1
00:00:01,550 --> 00:00:07,550
[संगीत]

2
00:00:08,800 --> 00:00:14,800
तुम [संगीत]

3
00:00:32,480 --> 00:00:37,360
ये एक शक्ति संगम तंत्र

4
00:00:37,360 --> 00:00:40,080
ये दो

5
00:00:40,080 --> 00:00:42,880
ये तीन

6
00:00:42,880 --> 00:00:47,040
ये चार शक्ति संगम तंत्र

7
00:00:47,040 --> 00:00:51,040
शक्ति संगम तंत्र शक्ति संगम तंत्र

8
00:00:51,040 --> 00:00:57,040
जैसे और कोई पहुंच ही नहीं सकता वहां तक शक्ति संगम तंत्र

9
00:00:57,200 --> 00:01:01,360
क्या सोचा था पहुंचेंगे नहीं तो

10
00:01:01,360 --> 00:01:05,360
पिछले भाग में आपने देख लिया होगा जो

11
00:01:05,360 --> 00:01:09,600
11 प्रकार के दावे इसने अपनी प्रामाणिकता के लिए अलग-अलग जगहों

12
00:01:09,600 --> 00:01:13,920
पर ठूसे हैं उसको हमने संकलित किया है। एक तरीके से जो निग्रह

13
00:01:13,920 --> 00:01:16,800
प्रवेशिका यह आज तक मेरे करण अर्जुन आएंगे।

14
00:01:16,800 --> 00:01:21,120
मेरे करण अर्जुन आएंगे। के नाम पर जो यह निग्रह प्रवेशिका आएगी। निग्रह

15
00:01:21,120 --> 00:01:25,360
प्रवेशिका आएगी। जो ये ढिंढोरा पीटता रहता है।

16
00:01:25,360 --> 00:01:29,760
लोगों को बरगलाता रहता है। है ना कि इंतजार में रहे सब के सब।

17
00:01:29,760 --> 00:01:34,320
तो इसने तो वो निग्रह प्रवेशिका नहीं दी। मगर इसके जो तथाकथित

18
00:01:34,320 --> 00:01:38,720
प्रामाणिक होने के जो इसके दावे दावे थे ना जो

19
00:01:38,720 --> 00:01:42,800
क्लेम्स करता था जो यह वो सब प्रकार के क्लेम्स को हमने संकलित

20
00:01:42,800 --> 00:01:46,800
किया है। संकलित करके आपको पिछला भाग ना

21
00:01:46,800 --> 00:01:51,040
देखा हो तो उसमें हमने बताया भी है। इसने अपनी प्रमाणिकता के लिए क्या-क्या

22
00:01:51,040 --> 00:01:55,840
कहा है। अब इसके सभी

23
00:01:55,840 --> 00:01:59,840
जितने भी प्रकार के इसने अपने दावे कर रखे हैं उनकी मीमांसा करेंगे और

24
00:01:59,840 --> 00:02:05,040
चीथड़े उड़ाएंगे। हर एक दावे का

25
00:02:05,040 --> 00:02:09,920
सबसे पहले बात करते हैं और शक्ति संगम तंत्र में

26
00:02:09,920 --> 00:02:14,400
और भी ऐसी चीजें लिखी है जो इस व्यक्ति ने आपको नहीं बताई जिसका उल्लेख

27
00:02:14,400 --> 00:02:18,960
ये निग्रह निकासिका में आपको मिलेगा निग्रह निकासिका

28
00:02:18,960 --> 00:02:22,960
में इसने बहुत सी चीजें आपको नहीं बताई है ना शक्ति संगम तंत्र

29
00:02:22,960 --> 00:02:27,280
के बारे में और क्या-क्या लिखा है ना तो आज जिस

30
00:02:27,280 --> 00:02:31,360
आधार पर अपना डमरू बजा जाता था

31
00:02:31,360 --> 00:02:32,160
शक्ति संगम

32
00:02:32,160 --> 00:02:36,640
तंत्र शक्ति संगम तंत्र शक्ति शक्ति संगम तंत्र उसी आधार पर

33
00:02:36,640 --> 00:02:40,800
इसकी प्रामाणिकता के चीड़े उड़ाएंगे जो प्रमाणिक

34
00:02:40,800 --> 00:02:44,800
बना फिरता है स्वगोषित आचार्य और हां यह पूरी

35
00:02:44,800 --> 00:02:48,960
की पूरी जो ये आप निग्रह निकासिका सुन रहे हैं पढ़ रहे हैं

36
00:02:48,960 --> 00:02:53,120
इस पूरी निग्रह निकासिका का जो एक स्लोगन है वो

37
00:02:53,120 --> 00:02:57,360
स्लोगन पता है क्या है वो है क्योंकि भागवतानंद

38
00:02:57,360 --> 00:03:01,680
ने कहा है निग्रह प्रवेशिका का भी निचोड़ यही है।

39
00:03:01,680 --> 00:03:06,400
इसके द्वारा कही जाने वाली हर बात का निचोड़ यही है।

40
00:03:06,400 --> 00:03:10,640
जो भी बात इसने परंपरा प्राप्त आचार्यों के विरुद्ध जाकर के

41
00:03:10,640 --> 00:03:14,800
स्वतंत्र रूप से कही है उस हर बात का निचोड़ यही है कि उसको क्यों

42
00:03:14,800 --> 00:03:18,800
माना जाए? क्योंकि भागवतानंद ने कहा है। ठीक है?

43
00:03:18,800 --> 00:03:23,120
तो ये सारी जो विवेचना है वो आकर के प्रत्येक

44
00:03:23,120 --> 00:03:27,120
बार जब उसका अंत होगा तो इसी वचन के साथ उसका अंत होगा कि यह

45
00:03:27,120 --> 00:03:31,840
क्यों माना जाए? क्योंकि भागवत आनंद ने कहा है।

46
00:03:31,840 --> 00:03:35,920
चलिए तो सबसे पहला आता है बिंदु कि इसने जो

47
00:03:35,920 --> 00:03:40,000
11 प्रकार के दावे किए हैं और उसमें जो हमने खंडात्मक

48
00:03:40,000 --> 00:03:44,160
तरीके से व्यवस्थित किया है कि पहला खंड जिसमें कि

49
00:03:44,160 --> 00:03:47,280
निग्रह संप्रदाय की स्पष्टता

50
00:03:47,280 --> 00:03:51,360
कि वह एक संप्रदाय है कि नहीं उस पर प्रकाश डाला जाए। फिर उसके साथ

51
00:03:51,360 --> 00:03:56,000
इसका संबंध है कि नहीं इस पर प्रकाश डाला जाए और

52
00:03:56,000 --> 00:04:00,000
यह प्रमाणिक है कि नहीं इस पर प्रकाश डाला जाए और फिर इसने

53
00:04:00,000 --> 00:04:04,080
जो अपने आचार्यत्व के लिए मां भगवती का

54
00:04:04,080 --> 00:04:08,480
आलंबन मां भगवती के वरदान

55
00:04:08,480 --> 00:04:12,720
मां भगवती के कपोल कल्पित वरदान का जो आलंबन लिया

56
00:04:12,720 --> 00:04:17,040
है पर साधना के रूप को बदल करके

57
00:04:17,040 --> 00:04:21,360
और या फिर जो शास्त्रों के उन वचनों का आलंबन लिया है।

58
00:04:21,360 --> 00:04:25,600
यह देख लो आचरण क्योंकि आचरण मुझ में है। इससे यह सिद्ध हो जाता

59
00:04:25,600 --> 00:04:30,000
है कि मैं जो है प्रामाणिक आचार्य हूं।

60
00:04:30,000 --> 00:04:34,320
भगवत गीता में एक जगह पर लिखा हुआ है कि

61
00:04:34,320 --> 00:04:38,480
जो भी व्यक्ति उल्टे वृक्ष की रूप में संसार की व्याख्या

62
00:04:38,480 --> 00:04:42,560
कर देगा। उल्टे वृक्ष के रूप में ठीक ठीक

63
00:04:42,560 --> 00:04:47,680
व्याख्या कर देगा। वह व्यक्ति तत्वदर्शी होगा।

64
00:04:47,680 --> 00:04:51,920
वह व्यक्ति वेदों का ज्ञाता होगा। अब इस एक बात को लेकर के उड़ते तोते

65
00:04:51,920 --> 00:04:55,920
की तरह फिरते हैं कौन? रामपाल एंड सनंस। और

66
00:04:55,920 --> 00:04:59,920
जब वह उड़ते फिरते हैं तो जो उनके

67
00:04:59,920 --> 00:05:02,320
द्वारा कुंठित मानसिकता वाले होते हैं उनके द्वारा

68
00:05:02,320 --> 00:05:06,720
जो ब्रेन वाश लोग होते हैं वो यह सोचना भूल जाते हैं कि रामपाल

69
00:05:06,720 --> 00:05:10,880
ने अगर किसी की देखा देखी और गीता में पड़ने

70
00:05:10,880 --> 00:05:14,960
के बाद ही क्यों ना सही उल्टे वृक्ष की व्याख्या के रूप में बात कह दी

71
00:05:14,960 --> 00:05:19,360
तो बस उसे प्रामाणिक मान लिया जाए। भले ही वह सन्यास आश्रम

72
00:05:19,360 --> 00:05:23,360
में हो या ना हो। भले ही उसने परंपरा से ज्ञान

73
00:05:23,360 --> 00:05:28,400
प्राप्त किया हो या ना किया हो।

74
00:05:28,400 --> 00:05:32,640
भले ही वो श्रुति स्मृति के समस्त शास्त्र जो है उनमें सामंजस्य

75
00:05:32,640 --> 00:05:36,720
की शिक्षा ना देता हो। भले ही वो अपने शिष्य का अंधकार दूर ना

76
00:05:36,720 --> 00:05:41,040
कर पाता हो। बस क्योंकि उसने उल्टे पेड़ की व्याख्या

77
00:05:41,040 --> 00:05:45,040
के रूप में संसार की उल्टे पेड़ के रूप में संसार की व्याख्या कर दी तो वो हो

78
00:05:45,040 --> 00:05:50,800
गया तत्वदर्शी और सारे लक्षण गौण हो गए।

79
00:05:50,800 --> 00:05:55,120
चलिए तो सबसे पहली बात है कि यह क्यों

80
00:05:55,120 --> 00:05:59,600
माना जाए कि भागवतानंद पर मां भगवती प्रसन्न है।

81
00:05:59,600 --> 00:06:03,760
जिस कारण से भागवतानंद को निग्रहचार्य का पद प्राप्त हुआ

82
00:06:03,760 --> 00:06:07,840
मां भगवती के द्वारा। यह सारी घटना का साक्षी कौन है? क्या साक्ष्य

83
00:06:07,840 --> 00:06:12,240
है? क्या प्रमाण है? क्योंकि भागवतानंद

84
00:06:12,240 --> 00:06:16,480
ने कहा है। इसलिए मान लो यह क्यों ना माना जाए।

85
00:06:16,480 --> 00:06:17,360
अगला अगला

86
00:06:17,360 --> 00:06:21,440
बिंदु क्या है? यह क्यों ना माना जाए कि षड्यंत्र पूर्वक शक्ति

87
00:06:21,440 --> 00:06:25,520
संगम तंत्र नामक ग्रंथ में निग्रह आगम का नाम पूर्व

88
00:06:25,520 --> 00:06:29,840
से ही संज्ञान में होने पर भी भागवतानंद द्वारा उक्त संप्रदाय

89
00:06:29,840 --> 00:06:34,080
का बोध भगवती द्वारा कराए जाने की चमत्कारिक कहानी गढ़ी

90
00:06:34,080 --> 00:06:38,080
गई है। यह क्यों ना माना जाए? क्योंकि भागवतानंद ने

91
00:06:38,080 --> 00:06:42,240
कहा है। हां भैया भागवतानंद इस द ग्रेट।

92
00:06:42,240 --> 00:06:46,800
उसने कहा है भाई वो शब्द प्रमाण है ना हमारा। अच्छा

93
00:06:46,800 --> 00:06:50,880
यदि शास्त्र में निग्रह नामक आगम का संदर्भ प्राप्त होता भी

94
00:06:50,880 --> 00:06:55,440
है तो भागवतानंद को ही उस संप्रदाय का प्रामाणिक उत्तराधिकारी

95
00:06:55,440 --> 00:06:59,600
मानने के समर्थन में क्या प्रमाण है? क्योंकि भागवतानंद

96
00:06:59,600 --> 00:07:04,080
ने कहा है हां शक्ति संगम तंत्र सहित अनेकानेक

97
00:07:04,080 --> 00:07:08,400
शास्त्रों में कई ऐसी परंपराओं का अथवा भगवान के अनेक ऐसे

98
00:07:08,400 --> 00:07:12,800
अवतारों का संदर्भ दिया गया है जो कब कहां कैसे उत्पन्न

99
00:07:12,800 --> 00:07:17,120
अथवा लुप्त हुए इन विषयों में कोई जानकारी स्पष्ट प्राप्त नहीं है।

100
00:07:17,120 --> 00:07:21,600
केवल शक्ति संगम तंत्र में ही आप देख लो तो बौद्ध आगम

101
00:07:21,600 --> 00:07:24,640
चीन आगम विश्वरूपागम

102
00:07:24,640 --> 00:07:29,040
इत्यादि नाम बताए गए हैं। जिनकी आगे कोई

103
00:07:29,040 --> 00:07:32,480
स्पष्ट जानकारी सनातन शास्त्रों द्वारा प्राप्त

104
00:07:32,480 --> 00:07:36,800
नहीं होती है। कहां पर बताए गए हैं शक्ति संगम तंत्र में? चौथे खंड

105
00:07:36,800 --> 00:07:40,880
के सातवें अध्याय के 105 से 115 वे

106
00:07:40,880 --> 00:07:45,760
श्लोक के बीच में आप देख लीजिएगा जो ये नाम मैं बता रहा हूं। बौद्ध आगम चीन आगम

107
00:07:45,760 --> 00:07:50,080
है ना तो आने वाले टाइम में कोई यह भी कहने लगेगा भैया मैं बौद्ध आगमाचार्य

108
00:07:50,080 --> 00:07:54,240
हूं बौद्धाचार्य हूं चीनाचार्य हूं तो क्या

109
00:07:54,240 --> 00:07:58,240
है तो क्या ऐसे में यदि कोई दय कहानी गढ़ते हुए स्वयं को

110
00:07:58,240 --> 00:08:02,240
बौद्धाचार्य अथवा चीनाचार्य के रूप में ख्यापित करने

111
00:08:02,240 --> 00:08:06,320
का प्रयास करेगा तो क्या सनातनियों द्वारा उसे प्रामाणिक

112
00:08:06,320 --> 00:08:10,480
आचार्य के रूप में स्वीकार कर लेना उचित माना जाएगा

113
00:08:10,480 --> 00:08:14,720
शिव पुराण शत रुद्र समिता एक चार के अनुसार प्रत्येक

114
00:08:14,720 --> 00:08:19,040
युग में भगवान शिव के असंख्य अवतारों का वर्णन मिलता है।

115
00:08:19,040 --> 00:08:23,680
जिनके बारे में भी पूर्वोक्त पूछी गई जानकारियां प्राप्त नहीं है।

116
00:08:23,680 --> 00:08:27,760
इतना ही नहीं सर्वविदित है कि वेद की कई ऐसी शाखाएं हैं जो

117
00:08:27,760 --> 00:08:32,000
प्राय प्राय लुप्त हो चुकी है। अतः जिनकी भी

118
00:08:32,000 --> 00:08:36,080
जितनी भी परंपराएं अथवा भगवान के अवतार ऐसे हैं जिनकी जानकारी स्पष्ट

119
00:08:36,080 --> 00:08:40,240
रूप से प्राप्त नहीं है। उनसे स्वयं को जोड़कर किसी के भी द्वारा गढ़ी

120
00:08:40,240 --> 00:08:44,560
जाने वाली कहानी को आधार मानकर किसी भी व्यक्ति को भगवान के अवतार

121
00:08:44,560 --> 00:08:47,520
अथवा किसी प्रामाणिक परंपरा के उत्तराधिकारी के रूप

122
00:08:47,520 --> 00:08:51,920
में स्वीकार कर लेना क्यों उचित माना जाए क्योंकि भागवतानंद

123
00:08:51,920 --> 00:08:55,360
ने कहा है

124
00:08:55,360 --> 00:08:59,360
और सुनिए आगे क्या है कई सनातन

125
00:08:59,360 --> 00:09:03,440
शास्त्रों में भगवान शंकर द्वारा वैदिक धर्म की रक्षा के लिए भगवत

126
00:09:03,440 --> 00:09:07,920
पाद आदि शंकराचार्य भगवान के रूप में अवतार लेने के संबंध में

127
00:09:07,920 --> 00:09:11,920
प्रमाण प्राप्त होते हैं। जिस शक्ति संगम तंत्र

128
00:09:11,920 --> 00:09:16,080
नामक शास्त्र के संदर्भ का उपयोग करते हुए भागवतानंद द्वारा यह जो

129
00:09:16,080 --> 00:09:20,480
ढिंढोरा पीटा जाता है। है ना स्वयं

130
00:09:20,480 --> 00:09:24,560
को प्रामाणिक सिद्ध करने के लिए उस शास्त्र में भी जगतगुरु

131
00:09:24,560 --> 00:09:28,800
शंकराचार्य उनके द्वारा स्थापित चार आमनाय पीठों सहित

132
00:09:28,800 --> 00:09:33,040
शंकर संप्रदाय का स्पष्ट विवरण है। कहां पे है?

