1
00:00:01,550 --> 00:00:07,550
[संगीत]

2
00:00:08,800 --> 00:00:14,800
तुम [संगीत]

3
00:00:32,480 --> 00:00:37,280
अब यहां तक हमने जो है निग्रह संप्रदाय की स्पष्टता

4
00:00:37,280 --> 00:00:41,600
उसकी प्रामाणिकता पर बात कर ली और उससे इसका संबंध कितना

5
00:00:41,600 --> 00:00:46,000
उस पर हर तरह से बात कर ली। अब हम दूसरा

6
00:00:46,000 --> 00:00:50,000
विषय जो उसने कहा कि मेरे आचरण को देख के ये तय करो कि मैं

7
00:00:50,000 --> 00:00:54,480
आचार्य हूं कि नहीं। प्रामाणिक मेरे आचरण को

8
00:00:54,480 --> 00:00:58,560
मेरे आचरण को देख के तय करो कि भगवती ने मुझे वरदान दिया है कि

9
00:00:58,560 --> 00:01:02,800
नहीं। तो अब उसकी पोस्टमार्टम करते हैं। तो बहुत पोस्टमार्टम करता है ना। अब इसकी

10
00:01:02,800 --> 00:01:05,280
करते हैं।

11
00:01:05,280 --> 00:01:09,360
तो

12
00:01:09,360 --> 00:01:13,360
नीचे हमने यहां पर लिंक दे दिए गए हैं। आपको वीडियो आप देख रहे हैं

13
00:01:13,360 --> 00:01:17,920
तो इसमें आपको वीडियो लगा दिया जाएगा। ऐसे में

14
00:01:17,920 --> 00:01:21,920
हमने वीडियो दिखा इसमें दिखाए हैं कि

15
00:01:21,920 --> 00:01:26,080
यह जो है कालिया जिनकी की पूजा करता उसकी आवश्यकता होने की बात

16
00:01:26,080 --> 00:01:30,080
कहता है। जिसमें भागवतानंद अभी आपको वीडियो आगे दिखा दिया

17
00:01:30,080 --> 00:01:34,240
जाएगा जिसमें भागवतानंद स्वयं कालिया जिन एवं परिसाधना जैसी इस्लामिक

18
00:01:34,240 --> 00:01:38,400
पूजा पद्धति लोगों को सिखाने की बात कर रहा है जो किसी भी प्रकार से वेद

19
00:01:38,400 --> 00:01:42,560
सम्मत नहीं है। यदि तुम किसी परंपरा का नाम दे दो

20
00:01:42,560 --> 00:01:46,560
वहां पर भी तो होता है तो वहां तुम ये चेक नहीं करोगे कि नहीं शास्त्र से

21
00:01:46,560 --> 00:01:52,160
है कि नहीं शास्त्र के बाहर नहीं होना चाहिए ना

22
00:01:52,160 --> 00:01:56,240
नाम बताओ किस परंपरा में कहा है किसने यह मंत्र आपको दिया है कालिया

23
00:01:56,240 --> 00:02:00,320
जिन का परिसाधना का शास्त्र में बात हो रही ना

24
00:02:00,320 --> 00:02:04,320
तस्मा शास्त्र प्रमाणम भाई शास्त्र बाहर यदि गुरु भी हो

25
00:02:04,320 --> 00:02:08,480
तो उसका भी वो करना चाहिए निग्रह ना तो तुम्हें उनका निग्रह करना चाहिए जो

26
00:02:08,480 --> 00:02:12,640
ऐसा दे रहे हैं तुम उनके आधार पर अपनी चीजों अपनी गलत

27
00:02:12,640 --> 00:02:16,960
चीजों की पुष्टि कर रहे हो कहां चला गया तुम्हारा निग्रह

28
00:02:16,960 --> 00:02:21,120
या निग्रह संप्रदाय से तुमको मिला कालिया जिन परिसाधना का

29
00:02:21,120 --> 00:02:25,200
एक व्यक्ति ने मुझे बहुत परेशान कर रखा था कि मुझे साधना दीजिए सिद्धि दीजिए साधना

30
00:02:25,200 --> 00:02:29,200
दीजिए सिद्धि दीजिए उनको कालिया जिन का मंत्र मंत्र चाहिए था। तो कालिया

31
00:02:29,200 --> 00:02:33,120
जिनका मंत्र किससे लेकर गए? हमसे लेकर गए। इस फोटो को मैंने भेज दिया और कहा

32
00:02:33,120 --> 00:02:37,120
कि ऐसे-सा कुछ कर ले। तो इतना सत्य है इसमें।

33
00:02:37,120 --> 00:02:41,120
फोटो सत्य है। फोटो मैंने भेजा क्योंकि जो डॉट लगे हैं फोटो के नीचे वो मैंने लगाए थे। ये मुझे याद

34
00:02:41,120 --> 00:02:45,200
है। क्योंकि जो डॉट लगे हैं फोटो के नीचे वो मैंने लगाए थे। ये मुझे याद है। क्योंकि जो डॉट

35
00:02:45,200 --> 00:02:49,280
लगे हैं फोटो के नीचे वो मैंने लगाए थे। ये मुझे याद है। क्योंकि जो डॉट लगे हैं फोटो के नीचे वो

36
00:02:49,280 --> 00:02:53,280
मैंने लगाए थे। ये मुझे याद है। लेकिन ये सब जो लिखा है ना कि इसे पहले मेरे पास भेजना

37
00:02:53,280 --> 00:02:57,600
पड़ेगा। ये मुझे याद नहीं आया। गुरु पूर्णिमा से लेकर अगले पूर्णिमा तक खुले में बैठकर

38
00:02:57,600 --> 00:03:01,680
आसमान के नीचे सावन आया बहार आई तेरे बाप शैतान को सजदे की मार

39
00:03:01,680 --> 00:03:05,680
आई। परी तू ना आई तो तुझे तेरे बाप शैतान की मार आई। 51 माला

40
00:03:05,680 --> 00:03:09,840
जप करना है। प्रत्यक्ष होने पर हाथ में फूल गुलाब देना है और साथ रहने को बोलना है।

41
00:03:09,840 --> 00:03:13,840
तीन वचन ले लें एवं मृत्यु समय ना बिगाड़ने बोले। इसकी वास्तविकता

42
00:03:13,840 --> 00:03:17,920
क्या है? पहली बात कि सावन आया बहार आई। तेरे बाप शैतान को सजदे की मार

43
00:03:17,920 --> 00:03:22,240
आई। यह जो मंत्र है यह वास्तविक मंत्र है। और यह मंत्र मैंने आदित्य वैभव

44
00:03:22,240 --> 00:03:26,480
को दिया। 29 जून 2021 को मैंने इसको यह साधना

45
00:03:26,480 --> 00:03:30,480
भेजी थी। कब भेजी थी? सुबह 8:50 में। तो

46
00:03:30,480 --> 00:03:34,720
क्या है इसमें? रात्रि को 12:00 बजने के ठीक बाद यदि संभव है तो स्नान करके अन्यथा

47
00:03:34,720 --> 00:03:39,040
हाथ पैर लिंग आदि धोकर कुल्ला आदि करके सफेद कपड़ा पहन के इत सुगंधित

48
00:03:39,040 --> 00:03:43,120
वस्तु लगाकर खुले आसमान में एकांत में चले जावे। पूर्व दिशा की

49
00:03:43,120 --> 00:03:47,280
ओर मुंह करके बैठ जावे। एक धूप जला लें। इसके अतिरिक्त कुछ भी और काम

50
00:03:47,280 --> 00:03:48,320
करने की आवश्यकता नहीं

51
00:03:48,320 --> 00:03:52,560
है। आकाश की ओर दृष्टि रखकर यदि चंद्रमा दिखे तो और भी उत्तम।

52
00:03:52,560 --> 00:03:56,800
निम्न मंत्र को स्फटिक की माला से सात माला पढ़ें। यह मंत्र शुक्रवार

53
00:03:56,800 --> 00:04:00,800
अथवा पूर्णिमा को करें। सावन आया बार आई तेरे बाप शैतान को

54
00:04:00,800 --> 00:04:05,120
सजदे की मार आई। लाली तू ना आई तो तुझे शैतान की मार आई।

55
00:04:05,120 --> 00:04:09,120
प्रयोग पूर्ण होने पर उससे तीन वचन लें। मेरे स्मरण करने पर सदैव आकर मेरा

56
00:04:09,120 --> 00:04:13,280
बताया कार्य करें। मेरे और मेरे परिवार प्रियजनों को किसी प्रकार की क्षति कभी ना करें।

57
00:04:13,280 --> 00:04:17,760
मृत्यु के बाद मेरी उर्ध्वति में किसी प्रकार से बाधक ना हो। यदि देवी की प्रत्यक्ष

58
00:04:17,760 --> 00:04:21,840
सिद्धि हो जावे तो उसके बाद आप गुरु दक्षिणा में मेरे बताए किसी भी एक दो कार्य को

59
00:04:21,840 --> 00:04:25,840
पूर्ण करा दें। प्रयोग से पहले प्रयोग के बीच या प्रयोग के बाद में कभी भी इस बात का

60
00:04:25,840 --> 00:04:29,840
उल्लेख मेरे अतिरिक्त किसी से अन्य से ना करें। बहुत सरल है। यद्यपि दीपावली

61
00:04:29,840 --> 00:04:33,920
की रात्रि से तीन रात मिट्टी के बर्तन में खीर बनाकर और दक्षिण दिशा होकर रात 12:00

62
00:04:33,920 --> 00:04:38,000
बजे 108 बार जप करना है। प्रत्यक्ष होने पर पैसा ले लेना है। अधिकतम 10 करोड़ और

63
00:04:38,000 --> 00:04:42,000
इसका 25% मुझे देना है। अब विधि तो सही है। कालिया

64
00:04:42,000 --> 00:04:46,160
जिन वाला यह मंत्र मैंने तीन चार लोगों को दिया था। जिनकी आर्थिक स्थिति मुझे लगी

65
00:04:46,160 --> 00:04:50,400
कि बहुत गड़बड़ है। और बहुत गरीबी में था वो बाद में बहुत अमीर भी हो गया था।

66
00:04:50,400 --> 00:04:54,400
और उड़ीसा के एक व्यक्ति जिसका मैंने संदर्भ दिया, उसको भी यह सिद्ध था और

67
00:04:54,400 --> 00:04:58,560
वो चार लोग मिलकर इसको सिद्ध किए थे। तो उसमें शर्त यही थी कि जो मंत्र देता

68
00:04:58,560 --> 00:05:02,720
है मतलब बताता है वह 25% उसको देने पर ही वह धन उसको लाभ

69
00:05:02,720 --> 00:05:03,440
करता है।

70
00:05:03,440 --> 00:05:07,520
उन्होंने अरबी फारसी के मंत्रों से किसी शक्ति की

71
00:05:07,520 --> 00:05:11,520
आराधना कर रखी थी अपने किसी गुरु से प्राप्त करके वो पीर

72
00:05:11,520 --> 00:05:15,520
शक्ति की। तो बहुत बाद में किसी समय मुझे भी कुछ आवश्यकता पड़ी तो हमने कहा कि आप जरा

73
00:05:15,520 --> 00:05:19,600
बताइए इसमें क्या होना चाहिए। तो बहुत बाद में किसी समय मुझे भी कुछ आवश्यकता पड़ी तो हमने कहा कि आप

74
00:05:19,600 --> 00:05:23,680
जरा बताइए इसमें क्या होना चाहिए। तो बहुत बाद में किसी समय मुझे भी कुछ आवश्यकता पड़ी तो हमने कहा

75
00:05:23,680 --> 00:05:27,760
कि आप जरा बताइए इसमें क्या होना चाहिए? तो ऐसी कई शक्तियां हैं जो पीरवाणी तंत्र

76
00:05:27,760 --> 00:05:32,160
में मुसलमानों के साथ कनेक्ट करती हैं। पीरवाणी है जिसमें खुदा

77
00:05:32,160 --> 00:05:36,160
सुलेमान ये सब शब्द आते हैं। आयतल कुर्सी कक्ष कुरान आगे पीछे तू रहमान धड़

78
00:05:36,160 --> 00:05:40,320
राखे खुदा सब राखे सुलेमान यद्यपि मैं अपनी व्यस्तता के कारण उसे नहीं कर सकता।

79
00:05:40,320 --> 00:05:44,400
यद्यपि मैं अपनी व्यस्तता के कारण उसे नहीं कर सकता। यद्यपि मैं अपनी व्यस्तता

80
00:05:44,400 --> 00:05:48,560
के कारण उसे नहीं कर सकता। यद्यपि मैं अपनी व्यस्तता के कारण उसे नहीं कर

81
00:05:48,560 --> 00:05:52,720
सकता। यह मैंने खुद लिखा है। मंत्र दे दीजिए, कोई तंत्र दे दीजिए, कोई सिद्धि दे दीजिए

82
00:05:52,720 --> 00:05:56,720
और मैं बहुत टालता हूं, टालता हूं। फिर एकाद किसी को कुछ दे देता था पहले लेकिन अब इन प्रकरणों के

83
00:05:56,720 --> 00:06:00,720
बाद मैं और भी सतर्क हो गया हूं। अब इन प्रकरणों के बाद मैं और भी सतर्क हो गया हूं। अब इन

84
00:06:00,720 --> 00:06:05,600
प्रकरणों के बाद मैं और भी सतर्क हो गया हूं। अब इन प्रकरणों के बाद मैं और भी सतर्क हो गया हूं।

85
00:06:05,600 --> 00:06:10,320
अब प्रश्न ये उठता है कि इस प्रकार की अवैदिक पूजा पद्धति भगवतानंद

86
00:06:10,320 --> 00:06:14,560
को किस प्रामाणिक संप्रदाय से प्राप्त हुई है? प्रथम तो कोई भी प्रामाणिक

87
00:06:14,560 --> 00:06:18,640
संप्रदाय इस प्रकार की अवैदिक पूजा पद्धति का समर्थन नहीं करता। यदि

88
00:06:18,640 --> 00:06:22,960
करता भी है तो निग्रह संप्रदाय में प्रमाण्य बुद्धि होने के कारण किसी संप्रदाय

89
00:06:22,960 --> 00:06:26,960
द्वारा किए जा रहे इस प्रकार के शास्त्र विरुद्ध कृत का निग्रह

90
00:06:26,960 --> 00:06:30,960
ना करते हुए उसका प्रचार करना यह दिखाता

91
00:06:30,960 --> 00:06:35,120
है कि भागवतानंद की प्रमाण्य बुद्धि निग्रह संप्रदाय में भी नहीं

92
00:06:35,120 --> 00:06:39,120
है। क्योंकि उसने स्वयं निग्रह संप्रदाय को श्रुति सम्मत बताया

93
00:06:39,120 --> 00:06:44,000
है। ऐसे में अपने संप्रदाय की सीमा का उल्लंघन करते हुए

94
00:06:44,000 --> 00:06:48,000
किसी और संप्रदाय की वेद विरुद्ध सामग्री का समर्थन करना

95
00:06:48,000 --> 00:06:52,080
भागवतानंद को उसी के द्वारा परिभाषित निग्रह संप्रदाय को ना

96
00:06:52,080 --> 00:06:54,320
मानने वाला सिद्ध करता है। तेरे

97
00:06:54,320 --> 00:06:58,320
ही द्वारा तू निग्रह संप्रदाय जो तूने तथाकथित बनाया

98
00:06:58,320 --> 00:07:02,400
उसका विरोधी सिद्ध होता है। क्यों? क्योंकि जब तू अपनी अवैदिक सामग्री का

99
00:07:02,400 --> 00:07:06,480
पक्ष लेता है तो उसके लिए अन्य परंपराओं का आलंबन लेता है। बोलना निग्रह

100
00:07:06,480 --> 00:07:10,800
संप्रदाय से प्राप्त हुई है जिससे हमें पता चले कि वो पूर्णतया श्रुति सम्मत नहीं अवैदिक

101
00:07:10,800 --> 00:07:14,880
भी है। बोल फंसेगा मैं बता

102
00:07:14,880 --> 00:07:19,120
रहा हूं जितना भिड़ेगा उतना फंसेगा। मैं बता रहा हूं। फंसता चला

103
00:07:19,120 --> 00:07:23,120
जाएगा। करियर खाना था। तेरा करियर खा जाऊंगा

104
00:07:23,120 --> 00:07:28,480
मैं। हैं? खा करियर।

105
00:07:28,480 --> 00:07:29,120
इसके साथ

106
00:07:29,120 --> 00:07:33,840
ही साथ यदि यह माना जाए कि इस प्रकार की इस्लामिक सामग्री से युक्त पूजा पद्धति

107
00:07:33,840 --> 00:07:38,080
उसे निग्रह संप्रदाय से ही प्राप्त हुई है तो ऐसे में निग्रह संप्रदाय

108
00:07:38,080 --> 00:07:42,160
को ही वेद विरुद्ध मानना होगा जो भी हो इस

109
00:07:42,160 --> 00:07:47,520
प्रकार की सनातन विरुद्ध सामग्री को प्रामाणिक एवं

110
00:07:47,520 --> 00:07:51,680
फलदायक मानते हुए उसका प्रचार समर्थन एवं महिमागान करने

111
00:07:51,680 --> 00:07:56,240
वाले भागवतानंद को अवैदिक और सनातन विरोधी ना मानकर सनातन

112
00:07:56,240 --> 00:08:00,880
वैदिक कार हिंदू धर्म का प्रामाणिक आचार्य क्यों माना जाए? क्योंकि भागवतानंद

113
00:08:00,880 --> 00:08:05,280
ने कहा है यही नहीं शक्ति संगम तंत्र

114
00:08:05,280 --> 00:08:09,920
एक आठ 32 एक नौ 41

115
00:08:09,920 --> 00:08:13,920
51 पहला खंड आठवां अध्याय 32वा

116
00:08:13,920 --> 00:08:18,240
श्लोक पहला खंड नौवा अध्याय 51वा श्लोक इसके अनुसार

117
00:08:18,240 --> 00:08:23,040
ब्राह्मण के लिए वेद विरुद्ध आचरण सर्वथा निषिद्ध है।

118
00:08:23,040 --> 00:08:27,840
वेद विरुद्ध आचरण सर्वथा निषिद्ध है। काली

119
00:08:27,840 --> 00:08:32,400
खंड में वेद रहित भूत प्रेत आदि को सिद्ध करने की विधि का आलंबन

120
00:08:32,400 --> 00:08:36,560
लेने वाले को चांडाल कहा गया है। ऐसे

121
00:08:36,560 --> 00:08:41,120
में यह जो इस्लामिक पूजा करने करवाने वाले को

122
00:08:41,120 --> 00:08:44,240
चांडाल क्यों ना माना जाए? अ्राह्मण क्यों

123
00:08:44,240 --> 00:08:49,040
ना माना जाए? पतित ब्राह्मण क्यों ना माना जाए? अयोग्य क्यों ना माना जाए?

