1
00:00:02,000 --> 00:00:06,320
सभी को जय श्री राम। सच के आसपास वाला

2
00:00:06,320 --> 00:00:10,560
झूठ जब हमने पहला वीडियो बनाया था भागवत

3
00:00:10,560 --> 00:00:14,560
आनंद के विषय में उसके द्वारा किए जा रहे जो दुष्प्रचार है केवल

4
00:00:14,560 --> 00:00:18,880
उसको टारगेट करते हुए और इस बात का ध्यान रखते हुए

5
00:00:18,880 --> 00:00:23,200
कि हमारे और उसके बीच का जो वैचारिक संघर्ष है इसका

6
00:00:23,200 --> 00:00:27,440
लाभ जो विदेशों से आने वाली जो यह संस्थाएं

7
00:00:27,440 --> 00:00:31,440
हैं जो दीमक की तरह से सनातन को नष्ट कर रही हैं वह

8
00:00:31,440 --> 00:00:35,680
ना ले लें। तो हमने उसका जो टाइटल

9
00:00:35,680 --> 00:00:40,000
रखा था उस वीडियो का पहली बार जब भागवत के

10
00:00:40,000 --> 00:00:44,480
द्वारा उठाए गए प्रश्नों के निराकरण में जब हमने वीडियो बनाया था तो उसका

11
00:00:44,480 --> 00:00:48,640
टाइटल यही रखा था सच के आसपास वाला झूठ। अब सच

12
00:00:48,640 --> 00:00:52,640
के आसपास वाला झूठ क्या है? जैसे कि कोई मेरे बारे में

13
00:00:52,640 --> 00:00:56,720
आपको यह बताए कि मैंने शिवश नारायण द्विवेदी को देखा

14
00:00:56,720 --> 00:01:00,960
है। जहां वह बैठता है वहां पीछे अमुक अमुक ग्रंथ रखे

15
00:01:00,960 --> 00:01:05,440
होते हैं या फिर अ कुछ

16
00:01:05,440 --> 00:01:09,600
और चीजें रखी होती है जो कि आप लोगों को भी दिखाई दे रही हैं।

17
00:01:09,600 --> 00:01:13,680
और जब वो वीडियो शूट करता है तो वीडियो शूट करने के थोड़ी ही देर बाद

18
00:01:13,680 --> 00:01:17,040
तुरंत थोड़ी देर बाद नहीं तुरंत वो एक कैडबेरी की

19
00:01:17,040 --> 00:01:22,800
चॉकलेट खाता है या फिर अमूल की आइसक्रीम खाता है और

20
00:01:22,800 --> 00:01:26,880
मैं यह दावे के साथ इसलिए कह सकता हूं क्योंकि मुझे मालूम है कि उसके ऑफिस में

21
00:01:26,880 --> 00:01:31,040
वहां क्या-क्या रखा हुआ देखा है मैंने। तो अब व्यक्ति

22
00:01:31,040 --> 00:01:35,200
क्योंकि उसने एक बात सत्य बताई है कि उसके पीछे क्या-क्या रखा होता

23
00:01:35,200 --> 00:01:39,200
है। करपात्री जी के ग्रंथ होते हैं। भगवत गीता होती है। तो

24
00:01:39,200 --> 00:01:43,440
क्योंकि उसने एक बात सत्य बोली है तो व्यक्ति इस बात पर ध्यान देना भूल जाता

25
00:01:43,440 --> 00:01:47,760
है कि उस एक सत्य बात के साथ जो उसने एक अटैच बात

26
00:01:47,760 --> 00:01:52,320
और बोली है वह सत्य है कि नहीं। भाई मेरे

27
00:01:52,320 --> 00:01:56,320
पीछे ग्रंथ रखे हैं। इस बात को

28
00:01:56,320 --> 00:02:00,640
मालूम होने वाला यह बात बताएगा कि

29
00:02:00,640 --> 00:02:04,640
मैं वीडियो शूट के बाद आइसक्रीम खाता हूं तो यह बात भी सत्य

30
00:02:04,640 --> 00:02:08,720
सिद्ध होगी। इसका आधार क्या है? इस संबंध में प्रमाण क्या

31
00:02:08,720 --> 00:02:12,800
है? क्या मेरे पीछे ग्रंथ रखे होने से यह सिद्ध हो

32
00:02:12,800 --> 00:02:17,360
जाता है कि मैं वीडियो शूट करने के बाद आइसक्रीम खाता हूं?

33
00:02:17,360 --> 00:02:21,520
या फिर जो भी मेरे बारे में इतनी सी भी जानकारी रखता है

34
00:02:21,520 --> 00:02:25,680
वह मेरे बारे में कोई भी बात बोलेगा तो वह मान ली जाएगी। कुछ इसी

35
00:02:25,680 --> 00:02:29,680
तरह के अनर्गल आरोप होते हैं भागवतानंद के

36
00:02:29,680 --> 00:02:32,080
द्वारा लगाए जाने वाले जो वो लोगों

37
00:02:32,080 --> 00:02:36,160
पर लगाता है मिलते जुलते। वो एक बात सच बताएगा जिससे कि लोग कहेंगे हां यह

38
00:02:36,160 --> 00:02:40,320
बात तो सही है। हमने ऐसा देखा है। और फिर उसके साथ में यह एक झूठ अपना

39
00:02:40,320 --> 00:02:44,880
परोस देगा कैरी मिनाटी बनने के लिए। तो

40
00:02:44,880 --> 00:02:49,040
ऐसा ही एक झूठ उसने बोला था भागवतानंद ने कि विद्या भास्कर

41
00:02:49,040 --> 00:02:53,360
जी महाराज जैसे प्रबुद्ध जन वेदगामी

42
00:02:53,360 --> 00:02:57,360
वेदानुगामी शंकर मठ में जाने का प्रयास कर रहे

43
00:02:57,360 --> 00:03:02,000
हैं पूरी शंकराचार्य जी से मिलने के लिए गए थे परंतु

44
00:03:02,000 --> 00:03:06,000
वहां पर उन्हें मिलने नहीं दिया गया यह क्या है

45
00:03:06,000 --> 00:03:10,240
यह भी वही सच के आसपास वाला झूठ है जिस पर आज खुलासा होने

46
00:03:10,240 --> 00:03:14,240
वाला है तो मैं बहुत ज्यादा देर तक जो है वह जो

47
00:03:14,240 --> 00:03:18,400
संशय की स्थिति है रोमांच की स्थिति है वह ना बनाने की बजाय

48
00:03:18,400 --> 00:03:22,480
पहले ही आपको बता दूं कि जब मैं विद्या भास्कर

49
00:03:22,480 --> 00:03:26,640
जी महाराज के पास मिलने गया तो जो सत्यता इस सब मन में मुझे

50
00:03:26,640 --> 00:03:31,040
पता लगी वो यही थी कि भागवतानंद

51
00:03:31,040 --> 00:03:35,520
ने विद्या भास्कर जी को लेकर के एक झूठ फैलाया था

52
00:03:35,520 --> 00:03:39,680
कि वो पूरी के शंकराचार्य जी से मिलने गए पर वहां

53
00:03:39,680 --> 00:03:43,680
के परिकरों ने उन्हें मिलने नहीं दिया गया विद्या भास्कर स्वामी जी ने भी ऐसा ही

54
00:03:43,680 --> 00:03:47,360
अनुभव बताया कि अयोध्या में शंकराचार्य जी आए थे तो हम उनका दर्शन

55
00:03:47,360 --> 00:03:51,440
करने की इच्छा रखते थे। पहले तो बहुत हम आराम से मिलते जुलते थे। साथ में धर्म

56
00:03:51,440 --> 00:03:55,680
चर्चा भी होती थी। बाद में मिलने गए तो उनके परिक हमको मिलने ही नहीं दिए। ये बाद में मिलने गए तो उनके परिक

57
00:03:55,680 --> 00:03:59,680
हमको मिलने नहीं दिए। ये बाद में मिलने गए तो उनके परिक हमको मिलने ही नहीं दिए। ये बात विद्या भास्कर स्वामी

58
00:03:59,680 --> 00:04:05,360
जी ने भी हमको कही। अब ये सच के आसपास वाला झूठ कैसे है?

59
00:04:05,360 --> 00:04:09,360
और किस आधार पर उसने यह बात कही। वह

60
00:04:09,360 --> 00:04:13,360
आधार यही था कि विद्या भास्कर जी महाराज तो स्वयं

61
00:04:13,360 --> 00:04:17,520
गए ही नहीं थे पूरी शंकराचार्य जी के पास। हां वो

62
00:04:17,520 --> 00:04:21,840
कभी और अन्य अवसरों पर जाते रहे होंगे। पर जिस अवसर को आधार

63
00:04:21,840 --> 00:04:25,920
बनाकर के बात भागवतानंद ने सच के आसपास वाले झूठ के रूप में

64
00:04:25,920 --> 00:04:30,000
प्रस्तुत की है। पर पड़ोसी प्रचारित किए। उस अवसर में

65
00:04:30,000 --> 00:04:34,240
तो विद्या भास्कर जी महाराज स्वयं गए ही नहीं बल्कि उनके कोई शिष्य गए

66
00:04:34,240 --> 00:04:38,240
थे और जिनके ना मिल

67
00:04:38,240 --> 00:04:42,320
पाने की बात विद्या भास्कर जी ने इस इस व्यक्ति को

68
00:04:42,320 --> 00:04:46,480
बताई धूर्त को और इसने उसको अपने साथ अपने

69
00:04:46,480 --> 00:04:50,800
द्वारा मिर्च मसाला लगाकर के प्रस्तुत कर दिया। कुछ इस तरीके से कि

70
00:04:50,800 --> 00:04:55,120
लोगों के मन में ऐसी नकारात्मकता स्थापित हो जाए।

71
00:04:55,120 --> 00:04:59,120
विद्या भास्कर जी महाराज को नहीं मिलने दिया। मान्य पीठ के मान

72
00:04:59,120 --> 00:05:02,880
आचार्य को नहीं मिलने दिया। रामानुजाचार्य

73
00:05:02,880 --> 00:05:06,880
को नहीं मिलने दिया। जगुरु रामानुजाचार्य जी को नहीं मिलने दिया। तो पहले ही लोगों के मन

74
00:05:06,880 --> 00:05:10,880
में इतनी नकारात्मकता स्थापित हो जाए कि बाद में जब

75
00:05:10,880 --> 00:05:14,880
कोई यह भी बताए कि नहीं नहीं विद्या भास्कर जी महाराज नहीं उनके शिष्य गए थे जो नहीं मिल

