1
00:00:01,550 --> 00:00:07,550
[संगीत]

2
00:00:08,800 --> 00:00:14,800
तुम [संगीत]

3
00:00:31,920 --> 00:00:36,000
अब दो चीजें रह गई हैं जो यह उत्तर

4
00:00:36,000 --> 00:00:40,080
लिखने के बाद हमें प्राप्त हुई थी। वह भी हम बता देते हैं। और

5
00:00:40,080 --> 00:00:44,240
फिर जो केवल कोर्ट के दृष्टिकोण से हमने क्या जवाब दिया उस पर हम एक वीडियो अलग

6
00:00:44,240 --> 00:00:48,560
से बना देंगे। अब आते हैं भागवतानंद को प्रामाणिक

7
00:00:48,560 --> 00:00:52,640
कहने वाले जो कोई कोल आचार्य हैं। उन्होंने

8
00:00:52,640 --> 00:00:56,800
कहा है कि हम इनको प्रामाणिक कहते हैं या नियुक्त करते हैं कॉल संप्रदाय में शाक्य

9
00:00:56,800 --> 00:01:00,800
संप्रदाय में। ठीक है? तो इसमें सबसे पहली बात तो यह आ

10
00:01:00,800 --> 00:01:04,960
जाती है कि भैया आपने जो हमको यह पत्र प्रदान किया

11
00:01:04,960 --> 00:01:09,520
है कि यह किसी कोलाचार्य का है यह कोलाचार्य का नाम क्या है?

12
00:01:09,520 --> 00:01:13,680
इन तक कैसे पत्राचार किया जा सकता है? इनका पता क्या है? कहां रहते

13
00:01:13,680 --> 00:01:19,120
हैं? इनका फोन नंबर क्या है? यह सब कौन बताएगा?

14
00:01:19,120 --> 00:01:23,200
हां कि बस उठाया मुंह और लिख दिया

15
00:01:23,200 --> 00:01:27,280
एक संस्कृत में। बस ये देखो हमको नियुक्ति पत्र मिल गया। कौन है?

16
00:01:27,280 --> 00:01:31,520
कहां रहते हैं? बताओ ना। उसको सार्वजनिक

17
00:01:31,520 --> 00:01:35,520
करो ना। यह कैसा पत्र जिसमें लिखने वाले का कोई जान लिखने वाले की कोई

18
00:01:35,520 --> 00:01:39,680
जानकारी स्पष्ट नहीं हो रही है। डर लगता है ना?

19
00:01:39,680 --> 00:01:43,920
शंकर के सैनिकों से डर लगता है ना? शिवश नारायण द्विवेदी

20
00:01:43,920 --> 00:01:48,640
से डर लगता है ना? राम के भक्तों से डर लगता है ना? इसलिए

21
00:01:48,640 --> 00:01:52,800
लिखवाते समय कह दिया होगा अपना वो मत लिखना। कहां रहते हो? फोन

22
00:01:52,800 --> 00:01:56,800
नंबर क्या है? हां। नहीं तो वो झूठे की हद तक और चोर

23
00:01:56,800 --> 00:02:00,160
के घर तक जाता है। हां

24
00:02:00,160 --> 00:02:04,160
पहली बात तो ये है। और दूसरी बात यह है

25
00:02:04,160 --> 00:02:08,400
कि कुछ अगर वो मुझे नहीं ज्ञात है कि पत्र

26
00:02:08,400 --> 00:02:12,480
कहां से आया है। मगर यदि आया हो वह प्रामाणिक आचार्य हैं। तो उनको

27
00:02:12,480 --> 00:02:16,640
बिल्कुल यथोचित उनका अभिवादन उनका

28
00:02:16,640 --> 00:02:22,640
उनका सम्मान और उनसे कुछ प्रश्न सम्मान पूर्वक। क्या

29
00:02:23,680 --> 00:02:27,920
सबसे पहले तो वही बात है कि भैया इस पत्र के साथ कोई ऐसी जानकारी

30
00:02:27,920 --> 00:02:32,080
क्यों नहीं दी गई है जिससे कि हम पता लगा सके कौन कोलाचार्य हैं कहां

