1
00:00:00,240 --> 00:00:04,560
अपना परिचय दे दें यहां का परिचय देते हुए जननी जगदंबा की

2
00:00:04,560 --> 00:00:08,640
साक्षात्कार उनकी पत्नी की मूर्ति से प्राप्त किए शूद्र कुल

3
00:00:08,640 --> 00:00:12,640
में जन्म लेता है तो बाद में कर्म के अनुसार जो है वो ब्राह्मण

4
00:00:12,640 --> 00:00:16,800
भी बन सकता है जाते हुए आकर के

5
00:00:16,800 --> 00:00:20,800
इलाहाबाद में गुरु जी के पास पहुंचा और वहां परमहंसोपाधि

6
00:00:20,800 --> 00:00:25,120
को प्राप्त किए। विदेश यात्रा का क्या निषेध है?

7
00:00:25,120 --> 00:00:29,120
कर सकते हैं। जा सकते हैं। क्रिश्चियन पप के रूप में भी

8
00:00:29,120 --> 00:00:33,120
आए हैं। क्रिश्चियन पॉप के रूप में आए हैं। कौन कहना है?

9
00:00:33,120 --> 00:00:37,200
इसन वाले भी यही कहते हैं। इस वाले भी इस जानते

10
00:00:37,200 --> 00:00:41,280
हैं आप इस वाले आते हैं कभी-कभी आपके यहां जो थियोसोफिकल

11
00:00:41,280 --> 00:00:45,920
सोसाइटी के फाउंडर उस गौतम ऋषि बाद में इसी

12
00:00:45,920 --> 00:00:50,000
रूप में आकर के जगत में जन कल्याण किए। मोहम्मद भी

13
00:00:50,000 --> 00:00:54,240
क्या कोई श्री अमृतानंद सरस्वती जी भी शिष्य हैं क्या निगमानंद

14
00:00:54,240 --> 00:00:58,480
जी के अमृतानंद सरस्वती पूर्व शरीर में कोई

15
00:00:58,480 --> 00:01:02,560
बार क्रिश्चियन धर्मुरु बने आपके सारस्वत मंदिर में जो

16
00:01:02,560 --> 00:01:06,640
विग्रह होता है जी वो निगमानंद जी का ही होता

17
00:01:06,640 --> 00:01:10,720
है सबसे जो मेन मंदिर होता है वो गुरु जी की मूर्ति प्रतिष्ठा की

18
00:01:10,720 --> 00:01:14,720
है क्या लाखों बाबाओं हमको क्या और उनके

19
00:01:14,720 --> 00:01:15,520
अनुयाय उनको

20
00:01:15,520 --> 00:01:20,240
मानते रहे हम कहां हाथ पकड़ने जाते लेकिन लेकिन

21
00:01:20,240 --> 00:01:24,320
उनके नाम पर हमारी मर्यादा को दूषित करना रामकृष्ण जी

22
00:01:24,320 --> 00:01:28,320
की मूर्ति के सामने उनके मूर्ति को लाकर प्रतिष्ठित करना ये

23
00:01:28,320 --> 00:01:32,400
तो उन्माद है इसका नाम धर्म नहीं है तो व्यापार है लेकिन सिद्ध

24
00:01:32,400 --> 00:01:36,640
है इसीलिए अरे सिद्ध है तो लाखों सिद्ध हुए हैं आज ही पहले कोई

25
00:01:36,640 --> 00:01:40,720
बाहर कोई सिद्ध हुआ है क्या एक से एक सिद्ध हुए हैं हम विश्वामित्र जी ने

26
00:01:40,720 --> 00:01:44,880
नई सृष्टि बना दी क्या उनके सामने कौन सिद्ध आप

27
00:01:44,880 --> 00:01:48,960
होंगे विश्वामित्र जी ने नई सृष्टि बना जी ये सब सिद्ध नहीं है

28
00:01:48,960 --> 00:01:52,960
क्या? तो हमारे यहां सिद्धों की क्या कमी है कि आपके सिद्ध का हम

29
00:01:52,960 --> 00:01:56,560
पूजन करें।

30
00:01:56,560 --> 00:02:00,880
तो सभी को जय श्री राम। जय श्री राम। इस समय

31
00:02:00,880 --> 00:02:05,040
हम आए हैं अ पुरी में

32
00:02:05,040 --> 00:02:09,200
और यहां पर है सारस्वत मठ। वहां पर हम इस समय

33
00:02:09,200 --> 00:02:14,560
हैं और हमारे साथ यहां पर महाराज जी हैं यहां के

34
00:02:14,560 --> 00:02:18,640
शंकरानंद सरस्वती जी महाराज महाराज जी जय श्री राम सबसे

35
00:02:18,640 --> 00:02:22,720
जय श्री राम और जैसा कि आप लोग जानते हैं हम

36
00:02:22,720 --> 00:02:25,840
विभिन्न जो

37
00:02:25,840 --> 00:02:29,840
विचारधाराएं हैं उनको आपके समक्ष प्रस्तुत करते हैं। दर्शन को लेकर

38
00:02:29,840 --> 00:02:34,000
के, आध्यात्म को लेकर के, धर्म को लेकर के। तो इसी क्रम में आज

39
00:02:34,000 --> 00:02:38,160
हम यहां पर आए हैं और आज थोड़ा सा यहां का दृष्टिकोण देखेंगे

40
00:02:38,160 --> 00:02:42,320
कि क्या यहां की फिलॉसोफी है, क्या यहां के सिद्धांत हैं? और किस

41
00:02:42,320 --> 00:02:46,480
तरह से यह फिलॉसफी अस्तित्व में आई। तो महाराज जी सबसे पहले थोड़ा

42
00:02:46,480 --> 00:02:50,640
सा आप अपना परिचय दे दें। यहां का परिचय

43
00:02:50,640 --> 00:02:54,880
देते हुए जी मैं स्वामी

44
00:02:54,880 --> 00:02:59,360
शंकरानंद जय श्री राम जय गुरु मैं स्वामी शंकरानंद

45
00:02:59,360 --> 00:03:03,440
सरस्वती अध्यक्ष श्री श्री निगमानंद

46
00:03:03,440 --> 00:03:07,600
सरस्वत आश्रम लोकनाथ मार्ग पूरी

47
00:03:07,600 --> 00:03:12,240
ये आश्रम पूरी के लोकनाथ मार्ग में अवस्थित है। जगन्नाथ

48
00:03:12,240 --> 00:03:15,040
देव जी के

49
00:03:15,040 --> 00:03:19,360
बगल में है। मंदिर के 1 कि.मी. डिस्टेंस में है। पश्चिम

50
00:03:19,360 --> 00:03:23,840
दिशा में यह आश्रम आसाम

51
00:03:23,840 --> 00:03:28,240
भंगीय सरस्वत मठ का अंतर्गत है। जिस

52
00:03:28,240 --> 00:03:32,800
मठ का फाउंडर है प्रतिष्ठाता परमहंस

53
00:03:32,800 --> 00:03:35,280
परिव्राजकाचार्य

54
00:03:35,280 --> 00:03:39,360
108 स्वामी निगमानंद सरस्वती जी वह

55
00:03:39,360 --> 00:03:44,080
भारतवर्ष के साधकों में अनन्य असाधारण महापुरुष

56
00:03:44,080 --> 00:03:49,120
है। और तंत्र ज्ञान जो प्रेम

57
00:03:49,120 --> 00:03:53,520
चार साधना में सिद्धि लाभ किए। उनकी

58
00:03:53,520 --> 00:03:58,240
शरीर बंगाल की शरीर था और

59
00:03:58,240 --> 00:04:02,240
1880 ख्रिस्ताब्दी में उनके अविर्भाव

60
00:04:02,240 --> 00:04:07,200
हुआ। इसके बाद वह

61
00:04:07,200 --> 00:04:11,520
शिक्षा आदि संपन्न करते हुए वैवाहिक संबंध

62
00:04:11,520 --> 00:04:17,040
में सुधांग सुला नामनी एक अनिंद्य सुंदरी

63
00:04:17,040 --> 00:04:22,560
कन्या के साथ संबंध में संबंधित हुए।

64
00:04:22,560 --> 00:04:26,560
चार साल के बाद उनका देहांत शरीर उपशांत हो जाने के

65
00:04:26,560 --> 00:04:28,000
बाद

66
00:04:28,000 --> 00:04:32,080
तीन बार उनके छाया मूर्ति को दर्शन किए।

67
00:04:32,080 --> 00:04:36,240
इससे उनके अंदर में जिज्ञासा उदित

68
00:04:36,240 --> 00:04:41,120
हुई वह है कि नहीं

69
00:04:41,120 --> 00:04:45,200
मतलब जो उनको दिख रही है उनकी पत्नी वो

70
00:04:45,200 --> 00:04:49,360
पत्नी ही दिख रही है या उनको पत्नी शरीर की शरीर छायामूर्ति शरीर

71
00:04:49,360 --> 00:04:53,440
की बात में बलती थी बात में बलती थी इसीलिए

72
00:04:53,440 --> 00:04:57,600
उनकी धारणा थी जो देहांत के बाद

73
00:04:57,600 --> 00:05:01,680
कुछ नहीं रहता लेकिन बात में जिस समय सारे

74
00:05:01,680 --> 00:05:05,920
पत्नी के साथ दो-तीन बार साक्षात्कार हुआ वो

75
00:05:05,920 --> 00:05:09,920
भी बात भी किए इससे ही उनकी संशय

76
00:05:09,920 --> 00:05:14,160
उत्पन्न हुआ जो मरने के बाद कुछ ना कुछ अस्तित्व रह

77
00:05:14,160 --> 00:05:18,160
जाता है। जी जी इसीलिए उसी को ढूंढने के लिए वह निकले

78
00:05:18,160 --> 00:05:22,320
वह है तो कहां है और स्वप्न के माध्यम

79
00:05:22,320 --> 00:05:26,720
से भी वो निर्देश प्राप्त किया मंत्र प्राप्त

80
00:05:26,720 --> 00:05:31,120
किए और उसी मंत्र की साधना के लिए वेस्ट बंगाल

81
00:05:31,120 --> 00:05:35,760
में वीरभूम जिला की तरापीठ शशान में

82
00:05:35,760 --> 00:05:39,840
वहां तंत्र साधक थे महाकौड़स ना सिद्ध बामक

83
00:05:39,840 --> 00:05:43,120
खेपाजी महाराज उनके संस्पर्श में आकर

84
00:05:43,120 --> 00:05:47,280
के तंत्र साधन में एक 21 दिन में वो तंत्र

85
00:05:47,280 --> 00:05:51,920
साधना की प्रस्तुत करते हुए एक रात्रि की चिता साधना में

86
00:05:51,920 --> 00:05:55,920
साक्षात जगत जननी जगदंबा की साक्षात्कार उनकी पत्नी

87
00:05:55,920 --> 00:05:59,920
की मूर्ति से प्राप्त किए जैसे पत्नी की मूर्ति उसी प्रकार

88
00:05:59,920 --> 00:06:04,320
प्राप्त किए मतलब समझा नहीं मतलब जगत

89
00:06:04,320 --> 00:06:09,120
जगत जन जगदंबा उनकी पत्नी की मूर्ति में साक्षात दिया है

90
00:06:09,120 --> 00:06:13,200
अच्छा उन्होंने अपनी पत्नी में जगदंबा नहीं नहीं जगदंबा

91
00:06:13,200 --> 00:06:17,280
जी ने आए दर्शन में लेकिन मूर्ति देखने

92
00:06:17,280 --> 00:06:21,360
के लिए थे जैसे उनकी पत्नी की मूर्ति में

93
00:06:21,360 --> 00:06:25,360
जैसे वो मूर्ति देख रहे हैं मां जगदंबा की हम तो उसमें उनकी

94
00:06:25,360 --> 00:06:29,360
पत्नी के दर्शन हुए ऐसे हां हां हां अच्छा मां जगदंबा

95
00:06:29,360 --> 00:06:33,840
की मूर्ति में उनको पत्नी के दर्शन हां हां अच्छा पत्नी की मूर्ति में जगदंबा

96
00:06:33,840 --> 00:06:38,000
जी ने दर्शन दिए पत्नी की मूर्ति में मूर्ति में जगदंबा जी ने दर्शन दिए तारापीठ

97
00:06:38,000 --> 00:06:42,000
में तारा तारा माता मतलब वो अपनी पत्नी की छवि देख रहे

98
00:06:42,000 --> 00:06:46,080
हैं उनको मां जगदंबा दिखाई दे दे रही है जगदंबा खुद वो साधना

99
00:06:46,080 --> 00:06:50,400
में जिस समय प्रकटित हुए माता ने उनकी

100
00:06:50,400 --> 00:06:54,480
गुरु जी ने बताए थे यदि सचमुच

101
00:06:54,480 --> 00:06:58,320
देवी आएगी तो आप प्रणाम

102
00:06:58,320 --> 00:07:02,800
करने के बाद आपकी शीश के ऊपर पैर रखेंगे सचमुच

103
00:07:02,800 --> 00:07:06,800
जग जगत जननी नहीं होंगे तो पैर रखने को कभी

104
00:07:06,800 --> 00:07:10,800
भी समर्थ नहीं होगी जब पैर रखा वो पूछा आप कौन

105
00:07:10,800 --> 00:07:14,880
है इस मूर्ति वो बता बताए मैंने मैंने जगत जननी जगदंबा हूं।

106
00:07:14,880 --> 00:07:19,520
इस मूर्ति में क्यों ना तुम तो इसी मूर्ति में मुझे ढूंढ रहे हैं।

107
00:07:19,520 --> 00:07:23,680
इसीलिए जगत जननी थी लेकिन

108
00:07:23,680 --> 00:07:27,760
उनकी मूर्ति पत्नी की पत्नी की थी। तो पत्नी की

109
00:07:27,760 --> 00:07:32,240
मूर्ति बनाई थी उन्होंने मतलब पत्नी का तो चित्र होता है हमारे पास साधारण

110
00:07:32,240 --> 00:07:36,480
रूप से। मूर्ति देखने के जैसे अच्छा मतलब चित्र होगा।

111
00:07:36,480 --> 00:07:41,120
चित्र हां नहीं मूर्ति बिल्कुल आमनेसामने देखा। अच्छा आमने-सामने

112
00:07:41,120 --> 00:07:45,840
देखा। अच्छा और उनके उसी रूप में देखा

113
00:07:45,840 --> 00:07:50,800
और इसके बाद बहुत खुश हो गए और

114
00:07:50,800 --> 00:07:54,800
जगत जननी जी ने दर्शन दिए आशीर्वाद किए वो

115
00:07:54,800 --> 00:08:00,080
भी उनकी चेतना चली गई गुरु जी ने अधुर में मंदिर में

116
00:08:00,080 --> 00:08:04,160
विद्यमान थे रात्रि में और उनकी जिस समय चेतना चले गई गुरु जी

117
00:08:04,160 --> 00:08:09,440
ने आकर के उसको फिर जागृत किए तब

118
00:08:09,440 --> 00:08:13,440
गुरु जी ने उसको शांत करके करके भेज दिया। फिर बाद में

119
00:08:13,440 --> 00:08:17,680
वह देखा जिस समय वर में प्राप्त किए थे जगत जनन ने दो

120
00:08:17,680 --> 00:08:21,680
वर प्रदान किए थे। एक वर था जिस समय वह

121
00:08:21,680 --> 00:08:26,480
स्मरण करेगा उसी मूर्ति में उसको दर्शन प्रदान करेंगे। और

122
00:08:26,480 --> 00:08:31,680
दूसरा वर था जो [संगीत]

123
00:08:31,680 --> 00:08:37,360
पहला वर में तो वो बताए थे मुझे कुछ प्राचना

124
00:08:37,360 --> 00:08:41,440
करो। उससे वो प्रार्थना किए थे। वो बोलते

125
00:08:41,440 --> 00:08:45,520
थे हमारे को जरूरत नहीं जिस समय चाहे तो उसी मूर्ति

