1
00:00:02,400 --> 00:00:06,480
आजकल इस वालों में प्रेमानंद जी महाराज को लेकर के बहुत भय

2
00:00:06,480 --> 00:00:10,640
व्याप्त हो गया है। मैंने देखा था कुछ समय पूर्व अमोग

3
00:00:10,640 --> 00:00:14,640
लीला ने किसी मामले में प्रेमानंद जी की

4
00:00:14,640 --> 00:00:18,800
अवमानना की थी और उसके बाद में मेरे ख्याल से कुछ स्पष्टीकरण भी प्रस्तुत

5
00:00:18,800 --> 00:00:22,960
किया था। और प्रेमानंद जी का उस विषय में

6
00:00:22,960 --> 00:00:27,040
यही कहना था कि भाई देखो एक ने हमारी राधा रानी के लिए कुछ कहा

7
00:00:27,040 --> 00:00:31,040
था तो उस व्यक्ति को एक महीने के लिए जो है किसी ना किसी

8
00:00:31,040 --> 00:00:35,120
मामले में प्रतिबंध लगा दिया गया था अमोग लीला

9
00:00:35,120 --> 00:00:37,280
पर।

10
00:00:37,280 --> 00:00:41,600
उसके बाद मैंने ऐसे भी कुछ वीडियोस देखे जिसमें कि इस

11
00:00:41,600 --> 00:00:46,000
से जुड़े हुए मंदिरों के संचालक जो हैं वो खींचे

12
00:00:46,000 --> 00:00:50,080
निपोल रहे हैं। खीज खा रहे हैं प्रेमान जी के नाम पर। नाम लेकर

13
00:00:50,080 --> 00:00:54,080
नहीं बोल रहे मगर बोल रहे हैं कि पीले वस्त्रों में एक जो है साधु बना फिरता है। वो

14
00:00:54,080 --> 00:00:58,080
मायावादी है वो यह है वो वो है। और मैं तो क्या कहूं मैं तो बहुत

15
00:00:58,080 --> 00:01:02,160
घनघोर कट्टर विरोध करता हूं एसो का। पर पता नहीं हमारे आगे कुछ

16
00:01:02,160 --> 00:01:06,640
लोग हैं जो उसकी उसको एप्रिशिएट करते उसकी प्रशंसा करते हैं

17
00:01:06,640 --> 00:01:10,800
और शायद संभवतः उसको इस बात पर भी आपत्ति थी कि

18
00:01:10,800 --> 00:01:15,040
वो उसको सुनने जाते हैं। अब हाल ही में एक-दो दिन पूर्व मैंने

19
00:01:15,040 --> 00:01:18,800
अमोग लीला का एक वीडियो देखा है जिसमें वह

20
00:01:18,800 --> 00:01:23,200
कुछ कुतर्क करते हुए अनर्गल प्रलाप करते हुए

21
00:01:23,200 --> 00:01:27,440
और इस बात पर जोर दे रहे हैं कि जो इस्कॉन के भक्त हैं या इस

22
00:01:27,440 --> 00:01:31,520
से जुड़े हुए जो इस के अनुयाई हैं वो किसी भी

23
00:01:31,520 --> 00:01:35,520
और संत साधु आचार्य की वाणी

24
00:01:35,520 --> 00:01:40,000
सुनने श्रवण करने ना जाएं और इस बात को

25
00:01:40,000 --> 00:01:44,080
स्थापित करने के लिए सिद्धांत को स्थापित करने के लिए बहुत सारे कुतर्क दे

26
00:01:44,080 --> 00:01:48,240
रहे हैं। गलत है ये। हम लोग फिर बाहर के बाबाओं को सुन रहे हैं आज क्योंकि

27
00:01:48,240 --> 00:01:52,960
बाहर के बाबा जी बड़ा अच्छा बोलते हैं। बड़ा अच्छा बोलते हैं। बड़ा अच्छा बोलते हैं।

28
00:01:52,960 --> 00:01:57,120
हम जो सुनने के लिए आ रहे हैं ना इस डिवोटीज हमारी इससे निष्ठा टूटती है अपने गुरुजनों

29
00:01:57,120 --> 00:02:01,840
के अंदर। सबसे पहली बात है कि जब हमने कुंभ

30
00:02:01,840 --> 00:02:06,080
में जाकर पूज्य राघवाचार्य जी महाराज का साक्षात्कार

31
00:02:06,080 --> 00:02:10,320
लिया था। उनकी वाणी प्राप्त की थी इस के विषय में। तो पूज्य

32
00:02:10,320 --> 00:02:14,560
राघवाचार्य जी महाराज ने भी अपना एक अनुभव

33
00:02:14,560 --> 00:02:18,800
हमें साझा किया था। उन्होंने कहा था कि और उनकी एक छोटी

34
00:02:18,800 --> 00:02:23,040
मानसिकता यह भी मैंने देखी जो इस कान से जुड़े हुए

35
00:02:23,040 --> 00:02:27,200
युवा वर्ग के लोग हैं उसमें कुछ लोग मेरे वक्तव्य को कथा

36
00:02:27,200 --> 00:02:31,280
को श्रवण करते हैं। तो कथा में वो लोग बहुत दूर पीछे बैठते

37
00:02:31,280 --> 00:02:33,840
थे। तो एक दिन हमने कथा के

38
00:02:33,840 --> 00:02:38,080
बाद उनको बुलाया और बुला के पूछा कि आप लोग भक्त हैं भगवान के।