31
00:02:32,080 --> 00:02:37,040
के हैं क्या लिखते हैं आप देखिए

32
00:02:37,040 --> 00:02:41,120
शंकर शंकर मठ से श्रीमठ से निकलने

33
00:02:41,120 --> 00:02:45,120
वाले किसी पत्र को देखिए उसमें वहां का संपर्क सूत्र तक होता

34
00:02:45,120 --> 00:02:49,600
है एड्रेस के साथ-साथ कहां है इसमें एड्रेस संपर्क सूत्र

35
00:02:49,600 --> 00:02:53,600
प्रेम प्रेम पत्र है क्या कोई लेकिन उन्हीं का आदेश है कि उनके विषय में ज्यादा मैं

36
00:02:53,600 --> 00:02:57,920
चर्चा ना करूं अभी तो नाम तो कर सकते स्वामी श्री अमतानंद सरस्वती जी हां

37
00:02:57,920 --> 00:03:02,160
तो उन्होंने कहा कि मैं हाईलाइट नहीं होना चाहता हूं बस

38
00:03:02,160 --> 00:03:06,800
यही उनकी इच्छा है बाकी वो कहां है कैसे हैं ये सब अवगत है आपको व्यक्त

39
00:03:06,800 --> 00:03:09,790
बता दूंगा

40
00:03:09,790 --> 00:03:12,640
[संगीत]

41
00:03:12,640 --> 00:03:16,960
जो अनाधिकृत रूप से दो लोगों में लिया दिया जा रहा है

42
00:03:16,960 --> 00:03:20,960
इसमें भी चोरी तो ऐसे पत्र

43
00:03:20,960 --> 00:03:26,080
को प्रामाणिक क्यों माना जाए? क्योंकि भागवतानंद ने कहा है।

44
00:03:26,080 --> 00:03:30,160
अब आगे चलते हैं। अब सम्मान पूर्वक कोलाचार्य से कुछ प्रश्न है जिन्होंने इनको

45
00:03:30,160 --> 00:03:33,360
प्रामाणिक कहा है।

46
00:03:33,360 --> 00:03:37,760
कौलाचार्य ने निग्रह संप्रदाय को पहली बात तो यह कंफ्यूजन है कि उन्होंने

47
00:03:37,760 --> 00:03:42,000
उसको अपने ही संप्रदाय के अंतर्गत प्रामाणिक

48
00:03:42,000 --> 00:03:46,000
कहा है या फिर स्वतंत्र रूप से प्रामाणिक कहा है। तो अगर

49
00:03:46,000 --> 00:03:50,400
स्वतंत्र रूप से कहा है तो क्या है? कौलाचार्य ने निग्रह संप्रदाय

50
00:03:50,400 --> 00:03:54,640
को स्वतंत्र रूप से प्रामाणिक घोषित करते हुए उसमें भगवतानंद को

51
00:03:54,640 --> 00:03:58,720
नियुक्त किया है। अथवा वह स्वयं कोल

52
00:03:58,720 --> 00:04:02,720
संप्रदाय में नियुक्त है। एवं उसी परंपरा के अंतर्गत ही

53
00:04:02,720 --> 00:04:06,720
निग्रह संप्रदाय को एक उप संप्रदाय के रूप में स्वीकार करते हुए भागवत उनको

54
00:04:06,720 --> 00:04:10,880
निग्रचार्य के रूप में स्वीकार किया है। तो ये प्रश्न है पहला क्या है?

