1
00:00:08,800 --> 00:00:14,800
तुम

2
00:00:32,160 --> 00:00:36,480
तो सभी को जय श्री राम। जैसा कि पिछले वीडियो में हमने आपको बताया

3
00:00:36,480 --> 00:00:40,640
था कि निग्रह प्रवेशिका तो

4
00:00:40,640 --> 00:00:44,880
भागवतानंद द्वारा नहीं दी गई। वो

5
00:00:44,880 --> 00:00:49,200
करण अर्जुन की तरह मेरे करण अर्जुन आएंगे। आएंगे

6
00:00:49,200 --> 00:00:53,600
आएंगे। मेरे करण अर्जुन आएंगे। मेरे करण

7
00:00:53,600 --> 00:00:57,680
अर्जुन आएंगे। मेरे करण अर्जुन आएंगे। इनका भी वही

8
00:00:57,680 --> 00:01:01,680
चलता रहता है। आएगी आएगी आएगी। है ना? मगर

9
00:01:01,680 --> 00:01:06,400
हमने जरूर निग्रह निकासिका लिख लिख ली है।

10
00:01:06,400 --> 00:01:10,400
और निग्रह निकासिका को लिखने का यह

11
00:01:10,400 --> 00:01:14,880
कहेंगे कि अवसर भी इस व्यक्ति ने ही हमें प्रदान किया है। अवसर

12
00:01:14,880 --> 00:01:19,520
क्या कहेंगे कि कारण हो सकता है हम इस तरह से

13
00:01:19,520 --> 00:01:23,680
क्रमानुसार विधिवत व्यवस्थित रूप से इस बात को ना करते।

14
00:01:23,680 --> 00:01:25,440
मगर

15
00:01:25,440 --> 00:01:29,920
इसके पीछे 100 करोड़ की बात है। 100 करोड़ रुपए

16
00:01:29,920 --> 00:01:34,240
की मांग की गई हमसे। 100 करोड़ रुपए

17
00:01:34,240 --> 00:01:38,800
जो पिछला सारा वो वृतांत हुआ जो घटनाक्रम चले

18
00:01:38,800 --> 00:01:42,800
उसमें इनकी जब वो कुछ

19
00:01:42,800 --> 00:01:47,440
कलई खुलने लगी कहीं-कहीं पर और बहुत सारे इनके ही

20
00:01:47,440 --> 00:01:51,440
निर्देशों के अनुसार प्रश्न कर दिए गए इनसे। भाई यह ताल टोकते थे ना मुझसे

21
00:01:51,440 --> 00:01:55,600
सार्वजनिक रूप से प्रश्न करो। तो सार्वजनिक रूप से प्रश्न करो। तो इनसे किया गया

22
00:01:55,600 --> 00:01:59,600
प्रश्न सार्वजनिक रूप से और जब प्रश्न किया गया सार्वजनिक रूप से तो इनको

23
00:01:59,600 --> 00:02:03,600
बड़ा बुरा लगा कि यह कैसा प्रश्न तुमने कर दिया सार्वजनिक

24
00:02:03,600 --> 00:02:08,000
रूप से तो सार्वजनिक रूप से कोर्ट चले गए

25
00:02:08,000 --> 00:02:12,080
धार्मिक सेक्टर के कैरी मिनाटी

26
00:02:12,080 --> 00:02:15,760
तो

27
00:02:15,760 --> 00:02:20,320
वहां से हमको नोटिस भिजवा दिया। अपना एक वकील है

28
00:02:20,320 --> 00:02:24,400
उसको साथ रख रखा है। लोगों को डराने, प्रभाव

29
00:02:24,400 --> 00:02:28,400
दिखाने अथवा कभी-कभी कुछ ऐसे लोग भी मिलते ही होंगे

30
00:02:28,400 --> 00:02:32,560
जो इसकी अपेक्षा करत और गलत होते होंगे। उनसे

31
00:02:32,560 --> 00:02:36,800
उलझने या उनसे किस प्रकार से

32
00:02:36,800 --> 00:02:40,800
सामना करना है इन सब के बावत एक वकील रख रखा है। कोई बात होती

