1
00:00:06,560 --> 00:00:11,360
देखा जाए जितने भी आपने संभता

2
00:00:11,360 --> 00:00:15,600
आहान जो मुख्य चैनल है आहान का उसका एक संदेश पढ़ा

3
00:00:15,600 --> 00:00:19,680
पीछे डिस्क्रिप्शन जो पड़ा हुआ है चैनल का डिस्क्रिप्शन उसको जब आप करके

4
00:00:19,680 --> 00:00:23,840
आप जाकर के पढ़ेंगे ना तो उसमें एक बात लिखी हुई है जो मैंने काफी समय पहले लिखी

5
00:00:23,840 --> 00:00:27,920
थी 2000 अह शायद 11 या 12 में

6
00:00:27,920 --> 00:00:32,080
लिखी होगी जब मैं अपने सनातन संस्कृति को नष्ट होता हुआ देखता था तो दुख

7
00:00:32,080 --> 00:00:36,160
होता था। मुझे दिशा नहीं मालूम थी। मेरे अंदर था कि मैं रामचंद्र जी

8
00:00:36,160 --> 00:00:40,320
के पथ का पथ की स्थापना अपने समाज में कर पाऊं। पर

9
00:00:40,320 --> 00:00:45,600
मैं दिशाहीन था। मुझे गुरु तत्व प्राप्त नहीं था। गुरु से अनभिज्ञ था।

10
00:00:45,600 --> 00:00:50,000
तो उस समय जो चिंता मेरी थी उस चिंता को ही मैंने इस

11
00:00:50,000 --> 00:00:54,160
पंक्ति में व्यक्त किया था। कि भगत सिंह,

12
00:00:54,160 --> 00:00:59,200
सुखदेव, राजगुरु इत्यादि जो क्रांतिकारी हुए

13
00:00:59,200 --> 00:01:03,200
यह भी स्वार्थी थे।

14
00:01:03,200 --> 00:01:07,680
संसार में जितने भी लोग हैं वो सब स्वार्थी हैं। इस

15
00:01:07,680 --> 00:01:11,680
प्रकार से स्वार्थी है कि सबकी सबका जो भी वो

16
00:01:11,680 --> 00:01:15,680
कुछ कर रहे हैं, कुछ भी कर रहे हैं। उसमें उनका यह स्वार्थ निहित है कि

17
00:01:15,680 --> 00:01:20,080
भैया मुझे इससे खुशी प्राप्त होती है। इसलिए मैं यह कर रहा हूं।

18
00:01:20,080 --> 00:01:24,160
मुझे आनंद मिलता है इसलिए मैं यह करता हूं। तो

19
00:01:24,160 --> 00:01:28,160
वह जो है वह स्वार्थी है। तो सब लोगों की लड़ाई जो है वह मेरी

20
00:01:28,160 --> 00:01:32,160
होती है। मेरी लड़ाई जैसे कि किसी की किसी की लड़ाई कहां

21
00:01:32,160 --> 00:01:36,320
तक सीमित है? किसी की लड़ाई केवल उसके अपने

22
00:01:36,320 --> 00:01:40,400
शरीर तक सीमित है। कि भाई मुझे मेरे शरीर को कुछ ना

23
00:01:40,400 --> 00:01:44,400
हो जाए। किसी की लड़ाई उसके अपने जो परिवार है मेरी माता,

24
00:01:44,400 --> 00:01:48,560
मेरी बहन, मेरी पिता, मेरी पत्नी, मेरी बेटी, मेरा बेटा

25
00:01:48,560 --> 00:01:52,800
यहां तक सीमित है। या फिर किसी की लड़ाई उसके कुल खानदान

26
00:01:52,800 --> 00:01:57,680
तक सीमित है। मेरे चाचा, मेरे ताऊ, मेरे भतीजे,

27
00:01:57,680 --> 00:02:02,960
मेरी ब्या चुकी बहने इस तरीके से

28
00:02:02,960 --> 00:02:07,120
और किसी किसी की लड़ाई फिर जो उसका जो कुटुंब का वृक्ष

29
00:02:07,120 --> 00:02:11,600
है उसके भी बाहर जहां वो रह रहा है। उसका नगर, गली, मोहल्ला

30
00:02:11,600 --> 00:02:16,080
वहां तक सीमित है। फिर किसी की लड़ाई

31
00:02:16,080 --> 00:02:18,240
अ नगर, गली, मोहल्ला

32
00:02:18,240 --> 00:02:22,480
छोड़कर के उसमें भी सीमित है। प्रदेश में अगर

33
00:02:22,480 --> 00:02:26,960
भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो किसी की लड़ाई क्षेत्र क्षेत्रवाद