39
00:02:38,080 --> 00:02:42,240
आप लोगों को आगे बैठकर के कथा श्रवण करना चाहिए तो रुचि भी होगी और सुनाने

40
00:02:42,240 --> 00:02:46,960
वाले को भी आनंद की अनुभूति होगी। उन्होंने एक बड़ी गंभीर बात बताई

41
00:02:46,960 --> 00:02:51,040
कि स्वामी जी आपके यहां ये YouTube पर प्रसारण हो रहा

42
00:02:51,040 --> 00:02:55,040
है और यह रिकॉर्डिंग हो रही है। एक चैनल पर दिखेगा और

43
00:02:55,040 --> 00:02:59,280
कहीं कैमरा हमारे तरफ घूम गया और हम उसमें दिख गए तो हमारे इस

44
00:02:59,280 --> 00:03:03,360
संस्था के जो लोग हैं वो मुझे दंडित करेंगे और

45
00:03:03,360 --> 00:03:07,360
मुझे फटकार लगाएंगे कि दूसरे संप्रदाय के आचार्यों का प्रवचन सुनने क्यों

46
00:03:07,360 --> 00:03:11,840
गए? दूसरे संप्रदाय के आचार्यों की कथा सुनने क्यों गए? तो राघवाचार्य

47
00:03:11,840 --> 00:03:16,160
जी महाराज की इस बात को जब हमने अपने YouTube चैनल पर प्रसारित

48
00:03:16,160 --> 00:03:20,240
किया तो बहुत से लोग ऐसे आए जो यही कहने लगे कि नहीं

49
00:03:20,240 --> 00:03:24,480
भाई नहीं इस में ऐसा कहीं नहीं सिखाया जाता पर आज प्रमाण सबके

50
00:03:24,480 --> 00:03:28,480
सामने है। अमोग लीला और इस

51
00:03:28,480 --> 00:03:32,480
के अन्य कई प्रचारक मंच पर बैठ करके

52
00:03:32,480 --> 00:03:36,480
चिल्ला चिल्ला कर यह सब बातें बोल रहे हैं कि किसी भी और संत की वाणी नहीं सुननी

53
00:03:36,480 --> 00:03:40,560
चाहिए अपने गुरु के अलावा और

54
00:03:40,560 --> 00:03:44,560
यही नहीं बहुत ही अभद्र तरीके से क्योंकि उसमें वो बातें तो घुमा

55
00:03:44,560 --> 00:03:48,880
फिरा करके प्रेमानंद जी के लिए ही है। वृंदावन में कौन प्रसिद्ध संत

56
00:03:48,880 --> 00:03:52,960
हैं जिनको सुनने इस के लोग भी चले जाते हैं।

57
00:03:52,960 --> 00:03:57,440
यह बातें कोई छुपी हुई नहीं है। ये बातें जग जाहिर बात है। तो यहां पर जो

58
00:03:57,440 --> 00:04:01,840
मूल में है प्रेमानंद जी हैं। अब प्रेमानंद जी

59
00:04:01,840 --> 00:04:06,560
हो या फिर कोई भी आचार्य हो जिसके लिए इस अमोग लीला ने

60
00:04:06,560 --> 00:04:11,600
बहुत भद्र तरीके से बात की है। क्या बातें की है?

61
00:04:11,600 --> 00:04:16,160
कह रहे हैं कि भैया वृंदावन के सभी साधु संतों को हमारा

62
00:04:16,160 --> 00:04:20,240
प्रणाम है। आ जाएंगे तो दंडवत होंगे। यहां तक कि मायावादी भी आ जाएंगे

63
00:04:20,240 --> 00:04:24,880
तो दंडवत होंगे। हम प्रणाम करेंगे हम। लेकिन

64
00:04:24,880 --> 00:04:29,120
लेकिन यह जितने भी बाबे हैं बाबे इत्यादि शब्दों का उसने

65
00:04:29,120 --> 00:04:31,200
उपयोग किया है। ऑलदो

66
00:04:31,200 --> 00:04:36,000
सारे वृंदावन के बाबा जी हमारे लिए पूजनीय है भाई। हम तो उनके चरणों की धूल भी नहीं है।

67
00:04:36,000 --> 00:04:40,160
लेकिन हमें किसी बाबे के पास नहीं जाना चाहिए सुनने के लिए। तो पहली

68
00:04:40,160 --> 00:04:44,240
बात तो यह है ये जो बाबे हैं ना यह तुम जैसों

69
00:04:44,240 --> 00:04:48,800
की खाट खड़ी करने के लिए पर्याप्त है। जिस दिन सामना

70
00:04:48,800 --> 00:04:53,120
करोगे तुम दंडवत क्यों होते हो मालूम है? चापलूसी करने के लिए

71
00:04:53,120 --> 00:04:57,200
चापलूसी करने के लिए तुम दंडवत होते हो। जो

72
00:04:57,200 --> 00:05:02,320
कुछ वो एक फिल्म आई थी ना हाउसफुल

73
00:05:02,320 --> 00:05:06,640
टू जय भद्रकाली उसमें जो अभिनेता था अक्षय

74
00:05:06,640 --> 00:05:10,720
कुमार वो क्या करता था? अपनी बात किसी से मनवाने के लिए उसके पैर

