1
00:00:04,160 --> 00:00:08,800
तो सभी को जय श्री राम। आप सभी को

2
00:00:08,800 --> 00:00:13,920
दीप मलिकोत्सव पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।

3
00:00:13,920 --> 00:00:17,920
देखिए दीपावली का त्यौहार जब भी आता था आज से पहले तो

4
00:00:17,920 --> 00:00:21,920
कई बार मुझसे लोग प्रश्न पूछते थे कि दीपावली के पीछे महत्व

5
00:00:21,920 --> 00:00:26,240
क्या है? और मैंने देखा है कि आम जनमानस में दीपावली

6
00:00:26,240 --> 00:00:31,040
के पर्व को लेकर के संशय की स्थिति बनी रहती है

7
00:00:31,040 --> 00:00:35,040
कि यह पर्व क्यों मनाया जाता है? कहां से इसकी स्टार्टिंग

8
00:00:35,040 --> 00:00:39,440
हुई है और शास्त्रों में इसके बारे में क्या वर्णित है?

9
00:00:39,440 --> 00:00:43,600
कुछ लोग ऐसा फैलाते हैं कि इस दिन लक्ष्मी गणेश का पूजन नहीं होना

10
00:00:43,600 --> 00:00:47,600
चाहिए। बल्कि श्री रामचंद्र जी का ही पूजन होना चाहिए। क्योंकि इस दिन श्री

11
00:00:47,600 --> 00:00:51,600
रामचंद्र जी वापस आए थे। और कुछ लोग श्री रामचंद्र

12
00:00:51,600 --> 00:00:55,840
जी से जोड़ने पर भी आपत्ति प्रकट करते हैं कि इस त्यौहार से श्री

13
00:00:55,840 --> 00:00:59,840
रामचंद्र जी के घर वापस लौटने का अयोध्या वापस लौटने

14
00:00:59,840 --> 00:01:04,000
का कोई संबंध नहीं है। और इन

15
00:01:04,000 --> 00:01:08,080
सारे संशयों के बीच क्योंकि आहवान का जो बेस

16
00:01:08,080 --> 00:01:12,800
है वह इसी बात पर है कि संशयात्मा विनश्यति

17
00:01:12,800 --> 00:01:16,960
संशय जिसके मन में होता है वह ना तो इस लोक में सुखी

18
00:01:16,960 --> 00:01:19,360
रह पाता है ना ही परलोक में

19
00:01:19,360 --> 00:01:23,520
और मेरा जीवन इसी एक श्लोक पर आधारित है। जो मैं

20
00:01:23,520 --> 00:01:27,680
कार्य कर रहा हूं ना संशय दूर होना चाहिए। संशय दूर

21
00:01:27,680 --> 00:01:31,680
होगा तभी हम वैचारिक तौर पर संगठित होंगे। क्योंकि संशय दूर

22
00:01:31,680 --> 00:01:36,240
होने पर अलग-अलग जो मतियां बनी हुई है, वह एक मत हो जाएंगे

23
00:01:36,240 --> 00:01:40,400
सबकी। तो इस कारण से सिंगल पॉइंट एजेंडा है कि

24
00:01:40,400 --> 00:01:44,640
संशय जो बने हुए हैं धर्म को लेकर के, भगवान को लेकर के,

25
00:01:44,640 --> 00:01:48,800
धर्म और अध्यात्म को लेकर के वो ज्यादा से ज्यादा लोगों में दूर हो। जिससे

26
00:01:48,800 --> 00:01:52,880
कि हम एक मत हो पाएं। और जैसे ही हम वैचारिक आधार पर एक

27
00:01:52,880 --> 00:01:57,040
होंगे वैसे ही हम व्यवहारिक आधार पर एकत्र होते हुए

28
00:01:57,040 --> 00:02:01,280
संगठित होते हुए अपने धर्म अपने

29
00:02:01,280 --> 00:02:05,520
अस्तित्व और आदर्श की रक्षा कर पाएंगे। तो जब

30
00:02:05,520 --> 00:02:10,560
यह संशय फैला होता है तो किस प्रकार से शत्रु हमारे

31
00:02:10,560 --> 00:02:14,880
गढ़ में घुसने का प्रयास करता है उसी का एक ज्वलंत

32
00:02:14,880 --> 00:02:18,880
उदाहरण है रामपाल। तो रामपाल भी इसी बीच

33
00:02:18,880 --> 00:02:22,880
घुस आता है जब यह देखता है कि इस पर्व को लेकर के अनेकों प्रकार के

34
00:02:22,880 --> 00:02:26,960
संशय हैं तो आपको आपकी जो मूल धारणाएं हैं

35
00:02:26,960 --> 00:02:31,280
उनसे पृथक करने के लिए रामपाल ने अपनी जेलधाम यात्रा

36
00:02:31,280 --> 00:02:34,480
से पूर्व 2014 में जो कुछ

37
00:02:34,480 --> 00:02:38,720
वीडियोस बनाए थे उनमें से एक वीडियो उसने इस

38
00:02:38,720 --> 00:02:43,040
बारे में भी बनाया होगा कि दीपावली क्यों नहीं मनानी

39
00:02:43,040 --> 00:02:47,120
चाहिए और दीपावली के संबंध में आम

40
00:02:47,120 --> 00:02:51,120
जनमानस में या कहें कि उसकी गीता के अनुसार उसकी गीता में लिखा है कि

41
00:02:51,120 --> 00:02:55,120
उसको फॉलो करने वाले निम्न बुद्धि के पिछड़े

42
00:02:55,120 --> 00:02:59,120
हुए अशिक्षित लोग होते हैं। है ना? ऐसा उसकी गीता में

43
00:02:59,120 --> 00:03:03,200
लिखा है। तो उसकी गीता के अनुसार ही यह मान लिया

44
00:03:03,200 --> 00:03:07,200
जाए कि जिन लोगों के बुद्धि कम होती है या पिछड़े होते हैं जो उन लोगों

45
00:03:07,200 --> 00:03:11,360
के अंदर सनातन धर्म की जो मूल अवधारणाएं हैं उनके प्रति द्वेष

46
00:03:11,360 --> 00:03:15,680
भरने के लिए जहर भरने के लिए यह जो है

47
00:03:15,680 --> 00:03:19,840
घुस आता है हमारे गढ़ में इस संशय को देखते हुए जहां पर हम लोग संशय

48
00:03:19,840 --> 00:03:23,840
में हैं वहीं पर जो बाहरी व्यक्ति है वह प्रवेश करता

49
00:03:23,840 --> 00:03:28,480
है हमारे धार्मिक गढ़ के अंदर और फिर

50
00:03:28,480 --> 00:03:32,480
वहां पर हमारे ही भाइयों को हमसे दूर ले जाता है या फिर

51
00:03:32,480 --> 00:03:36,640
विप्लव की स्थितियां उत्पन्न करने का प्रयास करता है। कोई किसी भी प्रकार

52
00:03:36,640 --> 00:03:40,800
से सनातन धर्म को सनातन को मानने वाले

53
00:03:40,800 --> 00:03:45,680
समाज को क्षति पहुंचाने का प्रयास करता है। तो रामपाल

54
00:03:45,680 --> 00:03:49,680
का जो वीडियो है उस पर आधारित उसका जो तथाकथित तंत्र आजकल चल

55
00:03:49,680 --> 00:03:53,920
रहा है जिस पर हमने हाई कोर्ट में याचिका लगाई हुई है जिस पर सुनवाई

56
00:03:53,920 --> 00:03:57,920
हो रही है। फिलहाल जो हिसार जेल जहां पर बंद है

57
00:03:57,920 --> 00:04:02,080
रामपाल वहां के जेलर को तलब किया गया है और उससे पूछा गया

58
00:04:02,080 --> 00:04:06,080
है कि भाई तुम्हारी जेल में रहते हुए रामपाल ये सब कैसे

59
00:04:06,080 --> 00:04:10,240
कर रहा है उसका जवाब दो आ करके तो ये

60
00:04:10,240 --> 00:04:14,240
तो सारी रही एक बात मगर रामपाल जो वीडियोस बना करके गया

61
00:04:14,240 --> 00:04:18,560
उसकी मदद के आधार पर बहुत ही घृणा मतलब घृणा

62
00:04:18,560 --> 00:04:22,640
से ओतप्रोत ऐसा वीडियो जिसको सुनकर के किसी भी सनातनी

63
00:04:22,640 --> 00:04:26,640
के कानों में ऐसा लगेगा जैसे कि किसी ने तेजाब

64
00:04:26,640 --> 00:04:30,800
डाल दिया हो। ऐसी ऐसी बातें बताते हुए वीडियो

65
00:04:30,800 --> 00:04:35,040
निर्गत किया जाता है। प्रत्येक वर्ष दीपावली के आसपास प्रत्येक

66
00:04:35,040 --> 00:04:39,200
वर्ष जो भी हमारे महत्वपूर्ण त्यौहार होते हैं चाहे होली हो चाहे दिवाली हो,

