1
00:00:02,000 --> 00:00:06,080
जैसा कि आपने अभी बताया कि हमें गीता क्यों पढ़नी चाहिए? तो इससे एक

2
00:00:06,080 --> 00:00:10,240
और प्रश्न था गीता कहां से पढ़े? शुरुआत में तो वो बता

3
00:00:10,240 --> 00:00:14,400
जी ऐसा है कि भगवत गीता यद्यपि हमें

4
00:00:14,400 --> 00:00:18,480
शुरुआत से ही पढ़नी चाहिए। पर जो तात्विक जो उसमें

5
00:00:18,480 --> 00:00:22,640
जो मटेरियल जो हमें प्राप्त होता है स्मृति कि वहां ये हो रहा था।

6
00:00:22,640 --> 00:00:26,720
ये सब स्मृति का अंश है और इसके बाद एक वैसे उनका भी बहुत

7
00:00:26,720 --> 00:00:30,720
बहुमूल्य अर्थ निकाले जा सकते हैं, निकल सकते हैं। प्राप्त भी है।

8
00:00:30,720 --> 00:00:34,800
परंतु जो गीता का रस है जहां से चालू होता है

9
00:00:34,800 --> 00:00:39,200
वहां से चालू होता है। जब अर्जुन जी चिंता

10
00:00:39,200 --> 00:00:43,440
व्यक्त करने लगते हैं भगवान कि मैं मेरे सामने मेरे चाचा

11
00:00:43,440 --> 00:00:47,520
ताऊ खड़े हैं। मेरे सगे संबंधी खड़े हैं। तो मैं

12
00:00:47,520 --> 00:00:51,600
इन पर मैं इनका वध कैसे कर दूं? क्या कर मतलब ऐसा

13
00:00:51,600 --> 00:00:55,760
इससे अच्छा तो है मैं हथियार डाल के और चला जाऊं युद्ध छोड़ के तो

14
00:00:55,760 --> 00:00:59,840
भगवान उनको यह बताने के लिए कि तुम जिसके मरने के बारे में

15
00:00:59,840 --> 00:01:03,840
चिंता कर रहे हो वो चिंता तुम्हारी क्यों व्यर्थ है यह बताने

16
00:01:03,840 --> 00:01:07,920
के लिए एक विश्लेषण शुरू करते हैं कि तुम कौन हो ये कौन है

17
00:01:07,920 --> 00:01:11,920
फिर जीव कौन है ब्रह्म कौन है या ऐसे समझ लो कि

18
00:01:11,920 --> 00:01:16,000
भक्त कौन है भगवान कौन तो क्या होता है अब जैसे

19
00:01:16,000 --> 00:01:17,120
लोग कहते हैं कि गीता

20
00:01:17,120 --> 00:01:21,280
हमारे लाइफ में कैसे काम आती होती है। हम

21
00:01:21,280 --> 00:01:25,280
तो जब अर्जुन जी ने यह कहा कि मैं इनको कैसे मार दूं? तो भगवान ने बताना

22
00:01:25,280 --> 00:01:29,840
शुरू किया दूसरे अध्याय से कि भाई तुम्हारा

23
00:01:29,840 --> 00:01:33,920
वास्तविक स्वरूप जो है इनका वास्तविक स्वरूप जो है वो क्या है? नित्य

24
00:01:33,920 --> 00:01:38,080
सनातन सच्चिदानंद स्वरूप आत्मा हो तुम।

25
00:01:38,080 --> 00:01:42,800
ईश्वर के अंश हो तुम। तो तुम भी सच्चिदानंद ही हो। क्योंकि ईश्वर

26
00:01:42,800 --> 00:01:46,960
सच्चिदानंद ही है। तो जब यह बताना शुरू किया तभी यह श्लोक

27
00:01:46,960 --> 00:01:50,960
आया ना नैन छिनती शस्त्राण नैन दति पावका

28
00:01:50,960 --> 00:01:55,280
ना चैन क्ले शति वता तो आत्मा

29
00:01:55,280 --> 00:01:59,360
को कोई काट नहीं सकता आत्मा कोई आत्मा को कोई जला नहीं सकता सुखा नहीं

30
00:01:59,360 --> 00:02:03,760
सकता डुबो नहीं सकता ये सब चीजें उसमें आई तो आपको क्या पता लगा कि

