिस्तान

248
00:17:38,560 --> 00:17:42,640
और पाकिस्तान में उनकी पूरी तरह से उनको आजादी इनकी छीन

249
00:17:42,640 --> 00:17:46,800
ली गई है। क्योंकि उनको पूरा अपने आप को ढकने के लिए कहा गया है और अफगानिस्तान

250
00:17:46,800 --> 00:17:51,040
में तो इस हद तक पार कर दी गई है कि एक छोटा सा नाक

251
00:17:51,040 --> 00:17:55,040
के ऊपर छेद दे दिया गया कि वहां से आप लोग देखिएगा उनको पूरा ढकने के लिए

252
00:17:55,040 --> 00:17:59,200
कह दिया गया तो हमारे ये कहीं भी अब रक्षण नहीं हो पाएगा यदि हम लोग अपने

253
00:17:59,200 --> 00:18:03,200
आप को देख दिखाएंगे नहीं यदि हम लोग अपना सम्मान नहीं कर पाएंगे और

254
00:18:03,200 --> 00:18:07,200
बात आई विश्व में हम लोगों को इतिहास भी इतिहास विश्व के

255
00:18:07,200 --> 00:18:08,000
लिए बहुत जरूरी

256
00:18:08,000 --> 00:18:12,160
होता है हम लोग अपनी पीढ़ियों को अपने बारे में नहीं बता पाएंगे अगर हमारा कोई इतिहास ही

257
00:18:12,160 --> 00:18:16,240
नहीं बचेगा जैसे विश्व में वैसे तो हर जगह सनातन धर्म था लेकिन आज

258
00:18:16,240 --> 00:18:20,320
भारत में सबसे ज्यादा उसके मंदिर है और उसी प्रकार से और एक से एक

259
00:18:20,320 --> 00:18:24,400
हमारे विश्व प्रख्यात मंदिर है और हम लोगों को 1947

260
00:18:24,400 --> 00:18:28,560
में जब आजादी मिली उसके कुछ ही वर्षों में विश्व के सात अजूबों को

261
00:18:28,560 --> 00:18:32,560
डिक्लेअ कर दिया गया। भारत की तब इतनी नाम पहचान नहीं थी। नहीं तो सात क्या

262
00:18:32,560 --> 00:18:36,720
भारत में 7000 अजूबे रखे हैं। इतने वर्षों बाद जब हिंदू

263
00:18:36,720 --> 00:18:40,880
संस्कृति थोड़ी बहुत जागी। लोगों को थोड़ा बहुत पता चला जब अंग्रेजों गुलाम

264
00:18:40,880 --> 00:18:45,120
से बाहर आए तो विश्व का सबसे बड़ा मंदिर एंड कोर वाट को हम लोगों का आठवा

265
00:18:45,120 --> 00:18:49,200
विश्व का अजूबा बनाया गया है। लेकिन क्या हम भारत में ऐसे अजूबे नहीं

266
00:18:49,200 --> 00:18:53,200
है जो हम लोग रक्षा कर सके और हम लोग इकलौते हैं जो त्याग

267
00:18:53,200 --> 00:18:57,520
की त्याग की महिमा जानते हैं। त्याग हम लोग करते हैं। स्वयं भगवान श्री कृष्ण

268
00:18:57,520 --> 00:19:01,760
वो जानते थे आज मैं अर्जुन के साथ युद्ध करने जा रहा हूं।

269
00:19:01,760 --> 00:19:05,920
लेकिन मेरा जो भांजा है अभिमन्यु वो कुरुक्षेत्र की रणभूमि अकेला मारा जाएगा

270
00:19:05,920 --> 00:19:10,080
और उनकी स्वयं पांच भांजों समान उनके द्रोपदी के पांच

271
00:19:10,080 --> 00:19:14,160
पुत्र जिनका मरण था वो स्वयं जानते थे लेकिन वो कहते थे धर्म

272
00:19:14,160 --> 00:19:18,320
के लिए कोई से बड़ा सा बड़ा त्याग देना पड़े तो हम लोग को अवश्य देना चाहिए हम

273
00:19:18,320 --> 00:19:22,400
लोगों को रक्षा करनी चाहिए ये जो सांस्कृतिक मूल्य है इनकी हम लोग को रक्षा करनी

274
00:19:22,400 --> 00:19:23,040
चाहिए इसी से

275
00:19:23,040 --> 00:19:27,200
विश्व बनेगा इसी सनातन राष्ट्र बनेगा हम लोगों को राष्ट्र लेना चाहिए