126
00:08:45,520 --> 00:08:50,160
में दर्शन दे दे। अच्छा यह वर उन्होंने मांगा। वर मांगा

127
00:08:50,160 --> 00:08:54,240
वही हुआ अपना वो इंजीनियर थे अपना कर्म क्षेत्र

128
00:08:54,240 --> 00:08:58,400
में चले आए। जिस समय स्मरण किया अपना शरीर से एक ज्योति निर्गत होती

129
00:08:58,400 --> 00:09:02,880
थी और वो ज्योति उसी मूर्ति में प्रकटित होती थी।

130
00:09:02,880 --> 00:09:07,360
वो इसके बाद उनके जिज्ञासा उदित हो हुआ।

131
00:09:07,360 --> 00:09:11,520
जिज्ञासा उदित हुई। मतलब फिर माता दर्शन देती थी उनको हां

132
00:09:11,520 --> 00:09:15,680
बिल्कुल हमने पत्नी के पत्नी की मूर्ति में अपना

133
00:09:15,680 --> 00:09:19,760
शरीर से जिस समय वो स्मरण करते थे उस समय उनके

134
00:09:19,760 --> 00:09:23,760
शरीर से एक ज्योति निर्गत होती थी वही ज्योति पत्नी

135
00:09:23,760 --> 00:09:28,000
की मूर्ति परिग्रह करती थी उन्हें फिर गुरु जी के निगमानंद

136
00:09:28,000 --> 00:09:28,500
जी के शरीर

137
00:09:28,480 --> 00:09:32,960
से निर्गत होती थी निगमानंद जी के शरीर से निर्गत माता

138
00:09:32,960 --> 00:09:37,040
वो उनको माता दर्शन दे रही ये माना जाए कि निगमानंद जी का ही कोई अंश दर्शन

139
00:09:37,040 --> 00:09:41,120
दे रहा है नहीं नहीं माता आई है। फिर वो गए माता उनके ही शरीर

140
00:09:41,120 --> 00:09:45,200
में रहती थी। हां वही तो वही तो रहस्य हो गए। इसलिए उनका

141
00:09:45,200 --> 00:09:49,360
जिज्ञासा उदित हो हुआ। जिज्ञासा उदित हुई

142
00:09:49,360 --> 00:09:53,440
जो हमारी ज्योति से हमारी शरीर से माता की उत्पन्न हो

143
00:09:53,440 --> 00:09:57,520
रही है। तो मैं कौन हूं? माता कौन है? उसी प्रश्न लेकर

144
00:09:57,520 --> 00:10:01,600
के गए। फिर अपना गुरु बामा खेपा के पास बामा खेपा जी

145
00:10:01,600 --> 00:10:05,680
ने उसको खूब डांटा। जगत जननी जगदंबा जगत जननी की

146
00:10:05,680 --> 00:10:09,760
तुमसे पैदा हुआ। इसे डांटा फिर इसीलिए

147
00:10:09,760 --> 00:10:14,160
आप जाइए कोई शंकर परंपरा के

148
00:10:14,160 --> 00:10:18,160
सिद्ध साधक से आप सन्यास ग्रहण कीजिए। इसके बाद

149
00:10:18,160 --> 00:10:22,960
वो ढूंढते-ढूंढते उनके साक्षात्कार

150
00:10:22,960 --> 00:10:27,120
हुआ अजमेर में राजस्थान की अजमेर

151
00:10:27,120 --> 00:10:31,280
में एक धर्म सभा में जो उनको स्वप्न

152
00:10:31,280 --> 00:10:35,520
में मंत्र दिए थे। उसी उनहीं उनको ही देखा एक मंच

153
00:10:35,520 --> 00:10:40,880
के पर हां उनके उनके नाम थे परमहंस परिवराजकाचार्य

154
00:10:40,880 --> 00:10:43,600
स्वामी सच्चिदानंद जी महाराज

155
00:10:43,600 --> 00:10:48,000
और शंकर परंपरा के सन्यासी सन्यासी थे सच्चिदानंद सरस्वती

156
00:10:48,000 --> 00:10:52,160
परमहंस देव उनका आश्रम था सावित्री पहाड़

157
00:10:52,160 --> 00:10:56,160
में पुष्कर की सावित्री पहाड़ में वहां

158
00:10:56,160 --> 00:11:00,160
थे उनके वो उसको वहां ले गए और गुरु जी

159
00:11:00,160 --> 00:11:04,720
के साथ अवस्थान किए वहां से ब्रह्मचर्य संस्कार प्राप्त किए

160
00:11:04,720 --> 00:11:09,040
और गुरु जी की कठोर ता के अंदर में रहते हुए भी

161
00:11:09,040 --> 00:11:13,680
सारी साध्या साधना को साधन किए। वेदांत की सारी पाठ ग्रहण किए।

162
00:11:13,680 --> 00:11:17,680
इसके बाद गुरु जी ने एक वेदांत की शिक्षा उनकी वहीं से हुई। वहीं

163
00:11:17,680 --> 00:11:21,840
से सच्चिदानंद जी से। सच्चिदानंद सच्चिदानंद जी बहुत वेदांती

164
00:11:21,840 --> 00:11:26,000
संत थे। हम और सच्चिदानंद जी ने

165
00:11:26,000 --> 00:11:30,000
उनको सन्यास प्रदान किए। नाम प्रदान किया स्वामी

166
00:11:30,000 --> 00:11:34,320
निगमानंद सरस्वती। अच्छा। और

167
00:11:34,320 --> 00:11:38,480
चार धाम की परिवजन के लिए उनको निर्देश किए। अच्छा बाद में साथ

168
00:11:38,480 --> 00:11:44,000
में खुद भी गए। साथ में खुद गए और

169
00:11:44,000 --> 00:11:48,080
मानव सरोवर वगैरह दो-तीन स्थान वो

170
00:11:48,080 --> 00:11:52,240
साथ में रहे। इसके बाद भेज दिया आप घूम के आ जाओ। वो

171
00:11:52,240 --> 00:11:56,240
चतुरधाम करते हुए गुरु जी के पास वापस आए। आकर

172
00:11:56,240 --> 00:11:58,880
के अपना अनुभूति प्रकट किए।

173
00:11:58,880 --> 00:12:02,960
मैंने तो दर्शन किया जो जो आप जो पढ़ाए

174
00:12:02,960 --> 00:12:05,920
थे सच्चिदानंद

175
00:12:05,920 --> 00:12:09,920
सच्चिदानंद स्वरूप जो परम ब्रह्म परमात्मा परमेश्वर है

176
00:12:09,920 --> 00:12:14,000
वो सर्वत्र है जी सब कुछ में है

177
00:12:14,000 --> 00:12:18,000
लेकिन मैं उनको उसको अनुभव करने के लिए चाहता हूं मैं वही

178
00:12:18,000 --> 00:12:22,160
हूं उसको अपरोख अनुभूति प्राप्त करने के लिए मैं चाहता हूं

179
00:12:22,160 --> 00:12:26,560
वो मैं वो मैं ही हूं हूं इसलिए गुरु जी ने बताया

180
00:12:26,560 --> 00:12:30,720
ये वेदांत की स्मरण मनन में बहुत दिन निकल जाएगा। आपके पास इतना

181
00:12:30,720 --> 00:12:34,960
समय है नहीं। मुझे ही 40 साल लगा था। इसीलिए आप एक

182
00:12:34,960 --> 00:12:39,360
काम कीजिए। कोई जोगी गुरु की सहायता ले लीजिए। उससे

183
00:12:39,360 --> 00:12:43,360
जल्दी हो जाएगा। योगी गुरु योगी गुरु जी। फिर वो

184
00:12:43,360 --> 00:12:47,760
गुरु जी के निर्देश के अनुसार जोगी गुरु की अनुसंधान में निकले

185
00:12:47,760 --> 00:12:51,920
और हिमालय के मुसोरी पहाड़ में एक

186
00:12:51,920 --> 00:12:56,320
जोग ताप सुमेर दास जी करके घटना चक्र में साक्षात्कार

187
00:12:56,320 --> 00:13:00,400
हुआ। वह परशुराम तीर्थ में दर्शन करने के लिए गए थे और

188
00:13:00,400 --> 00:13:04,800
वहां उनका शरीर अनारोग्य हो गए।

189
00:13:04,800 --> 00:13:08,960
वो नहीं वापस आ पाया। वहां बस्ती में रहे वो पहाड़ी

190
00:13:08,960 --> 00:13:13,120
लोगों के साथ और एक संध्या में पहाड़

191
00:13:13,120 --> 00:13:14,240
की शोभा दर्शन

192
00:13:14,240 --> 00:13:18,640
करने के लिए निकले तो वहां वापस

193
00:13:18,640 --> 00:13:22,640
नहीं आ पाया। रास्ता मार्ग खो गए। विस्मृत हो गए

194
00:13:22,640 --> 00:13:26,640
और अपना पुड़िया को वापस नहीं आ पाया। रात में एक रात्रि में एक

195
00:13:26,640 --> 00:13:30,640
ब्रेक के कोटर में थे। वहां ही सुबह वही

196
00:13:30,640 --> 00:13:34,800
जोगी गुरु जी ने वहां से आकर के उनको लेकर के गए

197
00:13:34,800 --> 00:13:39,200
और उनके पास कोई मुसोरी पहाड़ में कोई एक गुमफा

198
00:13:39,200 --> 00:13:43,840
में गुमफा में वह विद्यमान रह के

199
00:13:43,840 --> 00:13:47,840
तीन तीन महीना तक वहां से जो की सारी साधन प्रक्रिया

200
00:13:47,840 --> 00:13:51,920
को प्रशिक्षण प्राप्त किए और

201
00:13:51,920 --> 00:13:55,920
इसके बाद गुरु जी ने बताया राजयोग की साधना के लिए थोड़ा से

202
00:13:55,920 --> 00:14:00,000
भोजन की भी उत्कृष्ट भोजन होना चाहिए। यहां ये

203
00:14:00,000 --> 00:14:04,000
कंदमूल वगैरह उसको लेकर के और राज्यों की साधना आना

204
00:14:04,000 --> 00:14:08,240
कष्ट है। आप चले जाइए। कई गृहस्थ लोग आपको मदद

205
00:14:08,240 --> 00:14:12,880
की गृहस्थ की मदद से आप इस साधना की अभ्यास कीजिए।

206
00:14:12,880 --> 00:14:17,600
महाराज जी ने मैं आशीर्वाद करता हूं। मैं भी आपके साथ रहूंगा।

207
00:14:17,600 --> 00:14:21,760
और पहली सिद्धि तो वहां हो गई। तंत्र में तंत्र को माता

208
00:14:21,760 --> 00:14:25,760
स्वयं पत्नी के मूर्ति में दिखने लगी। हां। दूसरी सिद्धि यहां

209
00:14:25,760 --> 00:14:29,440
पे सच्चिदानंद जी के पास आ गई। अनुभव हुआ जो वेदांत का

210
00:14:29,440 --> 00:14:33,600
उन्होंने सिद्धांत का अनुभव किया लेकिन अभी उसका अपरोखानुभूति प्राप्त करने

211
00:14:33,600 --> 00:14:37,760
के लिए उनकी पिपासा उदित हुई। अब वो योगी वो गुरु योगी गुरु

212
00:14:37,760 --> 00:14:41,840
के पास जा रहे हैं। पास जा रहे हैं। तो गुरु जी ने भी उनको प्रशिक्षण प्रदान

213
00:14:41,840 --> 00:14:46,480
किए और उसी प्रशिक्षण से बताया तुम इसको अभ्यास करो।

214
00:14:46,480 --> 00:14:50,560
अभ्यास करने से निर्विकल्प समाधि आ जाएगी। और

215
00:14:50,560 --> 00:14:54,560
निर्विकल्प समाधि आ जाएगी। निर्भिकल्प समाधि में आपको सारी कुछ

216
00:14:54,560 --> 00:14:59,040
सब कुछ पहचान हो जाएगा। अच्छा वो आने से

217
00:14:59,040 --> 00:15:03,760
एक हरिपुर नाम के एक

218
00:15:03,760 --> 00:15:07,920
स्थान पे एक गृहस्थों के साहचर्य पहले साधना

219
00:15:07,920 --> 00:15:13,920
अभ्यास किए। बाद में आसाम की गुवाहाटी में

220
00:15:14,080 --> 00:15:18,240
एक सज्जनों की साहचर्य

221
00:15:18,240 --> 00:15:22,880
में वहां वह साधना अभ्यास किए। जगेश्वर

222
00:15:22,880 --> 00:15:26,880
विश्वास करके उनका नाम था एक्स्ट्रा असिस्टेंट कमिशर

223
00:15:26,880 --> 00:15:31,120
कमिश्नर थे वह आसाम गवर्नमेंट की

224
00:15:31,120 --> 00:15:35,120
उनकी साहचर्य में जोगी योग साधना

225
00:15:35,120 --> 00:15:40,160
की अभ्यास किए और वहां से ही वो पहले

226
00:15:40,160 --> 00:15:44,240
24 घंटा के लिए समाधि अभ्यास किए। दूसरे बार

227
00:15:44,240 --> 00:15:44,740
तीन दिन

228
00:15:44,640 --> 00:15:48,800
के लिए तीसरे बार सात दिन सात रात्रि के लिए वह

229
00:15:48,800 --> 00:15:52,880
समाधि अभ्यास किए और उनके निर्देश

230
00:15:52,880 --> 00:15:56,960
के अनुसार उन लोग उनका समाधि टूटे टूटा और

231
00:15:56,960 --> 00:16:01,120
वो वापस आए। इसके बाद उनमें साहस हो गए कि मुझे

232
00:16:01,120 --> 00:16:05,120
एक बार ये सारी सबिकल्प समाधि की अभ्यास हो गई। इसके बाद

233
00:16:05,120 --> 00:16:09,600
उनमें आकांक्षा उदित हुई कि मुझे निर्विकल्प निर्विकल्प

234
00:16:09,600 --> 00:16:14,400
में जाना चाहिए। जी और वहां आसाम की

235
00:16:14,400 --> 00:16:19,280
जो कामाख्या माता की मंदिर है उस मंदिर के

236
00:16:19,280 --> 00:16:23,440
बगल में बाजू में एक भुवनेश्वरी मंदिर है। उसी मंदिर

237
00:16:23,440 --> 00:16:27,760
के भी पश्चात में एक बिल वृक्ष की नीचे

238
00:16:27,760 --> 00:16:31,920
वो समाधि स्थल अभी वो उद्धार हुआ। अभी

239
00:16:31,920 --> 00:16:36,160
भी है। वहां वो

240
00:16:36,160 --> 00:16:40,160
अभ्यास किए निर्विकल्प समाधि में जाकर के

241
00:16:40,160 --> 00:16:44,320
उसी परतत्व को बोल रहे निर्विकल्प समाधि की अनुभूति के बारे

242
00:16:44,320 --> 00:16:48,320
में स्वामी जी ने गुरु जी ने बोल रहे उसी दिन मैंने

243
00:16:48,320 --> 00:16:52,480
वेदांत की निधि निध्यासन को आश्रय करके बैठा था और एक-एक

244
00:16:52,480 --> 00:16:56,560
चक्र को अतिक्रम करके सहस्त्रार में जाकर के वही पर तत्व

245
00:16:56,560 --> 00:17:00,240
के साथ वही एक ज्योति

246
00:17:00,240 --> 00:17:04,640
एक-एक ज्योति को एक-एक द्वार को अतिक्रम करते हुए

247
00:17:04,640 --> 00:17:08,960
मैंने जाकर के एक ज्योतिर्मय मंडल में पहुंचा और वहां