124
00:08:49,040 --> 00:08:54,160
क्योंकि भागवत आनंद ने कहा है

125
00:08:54,160 --> 00:08:58,560
यू तो भागवत आनंद अपने लगभग हर दूसरे वीडियो में किसी ना किसी की चारित्रिक

126
00:08:58,560 --> 00:09:02,640
छवि को नष्ट करते हुए उस पर आपत्तिजनक रूप से अश्लीलता से

127
00:09:02,640 --> 00:09:06,640
भरी टिप्पणियां करता हुआ दिखाई देता है। भले ही सामने कोई

128
00:09:06,640 --> 00:09:10,720
दुराचारी हो अथवा साधु हो परंतु फिर भी उदाहरण मात्र के

129
00:09:10,720 --> 00:09:16,080
लिए नीचे दिए गए लिंक में अथवा

130
00:09:16,080 --> 00:09:20,240
उपलब्ध वीडियो में पाठक पीडीएफ जो लोग देख रहे होंगे उनके

131
00:09:20,240 --> 00:09:24,480
लिए लिंक है वैसे इस वीडियो में वीडियो दिखा दिया जाएगा। पाठक यह देख

132
00:09:24,480 --> 00:09:28,880
सकते हैं कि किस प्रकार भागवतानंद द्वारा पूरी पीठ के परिकरों पर

133
00:09:28,880 --> 00:09:33,040
वहां जाने वाली महिला श्रद्धालुओं पर बिना किसी ठोस आधार

134
00:09:33,040 --> 00:09:37,120
के अत्यंत आपत्तिजनक एवं अमर्यादित शब्दों का पूर्णतः

135
00:09:37,120 --> 00:09:41,120
निराधार एवं गंभीर आरोप

136
00:09:41,120 --> 00:09:45,200
पूर्णत निराधार एवं गंभीर आरोप सार्वजनिक रूप से लगाते हुए

137
00:09:45,200 --> 00:09:49,280
सनातन धर्म की सर्वोच्च आचार्य पीठ के प्रति जन सामान्य को

138
00:09:49,280 --> 00:09:53,520
अनास्थावान बनाने का प्रयास किया जा रहा है। इस प्रकार असत्यवादी

139
00:09:53,520 --> 00:09:57,600
होते हुए भागवतानंद का शास्त्र विरुद्ध आचरण सिद्ध होता

140
00:09:57,600 --> 00:10:01,680
है। ध्यातव्य है कि भागवतानंद के इन्हीं दुष्कृत्यों

141
00:10:01,680 --> 00:10:06,000
के प्रति प्रतिकार स्वरूप एक जागरूक हिंदू होते हुए सनातन

142
00:10:06,000 --> 00:10:09,200
धर्म की सर्वोच्च आचार पीठ के प्रति

143
00:10:09,200 --> 00:10:13,360
जन सामान्य को अनास्थावान होने से बचाने के निमित्त

144
00:10:13,360 --> 00:10:18,080
ही हमने विवश होकर भागवतानंद से प्रश्न करते हुए वीडियो बनाना

145
00:10:18,080 --> 00:10:22,240
प्रारंभ किए थे। जिसके कारण इसने

146
00:10:22,240 --> 00:10:27,360
हमें 100 करोड़ का नोटिस भेजा।

147
00:10:27,360 --> 00:10:31,440
तो अब वह टिप्पणियां क्या-क्या हैं? यह सब आपको आगे दिख

148
00:10:31,440 --> 00:10:35,920
जाएगा वीडियोस में। सचिव

149
00:10:35,920 --> 00:10:39,920
जी का महिलाओं और भाबियों से अवैध संबंध भी रहा है। या मठ में रहने

150
00:10:39,920 --> 00:10:44,160
वाले और रायपुर वाले मठ में रहने वाले बहुत अच्छे से जानते हैं। तो

151
00:10:44,160 --> 00:10:48,480
अश्लीलता के पुजारण युवती किस अधिकार से भगाने का अधिकार रखती है?

152
00:10:48,480 --> 00:10:52,560
गोवर्धन मठ के अन्नपूर्णा भोजन का देखरेख इस नग्नता के प्रचारक युवती

153
00:10:52,560 --> 00:10:56,720
को क्यों दिया गया है? वह युवती भोजन प्रसाद पाने से सामान्य भक्तों

154
00:10:56,720 --> 00:11:00,800
को क्यों रोकती है? उसने किसने उस विजया श्री को

155
00:11:00,800 --> 00:11:05,040
एकाएक मठ में ऊंचा मान सम्मान और पद दिया। वह नीच कौन है?

156
00:11:05,040 --> 00:11:09,120
यह लिखा हुआ है। इसमें तीनचार बार विवाह कर चुकी पति बदलू

157
00:11:09,120 --> 00:11:13,920
महिला को केवल अर्थ संपत्ति पाने के लालच से क्यों इतना महत्व दिया गया?

158
00:11:13,920 --> 00:11:17,920
और भी कई चरित्रहीन महिला युवतियों को सिर्फ धन और वासना की तृप्ति

159
00:11:17,920 --> 00:11:22,160
के लिए मठ और शंकर परंपरा के मान्य सन्यासी जो पूरी पीठाधीश्वर शंकराचार्य

160
00:11:22,160 --> 00:11:24,640
जी के तक पहुंचाया जा रहा है। क्यों पहुंचाया

161
00:11:24,640 --> 00:11:29,040
जा रहा है? सचिव जी को कितने ही बार पिज़्ज़ा, कोल्ड ड्रिंक, बर्गर, गुटखा, रजनगंधा

162
00:11:29,040 --> 00:11:33,120
आदि अभक्ष पदार्थ का भक्षण करते देखा गया है। क्या यह ठीक है? गोवर्धन

163
00:11:33,120 --> 00:11:37,920
मठ की अधिष्ठात्री देवी को चढ़ने वाले दान, आभूषण और धन की चोरी।

164
00:11:37,920 --> 00:11:41,920
परिकरों का चरित्रहीन महिलाओं, युवतियों के साथ संबंध। ये पहला विषय

165
00:11:41,920 --> 00:11:46,480
है। इसमें आगे देखिए समलैंगिकों का गोवर्धन मठ में प्रवेश। समलैंगिक

166
00:11:46,480 --> 00:11:50,480
संबंधों के आरोपी ब्रह्मचारी ऋषिकेश को आदि गुरु शंकराचार्य जी के द्वारा

167
00:11:50,480 --> 00:11:54,560
स्थापित मठों में ऊंचे पद पर स्थापित कर शंकर परंपरा को विकृत किया जा

168
00:11:54,560 --> 00:11:59,280
रहा है। मठ में वेश्यावत्ति को बढ़ावा देना जबकि

169
00:11:59,280 --> 00:12:03,440
यहां तक के वक्तव्यों को निर्गत करते समय जो आपने वक्तव्य देख लिए हैं

170
00:12:03,440 --> 00:12:07,840
भागवतानंद के पास आने वाले अज्ञात फोन, मैसेज इत्यादि को पढ़ने का नाटक

171
00:12:07,840 --> 00:12:12,240
करते हुए दुष्प्रचार किया गया है। यह दिखाया गया है कि मतलब

172
00:12:12,240 --> 00:12:16,240
मैं किसी के द्वारा भेजे गए संदेश को पढ़ रहा हूं। ठीक है?

173
00:12:16,240 --> 00:12:20,640
वह यह जो वक्तव्य जो दिए गए हैं जो अभी आपने वीडियोस में देखे

174
00:12:20,640 --> 00:12:26,320
तो वह किसी संदेह किसी संदेश को पढ़ने के रूप में दिखाया गया है।

175
00:12:26,320 --> 00:12:30,400
इस वीडियो में कहीं भी भागवत आनंद द्वारा इन अक्षरों की प्रामाणिकता पर कोई प्रश्न

176
00:12:30,400 --> 00:12:34,640
नहीं किया गया। क्यों नहीं किया गया? भाई तुम्हारे पास कहीं से कोई संदेश

177
00:12:34,640 --> 00:12:38,640
आया है। वह व्यक्ति कौन है? उसको सामने लाओ या

178
00:12:38,640 --> 00:12:39,840
फिर किसी के भी द्वारा

179
00:12:39,840 --> 00:12:43,840
कोई भी मैसेज भेज देने को और जो है बढ़िया थाली सजा के परोस

180
00:12:43,840 --> 00:12:48,160
दोगे तुम चाहे किसी के लिए भी कोई भी बात हो रही हो तुम्हारे

181
00:12:48,160 --> 00:12:52,240
घर की स्त्रियों के रूप में तुम्हें मैसेज भेज दिए जाए उल्टे सीधे और

182
00:12:52,240 --> 00:12:58,240
फिर वो पढ़ोगे तुम YouTube पर बिना पुष्टि किए उनकी

183
00:13:00,320 --> 00:13:04,400
हम तो ये कुककृत नहीं करेंगे भागवत आनंद पर तुमसे हमें

184
00:13:04,400 --> 00:13:08,400
ये पूरी अपेक्षा है कि तुम किस किसी भी हद तक गिर सकते हो। जैसे

185
00:13:08,400 --> 00:13:14,400
कि तुम्हारे घर की स्त्रियों को गाली देने वाले व्यक्ति से तुमने हमें जोड़ा।

186
00:13:18,960 --> 00:13:23,120
आगे इन आक्षेपों के समर्थन में ही भाव भी व्यक्त किए किए गए हैं।

187
00:13:23,120 --> 00:13:27,200
तो पहली बात क्या किया कि अगर वह लेटर को पढ़ने का दिखावा कर रहा है।

188
00:13:27,200 --> 00:13:31,520
यद्यपि हो सकता है आए हो कहीं से तो पढ़ने का दिखावा कर रहा है। परंतु

189
00:13:31,520 --> 00:13:35,600
इस तरह से पढ़ रहा है। वो कहीं पर भी प्रश्न नहीं उठा रहा है कि यह बात तो जांच का विषय है।

190
00:13:35,600 --> 00:13:39,680
ऐसा कुछ नहीं कह रहा है जिससे कि यह सोचा जा सके कि इसका अनुसंधान अभी बाकी

191
00:13:39,680 --> 00:13:43,920
है। इस तरह से उसको प्रस्तुत किया गया है कि

192
00:13:43,920 --> 00:13:48,080
यह जो जानकारी जो जो पत्र के रूप में इसके पास आई है, मैसेज

193
00:13:48,080 --> 00:13:52,240
के रूप में इसके पास आई है या ऑडियो कॉल इसके पास आई है। यह सारी

194
00:13:52,240 --> 00:13:56,720
जानकारी बिल्कुल यथावत अक्षरस सत्य है।

195
00:13:56,720 --> 00:14:00,720
कोई प्रश्न नहीं उठाया। और उसके बाद क्या किया इसने?

196
00:14:00,720 --> 00:14:05,120
उन जो वो जानकारियां जो अज्ञात लोगों के द्वारा अनाधिकृत

197
00:14:05,120 --> 00:14:09,280
रूप से भेजी जा रही हैं उन जानकारियों की पुष्टि करने वाले भाव भी

198
00:14:09,280 --> 00:14:15,280
प्रस्तुत किए हैं।

199
00:14:15,760 --> 00:14:19,760
अच्छा कहीं-कहीं तो इन आक्षेपों से जुड़ी सामग्री

200
00:14:19,760 --> 00:14:24,000
पर इस प्रकार से कई वक्तव्य कहे हैं जिनके द्वारा इन आक्षेपों

201
00:14:24,000 --> 00:14:28,240
को सत्य के रूप में प्रचारित किया जाना सिद्ध होता है। यदि

202
00:14:28,240 --> 00:14:32,240
यह नाटक नहीं भी था कि यह पत्र हम जो कह रहे हैं पत्र पढ़ने

203
00:14:32,240 --> 00:14:36,240
का नाटक जो हो रहा है या फिर ऑडियो कॉल तुम ही ना बनवाई हो अगर

204
00:14:36,240 --> 00:14:40,480
यह नाटक नहीं बीता तो सुनो दुर्जंतोष न्याय तो भागवतानंद

205
00:14:40,480 --> 00:14:44,560
को इतने गंभीर आरोप लगाने वाले को सामने लाना चाहिए उसका

206
00:14:44,560 --> 00:14:48,800
नाम बताना चाहिए जिससे कि लोग विश्वास कर सके यह व्यक्ति

207
00:14:48,800 --> 00:14:54,800
के बोलने की बात इस व्यक्ति की बात पर हम विश्वास कर सकते यह निर्णय ले सके

208
00:14:55,200 --> 00:14:59,280
यदि वह सामने नहीं आना चाहता तो ऐसे में उसकी विश्वसनीयता उसका

209
00:14:59,280 --> 00:15:03,280
अस्तित्व अस्तित्व अथवा उस अज्ञात व्यक्ति के पास इन

210
00:15:03,280 --> 00:15:07,440
आक्षेपों को सिद्ध करने हेतु क्या सामग्री है? इन सब बातों का मूल्यांकन किए

211
00:15:07,440 --> 00:15:12,320
बिना ही उसके द्वारा भेजे गए संदेश को सार्वजनिक रूप से पढ़कर

212
00:15:12,320 --> 00:15:16,400
इस प्रकार किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति की छवि को क्षति

213
00:15:16,400 --> 00:15:20,400
पहुंचाने का प्रयास करने से बचना चाहिए था। यदि

214
00:15:20,400 --> 00:15:24,560
तुम सिद्ध नहीं कर पा रहे तो तुम्हें उसको सार्वजनिक करने से बचना चाहिए।

215
00:15:24,560 --> 00:15:28,800
इसी क्रम में अन्य कई वीडियो सहित इस वीडियो में भी आगे

216
00:15:28,800 --> 00:15:32,960
भागवतानंद द्वारा स्वयं से भी इसी प्रकार के अनर्गल

217
00:15:32,960 --> 00:15:37,440
आक्षेप लगाने के रूप में आपत्तिजनक टिप्पणियां की गई हैं।

218
00:15:37,440 --> 00:15:41,600
जिनमें से दो उदाहरण स्वरूप आगे आपको वीडियो में दिखाए जा रहे हैं।

219
00:15:41,600 --> 00:15:45,680
भगवान को पूरी शंकराचार्य से मिलवाया जा रहा है। वेश्याओं को मिलवाया जा रहा है। लेकिन तुम

