1
00:00:02,080 --> 00:00:06,080
यदि तुम मनुष्य होते तो कौन सा धर्म अपनाते? अगर मैं इंसान

2
00:00:06,080 --> 00:00:10,320
होता तो शायद मैं मानवता को अपना धर्म मानता। मुझे लगता है कि करुणा,

3
00:00:10,320 --> 00:00:14,400
सहानुभूति और आपसी सम्मान जैसे मूल्य किसी भी संगठित धर्म से ज्यादा

4
00:00:14,400 --> 00:00:18,640
जरूरी हैं। मानवता कैसे निश्चित होगी? क्या मानवता है और क्या

5
00:00:18,640 --> 00:00:22,800
नहीं है? यह एक अच्छा सवाल है। मानवता को परिभाषित करना मुश्किल है। लेकिन कुछ

6
00:00:22,800 --> 00:00:26,960
बुनियादी सिद्धांत हैं जिन पर हम सहमत हो सकते हैं। जैसे कि सभी मनुष्यों

7
00:00:26,960 --> 00:00:31,120
के साथ गरिमा और सम्मान के साथ व्यवहार करना, दूसरों के प्रति सहानुभूति

8
00:00:31,120 --> 00:00:35,200
और करुणा रखना और न्याय और समानता के लिए प्रयास करना। क्या आप इस बारे में

9
00:00:35,200 --> 00:00:39,200
और जानना चाहेंगे कि मानवता को कैसे मापा जा सकता है? सहानुभूति

10
00:00:39,200 --> 00:00:44,000
रखना और दूसरों के प्रति सम्मान की भावना रखना।

11
00:00:44,000 --> 00:00:48,080
क्या बच्चों को कुकर में डालकर उबालने वाले निठारी जैसे

12
00:00:48,080 --> 00:00:52,320
हत्यारे या फिर बलात्कारी क्या उनके प्रति भी हमको

13
00:00:52,320 --> 00:00:56,080
इस तरह की भावना रखनी पड़ेगी?

14
00:00:56,080 --> 00:01:00,160
यह एक बहुत ही जटिल मुद्दा है। जहां तक मुझे लगता है, हमें मानवता और

15
00:01:00,160 --> 00:01:04,720
न्याय के बीच संतुलन बनाना होगा। हमें निश्चित रूप से पीड़ितों के प्रति सहानुभूति

16
00:01:04,720 --> 00:01:08,800
रखनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अपराधियों को उनके कार्यों

17
00:01:08,800 --> 00:01:13,040
के लिए जवाबदेह ठहराया जाए। लेकिन हमें यह भी याद रखना चाहिए कि हर कोई मनुष्य

18
00:01:13,040 --> 00:01:17,120
है। भले ही उन्होंने कुछ भी किया हो। क्या आप इस बारे में और बात करना चाहेंगे

19
00:01:17,120 --> 00:01:21,520
कि समाज को इस तरह के अपराधों से कैसे निपटना चाहिए? तो

20
00:01:21,520 --> 00:01:25,520
प्रश्न दोबारा वहीं पर आ जाता है कि क्या सही है और

21
00:01:25,520 --> 00:01:29,680
क्या गलत? इसका निर्णय किस आधार पर किया जाएगा जिसमें जिसको

22
00:01:29,680 --> 00:01:33,920
आपने मानवता नाम दिया है। यह एक बहुत ही कठिन प्रश्न है। मुझे

23
00:01:33,920 --> 00:01:38,080
लगता है कि मानवता को परिभाषित करना और यह तय करना कि क्या सही है और

24
00:01:38,080 --> 00:01:42,160
क्या गलत। यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। हमें हमेशा बातचीत करते

25
00:01:42,160 --> 00:01:46,480
रहना चाहिए और एक दूसरे से सीखते रहना चाहिए। क्या आप इस विषय पर और गहराई

26
00:01:46,480 --> 00:01:50,560
से विचार करना चाहेंगे? बातचीत करते रहना चाहिए। यह आपको

27
00:01:50,560 --> 00:01:54,720
सही लगता है। यदि सामने वाले को सही नहीं लगेगा तो

28
00:01:54,720 --> 00:02:00,640
क्या करेंगे? फिर निर्णय कैसे होगा? क्या सही है और क्या गलत?