133
00:09:33,040 --> 00:09:37,200
चौथा खंड आठवा अध्याय 63

134
00:09:37,200 --> 00:09:41,360
से 164 वे श्लोक के बीच इतना लंबा विस्तार से शंकर

135
00:09:41,360 --> 00:09:46,320
परंपरा का वर्णन वहां किया गया है शक्ति संगम तंत्र में

136
00:09:46,320 --> 00:09:50,480
और यह वो संप्रदाय है जिस पर निग्रह करेगा

137
00:09:50,480 --> 00:09:54,720
निग्रहचार्य जिसका कोई वहां पर संदर्भ नहीं

138
00:09:54,720 --> 00:09:59,200
है शक्ति संगम तंत्र में ठीक है यही नहीं

139
00:09:59,200 --> 00:10:02,640
शक्ति संगम तंत्र के ही प्रथम खंड में विभिन्न परंपराओं

140
00:10:02,640 --> 00:10:06,720
के सन्यासियों का विवरण देते समय भी चीन आगम

141
00:10:06,720 --> 00:10:12,240
तथा बौद्ध आगम जैसे अवैदिक मत के सन्यासियों तक का विवरण है।

142
00:10:12,240 --> 00:10:16,560
चीन आगम को अवैदिक भी कहा गया है। बौद्ध आगम को अवैदिक भी कहा गया। उनके सन्यासियों

143
00:10:16,560 --> 00:10:20,560
का विवरण भी दिया गया है। मगर निग्रह संप्रदाय का विवरण

144
00:10:20,560 --> 00:10:25,200
देने में चूक हो गई। शक्ति संगम तंत्र के रचयिता को

145
00:10:25,200 --> 00:10:28,000
है ना।

146
00:10:28,000 --> 00:10:32,320
बौद्ध कैसे बद्ध बौद्ध आगम के कैसे सन्यासी हैं? वो शक्ति

147
00:10:32,320 --> 00:10:36,320
संगम तंत्र बताएगा। चीन आगम के कैसे सन्यासी हैं

148
00:10:36,320 --> 00:10:40,320
वो शक्ति संगम तंत्र बताएगा। परंतु निग्रह के कैसे सन्यासी

149
00:10:40,320 --> 00:10:44,400
होंगे? निग्रह के क्या स्वरूप होगा निग्रह संप्रदाय का

150
00:10:44,400 --> 00:10:48,640
वो शक्ति संगम तंत्र नहीं बताएगा। वो वैष्णव

151
00:10:48,640 --> 00:10:52,640
वैष्णव संप्रदायों की जानकारी प्रदान

152
00:10:52,640 --> 00:10:56,960
करेगा। शंकराचार्य शंकर परंपरा की स्पष्ट जानकारी प्रदान करेगा।

153
00:10:56,960 --> 00:11:01,040
मगर उन सब पर निग्रह करने वाला जो निग्रह संप्रदाय है

154
00:11:01,040 --> 00:11:05,200
निग्रह परंपरा है। वहां परंपरा शब्द के साथ तक निग्रह

155
00:11:05,200 --> 00:11:09,280
को प्रस्तुत नहीं किया जाएगा। केवल निग्रह आगम कहा जाएगा। निग्रह

156
00:11:09,280 --> 00:11:13,680
आगम और उसी पे हुलुल हुलु

157
00:11:13,680 --> 00:11:18,560
चालू कर दो उलना निग्रह आगम आ गया। निग्रह आगम

158
00:11:18,560 --> 00:11:22,640
तो अब बात ये आती है

159
00:11:22,640 --> 00:11:26,960
कि भागवतानंद के अनुसार जिस निग्रह

160
00:11:26,960 --> 00:11:31,360
संप्रदाय को अन्य सभी संप्रदायों का निग्रह करना है। इतने

161
00:11:31,360 --> 00:11:36,240
महत्वपूर्ण निग्रह संप्रदाय का एवं उसके अंतर्गत

162
00:11:36,240 --> 00:11:40,880
आने वाली चलने वाली गुरु परंपरा का कोई विवरण प्राप्त नहीं होता है।

163
00:11:40,880 --> 00:11:45,120
ऐसे में निग्रह आगम के संदर्भ से उन तथ्यों को किस प्रकार प्रमाणिक

164
00:11:45,120 --> 00:11:49,200
मान लिया जाए जो भागवतानंद द्वारा प्रस्तुत किए जाते हैं। निग्रह नाम तो

165
00:11:49,200 --> 00:11:53,600
लिखा है। मगर निग्रह संप्रदाय का स्वरूप मैं बता रहा हूं। वहां संप्रदाय

166
00:11:53,600 --> 00:11:57,680
भी नहीं है। वहां आगम है। निग्रह आगम तो वहां लिखा

167
00:11:57,680 --> 00:12:01,760
है। मगर निग्रह संप्रदाय के रूप में उस आगम को पकड़ के और मैं अपने

168
00:12:01,760 --> 00:12:05,840
अनुसार ले ले घोड़ा ले चाबुक दौड़ाने लगूं। तो

169
00:12:05,840 --> 00:12:09,920
क्यों मान लिया जाए इस बात को? क्योंकि भागवतानंद ने कहा है

170
00:12:09,920 --> 00:12:14,480
हां है ना भागवतानंद

171
00:12:14,480 --> 00:12:18,560
के अनुसार निग्रह संप्रदाय लुप्त हो गया था

172
00:12:18,560 --> 00:12:22,640
जिसको पुन स्थापित करने का कार्य दिव्य योजना द्वारा भागवतानंद

173
00:12:22,640 --> 00:12:26,720
को सौंपा गया व दूसरी ओर शक्ति संगम तंत्र में ही

174
00:12:26,720 --> 00:12:30,800
शंकर परंपरा के विच्छिन्न होने और पुनः उदय होने का

175
00:12:30,800 --> 00:12:33,760
विवरण भी प्राप्त होता है। ध्यातव्य है कि

176
00:12:33,760 --> 00:12:37,840
अब यह जो नोटिस हमको मिला था उसमें

177
00:12:37,840 --> 00:12:42,080
नोटिस में एक बात कही गई थी जिसने पहला

178
00:12:42,080 --> 00:12:47,360
भाग ना देखा हो वो देख ले यह जो निग्रह निकासिका हमारी ओर से

179
00:12:47,360 --> 00:12:51,360
प्रसारित की जा रही है जो करण अर्जुन आएगी

180
00:12:51,360 --> 00:12:55,360
वाली जो निग्रह प्रवेशिका है उसको उसके पूर्व पक्षों

181
00:12:55,360 --> 00:13:00,080
को संकलित करके उसके उत्तर पक्ष के रूप में यह जो

182
00:13:00,080 --> 00:13:04,320
क्या कहते हैं निर्गत की जा रही है तो यह जो है एक नोटिस

183
00:13:04,320 --> 00:13:08,720
जो हमें 100 करोड़ का मिला था उसके उत्तर के रूप में यह निग्रह

184
00:13:08,720 --> 00:13:12,960
निकासिका लिखी गई है। है ना? तो अब क्या है कि क्योंकि उसमें

185
00:13:12,960 --> 00:13:17,040
यह कहा गया था उस नोटिस में कि क्योंकि भागवतानंद जो है

186
00:13:17,040 --> 00:13:21,040
बड़े-बड़े धर्माचार्यों की पोल खोल रहे थे और शंकर परंपरा के बारे

187
00:13:21,040 --> 00:13:25,440
में भी बहुत सारे उसने एक्सपोज किया है शंकर परंपरा को इसलिए

188
00:13:25,440 --> 00:13:30,080
हमने इसलिए ऐसा ऐसा हमने भागवतानंद के विरुद्ध

189
00:13:30,080 --> 00:13:34,400
षड्यंत्र किया उसके बारे में अभद्र आपत्तिजनक और अपमान पूर्वक

190
00:13:34,400 --> 00:13:38,480
वचन कहे यह उसमें 100 करोड़ के नोटिस में कहा गया है जिसको

191
00:13:38,480 --> 00:13:42,720
और ज्यादा जानकारी लेनी हो पिछले वीडियो देख ले। खैर

192
00:13:42,720 --> 00:13:47,520
तो अब उसने यह जो भागवतानंद है यह

193
00:13:47,520 --> 00:13:51,360
शंकर मठ में

194
00:13:51,360 --> 00:13:55,840
घट घटित होने वाले कोई भी घटनाओं

195
00:13:55,840 --> 00:14:00,080
को है ना अपने अनुसार अपनी दृष्टि से देखता

196
00:14:00,080 --> 00:14:04,400
है कि अगर कैमरा बंद हो गया, कोई टेक्निकल फॉल्ट

197
00:14:04,400 --> 00:14:08,400
चल रहा है, आवाज क्लियर नहीं आ रही है तो इसका मतलब यह

198
00:14:08,400 --> 00:14:12,800
षड्यंत्र पूर्वक ही किया जा रहा है क्योंकि भागवतानंद ने कहा है

199
00:14:12,800 --> 00:14:17,120
और यह बात प्रमाणित कैसे होती है क्योंकि शास्त्र में लिखा है कि परंपरा

200
00:14:17,120 --> 00:14:21,600
में विच्छिन्नता आएगी एक दिन तो वो विच्छिन्नता यही है परंपरा

201
00:14:21,600 --> 00:14:25,600
एक दिन नष्ट होगी परंपरा कुछ समय के लिए लुप्त होगी तो वो जो लुप्त

202
00:14:25,600 --> 00:14:29,600
होने का समय है वो यही है क्यों क्योंकि भागवतानंद ने कहा है

203
00:14:29,600 --> 00:14:33,680
है ना तो अभी यहां पर जो उसके द्वारा यह जो चीज प्रस्तुत की जाती है कि

204
00:14:33,680 --> 00:14:37,920
भैया शंकर संप्रदाय लुप्त होगा यह जो चीज स्पष्ट

205
00:14:37,920 --> 00:14:42,080
की जाती है और अपने एक वीडियो में हम इस बात पर भी

206
00:14:42,080 --> 00:14:46,480
करेंगे कि इसने बुद्ध के विषय में विरोध क्यों किया शंकर परंपरा का।

207
00:14:46,480 --> 00:14:50,720
उसका भी इसकी प्रामाणिकता से रिलेशन है। इसने बुद्ध

208
00:14:50,720 --> 00:14:55,040
के मामले में जो शंकर संप्रदाय का शंकराचार्यों का विरोध किया है।

209
00:14:55,040 --> 00:14:59,040
उस विरोध का भी संबंध इसकी अपनी प्रामाणिकता से

210
00:14:59,040 --> 00:15:03,200
है। यह अपनी प्रामाणिकता को सुरक्षित करने के लिए

211
00:15:03,200 --> 00:15:06,720
जो ये जो बुद्ध मत है इसको स्टार्ट

212
00:15:06,720 --> 00:15:11,680
करने वाले जो जो सिद्धार्थ उनको

213
00:15:11,680 --> 00:15:15,840
विष्णु का अवतार सिद्ध करने पर तुला हुआ है। यह हम किसी और वीडियो

214
00:15:15,840 --> 00:15:20,080
में ले लेंगे। पर अभी क्या बात चल रही है कि यह जो

215
00:15:20,080 --> 00:15:24,160
यह कहता है कि देखो अगर वो वहां से आया तो इसका

216
00:15:24,160 --> 00:15:28,240
मतलब है वो इसीलिए आया होगा वहां से। थपाक थपाक थपाक। ये यहां से क्यों

217
00:15:28,240 --> 00:15:32,400
आया? थपाक थपाक थपाक। तो मैं जो कह रहा हूं वो इसीलिए आया होगा। देखो

218
00:15:32,400 --> 00:15:36,880
शास्त्र में भी लिखा है कि एक ना एक दिन ये परंपरा में

219
00:15:36,880 --> 00:15:40,880
संकट आएंगे। इस परंपरा में विच्छिन्न होगी ये परंपरा। शास्त्र में लिखा

220
00:15:40,880 --> 00:15:44,960
है और वो उधर से आया है। इसलिए मेरी वाणी सत्य मान लो कि वो इसीलिए आया

221
00:15:44,960 --> 00:15:49,440
है। वो जो है फिल्म देख के आया है। अभी-अभी

222
00:15:49,440 --> 00:15:53,520
जो उधर उस गेट से जो आएगा वो फिल्म देख करके ही आ रहा है। सिद्ध हो गया।

223
00:15:53,520 --> 00:15:57,680
कैसे सिद्ध हुआ? शक्ति संगम तंत्र में भविष्यवाणी की गई है ना विच्छिन्नता

224
00:15:57,680 --> 00:16:02,000
आएगी। तो मैं बता रहा हूं विच्छिन्नता आएगी। मान लो मेरी बात। क्यों?

225
00:16:02,000 --> 00:16:06,080
क्योंकि भागवतानंद ने कहा है हां तो अभी हम इस बात

226
00:16:06,080 --> 00:16:10,160
का जवाब दे रहे हैं कि क्या शास्त्र की किसी भी भविष्यवाणी

227
00:16:10,160 --> 00:16:14,720
को आधार बना करके होने वाली घटनाओं को

228
00:16:14,720 --> 00:16:18,720
होने वाली घटनाओं को उस शास्त्र की भविष्यवाणी के अनुरूप देख

229
00:16:18,720 --> 00:16:21,920
कर के और होने वाली घटनाओं को बिना ठीक से

230
00:16:21,920 --> 00:16:26,000
अनुसंधान किए मान लेना चाहिए कि विच्छिन्नता आ गई। बर्बाद

231
00:16:26,000 --> 00:16:30,080
हो गया सब। नष्ट हो गया सब। और अब जब सब नष्ट हो गया तो मान लो भैया

232
00:16:30,080 --> 00:16:34,080
सबसे बड़े आचार्य कौन है? निग्र आचार्य। हम चलो

233
00:16:34,080 --> 00:16:40,080
खैर तो क्या है कि

234
00:16:41,440 --> 00:16:45,440
तो उक्त शिकायत पत्र में आगे भागवतानंद द्वारा निराधार रूप से पूरी

235
00:16:45,440 --> 00:16:49,440
मठ में शास्त्र विरुद्ध अमर्यादित आचरण होने का आक्षेप लगाते

236
00:16:49,440 --> 00:16:55,440
हुए यह भागवतानंद द्वारा पूरी मठ के विरोध में किए गए।

237
00:16:55,840 --> 00:17:00,240
उक्त कृत को ही हमारे द्वारा भागवतानंद के लिए आपत्तिजनक टिप्पणियां

238
00:17:00,240 --> 00:17:04,320
करने का कारण बताया गया है। यद्यपि हमारे अनुसार हमने कोई आपत्तिजनक टिप्पणी

239
00:17:04,320 --> 00:17:08,480
नहीं की है। अतः यहां प्रसंग वश हम शिकायतकर्ता द्वारा पूरी मठ

240
00:17:08,480 --> 00:17:12,640
पर लगाए गए आक्षेपों के रूप में किए गए निराधार अनर्गल

241
00:17:12,640 --> 00:17:16,960
प्रलाप पर प्रलाप की वास्तविकता बताते हुए आगे बढ़ना उचित

242
00:17:16,960 --> 00:17:21,040
समझते हैं। भागवतानंद द्वारा स्वयं की वर्चस्वता

243
00:17:21,040 --> 00:17:25,440
को स्थापित करने के मंतव्य से वर्तमान में सुलभ सांकर पीठों के प्रति

244
00:17:25,440 --> 00:17:29,600
जन सामान्य को अनास्थावान बनाने के निमित्त शक्ति संगम तंत्र

245
00:17:29,600 --> 00:17:33,920
शास्त्र से प्राप्त शंकर परंपरा

246
00:17:33,920 --> 00:17:38,080
के विच्छिन्न होने की भविष्यवाणी को षड्यंत्र पूर्वक फेर बदल

247
00:17:38,080 --> 00:17:42,080
करके लुप्त हो जाने की भविष्यवाणी के रूप में प्रचारित किया जाता

248
00:17:42,080 --> 00:17:46,320
है। यह इसकी अमृत वचन का लिंक है और

249
00:17:46,320 --> 00:17:50,480
शक्ति संगम तंत्र के जो वचन है जहां पर ऐसा है विच्छिन्न होने की बात है वह

250
00:17:50,480 --> 00:17:54,880
भी हमने मेंशन कर दिया है। इतना ही नहीं सांकर परंपरा

251
00:17:54,880 --> 00:17:59,280
के पुनः उदित होने के विवरण को गौण रखते हुए

252
00:17:59,280 --> 00:18:03,360
उसी शक्ति संगम तंत्र में शंकर परंपरा के विच्छिन्न

253
00:18:03,360 --> 00:18:07,440
होने पर पुनः उदित होने की भविष्यवाणी भी की गई है। मगर उसको

254
00:18:07,440 --> 00:18:10,880
गौण करता है यह व्यक्ति और यह व्यक्ति केवल

255
00:18:10,880 --> 00:18:14,960
इस पर ज्यादा जोर देता है कि विच्छिन्न होगी विच्छिन्न होगी जिससे कि वो जो

256
00:18:14,960 --> 00:18:19,200
सर्वोच्च आचार्य सार्वभौम आचार्य वाली बात है ना वो कहीं ना कहीं दब

257
00:18:19,200 --> 00:18:23,360
जाए खत्म हो जाए विच्छिन्न हो गई अब तो अब तो खाली पड़ा है

258
00:18:23,360 --> 00:18:27,440
तो जाके हम बैठ जाएंगे निग्र आचार्य बन जाएंगे और ये

259
00:18:27,440 --> 00:18:32,000
सार्वभौम सर्वोच्च से याद आया ये बड़ा एक प्रलाप करता है

260
00:18:32,000 --> 00:18:36,080
ये भागवतानंद एक प्रलाप बहुत करता है कि अरे वो जगतगुरु के बाद

261
00:18:36,080 --> 00:18:41,040
फिर आए एक उपाधि हो गई। सार्वभौम आचार्य फिर सर्वोच्च आचार्य

262
00:18:41,040 --> 00:18:44,880
शंकराचार्य जी के विषय में

263
00:18:44,880 --> 00:18:49,280
क्या है कि सर्वोच्च जगतगुरु इस बात पर मुझे थोड़ी आपत्ति है क्योंकि सर्वोच्च

264
00:18:49,280 --> 00:18:53,440
सनातन धर्म में कोई नहीं हो सकता। तो भाई

265
00:18:53,440 --> 00:18:57,920
पहले केवल घी आया करता था। ठीक है?