67
00:04:39,200 --> 00:04:43,200
चाहे रक्षाबंधन हो, चाहे भाईदूज हो, चाहे वो कावड़

68
00:04:43,200 --> 00:04:48,080
यात्रा हो, चाहे वो महाशिवरात्रि हो, उन पर्वों के विरोध में

69
00:04:48,080 --> 00:04:52,080
नकारात्मक वीडियोस बना के फैलाए जाते हैं। जिससे

70
00:04:52,080 --> 00:04:56,160
कि पता चलता है कि यह पूरा एक बाहरी एक विदेशी एजेंडा है

71
00:04:56,160 --> 00:05:00,160
जो रामपाल के रूप में यहां पे काम कर रहा है हमारे हिंदू

72
00:05:00,160 --> 00:05:04,160
धर्म को क्षति पहुंचाने के लिए सनातन धर्म को क्षति पहुंचाने के लिए।

73
00:05:04,160 --> 00:05:04,880
तो

74
00:05:04,880 --> 00:05:09,040
जब मैंने उसका वीडियो देखा तो मैंने कहा कि भाई जो हमारा संशय फैला हुआ है उसके बारे

75
00:05:09,040 --> 00:05:13,200
में भी कुछ जानकारियां उपलब्ध करा दूं और उसने

76
00:05:13,200 --> 00:05:17,280
जो नीचता भरी बातें कही हैं उनका भी

77
00:05:17,280 --> 00:05:21,520
उत्तर दे दूं। तो सबसे पहले आप यह जान लीजिए कि दीपावली हमारे यहां क्यों मनाई

78
00:05:21,520 --> 00:05:25,680
जाती है? इसका क्या अर्थ है? व्यवहारिक आधार क्या है? और जो हमारा

79
00:05:25,680 --> 00:05:30,080
स्मृतियों के अनुसार जो शास्त्रोक्त आधार है वह क्या है?

80
00:05:30,080 --> 00:05:34,640
तो महाराज जो प्रथु थे उन्होंने भारतीय

81
00:05:34,640 --> 00:05:38,960
धर धरती का उद्धार किया था और जो है फसल इत्यादि

82
00:05:38,960 --> 00:05:43,200
में वृद्धि हो सके। इस संबंध में कार्य करके एक तरीके से

83
00:05:43,200 --> 00:05:47,680
उद्धार किया था धरती का। तो सबसे पहले तो इस घटना

84
00:05:47,680 --> 00:05:51,840
से भी जोड़कर के दीपावली को देखा जाता है। दूसरा इससे जुड़ा

85
00:05:51,840 --> 00:05:56,480
हुआ है जो राक्षस राज बलि थे उन्होंने

86
00:05:56,480 --> 00:06:00,800
एक समय पे माता लक्ष्मी को भी अनेक

87
00:06:00,800 --> 00:06:04,880
देवताओं के साथ बंदी बना लिया था और फिर वामन भगवान के

88
00:06:04,880 --> 00:06:08,880
आने पर उन्हें जो लक्ष्मी माताएं

89
00:06:08,880 --> 00:06:13,040
मुक्त हुई थी और उससे संबंधित भी

90
00:06:13,040 --> 00:06:17,200
जो दीपावली पर्व है उसको जोड़कर के देखा जाता है हमारे यहां। इसके साथ

91
00:06:17,200 --> 00:06:20,080
ही साथ समुद्र मंथन से धनवंतरी भगवान

92
00:06:20,080 --> 00:06:24,320
उत्पन्न हुए थे। अमृत कलश लेकर के और आयुर्वेद

93
00:06:24,320 --> 00:06:28,400
लेकर के और उसी क्रम में माता

94
00:06:28,400 --> 00:06:32,480
लक्ष्मी उत्पन्न होती हैं, प्रकट होती हैं

95
00:06:32,480 --> 00:06:36,560
समुद्र मंथन से। तो उस घटना से भी दीपावली

96
00:06:36,560 --> 00:06:40,560
महोत्सव जुड़ा हुआ है। इसके साथ ही साथ धन त्रयोदशी

97
00:06:40,560 --> 00:06:44,800
और दीप मलिकोत्सव के बीच में जो नरक चतुर्दशी आती

98
00:06:44,800 --> 00:06:48,800
है उससे भगवान श्री कृष्ण द्वारा जो नरकासुर का वध है

99
00:06:48,800 --> 00:06:52,880
वो जुड़ा हुआ है। तो इस प्रकार से यह एक श्रंखला बन जाती है

100
00:06:52,880 --> 00:06:57,120
कि अह धन त्रयोदशी जिस दिन धनवंतरी

101
00:06:57,120 --> 00:07:01,440
भगवान उत्पन्न होते हैं और उसके बाद नरक चतुर्दशी और उसके

102
00:07:01,440 --> 00:07:05,600
बाद दीप मलिकोत्सव यानी कि अमावस्या के दिन और जिस

103
00:07:05,600 --> 00:07:09,600
दिन माता लक्ष्मी उत्पन्न हुई और जिस दिन राजा बलि

104
00:07:09,600 --> 00:07:13,920
के बंधन से माता लक्ष्मी को मुक्त कराया था भगवान विष्णु ने भगवान

105
00:07:13,920 --> 00:07:18,240
वामन के रूप में आकर के ये सारी घटनाएं आपको पद्म पुराण

106
00:07:18,240 --> 00:07:22,480
स्कंद पुराण भविष्य पुराण श्रीमद् भागवत पुराण इन सभी पुराणों

107
00:07:22,480 --> 00:07:26,640
में कल्प वेद से थोड़े बहुत दृष्ट जो घटनाक्रम है उसमें

108
00:07:26,640 --> 00:07:30,880
थोड़ा बहुत ऊपर नीचे के भेद से आपको यह सारी घटनाएं मिल जाएंगी।

109
00:07:30,880 --> 00:07:35,760
स्कंद पुराण की अगर बात करें तो स्कंद पुराण के वैष्णव खंड में

110
00:07:35,760 --> 00:07:40,320
अ कार्तिक मास महात्म नामक जो

111
00:07:40,320 --> 00:07:44,320
उसका भाग है उसमें दसवां अध्याय है

112
00:07:44,320 --> 00:07:48,720
जिसमें कि कार्तिक मास का महत्व चल रहा है। उसी में कार्तिक दीपावली

113
00:07:48,720 --> 00:07:52,880
इत्यादि के बारे में सब बताया गया। नौवा और दसवां आप पढ़ सकते हैं। जहां पर जो घटना

114
00:07:52,880 --> 00:07:57,280
बताई गई है वहां पर राजा बलि द्वारा

115
00:07:57,280 --> 00:08:01,840
जब वामन भगवान

116
00:08:01,840 --> 00:08:05,920
वामन भगवान ने जब राजा बलि से धरती को मुक्त करा लिया

117
00:08:05,920 --> 00:08:10,000
उसके बाद राजा बलि ने भगवान से वरदान मांगा

118
00:08:10,000 --> 00:08:14,640
था कि प्रत्येक वर्ष आप तीन दिवस के लिए इस

119
00:08:14,640 --> 00:08:18,800
जो प्रजा है उस पर मेरा शासन लागू करें और उस दिन प्रजा में

120
00:08:18,800 --> 00:08:23,040
जो है अमुक अमुक तरीके से वहां पर इस इस तरीके तरीके के महोत्सव

121
00:08:23,040 --> 00:08:27,280
मनाए जाए। उस महोत्सव के अनुसार वहां पर

122
00:08:27,280 --> 00:08:31,360
जो जनता है वह एक प्रण ले कि अब मैं असत्यवादी नहीं रहूंगी। व्यभचारी

123
00:08:31,360 --> 00:08:35,360
नहीं रहूंगी। जनता मतलब जनसामान्य व्यभचार से दूर हो जाए। अमुक अमुक

124
00:08:35,360 --> 00:08:39,360
जितने भी दोष हैं उनसे दूर हो जाए और उनके यहां पर वो महोत्सव मनाया

125
00:08:39,360 --> 00:08:43,760
जाए। तो प्रत्येक वर्ष जो है तीन दिवस मेरा शासन व्याप्त हो।

126
00:08:43,760 --> 00:08:47,920
मेरा शासन हट जाने के बाद भी। तो यह वरदान उन्होंने मांगा था।

127
00:08:47,920 --> 00:08:50,880
विष्णु भगवान ने वह वरदान दिया था। तो उस

128
00:08:50,880 --> 00:08:55,040
वरदान के अनुसार भी ये तीन दिन जो तीन दिन जो है वो आते हैं प्रत्येक

129
00:08:55,040 --> 00:08:59,440
वर्ष जिसमें कि धन त्रयोदशी होता है और फिर उसके बाद

130
00:08:59,440 --> 00:09:03,920
नरक चतुर्दशी होती है और फिर जो है अ

131
00:09:03,920 --> 00:09:08,160
ये दीप मलिकोत्सव होता है। अच्छा इसके

132
00:09:08,160 --> 00:09:12,320
साथ ही साथ एक बात और है जो दीपावली से जुड़ती है कि