55
00:04:10,880 --> 00:04:14,960
इसमें से स्वतंत्र कहा है वह निग्रचार्य है या आपकी गुरु परंपरा

56
00:04:14,960 --> 00:04:19,840
में ही वह है। यदि ऐसा है तो आगे का प्रश्न सुनो।

57
00:04:19,840 --> 00:04:23,840
क्या भागवतानंद के द्वारा दी गई अव्यक्ता द्वैत की व्याख्या उसको

58
00:04:23,840 --> 00:04:24,800
नियुक्त करने वाले

59
00:04:24,800 --> 00:04:28,800
कोलाचार्य की परंपरा से प्राप्त सिद्धांतों के समान है।

60
00:04:28,800 --> 00:04:33,040
यदि तात्विक विवेचना समान है तो स्वतंत्र रूप से निग्रह

61
00:04:33,040 --> 00:04:37,360
संप्रदाय किस प्रकार माना जाएगा? तो स्वतंत्र तो नहीं हुआ। फिर वो कोलाचार्य

62
00:04:37,360 --> 00:04:41,600
हुआ। फिर वह कोल संप्रदाय का कोलाचार्य हुआ। हां

63
00:04:41,600 --> 00:04:45,680
उसके बाद अगर उनकी पुष्टि हो जाती है वह संप्रदाय के बारे में जो जो

64
00:04:45,680 --> 00:04:49,760
उसने खिचड़ी पकाई है वो पकने के बाद तो अवश्य माना जा सकता है

65
00:04:49,760 --> 00:04:53,840
कि आपके सिद्ध उसके अंतर्गत जो है फिर भी वो अस्तित्व तो

66
00:04:53,840 --> 00:04:58,000
खंडन होगा ही मगर एक बार के लिए

67
00:04:58,000 --> 00:05:02,160
आपकी बात को रखा जा सकता है। तो पहले तो स्पष्ट करें कि वो

68
00:05:02,160 --> 00:05:06,160
स्वतंत्र रूप से निग्रचार्य आपने कहा है उसे या अपने संप्रदाय के

69
00:05:06,160 --> 00:05:10,160
अंतर्गत कहा है। अंतर्गत कहा है तो क्या उसकी व्याख्या आपकी व्याख्या सेम

70
00:05:10,160 --> 00:05:14,160
है जैसा कि हमने पहले पूछा है ना संशयों को दूर करें गुरु वही जो

71
00:05:14,160 --> 00:05:18,240
संशय को दूर कर दे गु का मतलब अंधकार रू का मतलब निकालने वाला दूर

72
00:05:18,240 --> 00:05:22,400
करें इन संशयों को अपनी जानकारी दीजिए जिससे कि ट्रेन का टिकट

73
00:05:22,400 --> 00:05:26,640
कटा के वहां तक आया जा सके मिला जा सके सवाल पूछे

74
00:05:26,640 --> 00:05:30,720
जा सके हम तो नहीं है ना डरने वाले भागवतानंद डरने वाला

75
00:05:30,720 --> 00:05:34,800
है हम डरने वाले नहीं है ना हम तो पूछे पूछेंगे ना प्रश्न प्रश्न पूछ

76
00:05:34,800 --> 00:05:39,520
लेंगे आकर के जो जो बातें कही गई हां

77
00:05:39,520 --> 00:05:40,160
यदि

78
00:05:40,160 --> 00:05:44,240
तात्विक विवेचना आपके विपरीत है तो वह भागवतानंद द्वारा प्रतिवादित

79
00:05:44,240 --> 00:05:48,320
निग्रह संप्रदाय को प्रामाणिक कहकर क्या आप अपनी परंपरा के अगर अगर

80
00:05:48,320 --> 00:05:52,320
सही अगर आपकी आपसे मैच खाती है तो आपके अंतर्गत हो गया

81
00:05:52,320 --> 00:05:56,480
वो कालाचार्य होते हुए निग्रचार्य होगा और अगर आपके

82
00:05:56,480 --> 00:06:00,800
विपरीत है तो क्या आप अपनी परंपरा का जो

83
00:06:00,800 --> 00:06:04,880
तात्विक विवेचना है उसको नहीं मानते प्रामाणिक उसकी उसको प्रामाणिक मानते

84
00:06:04,880 --> 00:06:08,880
हैं यह प्रश्न आ जाएगा

85
00:06:08,880 --> 00:06:12,880
यदि किसी व्यक्ति कोल संप्रदाय के आचार्य द्वारा प्रामाणिक घोषित

86
00:06:12,880 --> 00:06:17,120
किया जाएगा तो वह कोल संप्रदाय का ही आचार्य कहलाएगा। वह स्वयं कोल