248
00:17:08,960 --> 00:17:13,280
की जो आनंद है वहां की जो शांति है उसको हमारे

249
00:17:13,280 --> 00:17:17,440
अनुभूति में आ रही है लेकिन मैंने उसको प्रकाश करने को समर्थ

250
00:17:17,440 --> 00:17:21,520
नहीं हूं और अनिर्वचनीय स्थिति

251
00:17:21,520 --> 00:17:25,920
को चले गए कि वो बोल रहे मैंने कितना समय था वो भी हमारे

252
00:17:25,920 --> 00:17:30,400
जान पहचान में है नहीं इसके बाद हटात उनका

253
00:17:30,400 --> 00:17:34,480
अंदर में एक अनुभव जागृत हुआ देखा सर्वत्र ज्योतिर्मय

254
00:17:34,480 --> 00:17:38,720
मंडल मध्यम बीच में कोईकोई छिद्र एक छिद्र को आश्रय

255
00:17:38,720 --> 00:17:42,960
करके वो अंदर वापस आ गए प्रवेश कर गए उसी छिद्र

256
00:17:42,960 --> 00:17:47,440
में और छिद्र में प्रवेश करने के बाद उनमें अनुभूति आया

257
00:17:47,440 --> 00:17:51,680
जो मैं गुरु हूं गुरु रहम गुरु रहम इस अनुभव को उसी

258
00:17:51,680 --> 00:17:55,920
आध्यासिक भाव को अपनाते हुए वो निर्विकल्प समाधि

259
00:17:55,920 --> 00:18:00,240
से भगवान की इच्छा से भगवान जी ने जिस आधार को अवलंबन

260
00:18:00,240 --> 00:18:04,320
करके जगत के काम जगत जनजनता की काम करने

261
00:18:04,320 --> 00:18:08,320
के लिए कल्याण करने के लिए चाहते हैं। उस समय खुद

262
00:18:08,320 --> 00:18:12,400
उसी शरीर में आ जाते हैं। हम इसीलिए उसी शरीर में

263
00:18:12,400 --> 00:18:15,840
भगवान जी ने खुद को प्रकट किए।

264
00:18:15,840 --> 00:18:20,080
वो गुरु बोध को मैं गुरु हूं। मैं गुरु हूं। गुरु रहम गुरु रहम

265
00:18:20,080 --> 00:18:24,080
और उसी बोध को अपनाते हुए समंदर विकल्प समाधि से वापस

266
00:18:24,080 --> 00:18:28,320
आए और वहां से फिर उसी

267
00:18:28,320 --> 00:18:32,640
अपना स्थिति को समझा प्रधान अपना

268
00:18:32,640 --> 00:18:36,880
स्थिति को सूचना देने के लिए अपना गुरु जी सच्चिदानंद जी सन्यास

269
00:18:36,880 --> 00:18:41,120
गुरु जी जो सच्चिदानंद परमहंस देव जी ने उनके पास जाने

270
00:18:41,120 --> 00:18:45,680
के लिए संकल्प किए। जाने के मार्ग में उस समय उसी समय

271
00:18:45,680 --> 00:18:49,920
इलाहाबाद में कुंभ मेला चल रही थी और उसी कुंभ

272
00:18:49,920 --> 00:18:53,920
मेला में अपना गुरु जी भी थे। यह संवाद प्राप्त करते हुए गुरु

273
00:18:53,920 --> 00:18:58,000
जी के पास गए। गुरु जी उस समय श्रृंगरी पीठाधीश्वर

274
00:18:58,000 --> 00:19:02,080
कैंप में रहे थे और उसी सभा में वो जाकर के श्रृंगरी

275
00:19:02,080 --> 00:19:06,240
पीठाधीश को प्रणाम नहीं करते हुए अपना गुरु जी को प्रणाम किए।

276
00:19:06,240 --> 00:19:10,400
कौन? निगमानंद जी ने निगमानंद देव

277
00:19:10,400 --> 00:19:14,480
जी ने अपना गुरु जी सच्चिदानंद परमहंस को प्रणाम किए। उस

278
00:19:14,480 --> 00:19:18,560
समय वहां तो शंकराचार्य जी को प्रणाम प्रणाम नहीं किया। साधु मंडल में

279
00:19:18,560 --> 00:19:22,560
बिल्कुल हलचल मच गए। वो शंकराचार्य जी को प्रणाम नहीं

280
00:19:22,560 --> 00:19:27,120
करते हुए अपना गुरु को प्रणाम किए। उसमें वो

281
00:19:27,120 --> 00:19:31,280
उसमें जुक्त तर्क वितर्क हो गए। उसने शंकराचार्य जी ने उनको

282
00:19:31,280 --> 00:19:36,160
अभिनव तर्क तीर्थ वही कई करके उस समय थे।

283
00:19:36,160 --> 00:19:40,560
और वह मतलब बुलाया पास बेटा आ जाओ हमारे पास बताया

284
00:19:40,560 --> 00:19:44,640
तुम यहां के परंपरा के भग्न क्यों किए मैंने तो कुछ भग्न की

285
00:19:44,640 --> 00:19:48,800
नहीं किया ना यहां जगतगुरु को पहले प्रणाम करना

286
00:19:48,800 --> 00:19:53,360
चाहिए था और बताए मनथ श्री जगन्नाथ मदगुरु श्री जगतगुरु

287
00:19:53,360 --> 00:19:57,600
मदात्मा सर्वभूत आत्मा तस्मै श्री गुरुवे नमः हमारे गुरु

288
00:19:57,600 --> 00:20:01,760
की कई गुरु है इस प्रकार सिद्धांत को अपनाना जाए

289
00:20:01,760 --> 00:20:06,560
गुरु तो एक ही है एक एक अद्वितीय तत्व है।

290
00:20:06,560 --> 00:20:10,800
इसीलिए हमारे गुरु जी की गुरु की कई स्वीकार किया जाए तो

291
00:20:10,800 --> 00:20:14,960
गुरु में दोष लगता है। गुरु

292
00:20:14,960 --> 00:20:19,440
में दोष संस्पर्श होता है। इसीलिए गुरु

293
00:20:19,440 --> 00:20:23,520
जी की गुरु तो एक ही सत्ता है। किसी कौन सत्ता को अवलंबन

294
00:20:23,520 --> 00:20:27,600
करके शिष्य को कल्याण करते हैं। दूसरी बात है। जिस प्रकार विद्युत

295
00:20:27,600 --> 00:20:31,840
एक ही है। लेकिन बल्ब में वह लाइट अम आलो

296
00:20:31,840 --> 00:20:36,000
दे रहा है और पंखा में हम लोगों को हवा दे रहा है। ले सत्ता तो एक

297
00:20:36,000 --> 00:20:40,240
ही है। इस प्रकार समझाया शंकराचार्य जी ने उस उनको

298
00:20:40,240 --> 00:20:44,560
कई प्रश्न भी किए। इस प्रकार कुंभ मेला कहां देखे हुए हो? वो

299
00:20:44,560 --> 00:20:46,400
कुछ बोला मैं निर्विकल्प में

300
00:20:46,400 --> 00:20:51,040
सारी कुछ देख लिया। इस प्रकार जगत ने

301
00:20:51,040 --> 00:20:55,120
सारे ये सब कुछ इस पिंड में जो कुछ है

302
00:20:55,120 --> 00:21:00,160
सारे ब्रह्मांड है उसको भी मैंने इसी पिंड में देख लिया तब

303
00:21:00,160 --> 00:21:04,320
जगतगुरु जी ने उनके गुरु जी को बताया वो तो परमहंस बन गए

304
00:21:04,320 --> 00:21:08,320
आप उनको क्यों दंड धारण क्रिया कराया ना वो जब से हमसे

305
00:21:08,320 --> 00:21:12,480
गया अभी तक आया नहीं अभी वो अभी मैंने उसको

306
00:21:12,480 --> 00:21:16,880
देख रहा हूं इसीलिए जगतगुरु के निर्देश से उनके सच्चिदानंद

307
00:21:16,880 --> 00:21:20,960
जी ने त्रिवेणी संगम में उनके दंड को विसर्जन दिया

308
00:21:20,960 --> 00:21:25,360
और साधु मंडल उनको परमहंस घोषित किए। परमहंस मतलब

309
00:21:25,360 --> 00:21:29,520
परमहंस मींस परम जो निर्विकल्प समाधि को प्राप्त

310
00:21:29,520 --> 00:21:34,160
परमहसु हंस चेती परमहंस जो

311
00:21:34,160 --> 00:21:38,560
से परम सत्ता को खुद मैं हूं। ब्रह्म

312
00:21:38,560 --> 00:21:43,280
मैं हूं सोहंग सोहंग इसी स्थिति में जो निर्विकल्प

313
00:21:43,280 --> 00:21:47,760
समाधि में जो अनुभव करता है जिस प्रकार हंस

314
00:21:47,760 --> 00:21:51,760
वो अनुभव कर रहे हैं तो फिर वो गुरु कैसे देख रहे हैं किसी को जैसे वो

315
00:21:51,760 --> 00:21:56,160
देख रहे हैं व्यवहारिक सत्ता है ना सत्ता त्रिविध है ना इसका मतलब परमार्थिक

316
00:21:56,160 --> 00:22:00,480
परमार्थिक व्यवहारिक और एक प्रतिभाषी इसमें एक

317
00:22:00,480 --> 00:22:01,520
इसमें एक व्यवहार

318
00:22:01,520 --> 00:22:05,600
परमार्थिक स्थिति में तो अनुभव कर लिया मैं ब्रह्म हूं लेकिन

319
00:22:05,600 --> 00:22:09,600
व्यवहारिक सत्ता तो एक है ना अलग है ऐसे ही एक चीज एक

320
00:22:09,600 --> 00:22:13,760
यहां पे प्रश्न और आ रहा है छोटा सा कि जैसे उन्होंने परमार्थ और व्यवहार का अंतर

321
00:22:13,760 --> 00:22:17,760
किया कि भाई परमार्थ में मैं हूं मगर व्यवहार में गुरु गुरु अलग है। मैं

322
00:22:17,760 --> 00:22:21,760
अलग हूं। अलग नहीं है। गुरु को गुरु गुरु के स्थान पे व्यवहार

323
00:22:21,760 --> 00:22:25,920
करना पड़ेगा। तो जब उन्होंने परमार्थ और व्यवहार का यहां पे अंतर किया तो वैसे

324
00:22:25,920 --> 00:22:30,000
ही परमार्थ और व्यवहार का यहां भी अंतर करना चाहिए कि जैसे जगतगुरु है जो

325
00:22:30,000 --> 00:22:34,400
और जो मेरा गुरु है। हम वो विद्युत एक ही है। पारमार्थिक

326
00:22:34,400 --> 00:22:38,560
सत्य है कि एक ही विद्युत सब जगह चल रहा है। मगर वो किस रूप में प्रकट हो रहा है?

327
00:22:38,560 --> 00:22:42,800
ये व्यवहारिक हो गया कि पंखे से कैसा व्यवहार होगा? बल्ब से कैसा व्यवहार होगा।

328
00:22:42,800 --> 00:22:46,880
तो अगर एक जगह पे अगर परमार्थ व्यवहार में अंतर हो रहा है तो दूसरी जगह

329
00:22:46,880 --> 00:22:50,880
पे क्यों नहीं हो रहा? दूसरी जगह में होना चाहिए। लेकिन वो अपना

330
00:22:50,880 --> 00:22:55,360
गुरु को तो पहले तो हां वो एक भाव की व्यवहार

331
00:22:55,360 --> 00:23:00,160
भाव की बात है वहां पर जिस प्रकार हनुमंत जी ने कह रहे हैं

332
00:23:00,160 --> 00:23:04,320
श्रीनाथ जानकी नाथ अभेद परमात्मनी तथापि

333
00:23:04,320 --> 00:23:08,480
मम सर्वस्वम राम राजीव लोचन ये

334
00:23:08,480 --> 00:23:12,720
श्रीनाथ और जानकीनाथ तो एक ही बराबर है तब भी हमारे नाथ

335
00:23:12,720 --> 00:23:16,560
ही राम राजीव लोचन है उसी प्रकार मदगुरु

336
00:23:16,560 --> 00:23:20,720
श्री जगतगुरु इस प्रकार भी गुरु की शिष्य की जो

337
00:23:20,720 --> 00:23:24,720
मान्यता मेरे लिए अनन्य भावन गुरु के लिए हां हां हां भले ही उनके

338
00:23:24,720 --> 00:23:28,800
मेरा कोई पर गुरु परदाता वाला रह सके रह सकता है हो

339
00:23:28,800 --> 00:23:33,120
सकता है लेकिन हमारे तो गुरु जगतगुरु हमारे गुरु ही जगुरु है मन्नत

340
00:23:33,120 --> 00:23:37,200
श्री जगन्नाथ मद्गुरु श्री जगतगुरु इस प्रकार की उनकी

341
00:23:37,200 --> 00:23:41,280
परमहंस उपाधि भी तो इस हिसाब से अब

342
00:23:41,280 --> 00:23:45,280
जो आपको गुरु मानेंगे वो आपसे बड़ा निगमन जी को नहीं मानेंगे

343
00:23:45,280 --> 00:23:49,440
जी जो इस समय आपको गुरु मानेंगे मान नहीं मानेंगे ना पर गुरु गुरु है

344
00:23:49,440 --> 00:23:53,600
वो मानेंगे नहीं तो कहेंगे मददगुरु जगतगुरु नहीं नहीं देखिए

345
00:23:53,600 --> 00:23:57,680
भावा द्वैतम सदा कुरत क्रियाद्वैतम नकारीचित इस

346
00:23:57,680 --> 00:24:01,680
प्रकार अद्वैत परंपरा में एक श्लोक है भावा द्वैतम

347
00:24:01,680 --> 00:24:06,000
सदा कुरत भाव में अद्वैत किया जा सकता है क्रिया में कभी भी अद्वैत

348
00:24:06,000 --> 00:24:10,080
भाव पोषण नहीं करना क्रिया में किया ना पहले जगतगुरु के छूने थे उन्होंने

349
00:24:10,080 --> 00:24:14,240
तर्क दिया कि मेरा ही गुरु जगत हां हां तो

350
00:24:14,240 --> 00:24:18,400
जैसे आपका कोई शिष्य है मान लीजिए हम वो आपसे

351
00:24:18,400 --> 00:24:22,400
आपको जगत गुरु मान मानेगा मानेगा पर गुरु के रूप में मानेगा लेकिन

352
00:24:22,400 --> 00:24:26,880
खुद गुरु को पहले ही श्रद्धा करना चाहिए मतलब आपको ही जगतगुरु कहेगा वो जगतगुरु

353
00:24:26,880 --> 00:24:30,880
नहीं हमारे पहले तो अपना गुरु को सम्मान करना चाहिए

354
00:24:30,880 --> 00:24:31,840
वही तो उसको

355
00:24:31,840 --> 00:24:36,080
परिचय कराया ना इसीलिए पिता माता जितना भी अनपढ़

356
00:24:36,080 --> 00:24:40,480
हो तब भी पिता माता पहला गुरु और पहला पूजनीय होते हैं ना

357
00:24:40,480 --> 00:24:44,720
इसी प्रकार इसी प्रकार दृष्टि से ले

358
00:24:44,720 --> 00:24:49,040
ठीक है वो तो भाव वाली बात है हां इससे पहले एक बात रह गए वो

359
00:24:49,040 --> 00:24:53,200
जिस समय प्रयाग आ रहे थे ये वाला बड़ा अच्छा बताया वो

360
00:24:53,200 --> 00:24:57,200
जो श्लोक पढ़ा है ना अभी भाव में तो अद्वैत हो सकता है क्रिया

361
00:24:57,200 --> 00:25:01,600
में कभी भी नहीं हां भावद्वैतम कहां का है श्लोक

362
00:25:01,600 --> 00:25:05,920
तो मैंने कहा कि नहीं बल पाऊंगा है भावद्वैतम

363
00:25:05,920 --> 00:25:10,720
भावद्वैतम क्र सदा कुरजात भाव में अद्वैत पोषण करना चाहिए

