1
00:00:04,160 --> 00:00:08,240
तात्पर्य यह है कि चाहे जिस दृष्टि से देखिए समर्थ

2
00:00:08,240 --> 00:00:12,560
छोटे बड़े सभी विषयों के उद्भट विद्वान और परम

3
00:00:12,560 --> 00:00:16,960
ज्ञाता थे। वे सभी विद्याओं और कलाओं

4
00:00:16,960 --> 00:00:21,200
के पूर्ण थे। कलाओं से परिपूर्ण थे और संसार के इस

5
00:00:21,200 --> 00:00:25,360
प्रकार के पूर्ण पुरुष देवता और अवतार माने जाते हैं। ऐसे ही महापुरुषों

6
00:00:25,360 --> 00:00:29,440
के उपदेश और शिक्षाएं छोटे बड़े

7
00:00:29,440 --> 00:00:34,400
शिक्षित अशिक्षित स्त्री पुरुष और बाल वृद्ध

8
00:00:34,400 --> 00:00:38,400
सबके काम की होती है। श्री समर्थ के इन उपदेशों और

9
00:00:38,400 --> 00:00:42,400
शिक्षाओं आदि का महत्व इसलिए और भी अधिक हो जाता है कि वह

10
00:00:42,400 --> 00:00:47,360
बहुत ही तौली हुई और विचार पूर्ण और उनमें

11
00:00:47,360 --> 00:00:51,840
की अधिकांश बातें स्वयं श्री समर्थ की अनुभव की हुई होती है।

12
00:00:51,840 --> 00:00:56,080
गुरुदेव ने कई अपने प्रवचनों में और

13
00:00:56,080 --> 00:01:00,160
वक्तव्यों में बताया है कि एक आदर्श

14
00:01:00,160 --> 00:01:04,240
जो आचार्य गण होते हैं या मुख्य रूप से अगर शंकराचार्य की बात करें तो

15
00:01:04,240 --> 00:01:08,240
उनका मुख्य कार्य क्या है? आचार्य के रूप में उनका

16
00:01:08,240 --> 00:01:12,480
मुख्य कार्य होता है कि जो काल क्रम से विलुप्त

17
00:01:12,480 --> 00:01:16,480
ज्ञान विज्ञान है उसको जो है अपने तपोबल

18
00:01:16,480 --> 00:01:20,880
के द्वारा पुन उद्भाषित करना और

19
00:01:20,880 --> 00:01:25,120
अ एक उनकी भाषा में तो मुझे नहीं याद है मगर

20
00:01:25,120 --> 00:01:29,360
एक उनका आता है कार्य जो उन्होंने बताया है कि सिस्टमेटिकली

21
00:01:29,360 --> 00:01:33,520
उसको कहते हैं वो सूत्र सूत्र शैली में देना तो

22
00:01:33,520 --> 00:01:37,520
काल क्रम से विलुप्त है उसको पुन्हा ित करना और जो

23
00:01:37,520 --> 00:01:41,520
है उसको जो है सूत्र शैली में देना। एक कार्य और है जो

24
00:01:41,520 --> 00:01:45,680
मुझे अभी विस्मरण हो गया है पर बहुत ही सूत्रात्मक है

25
00:01:45,680 --> 00:01:49,760
तो कुछ वही भाव यहां पर भी आ रहा है श्री समर्थ रामदास जी कि तोली हुई

26
00:01:49,760 --> 00:01:53,840
चीजें जैसे उन्होंने सूत्रात्मक शैली में जैसे

27
00:01:53,840 --> 00:01:58,000
गुरुदेव भगवान ने कितने सरलता से सूत्रात्मक शैली में बता दिया कि

28
00:01:58,000 --> 00:02:02,240
जीव की चाह का जो वास्तविक विषय है उसी का नाम सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर

29
00:02:02,240 --> 00:02:06,640
है। उसी का नाम भगवान ये सूत्रात्मक शैली कहते हैं। सिद्धांत

30
00:02:06,640 --> 00:02:10,880
समझ में आ गया। बहुत लंबी चौड़ी बातें नहीं करनी पड़ी। मेरे

31
00:02:10,880 --> 00:02:15,120
जानकारी में एक व्यक्ति थे जो इस के बहुत प्रबल प्रचारक