75
00:05:10,720 --> 00:05:14,880
पकड़ लेता था। है ना? इसी प्रकार

76
00:05:14,880 --> 00:05:18,960
से जब तुम पर तुम जानते हो कि हम किसी भी आचार्य

77
00:05:18,960 --> 00:05:23,040
का साधु संतों का सामना तो कर नहीं सकते तो जब भी किसी के

78
00:05:23,040 --> 00:05:27,120
सामने जाएंगे तो दंडवत हो जाएंगे। भाई तुम मायावादी कह रहे

79
00:05:27,120 --> 00:05:31,120
हो अगर सामने खड़े रहोगे मायावादी बोलोगे तो वो कहेगा ना सिद्ध

80
00:05:31,120 --> 00:05:35,200
कर मुझे मायावादी। इसीलिए तुम उसके सामने दंडवत

81
00:05:35,200 --> 00:05:39,280
होते हो और दिखाते हो कि हम सम्मान करना है। फिर

82
00:05:39,280 --> 00:05:43,360
लोगों को बताते हो कि मायावादी का भाष्य सुन लो तो सर्वनाश हो जाए। मायावादी का

83
00:05:43,360 --> 00:05:47,360
चेहरा देख लो तो यह हो जाए। मायावादी वैसा ही अभक्त है जैसे मुसलमानों के

84
00:05:47,360 --> 00:05:51,360
अनुसार काफिर होता है। तो पहले तो

85
00:05:51,360 --> 00:05:56,160
थोड़ी तमीज सीख लो। हम थोड़ी जो बदतमीजी

86
00:05:56,160 --> 00:06:00,320
कर रहे हो मंच पर बैठकर के साधु संतों के लिए थोड़ी

87
00:06:00,320 --> 00:06:04,480
तमीज सीख लो। सबसे पहले तो और दूसरी बात अपनी इस कायरता को

88
00:06:04,480 --> 00:06:08,880
सामने रखो कि हम जो है प्रकट क्यों? हम जो है दंडवत क्यों हो जाते हैं। रामभद्राचार्य

89
00:06:08,880 --> 00:06:13,120
जी ने माता के दूत की चुनौती दी थी ना तुमको। राम

90
00:06:13,120 --> 00:06:17,280
और कृष्ण में भेद करते हो ना। कृष्ण ही सर्वोपरि है। तुम्हारे यहां के भक्त

91
00:06:17,280 --> 00:06:22,160
लोग गाली देते हैं। अगर उनसे यह बात कहो नहीं राम और कृष्ण बराबर है तो

92
00:06:22,160 --> 00:06:26,480
और मैं अभी 28 साल से इस से जुड़ा हूं

93
00:06:26,480 --> 00:06:30,720
और मेरे बच्चे भी दीक्षित भक्त हैं। मेरी बीवी दीक्षित भक्त

94
00:06:30,720 --> 00:06:34,960
हैं। राम नरसिंह वराह ये सब एक कारण

95
00:06:34,960 --> 00:06:39,040
के लिए आते हैं। बस वो कारण के लिए आते हैं। इसलिए राम

96
00:06:39,040 --> 00:06:43,040
जी की भक्ति उतनी श्रेष्ठ नहीं है। हां राम जी में पावर

97
00:06:43,040 --> 00:06:47,680
कम है या कृष्ण जी में पावर ज्यादा है ज्यादा है क्योंकि वो पूर्ण पुरुषोत्तम है

98
00:06:47,680 --> 00:06:51,680
मर्यादा पुरुष लिखा है अपने शास्त्रों में कौन से शास्त्र में मैं

99
00:06:51,680 --> 00:06:55,920
आपसे पूछ रहा हूं कम पावरफुल है आप एक

100
00:06:55,920 --> 00:07:00,000
बताओ मर्यादा या पूर्ण इसमें पूर्ण कौन

101
00:07:00,000 --> 00:07:04,000
सा है बता रहा हूं ना बताओ अक्षर पुरुष के लिए

102
00:07:04,000 --> 00:07:08,000
मर्यादा बना है या पूर्ण बना है पूर्ण

103
00:07:08,000 --> 00:07:12,400
राम जी पूर्ण भी है कहां लिखा सब मानते

104
00:07:12,400 --> 00:07:16,480
हैं नहीं मानोगे नहीं आप सब

105
00:07:16,480 --> 00:07:20,480
झूठ बोल रहे हो आप साले आप साले

106
00:07:20,480 --> 00:07:24,000
आप साले ये आप ये बना रहे

107
00:07:24,000 --> 00:07:28,160
आप ये आप में लायक नहीं है जानने की

108
00:07:28,160 --> 00:07:32,320
वो आया ना आया ना

109
00:07:32,320 --> 00:07:36,720
भी सुना था उसने कहा था जब कृष्ण ही भगवान

110
00:07:36,720 --> 00:07:40,800
है और उसके लिए उदाहरण देते

111
00:07:40,800 --> 00:07:44,800
कृष्ण जो है पूर्णिमा का चांद है और बाकी सारे जो भगवान के

112
00:07:44,800 --> 00:07:48,880
रूप है उसमें कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ अभाव है। वो पूर्णिमा का चांद नहीं

113
00:07:48,880 --> 00:07:51,680
है।

114
00:07:51,680 --> 00:07:55,760
फिर अपनी रामायण में क्या लिखते हो?