364
00:25:10,720 --> 00:25:15,360
क्रिया में कभी भी हां बहुत बढ़िया

365
00:25:15,360 --> 00:25:19,440
ये उसे इलाहाबाद जाने से

366
00:25:19,440 --> 00:25:24,160
पहले वो काशी में उतरे थे। हम अन्नपूर्णा जी ने उनको बताया

367
00:25:24,160 --> 00:25:28,160
अन्नपूर्णा जी के वो देखा सोने थे अन्नपूर्णा की

368
00:25:28,160 --> 00:25:32,480
काशी में कई कभी भी खुदा में भूखा

369
00:25:32,480 --> 00:25:36,720
नहीं रहते हम लेकिन मार्ग पे देखा ये कोई भिखारी

370
00:25:36,720 --> 00:25:41,200
ने वो झूठे पत्ता से कुछ खाद्य सामग्री

371
00:25:41,200 --> 00:25:45,440
लेकर के खा रहा है जी वो कोई ब्राह्मण को पूछा भाई अन्नपूर्णा

372
00:25:45,440 --> 00:25:47,040
की पूरी में यहां भी

373
00:25:47,040 --> 00:25:51,280
लोग भूखा रहते हैं कि ये कैसे है वह

374
00:25:51,280 --> 00:25:56,400
बताया जो पहले दिन आते हैं अन्नपूर्णा जी ने उनको खिलाते हैं और

375
00:25:56,400 --> 00:26:00,400
इसके बाद अपना प्रजत्न में भी करना अन्नपूर्णा जी देते हैं

376
00:26:00,400 --> 00:26:04,480
लेकिन आपको भी खुद प्रजत्न करना पड़ता है वो बताया मैंने तो आज

377
00:26:04,480 --> 00:26:08,560
पहले आया हूं देखा है देखिए अन्नपूर्णा जी ने कैसे मुझे खिला

378
00:26:08,560 --> 00:26:12,560
रहे वो जाकर के स्नान करने के लिए दशा स्वम में घाट में

379
00:26:12,560 --> 00:26:16,960
गए और वहां बैठते-बैठते ही समाधिस्थ हो गए। बैठने से समय

380
00:26:16,960 --> 00:26:21,280
वही एक वृद्धा ने आकर के एक

381
00:26:21,280 --> 00:26:25,600
टोकी एक दोना दिए थे जिसमें कुछ भोजन

382
00:26:25,600 --> 00:26:29,920
सामग्री थे रखने के लिए दिए थे और वो उसको

383
00:26:29,920 --> 00:26:34,160
रखा वहां रखते रखते समाधिस्त हो गए देखा तो रात बहुत

384
00:26:34,160 --> 00:26:38,160
हो गए जिस समय समाधि टूटी अधिक रात्रि

385
00:26:38,160 --> 00:26:42,160
हो गई और देखा कोई सुनसान घाट में कहीं है नहीं

386
00:26:42,160 --> 00:26:46,560
लेकिन जो समय उड़ने के लिए गए तो उसी वो जो भुजिया

387
00:26:46,560 --> 00:26:50,640
थे उसी भुजिया हाथ में लग गए देखा उसमें में बूढ़ी

388
00:26:50,640 --> 00:26:54,640
कहां गई ढूंढा तो कहां भी प्राप्त नहीं किया तो खोल दे

389
00:26:54,640 --> 00:26:59,040
खुल के देखा तो वर्धमान की हमारे वेस्ट बंगाल के वर्धमान की एक सीता

390
00:26:59,040 --> 00:27:02,160
भोग होती है गीता माता वो भोग बिल्कुल

391
00:27:02,160 --> 00:27:06,320
टाटका है बिल्कुल गर्म है उष्णत है उसी अवस्था में उसको

392
00:27:06,320 --> 00:27:10,720
प्राप्त किए और उसी उसी अवस्था में उसको प्राप्त किए

393
00:27:10,720 --> 00:27:14,800
और वो उसको उसी अवस्था में

394
00:27:14,800 --> 00:27:18,800
प्राप्त किए और उसको भोजन भी कर लिया रात्रि में अन्नपूर्णा जी ने

395
00:27:18,800 --> 00:27:22,880
उनको तो बताया क्या बेटा हमारे पूरी में हमारे

396
00:27:22,880 --> 00:27:27,040
महिमा को आपका अनुभव हो कि नहीं वो बताया वो तो कोई मारवाड़ी

397
00:27:27,040 --> 00:27:31,120
बूढ़ी ने रखा था अब तो नहीं रखा था माता जी ने कहा कि क्या एक

398
00:27:31,120 --> 00:27:35,760
मारवाड़ी बूढ़ी के रूप परिग्रह करने की हमारी सामर्थ्य नहीं है तुम

399
00:27:35,760 --> 00:27:39,920
पर तत्व में तुम्हारा पर तत्व तुम्हारी

400
00:27:39,920 --> 00:27:44,080
अनुभव हो गए लेकिन अभी भी जिसको सच्चिदानंद

401
00:27:44,080 --> 00:27:48,160
आनंद कंद रूप में समाधि में अनुभव किए वह भी इसी सृष्टि

402
00:27:48,160 --> 00:27:52,160
में कण-कण में है। यह अनुभव तुम्हारी अभी भी अवशिष्ट

403
00:27:52,160 --> 00:27:56,240
है। तुम अभी भी ज्ञान में अपूर्ण हो। अपूर्ण

404
00:27:56,240 --> 00:28:00,480
है। वो जिस समय परिव्राजन कर रहे थे उस समय अपना

405
00:28:00,480 --> 00:28:05,200
सच्चिदानंद जी गुरु जी के साथ गए थे

406
00:28:05,200 --> 00:28:09,200
मुसरी पहाड़ की हिमालय की एक

407
00:28:09,200 --> 00:28:13,440
मुसौरी पहाड़ की एक साधिका के पास।

408
00:28:13,440 --> 00:28:17,440
उनके नाम थे गौरीमा और गौरीमा ने बताए

409
00:28:17,440 --> 00:28:21,600
थे यह तुम्हारी उनकी गुरु सच्चिदानंद को बताए थे यह तुम्हारी

410
00:28:21,600 --> 00:28:25,600
चेला यदि कभी निर्विकल्प समाधि को प्राप्त

411
00:28:25,600 --> 00:28:29,600
किए तो हमारे पास भेज देना वो याद आ गए अभी तो मैंने

412
00:28:29,600 --> 00:28:33,600
निर्विकल्प को प्राप्त किए इसीलिए फिर गए गौरी मां के पास गौरीमा

413
00:28:33,600 --> 00:28:37,600
ने उनको भाव साधना में जो परम

414
00:28:37,600 --> 00:28:41,920
तत्व को निर्विकल्प में सच्चिदानंद आनंद कंद के रूप में अनुभव

415
00:28:41,920 --> 00:28:46,320
किए थे वही परमात्मा पर मेरे परमेश्वर ने एकांश

416
00:28:46,320 --> 00:28:50,320
में वही विद्यमान है उसको अनुभव किए सर्वत्र कण-कण

417
00:28:50,320 --> 00:28:54,720
में जनजन में पल पल में सर्वत्र वही है उनकी संस्पर्श

418
00:28:54,720 --> 00:28:59,040
में उनके आशीर्वाद से संस्पर्श से वो भाव समाधि को प्राप्त किए और अनुभव

419
00:28:59,040 --> 00:29:03,120
किए वो वही तत्व ही जो निर्विकल्प समाधि में जिसको

420
00:29:03,120 --> 00:29:07,360
अनुभव किए वही सर्वत्र विद्यमान हुए उसी

421
00:29:07,360 --> 00:29:11,520
स्थिति को बताने के लिए सूचना देने के लिए गुरु जी के पास जाते हुए

422
00:29:11,520 --> 00:29:16,160
आकर करके इलाहाबाद में गुरु जी के पास पहुंचा और वहां परमहंस

423
00:29:16,160 --> 00:29:20,240
उपाधि को प्राप्त किए। इलाहाबाद में प्राप्त हुई थी। इलाहाबाद

424
00:29:20,240 --> 00:29:24,560
की बाली शंकराचार्य इलाहाबाद उस समय समा कुंभ चल रहा था। अच्छा इलाहाबाद

425
00:29:24,560 --> 00:29:28,560
में वो आए थे। आए थे। हां हां इसीलिए

426
00:29:28,560 --> 00:29:32,640
इसके बाद गुरु जी ने अपना उसको अपना गद्दी में बैठाने

427
00:29:32,640 --> 00:29:36,640
के लिए संकल्प किए और वो बताया जब मैं बंगाल

428
00:29:36,640 --> 00:29:40,800
में काम करूंगा। हमारे आग्रह प्रकाश किए। गुरु जी ने आकर के

429
00:29:40,800 --> 00:29:44,960
बंगाल में वो जहां से जो साधना कर रहे थे जगेश्वर विश्वास

430
00:29:44,960 --> 00:29:50,400
की घर पे वहां आकर के पहले उन लोगों को

431
00:29:50,400 --> 00:29:54,640
दीक्षा प्रदान किए और इसके बाद वो

432
00:29:54,640 --> 00:29:58,800
एक ग्रंथ लिखे थे जाकर के वो जहां जोग

433
00:29:58,800 --> 00:30:03,040
साधना किए थे वहां एकांत में रह के

434
00:30:03,040 --> 00:30:07,120
एक जोगी गुरु नाम के एक ग्रंथ रचना किए पहले जो जोग

435
00:30:07,120 --> 00:30:11,280
साधना में जिस ज्ञान को आहरण किए थे।

436
00:30:11,280 --> 00:30:15,280
उसी को अवलंबन करके पहले जोगी गुरु, ज्ञानी गुरु, तांत्रिक

437
00:30:15,280 --> 00:30:19,360
गुरु, प्रेमिक गुरु, ब्रह्मचर्य साधन, वेदांत विवेक ये सारी

438
00:30:19,360 --> 00:30:24,080
ग्रंथ को रचना किए। उसी ग्रंथ की संस्पर्श में आते हुए

439
00:30:24,080 --> 00:30:28,400
लोग उनके साहचर्य को प्राप्त किए। साधना अभ्यास,

440
00:30:28,400 --> 00:30:32,880
साधना शिक्षा के लिए लोग आने लगे। इसके बाद सारस्वत मठ, सारस्वत

441
00:30:32,880 --> 00:30:36,960
आश्रम यह सारी पूर्व भारत में उनकी अधिक से

442
00:30:36,960 --> 00:30:41,120
अधिक प्रतिष्ठा है। मठ आश्रम है और

443
00:30:41,120 --> 00:30:45,440
सारसत मठ करके पहले आसाम में प्रतिष्ठा किए। इसके बाद बंगाल

444
00:30:45,440 --> 00:30:48,160
में कोई आश्रम प्रतिष्ठा किए।

445
00:30:48,160 --> 00:30:52,560
हमारे ये आश्रम जो है यहां वो मठाश्रम प्रतिष्ठा

446
00:30:52,560 --> 00:30:57,280
करते हुए सारसत मठ सारस्वत आश्रम प्रतिष्ठा किए। भक्तों की

447
00:30:57,280 --> 00:31:01,520
एकत्रित सत्संग के लिए सारस्वत संघ का प्रवर्तन

448
00:31:01,520 --> 00:31:06,080
किए जो एक हप्ताह में हर सप्ताह में उन लोग एकत्र एकत्रित

449
00:31:06,080 --> 00:31:11,280
होते हुए साधना भजन करते हैं और

450
00:31:11,280 --> 00:31:15,680
वो आर्य दर्पण नाम करके एक मासिक पत्रिका

451
00:31:15,680 --> 00:31:20,560
भी प्रवर्तन किए जो 100 साल अभी 115 साल हो गए अभी

452
00:31:20,560 --> 00:31:24,640
एक सार्वभौम भक्त सम्मेलनी नाम के जहांजहां उनके भक्त लोग

453
00:31:24,640 --> 00:31:28,800
है जो भी कोई आ सकता है उसी सम्मेलन में हर साल

454
00:31:28,800 --> 00:31:32,880
वो क्रिश्मास हॉलिडे में है 26 27

455
00:31:32,880 --> 00:31:36,960
28 29 इस दिनों में वो एक भक्त

456
00:31:36,960 --> 00:31:41,200
सम्मेलनीय प्रवर्तन किए जगत कल्याण के लिए मठ आश्रम की समुन्नति

457
00:31:41,200 --> 00:31:45,760
के लिए और सारी विधि व्यवस्था को एक ट्रस्ट डीड करके समर्पण

458
00:31:45,760 --> 00:31:49,920
करके वो ई पुरी में आकर के अवस्थान किए और उस

459
00:31:49,920 --> 00:31:54,080
समय बाद में ये आश्रम हमारे

460
00:31:54,080 --> 00:31:58,720
1900 61 में ट्रस्ट सिद्धांत के अनुसार

461
00:31:58,720 --> 00:32:02,880
संकल्प किया गया पूरी में आश्रम करने के लिए 66 में

462
00:32:02,880 --> 00:32:03,380
यहां की

463
00:32:03,280 --> 00:32:07,680
आश्रम प्रतिष्ठा हुआ इसी आश्रम में इसका

464
00:32:07,680 --> 00:32:11,840
नाम है सारसत श्री निगमानंद सारसत आश्रम

465
00:32:11,840 --> 00:32:16,240
और यहां हमारे गुरु जी की आईडियोलॉजी है

466
00:32:16,240 --> 00:32:20,640
निगमानंद जी की ये उनका दार्शनिक सिद्धांत

467
00:32:20,640 --> 00:32:25,360
है शंकर की मत और गौरांग की पथ शंकर शंकर की माथे

468
00:32:25,360 --> 00:32:29,920
भक्ति उनकी चैतन महाप्रभु की और दर्शन बोल रहा हूं

469
00:32:29,920 --> 00:32:34,080
वो ब्रह्माद्वैत सिद्धांत है जीव ब्रह्म एव

470
00:32:34,080 --> 00:32:38,160
न अपर ये आचार्य शंकर की सिद्धांत है जीव

471
00:32:38,160 --> 00:32:42,400
ब्रह्म है जगत ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या जीव ब्रह्म

472
00:32:42,400 --> 00:32:46,560
एव न अपरह ये इसलिए हर जीव परम ब्रह्म

473
00:32:46,560 --> 00:32:50,880
की सत्ता है परम ब्रह्म से बिल्कुल अभिन्न है लेकिन

474
00:32:50,880 --> 00:32:54,880
लेकिन जीव की कोई बोध नहीं है मैं ब्रह्म हूं जीव फंसे

475
00:32:54,880 --> 00:32:59,040
गए संसार की माया में। इसीलिए उसी बोध को अपना

476
00:32:59,040 --> 00:33:03,200
बोध इस प्रकार नहीं समझ पा रहा था। इसी बोध को प्राप्त

477
00:33:03,200 --> 00:33:07,680
करने के लिए आचार्य शंकर ने थोड़ा से कठोर मार्ग का

478
00:33:07,680 --> 00:33:11,760
उपदेश प्रदान किए। यह ब्राह्मण कुलोदभव सन्यासी ही केवल

479
00:33:11,760 --> 00:33:16,320
उसी स्थिति को प्राप्त कर सकता है। इसीलिए निगम

480
00:33:16,320 --> 00:33:18,480
देव जी देव जी ने थोड़ा

481
00:33:18,480 --> 00:33:23,360
से कोहल पथ सुगम पथ को अपनाया महाप्रभु

482
00:33:23,360 --> 00:33:28,160
सिद्धांत तो आचार्य शंकर का है जीव ब्रह्मा बना अपरा

483
00:33:28,160 --> 00:33:32,880
लेकिन मार्ग को चुना महाप्रभु गौरांग देव जी की जो

