1
00:00:04,010 --> 00:00:10,010
[संगीत]

2
00:00:11,280 --> 00:00:17,280
तुम [संगीत]

3
00:00:34,400 --> 00:00:38,400
अब आ जाती है सबसे अति महत्वपूर्ण और रोचक

4
00:00:38,400 --> 00:00:42,560
जानकारी। बहुत रोचक है ये जानकारी। बहुत बहुत रोचक। पहले तो इसके

5
00:00:42,560 --> 00:00:46,560
Facebook से हमें प्राप्त था कि इसने अपने चार गुरुओं के चित्र लगा रखे

6
00:00:46,560 --> 00:00:51,280
थे। जिनमें से एक गुरु का नाम था निगमंद। है ना?

7
00:00:51,280 --> 00:00:55,360
तो ये अब वो खंड आ जाता है। तो भैया यह इस व्यक्ति का

8
00:00:55,360 --> 00:00:59,440
कहना है कि इससे जो पूर्व का इसका गुरु है इसकी गुरु परंपरा में वो

9
00:00:59,440 --> 00:01:03,760
निगमंद है। तो इसके द्वारा प्रदर्शित की गई

10
00:01:03,760 --> 00:01:07,840
इसकी तथाकथित गुरु परंपरा में एक निगमंद नाम

11
00:01:07,840 --> 00:01:11,840
भी है। इस संबंध में हम बता दे कि निगमानंद ने अपनी शिक्षाओं

12
00:01:11,840 --> 00:01:16,160
के माध्यम से सनातन के उन सब उन प्रमाणिक

13
00:01:16,160 --> 00:01:19,360
सिद्धांतों पर भी कुठाराघात किया है जिनको भागवतानंद

14
00:01:19,360 --> 00:01:25,040
भी स्वीकार करता है। जैसे वर्ण व्यवस्था बिंगो

15
00:01:25,040 --> 00:01:29,040
निगमानंद को रखते हो ना अपनी गुरु परंपरा में? निगमानंद तो

16
00:01:29,040 --> 00:01:34,320
वर्णाश्रम विरोधी है। अभी देते हैं प्रमाण।

17
00:01:34,320 --> 00:01:38,320
और थियोसोफिकल सोसाइटी का एजेंट है भाई। सदस्य रह चुका

18
00:01:38,320 --> 00:01:44,320
है। तुम तो बहुत बड़े शत्रु हो ना। मच्छराज की सीरीज बनाई थी ना तुमने।

19
00:01:44,480 --> 00:01:48,480
दयानंद इत्यादि पर लेकर के बातें कही थी ना। ये सब उसके एजेंट है।

20
00:01:48,480 --> 00:01:52,480
उसके एजेंट है। और तुम किसके शिष्य हो? जो स्वयं थियोसोफिकल सोसाइटी

21
00:01:52,480 --> 00:01:56,480
का एजेंट है। सदस्य रह चुका है। खैर तुम्हारी तो बात ही क्या?

22
00:01:56,480 --> 00:02:00,480
तुम्हारे तो एडमिशन ही वो आर्य समाज के

23
00:02:00,480 --> 00:02:05,280
स्कूल में कराया था ना तुम्हारे पिताजी ने। संबंध तो रहे होंगे जरूर।

24
00:02:05,280 --> 00:02:09,360
क्योंकि कोई व्यक्ति किसी भी अपने देश काल परिस्थिति में अगर कहीं भी

25
00:02:09,360 --> 00:02:13,360
चला गया तो वहां का हो गया। वहीं का है। विजय श्री के बारे में

26
00:02:13,360 --> 00:02:17,440
तो यही कहा था ना। अगर वह उस उस संस्थान

27
00:02:17,440 --> 00:02:21,600
जो विवादास्पद संस्थान है उससे जुड़े हुए किसी आदमी

28
00:02:21,600 --> 00:02:25,760
के द्वारा संचालित कोई संस्था में किसी एक क्षण के लिए

29
00:02:25,760 --> 00:02:30,000
वो दिखाई दे गई कि हां ये गई थी तो ये हो गई फ्री मिशंस की एजेंट

30
00:02:30,000 --> 00:02:34,000
और तुमने अपने चार-चार साल वहां पढ़ाई करी तुम्हारे पिताजी के द्वारा तुम्हारा वहां

