1
00:00:04,480 --> 00:00:04,980
भारतीय

2
00:00:04,960 --> 00:00:08,960
विचारशीलों ने बहुत कुछ सोच विचार कर अंत में

3
00:00:08,960 --> 00:00:13,200
यही निश्चित किया है कि मनुष्य को सत्य के मार्ग

4
00:00:13,200 --> 00:00:17,440
पर लगाए रखने के लिए सदा आस्तिक और सतचरित

5
00:00:17,440 --> 00:00:21,520
रखने के लिए यदि सबसे अधिक किसी चीज को सहायता किसी चीज

6
00:00:21,520 --> 00:00:25,680
से सहायता मिल सकती है तो वह भक्ति से ही मिल सकती है। यही बात

7
00:00:25,680 --> 00:00:29,760
अभी कुछ दिनों पहले मैंने अपने एक वीडियो में भी कही एक लाइव

8
00:00:29,760 --> 00:00:33,840
स्ट्रीम हो रही थी और उसमें कोई इस्लाम को मानने वाला व्यक्ति जो है हमारे

9
00:00:33,840 --> 00:00:38,000
धर्म के बारे में बहुत ही आपत्तिजनक कुछ वक्तव्य वहां पर कमेंट्स में लिख

10
00:00:38,000 --> 00:00:42,080
रहा था। मैं सदैव यही कहता हूं कि अपने जीवन की

11
00:00:42,080 --> 00:00:46,160
सभी विपरीत परिस्थितियों से गुरुदेव भी यही बताते हैं कि

12
00:00:46,160 --> 00:00:50,400
आपको आपके जीवन की सभी विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष करने

13
00:00:50,400 --> 00:00:54,880
में सबसे अधिक जो लाभप्रद है वो है भक्ति।

14
00:00:54,880 --> 00:00:58,880
भक्ति का बल बढ़ाइए और जीवन में सरलता पाइए। विषम

15
00:00:58,880 --> 00:01:02,880
से विषम परिस्थितियों में भी आप चट्टान की तरह सीना तान कर

16
00:01:02,880 --> 00:01:06,960
खड़े रह सकते हैं। तो वह भक्ति के कारण इसलिए भक्ति का

17
00:01:06,960 --> 00:01:11,200
बल बढ़ाएं। तो वही समर्थ रामदास जी भी कह रहे हैं। सच

18
00:01:11,200 --> 00:01:15,360
चरित्र रखने के लिए मैंने इस बारे में बहुत से उदाहरण दिए हैं कि किस तरीके से आपके

19
00:01:15,360 --> 00:01:19,520
जीवन में भक्ति के कारण जो बल आता है उसके कारण आप यह निर्णय

20
00:01:19,520 --> 00:01:20,480
कर पाते हैं।

21
00:01:20,480 --> 00:01:24,480
जैसे मान लीजिए मैं एक छोटा सा उदाहरण दे दूं।

22
00:01:24,480 --> 00:01:30,480
मैंने किसी को कहा कि मैं आपको जो है अमुक

23
00:01:30,640 --> 00:01:34,720
दिनांक को मैं जो है आपसे मैंने धन लिया है। मैं आपको यह

24
00:01:34,720 --> 00:01:39,440
धन आपको वापस कर दूंगा या फिर वापस कर दूंगा। छोड़ दीजिए। मैंने

25
00:01:39,440 --> 00:01:43,600
किसी को कहा कि दान स्वरूप भेंट स्वरूप मैं

26
00:01:43,600 --> 00:01:47,600
आपको जो है धन यह दे दूंगा। इतना धन मेरे पास मैं इतनी दिनांक को आपको

27
00:01:47,600 --> 00:01:51,840
दे दूंगा। या फिर अ

28
00:01:51,840 --> 00:01:56,000
कोई मेरे अनुगत कार्य कर रहा है और उसका वेतन मान है मुझे उसको

29
00:01:56,000 --> 00:02:00,240
देना है। मगर कई बार होता क्या है कि जब वह

30
00:02:00,240 --> 00:02:04,640
राशि वह धन मेरे हाथ में आ गया जिस समय

31
00:02:04,640 --> 00:02:08,880
उस समय मेरे अंदर लालच आ जाता है। अरे आज नहीं किसी और दिन