33
00:02:40,800 --> 00:02:45,760
है तो वह वकील जो है भेज देता है

34
00:02:45,760 --> 00:02:49,920
नोटिस-वोटिस जो भी है। तो हमको भैया ₹100 करोड़ का नोटिस प्राप्त

35
00:02:49,920 --> 00:02:55,200
हुआ इसकी तरफ से। तो 100 करोड़ का नोटिस प्राप्त हुआ।

36
00:02:55,200 --> 00:02:59,520
तो उस नोटिस में इसने

37
00:02:59,520 --> 00:03:03,680
शुरू में ही स्वयं को साक्त संप्रदाय का प्रामाणिक आचार्य

38
00:03:03,680 --> 00:03:08,000
बता दिया इसको भागवतानंद को।

39
00:03:08,000 --> 00:03:12,480
तो जब हमें नोटिस मिला सामने वाला जो व्यक्ति है जो बात

40
00:03:12,480 --> 00:03:16,640
पे बात बातबात पर जनेऊ की शपथ लेता फिरता है कि मैं इस बात पर भी जनेऊ हाथ में

41
00:03:16,640 --> 00:03:20,880
ले सकता हूं। मैं इस बात पर भी गंगा माता में उतर सकता हूं। मैं इस बात पर भी जनेऊ हाथ में ले सकता हूं।

42
00:03:20,880 --> 00:03:24,000
ये देखो मेरा यज्ञपवेत

43
00:03:24,000 --> 00:03:27,440
और वो रही भगवती कामाख्या का शिखर। ये बात तो मतलब मैं अपने यज्ञ

44
00:03:27,440 --> 00:03:31,440
को छू कर ही कह दे रहा हूं और आप ही के आश्रम के पीछे गंगा जी वहां घुस जाते हैं और आप

45
00:03:31,440 --> 00:03:35,840
शपथ कीजिएगा कि आप स्वामी मुक्तेश्वरानंद सरस्वती एक बार केवल गंगा जी में प्रवेश कर जाए

46
00:03:35,840 --> 00:03:40,080
स्वामी निश्वरानंद सरस्वती गंगा में प्रवेश कर जाए और कह दें कुछ नहीं। गंगा

47
00:03:40,080 --> 00:03:44,080
जी में प्रवेश करें कह देते। ऐसा कभी हुआ नहीं। जोधपुर वाली चिकित्सा पर तो हमने शपथ

48
00:03:44,080 --> 00:03:46,880
पूर्वक सब बात कह ही दी है। मैं कुछ वरदान देती हूं और

49
00:03:46,880 --> 00:03:50,960
भगवती ने मुझे यही वरदान दिए। इस बात की भी मैं शपथ कर सकता हूं। तो

50
00:03:50,960 --> 00:03:54,960
इस बात में हमने आपको गंगा जी भूषण सारा सत्य बता दिया है। हालांकि यज्ञ पवित्र कर

51
00:03:54,960 --> 00:03:59,040
छूकर सौगंध करना भी दोष माना गया है शास्त्र में। लेकिन क्या करूं?

52
00:03:59,040 --> 00:04:03,040
ये सामने शिव पुराण स्थित है। शिव जी इस बात के साक्षी

53
00:04:03,040 --> 00:04:07,040
हैं। मैं गंगा जी में प्रविष्ट होकर ये शपथ पूर्वक काशी विश्वनाथ जी की नगरी

54
00:04:07,040 --> 00:04:11,040
में ये शपथ पूर्वक आपको कहता हूं और इस स्पष्टता के लिए अब हमको कसम शपथ

55
00:04:11,040 --> 00:04:15,040
भी नहीं करेंगे। क्यों नहीं करेंगे? क्योंकि रोज 10 आरोप लगेंगे हमारे ऊपर। तो 10 बार हम देवी

56
00:04:15,040 --> 00:04:19,120
देवता की शपथ और जनेऊ छू के खाओ और गंगा जी और नर्मदा जी में घुस के कहो ये

57
00:04:19,120 --> 00:04:23,760
नाटक जनेऊ हाथ में जनेऊ हाथ में जनेऊ हाथ में इट्स माय पैशन

58
00:04:23,760 --> 00:04:27,840
जनेऊ हाथ में एक बढ़िया सी शॉर्ट फिल्म बन जाए जनेऊ हाथ में