115
00:07:55,760 --> 00:07:59,760
वहां पर राम भगवान को परम ब्रह्म बोला जा रहा है। छठवे अध्याय में युद्ध

116
00:07:59,760 --> 00:08:04,160
कांड में वहां पर भी तुम घुसेड़ देते हो अपना एजेंडा

117
00:08:04,160 --> 00:08:08,240
अब्राहमिक वाला जिसमें कि भगवान के कई रूप नहीं हो सकते।

118
00:08:08,240 --> 00:08:13,040
एक ही रूप हो सकता है। यही तो है अब्राहमिक एजेंडा

119
00:08:13,040 --> 00:08:17,120
एक ही अल्लाह या एक ही क्राइस्ट वही एक रूप हो

120
00:08:17,120 --> 00:08:21,280
सकता है। इसलिए दूसरे रूपों से भी तुम्हारे ही अनुसार

121
00:08:21,280 --> 00:08:25,680
श्री कृष्ण भगवान के ही दूसरे रूपों से भी तुम्हें एलर्जी है। क्योंकि

122
00:08:25,680 --> 00:08:29,840
एजेंडा अब्राहमिक डालना है भारत में हिंदुओं

123
00:08:29,840 --> 00:08:34,240
में। तो क्या डाला वहां पर रामायण में? राम

124
00:08:34,240 --> 00:08:38,880
जी की महिमा गान हो रहा है। वहां पर भी कह रहे हैं कि अगर तुम ऐसा करोगे तो तुम्हें पूर्ण

125
00:08:38,880 --> 00:08:39,380
जो

126
00:08:39,120 --> 00:08:43,120
भगवान है कृष्ण उनकी शरणागति प्राप्त हो जाएगी। यह है

127
00:08:43,120 --> 00:08:47,200
तुम्हारा एजेंडा और

128
00:08:47,200 --> 00:08:51,200
फिर जब तुम्हें कोई आचार्य गण

129
00:08:51,200 --> 00:08:55,280
चुनौती देते हैं तुम्हारे माता की दूध का वास्ता देते हुए कि जिसकी

130
00:08:55,280 --> 00:08:59,440
मां ने ध्यान है ना क्या कहा था? जिसकी मां ने

131
00:08:59,440 --> 00:09:04,160
निष्ठा पूर्वक दूध पिलाया हो वह मुझे आकर सिद्ध करें

132
00:09:04,160 --> 00:09:08,320
कि राम जी पूर्ण नहीं है। ये 16 कला 12 कला की जो बातें

133
00:09:08,320 --> 00:09:12,880
करते हो फिर तुम लोगों ने क्या किया था?

134
00:09:12,880 --> 00:09:16,880
कि जैसे ही उन्होंने मां के दूत की चुनौती दी तुमको मां के दूत का स्मरण

135
00:09:16,880 --> 00:09:21,360
कराते हुए तो तुमने क्या किया वहां पर? तुरंत दंडवत हो गए।

136
00:09:21,360 --> 00:09:26,000
अरे करते ना वहां शास्त्रार्थ नहीं श्री संप्रदाय वालों से करो।

137
00:09:26,000 --> 00:09:30,160
कहो उनको भगवत गीता अपनी भगवत गीता एज इट इस में तुमने

138
00:09:30,160 --> 00:09:34,400
लिखा है 2.2 में कि नारायण भी पूर्ण ऐश्वर्यवान नहीं

139
00:09:34,400 --> 00:09:38,560
है। जाओ करो नहीं तो

140
00:09:38,560 --> 00:09:42,560
हम दंडवत इसलिए होते हैं कि हमारे पास इस बारे में तर्क वितर्क

141
00:09:42,560 --> 00:09:46,960
करने की क्षमता नहीं है। ना ही हमारे पास हमारे कोई परंपरा

142
00:09:46,960 --> 00:09:50,960
का ज्ञान है तो हम ढिंढोरा पीटते हैं। हमारा यह दोगलापन

143
00:09:50,960 --> 00:09:54,560
है। वास्तविकता यह है कि हम अपनी कायरता को छिपाने के लिए दंडवत

144
00:09:54,560 --> 00:09:58,640
होते हैं। बाला 12 कला और 16 कला में केवल इतना ही

145
00:09:58,640 --> 00:10:02,720
तो अंतर मात्र है कि जो श्री राम जी हैं वो

146
00:10:02,720 --> 00:10:06,720
सूर्यवंशी है और श्री कृष्ण भगवान है वो

147
00:10:06,720 --> 00:10:10,960
चंद्रवंशी हैं। तो क्योंकि सूर्य अपने 12

148
00:10:10,960 --> 00:10:15,040
रूपों में अपने आप को प्रकट कर सकता है। उसी आधार पर हमारा वर्ष गिना जाता

149
00:10:15,040 --> 00:10:19,200
है। तो इसलिए वह 12 कलाओं के हो गए

150
00:10:19,200 --> 00:10:22,080
और

151
00:10:22,080 --> 00:10:26,160
क्योंकि चंद्रमा जो है 16 रूपों में

152
00:10:26,160 --> 00:10:30,160
अपने आप को विभाजित करके दिखा देता है। इसलिए उनको जो है 16 कला का

153
00:10:30,160 --> 00:10:34,640
कहा जा सकता है। इतनी सी बात है। यह ठीक इस प्रकार से है।

154
00:10:34,640 --> 00:10:38,640
जिस प्रकार से एक के सिक्के को तुम चवन्नियों के

155
00:10:38,640 --> 00:10:42,800
आधार पर गिनोगे तो चार टुकड़े होंगे। और अठन्नी के आधार

