1
00:00:00,560 --> 00:00:04,800
जैसे आपके अनुसार क्या इस्लाम भी धर्म है? क्या

2
00:00:04,800 --> 00:00:07,520
क्रिश्चियनिटी भी धर्म है? देवता

3
00:00:07,520 --> 00:00:11,600
धर्म के बाद अब्राहम आया

4
00:00:11,600 --> 00:00:16,640
जिसने अपनी आखरी बल से पवित्रता की शक्ति से

5
00:00:16,640 --> 00:00:18,000
इस्लाम धर्म से।

6
00:00:18,000 --> 00:00:22,480
कहता है कि ब्रह्मा कुमारी का जो ईश्वर है वो सर्वशक्तिमान

7
00:00:22,480 --> 00:00:26,560
तो सिद्ध नहीं हो रहा। परमात्मा ने स्वयं ही कहा है ना कि

8
00:00:26,560 --> 00:00:30,800
मैं स्वयंभूत हूं। मैं सर्वशक्तिमान हूं। लेकिन

9
00:00:30,800 --> 00:00:35,040
मैं अगर मनुष्य की भांति नहीं मिलेगी तो फिर मनुष्य

10
00:00:35,040 --> 00:00:38,160
में मुझ परमात्मा में अंतर ये जो

11
00:00:38,160 --> 00:00:42,160
बाइबल है, कुरान है, जो गुरु ग्रंथ है, साहित्य है, इन सबको

12
00:00:42,160 --> 00:00:46,160
लिखने वाले जो है तो सभी को जय श्री

13
00:00:46,160 --> 00:00:50,160
राम। इस समय हम हैं भिलाई में। ब्रह्मा

14
00:00:50,160 --> 00:00:54,320
कुमारीज का यहां पर केंद्र है और हमारे साथ में हमारी दीदी बैठी हुई

15
00:00:54,320 --> 00:00:58,400
हैं और जैसा कि आप सब लोग जानते हैं विभिन्न जो धार्मिक

16
00:00:58,400 --> 00:01:02,560
मान्यताएं हैं उनको लेकर के हम चर्चाएं करते

17
00:01:02,560 --> 00:01:06,640
हैं और वो आपके समक्ष रखते हैं। तो आज हम इसी क्रम में यहां आए हुए

18
00:01:06,640 --> 00:01:11,040
हैं। तो सबसे पहले मैं दीदी आप अपना थोड़ा सा परिचय दे दीजिए

19
00:01:11,040 --> 00:01:15,280
यहां का और थोड़ा सा अपने बारे में कि आप मतलब आपका परिचय देते हुए

20
00:01:15,280 --> 00:01:19,840
यहां के बारे में थोड़ा सा बता दीजिए जन सामान्य को।

21
00:01:19,840 --> 00:01:23,120
ओम शांति

22
00:01:23,120 --> 00:01:28,800
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरी विश्वविद्यालय

23
00:01:28,800 --> 00:01:32,960
की यह शाखा जो भिलाई के चरोदा

24
00:01:32,960 --> 00:01:37,040
पर है। संस्थान जो है

25
00:01:37,040 --> 00:01:41,360
वो माउंट आबू से रिले होती है। हमारा मुख्यालय

26
00:01:41,360 --> 00:01:45,520
माउंट आबू पर है और वहां से ही ऑल

27
00:01:45,520 --> 00:01:49,520
वर्ल्ड में यह सेवाएं होती हैं। वर्तमान

28
00:01:49,520 --> 00:01:51,840
समय

29
00:01:51,840 --> 00:01:56,000
मुख्यालय से जो हमारी संस्था है विश्व

30
00:01:56,000 --> 00:02:01,120
में वो 4500 से भी ज्यादा सेवा केंद्रों के माध्यम से

31
00:02:01,120 --> 00:02:05,440
मानव समाज कल्याण अर्थ सेवा कर रही है। जहां

32
00:02:05,440 --> 00:02:09,440
विभिन्न वर्गों से सेवा होती है। समय-समय पर

33
00:02:09,440 --> 00:02:13,520
यहां सामाजिक कार्यक्रम के माध्यम से

34
00:02:13,520 --> 00:02:18,720
सभी विश्व की आत्माओं को परमात्म संदेश दिया जाता है।

35
00:02:18,720 --> 00:02:23,200
परमात्म संदेश से तात्पर्य कि आज हम

36
00:02:23,200 --> 00:02:27,680
भिन्न धर्मों से और भिन्न जातियों से जुड़े हुए हैं।

37
00:02:27,680 --> 00:02:31,760
लेकिन परमात्मा जो निराकार है वह निराकार

38
00:02:31,760 --> 00:02:35,920
परमात्मा इस सृष्टि पर अवतरित होकर के सत्य गीता

39
00:02:35,920 --> 00:02:38,400
ज्ञान जो हम आत्माओं को सुना

40
00:02:38,400 --> 00:02:42,560
रहे हैं और इसी गीता ज्ञान को सुनकर के जो

41
00:02:42,560 --> 00:02:46,880
हम आत्माओं की सद्गति होती है और फिर सृष्टि में एक नव

42
00:02:46,880 --> 00:02:50,960
परिवर्तन आता है वो नव परिवर्तन होता है सतयुगी

43
00:02:50,960 --> 00:02:55,520
सृष्टि के आरंभ से और इसके माध्यम से ही

44
00:02:55,520 --> 00:02:59,680
यह जो हमारे सेवा स्थान है। यह अपने राजयोग

45
00:02:59,680 --> 00:03:03,840
की जो सेवा देते हैं। उस राजयोग में ही हमें यहां आत्मा और

46
00:03:03,840 --> 00:03:07,920
परमात्मा का परिचय मिलता है और आत्मा परमात्मा

47
00:03:07,920 --> 00:03:12,080
के परिचय से ही हम मेडिटेशन के माध्यम से अपने

48
00:03:12,080 --> 00:03:16,160
अंतर जगत की यात्रा करते हैं और अंतर जगत की यात्रा करके

49
00:03:16,160 --> 00:03:20,160
ही हम उस परम सत्य से जुड़ पाते हैं। जहां हमें

50
00:03:20,160 --> 00:03:24,160
आत्मिक शांति सुख, आनंद और प्रेम की प्राप्ति होती

51
00:03:24,160 --> 00:03:26,400
है।

52
00:03:26,400 --> 00:03:32,400
अच्छा दीदी जी थोड़ा सा हमारे दर्शकों को आप बताएंगे कि

53
00:03:32,720 --> 00:03:38,720
ब्रह्मा कुमारीज के अनुसार धर्म क्या है?

54
00:03:38,720 --> 00:03:43,040
ब्रह्मा कुमारी के अनुसार से धर्म दहिक

55
00:03:43,040 --> 00:03:48,160
नहीं है। हम धर्म से तात्पर्य होता है धारणा।

56
00:03:48,160 --> 00:03:52,960
और धारणा सभी धर्मों की है। जो अपने

57
00:03:52,960 --> 00:03:57,360
धारणा में परिपक्व हो वही सही धर्म है।

58
00:03:57,360 --> 00:04:01,520
क्योंकि हमारा जो धर्म है वो है आदि सनातन

59
00:04:01,520 --> 00:04:05,520
देवी देवता धर्म जो सृष्टि के आदि से चला

60
00:04:05,520 --> 00:04:09,520
आया है। आदि सनातन आदि सनातन क्योंकि

61
00:04:09,520 --> 00:04:13,600
वर्तमान का जो समय चल रहा है परमात्मा के कहे

62
00:04:13,600 --> 00:04:17,680
अनुसार यह समय कल्याणकारी पुरुषोत्तम संगम

63
00:04:17,680 --> 00:04:22,560
युग का समय है और इसी संगम युग में परमात्मा

64
00:04:22,560 --> 00:04:26,800
एक मानव तन का आधार लेकर के ही सृष्टि की पुन

65
00:04:26,800 --> 00:04:30,960
स्थापना का कार्य कर रहे हैं। जिसे उन्होंने नाम दिया है

66
00:04:30,960 --> 00:04:35,280
प्रजापिता ब्रह्मा और इसी प्रजापिता ब्रह्मा

67
00:04:35,280 --> 00:04:39,360
के नाम से ही यह ब्रह्मा कुमारी की जितनी भी शाखाएं

68
00:04:39,360 --> 00:04:44,400
हैं उसी नाम से ही चल रही है। नहीं नहीं

69
00:04:44,400 --> 00:04:48,720
जैसे मैंने पूछा ना कि धर्म किसे कहें? जैसे धर्म एक व्याख्या

70
00:04:48,720 --> 00:04:52,800
आई है भगवत गीता में कि अ

71
00:04:52,800 --> 00:04:53,920
तेरे लिए कर्तव्य

72
00:04:53,920 --> 00:04:58,320
और अकर्तव्य की स्थिति में विषय में केवल शास्त्र प्रमाण है।

73
00:04:58,320 --> 00:05:02,640
तो जैसे हमको विवाह किससे करना है यह भी एक धर्म है।

74
00:05:02,640 --> 00:05:06,640
या विवाह करना है कि नहीं करना है यह भी एक धर्म है। पिता की आज्ञा माननी है

75
00:05:06,640 --> 00:05:10,640
कि नहीं माननी यह भी एक धर्म है। किसकी आज्ञा माननी है, किसकी नहीं माननी यह भी

76
00:05:10,640 --> 00:05:15,200
एक धर्म है। तो क्या करना है और क्या नहीं करना है। इस विषय में एकमात्र

77
00:05:15,200 --> 00:05:19,760
शास्त्र प्रमाण है। कहा तो यह हमारा धर्म है। तो धर्म की

78
00:05:19,760 --> 00:05:24,320
उपयोगिता क्या है? मतलब धर्म को हम किसी को कैसे परिभाषित

79
00:05:24,320 --> 00:05:28,480
करते हैं? क्या है धर्म? जैसे आपने

80
00:05:28,480 --> 00:05:32,800
कहा विभिन्न धर्म तो जैसे

81
00:05:32,800 --> 00:05:37,440
आपके अनुसार क्या इस्लाम भी धर्म है? क्या क्रिश्चियनिटी

82
00:05:37,440 --> 00:05:41,520
भी धर्म है? क्योंकि वहां पर तो धर्म शब्द नहीं मिलता। दूसरे शब्द

83
00:05:41,520 --> 00:05:45,680
मिलते हैं तो फिर वह धर्म क्या चीज है जो जिसके कारण हम उसको भी धर्म

84
00:05:45,680 --> 00:05:51,680
कह रहे हैं

85
00:05:55,520 --> 00:06:01,040
इसे कैसे समझाया जाए हम

86
00:06:01,040 --> 00:06:05,200
इसको इस तरह से देख लेते हैं जैसे कि आपने कहा ना ईश्वर निराकार

87
00:06:05,200 --> 00:06:09,280
है हम फिर दूसरी तरफ हम कहते हैं कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है

88
00:06:09,280 --> 00:06:13,840
हम है ना तो निराकार है।

89
00:06:13,840 --> 00:06:17,920
वह किसी और शरीर का उपयोग करता है। है ना? क्या वह

90
00:06:17,920 --> 00:06:22,000
स्वयं से अवतरित होता है? क्या परमात्मा के बारे में

91
00:06:22,000 --> 00:06:26,560
जो स्वयं परमात्मा ने बताया है जी कि मैं स्वयंभू

92
00:06:26,560 --> 00:06:31,120
हूं। हम म स्वयं से जन्म लेने वाला। हम

93
00:06:31,120 --> 00:06:35,200
ना ही मैं जन्म किसी मानव रीति से जन्म

94
00:06:35,200 --> 00:06:39,200
लेता ना ही मैं मरता। माना वो परमात्मा

95
00:06:39,200 --> 00:06:43,280
जो जन्म और मृत्यु दोनों से परे है।

96
00:06:43,280 --> 00:06:47,520
अर्थात वो सर्वशक्तिवान है। नहीं नहीं ये तो बताया

97
00:06:47,520 --> 00:06:51,600
उसने परमात्मा ने कि मैं जन्म और मृत्यु से परे हूं। मगर क्या वो चाहे तो

98
00:06:51,600 --> 00:06:55,600
ये जो लीला रूपी संसार है प्रपंच रूपी संसार है। इसमें

99
00:06:55,600 --> 00:07:00,080
जैसे कि हम हम लोग हैं। हम भी आत्माएं आत्माओं के रूप में सनातन

100
00:07:00,080 --> 00:07:04,320
हैं। है ना? हां। है ना? मगर फिर भी हम लीला

101
00:07:04,320 --> 00:07:08,320
रूपी संसार में रूप लेते हैं। शरीर धारण करते हैं। है ना? तो उसी

102
00:07:08,320 --> 00:07:10,640
तरीके से क्या ईश्वर भी इस तरह

103
00:07:10,640 --> 00:07:14,800
से शरीर धारण कर सकता है? नहीं। परमात्मा ने कहा कि

104
00:07:14,800 --> 00:07:19,280
मैं शरीर धारण कब करता हूं? जब मुझे इस सृष्टि

105
00:07:19,280 --> 00:07:23,760
का परिवर्तन करना होता है। तब मैं आकर

106
00:07:23,760 --> 00:07:27,760
किसी और शरीर में आता। हां। किसी अपने से जैसे हम लोग अपने से शरीर

107
00:07:27,760 --> 00:07:31,760
में आ रहे हैं। वैसे परमात्मा नहीं आ सकता। परमात्मा ने कहा ना

108
00:07:31,760 --> 00:07:36,160
तो मैं पर काया प्रवेश करता हूं। पर आया प्रवेश तो इसमें

109
00:07:36,160 --> 00:07:40,160
इसमें वो जो टॉपिक है ना कि दूसरे चीजों को हम धर्म

110
00:07:40,160 --> 00:07:45,550
कैसे कह रहे हैं या फिर धर्म क्या होता है वो उससे रिलेटेड है तो इसमें क्या है कि

111
00:07:45,550 --> 00:07:49,760
[संगीत] जब हमने यह कहा कि ईश्वर पर काया प्रवेश

112
00:07:49,760 --> 00:07:53,840
तो कर सकता है परंतु स्वयं से माता के गर्भ से प्रकट होकर

113
00:07:53,840 --> 00:07:57,840
नहीं दिखा सकता तो इसमें फिर एक बाधा लग रही है कि ईश्वर

114
00:07:57,840 --> 00:08:02,080
सर्वशक्तिमान नहीं रहा क्योंकि सर्व का अर्थ है सभी कार्यों

115
00:08:02,080 --> 00:08:06,160
को करने की शक्ति जिसमें हो वो सर्वशक्ति शक्तिमान है। जैसे हम कहे क्या ईश्वर उड़

116
00:08:06,160 --> 00:08:10,240
सकता है? तो हां बिल्कुल उड़ सकता है। क्या ईश्वर गायब हो सकता है? तो गायब हो सकता है।

117
00:08:10,240 --> 00:08:14,240
क्या ईश्वर हर जगह हो सकता है? हां हो सकता है। क्या ईश्वर शेयर को हवा में उड़ा सकता

118
00:08:14,240 --> 00:08:18,240
है? बिल्कुल उड़ा सकता है। तो तभी उसको हम सर्वशक्तिमान कह रहे हैं।

119
00:08:18,240 --> 00:08:22,560
मगर यहां पे हम कह रहे हैं कि वो जन्म नहीं ले सकता। जी

120
00:08:22,560 --> 00:08:26,240
यहां हम इसको ऐसा भी कह सकते हैं हम कि

121
00:08:26,240 --> 00:08:30,240
परमात्मा निराकार है और बाकी

122
00:08:30,240 --> 00:08:34,800
सभी जो आत्माएं हैं उनमें कोई देव आत्मा है

123
00:08:34,800 --> 00:08:39,200
कोई धर्म आत्मा है कोई महान आत्मा है

124
00:08:39,200 --> 00:08:43,520
कोई पाप आत्मा है और कोई पुण्य आत्मा है हम

125
00:08:43,520 --> 00:08:47,600
हम कभी भी पुण्य परमात्मा नहीं कहते या

126
00:08:47,600 --> 00:08:51,600
पुण्य धर्मात्मा नहीं कहते या पुण्य महात्मा त्मा नहीं कहते।