76
00:05:14,880 --> 00:05:18,960
पाए थे किनहीं कारणों। तो जब लोगों को यह

77
00:05:18,960 --> 00:05:23,120
सच्चाई पता भी चले बाद में तो उनकी वह नफरत उनका वह

78
00:05:23,120 --> 00:05:27,200
जो उनके अंदर जो नकारात्मकता है वो इतनी पुष्ट हो चुकी

79
00:05:27,200 --> 00:05:31,440
है उस समय तक कि वो इस सच्चाई से अब उन्हें कोई प्रभाव

80
00:05:31,440 --> 00:05:36,320
नहीं पड़ता हो कि भाई विद्या भास्कर जी महाराज नहीं बल्कि

81
00:05:36,320 --> 00:05:40,480
उनके शिष्य गए थे पूरी के शंकराचार्य जी के पास जो नहीं मिल

82
00:05:40,480 --> 00:05:44,560
पाए थे। पूज्य महाराज जी तो प्रामाणिक आचार्य हैं। उनकी तो खैर बात ही अलग है। ऐसा

83
00:05:44,560 --> 00:05:49,440
संभव ही नहीं है कि वह पूरी के शंकराचार्य जी से मिलने जाएं। उन्हें मिलने नहीं दिया जाए।

84
00:05:49,440 --> 00:05:53,440
और उनके शिष्य भी उसी श्रेणी में आते हैं। पर ऐसा

85
00:05:53,440 --> 00:05:57,520
कई बार होता है गुरुदेव का इन दिनों स्वास्थ्य ठीक नहीं रह रहा

86
00:05:57,520 --> 00:06:01,840
है और ऐसा भी संभव हो सकता है कि कई बार गुरुदेव का स्वास्थ्य

87
00:06:01,840 --> 00:06:06,160
ठीक ना रहा हो जब कोई उनसे मिलने पहुंचे कोई विशेष व्यक्ति।

88
00:06:06,160 --> 00:06:10,160
राजनीतिज्ञों के साथ, नेताओं के साथ अक्सर ऐसा होता है कि वह कई

89
00:06:10,160 --> 00:06:14,800
बार ऐसा मैंने खुद देखा कुंभ के मेले में या अन्य अवसरों पर जब कोई

90
00:06:14,800 --> 00:06:18,080
प्रमुख और प्रसिद्ध राजनेता

91
00:06:18,080 --> 00:06:23,840
गुरुदेव से मिलने पहुंचे परंतु नहीं मिल पाए। क्यों? क्योंकि वह असमय पहुंचे थे।

92
00:06:23,840 --> 00:06:28,000
इसके साथ ही साथ कुछ और भी मर्यादाएं होती

93
00:06:28,000 --> 00:06:32,000
हैं। जैसे कभी-कभी कुछ वरिष्ठ जिन ही

94
00:06:32,000 --> 00:06:36,400
है। परंतु अपने किसी शिष्य को दूत को

95
00:06:36,400 --> 00:06:40,560
वहां पर गुरुदेव को निमंत्रित करने के लिए अपने यहां बुलाने के लिए भेज

96
00:06:40,560 --> 00:06:44,640
देते हैं। और ऐसे में कई बार परिकरों

97
00:06:44,640 --> 00:06:48,880
को एक समस्या का सामना करना पड़ जाता है कि जो व्यक्ति

98
00:06:48,880 --> 00:06:53,120
संदेश लेकर के आया है गुरुदेव को वहां बुलाने के लिए

99
00:06:53,120 --> 00:06:57,360
उस व्यक्ति ने क्या जो आसन इत्यादि

100
00:06:57,360 --> 00:07:01,360
होगा जब गुरुदेव वहां जाएंगे इस संबंध में पारदर्शिता

101
00:07:01,360 --> 00:07:05,360
के साथ स्पष्टीकरण दिया है कि कैसे बैठेंगे कहां बैठेंगे क्योंकि

102
00:07:05,360 --> 00:07:10,160
ऐसा गुरुदेव के साथ हो चुका है कि कहीं वह पहुंचे और वहां पर

103
00:07:10,160 --> 00:07:14,240
गुरुदेव बैठ गए उनका जो आसन था सिंहासन था जिस पर वो

104
00:07:14,240 --> 00:07:18,400
बैठे थे वो बैठ गए वहां पर फिर उसके बाद कोई और आया और

105
00:07:18,400 --> 00:07:22,400
वो इस तरह से बिठा दिया गया उसको जहां पर शंकर शंकराचार्य की

106
00:07:22,400 --> 00:07:27,040
अवमानना हुई। तो इन सब कारणों से यह भी ध्यान रखना पड़ता है कि यदि कोई

107
00:07:27,040 --> 00:07:31,040
विशेष व्यक्ति अपने किसी शिष्य को या दूत को भेज के

108
00:07:31,040 --> 00:07:33,200
गुरुदेव को आमंत्रित करवाना चाह रहा है

109
00:07:33,200 --> 00:07:37,840
अपने यहां तो वहां पर वो पारदर्शिता

110
00:07:37,840 --> 00:07:41,840
रखी गई है कि नहीं पहले से ही यह बताया गया है कि नहीं अगर हमारे यहां गुरुदेव आएंगे तो इस

111
00:07:41,840 --> 00:07:46,320
इस तरह से बैठेंगे। वहां मंच पे इस तरह से

112
00:07:46,320 --> 00:07:50,480
विराजमान होंगे वो और दूसरे अगर कोई सज्जन आएंगे तो वह कहां विराजमान होंगे?

113
00:07:50,480 --> 00:07:54,560
तो अगर ऐसी पारदर्शिता नहीं होती है तो कई बार पीठ की

114
00:07:54,560 --> 00:07:58,560
यह समस्या होती है कि यह जो समस्या है गुरुदेव के आसन

115
00:07:58,560 --> 00:08:02,720
इत्यादि के विषय में जो दूत आया है जो अपने गुरु का शिष्य

116
00:08:02,720 --> 00:08:07,360
आया है उसको स्पष्ट रूप से बताया जाए या ना बताया जाए

117
00:08:07,360 --> 00:08:11,440
क्यों क्योंकि बताने में कहीं ऐसा ना हो जाए कि जिन जिन

118
00:08:11,440 --> 00:08:15,440
मान्य आचार्य का या जिन विशेष व्यक्तित्व वाले सज्जन

119
00:08:15,440 --> 00:08:19,440
का वह दूत है वह शिष्य है उनका

120
00:08:19,440 --> 00:08:23,440
ही खंडन जैसा प्रतीत ना हो जाए उसको दिखाई ना दे जाए तो इसलिए

121
00:08:23,440 --> 00:08:26,160
कई बार

122
00:08:26,160 --> 00:08:30,640
ऐसी व्यवस्था ऐसी संभावना ना होने की स्थिति में मौन रह जाना पड़ता है

123
00:08:30,640 --> 00:08:35,120
कि भाई ठीक है अगर हम कुछ ऐसा बोलेंगे कि भाई पारदर्शिता

124
00:08:35,120 --> 00:08:39,760
प्रस्तुत नहीं की गई है मंच पर कहां बैठेंगे आसन कहां लगेगा उनका क्या होगा

125
00:08:39,760 --> 00:08:44,080
और यह सब बातें अगर हम बोलेंगे तो जिन्होंने इनको भेजा है

126
00:08:44,080 --> 00:08:48,240
उनका खंडन जैसा ना फील हो जाए उनका अपमान ना हो जाए इनके समक्ष

127
00:08:48,240 --> 00:08:52,320
ना हो जाए तो इन इन सब बातों के चलते भी कई बार वहां मौन धारण कर

128
00:08:52,320 --> 00:08:56,400
लेना पड़ता है। तो ऐसे कई सारे कारण हो

129
00:08:56,400 --> 00:09:00,560
जाते हैं जिसमें कि गुरुदेव से बहुत ही सुलभता

130
00:09:00,560 --> 00:09:04,560
से जो भेंट हो सकती थी वो भी कठिन दिखाई देने देने लगती। परंतु

131
00:09:04,560 --> 00:09:08,640
ऐसा नहीं है कि विद्वत जनों को प्रमुख आचार्यों को वहां जाने से

132
00:09:08,640 --> 00:09:12,800
रोका जाए। सर्वप्रथम जो मान्य आचार्य गण है उनके साथ ऐसा

133
00:09:12,800 --> 00:09:17,040
हो वह तो संभव ही नहीं है। हां कभी किसी के साथ

134
00:09:17,040 --> 00:09:21,760
अगर हुआ भी है तो केवल स्वास्थ्य के कारण ही हुआ होगा और

135
00:09:21,760 --> 00:09:25,760
हां जो अन्य जो समाज में जो प्रतिष्ठा रखते हैं

136
00:09:25,760 --> 00:09:29,760
नेता राजनेता इत्यादि उनके संबंध में ऐसा माना जा सकता

137
00:09:29,760 --> 00:09:33,760
है कि यदि वह ऐसे समय में आए ऐसे असमय में आए

138
00:09:33,760 --> 00:09:37,760
जिसमें कि जो समय गुरुदेव के विपरीत हो अनुकूल ना हो

139
00:09:37,760 --> 00:09:42,240
तो वह भी नहीं मिल पाए ऐसा माना जा सकता है। परंतु मान्य आचार्यों

140
00:09:42,240 --> 00:09:46,400
के लिए ऐसा माना जा सके ऐसा हो उनके साथ यह संभव नहीं

141
00:09:46,400 --> 00:09:50,480
है। अब वो तीसरा कारण मैंने आसन इत्यादि

142
00:09:50,480 --> 00:09:54,480
के बारे में बता ही दिया कि यदि कोई बुलाने आता है तो उस

143
00:09:54,480 --> 00:09:58,720
संबंध में क्या किस तरह से दृष्टिकोण रहता है। जिस कारण से कभी-कभी

144
00:09:58,720 --> 00:10:02,720
ऐसा हो सकता है कि गुरुदेव से फिर भेंट ना हो पाए। जो

145
00:10:02,720 --> 00:10:03,360
दूत आया

146
00:10:03,360 --> 00:10:07,440
है उसकी। तो इस तरह के कारण होते हैं जिनको कि सकारात्मक

147
00:10:07,440 --> 00:10:11,440
दृष्टि से देखने का प्रयास करेंगे तो अवश्य ही

148
00:10:11,440 --> 00:10:15,600
उसका जो उसके अंदर जो सकारात्मकता

149
00:10:15,600 --> 00:10:20,080
है वो आपको दिखाई दे जाएगी। परंतु फिर भी

150
00:10:20,080 --> 00:10:24,080
जब जो उक्त शिष्य थे पूज्य

151
00:10:24,080 --> 00:10:28,560
विद्या भास्कर जी महाराज के जो पूरी शंकराचार्य जी से नहीं मिल पाए थे जब शंकराचार्य