156
00:10:42,800 --> 00:10:46,800
पे गिनोगे तो दो टुकड़े होंगे। मगर दो अठन्नी और चार

157
00:10:46,800 --> 00:10:50,800
चवन्नी का जो मूल्यांकन है उनमें कोई बदलाव नहीं होगा। दोनों का मूल्यांकन

158
00:10:50,800 --> 00:10:55,760
एक रुपया ही आएगा। और यह बात भी वैष्णवाचार्य

159
00:10:55,760 --> 00:10:59,920
माधवाचार्य शास्त्री जी ने अपने ग्रंथ में लिखी है।

160
00:10:59,920 --> 00:11:04,640
समझ में आया जो फिर बरगलाने लगो नहीं नहीं ये जो है

161
00:11:04,640 --> 00:11:08,720
वो ये तो शंकर संप्रदाय वाले बोल रहे हैं। वैष्णवाचार्य ने

162
00:11:08,720 --> 00:11:10,320
बोली ये बात

163
00:11:10,320 --> 00:11:14,320
श्री संप्रदाय तुमसे कहीं श्रेष्ठ वहां तक पहुंच पाना

164
00:11:14,320 --> 00:11:18,320
तुम्हारे लिए पता नहीं कितने जन्मों में होगा। खैर बैक टू द पॉइंट।

165
00:11:18,320 --> 00:11:22,400
तो यह जो दंडवत होने का दिखावा कर रहे हो फिर अगली ही पंक्ति में बाबे

166
00:11:22,400 --> 00:11:27,440
बोल रहे हो ये सब बाबे हैं तुम्हारे लिए। शंकराचार्य राघवाचार्य

167
00:11:27,440 --> 00:11:31,520
प्रेमानंद जी ये सब बाबे हैं तुम्हारे लिए। और फिर

168
00:11:31,520 --> 00:11:36,240
कह रहे हो हम सम्मान बहुत करते हैं। इसी प्रकार से सम्मान भगवान श्री

169
00:11:36,240 --> 00:11:40,320
शिव जी का है। क्या सम्मान है? कि हम शिव जी को

170
00:11:40,320 --> 00:11:44,480
बहुत मानते हैं। हम शिव जी को वैष्णव मानते हैं। परम वैष्णव मानते

171
00:11:44,480 --> 00:11:48,480
हैं। वैष्णवा नाम यथा शंभू

172
00:11:48,480 --> 00:11:52,880
और फिर अगले ही बार में भगवत गीता 265

173
00:11:52,880 --> 00:11:57,200
में लिखते हैं कि भगवान ध्यान मग्न थे। शिवजी तो ध्यान मग्न थे। उनको जब पार्वती

174
00:11:57,200 --> 00:12:01,920
माता ने विषय भोग के लिए उकसाया। माता भी नहीं है वहां। जैसे तुम्हारी कोई

175
00:12:01,920 --> 00:12:06,320
तुम्हारे लिए कोई ऐसी वैसी कोई स्त्री हो। है ना? क्या लिखा है वहां?

176
00:12:06,320 --> 00:12:10,720
उनको जब पार्वती ने विषय भोग के लिए उकसाया तो वह सहमत हो गए। वहीं पर हरिदास

177
00:12:10,720 --> 00:12:14,720
ठाकुर को वहां पर एक

178
00:12:14,720 --> 00:12:18,880
वैश्या स्त्री ने उकसाया विषय भोग के लिए तो वो सहमत नहीं हुए क्योंकि

179
00:12:18,880 --> 00:12:23,200
वो भगवान के भक्त थे। कहां गई उनकी परम वैष्णवता शिव जी की श्रेष्ठ

180
00:12:23,200 --> 00:12:25,440
कर दिया तुमने तो वैष्णवता में भी

181
00:12:25,440 --> 00:12:29,680
नहीं माना। फिर कि

182
00:12:29,680 --> 00:12:33,920
हम तो बहुत सम्मान करते हैं। मगर शिव जी की पूजा करने वाले पापी हैं।

183
00:12:33,920 --> 00:12:38,000
शिवजी को भगवान के तुल्य समझने वाले पापी हैं। नीच

184
00:12:38,000 --> 00:12:42,160
हैं। मूर्ख हैं। मगर हम शिवजी को बहुत मानते हैं। शिवजी

185
00:12:42,160 --> 00:12:46,240
को भगवान मानने वाले अभक्त है। जैसे कुरान ना मानने वाला काफिर

186
00:12:46,240 --> 00:12:51,280
है। वैसे ही शिवजी को भगवान मानने वाला अभक्त है।

187
00:12:51,280 --> 00:12:55,280
उससे दूर रहो। उससे बात भी मत करो। तो शिव जी का हम बहुत सम्मान करते हैं। पर

188
00:12:55,280 --> 00:12:59,360
शिव जी अपनी इंद्रियों को अपने नियंत्रण में नहीं रख पाते हैं। हम बहुत सम्मान

189
00:12:59,360 --> 00:13:03,840
करते हैं भैया शिवजी का। यह सम्मान वैसा ही है

190
00:13:03,840 --> 00:13:07,920
जैसे वो एक प्रासंगिक विनोद पूर्ण

191
00:13:07,920 --> 00:13:11,920
एक चुटकुला है ना। वो एक मातृशक्ति

192
00:13:11,920 --> 00:13:15,920
होती है। वो अपने सखा से पूछती है। कहती

193
00:13:15,920 --> 00:13:20,400
है कि मैं तुम्हारी आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकती। पर तुम मेरे पिता नहीं हो।