266
00:18:57,920 --> 00:19:02,160
जब केवल घी हुआ करता था उसके सामने कोई विशेषण लगाने

267
00:19:02,160 --> 00:19:06,160
की आवश्यकता नहीं होती थी। मगर जब कालांतर में डालडा

268
00:19:06,160 --> 00:19:10,320
आने लगा, तरह-तरह के नकली घी बनने लगे तो घी के

269
00:19:10,320 --> 00:19:14,480
सामने भी विशेषण लगाने की जरूरत पड़ती है। शुद्ध

270
00:19:14,480 --> 00:19:18,480
देसी घी दे दो। यद्यपि इसका शास्त्रों में

271
00:19:18,480 --> 00:19:22,800
वर्णन ना हो या फिर कोई विधिक विषयक शास्त्रों में इसका वर्णन ना हो।

272
00:19:22,800 --> 00:19:25,920
मगर लोकाचार में पहचान करने के

273
00:19:25,920 --> 00:19:30,000
लिए कि श्रेष्ठतम उपाधि को लोग समझ पाए। श्रेष्ठतम

274
00:19:30,000 --> 00:19:34,320
आचार्य तक लोग पहुंच पाए या फिर उस ज्ञान

275
00:19:34,320 --> 00:19:38,320
को प्राप्त कर पाए जिस ज्ञान से मोक्ष मिलना है मूर्ख

276
00:19:38,320 --> 00:19:42,480
उसके लिए विशेषण देने पड़ते हैं। तो दिव्या अभिषेक दिव्य

277
00:19:42,480 --> 00:19:46,960
साम्राज्य अभिषेक के ऊपर कोई दीक्षा नहीं होने से सर्वोच्च दीक्षा युक्त होने से शंकराचार्य

278
00:19:46,960 --> 00:19:51,120
जी को हम शाक मत में सर्वोच्च धर्माधिकारी मानते हैं। धर्म अह

279
00:19:51,120 --> 00:19:55,200
गुरु मानते हैं। एकलिंग पुराण के प्रमाण से भी हम यह समझते हैं कि

280
00:19:55,200 --> 00:19:59,440
शंकराचार्य जी कलयुग के सर्वोच्च धर्म गुरु इस दृष्टि से मान्य हो जाते हैं।

281
00:19:59,440 --> 00:20:03,440
बताना पड़ता है।

282
00:20:03,440 --> 00:20:08,480
इतनी सी बात नहीं घुसी तेरे भेजे में।

283
00:20:08,480 --> 00:20:12,480
खैर इतना ही नहीं शंकर परंपरा के

284
00:20:12,480 --> 00:20:16,640
पुनः उदित होने के विवरण को गौ रखते हुए इस विषय में कोई

285
00:20:16,640 --> 00:20:20,640
भी चर्चा नहीं करता है। ये है इसका पक्षपात

286
00:20:20,640 --> 00:20:24,960
दोगलापन। त्रया चरित्र कोई

287
00:20:24,960 --> 00:20:28,960
भी चर्चा नहीं करता शक्ति संगम तंत्र द्वारा की गई

288
00:20:28,960 --> 00:20:33,040
भागवतानंद के शब्दों में कहे तो लुप्त हो जाने की

289
00:20:33,040 --> 00:20:37,520
ही सही थोड़ी देर मान लेते दुर्जन तोषण आए भविष्यवाणी

290
00:20:37,520 --> 00:20:41,760
को भागवतानंद द्वारा वर्तमान की समय धारा से किस आधार

291
00:20:41,760 --> 00:20:45,760
पर जोड़ा गया है जिसके कारण शास्त्र में दी गई

292
00:20:45,760 --> 00:20:50,240
उक्त भविष्यवाणी का समर्थन लेते हुए शंकर पीठ पर लगाए

293
00:20:50,240 --> 00:20:54,320
जाने वाले भागवतानंद के निराधार आक्षेपों की पुष्टि

294
00:20:54,320 --> 00:20:58,560
करने का प्रयास किया जाता है। किस आधार पर

295
00:20:58,560 --> 00:21:02,720
अगर शक्ति संगम तंत्र ने ये कहा भी है कि परंपरा लुप्त हो जाएगी

296
00:21:02,720 --> 00:21:06,720
तो यही समय क्यों माना जाए कि इस समय परंपरा परंपरा लुप्त हो

297
00:21:06,720 --> 00:21:10,960
जाएगी। क्यों माना जाए? किस आधार पे? इसके

298
00:21:10,960 --> 00:21:15,040
लिए प्रमाण क्या है? हो सकता है परंपरा का विच्छिन्न

299
00:21:15,040 --> 00:21:18,560
होने का जो समय कालखंड था वो निकल चुका हो।

300
00:21:18,560 --> 00:21:22,640
उस समय बहुत ज्यादा कार्य ना कर पाई हो। शंकर परंपरा इसलिए कहा गया

301
00:21:22,640 --> 00:21:26,800
हो कि विच्छिन्न हुई और पुनः उदित होना

302
00:21:26,800 --> 00:21:30,800
परंपरा विच्छिन्न हो जाएगी तो पुनः उदित नहीं होगी यदि वह समाप्त

303
00:21:30,800 --> 00:21:34,800
हो जाएगी यानी कि पुनः उदित होने की बात अगर की

304
00:21:34,800 --> 00:21:38,960
जा रही है शास्त्र में उसी शास्त्र में जिसके आधार पर तुमने अपने

305
00:21:38,960 --> 00:21:43,920
ताश के पत्तों का महल बनाया है उसी शास्त्र में

306
00:21:43,920 --> 00:21:48,000
शंकर परंपरा के विच्छिन्न हो जाने के बाद पुनः उदित होने की

307
00:21:48,000 --> 00:21:52,160
बात भी की जा रही है तो यदि परंपरा

308
00:21:52,160 --> 00:21:56,480
नष्ट हो जाएगी एक भी व्यक्ति नहीं बचेगा तो

309
00:21:56,480 --> 00:22:00,480
फिर परंपरा उदित कैसे होगी उदित तो तभी मानी जाएगी ना जब

310
00:22:00,480 --> 00:22:04,960
पिछले गुरु ने अगले अपने शिष्य को अपने उत्तराधिकारी को बनाया हो आगे

311
00:22:04,960 --> 00:22:09,040
पढ़ाया हो हां इसको ऐसे मान सकते हैं कि उतना

312
00:22:09,040 --> 00:22:13,040
प्रभाव नहीं रह जाएगा फिर उदित होगी फिर प्रभाव आएगा तो हो सकता

313
00:22:13,040 --> 00:22:17,600
है वह प्रभाव जो कम हुआ था वह निकल चुका हो वह समय देश कालखंड

314
00:22:17,600 --> 00:22:22,000
तुम्हारी बात को क्यों माना जाए क्योंकि भागवतानंद ने कहा है। चलो

315
00:22:22,000 --> 00:22:26,080
आगे चलते हैं। तो क्या है? संभव है कि यह भविष्यवाणी

316
00:22:26,080 --> 00:22:30,240
आने वाले एक दो सहस्त्र वर्षों के बाद घटित होनी हो अथवा

317
00:22:30,240 --> 00:22:33,600
भूतकाल में घटित हो चुकी हो। यदि मान भी मान

318
00:22:33,600 --> 00:22:38,080
भी लिया जाए कि शक्ति संगम तंत्र में भागवतानंद के अनुसार सांकर परंपरा

319
00:22:38,080 --> 00:22:42,160
के केवल लुप्त हो जाने के ही की ही बात कही गई है तब

320
00:22:42,160 --> 00:22:46,240
भी यह कैसे माना जाएगा कि यह भविष्यवाणी वर्तमान के समय में ही

321
00:22:46,240 --> 00:22:50,480
चरितार्थ होती है। क्योंकि तुम तो कह दोगे आवाज

322
00:22:50,480 --> 00:22:54,480
खराब हो रही है तो इसका मतलब है कि वहां षड्यंत्र चल रहा है। इसका मतलब है

323
00:22:54,480 --> 00:23:00,480
शक्ति संगम तंत्र की भविष्यवाणी सही होने वाली है।

324
00:23:01,520 --> 00:23:06,160
भले ही वहां पर आवाज खराब होने का कारण कुछ और हो,

325
00:23:06,160 --> 00:23:10,320
भले ही सुबह से देर से शुरू होने वाले कार्यक्रम के

326
00:23:10,320 --> 00:23:14,480
व्यवस्थापन के लिए यह ध्यान दिलाना पड़े कि देर हो रही है,

327
00:23:14,480 --> 00:23:19,120
मगर वहां पर तुम उसको षड्यंत्र के रूप में प्रस्तुत करो।

328
00:23:19,120 --> 00:23:23,360
तुम्हें वास्तविकता से कोई मतलब नहीं है। तुम्हें धर्म से कोई मतलब

329
00:23:23,360 --> 00:23:27,520
नहीं है। तुम्हें कैरी मिनाटी बनना है, धार्मिक कैरी मिनाटी

330
00:23:27,520 --> 00:23:33,520
हां? बन तू। धार्मिक कैरी मिनाटी बन।

331
00:23:35,120 --> 00:23:41,120
चलो फिर क्या है? आगे

332
00:23:43,280 --> 00:23:47,360
जिसके कारण भागवतानंद द्वारा सांकर पीठ के बारे में कुछ

333
00:23:47,360 --> 00:23:52,560
भी निराधार कह देने मात्र से ही सांकर पीठ का दोष युक्त होना सिद्ध हो जाता है।

334
00:23:52,560 --> 00:23:56,640
कि भैया शाक्ति संगम तंत्र में लिखा था विच्छिन्न होगी। इसलिए मैं जो विच्छिन्नता

335
00:23:56,640 --> 00:24:00,800
के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूं घटनाओं को तो मान लो कि विच्छिन्न हो रही है क्योंकि

336
00:24:00,800 --> 00:24:04,960
भविष्यवाणी है शास्त्र की हम अगर

337
00:24:04,960 --> 00:24:09,040
शास्त्र में कहीं लिखा है यह होगा ऐसा होगा देखो वहां कहा था

338
00:24:09,040 --> 00:24:13,120
और देखो मैंने उल्टे की व्याख्या कर दी देखो मैं ही हूं तत्वदर्शी मैं ही हूं

339
00:24:13,120 --> 00:24:17,600
नास्तमस की भविष्यवाणी रामपाल संस्कृत

340
00:24:17,600 --> 00:24:21,760
जाने वाला रामपाल नहीं तो तू और क्या है शंकर

341
00:24:21,760 --> 00:24:25,840
परंपरा को मानने वाला होने के नाम पर ही शंकर परंपरा को मिटा देने का

342
00:24:25,840 --> 00:24:31,350
प्रयास करने वाला नहीं तो तू और क्या है

343
00:24:31,350 --> 00:24:35,680
[संगीत]

344
00:24:35,680 --> 00:24:39,840
और क्या कहता है तू प्रयास नहीं किया है खंडन किया

345
00:24:39,840 --> 00:24:44,000
है तोते उड़ जाएंगे बताऊंगा तुझे तेरी

346
00:24:44,000 --> 00:24:48,160
बौद्ध वाली कहानी और तेरी शबरी वाली कहानी रुक जा तू

347
00:24:48,160 --> 00:24:52,160
रुक जा बताऊंगा आने दे समय अभी फिलहाल तेरी

348
00:24:52,160 --> 00:24:56,320
यह परंपरा का पोस्टमार्टम कर ले जरा तो अब

349
00:24:56,320 --> 00:25:00,720
आगे क्या है इस पक्ष में कि ऐसे भविष्यवाणी से किसी भी दृष्टांत

350
00:25:00,720 --> 00:25:04,720
को किसी भी घटनाक्रम को किसी भी घटना को जोड़ करके देखना

351
00:25:04,720 --> 00:25:08,800
उचित नहीं है। उस संबंध में क्या है कि शास्त्र में यह तो बताया

352
00:25:08,800 --> 00:25:12,960
गया है कि कुछ समय अवधि के लिए परंपरा विच्छिन्न होगी। परंतु यह नहीं बताया

353
00:25:12,960 --> 00:25:17,520
गया कि मठों में अनाचार होने के कारण ऐसा होगा। विच्छिन्न होगी।

354
00:25:17,520 --> 00:25:21,680
मगर मठों में अनाचार होने के कारण ऐसा होगा। यह तो नहीं

355
00:25:21,680 --> 00:25:25,760
कहा गया। तो अनाचार से जोड़कर ही क्यों देखा जाए? हो सकता है दबाव के

356
00:25:25,760 --> 00:25:29,760
कारण हो जाए। जैसे कि अंग्रेजों के मुगल के शासनकाल में उतना

357
00:25:29,760 --> 00:25:33,840
काम नहीं कर पाए। मान लो किया मगर उतना लोगों के

358
00:25:33,840 --> 00:25:38,000
लिए प्रासंगिक नहीं रहा। तो वो जो विच्छिन्न होना था विच्छिन्न

359
00:25:38,000 --> 00:25:42,080
भी मानी गई। उसके बाद पुनः उदित हो रही है। हो सकता है उदित होने का ही कालखंड

360
00:25:42,080 --> 00:25:46,000
हो। [संगीत]

361
00:25:46,000 --> 00:25:50,000
क्योंकि यह क्यों नहीं मानोगे? क्योंकि भागवतानंद ने कहा है। खैर

362
00:25:50,000 --> 00:25:55,680
आगे चलते हैं। फिर इसके बाद क्या है कि

363
00:25:55,680 --> 00:25:59,680
संभव है कि किसी युद्ध अथवा षड्यंत्र के कारण परंपरा विच्छिन्न किए

364
00:25:59,680 --> 00:26:04,080
जाने के संबंध में वह भविष्यवाणी कही हो। यदि मान भी लिया जाए कि विच्छिन्न

365
00:26:04,080 --> 00:26:08,240
होने का कारण अनाचार ही बताया गया है तब भी केवल इतने मात्र

366
00:26:08,240 --> 00:26:12,240
से किसी के भी द्वारा मठ मंदिरों पर लगाए जाने वाले आरोपों को बिना किसी

367
00:26:12,240 --> 00:26:16,400
उपयुक्त अनुसंधान के सत्य मान लेना पूर्णतया पूर्णतया

368
00:26:16,400 --> 00:26:20,480
अनुचित है किसी से भविष्यवाणी कर दी

369
00:26:20,480 --> 00:26:24,560
डायन है डायन है बिना यह सोचे समझे कि वो मातृ शक्ति डायन है कि

370
00:26:24,560 --> 00:26:30,560
नहीं मार डालो उसे क्योंकि भविष्यवाणी हो गई है

371
00:26:35,840 --> 00:26:40,000
स्कंद पुराण में रामायण महात्म सहित अनेक शास्त्रों में बताया

372
00:26:40,000 --> 00:26:44,160
गया है कि कलयुग में स्त्रियां पर पुरुष गमन करेंगभचारणी

373
00:26:44,160 --> 00:26:48,160
हो जाएंगी तो क्या यह जो व्यक्ति

374
00:26:48,160 --> 00:26:52,640
ऐसा बोल रहा है वह अपनी माताओं और अपनी बहनों के लिए व्यभचारणी

375
00:26:52,640 --> 00:26:57,280
होना पर पुरुष गमन करना यह सब

376
00:26:57,280 --> 00:27:01,360
संबोधन को स्वीकार करेगा क्योंकि शास्त्र

377
00:27:01,360 --> 00:27:07,360
में कहा है तो हो गई।

378
00:27:08,320 --> 00:27:12,560
क्या किसी भी स्त्री पर लगने वाले आरोपों का यथोचित अनुसंधान ना करके

379
00:27:12,560 --> 00:27:18,560
केवल इस भविष्यवाणी के कारण आरोपित स्त्री को दोषी मान लिया जाएगा

380
00:27:18,560 --> 00:27:22,720
कि भैया वहां भविष्यवाणी हुई है कि कलयुग में स्त्रियां हो जाएंगी। इसलिए

381
00:27:22,720 --> 00:27:26,720
अगर इसके थोड़ा बहुत भी अगर संकेत भी मिल गया तो बस हो

382
00:27:26,720 --> 00:27:30,720
गई वैभचारणी। यही है ना तुम्हारे सिद्धांत

383
00:27:30,720 --> 00:27:33,760
यही है ना न्याय

384
00:27:33,760 --> 00:27:38,400
शर्म नहीं आती है [संगीत]

385
00:27:38,400 --> 00:27:42,640
यहां यह मानना होगा कि कलयुग में स्त्री पुरुषों से स्त्री पुरुषों के अधिक मात्रा

386
00:27:42,640 --> 00:27:46,960
में व्यभचारी होने की बात कही है परंतु प्रत्येक स्त्री अथवा प्रत्येक पुरुष व्यभिचारी

387
00:27:46,960 --> 00:27:50,880
हो जाएंगे ऐसा नहीं कहा गया। श्रीमद् भगवत गीता के चौथे अध्याय में भी

388
00:27:50,880 --> 00:27:55,040
भगवान श्री कृष्ण ने भगवान सूर्य को दिए गए ज्ञान को लुप्त हो जाने की बात कही है।

389
00:27:55,040 --> 00:27:59,360
तो क्या इसका अर्थ यह मान लिया जाए कि उस कालखंड में

390
00:27:59,360 --> 00:28:03,360
ब्रह्म का ब्रह्म तत्व का ज्ञान किसी को था ही नहीं। कर्म योग

391
00:28:03,360 --> 00:28:07,520
का ज्ञान किसी को था ही नहीं। हम पुराणों में कर्म

392
00:28:07,520 --> 00:28:12,480
योग नहीं है। पुराणों में कर्म योग नहीं है क्या?

393
00:28:12,480 --> 00:28:16,800
पुराणों की रचना तो सृष्टि के प्रारंभ से ही हुई है। वेदों

394
00:28:16,800 --> 00:28:21,120
को भी रचना वेदों को भी कहने से पहले

395
00:28:21,120 --> 00:28:25,600
पुराणों का स्मरण किया था ब्रह्मा जी ने तो ज्ञान नहीं था उस समय

396
00:28:25,600 --> 00:28:29,760
लुप्त हो गया था ज्ञान तो प्राय लुप्त

397
00:28:29,760 --> 00:28:33,920
हो गया है ना के बराबर रह गया है ये मानना पड़ेगा ना कि यही मान

398
00:28:33,920 --> 00:28:38,000
लोगे खत्म ही हो गया था उस कालखंड में कोई था ही नहीं जिन

399
00:28:38,000 --> 00:28:42,080
गुरु संदीपन के पास भगवान श्री कृष्ण पढ़ने के लिए गए थे उनको

400
00:28:42,080 --> 00:28:46,370
ज्ञान नहीं था भीष्म को ज्ञान नहीं था विदुर को ज्ञान नहीं था किसी को भी ज्ञान नहीं था

401
00:28:46,370 --> 00:28:49,040
[संगीत]

402
00:28:49,040 --> 00:28:53,040
और वह एक कथा और आती इसमें कोई वैश्य था जा

403
00:28:53,040 --> 00:28:57,520
से उसका कुछ नाम था भागवत में ही आती है वो कथा

404
00:28:57,520 --> 00:29:03,520
भागवत में या महाभारत में उसको भी ज्ञान नहीं था।

405
00:29:07,040 --> 00:29:11,120
ठीक इसी प्रकार शक्ति संगम तंत्र द्वारा किसी समय

406
00:29:11,120 --> 00:29:15,120
परंपरा के विच्छिन्न होने की भविष्यवाणी की गई है। यह भविष्यवाणी नहीं की गई

407
00:29:15,120 --> 00:29:19,200
है कि भागवत आनंद द्वारा बताए गए समय में उसके द्वारा जिन लोगों पर

408
00:29:19,200 --> 00:29:23,760
आधा अधूरा निराधार बिना अनुसंधान किए जो आरोप लगाया जाएगा

409
00:29:23,760 --> 00:29:27,840
उन्हीं के कारण परंपरा विच्छिन्न होगी। अतः भविष्यवाणी को आधार मानकर पूरी

410
00:29:27,840 --> 00:29:31,920
मठ पर लगने वाले किसी भी आरोप की पुष्टि नहीं की जा सकती।

411
00:29:31,920 --> 00:29:36,000
उसके लिए यथोचित साक्ष्य इत्यादि के रूप में ठोस प्रमाणों

412
00:29:36,000 --> 00:29:40,480
की आवश्यकता होगी जो कि पूरी मठ में चल रहे अनाचरण का

413
00:29:40,480 --> 00:29:44,800
अनावरण कर देने का दंभ भरने वाले भागवतानंद

414
00:29:44,800 --> 00:29:48,880
द्वारा कभी भी उपलब्ध नहीं कराए गए केवल दम भरा है हमारे पास सुरक्षित