152
00:10:28,560 --> 00:10:32,640
जी अयोध्या में थे तो जब वो नहीं मिल पाए थे तो इस विषय को

153
00:10:32,640 --> 00:10:36,720
इस घटना को जब हमने मठ में सूचित किया तो हमें वहां से यही कहा

154
00:10:36,720 --> 00:10:40,720
गया यही भाव वहां से प्रकट किए गए पूज्य विद्या भास्कर जी

155
00:10:40,720 --> 00:10:44,880
महाराज के लिए भी कि इसको पौरुष का दोष ही समझे इसको उद्देश्य पूर्वक

156
00:10:44,880 --> 00:10:48,960
ना समझे ऐसा ही वहां से निवेदन प्रकट किया गया अच्छा

157
00:10:48,960 --> 00:10:53,120
अब यदि ऐसा ना होता इस पर भी बात करेंगे। यदि ऐसा ना

158
00:10:53,120 --> 00:10:57,200
होता और यह उद्देश्य पूर्वक ही किया होता तो अभी तो पूज्य राघवाचार्य जी महाराज

159
00:10:57,200 --> 00:11:01,200
के रूप में स्वयं विद्या भास्कर जी महाराज स्वयं ही वहां पर गए। पूज्य

160
00:11:01,200 --> 00:11:05,440
राघवाचार्य जी वहां पर गए। उनके ही प्रामाणिक शिष्य हैं। तो

161
00:11:05,440 --> 00:11:09,680
इसलिए यह अगर कभी संयोग से

162
00:11:09,680 --> 00:11:13,680
ऐसा हो भी गया तो उसको पौरुष का दोष समझते हुए उस पर

163
00:11:13,680 --> 00:11:17,920
ध्यान ना देने का ही निवेदन पीठ के परिकरों द्वारा भी किया गया।

164
00:11:17,920 --> 00:11:18,420
परंतु

165
00:11:18,400 --> 00:11:22,400
पूरी बात ना बताकर इस धूर्त ने धूर्तता

166
00:11:22,400 --> 00:11:26,800
के साथ विद्या भास्कर जी महाराज के बारे में क्या प्रचारित किया

167
00:11:26,800 --> 00:11:30,800
कि विद्या भास्कर जी महाराज जैसे प्रामाणिक आचार्य जनों

168
00:11:30,800 --> 00:11:34,800
को भी पूरी के शंकराचार्य जी से मिलने नहीं दिया जाता है।

169
00:11:34,800 --> 00:11:38,800
थे बाद में मिलने गए तो उनके परिक्र हमको मिलने नहीं दिए। जब बाद में मिलने गए तो उनके परिक हमको मिलने

170
00:11:38,800 --> 00:11:42,960
ही नहीं दिए। ये बात विद्या भास्कर स्वामी जी ने भी हमको कही। तभी तो मैं यह सोच कर हैरान

171
00:11:42,960 --> 00:11:46,960
था कि यदि ऐसा होता तो विद्या भास्कर जी महाराज तो महाराज तो

172
00:11:46,960 --> 00:11:51,040
अत्यंत निर्भीक संत हैं। वह तो बोलते प्रखर हो के अभी कुछ

173
00:11:51,040 --> 00:11:55,120
दिनों पूर्व उन्होंने स्कॉन के बारे में बोला था प्रखर हो के तो

174
00:11:55,120 --> 00:11:59,280
मुझे बड़ा आश्चर्य था इसीलिए मैं अयोध्या गया भी था कि भाई क्या वाकई में ऐसा

175
00:11:59,280 --> 00:12:03,600
हुआ है तो सच के आसपास वाला झूठ क्या है कि विद्या भास्कर जी महाराज

176
00:12:03,600 --> 00:12:07,760
को कष्ट तो था कि उनके शिष्य मिल नहीं पाए थे। परंतु उन्होंने

177
00:12:07,760 --> 00:12:12,160
एज इट इज यही बात जब भागवतानंद को बताई तो भागवतानंद ने

178
00:12:12,160 --> 00:12:16,160
उस बात को बदलकर किस तरह से समाज के समक्ष प्रस्तुत किया कि विद्या भास्कर

179
00:12:16,160 --> 00:12:20,160
जी महाराज स्वयं नहीं मिल पाए। दोनों बातों में अंतर है। यद्यपि

180
00:12:20,160 --> 00:12:24,320
उनका ना मिल पाने का भी खेद है पीठ को। उन्होंने खेद प्रकट किया कि

181
00:12:24,320 --> 00:12:28,800
अगर ऐसा हुआ तो परंतु ऐसा हो जाना कि प्रामाणिक

182
00:12:28,800 --> 00:12:33,120
आचार्य उन्हें नहीं मिलने दिया गया। तो यह धूर्तता फैलाई

183
00:12:33,120 --> 00:12:34,240
किसने?

184
00:12:34,240 --> 00:12:38,480
इसी भागवत आनंद में और इसके साथ ही साथ जब मैं अगले

185
00:12:38,480 --> 00:12:42,560
ही दिन राघवाचार्य जी महाराज से मिला तो वहां पर भी इसकी इसके झूठ का

186
00:12:42,560 --> 00:12:46,800
पर्दाफाश हुआ। राघवाचार्य जी महाराज ने भी बताया कि वह अपने

187
00:12:46,800 --> 00:12:50,880
जन्मदिन के दिन संभवत पूरी के शंकराचार्य जी

188
00:12:50,880 --> 00:12:55,360
उसी उसी नगर में थे जहां पर विद्यावास

189
00:12:55,360 --> 00:12:59,520
राघवाचार्य जी महाराज थे। तो उनका उस उस दिन जन्मदिन

190
00:12:59,520 --> 00:13:04,080
था। तो उन्होंने किसी महापुरुष के दर्शन करने के लिए

191
00:13:04,080 --> 00:13:08,240
पूरी के शंकराचार्य जी के दर्शन करना ही अच्छा समझा और वहां

192
00:13:08,240 --> 00:13:12,640
दर्शन करने गए उन्हें दर्शन मिले भी उन्हें भेंट भी हुई। हां कुछ

193
00:13:12,640 --> 00:13:16,720
दो-तीन बार उन्होंने दर्शन भी प्राप्त किए तो किसी एक बार ऐसा हुआ था

194
00:13:16,720 --> 00:13:21,280
जब उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं था तो

195
00:13:21,280 --> 00:13:25,600
संभवत खिड़की से ही प्रणाम करके वो जो है राघवाचार्य

196
00:13:25,600 --> 00:13:29,680
जी महाराज वहां से आ गए थे। इसके बाद पुनः

197
00:13:29,680 --> 00:13:33,680
जो है मिले शंकराचार्य जी महाराज से और

198
00:13:33,680 --> 00:13:37,680
उनके साथ मंच पर भी बैठे। मगर यह सब बातें इस व्यक्ति ने नहीं

199
00:13:37,680 --> 00:13:41,760
बताई। इस व्यक्ति ने इसको कैसे घुमा फिरा करके प्रस्तुत किया अपने वक्तव्यों

200
00:13:41,760 --> 00:13:46,000
में कि देखिए विद्या भास्कर जी महाराज को मिलने नहीं दिया जा रहा है। ऐसा

201
00:13:46,000 --> 00:13:49,920
ही हमें राघवाचार्य जी महाराज ने बताया। राघवाचार्य जी महाराज ने

202
00:13:49,920 --> 00:13:53,920
यह भी यह बताया अगर कि एक बार वो मिल नहीं पाए थे। केवल

203
00:13:53,920 --> 00:13:58,080
दूर से दर्शन करके चले आए तो राघवाचार्य जी महाराज ने आगे पीछे और भी चीजें

204
00:13:58,080 --> 00:14:02,160
बताई है ना मगर वो यह धूर्त नहीं बोलेगा वो राघवाचार्य जी स्वयं बोलेंगे उन्होंने

205
00:14:02,160 --> 00:14:06,240
मुझे बताया कि ऐसा-सा हुआ पूरी के शंकराचार्य जी से मिलने का असफल प्रयास

206
00:14:06,240 --> 00:14:10,400
तो राघवाचार्य जी भी कर चुके हैं। राघवाचार्य स्वामी जी से हमारी निजी वार्ता हो रही थी। उन्होंने कहा

207
00:14:10,400 --> 00:14:14,480
कि हम तो शंकराचार्य जी का दर्शन करने के लिए गए। कई घंटे प्रतीक्षा किए। बाद में

208
00:14:14,480 --> 00:14:18,480
उनके परिकों ने कहा कि स्वामी जी नहीं मिलेंगे। विश्राम कर रहे हैं। बस खिड़की से देखिए और जाइए। खिड़की

209
00:14:18,480 --> 00:14:22,480
से दर्शन किया और ऐसे वहां जोड़ा और निकल गया। यह ठीक उसी तरह रामपाल

210
00:14:22,480 --> 00:14:26,480
की तरह कि कहीं पर अगर ब्रह्मा विष्णु महेश ने कह दिया कि हम भी नाशवान

211
00:14:26,480 --> 00:14:30,560
है या हमारा भी आविर्भाव तिरोभाव हो गए तो हो गए नाशवान

212
00:14:30,560 --> 00:14:34,560
हो गए वो उसके आगे पीछे उन्होंने यह भी कहा कि मैं परम ब्रह्म हूं तो

213
00:14:34,560 --> 00:14:38,640
उससे कोई मतलब नहीं उसी प्रकार से इसने केवल वो एक

214
00:14:38,640 --> 00:14:42,720
बात कि राघवाचार्य जी ने बताया कि उनको मिलने नहीं दिया गया वो एक बात पकड़ ली

215
00:14:42,720 --> 00:14:46,720
उसके बाद वो मंच पर भी उन्होंने मंच भी साझा किया पूरी के शंकराचार्य

216
00:14:46,720 --> 00:14:51,040
जी के साथ तो उसको उसने गण कर दिया इसको कहते हैं अपने

217
00:14:51,040 --> 00:14:55,120
नैरेटिव को क्रिएट करना। कैसे क्रिएट करना है नैरेटिव?