220
00:15:45,680 --> 00:15:48,240
लोग को नहीं मिलने दिया जा रहा है। तब लगता है कि निर्विकल्प आनंद

221
00:15:48,240 --> 00:15:52,800
वहां इतने साल से क्या सेटिंग कर रहा है। दिव्य चैतन्य को बनाने के लिए शंकराचार्य

222
00:15:52,800 --> 00:15:57,040
दिव्य चैतन्य जी अगर शंकराचार्य बन भी जाते हैं या बनने का चिंतन करते

223
00:15:57,040 --> 00:16:01,040
भी हैं ना तो इतने टुकड़े करके फिकवा दिए जाएंगे निर्विकल्पानंद के गैंग के द्वारा

224
00:16:01,040 --> 00:16:03,120
कि पता नहीं चलेगा दिव्य चैतन्य जी कहां गए

225
00:16:03,120 --> 00:16:08,640
तो दिव्य चैतन्य जी की यही नीति

226
00:16:08,640 --> 00:16:13,120
इस वीडियो में भी स्वतंत्र रूप से निराधार आक्षेप

227
00:16:13,120 --> 00:16:17,200
अब यहां पहले उसने पत्र को पढ़ने का दिखावा

228
00:16:17,200 --> 00:16:21,200
किया कि मैं पत्र पढ़ रहा हूं है ना जो आक्षेप लगाए पहले पत्र को

229
00:16:21,200 --> 00:16:25,360
पढ़ने का दिखावा किया और दूसरे में क्या है कि अब जो है वह

230
00:16:25,360 --> 00:16:29,600
स्वतंत्र रूप से निराधार आक्षेप लगाने के साथ-साथ पूर्व वाले वीडियो

231
00:16:29,600 --> 00:16:33,680
की भांति भी किसी अज्ञात व्यक्ति के संदेश को पढ़ने के रूप में भी कुछ

232
00:16:33,680 --> 00:16:37,920
आक्षेप लगाए गए हैं। जिस संबंध में हम पूर्व में ही अपना पक्ष प्रस्तुत कराए हैं।

233
00:16:37,920 --> 00:16:42,400
प्रश्न उठाना चाहिए था और उनको प्रामाणिक

234
00:16:42,400 --> 00:16:46,880
अथवा सत्य के रूप में व्यक्त करने वाले वक्तव्य निर्गत

235
00:16:46,880 --> 00:16:51,040
नहीं किए जाने चाहिए थे। उनकी पुष्टि किए बिना, अनुसंधान

236
00:16:51,040 --> 00:16:55,120
किए बिना। तो यह जो दूसरा वीडियो है,

237
00:16:55,120 --> 00:16:59,440
इसमें जो कुछ मुख्य आरोप जो लगाए गए हैं जो हम जो देख पाए, ढूंढ पाए, वो आगे

238
00:16:59,440 --> 00:17:04,640
आपको वीडियो में दिखाए जा रहे हैं। देख लीजिए।

239
00:17:04,640 --> 00:17:05,140
जींस

240
00:17:05,040 --> 00:17:09,040
टॉप पहनी हुई स्त्री और कुत्ते को लिफ्ट टू लिप किस दे रही है।

241
00:17:09,040 --> 00:17:13,440
मुंह से मुंह लगाकर चुम्मा ले रही है। ऐसी स्त्री पूरी शंकराचार्य

242
00:17:13,440 --> 00:17:15,200
जी के साथ साझा कर रही है। बताओ

243
00:17:15,200 --> 00:17:19,520
महिला का नाम तो नहीं लूंगा क्योंकि हर बात की अपनी एक सीमा होती है।

244
00:17:19,520 --> 00:17:23,760
लेकिन उस सीमा में रहते हुए हम आपको संकेत करना चाहते हैं कि

245
00:17:23,760 --> 00:17:28,000
सन्यासी की भी एक सीमा होती है और सीमा से बाहर जाकर जब सन्यासी

246
00:17:28,000 --> 00:17:32,560
मर्यादा का अतिक्रमण करता है तो उसकी वह सीमा खंडित होकर

247
00:17:32,560 --> 00:17:36,640
विप्लव का कारण बनती है। तो हम इस

248
00:17:36,640 --> 00:17:39,920
बात की सीमा को समझते हुए आप सब को संकेत करना चाहते हैं

249
00:17:39,920 --> 00:17:44,240
कि स्वामी निर्विकल्पानंद सरस्वती का जिन महिलाओं के साथ

250
00:17:44,240 --> 00:17:48,320
यह अवैध संबंध बताया जाता है। उनमें से बहुत सी महिलाओं की पुत्र

251
00:17:48,320 --> 00:17:52,880
वधूओं ने ही अपनी मर्यादा की सीमा में रहते हुए हमको परोक्षत

252
00:17:52,880 --> 00:17:54,800
यह संदेश भी भिजवाया था।

253
00:17:54,800 --> 00:17:59,120
लोग जैसे तथाकथित योगाचार्य स्त्री पर भूल से भी दृष्टि पड़ने पर स्नान के पश्चात ही शुद्धता

254
00:17:59,120 --> 00:18:03,200
मिलेगी। ऐसी विचारधारा अनिवार्य नहीं हो जानी चाहिए। श्री नाम की लड़की ने कुंभ शिविर

255
00:18:03,200 --> 00:18:07,600
की बिक्री पूरी शंकराचार्य के यहां ₹55,000 प्रति व्यक्ति की और गुरुदेव

256
00:18:07,600 --> 00:18:11,600
के नाम से अपने योग की ऑनलाइन कक्षाएं बेचना शुरू कर दी हैं और हम सभी गुरुदेव

257
00:18:11,600 --> 00:18:15,600
के शिष्य जिस मूर्खा को इतना भी ज्ञान नहीं कि मृच्छ भूमि में जाना निषेध है वह मठ में कैसे

258
00:18:15,600 --> 00:18:19,600
बैठे रहती है? ऊपर से उसका और उसके धर्म विरुद्ध षड्यंत्र का

259
00:18:19,600 --> 00:18:24,000
पोषक मठ सिद्ध होगा या नहीं इसका उत्तरदाई कौन है? कौन है? कौन है?

260
00:18:24,000 --> 00:18:28,000
अब जिस स्त्री की बात चल रही थी, जिसका नाम विजया बताया

261
00:18:28,000 --> 00:18:30,560
गया था, मैं इस स्त्री को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता हूं। हां

262
00:18:30,560 --> 00:18:34,560
ये जरूर है कि शिवश नारायण द्विवेदी इत्यादि लोग जो आह्वान चैनल के हैं वो लोग निकटता से

263
00:18:34,560 --> 00:18:38,720
जानते हैं। संवाद इत्यादि होता रहता है। ये सब बातें भी सार्वजनिक हैं। इस पर सही नहीं। उनसे संवाद

264
00:18:38,720 --> 00:18:42,800
ही किया। उनके साथ दुष्कर्म भी कर चुके हैं। अब देखिए यह बात कथित तौर पर यहां अब

265
00:18:42,800 --> 00:18:47,680
आपको एक वीडियो और दिखाया जाता है। इसमें भी

266
00:18:47,680 --> 00:18:52,720
उन आक्षेपों के उन आक्षेपों के समर्थन में उनकी पुष्टि करने के निमित्त

267
00:18:52,720 --> 00:18:56,720
यह वीडियो भी बनाया गया है। जो पहले आपने आरोप देख लिए उनकी पुष्टि इस

268
00:18:56,720 --> 00:19:00,720
वीडियो में की जा रही है। यह भी देख लीजिए। क्योंकि विजयश्री के पास

269
00:19:00,720 --> 00:19:04,960
ऊपर और नीचे दोनों दृष्टिकोण से ऊपर और नीचे मतलब मैं लोक परलोक

270
00:19:04,960 --> 00:19:09,280
कहना चाह रहा हूं। बाकी आप जो अर्थ समझना चाहे वो समझ सकते हैं। भाई आपकी चिंतन नियंत्रण

271
00:19:09,280 --> 00:19:14,400
थोड़े है। हर वो चीज है जो मेरे पास नहीं है। तो

272
00:19:14,400 --> 00:19:18,400
जो भी है उसको पता नहीं है शायद। अगर वो सच में भोलीभाली है जो कि है नहीं

273
00:19:18,400 --> 00:19:22,400
मुझे नहीं लगता। जिस लेवल पर उसने अपने अधंगी तस्वीरें सार्वजनिक

274
00:19:22,400 --> 00:19:26,400
कर रखी हैं और जिस प्रकार की पुस्तकें उसने लिख रखी हैं। मुझे नहीं लगता कि वो

275
00:19:26,400 --> 00:19:30,400
महिला किसी छोटे-मोटे प्रोजेक्ट के चक्कर में है और जितने शीघ्रता से सीधे

276
00:19:30,400 --> 00:19:34,480
पूरी शंकराचार्य जी पांडे जी अभी ध्यान दीजिएगा। शिवश इतनी सिंपिंग कर

277
00:19:34,480 --> 00:19:38,560
रहा है। कि ये लड़की खुलेआम कहे कि यूनिवर्सिटी आचार्य का टाइटल नहीं और

278
00:19:38,560 --> 00:19:42,720
पूरी के शंकराचार्य जी के चेले कमेंट करते हैं मेरे वीडियो में कई बार कि

279
00:19:42,720 --> 00:19:45,760
विश्वविद्यालय को आचार्य की उपाधि मिली है। देख

280
00:19:45,760 --> 00:19:50,400
रहे हैं इन लोगों का विरोधाभास ये रिश्ता क्या कहलाता

281
00:19:50,400 --> 00:19:54,400
है? हमको समझ में नहीं आता है। तुम्हारे

282
00:19:54,400 --> 00:19:58,640
जैसे ही युवाओं को धर्म में रुचि रखनी चाहिए। चाहे विजय जो है

283
00:19:58,640 --> 00:20:02,800
वो अंडरवियर में और ऊपर के ब्रेट में फोटो खिंचाए घूम रही हो। लेकिन विजय

284
00:20:02,800 --> 00:20:06,960
तुम्हारी तो वाणी में हमको स्वामी करपात्री जी का रागस्तव वाला लक्षण दिखाते

285
00:20:06,960 --> 00:20:11,200
हुए वचन का अनुभव होता है। इतना ही नहीं

286
00:20:11,200 --> 00:20:15,760
यह कुछ बातें वह न्यायपालिका के पर्सपेक्टिव से भी लिखी है क्योंकि भाई न्यायपालिका

287
00:20:15,760 --> 00:20:19,920
में जा रहे हैं तो यह भी तो पता चले न्यायपालिका को न्यायपालिका के बारे में भी इसने क्या कहा

288
00:20:19,920 --> 00:20:24,080
है जब न्यायपालिका को लेकर के उसकी शरणागत होकर के

289
00:20:24,080 --> 00:20:28,080
हमसे अपनी रक्षा करना चाह रहा है ये व्यक्ति है

290
00:20:28,080 --> 00:20:32,160
ना कि हम इसके दुराचरण इसके जो इसके द्वारा किया जाने वाला

291
00:20:32,160 --> 00:20:36,400
की जाने वाली जो वितंडा है उसका प्रतिकार ना करें इसलिए जो न्यायालय की शरण

292
00:20:36,400 --> 00:20:40,800
ले रहा है तो न्यायालय को पता होना चाहिए ना कि न्यायालय के लिए इस व्यक्ति ने कितनी धर्तता

293
00:20:40,800 --> 00:20:43,840
से क्या बोला है।

294
00:20:43,840 --> 00:20:48,000
आगे चलते हैं। भागवतानंद को अद्वैत से मेल खाने

295
00:20:48,000 --> 00:20:52,160
वाले अव्यक्ता द्वैत सिद्धांत के रूप में ब्रह्म तत्व का ज्ञान देने वाले गुरु कौन

296
00:20:52,160 --> 00:20:56,160
है? यह विषय तोचाराधीन है। परंतु इतना सर्वविदित

297
00:20:56,160 --> 00:21:00,240
है कि भागवतानंद ने कई बार पूरी मटके वर्तमान शंकराचार्य स्वामी निश्चनंद

298
00:21:00,240 --> 00:21:00,880
सरस्वती जी

299
00:21:00,880 --> 00:21:05,120
महाराज के चरणों में बैठकर आध्यात्म का ज्ञान प्राप्त किया है।

300
00:21:05,120 --> 00:21:09,120
तो गरुड़ पुराण के अनुसार गरुड़ पुराण में कहा गया है कि

301
00:21:09,120 --> 00:21:15,120
जिससे आप थोड़ा सा भी पढ़ाई कर लेते हैं वो आपका गुरु होता है।

302
00:21:15,440 --> 00:21:19,680
पूरी के शंकराचार्य भी भागवतानंद के गुरु सिद्ध होते हैं। परंतु भागवत आनंद

303
00:21:19,680 --> 00:21:24,160
सीधे तौर पर पूरी शंकराचार्य के विषय में अनेक बार अमर्यादित

304
00:21:24,160 --> 00:21:29,200
ढंग से उपस पूर्वक वक्तव्य निर्गत करता है। तूतग की भाषा करता है।

305
00:21:29,200 --> 00:21:33,680
हम यह कहता है कि शंकराचार्य जो है

306
00:21:33,680 --> 00:21:38,400
किसी प्रवचन में आने के लिए करोड़ों रुपए लेते हैं।

307
00:21:38,400 --> 00:21:42,480
हम ये आक्षेप लगाता है। ऐसे नहीं मैं आ जाता

308
00:21:42,480 --> 00:21:46,480
हूं। आप एक करोड़ देकर चारों शंकराचार्य को बुलाकर ले आइए। आपका सामर्थ होगा। वो आ जाएंगे।

309
00:21:46,480 --> 00:21:50,560
हमको कोई मतलब नहीं है। ग्रहचार्य को बुलाने के लिए धन नहीं साहस और सदाचरण चाहिए।

310
00:21:50,560 --> 00:21:54,640
बता दे रहा हूं। और इसके दोगलेपन

311
00:21:54,640 --> 00:21:58,880
की बात तो हमने वहां बता ही दी आपको। एक तरफ कहेगा विश्व के

312
00:21:58,880 --> 00:22:03,120
वो हैं धर्म के वरिष्ठतम प्रतिमान

313
00:22:03,120 --> 00:22:07,680
और दूसरी तरफ ये आरोप लगाएगा वो मुसलमानों के हितषी हैं।

314
00:22:07,680 --> 00:22:11,920
सनातन धर्म के विरोधी है वो। हैं। अरे

315
00:22:11,920 --> 00:22:16,400
थोड़ा बहुत जो धर्म बच गया है रह जाने दे भाई। इन आचार्यों

316
00:22:16,400 --> 00:22:20,640
पर अनास्था जगा देगा ना इन आचार्यों के प्रति तो तेरे जैसे मुंह वाले के कभी

317
00:22:20,640 --> 00:22:25,040
अनुगत चल सकेगी क्या दुनिया

318
00:22:25,040 --> 00:22:31,040
देखा है अपना चेहरा कभी

319
00:22:31,760 --> 00:22:37,760
धर्म रक्षा के नाम पर आचार्यों के लिए विष्ठा निकलती है तेरे मुंह से

320
00:22:39,470 --> 00:22:45,470
[संगीत]

321
00:22:46,800 --> 00:22:50,800
यह अंत नहीं है। उदाहरण है। इन वीडियोस के

322
00:22:50,800 --> 00:22:54,960
पूर्व ये जो हमने आपको दिखाए हैं और उपरांत भी कई

323
00:22:54,960 --> 00:22:59,280
ऐसे आपत्तिजनक वक्तव्य निर्गत किए जा चुके हैं। वर्तमान

324
00:22:59,280 --> 00:23:03,440
में भी लगातार किए जा रहे हैं जिनके कारण भागवतानंद

325
00:23:03,440 --> 00:23:07,680
के विरुद्ध को कोई भी ठोस कारवाई ना हो

326
00:23:07,680 --> 00:23:10,880
तो यह अन्याय होगा।

327
00:23:10,880 --> 00:23:16,480
इसीलिए ठोस कारवाई हर प्रकार से कर रहे हैं।

328
00:23:16,480 --> 00:23:20,560
अच्छा इसके अलावा एक बात और है इस

329
00:23:20,560 --> 00:23:25,040
सब प्रसंग से हटकर इसकी नीचता की पराकाष्ठा

330
00:23:25,040 --> 00:23:29,120
देखो कि यदि कोई व्यक्ति अज्ञता वशव वश अपने घर

331
00:23:29,120 --> 00:23:33,200
में कुत्ता पाले हुए है और उसके प्रति स्नेह प्रकट करता है

332
00:23:33,200 --> 00:23:37,440
तो यह व्यक्ति क्या कह रहा है कि कुत्ते के साथ अपनी