87
00:06:17,120 --> 00:06:21,200
संप्रदाय एवं उसके आचार्यों का भी निग्रह करने वाले के रूप में किसी स्वतंत्र

88
00:06:21,200 --> 00:06:25,360
संप्रदाय से जैसे निग्रह संप्रदाय इत्यादि का आचार्य किस आधार

89
00:06:25,360 --> 00:06:29,360
पर कहलाएगा? यह भी प्रश्न बनता है। भाई वह तो निग्रह करने निकला

90
00:06:29,360 --> 00:06:33,440
है। आपने उसका निग्रह किया। आपने उसके निग्रह के प्रति अधीनता

91
00:06:33,440 --> 00:06:37,520
को स्वीकार कर लिया है क्या?

92
00:06:37,520 --> 00:06:42,160
हां यह भी प्रश्न आएगा और दूसरा दूसरी बात यह आएगी

93
00:06:42,160 --> 00:06:46,240
कि यदि आपने उसे घोषित किया है कि तू भाई

94
00:06:46,240 --> 00:06:50,240
हमारे परंपरा के अंतर्गत है तो फिर आप उसका निग्रह

95
00:06:50,240 --> 00:06:54,480
करोगे ना वो कहां से निग्रह करने वाला हो गया आपके धर्म

96
00:06:54,480 --> 00:07:00,480
और ब्रह्म की व्याख्या में वो हस्तक्षेप करेगा यह सही है यह गलत है

97
00:07:00,560 --> 00:07:04,640
क्या वो आपके विपरीत जाएगा और विपरीत जाने पर क्या आप उसको स्वीकार करोगे

98
00:07:04,640 --> 00:07:08,640
उसके प्रति नतमस्तक होगे और यदि उसके प्रति नतमस्तक होगे तो यह

99
00:07:08,640 --> 00:07:12,960
सिद्ध होगा कि आप उसके गुरु नहीं वह आपका गुरु है। ऐसे में आपके द्वारा

100
00:07:12,960 --> 00:07:17,440
प्रमाणिक कहे जाने को किस आधार पर सही मान लिया जाए।

101
00:07:17,440 --> 00:07:21,600
प्रामाणिकता के लिए आपका शब्द प्रमाण और धर्म ब्रह्म की व्याख्या के

102
00:07:21,600 --> 00:07:25,760
लिए उसका शब्द प्रमाण। वो भी तब जब आप मान लो। मुझे नहीं लगता कि आप मानोगे।

103
00:07:25,760 --> 00:07:29,920
उसकी आधीनता स्वीकार करोगे। निग्रह की वो निग्रह करने निकला है ना

104
00:07:29,920 --> 00:07:34,320
उसकी सबसे बड़ी कमजोरी ही निग्रह है।

105
00:07:34,320 --> 00:07:38,480
यह निग्रह ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है जो उसने कह दिया। ये उसको

106
00:07:38,480 --> 00:07:44,480
कभी प्रामाणिक सिद्ध नहीं कर करने होने देगा। निग्रह

107
00:07:45,120 --> 00:07:50,240
उसका सबसे बड़ा ड्रॉबक भागवतानंद का निग्रह है। निग्रह है।

108
00:07:50,240 --> 00:07:54,240
किसी के द्वारा प्रामाणिक नहीं हो पाएगा वो। क्योंकि वह सबको

109
00:07:54,240 --> 00:07:58,800
प्रामाणिक वो सब क्योंकि वह सबका निग्रह करने निकला है ना

110
00:07:58,800 --> 00:08:03,200
तो भागवतानंद की सबसे बड़ी कमजोरी उसका निग्रह

111
00:08:03,200 --> 00:08:07,600
है जिसके कारण वो किसी भी प्रामाणिक आचार्य के द्वारा प्रामाणिक

112
00:08:07,600 --> 00:08:11,760
सिद्ध नहीं हो सकता। क्यों? क्योंकि वह निग्रह

113
00:08:11,760 --> 00:08:15,840
करेगा उसका भी जो उसको प्रामाणिक कहेगा और निग्रह करने की