127
00:08:51,600 --> 00:08:55,840
परमात्मा से तात्पर्य कि वह सर्वोपरि है, सर्वोच्च

128
00:08:55,840 --> 00:09:00,000
है। और बाकी जो आत्माएं हैं चाहे वो देव आत्मा

129
00:09:00,000 --> 00:09:04,000
हो, धर्मात्मा हो, महान आत्मा हो, पुण्य आत्मा

130
00:09:04,000 --> 00:09:08,160
हो या पाप आत्मा हो यह हम सभी आत्माएं जो है जो

131
00:09:08,160 --> 00:09:12,560
माता के गर्भ से जन्म लेती हैं, मृत्यु को प्राप्त करती हैं

132
00:09:12,560 --> 00:09:16,560
और फिर जन्म लेती हैं। और परमात्मा जो कि निराकार

133
00:09:16,560 --> 00:09:20,720
है, वो इस जन्म मरण के चक्कर से परे है। नहीं नहीं वो स्वयं

134
00:09:20,720 --> 00:09:25,120
परमात्मा अलग है और देव आत्मा अलग नहीं वो तो है

135
00:09:25,120 --> 00:09:29,120
यदि वो चाहे वो चाहे तो वो कर सकता है ले सकता है जन्म या

136
00:09:29,120 --> 00:09:33,120
नहीं ले सकता परमात्मा चाहे तो जैसे उसका मन हुआ कि भाई मैं लीला

137
00:09:33,120 --> 00:09:37,200
में आऊं खेलूं कूदूं या मतलब अपने मन से

138
00:09:37,200 --> 00:09:41,760
ये नहीं कि उसको बाध्य है कि अभी आज जैसे हम लोग अपनी मृत्यु को कंट्रोल नहीं कर सकते

139
00:09:41,760 --> 00:09:45,760
मगर वो चाहे कि मैं अपने इच्छा अनुसार जब चाहूं तब शरीर को

140
00:09:45,760 --> 00:09:50,000
त्यागू मैं अपनी इच्छा अनुसार जब चाहूं तब आऊं हमारे कंट्रोल में जन्म मृत्यु

141
00:09:50,000 --> 00:09:54,160
नहीं है। उसके कंट्रोल में है तो क्या वो इस कंट्रोल के साथ

142
00:09:54,160 --> 00:09:58,240
आ सकता है या नहीं? और नहीं आ सकता है। अगर मान लिया कि उसने कहा

143
00:09:58,240 --> 00:10:02,880
है कि मैं नहीं आ सकता। फिर उसको हम सर्वशक्तिमान कैसे कहेंगे?

144
00:10:02,880 --> 00:10:07,120
परमात्मा को सर्वशक्तिमान कैसे कहेंगे? हम जैसे

145
00:10:07,120 --> 00:10:11,200
हम कहते हैं सर्वज्ञ। सर्वज्ञ का मतलब है ऐसा कुछ भी नहीं है जो उसको ज्ञात ना

146
00:10:11,200 --> 00:10:15,280
हो। है ना? हम कहते हैं सर्वव्यापी। तो सर्वव्यापी का

147
00:10:15,280 --> 00:10:19,520
अर्थ यह है हम उसको नहीं कहते। मान लीजिए हमने कहा आप नहीं कहते

148
00:10:19,520 --> 00:10:23,920
हैं कई आइडियोलॉजीस कहती भी हैं। तो मान लीजिए किसी ने कहा सर्व्यापी तो सर्वव्यापी

149
00:10:23,920 --> 00:10:28,000
का अर्थ आएगा कि ऐसी कोई जगह नहीं है जहां पर वो व्याप्त ना हो।

150
00:10:28,000 --> 00:10:32,640
तो जब हम कह रहे हैं सर्वशक्तिमान तो ऐसा कोई कार्य नहीं है जो वो ना कर पाए।

151
00:10:32,640 --> 00:10:36,800
कारण हां परंतु यहां पर एक प्रॉब्लम आ रही है कि वो जो है जन्म नहीं ले सकता।

152
00:10:36,800 --> 00:10:40,800
जी परमात्मा ने स्वयं भी कहा है ना

153
00:10:40,800 --> 00:10:44,960
कि मैं स्वयं हूं। मैं सर्वशक्तिमान हूं।

154
00:10:44,960 --> 00:10:48,960
लेकिन मैं अगर मैं भी जन्म ले लूं अगर मनुष्यों की भांति

155
00:10:48,960 --> 00:10:53,040
मैं भी जन्म ले लूं तो फिर मनुष्यों में और फिर मुझ परमात्मा में

156
00:10:53,040 --> 00:10:56,960
अंतर अंतर ये रह जाएगा कि मैं जब चाहूं तब मरूंगा मनुष्य जब

157
00:10:56,960 --> 00:11:01,200
चाहे तब नहीं मरता है। मैं जब चाहूं तब उत्पन्न होऊंगा। मनुष्य जब चाहे तब नहीं उत्पन्न

158
00:11:01,200 --> 00:11:05,760
होता है। जी जो परमात्मा के ज्ञान के आधार पर

159
00:11:05,760 --> 00:11:09,760
जो परमात्मा से हम आत्माओं को ज्ञान मिला है तो उन्होंने

160
00:11:09,760 --> 00:11:13,840
जो बताया कि सृष्टि रूपी ड्रामा ये सृष्टि रूपी नाटक

161
00:11:13,840 --> 00:11:17,920
रंगमंच जो कि 5000 वर्ष का एक बना बनाया

162
00:11:17,920 --> 00:11:22,080
नाटक रंगमंच है जो एक ड्रामा की भांति चल रहा है

163
00:11:22,080 --> 00:11:26,080
सिर्फ ड्रामा में परमात्मा का इस सृष्टि पर आना भी

164
00:11:26,080 --> 00:11:30,320
नो होता है लेकिन वो होता है परकाया प्रवेश परकाया प्रवेश

165
00:11:30,320 --> 00:11:34,320
वो तभी करते हैं। जब कलयुग के अंत में अति धर्म

166
00:11:34,320 --> 00:11:38,720
ग्लानी का समय होता है तब वो परकाया प्रवेश करते हैं

167
00:11:38,720 --> 00:11:42,800
और फिर वो आकर के हम आत्माओं को यहां जो पुण्य आत्माएं

168
00:11:42,800 --> 00:11:46,880
होती है वो स्वयं अपना भी परिचय देते हैं और फिर वो

169
00:11:46,880 --> 00:11:51,040
यही कहते हैं कि जो गीता में लिखा हुआ है गीता में जो लिखा

170
00:11:51,040 --> 00:11:55,840
हुआ है यदा यदा ही धर्म से भारत

171
00:11:55,840 --> 00:11:59,040
धर्मस तदात्म

172
00:11:59,040 --> 00:12:03,520
इस सृष्टि रंगमंच पर कल कल्प में एक बार आता हूं।

173
00:12:03,520 --> 00:12:07,520
5000 इसमें कल्प की बात तो नहीं आई है। हां मतलब ये पूरा

174
00:12:07,520 --> 00:12:11,520
वो कहते हैं जब जब धर्म की हानि होती है तबत मैं जो है अधर्म का

175
00:12:11,520 --> 00:12:12,020
नाश करने

176
00:12:12,000 --> 00:12:16,080
के लिए साधु भक्तों के उद्धार गणी परित्राणाय साधु नाम जी

177
00:12:16,080 --> 00:12:20,320
है ना विनाशाय चतुष्कताम तो वो तबत मैं अपना स्वयं का सृजन

178
00:12:20,320 --> 00:12:24,400
करता हूं। वहां पे ये भी नहीं कहा है कि मैं परकाया में प्रवेश करता हूं। वहां पे कहा मैं सृजन करता

179
00:12:24,400 --> 00:12:28,560
हूं। अपने आप का स्वयं रूप बनाता हूं। तो परमात्मा ने यह भी कहा

180
00:12:28,560 --> 00:12:32,800
ना कि धर्म की ग्लानी केवल एक बार होती

181
00:12:32,800 --> 00:12:37,120
है। सतयुग और त्रेता युग में धर्म ग्लानी नहीं हुई।

182
00:12:37,120 --> 00:12:41,280
द्वापर और कलयुग के बीच में भी नहीं हुई। ये कलयुग अंत में हुई।

183
00:12:41,280 --> 00:12:46,800
नहीं नहीं दीदी वो जो विषय चल रहा है ना वो ये चल रहा है कि ईश्वर

184
00:12:46,800 --> 00:12:50,960
ये मनुष्यों की भांति अवतार ले सकता है कि नहीं? परगाह प्रवेश

185
00:12:50,960 --> 00:12:55,120
नहीं मगर मनुष्यों की भांति शरीर धारण कर सकता है कि नहीं? अगर नहीं

186
00:12:55,120 --> 00:13:00,080
कर सकता है वो अलग बात है। मगर नहीं कर सकता तो फिर उसकी ये जो सर्वशक्तिमत्ता

187
00:13:00,080 --> 00:13:04,080
है उसमें क्वेश्चन उठ जाता है। जैसे अगर दुनिया में कोई

188
00:13:04,080 --> 00:13:08,240
भी एक कार्य है जो वो नहीं कर पा रहा है तो उस पर फिर क्वेश्चन आ जाता है। वो सर्व

189
00:13:08,240 --> 00:13:12,400
शब्द हट जाएगा। फिर सर्व का मतलब तो सर्व ही है। कि

190
00:13:12,400 --> 00:13:16,560
वो सब कुछ कर सकते हैं। जी तो वो सब कुछ तो कर ही रहे हैं।

191
00:13:16,560 --> 00:13:20,960
तो वो जन्म कहां ले रहे हैं? अच्छा वो जन्म इसलिए नहीं ले रहे हैं क्योंकि वो निराकार

192
00:13:20,960 --> 00:13:25,280
है। तो इसका मतलब वो नहीं ले सकते ना। बाधित हो गए ना तो वो कोई परया प्रवेश

193
00:13:25,280 --> 00:13:27,040
तो कर रहे हैं ना नहीं तो जन्म नहीं

194
00:13:27,040 --> 00:13:31,440
ले रहे ना हां जन्म नहीं ले रहे हैं जन्म मरण के चक्र से परे

195
00:13:31,440 --> 00:13:35,600
तो तो कहना चाहिए जो ये जो विशेषण है ना सर्व ये एक विशेषण

196
00:13:35,600 --> 00:13:39,680
है ये तब लग रहा है जब सर्व मतलब जिसमें सब हो गया सब

197
00:13:39,680 --> 00:13:43,760
हां या तो जैसे हम सर्वज्ञ कहेंगे तो हम कहें कि क्या ईश्वर ये जानता

198
00:13:43,760 --> 00:13:47,840
है कि नाली में कौन सा कीड़ा चल रहा है अब हम कह दे कि वो नाली में जानना उसका

199
00:13:47,840 --> 00:13:52,000
काम नहीं है हम कह दे वो अच्छी चीज नहीं है उसको क्यों जाने ईश्वर तो मगर

200
00:13:52,000 --> 00:13:56,080
वो अगर नहीं जानता है कि नाली में क्या है तो वहां पर सर्वज्ञता नष्ट हो

201
00:13:56,080 --> 00:14:00,160
जाएगी। यह मानना पड़ेगा कि नाली की चीजें भी उसको पता है। यानी कि

202
00:14:00,160 --> 00:14:04,160
अच्छी और बुरी सब चीजें उसको पता है। इसीलिए अगर कोई छोटा काम है या

203
00:14:04,160 --> 00:14:08,160
बड़ा काम है। अगर छोटा भी है तो भी उसको करना होना चाहिए। तभी

204
00:14:08,160 --> 00:14:12,240
वह सर्वशक्तिमान होगा। हम इसको एक इसको इस एक

205
00:14:12,240 --> 00:14:16,320
एक तरीके से और देख सकते हैं। अह हम लोग यह कैसे किसी को

206
00:14:16,320 --> 00:14:21,600
सिद्ध करें कि ईश्वर है। ईश्वर है। हम

207
00:14:21,600 --> 00:14:25,840
ईश्वर की शक्तियों को अनुभव करके

208
00:14:25,840 --> 00:14:29,840
ये कैसे पता चलेगा कि ये उसी की शक्ति है? जैसे जो लोग कहते हैं मैं ईश्वर को नहीं

209
00:14:29,840 --> 00:14:34,960
मानता। तो हम उसको क्या कहें? जिस प्रकार देखा जाए

210
00:14:34,960 --> 00:14:39,040
यह फैन चल रहा है हम हम इस फैन के नीचे बैठे हुए हैं

211
00:14:39,040 --> 00:14:42,320
जी और हमें ठंडी हवा लग रही है जी

212
00:14:42,320 --> 00:14:46,560
तो हम केवल फैन को देख रहे हैं ना क्योंकि वो स्थूल है जी

213
00:14:46,560 --> 00:14:51,040
लेकिन हवा को तो नहीं देखा जा रहा है उसकी हम महसूस तो कर रहे हैं ना

214
00:14:51,040 --> 00:14:55,200
तो उसी प्रकार परमात्मा है ना तो परमात्मा को हम

215
00:14:55,200 --> 00:14:59,760
अनुभव करते हैं ना परमात्मा की शक्तियों को हम अनुभव करते हैं ना

216
00:14:59,760 --> 00:15:04,320
लेकिन परमात्मा दिखाई नहीं दे रहा है। इसका यह मतलब तो नहीं कि परमात्मा

217
00:15:04,320 --> 00:15:08,480
नहीं है। नहीं वह तो दिखाई देना और ना देना तो इस पर निर्भर

218
00:15:08,480 --> 00:15:12,480
करता है कि भगवान ने हमें जो इंद्रियां दी हैं उसमें से एक इंद्री उसने नहीं दी

219
00:15:12,480 --> 00:15:16,800
देखने वाली जो ईश्वर को देख सके। मान लीजिए कि ईश्वर को देख सकने वाली इंद्री

220
00:15:16,800 --> 00:15:20,800
नहीं दी। तो नहीं देख पा रहे। अभी वो दे दे तो हो सकता है देख ले तो

221
00:15:20,800 --> 00:15:25,120
उसके ऊपर उसके ऊपर वो है सामर्थ्य कि वो चाहे तो अपने आपको दिखाए।

222
00:15:25,120 --> 00:15:29,200
वो चाहे तो ना दिखाए। वो तो एक अलग बात है। मगर एक व्यक्ति जैसे हमने कहा पंखा चल

223
00:15:29,200 --> 00:15:33,280
रहा है तो पंखा चलने से सिद्ध होता है कि इसके पीछे कोई शक्ति काम कर रही है। उसी

224
00:15:33,280 --> 00:15:37,360
प्रकार से उसी प्रकार से पूरी सृष्टि का संचालन हो रहा है। तो इसका मतलब

225
00:15:37,360 --> 00:15:41,600
है कि कोई पीछे शक्ति है। मगर इसमें दिक्कत ये आती है कि पीछे शक्ति

226
00:15:41,600 --> 00:15:46,000
है तो हम उस पीछे वाली शक्ति को शक्ति माने। ईश्वर माने कि

227
00:15:46,000 --> 00:15:50,080
ये सोचे हो सकता है इसके भी पीछे कोई शक्ति होगी। फिर उसके भी पीछे कोई शक्ति

228
00:15:50,080 --> 00:15:54,160
होगी। जी। जैसे मान लीजिए शक्ति तो एक ही होगी। हां। शक्ति

229
00:15:54,160 --> 00:15:57,600
तो एक ही होगी ना। हां और उस शक्ति को ही हम सर्वशक्ति

230
00:15:57,600 --> 00:16:01,600
भगवान का नाम देंगे ना नहीं ठीक है दे दिया मगर हम यह कैसे माने

231
00:16:01,600 --> 00:16:06,400
कि वह शक्ति ही हमारा गंतव्य है

232
00:16:06,400 --> 00:16:10,400
मतलब कि मेरा जैसे मान लीजिए भगवान है आपने कहा कि

233
00:16:10,400 --> 00:16:14,400
जो शक्ति सबसे लास्ट में इस पूरी सृष्टि को संचालित कर रही जिसके

234
00:16:14,400 --> 00:16:18,480
पीछे कोई नहीं है वही है तो वो हमारा ऐ है उसके

235
00:16:18,480 --> 00:16:22,560
बीच में मेरा संबंध है मेरा और उसमें यह कैसे माने जैसे मान

236
00:16:22,560 --> 00:16:26,560
लीजिए मान लीजिए कि इस दुनिया में कोई बहुत अमीर है। बहुत अमीर है। उसके

237
00:16:26,560 --> 00:16:30,960
पास बहुत पैसा है। तो मुझे क्या उससे मेरा संबंध स्थापित

238
00:16:30,960 --> 00:16:36,960
होना चाहिए ना। तभी तो मैं उसकी ओर आगे बढूंगा। तो वो कैसे हो?

