1
00:00:07,440 --> 00:00:11,520
इसमें जो टॉपिक रह रहे हैं हमारे सिद्धांतिक चर्चा के एक तो हम

2
00:00:11,520 --> 00:00:15,520
उस पे चर्चा कर रहे थे परंपरा पे तो परंपरा वाला टॉपिक

3
00:00:15,520 --> 00:00:19,520
छूटा था। परंपरा वाला टॉपिक में वो तुमने वशिष्ठ को नहीं माना। मैंने

4
00:00:19,520 --> 00:00:23,600
जो है फिर तुमको ये पूछा है कि भाई ऐसे अच्छा परंपरा वाले विषय में थोड़ी सी मैं

5
00:00:23,600 --> 00:00:27,680
क्लेरिटी चाहता हूं आपसे। हम्म कि जैसे आप जैसे जैसे तुम

6
00:00:27,680 --> 00:00:31,840
ऐसे ऋषियों पर आपत्ति उठा रहे हो जिनकी आयु जो है 1 लाख वर्ष थी या

7
00:00:31,840 --> 00:00:36,000
इतने हजार वर्ष थी तो मैं ऐसे ऋषियों पे आपत्ति उठा रहा हूं जिनके

8
00:00:36,000 --> 00:00:40,080
अंतःकरण में वेद प्रकट हुआ ऐसा शरीर आज दिखा दो कहां है नहीं

9
00:00:40,080 --> 00:00:44,240
जिसमें वेद प्रकट होता है मैंने तो आपको उसका सारा उत्तर उत्तर दे दिया था रिकॉर्डिंग में सुन लीजिएगा

10
00:00:44,240 --> 00:00:48,320
नहीं मैंने सुना था मैंने सुना था उसमें तुमने कहा है उसमें तुमने

11
00:00:48,320 --> 00:00:52,400
हमको यह कहा है अनुमान प्रमाण से क्योंकि हमें धर्म प्राप्त है तो वहां

12
00:00:52,400 --> 00:00:56,400
पर धर्म प्राप्त होना सिद्ध हो रहा है मगर वो वो अंतःकरण में आकर के प्राप्त होना सिद्ध नहीं

13
00:00:56,400 --> 00:01:00,400
हो रहा। नहीं वो तो हम मन में अपने विचार करते हैं कि नहीं करते? नहीं

14
00:01:00,400 --> 00:01:04,400
मैं ये कह रहा हूं वो हमें धर्म हमारे पास आज

15
00:01:04,400 --> 00:01:08,480
की तारीख में है। इससे यह सिद्ध हुआ कि ईश्वर ने ही धर्म दिया।

16
00:01:08,480 --> 00:01:12,560
मगर माध्यम अंतःकरण में था। ये थोड़ी ना है। हो सकता है आंखों

17
00:01:12,560 --> 00:01:16,720
से आंखों से कुछ उसने लिख के बताया हो तो उन्होंने देखा। इसका इसका इसका भी उत्तर

18
00:01:16,720 --> 00:01:21,440
है। इसका उत्तर है। इसका उत्तर है। अगर आप कहोगे मुंह से बोल के बताया। हम

19
00:01:21,440 --> 00:01:22,480
ठीक है तो खैर मैं

20
00:01:22,480 --> 00:01:27,110
ये ये जो मूल विषय ये घुसेगा सर्वशक्तिमान वाले में घुसेगा तो मैं इसका उत्तर आपको दूंगा आगे

21
00:01:27,110 --> 00:01:31,360
[गला साफ़ करने की आवाज़] लेकिन जब ये सर्वशक्तिमान वाला विषय आएगा तो मैं वहां पर आपको इस चीज को क्लेरिटी दे दूंगा लेकिन जो अंतकरण

22
00:01:31,360 --> 00:01:35,520
वाला था अंतकरण में कैसे हुआ इसका मैंने आपको अनुमान प्रमाण से सिद्ध किया था अंतकरण से

23
00:01:35,520 --> 00:01:39,520
ये अनुमान प्रमाण से यह सिद्ध है कि भाई धर्म उसी से मिला

24
00:01:39,520 --> 00:01:43,520
ईश्वर से ये सिद्ध है जो प्रक्रिया आप बता

25
00:01:43,520 --> 00:01:47,680
रहे हो वो चमत्कारिक है ना चमत्कारी को तो फिर उसका

26
00:01:47,680 --> 00:01:52,000
प्रत्यक्ष प्रमाण दिखाओ [हंसी] और ना ही आपने बच्चे का प्रत्यक्ष

27
00:01:52,000 --> 00:01:56,880
प्रमाण दिया कि बिना मां के बच्चा कहां जन्म ले रहा है आज? कोई

28
00:01:56,880 --> 00:02:00,960
बात नहीं। चलिए आपने दिए थे इसके जवाब आपने मगर वो संतुष्टिजनक नहीं

29
00:02:00,960 --> 00:02:04,960
दिए थे। बिना मां के मनुष्य जन्म नहीं ले रहा है आज की तारीख में।

30
00:02:04,960 --> 00:02:09,280
देखिए उसमें बात ये आ जाती है ना कि जब तीन प्रमाण समझने

31
00:02:09,280 --> 00:02:13,520
पड़ते हैं। अब अनुमान प्रमाण आप नहीं समझे तो फिर उसमें थोड़ा सा एक इशू होता है। बाकी रिकॉर्डिंग

32
00:02:13,520 --> 00:02:17,600
आप फिर से सुनेंगे ना। हनुमान प्रमाण से हमने हनुमान प्रमाण से हमने

33
00:02:17,600 --> 00:02:22,080
अगर हनुमान प्रमाण की बात आएगी तो हनुमान से तो हमने सर्वशक्तिमान भी सिद्ध किया है ना।

34
00:02:22,080 --> 00:02:26,160
कहां से सर्वशक्तिमान शब्द वो तो सच्चिदानंद सिद्ध हो रहा है। सर्वशक्तिमान कहां सिद्ध हो रहा है?

35
00:02:26,160 --> 00:02:30,320
सच्चिदानंद का जो सच्चिदानंद जहां से वो सिद्ध हो रहा है उसका जो व्यवहारिक

36
00:02:30,320 --> 00:02:34,960
रूप है वो तो वही है ना सब कुछ कर सकने वाला। ये जो सब कुछ कर सकने वाला देखिए

37
00:02:34,960 --> 00:02:37,520
ईश्वर की सिद्धि किस चाह से हो रही है? मौलिक चाह

38
00:02:37,520 --> 00:02:42,160
से। वो मौलिक चाह पता कैसे चल रही है कि मौलिक चाह है। उसका अवतार क्या है?

39
00:02:42,160 --> 00:02:46,160
एग्जीक्यूशन कैसे हो रहा है? हां। व्यवहार में हमें

40
00:02:46,160 --> 00:02:50,240
कैसे पता चल रहा है कि मूल में यह चाह है? यह तो जब हम अपने

41
00:02:50,240 --> 00:02:54,240
अंदर एनालाइज करेंगे उसी से पता चलेगा ना। हमारे व्यवहार से पता चल रहा है ना। हमें डर लग रहा

42
00:02:54,240 --> 00:02:58,400
है हम भाग रहे हैं। तो ये व्यवहार आ गया। तो वो जो जो इच्छाओं

43
00:02:58,400 --> 00:03:02,560
का मौलिक स्वरूप है सच्चिदानंद उसका अवतार हो गया कि हम भाग रहे हैं। हम

44
00:03:02,560 --> 00:03:06,560
जो है ये चाह रहे हैं वो चाह रहे हैं। उसका प्रकटीकरण ये हो गया। हां। तो

45
00:03:06,560 --> 00:03:10,640
बस ऐसे ही जब जैसे वो जो मौलिक चाह है उसका प्रकटीकरण ये

46
00:03:10,640 --> 00:03:14,720
है ऐसे ही उस चाह का मैं थोड़ा सा ओवरव्यू उसमें दे देता हूं एक एक मिनट

47
00:03:14,720 --> 00:03:19,040
जैसे वो जो मौलिक चाह है सच्चिदानंद की मौलिक चाह उसका प्रकटीकरण

48
00:03:19,040 --> 00:03:23,280
इसमें हो गया वैसे ही उस मौलिक चाह का जो मौलिक निवारण है

49
00:03:23,280 --> 00:03:27,440
सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर उसका प्रकटीकरण इसमें हो गया

50
00:03:27,440 --> 00:03:31,920
व्यवहार क्या हो गया क्या हो गया जैसे अवतार

51
00:03:31,920 --> 00:03:36,560
लेना जैसे मौलिक जैसे हमारे जैसे प्रकटीकरण

52
00:03:36,560 --> 00:03:40,640
से हमारी उस तर्क से तो आप सर्वशक्तिमान की सिद्धि करें। अवतार बीच में कहां से आ

53
00:03:40,640 --> 00:03:42,800
गया?