218
00:14:55,120 --> 00:14:59,120
यह शैली है नैरेटिव क्रिएट करने की। सारी बातें सत्य

219
00:14:59,120 --> 00:15:03,200
हैं। हमारे विपक्ष में है। फिर भी हम अपना नैरेटिव निकाल लेंगे। उसको स्थापित

220
00:15:03,200 --> 00:15:05,200
कर देंगे। ऐसा तोड़ मरोड़ के

221
00:15:05,200 --> 00:15:09,200
उसी सत्य को प्रस्तुत करेंगे। इसी को कहते हैं सच के आसपास वाला

222
00:15:09,200 --> 00:15:13,360
झूठ। तो सबसे पहले तो

223
00:15:13,360 --> 00:15:17,520
यह है। अब इसके बाद एक बात आती है

224
00:15:17,520 --> 00:15:21,520
कि इसकी धूतता की पराकाष्ठा आप देख सकते हैं कि जब

225
00:15:21,520 --> 00:15:25,600
राघवाचार्य जी महाराज वहां पर मिलने गए अब तक ये कह रहा था कि मिलने नहीं दिया

226
00:15:25,600 --> 00:15:29,680
जा रहा है। तो सबसे पहले तो इसको ये रोना रोना था ना कि अरे ये मैं

227
00:15:29,680 --> 00:15:33,680
क्या देख रहा हूं? राघवाचार्य जी महाराज पूरी पीठ के शंकराचार्य जी से कैसे भेंट कर

228
00:15:33,680 --> 00:15:37,680
रहे हैं। मगर जब उन्होंने भेंट की इसने देख लिया अपनी आंखों से तो इसके सुर

229
00:15:37,680 --> 00:15:41,760
बदल गए। आज बड़ा अच्छा दृश्य देखने को मिला। राघवाचार्य

230
00:15:41,760 --> 00:15:46,000
जी वहां पुरी के शंकराचार्य जी से मिलने पहुंचे हैं। अरे भाई कैसे पहुंच

231
00:15:46,000 --> 00:15:50,080
गए? तुम्हारा तो क्लेम है ना कि नहीं मिलने दिया जाता है। इसका

232
00:15:50,080 --> 00:15:54,240
मतलब वो क्लेम झूठा है। अच्छा फिर इसने आगे क्या कहा कि चलो

233
00:15:54,240 --> 00:15:58,640
हमारे कारण यह शोधन हो गया। तुम्हारे कारण शोधन कैसे हो गया भाई? हर

234
00:15:58,640 --> 00:16:02,880
चीज का क्रेडिट यह व्यक्ति स्वयं को देता है। अगर इस के विषय

235
00:16:02,880 --> 00:16:06,960
में मैंने कोई कार्य किया तो उसका भी क्रेडिट चलो हमारे

236
00:16:06,960 --> 00:16:11,040
कह देने के कारण ही परिवर्तन आ रहा है समाज में कि लोग अन्य लोग भी कह रहे हैं अरे

237
00:16:11,040 --> 00:16:15,280
भैया पहली बार जब मैं इस लखनऊ टेंपल

238
00:16:15,280 --> 00:16:19,280
में गया था ना तो मैंने तेरा नाम भी नहीं सुना था उस समय तू है

239
00:16:19,280 --> 00:16:21,120
कौन

240
00:16:21,120 --> 00:16:26,080
तो तू यह कैसे क्रेडिट दे रहा है कि हम जो कार्य कर रहे हैं वो तुझसे प्रेरणा मिली है

241
00:16:26,080 --> 00:16:30,160
राघवाचार्य जी महाराज को एक मंच पर देखने की प्रेरणा

242
00:16:30,160 --> 00:16:34,160
ऐसे आचार्य चार चार्यों को वैष्णवाचार्यों को

243
00:16:34,160 --> 00:16:38,320
शंकराचार्यों के साथ एक मंच पर देखने की प्रेरणा तो हमें गुरुदेव से मिलती

244
00:16:38,320 --> 00:16:43,280
है। गुरुदेव ने सदैव रामानुजाचार्य भगवान के प्रति मधवाचार्य

245
00:16:43,280 --> 00:16:47,520
के प्रति सभी संप्रदायों के प्रति बहुत सम्मान की दृष्टि हमें दी

246
00:16:47,520 --> 00:16:51,680
है। और वही हमारे अंदर है हृदय में और

247
00:16:51,680 --> 00:16:55,760
हम उसी दृष्टि से चलते हैं जिस जो दृष्टि गुरुदेव ने हमें दी है। पूरी

248
00:16:55,760 --> 00:17:01,040
के शंकराचार्य ने हमें दी है। और यही नहीं

249
00:17:01,040 --> 00:17:05,120
हम जब मधवाचार्य संप्रदाय के लोगों से मिलते हैं या उनको

250
00:17:05,120 --> 00:17:09,360
देखते हैं आचार्यों को तब भी इसी दृष्टि से देखते हैं। रामानुज

251
00:17:09,360 --> 00:17:13,760
परंपरा से देखते तब भी इसी दृष्टि से देखते हैं। और यही दृष्टि हमें राघवाचार्य

252
00:17:13,760 --> 00:17:17,920
जी महाराज से भी प्राप्त हुई थी। जब उनका इंटरव्यू है उसमें आप देखिएगा

253
00:17:17,920 --> 00:17:22,080
कैसे उन्होंने सभी मान्य प्रामाणिक संप्रदायों के प्रति जो है

254
00:17:22,080 --> 00:17:26,080
एक अच्छी दृष्टि सम्मान पूर्वक दृष्टि रखने के लिए

255
00:17:26,080 --> 00:17:30,480
शिक्षा दी है। तो हर बात का क्रेडिट

256
00:17:30,480 --> 00:17:34,560
तुझे किस प्रकार से मिल जाएगा भाई? अब तेरा कहना है कि मुझे नीचा दिखाने के

257
00:17:34,560 --> 00:17:36,880
लिए ही सही। तो

258
00:17:36,880 --> 00:17:40,880
तू यह क्यों सोचता है कि तेरे से ही प्रभावित होकर के इस

259
00:17:40,880 --> 00:17:44,960
दुनिया में सारे संसार में सारे कार्य हो रहे हैं। भाई आहान की नीव में

260
00:17:44,960 --> 00:17:49,200
है परंपरा प्राप्त आचार्यों को एक मंच पर लाना। उन्हें कम से कम

261
00:17:49,200 --> 00:17:53,200
सभी लोगों को किसी ना किसी परंपरा प्राप्त आचार्य आचार्य के सानिध्य में

262
00:17:53,200 --> 00:17:57,600
ले जाना। हमारा उद्देश्य यह नहीं है कि सबको केवल शंकराचार्य

263
00:17:57,600 --> 00:18:01,600
के ही सानिध्य में ले जाओ। जब हम उनके पास गए

264
00:18:01,600 --> 00:18:05,920
थे अभी वृंदावन तो गौडिया वैष्णव जो प्रामाणिक आचार्य

265
00:18:05,920 --> 00:18:10,160
जो थे उनके साथ हमने करीब एक डेढ़ घंटे वार्ता

266
00:18:10,160 --> 00:18:14,320
की थी उसमें अंत में हमने यही बोला था कि आप गौडिया वैष्णव से जुड़े

267
00:18:14,320 --> 00:18:19,440
तो प्रामाणिक से जुड़े हमने वहां यह तो नहीं कहा था नहीं आप शंकराचार्य से ही जुड़े

268
00:18:19,440 --> 00:18:23,600
तो हमारे काम करने का जो आधार है वही यह है

269
00:18:23,600 --> 00:18:27,760
कि हम सभी प्रामाणिक आचार्यों में एकत्व देखते हैं और धर्म स्थापना

270
00:18:27,760 --> 00:18:31,840
के लिए किसी भी प्रामाणिक आचार आचार्य से प्रत्येक सनातनी को जोड़ना

271
00:18:31,840 --> 00:18:35,920
ही हमारा उद्देश्य है। मगर प्रामाणिक आचार्य से स्वभोषित

272
00:18:35,920 --> 00:18:40,000
आचार्य या फिर तथाकथित कपोल कल्पित

273
00:18:40,000 --> 00:18:45,440
परंपराओं से नहीं प्रामाणिक परंपराओं से प्रामाणिक आचार्यों से

274
00:18:45,440 --> 00:18:49,440
और यदि इस सब के बाद भी तू

275
00:18:49,440 --> 00:18:52,160
अपने आप को क्रेडिट देना चाहता है कि

276
00:18:52,160 --> 00:18:56,400
हां भाई मेरी ही वजह से राघवाचार्य जी वहां पहुंचे शंकराचार्य जी से भेंट

277
00:18:56,400 --> 00:19:00,640
करने तो तुझे कौन सा क्रेडिट किस रूप में क्रेडिट

278
00:19:00,640 --> 00:19:04,880
मिलना चाहिए जिस प्रकार से रावण को क्रेडिट मिलना

279
00:19:04,880 --> 00:19:09,120
चाहिए श्री राम के जन्म का है

280
00:19:09,120 --> 00:19:13,440
ना जो तू अपना ढिंढोरा पीट रहा है तो अगर तुझे क्रेडिट

281
00:19:13,440 --> 00:19:17,440
दिया भी जाएगा दुर्जन न्याय से तो कौन सा क्रेडिट दिया जाएगा

282
00:19:17,440 --> 00:19:22,080
जैसे श्री राम जी के जन्म का क्रेडिट रावण को दिया जा सकता है

283
00:19:22,080 --> 00:19:26,320
अन्य राक्षसों को दिया जा सकता है जिनके वध के लिए

284
00:19:26,320 --> 00:19:30,400
जिनसे रक्षा करने के लिए मानवता की श्री राम जी का जन्म हुआ

285
00:19:30,400 --> 00:19:34,400
था प्राकट्य हुआ ऐसा क्रेडिट है तेरा अगर

286
00:19:34,400 --> 00:19:38,880
है तो और दूसरी बात के तूने अपने इस व्यक्ति ने

287
00:19:38,880 --> 00:19:42,960
अपने वक्तव्य में एक बात और कही एक बहुत अच्छा दृश्य देखने को मिला क्या

288
00:19:42,960 --> 00:19:47,280
अच्छा दृश्य भाई राघवाचार्य जी महाराज तेरे

289
00:19:47,280 --> 00:19:51,920
अनुसार कहां पर गए थे किसी समलैंगिक के पास किसी वैश्यागामी

290
00:19:51,920 --> 00:19:56,160
के पास किसी मलेच्छराज के दूत के पास भाई पूरी

291
00:19:56,160 --> 00:20:00,400
पीठ के परिकों से भी तो मिले वहां पर राघवाचार्य जी महाराज आशीर्वाद

292
00:20:00,400 --> 00:20:04,480
दिया बहुत सौ सौहार्दपूर्ण सौहार्दपूर्ण भेंट हुई

293
00:20:04,480 --> 00:20:08,000
तो भैया तेरे हिसाब से तो वो दृश्य गलत है ना

294
00:20:08,000 --> 00:20:12,000
और तो और पूरी के शंकराचार्य जी जो हिंदुओं के साथ छल कर

295
00:20:12,000 --> 00:20:16,000
रहे हैं हिंदुओं के साथ धोखा कर रहे हैं हिंदुओं की भावनाओं के साथ खेल रहे