133
00:09:12,320 --> 00:09:16,480
श्री रामचंद्र जी जब घर वापस आ गए थे तो घर वापस आने

134
00:09:16,480 --> 00:09:20,720
के बाद श्री रामचंद्र जी जब अयोध्या वापस आ गए थे युद्ध विजय प्राप्त करके सीता

135
00:09:20,720 --> 00:09:24,880
माता को साथ लेकर के जब अयोध्या में वापस आ गए थे तो उसके बाद

136
00:09:24,880 --> 00:09:29,120
जो दीपावली पर्व बना था वो उसमें एक अलग ही हर्षोल्लास था।

137
00:09:29,120 --> 00:09:33,360
तो यह कहा जा सकता है कि दीपावली पर्व से कालांतर

138
00:09:33,360 --> 00:09:37,360
में अनेक प्रकार की घटनाएं जुड़ती चली गई। जैसे कि अ श्री

139
00:09:37,360 --> 00:09:41,440
कृष्ण भगवान द्वारा नरकासुर का वध और श्री राम जी का

140
00:09:41,440 --> 00:09:45,680
अयोध्या आगमन। तो इसी तो ऐसा नहीं कर सकते कि वह जो दीपावली

141
00:09:45,680 --> 00:09:49,680
है उससे श्री रामचंद्र जी का कोई मतलब नहीं है। मतलब यह

142
00:09:49,680 --> 00:09:53,920
है कि अंधकार पर प्रकाश की विजय

143
00:09:53,920 --> 00:09:58,000
मतलब यह है तो उसमें कहीं नरकासुर का वध हो रहा है। कहीं पर

144
00:09:58,000 --> 00:10:02,080
श्री राम जी का राज्य हो रहा है। कहीं पर जो है लक्ष्मी माता मुक्त हो रही है।

145
00:10:02,080 --> 00:10:05,920
कहीं पर लक्ष्मी माता प्रकट हो रही हैं। तो ये सारी चीजें

146
00:10:05,920 --> 00:10:10,240
दीपावली से जुड़ जाती है। अब इसका जो एक

147
00:10:10,240 --> 00:10:15,520
व्यवहारिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण है वह यह है कि

148
00:10:15,520 --> 00:10:19,680
जब शीतकालीन जो फसल होती है वो आ

149
00:10:19,680 --> 00:10:23,920
चुकी होती है लोगों के पास लोगों के घरों में एकत्र हो चुका होता है तो

150
00:10:23,920 --> 00:10:27,920
लोग काफी समय तक वस्त्र इत्यादि के

151
00:10:27,920 --> 00:10:32,160
लिए परेशान नहीं होने वाले उनकी चिंता से वस्त्र की चिंता

152
00:10:32,160 --> 00:10:38,000
से मुक्त हो जाते हैं तो उस रूप में भी नए वस्त्रों के रूप में और

153
00:10:38,000 --> 00:10:42,640
कहना चाहिए कि पूरे वर्ष का एक आर्थिक गणना

154
00:10:42,640 --> 00:10:46,960
होती है लोगों के यहां कि भाई हमने इस पूरे वर्ष कितना पाया

155
00:10:46,960 --> 00:10:50,960
कितना खोया या आगे क्या करना है यह सारी चीजें भी ऐड ऑन

156
00:10:50,960 --> 00:10:54,960
होती है वहीं पर और एक परिवर्तन वहां पर आ रहा होता है कि अब आगे क्या

157
00:10:54,960 --> 00:10:59,440
करना है अब तक हमने क्या पाया है तो इसको एक आर्थिक क्रांति

158
00:10:59,440 --> 00:11:03,840
के विषय पर्व के रूप में भी मनाया जाता है और इसीलिए

159
00:11:03,840 --> 00:11:08,000
जो राजा बलि ने जब वहां पर वरदान मांगा था तो वह तीन दिवस में वहां

160
00:11:08,000 --> 00:11:12,160
पर दत क्रीड़ा जो होती है जिसको आम भाषा में हम लोग जुआ भी कहते हैं

161
00:11:12,160 --> 00:11:16,160
उसका भी प्रावधान है कि वहां पर तरह-तरह के खेल हो, तमाशे हो और

162
00:11:16,160 --> 00:11:20,160
वहां पे उन दिनों जो है दत क्रीड़ा भी हो। अब दत क्रीड़ा जो

163
00:11:20,160 --> 00:11:21,120
होती है वो दो प्रकार

164
00:11:21,120 --> 00:11:25,120
की होती है। एक ऐसी होती है जिसमें कि व्यक्ति का अपना

165
00:11:25,120 --> 00:11:29,120
बुद्धि अथवा बाहुबल नहीं लगता है। तो उस दत क्रीड़ा

166
00:11:29,120 --> 00:11:34,640
का निषेध माना गया है सर्वथा शास्त्रों के द्वारा। परंतु

167
00:11:34,640 --> 00:11:38,800
एक प्रकार की दूत द्वत क्रीड़ा ऐसी होती है जिसमें कि व्यक्ति की अपनी कल्पना

168
00:11:38,800 --> 00:11:42,880
शक्ति अपनी अह क्या कहते हैं यह

169
00:11:42,880 --> 00:11:47,360
बाहुबल अथवा बुद्धि बल इत्यादि का प्रयोग होता है तो उसमें

170
00:11:47,360 --> 00:11:52,240
निखार आता है तो एक सीमा में रहकर के द्वत क्रीड़ा

171
00:11:52,240 --> 00:11:56,320
इस प्रकार की जैसे कि आगे चलकर के अमुक फसल का

172
00:11:56,320 --> 00:12:00,800
क्या भाव होने वाला है और या फिर दो पहलवान

173
00:12:00,800 --> 00:12:04,800
हैं तो इसमें से कौन सा पहलवान जीत सकता है। इस प्रकार का

174
00:12:04,800 --> 00:12:09,040
जो दत क्रीड़ा होती है उसको यहां पर स्वीकार किया गया है। जो

175
00:12:09,040 --> 00:12:13,520
बिना किसी उसके केवल भाग्य के भरोसे खेला जाता है। ऐसी

176
00:12:13,520 --> 00:12:17,840
दत क्रीड़ा का सर्वथा निषेध किया गया है। तो यह थी पर्व

177
00:12:17,840 --> 00:12:21,840
की जानकारी आपके लिए और आपको अगर एक मैंने एक उदाहरण

178
00:12:21,840 --> 00:12:26,560
दे दिया वैसे पद्म पुराण में भी है और श्रीमद्

179
00:12:26,560 --> 00:12:30,880
भागवत में भी है और इसके साथ ही साथ

180
00:12:30,880 --> 00:12:34,880
क्या कहते हैं? स्कंद पुराण में भी है। सनत कुमार संमिता में

181
00:12:34,880 --> 00:12:36,320
भी है। तो इन

182
00:12:36,320 --> 00:12:40,400
शास्त्रों में आपको है और स्कंद पुराण का मैंने आपको रेफरेंस भी दे दिया। अब यह

183
00:12:40,400 --> 00:12:44,480
तो रही यह बात कि दीपावली का शास्त्रीय विवेचन क्या है? और

184
00:12:44,480 --> 00:12:48,480
दीपावली से दत क्रीडा कैसे जुड़ी है और जब आप स्कंद पुराण

185
00:12:48,480 --> 00:12:52,560
को पढ़ेंगे वैष्णव खंड को तो वहां पर आपको वो सारी बातें

186
00:12:52,560 --> 00:12:56,560
भी मिल जाएंगी कि आगे चलकर के भाई दूज आती है और जो

187
00:12:56,560 --> 00:13:00,640
गोवर्धन पूजा आती है तो वह सब बातें भी मिल जाएंगी। तो यह

188
00:13:00,640 --> 00:13:04,640
तो हमने बात कर ली कि दीपावली का शास्त्रीय विधान

189
00:13:04,640 --> 00:13:09,120
क्या है और कहां किन-किन घटनाक्रमों से जुड़ा हुआ है

190
00:13:09,120 --> 00:13:13,600
और कहां पर दिया गया शास्त्रों में इसका संदर्भ भी मैंने आपको बता दिया।

191
00:13:13,600 --> 00:13:17,840
अब बात करते हैं रामपाल द्वारा दीपावली के खंडन स्वरूप क्या-क्या

192
00:13:17,840 --> 00:13:22,480
नीचता से भरी हुई बातें कही गई हैं उन पे जरा प्रकाश डाल लेते हैं। सबसे पहले तो

193
00:13:22,480 --> 00:13:26,560
उसने इस बात को सीमित किया है। दीपावली पर्व को किस किससे सीमित

194
00:13:26,560 --> 00:13:30,560
किया है कि श्री रामचंद्र जी सीता माता के साथ घर वापस आए बस उसको इसके आगे