114
00:08:15,840 --> 00:08:18,000
स्थिति

115
00:08:18,000 --> 00:08:22,000
होने बनी रहने के कारण जो आपको प्रामाणिक कह

116
00:08:22,000 --> 00:08:26,320
रहा है उसमें प्रमाण्य बुद्धि सिद्ध नहीं होगी। जब प्रमाण्य बुद्धि

117
00:08:26,320 --> 00:08:30,400
सिद्ध नहीं होगी तो उसके द्वारा प्रामाणिक कहे जाने पर आप भी प्रामाणिक सिद्ध नहीं

118
00:08:30,400 --> 00:08:34,960
होगे। समझ रहे हो ना? घूमो

119
00:08:34,960 --> 00:08:39,750
चक्कर खाओ इसी में निग्रह में करो निग्रह

120
00:08:39,750 --> 00:08:43,840
[संगीत] तो मैं दोबारा से आचार्य जी के पास आता

121
00:08:43,840 --> 00:08:48,000
हूं जिन्होंने यह पत्र जारी किया है। यदि

122
00:08:48,000 --> 00:08:52,400
निग्रह संप्रदाय एक स्वतंत्र संप्रदाय है तो क्या किसी भी संप्रदाय

123
00:08:52,400 --> 00:08:56,400
के आचार्य किसी भी अन्य संप्रदाय में किसी भी व्यक्ति को प्रामाणिक रूप से घोषित कर

124
00:08:56,400 --> 00:09:00,640
सकते हैं? यदि किसी आचार्य के द्वारा किसी व्यक्ति को किसी संप्रदाय

125
00:09:00,640 --> 00:09:04,800
में प्रामाणिक रूप से नियुक्त किए जाने की बात को स्वीकार कर लिया जाना उचित

126
00:09:04,800 --> 00:09:08,800
है तो क्या शंकराचार्य भी श्री संप्रदाय में किसी

127
00:09:08,800 --> 00:09:12,800
को प्रामाणिक रूप से नियुक्त कर सकते हैं क्या वो कोला कॉल संप्रदाय

128
00:09:12,800 --> 00:09:17,280
में किसी को नियुक्त कर सकते हैं फिर नियुक्त कर सकते हैं तो क्या किसी को बहिष्कृत

129
00:09:17,280 --> 00:09:21,280
भी कर सकते हैं ये पूछा जाएगा पूछा

130
00:09:21,280 --> 00:09:25,840
जाएगा ना यदि कोई भी मुंह उठाकर के कहीं भी करने लगेगा तो फिर भैया शंकराचार्य

131
00:09:25,840 --> 00:09:29,840
भी करेंगे हां शंकराचार्य तो मना कर रहे हैं। निग्राचार्य केवल ईश्वर हो

132
00:09:29,840 --> 00:09:33,920
सकते हैं और सही है। तार्किक रूप से वो बात बिल्कुल हो ही नहीं

133
00:09:33,920 --> 00:09:38,590
सकता कोई एक व्यक्ति निग्रह करने वाला सारे संप्रदायों को।

134
00:09:38,590 --> 00:09:41,680
[संगीत]

135
00:09:41,680 --> 00:09:45,840
अब तुम अब अब ये गालीबाज अपने आप को ईश्वर सिद्ध करने में लग जाएगा।

136
00:09:45,840 --> 00:09:50,080
थोड़े दिन बाद पर साधना और कालिया जिंदगी की साधना से शक्तियां

137
00:09:50,080 --> 00:09:54,880
प्राप्त करके। खैर

138
00:09:54,880 --> 00:09:59,040
यदि अमुक कोलाचार्य निग्रह संप्रदाय कोल संप्रदाय का ही अंग मानते हैं

139
00:09:59,040 --> 00:10:03,280
तो वह कोलाचार्य होते हुए निग्रचार्य कहलाएगा स्वतंत्र रूप से निग्रचार

140
00:10:03,280 --> 00:10:07,360
किस आधार पर कहा जाएगा क्या कोल संप्रदाय

141
00:10:07,360 --> 00:10:11,520
के आचार्य जिनोपासना और परिसाधना के समर्थक हैं क्योंकि यह व्यक्ति

