1
00:00:00,480 --> 00:00:04,240
हां लाइव कभी

2
00:00:04,240 --> 00:00:10,080
तो लाइव है हम लोग इस समय लाइव है ना हां लाइव है ना

3
00:00:10,080 --> 00:00:16,080
लाइव हो गए जी हां

4
00:00:19,920 --> 00:00:24,000
लाइव है इस समय हम लोग ऑन एयर लिख के आ रहे हैं। ठीक है ठीक है मैं नहीं जानता ये

5
00:00:24,000 --> 00:00:29,440
बता जी जी जी

6
00:00:29,440 --> 00:00:33,440
तो जी बताएं अपना परिचय आप दे

7
00:00:33,440 --> 00:00:37,520
ठीक रहेगा जी जी जी आचार्य जी सबसे पहले आपको बहुत-बहुत साधुवाद आपने

8
00:00:37,520 --> 00:00:42,320
इस चर्चा के लिए समय निकाला आपका भी धन्यवाद जी

9
00:00:42,320 --> 00:00:46,480
और मेरा नाम शिवश नारायण द्विवेदी है। वर्तमान पूरी के जो

10
00:00:46,480 --> 00:00:50,800
शंकराचार्य जी हैं उनका मैं एक छोटा सा अल्पज्ञ

11
00:00:50,800 --> 00:00:55,040
शिष्य मात्र हूं। वही रहते हैं आप पूरी में? नहीं मैं लखनऊ

12
00:00:55,040 --> 00:00:59,920
में रहता हूं। लखनऊ में रहते हैं। अच्छा जी और

13
00:00:59,920 --> 00:01:04,160
अ प्रभु श्री राम के प्रति सदैव

14
00:01:04,160 --> 00:01:09,040
एक समर्पण की भावना रही है बचपन से ही। तो धीरे-धीरे उन्हीं की कृपा से

15
00:01:09,040 --> 00:01:13,040
अ जीवन में ऐसा मोड़ आया जिसके कारण मुझे लगता है

16
00:01:13,040 --> 00:01:15,520
कि गुरु मुझे प्राप्त हुए और उन्हीं के कारण

17
00:01:15,520 --> 00:01:19,680
मैं ईश्वर को जान पाया और बस इसी कारण से मेरा बस यही

18
00:01:19,680 --> 00:01:23,840
परिचय हो सकता है जो मैं जानता हूं अपने बारे में कि मैं पूरी

19
00:01:23,840 --> 00:01:28,080
के शंकराचार्य जी का एक अल्पज्ञ शिष्य हूं और प्रभु श्री राम का एक साधारण भक्त

20
00:01:28,080 --> 00:01:32,320
मात्र हूं। इससे भिन्न मेरा और कोई परिचय नहीं है। ठीक है।

21
00:01:32,320 --> 00:01:37,040
धन्यवाद। जी मेरा नाम आचार्य रघुवत है।

22
00:01:37,040 --> 00:01:41,760
जी हमारे श्रोता जानते हैं। आपके श्रोता और जान ले।

23
00:01:41,760 --> 00:01:46,400
एक ट्रस्ट है श्री वैदिक स्वास्थ पंथा न्यास

24
00:01:46,400 --> 00:01:50,720
उसके मैं संस्थापक का अध्यक्ष हूं।

25
00:01:50,720 --> 00:01:54,880
वेद विज्ञान मंदिर नाम से आश्रम है। वैदिक और आधुनिक

26
00:01:54,880 --> 00:01:59,920
भौतिक विज्ञान शोध संस्थान। जी प्राय

27
00:01:59,920 --> 00:02:04,000
जैसे आपने WhatsApp मैसेज में किया था। किसी ने कोई कहता

28
00:02:04,000 --> 00:02:08,000
है हम ऋषियों का या प्राचीन महापुरुषों का अपमान करते हैं। तो इसके लिए जानकारी

29
00:02:08,000 --> 00:02:12,880
दे दूं। मेरे पीछे जो लगा है। पृष्ठभूमि देखेंगे। सबसे

30
00:02:12,880 --> 00:02:17,440
ऊपर चार ऋषि अग्नि वायु आदि तंगरा है चित्र

31
00:02:17,440 --> 00:02:21,440
उनके नीचे ब्रह्मा जी हैं। एक साइड में मनु जी हैं। एक

32
00:02:21,440 --> 00:02:26,560
साइड में अत मदास जी हैं। एक साइड में महर्षि वाल्मीकि जी हैं।

33
00:02:26,560 --> 00:02:31,120
और उधर वो महर्षि वेदव्यास

34
00:02:31,120 --> 00:02:35,600
जी हैं। महादेव जी भी हैं। विष्णु जी भी हैं।

35
00:02:35,600 --> 00:02:39,760
श्री राम सीता जी है। कृष्ण जी अर्जुन और एक साइड में महर्षि

36
00:02:39,760 --> 00:02:45,600
दयानंद जिस भवन में बैठा हूं उसका नाम है महर्षि

37
00:02:45,600 --> 00:02:49,680
महा वैज्ञानिक ब्रह्मा अनुसंधान भवन। जिस

38
00:02:49,680 --> 00:02:53,920
कक्ष में बैठा हूं इसका नाम है भगवान शिव कक्ष। महान वैज्ञानिक परम

39
00:02:53,920 --> 00:02:57,920
योगी भगवान शिव कक्ष। जो मेला कक्ष है उसका नाम है महान

40
00:02:57,920 --> 00:03:02,080
वैज्ञानिक अमित पराक्रमी भगवान विष्णु कक्ष। सब ऋषि

41
00:03:02,080 --> 00:03:06,160
मुनि के नाम है। हमारे यहां भगवान मनु भवन नाम

42
00:03:06,160 --> 00:03:10,240
से है। [खांसने की आवाज़] लोपा मुद्रा जी के नाम से

43
00:03:10,240 --> 00:03:15,280
है। श्री राम के नाम से है। कृष्ण जी के नाम है।

44
00:03:15,280 --> 00:03:20,080
तो ये हमारा परिचय है। हमारी जो प्रार्थना होती है सत्संग में

45
00:03:20,080 --> 00:03:24,720
उसमें अग्नि वायु से लेकर के ऋषि दयानंद परंपरा

46
00:03:24,720 --> 00:03:29,520
जिसमें आदि शंकराचार्य जी का भी नाम है। सभी

47
00:03:29,520 --> 00:03:33,760
महापुरुषों देवियों, वीरांगना,

48
00:03:33,760 --> 00:03:38,560
वीरों और वैज्ञानिकों का स्मरण हम करते हैं

49
00:03:38,560 --> 00:03:42,880
सत्संग। तो ये परिचय है। महर्षि ब्रह्मा

50
00:03:42,880 --> 00:03:47,360
से ले ऋषि दयानंद परंत जो भी ऋषि हुए हैं

51
00:03:47,360 --> 00:03:52,000
जो भी वेद के लिए समर्पित रहे हैं। मानवता के लिए [गला साफ़ करने की आवाज़] समर्पित

52
00:03:52,000 --> 00:03:56,560
रहे हैं। उसी परंपरा का मैं एक छोटा सा अनुय हूं।

53
00:03:56,560 --> 00:03:59,040
जी

54
00:03:59,040 --> 00:04:03,360
मुझे एक चीज कहनी थी यहां पर आचार्य जी कि शायद कोई

55
00:04:03,360 --> 00:04:07,600
गलत सूचना पहुंची है। मैंने उसमें जो WhatsApp मैसेज आपको भेजा

56
00:04:07,600 --> 00:04:11,600
था उसमें कहीं भी बात नहीं लिखी थी कि आपकी ओर से ऋषियों का अपमान हो रहा

57
00:04:11,600 --> 00:04:15,680
है। किसी का किसी का कमेंट था एक का ज्यादा नहीं थे कमेंट एक का

58
00:04:15,680 --> 00:04:20,000
किसी का हां वो किया होगा। दूसरी बात ये है कि एक

59
00:04:20,000 --> 00:04:24,240
चीज मेरे पास जो WhatsApp में आई थी उसमें कुछ ऐसा लग रहा था। इसीलिए मैं मुझे

60
00:04:24,240 --> 00:04:28,720
लगता है कि मैं चर्चा शुरू होने से पहले उसको बता दूं उस उस बात को

61
00:04:28,720 --> 00:04:30,400
कि जो WhatsApp मैसेज मुझे प्राप्त

62
00:04:30,400 --> 00:04:34,560
हुआ था तो उसमें ये कहा गया था कि भाई आप जगह-जगह जाकर के आर्य

63
00:04:34,560 --> 00:04:38,640
समाज से आर्य समाज मंदिरों में जाकर के इंटरव्यू लेते हैं। तो उसमें ऐसा

64
00:04:38,640 --> 00:04:42,880
प्रतीत हो रहा था कि शायद लिखने वाले को यह नहीं ज्ञात है कि

65
00:04:42,880 --> 00:04:46,960
मैं सिर्फ आर्य समाज मंदिरों में ही नहीं गया। मैं इस मंदिर में भी गया हूं। मैं ब्रह्मा कुमारियों

66
00:04:46,960 --> 00:04:50,960
के यहां भी गया हूं। मैं रामपाल के यहां भी गया हूं। रामपाल वाले पे तो मुकदमा कर रखा

67
00:04:50,960 --> 00:04:55,040
है। हाई कोर्ट में मुकदमा चल रहा है। पेंडिंग है उस समय और यहां लखनऊ स्तर पर बहुत

68
00:04:55,040 --> 00:04:59,040
अच्छी कारवाई हुई है। उसमें लखनऊ में उसका जो आश्रम है वो सीज हो गया है।

69
00:04:59,040 --> 00:05:03,280
तो हां इतनी सारी चीजें चल रही हैं। तो ऐसा नहीं है कि सिर्फ आर्य

70
00:05:03,280 --> 00:05:07,520
समाज को ही लेकर कोई ऐसा पर्सनल कोई टारगेट करना ऐसा कुछ नहीं था।

71
00:05:07,520 --> 00:05:11,840
और मेरा जो पर्सनल वो रहा है कि मैं एक बहुत बड़े

72
00:05:11,840 --> 00:05:16,160
जीवन के दौर में इन सब चीजों से गुजरा हूं कि

73
00:05:16,160 --> 00:05:20,320
हमारे सनातनी भाई बहुत सारे मतों में बटे हुए हैं।

74
00:05:20,320 --> 00:05:24,720
भले ही वह कहने को हिंदू हैं या सनातनी है या वैदिक हैं, आर्य हैं।

75
00:05:24,720 --> 00:05:28,720
मगर उन अगर 10 लोगों को भी हम बिठा दें ना थोड़ी देर के लिए तो उन 10

76
00:05:28,720 --> 00:05:32,880
लोगों के बीच में भी कोई एक बात डाल देंगे तो 10ों का मत भिन्न हो जाएगा। उस

77
00:05:32,880 --> 00:05:36,880
कोई एक बात ऐसी नहीं जिसको लेकर के हम एकत्रित हो सके। तो

78
00:05:36,880 --> 00:05:41,200
मेरा जो ये हिंदुओं से संबंधित जो संस्थाएं हैं, संगठन

79
00:05:41,200 --> 00:05:45,280
हैं उनमें जाकर के चर्चा करने का मुख्य उद्देश्य यह रहता है कि जो मूल

80
00:05:45,280 --> 00:05:45,780
तत्व

81
00:05:45,760 --> 00:05:50,240
है वो बाहर आए और यदि कोई भ्रांति फैल रही है तो वो शोधित हो जाए।

82
00:05:50,240 --> 00:05:54,240
तो ऐसा नहीं होता है कि कहीं कोई पर्सनल अटैक करना है या प्रहार करना है

83
00:05:54,240 --> 00:05:58,320
जिससे कि हम संगठित हो। हमारा समाज जो है बिखरा हुआ है उसके कारण

84
00:05:58,320 --> 00:06:02,400
ही ये होता है। जी ये तो ठीक है। एकता होनी चाहिए।

85
00:06:02,400 --> 00:06:07,760
जी ऋषि दयानंद ने बहुत प्रयास किया था कि वेद के नाम पर

86
00:06:07,760 --> 00:06:11,840
उन्होंने तो पादरियों मौलवियों को भी बुलाया था। वेद के नाम पर

87
00:06:11,840 --> 00:06:16,080
एक होने चाहिए क्योंकि वेद हम तो मानते

88
00:06:16,080 --> 00:06:20,240
हिंदुओं का ग्रंथ है लेकिन जो अब तक मानते हिंदुओं का ग्रंथ है लेकिन वास्तव

89
00:06:20,240 --> 00:06:24,400
में ये ब्रह्मांडी ग्रंथ है ये मैंने अपनी थ्योरी वैदिक

90
00:06:24,400 --> 00:06:28,720
रश्मि सिद्धांत सृष्टि उत्पत्ति का जो मेरा नहीं है ऋषियों का ही है

91
00:06:28,720 --> 00:06:32,720
उसमें सिद्ध वेद ब्रह्मांड का ग्रंथ है केवल हिंदुओं

92
00:06:32,720 --> 00:06:36,720
का नहीं भारत का नहीं धरती का भी नहीं है और वेद मंत्रों से ही सृष्टि बनी

93
00:06:36,720 --> 00:06:40,800
है तो वेद मन वेद साधारण नहीं बहुत

94
00:06:40,800 --> 00:06:46,080
असाधारण है। [गला साफ़ करने की आवाज़] इसी पे एक हो जाने चाहिए।

95
00:06:46,080 --> 00:06:50,160
मनुष्य मात्र का जो धर्म है वेद का ही धर्म है। बस बस

96
00:06:50,160 --> 00:06:54,160
मनुष्य चाहे इस लोक का है चाहे दूसरे लोकों में रहता हो जो मननशील प्राणी है

97
00:06:54,160 --> 00:06:58,160
वो मनुष्य है। और उस सबका धर्म वैदिक

98
00:06:58,160 --> 00:07:00,880
ही है। वेद धर्म का भी ग्रंथ है।

99
00:07:00,880 --> 00:07:06,400
विज्ञान का भी ग्रंथ है। वैसे विज्ञान धर्म दोनों पर्यायवाची है।

100
00:07:06,400 --> 00:07:10,480
जी हां जी। तो अब उस पे चर्चा अवतार

101
00:07:10,480 --> 00:07:14,480
पर अवतार पर शुरू करें। तो अवतार पर मेरा यही

102
00:07:14,480 --> 00:07:18,640
कहना है कि जैसे जब ईश्वर सर्व सामर्थ्यवान है,

103
00:07:18,640 --> 00:07:22,880
अनंत समर्थवान है, सर्वशक्तिमान है, वो

104
00:07:22,880 --> 00:07:27,040
सृष्टि को बनाता है, स्थिति कर रखता है, लय करता

105
00:07:27,040 --> 00:07:31,120
है। तो एक उसको अवतार लेने में ही आर्य समाज

106
00:07:31,120 --> 00:07:35,440
को क्या आपत्ति हो जाती है? क्या आर्य समाज के अनुसार ईश्वर सर्वशक्तिमान

107
00:07:35,440 --> 00:07:39,600
नहीं है? जो यहां पर जो है अवतार लेने वो बाधा बाध्य करता है कि नहीं अवतार

108
00:07:39,600 --> 00:07:43,680
नहीं ले सकता। जैसे कहते हैं ना कि ईश्वर अबाध्य है तो यहां पर ईश्वर

109
00:07:43,680 --> 00:07:47,920
बाधित हो जाता है कि वो अवतार नहीं ले सकता या व्यवहारिक नहीं हो सकता। सगुण साकार स्वरूप

110
00:07:47,920 --> 00:07:52,000
नहीं धारण कर सकता। तो ये मेरा बस है। जी यही आपका

111
00:07:52,000 --> 00:07:56,800
प्रश्न बार-बार रहता है। मैंने लिखा है। जी जी तो पहले

112
00:07:56,800 --> 00:08:02,800
प्रमाण से प्रारंभ ना करके तर्क से प्रारंभ कर रहे हैं आप तो भी ठीक है।

113
00:08:03,520 --> 00:08:08,720
सर्व का अर्थ हमें समझना चाहिए।

114
00:08:08,720 --> 00:08:14,720
मीमासा दर्शन में एक सूत्र है। सर्वाधिकार

115
00:08:15,120 --> 00:08:19,600
जिसके अधिकृत जो कार्य है

116
00:08:19,600 --> 00:08:23,680
वो सारे कार्य जिसके अधिकृत जो कार्य है

117
00:08:23,680 --> 00:08:28,240
जैसे हम यज्ञ करते हैं क्या कहते सर्वम

118
00:08:28,240 --> 00:08:33,120
व पूर्णम स्वाहा सबको समर्पण कर रहे हैं।

119
00:08:33,120 --> 00:08:37,120
इसका अर्थ क्या है? इसका थोड़ी सारा ब्रह्मांड समर्पित कर रहे हैं। वहां

120
00:08:37,120 --> 00:08:41,120
सर्व मतलब मेरे जो अधिकार में मेरे पास जो सामग्री रखी है इसको मैं सारे

121
00:08:41,120 --> 00:08:45,200
समर्पित करता हूं। मीमांसा दर्शन का प्रमाण भी वो दे

122
00:08:45,200 --> 00:08:49,200
दिया है। उसका सा भाष सुना सकता हूं। जरूर समझे तो

123
00:08:49,200 --> 00:08:53,280
तो सर्वशक्तिमान का अर्थ है कि ईश्वर के जो गुण

124
00:08:53,280 --> 00:08:57,600
कर्म स्वभावों के अनुकूल जितने भी कार्य है उन सबको

125
00:08:57,600 --> 00:09:01,600
बिना किसी सहायता के करता है। मनुष्य

126
00:09:01,600 --> 00:09:07,440
कोई भी कार्य बिना ईश्वर की सहायता के नहीं कर सकता। जैसे

127
00:09:07,440 --> 00:09:11,680
हम रोटी बनाए ईश्वर नहीं दूसरों की भी सहायता चाहिए।

128
00:09:11,680 --> 00:09:16,560
मनुष्यों की गेहूं किसी से लेंगे। गेहूं

129
00:09:16,560 --> 00:09:18,800
भी जो किसान है वह मिट्टी से पैदा करेगा।

130
00:09:18,800 --> 00:09:23,040
वहां ईश्वर का सेवक चाहिए। हल चाहिए,

131
00:09:23,040 --> 00:09:27,040
बैल चाहिए, मशीन चाहिए, चक्की चाहिए, पानी चाहिए,

132
00:09:27,040 --> 00:09:31,120
बहुत कुछ चाहिए। ईश्वर केवल उपादान

133
00:09:31,120 --> 00:09:35,200
कारण प्रकृति से बिना किसी की सहायता से सृष्टि

134
00:09:35,200 --> 00:09:40,320
रचता है। कर्ता के लिए करण चाहिए।

135
00:09:40,320 --> 00:09:44,320
लेकिन उसके लिए करण नहीं चाहिए। साधन नहीं चाहिए। हमें साधन

136
00:09:44,320 --> 00:09:48,320
चाहिए। हमें तो इंद्रियां भी चाहिए। हमें शरीर भी चाहिए।

137
00:09:48,320 --> 00:09:52,400
पूरा अंतःकरण चाहिए। उसको नहीं चाहिए। हमें

138
00:09:52,400 --> 00:09:56,400
मशीनरी चाहिए। दूसरे लोगों का सहयोग चाहिए। जानवरों

139
00:09:56,400 --> 00:10:01,280
का सहयोग चाहिए। उसको नहीं चाहिए। अब ये देखें अपन

140
00:10:01,280 --> 00:10:05,680
पहले अपन सृष्टि को समझे।

141
00:10:05,680 --> 00:10:09,920
हमारे जैसे आठ अरब लोग भी धरती पर रहते हैं

142
00:10:09,920 --> 00:10:14,000
और लाखों प्रकार की योनिया है।

143
00:10:14,000 --> 00:10:20,000
400 किलोमीटर धरती का घेरा है और

144
00:10:20,000 --> 00:10:24,160
सूर्य से 13 लाख गुना बड़ा है। ऐसे

145
00:10:24,160 --> 00:10:28,400
10 खरब सूर्य अपनी गैलेक्सी में उन सबके

146
00:10:28,400 --> 00:10:33,360
अलग-अलग पृथ्वियां ग्रह उपग्रह आदि है। उलगा पिंड आदि

147
00:10:33,360 --> 00:10:37,440
ऐसी अरबों गैलेक्सियां हैं। ये बनी किससे?