195
00:13:30,560 --> 00:13:34,720
पीछे और कुछ नहीं पता है। अब जब वो वहां पर बातें कर रहा है सीता माता

196
00:13:34,720 --> 00:13:39,120
और राम जी के बारे में तो लोग अक्सर रामपाल के लोग आकर के मुझसे ये ऑब्जेक्शन

197
00:13:39,120 --> 00:13:43,200
उठाते हैं कि भाई तुम तू तड़ाक क्यों करते हो रामपाल के लिए? रामपाल जब सीता माता के

198
00:13:43,200 --> 00:13:47,200
बारे में बात कर रहा है, श्री राम जी के बारे में बात कर रहा है तो वहां पर तू तड़ाक कर रहा

199
00:13:47,200 --> 00:13:49,360
है।

200
00:13:49,360 --> 00:13:52,560
वो जगत के स्वामी परमेश्वर

201
00:13:52,560 --> 00:13:56,560
और उनके लिए रामपाल जैसा तुच्छ व्यक्ति तू तड़ाक में बात कर

202
00:13:56,560 --> 00:14:00,640
रहा है और उसके लिए फिर हमें बाध्य किया जाता है कि भाई तुम कौन होते हो रामपाल के

203
00:14:00,640 --> 00:14:05,120
लिए तू तड़ाक में बात करने वाले तुमको संस्कार नहीं है। यह है वो है। रामपाल

204
00:14:05,120 --> 00:14:09,360
को संस्कार हैं। उसका उससे पहले जाने

205
00:14:09,360 --> 00:14:13,760
कितने पीढ़ियों पहले उसकी जाने कितनी पीढ़ियों पहले रामचंद्र

206
00:14:13,760 --> 00:14:18,160
जी धरती पर आकर के धर्म की स्थापना कर चुके हैं

207
00:14:18,160 --> 00:14:22,400
और उनके लिए यह रामपाल तूतड़ा की बातें करता है। अच्छा तूत

208
00:14:22,400 --> 00:14:26,400
की बातें करते-करते वो बताता भी है कि

209
00:14:26,400 --> 00:14:30,560
भाई दीपावली क्यों मनाई जाती है और साथ ही साथ राम जी की

210
00:14:30,560 --> 00:14:34,960
जो जिन कथाओं को लेकर के जो लेफ्टिस्ट लोग हैं

211
00:14:34,960 --> 00:14:39,200
या जो प्रक्षिप्तवादी लोग हैं या जो परंपरा

212
00:14:39,200 --> 00:14:43,200
विरोधी लोग हैं जो सवाल उठाते आए हैं आज तक उन्हीं सवालों

213
00:14:43,200 --> 00:14:47,280
को अपनी भाषा में चिपकाने का प्रयास करता है। अब सबसे पहले वह शुरू

214
00:14:47,280 --> 00:14:51,280
करता है कि भाई दीपावली कब मनाई थी कि करोड़ों लोगों को मारा गया

215
00:14:51,280 --> 00:14:55,440
था तब सीता माता को जीत करके लाए थे। तो यह करोड़ों लोगों को मारने पर जोर

216
00:14:55,440 --> 00:14:59,520
देता है। जब वह जेल गया था उसको पकड़ने के लिए मारे गए थे

217
00:14:59,520 --> 00:15:03,520
लोग उसके आसपास के लोग मारे गए थे जिनके लिए वो अफसोस प्रकट करता

218
00:15:03,520 --> 00:15:07,520
है। वहां पर वो ये नहीं सोचता है। वहां हालांकि अब सोचता होगा। अब तो

219
00:15:07,520 --> 00:15:08,020
वो

220
00:15:07,680 --> 00:15:11,760
जेल जाने से पहले बोल के गया है ना जो भी बोल के गया जो भी कचरा करके गया है। जेल

221
00:15:11,760 --> 00:15:16,000
जाने से पहले करके गया उसी की सजा भुगत रहा है अब तक हम तो

222
00:15:16,000 --> 00:15:18,560
खैर

223
00:15:18,560 --> 00:15:22,640
उसका कहना है कि भाई बहुत लोगों को मारने के बाद सीता माता को लाया गया

224
00:15:22,640 --> 00:15:26,800
और फिर उसने बहुत ही बेहूदा ढंग से यह कहा

225
00:15:26,800 --> 00:15:31,040
कि भाई किसी की बात सुनकर के श्री रामचंद्र जी ने सीता माता

226
00:15:31,040 --> 00:15:35,040
को वनवास भेज दिया जबकि वो उस समय गर्भवती थी और

227
00:15:35,040 --> 00:15:39,040
वहां पर उसने उस इस वीडियो में इस तरीके से प्रस्तुत किया गया जैसे रामचंद्र

228
00:15:39,040 --> 00:15:43,040
जी को मालूम था कि सीता माता उस समय गर्भवती थी। फिर उसके

229
00:15:43,040 --> 00:15:47,120
बाद उसने एक बहुत ही घिनौनी बात कही। बहुत नीचता पूर्ण वक्तव्य कहा

230
00:15:47,120 --> 00:15:51,440
है। इतना नीचता पूर्ण वक्तव्य कि मैं

231
00:15:51,440 --> 00:15:55,520
क्या बताऊं? वनवास से सीता का हरण

232
00:15:55,520 --> 00:16:00,240
हुआ। यानी उसकी पत्नी का

233
00:16:00,240 --> 00:16:05,520
रावण उठा ले गया। और फिर रावण के साथ युद्ध हुआ।

234
00:16:05,520 --> 00:16:10,240
पुण्य आत्माओं करोड़ों व्यक्ति मारे गए वहां पर।

235
00:16:10,240 --> 00:16:14,240
तब सीता की वापसी हुई। तो

236
00:16:14,240 --> 00:16:18,240
ऐसे यह राजा के योग्य भी नहीं थे यह लोग और हम इनको भगवान मान रहे थे।

237
00:16:18,240 --> 00:16:22,320
एक गर्भवती औरत को अपनी को घर से बाहर निकाल देता है। कहीं

238
00:16:22,320 --> 00:16:22,880
मरो कहीं

239
00:16:22,880 --> 00:16:26,880
जाओ कोई बात थी। फिर परीक्षा लेने की क्या जरूरत थी?

240
00:16:26,880 --> 00:16:32,240
और क्यों इतनी दुनिया मरवाई फिर छोड़ देता रावण के पास ही रहती हो।

241
00:16:32,240 --> 00:16:36,320
इसके साथ ही साथ उसने यह भी कहा है कि भाई सीता माता को

242
00:16:36,320 --> 00:16:40,480
एक ही पुत्र जन्म हुआ था और एक घटनाक्रम में वाल्मीकि

243
00:16:40,480 --> 00:16:44,560
जी ने दूसरा पुत्र जो है वहां पर प्रकट कर दिया था। तो अब सबसे पहली

244
00:16:44,560 --> 00:16:49,200
बात तो हमने क्या जानी कि श्री रामचंद्र जी के आगमन

245
00:16:49,200 --> 00:16:53,280
में सीमित नहीं है दीपावली का पर्व हां श्री रामचंद्र जी का

246
00:16:53,280 --> 00:16:57,920
आना भी दीपावली से जुड़ा हुआ है। पहली बात। दूसरी बात क्या है?

247
00:16:57,920 --> 00:17:02,000
कि सीता माता को वनवास

248
00:17:02,000 --> 00:17:06,160
जो भेजा गया था जो यह कह रहा है कि धोबी की बात सुनकर के भेज दिया

249
00:17:06,160 --> 00:17:10,480
और उसने इतनी नीचतापूर्ण बात कही है और फिर भी इसके अनुयाई

250
00:17:10,480 --> 00:17:14,720
आकर के इसका पक्ष लेते हैं और बताते हैं कि संस्कार क्या होते हैं। है

251
00:17:14,720 --> 00:17:18,720
तो इसने जो सीता माता को वनवास भेजने

252
00:17:18,720 --> 00:17:23,760
पर जो बात उठाई है उसके लिए मैं बता दूं सबसे पहले तो

253
00:17:23,760 --> 00:17:28,000
भगवान ने अगर यह कहा है कि सीता माता को वनवास भेज रहा हूं तो भगवान

254
00:17:28,000 --> 00:17:32,160
ने यह भी कहा है वाल्मीकि रामायण में ही कई स्थानों

255
00:17:32,160 --> 00:17:36,160
पर कि वह जानते हैं कि सीता माता में कोई दोष नहीं है। जबकि

256
00:17:36,160 --> 00:17:38,640
इस धूर्त व्यक्ति ने

257
00:17:38,640 --> 00:17:42,720
बार-बार कई बार अपने वीडियो में ये बात कही कि उनको जो

258
00:17:42,720 --> 00:17:46,800
है सीता माता पर शक था। जबकि श्री रामचंद्र जी ने अनेकों

259
00:17:46,800 --> 00:17:50,960
ने अनेक बार अनेकों बार रामायण में यह बात कही है कि उन्हें