59
00:04:27,840 --> 00:04:32,720
हां और जो व्यक्ति जनेऊ हाथ में ना ले बात बातबात पर वो झूठा

60
00:04:32,720 --> 00:04:36,880
जो बात पर जनेऊ हाथ में ले ले वो सच्चा जो मौन रहे

61
00:04:36,880 --> 00:04:41,200
वो झूठा जो बात पर जनेऊ हाथ में लेता रहे वो सच्चा

62
00:04:41,200 --> 00:04:45,440
ये सनातन शास्त्रों के नियम होंगे इनके इनको वो परिसाधना

63
00:04:45,440 --> 00:04:49,680
से प्राप्त हुई है ना जो वरदान वरदान तो है नहीं वो पता चलेगा आगे

64
00:04:49,680 --> 00:04:53,920
वरदान उसी ने दिए होंगे जनेऊ हाथ में सनातन शास्त्रों का नियम

65
00:04:53,920 --> 00:04:58,400
जो व्यक्ति जनेऊ हाथ में लेता फिरेगा उसकी बात सत्य जो व्यक्ति

66
00:04:58,400 --> 00:05:04,000
या तो जनेऊ हाथ में नहीं लेगा या मौन रहेगा उसकी बात झूठ

67
00:05:04,000 --> 00:05:08,480
तो

68
00:05:08,480 --> 00:05:12,720
जब इसने अपने लिए ये प्रामाणिक साक्ष्य संप्रदाय

69
00:05:12,720 --> 00:05:16,880
का आचार्य लिख दिया और फिर हम पर कहा कि उसने यह बोला है, वह बोला है।

70
00:05:16,880 --> 00:05:20,960
तो हमने फिर सबसे पहले उस शब्द का ही खंडन किया क्योंकि इसने अपने

71
00:05:20,960 --> 00:05:25,520
आप को प्रामाणिक बोला था ना तो हमने फिर उसी पर मीमांसा की

72
00:05:25,520 --> 00:05:29,600
और वो मीमांसा आपके सामने निग्रह निकासिका के रूप में प्रस्तुत

73
00:05:29,600 --> 00:05:33,680
हो रही है। तो इसमें कुछ एक भाग

74
00:05:33,680 --> 00:05:38,240
यह है जिसमें हमने इस बात का खंडन किया है कि यह जो है

75
00:05:38,240 --> 00:05:42,240
कोई प्रामाणिकता है या मनचला खुद का स्वषित

76
00:05:42,240 --> 00:05:47,040
है। तो इस बात की विवेचना है और उसके बाद दूसरे खंड में जो

77
00:05:47,040 --> 00:05:51,120
अह न्यायिक दृष्टिकोण से जो उत्तर होना चाहिए कि भैया

78
00:05:51,120 --> 00:05:55,760
जो हमने किया वो क्यों किया और क्या वो

79
00:05:55,760 --> 00:05:59,760
इललीगल माना जाएगा माननी में आएगा तो शुरू करते

80
00:05:59,760 --> 00:06:05,440
हैं कि भागवतानंद गुरु को

81
00:06:05,440 --> 00:06:09,680
किसी भी संप्रदाय का शाक्य क्या किसी भी संप्रदाय का प्रामाणिक आचार्य क्यों

82
00:06:09,680 --> 00:06:14,400
ना माना जाए इस बारे में विस्त विस्तृत विवेचना

83
00:06:14,400 --> 00:06:18,480
निग्रह निकासिका वैसे पहले इसका नाम हम लोग कह रहे थे

84
00:06:18,480 --> 00:06:19,040
गप्प

85
00:06:19,040 --> 00:06:23,120
प्रवेशिका है ना यह सब तो मैंने कहा कि थोड़ा

86
00:06:23,120 --> 00:06:27,360
सा जो लेखन वगैरह है उसमें थोड़ा हल्का वर्ड

87
00:06:27,360 --> 00:06:32,000
लगेगा शब्द तो इसलिए फिर निग्रह निकासिका कर दिया।

88
00:06:32,000 --> 00:06:36,320
खैर तो पहले हम इसके दावे समझ लेते हैं। इसने क्या-क्या

89
00:06:36,320 --> 00:06:40,320
दावे किए हैं। इसका पहला दावा है कि इसको मां

90
00:06:40,320 --> 00:06:44,480
भगवती की दिव्य योजना के द्वारा निग्रह संप्रदाय का बोध हुआ।

91
00:06:44,480 --> 00:06:48,640
देखिए दोनों चीजों पर क्वेश्चन है। निग्रह संप्रदाय प्रमाणिक है कि नहीं?