32
00:02:15,120 --> 00:02:19,360
थे और वो मेरे को सदैव पेन कॉपी लेकर के

33
00:02:19,360 --> 00:02:23,440
कृष्ण का एक्सपेंशन ये है। कृष्ण का एक्सपेंशन वो है। यह सब

34
00:02:23,440 --> 00:02:27,520
बातें बताने का प्रयास करते थे। एक बार उन्होंने मुझसे

35
00:02:27,520 --> 00:02:31,520
मेरी क्योंकि मैं गुरुदेव को गुरुदेव का अनुसरण

36
00:02:31,520 --> 00:02:35,680
कर रहा था उन दिनों और उनको सुनता था। उनके उनकी चीजें पढ़ता

37
00:02:35,680 --> 00:02:36,180
था। उनकी

38
00:02:36,080 --> 00:02:40,240
बताई हुई चीजों को करने की कोशिश करता था। तो उन्होंने

39
00:02:40,240 --> 00:02:44,720
एक दिन मेरी योग्यता का आकलन करने के लिए मुझसे पूछ लिया

40
00:02:44,720 --> 00:02:48,720
कि बताओ अच्छा तुम धर्म क्या है? एक इस

41
00:02:48,720 --> 00:02:52,880
वाले व्यक्ति ने एक शंकराचार्य के अभी-अभी बने

42
00:02:52,880 --> 00:02:57,440
अल्पज्ञ शिष्य से है ना। अभी तो मुझको तब भी काफी समय हो गया।

43
00:02:57,440 --> 00:02:59,600
मगर

44
00:02:59,600 --> 00:03:03,600
उस समय जब मैं नवीन था उस रास्ते में और अल्पज्ञ था। बहुत

45
00:03:03,600 --> 00:03:07,680
कम सुन पाया था गुरुदेव को। उस समय एक

46
00:03:07,680 --> 00:03:11,760
वरिष्ठ सीनियर व्यक्ति इस का पूछ रहा है। उस समय मुझे

47
00:03:11,760 --> 00:03:15,760
यह भी यह दिशा भी प्राप्त नहीं हुई है कि मुझे अपने जीवन में धर्म के लिए ही

48
00:03:15,760 --> 00:03:20,240
समय बिताना है। यह भी नहीं है। एक गृहस्थ व्यक्ति जिसके

49
00:03:20,240 --> 00:03:24,240
उद्देश्य में यही है कि मकान कैसे बनना है या मकान बनना ना भी हो

50
00:03:24,240 --> 00:03:28,400
तो अपने जीवन को देखना है। दाल भात का इंतजाम कैसे करना है। रोटी

51
00:03:28,400 --> 00:03:32,560
कपड़ा और मकान इन सब में पूरा ध्यान है। उस समय पर

52
00:03:32,560 --> 00:03:37,200
शंकराचार्य के एक अल्पज्ञ एक अभी-अभी नवीन

53
00:03:37,200 --> 00:03:42,000
शिष्य से एक इस्कॉन के सात आठ 10 साल पुराने

54
00:03:42,000 --> 00:03:46,000
अनुगामी ने प्रश्न किया। अच्छा बताओ धर्म क्या है? तो

55
00:03:46,000 --> 00:03:50,080
उस नवीन शिष्य ने वहां पर उसको बता दिया सूत्रात्मक शैली में

56
00:03:50,080 --> 00:03:51,120
कि जीव की

57
00:03:51,120 --> 00:03:55,200
चाह के वास्तविक विषय को परिभाषित कर सकने

58
00:03:55,200 --> 00:03:59,520
वाले वेदाद शास्त्रों द्वारा जीव की चाह के वास्तविक

59
00:03:59,520 --> 00:04:03,600
विषय को प्राप्त कराने के निमित्त बताई गई मर्यादा का नाम

60
00:04:03,600 --> 00:04:07,760
धर्म है। और जो वो स्कॉन का अनुगामी था पेन कॉपी लेके

61
00:04:07,760 --> 00:04:11,920
एक्सपेंशन बता रहा था। उसका मुंह इतना बड़ा खुल गया। ये क्या

62
00:04:11,920 --> 00:04:16,640
था? और फिर वो क्या बोलता है मालूम है? फिर वह बोलता है

63
00:04:16,640 --> 00:04:20,690
इतनी क्रिष्ट वाली नहीं चाहिए सरल वाली परिभाषा चाहिए धर्म की