260
00:17:50,960 --> 00:17:55,440
सीता माता पर विश्वास था। दूसरी बात श्री रामचंद्र

261
00:17:55,440 --> 00:17:59,840
जी ने यह बात भी कही है कि सीता

262
00:17:59,840 --> 00:18:05,280
माता और उनमें कोई भेद ही नहीं है। वह अगर

263
00:18:05,280 --> 00:18:09,520
क्या कहते हैं? मनीषी हैं। तो सीता माता उनकी कीर्ति

264
00:18:09,520 --> 00:18:13,520
हैं। अभेद है उनमें। यह बात भी श्री रामचंद्र जी ने कही है।

265
00:18:13,520 --> 00:18:17,760
तो इस दृष्टि से देखा जाए तो श्री रामचंद्र जी अगर शक

266
00:18:17,760 --> 00:18:21,920
करेंगे तो किसके ऊपर करेंगे? स्वयं के ऊपर करेंगे। क्योंकि वो स्वयं में और सीता

267
00:18:21,920 --> 00:18:26,240
माता में अभेद दृष्टि रख रहे हैं। तो अगर वह स्वयं पर शक करेंगे।

268
00:18:26,240 --> 00:18:30,240
अगर श्री रामचंद्र जी स्वयं पर शक करेंगे तो क्या उन्हें अपने

269
00:18:30,240 --> 00:18:34,240
बारे में नहीं मालूम होगा कि मैं अपने बारे में जानता हूं कि नहीं जानता हूं कि मेरे मन में क्या चल

270
00:18:34,240 --> 00:18:38,400
रहा है या मैंने क्या किया क्या नहीं किया है तो इससे भी यह सिद्ध होता है कि उन्हें सीता

271
00:18:38,400 --> 00:18:42,400
माता सीता माता पर शक नहीं था उन्होंने लीला पूर्वक एक कार्य

272
00:18:42,400 --> 00:18:46,400
किया था दूसरी बात अब कुछ लोग यह कहेंगे

273
00:18:46,400 --> 00:18:50,400
कि भाई हम क्यों मान लें श्री रामचंद्र जी की इस बात पर कि वो अभेद देखते

274
00:18:50,400 --> 00:18:53,760
थे सीता माता और स्वयं में तो जब तुम उनकी इस बात को नहीं मान

275
00:18:53,760 --> 00:18:57,760
रहे हो कि सीता माता और उनमें वो अभेद देखते थे तो इस बात को कैसे मान लेते

276
00:18:57,760 --> 00:19:01,840
हो कि उन्होंने उन्हें उस पर शक था। यह भी है। अब तुम मान लो अब तुम यह भी

277
00:19:01,840 --> 00:19:05,840
कह सकते हो कि भाई शक वाली बात जो है वो तो सही है और

278
00:19:05,840 --> 00:19:10,000
जो अभेद वाली बात है वो किसी लेखक ने जबरदस्ती लिख दी है। तो

279
00:19:10,000 --> 00:19:14,240
फिर तुम्हें वो रामायण लानी होगी। का जो परंपरा प्राप्त रामायण है वो दिखानी

280
00:19:14,240 --> 00:19:18,320
होगी जिसमें कि वो दोनों में से कोई एक बात ना हो या तुम्हारे

281
00:19:18,320 --> 00:19:22,800
अनुसार उसमें लिखा हो। यह बात आ जाती है। कुल मिलाकर के

282
00:19:22,800 --> 00:19:26,800
श्री रामचंद्र जी और सीता माता के लिए जो प्रमाण है वह रामायण

283
00:19:26,800 --> 00:19:30,800
ही है। और उसी रामायण में यदि भगवान श्री राम ने सीता

284
00:19:30,800 --> 00:19:34,800
माता की अग्नि परीक्षा ली है या फिर धोबी के कह देने पर उनको वनवास

285
00:19:34,800 --> 00:19:38,800
भेजा है तो उसी रामायण में उन्होंने सीता माता और स्वयं में अभेद

286
00:19:38,800 --> 00:19:43,440
दृष्टि भी बताई है। और उसी रामायण में उन्होंने

287
00:19:43,440 --> 00:19:47,600
सीता माता पर शक ना होने की बात को भी

288
00:19:47,600 --> 00:19:51,600
स्वीकार किया है। और उसी रामायण में श्री राम का सत्य

289
00:19:51,600 --> 00:19:55,600
प्रतिज्ञ होना भी लिखा है। और उसी रामायण में श्री राम का दो

290
00:19:55,600 --> 00:19:59,680
दो प्रकार के वचन ना बोलने वाला भी लिखा हुआ है। तो इन बातों पर

291
00:19:59,680 --> 00:20:03,680
भी इस धूर्त को जेलधाम निवासी को ध्यान देना चाहिए।

292
00:20:03,680 --> 00:20:08,080
अच्छा अब इसके आगे बात करते हैं। क्या दो पुत्र हुए थे? नहीं। वाल्मीकि

293
00:20:08,080 --> 00:20:09,280
रामायण में उत्तरकांड

294
00:20:09,280 --> 00:20:13,280
में स्पष्ट लिखा हुआ है कि माता सीता ने दो पुत्रों

295
00:20:13,280 --> 00:20:17,360
को जन्म दिया। जन्म देने के बाद प्रथम दृष्टि

296
00:20:17,360 --> 00:20:21,680
वाल्मीकि जी बाहर थे तो उन्होंने जाकर के देखा दोनों ही पुत्र

297
00:20:21,680 --> 00:20:25,840
चंद्र कमल के समान सुशोभित हो रहे थे। यह वाल्मीकि रामायण में आपको

298
00:20:25,840 --> 00:20:30,000
उत्तरकांड में मिल जाएगा। अब बात आती है कि सीता माता को आखिरकार

299
00:20:30,000 --> 00:20:34,800
वनवास भेजा क्यों? जब वो निर्दोष थी तो तो बात ऐसी होती है

300
00:20:34,800 --> 00:20:38,960
कि अगर दैवीय दृष्टि से देखें तो पद्म

301
00:20:38,960 --> 00:20:43,200
पुराण के पाताल खंड में एक हमें घटनाक्रम

302
00:20:43,200 --> 00:20:47,440
प्राप्त होता है जहां पर एक दो तोता

303
00:20:47,440 --> 00:20:51,600
और मैना आपस में रामायण की बातें कर रहे होते हैं और सीता माता

304
00:20:51,600 --> 00:20:56,160
छोटी होती है उस समय तो वह देखती है कि यह तो मेरी बातें कर रहे हैं क्योंकि हमारा जो

305
00:20:56,160 --> 00:21:00,480
टाइमलाइन है वह सीधी तो है नहीं वह सर्कुलर है तो रामायण

306
00:21:00,480 --> 00:21:04,560
एक बार नहीं हुई, कई बार हो चुकी है और थोड़ा-थोड़ा सा उसमें कल्प भेद

307
00:21:04,560 --> 00:21:08,560
है। तोता मैना वह जो रामायण है शाश्वत रामायण

308
00:21:08,560 --> 00:21:12,720
उसकी बातें कर रहे होते हैं तो सीता माता

309
00:21:12,720 --> 00:21:16,720
वो सुनती है चकित हो जाती है कि मेरी बातें कर रहे हैं। तो वो अपने पास

310
00:21:16,720 --> 00:21:20,880
बुला लेती है उन दोनों पक्षियों को और पूछ पूछती है कि भाई तुम किसकी

311
00:21:20,880 --> 00:21:24,960
बातें कर रहे हो? तो रामायण के बारे में बताते तो उनको कहती है कि मैं ही तो सीता हूं।

312
00:21:24,960 --> 00:21:29,120
जिस रामायण की तुम बात कर रहे हो उसमें सीता मैं ही हूं। तो और

313
00:21:29,120 --> 00:21:33,120
अब तुम दोनों यहीं पर रहो तो वह उनको बंदी बनाने लगती हैं। कहती है कि वह

314
00:21:33,120 --> 00:21:37,520
तुम दोनों यहीं पर रहो जब तक मेरे राम नहीं आ जाते हैं। तो वो जो तोता

315
00:21:37,520 --> 00:21:41,600
और उसकी पत्नी थी जो वो दोनों व्याकुल हो जाते हैं कि

316
00:21:41,600 --> 00:21:45,680
हम स्वतंत्र रहने वाले पक्षी हैं और थोड़ा सा विरोध करते हैं सीता माता

317
00:21:45,680 --> 00:21:49,840
का। तो सीता माता उसकी पत्नी को बंदी बना लेती हैं

318
00:21:49,840 --> 00:21:53,840
और कहती हैं कि भाई तुम्हें यहीं रहना होगा। बंदी बना लेती है और तोता जो बाहर

319
00:21:53,840 --> 00:21:58,480
था वह रह जाता है तो उसकी पत्नी जो थी वह गर्भवती