92
00:06:48,640 --> 00:06:52,720
और फिर यह उसका निग्रहचार्य है कि नहीं? तो पहली जो विवेचना है

93
00:06:52,720 --> 00:06:57,280
पहले खंड में उसमें इस बारे में भी बात हो रही है

94
00:06:57,280 --> 00:07:01,440
कि निग्रह संप्रदाय कितना प्रामाणिक है और यह

95
00:07:01,440 --> 00:07:05,520
उस उसके निग्रहाचार किस प्रकार से हैं

96
00:07:05,520 --> 00:07:09,680
अथवा नहीं है। तो सबसे पहला दावा

97
00:07:09,680 --> 00:07:13,760
इनका है कि इसको मां भगवती की ओर से दिव्य योजना के द्वारा निग्रह संप्रदाय का

98
00:07:13,760 --> 00:07:18,800
बोध हुआ जिसका विवरण शाक्त संप्रदाय के किसी ग्रंथ में मिलता है।

99
00:07:18,800 --> 00:07:23,200
जंगल में कठिन तपस्या द्वारा भगवती देवी को प्रसन्न

100
00:07:23,200 --> 00:07:27,520
करके इसने निग्रह संप्रदाय का मंत्र

101
00:07:27,520 --> 00:07:31,520
एवं निग्रह संप्रदाय के सिद्धांत का प्रतिपादन करने

102
00:07:31,520 --> 00:07:34,400
वाला परम अक्षर सूत्र नामक ग्रंथ प्राप्त

103
00:07:34,400 --> 00:07:38,480
किया है। जिसकी व्याख्या को इसने ज्ञानवती टीका

104
00:07:38,480 --> 00:07:42,480
सूत्र विस्तार भाष्य नाम से प्रकाशित करवाया है।

105
00:07:42,480 --> 00:07:46,640
इसके द्वारा यह भी घोषणा की गई है कि एक दिव्य योजना के अंतर्गत मां भगवती

106
00:07:46,640 --> 00:07:50,960
के ही द्वारा इसको उन 300 ग्रंथों का अध्ययन

107
00:07:50,960 --> 00:07:55,600
कराया जा रहा है जिनका विवरण शाक्त मत के ग्रंथ में मिलता है जो प्रायः

108
00:07:55,600 --> 00:07:59,760
लुप्त हो चुके हैं। अर्थात जनसामान्य को सुलभ

109
00:07:59,760 --> 00:08:04,400
नहीं है। इसके साथ ही साथ विपक्षी द्वारा ये

110
00:08:04,400 --> 00:08:08,400
गुप्ताचार्य द्वारा यह घोषणा भी की गई है कि देवी

111
00:08:08,400 --> 00:08:12,640
द्वारा कराए जा रहे अध्ययन के पूर्ण हो जाने पर विपक्षी

112
00:08:12,640 --> 00:08:17,040
उन्हीं 300 ग्रंथों का सार 10,000 श्लोकों में लिपिबद्ध

113
00:08:17,040 --> 00:08:21,600
करके जनसामान्य को उपलब्ध कराएगा। विपक्षी तारापीठ

114
00:08:21,600 --> 00:08:25,760
एवं कामाख्या की परंपरा में आने वाले मनुष्य रूप में सुलभ गुरु के द्वारा भी

115
00:08:25,760 --> 00:08:30,800
अध्ययन करने की बात को स्वीकार करता है।

116
00:08:30,800 --> 00:08:35,280
परंतु उनके बारे में अधिक ना बताने की गुरु आज्ञा बताते हुए कोई

117
00:08:35,280 --> 00:08:39,280
जानकारी स्पष्ट रूप से प्रदान नहीं करता है। विपक्षी की

118
00:08:39,280 --> 00:08:43,760
साधना से प्रसन्न होकर उसे मां भगवती द्वारा वरदान दिया गया है