415
00:29:48,880 --> 00:29:52,240
है यह है वो है टेपों

416
00:29:52,240 --> 00:29:58,240
कभी आज तक सामने नहीं लाए

417
00:29:58,960 --> 00:30:03,280
यहां यह जान लेना आवश्यक है कि भविष्यवाणी के आधार पर किसी घटना की पुष्टि

418
00:30:03,280 --> 00:30:07,280
नहीं होती। अपितु किसी घटना के सत्यापित हो जाने पर भविष्यवाणी की

419
00:30:07,280 --> 00:30:11,760
पुष्टि अवश्य होती है। अथवा भविष्यवाणी में उसे किसी व्यक्ति,

420
00:30:11,760 --> 00:30:15,760
वस्तु अथवा स्थिति से जोड़ने के समर्थन में वस्तुनिष्ठता के

421
00:30:15,760 --> 00:30:20,000
साथ विषय का ऐसा स्पष्ट विवरण दिया गया हो जिसके आधार पर

422
00:30:20,000 --> 00:30:24,400
स्पष्टता के साथ किसी व्यक्ति, वस्तु अथवा स्थिति को उस भविष्यवाणी

423
00:30:24,400 --> 00:30:28,640
से जोड़ा जा सके। स्पष्ट विवरण के अभाव में

424
00:30:28,640 --> 00:30:32,720
इस प्रकार की शास्त्रों भविष्यवाणियों का पर्यावसान किसी

425
00:30:32,720 --> 00:30:36,880
को दोषी अथवा निर्दोष सिद्ध करने में ना होते हुए भविष्य में

426
00:30:36,880 --> 00:30:40,880
आने वाली समस्याओं के लिए पूर्व से ही सतर्क

427
00:30:40,880 --> 00:30:44,960
होने में है। कि हम समय के लिए सतर्क हो पाए।

428
00:30:44,960 --> 00:30:49,360
जो कठिन समय आ सकता है उसके लिए सतर्क रहे।

429
00:30:49,360 --> 00:30:53,520
ऐसे वाक्यों का पर्यावसान केवल इस बात में

430
00:30:53,520 --> 00:30:57,600
है। इस बात में नहीं है कि अगर कह दिया गया

431
00:30:57,600 --> 00:31:02,000
स्त्रियां जो है व्यभचारणी हो जाएंगी तो प्रत्येक स्त्री हो गई।

432
00:31:02,000 --> 00:31:06,080
अगर कह दिया गया पुरुष जो है काम लोप हो जाएंगे तो प्रत्येक पुरुष

433
00:31:06,080 --> 00:31:10,080
हो गया। मानते हो तुम? मानता है तू

434
00:31:10,080 --> 00:31:14,000
अपने आप को प्रत्येक पुरुष हो गया। मानता है तू अपने

435
00:31:14,000 --> 00:31:18,080
आप को काम लो। लिखा है रामायण

436
00:31:18,080 --> 00:31:22,800
महात्म में वैसे तुझसे तो यह प्रश्न करना बेकार ही है।

437
00:31:22,800 --> 00:31:28,000
गुप्ताचार्य

438
00:31:28,000 --> 00:31:34,000
हम

439
00:31:36,240 --> 00:31:42,240
[संगीत]

440
00:31:46,000 --> 00:31:50,720
जिस प्रकार सीधी सी बात है

441
00:31:50,720 --> 00:31:54,960
गर्मी के मौसम में गर्मी तो पड़ेगी ही

442
00:31:54,960 --> 00:31:58,960
इसका अर्थ यह नहीं कि गर्मी से बचने के उपाय बंद कर दिए जाए। उसी

443
00:31:58,960 --> 00:32:03,120
प्रकार कलयुग की ये जो चीजें बताई जा रही है ऐसा हो जाएगा। उससे

444
00:32:03,120 --> 00:32:07,360
हम निपटने के लिए तैयारी कर सके। इस भावना से

445
00:32:07,360 --> 00:32:11,680
शास्त्रों में वचन लिखे हैं। नहीं तो तुम में और रामपालियों

446
00:32:11,680 --> 00:32:16,240
में क्या अर्थ अंतर रह जाएगा?

447
00:32:16,240 --> 00:32:20,400
कलयुग के राक्षस सतयुग के राक्षस

448
00:32:20,400 --> 00:32:25,920
कलयुग में ब्राह्मण के रूप में जन्म लेंगे। बस

449
00:32:25,920 --> 00:32:30,880
हो गया। हो गया। हर ब्राह्मण

450
00:32:30,880 --> 00:32:34,960
राक्षस हो गया। सतयुग का जो राक्षस था वही आज ब्राह्मण है। यह रामपाल ही

451
00:32:34,960 --> 00:32:39,200
करते हैं। वही तुम करो।

452
00:32:39,200 --> 00:32:43,440
धार्मिक कैनी मिनाटी बनेंगे। तो अब क्या अर्थ निकला

453
00:32:43,440 --> 00:32:47,440
इस सबका कि भागवतानंद द्वारा पूरी पीठ पर

454
00:32:47,440 --> 00:32:51,520
लगाए गए सभी आक्षेप पूर्णतः निराधार है। एवं इस

455
00:32:51,520 --> 00:32:55,600
प्रकार सनातन धर्म की सर्वमान्य सर्वोच्च आचार पीठ पर

456
00:32:55,600 --> 00:32:59,600
ना केवल निराधार आक्षेप लगाना अपितु मनगढ़ंत विधि द्वारा उनकी पुष्टि

457
00:32:59,600 --> 00:33:03,680
करने का दावा करते हुए उनका प्रचार करना मठ की छवि

458
00:33:03,680 --> 00:33:08,000
को नष्ट करने का प्रयास है। जो पूर्ण रूप से आपराधिक

459
00:33:08,000 --> 00:33:11,280
कृत है।

460
00:33:11,280 --> 00:33:15,360
तथा जिसकी पुष्टि भागवतानंद द्वारा लिखित रूप

461
00:33:15,360 --> 00:33:18,240
से

462
00:33:18,240 --> 00:33:22,320
इस शिकायत पत्र में भी कर दी गई है। वह शिकायत पत्र जो मां रानी का लूटे समय

463
00:33:22,320 --> 00:33:26,560
दिया गया है। जो भी हो भागवतानंद के अनुसार इतना

464
00:33:26,560 --> 00:33:30,800
तो स्पष्ट है कि वर्तमान में शंकर परंपरा लुप्त होने वाली है और

465
00:33:30,800 --> 00:33:34,960
इस घटना की भविष्यवाणी भी शक्ति संगम तंत्र में शास्त्र

466
00:33:34,960 --> 00:33:39,040
में प्राप्त होती है। अब प्रश्न यहां यह उठता है कि

467
00:33:39,040 --> 00:33:43,280
जहां एक और किसी आचार परंपरा का विस्तृत वर्णन शक्ति

468
00:33:43,280 --> 00:33:47,600
संगम तंत्र सहित अनेक सनातन शास्त्रों में प्राप्त होता है। इतना

469
00:33:47,600 --> 00:33:51,920
ही नहीं उस परंपरा के इतिहास सहित भविष्य भविष्य

470
00:33:51,920 --> 00:33:55,920
में कुछ समय के लिए उस परंपरा के लुप्त होने तथा उसके

471
00:33:55,920 --> 00:34:00,240
पुन स्थापित होने की भविष्यवाणी भी शास्त्रों में प्राप्त होती है। परंतु

472
00:34:00,240 --> 00:34:04,480
वहीं दूसरी ओर जिस संप्रदाय की उत्पत्ति सभी प्रामाणिक

473
00:34:04,480 --> 00:34:08,560
संप्रदायों का निग्रह करने के लिए हुई है उसका ना तो कोई

474
00:34:08,560 --> 00:34:12,640
ऐसा स्मृति परक स्पष्ट वर्णन किसी शास्त्र में दिया गया है

475
00:34:12,640 --> 00:34:16,640
जिसके आधार पर उसके सिद्धांत इत्यादि का अनुसंधान किया जा

476
00:34:16,640 --> 00:34:20,640
सके अथवा ना ही ऐसा कोई वर्णन मिलता है जिसके

477
00:34:20,640 --> 00:34:24,880
आधार पर उसके साथ किसी के संबंध को सत्यापित किया जा सके।

478
00:34:24,880 --> 00:34:26,480
इतना ही नहीं जो

479
00:34:26,480 --> 00:34:31,680
परंपरा अभी लुप्त नहीं हुई है उसके लुप्त

480
00:34:31,680 --> 00:34:35,760
होने की भी भविष्यवाणी शास्त्रों से प्राप्त है। यहां तक कि उसके पुनः

481
00:34:35,760 --> 00:34:39,840
उदित होने की भविष्यवाणी शास्त्रों से प्राप्त है। परंतु जो सबसे

482
00:34:39,840 --> 00:34:44,080
महत्वपूर्ण परंपरा पूर्व में ही लुप्त हो चुकी है। उसके पुनः उदित

483
00:34:44,080 --> 00:34:48,240
होने का तो क्या उसके लुप्त हो जाने का विवरण भी कहीं प्राप्त

484
00:34:48,240 --> 00:34:53,120
नहीं होता है।

485
00:34:53,120 --> 00:34:57,120
ना तो उसका लुप्त होना बताया गया। ना उसका पुनः उदित होना

486
00:34:57,120 --> 00:35:01,200
बताया गया। ना ही उसके लिए परंपरा शब्द का उपयोग किया गया। ना

487
00:35:01,200 --> 00:35:05,840
ही उसके लिए संप्रदाय शब्द का उपयोग किया गया। मगर

488
00:35:05,840 --> 00:35:09,920
केवल निग्रह आगम आ गया। अब सब हम फिट कर लेंगे।

489
00:35:09,920 --> 00:35:15,520
बाकी का हम सब गढ़ लेंगे।

490
00:35:15,520 --> 00:35:21,040
तो

491
00:35:21,040 --> 00:35:25,440
ऐसे में ऐसे में जब उसकी ना तो

492
00:35:25,440 --> 00:35:29,680
ना तो लुप्त होने के बारे में बताया कि भविष्यवाणी हुई। अरे भैया लुप्त

493
00:35:29,680 --> 00:35:33,760
होना तो स्पष्ट है ना। तुम ही तो कह रहे हो ना कि लुप्त हो जाएगा तो वह भविष्यवाणी तक

494
00:35:33,760 --> 00:35:37,840
उसमें नहीं है शास्त्र में। क्यों नहीं है? फिर क्यों मान

495
00:35:37,840 --> 00:35:41,920
ले संप्रदाय था कोई? क्योंकि भागवतानंद ने कहा है

496
00:35:41,920 --> 00:35:45,920
ना लुप्त होना शास्त्रों में है ना उदित पुनः उदित होना

497
00:35:45,920 --> 00:35:49,920
शास्त्रों में है ना उसका स्वरूप ऐसा होगा जैसा भागवतानंद

498
00:35:49,920 --> 00:35:54,160
बता रहा है यह शास्त्रों में है ना उसके जो तात्विक सिद्धांत

499
00:35:54,160 --> 00:35:58,160
है वो शास्त्रों में है मगर इन सब पर क्यों मान लिया जाए

500
00:35:58,160 --> 00:36:02,880
एज इट इज जैसा ये बता रहा है भागवतानंद क्योंकि

501
00:36:02,880 --> 00:36:07,040
भागवतानंद ने कहा है और फिर भागवतानंद को उस परंपरा का आचार्य कैसे

502
00:36:07,040 --> 00:36:11,520
मान लिया जाए क्योंकि भागवत ने कहा है

503
00:36:11,520 --> 00:36:15,760
शक्ति संगम तंत्र में बहुत से वैदिक आगमों के संबंध में भी उल्लेख

504
00:36:15,760 --> 00:36:19,760
प्राप्त होता है। यही नहीं इस बात की घोषणा भी की जा रही है

505
00:36:19,760 --> 00:36:24,720
कि वहां उल्लेखित कई आगम ऐसे हैं जो पाखंड मात्र हैं।

506
00:36:24,720 --> 00:36:28,720
शक्ति संगम तंत्र में ही बताया गया है। कहां बताया

507
00:36:28,720 --> 00:36:30,880
गया है? चौथा खंड सातवां

508
00:36:30,880 --> 00:36:34,880
अध्याय 108वा श्लोक अर्थात अवैदिक

509
00:36:34,880 --> 00:36:39,120
मत बताए गए हैं कि भैया हम जो नाम यहां पर ले रहे हैं उनमें से कई ऐसे

510
00:36:39,120 --> 00:36:43,360
मत है जो अवैदिक हैं। ठीक है? यह किस आधार पर माना जाएगा

511
00:36:43,360 --> 00:36:47,440
कि शक्ति संगम तंत्र में जिस निग्रह आगम की बात हो रही है

512
00:36:47,440 --> 00:36:51,440
वह श्रुति सम्मत आगम ही है। यह कैसे स्पष्ट

513
00:36:51,440 --> 00:36:56,720
हुआ? क्योंकि भागवतानंद ने कहा है।

514
00:36:56,720 --> 00:37:00,800
भागवतानंद ने निग्रह संप्रदाय से मिलने वाले ज्ञान को श्रुति सम्मत कहा

515
00:37:00,800 --> 00:37:04,800
है। ऐसे में देखना होगा कि अलग-अलग संप्रदाय में से किस संप्रदाय

516
00:37:04,800 --> 00:37:09,120
द्वारा स्वीकार्य वैदिक तात्पर्य के अनुकूल निग्रह

517
00:37:09,120 --> 00:37:13,200
संप्रदाय का सिद्धांत है। उसके लिए भागवतानंद को

518
00:37:13,200 --> 00:37:17,360
उस अमुक संप्रदाय के वैदिक तात्पर्य का परंपरागत अध्ययन होना

519
00:37:17,360 --> 00:37:21,520
आवश्यक है। श्रीमद् भागवत 10 80 32

520
00:37:21,520 --> 00:37:25,680
के अनुसार परमात्मा प्राप्ति का ज्ञान प्रदान

521
00:37:25,680 --> 00:37:29,680
करने वाला परम गुरु होता है। ऐसे में जिस परंपरा से

522
00:37:29,680 --> 00:37:33,680
भागवतानंद को परम तत्व विषयक स्तुति का अर्थ प्राप्त हो रहा है।

523
00:37:33,680 --> 00:37:37,840
निग्रह संप्रदाय से प्राप्त सिद्धांतों के सत्यापन हेतु जिस

524
00:37:37,840 --> 00:37:41,920
परंपरा से वैदिक तात्पर्य के अनुसार ब्रह्म ज्ञान का मूल प्राप्त हो रहा

525
00:37:41,920 --> 00:37:45,920
है। भागवतानंद को उस परंपरा का अनुयाई अथवा शिष्य क्यों ना माना जाए।

526
00:37:45,920 --> 00:37:49,360
क्यों ना माना जाए?

527
00:37:49,360 --> 00:37:53,520
उपनिषदों का भाष्य लोगे शंकर का वेदों

528
00:37:53,520 --> 00:37:57,600
का भाष्य लोगे सायन का और फिर कहीं कह दोगे हमको

529
00:37:57,600 --> 00:38:01,600
भगवती ने आकर के वो जिब्राइल की तरीके से वो दिया है नया

530
00:38:01,600 --> 00:38:05,600
शास्त्र और शास्त्रीय पुष्टि कैसे होगी

531
00:38:05,600 --> 00:38:09,680
कैसे पता चलेगा

532
00:38:09,680 --> 00:38:13,840
कि ये शास्त्र सही है कि नहीं उसके लिए वैदिक तात्पर्य का सहारा

533
00:38:13,840 --> 00:38:18,640
लेना होगा ना उसके लिए वह वेद होने चाहिए ना परंपरा

534
00:38:18,640 --> 00:38:23,600
तो तुम्हें उस परंपरा का क्यों ना माना जाए जिस पर तुम निर्भर हो अपने वो

535
00:38:23,600 --> 00:38:27,520
जिब्राइल वाले शास्त्रों के लिए

536
00:38:27,520 --> 00:38:33,200
उनके सत्यापन के लिए क्यों ना माना जाए

537
00:38:33,200 --> 00:38:37,280
क्योंकि भागवतानंद ने कहा है तुम्हारी तथाकथित

538
00:38:37,280 --> 00:38:41,760
गढ़ी गई जो कहानी है भागवतानंद उसमें मां भगवती ने तुम्हें

539
00:38:41,760 --> 00:38:46,080
परमाक्षर सूत्र नामक ग्रंथ दिया है ना वेद तो नहीं दिए वेद का तात्पर्य

540
00:38:46,080 --> 00:38:50,160
तो नहीं दिया उपनिषदों का तात्पर्य तो नहीं दिया। वह तुम्हें

541
00:38:50,160 --> 00:38:54,720
किस परंपरा से मिला है? जिसके आधार पर तुम ये तय करोगे

542
00:38:54,720 --> 00:39:00,000
कि मुझे जो ग्रंथ मिला है वो वैदिक है कि नहीं? वो किसी

543
00:39:00,000 --> 00:39:05,040
बुरी शक्ति ने तो नहीं दिया। मेरी परी ने तो नहीं दिया।

544
00:39:05,040 --> 00:39:09,680
कालिया जिन कालिया जिन ने तो नहीं दिया। कैसे तय करोगे?