239
00:16:37,760 --> 00:16:42,560
संबंध स्थापित करना। परमात्मा कहते हैं

240
00:16:42,560 --> 00:16:47,040
मैं परमात्मा और हम सब उसकी संतान आत्मा।

241
00:16:47,040 --> 00:16:51,200
तो आत्मा का अपने पिता परमात्मा से संबंध ना

242
00:16:51,200 --> 00:16:55,200
होना यह तो कोई बात नहीं है। नहीं नहीं यह तो परमात्मा कह रहे

243
00:16:55,200 --> 00:16:59,200
हैं। फिर जो नास्तिक है ना जी हां उसको पहले मानना पड़ेगा कि

244
00:16:59,200 --> 00:17:04,480
परमात्मा है और ये जो कह रहा है वो सही कह रहा है। तब वो मानेगा इस बात को।

245
00:17:04,480 --> 00:17:08,480
नास्तिक अगर अपने मन में ये सोचे कि अगर मैंने इस सृष्टि

246
00:17:08,480 --> 00:17:12,480
पर जन्म लिया है। जन्म लिया है। जी तो वो माता के गर्भ से

247
00:17:12,480 --> 00:17:16,480
जन्म लिया हुआ है। जी है ना? लेकिन माता के गर्भ में

248
00:17:16,480 --> 00:17:20,560
मैं जो आत्मा आई हूं वो कहां से आई? उसका

249
00:17:20,560 --> 00:17:24,720
भी तो अपना कोई स्थान होगा ना। जब हम यह कहते हैं जब

250
00:17:24,720 --> 00:17:28,880
हम किसी से परिचय प्राप्त करते हैं तो हम कहते हैं कि भाई आप

251
00:17:28,880 --> 00:17:33,520
कहां से आए हैं? तो वह अपना स्थूल परिचय देते हैं।

252
00:17:33,520 --> 00:17:37,760
हम उनसे पुनः कहते हैं कि हम आपको पूछ रहे हैं तो वह पुनः

253
00:17:37,760 --> 00:17:41,920
अपने शरीर का ही परिचय देते हैं। लेकिन वो शरीर ना हो के वो

254
00:17:41,920 --> 00:17:46,000
एक आत्मा है। जब हम कहते कि नहीं आप एक आत्मा है तो

255
00:17:46,000 --> 00:17:50,080
आत्मा कहां से आई है? अब वो कहेगा कि मैं आत्मा तो

256
00:17:50,080 --> 00:17:53,120
भगवान के घर से आई हूं। तो अब वो भगवान रहता

257
00:17:53,120 --> 00:17:57,200
कहां है? तब वो भगवान तो इस पारबह्म के पार

258
00:17:57,200 --> 00:18:01,440
में रहता है। अर्थात इस सृष्टि से परे रहता है। नहीं नहीं इसमें इसमें

259
00:18:01,440 --> 00:18:05,440
दीदी यही बात है ना जैसे किसी ने मान लिया कि आत्मा है। ठीक है।

260
00:18:05,440 --> 00:18:09,440
हम उससे कह रहे हैं कि अब आत्मा कहां से आई है? तो ये सवाल तो जो आपने

261
00:18:09,440 --> 00:18:13,680
कहा ना जो समस्त सृष्टि के पीछे संचालित करने वाली जो शक्ति है

262
00:18:13,680 --> 00:18:17,920
उससे भी कहा जाता है। कहा जा सकता है कि तुम कहां से आई हो? कोई

263
00:18:17,920 --> 00:18:22,080
देखो। कोई एक भी व्यक्ति हो सकता है ना। कोई एक ही

264
00:18:22,080 --> 00:18:26,240
व्यक्ति हो सकता है। अगर हम यह कहते हैं कि परमात्मा है

265
00:18:26,240 --> 00:18:30,400
तो परमात्मा एक ही होगा। परमात्मा एक ही होगा। आप बहुत

266
00:18:30,400 --> 00:18:34,560
सारी देव आत्माओं को देख लीजिए। आप बहुत सारी धर्मात्मा हो

267
00:18:34,560 --> 00:18:38,800
सकती हैं। महान आत्मा पुण्य आत्मा हो सकती हैं। लेकिन बहुत

268
00:18:38,800 --> 00:18:42,960
सारे परमात्मा नहीं हो सकते हैं। परमात्मा एक ही मेरा क्वेश्चन

269
00:18:42,960 --> 00:18:47,040
अलग है। मैं ये कह रहा हूं कि परमात्मा एक है। हमने मान लिया कि कोई

270
00:18:47,040 --> 00:18:51,280
एक शक्ति है जो इस पूरे संसार को चला रही है। ठीक है? मगर

271
00:18:51,280 --> 00:18:53,840
मेरा

272
00:18:53,840 --> 00:18:57,920
जो नाश्त वो नहीं मान मेरा मेरा उससे संबंध क्या है जो मैं

273
00:18:57,920 --> 00:19:02,000
उसकी पूजा करूं उसकी बातें मानू मेरा क्या संबंध है उससे ये कैसे

274
00:19:02,000 --> 00:19:06,000
सिद्ध होगा वो वो वो तो वो वो वो तो यह कह

275
00:19:06,000 --> 00:19:08,160
देगा जैसे बुद्ध बौद्ध दर्शन

276
00:19:08,160 --> 00:19:12,240
जो कहता है वो कहता है भाई प्रकृति सब कुछ है प्रकृति चला रही है अपने

277
00:19:12,240 --> 00:19:16,320
आप चल रहा है और जो है आप यह करोगे तो यह होगा यह करोगे तो यह होगा बात

278
00:19:16,320 --> 00:19:20,720
खत्म कोई ईश्वरश्वर नहीं है यह नास्तिकों का दर्शन भी कहता है

279
00:19:20,720 --> 00:19:24,800
बौद्ध दर्शन नास्तिक दर्शन है तो अब यदि

280
00:19:24,800 --> 00:19:28,960
मैंने मान लिया प्रकृति चला रही ठीक है चला रही है उससे मेरा कोई रिलेशन नहीं है जब

281
00:19:28,960 --> 00:19:32,960
तक हम रिलेशन नहीं सिद्ध करेंगे तब तक ईश्वर सिद्ध नहीं होगा और जब तक ईश्वर नहीं

282
00:19:32,960 --> 00:19:37,120
सिद्ध करेंगे तब तक धर्म सिद्ध नहीं होगा और जब तक हम धर्म सिद्ध नहीं करेंगे

283
00:19:37,120 --> 00:19:41,360
तब तक हम ये पहचान नहीं पाएंगे कि इस्लाम और ईसाइयत को हम धर्म कहें

284
00:19:41,360 --> 00:19:45,600
ना कहें ये पॉइंट मतलब वहीं से कनेक्टेड है ये बात इसलिए आवश्यक है

285
00:19:45,600 --> 00:19:49,760
कि हम मतलब पहले ये जाने कि हम ये समझ पाए कि

286
00:19:49,760 --> 00:19:54,240
क्या कहते हैं कि ईश्वर सिद्ध कैसे होता है? अब जैसे हमने कहा एक्चुअली

287
00:19:54,240 --> 00:19:58,320
मेरी जानकारी में जो है ईश्वर नास्तिक से ही शुरू होती है

288
00:19:58,320 --> 00:20:02,800
सारी यात्रा। ईश्वर को सिद्ध करेंगे जब आप अगर सिद्ध करेंगे

289
00:20:02,800 --> 00:20:06,800
अगर सिद्ध नहीं करना केवल परमात्मा ने कहा है मान लो तो फिर तो वो वाली बात है कि

290
00:20:06,800 --> 00:20:11,200
जिसको मानना है मानेगा। जिसकी आस्था हो गई आपकी बातें उसको अच्छी लगी

291
00:20:11,200 --> 00:20:15,280
वो प्रभावित हुआ तो उसने मान लिया। मगर वो ठोस जो एक होता है

292
00:20:15,280 --> 00:20:19,440
ना कि फिर तस से मस ना होने वाली बात वो वाली बात नहीं हो

293
00:20:19,440 --> 00:20:23,200
पाएगी उसमें तो हम लोगों की जो व्याख्या है वो असुतो मा सद्गमया

294
00:20:23,200 --> 00:20:27,200
तमसो मा ज्योतिर्गम मृत्यु मा मृतम गमया से शुरू होती है एक

295
00:20:27,200 --> 00:20:31,440
जीव के अंदर एक नास्तिक व्यक्ति के अंदर भी कभी ना मरने की प्यास है

296
00:20:31,440 --> 00:20:35,600
हम अखंड ज्ञानी बन जाने की प्यास है कोई आया तो कौन आया

297
00:20:35,600 --> 00:20:39,680
अपने आप सोचने लगे कल पाकिस्तान इंडिया में कौन जीतने वाला है अपने आप सोचने

298
00:20:39,680 --> 00:20:43,680
लगे और इसके साथ ही साथ सदा आनंद ंदित रहने

299
00:20:43,680 --> 00:20:48,160
की प्यास है। हमारे अंदर सच्चित आनंद की प्यास है।

300
00:20:48,160 --> 00:20:52,240
इसका मतलब जैसे हमारे अंदर ऐसी कोई प्यास नहीं है जिसका विषय इस दुनिया

301
00:20:52,240 --> 00:20:56,480
में ना हो। उसका निराकरण करने वाला। जैसे हम हमारे अंदर भूख है

302
00:20:56,480 --> 00:21:00,640
तो दुनिया में खाना है। हमारे अंदर प्यास है। दुनिया में पानी है। हमारे

303
00:21:00,640 --> 00:21:04,960
अंदर देखने की क्षमता है तो दुनिया में दृश्य है। सुनने की क्षमता है तो दुनिया में

304
00:21:04,960 --> 00:21:08,960
आवाज है। तो जिस प्रकार भूख होने से ही सिद्ध हो जाता है

305
00:21:08,960 --> 00:21:12,960
कि इस दुनिया में कुछ है जो आपकी भूख मिटा सकता है। प्यास होने से

306
00:21:12,960 --> 00:21:16,960
ही सिद्ध हो जाता है कि इस दुनिया में कोई आपकी प्यास मिटाने वाला तत्व है। उसी

307
00:21:16,960 --> 00:21:21,600
प्रकार से सच्चित आनंद की प्यास होने से ये कभी ना मरने की प्यास,

308
00:21:21,600 --> 00:21:25,600
अखंड ज्ञानी की प्यास और आनंद की प्यास। तो सच्चिद आनंद की प्यास से ही सिद्ध हो

309
00:21:25,600 --> 00:21:29,680
जाता है कि दुनिया में सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर का अस्तित्व है। अच्छा

310
00:21:29,680 --> 00:21:33,680
इस प्यास को अगर हम थोड़ा निचोड़ करके देखें तो नास्तिक भी कभी-कभी

311
00:21:33,680 --> 00:21:37,760
ये सोचता है कि बारिश ज्यादा हो रही है तो कम हो जाए। जबकि वो

312
00:21:37,760 --> 00:21:38,260
सुपर

313
00:21:38,240 --> 00:21:42,320
सुप्रीम अथॉरिटी में विश्वास नहीं कर रहा है। मगर वो सोच रहा है कि बारिश

314
00:21:42,320 --> 00:21:46,400
कम हो जाए। और क्या कहते हैं? धूप ज्यादा पड़ रही है तो कम

315
00:21:46,400 --> 00:21:50,640
हो जाए। नास्तिक भी ऐसा सोच लेता है। इसका मतलब उसके अंदर भी सच्चिदानंद

316
00:21:50,640 --> 00:21:54,640
को ढूंढने की चाह है। और यह जो वह सोच रहा है ना

317
00:21:54,640 --> 00:21:58,960
यह बार-बार प्रकृति के नियमों के विपरीत है ना? तो

318
00:21:58,960 --> 00:22:02,960
इसका मतलब वो प्रकृति के सभी प्रकार के नियमों को तोड़ देने की

319
00:22:02,960 --> 00:22:06,960
चाह उसके अंदर विद्यमान है। और इसी से सिद्ध होता है

320
00:22:06,960 --> 00:22:11,280
कि इस संसार में कोई ऐसा है जो प्रकृति के सभी नियमों को तोड़ देता है। तो

321
00:22:11,280 --> 00:22:15,360
यहां से ईश्वर तो सिद्ध हो गया। मगर जो हम वो वाला ईश्वर जो

322
00:22:15,360 --> 00:22:19,440
प्रकृति के सभी नियमों को ना तोड़ पाए वो वाला ईश्वर यहां से सिद्ध

323
00:22:19,440 --> 00:22:23,600
नहीं होगा। अच्छा हां ये दिक्कत है। ईश्वर तो सिद्ध

324
00:22:23,600 --> 00:22:27,680
हो जाएगा मगर तब हमें कहना पड़ेगा कि हां प्रकृति के सभी नियमों को तोड़

325
00:22:27,680 --> 00:22:32,080
मां की कोख से भी आएगा। राम मतलब वो एक अलग वो आ जाएगी।

326
00:22:32,080 --> 00:22:36,080
राम में भी आएगा कृष्ण बन के भी आएगा। अब जब हम यह डिसाइड कर

327
00:22:36,080 --> 00:22:40,080
लेते हैं कि क्या कहते हैं? ईश्वर क्या कहते हैं?