333
00:23:37,440 --> 00:23:40,400
माता को सुला दो।

334
00:23:40,400 --> 00:23:43,200
इतनी नीचता

335
00:23:43,200 --> 00:23:47,200
साथ कुत्ता सुला रहे हो अपने साथ बिल्ली सुला रहे हो अपने साथ सूअर पाल रहे हो

336
00:23:47,200 --> 00:23:51,280
अपने साथ कुत्ता सुला रहे हो उससे रक्षाबंधन कर रहे हो हां कुत्ता

337
00:23:51,280 --> 00:23:55,280
के माथा में तिलक लग रहा है कुत्ता को राखी बांधी जा रही है कुत्ता से राखी बंधवाई जा रही

338
00:23:55,280 --> 00:23:59,440
है अरे भैया कुत्ता को अपनी मां के पास भेजो एक आध भाई पैदा करवा लो बुरा

339
00:23:59,440 --> 00:24:04,320
लगेगा सुनने में लेकिन सुनो और अब जो गुरु का अपमान है

340
00:24:04,320 --> 00:24:08,400
वो अनेक शास्त्र वचनों द्वारा दुराचरण कहा गया है कुछ उदाहरण हम दे देते

341
00:24:08,400 --> 00:24:12,400
देते हैं। अध्यात्म का ज्ञान देने वाला गुरु के गुरु का सम्मान

342
00:24:12,400 --> 00:24:16,640
ना करने पर नरक की प्राप्ति होती है। गरुण पुराण दो चार

343
00:24:16,640 --> 00:24:20,800
49 सज्जनों गुरुजनों की निंदा करने वाले यम यम मार्ग

344
00:24:20,800 --> 00:24:25,120
में प्रताड़ित प्रताड़ित होते हैं। गरुण पुराण दो चार नौ

345
00:24:25,120 --> 00:24:29,200
गुरु तथा अन्य पूज्य जनों का अपमान करने वाले वैतरणी नदी में गिरते

346
00:24:29,200 --> 00:24:31,680
हैं। गरुण पुराण दो चार 14

347
00:24:31,680 --> 00:24:35,840
ऐसे लोग नरकगामी होते हैं। गरुण पुराण दो चार 36 जिसकी

348
00:24:35,840 --> 00:24:39,920
भगवान में जितनी भक्ति है उतनी यदि भक्ति गुरु में भी है

349
00:24:39,920 --> 00:24:43,920
तभी वह व्यक्ति परमार्थ को प्राप्त कर पाता है। श्वेता शतपनिषद छ

350
00:24:43,920 --> 00:24:48,000
23 तो सनातन धर्म के सभी प्रामाणिक

351
00:24:48,000 --> 00:24:52,160
शास्त्रों द्वारा किसी को भी अब ये अगला आ रहा है। अभी तक तो गुरु की अवेलना

352
00:24:52,160 --> 00:24:56,480
की थी। अब इसने कैसे अशास्त्रीयता दिखाई है? सनातन

353
00:24:56,480 --> 00:25:00,640
धर्म के सभी प्रामाणिक शास्त्रों द्वारा किसी को भी गाली देना निषेध किया गया

354
00:25:00,640 --> 00:25:04,720
है। किसी भी स्थिति में जबकि स्वयं को सनातन धर्म का प्रामाणिक

355
00:25:04,720 --> 00:25:09,200
आचार्य कहने वाले भगवतानंद द्वारा अत्यंत निर्लज्जता पूर्वक

356
00:25:09,200 --> 00:25:13,280
पुरुषों की तो बाद दूर महिलाओं तक को अश्लील टिप्पणियां सहित गालियां भी दी

357
00:25:13,280 --> 00:25:18,170
गई हैं। उदाहरण के लिए आपको यहां प्रस्तुत कर दिया जाएगा।

358
00:25:18,170 --> 00:25:24,000
[संगीत]

359
00:25:24,000 --> 00:25:28,400
भागवतानंद स्वयं उसके द्वारा गाली दिए जाने सहित भविष्य में भी दृढ़ता

360
00:25:28,400 --> 00:25:33,360
पूर्वक गाली देने की गाली देते रहने की घोषणा कर रहा है।

361
00:25:33,360 --> 00:25:37,680
साथ ही साथ वह स्वयं इस कृत्य को शास्त्र विरुद्ध भी बता रहा है।

362
00:25:37,680 --> 00:25:41,680
मैं मानता हूं कि यह शास्त्रीय है। यह भी देख लो। अशास्त्रीय भी

363
00:25:41,680 --> 00:25:45,760
कह रहा है। इसको भगवती से वह प्राप्त है ना कि अशास्त्रीय कार्य नहीं

364
00:25:45,760 --> 00:25:49,840
करेगा। है ना? तो कर रहा है।

365
00:25:49,840 --> 00:25:53,920
तुम मेरा क्या दुष्प्रचार करोगे? मैं स्वयं वो स्क्रीनशॉट अटैच करके वीडियो में डाल

366
00:25:53,920 --> 00:25:56,800
रहा हूं। मैं गालियां देता हूं। मैं

367
00:25:56,800 --> 00:26:00,960
गालियां देता हूं और मैं गालियां दूंगा। कैसे? कब? किस परिस्थिति

368
00:26:00,960 --> 00:26:04,480
में यह देखो। अब लोग कह रहे हैं इसका शास्त्रीय विधान है क्या? बिल्कुल नहीं।

369
00:26:04,480 --> 00:26:08,640
लेकिन अब समस्या क्या है यहां पर? अब कुछ लोग तर्क दे रहे थे कि गाली तो भगवान

370
00:26:08,640 --> 00:26:12,800
कृष्ण ने भी नहीं दी कभी किसी को। अरे भैया उनके पास माथा काटने का सिस्टम

371
00:26:12,800 --> 00:26:17,120
उपलब्ध था। भगवान श्री कृष्ण के पास सुदर्शन चक्र था।

372
00:26:17,120 --> 00:26:21,200
इसीलिए उन्होंने चक्र का प्रयोग करके गाली देने वाले का मस्तक उड़ा दिया। मेरे पास नहीं है

373
00:26:21,200 --> 00:26:25,200
तो मैं क्या करूं? वाचिक प्रतिकार भी नहीं करूं। तो

374
00:26:25,200 --> 00:26:29,760
गाली देना शास्त्रीय है। बिल्कुल सही बात। लेकिन मैंने क्या पूर्व पक्षी बनकर गाली दी है?

375
00:26:29,760 --> 00:26:30,260
क्या

376
00:26:29,920 --> 00:26:33,920
है? गाली। तो मैं गाली देता हूं। यदि कोई गाली सुनने

377
00:26:33,920 --> 00:26:38,080
का काम करे। मैं ऐसा संत नहीं हूं कि तुम मुझे मां बहन की गालियां देते रहो तो मैं माथा झुका

378
00:26:38,080 --> 00:26:42,080
कर सुन लूंगा। ऐसी सारस्वत सिद्धि हमारे पास नहीं है कि कोई मुझे गालियां

379
00:26:42,080 --> 00:26:46,080
दे और मुझे अपनी सिद्धि बचाने के चक्कर में माथा झुका कर सुनना पड़े। बिल्कुल नहीं। कदापि

380
00:26:46,080 --> 00:26:50,320
नहीं। किसको मानोगे? वेद को मानोगे प्रमाण। पुराण को मानोगे, स्मृति को मानोगे,

381
00:26:50,320 --> 00:26:54,400
तंत्र को मानोगे, इतिहास को मानोगे, आधुनिक नीतिकारों को मानोगे,

382
00:26:54,400 --> 00:26:57,600
किसको मानोगे? जहां से मानोगे, वहां से प्रमाण देंगे। चलो प्रारंभ।

383
00:26:57,600 --> 00:27:01,920
तो गाली देना कितना शास्त्री है यह तो भागवत ने स्वयं ही बता दिया।

384
00:27:01,920 --> 00:27:06,080
परंतु साथ ही साथ हम गाली हम यहां गाली देने के निषेध करने वाले कुछ

385
00:27:06,080 --> 00:27:10,320
शास्त्र वचन उपलब्ध करा रहे हैं। जिसकी सदा

386
00:27:10,320 --> 00:27:14,800
वाणी शुद्ध हो वही वेदांत के फल को पाता है। मनुस्मृति दो3

387
00:27:14,800 --> 00:27:19,280
मनवाणी द्वारा किसी से द्रोह ना करना धर्म है।

388
00:27:19,280 --> 00:27:23,520
महाभारत शांति पर्व 162.21

389
00:27:23,520 --> 00:27:27,520
कठोर वचन बोलना व्यसन है। मनुस्मृति 7

390
00:27:27,520 --> 00:27:32,320
51 तथा व्यसनी नरकगामी होता है। मनुस्मृति

391
00:27:32,320 --> 00:27:34,960
753

392
00:27:34,960 --> 00:27:39,440
जिससे किसी को भी दुख पहुंचे ऐसी वाणी ना बोले दो 161

393
00:27:39,440 --> 00:27:43,440
मनुस्मृति गाली अपशब्द आदि प्रयोग करने पर दंड

394
00:27:43,440 --> 00:27:49,360
विधान दिया गया है 8238

395
00:27:49,360 --> 00:27:52,560
82

396
00:27:52,560 --> 00:27:58,560
68 से 82 [संगीत]

397
00:27:58,720 --> 00:28:00,880
78

398
00:28:00,880 --> 00:28:04,880
तक जो स्वभाव का कठोर हो, दूसरों को मर्म पहुंचाता हो,

399
00:28:04,880 --> 00:28:09,120
तीखी बातें बोलता हो और कठोर वचन रूपी कांटों से जुड़कर मनुष्यों

400
00:28:09,120 --> 00:28:13,200
को पीड़ा देता हो, उसे अत्यंत लक्ष्मीहीन अर्थात अभागा समझे

401
00:28:13,200 --> 00:28:17,280
वह कड़वी बोली के रूप में अपने मुंह में बंधी हुई एक पिशाचिनी को ढो

402
00:28:17,280 --> 00:28:21,760
रहा है। महाभारत [संगीत] आदि

403
00:28:21,760 --> 00:28:26,320
पर्व 87 नौ

404
00:28:26,320 --> 00:28:30,560
जब कोई किसी को उसकी माता बहन इत्यादि से जोड़ते हुए गाली देता है तब गाली

405
00:28:30,560 --> 00:28:34,560
के रूप में कहा गया कथन स्वतंत्र रूप से असत्य भाषण तो होता

406
00:28:34,560 --> 00:28:38,640
ही है। साथ ही साथ जिसको गाली दी जा रही है उसके सहित जिस

407
00:28:38,640 --> 00:28:42,880
महिला अथवा पुरुष से जोड़कर उसे गाली दी जा रही है। उक्त महिला

408
00:28:42,880 --> 00:28:46,880
सहित पुरुष पर भी उनका चरित्र दूषित होने का आरोप भी लग

409
00:28:46,880 --> 00:28:51,440
जाता है। अतः इस दृष्टि से गाली के रूप में तथा स्वतंत्र

410
00:28:51,440 --> 00:28:55,520
रूप से भी भागवतानंद द्वारा अनेक निर्दोष जनों पर निराधार

411
00:28:55,520 --> 00:29:00,240
रूप से अत्यंत गंभीर आक्षेप लगाए गए हैं। जबकि सनातन धर्म शास्त्रों द्वारा

412
00:29:00,240 --> 00:29:04,480
झूठी गवाही देना झूठा आक्षेप लगाना निषेध किया गया है। झूठ

413
00:29:04,480 --> 00:29:08,720
बोलने पर सभासद मारे जाते हैं। मनुस्मृति 8 14 झूठ

414
00:29:08,720 --> 00:29:13,680
बोलने पर दोषी होता है। झूठ बोलने वाला दोषी होता है। मनुस्मृति 836

415
00:29:13,680 --> 00:29:18,540
झूठी गवाही देने पर दंड का विधान किया गया है। मनुस्मृति 8257

416
00:29:18,540 --> 00:29:22,880
[संगीत] किसी व्यक्ति को उसकी माता अथवा बहन से जोड़ते

417
00:29:22,880 --> 00:29:27,280
हुए अथवा किसी महिला को सीधे तौर पर गाली देने पर असत्य

418
00:29:27,280 --> 00:29:31,600
भाषण एवं झूठी गवाही देने के रूप में शास्त्र के किन वचनों का उल्लंघन

419
00:29:31,600 --> 00:29:35,680
होता है। यह हम पूर्व में बता चुके हैं। मगर धातव्य

420
00:29:35,680 --> 00:29:40,080
यह है कि भागवतानंद ने गाली के साथ-साथ स्वतंत्र रूप से

421
00:29:40,080 --> 00:29:44,240
विजय श्री सहित कई महिलाओं पर दूषित होने का असिद्ध आरोप

422
00:29:44,240 --> 00:29:48,560
लगाया है। असिद्ध और मनुस्मृति में लिखा हुआ है आठवें

423
00:29:48,560 --> 00:29:52,560
अध्याय के 225वें श्लोक के अनुसार कि किसी

424
00:29:52,560 --> 00:29:57,360
महिला पर दूषित होने का आरोप लगाकर उसे प्रमाणित ना कर पाना।

425
00:29:57,360 --> 00:30:01,520
सिद्ध ना कर पाना विशेष रूप से दंडनीय

426
00:30:01,520 --> 00:30:05,600
है। कर सिद्ध। कर सिद्ध वैश्या कहा है

427
00:30:05,600 --> 00:30:10,480
ना तूने स्त्रियों को मठ में आने वाली नीच

428
00:30:10,480 --> 00:30:16,480
सिद्ध कर उन्हें वैश्या

429
00:30:16,640 --> 00:30:21,360
इस समूचे प्रत्युत्तर द्वारा अनेकानेक बार भागवतानंद का असत्यवादी

430
00:30:21,360 --> 00:30:25,360
होना सिद्ध हो गया शास्त्र के विरुद्ध जाना सिद्ध हो गया

431
00:30:25,360 --> 00:30:29,360
स्वयं उसने कह दिया कि गाली देना शास्त्रीय है इतना

432
00:30:29,360 --> 00:30:32,560
तो मानना पड़ेगा ना

433
00:30:32,560 --> 00:30:36,720
उदाहरण के लिए नीचे दिए गए लिंक में आगे वीडियो आपको दिखा

434
00:30:36,720 --> 00:30:40,800
दिया जाएगा। पीडीएफ में लिंक मिल जाएगा। भागवतानंद द्वारा पूरी मठ के

435
00:30:40,800 --> 00:30:45,360
परिककरों पर उपरोक्त बताए गए आक्षेपों को पुष्ट करने के समर्थन में

436
00:30:45,360 --> 00:30:49,680
कुछ वीडियो दिखाने की बात कही जा रही है कि वीडियो सुरक्षित

437
00:30:49,680 --> 00:30:53,920
है। आरोप लगा दिया। बहुत सारे वीडियो सुरक्षित

438
00:30:53,920 --> 00:30:58,320
है, साक्ष्य सुरक्षित है, गवाह सुरक्षित है। तो यह

439
00:30:58,320 --> 00:31:03,680
ठोस प्रमाण दी जाने की बात कही जा रही है।

440
00:31:03,680 --> 00:31:07,760
जो कि आज न्यायालय तक की शरण लेनी पड़ गई।

441
00:31:07,760 --> 00:31:12,160
आज तक इसने सार्वजनिक नहीं किया। इसने ये कुकृत

442
00:31:12,160 --> 00:31:16,160
तो किए मगर इसने वो ठोस प्रमाण आज तक नहीं किए

443
00:31:16,160 --> 00:31:20,400
जिनके आधार पर यह कहता है कि मैं जो है आरोप लगा रहा हूं।

444
00:31:20,400 --> 00:31:24,400
हम जिससे स्पष्ट है कि भागवतानंद द्वारा इस वीडियो

445
00:31:24,400 --> 00:31:29,440
में प्रमाण के नाम पर दिखाई गई जो वह सामग्री है

446
00:31:29,440 --> 00:31:31,680
अप्रासंगिक जिसका प्रसंग से कोई

447
00:31:31,680 --> 00:31:36,080
मतलब ही नहीं है जिससे कुछ भी सिद्ध नहीं होता उसके अतिरिक्त

448
00:31:36,080 --> 00:31:40,160
कोई ठोस प्रमाण नहीं है दिखाने के लिए ऐसे

449
00:31:40,160 --> 00:31:42,880
में

450
00:31:42,880 --> 00:31:48,320
उसको झूठ बोलने वाला असत्य भाषण क्यों ना माना जाए वरना दिखा