194
00:13:20,400 --> 00:13:23,520
फिर कहती है कि

195
00:13:23,520 --> 00:13:27,600
मैं जब तुम्हारे साथ होती हूं ना तो बहुत सुरक्षित फील होता है। पर तुम मेरे

196
00:13:27,600 --> 00:13:31,680
भाई भी नहीं हो। फिर कहती है कि मैं

197
00:13:31,680 --> 00:13:35,680
तुम्हारे बिना एक पल भी जी नहीं सकती पर तुम मेरे प्रेमी

198
00:13:35,680 --> 00:13:40,320
भी नहीं हो। तुम तुम तुम समझ रहे हो ना जानू तुम मेरे लिए क्या हो?

199
00:13:40,320 --> 00:13:40,820
तो

200
00:13:40,560 --> 00:13:44,560
जानू कहता है हां मैं समझ रहा हूं। मैं बेवकूफ हूं।

201
00:13:44,560 --> 00:13:48,720
वही हाल है। हम बहुत सम्मान करते हैं पर बाबे हैं। हम

202
00:13:48,720 --> 00:13:52,800
बहुत सम्मान करते हैं पर उनकी पूजा करने वाले नीच हैं। तो तुम समझ रहे हो ना शिव

203
00:13:52,800 --> 00:13:57,120
जी? तुम समझ रहे हो ना वृंदावन के संतों? तुम हमारे लिए क्या हो?

204
00:13:57,120 --> 00:14:01,760
तो क्या कहेंगे? वृंदावन के संत और शिवजी क्या कहेंगे?

205
00:14:01,760 --> 00:14:05,840
उसी प्रकार से है बाबे बाबे कह दो

206
00:14:05,840 --> 00:14:09,920
श्रवण करने तक के लिए मना कर दो और फिर कह दो हम बहुत

207
00:14:09,920 --> 00:14:14,320
सम्मान करते हैं तो तुम्हारा ये सम्मान का जो दिखावा

208
00:14:14,320 --> 00:14:18,480
है दोगलापन है यह वैसे ही है ठीक वैसे ही जैसे आर्य समाज

209
00:14:18,480 --> 00:14:22,480
कहता है ईश्वर सर्वशक्तिमान है पर अगले ही पल अवतार नहीं

210
00:14:22,480 --> 00:14:26,560
ले सकता हम तो कह रहे हैं ना सर्वशक्तिमान है अरे भैया सर्वशक्तिमान है तो अवतार क्यों

211
00:14:26,560 --> 00:14:29,280
नहीं ले सकता

212
00:14:29,280 --> 00:14:33,840
इस्लाम वाले भी कहते हैं सर्वशक्तिमान है मगर अवतार नहीं ले सकता।

213
00:14:33,840 --> 00:14:38,320
मूर्ति नहीं बन सकती। क्यों भाई? तो सर्वशक्तिमान

214
00:14:38,320 --> 00:14:42,320
कहां से सिद्ध होगा? जो सर्वशक्तिमान के घटक है वो कहां से

215
00:14:42,320 --> 00:14:45,120
सिद्ध होंगे?

216
00:14:45,120 --> 00:14:49,680
उसी प्रकार से तुम्हारा ये दोगलापन है कि हम बहुत सम्मान करते हैं।

217
00:14:49,680 --> 00:14:53,760
अब जरा तर्क पर बात कर लेते हैं। पहला तर्क

218
00:14:53,760 --> 00:14:56,080
है कि

219
00:14:56,080 --> 00:15:00,800
आप किसी भी दूसरे गुरु को सुनने जाएंगे तो

220
00:15:00,800 --> 00:15:05,840
आपकी जो निष्ठा अपने गुरु के प्रति है वह डगमगाएगी।

221
00:15:05,840 --> 00:15:09,920
यही कुतर्क रामपाल वाले भी करते हैं। रामपाल वालों का

222
00:15:09,920 --> 00:15:13,920
कहना है कि भाई दूसरों को मत सुनो क्योंकि दूसरों को सुनोगे तो हो सकता है पोल

223
00:15:13,920 --> 00:15:18,640
खुल जाए। तो इसमें यही क्यों सुना सोचा जाए कि भैया निष्ठा

224
00:15:18,640 --> 00:15:22,800
डगमगाएगी। ये क्यों ना सोचा जाए कि उसके द्वारा जो अवैदिक अप्रामाणिक ज्ञान दिया

225
00:15:22,800 --> 00:15:27,040
जा रहा है तथाकथित गुरु के द्वारा उसकी पोल खुल जाएगी।

226
00:15:27,040 --> 00:15:31,040
इसलिए यह माना जाए कि भैया अन्य को ना सुनो। तो मूल रूप से

227
00:15:31,040 --> 00:15:35,280
वह अपने भेद को खुलने से बचाने के लिए

228
00:15:35,280 --> 00:15:39,280
और अपने झूठ को और अपने आडंबर को सुरक्षित रखने के लिए वो अपने

229
00:15:39,280 --> 00:15:43,280
आदमियों को अपने से जुड़े लोगों को किसी अन्य आचार्यों के पास जाने का

230
00:15:43,280 --> 00:15:47,360
पर भी रोक लगाते हैं। गु का मतलब होता है अंधकार। रू का मतलब होता है