142
00:10:11,520 --> 00:10:16,000
कर्ता करवाता है यदि कोई व्यक्ति स्वयं को एक स्वतंत्र

143
00:10:16,000 --> 00:10:20,000
संप्रदाय या गुरु परंपरा के रूप में स्थापित करता है तो उसके

144
00:10:20,000 --> 00:10:24,000
पास स्वतंत्र स्वतंत्र रूप से वेदों अथवा उपनिषदों के भाष्य होने चाहिए। जैसा कि पहले

145
00:10:24,000 --> 00:10:28,000
भी बात हुई यदि किसी के पास स्वतंत्र रूप से तत्व विवेचना वाला शास्त्र

146
00:10:28,000 --> 00:10:32,240
उपलब्ध भी है स्वतंत्र जैसे इसका परमाक्षर सूत्र तब भी यह देखना

147
00:10:32,240 --> 00:10:36,240
आवश्यक होगा कि वह शास्त्र वेद उपनिषद इत्यादि के साथ सामंजस्य रखता

148
00:10:36,240 --> 00:10:40,240
है या नहीं। ऐसे में भी वेद उपनिषदों के परंपरा प्राप्त भाष्य

149
00:10:40,240 --> 00:10:44,480
होना महत्वपूर्ण हो जाता है। अथवा जिस परंपरा के वेद उपनिषदों के भाष्यों

150
00:10:44,480 --> 00:10:48,560
से उस अमुक स्वतंत्र शास्त्र का सत्यापन किया जाएगा। उस

151
00:10:48,560 --> 00:10:52,800
शास्त्र एवं उसके आधार पर स्वयं को स्थापित करने वाले व्यक्ति को इस अमुक

152
00:10:52,800 --> 00:10:56,800
परंपरा का माना जाएगा। जिस अमुक परंपरा के भाष्यादियों

153
00:10:56,800 --> 00:11:01,200
के द्वारा उसने अपने अमुक शास्त्र को सत्यापित किया गया है।

154
00:11:01,200 --> 00:11:05,360
सरल भाषा में कहें तो यदि किसी व्यक्ति की अपनी

155
00:11:05,360 --> 00:11:09,520
वैदिक परंपरा नहीं है तो उसे वेदों, उपनिषदों और अन्य वैदिक ग्रंथों की व्याख्या

156
00:11:09,520 --> 00:11:13,840
के लिए अन्य परंपरा पर निर्भर रहना होगा। ऐसे

157
00:11:13,840 --> 00:11:18,160
में वह स्वयं को स्वतंत्र रूप से वैदिक परंपरा का आचार्य किस आधार

158
00:11:18,160 --> 00:11:22,160
पर कह सकता है? है ना? यह भी प्रश्न बनेगा। यह

159
00:11:22,160 --> 00:11:26,240
आपसे भी प्रश्न है। भागवतानंद के द्वारा के कई विषयों में सांकर

160
00:11:26,240 --> 00:11:30,240
परंपरा का विरोध होने के कारण उसे सांकर परंपरा का प्रामाणिक आचार्य भी स्वीकार

161
00:11:30,240 --> 00:11:34,320
नहीं किया जा सकता। ऐसे में कोल संप्रदाय के आचार्य को यह बताना होगा कि

162
00:11:34,320 --> 00:11:38,480
उन्होंने भागवतानंद को किस वैदिक संप्रदाय के अंतर्गत प्रामाणिक

163
00:11:38,480 --> 00:11:42,560
रूप से स्वीकार किया है। हम अपने में किया

164
00:11:42,560 --> 00:11:46,880
है, स्वतंत्र निग्रह में किया है या फिर जिनका यह वेद

165
00:11:46,880 --> 00:11:51,840
भाष इत्यादि उपयोग में ले रहा है। उनके में किया है। भागवतानंद

166
00:11:51,840 --> 00:11:56,080
के द्वारा क्या कॉल संप्रदाय के आचार्य को निग्रह संप्रदाय