276
00:19:27,200 --> 00:19:31,360
अपने सम्मान के लिए और इतिहास के लिए संस्कृति के लिए विश्व में धरोहर बनने के

277
00:19:31,360 --> 00:19:35,440
लिए क्योंकि जब जब भारत अपना सब शक्तिमान था वो उसी

278
00:19:35,440 --> 00:19:39,520
पर था सबसे जब अमीर था वो इसी पर था जब वो हिंदू पालन कर रहा

279
00:19:39,520 --> 00:19:43,520
था विश्व के बड़े से बड़े विजेता चाहे तो अलेक्जेंडर हो चाहे तो

280
00:19:43,520 --> 00:19:48,800
वो मंगोल हो वो हमेशा भारत की सीमा पर आकर रुक गए हैं धन्यवाद

281
00:19:48,800 --> 00:19:53,680
मेरा टॉपिक श्री रामो विग्रह धर्म

282
00:19:53,680 --> 00:19:57,840
सभी बड़ों को समकक्षों को और छोटों को यशोचित सम्मान

283
00:19:57,840 --> 00:20:00,640
एवं प्रेम

284
00:20:00,640 --> 00:20:05,120
अब मैं अपना टॉपिक शुरू कर रहा हूं। श्री राम जय राम

285
00:20:05,120 --> 00:20:09,360
जय जय राम नमोस्तु रामाय लक्ष्मणाय

286
00:20:09,360 --> 00:20:13,600
देव चस जनका वादितो

287
00:20:13,600 --> 00:20:17,680
विश्वेश्वरम धर्म मार्ग प्रवर्तकम वंदे

288
00:20:17,680 --> 00:20:21,920
श्री हरिहरंदम करत्रम जगत गुरु

289
00:20:21,920 --> 00:20:26,000
जय श्री जिस प्रकार से अभी मेरा विषय है

290
00:20:26,000 --> 00:20:30,560
धर्म के संबंध में तो आज जैसे हम देखते हैं अधिकांश

291
00:20:30,560 --> 00:20:34,560
लोग धर्म का अर्थ ही नहीं जानते बहुत अधिकांश लोग केवल धर्म

292
00:20:34,560 --> 00:20:38,080
की परिभाषा के लिए केवल पूजन पद्धति को प्रयोग करते हैं

293
00:20:38,080 --> 00:20:42,080
जो कि इसका बहुत संकीर्ण अर्थ है। वास्तव में धर्म का अर्थ

294
00:20:42,080 --> 00:20:46,400
है शास्त्रोक्त रूप से किए गए कर्म को ही धर्म कहा जाता है।

295
00:20:46,400 --> 00:20:50,560
जैसा कि गुरुदेव बताते हैं उसके अनुसार और

296
00:20:50,560 --> 00:20:54,640
यहां पर कर्म को लेकर किसके लिए क्या कर्म होता है? यह भगवान श्री

297
00:20:54,640 --> 00:20:58,720
राम से बेहतर कोई बता नहीं सकता। हमारे वास्तविक अगर

298
00:20:58,720 --> 00:21:02,960
हीरो हम कहे जाए तो भगवान श्री राम ही है। जिस प्रकार से एक पुत्र

299
00:21:02,960 --> 00:21:07,040
का क्या धर्म हो सकता है? शिष्य का क्या धर्म हो सकता

300
00:21:07,040 --> 00:21:11,360
है? भाई का क्या धर्म हो सकता है? पिता का क्या धर्म हो सकता है?

301
00:21:11,360 --> 00:21:15,440
शत्रु का क्या धर्म हो सकता है? एक शरणागत वत्सल के लिए हमारा क्या धर्म

302
00:21:15,440 --> 00:21:19,520
हो सकता है? यह संसार में अगर कोई बता सकता है तो वह केवल भगवान

303
00:21:19,520 --> 00:21:23,840
श्री राम है। जिनके अलावा कोई नहीं इस चीज को व्याख्या कर सकता। वो

304
00:21:23,840 --> 00:21:28,480
एक ही अकेले सब रूपों में सबसे बेहतर

305
00:21:28,480 --> 00:21:32,720
आचरण प्रस्तुत करते हैं। जिस प्रकार से उन्होंने

306
00:21:32,720 --> 00:21:37,120
जब माता कौशल्या के गर्भ से जन्म लिया और अपने बालपन