320
00:21:58,480 --> 00:22:02,480
थी तो उसकी पत्नी गर्भावस्था में ही वहां

321
00:22:02,480 --> 00:22:06,800
दम तोड़ देती है वियोग के कारण अपने पति के तो

322
00:22:06,800 --> 00:22:10,880
जो तोता होता है वह भी संभवत मृत्यु को प्राप्त होता है या फिर उड़ जाता

323
00:22:10,880 --> 00:22:14,960
है जाने से पहले श्राप दे देता है तोता जो होता है वह कहता है कि

324
00:22:14,960 --> 00:22:19,280
भाई जिस प्रकार से गर्भावस्था में मैंने अपनी पत्नी का वियोग

325
00:22:19,280 --> 00:22:23,760
झेला है इसी प्रकार से मैं अयोध में धोबी बन के जन्म लूंगा

326
00:22:23,760 --> 00:22:29,760
और मेरी वाणी के कारण मेरे कहे गए वचनों के कारण

327
00:22:30,080 --> 00:22:34,720
तुम्हें भी अपने पति का वियोग झेलना होगा वह भी गर्भावस्था में

328
00:22:34,720 --> 00:22:38,800
तो एक श्राप यहां पर उनको था सीता माता को जिस

329
00:22:38,800 --> 00:22:40,320
श्राप का निर्वाह भगवान

330
00:22:40,320 --> 00:22:44,400
को करना था भगवान को निर्वाह करना था ऐसा नहीं कि श्राप के अगेंस्ट

331
00:22:44,400 --> 00:22:48,400
नहीं जा सकते भगवान मगर भगवान को वहां स्थापना करनी थी कि अगर श्राप

332
00:22:48,400 --> 00:22:52,800
दिया गया तो वो लागू होगा भले ही वो तो पारबह्म

333
00:22:52,800 --> 00:22:56,880
परमेश्वर के सगुण साकार स्वरूप की पत्नी ही क्यों ना हो तो उन्होंने उस

334
00:22:56,880 --> 00:23:00,880
श्राप का निर्वाह किया। इसके साथ ही साथ इसी तरीके का एक श्राप विष्णु भगवान को

335
00:23:00,880 --> 00:23:05,440
भी लगा हुआ था भृगु ऋषि के द्वारा जब भृघु ऋषि की पत्नी का

336
00:23:05,440 --> 00:23:09,920
गला उन्होंने सुदर्शन चक्र से काट दिया था। संभवत उन्होंने शायद दैत्यों

337
00:23:09,920 --> 00:23:14,000
को संरक्षण दिया था। इस कारण से तो उसके बाद भृगु

338
00:23:14,000 --> 00:23:18,480
ऋषि ने उन्हें श्राप दिया था कि भाई तुम भी एक दिन अपनी पत्नी का वियोग झेगी

339
00:23:18,480 --> 00:23:22,640
मेरे कारण श्राप दिया था उन्होंने तो उस श्राप

340
00:23:22,640 --> 00:23:26,640
का निर्वाह भी यहां पर करना था तो यह तो एक मर्यादा है ना कि

341
00:23:26,640 --> 00:23:30,720
भाई हमें अगर हमारे बड़े जिन्होंने श्राप दिया है जो हमारे

342
00:23:30,720 --> 00:23:34,800
इस व्यवहारिक धरातल पर हमसे बड़े सिद्ध हो रहे हैं तो उस श्राप

343
00:23:34,800 --> 00:23:39,120
का निर्वाह भी हमें करना है उसका मान भी रखना है जिससे कि धर्म स्थापना हो

344
00:23:39,120 --> 00:23:43,360
भगवान तो किसी की किसी भी सीमा को लांग सकते हैं,

345
00:23:43,360 --> 00:23:47,520
तोड़ सकते हैं। तो वो उनके लिए आवश्यक नहीं था। तो ये तो उन्होंने मर्यादा की स्थापना

346
00:23:47,520 --> 00:23:51,760
कर दी ना यहां पर कि आप किस प्रकार से अपने से बड़ों के

347
00:23:51,760 --> 00:23:55,360
वचनों में बंधे हुए हैं। इसके साथ ही साथ जैसा कि

348
00:23:55,360 --> 00:23:59,440
लवकुश का जन्म है वो विधि का विधान है कि वो

349
00:23:59,440 --> 00:24:03,440
कहां होना है? वो होना है वाल्मीकि जी के आश्रम

350
00:24:03,440 --> 00:24:07,440
में। तो उस कारण से भी सीता माता का वनवास जाना आवश्यक था।

351
00:24:07,440 --> 00:24:11,520
वाल्मीकि जी के आश्रम में जाकर के ठहरना। आवश्यक था और यह वाला जो

352
00:24:11,520 --> 00:24:15,600
घटनाक्रम है यह भी रामायण में उत्तरकांड में ही दिया गया है

353
00:24:15,600 --> 00:24:19,760
कि उन्होंने क्यों भेजा था। तो अगर उत्तरकांड को कुछ लोग प्रक्षिप्त भी कहते

354
00:24:19,760 --> 00:24:23,920
हैं तो उत्तरकांड की अगर इस बात को वो ले रहे हैं कि भाई उन्होंने सीता

355
00:24:23,920 --> 00:24:27,920
माता को वनवास भेजा तो उन्हें इस बात को भी लेना चाहिए कि सीता माता को

356
00:24:27,920 --> 00:24:31,920
वनवास उन्होंने क्यों भेजा यह बात उन्होंने बताई थी। किस लीला

357
00:24:31,920 --> 00:24:36,080
के किस लीला पूर्वक उन्होंने सीता माता को वनवास भेजा था।

358
00:24:36,080 --> 00:24:40,080
अच्छा इसके बाद यह घटनाक्रम

359
00:24:40,080 --> 00:24:44,320
हो गया। अभी भी कुछ लोग जो तर्क निष्ठ लोग होंगे वह संतुष्ट नहीं होंगे।

360
00:24:44,320 --> 00:24:48,640
ठीक है। अब बात आती है कि उन्हें एक मर्यादा और स्थापित

361
00:24:48,640 --> 00:24:52,720
करनी थी। वह मर्यादा क्या थी? मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जिन्होंने हमें सिखाया

362
00:24:52,720 --> 00:24:56,720
एक नारी सदा ब्रह्मचारी। अपनी पत्नी में सीमित रहना। एक

363
00:24:56,720 --> 00:25:00,880
पत्नी व्रत धारण करना। उन्होंने हमें वह दृष्टि दी

364
00:25:00,880 --> 00:25:04,960
कि अपनी पत्नी, अपनी भार्या को छोड़कर के समस्त संसार की स्त्रियां या

365
00:25:04,960 --> 00:25:09,440
तो तुम्हारी माताएं हैं या फिर तुम्हारी बहनें हैं या फिर तुम्हारी बेटियां

366
00:25:09,440 --> 00:25:10,720
हैं। यह दृष्टि

367
00:25:10,720 --> 00:25:14,720
हमें भगवान श्री रामचंद्र जी ने दी है। यह दृष्टि इस्लाम ने नहीं

368
00:25:14,720 --> 00:25:18,720
दी। इस्लाम ने कह दिया सामान्य है। एक से चार तक विवाह

369
00:25:18,720 --> 00:25:22,800
कर लो। यह दृष्टि राम ने दी। राम ने कहा कि एक

370
00:25:22,800 --> 00:25:26,880
नारी सदा ब्रह्मचारी। एक पत्नी व्रत धारण किया। वैष्णव माता भी

371
00:25:26,880 --> 00:25:30,880
आई कि हमसे विवाह कर लीजिए। तो उनको भी उन्होंने कहा कि नहीं मैं

372
00:25:30,880 --> 00:25:35,520
एक पत्नी व्रत धारण किए हुए हूं और वह तो आई थी सुपनखा।

373
00:25:35,520 --> 00:25:39,520
तो यह दृष्टि हमें श्री राम ने दी है एक पत्नी व्रत धारण करने की।

374
00:25:39,520 --> 00:25:43,520
तो एक पत्नी व्रत धारण करने पर कौन सी स्थिति

375
00:25:43,520 --> 00:25:47,600
ऐसी होती है जहां पर भी आपका व्रत नहीं टूटना चाहिए। तो उनमें

376
00:25:47,600 --> 00:25:51,760
से एक स्थिति है अपनी पत्नी से दूर रहने की स्थिति। अगर

377
00:25:51,760 --> 00:25:55,920
किसी कारणवश आपकी पत्नी आपके पास नहीं है

378
00:25:55,920 --> 00:26:00,320
उससे दूरी है आपकी तो उस स्थिति में क्या आपको

379
00:26:00,320 --> 00:26:04,880
दूसरा विवाह कर लेना चाहिए? क्या दूसरी स्त्री ले आनी चाहिए?