31
00:02:34,000 --> 00:02:34,500
एडमिशन

32
00:02:34,480 --> 00:02:39,200
कराया गया तो तुम उसके एजेंट साबित नहीं हुए यह है दोगलापन खैर

33
00:02:39,200 --> 00:02:43,280
बैक टू द पॉइंट निगमंद के बारे में

34
00:02:43,280 --> 00:02:47,440
जानकारी प्राप्त थियोसफिकल सोसाइटी के एजेंट रह चुके हैं ये

35
00:02:47,440 --> 00:02:51,760
और बहुत सारी इनकी शिक्षाएं ऐसी हैं जो अधर्मी है, अधार्मिक है। सनातन

36
00:02:51,760 --> 00:02:56,720
धर्म की दृष्टि से बिल्कुल पूर्णतया विरोधाभासी है। क्या-क्या है?

37
00:02:56,720 --> 00:03:02,720
निगमानंद ने धर्म उपदेश के नाम पर लगभग सभी क्षेत्रों में अभ्रामिक

38
00:03:04,080 --> 00:03:08,240
अभ्रामिक एवं सनातन विरोधी मानसिकता का ही पोषण किया

39
00:03:08,240 --> 00:03:12,240
है। तो यहां हम निगनंद द्वारा प्रचारित सनातन धर्म के मूल प्रामाणिक

40
00:03:12,240 --> 00:03:16,560
सिद्धांतों के विरोध में दी गई शिक्षाओं से जन सामान्य को अवगत कराते हुए

41
00:03:16,560 --> 00:03:20,960
यह प्रश्न करते हैं कि सनातन धर्म के ऐसे घोर विरोधी एवं

42
00:03:20,960 --> 00:03:25,360
थियोसोफिकल सोसाइटी के सदस्य का शिष्य स्वयं को निगम स्वयं

43
00:03:25,360 --> 00:03:29,440
को निगमंद के शिष्य होने के नाते किस आधार पर

44
00:03:29,440 --> 00:03:33,440
प्रमाणिक कह सकता है

45
00:03:33,440 --> 00:03:37,600
या फिर स्वयं थियोसोफिकल सोसाइटी को सनातन विरोधी बताने

46
00:03:37,600 --> 00:03:41,840
वाला तथा स्वयं स्वयं वर्णाश्रम धर्म का पक्षधर कहने वाला स्वयं

47
00:03:41,840 --> 00:03:44,160
को

48
00:03:44,160 --> 00:03:47,040
वो

49
00:03:47,040 --> 00:03:51,840
निगमानंद जैसे वर्णाश्रम विरोधी का शिष्य किस प्रकार हो सकता है?

50
00:03:51,840 --> 00:03:56,000
तुमने क्या सोचा था? कहा था ना झूठे की हद तक और चोर

51
00:03:56,000 --> 00:04:00,400
के घर तक जाते हैं हम। अब लो निगमानंद की बातें।

52
00:04:00,400 --> 00:04:04,480
तो निगमानंद द्वारा प्रसारित सनातन विरोधी शिक्षाओं के कुछ

53
00:04:04,480 --> 00:04:09,280
उदाहरण हम आपको यहां दे दे रहे हैं संदर्भ के साथ।

54
00:04:09,280 --> 00:04:13,280
उदाहरण है ये क्या क्या है उड़िया में छपे

55
00:04:13,280 --> 00:04:17,600
हुए इनके ग्रंथ हमें प्राप्त है ग्रंथ क्या किताबें

56
00:04:17,600 --> 00:04:22,080
अल्लाह और यीशु ये सब भगवान के नाम है जिसकी

57
00:04:22,080 --> 00:04:26,080
जिस रूप में प्रीति हो जाती है जिस नाम में प्रीति हो जाती है उसको वो नाम बजना

58
00:04:26,080 --> 00:04:30,560
चाहिए कोई अंतर नहीं है अल्लाह भजो या राम

59
00:04:30,560 --> 00:04:36,080
समझ गए ये तुम्हारे निगमानंद बता रहे हैं

60
00:04:36,080 --> 00:04:40,240
क्या लिखा है अल्लाह एवं यीशु का भगवान नाम भगवान के नाम के