148
00:10:37,440 --> 00:10:42,000
उस प्रकृति से जो साम्य अवस्था में पदार्थ था

149
00:10:42,000 --> 00:10:47,200
ना एनर्जी थी ना मास था ना चार्ज था ना वेग कुछ भी नहीं था

150
00:10:47,200 --> 00:10:51,440
उससे बनाया उसके पास उपादान कारण

151
00:10:51,440 --> 00:10:56,480
तो था जिससे बनाना है पर कर कारण कुछ नहीं था साधन कुछ नहीं

152
00:10:56,480 --> 00:11:00,480
इतना बड़ा ब्रह्मांड बिना किसी सहायता के बनाया हम

153
00:11:00,480 --> 00:11:04,640
प्रत्येक कार्य सहायता के बिना नहीं कर सकते किसी की सहायता किए वो बिना किसी

154
00:11:04,640 --> 00:11:08,720
सहायता इसलिए वो सर्वशक्ति हुई अगर ऐसा कहने लग जाए कि कुछ भी

155
00:11:08,720 --> 00:11:13,280
करना ये तो मीमांसा दर्शन के विरुद्ध है और फिर तर्क के विरुद्ध में बता

156
00:11:13,280 --> 00:11:17,600
प्रमाण छोड़िए अगर मैं कहूं

157
00:11:17,600 --> 00:11:20,720
कि ईश्वर तैमूर बन के भी आ

158
00:11:20,720 --> 00:11:25,200
सकता है भारत में रक्तपात करने के लिए ईश्वर औरंगजेब

159
00:11:25,200 --> 00:11:29,200
तोड़ने और औरंगजेब बनने बन के मंदिर तोड़ने भी आ सकता

160
00:11:29,200 --> 00:11:34,000
है। ईश्वर बाबर बनके राम जन्मभूमि तोड़ने आ सकता है।

161
00:11:34,000 --> 00:11:38,000
ईश्वर जनरल डायर बन के भारतीयों की हत्या करने आ सकता है? क्या

162
00:11:38,000 --> 00:11:42,080
ईश्वर चोरी भी कर सकता है? क्या ईश्वर किसी से दुष्कर्म भी कर सकता है? तो

163
00:11:42,080 --> 00:11:46,640
आप कहेंगे नहीं कर सकता। और वेद भी कहता है अपापवि

164
00:11:46,640 --> 00:11:50,800
पाप से विध नहीं हो सकता। इसलिए और

165
00:11:50,800 --> 00:11:56,080
देखिए कार्य दो प्रकार के होते हैं सृष्टि में। एक सामान्य और विशेष

166
00:11:56,080 --> 00:12:01,040
सामान्य कार्य क्या होते हैं? जिनमें समान नियम कार्य करते हैं। स्वाभाविक

167
00:12:01,040 --> 00:12:05,120
क्रियाएं कार्य करती है। स्वाभाविक ज्ञान बल कार्य करता है।

168
00:12:05,120 --> 00:12:09,200
श्वेत पाश्वर उपनषद कहता है स्वाभाविक ही जान वाला क्रिया

169
00:12:09,200 --> 00:12:13,280
इतनी बड़ी सृष्टि मैंने बताई उस सृष्टि में एक जैसे नियम काम कर

170
00:12:13,280 --> 00:12:17,520
रहे है। ईश्वर ऐसा नहीं करता ये कैसा होता है? करतुम

171
00:12:17,520 --> 00:12:21,760
अकर्तम अन्यथा करत ये करूं नहीं

172
00:12:21,760 --> 00:12:26,240
करूं उल्टा करूं सीधा करूं ये मेरा अधिकार है। इसलिए मैं करता हूं।

173
00:12:26,240 --> 00:12:30,320
वो ऐसा नहीं कर सकता। उसके सामान्य कार्य है

174
00:12:30,320 --> 00:12:35,040
और सा दर्शन क्या कहता है? त सनात

175
00:12:35,040 --> 00:12:36,080
अधात

176
00:12:36,080 --> 00:12:40,240
मण उस पुरुष का उस परमेश्वर का ब्रह्म

177
00:12:40,240 --> 00:12:44,960
का प्रकृति से सनधान संपर्क से वह अधिष्ठातित्व

178
00:12:44,960 --> 00:12:49,280
सिद्ध होता हुआ अधाता है उसका सृष्टि का क्योंकि पूरी

179
00:12:49,280 --> 00:12:53,520
प्रकृति से उसका नेक है उसके निकटता है वही

180
00:12:53,520 --> 00:12:57,760
कंट्रोल कर रहा है फिर आगे लिखते हैं भगवान कबीर

181
00:12:57,760 --> 00:13:02,000
विशेष कार्य [खांसने की आवाज़] विशेष कार्यों में जीवों

182
00:13:02,000 --> 00:13:07,040
का ही दृष्ट होता है तो जन्म लेना

183
00:13:07,040 --> 00:13:12,320
लौकिक कार्य करना यह विशेष कार्य

184
00:13:12,320 --> 00:13:16,400
इसके लिए करण चाहिए ये जीवो का अधष्ठत्व यहां जीवो का क्षेत्र आ

185
00:13:16,400 --> 00:13:20,400
जाता है मन ब्रह्म का नहीं ब्रह्म का सामान्य

186
00:13:20,400 --> 00:13:24,960
कर्म है और जीव का विशेष कर्म मैं हूं

187
00:13:24,960 --> 00:13:28,960
मैं आपसे बात कर रहा हूं नहीं भी करूं आप मेरे से बात कर

188
00:13:28,960 --> 00:13:33,600
नहीं भी करें उल्टा करें सीधा करें ये हमारे सारे विशेष कार्य हो गए।

189
00:13:33,600 --> 00:13:37,680
जन्म लेना, मरना, दुख होना, रोग होना।

190
00:13:37,680 --> 00:13:41,760
ये नहीं हो सकता। अब शंकराचार्य जी का ब्रह्म

191
00:13:41,760 --> 00:13:45,760
सूत्र पढ़ लीजिए कि अगर उसका

192
00:13:45,760 --> 00:13:49,920
शरीर हो तो क्या भोग आदि से ग्रस्त होगा? इसलिए

193
00:13:49,920 --> 00:13:51,520
वो ब्रह्म निराकार

194
00:13:51,520 --> 00:13:55,920
ही है। शंकराचार्य जी महाराज कह रहे हैं तो विशेष

195
00:13:55,920 --> 00:13:59,920
कार्यों में हमारा अधिकार है। सामान्य कार्यों में जो सब जगह

196
00:13:59,920 --> 00:14:03,920
एक नियम से कार्य कर रहे हैं स्वाभाविक ज्ञान बल क्रिया कर रहे हैं वहां

197
00:14:03,920 --> 00:14:08,320
परमेश्वर का ब्रह्म का कार्य है। तो वो ब्रह्म अपने सारे कार्य कर लेता है।

198
00:14:08,320 --> 00:14:12,640
यही सर्वशक्तिमान है। ठीक है। अब मैं

199
00:14:12,640 --> 00:14:16,800
आपने एक बार में काफी सारी चीजें दे दी है। तो मैं जो जो स्मरण

200
00:14:16,800 --> 00:14:20,800
में आएगा तो मैं उनको बात करूंगा। पहली बात तो यह है कि

201
00:14:20,800 --> 00:14:24,800
यहां पर आपने सर्व का जो अर्थ लिया है वह जो जो हमारे अधिकार में आता है

202
00:14:24,800 --> 00:14:29,680
उसकी उसके लिए है। उसके लिए आपने आधार भी बताया मीमांसा दर्शन का कोई वाक्य

203
00:14:29,680 --> 00:14:33,920
और इसमें पहली इसमें बात ये आ जाती है और अगला

204
00:14:33,920 --> 00:14:38,080
ही आपने बताया कि क्या वो अह जनरल डायर

205
00:14:38,080 --> 00:14:42,080
के रूप में आ सकता है? औरंगजेब के हां मोहम्मद साहब के रूप मोहम्मद के रूप में आ

206
00:14:42,080 --> 00:14:46,080
सकता है? ईसा के रूप में आ सकता है क्या? एक एक वही मैं अब इसमें

207
00:14:46,080 --> 00:14:50,400
क्या है दो बातें आ जाती हैं कि जैसे कि हम जब सर्वशक्तिमान

208
00:14:50,400 --> 00:14:54,400
का अर्थ यह नहीं लेते हैं कि वो सब कुछ कर सकता है। अगले ही पल जब

209
00:14:54,400 --> 00:14:58,480
हम कहते हैं कि वो सर्वज्ञ है। अगले ही पल जब हम कहते हैं कि वो

210
00:14:58,480 --> 00:15:02,480
सर्व्यापक है तो हम सर्वव्यापक कहते समय वो ये नहीं कहते कि वो

211
00:15:02,480 --> 00:15:06,560
नाली में नहीं है। जब नहीं सब में उसमें भी है। मैं

212
00:15:06,560 --> 00:15:10,800
जब बोल रहा हूं तो आप मुझे आप मुझे आप मुझे बोलिए।

213
00:15:10,800 --> 00:15:14,800
जब हम कहते हैं कि सर्व्यापक है तब हम यह नहीं कहते कि यहां पर सर्व्यापक का अर्थ यह

214
00:15:14,800 --> 00:15:18,800
नहीं है कि वो नाली में भी है। हम कहते हैं वो नाली में भी है। हम सर्व्यापक का

215
00:15:18,800 --> 00:15:22,800
अर्थ यह नहीं मान लेते कि वो नाली में नहीं है। है ना? इसी प्रकार

216
00:15:22,800 --> 00:15:26,880
से वह सर्वज्ञ भी है। तो हम सर्वज्ञ का अर्थ लेते हैं कि जो

217
00:15:26,880 --> 00:15:31,280
भी कुछ है वह जानता है। जो जिसकी जो भी कुछ है उसको

218
00:15:31,280 --> 00:15:35,280
उसकी नॉलेज है। ऑल नोइंग है वो सर्वज्ञ है। हम यह नहीं कहते कि

219
00:15:35,280 --> 00:15:39,360
कहीं पर कोई महिला स्नान कर रही है कपड़े उतार करके वो ईश्वर नहीं जानता

220
00:15:39,360 --> 00:15:43,520
है। हम यह नहीं कहते कि कहीं पर कोई दुराचार हो रहा है वो ईश्वर की ईश्वर

221
00:15:43,520 --> 00:15:47,600
नहीं जानता है। या कोई भी ऐसी चीज जिसको जानना और जानने पर चुप

222
00:15:47,600 --> 00:15:51,760
रहना अपराध माना जा सके वो ईश्वर जानता है। हम ये ईश्वर

223
00:15:51,760 --> 00:15:55,760
नहीं जानता है। हम यह नहीं कहते। हम सर्वज्ञ का अर्थ सर्वज्ञ ही लेते हैं।

224
00:15:55,760 --> 00:15:59,760
अब इसी इसी में छुपी हुई ये जो जनरल डायर और औरंगजेब वाली इत्यादि

225
00:15:59,760 --> 00:16:04,160
वाली बातें वो भी आ जाती हैं। अगर हम सामान्यत हमारे सामने कोई दुराचरण

226
00:16:04,160 --> 00:16:08,160
हो रहा है और हम लोग वहां पर शांत बैठे हैं तो वहां पर हम पर भी दोष आता

227
00:16:08,160 --> 00:16:12,240
है। अगर कोई ऐसा दुराचरण जिसमें हमारे पास सामर्थ्य है कि हम उसे रोक सकते

228
00:16:12,240 --> 00:16:16,640
हैं। मगर वो हो रहा है। परंतु जब ईश्वर सर्वज्ञ

229
00:16:16,640 --> 00:16:20,640
है और उसकी उसकी नॉलेज में सब कुछ पाप आचरण वगैरह हो

230
00:16:20,640 --> 00:16:21,600
रहा है तो उस पर यह वाला

231
00:16:21,600 --> 00:16:25,760
दोष जा रहा है शांत रहने वाला मगर हम वहां पर पीछे की तात्विक व्याख्या देख

232
00:16:25,760 --> 00:16:29,760
लेते हैं। तात्विक व्याख्या देख लेते हैं कि ईश्वर कर्म बंधन है। उसने फ्री

233
00:16:29,760 --> 00:16:33,840
विल दी है जीवों को। यहां पर तात्विक व्याख्या के आधार पर हम उसको दोषों

234
00:16:33,840 --> 00:16:37,840
से मुक्त कर लेते हैं। दोष लगते हुए भी उसके निर्दोष होना उसका

235
00:16:37,840 --> 00:16:42,160
सिद्ध कर लेते हैं। इसी इसका मतलब क्या है? कि जब हम तात्विक व्याख्या

236
00:16:42,160 --> 00:16:46,240
देखेंगे तब तो यह सिद्ध हो जाएगा कि दोष जो दिखाई दे रहे हैं वह दोष

237
00:16:46,240 --> 00:16:50,320
वस्तुतः है नहीं। परंतु जब तक हम तात्विक व्याख्या

238
00:16:50,320 --> 00:16:54,400
देखेंगे नहीं तो ऐसी प्रतीति बिल्कुल हो सकती है कि ईश्वर भी

239
00:16:54,400 --> 00:16:58,640
पाप आचरण से लिप्त हो रहा है। तो यही जो प्रतीति है ना

240
00:16:58,640 --> 00:17:02,960
यह जो हम इसको प्रपंच रूपी संसार को देखते हैं

241
00:17:02,960 --> 00:17:07,760
तो ईश्वर इसमें जो है वास्तविकता वस्तुतः देखते हैं तो ईश्वर

242
00:17:07,760 --> 00:17:11,840
अवतरित नहीं होता। उसकी प्रतीति है। परंतु व्यवहारिक सत्य होने के कारण वह

243
00:17:11,840 --> 00:17:15,840
हमारे लिए सत्य हो जाता है। एक है परमार्थ कि वस्तुतः क्या हो रहा है

244
00:17:15,840 --> 00:17:20,160
और एक है व्यवहार। तो जितना मेरे लिए संसार सत्य है, पहाड़ सत्य है।

245
00:17:20,160 --> 00:17:24,400
उसमें ईश्वर का जो आना जाना है, उसकी जो वो परमार्थ

246
00:17:24,400 --> 00:17:28,400
की दृष्टि से प्रतीति मात्र है। परंतु यहां से वो सत्य हो जाता है कि हां ईश्वर

247
00:17:28,400 --> 00:17:32,400
आया। उसने अवतार लिया। अब जो यह जनरल डायर और औरंगजेब वाली

248
00:17:32,400 --> 00:17:36,480
बात है तो इसमें भी वही वाली बात आती है कि जिस प्रकार

249
00:17:36,480 --> 00:17:36,980
से

250
00:17:36,640 --> 00:17:40,720
नाली में होते हुए भी हम उसकी तात्विक व्याख्या लेते हुए हम यह

251
00:17:40,720 --> 00:17:44,960
मान लेते हैं कि ईश्वर पर नाली में होने का दोष नहीं लग रहा है।

252
00:17:44,960 --> 00:17:48,960
बलात्कार का साक्षी होते हुए भी उस पर यह वाला दोष

253
00:17:48,960 --> 00:17:53,040
लगते हुए कि वह समर्थवान है। परंतु वह रोक नहीं रहा है। फिर भी उसकी

254
00:17:53,040 --> 00:17:57,120
तात्विक व्याख्या जान करके हम यह समझ लेते हैं कि ईश्वर पर दोष नहीं लग रहा है।

255
00:17:57,120 --> 00:18:01,440
उसी प्रकार से ईश्वर तो यहां पर सब कुछ करता हुआ प्रतीत प्रतीत

256
00:18:01,440 --> 00:18:05,600
हो सकता है क्योंकि वह अनंत है, अबाध्य है। परंतु जब हम उसकी तात्विक

257
00:18:05,600 --> 00:18:09,760
व्याख्या जान लेंगे कि भैया ईश्वर पर ये दोष क्यों नहीं जा रहे? क्योंकि ईश्वर

258
00:18:09,760 --> 00:18:13,840
के लिए तो ये प्रपंच मात्र है या माया मात्र है या जो भी है उसके

259
00:18:13,840 --> 00:18:18,080
पीछे की कोई एक तात्विक व्याख्या हमारे पास भी है। जिसके कारण ईश्वर

260
00:18:18,080 --> 00:18:22,240
प्रतीत तो हो सकता है सब कुछ करता हुआ जो व्यवहारिक सत्य के अनुसार सत्य

261
00:18:22,240 --> 00:18:26,400
हो जाएगा। परंतु जब हम उसकी तात्विक व्याख्या जानेंगे तो वह सारे दोष

262
00:18:26,400 --> 00:18:30,560
ईश्वर उस उन दोषों से मुक्त हो जाता है। तो जिस प्रकार वही नाली वाली

263
00:18:30,560 --> 00:18:34,720
बात या दुराचरण का साक्षी होने वाली बात से हम ईश्वर

264
00:18:34,720 --> 00:18:38,720
की तात्व व्याख्या के आधार पर उसको दूर हटा लेते हैं। प्रतीति को हम स्वीकार

265
00:18:38,720 --> 00:18:43,200
करते हैं कि हां ऐसी प्रतीति हो सकती है जब तक तात्विक व्याख्या ना हो। और

266
00:18:43,200 --> 00:18:47,440
इसके बाद आपने क्या कहा है? एक तो यह हो गया था कि वह अपने कार्य

267
00:18:47,440 --> 00:18:51,520
कर सकता है। इसलिए वह सर्वशक्तिमान है। अच्छा इसमें एक बात यह भी

268
00:18:51,520 --> 00:18:52,020
आती

269
00:18:51,840 --> 00:18:56,320
है कि ईश्वर को अनंत समर्थवान भी कहा गया है। सर्वशक्तिमान

270
00:18:56,320 --> 00:19:00,560
में हमने इससे कहा कि भाई सर्वज्ञ में आप सब कुछ मान रहे हो। सर्व्यापक

271
00:19:00,560 --> 00:19:04,640
में आप सब कुछ मान रहे हो। परंतु सर्वशक्तिमान में आप सब कुछ नहीं मान रहे। वहां पे आपने एक

272
00:19:04,640 --> 00:19:08,640
अपनी डेफिनेशन दे दी। मगर साथ ही साथ अनंत सामर्थ्यवान भी है। तो यहां

273
00:19:08,640 --> 00:19:12,880
पर तो उसकी सामर्थ्य का अंत हो रहा है ना। अगर कहीं भी जाकर के अंत

274
00:19:12,880 --> 00:19:17,120
होगा जैसे कि अबाध्य तो अगर किसी भी कारण से कारण

275
00:19:17,120 --> 00:19:21,120
लॉजिकली हो सकता है वह बाद की बात है। मगर किसी भी कारण से यदि

276
00:19:21,120 --> 00:19:25,200
बाधा आ रही है किसी भी कारण से यदि आप यह स्वीकार कर रहे हो कि

277
00:19:25,200 --> 00:19:29,440
वो उसकी सामर्थ्य का अंत हो रहा है तो फिर उसको वहां अनंत नहीं कहेंगे ना।

278
00:19:29,440 --> 00:19:33,520
उसको कहेंगे उस नियमों के कारण ईश्वर भी अनंत सामर्थवान नहीं है।

279
00:19:33,520 --> 00:19:37,600
तो फिर यह वाली बात अटक जाएगी। तो ये दो तीन चीजें वो चौथी पांचवी चीज आपने क्या

280
00:19:37,600 --> 00:19:42,720
कही थी मुझे याद नहीं है। कुछ आपने और भी बताया था। जी

281
00:19:42,720 --> 00:19:47,040
तो इसका अर्थ ये हुआ एक तो कि आप

282
00:19:47,040 --> 00:19:51,280
जनरल डायर और भगवान श्री कृष्ण में कोई अंतर नहीं मानते। ये तो प्रपंच

283
00:19:51,280 --> 00:19:55,280
दिख रहा है। नहीं व्यवहारिक सत्य है। व्यवहारिक व्यवहारिक

284
00:19:55,280 --> 00:19:59,600
सत्य है। मानते हैं। व्यवहारिक सत्य है कि जनरल डायर

285
00:19:59,600 --> 00:20:04,240
हां। मोहम्मद ईसा कुरान और वेद

286
00:20:04,240 --> 00:20:06,880
इनमें कोई अंतर नहीं है। नहीं

287
00:20:06,880 --> 00:20:10,960
अंतर है ना? व्यवहारिक व्यवहारिक अंतर है। मैं बता रहा हूं क्या

288
00:20:10,960 --> 00:20:15,520
मैं बता रहा हूं। सुनिए सुनिए पहले तात्विक सत्य तो यही है ना सब प्रपंच है।

289
00:20:15,520 --> 00:20:21,360
तात्विक सत्य है जी मैं और आप बात कर रहे हैं ये भी प्रपंच है।

290
00:20:21,360 --> 00:20:27,360
हां माया है। जी माया है। ये माया क्या चीज है?

291
00:20:27,840 --> 00:20:32,000
इससे थोड़ा सा विषयंतर हो जाएगा। एक एक चीज है। जैसे पहला

292
00:20:32,000 --> 00:20:36,080
माया लाए हो। माया के कारण मैं कब लाया हूं?

293
00:20:36,080 --> 00:20:40,080
मैं कब लाया हूं? बात को सुनिए। मैंने उसको बता दिया इसलिए जिससे जनता यदि

294
00:20:40,080 --> 00:20:44,160
आपके पक्ष को सुन रही है पूरा तो वह यह भी जानती जाए कि मेरे पक्ष तात

295
00:20:44,160 --> 00:20:48,240
मेरे पास तात्विक व्याख्या क्या है। मेरा माया मूल यहां पर कहना

296
00:20:48,240 --> 00:20:52,480
नहीं है। मेरा कहना है कि जिस प्रकार से नाली में होते हुए भी

297
00:20:52,480 --> 00:20:56,560
आप एक तात्विक व्याख्या के आधार पर वो तात्विक व्याख्या आपकी माया नहीं

298
00:20:56,560 --> 00:21:00,560
है। ठीक है? वो क्या है? मैं अभी उस पर नहीं जा रहा। मगर एक तात्विक व्याख्या

299
00:21:00,560 --> 00:21:04,560
है जिसके कारण नाली में होने के बावजूद भी आप ईश्वर को

300
00:21:04,560 --> 00:21:08,640
निर्दोष मान रहे हैं। विशुद्ध मान रहे हैं। एक तात्विक व्याख्या आपके पास है। मेरा

301
00:21:08,640 --> 00:21:12,720
यहां कहने का मतलब ये है। दूसरी एक एक ये पूरा कर लूं ये

302
00:21:12,720 --> 00:21:16,880
वाला। उसी प्रकार से बलात्कार का दृष्टा

303
00:21:16,880 --> 00:21:21,120
ठीक है बिना कपड़ों के नहाती हुई महिला और ना जाने कितना कितना दुष्कर्म

304
00:21:21,120 --> 00:21:22,080
से दुष्कर्म

305
00:21:22,080 --> 00:21:26,240
उसका साक्षी होने वाला होते हुए भी आपके पास एक तात्विक

306
00:21:26,240 --> 00:21:30,320
व्याख्या है इसलिए आप उसको इन दोषों से भी निर्दोष मानते

307
00:21:30,320 --> 00:21:34,320
हैं। इसी प्रकार से मेरे पास भी एक तात्विक व्याख्या होती है

308
00:21:34,320 --> 00:21:38,560
जिसके आधार पर मैं सब जगह सब कुछ करने वाला होते हुए भी

309
00:21:38,560 --> 00:21:42,560
ईश्वर पर कोई दोष ना लगने वाला उसे सिद्ध कर सकता हूं। वो तात्विक व्याख्या

310
00:21:42,560 --> 00:21:46,800
खोलना अभी जरूरी नहीं है। अभी यह है कि ईश्वर यदि अनंत सामर्थवान

311
00:21:46,800 --> 00:21:51,040
है तो फिर उसके सामर्थ्य का अंत क्यों हो रहा है? ईश्वर अगर हम

312
00:21:51,040 --> 00:21:55,040
अगर हम ईश्वर का सर्वज्ञ का ले रहे हैं सब कुछ जानने वाला सर्व्यापक

313
00:21:55,040 --> 00:21:59,200
का ले रहे हैं सब सब जगह होने वाला तो फिर हम सर्वशक्तिमान का मतलब सब कुछ

314
00:21:59,200 --> 00:22:03,360
कर सकने वाला क्यों नहीं ले रहे? जी देखिए [गला साफ़ करने की आवाज़] सर्वज्ञ

315
00:22:03,360 --> 00:22:07,440
का अर्थ सब कुछ जानने वाला। लेकिन यह पूछे

316
00:22:07,440 --> 00:22:11,600
कि ईश्वर अपनी अपनी मृत्यु भी जानता है क्या कि

317
00:22:11,600 --> 00:22:15,680
कब मरेगा तो आप क्या कहेंगे वो तो अलीक पदार्थ

318
00:22:15,680 --> 00:22:19,760
है ना हां तो कहेंगे मृत्यु होती मृत्यु होती

319
00:22:19,760 --> 00:22:23,760
नहीं तो जानेगा कैसे जी अलीक पदार्थ हुआ कि नहीं बाधित हुआ कि नहीं

320
00:22:23,760 --> 00:22:27,760
नहीं बाधित नहीं हुआ मैं बता मैं बता रहा हूं कैसे मैं बता रहा हूं कैसे बाधित

321
00:22:27,760 --> 00:22:32,720
नहीं हुआ बाधित नहीं हुआ और दूसरी बात दूसरी बात

322
00:22:32,720 --> 00:22:36,960
एक परीक्षा हॉल में विद्यार्थी बैठे हैं परीक्षा क्षा देने के लिए।

323
00:22:36,960 --> 00:22:38,960
ठीक है?

324
00:22:38,960 --> 00:22:42,240
एक निरीक्षक है।

325
00:22:42,240 --> 00:22:46,560
कोई कॉपी मांगता है, कॉपी दे देता है। और उसमें एक गाली

326
00:22:46,560 --> 00:22:50,640
लिख रहा है। एक सही उत्तर कर रहा है। गाली

327
00:22:50,640 --> 00:22:54,800
लिखते हुए देख के भी उसको टोकता नहीं है। रोकता नहीं है। वो

328
00:22:54,800 --> 00:22:59,200
कहता है एक और कॉपी चाहिए। एक और ले ले।

329
00:22:59,200 --> 00:23:03,360
रोकता रोकता नहीं है। जब कॉपी उसके पास जाती है तब अंक देता

330
00:23:03,360 --> 00:23:07,360
है। अगर रोकने लग जाए तो जीव की सत्ता

331
00:23:07,360 --> 00:23:12,080
ही समाप्त हो जाए। स्वतंत्रता भंग हो जाए। स्वतंत्र करता और फिर

332
00:23:12,080 --> 00:23:16,720
हर काम में टोकने लग जाए सृष्टि नहीं चलेगी। सृष्टि क्यों बनी?