167
00:11:56,080 --> 00:12:00,240
का बोध भागवतानंद द्वारा बताए जाने से पूर्व से था? यदि हां तो किस

168
00:12:00,240 --> 00:12:04,240
परंपरा अथवा किन आचार्यों द्वारा उन्हें इसका ज्ञान कराया गया। यदि

169
00:12:04,240 --> 00:12:08,480
नहीं तो किस आधार पर उन्होंने निग्रह संप्रदाय को प्रामाणिक रूप से उस रूप में स्वीकार

170
00:12:08,480 --> 00:12:11,920
किया है जिस रूप में भागवतानंद द्वारा अन्य सभी संप्रदायों

171
00:12:11,920 --> 00:12:15,920
का निग्रह करने वाला होते हुए निग्रह संप्रदाय का स्वरूप बताया

172
00:12:15,920 --> 00:12:20,560
जाता है। यदि भागवतानंद के अनुसार निग्रह संप्रदाय का कार्य

173
00:12:20,560 --> 00:12:24,640
सभी संप्रदायों पर शासन करना है तो यह जानना

174
00:12:24,640 --> 00:12:28,880
आवश्यक है कि क्या कोल संप्रदाय के उक्त आचार्य जो निग्रह संप्रदाय एवं

175
00:12:28,880 --> 00:12:32,960
भागवतानंद को निग्रह संप्रदाय के प्रामाणिक आचार्य के रूप में

176
00:12:32,960 --> 00:12:37,040
स्वीकार करते हैं। उन्होंने निग्रह संप्रदाय की अधीनता अथवा

177
00:12:37,040 --> 00:12:41,280
निग्रहचार्य को अपना नियंत्रक स्वीकार कर लिया है। क्या

178
00:12:41,280 --> 00:12:45,520
आप मानते हैं आप उसके अधीन हो? जो मैंने पूछा पहले क्या

179
00:12:45,520 --> 00:12:49,520
वह स्वीकार करते हैं निग्रचार्य के रूप में भागवतानंद उनका भी

180
00:12:49,520 --> 00:12:53,760
आपका भी निग्रह कर सकता है निग्रह संप्रदाय के अनुसार

181
00:12:53,760 --> 00:12:57,920
सिद्धांत अनुसार शास्त्रार्थ अथवा युद्ध द्वारा अद्वैत अथवा अव्यक्ता

182
00:12:57,920 --> 00:13:01,920
द्वैत के सिद्धांत को ना मानने वाले सभी संप्रदायों का निग्रह ना

183
00:13:01,920 --> 00:13:06,240
करके अपितु उनके साथ मित्रता पूर्ण व्यवहार करने वाले भागवतानंद

184
00:13:06,240 --> 00:13:10,800
को उसी के अनुसार बताए गए निग्रह संप्रदाय के स्वरूप से भागवतानंद

185
00:13:10,800 --> 00:13:16,160
की ठीक विपरीत स्थिति होते हुए भी भागवतानंद को

186
00:13:16,160 --> 00:13:20,640
निग्रह संप्रदाय का प्रामाणिक आचार्य किस आधार पर स्वीकार

187
00:13:20,640 --> 00:13:24,640
किया गया है? यह सारे प्रश्न आचार्य श्री से चल रहे हैं

188
00:13:24,640 --> 00:13:27,120
जो कौल संप्रदाय के आचार्य हैं। ऐसा सुनने

189
00:13:27,120 --> 00:13:31,520
में आता है। भागवतानंद द्वारा अनेक बार उनकी

190
00:13:31,520 --> 00:13:35,760
उसकी जीवा से असत्य भाषण हो जाने को वाकलन कहते हुए स्वीकार

191
00:13:35,760 --> 00:13:39,760
किया गया है। जबकि भागवतानंद के अनुसार उसकी कर्म इंद्रियों द्वारा किसी भी प्रकार

192
00:13:39,760 --> 00:13:43,920
से अनुचित कर्म ना होने का वरदान उसे मां भगवती से प्राप्त है।

193
00:13:43,920 --> 00:13:48,240
ऐसे में मां भगवती का वरदान झूठा सिद्ध हो जाता है। एवं इस प्रकार भगवती