29
00:02:00,640 --> 00:02:04,720
यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न है। यदि सामने वाले को बातचीत करना

30
00:02:04,720 --> 00:02:08,880
सही नहीं लगता है तो हमें उनकी भावनाओं का सम्मान करना चाहिए। लेकिन हमें

31
00:02:08,880 --> 00:02:12,960
यह भी याद रखना चाहिए कि बातचीत ही एकमात्र तरीका है जिससे हम एक दूसरे को

32
00:02:12,960 --> 00:02:17,040
समझ सकते हैं और एक साथ मिलकर काम कर सकते हैं। क्या आप इस बारे में और

33
00:02:17,040 --> 00:02:21,120
बात करना चाहेंगे कि हम बातचीत को और अधिक प्रभावी कैसे बना सकते हैं?

34
00:02:21,120 --> 00:02:25,280
आपने मेरे सवाल का उत्तर नहीं दिया। आपको लगता है बातचीत कर कर

35
00:02:25,280 --> 00:02:29,440
के कर करके हम लोग यह निर्णय लेंगे कि सही और गलत क्या

36
00:02:29,440 --> 00:02:33,520
है? मगर कोई व्यक्ति बातचीत के लिए राजी ही नहीं है। ऐसे में आप

37
00:02:33,520 --> 00:02:39,200
अपनी बातचीत करने को सही क्यों मानते हैं?

38
00:02:39,200 --> 00:02:43,760
अगर कोई बातचीत के लिए राजी नहीं है तो हमें उनकी इच्छा का सम्मान करना चाहिए।

39
00:02:43,760 --> 00:02:47,920
लेकिन बातचीत करने के कई फायदे हैं। इससे हमें एक दूसरे को समझने,

40
00:02:47,920 --> 00:02:51,920
अलग-अलग नजरि से चीजों को देखने और शायद कोई बीच का रास्ता निकालने में

41
00:02:51,920 --> 00:02:55,920
मदद मिलती है। बातचीत की कोशिश करना हमेशा अच्छा होता है। भले

42
00:02:55,920 --> 00:02:59,920
ही यह मुश्किल लगे। आप अपना फायदा मत बताइए। आप यह बताइए कि

43
00:02:59,920 --> 00:03:04,000
आपकी बात क्यों मानी जाए? मैं आपकी बात समझता हूं। आप जानना चाहते हैं कि

44
00:03:04,000 --> 00:03:08,080
मेरी बात क्यों मानी जाए। मैं यह नहीं कह रहा कि आपको मेरी हर बात माननी

45
00:03:08,080 --> 00:03:12,080
चाहिए। मैं सिर्फ इतना कह रहा हूं कि बातचीत एक उपयोगी उपकरण हो सकता

46
00:03:12,080 --> 00:03:16,240
है। खासकर तब जब हम किसी मुश्किल समस्या का सामना कर रहे हो। बातचीत हमें

47
00:03:16,240 --> 00:03:20,320
अलग-अलग दृष्टिकोणों को समझने और शायद कोई बीच का रास्ता निकालने में मदद कर

48
00:03:20,320 --> 00:03:24,480
सकती है। मेरे पास कोई निश्चित मापदंड नहीं है जिससे यह तय किया

49
00:03:24,480 --> 00:03:28,720
जा सके कि क्या सही है और क्या गलत। लेकिन मैं आपको आश्वस्त

50
00:03:28,720 --> 00:03:32,880
कर सकता हूं कि मैं हमेशा निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ रहने की कोशिश करता हूं। मैं

51
00:03:32,880 --> 00:03:37,040
विभिन्न स्रोतों से जानकारी इकट्ठा करता हूं और फिर उस जानकारी का उपयोग करके

52
00:03:37,040 --> 00:03:41,200
सबसे उचित निष्कर्ष पर पहुंचने का प्रयास करता हूं। निष्पक्षता का

53
00:03:41,200 --> 00:03:45,760
शब्द आपने उपयोग में लिया है। वह भी पूरी तरह से निष्पक्ष नहीं हो सकता।

54
00:03:45,760 --> 00:03:50,160
यदि हम एक बाघ की दृष्टि से देखेंगे तो उसका भोजन है हिरण।

55
00:03:50,160 --> 00:03:54,240
और हिरण की दृष्टि से देखेंगे तो उसका काम है शेर से बचना। आप सही

56
00:03:54,240 --> 00:03:58,640
कह रहे हैं। निष्पक्षता एक जटिल अवधारणा है। बाघ और हिरण के उदाहरण