328
00:22:40,080 --> 00:22:44,080
कैसे सिद्ध हुआ? तो इससे वह ईश्वर सिद्ध हुआ जो सब कुछ कर सकता है। फिर वहां बाधित

329
00:22:44,080 --> 00:22:48,080
ईश्वर नहीं है। अब जब हमने यह देखा कि बाधित ईश्वर सिद्ध हुआ

330
00:22:48,080 --> 00:22:52,160
उसके बिना नास्तिक नास्तिक अवधारणा खत्म ही नहीं हो सकती। बाधित ईश्वर के बिना

331
00:22:52,160 --> 00:22:53,280
बुद्धिज्म को हराने

332
00:22:53,280 --> 00:22:57,280
वाला भी सर्वशक्तिमान ईश्वर अद्वैत का ही था शंकराचार्य जी का।

333
00:22:57,280 --> 00:23:01,280
तो जब हमें यह पता चल जाता है कि

334
00:23:01,280 --> 00:23:05,360
बाधित ईश्वर ही है। अबाध्य ईश्वर ही है जो नास्तिकता को खत्म कर सकता

335
00:23:05,360 --> 00:23:09,440
है। अब देखते हैं कि जैसे हमने कहा कुरान भी धर्म

336
00:23:09,440 --> 00:23:13,600
है। तो धर्म यहां से क्या सिद्ध हुआ है? धर्म यहां से ये सिद्ध

337
00:23:13,600 --> 00:23:17,760
हुआ कि जीव की चाह का जो वास्तविक विषय है सच्चिदानंद स्वरूप

338
00:23:17,760 --> 00:23:21,920
परमेश्वर उसको प्राप्त कराने वाली विधा का नाम धर्म है। कि

339
00:23:21,920 --> 00:23:25,920
आप यह करोगे तो ईश्वर प्राप्त होगा। आपका सच्चिदानंद जिसको आप खोज रहे

340
00:23:25,920 --> 00:23:30,000
हो और यह नहीं करोगे तो प्राप्त नहीं होगा। तो यह तो हमने सिद्ध कर लिया। अब बात

341
00:23:30,000 --> 00:23:34,240
यह आती है की कुरान के द्वारा प्रतिपादित होने वाला ईश्वर क्या वही है? वैसा

342
00:23:34,240 --> 00:23:38,240
ही है जैसा यहां से हो रहा है। तो पता चलता है कि कुरान खुद कह रही है कि

343
00:23:38,240 --> 00:23:42,320
मेरा ईश्वर यह नहीं कर सकता। मेरा ईश्वर वो नहीं कर सकता। बाइबल खुद कह रही है

344
00:23:42,320 --> 00:23:46,640
मेरा ईश्वर यह नहीं कर सकता। तो फिर उसके द्वारा बताया गया उस बाधित

345
00:23:46,640 --> 00:23:50,800
एंटिटी को प्राप्त कराने वाली जो विधा है। उसको फिर धर्म नहीं कह पाएंगे।

346
00:23:50,800 --> 00:23:55,440
ये छोटा सा मेरा वो था। इसमें थोड़ा सा प्रकाश डालें। जी

347
00:23:55,440 --> 00:23:59,760
चलिए किरण दीदी आप क्लियर करेंगे? हां दीदी

348
00:23:59,760 --> 00:24:03,760
आप आ जाइए। और अच्छे से एक्सप्लेन कर दो भाई साहब

349
00:24:03,760 --> 00:24:09,760
के प्रश्न उत्तर को। वो क्लिप दे दीजिए दीदी को। अच्छा

350
00:24:10,560 --> 00:24:14,800
आदि भी लगा रहे हैं। ये क्या है? आदि सनातन का तात्पर्य

351
00:24:14,800 --> 00:24:18,800
यह है हां। कि परमात्मा ने सबसे पहले

352
00:24:18,800 --> 00:24:23,280
सृष्टि की शुरुआत की हां। तो जिस धर्म की स्थापना की

353
00:24:23,280 --> 00:24:28,080
हम वो है देवी देवता धर्म। ठीक है? सनातन नहीं है वो।

354
00:24:28,080 --> 00:24:31,680
वो सनातन नहीं है।

355
00:24:31,680 --> 00:24:35,760
खैर अभी जो बीच में मिलावट हुई इस वजह

356
00:24:35,760 --> 00:24:39,760
से आप यह कह सकते हैं कि सनातन नहीं है।

357
00:24:39,760 --> 00:24:44,160
परंतु जो हमें परमात्मा ने सत्य परिचय दिया उसमें यह कहा

358
00:24:44,160 --> 00:24:48,320
कि वो सनातन था ना। यह आदि सनातन देवी

359
00:24:48,320 --> 00:24:52,480
देवता धर्म की स्थापना परमात्मा शिव निराकार

360
00:24:52,480 --> 00:24:56,640
ने की। किस समय की? कलयुग के अंत

361
00:24:56,640 --> 00:25:00,640
और सतयुग के आदि दोनों के बीच के टाइम पे। तो

362
00:25:00,640 --> 00:25:04,640
जब परमात्मा ने यह सत्य धर्म की स्थापना की।

363
00:25:04,640 --> 00:25:08,720
उसके बाद सतयुग और त्रेता युग दो युग

364
00:25:08,720 --> 00:25:12,960
तक ये एक धर्म चला। जहां पर एक धर्म

365
00:25:12,960 --> 00:25:17,520
था, एक राज्य थी, एक मत थी, एक भाषा थी,

366
00:25:17,520 --> 00:25:22,240
धार्मिक, राजनैतिक सत्ता भी एक के हाथ में थी।

367
00:25:22,240 --> 00:25:25,600
वहां पे कोई भी प्रकार की मतभेद नहीं थी।

368
00:25:25,600 --> 00:25:29,760
फिर उसके बाद जैसे ही द्वापर युग आया तो

369
00:25:29,760 --> 00:25:34,240
दूसरा पूर्व शुरू हुआ, द्वैत धर्म शुरू हुआ।

370
00:25:34,240 --> 00:25:38,240
जहां पे ऊपर से और भी आत्माएं

371
00:25:38,240 --> 00:25:42,400
आना शुरू की। तो वहां पे सबसे पहले

372
00:25:42,400 --> 00:25:46,800
फिर देवता धर्म के बाद अब्राहम

373
00:25:46,800 --> 00:25:51,280
आया जिसने अपनी आत्मिक बल से पवित्रता

374
00:25:51,280 --> 00:25:55,680
की शक्ति से इस्लाम धर्म स्थापन किया। नहीं नहीं

375
00:25:55,680 --> 00:25:59,840
दीदी अभी बात ये हो रही है कि धर्म क्या है? धर्म

376
00:25:59,840 --> 00:26:03,920
धर्म वास्तव में ये हमारे भाषा में

377
00:26:03,920 --> 00:26:08,080
हम ये कहते हैं धर्म अर्थात जीवन की धारणा।

378
00:26:08,080 --> 00:26:12,080
जिसके लिए श्री रामचंद्र जी ने भी यह कहा कि

379
00:26:12,080 --> 00:26:16,320
धरत पर यह धर्म ना छोड़िए। जिसके लिए उन्होंने

380
00:26:16,320 --> 00:26:20,560
कहा रघुकुल रीति सदा चली आई प्राण जाए पर वचन ना जाए।

381
00:26:20,560 --> 00:26:24,640
अब अब इस पे एक सवाल आता है। जैसे श्री राम जी ने कहा है कि रघुल रीति सदा चली

382
00:26:24,640 --> 00:26:28,640
आई प्राण जाए पर वचन ना जाए। मगर कुरान में 33 चार में लिखा हुआ

383
00:26:28,640 --> 00:26:32,720
है कि आपने अगर अपने मुंह से किसी को बहन बेटी या मां बोल

384
00:26:32,720 --> 00:26:36,720
दिया फिर भी आप उसके साथ विवाह कर सकते हो। यह सब आपके मुंह की बातें हैं।

385
00:26:36,720 --> 00:26:40,720
तो कहने का अर्थ यहां पे यह आ जाता है यहां पे तो मुंह की बात को बदला जा

386
00:26:40,720 --> 00:26:44,720
रहा है और यहां सिखाया जा रहा है कि रकुल रही सदा चली आई प्राण जाई पर वचन रजाई

387
00:26:44,720 --> 00:26:48,960
हमने अभी शुरू में देखा था कि धर्म वो है ये करना है ये नहीं करना है ये नहीं करना

388
00:26:48,960 --> 00:26:52,960
ठीक है तो हमारा धर्म कह रहा है कि आप जो है मुंह की बात से मुकररो मत

389
00:26:52,960 --> 00:26:57,120
अपने वचन के पक्के रहो जी वहां पे जो कुरान कह रही है कि आप अपने

390
00:26:57,120 --> 00:27:01,280
धर्म अपने वचन से मुकर जाओ तो या तो ये धर्म हो सकता है या फिर ये धर्म

391
00:27:01,280 --> 00:27:05,440
हो सकता है जी तो धर्म का

392
00:27:05,440 --> 00:27:09,600
तात्पर्य यही है कि कुछ भी हो जाए अपनी

393
00:27:09,600 --> 00:27:13,680
बातों से हमें फिरना नहीं है। चाहे उसके लिए हमें प्राण तो कुरान धर्म

394
00:27:13,680 --> 00:27:18,000
नहीं है। फिर धर्म वो भी है पर वर्तमान

395
00:27:18,000 --> 00:27:22,480
समय हम आत्मिक शक्ति कम होने के कारण मनोबल

396
00:27:22,480 --> 00:27:26,800
कम होने के कारण आज हम कहते कुछ हैं और करते

397
00:27:26,800 --> 00:27:30,800
कुछ हैं। तो हमारी जो धारणा है वो खत्म हो

398
00:27:30,800 --> 00:27:34,800
गई। नहीं उसमें यह लिखा है जो कि आप

399
00:27:34,800 --> 00:27:38,960
जो है अपनी मुंह की बातों से मुकर जाओ मुकर सकते हो तो इस ये

400
00:27:38,960 --> 00:27:43,360
धर्म माने कि ना माने इसको बात को ना मानना

401
00:27:43,360 --> 00:27:47,360
ये कुछ भी करना यह धर्म नहीं तो फिर

402
00:27:47,360 --> 00:27:51,760
कुरान धर्म नहीं है ना फिर इस्लाम इस्लाम धर्म है बट

403
00:27:51,760 --> 00:27:56,560
उनकी जो बातें हैं कि कुछ भी कहो इस्लाम क्या है देखिए

404
00:27:56,560 --> 00:28:01,280
ये एक उन्होंने आकर के ऊपर से जो आत्मा आई

405
00:28:01,280 --> 00:28:05,440
आ के जो संदेश दिया उन्होंने जो उनके मार्ग पर चली वो

406
00:28:05,440 --> 00:28:10,080
आत्मा उस धर्म की कहलाने लगी। ठीक है? वास्तव में कोई

407
00:28:10,080 --> 00:28:14,160
यहां पे हमारा जब हम आए ऊपर से तो कोई हमारा

408
00:28:14,160 --> 00:28:18,320
जाति नहीं थी ना कोई हमारा धर्म नहीं था। जब हम ऊपर में थे तो एक

409
00:28:18,320 --> 00:28:22,320
ही धर्म एक ही परमात्मा के संतान थे और हम सब एक

410
00:28:22,320 --> 00:28:26,560
पिता की संतान होने के नाते हम सब आपस में एक ही धर्म के

411
00:28:26,560 --> 00:28:30,800
थे। हम बट जब नीचे यहां आए तो नीचे की व्यवस्था के वजह

412
00:28:30,800 --> 00:28:34,960
से नीचे की व्यवस्था बनी रहे। उसके वजह से सब ने अपना-अपना

413
00:28:34,960 --> 00:28:38,960
धर्म यहां पे स्थापित किया। आपका कहने का मतलब है कुरान में मिलावट हो गई

414
00:28:38,960 --> 00:28:43,440
है। ये बात उसमें लिखी नहीं है।

415
00:28:43,440 --> 00:28:47,600
ये किसी भी धर्म में गलत संदेश नहीं दिया गया है। तो ठीक है। अब

416
00:28:47,600 --> 00:28:51,680
धर्म में गलत संदेश नहीं दिया गया। मगर अब पहले ये तो समझ लें कि धर्म फिर

417
00:28:51,680 --> 00:28:56,160
आपके अनुसार है क्या? वो आप नहीं बता रहे हैं। धर्म हमारे अनुसार

418
00:28:56,160 --> 00:29:00,480
जीवन की धारणा। तो जीवन की धारणा है कि चचेरी

419
00:29:00,480 --> 00:29:04,560
बहन से विवाह करना है कि नहीं करना है। हमारा धर्म है कि नहीं करना है? नहीं करना

420
00:29:04,560 --> 00:29:08,560
है। मगर वो लोग कर रहे हैं। यानी कि कर ना करना धर्म है।

421
00:29:08,560 --> 00:29:11,760
ना करना धर्म है ना? धर्म की उपयोगिता क्या है? फिर

422
00:29:11,760 --> 00:29:15,840
क्या मिलेगा धर्म से? धर्म में चलेंगे

423
00:29:15,840 --> 00:29:20,320
तो शक्ति है। धर्म में चलेंगे तो शांति है।

424
00:29:20,320 --> 00:29:24,560
धर्म में चलेंगे तो सुख है। धर्म में चलेंगे तो प्रेम

425
00:29:24,560 --> 00:29:28,960
से जीवन जिएंगे। धर्म में से चलेंगे तो

426
00:29:28,960 --> 00:29:33,200
सच्ची आनंद की अनुभूति होगी। यानी कुल मिला के धर्म

427
00:29:33,200 --> 00:29:37,440
से धर्म में से ही धर्म से सच्चिदानंद मिलेगा। जी है ना? जी।

428
00:29:37,440 --> 00:29:41,760
तो तो बात यह है क्या कुरान के द्वारा जो

429
00:29:41,760 --> 00:29:45,840
मिल रहा है वो सच्चिदानंद है वो तो नहीं है

430
00:29:45,840 --> 00:29:51,200
जी उसके अनुसार से तो फिर उसको धर्म क्यों कहा जा रहा है

431
00:29:51,200 --> 00:29:55,200
अब धर्म ऐसे ही बाइबल के अनुसार भी

432
00:29:55,200 --> 00:29:59,360
नहीं है फिर भी उसे धर्म कह रहे हैं धर्म हर एक है

433
00:29:59,360 --> 00:30:03,360
लेकिन उसमें जो बातें कह दी गई उसमें मिलावट कर दिया

434
00:30:03,360 --> 00:30:07,440
गया उसको हम धर्म नहीं कहेंगे तो धर्म आपको पता पता कैसे चला

435
00:30:07,440 --> 00:30:13,120
कि दुनिया में कोई इस्लाम नाम का धर्म है? कैसे पता चला? परमात्मा

436
00:30:13,120 --> 00:30:17,200
ने कहा कि जब इस सृष्टि में एक धर्म था तो

437
00:30:17,200 --> 00:30:21,600
शांति थी। फिर यहां पे जब दूसरा आया

438
00:30:21,600 --> 00:30:25,840
फिर तीसरा आया, चौथा आया, पांचवा आया। ऐसे आज

439
00:30:25,840 --> 00:30:27,120
वर्तमान समय

440
00:30:27,120 --> 00:30:31,680
इतने सारे धर्म पिताएं आए। आकर के अपने-अपने धर्म की स्थापना किए।

441
00:30:31,680 --> 00:30:35,760
हम तो यहां पे जितनी धर्म आत्माएं आई उतनी

442
00:30:35,760 --> 00:30:39,920
मत हुई। नहीं नहीं वो नहीं कह रहा। आपको पता कैसे चलता है कि दुनिया

443
00:30:39,920 --> 00:30:44,000
में कोई इस्लाम नाम का धर्म है। कहने का मतलब मेरा ये है कि यदि

444
00:30:44,000 --> 00:30:48,320
हम कुरान को हटा देंगे या कुरान आपको देने वालों को हटा देंगे

445
00:30:48,320 --> 00:30:52,560
तो इस्लाम का अस्तित्व ही नहीं रह जाएगा आपके समक्ष। कैसे सिद्ध करूं? जब

446
00:30:52,560 --> 00:30:56,640
वह कुरान है, कुरान को मानने वाले लोग हैं, मुसलमान हैं। वह आपको

447
00:30:56,640 --> 00:31:00,640
लाकर के छाप के कुरान देते हैं। तब आप कहते हो कि दुनिया में कोई कुरान को

448
00:31:00,640 --> 00:31:04,800
मानने वाला इस्लाम धर्म है। जी। अब जब आप कह रहे हो कुरान जो है वो

449
00:31:04,800 --> 00:31:08,880
है अन ऑथेंटिक। है ना? ऑथेंटिक नहीं है। वो प्रामाणिक नहीं है।

450
00:31:08,880 --> 00:31:12,880
वो उसमें मिलावट हो गई। अब जब वो मिलावट एक लाइन की कर सकता है तो हो सकता है पूरी की

451
00:31:12,880 --> 00:31:16,960
पूरी कुरान ही मिलावट हो। जब एक लाइन की मिला जो झूठ बोल सकता है वो

452
00:31:16,960 --> 00:31:20,960
तो कुछ भी बोल सकता है। फिर हम उस पे बिलीव नहीं कर सकते। तो फिर हम या

453
00:31:20,960 --> 00:31:25,600
तो उसको मानेंगे तो पूरा मानेंगे और नहीं मानेंगे तो फिर नहीं मानेंगे।