34
00:02:26,960 --> 00:02:30,960
को छोड़कर के फिर वह देशगत आ जाती है।

35
00:02:30,960 --> 00:02:35,920
मेरा देश भारत वहां तक सीमित है और किसी की लड़ाई

36
00:02:35,920 --> 00:02:40,160
पूरा संसार है। मानवता है, प्राणी मात्र है वहां

37
00:02:40,160 --> 00:02:44,480
तक सीमित है। तो सबकी लड़ाई के पीछे एक वर्ड तो है।

38
00:02:44,480 --> 00:02:49,600
चाहे वह सन्यासी हो, चाहे गस्थ हो, चाहे वह बिल्कुल कोई

39
00:02:49,600 --> 00:02:53,680
क्या कहूं? दुर्व्यसनी हो, स्मैक का सेवन करने

40
00:02:53,680 --> 00:02:57,760
वाला क्यों ना हो, सबकी लड़ाई के पीछे, सबके संघर्ष के पीछे

41
00:02:57,760 --> 00:03:01,520
शब्द एक ही है। मैं

42
00:03:01,520 --> 00:03:05,520
सबके पीछे एक ही शब्द है। मैं। बस

43
00:03:05,520 --> 00:03:09,680
देखना यह है कि आपका यह मैं कितना बड़ा है। भगत

44
00:03:09,680 --> 00:03:14,000
सिंह, सुखदेव, राजगुरु इत्यादि का मैं आपसे बड़ा था।

45
00:03:14,000 --> 00:03:18,400
तो वह आज कहीं ना कहीं स्वतंत्रता संग्राम इत्यादि के अगर

46
00:03:18,400 --> 00:03:23,040
उसमें देखा जाए तो वह आदर्श माने जाते हैं और

47
00:03:23,040 --> 00:03:27,600
उनका मैं देशगत था और शंकराचार्य

48
00:03:27,600 --> 00:03:31,840
रामानुजाचार्य इनका मैं पूरे मानवता

49
00:03:31,840 --> 00:03:33,520
के लिए था। संसार

50
00:03:33,520 --> 00:03:37,760
के लिए था। श्री रामचंद्र जी का जो मैं था पूरे

51
00:03:37,760 --> 00:03:42,560
संसार के लिए था। प्राणी मात्र के लिए था।

52
00:03:42,560 --> 00:03:46,880
तो आपका यह मैं कितना बड़ा है यह देखने वाली बात होती है।

53
00:03:46,880 --> 00:03:51,360
तो हमें देखने में ऐसा लगता है जो वास्तविकता

54
00:03:51,360 --> 00:03:55,360
में देखा जाए तो जो मोक्ष प्राप्ति के लिए कार्य कर रहा है जो धर्म की

55
00:03:55,360 --> 00:03:59,520
रक्षा करने के लिए कार्य कर रहा है या जो सन्यासी हो गया हमारे मन

56
00:03:59,520 --> 00:04:03,520
में उनके प्रति आती है एक भावना कि भैया ये भी अपने सुख के लिए

57
00:04:03,520 --> 00:04:07,760
ही तो कर रहे हैं। बस इनका सुख जो है इसमें ना निहित

58
00:04:07,760 --> 00:04:12,080
हो करके जिन चीजों में जिन निकृष्ट चीजों में हमारा सुख है उसमें

59
00:04:12,080 --> 00:04:16,160
ना निहित हो करके इनका जो सुख है इन विभूतियों का सुख जो

60
00:04:16,160 --> 00:04:20,240
है वो सन्यास में है धर्म रक्षा में है या

61
00:04:20,240 --> 00:04:24,240
देश की रक्षा में है मानवता की रक्षा में है इत्यादि इत्यादि में

62
00:04:24,240 --> 00:04:28,400
है या इनका सुख जो है ईश्वर प्राप्ति में है

63
00:04:28,400 --> 00:04:32,400
भगवान की भक्ति में इनका सुख है तो फिर जब

64
00:04:32,400 --> 00:04:36,480
दोनों का ही मूल उद्देश्य सुख है तो वो धन्य क्यों और

65
00:04:36,480 --> 00:04:40,480
हम जो है निकृष्ट क्यों एक विचार आता है वो महापुरुष क्यों

66
00:04:40,480 --> 00:04:44,800
और हम सामान्य पुरुष क्यों इसलिए क्योंकि उनका

67
00:04:44,800 --> 00:04:48,800
सुख जिसमें निहित है उसमें सुख देख पाना

68
00:04:48,800 --> 00:04:53,520
उसमें सुख की दृष्टि रख पाना अत्यंत कठिन होता है

69
00:04:53,520 --> 00:04:58,080
वो भावना व्याप्त जिसने कर ली वो महापुरुष है

70
00:04:58,080 --> 00:05:02,400
जो यह सामाजिक प्रपंच रूपी संसार से अलग

71
00:05:02,400 --> 00:05:06,720
होकर के अपने सुख को किसी और में देख पाए किसी और में चिंतन