231
00:15:47,360 --> 00:15:51,360
निकालने वाला अद्वैत का उपनिषद। यदि कोई तथाकथित

232
00:15:51,360 --> 00:15:55,600
गुरु अपने शिष्य का अंधकार रूपी अज्ञानता को अंधकार

233
00:15:55,600 --> 00:15:59,760
रूपी संशय को दूर नहीं कर पा रहा है तो वह उसका गुरु ही सिद्ध नहीं

234
00:15:59,760 --> 00:16:03,760
होगा तो तुम ये किस आधार पर कह सकते हो कि इस गुरु को छोड़

235
00:16:03,760 --> 00:16:07,760
के उस गुरु की बात सुनने मत जाओ पहले इसको गुरु तो सिद्ध करो उसका

236
00:16:07,760 --> 00:16:11,120
अंधकार तो मिटाओ

237
00:16:11,120 --> 00:16:15,200
किस शास्त्र में लिखा है कहां पर लिखा है कि अपने गुरु को छोड़

238
00:16:15,200 --> 00:16:19,280
के किसी की बात नहीं सुननी है अच्छा फिर आगे

239
00:16:19,280 --> 00:16:23,840
तुम कुतर्क क्या करते हो कि भैया जो पत्नी

240
00:16:23,840 --> 00:16:29,040
जो पतिव्रता पत्नी होती है उसका वो जो है अपने

241
00:16:29,040 --> 00:16:33,760
पति को छोड़ के किसी और के संसर्ग में नहीं जाती हम

242
00:16:33,760 --> 00:16:37,760
तो क्या इस के अनुसार जिस कुल खानदान में एक स्त्री ब्याही जाती

243
00:16:37,760 --> 00:16:43,760
है उस कुल खानदान के सारे पुरुष उसके पति होते हैं क्या

244
00:16:44,480 --> 00:16:49,760
नीचता भरे कुतर्क है यह गुरु से तुलना तुम पति पत्नी की कर रहे

245
00:16:49,760 --> 00:16:53,840
और इस आधार पर यदि तुम यह कह रहे हो कि जो व्यक्ति जिसका शिष्य है

246
00:16:53,840 --> 00:16:57,920
वह अपने ही गुरु को सुने अन्य गुरुओं को ना सुने तो फिर इस के अन्य

247
00:16:57,920 --> 00:17:02,560
गुरुओं को क्यों सुना रहे हो उसे हम

248
00:17:02,560 --> 00:17:06,800
अब तुम कहोगे हम संप्रदाय की बात कर रहे हैं जिस जिस संप्रदाय के तुम हो उस

249
00:17:06,800 --> 00:17:10,880
संप्रदाय पे आओ यानी तुम कुल खानदान की बात कर रहे हो तो पहली बात तो

250
00:17:10,880 --> 00:17:15,040
पत्नी से यहां कंपैरिजन नहीं हो सकता सजातीय की अगर बात करें तो

251
00:17:15,040 --> 00:17:19,040
इस कब से जाती हो गई भाई ह वैष्णव जाति

252
00:17:19,040 --> 00:17:23,120
क्यों नहीं होगी और चलो वैष्णव भी नहीं होगी श्री संप्रदाय नहीं होंगे

253
00:17:23,120 --> 00:17:27,120
मध संप्रदाय नहीं होगा जबकि मधु संप्रदाय में स्वयं को गिनते हो

254
00:17:27,120 --> 00:17:31,200
गय संप्रदाय के अन्याचार्य क्यों नहीं होंगे उनकी भी

255
00:17:31,200 --> 00:17:35,200
यही शिकायत है कि हमें सुनने नहीं दिया जाता इसॉन के यहां

256
00:17:35,200 --> 00:17:40,560
पर इस्कॉन एक संस्था है एक विदेशी संस्था

257
00:17:40,560 --> 00:17:44,720
वो कब से जाती हो गई भाई हिंदुओं की किसने तय किया

258
00:17:44,720 --> 00:17:48,800
कि इस एक जाति है और उसके उसके आधार पर तुम कह रहे हो कि

259
00:17:48,800 --> 00:17:53,440
सजातीय गुरुओं को सुनो। और दूसरी बात यह है

260
00:17:53,440 --> 00:17:57,520
कि अगर संप्रदाय की बात की जाए तो पहली

261
00:17:57,520 --> 00:17:59,600
बात तो तुम यह बताओ तुम जब अपना वीडियो

262
00:17:59,600 --> 00:18:03,840
बनाते हो तो क्या कोई ऐसा फिल्टर लगाते हो कि मेरे वीडियोस को दूसरे संप्रदाय

263
00:18:03,840 --> 00:18:07,920
वाले ना देख पाए। इस के बाहर के लोग ना देख पाए। श्री संप्रदाय के

264
00:18:07,920 --> 00:18:12,480
ना देख पाए। चलो मान लिया शंकर संप्रदाय तो तुम्हारे लिए अप्रामाणिक है। दुर्जन

265
00:18:12,480 --> 00:18:16,480
ऐसे मगर श्री संप्रदाय वाले ना देख पाए।

266
00:18:16,480 --> 00:18:20,640
रामानंदी ना देख पाए। अन्य जो वैष्णवाचार्यों से जुड़े हुए

267
00:18:20,640 --> 00:18:25,200
भक्त हैं वो ना देख पाए तुम्हारा चैनल। इस विषय में तुमने क्या