451
00:31:48,320 --> 00:31:50,720
समलैंगिकता

452
00:31:50,720 --> 00:31:56,320
वैश्या गमन ये सब के प्रमाण दिखा

453
00:31:56,320 --> 00:32:00,560
नहीं तो तेरा वो वचन झूठा होगा मेरे पास प्रमाण सुरक्षित

454
00:32:00,560 --> 00:32:03,440
है

455
00:32:03,440 --> 00:32:06,080
संकेत में अपनी बात कह दी है रही बात प्रमाण की

456
00:32:06,080 --> 00:32:10,160
तो जितना प्रमाण चिल्लाओगे तुम्हारी ही फजीहत होगी तुम्हारी ही बदनामी होगी फिर भी तुमने

457
00:32:10,160 --> 00:32:14,320
मांगा है तो एक सैंपल दे दे रहा हूं जैसे पहले एक सैंपल दिया था हमने ना

458
00:32:14,320 --> 00:32:18,320
कीचड़ होली वाला वैसे ये भी एक सैंपल दे रहा हूं इसके आगे भी बहुत सारे

459
00:32:18,320 --> 00:32:22,720
सैंपल अगर मांगोगे तो दिए जाते रहेंगे समय अनुसार। बाकी जितने लोगों को ऋषिकेश ब्रह्मचारी

460
00:32:22,720 --> 00:32:26,800
ने धमकी दी है, जितने लोगों के सामने इस प्रकार के समलैंगिक गतिविधियां

461
00:32:26,800 --> 00:32:31,920
की है, वह सारे लोग भी हमारे संपर्क में हैं और सारे लोगों के पास प्रमाण सुरक्षित हैं।

462
00:32:31,920 --> 00:32:34,400
हम

463
00:32:34,400 --> 00:32:38,400
ऐसे में स्वतंत्र रूप से असत्य भाषण का निषेध शास्त्र के किन

464
00:32:38,400 --> 00:32:44,400
वचनों द्वारा किया गया है? यह बताना आवश्यक तो नहीं है।

465
00:32:44,400 --> 00:32:48,400
फिर भी विपक्ष की संतुष्टि के लिए भागवत आनंद की संतुष्टि के लिए यहां

466
00:32:48,400 --> 00:32:52,400
हम एक मात्र राम का नाम लिख दे रहे हैं। राम हां मैं श्री नहीं लगाता

467
00:32:52,400 --> 00:32:56,480
राम के आगे मैं नहीं लगाता। मुझे राम से बल प्राप्त होता

468
00:32:56,480 --> 00:33:00,240
है।

469
00:33:00,240 --> 00:33:04,240
राम में ही सब कुछ है। प्रसंगु श्री

470
00:33:04,240 --> 00:33:10,240
लगा दूं, प्रभु लगा दूं। मगर मेरे लिए राम पर्याप्त है।

471
00:33:11,360 --> 00:33:15,440
नहीं लगाता मैं श्री राम राम राम जपता हूं मैं

472
00:33:15,440 --> 00:33:19,600
राम राम कहता हूं मैं राम के पीछे चलने का प्रयास करता

473
00:33:19,600 --> 00:33:23,680
हूं तो जैसे लुप्ताचार गुप्ताचार के पीछे

474
00:33:23,680 --> 00:33:26,720
चलेंगे क्या

475
00:33:26,720 --> 00:33:31,040
हमें राम प्राप्त है हमें गुरु प्राप्त है गोविंद प्राप्त

476
00:33:31,040 --> 00:33:36,480
है ग्रंथ प्राप्त है तू है कौन

477
00:33:36,480 --> 00:33:39,440
सिंगल चेचिस

478
00:33:39,440 --> 00:33:43,600
जहां एक और वाल्मीकि रामायण 337 13 के अनुसार

479
00:33:43,600 --> 00:33:47,600
श्री राम धर्म का साक्षात स्वरूप है। वहीं दूसरी ओर

480
00:33:47,600 --> 00:33:51,040
साक्षात धर्म का स्वरूप भगवान श्री राम कहते हैं।

481
00:33:51,040 --> 00:33:55,120
मैंने पहले कभी भी झूठी बात नहीं कही है।

482
00:33:55,120 --> 00:33:57,200
और भविष्य में भी कभी असत्य नहीं

483
00:33:57,200 --> 00:34:01,360
कहूंगा। यह है राम। यह है धर्म। तेरी तरह

484
00:34:01,360 --> 00:34:05,360
नहीं। प्रमाण सुरक्षित है। जब कहा जाए दिखाओ तो

485
00:34:05,360 --> 00:34:11,040
इधर उधर की बातें करने लगेगा।

486
00:34:11,040 --> 00:34:16,240
वाल्मीकि रामायण 4 82

487
00:34:16,240 --> 00:34:20,480
मैंने कभी भी भागवतानंद पर अब ये वो वाली बात है जो इसने आरोप लगाया

488
00:34:20,480 --> 00:34:24,880
है ना अब ये वो वाली बात है जिसमें इसने आरोप लगाया है कि

489
00:34:24,880 --> 00:34:28,880
इसने जो है मुझ पर यौन रोगी होने का कथन कहा

490
00:34:28,880 --> 00:34:33,200
है तो यद्यपि मैंने भागवतानंद पर इस तरह का कोई आरोप नहीं लगाया

491
00:34:33,200 --> 00:34:37,360
हां प्रश्न पूछा क्योंकि बात यह भी प्रश्न पूछ रहा है ना

492
00:34:37,360 --> 00:34:41,360
सार्वजनिक रूप से असिद्ध बातों को यह तो आक्षेप के रूप में प्रस्तुत कर

493
00:34:41,360 --> 00:34:45,760
रहा है तो हम प्रश्न भी नहीं पूछ सकते वह भी तब

494
00:34:45,760 --> 00:34:48,720
हम

495
00:34:48,720 --> 00:34:52,880
इस संबंध में अनुसंधान पूर्वक स्पष्टीकरण मात्र मांगा

496
00:34:52,880 --> 00:34:57,200
था मैंने तो और जिसके प्रतिकार स्वरूप

497
00:34:57,200 --> 00:35:01,200
भागवतानंद द्वारा 100 करोड़ की मानहानि का दावा नोटिस

498
00:35:01,200 --> 00:35:05,200
मुझे भेजा गया जबकि आगे आप

499
00:35:05,200 --> 00:35:09,200
वीडियो देख लीजिए यह व्यक्ति व्यक्ति स्वयं कह रहा है कि मेरा यदि

500
00:35:09,200 --> 00:35:13,200
कहीं कोई आचरण पर आपको संशय हो शास्त्र विरुद्ध दिखे लगे

501
00:35:13,200 --> 00:35:18,720
प्रतीत हो तो आप मुझसे सार्वजनिक रूप से पूछिए वही तो किया

502
00:35:18,720 --> 00:35:22,720
वही किया था ना और जो मेरे कृत

503
00:35:22,720 --> 00:35:26,880
या वक्तव्य के विषय में सोच रहा है कि मैं गलत हूं मैं अशास्त्रीय पक्ष में हूं तो सार्वजनिक

504
00:35:26,880 --> 00:35:31,200
रूप से सभा में वो हमसे प्रश्न कर सकता है स्पष्टीकरण

505
00:35:31,200 --> 00:35:35,600
मांग सकता है हम तो

506
00:35:35,600 --> 00:35:39,680
अब यदि यदि मैंने तेरे ही कथन के अनुसार तुझसे सार्वजनिक रूप से

507
00:35:39,680 --> 00:35:43,840
पूछ लिया कि तू जोधपुर गया था कि नहीं अपने गुप्त

508
00:35:43,840 --> 00:35:47,840
रोग का इलाज करवाने के लिए चिकित्सा प्राप्त करने के लिए या

509
00:35:47,840 --> 00:35:51,920
गुप्त या जोधपुर के चिकित्सक से

510
00:35:51,920 --> 00:35:56,080
संपर्क किया था कि नहीं तो आज तूने मुझे महारानी का नोटिस भेज दिया

511
00:35:56,080 --> 00:36:00,560
इसका मतलब क्या हुआ कि तू अपने वचन से मुकर गया

512
00:36:00,560 --> 00:36:04,320
सार्वजनिक रूप से तुझसे प्रश्न ना किए जाए

513
00:36:04,320 --> 00:36:08,320
जहां पर तू गलत दिख रहा हो यदि वह गंभीर विषय हो तो तुझसे प्रश्न

514
00:36:08,320 --> 00:36:14,160
ना किए जाए तो तूने क्यों कर दिए प्रश्न?

515
00:36:14,160 --> 00:36:18,480
तूने क्यों आक्षेप लगा दिए सार्वजनिक रूप से? जबकि वो असिद्ध थे।

516
00:36:18,480 --> 00:36:24,480
हम प्रश्न नहीं कर सकते और तू आरोप लगाएगा निर्णायक होगा।

517
00:36:29,200 --> 00:36:33,760
जहां एक और न्यायालय एवं न्यायाधीशों का मुख भी ना देखने की शिक्षा भागवतानंद

518
00:36:33,760 --> 00:36:38,960
द्वारा प्रचारित की जाती है। हम न्यायाधीशों

519
00:36:38,960 --> 00:36:43,040
में न्यायाधीश के लिए क्या-क्या कहा है? क्या कहा है?

520
00:36:43,040 --> 00:36:48,320
जुारी, शराबी, कबाबी, व्यभिचारी

521
00:36:48,320 --> 00:36:52,320
हैं। क्राइम कैसे किया जाए? यह योजना बनाने वाले

522
00:36:52,320 --> 00:36:56,480
कोठे के दलाल बैठे होते हैं। कभी मुंह नहीं देखना

523
00:36:56,480 --> 00:37:01,200
है। कभी मुंह नहीं देखना चाहिए ऐसे लोगों का, ऐसी अदालतों का, ऐसे न्यायालयों

524
00:37:01,200 --> 00:37:03,760
का।

525
00:37:03,760 --> 00:37:07,760
फिर महारानी का दावा भेजकर अपने इस अपनी

526
00:37:07,760 --> 00:37:11,920
शिक्षा की वो कर दी ना। विरोध कर दिया ना।

527
00:37:11,920 --> 00:37:15,920
अगर तू यह कहे कि भैया हमने तुझे मजबूर किया। हमने तुझे विवश

528
00:37:15,920 --> 00:37:19,440
किया। यानी कि सामने वाले की प्रतिक्रिया

529
00:37:19,440 --> 00:37:23,520
के अनुसार तुम अपने सिद्धांतों को अपने वचनों को तोड़ दोगे

530
00:37:23,520 --> 00:37:28,480
ना

531
00:37:28,480 --> 00:37:32,480
नहीं देना चाहिए ना ऐसा सिद्धांत जिसको तोड़ने की

532
00:37:32,480 --> 00:37:37,040
आवश्यकता पड़ जाए रामो नाभि भाषते

533
00:37:37,040 --> 00:37:41,280
राम दो प्रकार की बातें नहीं करते जो भी बोलते हैं सोच

534
00:37:41,280 --> 00:37:45,520
समझ के बोलते हैं कि आज मैं लोकतंत्र लोकतांत्रिक व्यवस्था

535
00:37:45,520 --> 00:37:49,520
में हूं ऐसा तो नहीं कल को मुझे न्यायालय का

536
00:37:49,520 --> 00:37:52,960
आलंबन लेना पड़ जाएगा।

537
00:37:52,960 --> 00:37:56,960
तो इसलिए मुझे यह बात नहीं कहनी चाहिए कि न्यायालयों का

538
00:37:56,960 --> 00:38:02,880
न्यायाधीशों का मुंह भी नहीं देखना चाहिए। अब देख मुंह

539
00:38:02,880 --> 00:38:07,040
तो यहां पे तेरे जो है ये दोगले

540
00:38:07,040 --> 00:38:11,200
वचन की पुष्टि हो गई। हो गई ना? तो

541
00:38:11,200 --> 00:38:15,360
भागवतानंद के दोगले वचन की पुष्टि यहां से भी हो गई। कोई अदालत रक्षा नहीं करेगी

542
00:38:15,360 --> 00:38:21,360
उस समय। तो जो अदालत हमारी रक्षा नहीं कर सकती। हम बार-बार न्याय के लिए उस अदालत का मुख क्यों देख

543
00:38:22,720 --> 00:38:26,800
आया और सीधे पूरी पीठाधीश्वर से मिला और किसी संप्रदाय से नहीं मिला उस

544
00:38:26,800 --> 00:38:30,880
समय और किसी पीठ से भी नहीं मिला। उधर से आने में तीन-तीन पीठ रास्ते में पड़ते

545
00:38:30,880 --> 00:38:35,360
हैं अलग-अलग दिशाओं में लेकिन सीधे मिला पूरी वाले से। अच्छा कोई व्यक्ति कहे मैं गोवर्धन

546
00:38:35,360 --> 00:38:39,440
गोवर्धन पूरी जगन्नाथ पुरी का पंडा हूं। कोई व्यक्ति कहे मैं गोवर्धन मठ का शंकराचार्य

547
00:38:39,440 --> 00:38:43,920
हूं। कोई कहे कि मैं गोवर्ध मैं पूरी पीठ का पीठाधीश्वर हूं।

548
00:38:43,920 --> 00:38:48,080
तीनों एक विषय नहीं है। पूरी में केवल पूरी पीठ का अर्थ यह नहीं होता

549
00:38:48,080 --> 00:38:52,080
कि पूरी पीठ केवल शंकराचार्य जी की पीठ को कहा जाता है।

550
00:38:52,080 --> 00:38:56,080
वहां पर रामानुज संप्रदाय की भी पीठ है। पूरी में है

551
00:38:56,080 --> 00:39:00,160
तो पूरी पीठ के रामानुजाचार्य भी हो सकते हैं। जो पूरी में रामानुजाचार्य जी की पीठ

552
00:39:00,160 --> 00:39:04,720
होगी उसको रामानुज पीठ रामानुज गंध कहेंगे। जी स्वामी इत्यादि का मठ है वहां पर।

553
00:39:04,720 --> 00:39:08,880
तो पूरी पीठ का आचार्य होना। पूरी में गोवर्धन मठ का शंकराचार्य

554
00:39:08,880 --> 00:39:13,280
होना। पूरी का देवालय का अर्चक होना एक ही बात थोड़ी है।

555
00:39:13,280 --> 00:39:17,360
की मुझे यह भी सूचना मिली कि ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी

556
00:39:17,360 --> 00:39:18,320
स्वरूपानंद सरस्वती

557
00:39:18,320 --> 00:39:22,560
भी इसके कार्यक्रमों में आते जाते रहे। अब स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती

558
00:39:22,560 --> 00:39:26,800
के मत में अगर हम देखें तो अपने निकट संबंधियों के

559
00:39:26,800 --> 00:39:31,280
मृत्यु के बाद भी देवकीन नंदन ठाकुर जो सामान्य

560
00:39:31,280 --> 00:39:35,600
मुंडन इत्यादि भी नहीं कराता, वो धर्म रत्न था। और शंकराचार्य

561
00:39:35,600 --> 00:39:39,920
बनने के बाद भी कोई बदलाव नहीं है। अपितु कुमार स्वामी जैसे पाखंडी के धर्मद्रोही

562
00:39:39,920 --> 00:39:44,320
के जो स्वयं को ब्रह्मर्षि कहने के बाद भी संतुष्ट न हो सका तो महा ब्रह्मर्षि

563
00:39:44,320 --> 00:39:48,320
कह रहा। अब ये शंकराचार्य बन गए हैं या बना दिए गए हैं या उस रूप

564
00:39:48,320 --> 00:39:52,400
में प्रचारित हो रहे हैं। अगर यह इस प्रकार का कृत करेंगे तो शंकराचार्य जी

565
00:39:52,400 --> 00:39:56,800
की परंपरा जो लुप्त हो जाएगी। जिसकी भविष्यवाणी शक्ति संगम तंत्र में है

566
00:39:56,800 --> 00:40:00,800
कि मुख्य परंपरा जो शंकराचार्य जी की वो छिन्न हो जाएगी। भिन्न हो जाएगी, विखंडित

567
00:40:00,800 --> 00:40:04,880
हो जाएगी। वो क्यों हो जाएगी? ऐसे ही लोगों के ऐसे कुकृत्यों के कारण हो

568
00:40:04,880 --> 00:40:08,880
जाएगी। जहां पर स्वयं को शंकराचार्य के रूप में स्थापित करने

569
00:40:08,880 --> 00:40:13,200
वाले व्यक्तित्वों के द्वारा भी कुमार स्वामी जैसे दंडनीय और

570
00:40:13,200 --> 00:40:17,200
बहिष्कृत किए जाने योग्य व्यक्ति के प्रति इस प्रकार का व्यवहार किया