31
00:02:03,760 --> 00:02:07,840
हमारा वास्तविक स्वरूप क्या है आत्मा जो सनातन है जो सच्चिदानंद है

32
00:02:07,840 --> 00:02:12,080
जिसको जो अविनाशी है जिसको कोई कभी कुछ नहीं कर सकता तो भगवान

33
00:02:12,080 --> 00:02:16,240
ने वहां अर्जुन को बताया क्योंकि आत्मा सन सनातन है अविनाशी है इसलिए उसको कोई

34
00:02:16,240 --> 00:02:20,240
कुछ नहीं कर सकता तो फिर तू इनके मरने की फिक्र क्यों कर रहा है तो भगवान को तो

35
00:02:20,240 --> 00:02:24,640
उसको यह बताना था कि तेरा इनके मरने की फिक्र करना व्यर्थ है मगर तुमको

36
00:02:24,640 --> 00:02:28,800
यहां पता चल गया कि तुम्हारा वास्तविक स्वरूप क्या है और तुम्हें उस वास्तविक

37
00:02:28,800 --> 00:02:32,480
स्वरूप तक पहुंचना है जो जहां तक अभी तुम पहुंचे

38
00:02:32,480 --> 00:02:36,480
हुए नहीं हो तुमको यहां पर ये पता इसलिए गीता रेलेवेंट

39
00:02:36,480 --> 00:02:40,880
है कहते है ना गीता का हमारे जीवन में क्या कारण है तो

40
00:02:40,880 --> 00:02:45,280
आप जिस सतचित आनंद को ढूंढने निकले हो वो सच्चिदानंद

41
00:02:45,280 --> 00:02:49,520
के लिए सबसे पहले आपको आपकी पहचान कहां से प्राप्त हुई? भगवत गीता

42
00:02:49,520 --> 00:02:53,600
में। वहां पे उनका वहां पे उनका यह उद्देश्य है कि अर्जुन को ये

43
00:02:53,600 --> 00:02:57,600
समझाया जाए कि तुम समझ रहे हो जिनके जिनका मरना वो मर रहे

44
00:02:57,600 --> 00:03:01,680
नहीं है। वास्तविकता में वो सदैव जीवित रहने वाले हैं। तो उनका मरना मरने

45
00:03:01,680 --> 00:03:05,760
की फिक्र करना व्यर्थ है। और यदि तुम उनके शरीर की चिंता कर रहे हो तो

46
00:03:05,760 --> 00:03:09,920
शरीर तो कुछ दिन पहले नहीं था और कुछ दिन बाद भी नहीं होगा तो भी तुम्हारी चिंता

47
00:03:09,920 --> 00:03:14,000
करना व्यर्थ है। आज नहीं तो कल ये लोग मरेंगे ही। तो फिर तुम्हारी चिंता करना

48
00:03:14,000 --> 00:03:18,000
व्यर्थ है। तो इस तरीके से अर्जुन को समझाने के निमित्त जो बातें कही

49
00:03:18,000 --> 00:03:23,280
भगवान ने वह आपसे कनेक्ट हो जाती है। एक इसमें बात आती है कि

50
00:03:23,280 --> 00:03:27,760
आपके मन में एक सवाल आएगा कि जैसे कि iPhone

51
00:03:27,760 --> 00:03:31,760
है। iPhone के प्रति अट्रैक्शन आपके

52
00:03:31,760 --> 00:03:35,920
अंदर कब आया? जब आपको पता चला कि किसी वैज्ञानिक ने किसी कंपनी

53
00:03:35,920 --> 00:03:40,320
ने अमुक नाम की कंपनी ने iPhone बना दिया है।

54
00:03:40,320 --> 00:03:44,480
ठीक है? अच्छा आपके अंदर यह जो सब कुछ प्राप्त कर लेने

55
00:03:44,480 --> 00:03:47,840
की चाह है कि मैं सदैव खुश रहूं

56
00:03:47,840 --> 00:03:51,840
तो यह चाह क्यों आई आपके अंदर जब आपको मालूम ही

57
00:03:51,840 --> 00:03:56,240
नहीं है किसी ने बताया ही नहीं है कि जो है इस दुनिया में कोई सच्चिदानंद

58
00:03:56,240 --> 00:04:00,240
स्वरूप परमेश्वर है तो उसको प्राप्त करने की इच्छा आपके अंदर कैसे

59
00:04:00,240 --> 00:04:04,480
आ रही है जब आपको बताया ही नहीं इस दुनिया में कोई Samsung