307
00:21:37,120 --> 00:21:41,280
की अटकेलियां करते हुए गुरु

308
00:21:41,280 --> 00:21:46,000
के साथ वन में गए और वहां उनके समस्याओं का समाधान किया।

309
00:21:46,000 --> 00:21:51,600
उसके बाद उन्होंने विवाह किया एवं

310
00:21:51,600 --> 00:21:53,280
पिता की आज्ञा का पालन किया।

311
00:21:53,280 --> 00:21:57,520
पिता के केवल एक वचन मात्र से उन्होंने समस्त साम्राज्य त्याग

312
00:21:57,520 --> 00:22:01,600
दिया। जबकि वर्तमान स्थितियां यह है कि साम्राज्य के

313
00:22:01,600 --> 00:22:05,840
लिए तो भाई स्वयं का अपने पिता तक का पुत्र का भी हत्या कर देता है। तो

314
00:22:05,840 --> 00:22:09,920
इस स्थिति से बचने के लिए हम उनको हमारा आदर्श बिल्कुल मान सकते

315
00:22:09,920 --> 00:22:14,560
हैं। उन्होंने फिर आगे बढ़कर वन में गए

316
00:22:14,560 --> 00:22:18,800
और समस्त समस्याओं का सामना किया। पशु पक्षियों

317
00:22:18,800 --> 00:22:23,280
को जानवरों को उन्होंने मित्र बनाया।

318
00:22:23,280 --> 00:22:27,520
रावण जैसा शक्तिशाली उनकी भार का हरण करके ले गया तो उसके साथ

319
00:22:27,520 --> 00:22:31,760
पूर्ण युद्ध करके उसको परास्त करके अपनी भार को भी वहां से प्राप्त

320
00:22:31,760 --> 00:22:35,760
किया आखिर में जाके एक राजा का कर्तव्य भी निभाया बहुत

321
00:22:35,760 --> 00:22:39,840
ही बेहतरीन रूप से अपनी सब सर्वोत्तम सबसे प्रिय

322
00:22:39,840 --> 00:22:44,000
माता सीता का भी उन्होंने अपनी जनता के लिए एक आदर्श पुरुष के

323
00:22:44,000 --> 00:22:48,080
रूप में त्याग कर दिया इससे बेहतरीन हमारे इतिहास

324
00:22:48,080 --> 00:22:52,560
में कभी कोई व्यक्तित्व हो नहीं सकता कोई नहीं हो

325
00:22:52,560 --> 00:22:56,560
हम हमारी संतानों को, हमारे मिलने वालों को, हमारे मित्र जनों को सभी को अगर

326
00:22:56,560 --> 00:23:00,800
हम ये किसी भी प्रकार से समझा पावे के इन्हें हम हमारे गुरु

327
00:23:00,800 --> 00:23:04,800
के रूप में अगर मान ले तो बहुत सारी समस्याएं या मान

328
00:23:04,800 --> 00:23:08,720
लीजिए कि सभी समस्याएं हमारी सामान रूप से बिना किसी समस्या के

329
00:23:08,720 --> 00:23:11,280
हल हो।

330
00:23:11,280 --> 00:23:17,280
ये मेरा छोटा सवाल संदेश था आपके पास।

331
00:23:17,360 --> 00:23:22,080
श्री राम जय राम जय जय राम। उठे कि हम जो सो रहे

332
00:23:22,080 --> 00:23:26,400
उठे कि हम जो सो रहे अब उन्हें झिझोड़ दें नवीन

333
00:23:26,400 --> 00:23:30,480
क्रांति लाकर स्वदेश को नव मोड़ दें। स्वदेश

334
00:23:30,480 --> 00:23:34,480
को नव मोड़ दे। जय श्री राम। सर्व धर्मावलंबी जन को

335
00:23:34,480 --> 00:23:38,480
सादर प्रणाम। मैं हर्ष श्रीवास्तव विषय सनातनों को

336
00:23:38,480 --> 00:23:42,560
कैसे एकजुट किया जाए के सहित आप सभी का अभिवादन करता

337
00:23:42,560 --> 00:23:46,560
हूं। साथियों सनातनियों को कैसे एकजुट किया जाए।

338
00:23:46,560 --> 00:23:50,560
इस पूर्ण विषय से यह केवल यह मर्म नहीं है कि वर्तमान में