32
00:02:08,880 --> 00:02:12,880
दे देंगे। जैसे वेतन किसी को देना है और मैं आज ना दे

33
00:02:12,880 --> 00:02:17,040
के चार दिन के बाद दूध हो सकता है कि आज उसको कोई औषधि लेनी हो

34
00:02:17,040 --> 00:02:21,120
अपने घर में किसी के लिए। कोई रोगी हो उसके यहां वो उस चिंता में

35
00:02:21,120 --> 00:02:25,120
बैठा हो और मेरे मन में लालच आ गया कि कुछ दिन और इस पैसे को

36
00:02:25,120 --> 00:02:29,360
देख लूं अपने पास। ₹100 उसको देने हैं। कुछ दिन और बाद दे दूं।

37
00:02:29,360 --> 00:02:33,520
ऐसा लालच आ गया। या फिर मैंने किसी को दान स्वरूप भेंट स्वरूप दे देने

38
00:02:33,520 --> 00:02:35,600
को कहा था कि ठीक है मैं तुम्हें इतनी मदद

39
00:02:35,600 --> 00:02:39,600
कर दूंगा। परंतु जिस समय मेरे पास धन आ गया तो मैंने सोचा

40
00:02:39,600 --> 00:02:43,600
कि अरे क्या फायदा या मैंने कुछ और बहाने ढूंढे उसको ना

41
00:02:43,600 --> 00:02:47,600
देने के। या फिर मैंने किसी से लिया है और मेरे पास आ

42
00:02:47,600 --> 00:02:51,840
गया या फिर मुझे उसके लिए प्रयत्न करना है। कोई कठिन कार्य करना

43
00:02:51,840 --> 00:02:56,080
है तो मेरे पास जब वह आ गया या कठिन कार्य

44
00:02:56,080 --> 00:03:00,320
के लिए तो मैं सोचूं कि क्या करना है? उसके पास जाना है। ये अभी अभी मेरे पास

45
00:03:00,320 --> 00:03:04,640
हरी हरी गड्डी है। वो गायब हो जाएगी। आता है। निश्चित

46
00:03:04,640 --> 00:03:08,720
रूप से आता है विचार। आपके पास हरी हरी गड्डी है।

47
00:03:08,720 --> 00:03:12,800
यह आएगा जब वह गड्डी जा रही होगी ना तो हृदय में उसकी अभाव

48
00:03:12,800 --> 00:03:16,880
की अनुभूति होगी। उस अनुभूति से लड़ने के लिए उस

49
00:03:16,880 --> 00:03:20,960
विचार को परास्त करने के लिए आपके पास एक भावना होनी

50
00:03:20,960 --> 00:03:25,200
चाहिए और वही भावना है हमारे साथ श्री रघुनाथ

51
00:03:25,200 --> 00:03:29,280
तो किस बात की चिंता हमें जब ये विचार आते हैं निर्णय लेने

52
00:03:29,280 --> 00:03:33,440
की ये गड्डी कम करनी है कि नहीं करनी है यह धन इतना

53
00:03:33,440 --> 00:03:37,440
मोटा अमाउंट जाना है कि नहीं जाना है उस समय जब व्यक्ति विचार

54
00:03:37,440 --> 00:03:41,440
करता है नहीं रघुकुल रीत सदा चली आई प्राण जाई

55
00:03:41,440 --> 00:03:45,600
पर वचन ना जाई तो व्यक्ति वहां पर धर्मज्ञ हो पाता है। क्यों हो

56
00:03:45,600 --> 00:03:49,760
पाता है? क्योंकि उसको मालूम है कि दुनिया इधर से उधर हो सकती है। मगर

57
00:03:49,760 --> 00:03:50,800
मेरे पीछे खड़े

58
00:03:50,800 --> 00:03:54,880
कौन है? राम। और ये राम के पीछे खड़े होने

59
00:03:54,880 --> 00:03:58,880
की भावना आपको आती है भक्ति से। यह जो भावना है मेरे पीछे खड़े

60
00:03:58,880 --> 00:04:03,280
हैं राम। यह भावना आपको भक्ति से मिलती है। इसीलिए