54
00:03:42,800 --> 00:03:46,880
सर्वशक्तिमान है सब कुछ कर सकने वाला ये आगे तो ना

55
00:03:46,880 --> 00:03:51,520
जब वो पहले सिद्ध हो जाएगा तब तो उसे अवतार पे आएंगे ना।

56
00:03:51,520 --> 00:03:52,640
अभी तो आप अवतार पे बात

57
00:03:52,640 --> 00:03:56,720
अभी तो आप सर्वशक्तिमान पे बात कर रहे हैं तो आप अवतार पे चले। सर्वशक्तिमान इसीलिए तो नहीं सिद्ध

58
00:03:56,720 --> 00:04:00,880
होता है कि तुम अवतार पे बाधित कर देते हो उसे। इसमें इसमें लंबी चर्चा जाएगी।

59
00:04:00,880 --> 00:04:05,120
मैं इसमें ओवरव्यू दे रहा हूं मैं कि एक तो यह हमारा इसमें था

60
00:04:05,120 --> 00:04:09,200
जो मैंने अभी बोला ना परंपरा वाला तो परंपरा वाले में जो आप वशिष्ठ जी की

61
00:04:09,200 --> 00:04:13,600
लंबी आयु कह रहे थे चलिए ठीक है अगर मैंने उसको मैंने उसमें बोला भी था कि दुर्जन

62
00:04:13,600 --> 00:04:17,680
तो उसने ऐसे अगर मैं मान लेता हूं कि वो जो परंपरा है वो ठीक चली आ रही है। ठीक है हम और

63
00:04:17,680 --> 00:04:21,680
जो शास्त्र है वो सारे उसी परंपरा से चले हैं और बाद में वो परंपराएं की बहुत सारी

64
00:04:21,680 --> 00:04:25,920
शाखाएं बनती चली गई विशिष्टा द्वैत द्वैत इत्यादि इत्यादि और सारे शास्त्र अलग-अलग

65
00:04:25,920 --> 00:04:30,240
पंडितों के माध्यम से हमें मिले हैं। ठीक है। अब इसमें बात यह आ जाती है कि

66
00:04:30,240 --> 00:04:34,320
लेकिन फिर यह आता है कि आपने हमसे परंपरा पूछी क्यों? तो जो मैं

67
00:04:34,320 --> 00:04:38,320
कारण समझ में आया आप मुझे करेक्ट कर दिए मैं गलत हूं। तो तो मैं

68
00:04:38,320 --> 00:04:42,400
जो कारण समझ पाया वो ये था कि आपका मूल चीज ये था कि भैया जितने भी शास्त्र है वो सारे

69
00:04:42,400 --> 00:04:46,400
परत प्रमाण है। वेद जो है वो स्वतः प्रमाण है। तो वेद का जो अर्थ

70
00:04:46,400 --> 00:04:51,440
होगा उस हिसाब से बाकी सारे शास्त्रों के अर्थ मानने पड़ेंगे उसे क्योंकि वेद के विरुद्ध नहीं हो सकते।

71
00:04:51,440 --> 00:04:55,520
और अर्थ जो आएगा वो परंपरा से ही मानना पड़ेगा। और जो हमने जो

72
00:04:55,520 --> 00:04:59,520
है वो अर्थ वेदों का अलग कर रखा है। आपने अलग कर रखा है। तो आप कह रहे हो कि भैया आपने अलग

73
00:04:59,520 --> 00:05:03,920
कैसे कर दिया? ये परंपरा के विरुद्ध होने से अमान्य है। ये मोटा-मोटा पॉइंट है।

74
00:05:03,920 --> 00:05:07,680
हां। अब इसमें पॉइंट ये है समझने वाला जो पॉइंट है कि जब आप

75
00:05:07,680 --> 00:05:11,760
कह रहे हैं कि परंपरा से अर्थ आए हैं तो क्या आप ये कह रहे हैं कि ईश्वर ने जो वेद दिए

76
00:05:11,760 --> 00:05:15,760
थे उसी समय ईश्वर ने वेद का अर्थ भी जनाया था और वो अर्थ परंपरा से चले आ रहे हैं आज तक। क्या आप ये

77
00:05:15,760 --> 00:05:20,320
मानते हैं? बिल्कुल। हां तो मेरे पास इसका विरोध मैं प्रमाण में दे देता हूं। बता

78
00:05:20,320 --> 00:05:25,120
इसका आप खोलिए। निरुक्त एक 20

79
00:05:25,120 --> 00:05:29,360
निरुक्त एक 20 इसमें लिखा हुआ है कि जो परंपरा

80
00:05:29,360 --> 00:05:33,760
से जो समाधि अवस्था में जो ऋषियों को अर्थ जाने थे ना वेदार्थ हम

81
00:05:33,760 --> 00:05:37,840
वो लोग लोगों को देते थे लेकिन लोगों की जो स्मृतियां है वो शीड होने लग

82
00:05:37,840 --> 00:05:41,920
गई तो फिर वो अर्थ जो है वो भूलने लग गए हम फिर ऋषियों ने

83
00:05:41,920 --> 00:05:45,920
वेदांगों की रचना की हम और वेदांगों में निरुक्त निघंटु और

84
00:05:45,920 --> 00:05:50,000
ये व्याकरण आदि जो है वेदांग इनकी उन्होंने रचना की और यानी जो फिर

85
00:05:50,000 --> 00:05:54,000
यह हुआ कि अब जो वेदों का अर्थ होगा वो वेदांगों के आधार पे होगा

86
00:05:54,000 --> 00:05:58,160
वेदांगों के आधार पे होगा मगर वह आधार भी तो उन्होंने ही दिया

87
00:05:58,160 --> 00:06:02,160
वो वो हमारे शब्द प्रमाण के विरुद्ध थोड़ी ना जाएगा नहीं उसमें

88
00:06:02,160 --> 00:06:06,160
आप समझिए इसमें पॉइंट क्या आता है हम हम हम जो अर्थ देते हैं उसमें वेदांगों

89
00:06:06,160 --> 00:06:10,400
का विरोध थोड़ी ना है और सुनो तो सुनो

90
00:06:10,400 --> 00:06:14,400
सुनो सुनो सुनो दिक्कत क्या है दिक्कत ये है कि अगर आप यह

91
00:06:14,400 --> 00:06:18,400
मानते हो कि आपका वेदांगों के अकॉर्डिंगली है उनका नहीं है

92
00:06:18,400 --> 00:06:22,400
तो फिर आपको यह मानना पड़ेगा कि ये लोग जो है ये आपसे झूठे आपको झूठ

93
00:06:22,400 --> 00:06:22,900
झूठ बोल

94
00:06:22,800 --> 00:06:26,800
रहे हैं। कैसा झूठ? मन जो ये कि हम जो

95
00:06:26,800 --> 00:06:30,800
ये कह रहे हैं कि नहीं हमारा वेदांगों के साथ है। नहीं हमारा अर्थ वेदांग से

96
00:06:30,800 --> 00:06:34,800
ही है। तो आपको उन्हें झूठा सिद्ध करना झूठा मानना पड़ेगा। तो

97
00:06:34,800 --> 00:06:38,880
जब आप उनको झूठा मान लोगे तो आप उनसे द्वारा मिलने वाले मंत्रों को आप

98
00:06:38,880 --> 00:06:44,320
प्रामाणिक नहीं मान सकते। ये वही मंत्र है जो हम ईश्वर से लेके आए हैं।

99
00:06:44,320 --> 00:06:48,400
नहीं क्योंकि जरूरी नहीं है ना। जरूरी इसलिए नहीं है। इसलिए नहीं है मैं आपको

100
00:06:48,400 --> 00:06:52,400
बताता हूं। हम क्योंकि देखिए क्या है वेद जो चले आ रहे हैं वो तो हम

101
00:06:52,400 --> 00:06:56,640
मंत्रों को रटते आ रहे हैं। ठीक है? अब ऐसा हो रहा है कि मतलब

102
00:06:56,640 --> 00:07:00,880
वो तो परंपरा से चला आ रहा है जो वेद चला आ रहा है वो परंपरा लेकिन जो वेदार्थ है वो परंपरा

103
00:07:00,880 --> 00:07:05,040
से नहीं वेदार्थ नष्ट हो चुका है परंपरा से तो वेदार्थ करने के लिए जो रीति

104
00:07:05,040 --> 00:07:09,040
बताई गई है वो कही है वेदांग आप पढ़ो परंपरा से शास्त्र चले आ रहे हैं वेदांग जो शास्त्र

105
00:07:09,040 --> 00:07:13,280
है वो परंपरा से चले आ रहे हैं हम और उन शास्त्रों

106
00:07:13,280 --> 00:07:17,360
को जो है हम वो पढ़ेंगे परंपरा से और फिर उन शास्त्रों के द्वारा वेदांगों का

107
00:07:17,360 --> 00:07:21,360
अर्थ मतलब वेदों का अर्थ करेंगे हम मान लीजिए मैं पूरा बोल देता हूं मैं

108
00:07:21,360 --> 00:07:25,520
मैं थोड़ा सा पूरा बोल देता हूं मुझे निकलना भी है। जी जी।

109
00:07:25,520 --> 00:07:30,320
अब उसमें 10 पंडित है। 10 पंडितों ने वेदांग पढ़े हैं और वेदांग पढ़ पढ़ के अपने अपने