60
00:04:04,480 --> 00:04:08,640
S24 अल्ट्रा है तो आप Samsung S24 अल्ट्रा को

61
00:04:08,640 --> 00:04:12,800
ढूंढने क्यों जाओगे? सही बात है। तो यहां से एक चीज निकल के आएगी कि

62
00:04:12,800 --> 00:04:17,040
क्योंकि तुम उसके अंश हो क्योंकि जो उसके गुण है जो उसके लक्षण है वही

63
00:04:17,040 --> 00:04:21,760
तुम्हारे भी है। इसलिए तुम्हारे अंदर उसके प्रति अट्रैक्शन है।

64
00:04:21,760 --> 00:04:25,920
जैसे कि जो जहां से निकलता है उसी की ओर वापस उसी

65
00:04:25,920 --> 00:04:30,000
को वापस प्राप्त हो जाने के निमित्त वो करता है। जैसे कि अग्नि

66
00:04:30,000 --> 00:04:34,000
जब लपट बनके जलती है तो आकाश में स्थित सूर्य की ओर भागती

67
00:04:34,000 --> 00:04:38,000
है। कभी भी इधर-उधर नहीं भागती। हवा चले कोई बाधा उसको उत्पादित

68
00:04:38,000 --> 00:04:42,240
करे तो ठीक है। वरना उसका इशारा किस ओर होता है? आकाश की तरफ जहां सूर्य

69
00:04:42,240 --> 00:04:46,320
स्थित है। और जैसे कि झरने

70
00:04:46,320 --> 00:04:50,400
इत्यादि पृथ्वी के गर्भ से निकलते हैं और फिर दोबारा जो मूल स्त्रोत है

71
00:04:50,400 --> 00:04:54,480
समुद्र की ओर भागने लगते हैं तुरंत। इवन जो

72
00:04:54,480 --> 00:04:58,800
जड़ धरती से निकलने वाले पेड़

73
00:04:58,800 --> 00:05:02,800
पौधे इत्यादि वो भी इसीलिए फलते फूलते हैं। वापस एक दिन मिट्टी में ही

74
00:05:02,800 --> 00:05:03,300
मिल

75
00:05:02,960 --> 00:05:06,960
जाना है। मिट्टी से ही निकले। तो इसी प्रकार से क्योंकि हमारा अस्तित्व भी

76
00:05:06,960 --> 00:05:11,040
अविनाशी है। हम भी हमारी आत्मा हम जो आत्म स्वरूप है हम भी

77
00:05:11,040 --> 00:05:15,120
सच्चिदानंद हैं। इसलिए हम सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर की

78
00:05:15,120 --> 00:05:19,200
ओर बिना किसी के कहे ही अट्रैक्ट होते हैं। तो

79
00:05:19,200 --> 00:05:23,280
क्या हुआ कि जब हमने गीता पढ़ी तो उधर तो वो अर्जुन को समझा रहे

80
00:05:23,280 --> 00:05:27,520
हैं कि भाई वो अविनाशी है, सच्चिदानंद है, सनातन है, नित्य

81
00:05:27,520 --> 00:05:31,520
है। है ना? ये सब वो अर्जुन को समझा रहे हैं। ये समझाने के लिए कि तू इनके

82
00:05:31,520 --> 00:05:35,760
मरने की चिंता मत कर। मगर हमको क्या समझ में आ रहा है कि हमारा वास्तविक

83
00:05:35,760 --> 00:05:39,840
स्वरूप क्या है? नित्य है, सनातन है, अविनाशी है। इसलिए हमारे अंदर

84
00:05:39,840 --> 00:05:43,920
बचपन से ही गर्व जन्म से ही सच्चिदानंद को प्राप्त

85
00:05:43,920 --> 00:05:48,000
लेने की इच्छा इनबिल्ट है। तो इसलिए गीता रेलेवेंट

86
00:05:48,000 --> 00:05:52,080
है और गीता इस इस तरीके से आपके कार्य में आती है। जी। मैं समझता

87
00:05:52,080 --> 00:05:56,400
हूं कि आपको काफी कुछ जान जी भैया। बहुत-बहुत शुक्रिया आपका। थैंक यू सो मच भैया।

88
00:05:56,400 --> 00:06:02,400
चलिए जय श्री राम। जय श्री राम भैया।

89
00:06:04,790 --> 00:06:08,790
[संगीत]