333
00:23:16,720 --> 00:23:20,800
जीवों के कर्म के आकर्षण से ही प्रकृति में सृष्टि होने की

334
00:23:20,800 --> 00:23:25,440
सृष्टि बनने की प्रवृत्ति हुआ करती है। सा दर्शन कहता है

335
00:23:25,440 --> 00:23:29,520
अगर वो रोकने लग जाएगा तो हमारा क्या अस्तित्व है हम

336
00:23:29,520 --> 00:23:33,840
कुछ है कि नहीं वो तो दंड देगा कर्मण अधिकारस्ते

337
00:23:33,840 --> 00:23:38,080
मा फलेशु कदाच गीता में आप भी पढ़ते हैं हम कर्म करने

338
00:23:38,080 --> 00:23:42,080
में हमारा अधिकार है फल देने में उसका अधिकार नहीं उसको रोकने का अधिकार नहीं है

339
00:23:42,080 --> 00:23:46,320
उसको तो दंड देने का अधिकार है और रोकता भी है जब भी कोई

340
00:23:46,320 --> 00:23:50,480
व्यक्ति गलत काम करता है उसके मन में भय लज्जा शंका होती है

341
00:23:50,480 --> 00:23:54,000
कि ऐसा मत कर फिर भी करता वो

342
00:23:54,000 --> 00:24:00,000
भी दंड मिलता है। तीन सत्ता अनादि ईश्वर जी प्रकट

343
00:24:00,000 --> 00:24:04,400
अब उसकी अनंत सामर्थ तो जब भंग होगी जब अवतार लेना पड़ेगा उसको

344
00:24:04,400 --> 00:24:08,560
रावण को मारने के लिए अवतार लेना पड़ेगा।

345
00:24:08,560 --> 00:24:12,720
इतने बड़े सूर्य को बनाया सारे ब्रह्मांड को बनाया तारों को बनाया। रावण को

346
00:24:12,720 --> 00:24:16,800
पैदा भी किया तब नहीं शरीर धारण किया और मारने के लिए शरीर धारण करेगा। वो तो

347
00:24:16,800 --> 00:24:21,040
उसके अंदर ही बैठा था। यस आत्मा आत्म यत्मा

348
00:24:21,040 --> 00:24:25,200
शरीर क्या वो रावण के शरीर में नहीं बैठा था क्या वही नहीं मार

349
00:24:25,200 --> 00:24:30,880
सकता था उसके लिए तो नाटक करना पड़ेगा और नाटक करने से क्या होगा

350
00:24:30,880 --> 00:24:34,880
कि वो विकार विकारी हो जाएगा एक

351
00:24:34,880 --> 00:24:37,680
जगह

352
00:24:37,680 --> 00:24:41,840
एक जगह अलग स्पेशल क्रिया करेगा तो वो

353
00:24:41,840 --> 00:24:46,000
विकारी हो जाएगा और ब्रह्म सूत्र पढ़िए ईश्वर

354
00:24:46,000 --> 00:24:50,400
विकारी नहीं हो सकता वो निर्व निर्विकार है।

355
00:24:50,400 --> 00:24:55,040
इसलिए अवतार लेना अवतार लेने की जरूरत पड़ेगी।

356
00:24:55,040 --> 00:24:59,040
पृथ्वी को बनाने में, पृथ्वी को चलाने में, सूर्य को बनाने में, सूर्य को

357
00:24:59,040 --> 00:25:03,200
घुमाने में, सारी गैलेक्सी घुमाने में और हमें सबको जन्म

358
00:25:03,200 --> 00:25:07,440
देने में, हमें सबको मारने में, बड़े-बड़े भूकंप लाने में,

359
00:25:07,440 --> 00:25:11,440
बड़े-बड़े तारों में विस्फोट करने में, उसको हाथ पैरों

360
00:25:11,440 --> 00:25:15,760
की जरूरत नहीं पड़ती। और वहां हाथ पैरों की जरूरत पड़ेगी। उपन कहता है अपाणि

361
00:25:15,760 --> 00:25:19,040
पादो जवनो गहिता

362
00:25:19,040 --> 00:25:23,280
वहां बिना हाथ के ग्रहण करता है बिना पैरों के चलता है

363
00:25:23,280 --> 00:25:27,280
और वहां रावण को मारने के लिए शरीर लेना पड़ेगा क्यों

364
00:25:27,280 --> 00:25:31,360
भाई वैसे नहीं मरता रावण भूकंप इतने आते

365
00:25:31,360 --> 00:25:35,440
हैं और फिर कहते हैं कि जन्म लेता

366
00:25:35,440 --> 00:25:39,440
क्यों अधर्म के नाश के लिए आज से बड़ा अधर्म कब हुआ आज

367
00:25:39,440 --> 00:25:43,440
जितना धरती पर अधर्म हो रहा है मंदिर तोड़े श्री

368
00:25:43,440 --> 00:25:47,600
राम के श्री राम जी पकड़ प्रकट नहीं हुए थोड़ा सा

369
00:25:47,600 --> 00:25:51,920
थोड़ा सा थोड़ा सा इसमें एक बात एक निवेदन करना चाहूंगा आप अपनी एक्सप्लेनेशन

370
00:25:51,920 --> 00:25:52,800
जारी करिए

371
00:25:52,800 --> 00:25:57,280
है क्या कि कुछ चीजें ऐसी होती हैं जिसमें हम

372
00:25:57,280 --> 00:26:01,360
अगर उनको संक्षिप्त में भी कह देंगे तो काम चल जाएगा मगर जब विस्तार से कहते हैं

373
00:26:01,360 --> 00:26:06,320
तो जैसे उसमें क्या होता है कि भावनाएं

374
00:26:06,320 --> 00:26:10,320
लोगों की होती हैं उससे जुड़ी हुई होती हैं। अब क्या होगा कि भले ही

375
00:26:10,320 --> 00:26:14,800
मेरे पास उसका बहुत अच्छा उत्तर है उन भावनात्मक प्रश्नों का तो मुझे

376
00:26:14,800 --> 00:26:18,960
एक एक्स्ट्रा अलग से समय निकालना पड़ेगा जरूर मतलब

377
00:26:18,960 --> 00:26:23,120
जरूरत पड़नी करनी पड़ेगी कि आपकी उन भावनात्मक बातों का भी उत्तर दूं जबकि

378
00:26:23,120 --> 00:26:27,200
उनका बहुत ज्यादा महत्व नहीं है तो आप वो जो एक्सप्लेनेशन है कि ऐसा भी हो

379
00:26:27,200 --> 00:26:31,520
रहा है बहुत ज्यादा वो जो आपका क्योंकि ये मैंने देखा है जो आर्य

380
00:26:31,520 --> 00:26:35,600
समाज का पक्ष होता है वहां से कहा जाता है कि यहां ये लूटा गया सोमनाथ में ये हुआ

381
00:26:35,600 --> 00:26:39,680
वो हुआ इस तरह से बहुत सारे उदाहरण देते आप एक भी दे देंगे चल जाएगा

382
00:26:39,680 --> 00:26:43,760
जो मतलब सिद्धांतिक प्रश्न है वो कर दीजिए जी मतलब कब आता है अधर्म

383
00:26:43,760 --> 00:26:48,000
के नाश के लिए आता है परमात्मा आना पड़ता है जी जी जी तो

384
00:26:48,000 --> 00:26:52,000
सतयुग में अधर्म नहीं था सबसे ज्यादा अवतार सतयुग में हुए समझ समझ गया वो

385
00:26:52,000 --> 00:26:56,160
एक से ही हो गया जी तो फिर ये बताइए और सारे अवतार भारत में हुए

386
00:26:56,160 --> 00:27:00,160
यही पापी था क्या भारत ही असल में किसी मनुष्य को

387
00:27:00,160 --> 00:27:04,480
मारने के लिए ईश्वर को अवतार लेना पड़े [खांसने की आवाज़] तो

388
00:27:04,480 --> 00:27:08,320
ईश्वर की गरिमा नहीं बढ़ती उसका ना सामर्थ उसका

389
00:27:08,320 --> 00:27:12,400
साम सिद्ध नहीं होता। सिद्ध उसका सामर्थ्य होता है जो मरा। रावण का

390
00:27:12,400 --> 00:27:16,480
सामर्थ सिद्ध हो रहा है कि उसे मारने के लिए सारी सृष्टि

391
00:27:16,480 --> 00:27:20,720
के स्वामी को आना पड़ा। कंस का सामर्थ सिद्ध

392
00:27:20,720 --> 00:27:24,960
हो रहा है कि उसको मारने के लिए सारी सृष्टि को बनाने

393
00:27:24,960 --> 00:27:29,120
वाले को आना पड़ा। ये उनका सामर्थ्य बढ़ा रहे हम। परमात्मा को नहीं बढ़ा रहे।

394
00:27:29,120 --> 00:27:31,600
जी।

395
00:27:31,600 --> 00:27:35,760
ठीक है। मैं बोलता हूं। आपने एक बात तो पहले ही कही है कि

396
00:27:35,760 --> 00:27:39,760
क्या वो अपना अंत बता सकता है? है ना? तो यहां पर उसकी सामर्थ्य का

397
00:27:39,760 --> 00:27:44,160
अंत हो रहा है। तो इसमें क्या होता है? ये बहुत सारी ऐसी लॉजिकल फैलेसी

398
00:27:44,160 --> 00:27:48,240
होती हैं जो ईश्वर का खंडन करने के लिए नास्तिक इस्तेमाल करते हैं। अब जैसे इसके

399
00:27:48,240 --> 00:27:52,240
उत्तर में मैं अगर यह कह दूं कि मैं इसका जो उत्तर है उस

400
00:27:52,240 --> 00:27:56,400
व्यक्ति को समझा सकता हूं। इस इस प्रश्न का उत्तर वही व्यक्ति समझ

401
00:27:56,400 --> 00:28:01,120
सकता है जो अपना प्रश्न मुझे इस प्रकार से बोले कि मैं समझ ना पाऊं।

402
00:28:01,120 --> 00:28:05,440
इस प्रश्न का उत्तर मैं उस व्यक्ति को समझा सकता हूं जो अपना प्रश्न मुझसे

403
00:28:05,440 --> 00:28:09,680
इस प्रकार से बोले कि मैं समझ ना पाऊं। तो यह क्या है? एक लॉजिकल फैलेसी

404
00:28:09,680 --> 00:28:13,920
मैंने भी एक जवाब में एक दे दी। इसके अलावा और भी चीजें हैं। दूसरी

405
00:28:13,920 --> 00:28:18,000
बात अगर हम व्यवहार और परमार्थ मानते हैं। अगर इस जगत

406
00:28:18,000 --> 00:28:22,240
को प्रपंच मात्र मान लेते हैं तो ईश्वर की बाधा कहीं भी हो ही नहीं सकती।

407
00:28:22,240 --> 00:28:23,360
कैसे नहीं हो सकती?

408
00:28:23,360 --> 00:28:27,680
कि ईश्वर जब यहां पर राम रूप में आएंगे कृष्ण रूप में तो आएंगे तो वो घोषित

409
00:28:27,680 --> 00:28:31,840
कर सकते हैं। इस व्यवहारिक लीला को मैं कब समाप्त करूंगा बता सकते हैं अपना अंत

410
00:28:31,840 --> 00:28:35,840
व्यवहार में परमार्थ में नहीं जो पारमार्थिक सत्ता है मुझसे नहीं कह रहे

411
00:28:35,840 --> 00:28:39,840
कि ईश्वर अवतार लेता है। व्यवहारिक सत्ता के अनुसार हम कह रहे हैं कि ईश्वर अवतार लेता है।

412
00:28:39,840 --> 00:28:43,920
परमार्थ में ईश्वर अवतार नहीं लेता है। वास्तविकता में जो पारमार्थिक सत्य

413
00:28:43,920 --> 00:28:48,000
है उसके अनुसार नहीं। जैसे व्यवहार में हमने कोई हमारी माता नहीं है।

414
00:28:48,000 --> 00:28:52,400
कोई हमारी बहन नहीं है। कोई हमारा पिता नहीं है। सब जीवात्मा मात्र हैं। यह पारमार्थिक

415
00:28:52,400 --> 00:28:56,560
सत्य है। परंतु व्यवहार में हमने स्वीकार किया है कि ये हमारी माता जी हैं। हमारी बहन

416
00:28:56,560 --> 00:29:00,960
जी हैं। और उसके अनुसार हम बिहेव भी कर रहे हैं। जैसे कि पृथ्वी वैज्ञान

417
00:29:00,960 --> 00:29:04,960
के आधार पर गोल मानी जाती है। ठीक है? परंतु हमारे व्यवहार

418
00:29:04,960 --> 00:29:08,960
में पृथ्वी चपटी आती है। तो हम पृथ्वी के साथ चपटा व्यवहार करते हैं यह

419
00:29:08,960 --> 00:29:13,040
जानते हुए कि कि पृथ्वी गोल है। थ्योरिकली वो गोल है। तो एक तो यह

420
00:29:13,040 --> 00:29:17,040
वाली बात हो गई कि ईश्वर किस प्रकार से कर सकता है। दूसरी बात अलीक पदार्थ कैसे है?

421
00:29:17,040 --> 00:29:21,120
अलीक पदार्थ ऐसे है कि जैसे हमने कहा ईश्वर क्या ईश्वर

422
00:29:21,120 --> 00:29:25,360
अपना अंत बता सकता है। अब मैं उसकी बात कर रहा हूं परमार्थ पारमार्थिक सत्ता की।

423
00:29:25,360 --> 00:29:29,360
तो ईश्व क्या ईश्वर यह बता सकता है कि उसका अंत कहां पर है? जब हमने खुद ही

424
00:29:29,360 --> 00:29:33,520
यह स्वीकार किया है कि ईश्वर वो है जिसका कोई

425
00:29:33,520 --> 00:29:38,000
अंत नहीं है तो फिर ईश्वर पर अंत बताने का हम वो करके

426
00:29:38,000 --> 00:29:38,500
अपने

427
00:29:38,400 --> 00:29:42,400
प्रश्न में जो ईश्वर शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं उसका खंडन खुद ही कर

428
00:29:42,400 --> 00:29:46,560
रहे हैं। मतलब हमने पहले कुछ बोला और बाद में खुद ही उस चीज को काट

429
00:29:46,560 --> 00:29:50,560
दिया। एक ऐसा वाक्य बोला जिसमें पहले जो भी हमने बोला

430
00:29:50,560 --> 00:29:54,640
है बाद में उसका खुद ही खंडन कर दिया। तो हमारे वाक्य का निचोड़ यह आया

431
00:29:54,640 --> 00:29:59,360
जब हम यह वाक्य बोल रहे हैं क्या ईश्वर अपना अंत बता सकता है तो हम अप्रत्यक्ष

432
00:29:59,360 --> 00:30:03,440
रूप से कह रहे हैं क्या ईश्वर ऐसा कुछ बता सकता है कि कुछ भी

433
00:30:03,440 --> 00:30:07,760
पता ना लगे क्योंकि उस प्रश्न का जब हम निचोड़ निकालेंगे

434
00:30:07,760 --> 00:30:11,840
ईश्वर भी आ गया और हमने उस पर अंत भी थोप दिया ईश्वर भी आ गया और

435
00:30:11,840 --> 00:30:16,160
उस पर हमने अंत भी थोप दिया यानी अंत थोपने से हमने उसे ईश्वर नहीं माना

436
00:30:16,160 --> 00:30:20,320
और ईश्वर कहने से हमने उसे ईश्वर मान लिया यानी हमने एक एक

437
00:30:20,320 --> 00:30:24,560
पंक्ति में दो बातें बोल दी और पहली वाली बात से दूसरी वाली बात काट दी।

438
00:30:24,560 --> 00:30:28,560
दूसरी वाली बात से पहली वाली बात काट दी। तो हम अंतत गत्वा अपने

439
00:30:28,560 --> 00:30:32,720
इस पंक्ति में यह पूछ रहे हैं कि क्या ईश्वर

440
00:30:32,720 --> 00:30:37,040
हमें कुछ ऐसा बता सकता है कि कुछ हमें कुछ भी ना सुनाई दे। तो बिल्कुल

441
00:30:37,040 --> 00:30:41,200
ईश्वर ऐसा कर सकता है। ईश्वर मौन रहेगा हमें कुछ भी सुनाई नहीं देगा। हां

442
00:30:41,200 --> 00:30:45,280
बस हो रही है ना? हो गया। एक मिनट मैं आगे पूरा कर दूं। अच्छा

443
00:30:45,280 --> 00:30:50,320
फिर आगे आपने कहा तात्विक व्याख्या आपने बताई वो जो वो जो

444
00:30:50,320 --> 00:30:53,440
क्या कहते हैं इस्लाम वाले भी यही वो रखते

445
00:30:53,440 --> 00:30:57,520
हैं कि भाई ईश्वर हस्तक्षेप क्यों नहीं करता तो वो एक अलग तात्विक व्याख्या हो जाएगी। मैंने

446
00:30:57,520 --> 00:31:01,680
तो पहले ही स्वीकार किया कि नाली में रहते हुए भी हम ईश्वर

447
00:31:01,680 --> 00:31:05,760
को विशुद्ध मानते हैं। सबसे पवित्र मानते हैं। नाली में भी है तब भी

448
00:31:05,760 --> 00:31:10,080
हर कण में है तब भी हम पवित्र मानते हैं ईश्वर को। तो हमारे

449
00:31:10,080 --> 00:31:14,320
पास क्योंकि उसके लिए एक तात्विक व्याख्या है। परंतु जब तक वो तात्विक

450
00:31:14,320 --> 00:31:18,640
व्याख्या हम बता नहीं रहे हैं तब तक ऐसी प्रतीति हो सकती है कि ईश्वर

451
00:31:18,640 --> 00:31:22,800
एक अशुद्धि अशुद्धि अशुद्धि से जुड़ा

452
00:31:22,800 --> 00:31:26,960
जुड़ा हुआ है। ठीक है? उसी प्रकार से मैंने कहा है कि प्रतीति में

453
00:31:26,960 --> 00:31:31,040
यह जो व्यवहारिक प्रतीति है हमारी इसमें ईश्वर का अवतार हो सकता है। उसी आधार पर

454
00:31:31,040 --> 00:31:35,040
वो सब कुछ करने वाला हमें प्रतीत हो सकता है। इसीलिए भगवान ने कहा

455
00:31:35,040 --> 00:31:39,280
मैं अजन्मा अविनाशी होते हुए भी अपनी योग माया को अधीन करके

456
00:31:39,280 --> 00:31:43,360
प्रकट होता हूं। इसीलिए वेद में भी इस तरह के वाक्य आए हैं कि यद्यपि वे

457
00:31:43,360 --> 00:31:47,840
अजन्मा है। अविनाशी है। फिर भी वो नाना रूपों में माया के द्वारा उत्पन्न होता है।

458
00:31:47,840 --> 00:31:52,400
कौन सा वेद मंत्र है? मैं मैं अभी बता दूंगा। मैं वो जो है ना

459
00:31:52,400 --> 00:31:56,400
जो प्रमाण वाली बात है उसको एक सेकंड सेशन में

460
00:31:56,400 --> 00:32:00,800
चालू रखना चाहता हूं। इसीलिए मैंने आपके किसी भी प्रमाण में प्रमाण नहीं दिया।

461
00:32:00,800 --> 00:32:05,440
जी। अच्छा अब विकारी वाली बात भी मैंने आपको बता दी नाली वाली बात और

462
00:32:05,440 --> 00:32:08,640
दुराचरण का दृष्टा होने पर भी मौन रहने वाली बात। यानी

463
00:32:08,640 --> 00:32:12,720
कि जब तक मैं आपसे आपकी तात्विक व्याख्या नहीं पूछूंगा तब तक

464
00:32:12,720 --> 00:32:16,800
मुझे ईश्वर ऐसा प्रतीत हो सकता है कि हां ईश्वर

465
00:32:16,800 --> 00:32:20,960
विकार से जुड़ा हुआ है। यह प्रतीति हो सकती है। तो वही वाली

466
00:32:20,960 --> 00:32:24,960
बात है कि समस्त कर्मों को करते हुए भी गीता के अनुसार तू मुझे

467
00:32:24,960 --> 00:32:29,040
अकर्ता जान। क्यों अकर्ता? क्योंकि ना ही मैं उनसे वो जो कर्म हो

468
00:32:29,040 --> 00:32:33,120
रहे हैं उनसे मिलने वाले फल में मेरी आसक्ति है। और वास्तविकता तो यह है

469
00:32:33,120 --> 00:32:37,200
कि कहीं कुछ हो ही नहीं रहा है। 4 24 भगवत गीता। तो मेरे पास एक

470
00:32:37,200 --> 00:32:41,280
तात्विक व्याख्या होती है जिसके कारण वह जो प्रतीति हो रही है भगवान की वो

471
00:32:41,280 --> 00:32:45,360
जो प्रतीति हो रही है भगवान की समस्त उसमें होने वाली उस तात्विक व्याख्या के आधार

472
00:32:45,360 --> 00:32:49,680
पर उस जो दोष लग सकता है भगवान पर वो हम उससे निर्दोष

473
00:32:49,680 --> 00:32:53,760
उसे सिद्ध कर लेते हैं। तीसरी बात अब अब आई

474
00:32:53,760 --> 00:32:57,840
सबसे वो वाली बात कि कंस को मारने क्यों नहीं आए और सारे अवतार जो है भारत में ही क्यों

475
00:32:57,840 --> 00:33:01,840
हुए? तो मैं यह नहीं कह रहा हूं कि ईश्वर बाध्य है कंस को

476
00:33:01,840 --> 00:33:05,920
मारने के लिए अवतार लेने के लिए। ईश्वर बाध्य नहीं है। जैसे

477
00:33:05,920 --> 00:33:10,240
कि ईश्वर ने ईश्वर ने वेदों में अलंकार क्यों दिए?

478
00:33:10,240 --> 00:33:14,480
वेदों में जगह-जगह पर अलंकार माना गया है। तो ईश्वर ने अलंकार

479
00:33:14,480 --> 00:33:18,560
क्यों दिए? बाध्य नहीं है। मगर हम यह कहेंगे कि ईश्वर

480
00:33:18,560 --> 00:33:22,960
जो है ऐसे बहुत से प्रश्न उठ जाएंगे कि उसने पेड़ों का कलर

481
00:33:22,960 --> 00:33:23,680
हरा ही क्यों

482
00:33:23,680 --> 00:33:28,080
चुना? या उसने अमुक व्यवस्था क्यों की? तो ईश्वर अवतार

483
00:33:28,080 --> 00:33:32,080
के लिए बाध्य नहीं है और अवतार का जो मुख्य प्रयोजन है वो किसी को मारना ही

484
00:33:32,080 --> 00:33:36,480
नहीं है। ऐसी लीला में आना इस तरह का रूप धारण करना

485
00:33:36,480 --> 00:33:40,640
कि उस रूप के प्रति इस प्रपंच रूपी अविद्या रूपी संसार में जुड़ा

486
00:33:40,640 --> 00:33:44,640
हुआ व्यक्ति उस रूप के प्रति आकृष्ट हो सके। उसमें अपनी निष्ठा ला

487
00:33:44,640 --> 00:33:48,800
सके और उसमें ध्यान केंद्रित करके अपना भगवत भजन करते हुए मुक्त

488
00:33:48,800 --> 00:33:52,880
हो सके। भक्ति कर सके भगवान की। एक एक और है। तो

489
00:33:52,880 --> 00:33:57,280
अब यह वाली बात है कि अह जो है उसको अवतार लेने की आवश्यकता क्या है?