339
00:23:50,560 --> 00:23:55,200
स्थापित समाज को एक किया जाए। इनका एक संगठन बनाया जाए बल्कि

340
00:23:55,200 --> 00:23:59,280
यह है कि एक ऐसा सशक्त संगठन बनाया जाए जिसके

341
00:23:59,280 --> 00:24:03,360
द्वारा मूल उद्देश्य वास्तविकता में निष्पादित हो सके।

342
00:24:03,360 --> 00:24:07,520
वास्तविकता में हमारे समाज में सनातन संस्कृति का नित्य निरंतर

343
00:24:07,520 --> 00:24:11,760
पल्लवित पोषण हो और वो उनका सतत विकास हो। यह

344
00:24:11,760 --> 00:24:15,760
काल की पुकार है कि इस पूरी प्रक्रिया को निष्पादित किया जाए।

345
00:24:15,760 --> 00:24:19,840
अच्छा अब यहां पर इसका प्रभाव क्या होगा ये सोचते हैं।

346
00:24:19,840 --> 00:24:23,840
क्या हो जब हम जिस हिंदू राष्ट्र की संकल्पना करते हैं वह

347
00:24:23,840 --> 00:24:28,080
पूर्ण हो जाए। क्या हो शास्त्रों में जिस समाज की संकल्पना

348
00:24:28,080 --> 00:24:32,080
की बात की गई है की गई है वह वास्तविकता में हो जाए। तो कदाचित हमारा

349
00:24:32,080 --> 00:24:36,240
मूल उद्देश्य ही पूर्ण हो जाएगा। आहान का मूल उद्देश्य ही पूर्ण हो जाएगा। जिस

350
00:24:36,240 --> 00:24:40,400
उद्देश्य से भगवान शंकराचार्य ने दिग दिगंतर में सनातन

351
00:24:40,400 --> 00:24:44,480
की धर्म ध्वजा को लहराया था वह उद्देश्य पूर्ण हो जाएगा और

352
00:24:44,480 --> 00:24:48,560
इस पूरी प्रक्रिया की पहली सीढ़ी ही है कि सनातनियों

353
00:24:48,560 --> 00:24:52,560
को एकजुट किया जाए। देखिए इस पूरी प्रक्रिया में कई समस्याएं

354
00:24:52,560 --> 00:24:56,800
भी हैं। कई कठिनाइयां भी है। पहले जैसे पहली बात वर्तमान में स्थापित

355
00:24:56,800 --> 00:25:01,040
समाज में भेदभाव की संस्कृति है। ये भेदभाव परंपराओं से लेकर क्षेत्र

356
00:25:01,040 --> 00:25:05,200
से लेकर भाषा से लेकर जातिगत भी है। कदाचित ये भेदभाव समस्या नहीं

357
00:25:05,200 --> 00:25:09,600
है। समस्या यह है कि इस भेद से मन में भेद होता है और विखंडन

358
00:25:09,600 --> 00:25:13,840
उत्पन्न होता है। दूसरी बात अभी समाज

359
00:25:13,840 --> 00:25:18,000
में सनातन संस्कृति में कई आंतरिक और बाह्य हमले हो रहे हैं।

360
00:25:18,000 --> 00:25:22,080
विदेशों के द्वारा या फिर हमारे देश में ही द्वारा के लोगों के द्वारा तो ये

361
00:25:22,080 --> 00:25:26,400
भी एक समस्या है। तीसरी बात आम जनमानस में सनातन संस्कृति

362
00:25:26,400 --> 00:25:30,400
की मूल भावना ही नहीं फैली हुई। वे धर्म उसमें वहां पर धर्म की एक

363
00:25:30,400 --> 00:25:34,960
बहुत ही संकीर्ण परिभाषा है जिसका लोग पालन करते हैं। वे कर्मकांड

364
00:25:34,960 --> 00:25:39,440
आदि चीजों में ही फंसे रह जाते हैं। तो इस प्रकार जब आम जनमानस

365
00:25:39,440 --> 00:25:43,840
सनातन संस्कृति से परिचित ही नहीं है तो वो वास्तविकता में उत्थान

366
00:25:43,840 --> 00:25:48,240
की तरफ आगे नहीं बढ़ पाता है। अब साथियों समस्याओं