110
00:07:30,320 --> 00:07:34,400
वेदांगों के ज्ञान से अपना जो है उन्होंने अर्थ किए हैं। अब उसमें से हमें देखना पड़ेगा ना कि किसका

111
00:07:34,400 --> 00:07:37,920
जो है वेदांग अब उसमें विरोधाभास आ रहा है। तो हम तो चेक करेंगे किसका सही है किसने

112
00:07:37,920 --> 00:07:42,000
क्या गलती क्योंकि मनुष्य मनुष्य गलती कर सकता है। है ना? तो उसमें किसने ऐसा तो नहीं किसी

113
00:07:42,000 --> 00:07:46,240
व्याकरण के नियम में उसने फलाना गलती कर दी, फलाना गलती कर दी। हम इत्यादि को चेक करना पड़ता है।

114
00:07:46,240 --> 00:07:50,320
हम अंतत यह जो है यह बात इसी पर आ जाएगी कि इस आर्य

115
00:07:50,320 --> 00:07:54,640
समाज का जो भाषा है वो स्वामी दयानंद जी का जो भाषा है वो वेदांगों के अनुकूल है या शणाचार्य

116
00:07:54,640 --> 00:07:58,640
जी का जो भाषा है वो वेदांगों के अनुकूल है वो इसी और इसकी जो जांच है वो व्याकरण के वो

117
00:07:58,640 --> 00:08:02,720
कर पाएंगे। ठीक है। अब यह बात हो गई तुम्हारी। पहली बात इसमें यह

118
00:08:02,720 --> 00:08:06,880
वाला वो है कमीज कि वहां पर जो बात हो रही है वो इस केस

119
00:08:06,880 --> 00:08:10,960
में हो रही है कि स्मृति क्षीण हो रही है। इसलिए ये वाला सहारा भी रख लो।

120
00:08:10,960 --> 00:08:15,360
है ना? मगर सहारा थोड़ी है। सुनो तो मेरी बात सुनो।

121
00:08:15,360 --> 00:08:19,840
मगर यह नहीं है कि अगर किसी को याद है तो उसका विरोध विरोध ही करो।

122
00:08:19,840 --> 00:08:23,920
याद कहां है? याद तो है नहीं ना। परंपरा से वो तो खत्म हो चुका है। नहीं खत्म। उन्होंने यह

123
00:08:23,920 --> 00:08:28,000
कहा था खत्म हो चुका है या स्मृति हो रही कहा था। स्मृतिश होने से जो अर्थ था

124
00:08:28,000 --> 00:08:32,320
वो लुप्त हो गया। लुप्त हो गया। रचना की खत्म हो गया। आप पढ़िए

125
00:08:32,320 --> 00:08:36,320
ना तो खत्म हो गया तो रचना कैसे कर दी? उसको उसको सिद्ध करने

126
00:08:36,320 --> 00:08:40,320
के लिए वैसे ईश्वर को आना पड़ेगा अर्थ कि मैं

127
00:08:40,320 --> 00:08:44,560
बता दे रहा हूं ना जब हुआ ये कि जब अर्थ लोग स्मृति शीड होने लग गई। ठीक है?

128
00:08:44,560 --> 00:08:48,720
लुप्त का मतलब वहां मानना पड़ेगा कि प्राय लुप्त हो चला। अगर

129
00:08:48,720 --> 00:08:53,040
पूरा लुप्त मान लेंगे तो दोबारा भगवान को आना पड़ेगा देने के लिए ना क्योंकि हम अपने से तो

130
00:08:53,040 --> 00:08:57,280
अर्थ ज्ञान ले नहीं सकते हैं उसका। नहीं उसमें यह हुआ ना

131
00:08:57,280 --> 00:09:01,280
कि जो समाधिष्ट योगी थे उन्होंने तो यानी समाधिष्ट योगी कुछ

132
00:09:01,280 --> 00:09:05,360
लोगों को मैं पूरा मैं समझ गया मैं समझ गया यानी समाधि नहीं समझे मैं

133
00:09:05,360 --> 00:09:09,360
पूरा बोलना चाहता हूं मेरे को मैं चाहता हूं बताओ बताओ बताओ अब उसमें बात ये है

134
00:09:09,360 --> 00:09:13,440
ना कि अब समाधिष्ट योगी थे अब जब अब ऐसा तो नहीं कि एक ही सेकंड में पूरा वाइप आउट हो गया थर्नस

135
00:09:13,440 --> 00:09:17,520
की तरफ वो तो हुआ नहीं वही मैं कह रहा हूं मैं अब जब उसमें लुप्त होना जब लुप्त होना

136
00:09:17,520 --> 00:09:21,600
चालू हो रहा है ठीक है तो ऋषियों को समझ में आया कि भैया इनकी मेमोरी जो है उतनी तगड़ी है नहीं

137
00:09:21,600 --> 00:09:25,760
ये लोग वेद भी याद करे [गला साफ़ करने की आवाज़] फिर सारा अर्थ भी याद करें एक इंतजाम कर दो उन्होंने क्या

138
00:09:25,760 --> 00:09:29,760
उन्होंने क्या किया वेदांगों की रचना की ठीक है ऋषियों ने समाधिस्थ

139
00:09:29,760 --> 00:09:33,840
जो ऋषि थे उन्होंने वेदांगों की रचना की अब ये हो गया कि भैया अब आपको मंत्र याद करने की

140
00:09:33,840 --> 00:09:38,080
जरूरत नहीं है अब आप वेदांग पढ़ो वेदांग से अर्थ करो नहीं ये उन्होंने ये नहीं कहा

141
00:09:38,080 --> 00:09:42,160
कि जो है परंपरा से नहीं होगा क्योंकि उन्होंने अपने भाष्य में कई जगह परंपरा से शास्त्र

142
00:09:42,160 --> 00:09:46,240
आ रहे हैं सुनो तो उन्होंने उन्होंने जो उन्होंने जो क्या

143
00:09:46,240 --> 00:09:50,560
कहते हैं उन्होंने यह माना है कि परंपरा से जो है श्रुति परंपरा से ही वो वेदार्थ निकाला

144
00:09:50,560 --> 00:09:54,640
जाएगा। यह भी माना उन्होंने परंपरा मैं निरुक्त मैं निरुक्त से निकाल के दे

145
00:09:54,640 --> 00:09:58,880
दूंगा। हां मुझे आप बताइए मैंने आपको बताया एक 20 में आप चेक करेंगे

146
00:09:58,880 --> 00:10:02,960
श्रुति का सुनो श्रुति का मतलब ही होता है। श्रुति का मतलब ही है कि

147
00:10:02,960 --> 00:10:07,200
हम जो है श्रुति से कर रहे हैं। अगर ज्ञान का ज्ञान निकाल रहे हैं तो श्रुति

148
00:10:07,200 --> 00:10:08,800
का मतलब ही है कि परंपरा।

149
00:10:08,800 --> 00:10:12,800
नहीं तो श्रुति का मतलब ये लिखा हुआ है ना कि जो श्रुति से जो वेदांत चले थे वो नष्ट हो गए और

150
00:10:12,800 --> 00:10:16,880
वेदांगो से अर्थ हो गया। नष्ट हो गए। हां ये लिखा उन्होंने

151
00:10:16,880 --> 00:10:20,960
नष्ट हो गए। अरे आप आप पढ़िए वो भाव उसी में पता चल जाएगा आपको क्या है क्या नहीं है उसमें

152
00:10:20,960 --> 00:10:24,960
मैं मैं कहता हूं कि मेरे बोलने पे मत सुनिए खुद ही चेक कर लीजिए ना क्या लिखा है अगर आपको उसमें विशेष

153
00:10:24,960 --> 00:10:29,120
उसमें परंपरा की बात भी कई जगह हुई है निरुक्त में ही मैंने खुद

154
00:10:29,120 --> 00:10:33,200
निरुक्त में जो भी परंपरा की बात हुई है वो वेदार्थ की परंपरा की बात हुई है और वेदार्थ में

155
00:10:33,200 --> 00:10:37,440
मैं कह रहा हूं निरुक्त में जो 120 देखो अगर अगर हम कुछ

156
00:10:37,440 --> 00:10:41,600
भी करके जो हमें मंत्र दे रहे हैं उनको झूठा सिद्ध करेंगे कि भैया

157
00:10:41,600 --> 00:10:45,840
यह जो है हमको गलत ज्ञान दे रहे हैं तो हमें उनकी क्रेडिबिलिटी

158
00:10:45,840 --> 00:10:49,840
पर उंगली उठनी उठ उठानी पड़ेगी। नहीं तो जो मंत्र दे रहे हैं उनप थोड़ी

159
00:10:49,840 --> 00:10:53,840
मैं कुछ कह रहा हूं। जिन्होंने मंत्र तो मंत्र फिर हमें मंत्र पर विश्वास

160
00:10:53,840 --> 00:10:57,840
क्यों? देखिए जो आपसे गलत बात बोल रहा है जो अर्थ बोल रहा है गलत। ठीक है तो मैं

161
00:10:57,840 --> 00:11:02,080
साराचार्य से मंत्र थोड़ी ले रहा हूं। आप कहीं से भी ले आपको फिर अपनी परंपरा

162
00:11:02,080 --> 00:11:06,320
बतानी पड़ेगी जहां से आप ले रहे हो वो। वो आपकी है नहीं। जैसे समझिए इस चीज को। जैसे

163
00:11:06,320 --> 00:11:11,520
जैसे मान लीजिए मैंने कोई कोई भी दूसरे आचार्य हैं जो परंपरा से रूप से अपना

164
00:11:11,520 --> 00:11:15,600
उसे आप उसके विरुद्ध नहीं जा सकते अर्थ में। अरे तो उसमें बात ये है

165
00:11:15,600 --> 00:11:19,760
ना बात क्या है? बात यह है कि परंपरा से तो हमें मंत्र मिल रहे हैं। अरे

166
00:11:19,760 --> 00:11:23,920
वही उन्ही मंत्रों की क्रेडिबिलिटी की बात कर रहा हूं ना जो व्यक्ति द्वेषी हो सकता

167
00:11:23,920 --> 00:11:28,080
है। जब एक मिनट तुम इसमें वो बताओ कहां का छपा हुआ है तुम्हारा निरुक्त?