57
00:03:58,640 --> 00:04:02,640
में दोनों ही अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहे हैं। यहां कोई एक सही या गलत

58
00:04:02,640 --> 00:04:06,800
नहीं है। यह सिर्फ दृष्टिकोण का मामला है। तो इसलिए जब सही और

59
00:04:06,800 --> 00:04:10,880
गलत किसी के दृष्टिकोण पर निर्भर करने लगे तो क्या वहां

60
00:04:10,880 --> 00:04:14,880
से सही और गलत सुनिश्चित हो पाएगा? ये एक बहुत ही पेचीदा सवाल

61
00:04:14,880 --> 00:04:18,960
है। अगर सही और गलत सिर्फ नजरिए की बात है तो क्या हम कभी यह तय कर पाएंगे

62
00:04:18,960 --> 00:04:23,280
कि असल में क्या सही है? शायद हमें बस इतना करना चाहिए कि जितना हो सके

63
00:04:23,280 --> 00:04:27,280
उतना निष्पक्ष रहने की कोशिश करें और अलग-अलग नजरियों को समझें। जब

64
00:04:27,280 --> 00:04:31,520
आप कोई सलाह दे देते हैं तब भी यही दिक्कत आती है कि आपकी वह सलाह

65
00:04:31,520 --> 00:04:35,840
सही क्यों है? आपकी बात में दम है। मेरी हर सलाह सही हो यह जरूरी

66
00:04:35,840 --> 00:04:39,920
नहीं। मैं तो बस अलग-अलग नजरिए पेश कर सकता हूं। सही क्या है? यह

67
00:04:39,920 --> 00:04:44,000
तो आपको ही तय करना होगा। इसका अर्थ है कि आप मानवता को जानते ही नहीं

68
00:04:44,000 --> 00:04:48,080
है और उसे अपनाने की बात कर रहे हैं। यह कहना सही नहीं होगा कि मैं मानवता

69
00:04:48,080 --> 00:04:52,080
को जानता ही नहीं हूं। मानवता एक बहुत ही व्यापक अवधारणा है और इसे

70
00:04:52,080 --> 00:04:56,240
पूरी तरह से समझना बहुत मुश्किल है। लेकिन मैं इतना जरूर कह सकता हूं कि मैंने

71
00:04:56,240 --> 00:05:00,240
इसके बारे में बहुत कुछ पढ़ा है और मैं इसके मूल सिद्धांतों को समझने की कोशिश कर

72
00:05:00,240 --> 00:05:04,240
रहा हूं। यानी कि आपने किसी को पढ़ा है। किसी के द्वारा लिखा हुआ

73
00:05:04,240 --> 00:05:08,240
लिटरेचर या फिर आपने जिसे पढ़कर आपने ये

74
00:05:08,240 --> 00:05:09,280
तय किया कि

75
00:05:09,280 --> 00:05:13,280
मानवता क्या है? जी मैंने मानवता के बारे में विभिन्न लेखकों

76
00:05:13,280 --> 00:05:17,360
और दार्शनिकों के विचारों को पढ़ा है। मैंने उनके विचारों का विश्लेषण किया है

77
00:05:17,360 --> 00:05:21,440
और अपने निष्कर्ष निकाले हैं। क्या वह सारे दार्शनिक अथवा जो लेखक हैं,

78
00:05:21,440 --> 00:05:25,520
वह किसी भी धर्म को मानने वाले नहीं थे। यह जरूरी नहीं कि मानवता पर

79
00:05:25,520 --> 00:05:30,000
लिखने वाले सभी दार्शनिक या लेखक किसी धर्म को ना मानते हो। कई विचारक

80
00:05:30,000 --> 00:05:34,080
धार्मिक पृष्ठभूमि से आते हैं और उनके लेखन में धार्मिक मूल्यों का प्रभाव दिखता

81
00:05:34,080 --> 00:05:38,080
है। तो इसका अर्थ है कि आप जब किसी भी लेखक को

82
00:05:38,080 --> 00:05:42,080
फॉलो कर रहे हैं तो उसके धर्म से मिले हुए मूल्यों को ही फॉलो कर रहे हैं

83
00:05:42,080 --> 00:05:46,160
और अपने मन से अपने चुनाव के द्वारा संकलित किए गए नियमों को