545
00:39:09,680 --> 00:39:13,680
परंपरा पर निर्भर करना पड़ेगा ना। शंकर

546
00:39:13,680 --> 00:39:18,000
परंपरा पर। चलिए आगे चलते हैं। भागवतानंद

547
00:39:18,000 --> 00:39:22,080
के अनुसार निग्रह संप्रदाय का सिद्धांत अव्यक्ता द्वैत शंकर

548
00:39:22,080 --> 00:39:26,240
परंपरा का अद्वैत सिद्धांत ही है। ऐसे में यदि भागवतानंद

549
00:39:26,240 --> 00:39:30,720
द्वारा निग्रह संप्रदाय को श्रुति सम्मत बताने के लिए उसका शंकर

550
00:39:30,720 --> 00:39:34,720
संप्रदाय अंतर्गत अद्वैत सिद्धांत के अनुकूल होना बताया

551
00:39:34,720 --> 00:39:38,880
जाता है तो यह मानना होगा कि उसे शंकर संप्रदाय के दार्शनिक

552
00:39:38,880 --> 00:39:42,960
पक्ष का ज्ञान है। ऐसे में या तो यह माना जाए कि उसे शंकर

553
00:39:42,960 --> 00:39:46,960
संप्रदाय द्वारा दी गई तात्विक विवेचना का बोध भी दिव्य

554
00:39:46,960 --> 00:39:48,320
योजना द्वारा ही प्राप्त हुआ।

555
00:39:48,320 --> 00:39:52,400
जिसके समर्थन में जिसके समर्थन में अभी तक

556
00:39:52,400 --> 00:39:56,480
भागवतानंद द्वारा कोई वक्तव्य लेख यह सब नहीं दिया गया है।

557
00:39:56,480 --> 00:40:00,480
कि मुझे दिव्य योजना द्वारा ब्रह्म तत्व का ज्ञान हुआ था। मैं व्यक्तिगत

558
00:40:00,480 --> 00:40:04,640
रूप से सिद्धांतगत रूप से अपनी परंपरा में अद्वैती हूं। भगवान को जिस मत का जिस

559
00:40:04,640 --> 00:40:08,880
संप्रदाय का जिस आचार विधान का जब उन्हें अद्वैत

560
00:40:08,880 --> 00:40:13,200
मत की स्थापना करनी थी तो भगवान शंकराचार्य जी के रूप में आ गए। अब

561
00:40:13,200 --> 00:40:17,360
भगवान शंकराचार्य जी कौन है? शाक्तों की जो दीक्षा परंपरा

562
00:40:17,360 --> 00:40:21,680
है उसमें क्या कहते हैं? है तो दिव्या अभिषेक दिव्य साम्राज्य अभिषेक के

563
00:40:21,680 --> 00:40:25,680
ऊपर कोई दीक्षा नहीं होने से सर्वोच्च दीक्षा युक्त होने से शंकराचार्य जी को हम शाक मत

564
00:40:25,680 --> 00:40:29,760
में सर्वोच्च धर्माधिकारी मानते हैं धर्म गुरु मानते

565
00:40:29,760 --> 00:40:33,760
हैं तो एकलिंग पुराण के प्रमाण से भी हम यह समझते हैं कि शंकराचार्य

566
00:40:33,760 --> 00:40:38,240
जी कलयुग के सर्वोच्च धर्म गुरु इस दृष्टि से मान्य हो जाते हैं। परमाक्षर

567
00:40:38,240 --> 00:40:42,320
सूत्र मिला था। मगर जो यह ब्रह्म तत्व की व्याख्या

568
00:40:42,320 --> 00:40:46,480
है उपनिषदों के भाष्य इत्यादि के रूप में वह उसको दिव्य

569
00:40:46,480 --> 00:40:50,560
रूप से प्राप्त हुई है। इस बारे में उसने कुछ कुछ नहीं कहा है।

570
00:40:50,560 --> 00:40:56,560
ठीक है? परंतु यदि दिव्य योजना द्वारा

571
00:40:56,720 --> 00:41:01,440
आगे भविष्य आगे भविष्य में हां अभी तक उसने यह नहीं कहा है।

572
00:41:01,440 --> 00:41:05,520
मगर अभी तक उसने इस संबंध में कोई वक्तव्य नहीं

573
00:41:05,520 --> 00:41:10,080
दिया है। परंतु भविष्य में यदि वह कोई ऐसी कहानी कर दे

574
00:41:10,080 --> 00:41:14,160
तो बात अलग है। भाई जब ऐसी बात उठा दी गई तो हमने

575
00:41:14,160 --> 00:41:18,400
गढ़ दिया। लो आए थे एक और जिब्राइल हमारे पास। जिब्राइल बहुत जल्दी

576
00:41:18,400 --> 00:41:22,640
आ जाता है। जो भी पसंद होता है ना उसके

577
00:41:22,640 --> 00:41:26,720
लिए जिब्राइल तुरंत आता है। जैसे ही इच्छा होगी जो

578
00:41:26,720 --> 00:41:31,040
भगवान का दूत है उसकी जो भगवान का वो है संदेश वाहक

579
00:41:31,040 --> 00:41:35,200
जैसे ही इच्छा होगी जो भी करने की जिब्राइल तुरंत आ जाएगा। उसी

580
00:41:35,200 --> 00:41:40,000
प्रकार से जैसे यह निग्रह संप्रदाय के रूप में अपने आप को तथाकथित

581
00:41:40,000 --> 00:41:44,320
स्वषित आचार्य जो हैं यह अपने आप को सिद्ध कर रहे हैं। प्रामाणिक

582
00:41:44,320 --> 00:41:48,400
आचार्य के रूप में तो इनकी भी जैसे ही जो इच्छा होगी तुरंत इनके

583
00:41:48,400 --> 00:41:52,560
पास आ जाएगी नन्ही परी इनकी सोन परी आकर के दे जाएगी इनको

584
00:41:52,560 --> 00:41:55,680
चीजें मटेरियल

585
00:41:55,680 --> 00:42:00,080
शंकराचार्य की चीजों के लिए शंकराचार्य का शब्द प्रमाण नहीं है।

586
00:42:00,080 --> 00:42:04,160
सन्यासी का शब्द प्रमाण नहीं है। मगर इनके म्लेच्छराज को

587
00:42:04,160 --> 00:42:08,400
मानने के लिए इनका शब्द प्रमाण है। देखना हो देखो वरना बंद कर दो। और

588
00:42:08,400 --> 00:42:11,920
तुम्हारे अंत चेतना पर इतना प्रभाव डाल चुके हैं कि फुटपाट शर्ट

589
00:42:11,920 --> 00:42:16,080
पहन के खड़े-खड़े मूत रहे हो और स्त्रियां जो है शादी से पहले गर्भपात कराई घूम रही है। बिना

590
00:42:16,080 --> 00:42:20,080
पैसा की शक्ति के तुमको लग रहा है। अब इससे ज्यादा क्या प्रमाण दे दे तुमको? कि

591
00:42:20,080 --> 00:42:24,080
गली-गली में रील बनाकर लड़कियां जो है सो नाच रही है और व्यभचार फैला रही है। इतनी

592
00:42:24,080 --> 00:42:28,160
अंदर की मानसिकता से क्यों वहां पड़ जा रहा है। क्यों पड़ रहा है? बिना किसी पैशाचिक शक्ति के

593
00:42:28,160 --> 00:42:32,160
तो जिस पैशाचिक शक्ति के माध्यम से ऐसा हो रहा है उसका जहांजहां संदर्भ जिस प्रकार से

594
00:42:32,160 --> 00:42:35,360
प्राप्त होगा चाहे अधिक परंपरा से चाहे अनुभूत परंपरा से

595
00:42:35,360 --> 00:42:39,440
हम उसका वर्णन करेंगे अगर तुमको इसमें प्रमाण नहीं मानना है तो अपनी कंबल तानो और सो

596
00:42:39,440 --> 00:42:40,880
जाओ तुम्हारे लिए हम थोड़े बना रहे हैं

597
00:42:40,880 --> 00:42:43,680
ये सब बातें

598
00:42:43,680 --> 00:42:48,640
शंकराचार्य यदि उत्तर ना दे तो शंकराचार्य की आत्म मुगधता

599
00:42:48,640 --> 00:42:54,640
तुम उत्तर ना दो तो वो तुम्हारी प्रामाणिकता

600
00:42:57,000 --> 00:43:01,440
[संगीत]

601
00:43:01,440 --> 00:43:05,440
यदि दुर्जन तोष न्याय से मान भी मान भी लिया जाए कि दिव्य

602
00:43:05,440 --> 00:43:10,080
योजना द्वारा ही इसको ये तात्विक विवेचना भी प्राप्त हुई है

603
00:43:10,080 --> 00:43:14,160
तब भी भागवतानंद द्वारा शंकर परंपरा के आचार का आश्रय

604
00:43:14,160 --> 00:43:18,160
लेना तो सिद्ध होगा क्योंकि उसकी पुष्टि कैसे

605
00:43:18,160 --> 00:43:22,240
करोगे वैदिक परंपरा से ही तुम्हें आश्रय

606
00:43:22,240 --> 00:43:26,640
लेकर ये सिद्ध करना होगा कि मुझे जो मां भगवती ने शास्त्र दिया है वो वैदिक

607
00:43:26,640 --> 00:43:31,200
है। उसके लिए जाना पड़ेगा तुम्हें वैदिक परंपरा के पास

608
00:43:31,200 --> 00:43:35,200
और यदि उसके पास जाओगे तो उससे पुष्टि करनी होगी कि तुमको दिखाई देने

609
00:43:35,200 --> 00:43:39,200
वाली मां भगवती है या फिर परी

610
00:43:39,200 --> 00:43:43,920
की है तुमने पुष्टि नहीं

611
00:43:43,920 --> 00:43:49,760
आओ चलो लिखो निग्रह प्रवेशिका हम

612
00:43:49,760 --> 00:43:53,840
तो निग्रह संप्रदाय के सिद्धांतों का सत्यापन भागवतानंद द्वारा शंकर

613
00:43:53,840 --> 00:43:55,920
संप्रदाय के शरणागत होकर किए जाने

614
00:43:55,920 --> 00:44:00,080
पर भी भागवतानंद को शंकर संप्रदाय का शिष्य

615
00:44:00,080 --> 00:44:04,080
अनुयाई ना मानकर स्वतंत्र रूप से आचार्य किस आधार पर माना

616
00:44:04,080 --> 00:44:08,160
जाए? क्योंकि भागवतानंद ने कहा है। हर

617
00:44:08,160 --> 00:44:12,800
कहानी देखिए कहां आकर के खत्म हो रही है। समाप्त हो रही है।

618
00:44:12,800 --> 00:44:16,960
क्योंकि भागवतानंद ने कहा है। ज्ञातव्य

619
00:44:16,960 --> 00:44:20,960
है कि भागवतानंद द्वारा उसके व्यवहारिक गुरुओं का तारापीठ और कामाख्या पीठ

620
00:44:20,960 --> 00:44:24,960
से संबंध होना भी बताया गया है। एवं इससे अधिक कुछ भी स्पष्ट

621
00:44:24,960 --> 00:44:29,120
बताने को अस्वीकार करते हुए भागवतानंद के वैदिक

622
00:44:29,120 --> 00:44:33,120
ज्ञान किस परंपरा से आया यह स्पष्ट नहीं

623
00:44:33,120 --> 00:44:37,200
किया गया है। यदि मान भी लिया जाए कि भागवतानंद द्वारा बताए गए

624
00:44:37,200 --> 00:44:41,680
गुरुजनों जिनके बारे में उसने नाम लेने से मना कर दिया है। मेरे गुरुजन

625
00:44:41,680 --> 00:44:45,840
जो है उन्होंने मना किया है। अब मैं थोड़ा गुरु परंपरा का भी संकेत कर देता हूं।

626
00:44:45,840 --> 00:44:50,320
यद्यपि मेरे गुरुजनों ने मना किया है। फिर भी मैं सबों का तो नाम नहीं लूंगा। कामा

627
00:44:50,320 --> 00:44:54,400
की परंपरा से और तारापीठ की परंपरा से मेरा संबंध है। इससे अधिक मैं अभी नहीं

628
00:44:54,400 --> 00:44:58,560
बता सकता। गुरुजनों ने मना किया है। शंकराचार्य मना नहीं कर सकते।

629
00:44:58,560 --> 00:45:02,560
भाई भागवतानंद मना कर सकता है। कुछ बताने अथवा ना बताने

630
00:45:02,560 --> 00:45:07,120
से। उसकी इच्छा हो सकती है। उसका निर्णय हो सकता है। शंकराचार्य

631
00:45:07,120 --> 00:45:13,120
का नहीं हो सकता। मूर्ख [संगीत]

632
00:45:14,240 --> 00:45:20,240
औरों को लथखोर कहेगा और तेरे लिए आरती उतारे। [संगीत]

633
00:45:26,800 --> 00:45:29,840
तो

634
00:45:29,840 --> 00:45:33,840
यदि मान भी लिया जाए कि भागवतानंद द्वारा बताए गए गुरुजनों जिनके बारे में वो

635
00:45:33,840 --> 00:45:37,920
नाम बताने से मना करता है। ऐसे गुरुजनों

636
00:45:37,920 --> 00:45:41,920
से उनको वैदिक ज्ञान प्राप्त हुआ है। तब भी यह मान जानने

637
00:45:41,920 --> 00:45:45,920
की आवश्यकता होगी कि वह गुरुजन जिस परंपरा से हैं

638
00:45:45,920 --> 00:45:50,240
उस परंपरा के सभी सिद्धांत भागवतानंद द्वारा निग्रह संप्रदाय के

639
00:45:50,240 --> 00:45:54,320
बताए गए सभी सिद्धांतों के पूर्णतया अनुकूल

640
00:45:54,320 --> 00:45:58,720
है अथवा नहीं यह भी चेक करना होगा ना

641
00:45:58,720 --> 00:46:02,880
कि अगर वो यह देख रहा है ये कह रहा है कि मुझे

642
00:46:02,880 --> 00:46:07,360
तारापीठ से जुड़े हुए जो मेरे आचार्य गुरु हैं जिनका मैं नाम नहीं बता रहा हूं

643
00:46:07,360 --> 00:46:11,440
अगर वो कह रहा है कि मुझे वैदिक ज्ञान उनसे ही प्राप्त हुआ तो इसके द्वारा गढ़ी

644
00:46:11,440 --> 00:46:15,440
जाने वाली जो कहानियां है सारी कहानियां उनके अनुकूल है कि नहीं और

645
00:46:15,440 --> 00:46:19,520
एक छोटी सी बात कर दूं इसका निग्रह करना उनको स्वीकार है

646
00:46:19,520 --> 00:46:23,600
कि नहीं धर्म और धर्म की व्याख्या यह जो बताएगा वो उनके द्वारा

647
00:46:23,600 --> 00:46:27,600
स्वीकार होगी कि नहीं मान लीजिए वह कह रहे हैं नहीं धर्म यह है

648
00:46:27,600 --> 00:46:29,440
ऐसा करना है ऐसा नहीं करना

649
00:46:29,440 --> 00:46:34,320
है और यह कह रहा है नहीं ऐसा करना है वैसा नहीं करना है

650
00:46:34,320 --> 00:46:40,320
तो क्या इसका निग्रह उनको स्वीकार होगा

651
00:46:42,800 --> 00:46:46,960
और जब तक स्वीकार नहीं है तब तक इसके द्वारा

652
00:46:46,960 --> 00:46:51,120
उनमें प्रमाण्य बुद्धि रखना सिद्ध नहीं होगा। प्रमाण्य बुद्धि

653
00:46:51,120 --> 00:46:56,160
ना होने के कारण यह उस गुरु परंपरा से अपने आप को प्रामाणिक रूप से जोड़ नहीं पाएगा।

654
00:46:56,160 --> 00:47:00,480
तो यह उस परंपरा का भी प्रमाणिक सिद्ध नहीं होगा।

655
00:47:00,480 --> 00:47:05,040
हम्म और वैसे भी यह तो अपना स्वतंत्र रूप से तैयार कर रहा है ना।

656
00:47:05,040 --> 00:47:09,600
तो स्वतंत्र रूप से इसके पास वैदिक भाष्य कहां से आए? उपनिषदों

657
00:47:09,600 --> 00:47:14,000
का भाष्य कहां से आया? अगर इसे उपनिषद पढ़ने की आवश्यकता

658
00:47:14,000 --> 00:47:18,560
नहीं भी पड़ी। मगर वैदिक समाज इसको सनातनी

659
00:47:18,560 --> 00:47:23,600
तभी मानेगा ना जब इसकी चीजें वेद से मैल खा रही होंगी।

660
00:47:23,600 --> 00:47:28,800
तो इसने कहां से पुष्टि की है अपने आप के वैदिक होने की?

661
00:47:28,800 --> 00:47:33,120
नहीं पता। जवाब नहीं है। बस मान लो। क्यों?

662
00:47:33,120 --> 00:47:38,400
क्योंकि भगवत आनंद ने कहा है नहीं तो वीडियो बंद कर दोगे

663
00:47:38,400 --> 00:47:42,480
अगर तुमको इसमें प्रमाण नहीं मानना है तो अपनी कमल तानो सुनाओ तुम्हारे लिए हम थोड़े बना

664
00:47:42,480 --> 00:47:44,800
रहे हैं ये सब बातें तो

665
00:47:44,800 --> 00:47:48,880
अगर अब या तो उनके अनुकूल होना चाहिए चेक करना पड़ेगा अनुकूल

666
00:47:48,880 --> 00:47:52,880
है कि नहीं 99% तो यही अनुकूल नहीं है क्योंकि निग्रह करना तो कम से

667
00:47:52,880 --> 00:47:57,200
कम स्वीकार नहीं है किसी भी परंपरा के प्रामाणिक आचार्यों

668
00:47:57,200 --> 00:48:01,200
को यह तथाकथित गुप्ता आचार्य के द्वारा उनका निग्रह

669
00:48:01,200 --> 00:48:05,680
किया जाना स्वीकार होगा क्या

670
00:48:05,680 --> 00:48:09,760
तो निग्रह इसका स्वीकार नहीं है तो क्या

671
00:48:09,760 --> 00:48:13,760
हुआ उस परंपरा का नहीं है और वैसे भी ये स्वयं ही कहता है कि मैं स्वतंत्र

672
00:48:13,760 --> 00:48:18,000
परंपरा वाला हूं स्वतंत्र है मेरी परंपरा और जो मेरे

673
00:48:18,000 --> 00:48:23,200
पीछे के आचार्य हैं वो लुप्त है गुप्त है हम

674
00:48:23,200 --> 00:48:27,760
तो अगर उनके अनुकूल इसके सिद्धांत

675
00:48:27,760 --> 00:48:32,800
इसकी व्याख्या इसका निग्रह संप्रदाय का स्वरूप नहीं है

676
00:48:32,800 --> 00:48:35,360
तो

677
00:48:35,360 --> 00:48:39,600
यदि वह अनुकूल नहीं है तो निग्रह संप्रदाय को मानने

678
00:48:39,600 --> 00:48:43,840
की स्थिति में भागवतानंद का उन गुरुजनों पर प्रमाण बुद्धि होना सिद्ध नहीं होगा

679
00:48:43,840 --> 00:48:47,920
जिनके नाम पर भागवतानंद द्वारा बताए जिनके नाम भागवतानंद द्वारा बताए गए

680
00:48:47,920 --> 00:48:52,960
हैं। इस प्रकार भी भागवतानंद के पास परंपरागत

681
00:48:52,960 --> 00:48:57,280
रूप से प्रामाणिक वैदिक ज्ञान होना सिद्ध नहीं होगा। यदि भागवतानंद

682
00:48:57,280 --> 00:49:00,000
द्वारा बताए गए गुरुजनों और निग्रह संप्रदाय

683
00:49:00,000 --> 00:49:04,000
के सिद्धांतों में अनुकूलता है भी तब भी यह जानने की आवश्यकता

684
00:49:04,000 --> 00:49:08,560
होगी कि क्या भागवतानंद के उन गुरुजनों ने भागवतानंद को निग्रहचार्य

685
00:49:08,560 --> 00:49:12,880
के रूप में घोषित अथवा स्वीकार किया है अथवा नहीं। इन दोनों ही स्थितियों

686
00:49:12,880 --> 00:49:16,960
की संभावना भागवतानंद द्वारा दिए द्वारा निर्गत किए गए वक्तव्यों से

687
00:49:16,960 --> 00:49:21,200
ही समाप्त हो जाती है। जिनमें बताया गया है कि उसे निग्रचार्य का पद

688
00:49:21,200 --> 00:49:26,000
मां भगवती ने दिया है। एवं साथ ही साथ

689
00:49:26,000 --> 00:49:30,320
वह निग्राचार्य के रूप में स्वीकार नहीं करते क्योंकि यह पद किससे मिला है? मां भगवती

690
00:49:30,320 --> 00:49:34,960
से। स्वतंत्र है ना यह बेलगाम घोड़ा। जैसे

691
00:49:34,960 --> 00:49:39,120
बेलगाम घोड़ा होता है ना कोई किसी की लगाम नहीं होती। वैसे

692
00:49:39,120 --> 00:49:43,440
ही है ये।

693
00:49:43,440 --> 00:49:47,760
साथ ही साथ उसने किसी भी अन्य व्यक्ति के द्वारा अपने पद के सत्यापन

694
00:49:47,760 --> 00:49:51,760
पर आपत्ति जताते हुए अपनी पुस्तक में स्वयं को ही स्वयं के द्वारा आचार्य

695
00:49:51,760 --> 00:49:56,080
घोषित करना स्वीकार किया है। एक जो नए एक नया पर्चा आया मेरे पास

696
00:49:56,080 --> 00:50:00,240
चुटकुले वाला उस पर्चे में यही बताया गया है

697
00:50:00,240 --> 00:50:04,560
कि भैया किसी अमुक अमुक संप्रदाय के आचार्य ने जो है इनको जो है

698
00:50:04,560 --> 00:50:08,880
घोषित कर दिया। नियुक्त कर दिया। क्यों नहीं नियुक्त कर रहे हो भाई?