490
00:33:57,280 --> 00:34:01,360
तो इसमें बहुत सी बातें फिर आ जाएंगी कि उसको जो है बहुत सी ऐसी चीजें उसने की

491
00:34:01,360 --> 00:34:05,680
है कि उसको अपना ज्ञान विज्ञान मंत्र के रूप में देने की आवश्यकता ही क्या है? उसमें भी अलंकार

492
00:34:05,680 --> 00:34:09,680
देने की आवश्यकता ही क्या है? बहुत सी चीजें उसमें आती जाएंगी और अंत में

493
00:34:09,680 --> 00:34:13,920
अंत में यह आएगा कि ईश्वर की अपनी आवश्यकता तो कुछ है ही नहीं। वह तो सच्चिदानंद

494
00:34:13,920 --> 00:34:17,920
है। उसको तो कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है। तो यह वाली बात

495
00:34:17,920 --> 00:34:22,000
है। और अगली बात है सारे अवतार भारत में ही के हुए। तो यह प्रश्न

496
00:34:22,000 --> 00:34:26,080
तो आर्य समाज से भी किया जा सकता है कि वेद मंत्र केवल

497
00:34:26,080 --> 00:34:30,480
भारत के ऋषियों को ही प्राप्त क्यों हुए? ये भी हो सकता है। दूसरी बात

498
00:34:30,480 --> 00:34:34,880
सारे अवतार भारत में नहीं हुए हैं। जहां पर भगवान ने अवतार

499
00:34:34,880 --> 00:34:38,720
लिए हैं, उसे भारत कहा गया। इसको थोड़ा सा देखने का नजरिया जहां पर

500
00:34:38,720 --> 00:34:42,800
भगवान के अवतार 1 मिनट सारे 1 मिनट सारे अवतार

501
00:34:42,800 --> 00:34:47,040
भारत में नहीं हुए हैं। जहां पर भगवान के अवतार होते हैं उसे भारत कहा गया।

502
00:34:47,040 --> 00:34:51,040
एक चीज और है आपकी वो रह गई जो आपने कहा कि पाप आचरण होता

503
00:34:51,040 --> 00:34:55,120
है तो वो आता है। पाप जब बढ़ जाता है तो आता है। यह प्रश्न आर्य समाज से भी किया

504
00:34:55,120 --> 00:34:59,120
जा सकता है कि वो कर्मों का फल देता है। वो कर्मों का फल देता

505
00:34:59,120 --> 00:35:03,520
है। तो अब और कब कौन से कर्म का इंतजार है? दुनिया मैं नहीं कह रहा

506
00:35:03,520 --> 00:35:07,920
मैं नहीं कह रहा है नहीं नहीं आपने ये कहा ना

507
00:35:07,920 --> 00:35:11,920
कि ईश्वर जो है आप कहते हैं आप कहते

508
00:35:11,920 --> 00:35:15,920
हैं यदा परित्राण साधु नाम विनाश तो ये तो ये तो ये वाली

509
00:35:15,920 --> 00:35:20,640
बात आप कहते हैं ना कि ईश्वर कर्मों का फल देता है हां कर्म

510
00:35:20,640 --> 00:35:24,640
उसके लिए शरीर धारण की जरूरत नहीं एक एक मिनट एक मिनट वो

511
00:35:24,640 --> 00:35:28,880
बात ये आ रही है कि अगर कर्मों का फल ईश्वर देता है तो कब देगा भाई निर्भय

512
00:35:28,880 --> 00:35:32,880
हत्याकांड हो रहा है लोग लूट रहे हैं भूखे मर रहे फाइल हो रही है।

513
00:35:32,880 --> 00:35:37,280
दुनिया में ना जाने आप ही के चैनल पर मैंने देखा कितनी सारी वामपंथी साजिशें

514
00:35:37,280 --> 00:35:41,520
षड्यंत्र हो रहे हैं। और कब देगा ईश्वर कर्मों का फल? बस अब तो

515
00:35:41,520 --> 00:35:45,840
ये हां ठीक है जी बोलिए आपके एक बात सबके

516
00:35:45,840 --> 00:35:50,480
मूल में आ रही है कि जगत प्रपंच है। पारमार्थिक तात्विक

517
00:35:50,480 --> 00:35:54,800
ये शब्द जाल में मतल उलझाइए। सुनिए

518
00:35:54,800 --> 00:35:59,520
जगत प्रपंच नहीं है। जगत वास्तविकता है। ब्रह्म

519
00:35:59,520 --> 00:36:03,760
सूत्र का दूसरा ही सूत्र क्या कहता है?

520
00:36:03,760 --> 00:36:07,840
अ पहला सूत्र है अथात ब्रह्म जिज्ञासा। दूसरा

521
00:36:07,840 --> 00:36:12,080
कहता है जन्मादेशत प्रपंच का जन्म नहीं होता।

522
00:36:12,080 --> 00:36:16,320
अच्छा जगत प्रपंच क्या है? प्रपंच मतलब है नहीं पर दिख

523
00:36:16,320 --> 00:36:20,480
रहा है। किसको दिख रहा है? देखने वाला कौन है?

524
00:36:20,480 --> 00:36:24,640
मैं आपको मैं एक एक छोटी सी चीज बस छोटा सा पहले

525
00:36:24,640 --> 00:36:28,640
सुनिए। जी बोलिए बोलिए बोलिए। पूरा लेक्चर दिया। बोलिए।

526
00:36:28,640 --> 00:36:32,800
जगत प्रपंच नहीं है। जगत वास्तविक है। जगत मिथ्या

527
00:36:32,800 --> 00:36:37,360
नहीं है। ईश्वर जी प्रकृति चीन अनादि है। सुपर्ण

528
00:36:37,360 --> 00:36:41,600
सजा सखाया समान वृक्षम परिजाते

529
00:36:41,600 --> 00:36:45,600
ये वेद मंत्र कहता है इस प्रकृति

530
00:36:45,600 --> 00:36:49,760
रूपी वृक्ष पर दो पक्षी है एक फल खाता

531
00:36:49,760 --> 00:36:53,840
है देखता है खाता है उछल कूद करता

532
00:36:53,840 --> 00:36:58,000
है एक साक्षी भाव से [गला साफ़ करने की आवाज़] साक्षी भाव वाला है

533
00:36:58,000 --> 00:37:03,440
जीव कर्म फल करता है और भोगता है वैसे

534
00:37:03,440 --> 00:37:08,160
योग दर्शन कहता है व्यास भाष में महर्षि व्यास जी ने

535
00:37:08,160 --> 00:37:09,920
लिखा है कि उस ईश्वर

536
00:37:09,920 --> 00:37:14,720
का अपना कोई प्रयोजन नहीं सृष्टि बनाने में। सब जीवो के

537
00:37:14,720 --> 00:37:18,720
अनुग्रह के लिए सब जीवो को के उपकार के लिए

538
00:37:18,720 --> 00:37:23,040
वो सृष्टि रचना करता है। जब जीव ही नहीं है वो भी प्रपंच

539
00:37:23,040 --> 00:37:27,040
है। वो भी ब्रह्म रूप है। तो सृष्टि क्यों बनाई? किसी भी ऋषि

540
00:37:27,040 --> 00:37:31,600
ने इसको प्रपंच नहीं कहा है और सरपंच हो भी नहीं सकता।

541
00:37:31,600 --> 00:37:35,920
प्रपंच हो भी नहीं सकता है। अगर एक ही ब्रह्म मानेंगे

542
00:37:35,920 --> 00:37:40,080
बाकी सब प्रपंच मानेंगे तो प्रपंच देखने वाला भी ब्रह्म अज्ञानी सिद्ध

543
00:37:40,080 --> 00:37:44,240
हो जाएगा। एक ही ब्रह्म है। दूसरा है नहीं। ये

544
00:37:44,240 --> 00:37:48,240
कहां लिखा है? कोई भी वेद मंत्र ही नहीं सिद्ध कर सकता। किसी वेद मंत्र

545
00:37:48,240 --> 00:37:52,640
में किसी उपनिषद में नहीं है। नाली नाली वाली बात कर रहे हैं।

546
00:37:52,640 --> 00:37:56,720
आप पहले कीचड़ होता क्या है? कीचड़ कुछ मॉलिक्यूल्स

547
00:37:56,720 --> 00:38:01,120
का समूह है। मॉलिक्यूल बहुत बड़ा होता है। मॉलिक्यूल

548
00:38:01,120 --> 00:38:05,600
एटम से बना होता है। एटम इलेक्ट्रॉन प्रोटोन न्यूट्रॉन से बना होता है।

549
00:38:05,600 --> 00:38:09,600
और ये क्वारक आदि से बने होते हैं। और ये सूक्ष्म रश्मियों

550
00:38:09,600 --> 00:38:14,400
से बने होते हैं। बीच में बहुत सारा गैप होता है। आकाश होता है।

551
00:38:14,400 --> 00:38:18,640
दुर्गंध जैसे मीठा है। शक्कर है। शक्कर

552
00:38:18,640 --> 00:38:22,640
के अंदर जो मॉलिक्यूल है वो मीठे हैं। लेकिन मॉलिक्यूल

553
00:38:22,640 --> 00:38:25,120
से जाएंगे तो मिठास खत्म हो जाएगी। उनके

554
00:38:25,120 --> 00:38:29,120
अंदर जो आकाश आकाश ना मीठा है ना खट्टा है फिर भी वो प्रभावित नहीं

555
00:38:29,120 --> 00:38:33,440
होता। लेकिन परमात्मा तो आकाश से भी सूक्ष्म है।

556
00:38:33,440 --> 00:38:37,600
मैं हम यहां बैठे हैं कमरे में। कमरे में दुर्गंध हुई। कमरे में आकाश भी है। क्या

557
00:38:37,600 --> 00:38:41,600
आकाश भी दुर्गंधित होगा? ईश्वर तो छोड़िए। ईश्वर तो बहुत आगे की चीज है।

558
00:38:41,600 --> 00:38:45,840
आकाश पर भी सुगंध दुर्गंध का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। आकाश का ये

559
00:38:45,840 --> 00:38:49,920
गुण ही नहीं है तो ईश्वर तो बहुत सूक्ष्म है तो ईश्वर उस

560
00:38:49,920 --> 00:38:54,000
गंदगी से प्रभावित कैसे हो जाएगा ईश्वर तो उनके अंदर है ऐसे

561
00:38:54,000 --> 00:38:58,480
ही जब आकाश प्रभावित नहीं होता हमारे अंदर

562
00:38:58,480 --> 00:39:02,480
मेरे शरीर के अंदर मैं आत्मा हूं मैं

563
00:39:02,480 --> 00:39:06,480
मेरे अंदर दो प्रकार की क्रियाएं हो रही है एक ऐच्छिक क्रियाएं

564
00:39:06,480 --> 00:39:10,560
एक अनैच्छिक क्रियाएं हृदय का धड़कना भोजन

565
00:39:10,560 --> 00:39:14,880
का पचना रक्त संचरण होना ये सारे जो फिजियोलॉजी

566
00:39:14,880 --> 00:39:18,960
हो रही है, फिजियोलॉजी काम है, ये ईश्वर का है। ईश्वर के

567
00:39:18,960 --> 00:39:23,040
बिना नहीं हो सकता। सारे फोर्स अंदर काम कर रहे हैं। लेकिन मैं

568
00:39:23,040 --> 00:39:27,200
भोजन करता हूं। ये मेरा काम है। करूं नहीं करूं।

569
00:39:27,200 --> 00:39:31,280
लेकिन भोजन करने के बाद पेट में जाने के बाद मेरा काम समाप्त हुआ।

570
00:39:31,280 --> 00:39:35,600
फिर परमात्मा संभाल लेता है। तो इच्छा

571
00:39:35,600 --> 00:39:39,600
जो काम इच्छा से हो रहे हैं। मैं करूं या नहीं करूं? स्वतंत्रता से करता हूं।

572
00:39:39,600 --> 00:39:40,320
इसका मैं फल

573
00:39:40,320 --> 00:39:44,560
भोग रहा हूं। लेकिन अंदर जो काम हो रहे हैं वह ईश्वर के कारण है। तो ईश्वर

574
00:39:44,560 --> 00:39:48,640
उससे प्रभावित इसलिए है क्योंकि वो ईश्वर का क्षेत्र नहीं है।

575
00:39:48,640 --> 00:39:54,400
ईश्वर तो मुझे मेरे कामों का दंड आप कह रहे हो कि कब दंड देगा?

576
00:39:54,400 --> 00:39:58,560
हमारे हजारों लाखों जन्मों के संस्कार आते हैं। उसके

577
00:39:58,560 --> 00:40:02,400
सामने हमारा जीवन कुछ भी नहीं है।

578
00:40:02,400 --> 00:40:06,720
जन अगर इसी जन्म में संस्कार समाप्त हो जाए तो आगे सृष्टि बंद हो जाएगी।

579
00:40:06,720 --> 00:40:10,800
कर्मों का फल देने के लिए सृष्टि रचता है। इसलिए ये मत कहिए कि

580
00:40:10,800 --> 00:40:15,280
कब कब जन्म कब दंड देगा

581
00:40:15,280 --> 00:40:19,360
जब उसके यहां से चला जाएगा यहां भी दंड मिल सकता है आगे भी मिल

582
00:40:19,360 --> 00:40:23,600
सकता है। इसलिए इसके लिए हम उत्तरदाई

583
00:40:23,600 --> 00:40:27,680
है। तो सारा प्रपंच तात्विक पारमार्थ ये व्याख्या

584
00:40:27,680 --> 00:40:31,760
ही गलत है। ये वेद विरुद्ध है। ये दर्शन विरुद्ध है। ब्रह्म सूत्र के विरुद्ध भी

585
00:40:31,760 --> 00:40:35,840
है। अलग-अलग मत करिए के तात्विक है व्यवहारिक

586
00:40:35,840 --> 00:40:39,920
है। ठीक है हो गया और दूसरी बात आप कहते हैं कि अवतार

587
00:40:39,920 --> 00:40:44,080
लेके वो लीला करता बताता नहीं है। अच्छा लीला

588
00:40:44,080 --> 00:40:48,240
करने वाला झूठा होता है कि सत्यवादी होता है? मैं लीला

589
00:40:48,240 --> 00:40:52,320
करूं लीला करने वाला मिथ्यावादी हुआ कि सत्यवादी

590
00:40:52,320 --> 00:40:55,360
हुआ? मैं हूं नहीं वो दिखाऊं। और

591
00:40:55,360 --> 00:40:59,440
जो हूं जो हूं उसे दिखाऊं नहीं। ये मिथ्याचरण हुआ।

592
00:40:59,440 --> 00:41:03,600
तो ब्रह्म मिथ्याचरण नहीं कर सकता।

593
00:41:03,600 --> 00:41:07,600
जहां भी प्रमाण में बाद में आएंगे कहीं भी वेद में नहीं

594
00:41:07,600 --> 00:41:11,760
है कि ईश्वर अवतार लेता है। ले सकने की बात

595
00:41:11,760 --> 00:41:15,840
है। अनंत ईश्वर का अवतार लेने का वो सोचेगा भी

596
00:41:15,840 --> 00:41:19,840
तो भी उसका अनंत सामर्थ्य भंग हो जाएगा कि

597
00:41:19,840 --> 00:41:24,000
सारी सृष्टि में बसते हुए भी सारी सृष्टि में रहते हुए भी रावण को नहीं मार

598
00:41:24,000 --> 00:41:28,160
सकता या किसी को खुश नहीं कर सकता। खुश क्या करेगा? इतनी सृष्टि इतनी

599
00:41:28,160 --> 00:41:32,320
बड़ी सृष्टि में मैं चाहूं कि भगवान मुझे दर्शन दे दे उसके लिए मुझे

600
00:41:32,320 --> 00:41:36,320
प्रसन्न करने के लिए आ जाए प्रकट हो जाए यही ईश्वर का काम रह

601
00:41:36,320 --> 00:41:41,120
गया क्या ईश्वर का काम जन्मादेश है तो शंकर आचार्य शंकर जी का भाष्य पढ़िए

602
00:41:41,120 --> 00:41:45,120
जगत की जन्म स्थिति प्रलय करना उसका काम है ना कि किसी को खुश करना

603
00:41:45,120 --> 00:41:49,280
है किसी को नाराज करना ये उसका काम नहीं है उसका काम है

604
00:41:49,280 --> 00:41:53,360
जगत की सृष्टि करना संचालन करना

605
00:41:53,360 --> 00:41:57,680
समय पर प्रलय करना सबके कर्मों के अनुसार फल देना

606
00:41:57,680 --> 00:42:01,680
ये ईश्वर का कार्य है और ये वो करता है बिना किसी की सहायता

607
00:42:01,680 --> 00:42:05,680
करता यही उसका अनंत सामर्थ्य है बताइए

608
00:42:05,680 --> 00:42:09,760
सारे ब्रह्मांड को बनाने वाला सारे ब्रह्मांड को चलाने वाला उसका सा ये कम

609
00:42:09,760 --> 00:42:10,480
सामर्थ्य माना

610
00:42:10,480 --> 00:42:14,960
जाएगा क्या यही तो अनंत है हो गया हां हो गया आपका

611
00:42:14,960 --> 00:42:19,600
ठीक है पहली बात तो ये है कि तात्विक पारमार्थिक इनको अलग-अलग मत करिए

612
00:42:19,600 --> 00:42:25,200
मैं अभी आ रहा हूं मैं अभी आ रहा हूं तात्विक पारमार्थिक पे ही आ रहा हूं जी

613
00:42:25,200 --> 00:42:29,200
पहली बात तो ये है कि जैसे मैंने कहा था कि

614
00:42:29,200 --> 00:42:33,360
आपके पास एक तात्विक व्याख्या होती है। मैं इसको एक्सप्लेन करूंगा पूरा।

615
00:42:33,360 --> 00:42:37,440
जैसे मैंने कहा था कि आपके पास एक तात्विक व्याख्या होती है। जब ईश्वर पर दोष की

616
00:42:37,440 --> 00:42:41,600
प्रतीति होती है तो आप उसको बचा लेते हो। उसी प्रकार से एक तात्विक व्याख्या

617
00:42:41,600 --> 00:42:45,680
होती है। जब ईश्वर पर दोष की प्रतीति होगी तो हम उसे सिद्ध करेंगे निर्दोष।

618
00:42:45,680 --> 00:42:49,840
मगर अब आपने जैसे उसको खोला ही है कि भाई माया

619
00:42:49,840 --> 00:42:53,840
कहा गया है कि नहीं कहा गया माया है कि नहीं है तो इसमें यह वाली बात

620
00:42:53,840 --> 00:42:57,920
आती है इसमें मैं इसको अलग से रख लेता हूं माया वाले मामले को खोलने के

621
00:42:57,920 --> 00:43:01,920
लिए पर इसमें सबसे पहली बात एक ये आती है कि आपने कहा कि वो बहुत कुछ कर

622
00:43:01,920 --> 00:43:06,000
रहा है बहुत कुछ कर रहा है पर एक चीज करने ना करने के लिए बाधित है तो

623
00:43:06,000 --> 00:43:10,240
यहां अंत हो रहा है ना चाहे एक मेरे को पूरा कर ले दीजिए चाहे

624
00:43:10,240 --> 00:43:14,480
एक सुई के बराबर की कमी रह रही है मगर अंत हो रहा है उसकी

625
00:43:14,480 --> 00:43:18,560
सामर्थ्य पहली बात। दूसरी बात यह आती है आपने उसको

626
00:43:18,560 --> 00:43:22,640
बचाने के लिए कहा कि नाली मॉलिक्यूल वगैरह उस आपने उसकी डेफिनेशन

627
00:43:22,640 --> 00:43:25,520
दी कि उसमें क्या होता है। मगर जैसे

628
00:43:25,520 --> 00:43:29,600
कि हम यह कहते हैं कि अगर हम मल से स्पर्श हो जाएगा

629
00:43:29,600 --> 00:43:33,840
तो हम अपवित्र मानेंगे खुद को और अपने को शुद्ध शुद्ध करेंगे। यानी

630
00:43:33,840 --> 00:43:37,840
कि मल से स्पर्श होने पर हमारा मल में होने पर मल से लिपट जाने

631
00:43:37,840 --> 00:43:42,080
पर हम अपवित्र मान रहे हैं अपने आप को। मगर वहीं पर मल से

632
00:43:42,080 --> 00:43:46,160
एकीभूत होते हुए भी भगवान को हम उस मल से उत्पन्न होने वाली

633
00:43:46,160 --> 00:43:50,160
विकृति से विकृत नहीं मान रहे। ठीक है? इसी प्रकार से

634
00:43:50,160 --> 00:43:54,160
आपने और भी चीजें कही कि वो गंदगी प्रभावित इसी प्रकार से एक चीज और है शुरू

635
00:43:54,160 --> 00:43:58,560
में ही आपने कहा कि जो जो

636
00:43:58,560 --> 00:44:02,560
मनुष्य जो भी काम करता है हम जो भी काम कार्य करते हैं उसमें अंतत गतवा

637
00:44:02,560 --> 00:44:06,640
हमें ईश्वर की सहायता लेनी पड़ती है। ईश्वर को किसी की सहायता यानी कि

638
00:44:06,640 --> 00:44:10,960
दुनिया में जो भी कार्य हो रहे हैं अच्छे बुरे उसमें मनुष्य

639
00:44:10,960 --> 00:44:15,200
ईश्वर की सहायता ले रहा है। यह प्रतीति हो गई। ठीक है? अब इसमें

640
00:44:15,200 --> 00:44:19,200
बात यह आती है कि जिस जिस पदार्थ के साथ एक

641
00:44:19,200 --> 00:44:23,280
ही भूत होने पर स्पर्श हो जाने पर मनुष्य को दोष लग

642
00:44:23,280 --> 00:44:27,360
रहा है उसी पदार्थ के साथ एक ही भूत हो जाने पर ईश्वर को आप दोष नहीं दे

643
00:44:27,360 --> 00:44:31,440
रहे। एक एक दो पॉइंट ले लीजिए। एक एक पॉइंट हां ये हो गया। एक मिनट नहीं आपने

644
00:44:31,440 --> 00:44:36,320
चार पांच पॉइंट दिए ना। शुरू से सारे पॉइंट आप लेके चल रहे हो इसलिए लेने के लिए ले चल।

645
00:44:36,320 --> 00:44:40,320
तो दूसरी बात जिस कार्य को करने

646
00:44:40,320 --> 00:44:40,820
में

647
00:44:40,560 --> 00:44:44,640
निमित्त होने के बाद मनुष्य पर दोष लग रहा है उसी

648
00:44:44,640 --> 00:44:48,720
कार्य में निमित्त होने के बावजूद भी ईश्वर को आप दोष मुक्त मान रहे

649
00:44:48,720 --> 00:44:54,480
हैं। ठीक है? तो एक ये वाली बात हो गई। दूसरी बात आपने कहा कि

650
00:44:54,480 --> 00:44:58,480
वो आएगा आने से जो है हां ये वाली

651
00:44:58,480 --> 00:45:02,560
बात आप नहीं कह सकते कि वो कब देगा कर्मों का फल आज नहीं

652
00:45:02,560 --> 00:45:06,640
मिलेगा तो कल मिल जाएगा। तो यह बात तो हम भी कह सकते हैं। यह बात आप भी नहीं

653
00:45:06,640 --> 00:45:10,880
कह सकते कि अवतार कब लेगा। वो उसकी इच्छा पर आधारित है। उसको कब उचित

654
00:45:10,880 --> 00:45:14,960
लग रहा है? कब क्या कौन सा अवतार लेना है। तो हम बाधित थोड़ी ना कर सकते कि उसको

655
00:45:14,960 --> 00:45:19,040
कब लेगा वो अवतार। जी हां जी

656
00:45:19,040 --> 00:45:23,040
जी ये हो गया। तो यानी कि जैसे कर्म जैसे कर्मों का फल देने

657
00:45:23,040 --> 00:45:27,280
के लिए ईश्वर स्वतंत्र है कि उसकी अपनी मर्जी वो कब लेगा और कब वो

658
00:45:27,280 --> 00:45:31,440
उसके चीजों को अप्लाई करेगा। उसी तरीके से ईश्वर

659
00:45:31,440 --> 00:45:35,440
के पास भी अवतार लेने की भी स्वतंत्रता है कि वो कब लेगा उसके लिए उसको बाधित

660
00:45:35,440 --> 00:45:39,920
मत करिए कि कब आएगा यह फिर आप मत करिए। दूसरी बात अ

661
00:45:39,920 --> 00:45:45,280
मिथ्यावादी हां आपने कहा कि ईश्वर मिथ्यावादी नहीं हो सकता। ठीक है?