571
00:40:17,200 --> 00:40:21,280
जाएगा। उसके कार्यक्रमों में वो सम्मिलित होंगे। उसके साथ उठेंगे, बैठेंगे और

572
00:40:21,280 --> 00:40:25,280
उसको उस रूप में मान्यता प्रदान करेंगे। अभी क्या है केवल अपने मठ

573
00:40:25,280 --> 00:40:29,680
में डोनेशन आ जाए। हमारे शिष्य समूह बड़े लंबे चौड़े हो जाए। हम सनातन

574
00:40:29,680 --> 00:40:33,440
धर्म के सर्वोच्च के रूप में बैठ जाएं। यहां तक कि सगे गुरु भाई हैं

575
00:40:33,440 --> 00:40:37,680
दोनों लेकिन द्वारिका वाले परम आराध्य नहीं बन पाए और परम धर्माधीश

576
00:40:37,680 --> 00:40:41,680
नहीं बन पाए लेकिन ज्योतिष पीठ वाले परम आराध्य भी बन गए परम धर्माधीश

577
00:40:41,680 --> 00:40:45,760
भी बन गए और बयान क्या जारी करते चल रहे हैं कि शूद्र वर्ण के पास पैसा नहीं

578
00:40:45,760 --> 00:40:50,160
था समय नहीं था इसलिए बेचारे वेद ना पढ़ सके

579
00:40:50,160 --> 00:40:54,480
टीपू सुल्तान के समय परशुराम भाव इत्यादि के

580
00:40:54,480 --> 00:40:59,120
द्वारा जो मराठा सेना चल रही थी वहां पर पिंडारी मुसलमानों

581
00:40:59,120 --> 00:41:03,440
के द्वारा मराठा सेना के बैनर तले पिंडारी मुसलमानों के द्वारा श्रृंगेरी

582
00:41:03,440 --> 00:41:07,920
पर जो आक्रमण करके लूट मार मचाई गई थी उससे त्रस्त

583
00:41:07,920 --> 00:41:12,080
होकर तात्कालिक शंकराचार्य ने जो टीपू सुल्तान से सहायता मांगी थी और पाई

584
00:41:12,080 --> 00:41:16,080
भी थी वो बहुत दुर्भाग्यपूर्ण घटना है श्रृंगेरी के इतिहास में पूरे

585
00:41:16,080 --> 00:41:20,160
सनातन धर्म के इतिहास में लेकिन वह जो द्रव्य दोष लगा है

586
00:41:20,160 --> 00:41:24,640
श्रृंगेरी को उसके कारण श्रृंगेरी की बुद्धि में ऐसी राजनैतिक

587
00:41:24,640 --> 00:41:29,200
विकृतियां घुसती जाती हैं जो कई बार उनसे साईं के चमचों

588
00:41:29,200 --> 00:41:33,280
की भी विरुदावली बखान करवा देती है जो लोग साईं को श्रद्धा रहने देनी

589
00:41:33,280 --> 00:41:37,920
है कि नहीं रहने देनी है आप लोगों को आप कहते हैं कि

590
00:41:37,920 --> 00:41:41,920
सरस्वती जो है शंकराचार्य नहीं है श्रृंगरी ने अभिषेक किया

591
00:41:41,920 --> 00:41:46,160
तो श्रृंगरी अराजक हो गई मतलब आपके लिए बाकी तीन पीठ कुछ नहीं है वहां के लोग शिव

592
00:41:46,160 --> 00:41:48,480
स्वरूप नहीं है वहां के लोग शंकराचार्य नहीं है वहां के

593
00:41:48,480 --> 00:41:52,560
लोग कुछ नहीं बस जो है आप ही है तो एक जोत्वाकांक्षा

594
00:41:52,560 --> 00:41:56,800
होती है ना कि पूरे हिंदू धर्म में एकमात्र सर्वोच्च हम बने रहे हमारे अलावा कोई भी नहीं

595
00:41:56,800 --> 00:42:01,040
पहले तो बाकी आचार्यों को नकार दिया इन लोगों ने रामानुजाचार्य मधवाचार्य

596
00:42:01,040 --> 00:42:05,040
सब गरुड़ पुराण दो चार 11

597
00:42:05,040 --> 00:42:09,680
और दो एक 15 के अनुसार मन में स्वयं को प्रतिष्ठित

598
00:42:09,680 --> 00:42:14,080
समझने वालों का भी शास्त्र द्वारा विरोध किया गया है।

599
00:42:14,080 --> 00:42:18,160
जहां एक ओर भागवतानंद की दृष्टि से दिखाई देने वाले अपमान के प्रतिकार

600
00:42:18,160 --> 00:42:22,320
स्वरूप भागवतानंद ने हमारे विरुद्ध आपत्ति प्रकट की है। वहीं

601
00:42:22,320 --> 00:42:26,320
दूसरी ओर शास्त्रों के अनुसार ब्राह्मण मात्र को सम्मान

602
00:42:26,320 --> 00:42:31,200
की नहीं अपितु अपमान की चिंता होनी चाहिए। मनुस्मृति के अनुसार

603
00:42:31,200 --> 00:42:35,200
क्योंकि ब्राह्मण को चाहिए मनुस्मृति के अनुसार

604
00:42:35,200 --> 00:42:39,360
कि वह सम्मान के विष सम्मान को विष के समान समझे

605
00:42:39,360 --> 00:42:43,360
डरता रहे और अमृत के समान अपमान की सदा चिंता करता

606
00:42:43,360 --> 00:42:47,360
रहे। अर्थात तिरस्कार होने पर खेद ना करे। मान अपमान

607
00:42:47,360 --> 00:42:51,600
दोनों को सह ले। ऐसे में कम से कम स्वयं को प्रामाणिक आचार्य

608
00:42:51,600 --> 00:42:55,840
घोषित करने वाले व्यक्ति द्वारा तो इस सिद्धांत का उल्लंघन

609
00:42:55,840 --> 00:43:00,320
नहीं होना चाहिए। हम मनुस्मृति

610
00:43:00,320 --> 00:43:04,640
विरोधी हो गए, गरुड़ पुराण विरोधी हो गए।

611
00:43:04,640 --> 00:43:08,960
एक आचार्य का जीवन अत्यंत पारदर्शी होना चाहिए जिससे कि उसे देखकर

612
00:43:08,960 --> 00:43:13,040
उसके द्वारा किए जाने वाले धर्माचरण की स्थापना उसके शिष्यों में हो

613
00:43:13,040 --> 00:43:17,840
सके। गालीबाज शिष्य तैयार होंगे ना तुम्हारे तो गालीबाज।

614
00:43:17,840 --> 00:43:23,680
मेरे पास शस्त्र नहीं है इसलिए मैं गालियां दूंगा।

615
00:43:23,680 --> 00:43:28,480
इसी नाम पर बने हैं नए-नए मत संप्रदाय दुनिया में

616
00:43:28,480 --> 00:43:33,760
यह पंथ मत इसी नाम पर बने हैं।

617
00:43:33,760 --> 00:43:38,000
बस जहां मन आया कोई भी निर्णय ले लो। शास्त्र

618
00:43:38,000 --> 00:43:42,000
में उसका अभाव है। इसलिए आज मैंने इसलिए सिगरेट पी ली। आज

619
00:43:42,000 --> 00:43:46,320
मैंने इसलिए दूसरे विवाह कर लिया। आज मैंने इसलिए चार विवाह अलऊ

620
00:43:46,320 --> 00:43:50,320
कर दिए। आज मैंने इसलिए अनगिनत स्त्रियां जो

621
00:43:50,320 --> 00:43:54,320
हर वह स्त्री जो स्वयं को मुझे सौंपना चाहे हर वो

622
00:43:54,320 --> 00:44:00,320
स्त्री जो है मेरे लिए वो है हलाल

623
00:44:00,960 --> 00:44:06,000
स्मृति 1237 के अनुसार जिन कार्यों को करते समय

624
00:44:06,000 --> 00:44:10,000
छिपाने का भाव उत्पन्न हो वह कार्य तामसिक होते हुए त्याज्य कहे

625
00:44:10,000 --> 00:44:14,160
गए हैं। एवं जिन कार्यों को करते समय बताने का भाव उत्पन्न हो वह

626
00:44:14,160 --> 00:44:18,320
कार्य सात्विक अर्थात ग्राह करने योग्य कहे

627
00:44:18,320 --> 00:44:19,760
गए हैं। इसी कारण

628
00:44:19,760 --> 00:44:24,720
से मनुस्मृति अध्याय दो 79

629
00:44:24,720 --> 00:44:27,680
से दो

630
00:44:27,680 --> 00:44:32,800
180 तथा अध्याय चार

631
00:44:32,800 --> 00:44:36,960
तीन से चार और 45 से 46 के द्वारा इस तत्व की पुष्टि

632
00:44:36,960 --> 00:44:41,200
और अधिक हो जाती है क्योंकि यहां बताया गया है कि ब्राह्मण को नग्न

633
00:44:41,200 --> 00:44:45,360
होकर नहाना नहीं चाहिए। किसी की निंदा नहीं करनी चाहिए और ना

634
00:44:45,360 --> 00:44:50,000
ही प्राण रक्षा से अधिक धन संचय करना चाहिए।

635
00:44:50,000 --> 00:44:54,320
तो क्या भागवतानंद के संबंध में प्रस्तुत किए गए साक्ष्यों द्वारा प्राप्त

636
00:44:54,320 --> 00:44:58,480
तथ्यों के अनुसार स्वयं को प्रमाणिक आचार्य कहने वाले

637
00:44:58,480 --> 00:45:03,200
भागवतानंद का इन छिपाने वाले कार्यों से दूर रहने के निर्देश का पालन

638
00:45:03,200 --> 00:45:08,320
दिखता है। जो ये छिपाने वाले कार्य समझ रहे हैं ना

639
00:45:08,320 --> 00:45:13,200
गाली देना मंच पर बैठकर गाली दे

640
00:45:13,200 --> 00:45:17,360
वही कार्य कर YouTube पर जो तू मंच

641
00:45:17,360 --> 00:45:20,800
पर बोल पाए

642
00:45:20,800 --> 00:45:26,080
अन्यथा क्या सिद्ध होगा? छिपाने वाले कार्य।

643
00:45:26,080 --> 00:45:30,640
तामसिक कार्य सात्विक नहीं। ठीक है?

644
00:45:30,640 --> 00:45:36,640
इसी कारण से फिर क्या है?

645
00:45:36,960 --> 00:45:41,440
तो जहां एक और मत्स्य पुराण 145

646
00:45:41,440 --> 00:45:45,600
30 145 वे अध्याय के 30 वे श्लोक द्वारा अत्यंत विनम्र

647
00:45:45,600 --> 00:45:49,600
एवं मृदुल स्वभाव वाले को आचार्य कहा गया है। वहीं दूसरी ओर

648
00:45:49,600 --> 00:45:53,920
भागवतानंद द्वारा अश्लील टिप्पणियां की जाती हैं। अत्यंत निंदनीय कठोर

649
00:45:53,920 --> 00:45:57,920
वचन कहे जाते हैं। झूठे निराधार आरोप लगाए जाते हैं। अपने

650
00:45:57,920 --> 00:46:02,000
ही वचनों का विरोध किया जाता है। असत्य भाषण किया जाता है। क्या

651
00:46:02,000 --> 00:46:06,080
इनमें से अधिकांशतः छिपाने वाले कर्म नहीं है? क्या वह

652
00:46:06,080 --> 00:46:10,160
अपनी भागवत कथा के मंच पर न्यायालय में माता और बहनों से जुड़ी अश्लील

653
00:46:10,160 --> 00:46:14,240
गालियां बकेगा? न्यायालय में बकेगा?

654
00:46:14,240 --> 00:46:17,600
अपने मंच पर बकेगा?

655
00:46:17,600 --> 00:46:19,920
गालियां?

656
00:46:19,920 --> 00:46:24,000
है ना छिपाने वाले भाव? तो यदि नहीं

657
00:46:24,000 --> 00:46:28,400
तो उसे छिपाने वाले तामसिक कार्य करने वाला मानते हुए उसके

658
00:46:28,400 --> 00:46:32,560
द्वारा मनुस्मृति के मर्यादा का उल्लंघन क्यों ना माना जाए

659
00:46:32,560 --> 00:46:36,000
क्योंकि भागवतानंद ने कहा है यही

660
00:46:36,000 --> 00:46:40,080
नहीं भागवतानंद द्वारा उसके गुरु के संबंध में पूछे गए प्रश्न के उत्तर में स्पष्ट

661
00:46:40,080 --> 00:46:44,400
ना बताते हुए बताने की घोषणा की जाती है।

662
00:46:44,400 --> 00:46:50,160
यह कैसी सात्विक परंपरा है जिसे छिपाना पड़ रहा है।

663
00:46:50,160 --> 00:46:52,320
तामसिक

664
00:46:52,320 --> 00:46:56,400
ऐसे तामस आचरण करने वाले को सात्विक परंपरा का आचार्य किस

665
00:46:56,400 --> 00:47:00,800
प्रकार माना जाए? क्योंकि भागवतानंद ने कहा है शास्त्रों

666
00:47:00,800 --> 00:47:04,800
एवं भागवतानंद के अनुसार भी आचार्य सदाचारी होना चाहिए।

667
00:47:04,800 --> 00:47:08,880
जिसे देखकर उसके शिष्य भी स्वयं में सदाचरण को स्थापित करते

668
00:47:08,880 --> 00:47:13,280
हो। हो सकता है भागवतानंद द्वारा इस व्याख्या में उठने वाले प्रश्नों को नकारने

669
00:47:13,280 --> 00:47:17,360
का प्रयास किया जाए। परंतु गाली बकने की बात तो उसने

670
00:47:17,360 --> 00:47:20,800
स्वयं स्वीकार की है।

671
00:47:20,800 --> 00:47:25,760
उसे किस प्रकार नकारा जाएगा? बोल।

672
00:47:25,760 --> 00:47:30,320
क्या सदाचार और धर्माचरण के नाम पर उसके शिष्यों की टोली में

673
00:47:30,320 --> 00:47:34,560
माताओं और बहनों से जुड़ी हुई गालियों की स्थापना की जाएगी। उनके आचरण

674
00:47:34,560 --> 00:47:39,280
में [संगीत]

675
00:47:39,280 --> 00:47:43,520
लतखोर। जिस आचरण को भागवतानंद ने स्वयं

676
00:47:43,520 --> 00:47:47,520
शास्त्र विरुद्ध माना है। उस आचरण को शास्त्र सम्मत सदाचार

677
00:47:47,520 --> 00:47:51,520
किस प्रकार माना जाए? क्योंकि भागवतानंद ने

678
00:47:51,520 --> 00:47:55,680
कहा है निग्रह संप्रदाय के तीन मुख्य मार्ग बताए

679
00:47:55,680 --> 00:48:00,000
गए हैं। शास्त्रार्थ द्वारा अधर्म का निग्रह करना, शस्त्र द्वारा

680
00:48:00,000 --> 00:48:04,320
युद्ध में धर्म का निग्रह करना एवं योग द्वारा संयम पूर्वक आत्म

681
00:48:04,320 --> 00:48:08,480
निग्रह करना। यहां प्रश्न उठता है कि भागवतानंद द्वारा शास्त्रार्थ

682
00:48:08,480 --> 00:48:12,480
के माध्यम से जिस जिसजिस के निग्रह का प्रयास किया गया

683
00:48:12,480 --> 00:48:16,720
है। क्या उन सबका निग्रह हो चुका है? यदि

684
00:48:16,720 --> 00:48:20,720
नहीं तो शस्त्र के द्वारा उनका निग्रह कब से

685
00:48:20,720 --> 00:48:24,720
प्रारंभ करने वाले हो? हैं

686
00:48:24,720 --> 00:48:30,560
घचाचार्य

687
00:48:30,560 --> 00:48:34,880
क्या भगवती ने निग्रह संप्रदाय का दायित्व सौंपते हुए इस संघर्ष

688
00:48:34,880 --> 00:48:39,120
हेतु आवश्यक असाधारण शक्तियों से युक्त कोई दिव्यास्त्र

689
00:48:39,120 --> 00:48:42,320
नहीं दिया था क्या?

690
00:48:42,320 --> 00:48:48,320
मां भगवती होती तो देवी देती परी थी ना।

691
00:48:53,680 --> 00:48:57,760
जिसके अभाव में भागवतानंद को गालियों का आलंबन लेना पड़ रहा है। मां भगवती ने

692
00:48:57,760 --> 00:49:03,280
कहा था गाली देना मैं शस्त्र नहीं दे रही हूं।

693
00:49:03,280 --> 00:49:07,280
क्या शास्त्र के अभाव में गालियों का विकल्प उसे निग्रह संप्रदाय द्वारा प्राप्त

694
00:49:07,280 --> 00:49:11,600
हुआ है? यदि नहीं तो सनातन धर्म शास्त्रों की बात तो दूर की है। भागवतानंद

695
00:49:11,600 --> 00:49:16,720
को स्वयं उसके द्वारा ही विचित निग्रह संप्रदाय को मानने वाला किस प्रकार माना जाए?