119
00:08:43,760 --> 00:08:47,920
कि उसके द्वारा कभी कोई दुराचरण नहीं होगा क्योंकि बुद्धि भ्रष्ट होने

120
00:08:47,920 --> 00:08:49,440
पर भी शारीरिक क्रिया पर

121
00:08:49,440 --> 00:08:53,840
उसका नियंत्रण रहेगा एवं क्रियात्मक रूप से कुछ गलत होने वाला

122
00:08:53,840 --> 00:08:58,080
होगा तो विपक्षी की बुद्धि गलत नहीं होने देगी। उसका विवेक

123
00:08:58,080 --> 00:09:02,880
उसे रोक लेगा।

124
00:09:02,880 --> 00:09:06,960
भागवतानंद के व्यवहार से उसके द्वारा दी गई जानकारियों का सत्यापन

125
00:09:06,960 --> 00:09:10,960
किया जा सकता है। अर्थात भागवतानंद का

126
00:09:10,960 --> 00:09:15,440
निग्रहचार्य होना उसे निग्रह संप्रदाय का बोध मंत्र

127
00:09:15,440 --> 00:09:19,520
ग्रंथ एवं अध्ययन स्वयं मां भगवती द्वारा प्राप्त होना।

128
00:09:19,520 --> 00:09:23,840
इस प्रकार प्राप्त सिद्धांतों का श्रुति स्मृति शास्त्रों

129
00:09:23,840 --> 00:09:27,920
के साथ समन्वय होना एवं विपक्षी के द्वारा कभी भी

130
00:09:27,920 --> 00:09:32,880
दुराचरण ना हो पाने का वरदान इत्यादि

131
00:09:32,880 --> 00:09:37,120
इन सारी जानकारियों का सत्यापन कहां से हो सकता है भाई

132
00:09:37,120 --> 00:09:42,240
भागवतानंद के आचरण से कि वह शास्त्रानुकूल है कि नहीं आचरण

133
00:09:42,240 --> 00:09:46,640
तो दूसरे भाग में एक भाग में यह है कि निग्रह

134
00:09:46,640 --> 00:09:50,720
संप्रदाय की प्रमाणिकता पर कितनी स्पष्टता

135
00:09:50,720 --> 00:09:55,200
हमें प्राप्त है। दूसरा भाग कि निग्रह संप्रदाय

136
00:09:55,200 --> 00:09:59,200
के प्रामाणिक आचार्य के रूप में भागवतानंद को कैसे माना

137
00:09:59,200 --> 00:10:03,440
जाए। और तीसरा है कि जो यह आधार है

138
00:10:03,440 --> 00:10:07,440
आचार्य वाला है ना कि आचार्य के आचरण से

139
00:10:07,440 --> 00:10:11,440
देखो कि वह आचार्य है कि नहीं जो इसने रखा भी है और साथ ही साथ

140
00:10:11,440 --> 00:10:16,800
वो भगवती वाला वरदान कितना सत्य है। हां

141
00:10:16,800 --> 00:10:20,880
तो तीसरा इसके आचरण के अनुरूप है। इसके आचरण के आधार पर

142
00:10:20,880 --> 00:10:24,880
है। तीसरा वाले तीसरी वाली जो विवेचना है कि भैया इसके आचरण

143
00:10:24,880 --> 00:10:29,120
से क्या ये सिद्ध हो रहा है कि भगवती से इसको वरदान मिला था। ये आचार्य है शास्त्रानुकूल

144
00:10:29,120 --> 00:10:33,280
आचरण है इसके तो यह सब अच्छा इसके

145
00:10:33,280 --> 00:10:37,840
द्वारा इसकी पुस्तक अमृत वचन के 69वें अध्याय

146
00:10:37,840 --> 00:10:42,240
ये जो संख्याएं हैं इनमें कुछ ऊपर नीचे हो सकता है

147
00:10:42,240 --> 00:10:46,240
पर वहां पर है निग्रह संप्रदाय की प्रमाणिकता के

148
00:10:46,240 --> 00:10:48,240
अंतर्गत प्रश्न

149
00:10:48,240 --> 00:10:52,480
संख्या 434 में उसे आचार्य किसने बनाया? इस प्रश्न