168
00:11:28,080 --> 00:11:32,560
कहीं से भी ले लीजिए आप। एक भी चेक कर लीजिए। कोई सा भी खोल लीजिए। किसी के भाषा उठा लीजिए।

169
00:11:32,560 --> 00:11:36,880
नहीं वो पेज नंबर बता देते तो जल्दी हो जाता।

170
00:11:36,880 --> 00:11:41,040
नहीं मेरे पास जो आपके प्रथम है ना आपके पास में किसका? प्रथम

171
00:11:41,040 --> 00:11:46,560
पाद में है। हां प्रथम

172
00:11:46,560 --> 00:11:50,640
एक 20 देख लीजिए। अब बात यह आ जाती है कि मंत्र जो हमने

173
00:11:50,640 --> 00:11:54,640
लिए वो तो परंपरा से लिए हैं। जो अर्थ है वह परंपरा से थोड़ी है। अगर अर्थ परंपरा से

174
00:11:54,640 --> 00:11:58,640
होते तो मानना पड़ता। परंपरा प्राप्त अर्थ को नकारते तो फिर वेद मंत्र को नकारने की बात

175
00:11:58,640 --> 00:12:02,720
आती। अभी जो शणाचार्य का अर्थ है वो फिर परंपरा से थोड़ी वेदांग के आधार पे उसमें त्रुटियां

176
00:12:02,720 --> 00:12:08,240
इसे नकार। एक मिनट एक मिनट। इसमें तो 20वा है ही नहीं।

177
00:12:08,240 --> 00:12:11,920
पाद एक मिनट

178
00:12:11,920 --> 00:12:14,800
दृतीय पाद

179
00:12:14,800 --> 00:12:18,800
इसको कह रहेगे द्वितीय पाद में प्रथम अध्याय अध्याय

180
00:12:18,800 --> 00:12:23,280
प्रथम अध्याय का 20वा आएगा निपात लक्षणम तो नहीं है निपात

181
00:12:23,280 --> 00:12:27,280
लक्षण नहीं है उसका दूसरा वचन होगा उसमें नाम क्या है जैसे 20व

182
00:12:27,280 --> 00:12:33,280
में बहुत सारे वचन है ना उसमें दूसरा वचन होगा देखिए

183
00:12:35,280 --> 00:12:41,280
यही है एक मिनट

184
00:12:50,290 --> 00:12:54,320
[गला साफ़ करने की आवाज़] इसमें तुम्हारी वाली बात नहीं है। तुम ऐसा करो मुझे फोटो खींच

185
00:12:54,320 --> 00:12:58,560
के भेज दो। अरे आप जो जो आप पढ़ रहे हैं ना उसी के थोड़ा सा और नीचे जाइए

186
00:12:58,560 --> 00:13:04,560
नीचे पेज पे और वहां पे दूसरा वचन आपको संस्कृत में दिखेगा। उसकी हिंदी पढ़िए।

187
00:13:05,440 --> 00:13:09,440
एक अध्याय में केवल एक ही वचन थोड़ी है। एक पाठ में एक ही वचन थोड़ी है। वेदकालीन समाज

188
00:13:09,440 --> 00:13:13,680
में वैदिक संस्कृति ऋषियों द्वारा देवताओं के लिए प्रयुक्त होती

189
00:13:13,680 --> 00:13:18,000
थी। देवता विषयक ऋषियों द्वारा दृष्ट वैदिक

190
00:13:18,000 --> 00:13:22,480
मंत्र इसी भाषा में निबद्ध हैं। इन मंत्रों के अध्ययन के लिए आगे-आगे

191
00:13:22,480 --> 00:13:26,560
आचार्य इन मंत्रों का उच्चारण करता था तथा उनके पीछे-पीछे

192
00:13:26,560 --> 00:13:30,560
अध्ययता उच्चारण करते हुए अध्ययन करता था। इसके

193
00:13:30,560 --> 00:13:34,560
पीछे पीछे उच्चारण करके अध्ययन करने के कारण वेद मंत्रों

194
00:13:34,560 --> 00:13:39,680
को अनु अनु अनुय

195
00:13:39,680 --> 00:13:43,760
अनु पीछे पीछे उच्चारण करके अध्याय पाठ होने वाला कहा गया

196
00:13:43,760 --> 00:13:47,920
है। उस समय लौकिक संस्कृत जो परवर्ती

197
00:13:47,920 --> 00:13:51,280
काल में पाणिनीकृत

198
00:13:51,280 --> 00:13:56,160
अष्टाध्याय के विधानों द्वारा व्याकरण के नियमों से नियमित और परिनिष्ठित

199
00:13:56,160 --> 00:14:00,400
कर दी गई। वह लोक में प्रचलित थी। इसी लोक में प्रयुक्त

200
00:14:00,400 --> 00:14:04,480
भाषा को यहां भाषा शब्द से अभी अभिहित किया गया

201
00:14:04,480 --> 00:14:08,800
है। उपमा अर्थ में इव का लौकिक

202
00:14:08,800 --> 00:14:13,200
भाषा और वैदिक भाषा दोनों में प्रयोग होता है। यहां यास्क

203
00:14:13,200 --> 00:14:17,200
ने उदाहरण के लिए केवल वैदिक मंत्रों का ही उदाहरण इसलिए दिया है क्योंकि

204
00:14:17,200 --> 00:14:21,440
निरुक्त में निघंटू की व्याख्या करने की प्रतिज्ञा के प्रारंभ

205
00:14:21,440 --> 00:14:25,520
में ही

206
00:14:25,520 --> 00:14:28,160
सामामनाय

207
00:14:28,160 --> 00:14:32,640
के द्वारा कह दिया गया है।

208
00:14:32,640 --> 00:14:37,440
भाषा में लोग भाषा में निषेध अर्थ वाला यहां नहीं है वो वाली बात बहुत लंबा हो रहा है।

209
00:14:37,440 --> 00:14:41,600
अरे आप मुझे फोटो लीजिए वो 20वा ठीक है कोई कोई नहीं तुम अपनी फोटो भेज

210
00:14:41,600 --> 00:14:45,680
देना मुझे इसमें इसमें दोनों चीजें हैं और इसमें सवाल ये भी

211
00:14:45,680 --> 00:14:49,920
आएगा ना कि अगर आप यास्क का प्रमाण हमको दे भी रहे हो फिर हम ये पूछेंगे

212
00:14:49,920 --> 00:14:54,080
यास्क का वो कहां से आया क्या परंपरा तो बतानी पड़ेगी ना

213
00:14:54,080 --> 00:14:58,160
अरे मैं कह तो रहा हूं कि मान लो आप ही के आप ही के थ्रू आया। हां अगर आप यह भी मान

214
00:14:58,160 --> 00:15:02,240
लो कि आप ही के थ्रू आया तो भी आपको ये मानना पड़ेगा कि वेद के जो मंत्रार्थ जो ईश्वर

215
00:15:02,240 --> 00:15:06,320
ने दिए थे अभी वो नहीं है हमारे पास में अभी जो वेद के मंत्रार्थ होते हैं उनका आधार आपको वेदांगों

216
00:15:06,320 --> 00:15:10,800
को ही मानना पड़ेगा नहीं वेदांगों को नहीं परंपरा से वेद आए परंपरा

217
00:15:10,800 --> 00:15:14,800
से वेद का अर्थ भी आया और वो जो वेद वो जो वेद अर्थ

218
00:15:14,800 --> 00:15:18,800
होगा वो अष्टाध्याय के अनुरूप भी होगा व्याकरण के अनुरूप भी

219
00:15:18,800 --> 00:15:23,120
होगा ऐसा नहीं है कि व्याकरण के विरुद्ध अगर वो विरुद्ध होगा तो तो आपको यह मानना