484
00:33:32,880 --> 00:33:36,960
भक्ति और सेवा की पथ है भक्ति जीव क्यों नहीं

485
00:33:36,960 --> 00:33:41,520
अनुभव कर पा रहा है जीव इसीलिए अनुभव नहीं कर पा रहा है

486
00:33:41,520 --> 00:33:46,400
उनमें कई आध्यात सिक और बोध है

487
00:33:46,400 --> 00:33:50,400
जो काम क्रोध ये वगैरह प्रतिबंधक हो रहा

488
00:33:50,400 --> 00:33:54,400
है उसको जन्मांतरण संस्कार उसको बाधक हो रहा

489
00:33:54,400 --> 00:33:58,400
है उसी बोध में पहुंचने के लिए इसीलिए उसी संस्कार

490
00:33:58,400 --> 00:34:02,640
को लाघव करने के लिए परिमार्जित करने के लिए परिमल

491
00:34:02,640 --> 00:34:07,520
करने के लिए उन्हें सेवा और नाम संकीर्तन

492
00:34:07,520 --> 00:34:12,000
जप और नाम संकीर्तन को पथ को चुना जो महाप्रभु गौरंग

493
00:34:12,000 --> 00:34:16,240
देव जी की शंकर का मत मत गौरांग का पथ गौरांग का पथ ठीक

494
00:34:16,240 --> 00:34:20,400
उसी मार्ग में सेवा और भजन के मार्ग पर जाकर के

495
00:34:20,400 --> 00:34:24,720
जीव का जिस समय एक तरीके से कहा जाए तो यह जो बहुत

496
00:34:24,720 --> 00:34:28,720
ज्यादा विधि निषेध कर्मकांड इत्यादि पर ध्यान

497
00:34:28,720 --> 00:34:32,720
ना देते हुए भक्ति करना भक्त हैं वो

498
00:34:32,720 --> 00:34:34,160
बोल रहे हैं

499
00:34:34,160 --> 00:34:38,160
करना है सारी को कुछ मना नहीं किया वो मना नहीं

500
00:34:38,160 --> 00:34:42,400
किया भजन सारी पूजन विधि व्यवस्था भी चाहिए लेकिन साधन

501
00:34:42,400 --> 00:34:46,800
मार्ग के लिए भजन पूजन जप वगैरह

502
00:34:46,800 --> 00:34:50,800
ये सारी को आश्रय करना चाहिए। जीव को शिव ज्ञान से नर

503
00:34:50,800 --> 00:34:54,880
को नारायण ज्ञान से सेवा करना चाहिए। उससे ही

504
00:34:54,880 --> 00:34:59,360
धीरे धीरे धीरेधीरे जीव की संस्कार परिमार्जित हो जाएगा। जन्मांतरण

505
00:34:59,360 --> 00:35:03,920
कर्म संस्कार लाघव हो जाएगा। उससे ही जीव अनुभव कर पाएगा।

506
00:35:03,920 --> 00:35:08,000
जिस समय अंत आचार्य शंकर भी शंकर भी उसी प्रकार

507
00:35:08,000 --> 00:35:12,080
भाष्य आदि भाष्य में बोल रहे हैं। जिस समय जीव की

508
00:35:12,080 --> 00:35:16,480
निष्काम कर्म योग निष्काम उपासना के द्वारा अंतकरण

509
00:35:16,480 --> 00:35:20,720
पवित्र हो जाएगा। उस समय उसमें जिज्ञासा आएगी मैं कौन हूं।

510
00:35:20,720 --> 00:35:24,880
और जिज्ञासा के निरसन के लिए गुरु के पास जाने के बाद गुरु जी

511
00:35:24,880 --> 00:35:28,880
ने जो तत्व मसी महावाक्य को उपदेश प्रदान करेंगे उससे

512
00:35:28,880 --> 00:35:32,960
ही ओहम ब्रह्मास्म बोध में प्रतिष्ठा आ सकती है। ये भी

513
00:35:32,960 --> 00:35:37,120
शंकर शंकर सिद्धांत है। इसीलिए गुरु जी

514
00:35:37,120 --> 00:35:41,120
ने उसी को बताया जो निष्काम उपासना के द्वारा कि हम

515
00:35:41,120 --> 00:35:45,120
लोग वहां शंकर सिद्धांत में पहुंच पाएंगे।

516
00:35:45,120 --> 00:35:49,520
मैं ब्रह्म हूं। उसी अनुभूति मुझे भी आ सकती है।

517
00:35:49,520 --> 00:35:54,160
ये हो गए उनके सिद्धांत और उसी को अपना मठाश्रम

518
00:35:54,160 --> 00:35:58,480
में बताया जो हमारे दार्शनिक सिद्धांत है शंकर का मत और

519
00:35:58,480 --> 00:36:02,480
गौरांग का पथ वो भक्त लोगों की उपदेश देने

520
00:36:02,480 --> 00:36:06,480
के लिए बताया उनका मठाश्रम के भी तीन आदर्श है वो

521
00:36:06,480 --> 00:36:10,480
उनकी सिद्धांत है जो हमारे

522
00:36:10,480 --> 00:36:14,720
आदर्श गृहस्थ होना चाहिए जो हमारे चतुराश्रम और चतुर

523
00:36:14,720 --> 00:36:19,280
वर्ण की परंपरा है वो भी उसको भी गुरुत्व दिया प्रदान किए

524
00:36:19,280 --> 00:36:23,440
बोल रहे हैं जे चतुराश्रमिक परंपरा में गृहस्थ आश्रम

525
00:36:23,440 --> 00:36:27,680
सर्वश्रेष्ठ आश्रम है क्योंकि वह सारी आश्रम का पृष्ठ पोषक

526
00:36:27,680 --> 00:36:31,840
है जो ब्रह्मचर्य है वानप्रस्थ है सन्यास है वो सारी

527
00:36:31,840 --> 00:36:35,920
जुड़े हुए सन्यास गृहस्थ आश्रम के साथ इसलिए

528
00:36:35,920 --> 00:36:39,920
गृहस्थ जितना निर्मल पवित्र होगा गृहस्थों

529
00:36:39,920 --> 00:36:44,560
की अन्न जितना पवित्र होंगे उतना ही तीनों आश्रम

530
00:36:44,560 --> 00:36:48,880
उतना ही निर्मल होंगे इसलिए गृहस्थ आश्रम के गृहस्थ स्थाश्रमियों

531
00:36:48,880 --> 00:36:52,960
की साधन के लिए वो जो हमारे शास्त्र में

532
00:36:52,960 --> 00:36:57,840
पंच ऋण के बारे बारे में कहा गया है देव दे देव ऋण

533
00:36:57,840 --> 00:37:01,840
और ऋषि ऋण पितृ मातृ ऋण न ऋण और

534
00:37:01,840 --> 00:37:05,120
भूत ऋण इसी की उसको

535
00:37:05,120 --> 00:37:09,360
परिशोध के लिए वो नियम पंचक नाम के एक

536
00:37:09,360 --> 00:37:13,600
विधि प्रवर्तन किए जिससे साधना के द्वारा

537
00:37:13,600 --> 00:37:17,760
हम लोग देवण देवताओं की उपासना के द्वारा देवण परिशोध

538
00:37:17,760 --> 00:37:22,320
करते हैं। गुरु शास्त्र के आकर शास्त्र के अध्ययन अध्यापना

539
00:37:22,320 --> 00:37:26,560
के द्वारा ऋषि ऋण परिशोध करते हैं। पिता माता की सेवा और श्राद्ध

540
00:37:26,560 --> 00:37:30,800
तर्पण के द्वारा पितृ ऋण निऋण दूसरों के उपकार के

541
00:37:30,800 --> 00:37:35,040
लिए उपकार के लिए इसलिए वो अर्थ

542
00:37:35,040 --> 00:37:39,200
क्लस्ट के कल्याण के लिए गौरंग सेति सेवानिकेतन

543
00:37:39,200 --> 00:37:44,160
नाम के एक सेवा विभाग की प्रवर्तन किए जहां से

544
00:37:44,160 --> 00:37:49,200
सारी सेवा विधि व्यवस्था चलती है और

545
00:37:49,200 --> 00:37:53,200
इस प्रकार सारी विधि व्यवस्था बनाए हमारे मठाश्रम में सारी

546
00:37:53,200 --> 00:37:57,600
विधि व्यवस्था को देखते और गृहस्थों के लिए एक

547
00:37:57,600 --> 00:38:02,400
मठास विशेष विवाह पद्धति ऐसा कुछ

548
00:38:02,400 --> 00:38:06,480
नहीं विधि व्यवस्था जो पंच ऋण की परिशोध

549
00:38:06,480 --> 00:38:11,120
के लिए वो विधि व्यवस्था बनाए और एक बताया जे

550
00:38:11,120 --> 00:38:15,200
साधन साधकों के लिए गृहस्थ साधकों के लिए कि

551
00:38:15,200 --> 00:38:19,200
हम लोग को आदर्श होना चाहिए हमारे ऋषि योग में ऋषियों

552
00:38:19,200 --> 00:38:20,480
भी

553
00:38:20,480 --> 00:38:24,880
गृहस्थ थे वो जिस प्रकार आदर्श को तो जिस प्रकार

554
00:38:24,880 --> 00:38:29,200
आध्यात्मिक आध्यात्मिकता को अपना करके जीवन गुजार

555
00:38:29,200 --> 00:38:33,200
रहे थे उसी प्रकार आध्यात्मिक जीवन जापन हमारे गृहस्थ में

556
00:38:33,200 --> 00:38:37,200
होना चाहिए जैसे सत संतान की आगमन हो

557
00:38:37,200 --> 00:38:41,280
सके इसीलिए कहते हैं आदर्श गृहस्थ जीवन गठन और

558
00:38:41,280 --> 00:38:45,680
संघ होना चाहिए संघ शक्ति कड़ जुगे कलयुग

559
00:38:45,680 --> 00:38:50,320
में कोई एकला साधन करके समुन्नति प्राप्त करे यो बहुत कष्टाध्य

560
00:38:50,320 --> 00:38:54,320
है इसलिए बीच-बीच में हम लोग संघ होकर के आपस में

561
00:38:54,320 --> 00:38:58,560
भाव विनिमय के द्वारा वो अपना जो कमी

562
00:38:58,560 --> 00:39:02,800
को पूर्ति कर सकते हैं। इसलिए तीन प्रकार आदर्श

563
00:39:02,800 --> 00:39:07,360
को भी वो दिगदर्शन पदा आदर्शक व्यस्त जीवन गठन

564
00:39:07,360 --> 00:39:11,840
संघ शक्ति प्रतिष्ठा और भाव विनिमय ये हमारे मठाश्रम

565
00:39:11,840 --> 00:39:16,160
की भी उसी परंपरा में चलता है। चलती है। यहां की भी

566
00:39:16,160 --> 00:39:20,400
जो आश्रम है वह जगतगुरु की जो आसन आप देख

567
00:39:20,400 --> 00:39:24,400
रहे हैं जहां गुरु जी की मूर्ति है उससे पहले एक वेदी है

568
00:39:24,400 --> 00:39:29,120
वो जग उसका वैशिष्ट्य है उसी आसन में

569
00:39:29,120 --> 00:39:33,680
जगतगुरु तो भगवान ही है परमात्मा परमेश्वर है इसीलिए परमेश्वर

570
00:39:33,680 --> 00:39:35,920
में सारी देव देवता है इसीलिए

571
00:39:35,920 --> 00:39:40,000
उसी जगतगुरु के प्रतीकात्मक आसन में कोई

572
00:39:40,000 --> 00:39:44,080
ना कोई देवता की भी कोई भी अपना इष्ट को स्मरण करके

573
00:39:44,080 --> 00:39:49,360
चिंतन करके पूजन भी कर सकता है। भाव भी ले सकता है।

574
00:39:49,360 --> 00:39:53,520
जगतगुरु की जगतुगुरु की आसन प्रतिष्ठा की आसन प्रतिष्ठा हां

575
00:39:53,520 --> 00:39:58,320
मतलब जगतगुरु का आसन है वहां पर आप अपना जिसमें भी जो

576
00:39:58,320 --> 00:40:02,320
उसको स्मरण करके भी आप भाव जगुरु के प्रति भी कर सकते हैं। कर

577
00:40:02,320 --> 00:40:06,560
सकते हैं। कोई भगवान समझ के कर सकते हैं। हां कर सकते हैं। इस प्रकार

578
00:40:06,560 --> 00:40:11,040
व्यवस्था किए और यह जो हमारे आश्रम में वह जगतगुरु

579
00:40:11,040 --> 00:40:15,600
की सेवा में भी निरत है और यहां की एक वेद विद्यालय

580
00:40:15,600 --> 00:40:20,480
है और एक बोर्ड ऑफ सेकेंडरी उड़ीसा सरकार की

581
00:40:20,480 --> 00:40:24,640
तत्वावधान में है लेकिन हम लोग प्राइवेट में उसको मैनेज करते हैं।

582
00:40:24,640 --> 00:40:29,200
सारसत विद्या निकेतन करके वहां से भी 1100 बच्चा पढ़ते हैं।

583
00:40:29,200 --> 00:40:33,280
वो भी मोरालिटी जैसे डेवलप किया जाए उस प्रकार गीता

584
00:40:33,280 --> 00:40:37,280
भाग गीता और ब्रह्मचर्य जोग के भी वहां से शिक्षण

585
00:40:37,280 --> 00:40:41,360
प्रदान करते हैं। हमारे एक दातव्य चिकित्सालय है वहां

586
00:40:41,360 --> 00:40:45,360
से एलोपैथी और आयुर्वेदिक चिकित्सा भी प्रदान किया जाता

587
00:40:45,360 --> 00:40:49,360
है। जगन्नाथ देव जी की जो यात्रा महोत्सव है उसमें भी

588
00:40:49,360 --> 00:40:51,760
हम लोग व्यापक के रूप में

589
00:40:51,760 --> 00:40:56,000
जो आते हैं दर्शनार्थी लोग तीर्थ

590
00:40:56,000 --> 00:41:00,160
तीर्थटन के लिए उन लोगों के भी हम लोग भोजन पान वगैरह

591
00:41:00,160 --> 00:41:04,160
सारी विधि व्यवस्था भी करते हैं उन लोगों के लिए हमारे

592
00:41:04,160 --> 00:41:08,240
गौशाला भी है यज्ञशाला भी है भगवान की कृपा से जगन्नाथ

593
00:41:08,240 --> 00:41:12,320
देव जी की श्री चरण में और गुरु जी की विधि व्यवस्था से

594
00:41:12,320 --> 00:41:16,320
ये सारी चल रहे है वो चला रहा है हम लोग निमित्त मात्र एक बात

595
00:41:16,320 --> 00:41:20,320
बताएं महाराज जी मुख्य रूप से आपके सारसत मंदिर

596
00:41:20,320 --> 00:41:24,400
में जो विग्रह होता है जी वो निगमानंद जी का ही

597
00:41:24,400 --> 00:41:28,560
होता है सबसे जो मेन मंदिर होता है वो गुरु जी की मूर्ति प्रतिष्ठा

598
00:41:28,560 --> 00:41:32,720
की है लेकिन हर प्रायता हर आश्रम में भगवान शंकर

599
00:41:32,720 --> 00:41:36,800
की जो शिवलिंग भी होते हैं और

600
00:41:36,800 --> 00:41:40,880
सबसे बड़ी मूर्ति तो मैंने देखा निगमंद जी की निगानंद जी की अच्छा