662
00:45:45,280 --> 00:45:49,600
जैसे किसी व्यक्ति को दंड दे रहा है ईश्वर। है ना?

663
00:45:49,600 --> 00:45:53,600
किसी व्यक्ति को दंड दे रहा है और दंड स्वरूप अभी घर

664
00:45:53,600 --> 00:45:55,760
से व्यक्ति बाहर निकला और उस पर कोई

665
00:45:55,760 --> 00:45:59,280
उल्का पिंड आकर के गिर गया

666
00:45:59,280 --> 00:46:03,600
तो यह कार्य ईश्वर का है कि नहीं इस तरह से दंड दे देना ईश्वर का है

667
00:46:03,600 --> 00:46:09,280
ईश्वर का है तो यहां पर ईश्वर ने उसके साथ छल किया कि नहीं किया

668
00:46:09,280 --> 00:46:13,440
वो व्यक्ति वो व्यक्ति घर से बाहर देख के निकला वेदर की रिपोर्ट वगैरह हर

669
00:46:13,440 --> 00:46:17,760
चीज बिल्कुल सही है और मौसम भी बिल्कुल साफ है अचानक से बिल्कुल

670
00:46:17,760 --> 00:46:21,760
मौसम के विपरीत उसको को दंड मिल गया।

671
00:46:21,760 --> 00:46:26,320
अब अब रुक जाइए। इनका उत्तर देता हूं। रुकिए। जी जी

672
00:46:26,320 --> 00:46:30,480
अब जो गंदगी वाले हमने मल से हाथ लगा दिया तो हम

673
00:46:30,480 --> 00:46:34,880
अशुद्ध हो गए ना। आत्मा शुद्ध नहीं होता। ध्यान रखिए

674
00:46:34,880 --> 00:46:39,760
हमारा हाथ शरीर अशुद्ध होता है। ईश्वर का शरीर नहीं अशुद्ध कैसे होगा?

675
00:46:39,760 --> 00:46:45,520
इसमें सारा ब्रह्मांड शरीर है। उसके अंदर सब भरा हुआ है।

676
00:46:45,520 --> 00:46:49,680
हमारा हम इसलिए अशुद्ध हुए क्योंकि हम हमारा हम अशुद्ध नहीं। हाथ

677
00:46:49,680 --> 00:46:53,760
अशुद्ध हुआ था। आत्मा शुद्ध नहीं होता। तो आत्मा में कोई

678
00:46:53,760 --> 00:46:57,760
फर्क पड़ेगा। आत्मा कहीं भी जाएगा वो अशुद्ध नहीं होगा। ध्यान रखिए।

679
00:46:57,760 --> 00:47:01,920
दूसरी बात ईश्वर की इच्छा होगी जब जन्म पर जन्म तो

680
00:47:01,920 --> 00:47:06,000
लेता ही नहीं है। कर्म फल तो देने वाला है। कर्म फल तो देना

681
00:47:06,000 --> 00:47:10,000
उसकी अनिवार्यता है। कर्म फल देना उसका कार्य है। अवतार लेना उसका कार्य नहीं

682
00:47:10,000 --> 00:47:11,760
है।

683
00:47:11,760 --> 00:47:15,920
सब जगह जन्मा अायमान और

684
00:47:15,920 --> 00:47:20,240
फिर भी आप जन्म दिला रहे हैं उसको और कोई प्रयोजन नहीं है।

685
00:47:20,240 --> 00:47:24,320
क्या प्रयोजन है बताइए? किसी दुष्ट को मारना भी

686
00:47:24,320 --> 00:47:29,760
प्रयोजन नहीं है। धर्म की रक्षा भी प्रयोजन नहीं है। कुतल के लिए

687
00:47:29,760 --> 00:47:33,920
आप जो मेरे से बातचीत कर रहे हैं ये कुतल के लिए है या किसी प्रयोजन के लिए है? ये

688
00:47:33,920 --> 00:47:38,000
बताइए। प्रयोजन के लिए और वो बिना

689
00:47:38,000 --> 00:47:42,160
प्रयोजन के जब चाहे प्रकट हो जाएगा। और अपने सृष्टि

690
00:47:42,160 --> 00:47:46,160
नियम जो उसके नियम है उनके विरुद्ध प्रकट हो जाएगा। उनके विरुद्ध प्रकट

691
00:47:46,160 --> 00:47:49,040
हो जाएगा।

692
00:47:49,040 --> 00:47:53,760
अब उल्का पिंड गिर गया। उलका पिंड

693
00:47:53,760 --> 00:47:58,880
गिरा उसके पीछे उसके कितने संस्कार होंगे अंदर

694
00:47:58,880 --> 00:48:02,960
रामायण पढ़िए रामायण श्री राम राजतिलक

695
00:48:02,960 --> 00:48:07,440
होने वाला वनवास हो गया तो श्री राम कहते इसी को दव कहते हैं

696
00:48:07,440 --> 00:48:11,600
जो सोचा था वह ना होवे और जो

697
00:48:11,600 --> 00:48:15,600
नहीं सोचा था हो जाए इसी को दव कहते हैं तो ये दवश

698
00:48:15,600 --> 00:48:19,680
हुआ द प्रारब्ध यही प्रारब्ध है नहीं तो प्रारब्ध की

699
00:48:19,680 --> 00:48:25,680
धारणा ही समाप्त हो जाएगी फिर तो कर्म फल व्यवस्था ही खत्म हो जाएगी।

700
00:48:27,680 --> 00:48:31,680
ठीक है? अब एक एक बिंदु रखिए। एक बिंदु संक्षेप में फिर

701
00:48:31,680 --> 00:48:35,840
उसका उत्तर फिर उसके बाद ऐसे कई एक साथ हो जाते हैं तो मालूम नहीं पड़ता।

702
00:48:35,840 --> 00:48:39,840
हां वही दिक्कत आ जाती है। सबसे पहली बात प्रपंच

703
00:48:39,840 --> 00:48:43,920
वाली बात वो इस वाले इस वाले मैंने प्रपंच बोला

704
00:48:43,920 --> 00:48:48,000
नहीं। वैसे फिर भी आप बोल बोला नहीं पर आप बार-बार पारमार्थिक तात्विक प्रपंच

705
00:48:48,000 --> 00:48:52,000
शब्द है ना। हां यही वेद विरुद्ध है। ये विज्ञान विरुद्ध है।

706
00:48:52,000 --> 00:48:56,480
व्यवहार विरुद्ध है। ठीक है? और ये दार्शनिक

707
00:48:56,480 --> 00:49:00,640
सबसे बड़ी बुराई ये अद्वैतवादी है। अद्वैतवाद का मतलब

708
00:49:00,640 --> 00:49:04,720
ये आप निर्णय कुछ नहीं। निर्णय निर्णय पे ना जाए। बुराई

709
00:49:04,720 --> 00:49:08,720
है। ऐसा ना करें। प्लीज निवेदन है निर्णय पे ना जाए। जी नहीं तो

710
00:49:08,720 --> 00:49:12,720
निर्णय कर लेंगे। उस पे भी कर लेंगे। निर्णय हां निर्णय करेंगे। अभी जब तक तर्क वितर्क

711
00:49:12,720 --> 00:49:17,200
चल रहा है तब तक घोषणा ना करें। हां इसी पे चलिए। हां।

712
00:49:17,200 --> 00:49:22,240
अब आपकी सबसे लास्ट बात ही मैं पहले ले लेता हूं। प्रपंच वाली। आपने कहा

713
00:49:22,240 --> 00:49:26,320
आपने खुद कहा कि हम अ क्या

714
00:49:26,320 --> 00:49:30,320
कहते हैं? उससे लिप्त हो जाते हैं। जब मल से स्पर्श में

715
00:49:30,320 --> 00:49:34,960
आ जाते हैं तो हमारा शरीर होता है। इसलिए हम मानते हैं कि हम हो गए अपवित्र।

716
00:49:34,960 --> 00:49:39,200
परंतु हमारी आत्मा अशुद्ध नहीं होती है। आत्मा शुद्ध नहीं होती है। पर

717
00:49:39,200 --> 00:49:42,720
फिर भी हम अपनी शुद्धि का लिए कार्य करते हैं। उसमें आत्मा भी लिप्त होती

718
00:49:42,720 --> 00:49:46,880
है कार्य में। यही है व्यवहार और परमार्थ का अंतर।

719
00:49:46,880 --> 00:49:51,840
शरीर के कारण हम लोग अपवित्र हो भी रहे हैं और जबकि हमारी आत्मा

720
00:49:51,840 --> 00:49:55,840
जो है वह अभी भी शुद्ध है। इसी इसी

721
00:49:55,840 --> 00:50:00,080
एक मिनट इसको पूरा कर लूं व्यवहार परमार्थ इसी

722
00:50:00,080 --> 00:50:04,480
को कहा है मैंने व्यवहार और परमार्थ या फिर प्रपंच रूपी संसार और तात्विक व्याख्या

723
00:50:04,480 --> 00:50:08,720
तात्विक व्याख्या क्या है कि आत्मा को कभी कुछ नहीं होता नैन चंदती शस्त्राण नैन

724
00:50:08,720 --> 00:50:12,720
दहति पावक ना चैनम क्लपो न शोषति मारता

725
00:50:12,720 --> 00:50:16,720
और यह जो जड़ है जो इसमें संपर्क में आ रहा है शरीर हमारा

726
00:50:16,720 --> 00:50:20,720
है ना जो गंदा हो रहा है जो अपवित्र हो रहा है उसके कारण हम अपने

727
00:50:20,720 --> 00:50:24,720
को मान रहे हैं कि हम गंदे हो गए है ना यह हमारा हमारा व्यवहार हो गया। उसके कारण

728
00:50:24,720 --> 00:50:28,880
हम परेशान भी होते हैं। हम अपने आप को साफ भी करते हैं जाकर के। ये व्यवहार हो गया।

729
00:50:28,880 --> 00:50:33,200
अब हो गई। एक [गला साफ़ करने की आवाज़] मिनट एक मिनट। तो तो इसी प्रकार से जब जब

730
00:50:33,200 --> 00:50:37,600
ईश्वर आप कह रहे हैं कि ईश्वर आएगा तो उस पर यह दिखाई देगा वो दिखाई देगा

731
00:50:37,600 --> 00:50:41,840
तो वो यहां होते हुए भी लिप्त इसलिए नहीं होगा क्योंकि वास्तविकता

732
00:50:41,840 --> 00:50:46,160
में वो भी अशुद्ध नहीं हुआ है। वास्तविकता में वो भी प्रतीति

733
00:50:46,160 --> 00:50:50,560
मात्र है। जिस प्रकार से मेरा इस शरीर से जुड़ा होना प्रतीति मात्र है।

734
00:50:50,560 --> 00:50:54,800
उसी प्रकार से उसका अवतार भी प्रतीति मात्र है जो व्यवहारिक सत्य है।

735
00:50:54,800 --> 00:50:57,760
इससे इसे अवतार सिद्ध नहीं हुआ। इससे अवतार

736
00:50:57,760 --> 00:51:01,760
सिद्ध नहीं हुआ। इससे तो वो कीचड़ वाला उदाहरण सिद्ध हो रहा है। कीचड़ वाला उदाहरण

737
00:51:01,760 --> 00:51:05,920
इससे इससे अगर इससे अवतार इससे अवतार अगर सिद्ध नहीं हुआ तो मेरी

738
00:51:05,920 --> 00:51:10,000
ना तो कोई माता सिद्ध होगी ना मुझे कोई जन्म देने वाला सिद्ध होगा अगर

739
00:51:10,000 --> 00:51:14,080
तात्विक व्याख्या ही दे क्योंकि आत्मा का तो कोई जन्मदाता नहीं है तो ना तो मेरा कोई

740
00:51:14,080 --> 00:51:18,240
पिता एक मिनट ना तो मेरा कोई पिता है ना कोई मेरी मां है ना कोई मेरा

741
00:51:18,240 --> 00:51:22,400
ना मैं गंदा हुआ हूं मल से स्पर्श होने के कारण है ना मगर

742
00:51:22,400 --> 00:51:26,400
ये सब बातें अगर जितनी ये सब बातें सत्य है उतना ही भगवान का हमारे

743
00:51:26,400 --> 00:51:31,360
बीच में आना सत्य है सुनिए जब हां जी

744
00:51:31,360 --> 00:51:35,520
जहां ये ना आत्मा शुद्ध रहते हुए भी कैसे

745
00:51:35,520 --> 00:51:39,680
मान लेता है मैं गंदा हो गया इसलिए मान लेता है कि आत्मा

746
00:51:39,680 --> 00:51:43,680
का साधन है हमारा साधन मोटरसाइकिल पर जाएंगे

747
00:51:43,680 --> 00:51:47,920
मोटरसाइकिल खराब होगी पीड़ा हमें होगी मोटरसाइकिल वो नहीं होगी परमात्मा का कोई साधन

748
00:51:47,920 --> 00:51:52,000
नहीं है उपनिषद ये भी तो कहता है ननम छिनती तो कहता है

749
00:51:52,000 --> 00:51:56,080
लेकिन नैन गीता कहती है और उपनिषद भी

750
00:51:56,080 --> 00:52:00,080
ऐसे दृष्टा स्पष्ट सोता जता मनता बोद्धा

751
00:52:00,080 --> 00:52:04,320
यह ईश्वरी स्पर्श करने वाला है यही

752
00:52:04,320 --> 00:52:08,320
बोलने वाला है यही सोचने वाला है ये सब सुनने वाला है सूंघने

753
00:52:08,320 --> 00:52:12,320
वाला चखने वाला यही सब है क्यों ये इन करण से

754
00:52:12,320 --> 00:52:12,960
शुरू करता

755
00:52:12,960 --> 00:52:16,960
है ईश्वर ईश्वर में हम में ये अंतर है क्या

756
00:52:16,960 --> 00:52:21,840
ईश्वर अपने लिए संसार नहीं बनाता हमारे लिए बनाता है ईश्वर

757
00:52:21,840 --> 00:52:25,920
जन्म लेकर के विभिन्न योनि में घूमता हुआ अपने फलों को नहीं भोगता और मोक्ष

758
00:52:25,920 --> 00:52:30,000
को प्राप्त नहीं क्योंकि वो मुक्त ही है। लेकिन हम

759
00:52:30,000 --> 00:52:34,320
जन्म जन्मों में जाते हैं। योनियों में जाते हैं। ये हम में उनमें अंतर है।

760
00:52:34,320 --> 00:52:38,480
ईश्वर के लिए नहीं कहा। वास जी यथाई ये ईश्वर

761
00:52:38,480 --> 00:52:42,640
के लिए नहीं कहा है। इसीलिए माने शरीर ईश्वर

762
00:52:42,640 --> 00:52:46,400
के लिए नहीं कहा। हम जीवों के लिए कहा है।

763
00:52:46,400 --> 00:52:50,880
इसलिए इसलिए क्या कह रहे हो? तो ईश्वर अवतार लेगा तो इसके लिए भी यही

764
00:52:50,880 --> 00:52:54,880
बात बोलनी पड़े। इसीलिए मैं कह रहा हूं कि ये ये अंतर है ईश्वर और जीव

765
00:52:54,880 --> 00:52:58,960
में। इसीलिए जिन कार्यों से जिन कारणों से जीव

766
00:52:58,960 --> 00:53:02,960
वो मनुष्य के रूप में अपवित्र सिद्ध हो रहा है। उन्हीं कारणों से

767
00:53:02,960 --> 00:53:06,960
उन्हीं विषयों से जो ईश्वर है वो अवतार रूप में अपवित्र सिद्ध

768
00:53:06,960 --> 00:53:10,960
नहीं होगा। इन्हीं कारणों से अवतार अच्छा जीव और ब्रह्म

769
00:53:10,960 --> 00:53:14,000
अलग-अलग है।

770
00:53:14,000 --> 00:53:18,000
ये फिर एक फिर विषय होगा। अभी आप इसका आप इसका उत्तर दे

771
00:53:18,000 --> 00:53:22,400
दीजिए। देखिए इसका जिस समय अवतार में आता है अवतार में आता है

772
00:53:22,400 --> 00:53:28,000
ब्रह्म रूप। मैं मैं एक चीज कह रहा हूं। मैं एक चीज कह रहा हूं आपको कि

773
00:53:28,000 --> 00:53:28,500
लास्ट

774
00:53:28,240 --> 00:53:32,240
के जो चार पॉइंट पे हमारी बात हुई थी उसके इसको मैं कर लूं। उसके बाद फिर आप एक-एक

775
00:53:32,240 --> 00:53:36,880
करके उस पे हम लोग जब तक खत्म नहीं हुई तब तक बात करते रहेंगे। इस पर एक बारिश

776
00:53:36,880 --> 00:53:40,880
हां इसमें एक है आपने कहा कि ईश्वर का शरीर नहीं

777
00:53:40,880 --> 00:53:45,200
है इसलिए वो वो नहीं होता। ये मैंने दे दिया। अवतार लेना उसका कार्य नहीं है।

778
00:53:45,200 --> 00:53:49,360
तो अवतार लेना उसका कार्य नहीं है। उसी जिस प्रकार से पत्थर गिराना

779
00:53:49,360 --> 00:53:53,760
किसी दुष्ट पर उसका कार्य नहीं है। पर गिराया। उसको दंड देना था। पत्थर गिराकर

780
00:53:53,760 --> 00:53:57,920
गिरा दिया। उसका कार्य नहीं है। वह और तरीकों से भी मार सकता है। पत्थर

781
00:53:57,920 --> 00:54:02,480
गिरा के ही मारना जरूरी नहीं है। वह केवल अपनी [गला साफ़ करने की आवाज़] एक एक मिनट

782
00:54:02,480 --> 00:54:07,520
वो केवल अपनी शब्द शक्ति से भी किसी को उसके कर्मों का दंड दे सकता है।

783
00:54:07,520 --> 00:54:11,520
ठीक है? और तो और ये जिस रूप में हमको ज्ञान विज्ञान

784
00:54:11,520 --> 00:54:15,600
प्राप्त हो रहा है जो वैदिक विज्ञान है जो हमें मंत्रों के रूप में प्राप्त हो रहा

785
00:54:15,600 --> 00:54:19,680
है तो वह भी उसका जरूरी नहीं है कि मंत्रों के रूप में ही दे। केवल वो अपने मन

786
00:54:19,680 --> 00:54:23,920
में सोचे और हमारे मन में वह ज्ञान आ जाएगा। उसको मंत्र के रूप में कि

787
00:54:23,920 --> 00:54:28,000
भाई वह इतने नंबर का सूक्त है। फिर उसमें इतने नंबर के सूक्त में इतने नंबर का मंत्र में

788
00:54:28,000 --> 00:54:32,000
यह लिखा है। इस रूप में देने की कोई आवश्यकता नहीं है। वो केवल अपने स्मरण करेगा और

789
00:54:32,000 --> 00:54:36,240
कर देगा। और आपने कहा सृष्टि नियम के विरुद्ध इसको मैं

790
00:54:36,240 --> 00:54:40,320
लास्ट में ले लूंगा सृष्टि नियम के विरुद्ध वाला कि जैसे आपने कहा सृष्टि नियम

791
00:54:40,320 --> 00:54:43,280
के विरुद्ध तो सृष्टि नियम के विरुद्ध मैं यही समझता हूं कि जैसे ईश्वर

792
00:54:43,280 --> 00:54:47,440
का जो स्वरूप है वो है वो सर्वव्यापक है। फिर

793
00:54:47,440 --> 00:54:51,520
वो एक देश कैसे हो सकता है? ये सृष्टि उसका जो स्वाभाविक नियम आ गया

794
00:54:51,520 --> 00:54:55,680
तो इसमें बात ये आती है कि जो ईश्वर सब जगह है वो किसी एक देश

795
00:54:55,680 --> 00:54:59,840
काल परिस्थिति में कुछ चार ऋषियों के लिए व्यवहारिक कैसे हो गया जो ईश्वर सब

796
00:54:59,840 --> 00:55:03,840
जगह है वो भूर भुवा स्वाहा जब हम

797
00:55:03,840 --> 00:55:07,920
गायत्री मंत्र पढ़ते हैं तो हम कहते हैं हमें बुद्धि दो तो यह माना

798
00:55:07,920 --> 00:55:11,920
जाता है कि जो व्यक्ति गायत्री मंत्र पढ़ेगा उसको ईश्वर बुद्धि प्रदान करेंगे यदि वह

799
00:55:11,920 --> 00:55:15,920
योग्य हुआ तो तो वो सेलेक्टिव हो के लोगों को ज्ञान कैसे दे रहा है

800
00:55:15,920 --> 00:55:20,240
बुद्धि कैसे दे रहा है या व्यवहारिक हो रहा है और जहां व्यवहारिक होगा वहां विशेष होगा।

801
00:55:20,240 --> 00:55:24,320
जहां विशेष होगा तो वह अनंत रूप से तो हो नहीं सकता क्योंकि उसको किसी को ज्ञान देना है,

802
00:55:24,320 --> 00:55:28,480
किसी को नहीं देना है। तो वहां पर भी उसका एक देश हो के ही उस व्यवहार

803
00:55:28,480 --> 00:55:32,480
करना होगा। अगर वो एक देश होकर के व्यवहार नहीं करेगा तो अनंत जो

804
00:55:32,480 --> 00:55:36,480
उसका रूप है उसके साथ व्यवहार करेगा। फिर तो बुद्धि सबको चली जाएगी। सबको दे देगा

805
00:55:36,480 --> 00:55:40,480
बुद्धि। और तीसरी बात एक-एक करके बोलिए।

806
00:55:40,480 --> 00:55:44,480
एक-एक करके। एक-एक करके बोलिए पहले। वो कुछ

807
00:55:44,480 --> 00:55:48,640
चीजें रह जाती हैं। तो आपने कहा कि उसके संस्कार

808
00:55:48,640 --> 00:55:52,640
होंगे इसलिए उसके ऊपर गिरा। तो इसी प्रकार से जिसको वो

809
00:55:52,640 --> 00:55:56,800
ईश्वर के पास ये वाली चीजें हैं कि उसको किसको ऋषि बनाना है

810
00:55:56,800 --> 00:55:58,560
और ऋषि बना करके बिना यज्ञ

811
00:55:58,560 --> 00:56:02,800
पवित के भी उसको वैदिक ज्ञान विज्ञान दे देना है और उसके बाद उसी षष्ठी