72
00:05:06,720 --> 00:05:10,800
कर पाए इसलिए शास्त्रों में ऐसी बात भी कही गई

73
00:05:10,800 --> 00:05:15,200
है और एक मैंने पता नहीं अभी कहां एक दो दिन पहले ही किसी शायद किसी

74
00:05:15,200 --> 00:05:19,520
आचार्य जी की वाणी सुनी थी मैंने उन्होंने कहा था और शास्त्रों में

75
00:05:19,520 --> 00:05:24,640
स्कंद पुराण में आया है कि यदि आप हर क्षण

76
00:05:24,640 --> 00:05:28,640
यदि आपकी जो जैसे होता है गसिप कहते हैं जिसे आप अपने मित्रों के साथ

77
00:05:28,640 --> 00:05:32,960
बैठकर के गप्पे मार रहे हैं या इधर-उधर की बातें कर रहे हैं। मगर वो इधर-उधर

78
00:05:32,960 --> 00:05:36,960
की बातें किस बारे में है? रामायण के बारे में, भगवत

79
00:05:36,960 --> 00:05:41,440
गीता के बारे में। आपकी जो चर्चा का विषय है वो क्या है?

80
00:05:41,440 --> 00:05:45,600
चाय पीते समय कई लोग चाय पीते होंगे। निषेध है चाय का। मगर एक

81
00:05:45,600 --> 00:05:49,680
हमारे जो आज का जो सामान्य जनजीवन है

82
00:05:49,680 --> 00:05:54,800
उसमें चाय पीना या आजकल की भाषा में कहे तो स्नैक्स

83
00:05:54,800 --> 00:05:59,040
खा रहे हैं पी रहे हैं या जो भी है एक सामान्य समय है मगर वहां पर भी अगर बातें

84
00:05:59,040 --> 00:06:03,040
कर रहे हैं तो धर्म का निर्धारण हो रहा है कि भाई ये धर्म कैसे ब्रह्म

85
00:06:03,040 --> 00:06:04,160
ये कैसे अद्वैत

86
00:06:04,160 --> 00:06:08,640
कैसे द्वैत कैसे भगवान श्री कृष्ण चंद्र की बातें चल रही है या राम श्री रामचंद्र

87
00:06:08,640 --> 00:06:12,800
जी की लीलाओं की बातें चल रही है तो स्कंद पुराण मेंशन है यदि

88
00:06:12,800 --> 00:06:16,960
आपकी चर्चाओं का विषय भगवान भगवान है धर्म है तो आप

89
00:06:16,960 --> 00:06:22,240
कल्याणकारी पथ पर चल रहे हो और इसी बात को

90
00:06:22,240 --> 00:06:26,720
किनहीं महापुरुष की भी मैंने बात सुनी थी जिन्होंने कहा था कि यदि

91
00:06:26,720 --> 00:06:30,720
आप एकांत में बैठकर के भी श्री रामचंद्र इत्यादि का चिंतन कर

92
00:06:30,720 --> 00:06:34,800
रहे हो जहां पर आपको कोई व्यवस्था नहीं है उस समय उन्हीं का

93
00:06:34,800 --> 00:06:38,880
चिंतन करने की यदि आप कर रहे हो तो आप कल्याणकारी

94
00:06:38,880 --> 00:06:43,120
पद पर हो और जब आप ऐसे कल्याणकारी पथ पे हैं तो आप उन

95
00:06:43,120 --> 00:06:47,600
लोगों की दृष्टि से महापुरुष हो जाते हैं, धन्य हो जाते हैं। क्योंकि आप

96
00:06:47,600 --> 00:06:51,920
का बिना किसी विवशता के चिंतन में आज राम है।

97
00:06:51,920 --> 00:06:56,000
आपके बिना किसी व्यवस्था के चिंतन में आज कृष्ण है। धर्म है।

98
00:06:56,000 --> 00:07:00,080
रामो विग्रहवान धर्म। चलो मान लिया कि

99
00:07:00,080 --> 00:07:02,400
आपका

100
00:07:02,400 --> 00:07:06,640
क्या कहते हैं? विषय यह है कि हमको जो है धर्म का

101
00:07:06,640 --> 00:07:10,960
नाश करने वाले इत्यादि जो ये सनातना भाष है स्पॉन है आर्य समाज

102
00:07:10,960 --> 00:07:15,280
है या ये ब्रह्मा कुमारीज है इनको उत्तर देना है आपके

103
00:07:15,280 --> 00:07:19,280
अंदर वो एक जुनून है कि भाई इन्होंने ऐसी गलत बात क्यों कर दी है