150
00:10:52,480 --> 00:10:56,800
के उत्तर में यह बताता है कि

151
00:10:56,800 --> 00:11:00,800
मुझे आचार्यत्व प्रदान करने के लिए मैं स्वयं अधिकृत हूं। एवं

152
00:11:00,800 --> 00:11:04,880
शास्त्रों द्वारा किसी को आचार्य के रूप में स्वीकार

153
00:11:04,880 --> 00:11:08,960
करने के निमित्त शास्त्रों के कुछ वचन प्रस्तुत करता है जो कुछ इस प्रकार है।

154
00:11:08,960 --> 00:11:13,040
जो शास्त्र वाक्य को ध्यान से चुनकर तथा समझकर उन

155
00:11:13,040 --> 00:11:17,360
पर आचरण करें। अपने आचरण से आदर्श प्रस्तुत

156
00:11:17,360 --> 00:11:21,440
करके उनके सदर्थ की स्थापना से अन्य

157
00:11:21,440 --> 00:11:25,760
जनों को भी सदाचारी बनाए। विनम्र वाणी बोलने वाले तथा सभी

158
00:11:25,760 --> 00:11:30,240
कार्यों का उपदेश करने वाले को आचार्य कहते हैं।

159
00:11:30,240 --> 00:11:34,240
अतः शास्त्र वाक्य मुझे आचार्यत्व प्रदान करते हैं। तो यहां पर

160
00:11:34,240 --> 00:11:38,640
इसने विवेचना कर दी कि शास्त्र वाक्य कैसे हैं? क्या है? और फिर

161
00:11:38,640 --> 00:11:42,640
इसने यह भी अपने आप को आचार्य आचार्यत्व प्रदान करने की बात कहकर

162
00:11:42,640 --> 00:11:46,720
यह स्वीकार कर लिया सारे आचरण इसमें हैं। तो यह भी इसका एक दावा है कि मैं

163
00:11:46,720 --> 00:11:50,960
निग्रचार क्यों हूं। निग्रह मार्ग तीन प्रकार से चलता है।

164
00:11:50,960 --> 00:11:54,960
शास्त्रार्थ के द्वारा विपक्षी के मत का निग्रह करके शास्त्र

165
00:11:54,960 --> 00:11:59,440
रक्षा करना। शास्त्र के माध्यम से विपक्षी को युद्ध में पराजित

166
00:11:59,440 --> 00:12:03,360
करके उसका निग्रह करना और योग मार्ग से अपनी इंद्रियों

167
00:12:03,360 --> 00:12:07,520
का संयम पूर्वक निग्रह करके आत्म निग्रह करना।

168
00:12:07,520 --> 00:12:11,520
तो यह इन्होंने निग्रह मार्ग के बारे में बताया। जिस

169
00:12:11,520 --> 00:12:15,920
प्रकार वैष्णवागमों के अनुसार भगवान विष्णु की आराधना

170
00:12:15,920 --> 00:12:20,640
करके और वैष्णवों के सिद्धांत पर चलकर आचार्य जन वैष्णवाचार्य

171
00:12:20,640 --> 00:12:24,720
की उपाधि धारण करते हैं। उसी प्रकार निग्रह आगमों

172
00:12:24,720 --> 00:12:28,880
के अंतर्गत चलने वाले निग्रहचार्य कहे जाते हैं।

173
00:12:28,880 --> 00:12:33,040
ठीक है? तो अपने आप को निग्रह आगमों के अंतर्गत

174
00:12:33,040 --> 00:12:37,360
होने वाला घोषित करते हुए खुद ही जोड़ जोड़ते हुए

175
00:12:37,360 --> 00:12:42,000
और निग्रचार कहे जाते हैं। फिर भागवतानंद

176
00:12:42,000 --> 00:12:46,880
को किसी कोलाचार्य के द्वारा एक नियुक्ति

177
00:12:46,880 --> 00:12:51,680
नियुक्ति पत्र भी प्राप्त हुआ है जो इसने सार्वजनिक किया है।

178
00:12:51,680 --> 00:12:55,680
जिसमें कि वो उनके द्वारा कहा गया है कि प्रामाणिक है। हम इन्हें नियुक्त करते

179
00:12:55,680 --> 00:12:59,840
हैं। वैसे थोड़ी देर पहले हमने पढ़ा कि मुझे कोई आचार्यत्व जो