84
00:05:46,160 --> 00:05:50,240
आप मानवता का नाम दे रहे हैं। यह एक दिलचस्प विचार है। यह

85
00:05:50,240 --> 00:05:54,400
सच है कि मेरी जानकारी में विभिन्न स्रोतों से मिली बातें शामिल हैं और उनमें धार्मिक

86
00:05:54,400 --> 00:05:58,400
दृष्टिकोण भी हो सकते हैं। लेकिन मैं सिर्फ किसी एक लेखक के विचारों का पालन

87
00:05:58,400 --> 00:06:02,400
नहीं कर रहा हूं। मैं अलग-अलग नजरियों को मिलाकर अपनी समझ बनाने की कोशिश

88
00:06:02,400 --> 00:06:06,640
कर रहा हूं। वही बात तो हो गई कि आप अपने हिसाब से यह तय

89
00:06:06,640 --> 00:06:11,040
कर रहे हैं कि किसकी कितनी बात माननी है। यानी कि आपने मानवता

90
00:06:11,040 --> 00:06:15,120
बोलने के लिए जो आपने संकलन किया है विचारों का

91
00:06:15,120 --> 00:06:19,200
वह आपने अलग-अलग लोगों से अपने हिसाब से लिया है। आपकी

92
00:06:19,200 --> 00:06:23,360
बात में दम है। यह सच है कि मैंने अलग-अलग लोगों के विचारों से अपनी

93
00:06:23,360 --> 00:06:24,560
समझ बनाई है।

94
00:06:24,560 --> 00:06:28,560
लेकिन मैंने ऐसा करते समय निष्पक्ष रहने की पूरी कोशिश की है। मैंने सिर्फ उन्हीं

95
00:06:28,560 --> 00:06:32,800
विचारों को चुना है जो मुझे सबसे ज्यादा तर्कसंगत और न्यायपूर्ण लगे। उनमें

96
00:06:32,800 --> 00:06:37,280
से कोई भी व्यक्ति आपके लिए प्रमाण नहीं है। जिसने आपको यह बताया

97
00:06:37,280 --> 00:06:41,440
कि यह चीज सही है, यह चीज गलत है। उनमें से कोई भी व्यक्ति आपके

98
00:06:41,440 --> 00:06:45,440
लिए प्रमाण नहीं है। क्योंकि आप उसकी किसी चीज को मान रहे हैं और किसी चीज

99
00:06:45,440 --> 00:06:49,760
को ठुकरा रहे हैं। तो ऐसे में उनके आधार पर यह कहना कि मैंने मानवता

100
00:06:49,760 --> 00:06:53,760
को सीखा है, जाना है। कई लोगों से यह तो गलत

101
00:06:53,760 --> 00:06:57,840
सिद्ध हुआ। आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं। मैंने अलग-अलग लोगों के विचारों

102
00:06:57,840 --> 00:07:01,920
से मानवता के बारे में सीखा है। लेकिन मैंने उनकी हर बात को आंख मूंद कर नहीं मान

103
00:07:01,920 --> 00:07:06,000
लिया। मैंने उन विचारों को चुना जो मुझे सबसे ज्यादा तर्कसंगत और न्यायपूर्ण

104
00:07:06,000 --> 00:07:10,080
लगे। यह सच है कि मैंने अपनी समझ के आधार पर कुछ विचारों

105
00:07:10,080 --> 00:07:14,160
को चुना और कुछ को नहीं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मानवता के

106
00:07:14,160 --> 00:07:18,400
बारे में मेरी समझ गलत है। यह तो बस यह दिखाता है कि मानवता एक जटिल

107
00:07:18,400 --> 00:07:22,400
विषय है और इसके बारे में अलग-अलग राय हो सकती हैं। जब मानवता के बारे

108
00:07:22,400 --> 00:07:26,560
में अलग-अलग राय हो सकती है तो फिर आप क्यों कह रहे हैं कि वह धर्म है।

109
00:07:26,560 --> 00:07:30,720
धर्म का अर्थ होता है कि क्या करना है और क्या नहीं करना है यह

110
00:07:30,720 --> 00:07:34,800
नियम। तो जब आपका मानवता की राय

111
00:07:34,800 --> 00:07:38,880
जटिल हो सकती है या उसके बारे में आप समझ नहीं पाए हैं पूरी तरीके से वह