380
00:26:04,880 --> 00:26:08,960
यहां पर उदाहरण भी भगवान श्री रामचंद्र को सेट करना था। उसके लिए

381
00:26:08,960 --> 00:26:12,960
भी माता सीता का वनवास या उनसे दूर

382
00:26:12,960 --> 00:26:17,040
होना आवश्यक था। तो यह भी एक लीला पूर्वक एक मर्यादा एक धर्म

383
00:26:17,040 --> 00:26:21,440
स्थापना करने के लिए कि आप अपनी पत्नी से भले ही दूर क्यों ना हो परंतु

384
00:26:21,440 --> 00:26:25,760
आजीवन उसी के लिए समर्पित होकर के जीना आपका कर्तव्य है। आपका धर्म

385
00:26:25,760 --> 00:26:29,840
है। इस धर्म की स्थापना भी श्री रामचंद्र जी ने इस

386
00:26:29,840 --> 00:26:34,400
लीला के द्वारा स्थापित की। अच्छा अब इसके बाद

387
00:26:34,400 --> 00:26:38,560
एंड में सबसे जरूरी सिद्धांत और यह ऐसा

388
00:26:38,560 --> 00:26:43,360
सिद्धांत है जो आपके लिए आपके जीवन

389
00:26:43,360 --> 00:26:47,440
में प्रत्येक प्रतिदिन तो आपको जो है कहीं ना कहीं

390
00:26:47,440 --> 00:26:51,760
दिखाई दे ही जाएगा। क्या होता है कि अच्छे और बुरे में से

391
00:26:51,760 --> 00:26:56,000
अच्छे को चुनना बहुत आसान होता है और बुरे को त्यागना

392
00:26:56,000 --> 00:27:00,240
बहुत आसान होता है। धर्म और अधर्म में से धर्म को चुनना और

393
00:27:00,240 --> 00:27:04,240
अधर्म को त्यागना बहुत आसान होता है। पर तब बहुत कठिन स्थिति

394
00:27:04,240 --> 00:27:08,320
होती है जब दोनों और धर्म होता है। और ऐसी ही

395
00:27:08,320 --> 00:27:12,560
कठिन स्थिति के लिए हमारे बीच में एक आदर्श स्थापित किया भगवान

396
00:27:12,560 --> 00:27:16,800
श्री रामचंद्र जी ने। जब उन्होंने दोनों

397
00:27:16,800 --> 00:27:20,960
तरफ दिखाई देने वाले धर्म में से एक धर्म को वरीयता

398
00:27:20,960 --> 00:27:25,360
दी। किस आधार पर वरीयता दी वह आप सुनिए। भगवान श्री रामचंद्र

399
00:27:25,360 --> 00:27:29,680
जी की जो जनता थी, प्रजा थी, वो स्वधर्म निष्ठ थी।

400
00:27:29,680 --> 00:27:33,840
जिसका जो कर्म था वही वह करती थी। इसी कारण से राम राज्य

401
00:27:33,840 --> 00:27:38,000
का जो वर्णन है वहां पर यह आता है कि हवा उतनी ही चलती थी जितनी

402
00:27:38,000 --> 00:27:41,120
चलनी चाहिए। धूप उतनी ही निकलती थी जितनी निकलनी

403
00:27:41,120 --> 00:27:45,440
चाहिए। ठंडक भी उतनी ही होती थी जितनी सुखप्रद हो।

404
00:27:45,440 --> 00:27:49,600
कभी अकाल मृत्यु कोई नहीं मरता था। मरता था तो उसके लिए राजा

405
00:27:49,600 --> 00:27:53,600
को जिम्मेदार ठहराया जाता था श्री रामचंद्र जी को और श्री रामचंद्र

406
00:27:53,600 --> 00:27:58,160
जी उस समस्या को हल करते थे। तो ऐसी स्वधर्म निष्ठ जो प्रजा थी

407
00:27:58,160 --> 00:28:02,480
वह एक प्रकार के दुख से या कष्ट से या कहे पीड़ा

408
00:28:02,480 --> 00:28:06,560
से संघर्ष कर रही थी कि जो स्त्रियां व्यभचारणी

409
00:28:06,560 --> 00:28:10,560
होती थी या जो स्त्रियां अपने पति की आज्ञा के

410
00:28:10,560 --> 00:28:14,720
बिना अनुमति के बिना जानकारी के बाहर कहीं और समय बिताती

411
00:28:14,720 --> 00:28:18,880
थी। वो माता सीता का आलंबन लेकर के उदाहरण देकर के और

412
00:28:18,880 --> 00:28:23,200
अपने पति पर अपनी मंतव्य की अपने पति के समक्ष अपने मंतव्य

413
00:28:23,200 --> 00:28:27,680
को सिद्ध करने का प्रयास करती थी और माता सीता का उदाहरण आ जाने के कारण

414
00:28:27,680 --> 00:28:31,760
जो घर का स्वामी होता था जो पति होता

415
00:28:31,760 --> 00:28:36,080
था वो कोई उत्तर नहीं दे पा रहा होता था तो

416
00:28:36,080 --> 00:28:40,400
यद्यपि इसका तार्किक समाधान था मगर उसको

417
00:28:40,400 --> 00:28:44,400
करतेकरते काफी समय लग जाना था तब तक

418
00:28:44,400 --> 00:28:48,480
यह जो विकृति थी फैल रही थी जिसके कारण प्रजा में

419
00:28:48,480 --> 00:28:53,760
कष्ट हो रहा था। तो दर्शन, विज्ञान और व्यवहार

420
00:28:53,760 --> 00:28:56,320
तीनों प्रकार के जो मत होते हैं उसके

421
00:28:56,320 --> 00:29:00,560
सामंजस्य से निर्णय लिया जाता है। और भगवान श्री राम

422
00:29:00,560 --> 00:29:05,520
ने अपने रामायण में ही एक बार यह भी कहा है कि जिस

423
00:29:05,520 --> 00:29:10,160
राज्य में राजा की निंदा हो रही होती है, वह राजा भी अधोगामी

424
00:29:10,160 --> 00:29:14,400
हो जाता है। तो राजा का पहला कर्तव्य हो जाता है कि प्रजा का संरक्षण

425
00:29:14,400 --> 00:29:18,560
करना। अगर प्रजा किसी कारण से संघर्ष

426
00:29:18,560 --> 00:29:22,800
कर रही है, किसी प्रकार की कष्ट से संघर्ष कर रही है और वो

427
00:29:22,800 --> 00:29:26,960
जो कष्ट है वो व्यापक है तो उस कष्ट से निकालना

428
00:29:26,960 --> 00:29:31,360
भी राजा का ही कार्य होता था। होता है। वास्तविकता

429
00:29:31,360 --> 00:29:35,600
यही है। राजा का ही कार्य है। उस प्रकार के कष्ट से अह बाहर निकालना

430
00:29:35,600 --> 00:29:39,920
अपनी प्रजा को। तो जब प्रजा इस कष्ट का सामना कर रही थी कि जो

431
00:29:39,920 --> 00:29:43,920
इस प्रकार की स्त्रियां थी जो अपने पति पर

432
00:29:43,920 --> 00:29:48,000
जो है हावी होने का प्रयास करती थी इस आधार पर कि सीता भी

433
00:29:48,000 --> 00:29:52,160
तो वही रह के आई है। उसको तो कुछ नहीं कहा गया। तो इस कारण से

434
00:29:52,160 --> 00:29:56,160
भगवान श्री राम के समक्ष दो धर्म आ गए। एक धर्म

435
00:29:56,160 --> 00:30:00,160
जहां पर प्रजा परेशान है, प्रजा भी निर्दोष है। मगर प्रजा के सामने

436
00:30:00,160 --> 00:30:04,160
ऐसा चक्रव्यूह रचा जा रहा है जिसके कारण वह उसमें फंस

437
00:30:04,160 --> 00:30:08,240
करके जो है परेशान हो रही है। कष्ट को भोग रही है। प्रजा भी निर्दोष है

438
00:30:08,240 --> 00:30:11,360
और इधर सीता माता भी निर्दोष है। तो दोनों

439
00:30:11,360 --> 00:30:15,520
तरफ धर्म है। एक तरफ पत्नी है तो पति का धर्म, एक तरफ प्रजा है

440
00:30:15,520 --> 00:30:19,520
तो राजा का धर्म। तो ऐसे में क्या किया जाए? अगर हम

441
00:30:19,520 --> 00:30:23,680
पत्नी निर्दोष पत्नी के साथ पत्नी को कष्ट नहीं देते हैं तो

442
00:30:23,680 --> 00:30:27,680
प्रजा कष्ट में रहती है और अगर हम निर्दोष प्रजा को कष्ट

443
00:30:27,680 --> 00:30:31,920
में नहीं कष्ट नहीं देते हैं तो पत्नी कष्ट

444
00:30:31,920 --> 00:30:35,920
में रहती है। तो ऐसे में यहीं पे भगवान

445
00:30:35,920 --> 00:30:40,000
श्री रामचंद्र ने सबसे बड़ा सिद्धांत हमको दिया। यह बहुत

446
00:30:40,000 --> 00:30:44,400
कठिन स्थिति होती है कि दो अच्छे रास्तों में से ज्यादा अच्छा चुनना

447
00:30:44,400 --> 00:30:48,400
और दो गलत रास्तों में से कम गलत चुनना। तो कैसे करें?