61
00:04:40,240 --> 00:04:44,320
साथ समानता क्रिश्चियन यीशु का नाम जपते हैं। मुसलमान अल्लाह का नाम

62
00:04:44,320 --> 00:04:48,480
जपते हैं। जो कोई भी भगवान के जैसे भी रूप का चिंतन करता है उसे वैसा

63
00:04:48,480 --> 00:04:52,960
ही नाम जपना चाहिए। तो इन्होंने वहां यह नहीं बताया

64
00:04:52,960 --> 00:04:58,800
कि क्या अंतर है? बल्कि यह बता दिया वो भी भगवान है। ये भी भगवान है। समान है।

65
00:04:58,800 --> 00:05:02,480
अवतार की निंदा

66
00:05:02,480 --> 00:05:06,800
भगवान का अवतार पशु नहीं हो सकता। यह वरा मत्स ये सब भगवान के अवतार

67
00:05:06,800 --> 00:05:09,920
नहीं हो सकते।

68
00:05:09,920 --> 00:05:14,000
कहां लिखा है? इसलिए जो दशा अवतार हैं भगवान के पूर्ण

69
00:05:14,000 --> 00:05:18,400
अवतार नहीं है। यह निंदा भगवान के अवतार की

70
00:05:18,400 --> 00:05:22,480
कहां लिखा है? निगम तत्व पृष्ठ संख्या 131

71
00:05:22,480 --> 00:05:26,960
और अल्लाह के साथ समानता सनातन ईश्वर की यह कहां लिखा है?

72
00:05:26,960 --> 00:05:31,120
निगम तत्व पृष्ठ संख्या 120 जो हमारी

73
00:05:31,120 --> 00:05:35,280
पूज्य जगत जननी जगत माता तारा तारापीठ

74
00:05:35,280 --> 00:05:41,280
वाली तारा देवी उनको पत्नी के रूप में देखना

75
00:05:42,720 --> 00:05:46,800
उनको देखने के लिए तत्पर होना यह सब

76
00:05:46,800 --> 00:05:50,720
गंध मचाई हुई है तुम्हारे गुरु ने

77
00:05:50,720 --> 00:05:54,800
हम कहां लिखा है योगी गुरु

78
00:05:54,800 --> 00:05:58,080
पष्ठ संख्या 10

79
00:05:58,080 --> 00:06:02,160
जगत माता तारा को अपनी पत्नी के रूप में देखने पर

80
00:06:02,160 --> 00:06:06,560
निगमानंद के तंत्र गुरु बामा खेपा द्वारा उन्हें जाने को कहना।

81
00:06:06,560 --> 00:06:11,360
उन्होंने कहा तुम कहीं और जाओ भाई हमारे यहां तुम्हारी साधना नहीं हो पाएगी।

82
00:06:11,360 --> 00:06:15,360
तारा देवी को अपनी पत्नी के रूप में देखने के कारण तथा

83
00:06:15,360 --> 00:06:19,440
जगत माता तारा के प्रति पत्नी का भाव जागृत हो जाने पर निगमानंद

84
00:06:19,440 --> 00:06:23,440
के मन में देवी देवी को पत्नी भाव से स्पर्श करने की

85
00:06:23,440 --> 00:06:27,760
इच्छा जागृत हुई। इसी का शिष्य है ना तू?

86
00:06:27,760 --> 00:06:32,160
तू भी ऐसे ही देखता होगा। तभी परी वो जो झूठा

87
00:06:32,160 --> 00:06:36,400
वरदान देकर गई उसको भगवती बता रहा है। हम

88
00:06:36,400 --> 00:06:40,400
अगर परी सिद्ध हो जाए तो पहले मेरे पास भेजना। यही कहा

89
00:06:40,400 --> 00:06:44,640
था ना जिनको परी साधना दी थी।

90
00:06:44,640 --> 00:06:48,640
यह देख बाबा खेपा ने उन्हें किसी अन्य के अन्य गुरु के

91
00:06:48,640 --> 00:06:53,360
पास जाने को कहा। कहां लिखा है? संत चरितमाला पष्ठ संख्या