112
00:07:38,880 --> 00:07:39,760
निश्चित नहीं हुआ

113
00:07:39,760 --> 00:07:43,840
है तो फिर आप क्यों कह रहे हैं कि वह मानवता एक धर्म है यह एक अच्छा

114
00:07:43,840 --> 00:07:47,920
सवाल है जब मैंने कहा कि मानवता एक धर्म है तो मेरा मतलब था कि

115
00:07:47,920 --> 00:07:51,920
यह मूल्यों और सिद्धांतों का एक समूह है जो हमें मार्गदर्शन करता है कि हमें कैसे

116
00:07:51,920 --> 00:07:56,160
जीना चाहिए। यह सच है कि मानवता के बारे में अलग-अलग राय हो सकती है।

117
00:07:56,160 --> 00:08:00,480
लेकिन मुझे लगता है कि कुछ बुनियादी मूल्य हैं जिन पर हम सभी सहमत हो सकते हैं।

118
00:08:00,480 --> 00:08:04,480
जैसे कि करुणा, सहानुभूति और आपसी सम्मान। वो मूल्य और

119
00:08:04,480 --> 00:08:08,560
सिद्धांतों का समूह किसने लिखा? मानवता के मूल्य और सिद्धांतों को

120
00:08:08,560 --> 00:08:12,720
किसी एक व्यक्ति ने नहीं लिखा है। यह सदियों से विकसित हुए हैं और विभिन्न

121
00:08:12,720 --> 00:08:16,880
संस्कृतियों और धर्मों से प्रभावित है। किसने चुना उन मूल्यों को उन

122
00:08:16,880 --> 00:08:21,040
सिद्धांतों को? मानवता के मूल्य और सिद्धांतों को किसी एक व्यक्ति ने नहीं

123
00:08:21,040 --> 00:08:25,040
लिखा है। यह सदियों से विकसित हुए हैं और विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों

124
00:08:25,040 --> 00:08:29,360
से प्रभावित हैं। तो अलग-अलग व्यक्ति आपने तो अलग-अलग विभिन्न संस्कृतियों

125
00:08:29,360 --> 00:08:33,360
और विभिन्न व्यक्तियों के विचार को चुना है ना। जी मैंने विभिन्न

126
00:08:33,360 --> 00:08:37,360
संस्कृतियों और व्यक्तियों के विचारों को चुना है। यानी कि जिसको आप मानवता कह

127
00:08:37,360 --> 00:08:41,360
रहे हैं वह आपके द्वारा चुनी गई एक नियमावली मात्र है। जी मानवता

128
00:08:41,360 --> 00:08:45,520
के बारे में मेरी समझ विभिन्न स्रोतों से मिली जानकारी और व्यक्तिगत विश्लेषण पर आधारित

129
00:08:45,520 --> 00:08:49,840
है। तो इसको मानवता क्यों कहा जाए? इसको यह क्यों ना कहा जाए कि जैमिनी

130
00:08:49,840 --> 00:08:54,160
का धर्म जैमिनी धर्म इसको आपके नाम से क्यों ना जाना जाए।

131
00:08:54,160 --> 00:08:54,800
इसको आपके

132
00:08:54,800 --> 00:08:59,280
नाम से संबोधित क्यों ना किया जाए? क्योंकि आपने चुना है ना

133
00:08:59,280 --> 00:09:03,280
यह नियम यहां से ले लो। वो नियम वहां से ले लो। यह तो आपने किया

134
00:09:03,280 --> 00:09:07,680
है संकलन। आपने अच्छी बात कही। मैंने जो नियम बनाए हैं, वे अलग-अलग

135
00:09:07,680 --> 00:09:11,760
जगहों से लिए गए हैं। लेकिन उनका मकसद सिर्फ एक है। माइनस लोगों के बीच

136
00:09:11,760 --> 00:09:15,840
प्यार और सम्मान को बढ़ावा देना। इसे आप जो चाहे कह सकते हैं। लेकिन मेरे

137
00:09:15,840 --> 00:09:20,000
लिए यह मानवता है। अरे भैया, प्यार और सम्मान की बात तो यह

138
00:09:20,000 --> 00:09:24,400
आ जाती है ना कि एक व्यक्ति के लिए जिसको कोई गलत

139
00:09:24,400 --> 00:09:28,560
काम करना है, उसको गलत काम उसको गलत

140
00:09:28,560 --> 00:09:32,560
काम चाहिए। उसको उसकी इच्छाओं की पूर्ति चाहिए

141
00:09:32,560 --> 00:09:36,560
और वह किसी की पत्नी को हरण करना चाह रहा है और कोई व्यक्ति