601
00:41:40,880 --> 00:41:45,440
एक ये इस तरह की एक वीडियो हमने देखी थी हम

602
00:41:45,440 --> 00:41:50,160
इसमें निगमंद जी हैं हम और

603
00:41:50,160 --> 00:41:54,400
उनके साथ में यह मां भगवती हैं। निगम

604
00:41:54,400 --> 00:41:58,560
सहस्त्र नाम ये आप ही का ऑफिशियल चैनल है

605
00:41:58,560 --> 00:42:04,560
नहीं हमारे यहां के नहीं ये

606
00:42:05,360 --> 00:42:11,360
ये कोई स्तुति हो रही है।

607
00:42:19,200 --> 00:42:23,920
ये आप ही के मतलब आप ही के और कोई वही किया है

608
00:42:23,920 --> 00:42:28,560
ये स्मृति होगी ना आपके यहां कोई कौन सी भाषा में है ये

609
00:42:28,560 --> 00:42:33,280
उड़िया

610
00:42:33,280 --> 00:42:39,280
शास्त्र नाम तो संस्कृत में है अच्छा सुनने दी पहले

611
00:43:05,840 --> 00:43:10,000
ये नहीं है।

612
00:43:10,000 --> 00:43:12,240
संस्कृत

613
00:43:12,240 --> 00:43:16,320
शास्त्र नाम है ना निगम शास्त्र निगम शास्त्र तो यह संस्कृत में

614
00:43:16,320 --> 00:43:21,520
है और ये जो चैनल है ये निगम सुधा

615
00:43:21,520 --> 00:43:25,520
ये चैनल आपके मतलब कोई जानकार वाले हैं या आप ही की

616
00:43:25,520 --> 00:43:29,840
परंपरा की कोई दूस परंपरा में दूसरे कई किए हैं भक्षक के कोई संघर्ष

617
00:43:29,840 --> 00:43:33,840
कर अच्छा होंगे अच्छा इसमें एक ये आगे

618
00:43:33,840 --> 00:43:38,080
ये जो भगवती दिखाई दे रही हैं निगमंद जी के साथ

619
00:43:38,080 --> 00:43:42,160
हम्म तो ये कौन है? उसको गुरु शक्ति कहते हैं। इस प्रकार वो

620
00:43:42,160 --> 00:43:46,480
बैठा दिया उस पर एडिट करके। अच्छा हां गुरु और गुरु शक्ति अभिन्न

621
00:43:46,480 --> 00:43:51,280
कहते हैं ना। अच्छा गुरु और गुरु शक्ति

622
00:43:51,280 --> 00:43:55,520
गुरु शक्ति को त्रिशूल के रूप में ऐसे कल्पना करना थे।

623
00:43:55,520 --> 00:43:59,760
लेकिन वो मूर्ति रूप में बैठा दिया। तो ये वामांग

624
00:43:59,760 --> 00:44:03,840
में इस प्रकार कहने का मतलब है ना कि जैसे ऐसे पत्नी के रूप में बैठी है

625
00:44:03,840 --> 00:44:07,920
वो। है ना? इस प्रकार बैठाना नहीं चाहिए था। हम

626
00:44:07,920 --> 00:44:12,320
लोग भी उसको सही दृष्टि से नहीं लेते।

627
00:44:12,320 --> 00:44:17,120
एक पत्नी की एक काल्पनिक मूर्ति को लेकर के इस प्रकार

628
00:44:17,120 --> 00:44:21,040
दिखाना मां मां जगदंबा उनकी पत्नी के रूप में बैठी हैं।

629
00:44:21,040 --> 00:44:25,520
इस प्रकार अधिक इस प्रकार शोभाजी करना जरूरत

630
00:44:25,520 --> 00:44:29,840
नहीं है। साधन की जगत में जो हो गए हो गए। सुधांशु

631
00:44:29,840 --> 00:44:34,000
माला जी ने जगत जननी थे और उनकी हम लोगों का

632
00:44:34,000 --> 00:44:38,160
श्रद्धा भक्ति है लेकिन एक परम फिर

633
00:44:38,160 --> 00:44:42,640
वो तो उनकी पूर्वाश्रम की बात था एक सन्यासी फिर परमहंस

634
00:44:42,640 --> 00:44:46,800
सन्यासी हां उनको फिर खींच करके ला के सन्यास जीवन में उनकी

635
00:44:46,800 --> 00:44:51,040
पत्नी को संजोग करना ये साधकों की दृष्टि

636
00:44:51,040 --> 00:44:55,040
से सही नहीं सही सही लगेगा कि हमारी जगदंबा को

637
00:44:55,040 --> 00:44:59,600
आप निगमानंद जी के साथ बिठा रहे हो तो अजीब लग रहा है वो इसीलिए

638
00:44:59,600 --> 00:45:01,840
इसीलिए

639
00:45:01,840 --> 00:45:06,000
देखिए आज तो सोशल मीडिया है कोई किसी को रुकावट करने का

640
00:45:06,000 --> 00:45:10,240
भी समर्थ नहीं है। वो क्या कहा निगमानंद जी के जाने के बाद उनका

641
00:45:10,240 --> 00:45:15,040
प्रामाणिक शिष्य किसको माना जाए? नहीं वह तो जाने से पहले

642
00:45:15,040 --> 00:45:20,240
वो ट्रस्ट बोर्ड करके गए ना 11 जन 11

643
00:45:20,240 --> 00:45:24,320
सदस्यों को लेकर के वो उसका परंपरा अभी भी जागृत रखा

644
00:45:24,320 --> 00:45:28,320
है जागृत रखा है तो वो लोग तो ये नहीं करते ना कि ट्रस्ट

645
00:45:28,320 --> 00:45:32,480
बोर्ड से इसका कोई संबंध है नहीं अच्छा तो ये मतलब इसको

646
00:45:32,480 --> 00:45:36,480
एक तरीके से आपको रोकना चाहिए कोई काम

647
00:45:36,480 --> 00:45:40,720
किसको रोकेंगे नहीं बात ये है ना कि फिर आपके नाम से ऐसा

648
00:45:40,720 --> 00:45:45,680
हो रहा है वो निगम ानंद जी के नाम से तो छवि खराब हो गई ना फिर

649
00:45:45,680 --> 00:45:49,920
वो सोशल मीडिया में उसमें कोईकोई प्रतिष्ठित

650
00:45:49,920 --> 00:45:54,000
लोग लोगों के लोगों के भी हाथ है जिन लोग अपना भाव से

651
00:45:54,000 --> 00:45:58,320
इस प्रकार तैयार किया एक ये निगम तत्व में

652
00:45:58,320 --> 00:46:02,720
इन्होंने लिखा कि गौतम ऋषि की देह से बुद्ध देव

653
00:46:02,720 --> 00:46:06,880
मोहम्मद जी ईशु और गौरांग ये सब गौत वो

654
00:46:06,880 --> 00:46:10,880
गौतम ऋषि की देह से उत्पन्न हुए बात में गौतम

655
00:46:10,880 --> 00:46:15,040
ऋषि इसी बात में इसी इसी रूप में आकर के जगत में जन

656
00:46:15,040 --> 00:46:19,520
कल्याण किए। मोहम्मद भी मोहम्मद ईशु ईसा मसीह हां

657
00:46:19,520 --> 00:46:24,160
वो भी मना नहीं कर सकते हमारे जो

658
00:46:24,160 --> 00:46:28,560
एक ये एनीबसंत की बात सुने

659
00:46:28,560 --> 00:46:33,360
होंगे आप एनीबिसेंट हां वो एडिआर में है ना

660
00:46:33,360 --> 00:46:37,440
जो थियोसोफिकल सोसाइटी के फाउंडर उसमें इनके जो

661
00:46:37,440 --> 00:46:40,480
गुरुदेव है

662
00:46:40,480 --> 00:46:44,560
जोगी गुरु सुमेर दास जी उनको तो बताते हैं

663
00:46:44,560 --> 00:46:48,800
वो कई बार क्रिश्चियन पॉप के रूप में भी आए

664
00:46:48,800 --> 00:46:51,680
हैं। क्रिश्चियन पॉप के रूप में आए हैं। कौन

665
00:46:51,680 --> 00:46:55,680
और गौतम ऋषि नहीं नहीं सुमेरदास जी ने

666
00:46:55,680 --> 00:47:00,800
सुमेदा दास जी सुमेरदास जी ने इससे पहले कितना बार क्रिश्चियन

667
00:47:00,800 --> 00:47:05,440
धर्मगुरु के रूप में भी आए हैं। वो खुद ये

668
00:47:05,440 --> 00:47:10,080
जो औरंगजेब भी थे वो एक शरीर में औरंगजेब

669
00:47:10,080 --> 00:47:14,160
हां औरंगजेब वो मुसलमान मुसलमान वो एक शरीर में औरंगजेब

670
00:47:14,160 --> 00:47:18,480
भी थे पिथागोरस मैथमेटिशियन जो पिथागोरस है वो थे

671
00:47:18,480 --> 00:47:23,120
वो आपके पाइथागोरस हां पाइथागोरस मैथमेटिशियन मैथमेटिशियन

672
00:47:23,120 --> 00:47:27,520
वो एक शरीर में वही सुमेरदास जी वही थे हां और सुमेरस

673
00:47:27,520 --> 00:47:31,520
पूर्व पूर्व शरीर में तो सुमेरदास जी या फिर गौतम ऋषि पूर्व नहीं

674
00:47:31,520 --> 00:47:35,760
मैं बोल रहा हूं जी सुमेर दास जी ने इस शरीर में तो

675
00:47:35,760 --> 00:47:39,760
प्रसिद्ध जोगी है और इतना जो सिद्ध महापुरुष है उनका

676
00:47:39,760 --> 00:47:44,560
शिष्य थे आनी बसंत और उन्होंने प्रतिष्ठा किए

677
00:47:44,560 --> 00:47:47,600
क्या आपके

678
00:47:47,600 --> 00:47:52,000
जो मद्रास में थियोसोफिकल

679
00:47:52,000 --> 00:47:56,480
सोसाइटी उसी थियोसोफिकल सोसाइटी से बोल रहे हैं

680
00:47:56,480 --> 00:48:00,960
वैशांत की गुरु जी जोगी गुरु जो सुमेरदास जी जो निगम

681
00:48:00,960 --> 00:48:05,360
देव की भी गुरु जी है अच्छा वो गुरु जी ने इससे पूर्व

682
00:48:05,360 --> 00:48:06,880
शरीर में एनी बेसेंट

683
00:48:06,880 --> 00:48:10,880
के गुरु सुमेर दास जी जो जो वही सुमेर दास जी इनके

684
00:48:10,880 --> 00:48:15,040
भी गुरु हैं गुरु है और एनी बेसेंट ने थियोसफिकल सोसाइटी प्रतिष्ठा

685
00:48:15,040 --> 00:48:19,280
की हां उस वहां की एक चैनल में आप भी देख सकते

686
00:48:19,280 --> 00:48:23,280
हैं वहां बोल रहे सुमेर दास जी ने इससे पूर्व

687
00:48:23,280 --> 00:48:27,360
पूर्व शरीर में कोई बार क्रिश्चियन धर्मगुरु बने

688
00:48:27,360 --> 00:48:31,760
और औरंगजेब जी भी बने और वो

689
00:48:31,760 --> 00:48:35,920
पाइथागोरस जो मैथमेटिक्स भी बने सुमेर दास जी जो निगमन

690
00:48:35,920 --> 00:48:39,920
जी के योगी गुरु थे वो पूर्व शरीर जेब भी बने हैं पूर्व

691
00:48:39,920 --> 00:48:44,000
के शरीर में और वो पथागोरस भी बने पाइथागोरस भी बने और वो

692
00:48:44,000 --> 00:48:48,080
कितना बार यीशु और मोहम्मद के रूप में भी मोहम्मद ने

693
00:48:48,080 --> 00:48:52,160
ई क्रिश्चियन धर्मगुरु भी बने। अच्छा क्रिश्चियन भी वो

694
00:48:52,160 --> 00:48:56,560
इसीलिए वो यदि हो सके इसीलिए हमारे महापुरुषों ने बीच-बीच

695
00:48:56,560 --> 00:49:00,880
में कोई उसको कहते हैं आवेश अवतार अवतार तो कितना प्रकार के होते हैं

696
00:49:00,880 --> 00:49:04,960
ऋषि ने रूप लिया उस ईशु का

697
00:49:04,960 --> 00:49:08,960
उसी रूप नहीं ले सकते ले भी सकते

698
00:49:08,960 --> 00:49:13,120
उसमें आवेश होते हैं बीच-बीच में हमारे ऋषियों ने

699
00:49:13,120 --> 00:49:17,280
अपना तपशक्ति को आश्रय करते हुए जगत की कल्याण

700
00:49:17,280 --> 00:49:21,440
के लिए कोई निर्मल पवित्र आधार में आवेश हो जाते हैं। उसको

701
00:49:21,440 --> 00:49:22,080
कहते हैं आशा

702
00:49:22,080 --> 00:49:26,080
अवतार। इसी दृष्टि से वो बताया। इसमें एक चीज नहीं आती।

703
00:49:26,080 --> 00:49:30,400
जैसे पुराण के द्वारा प्रतिपादित होने वाला जो ईश्वर है सिद्धांत है।

704
00:49:30,400 --> 00:49:34,400
जो कि मोहम्मद ने बताया है या बाइबल है

705
00:49:34,400 --> 00:49:39,200
तो वह तो हमारे सिद्धांत के बिल्कुल विपरीत है। देखिए

706
00:49:39,200 --> 00:49:43,440
विपरीत नहीं है। ये हमारे सनातन सिद्धांत है।

707
00:49:43,440 --> 00:49:47,520
कुरान में भी वही है। देखिए हमारे सिद्धांत को चुरा करके एक

708
00:49:47,520 --> 00:49:51,520
सिद्धांत को वो बोल रहे हैं। सब सब कुछ है। चुरा के कहां? वो तो वही है ना। गौतम ऋषि

709
00:49:51,520 --> 00:49:55,760
तो प्रकट हुए। चुराया कहां से? नहीं नहीं। वही बोल रहा हूं। हमारे सनातन सिद्धांत

710
00:49:55,760 --> 00:49:59,760
को सनातन सिद्धांत को एक-एक सिद्धांत को उन

711
00:49:59,760 --> 00:50:04,000
लोग वो सर्वश्रेष्ठ कह करके बोल रहे हैं। हमारे

712
00:50:04,000 --> 00:50:08,000
सेवा भी है समर्पण भी है कि नहीं? हमारे सनातन सिद्धांत

713
00:50:08,000 --> 00:50:12,160
में सेवा और समर्पण है कि नहीं? वो तो उन लोग को तो वही नहीं कुर्बान

714
00:50:12,160 --> 00:50:16,160
भी कर रहा है जो अंत है निचोड़ है वो तो बिल्कुल विपरीत

715
00:50:16,160 --> 00:50:20,240
जैसे भी एक जगह कहा गया है 334 में कहा गया कि

716
00:50:20,240 --> 00:50:24,320
यदि तुमने किसी को बहन बेटी मां इत्यादि बोल दिया फिर भी

717
00:50:24,320 --> 00:50:28,320
तुम उसके साथ विवाह कर सकते हो कुरान में नहीं वो अलग है

718
00:50:28,320 --> 00:50:33,280
मैं उसे वहां नहीं जा रहा हूं तो फिर कुरान में तो कुछ कुछ कुछ

719
00:50:33,280 --> 00:50:37,120
है जिसको भी ग्रहणीय नहीं है

720
00:50:37,120 --> 00:50:41,120
इस प्रकार कहते हैं तो फिर हम फिर कुरान को क्यों जस्ट वो करना

721
00:50:41,120 --> 00:50:45,360
नहीं देखिए देखिए कलुषित हमारे सना ये

722
00:50:45,360 --> 00:50:49,760
हमारे हिंदुओं में भी एक कोई परंपरा है जिन लोग गीता की

723
00:50:49,760 --> 00:50:54,000
कुछ श्लोक को स्वीकार करते हैं और कुछ अपव्याख्या भी करते