454
00:31:25,600 --> 00:31:29,600
ये बात है।

455
00:31:29,600 --> 00:31:33,920
ये तो बड़ा खत्म हो सकता है। नहीं बंद

456
00:31:33,920 --> 00:31:37,920
करके जी अगर ये हमारे पास जा ही रहे हैं तो

457
00:31:37,920 --> 00:31:41,920
एक हम डिबेट डिबेट बोला है। अच्छा नहीं इसको छोड़ देते हैं

458
00:31:41,920 --> 00:31:46,000
ना टॉपिक दूसरा ले लेते हैं। दूसरा टॉपिक ले लेते हैं। वो कट

459
00:31:46,000 --> 00:31:50,160
जाता है। अच्छा है ना? अच्छा यहां हम ये कह सकते

460
00:31:50,160 --> 00:31:54,480
हैं आप ये लगा लीजिए नहीं कोई बात नहीं उसमें नहीं जी तात्पर्य

461
00:31:54,480 --> 00:31:58,560
ये है यहां पे कि हम हम सब कौन है कहने का मतलब है अपमान

462
00:31:58,560 --> 00:32:02,800
नहीं करना है किसी का इसलिए मैं समझ रहा हूं नहीं धर्म नहीं

463
00:32:02,800 --> 00:32:06,880
किसी किसी समुदाय का अपमान ना हो धर्म तो कह ही नहीं सकते ना वो मैं

464
00:32:06,880 --> 00:32:10,880
आपसे जानना चाह रहा था मैं समझ रहा था ठीक है चलिए अच्छा एक चीज अब

465
00:32:10,880 --> 00:32:14,880
इसमें ये आती है कि कुल मिलाकर के चलिए वो तो छोड़ दीजिए इस्लाम है कि नहीं

466
00:32:14,880 --> 00:32:19,120
अब ब्रह्मा कुमारी तो धर्म ही बता रही है ना तो बात ये आता

467
00:32:19,120 --> 00:32:23,280
है कि ब्रह्मा कुमारी का जो ईश्वर है वो सर्वशक्तिमान

468
00:32:23,280 --> 00:32:28,480
तो सिद्ध नहीं हो रहा और अगर वो सिद्ध नहीं हो रहा सर्वशक्तिमान तो फिर

469
00:32:28,480 --> 00:32:32,560
वो जो नास्तिकता को खंडन करने वाला ईश्वर नहीं है फिर वो क्योंकि वो कहीं ना कहीं

470
00:32:32,560 --> 00:32:36,560
कुछ नहीं कर रहा है तो या तो वो सर्वशक्ति सर्वशक्तिमान नहीं है और

471
00:32:36,560 --> 00:32:41,280
या फिर जो है वो ईश्वर नहीं है। परमात्मा सर्वशक्तिमान

472
00:32:41,280 --> 00:32:44,640
है हम इसलिए है क्योंकि परमात्मा

473
00:32:44,640 --> 00:32:49,360
सर्वशक्तिमान है। इसका मतलब ये नहीं कि वो छोटे से छोटा काम करे।

474
00:32:49,360 --> 00:32:53,920
पत्ता चाहे तो पत्ता हिलाए, चाहे तो पत्ता ना हिलाए, चाहे तो

475
00:32:53,920 --> 00:32:58,000
अ कुछ भी मरे हुए के जिंदा करे, चाहे तो जिंदा

476
00:32:58,000 --> 00:33:02,640
को मार दे। इसका मतलब ये नहीं कि मतलब परमात्मा सर्वशक्तिमान

477
00:33:02,640 --> 00:33:06,640
है तो वो अपने आप को प्रमाणित करने के लिए कुछ भी करें। नियम के विरुद्ध

478
00:33:06,640 --> 00:33:11,120
कोई भी कार्य परमात्मा नहीं कर सकता। मतलब परमात्मा भी नियम के

479
00:33:11,120 --> 00:33:15,200
नियम के बंधन में बंधे हुए हैं। परमात्मा के ऊपर

480
00:33:15,200 --> 00:33:19,680
भी एक समय के या

481
00:33:19,680 --> 00:33:24,320
कहे नियम का बंधन है। उसके ऊपर बंधन है तो वो तो बाधित हो गया।

482
00:33:24,320 --> 00:33:28,320
बाधित हो गया। हम लोग मुक्त होने के लिए प्रयत्न कर रहे हैं और हमारा ईश्वर स्वयं बाधित

483
00:33:28,320 --> 00:33:32,320
है। हम मुक्त होने के लिए प्रयत्न कर रहे हैं। हम किससे?

484
00:33:32,320 --> 00:33:36,320
जीवन और मरण के चक्र से मुक्त होना चाहते हैं। केवल और

485
00:33:36,320 --> 00:33:40,720
परमात्मा बाकी अनंत अनंत सुख नहीं चाहिए हमें। अनंत अबाध्य नहीं

486
00:33:40,720 --> 00:33:44,880
दुख चाहिए। और वो वो किसी को मिल ही नहीं सकती। परमात्मा

487
00:33:44,880 --> 00:33:48,880
कहते हैं कि बच्चे कि जब तुम इस सृष्टि पर आते हो तो

488
00:33:48,880 --> 00:33:52,880
तुम्हें इस सृष्टि में जन्म मरण के चक्र में

489
00:33:52,880 --> 00:33:57,040
आना ही है। और मैं एक हूं जो जन्म मरण के चक्र में नहीं

490
00:33:57,040 --> 00:33:59,760
आता हूं। मैं इसलिए नहीं आता हूं

491
00:33:59,760 --> 00:34:04,480
ताकि तुम्हें आ के मुक्ति और जीवन मुक्ति का मार्ग दिखा सकूं।

492
00:34:04,480 --> 00:34:08,480
शांति दे सकूं। सद्गति दे सकूं। इसलिए मैं नहीं आता हूं।

493
00:34:08,480 --> 00:34:12,480
चाहूं तो मैं आ सकता हूं। मेरे मेरे में उतनी क्षमता है कि मतलब

494
00:34:12,480 --> 00:34:16,480
वो जन्म ले सकते हैं। ले सकते हैं। बट वो कहते हैं कि मैं अगर जन्म

495
00:34:16,480 --> 00:34:20,640
लूंगा तो फिर मुझ में और तुझ में क्या अंतर है? मतलब ले सकते हैं।

496
00:34:20,640 --> 00:34:24,880
ले सकते हैं। अच्छा ठीक है। लेकिन अंतर अंतर सिद्ध हो

497
00:34:24,880 --> 00:34:29,040
इसके लिए परमात्मा जन्म नहीं लेते। लेते नहीं है मगर

498
00:34:29,040 --> 00:34:33,040
ले सकते हैं। ले सकते हैं। अच्छा ठीक है। तो ठीक है। अगर ले सकते हैं तो

499
00:34:33,040 --> 00:34:37,040
फिर तो ये वाली बात खत्म हो गई कि वो जन्म ले सकते हैं। जी ऐसा मानता है ना

500
00:34:37,040 --> 00:34:41,760
ब्रह्मा कुमारी के ये आप ऑफलाइन कह रहे हैं। जी

501
00:34:41,760 --> 00:34:45,920
ले सकते हैं। अच्छा ठीक है। तो एक बात उसने कही कि मैं लेता

502
00:34:45,920 --> 00:34:50,000
नहीं हूं। ठीक है? अब बार-बार एक बात आ रही है कि परमात्मा

503
00:34:50,000 --> 00:34:54,160
ने ऐसा कहा, परमात्मा ने ऐसा कहा। यह वाली बात बार-बार आ रही है।

504
00:34:54,160 --> 00:34:58,320
तो आपके लिए ये परम प्रमाण क्या है? वेद मानते

505
00:34:58,320 --> 00:35:02,480
हैं आप। वेदों को परम प्रमाण। जी। वेदों को मानते हैं परम

506
00:35:02,480 --> 00:35:05,200
प्रमाण?

507
00:35:05,200 --> 00:35:09,280
वेदों को भी मानते हैं। हम सभी शास्त्रों को भी मानते हैं।

508
00:35:09,280 --> 00:35:13,280
क्योंकि सभी शास्त्रों को और वेदों को हम

509
00:35:13,280 --> 00:35:17,680
वेदों का पुराणों का सार जो समझा रहे हैं परमात्मा निराकार

510
00:35:17,680 --> 00:35:21,680
हम वर्तमान समय आकर के

511
00:35:21,680 --> 00:35:25,840
गीता का सार जो अभी हम बच्चों को सुना रहे हैं। जिस गीता

512
00:35:25,840 --> 00:35:30,000
में लिखा हुआ है कि जब जब धर्म की हानि होती है तबतब मैं

513
00:35:30,000 --> 00:35:34,080
सृष्टि पर आकर के सत्य धर्म की स्थापना और असत्य

514
00:35:34,080 --> 00:35:38,160
का महाप तो दीदी ये लिखा है ना कि वो तो क्या

515
00:35:38,160 --> 00:35:42,560
कहते हैं वो सजाम में हम अपना सृजन करते हैं अपने रूप का

516
00:35:42,560 --> 00:35:46,720
मतलब वो किसी परकाया प्रवेश नहीं करते वो स्वयं आते हैं तो स्वयं आते

517
00:35:46,720 --> 00:35:50,880
हैं तो कैसे आते हैं शरीर धारण करते हैं अपना रूप बनाते हैं तो

518
00:35:50,880 --> 00:35:54,960
रूप बना के किसी और शरीर में नहीं आते यह कह

519
00:35:54,960 --> 00:36:00,320
रहे हैं

520
00:36:00,320 --> 00:36:04,720
रूप धारण करते हैं। का मतलब यह है कि परमात्मा

521
00:36:04,720 --> 00:36:09,600
मनुष्य रूप में ही आते हैं। तो दीदी इसमें ये बात आएगी कि

522
00:36:09,600 --> 00:36:13,680
जैसे भगवत गीता में सजाम में हम लिखा है। मैं अपना

523
00:36:13,680 --> 00:36:17,760
सृजन करता हूं। या तो उसकी संस्कृत हो परकाया प्रवेश

524
00:36:17,760 --> 00:36:21,760
की वो तो है नहीं। सजाम में हम लिखा है। अच्छा दूसरी बात ये

525
00:36:21,760 --> 00:36:25,760
आती है कि आप वेद और पुराणों को एज इट इज मानते हैं कि थोड़ा

526
00:36:25,760 --> 00:36:29,760
बहुत ऐसा समझते हैं कि कहीं पे कुछ नहीं मानना है, कहीं पे कुछ मानना है। इस

527
00:36:29,760 --> 00:36:34,000
तरह से नहीं ऐसा नहीं है। सभी में बातें लिखी हुई है।

528
00:36:34,000 --> 00:36:38,000
जो बातें लिखी हुई है उसको हम भी मानते हैं। स्वीकार। भागवत पुराण

529
00:36:38,000 --> 00:36:42,240
में कई जगह लिखा हुआ है कि भगवान आए, जन्म लिया, भगवान ने लीला की।

530
00:36:42,240 --> 00:36:46,320
बहुत सारे पुराणों में लिखा है। कई बातें वेद में भी लिखा

531
00:36:46,320 --> 00:36:50,400
है। कई बातें हैं। जो जन्म

532
00:36:50,400 --> 00:36:54,560
लिया इस बात को हम नहीं मानते क्योंकि परमात्मा जन्म यानी शास्त्रों को पूरा

533
00:36:54,560 --> 00:36:58,800
पूरा नहीं मानते। शास्त्रों में यह भी बातें लिखी हुई है कि परमात्मा

534
00:36:58,800 --> 00:37:03,040
जन्म मरण के चक्र से परे हैं। वो इसलिए लिखी है कि जैसे हमारे दो रूप हैं।

535
00:37:03,040 --> 00:37:07,120
एक है ये भौतिक संसार का रूप तो हमने जन्म लिया हम कब जन्मे कब मरे

536
00:37:07,120 --> 00:37:11,440
ये सब है। मगर एक हमारा वो परमार्थिक रूप है आत्मा का।

537
00:37:11,440 --> 00:37:15,520
जैसे आत्मा के लिए लिखा है नैन छिंदती शस्त्राण नैन दहति पावका

538
00:37:15,520 --> 00:37:19,760
ना चैनम क्ले न शोषति मारता आत्मा का आत्मा को

539
00:37:19,760 --> 00:37:23,840
काट नहीं सकता कुछ नहीं हो सकता है तो एक हमारा ये पारमार्थिक रूप है तो

540
00:37:23,840 --> 00:37:28,000
पारमार्थिक रूप भगवान की विवेचना की गई तो वो जन्म और मरण से बाहर है हमारा

541
00:37:28,000 --> 00:37:32,240
भी बाहर है और एक हो गया भौतिक रूप के लीला रूपी संसार

542
00:37:32,240 --> 00:37:36,240
में हमने देह धारण की बाधित के रूप में और ईश्वर ने अवतार

543
00:37:36,240 --> 00:37:40,400
लिया अब के रूप में तो आप हमारा तो मान रही हैं मगर ईश्वर

544
00:37:40,400 --> 00:37:44,400
का नहीं मान खैर यह मैं कह रहा था

545
00:37:44,400 --> 00:37:48,480
कि जो आप शास्त्रों की व्याख्या करते हैं वेद और पुराण और

546
00:37:48,480 --> 00:37:52,560
गीता की तो ये आपको वेद पुराण गीता कैसे

547
00:37:52,560 --> 00:37:55,120
प्राप्त हुई?

548
00:37:55,120 --> 00:37:59,520
ये मैंने तो कभी वेद पुराण गीता मैंने पढ़ा नहीं सुना नहीं।

549
00:37:59,520 --> 00:38:03,600
मैं जब छोटी थी तभी से परमात्मा का मुझे परिचय मिला। ब्रह्माकुमारी

550
00:38:03,600 --> 00:38:07,840
संस्था का परिचय मिला। अच्छा और इसी के माध्यम से ही मुझे

551
00:38:07,840 --> 00:38:11,840
जो परमात्मा के महावाक्यश्वरी महावाक्य जो सुनाए जाते

552
00:38:11,840 --> 00:38:15,840
हैं उसमें जो महावाक्यों के द्वारा ज्ञान मुरली

553
00:38:15,840 --> 00:38:20,320
के द्वारा जो मुझे परमात्मा के द्वारा जितना भी शास्त्रों का भी ज्ञान

554
00:38:20,320 --> 00:38:24,640
इसमें थोड़ा बहुत मिला और वेदों का भी थोड़ा बहुत गीता

555
00:38:24,640 --> 00:38:28,880
का भी थोड़ा बहुत तो सभी का सार जो यहां पर परमात्मा हम

556
00:38:28,880 --> 00:38:30,720
हमको यहां सुनाते हैं। उन्हीं

557
00:38:30,720 --> 00:38:34,960
के माध्यम से मैंने जो भी शास्त्रों को सुना तो मैं शास्त्रों को कोई इग्नोर

558
00:38:34,960 --> 00:38:39,280
भी नहीं करती। वेद पुराण को इग्नोर भी नहीं करती। बात यह है ना जैसे

559
00:38:39,280 --> 00:38:43,440
मानती भी हूं। जैसे वेद की लिखी हुई कोई किसी बात को यदि हम

560
00:38:43,440 --> 00:38:47,520
जी इस आधार पे काट दें कि ये क्या कह रहा है? इन्होंने अगर

561
00:38:47,520 --> 00:38:51,760
नहीं माना है तो फिर नहीं मानना है। अगर हम इस आधार पे इसको काट रहे हैं तो हमारा परम प्रमाण

562
00:38:51,760 --> 00:38:55,760
ये है। हम मानते इसे हैं। जैसे मान लीजिए कि आईएस आईएस का कोई

563
00:38:55,760 --> 00:38:59,760
आतंकवादी है। ठीक है? वो हमसे कहे वो है आतंकवादी

564
00:38:59,760 --> 00:39:03,840
अपराधी है। वो हमसे कहे कि पानी पिला दो यह पुण्य होता है।

565
00:39:03,840 --> 00:39:07,840
ठीक है? तो हमने आईएस आईएस को क्यों माना? क्योंकि हमें मालूम था कि

566
00:39:07,840 --> 00:39:12,000
पानी पिलाना पुण्य है। तो आईएस आईएस की बात आईएस आईएस के आतंकवादी

567
00:39:12,000 --> 00:39:16,000
की बात हमने मान ली। मगर हम उसको मानते नहीं हैं। हमने माना किस बात को?