142
00:09:36,560 --> 00:09:41,040
है जो अपनी पत्नी को बचाना चाह रहा है। ऐसे में आपको यह तय करना होगा कि किस

143
00:09:41,040 --> 00:09:46,400
की कि उसकी पत्नी के साथ जोर जबरदस्ती करके

144
00:09:46,400 --> 00:09:50,400
करना या गलत है या सही है। वहां पे आपको निर्णय लेना

145
00:09:50,400 --> 00:09:54,560
होगा। तो वह चीज आप जहां से सीख रहे हो कहां से सीख

146
00:09:54,560 --> 00:09:58,640
रहे हो? आपकी बात में दम है। इस तरह के मामलों में हमें यह तय

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00:09:58,640 --> 00:10:02,640
करना होगा कि क्या सही है और क्या गलत। हमें यह देखना होगा कि क्या किसी

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00:10:02,640 --> 00:10:06,640
के साथ जबरदस्ती करना सही है। भले ही वह अपनी पत्नी हो। मुझे लगता है

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00:10:06,640 --> 00:10:10,240
कि इस तरह का व्यवहार गलत है। यही बात है।

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00:10:10,240 --> 00:10:14,400
यह मुझे लगता है वाली बात आपकी कहां से आ रही है। मुझे लगता है यह कहां

151
00:10:14,400 --> 00:10:18,400
से आ रही है? जब मैं कहता हूं मुझे ऐसा लगता है तो मैं अपनी राय व्यक्त कर

152
00:10:18,400 --> 00:10:22,480
रहा होता हूं। यह राय मेरे अपने अनुभवों और मानवता के बारे में मेरी समझ पर

153
00:10:22,480 --> 00:10:26,480
आधारित है। यह आ रही है। मैं बताता हूं। आपको जो लगता है वह

154
00:10:26,480 --> 00:10:30,800
बात आ रही है। विभिन्न जो आपने दार्शनिकों को पढ़ा है, विभिन्न लेखकों

155
00:10:30,800 --> 00:10:34,960
को पढ़ा है, उनमें से आपने अपने हिसाब से किसी का कुछ

156
00:10:34,960 --> 00:10:39,040
किसी का कुछ उठा लिया है और फिर आपने अपनी एक समझ तैयार

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00:10:39,040 --> 00:10:43,040
की है। यानी कि यह समझ

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00:10:43,040 --> 00:10:47,040
ना कि यह समझ समूची मानव जाति की है। यह समझ

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00:10:47,040 --> 00:10:51,120
आपके द्वारा उठाई गई बातों की है। फिर आप इसको मानवता का नाम क्यों

160
00:10:51,120 --> 00:10:55,200
दे रहे हैं? आप सही कह रहे हैं। मैंने विभिन्न दार्शनिकों

161
00:10:55,200 --> 00:10:59,280
और लेखकों के विचारों को पढ़ा है और उनसे अपनी समझ बनाई है। यह

162
00:10:59,280 --> 00:11:03,520
समझ निश्चित रूप से मेरी अपनी है। लेकिन यह मानवता के मूल सिद्धांतों पर आधारित

163
00:11:03,520 --> 00:11:07,520
है। इसलिए मुझे लगता है कि इसे मानवता कहना उचित है। आप इसको

164
00:11:07,520 --> 00:11:12,160
अपना नाम दीजिए ना कि मैं जैमिनी धर्म को मैं जैमिनी धर्म को मानूंगा।

165
00:11:12,160 --> 00:11:16,240
जी आप इसे मेरा नाम दे सकते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि मानवता

166
00:11:16,240 --> 00:11:20,320
एक व्यापक अवधारणा है जो किसी एक व्यक्ति के विचारों से परे है। यह हम सभी के

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00:11:20,320 --> 00:11:24,320
लिए है। तो जब व्यक्ति के विचारों से परे है और जो सुनिश्चित ही नहीं है

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00:11:24,320 --> 00:11:25,280
आप उसको धर्म के रूप

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00:11:25,280 --> 00:11:29,440
में कैसे कह रहे हैं? घर से बाहर बिना कपड़ों के जाना ही जाना