220
00:15:23,120 --> 00:15:27,520
पड़ेगा कि ना हमारे पास वेद है ना वेदार्थ है यह सनातन

221
00:15:27,520 --> 00:15:31,760
ना पॉइंट यह कि जब शास्त्र ही खुद कह रहे हैं कि जब परंपरा से आने वाले वेदार्थ नष्ट हो चुके तो जबरदस्ती

222
00:15:31,760 --> 00:15:36,000
अरे भैया शास्त्र उसमें परंपरा भी कह रहे हैं श्रुति श्रुति का श्रुति का मतलब ही श्रुति

223
00:15:36,000 --> 00:15:40,000
कितनी बार कहा होगा निरुक्त निरुक्त में बताओ यास्काचार्य ने बताओ तो

224
00:15:40,000 --> 00:15:40,640
श्रुति जितनी

225
00:15:40,640 --> 00:15:45,520
बार कहा है वेदार्थ की परंपरा के लिए कहा है तो क्या वेदार्थ की परंपरा में ये निरुक्तचार्य

226
00:15:45,520 --> 00:15:49,840
जो अर्थ किया जाता है व्याकरण तो व्याकरण संप्रदाय बताया निरुक्त

227
00:15:49,840 --> 00:15:53,840
संप्रदाय बताया तो यासकाचार्य ने भी अरे देखो ये सब चीजें तो तुमने अभी मुझे भेजी

228
00:15:53,840 --> 00:15:58,240
नहीं है भेज देना मैं देखूंगा जो तुम संप्रदाय 10 संप्रदाय वाली बात

229
00:15:58,240 --> 00:16:02,400
पढ़ा होगा तो आप तो खुद ही कह रहे हो ना उसमें है तो निरुत पढ़े तो उसमें सारी चीजें फिर उसमें अलग से क्या

230
00:16:02,400 --> 00:16:06,480
ये वाली जो चीजें हैं क्योंकि उन्होंने 10 संप्रदाय के नाम लिए हैं वो मुझे बता देना

231
00:16:06,480 --> 00:16:10,560
मगर मैं तुम्हें एक बात बता रहा हूं कि जहां जहां पे वो ये कहेंगे कि धर्म और ब्रह्म की व्याख्या हम

232
00:16:10,560 --> 00:16:14,640
निरुक्त उससे करते हैं श्रुति से तो श्रुति का मतलब ही है कि हमने अपने

233
00:16:14,640 --> 00:16:18,640
गुरुजनों से जो सुना उससे करते हैं श्रुति को तो वेद कहा गया ना वेद

234
00:16:18,640 --> 00:16:22,640
हां तो तो वो वेद श्रुति वेद का अपने आप में जो श्रुति नाम

235
00:16:22,640 --> 00:16:26,640
है उसका उसका मतलब ही परंपरा बिना परंपरा के श्रुति का अस्तित्व क्या

236
00:16:26,640 --> 00:16:30,800
है? नहीं वेद तो मान रहे हैं ना परंपरा से। वेदार्थ तो ये जो बात

237
00:16:30,800 --> 00:16:35,280
कह रहे हैं कि व्यास का ये वेदासकाचार्य ये नहीं कह रहे हैं कि जो परंपरा

238
00:16:35,280 --> 00:16:39,360
से जो ज्ञान विज्ञान है उसका विरोध में भी तुम अपना खड़ा कर सकते हो। ये

239
00:16:39,360 --> 00:16:43,360
जो मैं आधार दे रहा हूं उसके द्वारा। नहीं हमने तो वेदांगों के आधार पर खड़ा किया ना बाबा। केवल

240
00:16:43,360 --> 00:16:47,520
वेदांग नहीं होगा ना। उसमें श्रुति भी होगी। वेदांग भी होगा तब दोनों के समन्वय

241
00:16:47,520 --> 00:16:51,520
से होना चाहिए। तो है और क्या है? अरे श्रुति परंपरा भाई। परंपरा

242
00:16:51,520 --> 00:16:55,520
को आप ठुकरा नहीं सकते ना। भैया श्रुति मतलब परंपरा अपने आप में

243
00:16:55,520 --> 00:16:56,020
भी

244
00:16:55,760 --> 00:17:00,240
और मैं इसमें बता दूंगा कई जगह परंपरा के लिए उन्होंने बोला होगा प्रत्यक्ष

245
00:17:00,240 --> 00:17:06,000
जितनी जगह परंपरा बोला है वेदार्थ की परंपरा बोला उसमें निरुक्त परंपरा है व्याकरण परंपरा है और बताइए

246
00:17:06,000 --> 00:17:10,400
ये भी दिखा देंगे बात ये है कि तुम जहां पे तुम्हारी बात आ रही है

247
00:17:10,400 --> 00:17:14,720
तुम यहां पे अब तर्क की बात ही नहीं छोड़ दे रहे हो बिल्कुल तुम मुझे शब्द प्रमाण से दबाने

248
00:17:14,720 --> 00:17:18,880
की कोशिश कर रहे हो तर्क ये है कि सीधी बात है कि हमको शास्त्र देने

249
00:17:18,880 --> 00:17:23,040
वाला कौन है हमारी परंपरा यदि वो झूठी हो सकती है।

250
00:17:23,040 --> 00:17:27,040
यदि उसकी क्रेडिबिलिटी पर बात आ सकती है तो वह हमको झूठे मंत्र भी दे सकती

251
00:17:27,040 --> 00:17:31,040
है। यासकाचार्य के नाम से झूठा शास्त्र भी दे सकती है। अगर तुम यह सिद्ध कर

252
00:17:31,040 --> 00:17:35,040
दोगे कि यासकाचार्य के अनुसार शंकराचार्य जी फिट नहीं बैठ रहे। अगर तुम यह

253
00:17:35,040 --> 00:17:39,440
सिद्ध कर दोगे कि यासकाचार्य के द्वारा दिए गए जो अष्टाध्यायी सूत्र है व्याकरण

254
00:17:39,440 --> 00:17:43,440
के सूत्र उसके उसके अनुसार जो हमारे पारंपरिक गुरु हैं वो सही सिद्ध नहीं हो

255
00:17:43,440 --> 00:17:47,440
रहे। तो आप यह सिद्ध करोगे कि वेदार्थ है ही नहीं कहीं। वेद है

256
00:17:47,440 --> 00:17:51,520
ही नहीं कहीं। सब मनमाना है। सब कुछ मनमाना है। यह

257
00:17:51,520 --> 00:17:55,600
सिद्ध करोगे। ठीक है। अब आपने एक पॉइंट बोला कि तर्क से सबसे पहले मैंने यही बोला

258
00:17:55,600 --> 00:18:00,080
था कि मैं दुर्जन ऐसे मान लेता हूं कि शास्त्र आपकी परंपरा से आए हैं। उन्हीं शास्त्रों के अंदर निरत्ताचार्य

259
00:18:00,080 --> 00:18:04,080
बोल रहे हैं कि जो वेद तो परंपरा से चल रहे हैं लेकिन जो वेदांत है उसकी परंपरा वो परंपरा से

260
00:18:04,080 --> 00:18:08,080
आना भी तो सिद्ध है। मैं पूरा बोल देता हूं। आपने तो बोला ना मेरा तो सुनिए। तो आपने

261
00:18:08,080 --> 00:18:10,800
तो उसी शास्त्र में निरुक्तचार्य बोल रहे हैं

262
00:18:10,800 --> 00:18:14,800
कि जो मंत्र परंपरा से चल रहे हैं। लेकिन वेदार्थ जो है उसकी परंपरा लुप्त होने के कारण

263
00:18:14,800 --> 00:18:18,800
बुद्धिश होने के कारण बुद्धिश होने के कारण वेदांगों की ऋषियों ने रचना की। अब जो

264
00:18:18,800 --> 00:18:23,040
वेदांगों के जो वेद के जो अर्थ होंगे वेदांगों के आधार पे होंगे। जिसका अर्थ वेदांगों के अनुकूल

265
00:18:23,040 --> 00:18:27,040
होगा उसका प्रमाण होगा। जिसका विरुद्ध होगा उसका अप्रमाण होगा। सिंपल सी

266
00:18:27,040 --> 00:18:31,040
बात है ना? इसमें कोई डिबेट का टॉपिक मुझे पहले तो ये फोटो भेजो। फिर इसके आगे हम बात

267
00:18:31,040 --> 00:18:35,040
करेंगे। दूसरी बात यह है कि उन्होंने इस स्थिति में कहा है कि वेदार्थ का

268
00:18:35,040 --> 00:18:39,040
जो वो है वो क्षीण हो रहा है। माना है कि वेदार्थ लुप्त हो रहे हैं। हां तो

269
00:18:39,040 --> 00:18:43,120
लुप्त हो रहे हैं। लुप्त हो गए ये नहीं वो कह सकते क्योंकि उसके लिए फिर दोबारा भगवान को

270
00:18:43,120 --> 00:18:47,920
आना पड़ेगा। नहीं तो नहीं तो उन्होंने ये नहीं कह दिया कि अगर कोई अगर