61
00:04:03,280 --> 00:04:07,360
कहा जाता है कि भक्ति का बल एकत्र करिए। तभी आप अपने धर्म पर अक होकर के

62
00:04:07,360 --> 00:04:12,000
खड़े रह सकते हैं। आज हमने देखिए बहुत

63
00:04:12,000 --> 00:04:16,560
क्या कहते हैं हमें ऐसे बहुत से वीडियोस प्राप्त हुए हैं

64
00:04:16,560 --> 00:04:20,720
अलंकार समाजियों के जिसमें कि वो गाली बक

65
00:04:20,720 --> 00:04:24,720
रहे हैं सीधे-सीधे और गाली बक रहे हैं और बहुत गंदी गंदी

66
00:04:24,720 --> 00:04:28,880
अश्लील बातें वहां पर कर रहे हैं। हो सकता है कि जो सामने उनके प्रतिद्वंदी

67
00:04:28,880 --> 00:04:32,880
है उनका वो और भी ज्यादा निकृष्ट व्यक्ति हो। मगर गाली- बकना

68
00:04:32,880 --> 00:04:36,880
मर्यादा नहीं है। यदि रावण ने मंदो सीता माता का हरण

69
00:04:36,880 --> 00:04:40,960
किया है तो श्री रामचंद्र जी ने मंदोदरी का हरण करने की

70
00:04:40,960 --> 00:04:45,440
मर्यादा को स्थापित नहीं किया है। आप गाली नहीं बख सकते।

71
00:04:45,440 --> 00:04:49,520
महाभारत के एक श्लोक का उदाहरण ले ले के क्योंकि कहीं भी किसी भी अंश

72
00:04:49,520 --> 00:04:53,680
में गाली को स्वीकृत नहीं किया गया। हर जगह गाली को

73
00:04:53,680 --> 00:04:58,400
निषेध किया गया है। तो ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भी

74
00:04:58,400 --> 00:05:02,560
आप अपने धर्म पर कैसे टिके रह सकते हैं? विपरीत परिस्थितियों

75
00:05:02,560 --> 00:05:05,920
में जब आपके अंदर भक्ति का बल होगा तब

76
00:05:05,920 --> 00:05:10,000
आप अपने प्राणों को भी न्योछावर कर दे कर देने पर भी

77
00:05:10,000 --> 00:05:14,160
धर्म की रक्षा के लिए धर्म के निर्वाह के लिए खड़े हो पाएंगे। तो

78
00:05:14,160 --> 00:05:18,240
इसीलिए कहा जाता है कि आपको कोई सत चरित्र रखने के लिए

79
00:05:18,240 --> 00:05:22,800
सबसे सरल साधन है अच्छा चरित्र रखने के लिए तो वो है भक्ति।

80
00:05:22,800 --> 00:05:27,120
क्यों नहीं रह पाते ये अलंकार वाले? क्योंकि इनके पास भक्ति

81
00:05:27,120 --> 00:05:31,440
नहीं है। क्यों नहीं रह पाते ये इस्लाम

82
00:05:31,440 --> 00:05:36,400
को मानने वाले? क्योंकि इनके पास भक्ति नहीं। भक्ति है ही नहीं।

83
00:05:36,400 --> 00:05:40,560
तो जब भक्ति ही नहीं होगी तो आपके अंदर अपने धर्म के प्रति निष्ठा

84
00:05:40,560 --> 00:05:44,560
कहां से आएगी? और फिर वह सर्वशक्तिमान ईश्वर की जो आवश्यकता है वह

85
00:05:44,560 --> 00:05:48,560
क्यों है? जब तक ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं होगा, मोक्ष परम

86
00:05:48,560 --> 00:05:53,360
स्वतंत्र नहीं होगा तो आपका धर्म शाश्वत नहीं होगा। ये सब क्रम है।

87
00:05:53,360 --> 00:05:57,440
जब तक ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं होगा। उसके साथ

88
00:05:57,440 --> 00:06:01,520
एकत्व के रूप में प्राप्त होने वाला मोक्ष परम स्वतंत्र नहीं होगा।