724
00:50:54,000 --> 00:50:58,160
हैं अपना अनुकूल में व्याख्या करते हैं उसी प्रकार कुरान

725
00:50:58,160 --> 00:51:02,160
के सिद्धांत को भी कुछ कुछ लोग ये क्या-क्या कर रहे हैं हम लोगों का

726
00:51:02,160 --> 00:51:06,160
ऐसा पता नहीं है नहीं मगर ये है ना कि कुरान जिन लोगों से हमारे

727
00:51:06,160 --> 00:51:10,320
पास तक आई है जैसे परंपरा हम तो उनकी कुरान की जो परंपरा

728
00:51:10,320 --> 00:51:14,560
है कुरान में क्या लिखा है यह कुरान वाले ही बता सकते हैं। उनकी जो परंपरा है जैसे

729
00:51:14,560 --> 00:51:18,640
हमारे वेदांत में क्या लिखा है वो हम शंकर परंपरा वाले ही बता सकते हैं क्या

730
00:51:18,640 --> 00:51:22,640
लिखा है कोई दूसरा आके चैलेंज नहीं कर सकता कि नहीं मुझको ज्यादा पता है आपको कम

731
00:51:22,640 --> 00:51:26,640
पता है क्योंकि वो लेके कौन आ रहा है वेदांत परंपरा से

732
00:51:26,640 --> 00:51:30,640
लेके आ रहे हैं। ऐसे ही कुरान जो लेके आ रहे हैं वो कुरान वाले लेके आ रहे हैं।

733
00:51:30,640 --> 00:51:34,720
कुरान वाले क्लेम कर रहे हैं कि नहीं बोली मुंह बोली बहन से

734
00:51:34,720 --> 00:51:38,960
विवाह हो सकता है। हमारे यहां कह रहे हैं रघकुल रीत सदा चली आई प्राण जाई पर प्रवचन

735
00:51:38,960 --> 00:51:43,200
ना जाए विवाह नहीं हो सकता है तो इस तरीके से गौतम

736
00:51:43,200 --> 00:51:47,360
ऋषि के द्वारा मोहम्मद का प्रकट होना ये जो है

737
00:51:47,360 --> 00:51:51,360
देखिए ले देखिए ये जो हम लोग एक तरीके से हम लोग नहीं नहीं

738
00:51:51,360 --> 00:51:52,160
सुनिए मुसलमान

739
00:51:52,160 --> 00:51:56,160
जो इस्लाम है उसको पार्ट बना रहे हैं पार्ट नहीं है

740
00:51:56,160 --> 00:52:00,320
नहीं नहीं हम लोगों को कहना है अवतार जो दार्शनिक

741
00:52:00,320 --> 00:52:04,560
नहीं नहीं मैं व्यवहार के ऊपर नहीं जा रहा हूं व्यवहार में

742
00:52:04,560 --> 00:52:08,560
कोई कैसे शादी ब्याह कर रहे हैं वो वहां नहीं जा रहा

743
00:52:08,560 --> 00:52:12,560
हूं। हमारे जो परंपरा है जो दार्शनिक सिद्धांत

744
00:52:12,560 --> 00:52:17,280
है जो मैं उसी के ऊपर फोकसिंग कर रहा हूं।

745
00:52:17,280 --> 00:52:21,440
हमारे ऋषियों ने भी उसके ऊपर फोकसिंग करते थे। लेकिन ये

746
00:52:21,440 --> 00:52:25,440
जो व्यवहार को कैसे वो जो देखिए कुरान में जैसे कह रहे हैं

747
00:52:25,440 --> 00:52:29,600
उस कुरान को मानने वाले मैडम लोग भी उसको कहां-कहां

748
00:52:29,600 --> 00:52:33,680
भी विरोध करते हैं। हमारे कुरान में है नहीं करके। जिस

749
00:52:33,680 --> 00:52:37,920
प्रकार में करते हैं कहां-कहां भी मगर उनके जो ऑथेंटिक

750
00:52:37,920 --> 00:52:42,000
वो है ना चैन ऑफ नरेशन वाले वो जो कहेंगे वो मानना पड़ेगा भले ही कोई कुछ भी

751
00:52:42,000 --> 00:52:46,960
कहता रहे नहीं देखिए सब कुछ वहां

752
00:52:46,960 --> 00:52:50,960
जैसे शंकराचार्य ने क्या कहा जैसे जैसे निगमानंद जी ने क्या कहा वो जो

753
00:52:50,960 --> 00:52:55,200
11 बोर्ड मेंबर्स हैं वो जो कहेंगे मानना पड़ेगा कि निगमानंद जी ने ये कहा

754
00:52:55,200 --> 00:52:59,360
कोई और आके चैलेंज नहीं कर सकता क्योंकि वो ऑथेंटिक है उनको ठप्पा लगा के गए कि मैंने

755
00:52:59,360 --> 00:53:03,360
जो कहा वो ये बताएंगे तो ऐसे ही कुरान ने जो मोहम्मद ने

756
00:53:03,360 --> 00:53:07,600
जो कहा है वो वही बता बताएंगे जो मोहम्मद के बाद की सीरीज में है। सीरीज

757
00:53:07,600 --> 00:53:11,760
में देखिए बात में उसको कुछ कुछ भी इधर-उधर किया गया है तो तो हम तो

758
00:53:11,760 --> 00:53:15,840
हम यह नहीं कह सकते ना कि कुरान ने ये लिखा हम ये कह सकते हैं हम नहीं मानते। हम कुरान को

759
00:53:15,840 --> 00:53:20,000
ही नहीं मानते। मगर कुरान में ये लिखा है जो हम जानते हैं और वो नहीं लिखा

760
00:53:20,000 --> 00:53:24,880
है जो वो जानते हैं। वो फिर गलत क्लेम हो जाएगा।

761
00:53:24,880 --> 00:53:28,960
आप क्या कह रहे हैं? कुरान को क्या करना? नहीं नहीं मैं

762
00:53:28,960 --> 00:53:32,960
बस यह कह रहा हूं थोड़ा सा कि गौतम ऋषि के देह से यह सब उत्पन्न हुए तो

763
00:53:32,960 --> 00:53:37,040
इसमें कहीं ना कहीं समाज में एक शंका आ सकती है। बस वो कह रहा हूं। निगम तत्व

764
00:53:37,040 --> 00:53:41,120
में एक बात कही है कि अल्लाह का नाम लो या भगवान का नाम लो जिसमें आपकी

765
00:53:41,120 --> 00:53:45,120
आस्था लग जाए उसका नाम आपको लेना चाहिए। तो

766
00:53:45,120 --> 00:53:49,760
सनातनियों के लिए नहीं है। जो जिस धर्म में ये बोलता रहे

767
00:53:49,760 --> 00:53:53,920
आपकी आप तो खींच के किसी को ला नहीं सकते। सनातनी

768
00:53:53,920 --> 00:53:58,320
बन जाओ। ये तुम्हारे उसी में उनकी कहना है। तुम्हारे उसमें आस्था

769
00:53:58,320 --> 00:54:02,480
है तो उसको ही आश्रय करो। समय आएगा

770
00:54:02,480 --> 00:54:06,560
वो भगवान ने तुम खींच करके सही रास्ता पर ले आए। मतलब ये कहा है ना इन्होंने

771
00:54:06,560 --> 00:54:10,640
कि अल्लाह का नाम लो या भगवान का जिसमें तुम्हारी आस्था है। इस्लाम लोग तो अल्लाह का नाम लेंगे

772
00:54:10,640 --> 00:54:14,800
ही। इस्लाम लोग तो अल्लाह उनकी तो कोई भी

773
00:54:14,800 --> 00:54:18,800
इस्लामिक जिसका जिसमें आस्था हो उसका नाम उसका पहले उसको ही आस्था

774
00:54:18,800 --> 00:54:23,200
पोषण करो। बाद में जो जरूरत होगा भगवान जी ने करा लेंगे तुमसे।

775
00:54:23,200 --> 00:54:27,520
कहना है इस वाले भी यही कहते हैं। इस वाले भी इस

776
00:54:27,520 --> 00:54:31,520
जानते हैं आप इस वाले आते हैं कभी-कभी आपके यहां यहां नहीं आते पूरी

777
00:54:31,520 --> 00:54:35,600
में आते हैं पूरी भुवनेश्वर में जो आते हैं अनुष्ठान में अनुष्ठान में आते हैं

778
00:54:35,600 --> 00:54:39,600
तो वो भी वो भी इसी तरह से प्रचार करते हैं कि भाई अल्लाह और कृष्ण

779
00:54:39,600 --> 00:54:43,760
एक हैं तुम अल्लाह को भजे या कृष्ण को भजो अल्लाह कृष्ण है कि नहीं ऐसे कहना

780
00:54:43,760 --> 00:54:48,800
नहीं चाहिए तुम्हारी इस्लामियों को कि तुम्हारी अल्लाह में

781
00:54:48,800 --> 00:54:53,120
आस्था है उसको भजो बाद में वो भगवान

782
00:54:53,120 --> 00:54:57,120
जी ने जो जिसको खींचना है जहां खींच लेंगे जी अच्छा ये निगम तत्व में

783
00:54:57,120 --> 00:55:01,600
एक चीज लिखी है मनुस्मृति के आधार पर लिखा है कि

784
00:55:01,600 --> 00:55:04,800
अह अगर कोई

785
00:55:04,800 --> 00:55:09,040
शूद्र कुल में जन्म लेता है तो बाद में कर्म के अनुसार जो है वो

786
00:55:09,040 --> 00:55:13,040
ब्राह्मण भी बन सकता है।

787
00:55:13,040 --> 00:55:17,360
वहां कहते हैं जन्मना जायते शद्रम

788
00:55:17,360 --> 00:55:21,840
जी अह संस्कारा द्विजो उच्चते

789
00:55:21,840 --> 00:55:25,920
वेदाध्याय भवेत विप्र ब्रह्म जानातीति ब्राह्मण

790
00:55:25,920 --> 00:55:30,000
ये भी एक मनुस संगीिता में एक श्लोक है उसके आधार पर

791
00:55:30,000 --> 00:55:34,080
कहते हैं जिस प्रकार हमारे विश्वामित्र जी ने

792
00:55:34,080 --> 00:55:38,160
क्षत्रिय थे क्षत्रिय थे बाद

793
00:55:38,160 --> 00:55:42,320
में जिस समय वशिष्ठ के साथ उनका टक्कर हुआ उस

794
00:55:42,320 --> 00:55:46,640
समय में वशिष्ठ देव जी की ब्रह्मत से वो प्रतिहत

795
00:55:46,640 --> 00:55:50,640
हो गए। इसीलिए बाद में तपस्या करके ब्रह्मसित को

796
00:55:50,640 --> 00:55:54,640
प्राप्त किए। तो क्षत्रिय ब्रह्मसित को प्राप्त हो गए।

797
00:55:54,640 --> 00:55:58,720
मगर इस ये वाला प्रश्न तो युधिष्ठिर जी ने पूछा था भीष्म जी से

798
00:55:58,720 --> 00:56:03,200
कि इसमें वो बताते हैं भीष्म जी कि क्या कहते हैं? ऐसा नहीं है।

799
00:56:03,200 --> 00:56:07,440
वो जो उनका जन्म के समय का प्रसंग था ना हम तो उनकी माता

800
00:56:07,440 --> 00:56:11,440
ने ब्राह्मणोचित खीर खा ली थी जिसमें ब्राह्मण तत्व था।

801
00:56:11,440 --> 00:56:15,440
अच्छा और जो परशुराम जी की माता है उन्होंने क्षत्रियचित

802
00:56:15,440 --> 00:56:19,600
खीर खा ली थी। जहां पे क्षत्रिय तत्व का बालक जन्म लेना था वहां ब्राह्मण

803
00:56:19,600 --> 00:56:23,680
तत्व का बालक जन्म ले लिया और जहां पे ऋषि द्वारा दिया गया वो था

804
00:56:23,680 --> 00:56:27,840
वरदान। तो फिर बाद उनके अंदर तत्व तो जन्म से ही था क्योंकि

805
00:56:27,840 --> 00:56:28,340
उन्होंने

806
00:56:28,080 --> 00:56:32,080
वो वरदान था। फिर बाद में वो कई बार वशिष्ठ जी के पास गए।

807
00:56:32,080 --> 00:56:36,320
परंतु वशिष्ठ जी ने उनको ब्रह्म ऋषि नहीं माना। अंत में उन्होंने बहुत

808
00:56:36,320 --> 00:56:40,720
तपस्या की। बहुत तपस्या की। तब ब्रह्मा जी ने आकर के कहा कि तुम ब्रह्म

809
00:56:40,720 --> 00:56:45,520
ऋषि हो गए। हो गए। मगर वो जो तत्व था वो जन्म से था उनके अंदर।

810
00:56:45,520 --> 00:56:49,520
तो और दूसरी बात यह है कि जैसे मनुस्मृति में यह बताया गया है

811
00:56:49,520 --> 00:56:53,520
कि अमुक अमुक अवधि में

812
00:56:53,520 --> 00:56:57,600
जैसे इस वाली ऋतु में ब्राह्मण का जनेऊ

813
00:56:57,600 --> 00:57:01,760
होना चाहिए। इस ऋतु में क्षत्रिय का जनेऊ होना चाहिए। या फिर इतनी

814
00:57:01,760 --> 00:57:05,920
आयु से पहले ब्राह्मण का जने हो जाना चाहिए। इतनी आयु से पहले क्षत्रिय

815
00:57:05,920 --> 00:57:10,000
का जने हो जाना चाहिए। यानी कि जनेऊ होने से पहले ही यह तय

816
00:57:10,000 --> 00:57:14,000
करना है कि यह ब्राह्मण है कि क्षत्रिय है कि वैश्य के शूद्र है तो फिर जन्म से ही मानना

817
00:57:14,000 --> 00:57:18,080
पड़ेगा हम और एक ये चीज आ जाती है कि कौन सा एग्जजेक्टली

818
00:57:18,080 --> 00:57:23,360
कर्म होगा जिसके आधार पे ये माना जाए कि हां अब ये ब्राह्मण हो गया

819
00:57:23,360 --> 00:57:28,800
ये दिक्कतें आएंगी। अच्छा अब एक एक चीज और है कि

820
00:57:28,800 --> 00:57:32,960
क्या आपके कोई यह जो 11 बोर्ड मेंबर्स

821
00:57:32,960 --> 00:57:36,960
हैं प्रामाणिक शिष्य निगमानंद जी के इनके अलावा भी और

822
00:57:36,960 --> 00:57:41,120
कोई शिष्य हो सकते हैं जो प्रामाणिक हो। मतलब निगमानंद जी की

823
00:57:41,120 --> 00:57:43,520
ओर से कौन क्लेम कर सकता है कि निगमानंद

824
00:57:43,520 --> 00:57:47,680
जी ने क्या कहा और क्या नहीं कहा? जैसे कोई अभी आप बता रहे हो कि कोई

825
00:57:47,680 --> 00:57:52,000
अपने मन से निगमंद देव जी ने जो कुछ किए

826
00:57:52,000 --> 00:57:56,000
हम उनकी परंपरा चलने के लिए तो वो विधि व्यवस्था

827
00:57:56,000 --> 00:58:00,160
करके गए बोर्ड तैयार करके इन लोग हमारी प्रशासनिक और

828
00:58:00,160 --> 00:58:04,400
विधि व्यवसाय विधि व्यवस्था को चलाएंगे 11 इसके बाद

829
00:58:04,400 --> 00:58:08,480
में क्या कौन क्या कर रहे हैं मतलब मेन प्रमाणिक यही है

830
00:58:08,480 --> 00:58:12,720
यही है इसके बाद जो कुछ करेगा वो कुछ ना कुछ स्वेच्छाचारिता

831
00:58:12,720 --> 00:58:16,960
कुछ ना कुछ भ्रष्टाचार 11 में से आप भी मैं पहले था बीच