271
00:18:47,920 --> 00:18:51,920
अगर कोई यह कहेगा कि भाई मैं भूल गया हूं। तो वहां पे एक सिंगल पॉइंट

272
00:18:51,920 --> 00:18:56,000
एजेंडा आ जाएगा कि भैया यहां पर जो है आपके जो क्या कहते हैं वेदांग

273
00:18:56,000 --> 00:19:00,000
है केवल उनके आधार पर कर सकते हो। मगर जब कोई वहां खड़ा हुआ कह रहा है कि नहीं

274
00:19:00,000 --> 00:19:04,080
मुझे याद है। तो वहां पर यह वाली चीज फिर तो उसको उसका विरोध नहीं कर सकते

275
00:19:04,080 --> 00:19:08,160
ना। जैसे वो जो स्मृति क्षण हो रही है, प्रज्ञा शक्ति क्षीण हो रही है, उसकी वजह से हम

276
00:19:08,160 --> 00:19:12,320
भूले तो हम कह रहे हैं कि हम भूले ठीक है। मगर हम जब कह रहे हैं कि यह वाली चीज हमको

277
00:19:12,320 --> 00:19:16,400
याद है तो उसमें हमारा झूठ अगर आप हमें नकारते हुए वेदांत का सहारा

278
00:19:16,400 --> 00:19:20,400
लो तो भी ठीक है। ठीक है। तो इस केस में अब हमारे पास में इतिहास

279
00:19:20,400 --> 00:19:24,560
प्रमाण है। इतिहास प्रमाण ये है हमारे पास में कि मतलब क्षीण हुआ है।

280
00:19:24,560 --> 00:19:25,840
वेदार्थ जो है वो शीण हुए हैं।

281
00:19:25,840 --> 00:19:30,160
वेद आए हैं लेकिन वेदार्थ शीण हुए हैं। इसका हमारे पास में प्रमाण है। अब इस केस में मान लीजिए कि

282
00:19:30,160 --> 00:19:34,320
मैं दुर्जन ऐसे मान लेता हूं। वैसे तो प्रमाण कुछ है नहीं। फिर भी मैं

283
00:19:34,320 --> 00:19:38,400
ऐसे मानता हूं सुनिए तो दुर्जन ने ऐसे मगर मैं मान लेता हूं कि जो वेदार्थ

284
00:19:38,400 --> 00:19:42,640
है वो किसी न किसी आंशिक रूप में आज बचे हुए हैं तो भी उनका क्योंकि ये आपने

285
00:19:42,640 --> 00:19:46,640
बोला ना कि ईश्वर को दोबारा वेद देना पड़ेगा। वो तब देना पड़ता जब ऋषियों ने

286
00:19:46,640 --> 00:19:50,640
इसकी व्यवस्था नहीं की होती वेदांगों के रूप में। लेकिन वेदार्थ करने की व्यवस्था ऋषियों

287
00:19:50,640 --> 00:19:54,960
ने वेदांगों के रूप में कर रखी थी। इसीलिए दोबारा से वेदार्थ देने की आवश्यकता नहीं। एक पॉइंट। दूसरा

288
00:19:54,960 --> 00:19:58,960
पॉइंट ये कि अगर मैं मान भी लेता हूं कि वेदार्थ जो है वो किसी न किसी को याद भी

289
00:19:58,960 --> 00:20:02,960
होगा। वो कह रहे नहीं मेरे को तो परंपरा से वेदार्थ याद है भले ही खत्म हो गया। नित्याचार कह रहे हो लेकिन मैं नहीं सुनता मेरे

290
00:20:02,960 --> 00:20:06,960
को याद है तो भी उसका जो है वो वेदांगों के विरुद्ध नहीं होना चाहिए अगर

291
00:20:06,960 --> 00:20:11,040
वो वेदांगों के विरुद्ध दे बोलेगा कोई बात तो हम यही मानेंगे कि भैया वो जो है उसकी बुद्धि

292
00:20:11,040 --> 00:20:15,040
क्षीण हो गई है उसकी अल्पशक्ति जो भी है क्षीण हो गई और वो व्यक्ति गलत बोल रहा है क्योंकि वेदांगों को तो

293
00:20:15,040 --> 00:20:19,440
ऋषियों ने स्वीकार किया इसलिए वेदांगों के विरुद्ध नहीं हो सकता हां उस व्यक्ति पे दोष यहां पे एक कैची

294
00:20:19,440 --> 00:20:23,520
पॉइंट है तुमने कहा कि उन्होंने व्यवस्था कर दी थी भगवान को आने

295
00:20:23,520 --> 00:20:27,600
की जरूरत नहीं है यानी कि आपका मतलब है कि आपने जो आपकी जो बुक्स है

296
00:20:27,600 --> 00:20:32,400
हमारी जो बुक्स है ग्रंथ है अष्टाध्याय के सूत्र है पाणिनीय अष्टाध्याय

297
00:20:32,400 --> 00:20:36,560
है या जो निरुक्त है यह सब हम एक बच्चे को पकड़ा देंगे और वेदार्थ

298
00:20:36,560 --> 00:20:40,560
कर लेगा। नहीं मैंने कब बोला कि बच्चे को पढ़ा उसकी पूरी व्यवस्था है ना कैसे

299
00:20:40,560 --> 00:20:41,120
पढ़ेंगे?

300
00:20:41,120 --> 00:20:45,120
हां उस व्यवस्था में आ जाएंगे आ जाएंगे। सुनिए बहुत

301
00:20:45,120 --> 00:20:49,280
सिंपल है। सबसे पहले शिक्षा पढ़ेंगे। शिक्षा के बाद अष्टाध्याय के सूत्र याद करेंगे। प्रथमा वित्त

302
00:20:49,280 --> 00:20:53,280
पढ़ेंगे। भैया वो शिक्षा में कहीं ना कहीं उनकी प्रिपरेशन में परंपरा

303
00:20:53,280 --> 00:20:58,080
प्राप्त ज्ञान आना पड़ेगा। परंपरा से शास्त्र ही तो पढ़ाएंगे और क्या पढ़ाएंगे?

304
00:20:58,080 --> 00:21:02,480
अरे मैंने कहा कि जब भगवान को आना नहीं जब उन्होंने

305
00:21:02,480 --> 00:21:06,640
ऐसी मतलब सबसे पहले सिखाते तो क सिखाते मतलब जाकिर

306
00:21:06,640 --> 00:21:10,640
नायक जाकिर नायक भी खड़ा हो के जो है वो बच्चों को प्रिपेयर कर देगा

307
00:21:10,640 --> 00:21:14,880
कि भैया अष्टाध्याय के तुम सूत्र ले लो कोई भी कर देगा बहुत सिंपल

308
00:21:14,880 --> 00:21:19,120
है ना अगर मान लीजिए अष्टाध्याय से अष्टाध्याय के आधार पे कोई उसने बोलता है कि मैंने जो भाषा की अष्टाध्याय

309
00:21:19,120 --> 00:21:23,440
के आधार पे ठीक है तो अष्टाध्याय विशेषज्ञ चेक कर लेगा ना ये कि अष्टाध्याय विशेषज्ञ

310
00:21:23,440 --> 00:21:27,680
है ना वहां पर इसका मतलब कहां पे अष्टाध्याय विशेषज्ञ

311
00:21:27,680 --> 00:21:31,840
है ना वहां पर कहां पे इस बात को तय करने के लिए कि

312
00:21:31,840 --> 00:21:35,840
हुआ है कि नहीं अष्टाध्याय से नहीं मैं पूछ रहा हूं कहां पर तो कहां पर बताइए ना तुम कह रहे

313
00:21:35,840 --> 00:21:39,920
हो ना अष्टाध्याय विशेषज्ञ तय कर लेगा कि वो अष्टाध्याय से हुआ है कि नहीं

314
00:21:39,920 --> 00:21:44,320
हुआ है हां यही अष्टाध्याय हमारा शब्द प्रमाण होगा यही विशेषज्ञ

315
00:21:44,320 --> 00:21:48,880
हमारा शब्द प्रमाण होगा हां तो यह परंपरा प्राप्त होगा अष्टाध्याय

316
00:21:48,880 --> 00:21:52,880
विशेषज्ञ और उस उस वो अष्टाध्याय विशेषज्ञ है कि नहीं उसको

317
00:21:52,880 --> 00:21:56,560
उसको कैसे माना जाए कि उसके पीछे वाला वो विशेषज्ञ

318
00:21:56,560 --> 00:22:01,120
वो अष्टाध्याय विशेषज्ञ है कि नहीं उसको कैसे माना जाए कि उसके पीछे वाला वो विशेषज्ञ

319
00:22:01,120 --> 00:22:05,360
वो तो चलिए बाद की बात है तो वो शब्द तो वही मैं कह रहा हूं परंपरा तो आपने मान

320
00:22:05,360 --> 00:22:09,760
ली ना जब विशेषज्ञ के अधीन छोड़ दिया नहीं छोड़ा मैंने आपसे मैंने आपसे पहले

321
00:22:09,760 --> 00:22:13,760
मैंने आपसे पहले ही बोला ना कि दुर्जन न्याय से मैं मान तो रहा हूं कि सारे शास्त्र आप की परंपरा से