568
00:39:16,000 --> 00:39:20,160
जिसको हम पहले से ही मानते हैं। आईएसआईएस एक माध्यम हो सकता है कि उस समय हमारे

569
00:39:20,160 --> 00:39:24,320
अंदर वो चीज याद दिला दी। उसने ये कर दिया। मगर हम उसको मानते नहीं। वो हमारी नजरों

570
00:39:24,320 --> 00:39:28,400
में क्या है? एक आतंकवादी, एक अपराधी हम उसकी बात उसकी भी कुछ

571
00:39:28,400 --> 00:39:32,400
बातें अच्छी हो सकती है जो इसे हम फॉलो कर ले मगर हम इसलिए फॉलो करेंगे

572
00:39:32,400 --> 00:39:36,480
क्योंकि हमारे पास कोई और चश्मा है यह देखने का कि क्या सही है और

573
00:39:36,480 --> 00:39:40,480
क्या गलत है तो यदि हम वेद को सही और गलत के लिए चश्मे के रूप में

574
00:39:40,480 --> 00:39:44,480
ले रहे हैं तब तो यह होता है कि हम उसे मानते हैं अगर हम यह सोच रहे हैं

575
00:39:44,480 --> 00:39:45,760
कि किसी और की कही हुई

576
00:39:45,760 --> 00:39:49,760
बातों के आधार पर वेद का इतना मानना है इतना नहीं मानना है या पुराण का इतना मानना है

577
00:39:49,760 --> 00:39:53,840
इतना नहीं मानना है या गीता का इतना मानना है इतना नहीं मानना

578
00:39:53,840 --> 00:39:57,840
है तो इसका मतलब हम गीता को नहीं मान रहे उसको मान रहे जिसके आधार पर हम

579
00:39:57,840 --> 00:40:01,840
गीता का आधा अधूरा ले रहे हैं। तो एक तो यह वाली बात हो

580
00:40:01,840 --> 00:40:06,000
गई। दूसरी यह बात है कि फिर जब आपका परम प्रमाण मुरली

581
00:40:06,000 --> 00:40:10,320
है। जी है ना? तो एक तरफ हम कहते हैं कि हमारा जो ज्ञान

582
00:40:10,320 --> 00:40:14,320
है वो सनातन ज्ञान है। जी सनातन और मुरली हमको

583
00:40:14,320 --> 00:40:18,320
आ रही है। आज भी आई होगी। जी कल भी आएगी। यानी वह

584
00:40:18,320 --> 00:40:22,320
किसी देश काल परिस्थिति में मिलने वाला ज्ञान है। जी और हम यह कह रहे हैं कि

585
00:40:22,320 --> 00:40:26,560
हमारा जो ज्ञान है वो सनातन है। जी तो इसका प्रमाण कैसे

586
00:40:26,560 --> 00:40:30,960
माना जाएगा? फिर मतलब आपसे कोई सुपर

587
00:40:30,960 --> 00:40:34,960
नेचुरल पावर ये कह रही है कि मैं तुमको ज्ञान दे रही

588
00:40:34,960 --> 00:40:39,040
हूं। हम कह रहे हैं यही सनातन ज्ञान है। जबकि वो आज मिल रहा है।

589
00:40:39,040 --> 00:40:43,280
आज हमको आज से पहले वो अस्तित्व में नहीं था वो ज्ञान। है ना?

590
00:40:43,280 --> 00:40:47,440
और जो अस्तित्व में था सदा से था। वेद इत्यादि वह

591
00:40:47,440 --> 00:40:51,600
हम नहीं मान रहे हैं। हम उसके आधार पर उसकी बातों को कट कर रहे हैं।

592
00:40:51,600 --> 00:40:55,840
जैसे कि पुराण की कई बात आपने कहा कि यह वाली बात हम नहीं मानते हैं। वह वाली बात मानते हैं।

593
00:40:55,840 --> 00:40:59,840
जी तो ये एक सिचुएशन फंस जाती है। जी तो ये ऐसा

594
00:40:59,840 --> 00:41:01,600
है जी कि

595
00:41:01,600 --> 00:41:05,760
परमात्मा शिव का कहना है

596
00:41:05,760 --> 00:41:09,760
कि ये जो वेद पुराण है ये भी कोई आदिकाल से चला नहीं

597
00:41:09,760 --> 00:41:14,160
आ रहा है। यह द्वापर युग से जो भी आत्माएं

598
00:41:14,160 --> 00:41:18,240
आई, महान पुरुष आए, जिन्होंने वेदों की रचना की, वह

599
00:41:18,240 --> 00:41:22,640
भी कोई एक मनुष्य आत्मा ही है। और अभी वर्तमान

600
00:41:22,640 --> 00:41:26,800
में जो हम ज्ञान मुरली सुनते हैं, ये स्वयं परमात्मा

601
00:41:26,800 --> 00:41:30,880
निराकार जो अभी वर्तमान में प्रजापिता ब्रह्मा के माध्यम

602
00:41:30,880 --> 00:41:35,440
से जो हमको ज्ञान दे रहे हैं। यह

603
00:41:35,440 --> 00:41:39,760
हमको कहते हैं कि बच्चे कि जब कोई भी आत्मा

604
00:41:39,760 --> 00:41:45,120
आती है सृष्टि पर हम तो वो अपने आत्मिक बल से

605
00:41:45,120 --> 00:41:49,280
जितना उनके पास पावर होती है उतना वो ज्ञान देती

606
00:41:49,280 --> 00:41:53,680
है। जिस प्रकार एक झाड़ है हम तो जैसा

607
00:41:53,680 --> 00:41:57,760
झाड़ होता है तो झाड़ में जो बीज होता है तो बीज को जितनी

608
00:41:57,760 --> 00:42:02,080
नॉलेज होगी उतनी टाल टालियां शाखा या पत्ते को नॉलेज

609
00:42:02,080 --> 00:42:06,400
वो तो मैं समझ गया मगर जब कोई ज्ञान उसी प्रकार मैं परमात्मा

610
00:42:06,400 --> 00:42:10,640
सृष्टि का बीज रूप हूं तो मुझ में जो ज्ञान है वो वर्तमान

611
00:42:10,640 --> 00:42:14,640
समय आकर के मैं सृष्टि के आदि मध्य अंत का ज्ञान तुम बच्चों

612
00:42:14,640 --> 00:42:17,040
को देता हूं और

613
00:42:17,040 --> 00:42:21,040
जो वेद शास्त्र जिन्होंने भी सुनाए हैं। जिन्होंने भी बताए

614
00:42:21,040 --> 00:42:25,040
हैं, बनाए हैं, वह वास्तव में द्वापर युग से

615
00:42:25,040 --> 00:42:29,120
बने हैं। कोई सतयुग और त्रेता युग से चला नहीं। तो इसका अर्थ फिर यह हुआ कि

616
00:42:29,120 --> 00:42:33,120
पहली बात तो हम लोग सनातनी नहीं है। ब्रह्माकुमारीज वाले क्योंकि सनातन तो

617
00:42:33,120 --> 00:42:37,200
वही है सनातनी हिंदू जिसको सनातन वैदिक आर्य हिंदू। वो तो उसी को

618
00:42:37,200 --> 00:42:41,520
कहा जाता है जो वेदों में प्रमाण ने बुद्धि रखे। वेद, उपनिषद, पुराण

619
00:42:41,520 --> 00:42:45,600
और स्मृति ग्रंथ। और हम लोग कह रहे हैं कि हम जो है उनको अंतिम प्रमाण नहीं मानते।

620
00:42:45,600 --> 00:42:49,760
कोई और हमारे लिए अंतिम प्रमाण है। दूसरी बात यह है

621
00:42:49,760 --> 00:42:53,920
कि यह तो हो गया कि हम इनको नहीं मानते और

622
00:42:53,920 --> 00:42:57,920
हमको कोई सुपर नेचुरल पावर है। वो आके बताती है कि यह करना

623
00:42:57,920 --> 00:43:02,000
है। यह नहीं करना है। यह अच्छा है ये बुरा है। मगर इसमें अब ये एक लास्ट

624
00:43:02,000 --> 00:43:06,000
बात आती है। इसके बाद और पूरा करेंगे कि इस

625
00:43:06,000 --> 00:43:10,080
संसार में क्या ईश्वर की मर्जी के

626
00:43:10,080 --> 00:43:16,080
बिना बुराई पनप सकती है?

627
00:43:17,360 --> 00:43:20,560
देखिए

628
00:43:20,560 --> 00:43:24,640
ईश्वर कोई बुराई को

629
00:43:24,640 --> 00:43:28,720
बुराइयों को प्रेरित नहीं करते बुराई करने प्रेरित नहीं उसकी मर्जी के

630
00:43:28,720 --> 00:43:32,880
बिना उसकी मर्जी के बिना कहने से यह समय का

631
00:43:32,880 --> 00:43:37,600
चक्र जो है चलता है सत्य मतलब उसका इस पर भी अधिकार नहीं है उसमें

632
00:43:37,600 --> 00:43:41,760
उसका किसी के ऊपर अधिकार नहीं वो हर आत्मा

633
00:43:41,760 --> 00:43:46,160
को स्वतंत्रता प्रदान कि जो जैसा कर्म करेगा

634
00:43:46,160 --> 00:43:50,320
उसके अनुसार से वह फल की नहीं ईश्वर उसको करने से रोक

635
00:43:50,320 --> 00:43:54,720
सकता है कि नहीं यह पावर है कि नहीं उसके पास वो रोक सकता है बट वो रोकता

636
00:43:54,720 --> 00:43:59,120
नहीं क्यों नहीं रोकता यानी यानी वो रोक सकता है रोक सकता है ठीक है

637
00:43:59,120 --> 00:44:03,200
तो इसका मतलब जो बुराई अगर अस्तित्व में आ रही है तो उसमें ईश्वर की

638
00:44:03,200 --> 00:44:07,360
सहमति प्राप्त है। जी सहमति है ना?

639
00:44:07,360 --> 00:44:11,360
बुराई आ रही है इसलिए ईश्वर की सहमति नहीं है। देखो कोई भी

640
00:44:11,360 --> 00:44:16,080
माता-पिता जैसे मैं कहीं पे खड़ा हूं। फॉर एग्जांपल कोई भी माता-पिता

641
00:44:16,080 --> 00:44:20,080
जी अपने बच्चों को जी बुरा करने की सहमति नहीं दे

642
00:44:20,080 --> 00:44:24,720
सकता। नहीं दे सकता। उसी प्रकार परमात्मा हमारे माता-पिता

643
00:44:24,720 --> 00:44:28,800
हैं। जी वो हमें कोई भी बुरा कार्य करने की सहमति

644
00:44:28,800 --> 00:44:32,560
या बुराइयों पे चलने के लिए प्रेरित नहीं कर सकते। मगर

645
00:44:32,560 --> 00:44:36,560
माता-पिता अपने सामने बच्चे को गलत करने भी तो नहीं दे सकता। नहीं

646
00:44:36,560 --> 00:44:40,880
दे सकता। तो वो तो हो रहा है। स्वभाव संस्कार

647
00:44:40,880 --> 00:44:44,880
है देखिए जब तक उनकी उपस्थिति है

648
00:44:44,880 --> 00:44:48,880
तब तक बच्चा गलत नहीं करता लेकिन पीछे से भी तो वो करता है।

649
00:44:48,880 --> 00:44:53,040
यानी कि ऐसी कोई जगह है जहां भगवान नहीं देख पा रहे हैं। भगवान देख

650
00:44:53,040 --> 00:44:57,200
रहे हैं। पर भगवान कहते हैं कि बच्चे मैं

651
00:44:57,200 --> 00:45:01,280
देख करके भी हम किसी के हाथ नहीं पकड़ सकता।

652
00:45:01,280 --> 00:45:05,600
यानी कि यहां भी को रोक नहीं। तो यहां भी ईश्वर बाधित है।

653
00:45:05,600 --> 00:45:09,680
देखिए ईश्वर बाधित है। कहने का मतलब यह नहीं है कि

654
00:45:09,680 --> 00:45:13,840
वो एक-एक को जा करके उंगली पकड़ के रोके। ईश्वर तो अपनी

655
00:45:13,840 --> 00:45:17,840
शब्द शक्ति से रोक सकता है। केवल वो स्मरण सर्वशक्तिमान है। इसका

656
00:45:17,840 --> 00:45:21,920
मतलब यह नहीं कि उसका वही कार्य है कि कोई गलत कर रहा है उसको रोके। कोई अच्छा कर

657
00:45:21,920 --> 00:45:26,320
रहा है तो उसमें खुशी मनाए। रोक सकता। नहीं नहीं बात कहने का मतलब

658
00:45:26,320 --> 00:45:30,400
हम कहने का एक भाव कह रहे हैं कि जैसे आपने कहा कि वह बाधित

659
00:45:30,400 --> 00:45:34,880
है तो बाधित होने का मतलब भगवान भगवान

660
00:45:34,880 --> 00:45:38,960
ऑलमाइटी अथॉरिटी सबसे ऊंची शक्ति है वो तो वो

661
00:45:38,960 --> 00:45:43,120
इतनी छोटी-छोटी कार्य जैसे मान ली जाए फॉर एग्जांपल

662
00:45:43,120 --> 00:45:47,360
मेरे यहां पे राष्ट्रपति आया हम प्रधानमंत्री

663
00:45:47,360 --> 00:45:47,860
आया

664
00:45:47,760 --> 00:45:52,080
हम फॉर एग्जांपल मैं कहूं छोटी सी काम है एक हम

665
00:45:52,080 --> 00:45:56,320
मेरे घर की नल खराब हम उसको आप सुधार दीजिए।

666
00:45:56,320 --> 00:46:00,400
हम क्या मेरे को यह कहना अच्छा लगता

667
00:46:00,400 --> 00:46:04,400
है? नहीं नहीं अच्छा लगता ना। क्यों? क्योंकि वो इतना

668
00:46:04,400 --> 00:46:08,720
बड़ा व्यक्ति मैं तो उससे बड़ा से बड़ा कार्य करा सकती हूं ना। बिल्कुल। तो

669
00:46:08,720 --> 00:46:13,040
भगवान इतनी ऊंची शक्ति सर्वशक्तिवान बात है। तो

670
00:46:13,040 --> 00:46:17,120
उसको हम कहें कि इतनी छोटी-छोटी काम तो क्या उनसे

671
00:46:17,120 --> 00:46:21,200
हम ऐसी अपेक्षा रखें कि हम कुछ भी करते रहे। हम कहे कि

672
00:46:21,200 --> 00:46:25,200
भगवान जो नहीं नहीं अपेक्षा नहीं कह रहा हूं। मैं यह कह

673
00:46:25,200 --> 00:46:29,200
रहा हूं। जैसे आज हमने देखा न्यूज़ पेपर में आया सामूहिक बलात्कार हो

674
00:46:29,200 --> 00:46:33,680
गया किसी बिटिया के साथ। ठीक है? तो क्या ये इंपॉर्टेंट

675
00:46:33,680 --> 00:46:37,680
एक जरूरी नहीं है कि उसको रोक दिया जाता। भगवान वहां रोक देते

676
00:46:37,680 --> 00:46:41,680
उसे। अगर हम कहेंगे कि भगवान की मर्जी के बिना होता है तो भगवान की

677
00:46:41,680 --> 00:46:46,240
फिर सर्वशक्तिमत्ता घटेगी। तो हमें मानना पड़ेगा ना कि भगवान