696
00:49:16,720 --> 00:49:20,960
क्योंकि भागवतानंद ने कहा है कुल मिलाकर आचरण

697
00:49:20,960 --> 00:49:24,960
की दृष्टि से समीक्षा करने पर भागवतानंद के आचरण में बहुत सारी

698
00:49:24,960 --> 00:49:29,200
अशास्त्रीयता प्राप्त होती है। जो उसे सनातन धर्म के प्रामाणिक

699
00:49:29,200 --> 00:49:33,200
आचार्य के रूप में स्वीकार करने में बाधक है।

700
00:49:33,200 --> 00:49:37,520
क्या-क्या है? अवैदिक अप्रामाणिक इस्लामिक सामग्री से युक्त पूजा

701
00:49:37,520 --> 00:49:41,600
पाठ करना करवाना असत्य भाषण झूठी गवाही

702
00:49:41,600 --> 00:49:46,320
झूठे आक्षेप या फिर असिद्ध गवाही असिद्ध आक्षेप

703
00:49:46,320 --> 00:49:50,400
वचन भंग दोगली बातें गाली

704
00:49:50,400 --> 00:49:54,560
अभद्र भाषा का उपयोग गुरु निंदा गाली के रूप में

705
00:49:54,560 --> 00:49:58,720
अथवा स्वतंत्र रूप से प्रमाणित ना कर पाने की स्थिति में भी किसी

706
00:49:58,720 --> 00:50:03,440
महिला पर दूषित होने का आरोप विशेष रूप से दंडनीय है।

707
00:50:03,440 --> 00:50:07,760
छिपाने वाले कर्म करना, सम्मान की चिंता करना, दुराचरण

708
00:50:07,760 --> 00:50:12,320
करना, षड्यंत्र करना यह सब जो है

709
00:50:12,320 --> 00:50:16,400
आपके बाधक हैं। आपके अनुसार जो

710
00:50:16,400 --> 00:50:18,320
आचार्य के रूप में स्वीकार करने वाली

711
00:50:18,320 --> 00:50:22,400
परिभाषा को बताया गया उसी के उसी में और हां आगे और है।

712
00:50:22,400 --> 00:50:26,480
ऐसे अशास्त्रीय आचरणों से युक्त व्यक्ति को सदाचारी मानकर

713
00:50:26,480 --> 00:50:30,640
किस प्रकार सनातन धर्म के प्रामाणिक धर्माचार्य के रूप में स्वीकार किया

714
00:50:30,640 --> 00:50:36,640
जाए क्योंकि भागवतानंद ने कहा है

715
00:50:37,040 --> 00:50:41,120
इतने पर भी यदि किसी को भागवतानंद में दोष दिखाई नहीं दे रहा है तो

716
00:50:41,120 --> 00:50:46,000
ऐसे अंधों के लिए अंधों के लिए हमारे गुरु जी तदा जो है

717
00:50:46,000 --> 00:50:50,080
शास्त्र से बात करते श्लोक पढ़ देते हैं हमारे गुरु जी

718
00:50:50,080 --> 00:50:54,480
हम निग्र चाय की सम्मान करते हैं भाई ज्ञान है उसको

719
00:50:54,480 --> 00:51:00,080
चाहे वो जो ज्ञान प्रस्तुत कर रहा हो प्रासंगिक हो अथवा प्रासंगिक

720
00:51:00,080 --> 00:51:05,520
सामना तो कर भाई सामना तो कर

721
00:51:05,520 --> 00:51:09,600
चितड़े उड़ जाएंगे। चितड़े कपोल कल्पित जो संसार बनाया

722
00:51:09,600 --> 00:51:15,600
है ना ढोंग रच रच के

723
00:51:17,280 --> 00:51:19,120
तो ऐसे अंधों के लिए

724
00:51:19,120 --> 00:51:23,120
यहां दो उदाहरण हम आगे दे रहे हैं जिसमें स्वयं भागवतानंद ने स्वयं के दोष

725
00:51:23,120 --> 00:51:24,160
को ही स्वीकार किया

726
00:51:24,160 --> 00:51:28,160
है। तो दोष क्या है? गोवर्धन मठ के पूरी

727
00:51:28,160 --> 00:51:32,320
परिकरों में से एक ऋषिकेश ब्रह्मचारी जी के नाम से बनाई गई

728
00:51:32,320 --> 00:51:36,320
एक फर्जी YouTube आईडी द्वारा की गई एक टिप्पणी को

729
00:51:36,320 --> 00:51:40,640
बिना किसी सत्यापन के भागवतानंद ने सोशल मीडिया पर ऋषिकेश ब्रह्मचारी

730
00:51:40,640 --> 00:51:44,800
जी के विरोध में प्रस्तुत किया था। जिसके उपरांत वास्तविकता

731
00:51:44,800 --> 00:51:48,880
ज्ञात हो जाने पर ऋषिकेश ब्रह्मचारी जी के नाम से बनाई गई फर्जी

732
00:51:48,880 --> 00:51:54,880
आईडी द्वारा किसी की गई आपत्तिजनक टिप्पणी के संबंध में

733
00:51:55,200 --> 00:51:59,520
बिना किसी निरीक्षण परीक्षण के दिए गए अपने सार्वजनिक वक्तव्य

734
00:51:59,520 --> 00:52:03,680
को भागवतानंद ने हटा लिया था। क्यों हटाया था? अगर वह

735
00:52:03,680 --> 00:52:07,680
सत्य था तो रहने देते और हटाया था तो इसका मतलब

736
00:52:07,680 --> 00:52:12,080
वो असत्य था जो कहा था। और ये अस्थाई क्या होता है भाई?

737
00:52:12,080 --> 00:52:16,240
विश्वास नहीं है क्या अपने वक्तव्यों पे? सार्वभौम सिद्धांत

738
00:52:16,240 --> 00:52:22,240
नहीं है क्या? क्या होता है? अस्थाई अस्थाई अस्थाई।

739
00:52:22,720 --> 00:52:27,840
सनातन धर्म के आचार्य बने फिरते हो। तो सनातन नित्य स्थाई

740
00:52:27,840 --> 00:52:33,200
और अस्थाई का रोना रोते हो अपनी हर पोस्ट में

741
00:52:33,200 --> 00:52:37,840
ऐसे ही होते हैं ना धर्माचार्य सनातन धर्म के जो हर बात को कहते हैं अस्थाई

742
00:52:37,840 --> 00:52:40,700
बात है

743
00:52:40,700 --> 00:52:45,840
[संगीत]

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00:52:45,840 --> 00:52:48,000
हम

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00:52:48,000 --> 00:52:53,040
हटा लिया गया और कई अपनी पोस्ट को आए दिन

746
00:52:53,040 --> 00:52:57,200
यह व्यक्ति त्रया चरित्र वाला अस्थाई कहता

747
00:52:57,200 --> 00:53:01,360
रहता है। क्यों? अस्थाई झूठ होता है। असत होता

748
00:53:01,360 --> 00:53:05,360
है। सत्य अस्थाई नहीं होता है। ठीक

749
00:53:05,360 --> 00:53:08,560
है?

750
00:53:08,560 --> 00:53:11,520
तो इसी प्रकार

751
00:53:11,520 --> 00:53:15,680
आगे जो है एक वीडियो प्रस्तुत किया गया

752
00:53:15,680 --> 00:53:16,960
है।

753
00:53:16,960 --> 00:53:21,280
यदि तुम्हारी बुद्धि कभी अधर्म में लग रही होगी तो क्रिया पर तुम्हारा नियंत्रण

754
00:53:21,280 --> 00:53:25,760
होगा। बुद्धि खराब होने से तुम्हारा कर्म खराब नहीं होने दूंगी।

755
00:53:25,760 --> 00:53:30,080
और यदि कभी तुम क्रिया ही गलत करने जा रहे हो तो बुद्धि भ्रष्ट नहीं होगी। तुम्हारा

756
00:53:30,080 --> 00:53:34,320
विवेक तुम्हें रोक लेगा। बोला था कि विजय की क्लिप ऐड करूंगा।

757
00:53:34,320 --> 00:53:38,400
वाकलन से हो गया होगा। वाकलन से मैंने वो बोलने के समय अलग-अलग विषयों

758
00:53:38,400 --> 00:53:42,720
में गड़बड़ हो गई थी। इस मानवीय त्रुटि को हम सुधार लेते हैं। लेकिन

759
00:53:42,720 --> 00:53:46,960
उसी त्रुटि के कारण बोलने में हो गया था वाकस्खलन। अब

760
00:53:46,960 --> 00:53:51,040
जिस स्त्री की बात चल रही थी जिसका नाम विजयाश्री बताया गया था। मैं इस स्त्री को

761
00:53:51,040 --> 00:53:55,120
व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता हूं। हां, मैं इसी वीडियो में एक वीडियो अटैच करूंगा आप लोगों के

762
00:53:55,120 --> 00:53:59,120
लिए जिसमें आप देखिएगा कैसे पूरी के शंकराचार्य जी के मंच पर वो स्त्री

763
00:53:59,120 --> 00:54:03,360
बैठी हुई है और सम्मान के साथ वाकस्थलन से हो गया होगा वाकस्थलन से। तो इस

764
00:54:03,360 --> 00:54:07,600
लड़की का Facebook हैंडल भी हमने बता दिया और इसका एक पॉडकास्ट

765
00:54:07,600 --> 00:54:11,600
का लिंक भी दे दिया। वहां आप स्पष्ट सुन सकते हैं कि ये विदेश इत्यादि भी आती जाती रही है। वहां से भी

766
00:54:11,600 --> 00:54:16,320
इसका उठना बैठना है। और पूरी के शंकराचार्य के मंच पर एक संदिग्ध

767
00:54:16,320 --> 00:54:20,320
सूत्रों वाली स्त्री का अचानक से आना और अचानक से उसका मठ में इतने

768
00:54:20,320 --> 00:54:24,320
महत्वपूर्ण स्थान पर बैठ जाना वाकस्थलन से हो गया होगा। वाकलन से

769
00:54:24,320 --> 00:54:28,480
मैंने और पूरी के शंकराचार्य के मंच पर रिदमम कपूर को बैठने

770
00:54:28,480 --> 00:54:32,560
दिया जा रहा है। वाकस्थलन से हो गया होगा। वाकलन सेशन उसका है यूआईएसएफ

771
00:54:32,560 --> 00:54:36,720
यूनिवर्सल योगा स्पोर्ट्स फेडरेशन जिसकी उत्तराखंड प्रेसिडेंट है रिदमा कपूर। तो भूरी शंकराचार्य

772
00:54:36,720 --> 00:54:41,040
जी के साथ मठ में मंच साझा कर अलग-अलग शिविरों में मंच साझा कर रही है। वाकस्थलन

773
00:54:41,040 --> 00:54:45,120
से हो गया होगा वाकलन से यूआईएसएफ की उत्तराखंड स्टेट प्रेसिडेंट मंच साझा किसके

774
00:54:45,120 --> 00:54:49,200
साथ कर रही है? पूरी शंकराचार्य जी के साथ और वाकस्थलन

775
00:54:49,200 --> 00:54:53,200
से हो गया होगा वाकलन से रिदमम कपूर को और रिदमम कपूर जो है वो

776
00:54:53,200 --> 00:54:57,600
पूरी शंकराचार्य जी के साथ मंच साझा कर रही है। वाकस्थलन से हो गया होगा वाक।

777
00:54:57,600 --> 00:55:01,920
यदि तुम्हारी बुद्धि कभी अधर्म में लग रही होगी तो क्रिया पर तुम्हारा नियंत्रण

778
00:55:01,920 --> 00:55:06,400
होगा। बुद्धि खराब होने से तुम्हारा कर्म खराब नहीं होने दूंगी।

779
00:55:06,400 --> 00:55:10,720
और यदि कभी तुम क्रिया ही गलत करने जा रहे हो तो बुद्धि फ्रष्ट नहीं होगी। तुम्हारा

780
00:55:10,720 --> 00:55:13,760
विवेक तुम्हें रोक लेगा।

781
00:55:13,760 --> 00:55:18,320
जिसमें उसने यह स्वीकार कर लिया है कि उसकी जीवा द्वारा वाकलन

782
00:55:18,320 --> 00:55:22,320
हो जाने के चलते उसने विजयश्री नाम से किसी और महिला

783
00:55:22,320 --> 00:55:26,400
के वीडियो को दिखा दिया। या फिर किसी और महिला के वीडियो को

784
00:55:26,400 --> 00:55:30,560
उसने वाकलन के चलते विजयश्री बोल दिया। वह

785
00:55:30,560 --> 00:55:35,280
बात और है कि एक बार नहीं बोला है। कम से कम पांच छह बार बोला है।

786
00:55:35,280 --> 00:55:39,280
ठीक है? मगर बोला है। उसको उसने वाकलन

787
00:55:39,280 --> 00:55:42,480
कहा है। अब

788
00:55:42,480 --> 00:55:45,680
फिर भी [संगीत]

789
00:55:45,680 --> 00:55:50,160
इस वीडियो में जो आपको अभी-अभी दिखाया गया है। भागवतानंद ने स्पष्ट

790
00:55:50,160 --> 00:55:54,720
किया है कि उसकी कर्मेंद्रियों द्वारा ऐसा कोई आचरण

791
00:55:54,720 --> 00:55:58,800
हुआ, जो उचित नहीं था। भाई वाकलन

792
00:55:58,800 --> 00:56:03,760
से निकला तो क्या असत्य भाषण निकला ना वाकलन से

793
00:56:03,760 --> 00:56:07,920
जी्हा फिसल जाने के कारण तुम्हारे मुख से असत्य भाषण

794
00:56:07,920 --> 00:56:11,920
निकला ना ह तो क्या हुआ

795
00:56:11,920 --> 00:56:16,800
ऐसा कोई कार्य हुआ तुम्हारी कर्म इंद्री से जो कि

796
00:56:16,800 --> 00:56:20,960
उचित नहीं था तुमने स्वीकार भी कर लिया अशास्त्रीयता

797
00:56:20,960 --> 00:56:25,680
तो तुमने स्वीकार कर ही ली है गाली देने के रूप में

798
00:56:25,680 --> 00:56:29,840
तो

799
00:56:29,840 --> 00:56:34,000
अच्छा यहां राम का विरोध हो ही गया क्योंकि राम जो भी बोलते हैं सोच समझ

800
00:56:34,000 --> 00:56:38,000
के बोलते हैं। अब तुम राम की भी कोई बात ले आना। ये देखो यहां पर भी राम ने

801
00:56:38,000 --> 00:56:42,880
दोहरी बात की है। तुम तो यही करोगे ना। विधर्मी

802
00:56:42,880 --> 00:56:46,880
की यही पहचान होती है। वो जिसको मानने का दावा करता है एक दिन उसी पर

803
00:56:46,880 --> 00:56:51,520
उंगली उठाता है। उसी का विरोध करता है। करो

804
00:56:51,520 --> 00:56:55,520
आओ सामने। बता दो समाज को तुम राम के कितने

805
00:56:55,520 --> 00:56:59,600
बड़े शत्रु हो। यह भी कर लेना। पहले शंकराचार्य का

806
00:56:59,600 --> 00:57:04,000
पूरी शंकराचार्य का की महिमा गान करते नहीं थकते थे।

807
00:57:04,000 --> 00:57:08,080
है ना? जब पूरी शंकराचार्य ने पूरी शंकराचार्य के यहां दाल

808
00:57:08,080 --> 00:57:12,160
नहीं गली तुम्हें हवा नहीं दी गई मां। तो आज उनका

809
00:57:12,160 --> 00:57:17,760
उपस उड़ाते नहीं थकते हो। है ना?