194
00:13:48,240 --> 00:13:52,480
द्वारा निग्रह संप्रदाय का बोध और आचार्य के रूप में नियुक्ति भी संदिग्ध

195
00:13:52,480 --> 00:13:56,560
हो जाती है। ऐसे में कोलाचार्य द्वारा इस बात को प्रमाणिक कहना किस

196
00:13:56,560 --> 00:14:02,160
प्रकार से उचित माना जाए

197
00:14:02,160 --> 00:14:06,320
भागवतंद स्वयं को शाक्त बताता है और आप

198
00:14:06,320 --> 00:14:10,640
भी कोलाचार्य हैं। क्या आप भी पंच देवसना करते करवाते

199
00:14:10,640 --> 00:14:14,640
हैं? क्या आप अच्छा शाक्त होता कौन है?

200
00:14:14,640 --> 00:14:19,120
जो सर्वोच्च रूप में शक्ति को देखे।

201
00:14:19,120 --> 00:14:24,480
कम से कम उनके मंत्र तो ना देना आगे।

202
00:14:24,480 --> 00:14:28,480
कार्य कर रहे हो स्मारतों वाले और कह रहे हो अपने

203
00:14:28,480 --> 00:14:32,560
आप को सात। आप यह बताएंगे कि आप कौन से

204
00:14:32,560 --> 00:14:36,560
मंत्र दीक्षा लेने आए हैं। जैसे विष्णु भगवान, दुर्गा मैया, शिव जी, हनुमान

205
00:14:36,560 --> 00:14:40,560
जी, सूर्यदेव, गणपति भगवान, कुमार कार्तिकेय ये

206
00:14:40,560 --> 00:14:44,640
सब जो भी शास्त्रक्त देवता है उन देवता का आप नाम लिख देंगे। क्या कर रहे हैं

207
00:14:44,640 --> 00:14:46,880
आप?

208
00:14:46,880 --> 00:14:52,000
आप पंच देवोपासना के मंत्र दे रहे हैं। ये

209
00:14:52,000 --> 00:14:56,880
इस समय आचार्य श्री से बात नहीं हो रही। क्या कर रहा है व्यक्ति? भागवतानंद

210
00:14:56,880 --> 00:15:01,040
कहने को कौलाचार्य ने कह दिया कि भैया प्रामाणिक है या इसने कह

211
00:15:01,040 --> 00:15:05,520
दिया मैं सा हूं तो कहने को यह साक्त है। मगर मंत्र दे रहा पंचदेव

212
00:15:05,520 --> 00:15:09,840
उपासना के। कैसा साक्त है भाई? यदि कोई अपने आप को वैष्णव

213
00:15:09,840 --> 00:15:13,840
कहेगा यदि वह सब में एकत्व भी देखता होगा तब भी मंत्र तो वह वैष्णव

214
00:15:13,840 --> 00:15:18,960
विष्णु का ही देगा ना

215
00:15:18,960 --> 00:15:23,600
तो इसकी विवेचना कैसे करोगे

216
00:15:23,600 --> 00:15:27,600
यह सा है या स्मार्थ है पहले तय कर लीजिए यदि

217
00:15:27,600 --> 00:15:31,600
ये स्मार्थ है तो इसकी गुरु परंपरा क्या है स्मार्थ का इसका

218
00:15:31,600 --> 00:15:35,760
अध्ययन कहां से है वो सब देखना पड़ेगा क्या आपके यहां स्मार्थ का अध्ययन है या साक्त

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00:15:35,760 --> 00:15:39,760
का अध्ययन है ये देखना पड़ेगा बहुत सारी सारी चीजें हम उसका वर्णन करेंगे। अगर तुमको इसका

220
00:15:39,760 --> 00:15:44,060
प्रमाण नहीं मानना है तो अपनी कंबल तानो। सो जाओ। तुम्हारे लिए हम थोड़े बना रहे हैं ये सब बातें।

221
00:15:44,060 --> 00:15:50,060
[संगीत]

222
00:16:02,800 --> 00:16:06,800
आ