812
00:56:02,800 --> 00:56:06,800
क्रम में आगे चलकर के विधान करना है कि आप जब यज्ञोपवीत हो जाएगा उपनीत

813
00:56:06,800 --> 00:56:10,800
हो जाओगे तब जाकर के आपको जो है वेदों का अधिकार प्राप्त होगा। तो यह ईश्वर की

814
00:56:10,800 --> 00:56:14,960
अपनी चुनाव होता है कि किसको किस योग्य वह समझता है। तो जो

815
00:56:14,960 --> 00:56:19,120
जब हम कर्म फल देने के लिए उस पर यह लागू नहीं कर रहे कि भैया अगर कर्म फल देना

816
00:56:19,120 --> 00:56:23,120
है तो आज की तारीख में क्यों नहीं दे रहा अभी क्यों नहीं दे रहा हो सकता है वह अपने तरीके से दे

817
00:56:23,120 --> 00:56:27,600
रहा होगा कर्म फल उसको पता नहीं कौन सी बीमारी उसने लगवा दी हो कौन सी उसको परेशानी

818
00:56:27,600 --> 00:56:31,600
गैस की प्रॉब्लम हो उसको एड्स हो गया हो कैंसर हो गया हो जो दुराचारी है जो हमको

819
00:56:31,600 --> 00:56:35,680
पता ही नहीं चल रहा तो इसी प्रकार से भगवान भी अपने इच्छा अनुसार

820
00:56:35,680 --> 00:56:40,000
अवतार लेंगे जब उनका मन होगा लेंगे नहीं मन होगा तो पत्थर गिरा के मार देंगे

821
00:56:40,000 --> 00:56:44,000
नहीं जिसको मारना होगा उसको नहीं भी मारेंगे जिसको वेद का

822
00:56:44,000 --> 00:56:48,320
ज्ञान कराना होगा समाधि अवस्था में कराएंगे और जिसको जिसको

823
00:56:48,320 --> 00:56:52,400
व्यवस्था के अनुसार वेद का ज्ञान विज्ञान देना होगा वैसे देंगे। अच्छा

824
00:56:52,400 --> 00:56:56,400
अब बंद करिए जो अब इसमें जो पहला इसमें जो पहला पॉइंट है उसको ले लेते हैं।

825
00:56:56,400 --> 00:57:02,240
अनंत सामर्थ्यवान इस पे चलिए अब आप अब इसको बता दीजिए। जी

826
00:57:02,240 --> 00:57:06,240
अनंत सामर्थ्यवान सृष्टि कितनी बड़ी मानी समझे

827
00:57:06,240 --> 00:57:10,240
इस बात को। एक दांत का डॉक्टर सारी जिंदगी दांतों

828
00:57:10,240 --> 00:57:13,680
की चिकित्सा कर ले। नहीं जानता दांत के बारे में सब कुछ उसे पूछो

829
00:57:13,680 --> 00:57:17,760
सब जानते हो कि नहीं जानता सारे जीवों को बनाया सारे ब्रह्मांड

830
00:57:17,760 --> 00:57:21,920
को बनाया अनंत नहीं है क्या ये ब्रह्मांड का विस्तार भी तो अनंत ही है प्रकृति अनंत

831
00:57:21,920 --> 00:57:25,920
है उस सब में व्यापक है उस सबको जानता है इसलिए वो अनंत सामर्थ अनंत

832
00:57:25,920 --> 00:57:31,680
ज्ञानवान है अन सामर्थ्यवान है इसका अर्थ नहीं है कि उल्टा भी करे

833
00:57:31,680 --> 00:57:35,680
आप वेद को मानते हैं कि नहीं मानते बताओ वेद कह रहा है

834
00:57:35,680 --> 00:57:39,680
अपापवि पाप में विध नहीं हो सकता आप कह रहे हो सकता है

835
00:57:39,680 --> 00:57:43,680
व्यवहार में हो सकता आपके द्वारा भी तो हो रहा है। हां

836
00:57:43,680 --> 00:57:49,600
कैसे हो रहा है? स्त्री स्त्रियां नहा रही है। वो देख रहा है कि नहीं देख रहा है?

837
00:57:49,600 --> 00:57:53,920
स्त्रियां नहा रही है। देख रहा है कि नहीं देख रहा? तो कैसे हो गया? वो तो सब स्त्रियों को स्त्रियों

838
00:57:53,920 --> 00:57:58,320
को नहाते हुए देखना पाप है कि नहीं? ये हमारे लिए पाप है। बस

839
00:57:58,320 --> 00:58:02,560
बस यही मैं भी कह रहा हूं कि जो हमारे लिए पाप है उसके लिए पाप नहीं है। वो दुराचार

840
00:58:02,560 --> 00:58:06,560
नहीं करता। वही मैं कह रहा हूं। जो हमारे लिए पाप है, जो हमारे लिए पाप

841
00:58:06,560 --> 00:58:10,720
है, उसके लिए पाप नहीं है। वही तो मैं भी कह रहा हूं। सुनिए। जी ये बताइए

842
00:58:10,720 --> 00:58:15,280
पहले कोई प्रमाण दीजिए अवतार का प्रमाण में आइए ये कुतर्क

843
00:58:15,280 --> 00:58:19,760
मन जाइए प्रमाण पे आ जाऊं हां तर्क को छोड़ अवतार

844
00:58:19,760 --> 00:58:23,840
का लाओ तर्क को छोड़ दे तर्क नहीं कर रहे कुतर्क कर

845
00:58:23,840 --> 00:58:28,000
रहे हो अरे अब आप चलिए अगर हम अगर

846
00:58:28,000 --> 00:58:28,800
हम मैं प्रमाण

847
00:58:28,800 --> 00:58:33,040
दे देता हूं मैं प्रमाण अगर हम केवल आत्मा होते तो पाप नहीं होता

848
00:58:33,040 --> 00:58:37,040
केवल आत्मा होते मैं कह रहा हूं जिस जिस

849
00:58:37,040 --> 00:58:41,040
पाप के मनुष्य द्वारा होने पर हम उस पाप नहीं मान रहे उसी के द्वारा

850
00:58:41,040 --> 00:58:45,280
ईश्वर के द्वारा उसको होने पर हम उसे पाप से अलग कर रहे हैं और वही चीज मनुष्य

851
00:58:45,280 --> 00:58:49,520
के द्वारा होने पर हम उसे पाप से विध मान रहे हैं। यानी अगर हम जिस

852
00:58:49,520 --> 00:58:53,680
कार्य से लिप्त होने जिस कार्य से सुनिए ये लाइन ये लाइन पूरी

853
00:58:53,680 --> 00:58:57,760
मैं मुक्त आत्मा होता तो सारे ब्रह्मांड को देखता मुझे कोई पाप नहीं

854
00:58:57,760 --> 00:59:01,760
लगता। इसका मतलब जिन कार्यों से मनुष्य को पापी माना जाएगा उन्हीं कार्यों

855
00:59:01,760 --> 00:59:05,840
से ईश्वर को पाप नहीं पापी नहीं माना जाएगा। यही तो मेरा कहना कार्य कर रहा है ईश्वर

856
00:59:05,840 --> 00:59:09,920
कार्य कर ही नहीं रहा है वो तो बाद की बात है अभी

857
00:59:09,920 --> 00:59:14,000
मैंने पूछा अनंत सामर्थवान अनंत तो अनंत सामर्थ बता दिया

858
00:59:14,000 --> 00:59:18,000
अनंत ब्रह्मांड को रचने वाला है आपने उसमें दो धारण करने वाला

859
00:59:18,000 --> 00:59:22,240
है आप ब्रह्मांड को जानते हो तो नहीं कुछ अनंत ब्रह्मांड को रचने वाला अनंत

860
00:59:22,240 --> 00:59:26,240
ब्रह्मांड को धारण करने वाला अनंत ब्रह्मांड का प्रलय करने वाला

861
00:59:26,240 --> 00:59:30,480
आपको ब्रह्मांड की जानकारी है ही नहीं वास्तव में और नहीं है जानकारी क्या वेद की उत्पत्ति

862
00:59:30,480 --> 00:59:34,480
होती कैसे चार ऋषियों को दे दिया कैसे मालूम है आपको ये

863
00:59:34,480 --> 00:59:38,480
अतिरिक्त बातें हैं आचार्य जी आपने कहा

864
00:59:38,480 --> 00:59:42,560
किसी को दे दिया ज्ञान दे दिया चार को नहीं आपने कहा कि किसी

865
00:59:42,560 --> 00:59:43,920
को ज्ञान दे दिया ऐसा नहीं

866
00:59:43,920 --> 00:59:48,080
देता है ज्ञान उसकी प्रक्रिया है ज्ञान देने की प्रक्रिया

867
00:59:48,080 --> 00:59:52,320
अगर अलग से समझे तो कोई वही समझा दे पहले ज्ञान कैसे देता है ईश्वर और वेद

868
00:59:52,320 --> 00:59:57,120
है क्या आपसे निवेदन है विनम्र मेरा कि आप ऐसे

869
00:59:57,120 --> 01:00:01,360
आपको ये प्रमाण देता हूं प्रमाण

870
01:00:01,360 --> 01:00:06,160
तो प्रमाण दे देता हूं। पहले मैं प्रमाण दूं।

871
01:00:06,160 --> 01:00:10,400
आपने तो दिए ही है अभी तक बहुत सारे। नहीं। मैं केवल दो चार प्रमाण दे देता हूं। बस

872
01:00:10,400 --> 01:00:16,400
हां दीजिए दीजिए।

873
01:00:25,760 --> 01:00:30,080
एक तो यजुर्वेद में है 319 यद्यपि वह अजन्मा

874
01:00:30,080 --> 01:00:35,120
है पर विभिन्न रूपों में प्रकट होता है। 319

875
01:00:35,120 --> 01:00:39,280
जी मंत्र क्या है वो आप देख लीजिए मैं मंत्र बोलता

876
01:00:39,280 --> 01:00:43,840
मतलब 31 19 ठीक है ठीक है प्रजापति चरत

877
01:00:43,840 --> 01:00:47,840
जी वो देखता हूं मैं इसमें

878
01:00:47,840 --> 01:00:51,520
क्या लिख रहा है

879
01:00:51,520 --> 01:00:55,760
हां ये रहा इसमें क्या लिखा हुआ है आप

880
01:00:55,760 --> 01:01:00,480
बताइए

881
01:01:00,480 --> 01:01:04,720
प्रजापति चरत ग अंतर दृश्य

882
01:01:04,720 --> 01:01:09,280
विश्वना

883
01:01:09,280 --> 01:01:14,160
केतु इसमें अवतार कहां सिद्ध हो रहा है

884
01:01:14,160 --> 01:01:18,160
गर्व क्या होता है प्रमाण अर्थ क्या अर्थ क्या

885
01:01:18,160 --> 01:01:22,160
लिखा है उसका नहीं अर्थ किसका लोगे अर्थ

886
01:01:22,160 --> 01:01:26,800
वधर का लाओ किसका लाओ अर्थ की प्रामाणिकता तो चाहिए

887
01:01:26,800 --> 01:01:31,360
ठीक है वो मैं देखो अर्थ आपके यहां क्या लिखा है वो बता दो आप

888
01:01:31,360 --> 01:01:35,360
प्रजाओं का पति ब्रह्मांड के गर्भ के अंदर मेरा

889
01:01:35,360 --> 01:01:39,360
अर्थ नहीं मानोगे मैं तो और ही अर्थ कर मैंने विचर रहा है

890
01:01:39,360 --> 01:01:44,080
ना दिखता हुआ वह बहुत प्रकार से विविध रूपों में प्रकट होता है हां

891
01:01:44,080 --> 01:01:48,080
प्रकट होता है हां सुन लिए तो कहां कहां प्रकट होता है सुनिए

892
01:01:48,080 --> 01:01:52,080
सूर्य के रूप में प्रकट हो रहा है यानी सूर्य वो है यानी

893
01:01:52,080 --> 01:01:56,720
सूर्य ईश्वर है नहीं नहीं नाभ्या आंतरिक्षम शी

894
01:01:56,720 --> 01:02:00,720
समत य भूम प्रमा अंतरिक्ष

895
01:02:00,720 --> 01:02:04,720
ये है जो उसका ब्रह्मा ये विराट रूप है उसका यानी

896
01:02:04,720 --> 01:02:06,960
सूर्य ईश्वर है नहीं नहीं सूर्यश्वर

897
01:02:06,960 --> 01:02:11,580
नहीं बिजली कैसे प्रकट हो रही है एसी चला

898
01:02:11,580 --> 01:02:15,680
[नाक से की जाने वाली आवाज़] लाइट आ गई हीटर चला लाइट आ गई पंखा हवा

899
01:02:15,680 --> 01:02:19,760
चली लाइट आ गई विविध रूपों में कार्य कर रही है वैसे ईश्वर विविध

900
01:02:19,760 --> 01:02:24,000
रूपों में कार्य कर रहा है पर बिजली ना तो ठंडी है ना बिजली गरम

901
01:02:24,000 --> 01:02:28,080
है ठीक है सुनिए वैसे ईश्वर विविध रूपों में कार्य कर

902
01:02:28,080 --> 01:02:32,560
रहा है वहां रूपों में प्रकट होना माना गया है ना प्रकट हो रहा है।

903
01:02:32,560 --> 01:02:36,800
प्रकट होने का अर्थ यही है कि जब साम्य अवस्था

904
01:02:36,800 --> 01:02:40,880
थी तब ईश्वर प्रकट नहीं था। उसको कोई नहीं जान सकता था। लेकिन ये सब

905
01:02:40,880 --> 01:02:44,880
बन गए। प्रकट हो गया। देखो कैसा सुंदर ईश्वर ने बनाया है।

906
01:02:44,880 --> 01:02:49,120
ईश्वर कैसा प्रकाश दे रहा है। ये न तत्र

907
01:02:49,120 --> 01:02:53,280
सूर्य भात न चंद्र तारकम ने अग्नि ये

908
01:02:53,280 --> 01:02:57,440
प्रकट हो रहा है ईश्वर अर्थात कार्य प्रकट हो रहा है। कार्य को देख के

909
01:02:57,440 --> 01:03:01,440
कर्ता का अनुमान होता है। अगर ये नहीं है तो [हंसी] अनुमान भी नहीं होगा कि ईश्वर है भी

910
01:03:01,440 --> 01:03:05,600
कि नहीं। ठीक है। कार्य को देख के का अनुमान होता है।

911
01:03:05,600 --> 01:03:09,600
ये प्रकट हो रहा है ईश्वर। जैसे जैसे आपने मेरे व्यवहार और परमार्थ पर

912
01:03:09,600 --> 01:03:13,840
वो किया था ना प्रश्न कि व्यवहार और परमार्थ को आप अलग मत करिए। यहां पर भी देखिए

913
01:03:13,840 --> 01:03:17,840
आपकी बात से व्यवहार परमार्थ सिद्ध हो रहा है कि एक समय था जब ईश्वर को

914
01:03:17,840 --> 01:03:21,840
जानने वाला कोई नहीं था। वो हो गया ईश्वर व्यवहार में ना आ सकने वाला। ईश्वर

915
01:03:21,840 --> 01:03:22,340
व्यवहार

916
01:03:22,160 --> 01:03:26,240
में नहीं आ रहा है। हम उसे जान ही नहीं सकते। किसी प्रकार से इंद्रियों का विषय है ही नहीं।

917
01:03:26,240 --> 01:03:30,720
एक एक मिनट मैं कह लूं। और उसके बाद ईश्वर प्रकट हो रहा है। व्यवहार

918
01:03:30,720 --> 01:03:34,720
आपकी अभी अभी आपकी बात रख रहा हूं। ईश्वर व्यवहार में प्रकट हो रहा है। ठीक है? व्यवहार

919
01:03:34,720 --> 01:03:38,800
में आ रहा है। यानी कि उसका मौलिक स्वरूप क्या था? स्वाभाविक स्वरूप क्या

920
01:03:38,800 --> 01:03:42,960
था? व्यवहार में ना आ सकने वाला। मगर उसने अवतार

921
01:03:42,960 --> 01:03:47,040
लिया। ये क्या है? प्रकट होना क्या है?

922
01:03:47,040 --> 01:03:51,040
सुनिए। उसका एक एक मिनट। मैं वो वो नहीं दिख

923
01:03:51,040 --> 01:03:55,040
रहा। भावना को व्यक्त कर सूर्य में वह है। यानी प्रकट नहीं

924
01:03:55,040 --> 01:03:59,280
हो रहा है। नहीं है। वायु है। वो प्रकट नहीं हो रहा है। प्रकट

925
01:03:59,280 --> 01:04:03,280
अपने कार्यों के कार्यों के माध्यम से प्रकट कार्य कर रहा है। दिखाई दे रहे

926
01:04:03,280 --> 01:04:07,600
हैं उसके। यानी व्यवहार में यानी व्यवहार में आ रहा है ना

927
01:04:07,600 --> 01:04:11,600
व्यवहार व्यवहार में तो आ ही रहा है हां तो मौलिक स्वरूप क्या है

928
01:04:11,600 --> 01:04:15,600
नहीं है उसका शरीर ठीक है अभी अभी शरीर धारण नहीं है अभी मैं अवतार की बात कर रहा

929
01:04:15,600 --> 01:04:19,920
हूं आपको अवतार बताता हूं उसका मौलिक स्वरूप क्या है स्वाभाविक स्वरूप क्या है

930
01:04:19,920 --> 01:04:24,080
व्यवहार में ना आ सकने वाला ये उसका मौलिक स्वरूप है नहीं नहीं

931
01:04:24,080 --> 01:04:28,480
ये नहीं है हां क्या है अशब्दम अश्वत्रम अशब्द

932
01:04:28,480 --> 01:04:32,560
अरूपम अशब्दम अरूपम ये उसका स्वरूप है ठीक है इसका

933
01:04:32,560 --> 01:04:36,720
निचोड़ निकलेगा व्यवहार में ना अभी आपने बोला ना पहले वो किसी के जानने

934
01:04:36,720 --> 01:04:37,220
में ना आ

935
01:04:37,200 --> 01:04:41,360
सकने वाला था तो मौलिक मौलिक स्वरूप हो गया ना जानने में ना आ सकने

936
01:04:41,360 --> 01:04:45,360
वाला अभी भी नहीं जान सकते उसको उसके कार्यों को देख रहे हैं यानी

937
01:04:45,360 --> 01:04:49,360
कि कार्यों के अनुसार कुछ कुछ हम उसको जानने में आ सकने वाला हो गया

938
01:04:49,360 --> 01:04:53,520
ना बिल्कुल अनुमान होता है यानी यानी कि कार्यों के कारण

939
01:04:53,520 --> 01:04:57,600
हम उसे अब जान सकते पहले नहीं जान पा रहे थे हां पहले नहीं जान पा रहे यानी कि

940
01:04:57,600 --> 01:05:01,760
उसका मौलिक स्वरूप तो व्यवहार में ना आ सकने वाला था ना नहीं अभी भी

941
01:05:01,760 --> 01:05:06,080
वही स्वरूप है उसका अब जो दिख रहा है वो वो तो अरूप

942
01:05:06,080 --> 01:05:10,160
ही है। मैं मैं रूप मैं रूप की बात नहीं कर रहा हूं।

943
01:05:10,160 --> 01:05:14,160
मैं हम इस मैं इसकी बात कर रहा हूं कि बिना दिखाई देते हुए

944
01:05:14,160 --> 01:05:18,160
भी अभी वो हमारी कुछ कुछ इंद्रियों का विषय बन रहा है। व्यवहार में आ रहा है।

945
01:05:18,160 --> 01:05:22,400
हम उसे जान पा रहे हैं थोड़ा बहुत। मगर एक समय ऐसा था जब हम उसे

946
01:05:22,400 --> 01:05:26,720
बिल्कुल नहीं जान सकते। वो रूप है एक ऐसा। जब हम उसे बिल्कुल नहीं जान सकते।

947
01:05:26,720 --> 01:05:30,720
मनुष्य सो रहा है ना कुछ नहीं कर रहा तो उसके व्यवहार का पता नहीं लगता। जाग जाता

948
01:05:30,720 --> 01:05:34,960
है व्यवहार का पता लगता है। उसका जागरण ब्रह्मा का रात्रि

949
01:05:34,960 --> 01:05:39,200
थी। ब्रह्मा का दिन है। सुनिए सुनिए जो वचनित होता है। जो वचन

950
01:05:39,200 --> 01:05:43,280
है वो यह नहीं है कि सोने वो उसको कोई देख नहीं रहा था। वचन ये है कि

951
01:05:43,280 --> 01:05:47,440
एक समय था जब वो किसी के जानने योग्य नहीं था। किसी

952
01:05:47,440 --> 01:05:51,440
के सोने से किसी के सोने से किसी का अव्यवहारिक व्यवहार में

953
01:05:51,440 --> 01:05:52,240
ना आ सकने वाला

954
01:05:52,240 --> 01:05:56,320
सिद्ध नहीं होता है। व्यवहार में ना आ सकने वाला तभी सिद्ध होगा जब वो व्यवहार में

955
01:05:56,320 --> 01:06:00,480
ना आ सकने वाला होगा। तो स्वरूप से ईश्वर के लिए मैं भी यही कह रहा हूं कि वो

956
01:06:00,480 --> 01:06:04,560
व्यवहार में ना आ सकने वाला है। मगर एक समय ऐसा आता है जब सृष्टि रचना

957
01:06:04,560 --> 01:06:08,720
होती है तो वो व्यवहार में आने लगता है। कुछ कुछ इंद्रियों

958
01:06:08,720 --> 01:06:12,880
का अनुमान के द्वारा ही सही मगर वो जानने योग्य होता है।

959
01:06:12,880 --> 01:06:16,960
तो ये उसका प्रथम अवतार ही सिद्ध हो रहा है। दूसरी बात तो इसको मानो ना सारे

960
01:06:16,960 --> 01:06:21,040
ब्रह्मांड को मानो उसका शरीर ये तो वेद ही कहता है। दूसरी बात ब्रह्मांड को शरीर मानो।

961
01:06:21,040 --> 01:06:25,200
मनुष्य रूप में नहीं या किसी जान दूसरी बात। अच्छा

962
01:06:25,200 --> 01:06:29,200
इसका अर्थ बताओ। अर्थ बताओ इसका एक मिनट

963
01:06:29,200 --> 01:06:33,920
31 31 का मेरा बता रहा हूं बता रहा हूं

964
01:06:33,920 --> 01:06:38,080
का मेरा अर्थ है कि यद्यपि जो

965
01:06:38,080 --> 01:06:42,480
ईश्वर है पढ़ रहे हैं आप किसका का शायण का

966
01:06:42,480 --> 01:06:47,040
शंकराचार्य परंपरा पढ़िए यद्यपि ईश्वर अजन्मा

967
01:06:47,040 --> 01:06:51,280
है अजन्मा होते हुए भी वो उत्पन्न

968
01:06:51,280 --> 01:06:57,280
होता है विविध रूपों में

969
01:06:59,440 --> 01:07:03,520
सुनिए जी बोलिए बोलिए हां मैं और

970
01:07:03,520 --> 01:07:05,920
सुनाओ

971
01:07:05,920 --> 01:07:11,920
एक मिनट सुना रहा हूं

972
01:07:12,880 --> 01:07:16,880
दो तीन बातें हो जाती है ना उससे क्या होता है जो एक मूल कोई बात चल रही होती है वो

973
01:07:16,880 --> 01:07:22,880
रह जाती है फिर अर्थ सुन उसका हां सुना रहा हूं

974
01:07:31,920 --> 01:07:35,920
परमात्मा सब पदार्थों के अंदर विचरता है। वह कभी जन्म लेने