92
00:06:53,360 --> 00:06:58,080
24 अद्वैत सिद्धांत की निंदा शंकराचार्य

93
00:06:58,080 --> 00:07:02,160
के जाने के बाद समाज में काल क्रम के साथ ज्ञान के नाम पर केवल सुख

94
00:07:02,160 --> 00:07:06,240
की बात रह गई एवं आत्मज्ञान आत्म संबंधी

95
00:07:06,240 --> 00:07:10,560
समाधि आत्म समाधि को तो को छोड़ समाज केवल ब्रह्म

96
00:07:10,560 --> 00:07:14,640
विध होने लगा तथा कालांतर में नास्तिक हो गया उसे हटाने

97
00:07:14,640 --> 00:07:18,640
चैतन्य महाप्रभु ने सोहम जपने वाले नास्तिक लोगों

98
00:07:18,640 --> 00:07:22,720
का खंडन कर ज्ञान मार्ग की निंदा की। यद्यपि

99
00:07:22,720 --> 00:07:25,040
वह स्वयं

100
00:07:25,040 --> 00:07:29,120
चैतन महाप्रभु शंकराचार्य परंपरा के दनामी संप्रदाय में

101
00:07:29,120 --> 00:07:33,920
दीक्षित थे। कहां लिखा है? निगम तत्व पृष्ठ संख्या

102
00:07:33,920 --> 00:07:37,920
115 वेदांत में उपास्य एवं उपासक का

103
00:07:37,920 --> 00:07:42,400
भाव नहीं है। वेदांत में उपास्य एवं उपासना

104
00:07:42,400 --> 00:07:46,560
का भाव नहीं रहता। वहां एक ही तत्व को भगवान आत्मा एवं

105
00:07:46,560 --> 00:07:50,720
ब्रह्म के रूप में लक्षित किया गया है। यह निंदा चल रही है

106
00:07:50,720 --> 00:07:54,880
अद्वैत की। प्रणव एवं स्त्रियों द्वारा शूद्रों द्वारा

107
00:07:54,880 --> 00:07:58,960
वेद पाठ का अधिकार दिया जाना। ज्ञानी की वेद पाठ

108
00:07:58,960 --> 00:07:59,840
में कोई आवश्यकता

109
00:07:59,840 --> 00:08:04,240
नहीं है। वेद ज्ञान है। अतः अज्ञानी को अज्ञान की आवश्यकता है।

110
00:08:04,240 --> 00:08:08,240
शूद्र एवं स्त्री अज्ञानी है। अतः वह वेद पाठ करें।

111
00:08:08,240 --> 00:08:12,960
जो ज्ञानी है वही ब्राह्मण है। ब्राह्मण को नहीं

112
00:08:12,960 --> 00:08:17,120
वेद पाठ करना चाहिए शूद्र और स्त्री को ब्राह्मण को

113
00:08:17,120 --> 00:08:19,600
नहीं।

114
00:08:19,600 --> 00:08:23,760
निगम तत्व पृष्ठ संख्या 22 से 23 प्रणव सद्गुरु

115
00:08:23,760 --> 00:08:28,160
का जाप क्या है? सभी प्रणव लगाकर

116
00:08:28,160 --> 00:08:34,000
जप करें। एवं प्रणव सद्गुरु का जाप भी करें।

117
00:08:34,000 --> 00:08:38,080
प्रणव के साथ सद्गुरु का जाप भी करें। कहां लिखा है? निगम तत्व

118
00:08:38,080 --> 00:08:42,320
पृष्ठ संख्या 24 गांजे का सेवन भी किया है इन्होंने

119
00:08:42,320 --> 00:08:46,880
किसी सन्यासी के साथ कहां लिखा है योगी गुरु पष्ठ संख्या

120
00:08:46,880 --> 00:08:50,880
55 शास्त्रीय विधि विधान की निंदा भी की

121
00:08:50,880 --> 00:08:55,280
है एक जगह वैष्णवों की निंदा करते हुए कहा है क्या वस्त्र एवं कॉपी

122
00:08:55,280 --> 00:08:59,360
ना पहनने से गोविंद कृपा नहीं करेंगे मतलब यह जो विधि विधान है

123
00:08:59,360 --> 00:09:03,520
तिलक ना लगाने से गोविंद कृपा नहीं करेंगे शिका धारण करने से गोविंद