296
00:20:16,000 --> 00:20:20,240
हैं वो अपनी दिव्य बातें बता करके और

297
00:20:20,240 --> 00:20:24,240
आत्म मुग्ध है अपने परिककरों के मुंह में धर्म अधर्म का वो

298
00:20:24,240 --> 00:20:28,320
निर्णय नहीं कर पा रहे हैं तुझे शर्म आ रही थी तूने अपने एक वीडियो में कहा

299
00:20:28,320 --> 00:20:32,400
था मुझे शर्म आती है मैं जो है लज्जित होता हूं कि मैंने कभी

300
00:20:32,400 --> 00:20:36,720
इस व्यक्ति का साथ दिया। ये सब बोला है ना पुरी शंकराचार्य जी के लिए। तो ऐसे

301
00:20:36,720 --> 00:20:41,120
गलत प्रांगण में तुम्हारे

302
00:20:41,120 --> 00:20:45,360
द्वारा जो मान्य आचार्य हैं हमारे द्वारा भी है। राघवाचार्य जी महाराज को देखकर

303
00:20:45,360 --> 00:20:49,680
तुझे प्रशंसा क्यों हो रही है? तुझे तो उनका खंडन करना चाहिए कि सम लैंगिकों

304
00:20:49,680 --> 00:20:53,760
के पास क्या कर रहे हैं? वह राघवाचार्य जी महाराज व्यभचारियों के पास

305
00:20:53,760 --> 00:20:57,760
क्या कर रहे हैं? वैशगामियों के पास क्या कर रहे हैं? गुंडों के पास क्या कर रहे हैं। आत्मों के

306
00:20:57,760 --> 00:21:01,920
पास क्या कर रहे हैं? घमंडी के पास क्या कर रहे हैं? मलेच्छ राज

307
00:21:01,920 --> 00:21:06,000
के दूतों के साथ वो क्या कर रहे हैं?

308
00:21:06,000 --> 00:21:11,280
क्यों? सुर बदल गए। इसको कहते हैं दोगलापन।

309
00:21:11,280 --> 00:21:15,680
बागेश्वर वालों से मिलने वालों के साथ वो क्या कर रहे हैं? राघवाचार्य जी महाराज

310
00:21:15,680 --> 00:21:19,760
भाई बागेश्वर वालों से जो मिल रहे हैं तूने क्या क्रम बताया था? कि

311
00:21:19,760 --> 00:21:23,120
भैया वो फलाना अब्दुल्ला मिल रहा है उससे और वो मिल रहा है उससे उससे

312
00:21:23,120 --> 00:21:27,280
मिल रहा है। बागेश्वर बागेश्वर से मिल रहा है। ये और उनसे मिल रहे हैं। ये

313
00:21:27,280 --> 00:21:31,360
ये मिलने पर तूने कटाक्ष क्यों नहीं किया? दुख प्रकट क्यों नहीं

314
00:21:31,360 --> 00:21:35,760
किया? प्रशंसा क्यों कर दी? यह सब इसका दोगलापन

315
00:21:35,760 --> 00:21:39,920
है। और यह यह नहीं बताता है कि इसकी छाती पर कितने सांप

316
00:21:39,920 --> 00:21:44,080
लौटे थे। जब इसने राघवाचार्य जी महाराज को वहां शंकराचार्य जी के पास

317
00:21:44,080 --> 00:21:48,560
देख लिया था। ये ये नहीं बताएगा। ये तो प्रशंसा दिखाएगा भूरी भूरी।

318
00:21:48,560 --> 00:21:52,880
हां। खैर जो भी हो एक बात तो साफ है कि

319
00:21:52,880 --> 00:21:57,040
यह जो आचार्य गण है हमारे मान्य आचार्य गण कोई भी इसको महत्ता नहीं देता है। इसकी

320
00:21:57,040 --> 00:22:01,440
बातों को महत्ता नहीं देता है और जो

321
00:22:01,440 --> 00:22:05,440
इसके द्वारा कही जाने वाले वक्तव्य हैं उनकी उनको कोई भी

322
00:22:05,440 --> 00:22:09,680
सत्य नहीं मानता है। क्यों? क्योंकि इसने पूरी पीठ पर देखिए कितने सारे आरोप

323
00:22:09,680 --> 00:22:13,760
लगाए थे। राघवाचार्य जी वहीं पर गए। उन्हीं लोगों के बीच सौहार्दपूर्ण

324
00:22:13,760 --> 00:22:18,160
तरीके से बैठे और वापस आए। कोई आपत्ति नहीं हुई इन्हें।

325
00:22:18,160 --> 00:22:22,560
उनहीं ऋषिकेश ब्रह्मचारी जी को उन्होंने आशीर्वाद दिया। ऋषिकेश ब्रह्मचारी

326
00:22:22,560 --> 00:22:28,560
जी ने उनके चरण स्पर्श किए।

327
00:22:29,750 --> 00:22:35,750
[संगीत]

328
00:22:47,990 --> 00:22:53,990
[प्रशंसा] [संगीत]

329
00:22:54,560 --> 00:22:57,070
हम

330
00:22:57,070 --> 00:23:03,070
[संगीत]

331
00:23:35,040 --> 00:23:37,970
हम

332
00:23:37,970 --> 00:23:43,970
[संगीत]

333
00:23:46,770 --> 00:23:52,400
[प्रशंसा]

334
00:23:52,400 --> 00:23:56,640
क्यों भाई ये व्यक्ति ये लोग तो इसके द्वारा

335
00:23:56,640 --> 00:24:00,720
अपराधी घोषित है ना वही सब लोग थे वहां पर तो

336
00:24:00,720 --> 00:24:05,040
क्या हुआ अगर इस पर विश्वास करते होते मान्य

337
00:24:05,040 --> 00:24:09,840
आचार्य गण वैष्णवाचार्य गण तो क्या वो वहां जाते

338
00:24:09,840 --> 00:24:14,160
वो तो वैसे ही दूरी बना के रखते जैसे कि पूज्य

339
00:24:14,160 --> 00:24:18,240
विद्या भास्कर जी महाराज ने मुझे बताया था अपनी चर्चा में बहुत

340
00:24:18,240 --> 00:24:22,320
मानते हैं पूरी के शंकराचार्य जी को और उन्होंने यह तक कहा

341
00:24:22,320 --> 00:24:26,320
कई विषयों में उन्होंने माना यह कहा वो अपनी श्रद्धा

342
00:24:26,320 --> 00:24:30,400
दिखाई गुरुदेव के प्रति कहा कि वर्तमान में धरती पर सबसे

343
00:24:30,400 --> 00:24:34,640
ज्यादा कुछ कई विषयों में उन्होंने कहा कि धरती पर सबसे

344
00:24:34,640 --> 00:24:38,720
ज्यादा विद्वान व्यक्ति वही है पूरी के शंकराचार्य और उन्होंने मुझे एक प्रकरण भी

345
00:24:38,720 --> 00:24:44,720
बताया कि नेपाल में कहीं पर

346
00:24:45,200 --> 00:24:49,200
कोई कथा होनी थी या कोई कार्यक्रम होना था जहां पर विद्या भास्कर जी महाराज को बुलाया

347
00:24:49,200 --> 00:24:53,200
गया था और उसी कार्यक्रम में उसी कार्यक्रम में पूरी

348
00:24:53,200 --> 00:24:57,360
के शंकराचार्य जी के नाम से अधोक्षजानंद को भी बुलाया गया था

349
00:24:57,360 --> 00:25:02,000
अधोक्षजानंद पर विद्या भास्कर जी महाराज को

350
00:25:02,000 --> 00:25:06,320
विश्वास नहीं है कि वो शंकराचार्य तो विद्या

351
00:25:06,320 --> 00:25:10,800
भास्कर जी महाराज ने साफ मना कर दिया कि

352
00:25:10,800 --> 00:25:14,880
भाई मैं नहीं जाऊंगा ऐसे कार्यक्रम में मैं नहीं आऊंगा जहां पर पूरी के शंकराचार्य जी के

353
00:25:14,880 --> 00:25:19,200
नाम से आप अधोजानंद जैसे व्यक्ति को बुलाओगे। पूरी के शंकराचार्य

354
00:25:19,200 --> 00:25:24,160
जी के रूप में हम जो वर्तमान पूरी पीठाधीश्वर हैं।

355
00:25:24,160 --> 00:25:28,240
मैं नाम नहीं ले सकता हूं गुरुदेव का। वही हम उन्हीं को

356
00:25:28,240 --> 00:25:32,320
जानते हैं। ऐसा विद्या भास्कर जी ने बताया उन लोगों को कि पूरी के शंकराचार्य जी

357
00:25:32,320 --> 00:25:36,400
के रूप में हम उन्हीं को जानते हैं। बाद में वहां के पोस्टर इत्यादि

358
00:25:36,400 --> 00:25:40,480
प्रचार सामग्री बदलवाई गई। उसके फोटोोटो हटाई गई। तब जाकर के विद्या

359
00:25:40,480 --> 00:25:44,480
भास्कर जी महाराज वहां गए। इसको कहते हैं

360
00:25:44,480 --> 00:25:48,800
मर्यादा और इसको कहते हैं सत्य निष्ठा। उनको

361
00:25:48,800 --> 00:25:52,800
विश्वास नहीं था अधुजनंद पर तो वह नहीं गए दूर हो

362
00:25:52,800 --> 00:25:57,200
गए अधुक्षानंद से। और इसी प्रकार से

363
00:25:57,200 --> 00:26:00,400
यदि उन्हें विश्वास होता भागवत आनंद पर तो वो दूर

364
00:26:00,400 --> 00:26:04,400
हो जाते राघवाचार्य जी महाराज और आज राघवाचार्य जी महाराज गए

365
00:26:04,400 --> 00:26:08,640
हैं। भगवान ने चाहा तो कुछ समय में जैसे ही संयोग होगा तो पूज्य विद्या भास्कर

366
00:26:08,640 --> 00:26:12,720
जी महाराज भी दिखाई देंगे। वहीं पर दोनों आचार्य गण हमें एक साथ

367
00:26:12,720 --> 00:26:18,640
दिखाई देंगे। शंकराचार्य और वैष्णवाचार्य

368
00:26:18,640 --> 00:26:23,520
तो अगर भागवतानंद की बातों को महत्ता देते

369
00:26:23,520 --> 00:26:28,240
ऐसे मान्य आचार्य गण तो क्या यह दृश्य

370
00:26:28,240 --> 00:26:32,400
हम लोगों को देख हम लोगों के लिए देख पाना संभव हो पाता जो हमने अभी

371
00:26:32,400 --> 00:26:36,480
दृश्य देखे तो यह बात भी क्लियर हो गई। हां यह हो सकता है कि