64
00:04:20,690 --> 00:04:24,960
[हंसी] ठीक है तो ये होती है सूत्रात्मक शैली की

65
00:04:24,960 --> 00:04:29,360
उपयोगिता ऐसे सूत्रात्मक शैली में आप देखिएगा

66
00:04:29,360 --> 00:04:33,440
जिनके यहां पर बिखराव है वहां पर ऐसे आपको सिद्धांत नहीं मिलेंगे

67
00:04:33,440 --> 00:04:37,520
इतने जटिल विषयों में इतने जटिल विषयों में गए नास्तिकता को

68
00:04:37,520 --> 00:04:42,800
कैसे हराया जाए जीव की चाह के वास्तविक के विषय के नाम ही ईश्वर हार गई नास्तिकता

69
00:04:42,800 --> 00:04:46,800
विधर्मी ईश्वर को कैसे बाधित ईश्वर को कैसे हराया जाए ईश्वर वही है जो

70
00:04:46,800 --> 00:04:50,960
कुछ भी कर सकता है लो हार गया विधर्मी नास्तिक विधर्मी ग्रंथों को कैसे

71
00:04:50,960 --> 00:04:55,360
हराया जाए कि ईश्वर के विषय में केवल वही शास्त्र प्रमाणिक

72
00:04:55,360 --> 00:04:59,600
जिन्हें ईश्वर ने भी ना रचा हो अपुषय ग्रंथ

73
00:04:59,600 --> 00:05:03,600
तो ये होता है सूत्रात्मक शैली में ज्ञान विज्ञान को फैलाना

74
00:05:03,600 --> 00:05:06,640
प्रचारित करना तो उसी को यहां पर कहा जा रहा है तौली हुई

75
00:05:06,640 --> 00:05:10,720
विचार एक प्रश्न आता है भाई ये विशुद्ध करने की ये

76
00:05:10,720 --> 00:05:14,720
सूत्रात्मक शैली में देने की आवश्यकता क्या है लोग यह आरोप लगाते हैं।

77
00:05:14,720 --> 00:05:18,880
मुसलमान आरोप लगाता है कि भाई वेद में इतनी घुमा फिरा के बात क्यों

78
00:05:18,880 --> 00:05:22,880
कही गई है? उपनिषदों में इतनी घुमा फिरा के बात क्यों कही गई है? ये सूत्रात्मक

79
00:05:22,880 --> 00:05:27,200
शैली में देने के लिए ही आचार्य गण समय-समय पर आते हैं।

80
00:05:27,200 --> 00:05:31,280
उस समय के वातावरण के अनुसार सूत्रात्मक शैली में देते हैं। पर ये

81
00:05:31,280 --> 00:05:35,600
आवश्यकता क्यों? भगवान ने सीधे सूत्रात्मक शैली में क्यों नहीं दिया? भाई भगवान

82
00:05:35,600 --> 00:05:39,680
ने सूत्रात्मक शैली में ही दिया था। ब्रह्मा जी को तो केवल प्रणव

83
00:05:39,680 --> 00:05:43,920
मिला था। जिसको कहते हैं सूक्ष्म वेद कहते

84
00:05:43,920 --> 00:05:48,080
हैं ना सूक्ष्म वेद क्या है केवल प्रणव उसमें मिला

85
00:05:48,080 --> 00:05:52,160
लो इससे बड़ा सूत्र क्या है केवल प्रणव मगर जैसे जैसे

86
00:05:52,160 --> 00:05:56,240
हमारी प्रज्ञा शक्ति घटती है विकृति आती है हम प्रपंच रूपी

87
00:05:56,240 --> 00:06:00,240
संसार में फंसते चले जाते हैं वैसे वैसे उन सूत्रों को जो उस

88
00:06:00,240 --> 00:06:04,480
समय की काल परिस्थिति के अनुसार दिए गए थे उन सूत्रों को समझ पाना

89
00:06:04,480 --> 00:06:08,640
हमारे लिए कठिन हो कठिन हो जाता है तब जब कठिनता होती

90
00:06:08,640 --> 00:06:12,640
है तो उस देश काल परिस्थिति के अनुसार दोबारा पुनः उसको सूत्रों

91
00:06:12,640 --> 00:06:16,880
में पिरोहित करके दिया जाता है। इसलिए जैसे अपने समय में तुलसीदास