699
00:50:08,880 --> 00:50:12,880
तुम तो तुम तो स्वयं को स्वयं ही आचार्य घोषित करते हो। तुम्हें तो यह

700
00:50:12,880 --> 00:50:17,600
बात करनी नहीं चाहिए कि मुझे फलाने ने नियुक्त किया है। वो बात और है

701
00:50:17,600 --> 00:50:22,320
कि सनातन संविधान के अनुसार सनातन शास्त्रों के अनुसार

702
00:50:22,320 --> 00:50:26,800
जब तक कोई प्रामाणिक आचार्य किसी को नियुक्त नहीं करेगा, अपना उत्तराधिकारी

703
00:50:26,800 --> 00:50:30,960
अपना शिष्यत्व प्रदान नहीं करेगा तब तक उसको सनातन समाज नहीं

704
00:50:30,960 --> 00:50:35,040
मानेगा कि वो प्रामाणिक है। मगर

705
00:50:35,040 --> 00:50:39,360
इसके कारण तुम अपने सिद्धांत थोड़ी ना बदलोगे। या तो कह दो हम दोगले

706
00:50:39,360 --> 00:50:44,320
हैं। गाओ गाना दोगला नंबर वन

707
00:50:44,320 --> 00:50:50,320
मैं हूं दोगला नंबर वन गाओ

708
00:50:51,040 --> 00:50:54,080
तो क्या है

709
00:50:54,080 --> 00:50:58,240
कुल मिलाकर एक तथ्य को तो स्वीकार करना ही होगा कि यदि भागवतानंद उन

710
00:50:58,240 --> 00:51:02,320
गुरु उन गुरुजनों के आधार पर स्वयं की प्रामाणिकता को सिद्ध

711
00:51:02,320 --> 00:51:06,640
करता भी है तब भी उसे स्वयं को उन गुरुजनों

712
00:51:06,640 --> 00:51:10,960
की अमुक अमुक परंपरा से सद्ध स्वीकार ार करना पड़ेगा

713
00:51:10,960 --> 00:51:15,040
कि मैं फलाना कोलाचार्य के आपसे दीक्षित हूं। फिर उन्होंने पद दिया

714
00:51:15,040 --> 00:51:19,200
है कि नहीं दिया बात की है। तुम्हारा निग्रह

715
00:51:19,200 --> 00:51:23,280
संप्रदाय कहां से आ गया भाई? अलग से

716
00:51:23,280 --> 00:51:27,280
निग्रह संप्रदाय को तो निग्रह संप्रदाय स्वतंत्र रूप से आपको घोषित करना

717
00:51:27,280 --> 00:51:31,360
है ना। और आचार्य की उपाधि आपने स्वयं ही स्वयं को

718
00:51:31,360 --> 00:51:35,920
दी है। हम चलो आगे।

719
00:51:35,920 --> 00:51:40,160
उस उस स्थिति में भी उसे स्वतंत्र रूप से निग्रचार

720
00:51:40,160 --> 00:51:44,320
के रूप में स्वीकार करना तर्कसंगत सिद्ध नहीं होगा। जो भी हो एक

721
00:51:44,320 --> 00:51:48,400
बात तो स्पष्ट है कि भागवतानंद के पास वैदिक ज्ञान जहां

722
00:51:48,400 --> 00:51:52,800
से भी आया हो निग्रह संप्रदाय से तो नहीं आया। जबकि

723
00:51:52,800 --> 00:51:56,880
शास्त्र के कई ऐसे वचन है जिनके आधार पर परंपरा से प्राप्त

724
00:51:56,880 --> 00:52:01,040
ज्ञान को ही प्रामाणिक मानना पड़ेगा। वैदिक ज्ञान किससे

725
00:52:01,040 --> 00:52:05,280
आया? मां भगवती से आया। वैदिक ज्ञान वेद का

726
00:52:05,280 --> 00:52:06,240
तात्पर्य उपनिषद

727
00:52:06,240 --> 00:52:10,320
का तात्पर्य बहुत सारे वचन है

728
00:52:10,320 --> 00:52:14,560
निरुक्त का एक छ पांच मुंडकोपनिषद एक एक से

729
00:52:14,560 --> 00:52:17,280
चार

730
00:52:17,280 --> 00:52:21,440
एक दो 12 शतपद ब्राह्मण 11 पांच छ

731
00:52:21,440 --> 00:52:25,680
श्रीमद् भगवत गीता तीन 16 चार दो छंदो

732
00:52:25,680 --> 00:52:30,320
उपनिषद छ 14 दो और

733
00:52:30,320 --> 00:52:34,480
चार नौ तीन यही नहीं भागवतानंद द्वारा निग्रह

734
00:52:34,480 --> 00:52:39,040
संप्रदाय की प्रामाणिकता के को सिद्ध करने हेतु बताए गए शक्ति

735
00:52:39,040 --> 00:52:43,760
संगम तंत्र शास्त्र में भी परंपरा के ज्ञान को प्रामाणिकता

736
00:52:43,760 --> 00:52:47,920
दी गई है। उसी ज्ञान को प्राथमिकता देते हुए

737
00:52:47,920 --> 00:52:52,560
मुख्य परंपरा के रूप में शंकर परंपरा को बताया गया है।

738
00:52:52,560 --> 00:52:57,440
शंकराचार्य परंपरा का विस्तृत वर्णन दिया गया है।

739
00:52:57,440 --> 00:53:01,760
तो निग्रह संप्रदाय के पास स्वतंत्र रूप से श्रुति

740
00:53:01,760 --> 00:53:05,840
शास्त्रों का परंपरागत ज्ञान नहीं है। ऐसे में निग्रह

741
00:53:05,840 --> 00:53:09,840
संप्रदाय के सिद्धांत को श्रुति समुति का समर्थन प्रदान करने

742
00:53:09,840 --> 00:53:13,920
हेतु किसी ना किसी परंपरा द्वारा प्राप्त वेदार्थ के

743
00:53:13,920 --> 00:53:18,320
आलंबन से निग्रह संप्रदाय के सिद्धांत की सुति सम्मतता

744
00:53:18,320 --> 00:53:21,440
को सत्यापित किया जाना किया जाएगा

745
00:53:21,440 --> 00:53:25,520
करना पड़ेगा तो किसी भी अंश में शंकर

746
00:53:25,520 --> 00:53:29,840
परंपरा द्वारा दिए जाने वाले सिद्धांतों का अगर किया

747
00:53:29,840 --> 00:53:33,920
जाएगा तो कम से कम जिस पर आप निर्भर है वेदार्थ के लिए

748
00:53:33,920 --> 00:53:38,400
वेद भाष्य के लिए उपनिषद भाष्य के लिए तो

749
00:53:38,400 --> 00:53:42,480
किसी भी अंश में शंकर परंपरा

750
00:53:42,480 --> 00:53:46,480
द्वारा दिए जाने वाले सिद्धांतों का विरोध तर्क संगत सिद्ध नहीं होगा। यदि

751
00:53:46,480 --> 00:53:52,480
जिससे आप वेद का अर्थ ले रहे हो उसके किसी और सिद्धांत को आप खंडन नहीं कर सकते।

752
00:53:52,640 --> 00:53:58,000
मगर आपने तो किया है। आपने तो किया है ना।

753
00:53:58,000 --> 00:54:02,000
क्योंकि यदि किसी के द्वारा प्राप्त होने वाले वेद अथवा वेदार्थ पर

754
00:54:02,000 --> 00:54:06,000
आपको विश्वास है तो उसी के द्वारा प्रदान किए जाने वाले अन्य किसी भी सिद्धांत

755
00:54:06,000 --> 00:54:10,080
पर आपका विश्वास होना सिद्ध नहीं होता है। और

756
00:54:10,080 --> 00:54:12,880
यदि

757
00:54:12,880 --> 00:54:17,200
किसी आचार अथवा परंपरा अगर परंपरा पर परंपरा

758
00:54:17,200 --> 00:54:22,640
के किसी एक अंश पर भी आपको विश्वास नहीं है।

759
00:54:22,640 --> 00:54:26,720
हम आपके द्वारा कहा जाता है कि शास्त्रों का गलत अर्थ

760
00:54:26,720 --> 00:54:30,800
प्रदान कर रहे हैं तो वह आपको गलत वेद मंत्र अथवा उनकी गलत व्याख्या भी

761
00:54:30,800 --> 00:54:35,120
दे सकते हैं। वही आर्य समाजी हो गए ना तुम भी जहां

762
00:54:35,120 --> 00:54:39,120
से वेद मिले उसका अर्थ मिला वेद मानेंगे मंत्र मानेंगे उसका अर्थ नहीं

763
00:54:39,120 --> 00:54:43,520
मानेंगे फस जाओगे ना भू हम

764
00:54:43,520 --> 00:54:47,360
फिर क्या है आगे

765
00:54:47,360 --> 00:54:51,520
यदि इस तथ्य पर ध्यान नहीं दिया जाएगा तो हमारे ही द्वारा आर्य

766
00:54:51,520 --> 00:54:55,600
समाज रामपाल से लेकर डॉक्टर जाकिर नायक जैसे सभी सनातन

767
00:54:55,600 --> 00:54:59,200
धर्म के आचार्य

768
00:54:59,200 --> 00:55:03,280
सनातन धर्म के आचार्य होने का डंका का पीटेंगे

769
00:55:03,280 --> 00:55:07,600
अगर हम अरे भाई परंपरा की आवश्यकता क्या है?

770
00:55:07,600 --> 00:55:11,920
अगर परंपरा की बातों को शब्द प्रमाण के रूप में नहीं लेना है तो

771
00:55:11,920 --> 00:55:15,600
क्या आवश्यकता है परंपरा की?

772
00:55:15,600 --> 00:55:18,640
प्रमाण है परंपरा

773
00:55:18,640 --> 00:55:22,640
और तुमने खेल बना दिया है। और अगर तुम्हारी तरह अगर मान ले तो

774
00:55:22,640 --> 00:55:28,640
फिर सबको छूट मिल जाएगी। आर्य समाज भी कहेगा मेरा भी वेद भाष्य मान लो।

775
00:55:28,640 --> 00:55:32,800
मैंने भी समाधिष्ट होकर के वह प्राप्त किया है वेद का ज्ञान परम सीधे

776
00:55:32,800 --> 00:55:35,920
परमेश्वर से

777
00:55:35,920 --> 00:55:40,480
वो भी कहेगा जिब्राइल आ गया था वो जाकिर नायक

778
00:55:40,480 --> 00:55:46,480
लो डायरेक्ट आ गया मेरे पास परी आ गई मेरे पास

779
00:55:48,400 --> 00:55:52,720
हम फिर आगे क्या है यदि भागवतानंद

780
00:55:52,720 --> 00:55:56,960
द्वारा किया दिया जाने वाला ज्ञान निग्रह संप्रदाय का

781
00:55:56,960 --> 00:56:00,960
ही माना जाए तो बुद्ध अवतार एवं शबरी प्रकरण में भागवतानंद द्वारा

782
00:56:00,960 --> 00:56:05,280
दिए गए निर्णय का सांकर संप्रदाय के विरुद्ध होने के कारण भागवतानंद

783
00:56:05,280 --> 00:56:09,680
की सांकर संप्रदाय में प्रमाण्य बुद्धि होना सिद्ध नहीं होता। अतः

784
00:56:09,680 --> 00:56:13,920
स्वतंत्र रूप से परंपरागत वैदिक ज्ञान प्राप्त ना होने एवं वैदिक

785
00:56:13,920 --> 00:56:18,320
ज्ञान के लिए जिस पर आश्रित है उस पर प्रमाण बुद्धि ना रखने की स्थिति में

786
00:56:18,320 --> 00:56:22,720
निग्रह संप्रदाय द्वारा शंकर संप्रदाय से प्राप्त वेद अथवा वेदार्थ

787
00:56:22,720 --> 00:56:26,800
पर विश्वास होना सिद्ध नहीं होता है। ऐसे में निग्रह संप्रदाय को अवैदिक

788
00:56:26,800 --> 00:56:30,960
क्यों ना माना जाए क्योंकि भागवतानंद ने कहा

789
00:56:30,960 --> 00:56:36,720
है।

790
00:56:36,720 --> 00:56:40,720
यदि यह कहा जाए कि भागवतानंद को शंकर परंपरा का प्रामाणिक ज्ञान

791
00:56:40,720 --> 00:56:45,280
उसकी सर्वोच्च पीठ पर विराजमान आचार्य अथवा जगतगुरु

792
00:56:45,280 --> 00:56:49,520
शंकराचार्य से भी अधिक है। जिनके निर्णय के विरोध में भागवतानंद

793
00:56:49,520 --> 00:56:53,840
ने बुद्ध अवतार और शबरी प्रकरण में अपना निर्णय दे दिया है।

794
00:56:53,840 --> 00:56:58,080
तब यह कितनी हास्यप्रद बात होगी भाई। उस

795
00:56:58,080 --> 00:57:02,160
संप्रदाय में क्या हुआ है? क्या कहा गया है? क्या नहीं कहा गया है?

796
00:57:02,160 --> 00:57:06,240
उस संप्रदाय का प्रामाणिक और वो भी जगतगुरु शंकराचार्य की गद्दी पर

797
00:57:06,240 --> 00:57:10,240
बैठने वाला बताएगा तुम होते कौन हो बताने वाले

798
00:57:10,240 --> 00:57:14,400
कि पूर्वाचार्य ने क्या कहा था क्या नहीं कहा था प्रश्न कर सकते हो

799
00:57:14,400 --> 00:57:18,300
बस समझ में आया तो ठीक है

800
00:57:18,300 --> 00:57:22,080
[संगीत]

801
00:57:22,080 --> 00:57:26,240
संशय कर सकते हो संशय उत्पन्न हो सकता है पूछ लो मगर पूछेंगे

802
00:57:26,240 --> 00:57:30,560
नहीं उसको आरोप के रूप में खंडन किया है शक्ल देखी

803
00:57:30,560 --> 00:57:33,360
अपनी

804
00:57:33,360 --> 00:57:37,440
खींचे ने पुरवा लो बस खंडन करेंगे कृपात्री

805
00:57:37,440 --> 00:57:43,400
जी महाराज का

806
00:57:43,400 --> 00:57:47,680
[संगीत] फिर क्या फायदा क्या

807
00:57:47,680 --> 00:57:51,680
लाभ है परंपरा का मैं पूछता हूं जब उस परंपरा के प्रामाणिक

808
00:57:51,680 --> 00:57:55,760
आचार्य कह रहे हैं कि हमारे पूर्वाचार्यों से हमें यह ज्ञान प्राप्त हुआ है। मगर एक

809
00:57:55,760 --> 00:57:57,920
निठल्ला

810
00:57:57,920 --> 00:58:03,120
दूसरा व्यक्ति बाहर से आकर के बता रहा है। नहीं नहीं पूर्वाचार्य ने तो ये कहा था

811
00:58:03,120 --> 00:58:07,030
तुम होते कौन हो

812
00:58:07,030 --> 00:58:09,840
[संगीत]

813
00:58:09,840 --> 00:58:14,160
और और यदि तुम हो ही आर्य समाजी रामपाली जाकिर

814
00:58:14,160 --> 00:58:19,440
नायक तो ये परंपरा का ढिंढोरा पीटना बंद करो

815
00:58:19,440 --> 00:58:23,600
परंपरा को मानने वाला होना भी है। यदि हर कोई एरा गैरा न्थू

816
00:58:23,600 --> 00:58:27,840
गहरा आ के किसी परंपरा के क्या सिद्धांत है? क्या उसकी मान्यता है?