322
00:22:13,760 --> 00:22:17,760
हम भी आपकी परंपरा से संबंधित हैं और हमें सारे शास्त्र आप की परंपरा से मिले मैंने बोला तो शुरू में

323
00:22:17,760 --> 00:22:21,920
मैंने बोला तो मैं तो ये कह रहा हूं कि किसी कारण से अगर हमें

324
00:22:21,920 --> 00:22:26,000
हमारे गुरुजनों का झूठ बोलना हमारा लग रहा है ये लग

325
00:22:26,000 --> 00:22:30,560
रहा कि द्वेष वश या लालच वश या भयवश झूठ बोल रहे हैं।

326
00:22:30,560 --> 00:22:34,560
सुनो उनके सामने हमने सिद्ध कर दिया। सुनो तो उनके सामने हमने [गला साफ़ करने की आवाज़] सिद्ध कर

327
00:22:34,560 --> 00:22:38,640
दिया। ये देखो अष्टाध्याय से आपका मैच नहीं खा रहा है। फिर वो कह रहा है कि

328
00:22:38,640 --> 00:22:42,640
नहीं अष्टाध्याय से मैच हमारा खा रहा है। तो इसका मतलब वो लोग झूठे लोग

329
00:22:42,640 --> 00:22:46,640
हैं। उन पर विश्वास नहीं किया जा सकता। एक सूत भी नहीं किया जा सकता। और जब

330
00:22:46,640 --> 00:22:50,880
एक सूत गलत है। क्यों गलत है? अर्ध कुकुट न्याय नहीं अर्ध कुकुट न्याय करोगे

331
00:22:50,880 --> 00:22:55,200
यहां? हां। तो क्या दिक्कत है? अर्ध कुकुट न्याय कर दोगे?

332
00:22:55,200 --> 00:22:59,360
किसी व्यक्ति की कोई एक बात गलत हो तो सारी बात गलत हो जाती है क्या? अब

333
00:22:59,360 --> 00:23:03,760
बस बस अब इस पर मनन करो अब तुम और इसमें एक और शब्द

334
00:23:03,760 --> 00:23:08,480
इसका उत्तर देयर है वो हमारा शब्द प्रमाण नहीं रहा।

335
00:23:08,480 --> 00:23:11,680
ये है पॉइंट ये है कि वैसे मैं इसका उत्तर दे भी चुका हूं। इसका उत्तर मैंने

336
00:23:11,680 --> 00:23:15,760
आपको कम से कम पांच बार मैंने रिपीट किया कि ये बात तब बोला जा

337
00:23:15,760 --> 00:23:19,920
सकता है जब वेदार्थ परंपरा से आ रहा हो। है ना? और अगर हम लोग लेकिन

338
00:23:19,920 --> 00:23:24,560
परंपरा से नहीं आ रहा है। हमारा तो आ रहा है वेदार्थ परंपरा से। तो जब जब

339
00:23:24,560 --> 00:23:28,640
ने बोल दिया कि वेदास की परंपरा नष्ट हो गई तो कहां से आ रहा है? नष्ट नहीं हुई। वो प्रायः लुप्त

340
00:23:28,640 --> 00:23:32,720
हो रही है। इसमें लेना पड़ेगा। ऐसे बहुत लुप्त हो गई है।

341
00:23:32,720 --> 00:23:36,720
अगर वो लुप्त ही हो जाएगी तो फिर लुप्त हो गई तो बिल्कुल कोई है ही नहीं बताने वाला।

342
00:23:36,720 --> 00:23:40,800
वहां ईश्वर को जाना पड़ जाएगा। इसका एक और बात है कि शाखाएं भी लुप्त हो चुकी है। ये

343
00:23:40,800 --> 00:23:44,800
भी लीजिए। तो शाखाएं लुप्त हो रही है। मैं तो वो तो बोल रहा हूं, लुप्त हो रही है। लुप्त होना

344
00:23:44,800 --> 00:23:48,880
और झूठ बोलने में अंतर है। जहां लुप्त हो रही है क्या सुनो जहां लुप्त

345
00:23:48,880 --> 00:23:53,360
हो रही है वहां बोला जा रहा है भैया हमारी स्मृति क्षीन हुई। हम ये नहीं बता पाएंगे।

346
00:23:53,360 --> 00:23:57,760
क्या मगर जिस विषय मगर जिस विषय में हम बता रहे हैं उस विषय में हमें नकारा

347
00:23:57,760 --> 00:24:01,760
नहीं जा सकता है। नहीं हमारी क्रेडिबिलिटी में दोष नहीं आ सकता है। नहीं आपने तो ये

348
00:24:01,760 --> 00:24:05,760
स्वीकार किया ना कि जो हमारे आचार्यों का जो भाषा है वो वेदांगों के अनुकूल है। आपने स्वीकार किया ना

349
00:24:05,760 --> 00:24:09,920
इस चीज को। हां कि नहीं और है ना? अब आप ही की [गला साफ़ करने की आवाज़] परंपरा

350
00:24:09,920 --> 00:24:13,920
से मान लीजिए हमने वेदांग पढ़े। ठीक है? हमने अर्थ

351
00:24:13,920 --> 00:24:18,560
किया तो हम देखेंगे इसमें और जो एक साल पहले आचार्य थे

352
00:24:18,560 --> 00:24:22,880
400 साल पहले थे मान लीजिए तो उनके भाष्य से और इधर तो विरोधाभास आ रहा है तो हम पूछेंगे

353
00:24:22,880 --> 00:24:27,040
ना कि ये विरोधाभास क्यों आ रहा है इसका उत्तर मेन मेन जो विरोधाभास

354
00:24:27,040 --> 00:24:31,040
आया है वो व्याकरण इत्यादि विषयों में कम आया है वो ऐसे विषयों

355
00:24:31,040 --> 00:24:35,040
में ज्यादा आया है कि ईश्वर अवतार कैसे ले सकता है या अलंकारिक व्याख्या

356
00:24:35,040 --> 00:24:39,120
हो गई ना ना ऐसी बात नहीं है ऐसी ज्यादातर खेल पलटा हुआ है मैं आपको

357
00:24:39,120 --> 00:24:43,360
समझाता हूं कैसे खेल पलटा वो समझाता हूं सायनाचार्य ने बोला है इससे

358
00:24:43,360 --> 00:24:47,520
विषय बदल इससे विषय बदल जाएगा विषय नहीं बदलेगा विषय यही है विषय यही है

359
00:24:47,520 --> 00:24:52,160
ये जो मैंने बात बोली है इसको अभी थोड़ी देर छोड़ दो इससे क्योंकि मेरा विषय बदल सकता है

360
00:24:52,160 --> 00:24:56,320
नहीं बात पूरा तो हो जाए पूरा हो जाए मैं

361
00:24:56,320 --> 00:25:00,320
थोड़ा सा बस दो लाइन ऐड करना चाहता हूं इसमें कि सायनाचार्य जी तो बोलते

362
00:25:00,320 --> 00:25:04,400
हैं कि नहीं वेद में तो कोई वेद तो केवल कर्मकांड की पुस्तक है वेद का प्रयोग तो केवल यज

363
00:25:04,400 --> 00:25:08,400
के लिए होना चाहिए अब बताइए जब ऐसे ही वो इस मानसिकता से वेद का अर्थ कर रहे हैं

364
00:25:08,400 --> 00:25:12,560
तो कैसे मान रहे हैं अब मैं 50 उनहीं उनहीं उनहीं के आचार उनहीं के आचार

365
00:25:12,560 --> 00:25:16,640
परंपरा में उनहीं के भाई आई क्यों लिख दे रहे हैं पंचदशी जहां ब्रह्म की व्याख्या हो रही

366
00:25:16,640 --> 00:25:20,640
है तत्विक विवेचन हो रहा है अगर ऐसा है इसलिए वो तो इसलिए

367
00:25:20,640 --> 00:25:24,960
लिख रहे हैं क्योंकि वेदांत की परंपरा आ रही है ना अद्वैत वेदांत की तो उन्होंने उस आधार पे लिखा तो वेदांत

368
00:25:24,960 --> 00:25:29,280
को वेदांत को वेदांत के रूप में नहीं कहते क्या वो वेदांत

369
00:25:29,280 --> 00:25:33,280
को अलग मानते हैं क्या उन्होंने कोई मेंशन किया वेदांत जो है वो तो वेदांत परत

370
00:25:33,280 --> 00:25:38,560
प्रमाण है ना मैं ये नहीं कह रहा हूं मैं कह रहा हूं क्या वो वेद

371
00:25:38,560 --> 00:25:42,160
वो वेद के बाहर मानते हैं क्या वेदांत को

372
00:25:42,160 --> 00:25:46,480
परत प्रमाण स्वतः प्रमाण अरे भाई बात ये हो रही है क्या वो उसको वेद विरोधी