89
00:06:01,520 --> 00:06:05,680
तो आपका धर्म शाश्वत कहां से होगा? बदलेगा। अरे कर लेता हूं। अरे उसको

90
00:06:05,680 --> 00:06:09,760
चार दिन बाद दे दूंगा यार। 10 दिन और इस गड्डी के दर्शन कर लो।

91
00:06:09,760 --> 00:06:14,160
यह विचार आते हैं तो जो व्यक्ति अपने धर्म से चूकता है ना

92
00:06:14,160 --> 00:06:18,240
उसके पास भक्ति का बल नहीं है। यह मानना चाहिए तो फिर वो कालिया

93
00:06:18,240 --> 00:06:20,960
जिन अथवा परी की साधना में व्यस्त है।

94
00:06:20,960 --> 00:06:26,960
ऐसा फिर मान लेना चाहिए।

95
00:06:28,240 --> 00:06:31,280
अच्छा

96
00:06:31,280 --> 00:06:35,280
भक्ति ही मनुष्य में सबसे अधिक गुणों की स्थापना कर सकती है

97
00:06:35,280 --> 00:06:39,520
और संसार को अनेक प्रकार के अनर्थों से बचा सकती है।

98
00:06:39,520 --> 00:06:43,520
श्री समर्थ की सूक्ष्म दृष्टि से भला इतनी बड़ी बात

99
00:06:43,520 --> 00:06:47,520
कैसे छूट सकती थी। इसलिए उन्होंने धर्म मार्ग में भक्ति को

100
00:06:47,520 --> 00:06:51,680
बहुत बड़ा स्थान दिया है। उन्होंने जनसाधारण के लिए तो भक्ति की व्यवस्था दी

101
00:06:51,680 --> 00:06:56,080
ही है। पर साथ ही ऐसे लोगों के लिए भी भक्ति की आवश्यकता बतलाई

102
00:06:56,080 --> 00:07:00,320
है जो संसार से सब प्रकार से विरक्त होकर

103
00:07:00,320 --> 00:07:04,400
उनके उच्च आदर्श तक पहुंच गए हो। उनकी आज्ञा है कि जो

104
00:07:04,400 --> 00:07:08,640
लोग परमात्मा तक पहुंच गए हो उन्हें उन्हें भी भक्ति यानी तत्वदर्शी

105
00:07:08,640 --> 00:07:12,800
संत सन्यासी विरक्त संत उन्हें भी भक्ति

106
00:07:12,800 --> 00:07:17,040
मार्ग का कभी त्याग नहीं करना चाहिए बल्कि सदा उस पर आरूढ़ रहना

107
00:07:17,040 --> 00:07:21,280
चाहिए। मनुष्य मात्र को सन्मार्ग में लगाए रखने वाले इस

108
00:07:21,280 --> 00:07:25,600
दूसरे साधन का भी श्री समर्थ ने जो विवेचन और प्रतिपादन

109
00:07:25,600 --> 00:07:29,600
किया है वह भी उनकी लोक कल्याणकारिणी बुद्धि का एक अच्छा

110
00:07:29,600 --> 00:07:34,000
नमूना है। संसार के सभी लोग विरक्त त्यागी और वीतराग

111
00:07:34,000 --> 00:07:36,000
नहीं हो सकते। अधिकांश

112
00:07:36,000 --> 00:07:40,400
लोगों को संसार में रहकर गृहस्थ घर गृहस्ती के कामों में ही जीवन बिताना

113
00:07:40,400 --> 00:07:44,400
पड़ेगा। ऐसे अधिक से अधिक साधन करें। ऐसे

114
00:07:44,400 --> 00:07:48,560
लोगों के लिए श्री समर्थ का आदेश है कि वह गृहस्थ आश्रम

115
00:07:48,560 --> 00:07:52,640
में रहकर ही परमार्थ का अधिक से अधिक साधन करें। उन्होंने इस गस्थ

116
00:07:52,640 --> 00:07:56,800
आश्रम का बहुत अधिक महत्व बतलाया है। इन लोक

117
00:07:56,800 --> 00:08:02,800
तथा परलोक के साधन का मुख्य आधार है।

118
00:08:07,320 --> 00:08:11,320
[संगीत]