180
00:12:59,840 --> 00:13:03,840
है कोई प्रदान करने के लिए अधिकृत नहीं है। मैं स्वयं ही अधिकृत हूं। शास्त्र

181
00:13:03,840 --> 00:13:08,080
मुझे अधिकृत करते हैं। पर चलो इनका यह भी ले लिया जो कोलाचार

182
00:13:08,080 --> 00:13:12,320
वाला एक उपहास पूर्वक एक पत्र प्राप्त हुआ है। वो उपहास क्यों है वो भी बताऊंगा

183
00:13:12,320 --> 00:13:16,320
मैं। उसमें उपहास विनोद है और कुछ नहीं है। जस्ट जोक मामा मिया

184
00:13:16,320 --> 00:13:19,360
आई एम जस्ट जोकिंग वही है उसमें।

185
00:13:19,360 --> 00:13:23,520
इसी क्रम में विपक्षी द्वारा उसकी तथाकथित दृष्टिगोचर गुरु

186
00:13:23,520 --> 00:13:28,080
परंपरा का एक चित्र भी सार्वजनिक किया गया है। उसमें

187
00:13:28,080 --> 00:13:32,560
उसे प्रमाणिक कहने वाले कोलाचार्य की ये जो चित्र है

188
00:13:32,560 --> 00:13:36,560
मेरी जानकारी में नहीं है कि ये चित्र जो है जो प्रमाणिक कहने वाले जो

189
00:13:36,560 --> 00:13:40,800
कोलाचार्य हैं उनकी परंपरा से है कि नहीं है ना

190
00:13:40,800 --> 00:13:44,800
क्योंकि जिसकी जो परंपरा होगी वह अपनी ही परंपरा में किसी को प्रामाणिक कह

191
00:13:44,800 --> 00:13:48,880
सकता है ना तो जिन गुरुओं को इसने अपने

192
00:13:48,880 --> 00:13:53,040
चित्र में बताया है क्या वो उस कोलाचार्य से सद्ध

193
00:13:53,040 --> 00:13:57,280
है उसी परंपरा में आते हैं कि नहीं जिस परंपरा के कोलाचार्य ने इनको नियुक्त

194
00:13:57,280 --> 00:14:01,520
किया है ये ये भी एक प्रश्न आगे आएगा इस पर विधिवत बात करेंगे

195
00:14:01,520 --> 00:14:05,840
तो ये कुछ 10 11 इन्होंने दावे किए जो अभी तक

196
00:14:05,840 --> 00:14:09,920
इन्होंने निग्रह प्रवेशिका नहीं दी है मगर हमने

197
00:14:09,920 --> 00:14:13,920
श्रम करके मेहनत करके इनके अलग-अलग जगह पर किए गए जो दावे

198
00:14:13,920 --> 00:14:18,080
हैं उन दावों को संकलित किया है कि इसने अपनी परंपरा के बारे

199
00:14:18,080 --> 00:14:22,240
में अपनी प्रामाणिकता को लेकर क्या-क्या खिचड़ी

200
00:14:22,240 --> 00:14:26,240
पकाई है उसको पहले पकड़ तो लें। पहले सामने वाले का पूर्व पक्ष तो प्राप्त

201
00:14:26,240 --> 00:14:31,360
हो तब तो उत्तर पक्ष रखेंगे ना। ये तो पूर्व पक्ष ही नहीं देते हैं।

202
00:14:31,360 --> 00:14:34,560
फलाने के सचिव ये कर रहे हैं। उनके सचिव ये कर रहे हैं। पूरी मठ

203
00:14:34,560 --> 00:14:38,720
के सचिव ये कर रहे हैं। अपने सचिवों का कुछ नाम ही नहीं बताते हैं।

204
00:14:38,720 --> 00:14:42,800
तो अपना पूर्व पक्ष तो छुपा के रखो। मेरे गुरु कौन है? ये उन्होंने बताने

205
00:14:42,800 --> 00:14:46,960
को मना किया है। है ना? मेरे साथ कौन-कौन चलता फिरता

206
00:14:46,960 --> 00:14:51,120
है? मेरा परिकर कौन-कौन है? वह गुटखा खाता है कि नहीं? वह शराब पीता है कि नहीं? मदिरापान