817
00:58:27,840 --> 00:58:32,000
यदि कोई भी सड़क पर चलता हुआ आकर के विवेचना कर दे उस परंपरा

818
00:58:32,000 --> 00:58:36,080
के प्रामाणिक आचार्यों के विरुद्ध और उसको मान लिया जाए तो फिर परंपरा

819
00:58:36,080 --> 00:58:42,080
शब्द की आवश्यकता क्या है? ये बता तू मुझे

820
00:58:43,210 --> 00:58:49,210
[संगीत]

821
00:58:50,720 --> 00:58:54,880
परंतु उस स्थिति में भी यदि ये जब ये कहता है कि

822
00:58:54,880 --> 00:58:59,120
भागवतानंद को बुद्ध और शबरी के विषय में जगदगुरु शंकराचार्य

823
00:58:59,120 --> 00:59:03,200
जो उसके प्रामाणिक आचार्य होते हैं उनसे भी ज्यादा ज्ञान है।

824
00:59:03,200 --> 00:59:07,280
है ना? तो उस स्थिति में भी यह तो मानना ही होगा कि भागवतानंद ने

825
00:59:07,280 --> 00:59:11,360
शंकर परंपरा का प्रामाणिक रूप से अध्ययन किया है। तभी तो वह कह रहा है कि नहीं नहीं इनके

826
00:59:11,360 --> 00:59:15,440
पूर्व ने यह कहा वो कहा। इसने समझ लिया अच्छे से आकर के तो

827
00:59:15,440 --> 00:59:19,600
प्रामाणिक अध्ययन कहां से किया है? शंकर परंपरा से।

828
00:59:19,600 --> 00:59:23,760
है ना? ऐसे में भागवतानंद को शंकर परंपरा का शिष्य क्यों

829
00:59:23,760 --> 00:59:28,720
ना माना जाए? क्योंकि भागवतानंद ने कहा है हम

830
00:59:28,720 --> 00:59:33,200
यदि बुद्ध और शबरी के विषय में अन्य वैष्णव परंपराओं में से किसी का आलंबन

831
00:59:33,200 --> 00:59:37,200
लिया जाएगा अगर वो यह कहे कि नहीं फलाना वैष्णव संप्रदाय है वो तो यह मानता

832
00:59:37,200 --> 00:59:41,360
है वो तो देखो मेरे से मैच खाता है तो इसको उसका शिष्य मानना

833
00:59:41,360 --> 00:59:43,600
पड़ेगा

834
00:59:43,600 --> 00:59:47,600
तो ऐसे में अमुक संप्रदाय का निर्णय स्वीकार करने की स्थिति में भागवतानंद

835
00:59:47,600 --> 00:59:51,600
द्वारा उस परंपरा में प्रमाण्य बुद्धि रखते हुए उसके सभी सिद्धांतों

836
00:59:51,600 --> 00:59:57,520
को स्वीकार करना पड़ेगा करेगा करेगा

837
00:59:57,520 --> 01:00:03,520
ठेंगा करेगा तू

838
01:00:04,400 --> 01:00:08,560
तथा उन सभी सिद्धांतों का त्याग भी करना आवश्यक हो जाएगा

839
01:00:08,560 --> 01:00:12,640
जो एक अंश में भी उस अमुक परंपरा के विरोध में होंगे जिस परंपरा

840
01:00:12,640 --> 01:00:16,800
द्वारा बुद्ध और शबरी प्रकरण के निर्णय में समर्थन लेकर उस अमुक परंपरा में

841
01:00:16,800 --> 01:00:21,200
भागवतानंद की प्रमाण बुद्धि स्थापित मानी गई है।

842
01:00:21,200 --> 01:00:25,200
उस स्थिति में भी भागवतानंद को स्वतंत्र रूप से आचार्य ना मानकर उस

843
01:00:25,200 --> 01:00:29,200
अमुक परंपरा जिससे आपने बुद्ध और शबरी का समर्थन प्राप्त किया है

844
01:00:29,200 --> 01:00:33,280
उसका शिष्य क्यों ना माना जाए। क्योंकि भागवतानंद

845
01:00:33,280 --> 01:00:37,440
ने कहा है। अच्छा एक बात हम पूर्व

846
01:00:37,440 --> 01:00:41,520
में ही कह आए हैं कि शक्ति संगम तंत्र शास्त्र में वर्णित

847
01:00:41,520 --> 01:00:45,760
निग्रह आगम के वैदिक होने पर भी संदेह है। कोई स्पष्ट

848
01:00:45,760 --> 01:00:50,320
है ही नहीं। केवल शब्द है निग्रह आगम क्योंकि

849
01:00:50,320 --> 01:00:54,800
अनेकानेक अवैदिक आगमों के बीच

850
01:00:54,800 --> 01:00:59,120
वर्णित भी है। यहां से भी एक और वो आता है भाई जहां चीन आगम

851
01:00:59,120 --> 01:01:03,120
लिखा है बौद्ध आगम लिखा है वही आसपास निग्रह आगम भी लिखा है। वो ये

852
01:01:03,120 --> 01:01:07,120
कह रहा है कि कई ऐसे अवैदिक है जिनका यहां नाम उल्लेख किया जा रहा है।

853
01:01:07,120 --> 01:01:11,200
तो निग्रह आगम को केवल शक्ति संगम तंत्र के आधार

854
01:01:11,200 --> 01:01:12,560
पर कैसे मान ले वो वैदिक

855
01:01:12,560 --> 01:01:14,880
है?

856
01:01:14,880 --> 01:01:18,880
क्योंकि भागवतानंद ने कहा है तो निग्रह आगम

857
01:01:18,880 --> 01:01:22,880
का वैदिक होने के समर्थन में कोई ठोस प्रमाण प्राप्त नहीं होता। ऐसे

858
01:01:22,880 --> 01:01:26,960
में निग्रह संप्रदाय के जो कार्य भागवतानंद ने बताए हैं वही कार्य निग्रह

859
01:01:26,960 --> 01:01:31,200
संप्रदाय के हैं। यह किस आधार पर माना जाए? क्योंकि भागवतानंद

860
01:01:31,200 --> 01:01:35,280
ने कहा है भागवतानंद के अनुसार सभी संप्रदायों में

861
01:01:35,280 --> 01:01:39,280
किस किसी भी प्रकार से आने वाली विकृति को नष्ट करने

862
01:01:39,280 --> 01:01:43,680
हेतु उस अमुक संप्रदाय का निग्रह करना भी निग्रह संप्रदाय

863
01:01:43,680 --> 01:01:47,840
के तीन प्रमुख कार्यों में से एक कार्य है। यहां

864
01:01:47,840 --> 01:01:52,960
ज्ञातव्य है कि सभी संप्रदायों का भिन्न-भिन्न तात्विक सिद्धांत है।

865
01:01:52,960 --> 01:01:57,200
अतः सभी संप्रदायों में उनके यहां का तात्विक सिद्धांत अक्षरश

866
01:01:57,200 --> 01:02:01,600
प्रसारित किया जा रहा है या नहीं इस विषय में निर्णय लेने हेतु

867
01:02:01,600 --> 01:02:05,840
निग्रह करने वाले को सभी संप्रदायों का तात्विक

868
01:02:05,840 --> 01:02:10,480
सिद्धांत प्रामाणिक रूप से ज्ञात होना आवश्यक है ज्ञात होगा

869
01:02:10,480 --> 01:02:14,880
ये भागवतानंद को तो सब कुछ ज्ञात होगा बिल्कुल तरीके से विशिष्टा

870
01:02:14,880 --> 01:02:18,880
द्वैत द्वैत सुद्धा द्वैत सब उनके यहां का सब पढ़ लिया होगा कहीं कोई गुरु गलत तो

871
01:02:18,880 --> 01:02:23,040
नहीं बोल रहा सब पढ़ लिया होगा भैया कोई गुरु गुरु अपने

872
01:02:23,040 --> 01:02:27,040
शिक्षाओं में बदलाव तो नहीं कर रहा ब्रिटिशर्स से प्रभाव में आकर के तो निग्रह करना

873
01:02:27,040 --> 01:02:27,600
है ना तुझे

874
01:02:27,600 --> 01:02:31,840
तो तो तूने पढ़ लिया होगा कि वल्लभाचार्य कब किससे मिले कब नहीं मिले उनकी

875
01:02:31,840 --> 01:02:37,840
सारी वस्तुनिष्ठता से तेरे पास जानकारी होगी है ना

876
01:02:38,640 --> 01:02:42,720
तो क्या है कि पहली बात तो ऐसा बहुत दुर्गम

877
01:02:42,720 --> 01:02:48,720
है

878
01:02:49,200 --> 01:02:53,520
परंतु सभी संप्रदाय का प्रमाणिक ज्ञान

879
01:02:53,520 --> 01:02:57,600
ना होने की स्थिति में किस व्यक्ति विशेष को सभी संप्रदाय का निग्रह करने वाले

880
01:02:57,600 --> 01:03:01,840
के रूप में किस आधार पर स्वीकार किया जाएगा? यदि तुमको

881
01:03:01,840 --> 01:03:06,000
सभी संप्रदायों का प्रामाणिक ज्ञान है ही नहीं। उनके अंदर की बहुत सी छोटी बड़ी

882
01:03:06,000 --> 01:03:10,080
ऐसी बातें हैं जो आपको पता ही नहीं है। वल्लभ संप्रदाय

883
01:03:10,080 --> 01:03:14,160
की नबाग संप्रदाय की बहुत सी छोटी बड़ी ऐसी कहानियां होंगी जो

884
01:03:14,160 --> 01:03:18,160
आपको नहीं पता है। तो फिर किस आधार पर तुमको उस पर निग्रह करने वाला मान लिया

885
01:03:18,160 --> 01:03:22,560
जाए। इसीलिए जगतगुरु शंकराचार्य ने कहा था

886
01:03:22,560 --> 01:03:26,640
निग्रचार भगवान हो सकते हैं केवल भगवान और

887
01:03:26,640 --> 01:03:31,120
तुम बनने चले भगवान हम

888
01:03:31,120 --> 01:03:35,200
गॉड मैन

889
01:03:35,200 --> 01:03:37,440
तो

890
01:03:37,440 --> 01:03:41,760
अच्छा यद्यपि ये चीज संभव नहीं है कि सभी संप्रदायों का बिल्कुल

891
01:03:41,760 --> 01:03:46,080
एक एक बाल बराबर आपको ज्ञान हो जाए परंतु फिर भी सभी

892
01:03:46,080 --> 01:03:50,160
संप्रदायों का ज्ञान प्रामाणिक रूप से होने की स्थिति में भी

893
01:03:50,160 --> 01:03:54,640
निग्रह करने वाले की प्रामाणिकता पर प्रश्न चिन्ह लगा ही रहेगा।

894
01:03:54,640 --> 01:03:58,800
क्योंकि सभी संप्रदायों की तात्विक विवेचना दूसरे संप्रदाय

895
01:03:58,800 --> 01:04:03,040
की तात्विक विवेचना से भिन्न है। अथवा यदि यह भी मान लिया

896
01:04:03,040 --> 01:04:07,280
जाए कि क्योंकि अद्वैत में सभी सिद्धांतों का लय हो जाता है।

897
01:04:07,280 --> 01:04:11,760
इसलिए सिद्धांतों को प्रमाणिक मानते हुए

898
01:04:11,760 --> 01:04:16,240
सभी सिद्धांतों को प्रमाणिक मानते हुए उनका पर्यावसान अद्वैत में मानना चाहिए।

899
01:04:16,240 --> 01:04:20,560
ऐसे में यह जानना आवश्यक होगा कि क्या

900
01:04:20,560 --> 01:04:24,560
सभी संप्रदाय अपने सिद्धांत का पर्यावसान अद्वैत में मानते हैं या

901
01:04:24,560 --> 01:04:28,560
नहीं। यदि नहीं मानते और ना मानते हुए

902
01:04:28,560 --> 01:04:32,560
बल्कि खंडन कर देते हैं। अद्वैत है ही नहीं। यदि नहीं

903
01:04:32,560 --> 01:04:36,640
मानते तो उन्हें प्रमाणिक कहने के कारण क्योंकि तुम निग्रह करने

904
01:04:36,640 --> 01:04:40,960
वाले हो। यह ध्यान रखना। निग्रह करने वाले हो ना तुम

905
01:04:40,960 --> 01:04:45,200
तो तात्विक विवेचना को प्रमाणिक कहना पड़ेगा ना। नहीं तो उसकी

906
01:04:45,200 --> 01:04:51,200
विवेचना का खंडन करोगे तो

907
01:04:52,880 --> 01:04:56,880
उन्हें प्रमाणिक कहने वाले कहने के कारण उनके ही

908
01:04:56,880 --> 01:05:00,880
अनुसार अद्वैत में सबका परवसान बताने वाला स्वयं अप्रामाणिक सिद्ध

909
01:05:00,880 --> 01:05:05,200
हो जाएगा। अतः यद्यपि संभव है कि फिर भी लोकाचार की दृष्टि

910
01:05:05,200 --> 01:05:09,680
से शास्त्रों की सीमा के बाहर आपसी सामंजस्य के निमित्त

911
01:05:09,680 --> 01:05:13,680
किसी पद द्वारा सभी संप्रदायों का निग्रह करने के बारे

912
01:05:13,680 --> 01:05:17,840
में सोचा भी जा सकता है। परंतु सभी संप्रदायों

913
01:05:17,840 --> 01:05:21,920
में अंश मात्र भी भेद होने की स्थिति में एक ही आचार्य पद

914
01:05:21,920 --> 01:05:26,160
द्वारा सभी संप्रदायों का निग्रह किए जाने के

915
01:05:26,160 --> 01:05:30,240
जाने को शास्त्रीय समर्थन होने की बात को कपोल कल्पना

916
01:05:30,240 --> 01:05:33,120
क्यों ना कहा जाए।

917
01:05:33,120 --> 01:05:37,280
एक व्यक्ति जो इनमें से किसी परंपरा का नहीं

918
01:05:37,280 --> 01:05:41,280
है। वो यह कह रहा है कि तुम्हारे यहां का सिद्धांत क्या है? क्या नहीं है?

919
01:05:41,280 --> 01:05:44,480
यह मैं तय करूंगा।

920
01:05:44,480 --> 01:05:48,480
वहां के प्रामाणिक आचार्य नहीं एक व्यक्ति

921
01:05:48,480 --> 01:05:54,240
और वह किसको मानने वाला है? अद्वैत को मानने वाला। [संगीत]

922
01:05:54,240 --> 01:05:58,240
तो इसको ये शास्त्र सम्मत अथवा अमुक अमुक संप्रदाय सम्मत

923
01:05:58,240 --> 01:06:02,240
जो अधिकार है वो प्राप्त हुआ कि नहीं हुआ? अगर वो नहीं

924
01:06:02,240 --> 01:06:06,560
दे रहे हैं तो उनसे लड़ना होगा। लड़ रहे हो क्या? क्या

925
01:06:06,560 --> 01:06:08,080
वो दे रहे हैं तुम्हें निग्राचार्य

926
01:06:08,080 --> 01:06:12,560
का पद? हम पर निग्रह करने वाला है निग्रचार्य।

927
01:06:12,560 --> 01:06:16,960
तो इसको कपोल कल्पना क्यों ना माना जाए क्योंकि भागवतानंद

928
01:06:16,960 --> 01:06:21,120
ने कहा है क्या भागवतानंद के अनुसार श्री संप्रदाय

929
01:06:21,120 --> 01:06:25,440
मद संप्रदाय नार्क संप्रदाय इत्यादि सभी मान्य संप्रदायों

930
01:06:25,440 --> 01:06:29,680
ने अव्यक्ता द्वैत के रूप में ब्रह्म की व्याख्या अथवा पंच

931
01:06:29,680 --> 01:06:34,240
देवोपासना के रूप में ब्रह्मा विष्णु महेश भगवती गणेश के एकत्व

932
01:06:34,240 --> 01:06:38,800
रूपी स्तुति सम्मत सिद्धांत अर्थात निग्रह संप्रदाय के दार्शनिक

933
01:06:38,800 --> 01:06:43,280
पक्ष और दैय पक्ष को स्वीकार कर लिया अथवा नहीं

934
01:06:43,280 --> 01:06:47,440
नहीं किया है। यदि नहीं किया है तो निग्रह संप्रदाय द्वारा बताए गए

935
01:06:47,440 --> 01:06:51,600
श्रुति के अर्थ को वैदिक तात्पर्य श्रुति के अर्थ को वैदिक तात्पर्य

936
01:06:51,600 --> 01:06:55,680
को स्वीकार ना करने वालों का निग्रह ना करने की

937
01:06:55,680 --> 01:06:59,760
स्थिति में भागवतानंद को उसके द्वारा बताए गए निग्रह

938
01:06:59,760 --> 01:07:03,920
संप्रदाय के स्वरूप के अनुसार निग्रहचार निग्रह

939
01:07:03,920 --> 01:07:08,160
संप्रदाय का प्रामाणिक आचार्य क्यों माना जाए? क्योंकि

940
01:07:08,160 --> 01:07:12,640
भागवतानंद ने कहा है भागवतानंद के अनुसार निग्रह

941
01:07:12,640 --> 01:07:17,200
संप्रदाय का कार्य अन्य सभी संप्रदायों पर निग्रह करना है।

942
01:07:17,200 --> 01:07:21,280
जिसके अंतर्गत निग्रचार्य पद पर बैठे होने के कारण भागवतानंद

943
01:07:21,280 --> 01:07:24,640
को

944
01:07:24,640 --> 01:07:28,640
सभी संप्रदायों का निग्रह करने हेतु भगवती द्वारा नियुक्त किया गया

945
01:07:28,640 --> 01:07:33,120
है। क्या भाग भागवतानंद द्वारा स्वीकार्य अन्य सभी प्रामाणिक

946
01:07:33,120 --> 01:07:37,120
श्रीमद् इत्यादि संप्रदायों ने भागवतानंद द्वारा

947
01:07:37,120 --> 01:07:41,680
उनके संप्रदाय का निग्रह किए जाने की प्रति अधीनता

948
01:07:41,680 --> 01:07:45,920
को स्वीकार कर लिया जो बात अभी मैंने पिछले उदाहरण के लिए ली है।

949
01:07:45,920 --> 01:07:50,000
कर लिया है। क्या राघवाचार्य जी महाराज मानते हैं कि आप हमारा निग्रह

950
01:07:50,000 --> 01:07:54,080
करेंगे। हम जो धर्म ब्रह्म की व्याख्या बता रहे

951
01:07:54,080 --> 01:07:58,320
होंगे उसमें यदि तुम आते हो हमसे विपरीत होगे तो हम तुम्हारी मान लेंगे।

952
01:07:58,320 --> 01:08:02,800
यह मानते हैं राघवाचार्य जी

953
01:08:02,800 --> 01:08:08,800
कर ली तुम्हारी अधीनता स्वीकार मध संप्रदाय ने

954
01:08:09,040 --> 01:08:11,390
यूवाचार्य

955
01:08:11,390 --> 01:08:16,160
[संगीत]

956
01:08:16,160 --> 01:08:20,400
तो अधीनता को स्वीकार कर लिया है यदि नहीं तो

957
01:08:20,400 --> 01:08:24,480
ऐसे में स्वयं को वैदिक कहने वाले निग्रह संप्रदाय द्वारा किए जाने

958
01:08:24,480 --> 01:08:28,800
वाले निग्रह को स्वीकार ना करते हुए अवैदिक सिद्ध होने वाले संप्र संप्रदायों का निग्रह

959
01:08:28,800 --> 01:08:33,200
करने की स्थिति में भी निग्रह ना करने की स्थिति में भी

960
01:08:33,200 --> 01:08:37,200
भागवतानंद को निग्रह संप्रदाय का प्रामाणिक आचार्य कैसे माना जाए? उसके द्वारा

961
01:08:37,200 --> 01:08:41,280
जो कार्य बताया गया वही वो नहीं कर रहा है तो वो आचार्य कैसे हुआ? उसके

962
01:08:41,280 --> 01:08:45,520
द्वारा कहा गया है ना कि मैं सबका निग्रह करूंगा क्योंकि

963
01:08:45,520 --> 01:08:49,840
मैं निग्रह आचार्य हूं। और उसके अनुसार वेद

964
01:08:49,840 --> 01:08:53,840
का तात्पर्य अद्वैत ये दोनों चीजें सभी संप्रदायों ने मान ली है

965
01:08:53,840 --> 01:08:57,840
क्या? नहीं मानी है और नहीं मानी है तो

966
01:08:57,840 --> 01:09:02,080
वह शास्त्रार्थ करें। शास्त्रार्थ नहीं हो रहा है तो फिर वह शस्त्र