367
00:25:48,240 --> 00:25:52,240
से कठिनाइयों से समाधानों की ओर आते हैं। पहली

368
00:25:52,240 --> 00:25:56,240
बात सभी लोगों में सर्वम एकम की

369
00:25:56,240 --> 00:26:00,560
भावना को परिनिश्चित करना होगा। जिससे आम जनमानस इस पूर्ण संस्कृति

370
00:26:00,560 --> 00:26:04,880
से जुड़ सके और आगे बढ़ सके। दूसरी बात कि हमें जो समाज

371
00:26:04,880 --> 00:26:09,040
में जो स्थापित समाज है उनको एकजुट करके आगे बढ़ना होगा।

372
00:26:09,040 --> 00:26:13,120
जो भी भेद है वो भेद रहे। उदाहरण के स्वरूप हम समझते हैं कि भगवान

373
00:26:13,120 --> 00:26:17,120
शंकराचार्य ने चार दिशाओं में चार पीठ की स्थापना की। इसलिए नहीं

374
00:26:17,120 --> 00:26:21,360
कि उनमे भेद हो सके बल्कि इसलिए कि वे चार जगह से एक

375
00:26:21,360 --> 00:26:25,680
सनातन संस्कृति को वास्तविकता में आगे बढ़ा सके। तो इस मूल उद्देश्य

376
00:26:25,680 --> 00:26:29,680
से जितने भी समाज हैं उनको संगठित करके एक सशक्त संगठन की ओर

377
00:26:29,680 --> 00:26:33,760
आगे ले जाया जा सके। इसका प्रभाव यह होगा कि समाज में

378
00:26:33,760 --> 00:26:37,760
एक नेतृत्व होगा जिससे कि सभी समस्याओं का सभी हमलों

379
00:26:37,760 --> 00:26:42,400
का जो आंतरिक बाह्य हमले हैं उनको उनका समाधान किया जा सकेगा।

380
00:26:42,400 --> 00:26:46,960
इसके लिए आन एक अच्छा प्रकल्प है। एक अच्छे समाधान की ओर आगे बढ़ रहा है। आवश्यकता

381
00:26:46,960 --> 00:26:50,960
है ऐसे और समस्याओं को लेकर ऐसे और समाधानों को पूर्ण

382
00:26:50,960 --> 00:26:54,960
करने का हमें साथ मिलकर छोटे-छोटे गिलहरे

383
00:26:54,960 --> 00:26:59,120
प्रयास करने होंगे जो व्यक्ति व्यक्तिगत हो व्यक्ति परख हो

384
00:26:59,120 --> 00:27:03,280
जिनका लेकिन जिनका प्रभाव बेहतर हो और अंततः इसी

385
00:27:03,280 --> 00:27:07,840
कड़ी में अथर्ववेद की एक सूक्ति कृतम में दक्षिण

386
00:27:07,840 --> 00:27:12,000
हस्ते जयो में सव्याहिता अर्थात

387
00:27:12,000 --> 00:27:16,160
यदि मेरे दाहिने हाथ में पुरुषार्थ है तो मेरे बाएं हाथ में सफलता रखी

388
00:27:16,160 --> 00:27:20,320
हुई है। उस उद्देश्य से आप सभी का आह्वान करता हूं कि हम सभी

389
00:27:20,320 --> 00:27:24,480
को मिलकर छोटे छोटे ही सही लेकिन उन महत्वपूर्ण प्रयासों

390
00:27:24,480 --> 00:27:28,720
से आगे बढ़ना होगा। शंकर परंपरा के नेतृत्व संभालकर समाज

391
00:27:28,720 --> 00:27:32,720
को एकजुट करना होगा और जिस मूल उद्देश्य से हम सभी यहां पर

392
00:27:32,720 --> 00:27:36,720
हैं। उस मूल उद्देश्य को पूर्ण करके सनातन संस्कृति को

393
00:27:36,720 --> 00:27:40,720
पल्लवित करना होगा। एक सही स्वस्थ समाज की संकल्पना करनी

394
00:27:40,720 --> 00:27:45,680
होगी। धन्यवाद जय श्री राम

395
00:27:45,680 --> 00:27:49,680
सभी विद्वत जनों को मेरा सादर जय सियाराम मेरा विषय

396
00:27:49,680 --> 00:27:54,000
है वर्ण जन्म से अथवा कर्म से तो सर्वप्रथम

397
00:27:54,000 --> 00:27:58,240
वर्ण एवं आश्रम यह सनातन धर्म के दो अभिन्न अंग है