832
00:58:16,960 --> 00:58:20,960
में मैं छोड़ के भारत भ्रमण में चले गए थे। इसीलिए अभी तक फिर

833
00:58:20,960 --> 00:58:25,040
दूसरी बार उसमें नहीं गए। अच्छा आपके यहां पे

834
00:58:25,040 --> 00:58:29,280
गुरु जी की सभा के निर्देश आएगा तो कब हो सकता है नचे वही तो जो कर रहा हूं।

835
00:58:29,280 --> 00:58:33,440
अच्छा आपके यहां पे विदेश यात्रा का क्या निषेध है? कर सकते

836
00:58:33,440 --> 00:58:37,440
हैं जा सकते हैं। विदेश यात्रा जा सकते हैं। जाते हैं। जाते हैं। विदेश

837
00:58:37,440 --> 00:58:41,600
कर सकते हैं। इस बारे में विदेश यात्रा को उन्होंने स्वीकार किया।

838
00:58:41,600 --> 00:58:46,080
निवांत जी उनके समय पे प्रश्न नहीं आया था।

839
00:58:46,080 --> 00:58:50,160
विदेश में हम लोग हमारे जो मान लीजिए उनके समय एक मिनट जब मान लीजिए उनके

840
00:58:50,160 --> 00:58:54,400
समय पे नहीं आया तो फिर हमें देखना पड़ेगा कि उनके गुरु ने क्या कहा अब उनके

841
00:58:54,400 --> 00:58:59,680
गुरु हैं सच्चिदानंद जी शंकर परंपरा वो तो कह रहे हैं कि विदेश यात्रा

842
00:58:59,680 --> 00:59:03,760
द्विजों को नहीं करनी चाहिए नहीं करना चाहिए है ना तो फिर हम लोग क्या माने कि करनी

843
00:59:03,760 --> 00:59:07,920
चाहिए कि नहीं करनी चाहिए अकॉर्डिंग टू निगम इसके

844
00:59:07,920 --> 00:59:12,880
ऊपर तो वो कुछ कहा नहीं लेकिन हमारे जो

845
00:59:12,880 --> 00:59:16,880
भक्त लोग कुछ है लोग विदेश में रह रहे हैं।

846
00:59:16,880 --> 00:59:20,880
वहां विदेश में हमारे जो सारसत संघ है ना वो संगठन

847
00:59:20,880 --> 00:59:24,880
बना के भी वहां पूजा पाठ कर रहे हैं। मतलब विदेश यात्रा अलाउ

848
00:59:24,880 --> 00:59:29,200
है निगमानंद जी के अकॉर्डिंग अकॉर्डिंग उनके अकॉर्डिंग वो तो कुछ कहा नहीं

849
00:59:29,200 --> 00:59:33,520
बात में कोई तो फिर आपको प्रामाणिक कैसे माना जाएगा फिर जब निगमानंद

850
00:59:33,520 --> 00:59:37,680
जी के गुरु जो कह रहे हैं वो आप 11 लोग नहीं कर रहे हैं। मान लीजिए या

851
00:59:37,680 --> 00:59:41,840
तो यह मानना पड़ेगा निगमानंद जी ने थोड़ी बहुत अपने से अलऊ किया

852
00:59:41,840 --> 00:59:46,000
हम और अगर आप नहीं निगमंद जी को नहीं मान रहे मान लीजिए निगमानंद जी ने इसमें

853
00:59:46,000 --> 00:59:50,000
मौन है और उनके गुरु कह रहे हैं विदेश यात्रा नहीं तो फिर आप लोग कर

854
00:59:50,000 --> 00:59:54,160
रहे हैं तो फिर आपकी ऑथेंटिसिटी पे सवाल आ जाएगा क्या अपने मन से अपने मन से देखिए देखिए

855
00:59:54,160 --> 00:59:58,320
अभी निगम देव जी ने जहां पहले

856
00:59:58,320 --> 01:00:02,640
मठाश्रम की सूचना की वो तो अभी बंगाल बांग्लादेश

857
01:00:02,640 --> 01:00:06,960
में हो गए हम वहां लाखों भगत हैं हम

858
01:00:06,960 --> 01:00:11,040
बांग्लादेश नहीं बांग्लादेश की नहीं बात कर समुद्र पार की जो विदेश यात्रा भाई

859
01:00:11,040 --> 01:00:14,800
ऐसे तो अपना अखंड भारत का जो नक्शा है उसमें तो बांग्लादेश वगैरह सब आ जाता है

860
01:00:14,800 --> 01:00:18,960
आ जाता है वो जो विदेश यात्रा है समुद्र पार करके जापान यूएसए

861
01:00:18,960 --> 01:00:23,040
यूएसए सब जिनको मलेच्छ भूमि कहा गया तो वहां

862
01:00:23,040 --> 01:00:27,280
उसके विधि निषेध की बात कर रहा हूं उसके पर

863
01:00:27,280 --> 01:00:31,440
हमारे कोई अभी तक ठीक है एक चीज और है क्या

864
01:00:31,440 --> 01:00:36,720
कोई श्री अमृतानंद सरस्वती जी भी शिष्य हैं क्या निगमानंद जी

865
01:00:36,720 --> 01:00:40,800
अमृतानंद सरस्वती आपने डायरेक्ट निगानंद जी से

866
01:00:40,800 --> 01:00:44,880
लिया बात नहीं उनके शिष्य से उनके शिष्य के शिष्य हैं तो

867
01:00:44,880 --> 01:00:49,200
कोई अमृतानंद सरस्वती जी भी हैं शिष्य नहीं तो प्रामाणिक

868
01:00:49,200 --> 01:00:53,360
शिष्य अच्छा क्योंकि कोई अच्छा एक चीज और

869
01:00:53,360 --> 01:00:57,440
है आपके पास ज्ञान कई जगह से आया है क्योंकि निगमंद

870
01:00:57,440 --> 01:01:01,680
जी की कई परंपराएं हो गई एक बाबा के कृपाल जी की हो गई एक वो सुमेरु

871
01:01:01,680 --> 01:01:05,920
सुमेर दास जी की हुई और वेदांत की परंपरा शंकराचार्य जी की हो तो

872
01:01:05,920 --> 01:01:09,920
यह माना जाएगा गौरिमा भी है बाप की परंपरा बाप शादी का

873
01:01:09,920 --> 01:01:14,320
बाप शादी का क्या है गौरिमा है ना गौरिमा जहां जाकर के

874
01:01:14,320 --> 01:01:18,400
जो निर्विकल्प समाधि में जिसको अनुभव किए वहां कौन गुरु

875
01:01:18,400 --> 01:01:22,400
थे गुरु थे गौरिमा बताया ना गौरी हां प्रति बताया अच्छा वो इनकी गुरु

876
01:01:22,400 --> 01:01:26,400
थी एक चौथा गुरु थे मतलब महिला इनकी गुरु एक

877
01:01:26,400 --> 01:01:30,880
बाप उनसे कोई नहीं मार्गदर्शन

878
01:01:30,880 --> 01:01:35,120
हां वो जिस समय अन्नपूर्णा जी ने बताया तुम अभी भी अपूर्ण है

879
01:01:35,120 --> 01:01:39,600
निर्विकल्प समाधि में जो परतत्व को साक्षात्कार किए वही तत्व

880
01:01:39,600 --> 01:01:45,040
यहां कण-कण में है। उसको भी अनुभव करना है। इसीलिए वो

881
01:01:45,040 --> 01:01:49,200
पहले जो गुरु मां जो सच्चिदानंद जी के साथ गए थे गौरी

882
01:01:49,200 --> 01:01:53,200
मां के आश्रम गौरी मां जी ने वहां बताए थे कि उसका

883
01:01:53,200 --> 01:01:57,200
निर्विकल्प समाधि हो जाने से मुझे भेज देना। अच्छा उसको याद करते हुए वहां

884
01:01:57,200 --> 01:02:01,440
चले गए और वहां उनके संस्पर्श में आते हुए वो 250 साल की

885
01:02:01,440 --> 01:02:05,440
उम्र वाली थी वो माने 250 साल उम्र वाली

886
01:02:05,440 --> 01:02:09,680
और वहां से उनके संस्पर्श में आते हुए

887
01:02:09,680 --> 01:02:14,240
वो उनका संस्पर्श में आते हुए उनका दृष्टि खुल गई

888
01:02:14,240 --> 01:02:18,320
जिसको मैंने वहां दर्शन किए थे वो यहां भी तो एक बात तो माननी

889
01:02:18,320 --> 01:02:22,320
पड़ेगी ना कि आपकी जो वैदिक परंपरा है वो वैदिक परंपरा आपकी

890
01:02:22,320 --> 01:02:26,560
शंकराचार्य से ही आई है वेदांत क्योंकि वो तो तंत्रोक्त हो गई वो

891
01:02:26,560 --> 01:02:30,720
वाली है ना तो वेदांत की परंपरा आपकी शंकराचार्य से ही आई है। यानी कि

892
01:02:30,720 --> 01:02:34,720
जो सिद्धांत हैं या जो भी ग्रंथ इत्यादि है वो शंकर परंपरा

893
01:02:34,720 --> 01:02:38,960
से ही आ रहे हैं। तो अब क्या हो रहा है कि

894
01:02:38,960 --> 01:02:43,200
क्या यह माना जा सकता है कि शंकर शंकराचार्य

895
01:02:43,200 --> 01:02:45,920
परंपरा ने जो आज के जो वर्तमान जगतगुरु

896
01:02:45,920 --> 01:02:50,000
शंकराचार्य होते हैं वो कोई सिद्धांत बता दें

897
01:02:50,000 --> 01:02:54,000
कि ऐसा-सा हमारे ग्रंथ में लिखा है। परंतु कोई अपने

898
01:02:54,000 --> 01:02:58,000
आप को निगमानंद जी का शिष्य कहते हुए यह कहे कि नहीं नहीं यहां पर शंकराचार्य

899
01:02:58,000 --> 01:03:02,160
गलत बोल रहे हैं। वैदिक उसमें वैदिक ग्रंथावली में तो क्या उसका

900
01:03:02,160 --> 01:03:06,160
मान्य होगा? जैसे कि मेरे गुरु ने मुझको मंत्र वेद के

901
01:03:06,160 --> 01:03:10,160
मंत्र भी दिए हम और उसका अर्थ भी दिया। हम अब मैं अगर

902
01:03:10,160 --> 01:03:14,160
कहूं कि मुझे तुम्हारे मंत्र पे तो विश्वास है कि ये भगवान का मंत्र है। हम

903
01:03:14,160 --> 01:03:18,880
वेदों भगवान का दिया हुआ ज्ञान है। मगर अर्थ मैं अपना निकालूंगा।

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01:03:18,880 --> 01:03:23,120
तो इसका मतलब जब मैं मुझे अगर उसके अर्थ पर विश्वास नहीं है तो मुझे उसके

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01:03:23,120 --> 01:03:27,440
मंत्र पर भी विश्वास नहीं है। क्योंकि मुझे उसकी क्रेडिबिलिटी पर विश्वास

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01:03:27,440 --> 01:03:31,440
नहीं है ना और यदि मुझे उसके मंत्र पर विश्वास है तो मुझे उसके अर्थ पे

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01:03:31,440 --> 01:03:35,440
भी विश्वास होना चाहिए। मैं अगर अपने आप को निगमानंद परंपरा से कह रहा हूं

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01:03:35,440 --> 01:03:39,520
और निगमानंद जी शंकर परंपरा से वेदांत पढ़ते हैं पढ़ाते

909
01:03:39,520 --> 01:03:44,160
हैं। तो हम शंकर परंपरा के जो मान्य आचार्य हैं शंकराचार्य

910
01:03:44,160 --> 01:03:48,160
उनका विरोध हम नहीं कर सकते। करेंगे तो हम निगमानंद परंपरा के सिद्ध नहीं

911
01:03:48,160 --> 01:03:52,160
होंगे और यदि निगमानंद जी कर देते तो वो शंकराचार्य परंपरा के सिद्ध नहीं

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01:03:52,160 --> 01:03:56,480
होते। है तो ये थोड़ा सा मैं आपसे कहूंगा कि जो

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01:03:56,480 --> 01:04:00,720
श्री अमृतानंद सरस्वती जी हैं स्वामी अमृतानंद सरस्वती

914
01:04:00,720 --> 01:04:01,220
जी

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01:04:01,200 --> 01:04:05,520
उनके नाम से एक दुष्प्रचार किया जा रहा है। थोड़ा सा आप इस पर अगर

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01:04:05,520 --> 01:04:09,760
हो सके तो पता करिएगा कि उनके आश्रम कहां वो शायद अपने आप को बोर

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01:04:09,760 --> 01:04:13,760
का बताया गया है। उन्होंने तो पूछा गया उस व्यक्ति से कि भाई

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01:04:13,760 --> 01:04:17,840
तुम्हारे वो जो जिनका तुम गुरु का नाम ले रहे हो वो कहां है? पहले तो बताया कि मैं

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01:04:17,840 --> 01:04:21,920
बताऊंगा ही नहीं। फिर धीरे-धीरे थोड़ा सा उसने बताया कि स्वामी अमृतानंद सरस्वती

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01:04:21,920 --> 01:04:26,000
जी बोर में है। नहीं नहीं वैसे कोई हमारे बेंगलुरु में भी कोई सन्यास आश्रम

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01:04:26,000 --> 01:04:30,000
है नहीं हम और कोई क्या कर रहे हैं वह अपना

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01:04:30,000 --> 01:04:34,160
बिजनेस चलाने के लिए कोई कोई भी इस प्रकार मतलब निगमंद जी का कोई

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01:04:34,160 --> 01:04:38,800
प्रामाणिक शिष्य नहीं है नहीं बिल्कुल स्वामी अमृतानंद सरस्वती के नाम से

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01:04:38,800 --> 01:04:42,880
है ना शिष्य है तो वो बताना चाहिए किनसे लिया प्रामाणिक मतलब

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01:04:42,880 --> 01:04:46,880
उत्तराधिकारी देखिए शंकराचार्य के हम भी शिष्य हैं हमारी जो ट्रस्ट परंपरा में वो

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01:04:46,880 --> 01:04:51,040
बिल्कुल जुड़े हुए हैं हां तो निगमानंद जी का कोई प्रामाणिक शिष्य नहीं है

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01:04:51,040 --> 01:04:55,440
अमृतानंद सरस्वती जी नाम है ना चलिए जैसे कहिए उड़ीसा

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01:04:55,440 --> 01:04:59,600
में भी कई कई बहुत प्रतिष्ठित हो गए लेकिन कोई हमारे

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01:04:59,600 --> 01:05:03,760
जो परंपरा के पारंपरिक में भी है नहीं अपना को खुद निगम को

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01:05:03,760 --> 01:05:08,960
चीज को मानते हैं चलाते हैं क्या कर सकते हैं आज तो

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01:05:08,960 --> 01:05:12,960
ठीक है आपने काफी सारा समय दे दिया बहुत सारी चीजें

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01:05:12,960 --> 01:05:16,240
आप और आपको भी अच्छा लगा होगा ये सारा

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01:05:16,240 --> 01:05:20,320
वर्तमान सुन के जी जी और आप आए तो यहां पर

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01:05:20,320 --> 01:05:24,320
आ सकते हैं यहां देख सकते हैं और निगमानंद जी का विग्रह भी स्थापित होता

935
01:05:24,320 --> 01:05:28,560
है यहां पर। तो उनका भी दर्शन कर सकते हैं और उनमें अपने ईस्ट का दर्शन

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01:05:28,560 --> 01:05:32,640
कर सकते हैं या फिर अपने ईस्ट में अपने निगमानंद जी का दर्शन कर सकते हैं। ठीक

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01:05:32,640 --> 01:05:36,640
है सभी को जय श्री राम। जय श्री राम। [संगीत]