124
00:09:03,520 --> 00:09:09,520
कृपा नहीं करेंगे धोती बांधने से गोविंद कृपा नहीं करेंगे हम

125
00:09:10,240 --> 00:09:14,320
तो ये सब कहा है कहां कहा है

126
00:09:14,320 --> 00:09:18,320
योगी गुरु पष्ठ संख्या 203 अब

127
00:09:18,320 --> 00:09:22,400
यहां तक क्या क्लियर हो गया अल्लाह के साथ एक बता रहा है भगवान के दश

128
00:09:22,400 --> 00:09:26,800
अवतारों की निंदा कर रहा है स्वीकार नहीं कर रहा है थियोसोफिकल

129
00:09:26,800 --> 00:09:31,600
सोसाइटी का एज सदस्य रह चुका है और

130
00:09:31,600 --> 00:09:37,120
क्या है स्त्री और शूद्रों को वेद पाठ में अधिकृत बता रहा है

131
00:09:37,120 --> 00:09:41,280
अद्वैत की निंदा कर रहा है। इस तरह से सनातन सिद्धांतों

132
00:09:41,280 --> 00:09:45,440
का पुरजोर विरोध करने वाला प्रामाणिक आचार्य है।

133
00:09:45,440 --> 00:09:49,760
और उसके उसका शिष्य अपने आप को बताने वाला प्रामाणिक आचार्य

134
00:09:49,760 --> 00:09:54,000
है। तो जो अंधे और जो

135
00:09:54,000 --> 00:09:58,160
बैल बुद्धि हो ना वो ही इस व्यक्ति

136
00:09:58,160 --> 00:10:02,640
को प्रामाणिक आचार्य के रूप में अपना स्वीकार करें। सनातन धर्म का

137
00:10:02,640 --> 00:10:06,960
यदि वह निगमंद का थियोसफिकल सोसाइटी के सदस्य का शिष्य है

138
00:10:06,960 --> 00:10:11,600
जिसकी निंदा इसी मूर्ख ने खूब की है तो

139
00:10:11,600 --> 00:10:15,600
उपरोक्त व्याख्यान को पढ़कर पाठक सरलता से निर्णय कर सकते हैं

140
00:10:15,600 --> 00:10:19,680
कि क्या मां तारा देवी के प्रति कुदृष्टि रखने वाला भगवान विष्णु के

141
00:10:19,680 --> 00:10:23,840
अवतारों का खंडन करने वाला कुरान की सीमा के ईश्वर को सनातन ईश्वर

142
00:10:23,840 --> 00:10:25,520
के समान बताने वाला वर्णाश्रम

143
00:10:25,520 --> 00:10:31,520
विरोधी सनातन शास्त्रों द्वारा बताए गए विधि निषेध का विरोधी

144
00:10:31,680 --> 00:10:35,840
थियोसोफिकल सोसाइटी का सदस्य यहां तक कि स्वयं भागवतानंद

145
00:10:35,840 --> 00:10:39,840
द्वारा स्वीकार अद्वैत का खंडन करने वाला सनातन वैदिक आर्य

146
00:10:39,840 --> 00:10:43,920
हिंदुओं का प्रामाणिक आचार्य किस प्रकार हो सकता है? एवं

147
00:10:43,920 --> 00:10:48,240
ऐसे सनातन विरोधी व्यक्ति को गुरु कहने वाला किस प्रकार से कौन से शास्त्रीय

148
00:10:48,240 --> 00:10:52,400
विधान के अनुसार प्रामाणिक आचार्य हो सकता है? क्यों? क्यों

149
00:10:52,400 --> 00:10:56,800
कहा जाए तुम्हें प्रामाणिक? क्योंकि भागवतानंद

150
00:10:56,800 --> 00:11:01,040
ने कहा है। तो इस प्रकार सिद्ध होता है कि भागवतानंद को केवल उसी

151
00:11:01,040 --> 00:11:05,520
की वाणी को शब्द प्रमाण मानते हुए ही निग्रह संप्रदाय के प्रामाणिक

152
00:11:05,520 --> 00:11:09,760
आचार्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। निग्रह संप्रदाय के उस अस्तित्व