398
00:27:58,240 --> 00:28:02,400
एवं वर्णिक चार है ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य एवं शूद्र

399
00:28:02,400 --> 00:28:06,640
इसका प्रथम जिक्र ऋग्वेद में हमें प्राप्त होता है जो श्लोक है

400
00:28:06,640 --> 00:28:10,160
ब्राह्मणस मुखम आशित बहुराज्य कृत

401
00:28:10,160 --> 00:28:14,560
कुर तदस यद वैश्य पदभ्याम शद्र जायत इस प्रकार से

402
00:28:14,560 --> 00:28:18,880
सनातन परंपरा से हमें चार वर्ण प्राप्त होते हैं। सभी वैदिक आर्य हिंदुओं

403
00:28:18,880 --> 00:28:23,600
के चार वर्ण है और जैसा कि हम जानते हैं शास्त्रों

404
00:28:23,600 --> 00:28:27,840
रूप से सभी अपने जन्म के आधार पर ही वर्ण का निश्चित होता है।

405
00:28:27,840 --> 00:28:32,080
उदाहरण के रूप में भगवत गीता में अर्जुन ने भी कहा है कि

406
00:28:32,080 --> 00:28:36,160
कुल धर्मा जाति धर्मा शाश्वतः कुल धर्म सनातना

407
00:28:36,160 --> 00:28:40,480
और भगवान ने अर्जुन को भी तुम क्षत्रिय हो तुम्हारे

408
00:28:40,480 --> 00:28:44,800
लिए धर्म युद्ध ही उचित है एवं वही श्रेयस्कर है। इस प्रकार से

409
00:28:44,800 --> 00:28:48,880
जन्म से ही उसको तालुकात कर कर उनको उस कर्तव्य

410
00:28:48,880 --> 00:28:53,040
को पालन करने के लिए बताया गया है। उस प्रकार हमें ध्यान देना चाहिए कि

411
00:28:53,040 --> 00:28:57,120
जन्म से ही वर्ण प्राप्त होता है। पहले जन्म उसके पश्चात कर्म

412
00:28:57,120 --> 00:29:01,200
एवं जिस प्रकार से हम देखते हैं कि कर्म की चर्चा आती है कि केवल

413
00:29:01,200 --> 00:29:05,680
और केवल आपके कर्म से ही यह तय होगा आपका वर्ण क्या है तो प्रतिपल

414
00:29:05,680 --> 00:29:09,920
में आपका वर्ण परिवर्तित होता जाएगा अगर जन्म के आधार पर हम इसको

415
00:29:09,920 --> 00:29:14,320
नहीं देखते हैं और जो भी बाहरी तत्व इस प्रकार

416
00:29:14,320 --> 00:29:19,040
के अशास्त्रीय विधानों को तय करती हैं एवं बताती हैं वह सभी सनातन

417
00:29:19,040 --> 00:29:23,040
विरोधी हैं क्योंकि हमें परंपरा से जो प्राप्त है उसी का अवलंबन

418
00:29:23,040 --> 00:29:25,440
लेना चाहिए जिस प्रकार धर्म का भी परिभाषा

419
00:29:25,440 --> 00:29:29,680
है कि परंपरागतम प्राप्त इति धर्म एवं धारति इति धर्म

420
00:29:29,680 --> 00:29:33,760
तो उन सब वाक्यों को हमें अपने जीवन में

421
00:29:33,760 --> 00:29:37,760
अवलंबन करना चाहिए एवं उसका पालन करना चाहिए। उसके अतिरिक्त मैं यह

422
00:29:37,760 --> 00:29:41,920
कहना चाहूंगा कि वर्णों में किसी के भी प्रति

423
00:29:41,920 --> 00:29:46,160
हीन भावना का विषय कभी नहीं है। यह भेद वास्तव में मंगल कारक

424
00:29:46,160 --> 00:29:50,240
है। सभी अपने जन्म के आधार पर उस कर्तव्य का पालन करेंगे

425
00:29:50,240 --> 00:29:54,240
एवं अपने जीवन को धर्म युक्त बनाएंगे और मोक्षदायक बनाएंगे। यह

426
00:29:54,240 --> 00:29:58,400
शास्त्रीय विधान है। इस प्रकार से हमें धर्म युक्त होकर ही

427
00:29:58,400 --> 00:30:04,400
जन्म के आधार पर वर्ण को मानना चाहिए।

428
00:30:07,820 --> 00:30:11,820
[संगीत]