372
00:26:36,480 --> 00:26:41,440
कई विषयों में आचार्य गण कुछ कारणों से जैसे कि

373
00:26:41,440 --> 00:26:45,440
जो ज्योतिष पीठ वाले महाराज जी उन्होंने बोला था ना कि कई बार हमें

374
00:26:45,440 --> 00:26:49,600
सह लेना पड़ता तो कुछ बातों में मौन तो धारण कर सकते हैं। यह

375
00:26:49,600 --> 00:26:54,240
हो सकता है कि कुछ बातों में मौन हो जाए। परंतु

376
00:26:54,240 --> 00:26:58,320
इस पर विश्वास नहीं है। यह उन्होंने एक्शन स्पीक्स लाउडर

377
00:26:58,320 --> 00:27:02,400
देन वॉइस। यह कहावत है ना एक्शन स्पीक्स

378
00:27:02,400 --> 00:27:06,880
लाउडर देन वॉइस। तो आपके जो आचरण है कर्म है

379
00:27:06,880 --> 00:27:10,960
वह आपकी वॉइस से भी ज्यादा बोलते हैं। तो आचार्य गणों

380
00:27:10,960 --> 00:27:15,200
ने अगर कुछ बोला नहीं कई बार आचार्य गण कुछ बोलते नहीं है बल्कि कुछ ऐसा

381
00:27:15,200 --> 00:27:15,700
कर देते

382
00:27:15,680 --> 00:27:20,400
हैं जिससे कि हमें संदेश प्राप्त हो जाते हैं। एक और ये व्यक्ति

383
00:27:20,400 --> 00:27:24,400
स्वयं को बहुत बड़े ज्ञानी के रूप में प्रचारित कर करता है और

384
00:27:24,400 --> 00:27:28,560
हो भी सकता है। भाई संस्कृत का ज्ञान है। भाषा का ज्ञान हो सकता है

385
00:27:28,560 --> 00:27:32,720
और वस्तुनिष्ठता से शास्त्रों का ज्ञान हो सकता है कि कहां क्या लिखा

386
00:27:32,720 --> 00:27:36,720
है। परंतु किस प्रमाण का उपयोग कहां पर

387
00:27:36,720 --> 00:27:40,800
करना है वह तर्क बुद्धि तर्कशील और किसका किस सिद्धांत

388
00:27:40,800 --> 00:27:44,880
का पर्यावसान कैसे लेना है वो यह सारे जो बातें हैं

389
00:27:44,880 --> 00:27:49,120
यह सारी बातें गुरुगम्य विद्या होती है मनुष्य चाहे

390
00:27:49,120 --> 00:27:53,200
चारों वेद पढ़ ले सारे पुराण पढ़ ले सारे उपनिषद

391
00:27:53,200 --> 00:27:57,200
पढ़ ले जप तप व्रत दान पुण्य

392
00:27:57,200 --> 00:28:01,760
तीर्थ यज्ञ सब कुछ व्यर्थ है अगर कोई प्रामाणिक

393
00:28:01,760 --> 00:28:06,000
आचार्य गुरु नहीं तो स्कंद पुराण में लिखा है। तो यह

394
00:28:06,000 --> 00:28:10,080
अगर सारे पढ़ भी ले रहा है तो इसकी क्योंकि गुरुगम्य विद्या नहीं

395
00:28:10,080 --> 00:28:14,640
है। इसका कोई गुरु नहीं है। जो जिनको ये गुरु बता रहा है उसको हम देख देखते जाइए। पोस्टमार्टम

396
00:28:14,640 --> 00:28:18,640
चल रहा है ना देख ही रहे होंगे निगमंद इत्यादि के विषय में। तो

397
00:28:18,640 --> 00:28:22,880
खैर गुरुगम्य विद्या होती है। आप पढ़ लो रट लो। मगर फिर भी

398
00:28:22,880 --> 00:28:27,120
चीजों को कहां कैसे समझना है उसके लिए गुरु का सानिध्य आवश्यक

399
00:28:27,120 --> 00:28:32,480
होता है जो इसके पास है नहीं क्योंकि स्वयंभू है। तो

400
00:28:32,480 --> 00:28:36,800
यह व्यक्ति स्वयं को बड़ा विद्वान प्रचारित तो करता है। परंतु

401
00:28:36,800 --> 00:28:42,480
वास्तविकता यही है कि इन आचार्यों के मध्य इसकी जो

402
00:28:42,480 --> 00:28:46,560
स्थिति है वो बस एक ऐसे

403
00:28:46,560 --> 00:28:50,640
है जैसे कोई विनोद मात्र का विषय ऐसे

404
00:28:50,640 --> 00:28:55,120
अन्य कई आचार्य हैं। उनके यहां की मैं बात कर रहा हूं। कई अंदर के लोगों ने मुझे बताया भी है

405
00:28:55,120 --> 00:28:59,360
कि इसके लिए ऐसा होता है कि कोई आचार्य हैं। उनको कोई विवाद का विषय दिखाई

406
00:28:59,360 --> 00:29:03,360
दिया और उनको विनोद गमन है तो उन्होंने कहा

407
00:29:03,360 --> 00:29:08,320
भैया इसको ऐसा करो उसको भेज दो

408
00:29:08,320 --> 00:29:12,320
भागवत आनंद को इसको भेज दो आनंद आ जाएगा

409
00:29:12,320 --> 00:29:16,720
और हंसते हैं ठका मार के तो जैसे कोई नहीं अपने

410
00:29:16,720 --> 00:29:20,800
शान को पाल के रखता है तो कोई किसी के साथ अटखेली करनी

411
00:29:20,800 --> 00:29:24,800
किसी को डराना है तो जो ही टोमी छू तो

412
00:29:24,800 --> 00:29:29,040
इस तरह से भी ऐसे कई आचार्य गण हैं जिनके

413
00:29:29,040 --> 00:29:33,120
मध्य यह विनोद का विषय मात्र है और

414
00:29:33,120 --> 00:29:37,680
वहां के लोगों ने हमें ये चीजें बताई है कि इनकी क्या स्थिति है प्रामाणिक

415
00:29:37,680 --> 00:29:42,000
आचार्यों के यहां पर इनकी और इस तरह से

416
00:29:42,000 --> 00:29:46,080
शान की तरीके से इस तरह से पालतू शान की तरीके

417
00:29:46,080 --> 00:29:47,920
से उपयोग में ले लेने के बाद

418
00:29:47,920 --> 00:29:52,080
वो आचार्य गण उसी तरह से मुस्कुराते हैं। वह जो हंसी

419
00:29:52,080 --> 00:29:56,080
होती है उनके चेहरे पर विनोद वाली कि जैसे मान लीजिए कोई फोटो

420
00:29:56,080 --> 00:30:00,160
आई कि यह फोटो पर विवाद हो रहा है। अच्छा इसको भागवतानंद

421
00:30:00,160 --> 00:30:04,480
को भेज दो आनंद आ जाएगा। तो इस तरह से भी आचार्य

422
00:30:04,480 --> 00:30:08,560
गणों के यहां पर होता है। तो फिर वो वैसे ही उनके चेहरे पर मुस्कान दिखाई देती

423
00:30:08,560 --> 00:30:12,560
है जैसे विष्णु भगवान की मुस्कान दिखाई देती है। जब वो अपनी शैया पर लेटे होते हैं

424
00:30:12,560 --> 00:30:16,880
प्रपंच रूपी संसार को रच के और जीवों को देख रहे होते हैं भटकते हुए।

425
00:30:16,880 --> 00:30:21,200
तो उसी तरीके से वह आचार्य गण हास्य का आनंद लेते हैं। विनोद

426
00:30:21,200 --> 00:30:25,360
का आनंद लेते हैं। मात्र इतनी इसकी स्थिति है

427
00:30:25,360 --> 00:30:29,360
प्रामाणिक आचार्यों के मध्य जो बाहर ऐसा दिखाई देगा ऐसा

428
00:30:29,360 --> 00:30:33,520
प्रतीत होता है कि भैया बहुत माना जाता है और वो अपने उस

429
00:30:33,520 --> 00:30:37,520
जो वो जो विनोद का विषय है ना उसको

430
00:30:37,520 --> 00:30:42,400
संरक्षित रखने के लिए कभी दो बोल बोल भी देते हैं उसके पक्ष में

431
00:30:42,400 --> 00:30:46,480
समय आने पर तो ऐसे भी आचार्य गण

432
00:30:46,480 --> 00:30:51,360
है तो इसकी स्थिति यही है अब बात ये आती है

433
00:30:51,360 --> 00:30:55,360
जब मैं वहां पर गया तो विद्या भास्कर जी महाराज ने

434
00:30:55,360 --> 00:30:59,520
मुझे बहुत स्नेह और प्रेम दिया और ऐसे प्रामाणिक

435
00:30:59,520 --> 00:31:03,600
आचार्य द्वारा इतनी कृपा प्राप्त हो जाना मेरे जीवन

436
00:31:03,600 --> 00:31:07,600
का मतलब क्या कहूं मैं एक बड़ा अचीवमेंट

437
00:31:07,600 --> 00:31:11,920
होता है ना कि किसी के जीवन में होता है कि मैंने कुछ पा लिया तो ऐसा कुछ मुझे

438
00:31:11,920 --> 00:31:16,240
वहां जब मैं उस दिन उनके पास गया तो उन्होंने जो मुझे जो अपना स्नेह

439
00:31:16,240 --> 00:31:20,400
प्रेम जो प्रदान किया वह तो मेरे जीवन का एक अचीवमेंट

440
00:31:20,400 --> 00:31:24,800
है एक उपलब्धि जो मैं वहां जाकर के मुझे प्राप्त हुई। उन्होंने मुझे धोती

441
00:31:24,800 --> 00:31:28,800
दी। उन्होंने मुझे राशि भी

442
00:31:28,800 --> 00:31:33,200
प्रदान करी धोती बांध करके जो मुझे बाद में मिला और जाते ही मुझे जो है

443
00:31:33,200 --> 00:31:37,680
भोजन प्रसाद इत्यादि सब प्राप्त हुआ और बहुत

444
00:31:37,680 --> 00:31:43,680
मन से और समय देकर उन्होंने मेरी बातों को सुना।

445
00:31:48,830 --> 00:31:54,830
[संगीत]

446
00:32:04,000 --> 00:32:08,400
रामपाल इत्यादि के विषय में भी उनसे बात हुई और

447
00:32:08,400 --> 00:32:12,560
इस के विषय में भी बात हुई कुछ अभी वो नरसिम्हा मूवी को लेकर के बात चल

448
00:32:12,560 --> 00:32:16,720
रही है तो उसमें भी बात हुई और हां फिर मैंने भागवतानंद