153
00:11:09,760 --> 00:11:13,840
को स्वीकार किया जा सकता है जिस स्वरूप में यह भागवतानंद प्रस्तुत

154
00:11:13,840 --> 00:11:18,080
करता है। ऐसे में यह प्रश्न विचारनीय होगा कि जिसके कथित व्यवहार

155
00:11:18,080 --> 00:11:22,080
में गाली गलौज, जिन उपासना, मां भगवती के वरदान और मलेच्छराज

156
00:11:22,080 --> 00:11:26,080
जैसी काल्पनिक फिल्मी गप्पे करना सम्मिलित हो। इसके साथ ही

157
00:11:26,080 --> 00:11:30,480
साथ किसी स्त्री के अंतर वस्त्रों पर सार्वजनिक

158
00:11:30,480 --> 00:11:34,640
टिप्पणी करने वाला उस पर कुत्ते के साथ चुंबन का झूठा आरोप

159
00:11:34,640 --> 00:11:38,800
लगाने वाला मनु के संविधान का उल्लंघन करने वाला किसी

160
00:11:38,800 --> 00:11:40,720
स्त्री पर वैश्या होने का निराधार

161
00:11:40,720 --> 00:11:44,800
आरोप लगाने वाला व्यक्ति सनातनियों के लिए शब्द प्रमाण

162
00:11:44,800 --> 00:11:49,200
कैसे हो सकता है? यह अत्यंत आपत्तिजनक है

163
00:11:49,200 --> 00:11:53,200
कि जिन आचार्यों के चरणों में बैठकर उसने ज्ञान प्राप्त किया जिन पर वह आज भी

164
00:11:53,200 --> 00:11:58,240
ज्ञान प्राप्ति हेतु निर्भर है। आज भी समझे

165
00:11:58,240 --> 00:12:02,400
उनहीं आचार्यों पर अभद्र टिप्पणियां करने वाला और तू तड़ाक जैसी अमर्यादित शैली

166
00:12:02,400 --> 00:12:07,920
में बात करने वाले व्यक्ति को प्रबुद्ध वर्ग द्वारा प्रमाण के रूप में

167
00:12:07,920 --> 00:12:12,560
स्वीकार किया जाता है। [संगीत]

168
00:12:12,560 --> 00:12:16,720
तो इन सारी विवेचनाओं के बाद एट

169
00:12:16,720 --> 00:12:21,360
द एंड क्या निकला कि भागवतानंद को

170
00:12:21,360 --> 00:12:25,360
भागवतानंद के द्वारा स्थापित निग्रह संप्रदाय को उसके

171
00:12:25,360 --> 00:12:29,600
स्वरूप को उसके अस्तित्व को उसके साथ भागवतानंद

172
00:12:29,600 --> 00:12:34,480
के संबंध को भागवतानंद के निग्रचार के पद को

173
00:12:34,480 --> 00:12:39,520
भागवतानंद को मिले वरदान को उसके आचार्यत्व को

174
00:12:39,520 --> 00:12:45,520
उसके सदाचारी होने के विषय में [संगीत]

175
00:12:45,680 --> 00:12:49,760
क्या प्रमाण है? क्यों माना जाए इन सब बातों को?

176
00:12:49,760 --> 00:12:53,960
क्योंकि भागवतानंद ने कहा है

177
00:12:53,960 --> 00:12:58,880
[संगीत] यह है 100 करोड़ की

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00:12:58,880 --> 00:13:03,520
निग्रह निकासिका। निकल यहां से

179
00:13:03,520 --> 00:13:07,520
और जा सिद्ध कर अपने वरदान को सत्य। वहां किस्कलन

180
00:13:07,520 --> 00:13:12,000
हुआ है ना तेरी जीभ से। कर सिद्ध कि वह कर्मेंद्र्रियों से

181
00:13:12,000 --> 00:13:16,080
होने वाला अनुचित आचरण नहीं था। मिल

182
00:13:16,080 --> 00:13:20,800
गया ना जवाब? मिल गई ना निग्रह निकासिका।

183
00:13:20,800 --> 00:13:26,800
अब कर मेहनत। जय श्री राम।

184
00:13:29,920 --> 00:13:33,920
[संगीत]