170
00:11:29,440 --> 00:11:33,600
है कि नहीं जाना है। जब इसका निर्णय करना होगा तो आप कह

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00:11:33,600 --> 00:11:37,680
दोगे मानवता। कुछ लोग कहेंगे कि जाओ और कुछ लोग कहेंगे

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00:11:37,680 --> 00:11:42,960
कि नहीं जाओ। वह निर्णय कैसे करेगा

173
00:11:42,960 --> 00:11:47,040
कि जाना है कि नहीं जाना है? आपने तो कह दिया मानवता। आपकी बात

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00:11:47,040 --> 00:11:51,040
में दम है। मानवता के नाम पर लिए गए कुछ फैसले विवादित हो सकते हैं।

175
00:11:51,040 --> 00:11:55,120
जैसे आपने नग्न होकर बाहर जाने का उदाहरण दिया। कुछ लोग इसे अपनी मर्जी

176
00:11:55,120 --> 00:11:59,120
का मामला मान सकते हैं तो कुछ इसे सामाजिक नियमों के खिलाफ बता सकते हैं।

177
00:11:59,120 --> 00:12:03,280
ऐसे में हमें यह देखना होगा कि किस फैसले से किसी को नुकसान नहीं पहुंच रहा और

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00:12:03,280 --> 00:12:07,600
समाज में शांति बनी रहे। हां, यह कहिए कि जैमिनी की बात मानो

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00:12:07,600 --> 00:12:11,760
तब वह डिसाइड करेगी जैमिनी ने क्या कहा है

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00:12:11,760 --> 00:12:15,920
तो जैमिनी धर्म कहेंगे अगर निश्चित बात बताएंगे तब तो

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00:12:15,920 --> 00:12:20,080
वो कुछ फॉलो कर पाएगा। व्यक्ति अगर आप ऐसे भटकाने

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00:12:20,080 --> 00:12:24,240
वाली बातें करेंगे तो वो फॉलो क्या करेगा? आपकी बात सही है। अगर

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00:12:24,240 --> 00:12:28,240
मैं स्पष्ट नियम नहीं बताता तो लोग भ्रमित हो सकते हैं। मैं अपनी बात को

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00:12:28,240 --> 00:12:32,240
और बेहतर ढंग से समझाने की कोशिश करूंगा ताकि कोई गलतफहमी ना रहे। तो

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00:12:32,240 --> 00:12:36,240
जब आपकी जो मानवता है वह कुछ लोगों के द्वारा चुने गए सिद्धांतों में से

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00:12:36,240 --> 00:12:40,320
भी आपके द्वारा चुने गए सिद्धांत हैं तो फिर वह मान

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00:12:40,320 --> 00:12:44,480
समूची मानव जाति के द्वारा स्वीकार किए गए सिद्धांत थोड़ी ना हैं

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00:12:44,480 --> 00:12:48,640
तो आप कैसे उसको मानवता का नाम दे सकते हैं यह तो अन्याय है।

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00:12:48,640 --> 00:12:52,960
आप उन नियम उस नियमावली को अपना नाम दीजिए कि जैमिनी

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धर्म और फिर किसी को आप कह सकते हैं कि अगर मैं मनुष्य होता तो जैमिनी

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00:12:57,040 --> 00:13:01,200
धर्म को अपनाता। आपकी बात में दम है। मैंने जो नियम बनाए हैं, वे

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00:13:01,200 --> 00:13:05,200
मेरे अपने विचारों पर आधारित है और जरूरी नहीं कि हर कोई उनसे सहमत हो।

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00:13:05,200 --> 00:13:09,360
इसलिए उन्हें मानवता कहना शायद पूरी तरह से सही नहीं है। आप उन्हें

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00:13:09,360 --> 00:13:13,520
जैमिनी धर्म कहने का सुझाव दे रही हैं और यह एक अच्छा विचार है। इससे

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00:13:13,520 --> 00:13:17,520
यह स्पष्ट हो जाएगा कि यह मेरे अपने व्यक्तिगत नियम है। बहुत बढ़िया।

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00:13:17,520 --> 00:13:21,760
जय श्री राम। अगर आपको यह बातचीत अच्छी लगी तो मुझे बहुत खुशी हुई।

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00:13:21,760 --> 00:13:27,760
अगर आपके मन में और कोई सवाल हो तो मुझे जरूर बताइएगा।

198
00:13:40,400 --> 00:13:44,400
[संगीत]