449
00:32:16,720 --> 00:32:20,720
के बारे में अपनी कुछ चीजें रेज की तो उसमें काफी तर्क वितर्क भी हुए वहां पर कई

450
00:32:20,720 --> 00:32:24,800
और भी उनके शिष्य उपस्थित थे वो भी अच्छा उनके उनके

451
00:32:24,800 --> 00:32:30,800
शिष्य भी उपस्थित थे। वो भी उस चर्चा को सुन रहे थे।

452
00:32:31,280 --> 00:32:36,320
तो कई बार जैसे सबसे पहली बात तो मैंने यही कहा

453
00:32:36,320 --> 00:32:40,800
महाराज जी को कि महाराज जी वो असिद्ध आरोप लगाता है। गुप्तचरों

454
00:32:40,800 --> 00:32:44,880
से प्राप्त हुआ है समाचार। मगर वो कौन गुप्तचर

455
00:32:44,880 --> 00:32:48,880
है? वह कौन सा प्रमाण है? वह सब नहीं बताता है। असिद्ध आरोप लगाता

456
00:32:48,880 --> 00:32:53,360
है। जिन जिनसे किसी भी बात की पुष्टि नहीं होती है। तो महाराज जी ने

457
00:32:53,360 --> 00:32:57,440
महाराज जी हसे थोड़ा सा फिर बोले कि गुप्तचरों का कोई

458
00:32:57,440 --> 00:33:01,440
नाम थोड़ी ना बताता है। तो फिर मैंने बताया कि महाराज जी वह तो बात सही है

459
00:33:01,440 --> 00:33:05,440
कि गुप्तचरों का नाम नहीं बताता है। परंतु गुप्तचरों को प्रमाण के रूप

460
00:33:05,440 --> 00:33:09,520
में उपयोग में भी तो नहीं लिया जा सकता। गुप्तचर इसलिए

461
00:33:09,520 --> 00:33:13,600
होते हैं कि भाई हम प्रमाण इकट्ठा कर ले। ठीक है? गुप्तचरों ने गुप्तचरी

462
00:33:13,600 --> 00:33:17,600
कर दी। जैसे अभी कल परसों की बात है। यहां पर बजरंग दल

463
00:33:17,600 --> 00:33:21,760
वालों की टीम ने हमारा साथ भी दिया उस टीम ने। उसी टीम ने यहां पर

464
00:33:21,760 --> 00:33:25,920
गौ मांस का गौ मांस को इधर से उधर स्थानांतरित

465
00:33:25,920 --> 00:33:30,320
किया जा रहा था। गुप्तचरी से उन्हें सूचना प्राप्त हुई और उन्होंने जाकर धरपकड़

466
00:33:30,320 --> 00:33:34,400
कर ली और पकड़वा दिया उनको। कोई व्यक्ति था जो अपनी

467
00:33:34,400 --> 00:33:38,400
जीप में धर कर ले जा रहा था। अब गुप्तचरी की सुन के ही हम कह

468
00:33:38,400 --> 00:33:42,560
देते कि ये व्यक्ति ऐसा करता है तो उस व्यक्ति पर कोई कारवाई हो पाती नहीं हो पाती। मगर गुप्तचरी

469
00:33:42,560 --> 00:33:46,720
के माध्यम से उस व्यक्ति तक पहुंचा गया और वहां पर उसको

470
00:33:46,720 --> 00:33:51,120
प्राप्त किया गया। तो इस बात को सुना महाराज जी ने कि

471
00:33:51,120 --> 00:33:55,120
जब हमने यह वाली बात कही कि गुप्तचरों को प्रमाण के रूप में उपयोग में

472
00:33:55,120 --> 00:33:59,120
नहीं लिया जा सकता। महाराज जी ने सुना हमारी बात सुनी और

473
00:33:59,120 --> 00:34:03,280
फिर हमने बताया कि महाराज जी ने वहीं पर हमको एक बात बताई थी एक दैवीय घटना

474
00:34:03,280 --> 00:34:07,440
उनके संभवत उनके गुरु की जो माताजी थी वो

475
00:34:07,440 --> 00:34:11,680
80 वर्ष की आयु में भी जो है अपने बालक को स्तनपान

476
00:34:11,680 --> 00:34:16,400
कराती थी 80 वर्ष की आयु में तो वो एक दिव्य दैय

477
00:34:16,400 --> 00:34:20,960
एक उनके पास सामर्थ्य था और साक्षात

478
00:34:20,960 --> 00:34:26,000
भगवान के दर्शन भी कराते थे ऐसा भी आचार्य श्री ने बताया

479
00:34:26,000 --> 00:34:28,480
तो

480
00:34:28,480 --> 00:34:33,280
इसी प्रकार की जो पूरी के शंकराचार्य जी की घटनाएं हैं या जिसका भी

481
00:34:33,280 --> 00:34:37,680
उपहास बनाना होगा भागवत आनंद को इस प्रकार की घटनाओं

482
00:34:37,680 --> 00:34:41,680
का आधार लेकर के आर्य समाजियों की भाषा में वो उपहास उड़ाता है। मैंने यह भी बात

483
00:34:41,680 --> 00:34:45,680
कही। फिर यह भी ये भी मैंने कहा महाराज जी से

484
00:34:45,680 --> 00:34:50,000
कि अब स्वयं कहता है कि भागवती मुझे स्वयं आकर के पढ़ाती है। स्वयं

485
00:34:50,000 --> 00:34:54,720
लोगों को श्राप दे देता है। फिर वह श्राप कोई कार्य नहीं कर पाता है।

486
00:34:54,720 --> 00:34:58,720
बहुत सी चमत्कारिक बातें बोलता है स्वयं पर वह

487
00:34:58,720 --> 00:35:01,840
सारी चमत्कारिक बातों को अगर उस तरह से देखा जाए तो सब

488
00:35:01,840 --> 00:35:06,160
धूमिल हो जाती है। परंतु पूरी के शंकराचार्य जी की ऐसी ही बातों को लेकर के

489
00:35:06,160 --> 00:35:10,480
और जो है बातें बनाता है और यह जैसे दय बात विद्या

490
00:35:10,480 --> 00:35:14,480
भास्कर जी महाराज ने भी अपने वो गुरु और उनकी माता जी के बारे

491
00:35:14,480 --> 00:35:18,560
में बताई तो वो समय आने पर इन इस प्रकार से

492
00:35:18,560 --> 00:35:22,640
तो इन बातों का भी मजाक बना सकता है। आर्य समाजियों

493
00:35:22,640 --> 00:35:26,720
के दृष्टिकोण से अभी देखने लग जाइए। इन सब बातों को तुरंत मजाक बनाया जा सकता है।

494
00:35:26,720 --> 00:35:30,880
तो वह तो केवल कहने की शैली है। अगर

495
00:35:30,880 --> 00:35:34,960
केवल शैली को आप बदल दें कहने की वक्तव्य निर्गत करने

496
00:35:34,960 --> 00:35:39,040
की तो उसी से ही किसी भी गंभीर बात

497
00:35:39,040 --> 00:35:43,360
को उपस में भी बदला जा सकता है। जैसे वो

498
00:35:43,360 --> 00:35:47,600
शब्द है ना कि एक अच्छा अब इसको कहने का भाव अगर बदल

499
00:35:47,600 --> 00:35:51,600
जाए अच्छा है। अच्छा है। अब अच्छा शब्द का उपयोग किस में हुआ? हां अच्छा है।

500
00:35:51,600 --> 00:35:56,160
ठीक है। सही है। फिर अच्छा ये क्या हुआ

501
00:35:56,160 --> 00:36:00,480
कि क्रोध दिखा रहा है। अच्छा अब तुम हमारे साथ ऐसे करोगे। फिर अच्छा

502
00:36:00,480 --> 00:36:05,120
आश्चर्य हो गए। देखा होगा लोगों ने ये वाला सीन अच्छा है। अच्छा है।

503
00:36:05,120 --> 00:36:09,280
तो एक ही शब्द का केवल कहने के भाव को अगर बदल

504
00:36:09,280 --> 00:36:13,280
दे तो उसमें जो है वो गंभीर बात उपहास हो सकती

505
00:36:13,280 --> 00:36:17,520
है। उसमें विस्मयादि बोधक हो सकता है। सब हो सकते हैं। उसी शब्द का उपयोग।

506
00:36:17,520 --> 00:36:21,680
तो इस बात को भी उन्होंने समझा कि वह इस तरह से उपहास

507
00:36:21,680 --> 00:36:25,760
जो बनाता है आचार्यों का उनकी उनसे उनके जीवन से जुड़ी

508
00:36:25,760 --> 00:36:30,720
हुई जो दय बातें होती है। फिर इसके बाद एक

509
00:36:30,720 --> 00:36:34,880
बहुत ठोस बात आई जिसमें कि आचार्य जी ने सहमति

510
00:36:34,880 --> 00:36:40,240
भी जताई। केवल सुनी नहीं। वो ठोस बात थी कि

511
00:36:40,240 --> 00:36:44,480
मैंने कहा कि वो कोई व्यक्ति है अगर और वह साधना

512
00:36:44,480 --> 00:36:48,480
मार्ग में आने से पहले या प्रामाणिक आचार्यों की शरण

513
00:36:48,480 --> 00:36:52,720
में आने से पहले उसका अमुक जीवन रहा हो, कोई गलती रही हो, कुछ किया हो उसने।

514
00:36:52,720 --> 00:36:56,720
परंतु वह व्यक्ति जब प्रामाणिक आचार्यों के सानिध्य में आ गया है और अपने जीवन को

515
00:36:56,720 --> 00:37:00,800
परिवर्तन परिवर्तित कर रहा है। तो ऐसे में यह पुराने जीवन के

516
00:37:00,800 --> 00:37:04,800
आधार पर उसकी टांग खींचता है। वहीं पर जब इसकी

517
00:37:04,800 --> 00:37:08,960
गुरु परंपरा में इसने जो निगमंद नाम बताया है उनके विषय

518
00:37:08,960 --> 00:37:12,960
में बहुत सारी बातें चल रही है। थियोसफिकल सोसाइटी इत्यादि सब कुछ चल रहा है। तो वहां

519
00:37:12,960 --> 00:37:17,120
पर खुद ही कहता है कि वो वहां वहां गए थे। वहां के हो के नहीं रह गए थे

520
00:37:17,120 --> 00:37:21,360
और साधना मार्ग में आने से पहले गए थे। यह सब बातें इसने बोल दी। हां।

521
00:37:21,360 --> 00:37:25,520
हालांकि साधना मार्ग में आने के बाद की बात है जब वो थियोसफिकल सोसाइटी गए