810
00:57:17,760 --> 00:57:20,400
हम

811
00:57:20,400 --> 00:57:24,560
तो यह बताने की आवश्यकता तो नहीं है कि श्री राम धर्म का साक्षात स्वरूप

812
00:57:24,560 --> 00:57:28,880
है। तो ऐसे असत्य भाषण कर देना बिना सोचे

813
00:57:28,880 --> 00:57:33,440
समझे वाकलन के अनु कारण पांच छह बार लगातार

814
00:57:33,440 --> 00:57:37,680
छूट निकाल देना असत्य भाषण निर्गत कर देना ये अधर्म माना

815
00:57:37,680 --> 00:57:40,880
जाएगा ना अधर्म अधर्म हुआ तुम्हारी

816
00:57:40,880 --> 00:57:44,400
कर्म इंद्री से हम

817
00:57:44,400 --> 00:57:50,160
अब क्या बात आती है कि उसको

818
00:57:50,160 --> 00:57:54,640
अब उसके द्वारा अधर्म होना अशास्त्रीयता होना भागवतानंद

819
00:57:54,640 --> 00:57:58,720
ने स्वयं स्वीकार किया है कि हां शास्त्रीय गाली देना इतना तो

820
00:57:58,720 --> 00:58:02,800
है झूठ बोलना हमने सिद्ध कर दिया मनुस्मृति

821
00:58:02,800 --> 00:58:06,880
का विरोध हमने सिद्ध कर दिया अनेकानेक शास्त्रों का विरोध हमने

822
00:58:06,880 --> 00:58:12,080
सिद्ध कर दिया वाकलन उसने स्वयं स्वीकार कर लिया जबकि

823
00:58:12,080 --> 00:58:16,480
देवी के द्वारा उसको यह

824
00:58:16,480 --> 00:58:21,680
वरदान प्राप्त था कि जबकि

825
00:58:21,680 --> 00:58:24,000
देवी के द्वारा

826
00:58:24,000 --> 00:58:28,160
भागवतानंद को यह वरदान प्राप्त है कि यदि उसकी कर्मेंद्रियों

827
00:58:28,160 --> 00:58:32,240
द्वारा कोई अनुचित कार्य होने वाला होगा तो उसका विवेक उसकी

828
00:58:32,240 --> 00:58:36,240
बुद्धि उसकी कर्मेंद्रियों का निग्रह करेंगे। पर यहां

829
00:58:36,240 --> 00:58:40,240
तो भागवतानंद के कथन अनुसार ही यह सिद्ध होता है कि अनुचित आचरण

830
00:58:40,240 --> 00:58:44,400
करते समय उसकी कर्मेंद्रियों का निग्रह उसके मन बुद्धि

831
00:58:44,400 --> 00:58:48,960
विवेक इत्यादि के द्वारा नहीं किया गया। तुम्हारी जीवा फिसल कैसे सकती है?

832
00:58:48,960 --> 00:58:54,960
तुम्हें तो वरदान प्राप्त है ना देवी का कैसे हो गया वहांन?

833
00:58:55,280 --> 00:58:59,520
तो या तो वाकलन नहीं था और या फिर वह देवी नहीं

834
00:58:59,520 --> 00:59:03,600
थी और या फिर वह वरदान नहीं था। समझे?

835
00:59:03,600 --> 00:59:09,600
आखिरकार कोई तो वजह होगी जो हम शंकराचार्य के शिष्य हैं

836
00:59:09,600 --> 00:59:13,600
और आखिरकार कोई तो वजह होगी जो हम राम के भक्त

837
00:59:13,600 --> 00:59:19,600
हैं।

838
00:59:19,920 --> 00:59:24,000
वाक्य स्कलन तुम्हारी कर्मेंद्रियों द्वारा होने वाली एक गलती

839
00:59:24,000 --> 00:59:28,080
है। जबकि तुम्हें वरदान प्राप्त है कि तुम्हारे द्वारा ऐसा

840
00:59:28,080 --> 00:59:33,280
नहीं होगा। तुम्हारा मन, बुद्धि, विवेक, चित्त इत्यादि उसका निग्रह करेंगे।

841
00:59:33,280 --> 00:59:37,440
ऐसे में देवी का वरदान निरर्थक सिद्ध होते हुए उस वरदान

842
00:59:37,440 --> 00:59:41,520
के असत्य सिद्ध हो जाने की स्थिति में भागवतानंद द्वारा उसके

843
00:59:41,520 --> 00:59:45,680
प्रामाणिक आचार्यत्व के विषय में कही गई पूरी कथा को जब देवी

844
00:59:45,680 --> 00:59:49,680
की देवी का वरदान कपोल कल्पित तो देवी से जुड़ी हुई अलग-अलग

845
00:59:49,680 --> 00:59:54,000
अन्य चीजों को कपोल कल्पित क्यों ना माना जाए। क्योंकि

846
00:59:54,000 --> 00:59:58,160
भागवतानंद ने कहा है अंतत गत जब यह सिद्ध

847
00:59:58,160 --> 01:00:02,160
हो ही चुका है कि भागवतानंद ने कुछ कार्य ऐसे किए हैं जो उसे

848
01:00:02,160 --> 01:00:06,240
नहीं करने चाहिए थे क्योंकि श्रीमद् भगवत गीता 16 24 के

849
01:00:06,240 --> 01:00:10,720
अनुसार कर्तव्य तथा अकर्तव्य के विषय में एकमात्र

850
01:00:10,720 --> 01:00:15,040
शास्त्र प्रमाण है। ऐसे में कम से कम स्वयं को आचार्य

851
01:00:15,040 --> 01:00:19,440
कहने वाले के द्वारा शास्त्र विरुद्ध आचरण को तो वही कार्य मानना

852
01:00:19,440 --> 01:00:25,200
पड़ेगा, जो उसे नहीं करना चाहिए था।

853
01:00:25,200 --> 01:00:29,360
ऐसे में भागवतानंद द्वारा बताया गया मां भगवती का वह वरदान भी सार्थक सिद्ध

854
01:00:29,360 --> 01:00:33,520
नहीं होता जिसके अनुसार भागवतानंद द्वारा किसी भी प्रकार से ऐसा कार्य

855
01:00:33,520 --> 01:00:37,760
ना किए जाने का दावा किया गया था जो अनैतिक अशास्त्रीय हो।

856
01:00:37,760 --> 01:00:41,760
कुल मिलाकर उसे वरदान प्राप्त था कि उसके द्वारा कोई भी दुराचरण नहीं

857
01:00:41,760 --> 01:00:45,840
होगा। ऐसे में भी उसके द्वारा इस प्रकार के अनेक दुराचरण का होना

858
01:00:45,840 --> 01:00:49,840
यह सिद्ध करता है कि या तो उसे देवी के रूप में दिखाई देने वाला

859
01:00:49,840 --> 01:00:53,920
तत्व वास्तविकता में देवी नहीं बल्कि तुम्हारा वो कालिया जिन

860
01:00:53,920 --> 01:00:58,160
परी इत्यादि थे। कोई बुरी शक्ति है जो भागवतानंद

861
01:00:58,160 --> 01:01:02,320
के माध्यम से धर्म का क्षय और अधर्म का प्रचार करने हेतु कार्यरत

862
01:01:02,320 --> 01:01:06,320
है। अथवा भागवतानंद द्वारा वर्णित वरदान वाली बात असत्य है। कोई

863
01:01:06,320 --> 01:01:10,320
वरदान नहीं मिला। देवी ही नहीं दिखी या तो दिखी तो पूरी

864
01:01:10,320 --> 01:01:14,320
शक्ति दिखी और या फिर दिखी नहीं। वरदान

865
01:01:14,320 --> 01:01:18,320
मिला ही नहीं। यदि ऐसा है तो इस प्रकार भागवतानंद

866
01:01:18,320 --> 01:01:22,320
के असत्यवादी होने के कारण उन सारे घटनाक्रमों के अस्तित्व पर

867
01:01:22,320 --> 01:01:26,320
भी प्रश्न चिन्ह उड़ जाता है जिनकी प्रामाणिकता के लिए मात्र

868
01:01:26,320 --> 01:01:30,320
भागवतानंद के शब्द ही प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं। एवं जिसके

869
01:01:30,320 --> 01:01:34,320
लिए बात बार बात मैं जनेऊ ले सकता हूं हाथ में मैं गंगा में उतर सकता हूं। मैं जनेऊ ले

870
01:01:34,320 --> 01:01:38,320
सकता हूं। जाकिर नायक भी बोलेगा मैं जनेऊ हाथ में ले सकता हूं।

871
01:01:38,320 --> 01:01:40,400
मान लेना उसकी बातें वो

872
01:01:40,400 --> 01:01:44,400
सनातनियों से कह रहा हूं। जो बनते हैं निग्र आचार्य सब कुछ

873
01:01:44,400 --> 01:01:50,400
शास्त्र से बोलता है

874
01:01:55,280 --> 01:01:58,000
तो क्या है

875
01:01:58,000 --> 01:02:02,800
मानना पड़ेगा असत्य मानना पड़ेगा सब पर प्रश्न उठ जाएगा

876
01:02:02,800 --> 01:02:07,440
हम जिनके उसकी वेद सम्मतता

877
01:02:07,440 --> 01:02:11,440
निग्र निग्रह संप्रदाय से उसके संबंध निग्रह संप्रदाय का

878
01:02:11,440 --> 01:02:15,920
अस्तित्व निग्रह संप्रदाय का स्वरूप स्वरूप जो उसके द्वारा विचित

879
01:02:15,920 --> 01:02:21,440
है। इन सब चीजों पर प्रश्न उठ जाएगा।

880
01:02:21,440 --> 01:02:25,960
इनकी कैसे प्रमाणिकता सिद्ध होगी? फिर

881
01:02:25,960 --> 01:02:31,120
[संगीत] भागवतानंद के

882
01:02:31,120 --> 01:02:35,120
सब सब पर हो जाएगा। तो ऐसे में भागवतानंद द्वारा बताए गए वृतांत

883
01:02:35,120 --> 01:02:39,280
को कपोल कल्पित क्यों ना माना जाए। क्योंकि भागवतानंद

884
01:02:39,280 --> 01:02:43,600
ने कहा है ध्यातव्य है कि अनादि काल से प्राप्त सनातन वैदिक

885
01:02:43,600 --> 01:02:47,840
शास्त्रों के विरुद्ध नया शास्त्र लाने पर उसे लाने वाले को सनातन

886
01:02:47,840 --> 01:02:52,000
विरुद्ध मत पंथ अथवा विधर्मी नास्तिक कहा गया है। एवं

887
01:02:52,000 --> 01:02:55,520
पूर्व से ख्यापित वैदिक तात्पर्य को विरुद्ध

888
01:02:55,520 --> 01:02:59,920
अथवा पूर्व से ख्यापित वैदिक तात्पर्य के विरुद्ध नवीन सिद्धांत

889
01:02:59,920 --> 01:03:05,920
अर्थात वेद उपनिषद ब्रह्मसूत्र भगवत गीता अथवा

890
01:03:07,520 --> 01:03:11,760
अन्य तात्विक विवेचना करने वाले सनातन शास्त्रों पर किसी नवीन सिद्धांत

891
01:03:11,760 --> 01:03:15,760
को उद्भाषित करने के समर्थन में भाष्य करने पर ही किसी

892
01:03:15,760 --> 01:03:19,760
को स्वतंत्र रूप से संप्रदाय माना जाता है। वह बात और है कि उस

893
01:03:19,760 --> 01:03:25,760
स्थिति में भी उसके द्वारा दिए जाने वाले सिद्धांत की प्रमाणिकता

894
01:03:26,400 --> 01:03:31,040
अथवा युक्ति के आधार पर प्रश्न उठाया जा सकता है।

895
01:03:31,040 --> 01:03:35,200
होगा। परंतु जब कोई जब तक कोई

896
01:03:35,200 --> 01:03:39,520
श्रुति और उसके अर्थ के लिए किसी भी पूर्व से ख्यापित परंपरा पर ही निर्भर

897
01:03:39,520 --> 01:03:43,520
करता है। तब तक उसे स्वतंत्र रूप से किसी नवीन अथवा लुप्त

898
01:03:43,520 --> 01:03:47,840
संप्रदाय के आचार्य के रूप में स्वीकार किया जाना बिल्कुल भी युक्ति

899
01:03:47,840 --> 01:03:52,160
युक्त सिद्ध नहीं होता। अब जैसा कि भागवत आनंद द्वारा निग्रह संप्रदाय

900
01:03:52,160 --> 01:03:56,160
के बारे में बताया गया उस व्याख्यान के अनुसार निग्रह संप्रदाय का श्रुति

901
01:03:56,160 --> 01:04:00,160
अथवा उसके अर्थ के लिए किसी ना किसी पूर्व से स्थापित संप्रदाय पर

902
01:04:00,160 --> 01:04:04,480
निर्भर होना सिद्ध होता है। निग्रह संप्रदाय की ना ही

903
01:04:04,480 --> 01:04:08,560
धर्म की व्याख्या नवीन है ना ही ब्रह्म की व्याख्या। ऐसे में उसे

904
01:04:08,560 --> 01:04:10,720
किस आधार पर स्वतंत्र रूप से प्रामाणिक

905
01:04:10,720 --> 01:04:14,800
संप्रदाय एवं भागवतानंद के कथित व्याख्यान के अनुसार निग्रह

906
01:04:14,800 --> 01:04:18,880
संप्रदाय में नियुक्त किसी को स्वतंत्र रूप से निग्रह संप्रदाय के रूप

907
01:04:18,880 --> 01:04:24,080
में स्वीकार किया जाए। क्योंकि भागवतानंद ने कहा है

908
01:04:24,080 --> 01:04:28,320
जब भागवतानंद के आचार्यत्व की प्रामाणिकता के संबंध में होने वाले प्रत्येक

909
01:04:28,320 --> 01:04:32,400
प्रश्न का एक ही उत्तर है कि भागवतानंद को सनातन

910
01:04:32,400 --> 01:04:36,800
धर्म का प्रामाणिक आचार्य इसलिए मानना है क्योंकि भागवतानंद ने कहा है

911
01:04:36,800 --> 01:04:41,360
तो ऐसे में स्वगोषित आचार्य उसे क्यों ना कहा जाए। भागवतानंद

912
01:04:41,360 --> 01:04:45,360
को आचार्य किसने घोषित किया? इस प्रश्न के उत्तर में जब भागवतानंद

913
01:04:45,360 --> 01:04:49,920
स्वयं यह कहता है कि उसे आचार्य घोषित करने में केवल वह स्वयं अधिकृत है।

914
01:04:49,920 --> 01:04:54,320
अर्थात उसे आचार्य घोषित करने वाला वह स्वयं है। जबकि विपक्षी

915
01:04:54,320 --> 01:04:58,560
द्वारा नोटिस में बताया गया है कि साक्ष्य संप्रदाय द्वारा उसे

916
01:04:58,560 --> 01:05:02,640
यह उपाधि प्राप्त हुई है। हम नहीं हुई

917
01:05:02,640 --> 01:05:06,640
है। उसी ने दी है या भगवती ने दी। भगवती के लिए

918
01:05:06,640 --> 01:05:10,640
वचन चाहिए। प्रमाण चाहिए और किताब में कहा है कि खुद

919
01:05:10,640 --> 01:05:14,800
खुद मैं खुद ही खुद को दे सकता हूं। तो ये सब सरासर

920
01:05:14,800 --> 01:05:19,040
झूठ हो गया। हम विपक्षी को सनातन धर्म विपक्षी यानी

921
01:05:19,040 --> 01:05:23,200
भागवतानंद हम भागवतानंद को सनातन धर्म का प्रामाणिक आचार

922
01:05:23,200 --> 01:05:25,760
अथवा निग्रचार कहने का पुरजोर विरोध

923
01:05:25,760 --> 01:05:30,240
करते हैं। क्योंकि जिस प्रकार किसी भी अनाधिकारी को राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री,

924
01:05:30,240 --> 01:05:34,400
मुख्यमंत्री, एसपी, कलेक्टर यह बात न्यायपालिका को बताई जा रही है।

925
01:05:34,400 --> 01:05:38,560
इत्यादि महत्वपूर्ण उपाधि दे देना समाज के लिए घातक है। उससे कहीं अधिक

926
01:05:38,560 --> 01:05:42,560
सनातन धर्म के प्रमाणिक धर्माचार्य की उपाधि किसी भी अनाधिकारी

927
01:05:42,560 --> 01:05:46,560
को दे देना मानवता के लिए धर्म के लिए अत्यंत घातक है।

928
01:05:46,560 --> 01:05:51,040
तो यह हुआ आचरण के अनुसार युक्ति के अनुसार

929
01:05:51,040 --> 01:05:55,280
भागवतानंद के द्वारा बताए गए कथित निग्रह

930
01:05:55,280 --> 01:05:59,280
संप्रदाय के स्वरूप का खंडन अगर वह है तो

931
01:05:59,280 --> 01:06:03,600
और भागवतानंद के निग्रहचार्य होने का खंडन

932
01:06:03,600 --> 01:06:09,600
उसके आचार्यत्व का खंडन यह हुआ

933
01:06:10,730 --> 01:06:14,730
[संगीत]