92
00:06:16,880 --> 00:06:20,960
जी की भी आवश्यकता थी उसी प्रकार आज रामानुजाचार्य की गद्दी पर बैठने

93
00:06:20,960 --> 00:06:21,760
वाले आचार्यों

94
00:06:21,760 --> 00:06:25,840
की आवश्यकता है। शंकराचार्य की गद्दी पर बैठने वाले शंकराचार्यों की आवश्यकता

95
00:06:25,840 --> 00:06:30,000
है। आज के समय अनुसार जो है सूत्रात्मक शैली में ज्ञान

96
00:06:30,000 --> 00:06:34,080
विज्ञान की फिर से आवश्यकता है और आने वाले समय में जैसे जैसे और विकृति

97
00:06:34,080 --> 00:06:38,080
आएगी तब भी हमें आचार्यों की आवश्यकता रहेगी सूत्रात्मक शैली

98
00:06:38,080 --> 00:06:42,320
में देने के लिए। वरना तो फिर वेद ही पर्याप्त थे। इसी को सत्यार्थ प्रकाश

99
00:06:42,320 --> 00:06:46,720
लिखने की क्या आवश्यकता है? गो बैक टू द वेदास। भाई वो

100
00:06:46,720 --> 00:06:50,960
ले चलते हैं। हम वेद वेद गो बैक टू द वेदास। वेद

101
00:06:50,960 --> 00:06:54,960
को ही मानेंगे। सूत्रात्मक शैली में जो पुराण में दिया गया पुराण के बाद

102
00:06:54,960 --> 00:06:59,040
जो है जो और अन्य आचार्यों के ग्रंथों में दिया उनको नहीं सुनेंगे। खुद जो है

103
00:06:59,040 --> 00:07:03,360
वेद को गो बैक टू द वेदास। गो बैक टू द वेदास गो बैक टू द वेदास।

104
00:07:03,360 --> 00:07:07,520
चिल्ला चिल्ला कर फिर कहां ले जाएंगे? व्यक्ति को सत्यार्थ प्रकाश

105
00:07:07,520 --> 00:07:11,600
समुल्लास फिर उसमें ले जाएंगे। तो कहने का

106
00:07:11,600 --> 00:07:15,600
मतलब तो यह है ना उनका भी कि भाई सुत्रात्मक शैली में हमने भी दिया है। मगर

107
00:07:15,600 --> 00:07:19,840
वही जब तुलसीदास जी दे देंगे तो वहां कहेंगे देखो देखो ये तो तुलसीदास जी का ग्रंथ पढ़ने

108
00:07:19,840 --> 00:07:24,240
कह रहे हैं। वेद पढ़ने की बात नहीं कह रहे हैं। और

109
00:07:24,240 --> 00:07:28,480
यदि उनके हिसाब से कुछ ये सब प्रश्न आते हैं कि जब सबको वेद ही पढ़ने

110
00:07:28,480 --> 00:07:32,560
हैं तो फिर सत्यार्थ प्रकाश क्यों लिखी जा रही बताओ? जब

111
00:07:32,560 --> 00:07:36,640
सबको वेद ही पढ़ने है तो सत्यार्थ प्रकाश लिखी क्यों जा रही है

112
00:07:36,640 --> 00:07:37,140
क्योंकि

113
00:07:36,960 --> 00:07:41,200
जाहिर सी बात है कि सबको वेद नहीं समझ में आएंगे इसलिए सत्यार्थ प्रकाश

114
00:07:41,200 --> 00:07:45,200
भी है और जब तक लोग किसी किसी की सीमा के बाहर वेद

115
00:07:45,200 --> 00:07:49,440
और अन्य गढ़ ग्रंथ नहीं होंगे तब तक सत्यार्थ प्रकाश जैसे स्वरचित

116
00:07:49,440 --> 00:07:53,760
ग्रंथों की क्या आवश्यकता है मार्केट में तो उन्होंने उनका

117
00:07:53,760 --> 00:07:58,000
सत्यार्थ प्रकाश को लिखना ही इस बात का द्योतक है कि

118
00:07:58,000 --> 00:08:02,240
सबके लिए वेद उपनिषद सब कुछ नहीं है सबका का सब में अधिकार

119
00:08:02,240 --> 00:08:06,240
नहीं है। इस बात का दतक है उनके द्वारा सत्यार्थ प्रकाश की रचना करना।