448
00:30:48,400 --> 00:30:52,720
तो इसी चीज को इस निर्णय को इस उदाहरण

449
00:30:52,720 --> 00:30:56,720
को इस दृष्टांत को प्रस्तुत करके भगवान श्री रामचंद्र जी ने हमारे

450
00:30:56,720 --> 00:31:00,800
समक्ष एक उदाहरण स्थापित किया। एक आदर्श स्थापित किया कि जब

451
00:31:00,800 --> 00:31:05,200
आपके समक्ष आपका जो व्यष्टि का धर्म है वो समष्टि

452
00:31:05,200 --> 00:31:09,520
के धर्म पर हावी होने लगे तो अपने व्यष्टि के धर्म का त्याग कर देना चाहिए।

453
00:31:09,520 --> 00:31:14,080
आपके व्यक्तिगत आत्म कल्याण के लिए आपसे जुड़ी हुई चीजें

454
00:31:14,080 --> 00:31:18,240
जो उसके निमित्त जो आपका धर्म है जब वह आपके उस

455
00:31:18,240 --> 00:31:22,400
धर्म पर हावी होने लगे जो समष्टि के लिए है जो व्यापक है तो

456
00:31:22,400 --> 00:31:26,400
आपको उस समय अपने व्यष्टि के अपने व्यक्तिगत आत्म कल्याण

457
00:31:26,400 --> 00:31:30,880
के निमित्त जो चीजें हैं उनका त्याग कर देना चाहिए और वैसा ही भगवान श्री रामचंद्र

458
00:31:30,880 --> 00:31:34,880
जी ने भी किया अपने पत्नी के समक्ष जो उनका धर्म था

459
00:31:34,880 --> 00:31:39,040
कि उनको कष्ट नहीं देना चाहिए पत्नी की रक्षा करनी चाहिए ये उनका व्यष्टि

460
00:31:39,040 --> 00:31:44,000
का धर्म था मगर एक राजा होते हुए उन्हें अपनी प्रजा को

461
00:31:44,000 --> 00:31:48,080
कष्ट नहीं देना चाहिए यह समष्टि का धर्म धर्म था और उन्होंने समष्टि के

462
00:31:48,080 --> 00:31:52,560
धर्म का अनुकरण किया अनुसरण किया और अपनी निर्दोष पत्नी को भी

463
00:31:52,560 --> 00:31:56,560
वनवास भेज के एक उदाहरण एक मर्यादा स्थापित की कि

464
00:31:56,560 --> 00:32:00,800
जब आपके समक्ष दो सही रास्ते हो तो दोनों में से ज्यादा सही

465
00:32:00,800 --> 00:32:05,200
और दो गलत रास्ते हो तो दोनों में से कम गलत आप किस आधार पर चुनेंगे।

466
00:32:05,200 --> 00:32:08,240
अब देखिए दूसरे उदाहरण

467
00:32:08,240 --> 00:32:12,720
जो भीष्म जो भीष्म जी थे उनके समक्ष

468
00:32:12,720 --> 00:32:16,880
द्रोपदी का चिरण हो रहा था। तो एक अबला

469
00:32:16,880 --> 00:32:21,360
एक नारी की गरिमा के और सम्मान के लिए लड़ना

470
00:32:21,360 --> 00:32:25,360
यह धर्म है और क्षत्रिय तो थे ही तो यह धर्म था उनका उनकी रक्षा

471
00:32:25,360 --> 00:32:30,160
करना उनके सामने पाप हो रहा था परंतु वह चुप रहे क्यों चुप रहे

472
00:32:30,160 --> 00:32:34,400
क्योंकि उनका व्यष्टि का धर्म था क्या धर्म था कि उन्होंने प्रतिज्ञा ली थी

473
00:32:34,400 --> 00:32:39,200
उन्होंने प्रतिज्ञा ली थी ये उनका व्यष्टि का धर्म था और जो

474
00:32:39,200 --> 00:32:41,760
द्रोपदी का चीर हरण हो रहा था

475
00:32:41,760 --> 00:32:45,840
और वहां पर उस द्रोपदी की रक्षा करना करना उनका समष्टि का धर्म था।

476
00:32:45,840 --> 00:32:49,920
मगर वह सही निर्णय नहीं ले पाए। दो गलत रास्तों में से कम

477
00:32:49,920 --> 00:32:54,080
गलत। अपनी प्रतिज्ञा को तोड़ना भी गलत है और द्रोपदी को ना

478
00:32:54,080 --> 00:32:58,080
बचाना भी गलत है। मगर दोनों में से ज्यादा गलत क्या है? द्रोपदी

479
00:32:58,080 --> 00:33:02,240
को ना बचाना। अपनी प्रतिज्ञा को तोड़ देना उतना गलत नहीं है।

480
00:33:02,240 --> 00:33:06,320
क्यों? क्योंकि उसका प्रभाव केवल तुम्हारे ऊपर हो रहा है। और जहां पर

481
00:33:06,320 --> 00:33:10,480
एक नारी का सरेआम शोषण हो रहा है। सरेआम उसकी गरिमा को भंग

482
00:33:10,480 --> 00:33:14,480
किया जा रहा है। वो एक समष्टि की बात है। परंतु उन्होंने वहां पर अपने

483
00:33:14,480 --> 00:33:19,840
आत्म कल्याण की बात पर ज्यादा ध्यान दिया कि मैं अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ सकता।

484
00:33:19,840 --> 00:33:24,000
मगर वहां पर उन्होंने समष्टि के धर्म को पीछे

485
00:33:24,000 --> 00:33:28,000
कर दिया और व्यष्टि के धर्म को आगे कर दिया। इसी प्रकार से द्रोणाचार्य

486
00:33:28,000 --> 00:33:32,240
ये दोनों ही महानुभाव धर्म के मर्मज्ञ थे। मगर

487
00:33:32,240 --> 00:33:36,320
फिर भी यहां पर इनसे चूक हो गई कि इन्होंने अपने व्यष्टि के धर्म

488
00:33:36,320 --> 00:33:40,480
को आगे कर दिया। समष्टि के धर्म को पीछे कर दिया। कई तो पिता की

489
00:33:40,480 --> 00:33:44,800
आज्ञा मानना यह व्यक्तिगत धर्म

490
00:33:44,800 --> 00:33:48,800
है और पिता यदि अत्याचारी हो जाए और

491
00:33:48,800 --> 00:33:53,360
वहां पे भी उसकी बात मानना उसके अत्याचार में उसका साथ निभाना

492
00:33:53,360 --> 00:33:57,120
तो यह समष्टि का समष्टि के अनुसार यह अधर्म

493
00:33:57,120 --> 00:34:01,200
है और यही उदाहरण हमको मिलता है प्रह्लाद जी से

494
00:34:01,200 --> 00:34:06,080
तो यहां पे अपने व्यक्तिगत धर्म का त्याग किया क्यों क्योंकि जिससे कि

495
00:34:06,080 --> 00:34:10,240
काल क्रम से कालांतर में हम जैसे तुच्छ उच्च प्राणियों के आने पर हमको

496
00:34:10,240 --> 00:34:14,480
भगवान का नाम मिल पाए नारायण नारायण हम लोग जप पाए तो

497
00:34:14,480 --> 00:34:18,720
जब समष्टि का धर्म हमारे व्यक्तिगत धर्म पर हावी हो जाए तो वहां पर समष्टि

498
00:34:18,720 --> 00:34:22,960
के धर्म को चुना का चयन होना चाहिए व्यष्टि के धर्म का नहीं यह

499
00:34:22,960 --> 00:34:27,520
सिद्धांत हमें श्री रामचंद्र जी ने स्थापित कर दिया कि हम अपनी

500
00:34:27,520 --> 00:34:31,520
निर्दोष प्रजा को कष्ट नहीं देंगे भले ही अपनी

501
00:34:31,520 --> 00:34:35,600
निर्दोष पत्नी को कष्ट देना पड़े। अब दूसरी जो दैय बातें

502
00:34:35,600 --> 00:34:40,080
हैं आध्यात्मिक और पीछे बहुत सारी चीजें हैं वो सब मैंने आपको बता ही दिया।

503
00:34:40,080 --> 00:34:44,160
तो ये ये जो धूर्त व्यक्ति है इसकी नीचता

504
00:34:44,160 --> 00:34:48,320
भरे जो वक्तव्य हैं उनका निराकरण है। दीपावली

505
00:34:48,320 --> 00:34:52,640
का समाधान है कि दीपावली आखिरकार मनाई क्यों जाती है और सभी को दीपावली

506
00:34:52,640 --> 00:34:56,640
की धन त्रयोदशी की और भाई

507
00:34:56,640 --> 00:35:02,640
दूज की गोवर्धन पूजा की हार्दिक शुभकामनाएं। जय श्री राम।

508
00:35:04,550 --> 00:35:08,550
[संगीत]