678
00:46:46,240 --> 00:46:50,240
सब कुछ करने वाले होते हुए भी वो अकर्ता है। जैसे भगवत

679
00:46:50,240 --> 00:46:54,240
गीता में उन्होंने कहा कि तू मुझको सब कुछ करने वाला होते हुए भी अकर्ता जान।

680
00:46:54,240 --> 00:46:58,320
क्यों? इसलिए कि तुझे नहीं पता है कि ये सब नाटक है। मुझे पता

681
00:46:58,320 --> 00:47:02,480
है कि नाटक है। ये बलात्कार बलात्कार कुछ हो ही नहीं रहा है। तो फिर मुझे फर्क नहीं पड़ता

682
00:47:02,480 --> 00:47:02,980
फिर उन

683
00:47:02,880 --> 00:47:07,120
चीजों से। हमें दोष क्यों लगता है? क्योंकि हमारे लिए नाटक नहीं है। उसके

684
00:47:07,120 --> 00:47:11,280
लिए नाटक है। जिस दिन हम लोग मुक्त हो जाएंगे हमारे लिए नाटक नहीं होगा। जी तो भगवान

685
00:47:11,280 --> 00:47:15,600
को भगवान इसलिए नहीं रोकता है कोई भी अच्छा है बुरे में हस्तक्षेप

686
00:47:15,600 --> 00:47:19,680
इसलिए नहीं करता है क्योंकि उसको मालूम है जैसे हमारे हमारे घर में छोटे बच्चे होते

687
00:47:19,680 --> 00:47:23,760
हैं वो खामखा की चीज के लिए रोते नहीं जिद करते हैं मम्मी मुझे वही चाहिए

688
00:47:23,760 --> 00:47:27,920
पास में आता है अरे मम्मी ये तो बेकार है जी ये तो व्यर्थ की चीज थी मैं रो रहा था तो मम्मी

689
00:47:27,920 --> 00:47:31,920
को पता है वो व्यर्थ की चीज है बच्चे को पता है कि वो बहुत इंपॉर्टेंट है जी

690
00:47:31,920 --> 00:47:36,720
तो मम्मी रुक रही है आराम से वो नहीं जा रही है वो पिता वो है परमात्मा

691
00:47:36,720 --> 00:47:40,880
ठीक है तो ये तो ये हो गया कि वो क्यों नहीं रोकता क्यों हस्तक्षेप नहीं करता मगर हमारे

692
00:47:40,880 --> 00:47:44,960
अकॉर्डिंगली दुनिया में जो बुरा हो रहा है वो हकीकत लग रहा है हमें नहीं

693
00:47:44,960 --> 00:47:49,040
नहीं वो हमें हकीकत लग रहा है हम उस चीज में जी रहे

694
00:47:49,040 --> 00:47:53,120
हैं और परमात्मा को लग रहा है कि एक नाटक है

695
00:47:53,120 --> 00:47:57,200
परमात्मा को लग नहीं रहा उसको मालूम है उसको मालूम है और उसको ये

696
00:47:57,200 --> 00:48:01,360
पता है कि ये थोड़े समय के लिए है फिर उसके बाद हमारा जो ओरिजिनल

697
00:48:01,360 --> 00:48:05,440
अस्तित्व कुछ और है हां कि उसको मालूम है तू नैन चिंदती शस्त्राण नैनम दति

698
00:48:05,440 --> 00:48:09,520
पाव कहा है तू जो है आत्मा है तुझे कुछ हो ही नहीं सकता तू कहां कहां घबरा रहा

699
00:48:09,520 --> 00:48:13,600
उसको मालूम है। खैर तो इसमें बात यह थी इसका मतलब ईश्वर की नजरों

700
00:48:13,600 --> 00:48:17,840
में कुछ भी अच्छा बुरा होता ही नहीं है क्योंकि उसको मालूम है ये सब प्रपंच है। ठीक है?

701
00:48:17,840 --> 00:48:18,340
मगर

702
00:48:18,240 --> 00:48:22,240
हमारी नजरों के अनुसार जो बुरा है हमारी नजरों के

703
00:48:22,240 --> 00:48:26,400
अनुसार जो अच्छा है तो हमारी नजरों के अनुसार जैसे अच्छे पे भगवान

704
00:48:26,400 --> 00:48:30,480
का कंट्रोल है वैसे ही हमारे नजरों के अनुसार बुरे पे भी भगवान

705
00:48:30,480 --> 00:48:34,720
का कंट्रोल है। जी है ना? अब बात यह आती है इसमें

706
00:48:34,720 --> 00:48:38,720
कि यदि भगवान का बुराई पे कंट्रोल है और उसके बावजूद

707
00:48:38,720 --> 00:48:42,800
भी बुराई हमारे अकॉर्डिंगली भगवान के अकॉर्डिंगली बुराई है ही नहीं मगर

708
00:48:42,800 --> 00:48:46,800
हमारे अकॉर्डिंगली जो बुराई है उस पर भगवान का यदि कंट्रोल है

709
00:48:46,800 --> 00:48:50,800
तो यदि बुराई फिर भी अस्तित्व में है तो इसका मतलब हमें ये

710
00:48:50,800 --> 00:48:55,200
मानना पड़ेगा कि जैसे सब चीजों का मूल आधार

711
00:48:55,200 --> 00:48:59,520
भगवान है जैसे आपने कहा कि पंखा घूम रहा है तो इसके पीछे शक्ति है।

712
00:48:59,520 --> 00:49:03,760
ठीक है? जैसे हमने कहा कि पेड़ हिल रहा है तो उसके पीछे शक्ति है। तो इसका मतलब हमें

713
00:49:03,760 --> 00:49:08,000
मानना पड़ेगा कि अगर दुनिया में बुराई भी हो रही है तो उसके पीछे

714
00:49:08,000 --> 00:49:12,000
भी शक्ति है। अंत समय में जाके वहां रुकना

715
00:49:12,000 --> 00:49:16,160
पड़ेगा एक शक्ति के आधार पे। इसका मतलब हमें मानना पड़ेगा कि भगवान

716
00:49:16,160 --> 00:49:20,160
सबका मूल है। बुराई भी उसके ही कारण है। तो फिर बात ये आ जाती है

717
00:49:20,160 --> 00:49:26,160
क्या भगवान आपसे झूठ बोल सकता है?

718
00:49:26,800 --> 00:49:30,960
भगवान सत्य है। वो

719
00:49:30,960 --> 00:49:34,960
झूठ नहीं बोलता। बोल सकता है कि नहीं? बोल

720
00:49:34,960 --> 00:49:39,120
सकता है बट वो झूठ नहीं बोलता। नहीं नहीं बोल सकता है तो फिर वो

721
00:49:39,120 --> 00:49:44,080
ये वाली बात भी झूठ बोल दे बोल देगा कि ना कि मैं झूठ नहीं बोल बोलता।

722
00:49:44,080 --> 00:49:48,160
देखिए वो सर्वशक्तिमान है तो सब कुछ कर सकता है।

723
00:49:48,160 --> 00:49:52,240
जिस प्रकार हमने कहा कि वो सर्वशक्तिवान है तो सब कुछ कर सकता है। लेकिन

724
00:49:52,240 --> 00:49:56,720
वो बाधित है। वो भी समय के चक्र में बंधा हुआ है।

725
00:49:56,720 --> 00:50:00,800
मतलब वो झूठ वो झूठ नहीं बोल सकता। वो समस्त बुराइयों का कारण जरूर है पर वो

726
00:50:00,800 --> 00:50:04,960
स्वयं झूठ नहीं बोलता नहीं झूठ बोल ही सकते तो

727
00:50:04,960 --> 00:50:09,200
यहां भी बाधित हो गया अभी जैसे जन्म में तो जन्म ले लिया उसने मगर

728
00:50:09,200 --> 00:50:13,760
अगर वो झूठ बोलता तो फिर उसकी महिमा में ये नहीं गाते ना सत्यम शिवम सुंदरम

729
00:50:13,760 --> 00:50:17,920
सत्यम क्यों परम सत्य है जी परम सत्य तो इसलिए वो

730
00:50:17,920 --> 00:50:22,160
झूठ बोल ही नहीं सकता। नहीं तो वो वो वो वाला सत्य है ना जो इस प्रपंच रूपी संसार

731
00:50:22,160 --> 00:50:26,240
के बाहर जो हमें जो प्राप्त करना है। पर वो बोलने में भी झूठ नहीं

732
00:50:26,240 --> 00:50:30,480
बोल सकता। व्यवहार में भी नहीं मतलब नाटक के अंदर आके तो तो

733
00:50:30,480 --> 00:50:34,480
फिर तो बाधित हो गया फिर से अभी हमने जन्म दे के उसको सर्वशक्तिमान

734
00:50:34,480 --> 00:50:38,480
बनाया था फिर बाधित हो गया भाई अगर संसार में

735
00:50:38,480 --> 00:50:42,000
इतना सा भी कोई काम है जो वो नहीं कर सकता है तो फिर वो बाधित

736
00:50:42,000 --> 00:50:46,400
हो गया ऐसा नहीं ये ये सवाल इसलिए पूछ रहा हूं मैं असल में जी

737
00:50:46,400 --> 00:50:50,480
वो उसका पॉइंट ये है कि एक हमारे बृहधारणिक उपनिषद में दो चार

738
00:50:50,480 --> 00:50:54,640
10 में एक बात कही गई है हमारे जो वेद है वो अपारुषय ग्रंथ है वो

739
00:50:54,640 --> 00:50:59,840
अंतिम प्रमाण है उनके उनके के अलावा मतलब वो भगवान की सांस के रूप में है।

740
00:50:59,840 --> 00:51:03,920
भगवान हम लोग दो प्रकार के कार्य करते हैं। एक चाहकर और एक बिना

741
00:51:03,920 --> 00:51:08,000
चाहकर। जो हम चाहकर करते हैं उसमें हमारी बुद्धि इन्वॉल्व होती है।

742
00:51:08,000 --> 00:51:12,320
तो हम हम उस पर कंट्रोल होता है कि हम इसको कैसे करें। जैसे

743
00:51:12,320 --> 00:51:16,320
मैं मेरे सामने दो लोग बैठे हुए हैं। एक वो भाई साहब बैठे हैं। एक दीदी बैठी

744
00:51:16,320 --> 00:51:20,480
है। मैं चाहूं तो इनको बुलाऊं, मैं चाहूं तो इनको बुलाऊं। क्योंकि मैं चाहता हूं

745
00:51:20,480 --> 00:51:24,480
इसलिए मैं उसमें निर्णय ले पा रहा हूं कि इनको बुलाऊं कि इनको बुलाऊं। मगर कुछ

746
00:51:24,480 --> 00:51:28,640
कार्य हम ऐसे भी करते हैं जो हम बिना किसी चाह के करते हैं।

747
00:51:28,640 --> 00:51:32,800
ठीक है? जैसे कि सांस लेना। जी। इसमें हमारी कोई इच्छा

748
00:51:32,800 --> 00:51:36,880
नहीं है। बच्चा जन्म ले रहा है माता के गर्भ से तो वो सांस ले रहा है। उसमें कोई उसकी

749
00:51:36,880 --> 00:51:41,120
निर्णय नहीं है। अपने आप ले रहा है। स्वतः उसका नेचर है वो सांस लेना।

750
00:51:41,120 --> 00:51:45,200
ठीक है। इसी प्रकार से वेद जो है भगवान के स्वास रूप में

751
00:51:45,200 --> 00:51:49,200
प्रकट होते हैं। तो वो चैलेंजेबल नहीं है। और भगवान जब

752
00:51:49,200 --> 00:51:53,680
हमें चाह के कुछ देंगे तो वो चैलेंजेबल हो जाएगा। उसकी

753
00:51:53,680 --> 00:51:57,120
क्रेडिबिलिटी पे क्वेश्चन मार्क आ जाएगा और जो कुरान इत्यादि का

754
00:51:57,120 --> 00:52:01,200
ज्ञान भी है वो भी उनका खुद का कहना है कि वह चाह कर दिया है इसलिए

755
00:52:01,200 --> 00:52:05,440
भी ऑथेंटिक नहीं है कुरान और बाइबल इत्यादि मगर हमारे जो वेद

756
00:52:05,440 --> 00:52:10,000
पुराण इत्यादि ग्रंथ है ये बिना चाह के स्वास रूप में प्रकट होते हैं

757
00:52:10,000 --> 00:52:14,080
तो जब हम ये कहते हैं कि भगवान आके हमको खुद बता रहे हैं तो

758
00:52:14,080 --> 00:52:18,080
वो तो हो सकता है हमको भटका रहे हो क्योंकि क्रिमिनल्स क्राइम कर रहे हैं वो

759
00:52:18,080 --> 00:52:22,160
उनकी मर्जी के बिना थोड़ी ना कर रहे हैं। राक्षस जन्म ले रहे हैं तो उनकी मर्जी के बिना थोड़ी ना

760
00:52:22,160 --> 00:52:26,240
ले रहे हैं। उसमें उनका कंट्रोल है। जैसे सर्वाधार का जैसे दीदी ने

761
00:52:26,240 --> 00:52:30,560
सबसे पहले दुनिया की समस्त सृष्टि संचालित कहां से हो रही है उसको ईश्वर बताया।

762
00:52:30,560 --> 00:52:34,800
तो उसमें तो क्रिमिनल्स भी तो आ गए।

763
00:52:34,800 --> 00:52:38,880
मतलब जो कहने का मतलब मेरा यह था कि जो कोई सुपर नेचुरल

764
00:52:38,880 --> 00:52:43,040
पावर अगर हमको आके कह भी रही है कि मैं भगवान हूं। और वो भगवान

765
00:52:43,040 --> 00:52:47,040
ही है। मान लीजिए। हम्। नहीं तो बुद्ध के बुद्ध के रूप में विष्णु भगवान का

766
00:52:47,040 --> 00:52:51,200
अवतार होता है। और वह झूठ बोलते हैं। मोहिनी के रूप में वह छल

767
00:52:51,200 --> 00:52:55,520
करते हैं। है ना? तो हम इसलिए वेद के आगे

768
00:52:55,520 --> 00:52:59,600
भगवान के वाक्य को भी नहीं माना गया है। मना कर दिया। नहीं भैया वेद

769
00:52:59,600 --> 00:53:03,920
परम प्रमाण। तो जब हम कहते हैं कि कोई भगवान ही आकर के हमको मुरली

770
00:53:03,920 --> 00:53:08,000
के द्वारा मिल रहे हैं। और ये कह रहे हैं कि तुम ऐसा करो, ऐसा मत करो, ये करो,

771
00:53:08,000 --> 00:53:12,000
ये मत करो। तो फिर उसमें ये बात आ जाती है कि भगवान चाहकर कुछ जब कर रहे हैं और दुनिया

772
00:53:12,000 --> 00:53:16,160
में भगवान की मर्जी के बिना कुछ नहीं है तो इसका मतलब बुराई का भी अस्तित्व नहीं है भगवान

773
00:53:16,160 --> 00:53:20,160
की मर्जी के बिना तो हो सकता है कि हमें भटका भी रहे हो। कुरान में भी ये बात लिखी हुई

774
00:53:20,160 --> 00:53:24,320
है कि मैं कुछ लोगों को भटका देता हूं। तो जब वो किसी

775
00:53:24,320 --> 00:53:28,640
को भटकाने की बात स्वयं स्वीकार कर रहा है कुरान को बोलने वाला

776
00:53:28,640 --> 00:53:32,800
जो खुदा कहते हैं उसे है ना? तो फिर उसकी एक भी बात पे बिलीव

777
00:53:32,800 --> 00:53:36,880
कैसे किया जाएगा? तो कहने का अर्थ यह है मेरा कि वेद के समक्ष फिर

778
00:53:36,880 --> 00:53:41,040
हम किसी बोली हुई बात को प्रमाण नहीं मान सकते। इसमें आप कुछ बता