967
01:09:02,080 --> 01:09:06,320
का युद्ध करें और अगर नहीं कर रहा है तो ऐसे में निग्रचार

968
01:09:06,320 --> 01:09:10,480
को और अगर नहीं कर रहा है तो ऐसे में भागवतानंद

969
01:09:10,480 --> 01:09:16,480
को निग्राचार्य क्यों माना जाए क्योंकि भागवतानंद ने कहा है

970
01:09:18,320 --> 01:09:22,480
किसी मनुष्य द्वारा धारण किए जाने वाले पद के रूप में निग्रचार नामक

971
01:09:22,480 --> 01:09:26,800
कोई उपाधि अथवा आचार्य पीठ सनातन शास्त्रों में नहीं दी गई है।

972
01:09:26,800 --> 01:09:31,760
इस बात की पुष्टि सनातन धर्म के सर्वमान्य सर्वोच्च सुन ले सर्वमान्य

973
01:09:31,760 --> 01:09:36,400
सर्वोच्च सार्वभौम विशेषण लगाने पड़ेंगे।

974
01:09:36,400 --> 01:09:41,120
जब जब तुम्हारे जैसी गंदगी समाज में व्याप्त होने लगी तबतब

975
01:09:41,120 --> 01:09:45,760
जब जब देसी घी के नाम पर घी के नाम पर डालडा

976
01:09:45,760 --> 01:09:50,000
आलू से बनने वाले वनस्पति घी को बेचा जाने लगेगा तबतब विशेषण

977
01:09:50,000 --> 01:09:55,680
लगाने पड़ेंगे शुद्ध देसी घी समझे

978
01:09:55,680 --> 01:09:59,680
केवल धर्म ही पर्याप्त शब्द है धारण

979
01:09:59,680 --> 01:10:04,000
करने वाले के रूप में मगर विशेषण लगाने पड़ते हैं सनातन

980
01:10:04,000 --> 01:10:07,160
वैदिक आर्य हिंदू

981
01:10:07,160 --> 01:10:13,160
[संगीत] मूर्ख

982
01:10:13,680 --> 01:10:17,680
तो क्या है जगतगुरु शंकराचार्य जी ने

983
01:10:17,680 --> 01:10:21,760
और न्यायालय के दृष्टिकोण से ये बात लिखी हुई है इसमें

984
01:10:21,760 --> 01:10:25,840
जिनका परामर्श सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मांगा जाता है

985
01:10:25,840 --> 01:10:30,960
तट पूंजियों का नहीं आई रिपीट तट पुंजियों का नहीं

986
01:10:30,960 --> 01:10:36,960
समझे निगचार्य निगचार्य

987
01:10:39,760 --> 01:10:43,840
तो शंकर परंपरा के 145 वे

988
01:10:43,840 --> 01:10:48,560
श्रीमद जगुरु शंकराचार्य पूरी पीठाधीश्वर

989
01:10:48,560 --> 01:10:52,880
जिनका परामर्श सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भी मांगा जाता है।

990
01:10:52,880 --> 01:10:56,880
उन्होंने पुष्टि की है। निग्राचार्य नामक कोई उपाधि नहीं है।

991
01:10:56,880 --> 01:11:00,880
शास्त्रों में मनुष्य द्वारा धारण किए जाने योग्य। केवल भगवान

992
01:11:00,880 --> 01:11:04,880
अवतरित हो सकते हैं। ब्रह्म अवतरित हो सकते हैं।

993
01:11:04,880 --> 01:11:10,880
और अगर तू कल को यह कहने लगे कि मैं ब्रह्म हूं तो बहुत

994
01:11:10,880 --> 01:11:14,960
पोस्टमार्टम किया जाएगा कि क्यों नहीं कर रहा वो

995
01:11:14,960 --> 01:11:19,920
हत्या बंद ब्रह्म है तो तू ईश्वर है तो तू

996
01:11:19,920 --> 01:11:24,000
ऐसे ही करता है ना हंसी उड़ाता है ना 83 वर्ष की आयु

997
01:11:24,000 --> 01:11:28,400
में भारत भ्रमण की यात्रा करने वाले एक वृद्ध सन्यासी की उपास उड़ाता

998
01:11:28,400 --> 01:11:34,400
है

999
01:11:36,560 --> 01:11:40,880
तो सनातन धर्म के ऐसे अंतिम निर्णायक पद पर विराजमान जगुरु शंकराचार्य

1000
01:11:40,880 --> 01:11:45,120
पुरी पीठाधीश्वर जी महाराज ने स्पष्ट कहा है कि निग्रचार केवल

1001
01:11:45,120 --> 01:11:49,280
स्वयं ईश्वर ही हो सकते हैं। अर्थात कोई भी मनुष्य निग्रचार नामक

1002
01:11:49,280 --> 01:11:53,440
उपाधि के योग्य नहीं है। क्यों नहीं है? क्योंकि यदि वह निग्रह जैसे कि तू बता

1003
01:11:53,440 --> 01:11:57,440
रहा है कि निग्रह करेगा पूरे पे तो सब लोगों को तेरा

1004
01:11:57,440 --> 01:12:01,840
निग्रह स्वीकार होना चाहिए। नहीं होने की स्थिति में तुझे उनसे शास्त्रार्थ

1005
01:12:01,840 --> 01:12:06,080
या फिर शस्त्र युद्ध लड़ना पड़ेगा। शास्त्रार्थ तो थोड़ा बहुत तू कर

1006
01:12:06,080 --> 01:12:10,240
लेगा। यद्यपि प्रत्येक परंपरा में तार्किक व्यक्ति विराजमान है।

1007
01:12:10,240 --> 01:12:14,640
मगर जब तक वो सामने नहीं आएगा तब तक तू नौ मन उछल लेगा। चाचा चाचा

1008
01:12:14,640 --> 01:12:20,160
चाचा कर लेगा। मगर शस्त्र युद्ध लड़ेगा तू।

1009
01:12:20,160 --> 01:12:24,160
धातु बचा है तेरे शरीर में 50 किलो के

1010
01:12:24,160 --> 01:12:27,840
व्यक्ति

1011
01:12:27,840 --> 01:12:32,160
युद्ध लड़ेंगे शस्त्र से मिल जा कहीं पे कर ले दो दो हाथ

1012
01:12:32,160 --> 01:12:36,160
कर लेते हैं तेरे भगवती से प्राप्त तपोबल की वो

1013
01:12:36,160 --> 01:12:40,400
पुष्टि कि वो भगवती से प्राप्त है कि वो परी

1014
01:12:40,400 --> 01:12:46,160
साधना से प्राप्त है कर लेते हैं मिल ले कहीं पर

1015
01:12:46,160 --> 01:12:50,320
नहीं मिलेगा भागता फिरेगा YouTube ट्यूबराचार्य बनेगा।

1016
01:12:50,320 --> 01:12:54,560
क्या करेगा? क्या कहता है? मैं आ रहा हूं। इनकी

1017
01:12:54,560 --> 01:12:58,560
पोस्टमार्टम करूंगा। क्या मैं अभी बताता हूं मेरे पास समय नहीं है। अबे

1018
01:12:58,560 --> 01:13:02,880
समय नहीं है तो समय होने पर तू ये करेगा? वीडियो बनाएगा। अबे उतर धरती

1019
01:13:02,880 --> 01:13:05,200
पर।

1020
01:13:05,200 --> 01:13:09,200
जाके पुरुषार्थ कर। हां मैं छाती ठोक

1021
01:13:09,200 --> 01:13:13,440
के कह सकता हूं। मैंने पुरुषार्थ किया है धर्म के लिए। तू कह छाती

1022
01:13:13,440 --> 01:13:17,600
ठोक के। नहीं कहा जाएगा। शर्म

1023
01:13:17,600 --> 01:13:21,600
से आंखें नीची हो जाएंगी। यूबर आचार्य केवल YouTube

1024
01:13:21,600 --> 01:13:25,760
पर बोलने को यह कहते हैं पोस्टमार्टम धर्म रक्षा कर

1025
01:13:25,760 --> 01:13:31,760
पुरुषार्थ।

1026
01:13:32,080 --> 01:13:36,560
और तू तो ये कह रहा है ना कि मेरा कार्य है शस्त्र से युद्ध लड़ना।

1027
01:13:36,560 --> 01:13:41,600
नहीं मानता तेरी व्याख्या को। बता कब कर रहा है शस्त्र से युद्ध?

1028
01:13:41,600 --> 01:13:46,560
लिख के दे दूंगा अपनी। विल बना दूंगा विल।

1029
01:13:46,560 --> 01:13:50,720
भैया मुझे कुछ भी हो जाए इसके साथ मल युद्ध करते

1030
01:13:50,720 --> 01:13:54,960
समय शस्त्र युद्ध करते समय तो इस पर कोई वो

1031
01:13:54,960 --> 01:13:58,960
नहीं आएगा मैं अपनी ओर से ये लिख के दे दूंगा आजा

1032
01:13:58,960 --> 01:14:02,960
कर ले 50 किलो का वजन नहीं है हाड़ मास

1033
01:14:02,960 --> 01:14:07,520
में चले हैं शस्त्र युद्ध करने कपोल कल्पित

1034
01:14:07,520 --> 01:14:12,080
कहानियां अगड़ के जनता को बेवकूफ बनाएंगे

1035
01:14:12,080 --> 01:14:16,160
पटक दूंगा उठाउ उठा के अगर मल्य युद्ध हुआ कभी तो उठा उठा उठा

1036
01:14:16,160 --> 01:14:20,480
के पटकूंगा तान दूंगा तुझको मैं हवा

1037
01:14:20,480 --> 01:14:24,560
में कितनी बार कहा है कि अपना

1038
01:14:24,560 --> 01:14:28,960
वो सांप लेके आजा जो लगा के फिरता है साथ में सर्पदंड

1039
01:14:28,960 --> 01:14:34,080
वो सांप लेके आजा मैं बिना उसके आऊंगा

1040
01:14:34,080 --> 01:14:39,600
बिना हाथ में कुछ धारण किए आऊंगा तू अपना सांप ले आजा

1041
01:14:39,600 --> 01:14:43,380
कर लेना शस्त्र से युद्ध

1042
01:14:43,380 --> 01:14:45,920
[संगीत]

1043
01:14:45,920 --> 01:14:47,440
यदि कभी ऐसा

1044
01:14:47,440 --> 01:14:51,440
ऐसी प्रतियोगिता हुई ना तेरे साथ तो उठा के

1045
01:14:51,440 --> 01:14:55,520
पटक दूंगा तुझे तान के पटक दूंगा।

1046
01:14:55,520 --> 01:15:01,520
क्या है तेरे अंदर? धातु नाम की मात्रा है क्या थोड़ी बहुत?

1047
01:15:02,640 --> 01:15:06,640
चले हैं शस्त्र से युद्ध करने। 32 ही देख

1048
01:15:06,640 --> 01:15:10,800
लो इनकी। शस्त्र से युद्ध करेंगे। यह धर्म की रक्षा के

1049
01:15:10,800 --> 01:15:15,600
लिए। YouTube से बाहर कभी निकल ना पाए। पोस्टमार्टम

1050
01:15:15,600 --> 01:15:19,600
करते हैं मान्य आचार्य जनों का। हैं? प्रतिष्ठित लोगों

1051
01:15:19,600 --> 01:15:24,000
का पोस्टमार्टम करते हैं। तूतक करते हैं। गोवर्धन मठ के भावी शंकराचार्य

1052
01:15:24,000 --> 01:15:28,720
के रूप में जिसको प्रोजेक्ट किया जा रहा है ना दिव्य चेतन ब्रह्मचारी का भी नाम इसमें है। अरे लतखोरों

1053
01:15:28,720 --> 01:15:32,720
मैं सतर्क करता हूं तुम लोगों को। ये जो दंभ पाले हो ना कुशासन के गुलाम

1054
01:15:32,720 --> 01:15:36,720
बने हुए हो अन्नदोष के चक्कर में इससे बाहर निकलो। मैं यात्रा पूर्ण होते ही

1055
01:15:36,720 --> 01:15:40,960
तुम लोगों का पोस्टमार्टम करूंगा। यह जो तुम लोग लथोरी दिखा रहे हो धर्म शास्त्रों का प्रवचन

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01:15:40,960 --> 01:15:45,280
कर रहे हो यह सारे ब्रह्म राक्षसों की वृत्ति का मैं पर्दाफाश करूंगा

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01:15:45,280 --> 01:15:49,440
यह करेंगे धर्म रक्षा समय मिलने दो मैं वापस आके वीडियो

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01:15:49,440 --> 01:15:52,480
बनाऊंगा

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01:15:52,480 --> 01:15:57,200
बना वीडियो यही है तेरा पुरुषार्थ

1060
01:15:57,200 --> 01:16:01,440
वरना नहीं मानता तेरे सिद्धांतों को आजा कर ले शस्त्र

1061
01:16:01,440 --> 01:16:07,440
से युद्ध

1062
01:16:10,640 --> 01:16:14,800
तो जब शंकराचार्य जगतगुरु शंकराचार्य जिनका आलंबन

1063
01:16:14,800 --> 01:16:19,120
समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट के द्वारा भी लिया जाता है। जब जगतगुरु शंकराचार्य

1064
01:16:19,120 --> 01:16:23,280
ने कह दिया कि कोई भी मनुष्य निग्रचार पद के योग्य नहीं

1065
01:16:23,280 --> 01:16:27,360
है। निग्रचार ऐसा पद नहीं है जिस पर कोई मनुष्य विराजमान

1066
01:16:27,360 --> 01:16:31,440
हो सके क्योंकि विप्लव हो जाएगा। चीजें आपस में सामंजस्य बैठेगा ही

1067
01:16:31,440 --> 01:16:35,680
नहीं क्योंकि तुमको सभी संप्रदायों का निग्रह करना है।

1068
01:16:35,680 --> 01:16:40,240
है ना कंट्रोल करना है उन्हें नियंत्रण

1069
01:16:40,240 --> 01:16:44,640
तो जब

1070
01:16:44,640 --> 01:16:48,880
ऐसे में यह यह क्यों ना माना जाए कि शास्त्र में बताए गए सभी

1071
01:16:48,880 --> 01:16:53,440
आगमों की आचार परंपरा हो यह आवश्यक नहीं है

1072
01:16:53,440 --> 01:16:57,520
आगम शास्त्रों के बारे में बता दिया गया निग्रह आगम

1073
01:16:57,520 --> 01:17:02,160
जरूरी नहीं कि वहां किसी परंपरा को बताया गया शक्ति संगम तंत्र में

1074
01:17:02,160 --> 01:17:06,160
तो यह क्यों ना माना जाए कि जिस प्रकार

1075
01:17:06,160 --> 01:17:07,600
शास्त्र में बताए गए सभी

1076
01:17:07,600 --> 01:17:12,160
आगमों की आचार परंपरा हो या आवश्यक नहीं उसी प्रकार निग्रह

1077
01:17:12,160 --> 01:17:16,400
आगम की भी कोई आचार परंपरा नहीं है। वो निग्रह आगम मात्र

1078
01:17:16,400 --> 01:17:20,480
हैं। मगर वो कोई अपने आप में संप्रदाय कोई परंपरा इत्यादि नहीं

1079
01:17:20,480 --> 01:17:24,480
है। यह क्यों ना माना जाए? जहां एक और आचार अथवा परंपराओं

1080
01:17:24,480 --> 01:17:28,720
के विषय में बताते समय स्पष्ट रूप से संप्रदाय अथवा परंपरा जैसे

1081
01:17:28,720 --> 01:17:32,800
शब्दों का उपयोग किया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर निग्रह आगम जैसे

1082
01:17:32,800 --> 01:17:36,960
अति महत्वपूर्ण संप्रदाय के लिए परंपरा अथवा संप्रदाय इत्यादि

1083
01:17:36,960 --> 01:17:41,040
शब्दों का कोई उपयोग नहीं किया गया है। ज्ञातव्य है कि निग्रह

1084
01:17:41,040 --> 01:17:45,200
शब्द का उल्लेख स्कंद पुराण सहित कई अन्य शास्त्रों में कई स्थानों

1085
01:17:45,200 --> 01:17:49,360
पर प्राप्त होता है। ऐसे में बिना किसी आधार के कपोल कल्पित

1086
01:17:49,360 --> 01:17:53,520
कहानी करते हुए उन सभी प्रमाण स्थलों का उपयोग भागवतानंद

1087
01:17:53,520 --> 01:17:57,680
द्वारा परिभाषित निग्रह संप्रदाय को प्रामाणिक सिद्ध करने हेतु

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01:17:57,680 --> 01:18:01,680
किया जाना कहां तक उचित है? फिर भले ही वहां पर निग्रह

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01:18:01,680 --> 01:18:06,000
शब्द का प्रयोग किसी दूसरे की प्रसंग में किसी दूसरे प्रसंग

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01:18:06,000 --> 01:18:10,160
में किसी देवता के लिए हो रहा हो। किसी देवी

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01:18:10,160 --> 01:18:13,200
के लिए हो रहा हो।

1092
01:18:13,200 --> 01:18:17,520
परंतु उसको जो है निग्रह शब्द आ गया। बस देखो मैं निग्रह

1093
01:18:17,520 --> 01:18:21,520
निग्रह संप्रदाय बोल रहा हूं ना और देखो निग्रह शब्द उसमें यह सोचना

1094
01:18:21,520 --> 01:18:22,720
भूल ही गए कि शास्त्र

1095
01:18:22,720 --> 01:18:26,880
में निग्रह शब्द का क्या स्वरूप दिया गया है किस बाबत दिया गया है यह सोचना

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01:18:26,880 --> 01:18:30,960
भूल ही गए दुर्जनोष न्याय से अगर वो संप्रदाय भी है तो तू उससे कनेक्ट

1097
01:18:30,960 --> 01:18:36,960
हो गया ये कैसे मान ले

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01:18:37,040 --> 01:18:41,520
ऐसे में यह क्यों ना माना जाए कि शक्ति संगम तंत्र शास्त्र में बताए गए इन आगमों

1099
01:18:41,520 --> 01:18:46,480
के द्वारा किसी आचार परंपरा अथवा संप्रदाय को संबोधित नहीं किया

1100
01:18:46,480 --> 01:18:50,640
बल्कि आगमों के इन नामों द्वारा केवल अमुक अमुक आगम

1101
01:18:50,640 --> 01:18:54,960
शास्त्रों का संबोधन मात्र किया गया है। जिनकी वैदिकता भी अभी सुनिश्चित

1102
01:18:54,960 --> 01:19:00,000
नहीं है। तो ये क्यों ना माना जाए? क्योंकि

1103
01:19:00,000 --> 01:19:05,790
भागवतानंद ने कहा है। है ना?

1104
01:19:05,790 --> 01:19:09,790
[संगीत]