104
00:07:19,280 --> 00:07:23,360
जिसकी वजह से हमारे सनातन समाज को हानि हो रही है मानवता को हानि हो

105
00:07:23,360 --> 00:07:27,520
रही है यह बातें ये क्यों निर्गत कर रहे हैं और उसको लेकर के आपको जवाब

106
00:07:27,520 --> 00:07:31,680
देना है वही जवाब देने का चिंतन यद्यपि ऐसा आवश्यक

107
00:07:31,680 --> 00:07:35,840
नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति जवाब दे। मगर यदि उसको लेकर के भी चिंतन चल रहा है।

108
00:07:35,840 --> 00:07:39,920
आपको दिन और रात वही दिख रहा है कि मुझे जो है धर्म स्थापना के लिए जो है

109
00:07:39,920 --> 00:07:43,920
इसका उत्तर निकालना है। कम से कम मैं समाज को ना दे पाऊं तो अपने घर के लोगों

110
00:07:43,920 --> 00:07:48,000
को तो बता पाऊं। यह भ्रांति है। स्त्रियों को यज्ञ पवित नहीं कराना

111
00:07:48,000 --> 00:07:52,240
चाहिए क्योंकि स्त्रियों का जो संरचना है वह अमुक रूप से है।

112
00:07:52,240 --> 00:07:56,240
उनके लिए अमुक धर्म है और पुरुषों के लिए अमुक धर्म है। तो

113
00:07:56,240 --> 00:08:00,400
कितने विधिवत तरीके से सिस्टमैटिकली मैं यह बात इस बात

114
00:08:00,400 --> 00:08:04,480
की सिद्धांत की स्थापना कर पाऊं। इस बारे में आपका चिंतन चल रहा है। तो आप

115
00:08:04,480 --> 00:08:08,800
उन करोड़ों लोगों से कितने अलग हैं। कितने धन्य हैं आप। इतने

116
00:08:08,800 --> 00:08:12,800
स्तर पर भी कितने धन्य है आप जिनके मन में यह चिंतन चल रहा है कि

117
00:08:12,800 --> 00:08:17,200
Netflix पर कौन सी मूवी आई है या आज मॉल में कौन सी मूवी

118
00:08:17,200 --> 00:08:21,280
चल रही है या और बहुत सारे प्रपंच मैकडोनाल्ड्स

119
00:08:21,280 --> 00:08:25,760
पिज़्ज़ा या जो भी जिसमें भी आज सामान्य जन जीवन की आसक्ति

120
00:08:25,760 --> 00:08:30,240
है तो ये सोचने वाली बात है कि एन केन प्रकारन

121
00:08:30,240 --> 00:08:34,320
आपके मन में चिंतन किसका चल रहा है तो उन्हीं को धन्य कहा जाता

122
00:08:34,320 --> 00:08:38,560
है जो इस प्रपंच रूपी संसार में जिनकी आसक्ति कम होती

123
00:08:38,560 --> 00:08:42,640
चली जाती है या रही नहीं जाती उनहीं को धन्य कहा जाता है। वही महापुरुष

124
00:08:42,640 --> 00:08:46,800
हो सकते हैं। तो भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु इनको धन्य क्यों

125
00:08:46,800 --> 00:08:51,120
कहा गया? क्योंकि इनकी आसक्ति किस में हो गई? इनकी आसक्ति

126
00:08:51,120 --> 00:08:55,920
हो गई स्वतंत्रता संग्राम में। जिनको मरने से भय ना लगा।

127
00:08:55,920 --> 00:09:00,080
हम इनकी आसक्ति हो गई ना उसमें। तो जो हम जैसे

128
00:09:00,080 --> 00:09:04,160
निकृष्ट लोग जो अपनी आसक्ति को हटा नहीं

129
00:09:04,160 --> 00:09:08,320
पाते हैं प्रपंच रूपी संसार से वह सामान्य रह जाते हैं और जो हटा

130
00:09:08,320 --> 00:09:12,480
करके और जिनका मैं बड़ा हो जाता है और मैं बड़े होने

131
00:09:12,480 --> 00:09:16,480
के रूप में परिणाम स्वरूप जिनका लक्ष्य बड़ा हो जाता है जिनके चिंतन

132
00:09:16,480 --> 00:09:20,800
का विषय वृहद होता चला जाता है वह महापुरुष और वह धन्य कहलाते

133
00:09:20,800 --> 00:09:25,040
हैं। है ना? तो ऐसे ही थे हमारे श्री

134
00:09:25,040 --> 00:09:31,040
समर्थ रामदास जी।

135
00:09:32,480 --> 00:09:36,480
[संगीत]