975
01:07:35,920 --> 01:07:40,800
वाला ना होकर के भी अनेक प्रकार से प्रकट होता है। उसके

976
01:07:40,800 --> 01:07:45,040
मूल स्वरूप को ज्ञानी जन देखते हैं।

977
01:07:45,040 --> 01:07:47,440
हां।

978
01:07:47,440 --> 01:07:51,440
तो अनेक प्रकार से अनेक जीवों के रूप

979
01:07:51,440 --> 01:07:55,600
में प्रकट होता है। यह तो बात बाद की बात हो गई। वो प्रकट

980
01:07:55,600 --> 01:07:59,760
हो रहा है ना वो अप्रकट था प्रकट हो रहा है। ये भी ये भी उसके स्वाभाविक मौलिक स्वरूप

981
01:07:59,760 --> 01:08:03,760
में अंतर आ रहा है। उसने ये अवतार है। सुनिए उसने प्रकृति

982
01:08:03,760 --> 01:08:07,920
से सृष्टि को रचा है। जैसे मैं मैं पूछ रहा हूं आपसे

983
01:08:07,920 --> 01:08:11,920
कौन से रूप में प्रकट हुआ है? ये बता दीजिए। यहां प्रकट होना है ना? कई रूपों में

984
01:08:11,920 --> 01:08:14,640
प्रकट होता है। कौन से रूप में प्रकट? उसने उसका ज्ञान

985
01:08:14,640 --> 01:08:18,800
प्रकट हो रहा है ब्रह्मांड के रूप में उसका ज्ञान प्रकट हो रहा है। प्रकृति से उसने

986
01:08:18,800 --> 01:08:22,800
जान कुल मिला के बात यही आ रही है कि यहां पे आप इसका एज इट इज अर्थ ना लेकर

987
01:08:22,800 --> 01:08:27,520
के अपना कुछ उसमें मिक्स कर रहे हैं। सुनो पहले तो ये बात बताऊं आपको

988
01:08:27,520 --> 01:08:31,600
गर्व का क्या-क्या अर्थ होता है? मैं ऋषियों की बात करता हूं। अनषियों

989
01:08:31,600 --> 01:08:37,600
की बात नहीं करता। या सूर्यतिम

990
01:08:38,160 --> 01:08:42,160
गर्भ वह गर्भ है वह सूर्य लोकों

991
01:08:42,160 --> 01:08:46,320
में विचरता है हिरण्य गर्भ में विचरता है या

992
01:08:46,320 --> 01:08:50,560
गर्भ का अर्थ सूर्य आदि तेजस्वी लोक है उनमें विचरता है वो

993
01:08:50,560 --> 01:08:54,560
और उन सबको प्रकट करता है ये इसका अर्थ है और

994
01:08:54,560 --> 01:08:58,640
सबको प्रकट करता है प्रकट होता नहीं है हां उन सबको प्रकट करता है वो

995
01:08:58,640 --> 01:09:02,720
थोड़ी आएगा स्वरूप लेकर के ठीक है ठीक है और सुनिए आचार्य शण का एक मैं मंत्र बता बताता हूं

996
01:09:02,720 --> 01:09:07,520
आपको जो आपकी परंपरा बता रहे है ना

997
01:09:07,520 --> 01:09:11,840
एक मंत्र ऋग्वेद का तुम सुकरस

998
01:09:11,840 --> 01:09:17,600
दरदर ही तब दरदर तू सुकरस रायसी

999
01:09:17,600 --> 01:09:21,760
किस्मान तच्छ ना निशु सप

1000
01:09:21,760 --> 01:09:25,840
ये आचार्य श ने अर्थ किया है हे

1001
01:09:25,840 --> 01:09:30,080
सारमे सार मतलब कुत्ता तुम

1002
01:09:30,080 --> 01:09:34,640
सुकरस वरस तुम वराह सुकर को ददरी

1003
01:09:34,640 --> 01:09:38,720
फाड़ो काटो आप देखिए आप गलत जा रहे हैं इसका विषय

1004
01:09:38,720 --> 01:09:42,880
से कोई मतलब नहीं है आप ये आप ये सिद्ध कर रहे फिर आप ये

1005
01:09:42,880 --> 01:09:47,200
सिद्ध कर रहे हैं कि शायन का भाष्य क्यों नहीं माना जाना चाहिए हां

1006
01:09:47,200 --> 01:09:51,360
मैं सिद्ध कर रहा हूं की परंपरा ही गलत है अगर शायण का

1007
01:09:51,360 --> 01:09:55,680
भाष्य आपका कहने का मतलब है पहली बात तो उस पे भी मैं आऊंगा शायन की परंपरा गलत है

1008
01:09:55,680 --> 01:09:59,760
मतलब कुल मिला के आपका कहने का यह है कि क्योंकि शायन के भाष्य में कहीं पर

1009
01:09:59,760 --> 01:10:04,640
गलती हो गई इसलिए पूरी तरीके से नकार दो कि शायन मानने योग्य नहीं है। आपने

1010
01:10:04,640 --> 01:10:08,720
सुनिए सुनिए आपने खुद ऋषि दयानंद जी के द्वारा आपके आप जो

1011
01:10:08,720 --> 01:10:12,800
मानते हो ऋषि तो दयानंद जी की जो सत्यार्थ प्रकाश है उसमें आपने खुद

1012
01:10:12,800 --> 01:10:16,800
गलतियां मानी है। आपने खुद माना है कि नियोग में उन्होंने गलत कर दिया। ज्यादा

1013
01:10:16,800 --> 01:10:21,040
बात कर दी। इस कारण से उनकी एक भी बात नहीं माननी चाहिए। पहली बात। दूसरी बात

1014
01:10:21,040 --> 01:10:25,280
अगर सायण को आप गलत मान भी लो। मान लो शण गलत है उनका

1015
01:10:25,280 --> 01:10:29,600
क्योंकि भाष्य गलत है। मैं इसलिए यह कर रहा हूं क्योंकि मुझे अपने विषय को बचाना

1016
01:10:29,600 --> 01:10:33,680
है। विषय चल रहा है। ईश्वर अनंत सामर्थ्यवान है तो उसके अवतार में क्या दिक्कत

1017
01:10:33,680 --> 01:10:37,680
है? अब आप अब आप ये वाली बात ले आए कि शायन ने वहां पे कुछ गलत ऐसी

1018
01:10:37,680 --> 01:10:42,320
चीज लिखी है जो हमारी हमारे तर्क के अनुसार लॉजिक्स के अनुसार गलत बैठ रही है। एक मिनट

1019
01:10:42,320 --> 01:10:45,280
जी अगर एक मिनट रुकिए एक मिनट रुकिए। एक

1020
01:10:45,280 --> 01:10:49,280
पूरी बात कर लीजिए। पूरी बात कर लीजिए। पूरी बात कर लीजिए कि अगर आप

1021
01:10:49,280 --> 01:10:53,360
शायन को गलत मान भी रहे हैं तो मुझे आप यह बता दीजिए आपके पास वेद

1022
01:10:53,360 --> 01:10:56,560
मंत्र आए कहां से?

1023
01:10:56,560 --> 01:11:00,880
सुनिए पहले एक बात सुनिए। हां मैंने आपको

1024
01:11:00,880 --> 01:11:04,880
जानकारी है कि नहीं? एत ब्राह्मण का वैज्ञानिक भाष्य क्या है? वेद विज्ञान

1025
01:11:04,880 --> 01:11:09,200
आलोक नाम से विश्व में पहली बार। जी और आचार्य शण

1026
01:11:09,200 --> 01:11:12,560
का मेरे पास भाष्य है

1027
01:11:12,560 --> 01:11:16,560
श के ऋणी हम इसलिए आचार्य शण के

1028
01:11:16,560 --> 01:11:20,720
क्योंकि उन्होंने वेद मंत्र को बचाए रखा उल्टा

1029
01:11:20,720 --> 01:11:24,800
सीधा अर्थ किया भले ही किया लेकिन उन्हें बचाए रखा नहीं तो

1030
01:11:24,800 --> 01:11:29,840
आप अपनी आप अपनी प्रामाणिकता बताएं मुझे सायन के अपनी प्रामाणिकता

1031
01:11:29,840 --> 01:11:34,000
तो सायन ने पशु बलि आप मुझे अपनी प्रामाणिकता

1032
01:11:34,000 --> 01:11:38,400
बताएं आप मुझे अपनी प्रामाणिकता बताएं मेरी प्रामाणिकता

1033
01:11:38,400 --> 01:11:42,400
जी मेरी प्रामाणिकता ये है मेरी प्रामाणिकता जब

1034
01:11:42,400 --> 01:11:46,720
समझ में आएगी जब आप मेरे ग्रंथ पढ़ोगे अभी तो कुछ पढ़ा नहीं

1035
01:11:46,720 --> 01:11:50,800
अच्छा मेरी प्रामाणिकता ये इसका इसका मतलब ये है इसका मतलब

1036
01:11:50,800 --> 01:11:55,120
ये है मैं भी आपको एक गट्ठर दे दूं आप इसको पढ़िए तब आप मेरी प्रमाणिकता समझेंगे

1037
01:11:55,120 --> 01:11:59,360
तो सुनिए हां मेरे हमारे ग्रंथों में

1038
01:11:59,360 --> 01:12:00,320
कहीं भी हिंसा

1039
01:12:00,320 --> 01:12:04,480
नहीं मिलेगी कहीं नरबलि मिलेगी देखिए इस देखिए

1040
01:12:04,480 --> 01:12:08,480
इसका इसका जो उत्तर है ना से इसका जो इसका इसका जो इसका जो

1041
01:12:08,480 --> 01:12:12,480
उत्तर है ना इसका उत्तर पहली बात आपकी सत्यार्थ प्रकाश में ही लिखा गया है। वह

1042
01:12:12,480 --> 01:12:16,560
मैं बता देता हूं। नियोग विषय में बात करते समय वो बात नहीं

1043
01:12:16,560 --> 01:12:20,560
कर रहा। नहीं बात क्यों नहीं कर रहे? आप ला रहे हैं ना बार-ब आप बार-बार पशुलि

1044
01:12:20,560 --> 01:12:24,880
ला रहे हैं तो नियोग लाने दीजिए ना मुझे। यही होता है विषय। [हंसी] यही विषय

1045
01:12:24,880 --> 01:12:29,200
होता है। मैं अपनी कह रहा हूं। आप अगर पशु बलि की तुलना कर रहे हैं ना। पशु

1046
01:12:29,200 --> 01:12:33,280
बलि की तुलना कर रहे तो मैं भी आपको बता रहा हूं। कुछ आप

1047
01:12:33,280 --> 01:12:37,360
अवतार के लाइए प्रमाण। हां तो अवतार का प्रमाण यही मैं मैं बता रहा हूं

1048
01:12:37,360 --> 01:12:41,600
अवतार की बात मैं एक यह वाली बात पूरी कर लूं नियोग में उन्होंने यह

1049
01:12:41,600 --> 01:12:45,600
शतपद ब्राह्मण जब नियोग में एक एक मिनट मुझे एक अच्छी बात है उसमें

1050
01:12:45,600 --> 01:12:49,600
मैं अवमानना नहीं करूंगा दयानंद जी की जब शतपद ब्राह्मण मैं दया

1051
01:12:49,600 --> 01:12:53,600
मैं दयानंद जी का दोष नहीं बता रहा हूं आपको उनका एक लॉजिक बता रहा हूं वो

1052
01:12:53,600 --> 01:12:57,600
सुनिए उन्होंने एक लॉजिक दिया है उन्होंने कहा जब

1053
01:12:57,600 --> 01:13:01,600
यह कहा पूर्व पक्ष में उन्होंने यह रखा महा दयानंद जी ने

1054
01:13:01,600 --> 01:13:06,240
कि भाई यह जो नियोग है इसके बारे में आपने बहुत सारी बातें बता दी मगर अंततवा

1055
01:13:06,240 --> 01:13:10,240
यह मुझे व्यभचार लग रहा है। पाप लग रहा है। यह पूर्व पक्ष रखा उन्होंने दयानंद जी

1056
01:13:10,240 --> 01:13:14,400
ने। तो उन्होंने उस उन्होंने जवाब वहां बहुत अच्छा दिया है कि

1057
01:13:14,400 --> 01:13:15,680
किसी पराई स्त्री

1058
01:13:15,680 --> 01:13:19,760
को तुम जब अपना मान लेते हो विवाह के बाद तो

1059
01:13:19,760 --> 01:13:23,920
किन कारणों से उसको अपना मानते हो? जो अभी तक तुम्हारे लिए अभोज्ञा थी वो

1060
01:13:23,920 --> 01:13:28,160
भोग्या कैसे हो गई तुम्हारे लिए? क्योंकि तुमने शास्त्र से उसको अपने

1061
01:13:28,160 --> 01:13:32,160
लिए भोग्या बनाया। ठीक है? तो इसका मतलब यह है कि

1062
01:13:32,160 --> 01:13:36,320
शास्त्र की दृष्टि से अच्छा और बुरा देखना पड़ता है। अगर हमें अपनी

1063
01:13:36,320 --> 01:13:40,400
दृष्टि से वो गलत दिखाई दे रहा है क्योंकि धर्म और ब्रह्म में हमारी इंद्रिय

1064
01:13:40,400 --> 01:13:44,480
गति बहुत सीमित होती है। इसलिए यदि शास्त्र की दृष्टि वहां पर आ जाती

1065
01:13:44,480 --> 01:13:48,560
है तो वहां पर शास्त्र की दृष्टि से देखना पड़ता है अच्छाई और बुराई में।

1066
01:13:48,560 --> 01:13:52,560
तो इसी प्रकार से जो क्या कहते हैं? शास्त्रों के द्वारा

1067
01:13:52,560 --> 01:13:56,720
वर्णित जो चीजें हैं। पहली बात तो यह है कि आपने उसका परंपरा से अध्ययन नहीं किया है।

1068
01:13:56,720 --> 01:14:01,440
आपने स्वा अध्ययन किया है। शाय मैं परंपरा को

1069
01:14:01,440 --> 01:14:05,600
परंपरा एक मिनट एक मुझे मुझे पूरा करने दीजिए। शायण

1070
01:14:05,600 --> 01:14:09,760
जी जैसे आपके यहां पर यह नहीं माना गया कि नहीं गुरु शिष्य परंपरा कोई

1071
01:14:09,760 --> 01:14:13,760
एक चली हो। मगर शायण जी गुरु शिष्य परंपरा में

1072
01:14:13,760 --> 01:14:17,920
मानते हैं। उनके बड़े भ्राता का नाम था विद्या्य स्वामी। उन्होंने ही उनको वेद भाष्य करने के लिए कहा

1073
01:14:17,920 --> 01:14:22,160
था। और विद्याण्य स्वामी जो है अपने समय के शंकराचार्य थे। शंकराचार्य

1074
01:14:22,160 --> 01:14:26,320
परंपरा से ही चला आ रहा है शायण भाष्य। तो शायण जो है वह परंपरा को मानने

1075
01:14:26,320 --> 01:14:30,880
वाले हैं। उन्होंने अपने भाष्य में यह तक लिखा है कि मैंने प्रमाण और युक्त परंपरा

1076
01:14:30,880 --> 01:14:34,880
परंपरा से प्राप्त ज्ञान विज्ञान के आधार पर ही ये भाष्य किया है। वो परंपरा

1077
01:14:34,880 --> 01:14:39,040
को मानते हैं। तो यदि आप शायन को जानने की बात कह रहे हैं कि मैं

1078
01:14:39,040 --> 01:14:43,040
शायण ने क्या भाग प्रस्तुत किया है तो उनका अध्ययन आपको प्रामाणिक रीति

1079
01:14:43,040 --> 01:14:47,040
से करना चाहिए ना कि बाजार में बुक खरीद करके। जहां पर भी क्वेश्चंस आ

1080
01:14:47,040 --> 01:14:51,600
रहे हैं वहां पर उनके जो प्रामाणिक उत्तराधिकारी हैं उनके पास जाए कि यहां पर मुझे जो है

1081
01:14:51,600 --> 01:14:55,600
जो है संशय हो रहा है तो उसमें मुझे उत्तर चाहिए तब आप भी बता दो ना आप

1082
01:14:55,600 --> 01:14:59,600
तो परंपरा वाले हो ना मैं मैं बता रहा हूं मैं बता रहा हूं आप तो परंपरा वाले हो मैं बता

1083
01:14:59,600 --> 01:15:03,840
रहा हूं मैं दोनों चीजें बता रहा हूं मैं दोनों चीज बता दीजिए इस मंत्र का भी

1084
01:15:03,840 --> 01:15:07,840
मैं दोनों मैं दोनों चीजें बता रहा हूं मैं दोनों चीजें बता रहा हूं मैंने दोनों तरीके से

1085
01:15:07,840 --> 01:15:12,000
आपका उत्तर दिया है। अब मैं पूछ रहा हूं। अब मैं अब मैं पूछ रहा

1086
01:15:12,000 --> 01:15:16,240
हूं कि अगर शायण भी गलत है। आपके पास वेद

1087
01:15:16,240 --> 01:15:21,120
मंत्र किसके द्वारा आए हैं? ये बताइए। सुनिए

1088
01:15:21,120 --> 01:15:25,120
गलत है। उनका अर्थ गलत है। वेद मंत्र थोड़ी

1089
01:15:25,120 --> 01:15:29,200
गलत है। यानी शायन अज्ञानी थे ना एक तरीके से। हां

1090
01:15:29,200 --> 01:15:33,440
बहुत पढ़ा है। अज्ञानी थे। लेकिन समझा नहीं। यानी शायन

1091
01:15:33,440 --> 01:15:37,600
हमारे लिए पढ़ा बहुत। ठीक है। ठीक है। ठीक है। यानी शायण हमारे लिए अज्ञानी

1092
01:15:37,600 --> 01:15:42,720
है। तो जो अज्ञानता कर सकता है वो वेद मंत्र नहीं बदल सकता।

1093
01:15:42,720 --> 01:15:46,160
नहीं बदल सकता। बताइए। क्यों नहीं बदल सकता? इसको

1094
01:15:46,160 --> 01:15:50,160
तो उनको परंपरा को हमने माना। अब इसमें मत जाइए। पहले इस मंत्र का

1095
01:15:50,160 --> 01:15:54,320
अर्थ बताइए जो आपने प्रमाण दिया। देखिए वो जो है

1096
01:15:54,320 --> 01:15:58,320
आप जो मंत्र का अर्थ पूछ रहे हैं। इसी प्रकार से फिर मैं नियोग पे बात करूंगा।

1097
01:15:58,320 --> 01:16:02,560
वो एक एडिशनल चीजें हैं जो आप ला रहे हैं। विषय चल रहा है। मंत्र आपने

1098
01:16:02,560 --> 01:16:06,560
अवतारवाद के लिए अवतारवाद के लिए मंत्र प्रस्तुत किया है।

1099
01:16:06,560 --> 01:16:10,800
उसका बता नहीं पाए। आप आप अर्थ मैंने बता तो दिया।

1100
01:16:10,800 --> 01:16:14,960
वो गलत है। तो आप मुझे अपना प्रामाणिकता बता दीजिए फिर इनके विरुद्ध

1101
01:16:14,960 --> 01:16:18,960
जा। अर्थ क्या बताया आपने? उसमें भी ये नहीं आ रहा कि परमात्मा जन्म

1102
01:16:18,960 --> 01:16:22,960
लेता है। इसमें तो प्रकट होता है। आपने कहां मान लिया प्रकट होता है। बताइए किस

1103
01:16:22,960 --> 01:16:27,280
रूप में प्रकट होता है? सूर्य के रूप में, चंद्र के रूप में, पृथ्वी

1104
01:16:27,280 --> 01:16:31,280
परमात्मा है। नहीं है परमात्मा। फिर प्रकट बताइए ना

1105
01:16:31,280 --> 01:16:35,280
किसके रूप में बिजली प्रकट हो रही है पंखे में पर पंखा बिजली थोड़ी है।

1106
01:16:35,280 --> 01:16:39,440
हां तो फिर इसका मतलब इसका मतलब ये उदाहरण सही नहीं है ना। प्रकट कहां

1107
01:16:39,440 --> 01:16:43,520
हो रहा है? क्या? उदाहरण यही सही है। यही प्रकट हुआ है।

1108
01:16:43,520 --> 01:16:47,520
बिजली पंखा आप यानी कि यानी कि आप यहां ये मान रहे हो

1109
01:16:47,520 --> 01:16:51,520
उसका कार्य प्रकट हुआ। कार्य प्रकट होता है। मगर मगर मंत्र में

1110
01:16:51,520 --> 01:16:55,760
कार्य प्रकट होना नहीं आया। उसमें आया है वो प्रकट हुआ और जो हमारे परंपरा

1111
01:16:55,760 --> 01:16:59,760
प्राप्त है सायण और जो हमारी शंकराचार्य परंपरा है जो प्रामाणिक है वो यह

1112
01:16:59,760 --> 01:17:01,280
मानते हैं कि यहां पर ईश्वर के

1113
01:17:01,280 --> 01:17:05,280
अवतार की बात हो रही है अब बात आती है आप अब आप इसको

1114
01:17:05,280 --> 01:17:09,680
प्रमाणिक नहीं मानते तो मैं कह रहा हूं जो प्रामाणिकता ब्राह्मणों

1115
01:17:09,680 --> 01:17:14,160
को मांसाहारी बता रही है मानने नहीं कह रही है उसको कैसे प्रामाणिक

1116
01:17:14,160 --> 01:17:18,240
तो जो प्रामाणिकता स्त्रियों का देवर के साथ नियोग करा रही है उसको हम प्रामाणिक

1117
01:17:18,240 --> 01:17:22,400
कैसे मान लें कि यह जो है अलग चर्चा कर सकता हूं

1118
01:17:22,400 --> 01:17:26,720
तो फिर बल विषय पे मैं अलग से चर्चा कर सकता हूं। आप अवतार पे रहिए। सांड

1119
01:17:26,720 --> 01:17:31,120
की बात कर ऋष की बात नहीं कर रहा। की बात कर रहा हूं। तो

1120
01:17:31,120 --> 01:17:35,120
मैं दयानंद जी की बात करूंगा ना। आप छोड़ दीजिए आर्य समाज मैंने दयानंद की

1121
01:17:35,120 --> 01:17:39,440
बात। आप आर्य समाज छोड़ दीजिए। अच्छा वेदव्यास जी नियोग

1122
01:17:39,440 --> 01:17:43,680
से पैदा नहीं हुए वेदव्यास जी। अरे भाई मैं बात कर जिस जिस

1123
01:17:43,680 --> 01:17:48,240
समय जिस समय लिखा है आप आपने खुद

1124
01:17:48,240 --> 01:17:52,400
आपने खुद कहा कि आपने खुद माना अपने वीडियो में कि सत्यार्थ

1125
01:17:52,400 --> 01:17:56,480
प्रकाश में नियोग पे ज्यादा बात कर दी इतनी बात नहीं करनी चाहिए थी यानी गलत माना

1126
01:17:56,480 --> 01:18:00,480
ना ये नहीं लिखा ये नहीं कहा मैंने गलत कर दिया ज्यादा

1127
01:18:00,480 --> 01:18:04,880
जो जहां पे जो चीज नहीं करनी चाहिए आज के लिए आपसे मैं

1128
01:18:04,880 --> 01:18:09,120
देखिए देखिए अगर हमारे को अवतार के निष्कर्ष पर पहुंचना है तो बहुत सरल

1129
01:18:09,120 --> 01:18:13,120
सी बात है तर्क पे हमने बहुत देर बात करी अभी आप प्रमाण पे आए अब आप