268
00:18:25,200 --> 00:18:29,200
किया है? और जब तुमने ऐसा कुछ नहीं किया तो तुम ये बात कैसे कह सकते हो

269
00:18:29,200 --> 00:18:35,200
कि अन्य गुरुओं को मत सुनो या अन्य संप्रदाय के गुरुओं को मत सुनो।

270
00:18:36,240 --> 00:18:40,400
मीठा मीठा गपगप कड़वा कड़वा थू हमारा कोई बाहर ना जाए।

271
00:18:40,400 --> 00:18:44,720
बाहर वाला हमारे पास आ जाए क्योंकि चंदा इकटठा

272
00:18:44,720 --> 00:18:50,160
करना है। चर्च जैसे मंदिर बनाने हैं नीले नीले

273
00:18:50,160 --> 00:18:54,240
इस कौन वो ईश्वर अल्लाह और यहोवा को एक

274
00:18:54,240 --> 00:18:58,160
करना है यह मकसद है ना

275
00:18:58,160 --> 00:19:02,800
और और सुनो अगर संप्रदाय से बाहर ना जाने की बात है तो तुम्हारे अनुसार

276
00:19:02,800 --> 00:19:07,040
चैतन्य महाप्रभु तो मधुबर संप्रदाय के हैं। तो क्यों गए वो श्रीधर स्वामी

277
00:19:07,040 --> 00:19:11,840
की टीका को पढ़ने? वो किस संप्रदाय से श्री स्वामी

278
00:19:11,840 --> 00:19:15,920
अगर तुम यह भी कह दो कि वो शंकर संप्रदाय के भले ही थे मगर उन्होंने जो टीका लिखा था

279
00:19:15,920 --> 00:19:20,240
वो वैष्णव टीका ही लिखा था क्यों अरे वैष्णव भी था

280
00:19:20,240 --> 00:19:24,240
तो शंकर संप्रदाय का तो क्यों गए चैतन्य महाप्रभु वहां

281
00:19:24,240 --> 00:19:29,040
पर लेने के लिए क्यों सुनने गए दूसरे गुरु को

282
00:19:29,040 --> 00:19:33,120
इसका मतलब यदि तुम चैतन्य महाप्रभु का जाना स्वीकार

283
00:19:33,120 --> 00:19:37,200
करते हो और यहां पर स्वीकार नहीं करते हो अपने भक्तों का

284
00:19:37,200 --> 00:19:41,200
किसी और के पास जाना तो मतलब वहां पर निष्ठा डगमगाने से नहीं

285
00:19:41,200 --> 00:19:45,520
है। मतलब वहां अनन्यता से नहीं है।

286
00:19:45,520 --> 00:19:49,600
मतलब वहां पर है चंदा कम हो जाने से, भीड़ कम

287
00:19:49,600 --> 00:19:51,280
हो जाने से, फॉलोअ

288
00:19:51,280 --> 00:19:55,280
कम हो जाने से मतलब है पोल खुल जाने से, बचाना

289
00:19:55,280 --> 00:19:58,320
है।

290
00:19:58,320 --> 00:20:02,960
हमको तो वर्णाश्रम की धज्जियां उड़ानी है। हिंदुस्तानियों

291
00:20:02,960 --> 00:20:08,800
को दोबारा से गुलाम बनाना है। मानसिक तौर पर वैचारिक तौर पर

292
00:20:08,800 --> 00:20:14,080
मलच्छों का शासन करवाना है। मलच्छों को गुरु के रूप में पुजवाना है।

293
00:20:14,080 --> 00:20:18,160
बाहर से ला लाला करके लोगों को यहां खड़ा कर देना आचार्य के

294
00:20:18,160 --> 00:20:22,400
रूप में। हमारा तो यह एजेंडा है। तो दूसरों

295
00:20:22,400 --> 00:20:26,480
के पास अगर हमारे अब भक्तगण जाएंगे तो वह लोग हमारे इस एजेंडे को

296
00:20:26,480 --> 00:20:30,480
समझ जाएंगे। इसलिए दूसरों के पास नहीं जाना चाहिए।

297
00:20:30,480 --> 00:20:34,720
कलेक्शन करते रहना चाहिए। और नहीं तो बताओ

298
00:20:34,720 --> 00:20:39,120
चैतन्य महाप्रभु क्यों गए थे श्रीधर स्वामी जी के पास किस संप्रदाय

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से थे वो उन्होंने वो जो भाष्य लिखा था किस संप्रदाय से

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वो ज्ञान उनके पास तक आया था और श्री श्रीधर स्वामी के टीके को

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यदि चैतन्य महाप्रभु प्रामाणिक मानते

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हैं तो इस में वो टीका क्यों नहीं पढ़ा रहे हो तुम लोग

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चैतन्य महाप्रभु के अनुसार उस टीके के विरोध में जाकर के

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उसकी सीमा से बाहर जाकर के जो भाष्य करने का प्रयास करेगा वो वैश्या

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है भाष्य

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करने वाला लिखा है तुम्हारी चैतन चरितामृत में

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तो फिर क्यों नया भाष्य लिखा गया है वहां पर

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और किसने लिखा है वो और उसको क्या कहा जाएगा चैतन महाप्रभु के अनुसार

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कुतर्क कुतर्क कुतर्क कुतर्क इज इक्वल

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टू इस जय श्री राम

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[संगीत]