522
00:37:25,520 --> 00:37:29,840
हैं। हम मगर फिर भी अगर इसकी

523
00:37:29,840 --> 00:37:32,560
बात को मान लिया जाए कि साधना मार्ग में आने से पहले गए

524
00:37:32,560 --> 00:37:36,640
थे। तो भाई जब यह साधना मार्ग में आने से पहले

525
00:37:36,640 --> 00:37:40,800
निगमानंद जी के लिए दोष दृष्टि से नहीं देखता है। साधना मार्ग

526
00:37:40,800 --> 00:37:45,040
में जाने से पहले को दोष दृष्टि से नहीं देखता है। तो किसी और के साधना

527
00:37:45,040 --> 00:37:49,040
मार्ग में जाने आने से पहले को पहले के विषयों को

528
00:37:49,040 --> 00:37:53,360
दोष दृष्टि से क्यों देखता है? जब आज वो व्यक्ति जीवन को सुधारना चाहता

529
00:37:53,360 --> 00:37:57,600
है। जब आज वो व्यक्ति प्रामाणिक आचार्य के सानिध्य में आकर के स्वयं को बदल

530
00:37:57,600 --> 00:38:01,600
रहा है। तो वो क्यों दोष दृष्टि से देख रहा है? और यदि देख रहा

531
00:38:01,600 --> 00:38:05,680
है तो वो निगमंद को क्यों नहीं देख रहा है? तो जब मैंने ये वाली बात कही तो

532
00:38:05,680 --> 00:38:09,760
महाराज जी ने सहमति जताई कि हां ये बात पूछने की है।

533
00:38:09,760 --> 00:38:13,840
तो यह बात उन्होंने हमारी इससे सहमति भी जताई और जो पहले

534
00:38:13,840 --> 00:38:17,840
वाली बातें हैं उसमें भी उन्होंने हमारी सारी

535
00:38:17,840 --> 00:38:21,840
बातें सुनी कि भाई किसी स्त्री को वैश्या बोल दे रहे हो

536
00:38:21,840 --> 00:38:25,840
जबकि सिद्ध करने के लिए कुछ नहीं है। तो ये सारी बातें उन्होंने सुनी।

537
00:38:25,840 --> 00:38:29,840
मैंने यह भी कहा कि वाकस्खलन कहता है। वाकस्खलन बोलता है कि

538
00:38:29,840 --> 00:38:33,840
मुझे देवी से वरदान प्राप्त है। भाई तुम दूसरों की दिव्यानुभूति

539
00:38:33,840 --> 00:38:37,840
पर बात कर रहे हो। तुम्हारी भी तो कुछ है चीजें। भगवती से मुझे वरदान प्राप्त है।

540
00:38:37,840 --> 00:38:41,840
वाक मेरा कर्म इंद्रियों से कोई गलती नहीं होगी। फिर वाकस्खलन

541
00:38:41,840 --> 00:38:46,560
हो जाता है। तो इस तरीके से

542
00:38:46,560 --> 00:38:47,600
सारी बातें उन्होंने

543
00:38:47,600 --> 00:38:52,000
सुनी और मुझे बहुत समय दिया। मुझे बहुत सारा स्नेह, प्रेम, दुलार

544
00:38:52,000 --> 00:38:56,160
सब कुछ प्राप्त हुआ वहां से। मैं उनका सदैव ऋणी रहूंगा। इन सब बातों के लिए

545
00:38:56,160 --> 00:39:00,480
इतना सारा वैष्णवाचार्य परम वैष्णवाचार्य के द्वारा मुझ जैसे एक

546
00:39:00,480 --> 00:39:05,680
तुच्छ व्यक्ति को समय मिला और

547
00:39:05,680 --> 00:39:10,000
उनके द्वारा स्थापित एक मंदिर भी गए थे हम लोग वहां बहुत अच्छा दर्शन

548
00:39:10,000 --> 00:39:14,400
किया हमने श्री राम दरबार था और वहां पर शेषनाग

549
00:39:14,400 --> 00:39:18,640
भी थे और बहुत अच्छा विग्रह था भगवान का तो हमने

550
00:39:18,640 --> 00:39:22,640
वहां पर उनके कई और प्रामाणिक शिष्यों से भी भेंट हुई तो सब कुछ अच्छा रहा

551
00:39:22,640 --> 00:39:26,800
और हमने बताया बस मेरा एक निवेदन है जो मैं वहां कर नहीं पाया। आगे

552
00:39:26,800 --> 00:39:31,200
जाऊंगा तो करूंगा भी या फिर किसी प्रकार से अभी संपर्क में संपर्क

553
00:39:31,200 --> 00:39:36,560
करके जो अपनी बात पहुंचाऊंगा। इस वीडियो के माध्यम से भी बोल ही दे रहा हूं कि

554
00:39:36,560 --> 00:39:40,960
मुझे ऐसा लग रहा है कि महाराज जी हैं जो एक बार हमारी चर्चा जो है

555
00:39:40,960 --> 00:39:45,280
भागवतानंद के साथ सौहार्दपूर्ण मतलब उसमें पहले से एक

556
00:39:45,280 --> 00:39:49,520
वैमनसता भर के ना ले जाने वाले दृष्टिकोण के साथ एक

557
00:39:49,520 --> 00:39:53,680
चर्चा वो कराने का संभवत आगे भविष्य में सोच सकते हैं। ऐसा अभी

558
00:39:53,680 --> 00:39:57,760
वर्तमान में विचार हो तो मैं अपनी ओर से यह बात कहूंगा आचार्य जी

559
00:39:57,760 --> 00:40:01,920
से कि आचार्य जी आप अपने समक्ष भागवतानंद

560
00:40:01,920 --> 00:40:02,880
को बुलाकर

561
00:40:02,880 --> 00:40:07,040
और इन विषयों में जो भी विषय प्रासंगिक है उन विषयों

562
00:40:07,040 --> 00:40:11,120
में उसको सामने से बिठाकर मेरी सीधे उससे एक चर्चा आप

563
00:40:11,120 --> 00:40:15,200
करवा दें कि वो जो यह सिद्ध आरोप जो लगा रहा है वो कितने

564
00:40:15,200 --> 00:40:19,440
पुष्ट है अ या फिर

565
00:40:19,440 --> 00:40:23,440
उसको जो और जो लेकर के प्रासंगिक प्रश्न है वो वो कितने आवश्यक है कितने

566
00:40:23,440 --> 00:40:27,520
महत्वपूर्ण है और उनके क्या परिणाम है उनके क्या निराकरण है इस

567
00:40:27,520 --> 00:40:31,600
पर फिर क्योंकि वह भाई सब पर बात कर रहा है तो थोड़ी बहुत बातें हमें

568
00:40:31,600 --> 00:40:35,680
भी करने का अधिकार है तो वो जो उसकी परंपरा है या उसकी ये सब

569
00:40:35,680 --> 00:40:39,600
चीजें जो वो कह रहा है जैसे कि

570
00:40:39,600 --> 00:40:43,680
परिसाधना इत्यादि दे रहा है जब वो लोगों को तो वैदिक आचार्य कैसे

571
00:40:43,680 --> 00:40:47,760
है मान लिया कि उसने स्वयं ने नहीं की। यद्यपि उसने

572
00:40:47,760 --> 00:40:52,160
आवश्यकता होना प्रकट किया अपने वीडियोस में कि मुझे उसकी आवश्यकता

573
00:40:52,160 --> 00:40:56,160
थी परंतु समय के कारण समय के अभाव के कारण मैं नहीं कर पाया यह

574
00:40:56,160 --> 00:41:00,240
वो खुद बोला दूसरी बात उसको यह मंत्र इत्यादि प्राप्त कहां से हो रहे हैं अगर

575
00:41:00,240 --> 00:41:04,240
प्रामाणिक हैं तो प्रामाणिक कहां से हैं प्रामाणिक नहीं है तो वो आगे क्यों प्रोसीड

576
00:41:04,240 --> 00:41:09,520
कर रहा है ये बहुत सी बातें मुझे नहीं लगता कि हमारे मान्य वैष्णवाचार्य हैं

577
00:41:09,520 --> 00:41:13,520
विद्या भास्कर जी महाराज सर के और राघवाचार्य जी महाराज सरी के वह इस तरह

578
00:41:13,520 --> 00:41:17,600
की सामग्री को आगे प्रदान करते होंगे और यहां तक कि इसने तो यह तक

579
00:41:17,600 --> 00:41:18,100
कहा है

580
00:41:17,920 --> 00:41:22,320
अपने एक वीडियो में कि राघवाचार्य जी को भी ऐसी कालिया जिनो परिधना

581
00:41:22,320 --> 00:41:26,400
जैसी साधनाओं की आवश्यकता पड़ी थी। तो यह भी एक बात है भाई कि मुझे

582
00:41:26,400 --> 00:41:30,400
नहीं लगता राघवाचार्य जी महाराज एस इस साधना को मांग सकते हैं। किसी

583
00:41:30,400 --> 00:41:34,400
को दिलवा सकते हैं। तो यह सारी चीजें हैं। मेरा निवेदन यही

584
00:41:34,400 --> 00:41:38,720
रहेगा। आचार्य श्री से आगे भविष्य में मिलूंगा संपर्क में जाऊंगा कि भाई वो

585
00:41:38,720 --> 00:41:42,800
इनसे जो है भागवत आनंद से मेरी एक चर्चा सौहार्दपूर्ण

586
00:41:42,800 --> 00:41:47,040
वाली। पहले से कोई वैमनसता को एक साइड रख के है तो मगर

587
00:41:47,040 --> 00:41:51,040
उसको एक साइड रख के कि हम भैया आज समझने जा रहे हैं कि सामने वाला कहना क्या

588
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चाहता है। इस दृष्टि से वह चाहे यदि वैसे वह तो चाह लेंगे तो

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हो ही जाएगा यदि वह अब वह बात अलग है कि भागवतानंद फिर

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इनसे भी वही कार्य करने लगे दूर मतलब

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फिर इनके इनकी मानना भी करने पड़ गए वो बात अलग है कि क्योंकि

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भागवतानंद का मुझे भरोसा नहीं है वो किसी के भी साथ कोई भी व्यवहार कर

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सकता है उससे पटरी नहीं खाएगी तो और इन सब बातों का निराकरण तभी हो सकता है

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जब जिस समय ये सब बातें उठ रही हो तो एक के बाद एक के बाद एक वहीं की वही

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वहीं की वहीं हर बात आपको हर बात का निराकरण प्राप्त हो जाए। तो इस निवेदन

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के साथ ही मैं अपनी वाणी को विराम देते हुए वीडियो को समाप्त

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करता हूं। जय श्री राम। जय श्रीमन नारायण।

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[संगीत]