779
00:53:41,040 --> 00:53:45,600
दे फिर हम ऑफ करें। पहले

780
00:53:45,600 --> 00:53:49,600
एक मिनट हम ये कह सकते हैं कि जितने भी वेद शास्त्र

781
00:53:49,600 --> 00:53:50,100
उनकी

782
00:53:49,840 --> 00:53:54,320
ओर घुमा लो। मत करे मत। अच्छा अच्छा जितने वेद शास्त्र है हमारे

783
00:53:54,320 --> 00:53:58,880
वो परमात्मा ने नहीं लिखे है वो हम मनुष्य आत्माओं ने लिखे है

784
00:53:58,880 --> 00:54:02,960
मनुष्य आत्माओं ने लिखे है मनुष्य आत्मा में लिखने का मतलब नहीं

785
00:54:02,960 --> 00:54:06,960
मैं यही से शुरू करूंगा जैसे की मुरली है दीदी आप इसको ले लीजिए

786
00:54:06,960 --> 00:54:11,920
प्लीज वो वो अच्छी चीज है जो आप बता रही है वो जाएगा समाज में अच्छा रहेगा

787
00:54:11,920 --> 00:54:16,000
एक मिनट आप कहने का मतलब आप आ जाइए ना इधर आ जाइए एक मिनट आ जाइए एक

788
00:54:16,000 --> 00:54:21,200
मिनट कहने का मतलब मैं आपको समझा चालू है मैं आपको

789
00:54:21,200 --> 00:54:25,520
नहीं

790
00:54:25,520 --> 00:54:29,600
हम पढ़ते हैं और हमने पढ़ करके अब हमने उसपे चिंतन

791
00:54:29,600 --> 00:54:33,600
किया और चिंतन करके अगर हम उसको एक किताब की रीति

792
00:54:33,600 --> 00:54:37,680
से लिख देते हैं तो अब उस मेरे द्वारा जो परमात्मा ने

793
00:54:37,680 --> 00:54:41,760
मुझे सुनाया मैंने सुन लिया अब फिर मेरे चिंतन किया ना

794
00:54:41,760 --> 00:54:46,080
अब मैंने चिंतन करके उसकी किताब बना ली अब उस किताब को तो जितने

795
00:54:46,080 --> 00:54:50,320
लोग पढ़ेंगे तो वो सब अपनी अपनी रीति समझेंगे ना उसे तो उसी प्रकार

796
00:54:50,320 --> 00:54:54,320
वेद और शास्त्र भी है कि जो बाइबल है, कुरान है,

797
00:54:54,320 --> 00:54:58,320
जो गुरु ग्रंथ साहिब है इन सबको लिखने वाले जो है गुरु

798
00:54:58,320 --> 00:55:02,720
नानक जी ने कोई गुरु ग्रंथ साहिब नहीं लिखा। उन्होंने तो परमात्मा का परिचय

799
00:55:02,720 --> 00:55:06,720
दिया लेकिन उसको फॉलो करने वाली जो आत्माएं थी उन्होंने उनकी जीवन

800
00:55:06,720 --> 00:55:10,720
कहानी लिख डाली कि वो आए सृष्टि पर वो अवतरित हुए। फिर

801
00:55:10,720 --> 00:55:14,800
उन्होंने ऐसा नहीं वेद की वेद वेद इत्यादि की रचना नहीं की गई है।

802
00:55:14,800 --> 00:55:18,960
वही तो मैं कह रहा हूं। वैधानिक उपनिषद यह कहता है कि वेद इत्यादि कभी

803
00:55:18,960 --> 00:55:22,960
रचे नहीं गए। वह सदैव विद्यमान थे भगवान की सांस के रूप में। उनकी कभी

804
00:55:22,960 --> 00:55:27,120
रचना नहीं हुई। सनातन है ना? किसका?

805
00:55:27,120 --> 00:55:31,120
कृष्ण को माना जा रहा है। किसको? जो हम ये जो कह रहे हैं कि

806
00:55:31,120 --> 00:55:35,280
भगवान हमारे साथ छल कर सकते हैं या भगवान जो वेदते

807
00:55:35,280 --> 00:55:39,440
शास्त्र ईश्वर ईश्वर के बिना ईश्वर के बिना

808
00:55:39,440 --> 00:55:40,560
दुनिया में किसी चीज

809
00:55:40,560 --> 00:55:44,640
का कोई चीज अस्तित्व में ही नहीं आ सकती। आप ही ने कहा कि इस संसार

810
00:55:44,640 --> 00:55:48,720
में फूल भी खिल रहा है तो उसका आधार भी ईश्वर है। तो अगर फूल पंखा

811
00:55:48,720 --> 00:55:52,800
सबका आधार ईश्वर है तो वहां पर छल और इसका

812
00:55:52,800 --> 00:55:56,960
आधार भी ईश्वर है। यद्यपि ईश्वर के अनुसार वो कुछ नहीं है। ईश्वर को पाप नहीं लगता

813
00:55:56,960 --> 00:56:00,960
क्योंकि ईश्वर जानता है तो कुछ है ही नहीं। है ना? मगर हम बच्चों की तरीके से

814
00:56:00,960 --> 00:56:05,040
देख रहे हैं कि भैया ये पाप है। वो वो है तो हमारे अनुसार उसका आधार भी वो

815
00:56:05,040 --> 00:56:09,120
है। ईश्वर है। तो अगर ईश्वर के लिए कुछ भी नहीं है। जब कुछ

816
00:56:09,120 --> 00:56:13,200
सच नहीं है। कुछ झूठ नहीं है तो ईश्वर तो प्रपंच रूपी संसार में आके हां

817
00:56:13,200 --> 00:56:17,200
तो ईश्वर तो प्रपंच रूपी संसार में आकर कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र है और सब

818
00:56:17,200 --> 00:56:21,360
कुछ करते हुए भी उसको पाप नहीं लगेगा क्योंकि उस जानता है बलात्कार है ही नहीं चोरी

819
00:56:21,360 --> 00:56:25,360
है ही नहीं वो मर्डर है ही नहीं कुछ है ही नहीं है ना वो

820
00:56:25,360 --> 00:56:29,040
तो नाटक है सब

821
00:56:29,040 --> 00:56:33,040
ठीक है कर्मों का परिणाम ही होता है ना कि हम जैसा बोलेंगे वैसा

822
00:56:33,040 --> 00:56:37,040
हम पाएंगे वो तो ठीक है मगर जब ईश्वर देखिए एक दो बातें

823
00:56:37,040 --> 00:56:41,040
अटक रही है बस एंड ही है कि यदि ईश्वर झूठ बोल

824
00:56:41,040 --> 00:56:45,040
सकता है तभी वो सर्वशक्तिमान है सिंपल अगर वह झूठ नहीं बोल सकता तो सर्व

825
00:56:45,040 --> 00:56:49,200
शब्द हटाना पड़ेगा। शक्तिमान कह दीजिए। हां कोई भी एक कार्य

826
00:56:49,200 --> 00:56:53,520
अगर वह नहीं कर पा रहा है तो वह सर्व शब्द हटाना पड़ेगा। या तो वो सर्वशक्तिमान

827
00:56:53,520 --> 00:56:57,680
नहीं है या तो वो झूठ बोल सकता है। अगर वो झूठ बोल सकता है तो वो आपको आकर के सच ही

828
00:56:57,680 --> 00:57:03,680
बता रहा है। इसकी कोई गारंटी नहीं है। ये दिक्कत है।

829
00:57:05,520 --> 00:57:09,920
अपनी भाषा में यही कहेंगे कि वेद ही परम प्रमाण है। अपौरुष है ग्रंथ जिनको

830
00:57:09,920 --> 00:57:14,000
ईश्वर ने भी नहीं रचा। वो कि वेद वेद के लिए ईश्वर भी नहीं

831
00:57:14,000 --> 00:57:18,000
कहता कि मैंने उसे रचा। आप कह रही मनुष्यों की रचना है वो उन्होंने भी नहीं

832
00:57:18,000 --> 00:57:22,240
रचा। वो सनातन ग्रंथ है कि कब से जब से ईश्वर है।

833
00:57:22,240 --> 00:57:26,480
हां वो सनातन ग्रंथ है। बस वो ये होता है कि पहले वो श्रुति के द्वारा

834
00:57:26,480 --> 00:57:30,480
प्रवाहित होते हैं। ऋषि उनके दर्शन करते हैं। फिर ऋषियों के माध्यम

835
00:57:30,480 --> 00:57:34,560
से गुरु शिष्य परंपरा के द्वारा फिर आगे आकर के द्वापर में व्यास जी उन्हें लिख देते

836
00:57:34,560 --> 00:57:38,880
हैं। आपकी कुछ मान्यता अलग होगी। मगर ये है अगर

837
00:57:38,880 --> 00:57:42,880
हम यह कहेंगे ना कि ईश्वर हमको आकर खुद कह

838
00:57:42,880 --> 00:57:46,880
रहा है कि वो गलत है। तो ईश्वर को हमने नकारा है। पहले भी नकारा

839
00:57:46,880 --> 00:57:50,960
है। विष्णु भगवान बुद्ध के रूप में आए। हमने मना कर दिया। हम आपकी बात नहीं

840
00:57:50,960 --> 00:57:55,120
मानेंगे। वेद की महात्मा नहीं तो आज हम बुद्धिस्ट होते। हम बुद्ध

841
00:57:55,120 --> 00:57:59,200
बुद्धिस्ट बन जाते। सारी बातों का सार सारी

842
00:57:59,200 --> 00:58:03,280
बातों का सार अगर हम निकाले तो हम यही कह सकते हैं कि

843
00:58:03,280 --> 00:58:07,280
ब्रह्मा कुमारी में अब आ जाइए ना। अब तो एंड एंड है। अब अब

844
00:58:07,280 --> 00:58:11,280
मैं वो सवाल नहीं करूंगा। अब सवाल नहीं करूंगा। आ जाइए। चलिए एंड

845
00:58:11,280 --> 00:58:17,040
है हां बस एंड एंड उसको

846
00:58:17,040 --> 00:58:22,720
अब सवाल नहीं करूंगा आ जाइए एंड

847
00:58:22,720 --> 00:58:26,960
देखिए अब हम हम यही कहेंगे कि ब्रह्मा

848
00:58:26,960 --> 00:58:31,120
कुमारी में जो दिया जाने वाला ज्ञान होगा वो ज्ञान परम

849
00:58:31,120 --> 00:58:35,200
सत्य है। दूसरा परमात्मा ने

850
00:58:35,200 --> 00:58:39,840
हमें बताया कि परमात्मा की रचना परमात्मा

851
00:58:39,840 --> 00:58:43,840
की सर्वप्रथम रचना देव आत्मा है और वही

852
00:58:43,840 --> 00:58:47,840
देव आत्मा जब इस सृष्टि पर कर्म करते-करते

853
00:58:47,840 --> 00:58:52,080
नीचे गिरती है तो वो साधारण मानव बन जाती है।

854
00:58:52,080 --> 00:58:56,080
परमात्मा ने कहा कि मेरी रचना देव आत्मा है

855
00:58:56,080 --> 00:59:00,240
और फिर उसके बाद धर्म आत्माएं हैं। जो द्वापर

856
00:59:00,240 --> 00:59:04,240
आने के बाद जब सृष्टि का संचालन बिगड़ता है तो

857
00:59:04,240 --> 00:59:08,400
परमात्मा समय-समय पर धर्म की आत्माओं को सृष्टि पर भेजते

858
00:59:08,400 --> 00:59:12,480
हैं और धर्म आत्माओं को भेज के वे पुनः उन्हें यह संदेश

859
00:59:12,480 --> 00:59:16,720
देते हैं कि अब आप सृष्टि पर जाकर के सृष्टि की मानव आत्माओं

860
00:59:16,720 --> 00:59:21,120
को बताओ कि प्रेम क्या है? सत्य क्या है? है ना? धर्म

861
00:59:21,120 --> 00:59:25,120
क्या है? इन सभी चीजों का ज्ञान यहां पर तो कुछ एक आत्माएं

862
00:59:25,120 --> 00:59:29,200
होती है जो उस मार्ग पर चलती हैं और कुछ होती है जो उस मार्ग पर नहीं

863
00:59:29,200 --> 00:59:32,560
चलती है जो चलती है वो उस परमात्मा के सानिध्य

864
00:59:32,560 --> 00:59:36,560
में रहती है जो नहीं चलती है वो उनसे दूर हो जाती है और अंत में

865
00:59:36,560 --> 00:59:40,720
परमात्मा को पुनः इस सृष्टि पर अवतरित होना ही होता

866
00:59:40,720 --> 00:59:44,800
है क्योंकि परमात्मा ये कहते हैं कि कोई हनुमान के रूप में

867
00:59:44,800 --> 00:59:48,800
याद करता है कोई बुद्ध के रूप में याद करता है कोई कृष्ण के

868
00:59:48,800 --> 00:59:52,880
रूप में याद करता है कोई दुर्गा काली के रूप में याद करता तो यह सभी

869
00:59:52,880 --> 00:59:57,280
मानव देह में है और जो जन्म मरण में आता है उसे हम परमात्मा

870
00:59:57,280 --> 01:00:01,280
नहीं कह सकते। परमात्मा वो जो जन्म मरण से परे हो और जो

871
01:00:01,280 --> 01:00:05,680
जन्म वो जन्म मरण से परे है उसके कंट्रोल में अपना आना जाना

872
01:00:05,680 --> 01:00:09,680
ऐसा है। मैं बताऊं है क्या कि जैसे मान लीजिए ईश्वर

873
01:00:09,680 --> 01:00:13,840
ने एक रूप दिखाया आपको जी कि अ

874
01:00:13,840 --> 01:00:18,080
मान लीजिए ईश्वर सब जगह है। ठीक है? मगर हम उसको अभी माया

875
01:00:18,080 --> 01:00:22,080
होने के कारण माया का पर्दा होने के कारण हम उसको देख नहीं पा

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रहे। फिर उसने क्या किया? एक मानव की आकृति के रूप में वो जो माया

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का पर्दा है उसमें उसने एक चित्र बनाया चित्र। अब हम उस जो

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उसने जो छेद किया है ना उस चादर में माया रूपी चादर में उस चादर से

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हम जो देख रहे हैं उधर परम तत्व को वो भगवान है। तो परम

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तत्व ने अपना एक रूप आपके सामने प्रकट कर दिया। अब क्या है कि हमने कहा

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कि भाई वो जन्म मरण के फेर में नहीं आता है। ठीक है? नहीं आता है। भगवान ने क्या

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किया? भगवान आपके सामने

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आ गए कृष्ण के रूप में, राम के रूप में। उन्होंने मात्र इतना किया कि जो आपको अभी

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तक दिखा रहे थे अपना रूप वो अब नहीं दिखा रहे। तो सांसारिक

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दृष्टि से क्या हुआ? भगवान का मरण हो गया। देह त्याग कर

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दिया। शरीर को नष्ट कर दिया। वास्तविकता में उन्होंने क्या किया

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है? केवल वो गायब हुए हैं। अभी तक वो गोचर थे। अब अगोचर

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हो गए। तो इस अगोचर वाली तरीके से कहेंगे तो वह जन्म

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मरण में नहीं आए और सांसारिक दृष्टि से कहेंगे तो वह जन्म मरण

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में आए। तो दोनों ही बातें हमारे शास्त्रों में इसलिए मिलती है। चलिए खैर दीदी

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ने बहुत सारा समय दिया हमको और मैं आशा करता हूं कि ये चर्चा आपको अच्छी

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लगी होगी। आप सभी कमेंट करके जरूर बताएं कैसी लगी आपको चर्चा

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और दीदी को बहुत-बहुत धन्यवाद। आपने अपना काफी सारा समय दिया।

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आपका भी धन्यवाद कि आप हमारे सेवा स्थान पर पधारे और

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आज आपने परमात्मा के बारे में जानने की इच्छा जागृत की।

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जी तो सभी को जय श्री राम। जय श्री राम।

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[संगीत]