207
00:14:51,120 --> 00:14:55,120
करता है कि नहीं? यह मैं अभी नहीं बताऊंगा। हां।

208
00:14:55,120 --> 00:15:00,560
मेरा विवाह कहां पे हुआ है? किस कुल खानदान में हुआ है? यह मैं अभी नहीं बताऊंगा।

209
00:15:00,560 --> 00:15:04,800
और दूसरों की जिनकी जिनकी जीवन शैली पारदर्शिता

210
00:15:04,800 --> 00:15:09,040
के साथ प्रस्तुत है उसमें अपने अनुसार नियम लागू

211
00:15:09,040 --> 00:15:13,040
करते हुए अपने अनुसार अर्थ निकालते हुए किसी की बात

212
00:15:13,040 --> 00:15:17,040
कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा भानुमती का कुबा जोड़ा और मैं करता रहूंगा

213
00:15:17,040 --> 00:15:21,200
दोषारोपण और अपनी सारी चीजें छुपा के रखूंगा दोषारोपण करोगे कैसे

214
00:15:21,200 --> 00:15:26,320
मैं पूर्व पक्ष तुमको दूंगा ही नहीं उत्तर पक्ष कहां से दोगे

215
00:15:26,320 --> 00:15:30,480
तो हम ढूंढेंगे तुम्हारा पूर्व पक्ष हम ढूंढेंगे तुम तो दोगे नहीं हम ढूंढ ढूंढेंगे।

216
00:15:30,480 --> 00:15:34,640
तो यह सारे जो दावे इन्होंने किए हैं, यह जो निग्रह निकासिका

217
00:15:34,640 --> 00:15:38,800
आपको एक छोटी सी पुस्तक प्राप्त होगी। उसमें यह जो सारे दावे

218
00:15:38,800 --> 00:15:42,960
किए हैं इनका विवरण बताया जाएगा कि कहां पर किए हैं और

219
00:15:42,960 --> 00:15:46,960
अगर वह पुस्तक आपको पीडीएफ में मिलेगी तो आपको उस वीडियो का लिंक

220
00:15:46,960 --> 00:15:49,600
मिल जाएगा जिस वीडियो में उसने ये ये बातें कही हैं

221
00:15:49,600 --> 00:15:53,680
जो जो बातें यहां पर दावे के रूप में संकलित की गई हैं। इसके

222
00:15:53,680 --> 00:15:57,840
द्वारा जो अपनी प्रमाणिकता के विषय में बताया गया है। तो यह हमने

223
00:15:57,840 --> 00:16:02,240
देख लिया कि इसके दावे क्या-क्या हैं। अब इसके अगले भाग में हम देखेंगे इन

224
00:16:02,240 --> 00:16:06,400
दावों के प्रति उत्तर में जो किस प्रकार

225
00:16:06,400 --> 00:16:10,720
जो विवेचना की गई है और उसके अनुसार किस प्रकार यह सिद्ध होता है

226
00:16:10,720 --> 00:16:14,720
कि यह कोई प्रामाणिक आचार वाचार नहीं है। यह एक

227
00:16:14,720 --> 00:16:18,960
नंबर का दोगला और झूठा व्यक्ति है। बात बातबात में दोगलापन

228
00:16:18,960 --> 00:16:22,960
करता है। पक्षपात करता है। सिद्धांतों के साथ खिलवाड़ करता

229
00:16:22,960 --> 00:16:27,440
है। झूठ बोलता है। इसका झूठ बोलना भी सिद्ध होगा।

230
00:16:27,440 --> 00:16:31,760
इसकी अशास्त्रीयता भी सिद्ध हो जाएगी। सब कुछ सिद्ध होगा

231
00:16:31,760 --> 00:16:35,840
इस विवेचना में। तो अगले भाग भाग में हम उस पर

232
00:16:35,840 --> 00:16:39,920
बात करेंगे। निग्रह निकासिका एक तरीके से कहा जाए

233
00:16:39,920 --> 00:16:43,920
तो निग्रह निकासिका जो का जो मुख्य भाग है वह अगले भाग में

234
00:16:43,920 --> 00:16:47,920
आपके समक्ष प्रस्तुत होगा। जय श्री राम।