1130
01:18:13,120 --> 01:18:16,480
प्रमाण पे आए मैं मैं प्रमाण दे रहा हूं मुझे

1131
01:18:16,480 --> 01:18:20,480
आप यह बता दीजिए अगर सायण का अर्थ आप नहीं मान रहे हैं तो आपके पास

1132
01:18:20,480 --> 01:18:24,960
वेद मंत्र कैसे आया मैं सायण का भी लाऊंगा अर्थ साण का भी अर्थ

1133
01:18:24,960 --> 01:18:29,120
मैं भाई साहब आचार्य जी काऊंगा मैं मैं पूछ रहा हूं

1134
01:18:29,120 --> 01:18:33,920
कि आपके पास वेद मंत्र कैसे आया अगर आप सायण को प्रमाण नहीं मान रहे तो

1135
01:18:33,920 --> 01:18:38,080
एक व्यक्ति ने कोई बात कह दी और उसने उसको कह दी इसका अर्थ नहीं

1136
01:18:38,080 --> 01:18:42,080
है कि वो सुना रहे वेद पाठी ब्राह्मण ने वेद मंत्र सुना दिया इसका अर्थ नहीं वो वेद मंत्र

1137
01:18:42,080 --> 01:18:46,240
जानता भी है अर्थ भी जानता है तो वेद के विषय में हमारे पास प्रमाण क्या है कि ईश्वर

1138
01:18:46,240 --> 01:18:50,800
की ही वाणी है ये तो मनुस्मृति प्रमाण है मनुस्मृति

1139
01:18:50,800 --> 01:18:54,800
कहां से प्रमाण है वो कहां से कहां से मत पूछिए कहां से आई मत पूछिए

1140
01:18:54,800 --> 01:18:58,960
आप मनुस्मृति में आपने सारा घोटाला कर दिया है अरे आप बताइए ना कहां

1141
01:18:58,960 --> 01:19:03,520
से आया कहीं से आया कहां से आया उसका अर्थ

1142
01:19:03,520 --> 01:19:06,640
पर बात करिए आप

1143
01:19:06,640 --> 01:19:10,720
आप अर्थ को ठुकरा रहे हैं ना आप जिस जिस एक सोर्स को

1144
01:19:10,720 --> 01:19:14,720
प्रमाणिक मान रहे हैं मंत्र के लिए उसी सोर्स को अप्रामाणिक

1145
01:19:14,720 --> 01:19:18,720
मान रहे हैं उसके अर्थ के लिए बात ये है अपनी बात प्रमाण

1146
01:19:18,720 --> 01:19:22,720
दीजिए दूसरा कहां से आया वो छोड़िए ये आया जो आया

1147
01:19:22,720 --> 01:19:26,880
देखिए मूल तो आया उनसे सायन से लेकिन अर्थ उन्होंने सारा

1148
01:19:26,880 --> 01:19:30,880
गड़बड़ कर दिया यानी कि यानी कि सायन अज्ञानी थे उन्होंने

1149
01:19:30,880 --> 01:19:31,680
गलती की है ना

1150
01:19:31,680 --> 01:19:36,320
भाष्य में सारी गलती है सब गलती नहीं पर बहुत सारी गलती है सा

1151
01:19:36,320 --> 01:19:40,480
जो जो कहीं पर वेदों का अर्थ करते समय गलती

1152
01:19:40,480 --> 01:19:44,480
कर सकता है। वो वेदों का मंत्र लिखते समय भी तो गलती कर सकता है। नहीं कर

1153
01:19:44,480 --> 01:19:48,560
सकता। क्यों? मंत्र तो जैसे तैसे कंप्यूटर भी सुना सकता है। अर्थ नहीं

1154
01:19:48,560 --> 01:19:52,800
कर सकता कंप्यूटर। तो कंप्यूटर तो कंप्यूटर तो कंप्यूटर

1155
01:19:52,800 --> 01:19:56,960
से लेने के बाद हम उस वेद मंत्र को वेद मंत्र नहीं मानते। हम किसी गुरु के पास जाकर सत्यापित

1156
01:19:56,960 --> 01:20:00,960
करते हैं ना। ये वेद है कि नहीं। जैसे आपके यहां पर जर्मनी से वेद आए थे

1157
01:20:00,960 --> 01:20:04,960
तो आपने कहीं पर मैंने सुना है केरल में जाके किसी सत्यापित करवाए थे।

1158
01:20:04,960 --> 01:20:09,280
देखिए जी। अगर वेद की बात कर रहे हैं ना परंपरा से मैं प्रेरण

1159
01:20:09,280 --> 01:20:13,520
करता हूं। एक मंत्र देता हूं। अर्थ करवा दीजिए आप अपनी परंपरा से। चैलेंज देखिए

1160
01:20:13,520 --> 01:20:17,680
आप अपनी प्रामाणिकता बताइए। बात परंपरा की बात मत करिए। मैं अगर आपको

1161
01:20:17,680 --> 01:20:21,760
मेरा मेरा वेद अर्थ आपको प्रामाणिक नहीं लग रहा है तो आप अपनी प्रामाणिकता

1162
01:20:21,760 --> 01:20:25,760
बता दीजिए। कहां से आए वेद मंत्र? तो आप सायण की प्रामाणिकता बता दीजिए। बता

1163
01:20:25,760 --> 01:20:30,000
तो रहा हूं। सायण की प्रामाणिकता जब सुनिए जब महर्षि याजवल

1164
01:20:30,000 --> 01:20:34,240
कह रहे हैं कि गर्भ सूर्य को कहते हैं। सायण की सुनिए। गर्भ गर्भ

1165
01:20:34,240 --> 01:20:38,480
को नहीं कहते। गर्भ गर्भ को नहीं कहते। वेद के गर्भ सूर्य को भी कहते

1166
01:20:38,480 --> 01:20:44,240
गर्भ सूर्य को भी कहते गर्भ गर्भ को भी तो कहते हैं वेद के पद योगिक है

1167
01:20:44,240 --> 01:20:47,200
वेद के पद योगिक है वो गर्व क्यों

1168
01:20:47,200 --> 01:20:51,520
बात आ गई बात आ गई है प्रमाण के पद योगिक है बात आ गई प्रमाण पे

1169
01:20:51,520 --> 01:20:55,520
आप जिनसे वेद के मंत्र ले रहे हैं उसके अर्थ को स्वीकार नहीं कर रहे हैं

1170
01:20:55,520 --> 01:21:00,080
तो बेकार में मंत्र वो और मंत्र देना वो फिर व्यर्थ रुक गया नहीं नहीं दीजिए

1171
01:21:00,080 --> 01:21:04,080
मंत्र दीजिए मंत्र दीजिए दे तो रहा हूं इतने सारे अभी

1172
01:21:04,080 --> 01:21:08,240
तो एक दिया है वो भी अर्थ गड़बड़ उसका

1173
01:21:08,240 --> 01:21:12,320
मैं जो भी मैं जो भी दूंगा उसका अर्थ आपके लिए गड़बड़ ही होगा। यागव जी की बुक

1174
01:21:12,320 --> 01:21:16,400
आपके पास कहां से आई? कहां से ये क्यों पूछ रहे हो? आपके

1175
01:21:16,400 --> 01:21:20,400
यहां अरे भाई अरे भैया पता नहीं किसी मोहम्मद से जाकर ले

1176
01:21:20,400 --> 01:21:24,560
ली। किससे ले ली बताइए मुझे? मोहम्मद से तो आपने ली या पशु वली हमने नहीं

1177
01:21:24,560 --> 01:21:28,720
ली। आपने दिया मोहम्मद को आप अपने पूर्वजों का बात बता दीजिए ना।

1178
01:21:28,720 --> 01:21:33,040
मेरे पूर्वज मैं श्री राम का वंशज हूं। अरे वो पूर्वज

1179
01:21:33,040 --> 01:21:37,680
नहीं विद्या विद्या में सुनिए विद्या में मुंडकोपनिषद पढ़िए

1180
01:21:37,680 --> 01:21:41,680
विद्या विद्या के मामले में एक से लेके पहले ही अध्याय में

1181
01:21:41,680 --> 01:21:45,840
एक से ले चौथे मंत्र तक वहां पर ऋषि अपनी परंपरा

1182
01:21:45,840 --> 01:21:50,000
बता रहे हैं विद्या कैसे आई आप मुझे बताइए आपकी परंपरा|

1183
01:21:50,000 --> 01:21:54,160
परंपरा अच्छा आप बताइए| हां बताइए शंकराचार्य जी गुरु कौन

1184
01:21:54,160 --> 01:21:58,720
थे| बता दे रहा हूं| बताओ| शंकराचार्य

1185
01:21:58,720 --> 01:22:02,320
को व्यास जी तक जोड़िए| व्यास जी हां जोड़ रहा हूं जोड़ रहा जोड़

1186
01:22:02,320 --> 01:22:07,040
रहा हूं। जोड़ रहा हूं जोड़ रहा हूं। अभी जोड़ा दे रहा हूं।

1187
01:22:07,040 --> 01:22:11,040
पहले है अगर पीछे चलते हुए चले तो उनसे पहले

1188
01:22:11,040 --> 01:22:15,200
वाले हैं गोविंद योगेंद्र गोविंद योगेंद्र मत्स्य

1189
01:22:15,200 --> 01:22:19,520
उनसे पहले हैं गडपाद उससे पहले सुखदेव जी उससे पहले व्यासदेव जी उससे पहले पाराशर

1190
01:22:19,520 --> 01:22:23,680
जी उससे पहले शक्ति उससे पहले वशिष्ठ एक मिनट उससे पहले पद्म भव उससे

1191
01:22:23,680 --> 01:22:27,760
पहले नारायण जी कितने कितने खा गए बीच में आप व्यास जी और

1192
01:22:27,760 --> 01:22:32,080
शंकराचार्य जी की चार पीढ़ी बताई आपने देखिए

1193
01:22:32,080 --> 01:22:36,640
यहां पर दो बातें होती है। मैं बताता हूं यहां पे बीच में टूट गई परंपरा।

1194
01:22:36,640 --> 01:22:40,640
दो आंसर है ना नहीं टूटेगी। नहीं टूटेगी। चार पीढ़ी

1195
01:22:40,640 --> 01:22:44,960
है। चार पीढ़ी पहले ठीक है। ठीक है। एक होता है मतानुज्ञा निग्रह

1196
01:22:44,960 --> 01:22:48,960
स्थान कि अगर मैंने कहा कि आप अंधे हो तो आपने कह

1197
01:22:48,960 --> 01:22:53,040
दिया तू भी तो गूंगा है। मेरे गूंगे होने से आपका अंधा ना होना सिद्ध नहीं होता। पहली

1198
01:22:53,040 --> 01:22:57,280
बात मेरे गलत होने से आपका सही होना सिद्ध नहीं होता। आप मेरे

1199
01:22:57,280 --> 01:23:01,280
को अप्रामाणिक कह रहे हैं मगर आप अपनी प्रामाणिकता के लिए भी मेरी अप्रामाणिकता

1200
01:23:01,280 --> 01:23:05,280
को ही आधार बता रहे हैं। अगर मैं अप्रामाणिक हूं इसका मतलब बिना क्वेश्चन की आपको मान

1201
01:23:05,280 --> 01:23:10,080
लेना चाहिए। तो एक पहली बात अभी बात अभी आंसर

1202
01:23:10,080 --> 01:23:14,160
नहीं पूछना चाहिए आंसर आंसर आंसर पूरा नहीं हुआ है। आंसर

1203
01:23:14,160 --> 01:23:17,440
पूरा नहीं हुआ है। आंसर पूरा आंसर पूरा नहीं हुआ

1204
01:23:17,440 --> 01:23:21,440
है। आंसर पूरा नहीं हुआ है। ये बातें बंद कर अर्थ की बात कर पूरी बात बता रहा

1205
01:23:21,440 --> 01:23:25,600
हूं। यह बातें बंद क्यों करें? ये बातें मैं मंत्र ला रहा हूं। भाई वह मंत्र

1206
01:23:25,600 --> 01:23:29,840
लाने का कोई मतलब नहीं है ना इसीलिए तो परंपरा पूछता हूं परंपरा

1207
01:23:29,840 --> 01:23:34,080
पूछता हूं मेरी मेरी

1208
01:23:34,080 --> 01:23:38,160
मेरी मेरी दूसरी बात भी सुन लीजिए दूसरी पहली तो ये हो गई मेरे गलत होने से

1209
01:23:38,160 --> 01:23:43,920
आपका सही होना सिद्ध नहीं होता दूसरी बात ये आती है कि

1210
01:23:43,920 --> 01:23:48,000
इसको थोड़ा सा मैं समझा देता हूं आपको कि मान लीजिए इसको

1211
01:23:48,000 --> 01:23:52,320
बताइए मैं परंपरा से अर्थ पूछ रहा हूं सरगा शुक्र परंपरा

1212
01:23:52,320 --> 01:23:56,400
हमारे यहां पर ईश्वर को निराकार सगुण निराकार और सगुण साकार

1213
01:23:56,400 --> 01:24:01,920
तीनों रूपों में स्वीकार किया गया है। पहला है एक मिनट

1214
01:24:01,920 --> 01:24:05,920
एक मिनट जिन मंत्रों का बताइए क्या

1215
01:24:05,920 --> 01:24:10,080
किया है आचार्य जी जिन मंत्रों का अर्थ जिन मंत्रों का अर्थ ईश्वर

1216
01:24:10,080 --> 01:24:14,160
के निराकार रूप में सिद्ध है उनको हम स्वीकार करते हैं। जिन मंत्रों का

1217
01:24:14,160 --> 01:24:18,160
अर्थ ईश्वर के सगुण निराकार होने में सिद्ध है उसको भी हम स्वीकार करते हैं।

1218
01:24:18,160 --> 01:24:22,560
ऐसा मंत्र ऐसा मंत्र बताइए कि आचार्य जीत

1219
01:24:22,560 --> 01:24:26,640
राम के आचार्य जी थोड़ी तीन बातें हो गई

1220
01:24:26,640 --> 01:24:30,720
हमने बहुत देर तक तर्क पे बात की थी उसके बाद प्रमाण पे आए और फिर

1221
01:24:30,720 --> 01:24:32,480
उसके बाद प्रमाण की प्रामाणिकता

1222
01:24:32,480 --> 01:24:36,560
परंपरा अब एक आपने बात कही थी कि अगर आपके पास तर्क नहीं

1223
01:24:36,560 --> 01:24:40,800
होगा तो आपको घोषणा करनी होगी कि आपके आर्य समाज के पास तर्क नहीं है। पहले आप वो घोषणा

1224
01:24:40,800 --> 01:24:44,960
कर दीजिए। फिर मैं प्रमाण पे बात करता हूं। अच्छे से सारी बातें तर्क से हमने खत्म

1225
01:24:44,960 --> 01:24:49,120
की आपकी। कहां तर्क से तर्क से उत्तर दिया आप कहां तर्क

1226
01:24:49,120 --> 01:24:53,120
से उत्तर दिया आप आप गंदगी को ईश्वर से जोड़ रहे हो आपको उस गंदगी

1227
01:24:53,120 --> 01:24:57,680
आप आप जिस आप जब ईश्वर को

1228
01:24:57,680 --> 01:25:01,680
आप जब ईश्वर को जिस कार्य के कारण जिन कार्यों के द्वारा

1229
01:25:01,680 --> 01:25:05,760
मनुष्य लिप्त हो जाएगा जिन कार्यों से उन कार्यों के कारण आप ईश्वर को पापी नहीं मान

1230
01:25:05,760 --> 01:25:10,160
रहे हो और वहीं पर अगर वो अवतार ले रहा है तो पापी मान रहे हो जैसे कि

1231
01:25:10,160 --> 01:25:14,240
जैसे कि जब स्त्रियां नहा रही हैं सरोवर में तब भी ईश्वर देख रहा है मगर उसने

1232
01:25:14,240 --> 01:25:18,400
कृष्ण बन के अगर देख लिया तो वह पापी हो गया। यह बात

1233
01:25:18,400 --> 01:25:22,480
है। आप अगर उसने रूप ले लिया अगर उसने रूप ले लिया तो पापी

1234
01:25:22,480 --> 01:25:26,480
हो गया। तो आपका तर्क कटा। मैंने कहा अनंत एक पॉइंट भी

1235
01:25:26,480 --> 01:25:30,640
अगर वो रुकेगा तो अंत है। उसकी सामर्थ्य का अंत है।

1236
01:25:30,640 --> 01:25:34,880
अनंत सामर्थ्यवान सिद्ध करिए उसे। अनंत वरना कहिए।

1237
01:25:34,880 --> 01:25:38,960
वरना यह कहिए कि वह अनंत सृष्टि रच सकता है।

1238
01:25:38,960 --> 01:25:42,960
वह अनंत यह फला काम कर सकता है। उसके अंदर अनंत मगर वो अनंत

1239
01:25:42,960 --> 01:25:47,120
सामर्थ्यवान नहीं है। किसी कुरान का उपदेश

1240
01:25:47,120 --> 01:25:47,620
भी कर सकता

1241
01:25:47,600 --> 01:25:51,600
है। नहीं तो उसकी अनंतता भंग होगी। बाइबल का उपदेश भी करेगा

1242
01:25:51,600 --> 01:25:55,840
नहीं तो अनंतता भंग होगी। आपने खुद कहा कि आपने खुद कहा आपने आपने

1243
01:25:55,840 --> 01:26:00,000
खुद कहा मनुष्य कोई भी कार्य बिना ईश्वर की सहायता से कर ही नहीं रहा है। यानी कुरान भी देने

1244
01:26:00,000 --> 01:26:04,400
में ईश्वर की सहायता तो आपने भी मानी। सुनिए ये नहीं होता है। जी जी ऐच्छिक

1245
01:26:04,400 --> 01:26:08,480
क्रिया अनैच्छिक क्रियाएं हृदय की धड़कन ईश्वर का काम है लेकिन अच्छे

1246
01:26:08,480 --> 01:26:13,200
बुरे कर्म करना मेरा काम है। ईश्वर की सहायता है ना उसमें

1247
01:26:13,200 --> 01:26:17,360
ईश्वर की सहायता इसमें थोड़ी है अच्छे बुरे कर्म करने में उसके शरीर को चलाने

1248
01:26:17,360 --> 01:26:21,760
में ईश्वर की सहायता है वो पाप करने में थोड़ी ईश्वर की सहायता है कैसे

1249
01:26:21,760 --> 01:26:26,160
अगर उसका अरे भाई वही तो मैं कह रहा हूं आप मानना पड़ेगा कि मोहम्मद

1250
01:26:26,160 --> 01:26:30,400
भी राम दोनों ही अवतार हैं। कैसे अंतर करेंगे? आप

1251
01:26:30,400 --> 01:26:34,560
जब ये चलिए ठीक है। अंतर ठीक है। ठीक है। ठीक है। मैं बता रहा हूं। आपने कहा कि

1252
01:26:34,560 --> 01:26:38,640
ईश्वर नाना रूपों में प्रकट होता है। ठीक है? सूर्य को माना, चंद्रमा को

1253
01:26:38,640 --> 01:26:42,960
माना। इसका मतलब नाली भी ईश्वर है। सब में ईश्वर है। नाली

1254
01:26:42,960 --> 01:26:47,040
ईश्वर नहीं है। नाली नाली नाली नाली क्या होती

1255
01:26:47,040 --> 01:26:51,520
है? नाली नाली मॉलिक्यूल है। उनमें भी ईश्वर है। हां उनमें नहीं

1256
01:26:51,520 --> 01:26:55,840
नाली के रूप में भी ईश्वर ने अपने आप को प्रकट किया है। नाली नाली

1257
01:26:55,840 --> 01:27:00,000
मल हां सब में ईश्वर है। मॉलिक्यूल को तो बस बस ऐसे

1258
01:27:00,000 --> 01:27:02,880
मल मल भी ईश्वर है। सब में ईश्वर है।

1259
01:27:02,880 --> 01:27:07,680
आर्य समाज का ईश्वर मल भी मल के रूप में भी अपने आप को प्रकट करता है। नहीं करता

1260
01:27:07,680 --> 01:27:12,080
बस ऐसे ही है ऐसे ही है अब सुनिए सुनिए सुनिए

1261
01:27:12,080 --> 01:27:16,400
अब अब अब अब अब सुन लीजिए एक चीज प्रमाण लाइए कुतर्क मत करिए

1262
01:27:16,400 --> 01:27:20,640
मैं आपको जो है मोहम्मद वाला मोहम्मद कुतर्क आपका मोहम्मद कुतर्क नहीं है मेरी नाली

1263
01:27:20,640 --> 01:27:25,440
कुतर्क है आपका मोहम्मद कुतर्क नहीं है आपकी कुरान कुतर्क नहीं है आपकी

1264
01:27:25,440 --> 01:27:29,440
आपकी कुरान कुतर्क नहीं है मगर मेरा जो मल है वो कुतर्क है आपने कहा

1265
01:27:29,440 --> 01:27:33,600
कि कृष्ण बनके नंगे दर्शन कर सकता है तो मोहम्मद बनके मार भी सकता है

1266
01:27:33,600 --> 01:27:37,680
लोगों को मैंने कहा मैंने कहा मैंने मैंने कहा आपका ईश्वर नहीं देख रहा है क्या

1267
01:27:37,680 --> 01:27:41,680
जहां वो नहा रही है ईश्वर ईश्वर ईश्वर तो

1268
01:27:41,680 --> 01:27:45,840
उनके अंदर भी है उसको देख मैं कह रहा हूं ईश्वर देख रहा है ना उसकी

1269
01:27:45,840 --> 01:27:50,080
आंख नहीं है वो देखता नहीं है बिना आंखों के सब देखता है ईश्वर ईश्वर

1270
01:27:50,080 --> 01:27:54,080
देखता है ना वही मैं कह रहा हूं मैं क्या कह रहा हूं आंखों से देखेगा कह रहा हूं

1271
01:27:54,080 --> 01:27:58,080
देख रहा है ना वो देख रहा है ना आप जो कुतर्क है वो भी देख रहा है ये

1272
01:27:58,080 --> 01:28:02,080
ये आप कहां लिखा है बता दीजिए कुतर्क मेरे जो कुत ये कहां लिखा है कि वो

1273
01:28:02,080 --> 01:28:06,640
उनको ईश्वर देख रहा था तो नहीं देख रहा ये आपकी परंपराएं

1274
01:28:06,640 --> 01:28:10,720
पाप लिखे उसमें कृष्ण भगवान का दोष आपके आर्य समाज में पाप लिखे हुए हैं उसमें

1275
01:28:10,720 --> 01:28:14,800
दोष है पाप आपने लिखे हैं पाप आपने लिखे हैं ठीक है आप व्यक्तिगत

1276
01:28:14,800 --> 01:28:18,000
हो रहे हैं ठीक है आप आप

1277
01:28:18,000 --> 01:28:23,200
जा सकते हैं आप आप अपना काम करिए आचार्य जी आप व्यक्तिगत हो रहे हैं

1278
01:28:23,200 --> 01:28:27,280
आप आप विषय कर रहे हैं आपको हर तरह का

1279
01:28:27,280 --> 01:28:31,520
तर्क दिया है मैंने हर तरह आपके पास तर्क नहीं है तभी आप प्रमाण पे आए तर्क

1280
01:28:31,520 --> 01:28:35,760
नहीं है आपके पास आपके पास तर्क आपके आपकी आपकी

1281
01:28:35,760 --> 01:28:38,320
भागवत आप अपनी माला जपते रहिए आप

1282
01:28:38,320 --> 01:28:42,320
नहीं नहीं आप अपनी जपिए