373
00:25:46,480 --> 00:25:50,480
मानते हैं क्या पंचदशी क्योंकि जिस वेदांत के

374
00:25:50,480 --> 00:25:55,200
आप कह रहे हैं ना उसके इंटरप्रिटेशन कई तरीके से हो सकते हैं तो कौन सा इंटरप्रिटेशन

375
00:25:55,200 --> 00:25:59,840
ठीक है इसका वेरिफिकेशन पूरा सुनिए पूरा सुनिए पूरा सुनिए किसका जैसे उसका अद्वैत

376
00:25:59,840 --> 00:26:04,080
परक हैद्वैत पर है पर उसके जो इंटरप्रिटेशन है वो कौन सा सही है इसका इसीलिए

377
00:26:04,080 --> 00:26:08,160
वो क्या है वो प्रत्यय प्रमाण है तो उसकी जो जांच होगी ठीक ठीक इंटरप्रिटेशन कौन सी वो वेदों

378
00:26:08,160 --> 00:26:12,240
के आधार पे होगी तो वेद प्रमाण है वेदों के आधार पे

379
00:26:12,240 --> 00:26:16,240
आधार पे नहीं कर सकते मैं यह नहीं कह रहा कि वेदांत के अरे क्या बात कर

380
00:26:16,240 --> 00:26:20,400
रहे हो तुम गलत जा रहे हो तुम मैंने ये कहा कि वेदांत के आधार पर वेदार्थ

381
00:26:20,400 --> 00:26:24,560
कर रहे हैं मैंने ये कहा कि अगर वो वेदार्थ सिर्फ केवल कर्मकांड

382
00:26:24,560 --> 00:26:28,560
के लिए कर रहे थे मतलब वो उसमें तात्विक विवेचन देख ही नहीं रहे थे तो जिन्होंने

383
00:26:28,560 --> 00:26:33,360
उन्हें आज्ञा दी थी ये करने की जिन्होंने उनसे कहा था उन्हीं ने तो पंचदशी लिखा

384
00:26:33,360 --> 00:26:37,360
हां तो वो तो पॉइंट वही है ना कि वो उपनिषद में तो अगर वो अगर

385
00:26:37,360 --> 00:26:41,440
वो वेद अपने को वैदिक नहीं मान रहे होते वेदों का आश्रय नहीं लिया

386
00:26:41,440 --> 00:26:45,520
होता तो काहे के लिए पंचदशी लिखते तो किसी की एक बात थोड़ी ना मानी

387
00:26:45,520 --> 00:26:49,520
उन्होंने तो लिखा नहीं पहली बात एक बात दूसरी बात उन्होंने तो लिखा किसने लिखा

388
00:26:49,520 --> 00:26:53,520
है उनके भाई ने लिखा ना आपने बोला ना अभी तो भाई उसी ने तो

389
00:26:53,520 --> 00:26:57,360
आर्डर दिया था कि भैया वेदों पे भाष्य कर दो तुम मेरे पास समय नहीं है

390
00:26:57,360 --> 00:27:01,440
पॉइंट इसके अंदर ये है कि जैसे वो ये कह रहे वो ये

391
00:27:01,440 --> 00:27:05,440
जो पंचदशी का उन्होंने किया वो प्रस्तांत्रिक आधार पे किया प्रस्तांत्रिक [खांसने की आवाज़][गला साफ़ करने की आवाज़] के अंदर तो उपनिषद आ

392
00:27:05,440 --> 00:27:09,600
रहा है ना मैं मैं ये नहीं कह रहा कि उन्होंने नहीं आ मैंने मैं

393
00:27:09,600 --> 00:27:14,960
यह नहीं कह रहा हूं। मैं यह कह रहा हूं कि वैदिक मानसिकता के थे कि नहीं

394
00:27:14,960 --> 00:27:19,040
तुम मेरी बात समझ नहीं पाए। तुमने एक आरोप लगाया कि उन्होंने वेदों

395
00:27:19,040 --> 00:27:23,200
का आधार कर्मकांड माना है। उन्होंने खुद लिखा है। अरे

396
00:27:23,200 --> 00:27:27,360
तो मैं तो किसी की केवल एक बात को लेकर के क्यों माना जाए? भाई

397
00:27:27,360 --> 00:27:31,600
उसको जो व्यापक दृष्टि है उससे देखोगे ना। अच्छा

398
00:27:31,600 --> 00:27:35,680
नहीं वो जो सामने और सायन के भाष्य में जो विद्या की बातें हुई है उस

399
00:27:35,680 --> 00:27:39,680
पर भाष्य किया तो है उन्होंने तो वो तात्विक विवेचन हो गया उन्होंने भले ही

400
00:27:39,680 --> 00:27:43,760
उसको कर्मकांड कह दिया मगर उसमें तात्विक विवेचन तो कर रहे हैं सायन नहीं तात्विक विवेचन वो

401
00:27:43,760 --> 00:27:47,760
थोड़ी कर रहे हैं वो तो कर्मकांड के लिए बोल रहे हैं साफसाफ अरे भैया वहां विद्या की बात क्यों

402
00:27:47,760 --> 00:27:50,480
कर रहे हैं फिर

403
00:27:50,480 --> 00:27:54,880
पॉइंट अब जैसे विद्या को भी कैसे ले रहे हैं कर्मकांड विषय ले रहे हैं वो तो

404
00:27:54,880 --> 00:28:00,800
ये तुम बताओगे कि अगर उन्होंने एक जगह लिख दिया उन्होंने कर्मकांड की

405
00:28:00,800 --> 00:28:04,960
जैसे कोई कोई अपने वेद भाष्य लिखता है तो वेद भाष्य की भूमिका लिखता है उस भूमिका में बताता है कि मैंने

406
00:28:04,960 --> 00:28:09,040
वेद भाष्य कैसे कर रहा हूं क्या कर रहा हूं और सायरन ने भी जैसे स्वामी दानंद ने अपनी वेद भाष की भूमिका

407
00:28:09,040 --> 00:28:12,560
लिखी है वैसे सायरन ने भी लिखा हुआ है उसी भूमिका उन्होंने उसमें

408
00:28:12,560 --> 00:28:17,120
कर्मकांड की प्राचुर्यता देखी तो लिख दिया उसमें क्या है इसका मतलब इसका

409
00:28:17,120 --> 00:28:21,440
वेद का वेद का इसका अर्थ नहीं है इसका अर्थ ही नहीं

410
00:28:21,440 --> 00:28:25,520
इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्होंने उसमें तत्व ज्ञान नहीं देखा वेद में तो आप दिखा दो कि वेद

411
00:28:25,520 --> 00:28:29,680
में कहां तत्वज्ञान उन्होंने लिखा है अपनी भूमिका मैं कह तो रहा हूं विद्या वाले पार्ट

412
00:28:29,680 --> 00:28:33,760
नहीं लिखना चाहिए था वहां समझाना नहीं अच्छा समझा दिया उन्होंने भूमिका

413
00:28:33,760 --> 00:28:36,240
में बोल दिया

414
00:28:36,240 --> 00:28:40,400
तो बाद छोड़ दोगे जो उन्होंने यजुर्वेद के भाष में लिखा है 40व अध्याय में

415
00:28:40,400 --> 00:28:44,480
उसको हम समझेंगे ना कि कौन से दृष्टिकोण से लिखा है जो दृष्टिकोण दृष्टिकोण

416
00:28:44,480 --> 00:28:48,480
साफ पता लग रहा है वहां तत्व ज्ञान है नहीं तो आप थोड़ी डिसाइड करोगे क्या

417
00:28:48,480 --> 00:28:52,560
है क्या आप डिसाइड कैसे कर रहे हो जी क्या सोचते मैं डिसाइड

418
00:28:52,560 --> 00:28:56,800
की बात सही कोट करके कर रहा हूं ना अपने को चलो ठीक है शारणाचार्य ने क्या कोट किया

419
00:28:56,800 --> 00:29:00,880
तुम्हारे पास कैसे आया चलो इस पे आ जाओ एक अरे परंपरा से ही मैं परंपरा

420
00:29:00,880 --> 00:29:04,880
से सुनो तो सुनो तो सुनो अरे अभी

421
00:29:04,880 --> 00:29:09,200
अभी दुर्जन तोष न्याय से तुम वो वाली मान रहे हो ना वेदार्थ की परंपरा अभी मैं शारणाचार्य

422
00:29:09,200 --> 00:29:13,360
की परंपरा की बात कर रहा हूं तो सायनाचार्य ने क्या लिखा क्या माना

423
00:29:13,360 --> 00:29:17,600
क्या कहा ये तुम्हें कौन बता रहा है कौन दे रहा है छाप के बुक यानी

424
00:29:17,600 --> 00:29:21,600
पॉइंट इसके अंदर क्या है कि मान लो अरे भैया मैं बोल रहा हूं मैंने आप ही के आचार्यों से पढ़ा तो भी

425
00:29:21,600 --> 00:29:25,680
तो आचार्य जो मैं मेरा आचार्य बता रहा है कि शारणाचार्य ने यह

426
00:29:25,680 --> 00:29:28,160
लिखा और मेरा ही आचार्य बता रहा है कि शारणाचार्य

427
00:29:28,160 --> 00:29:32,560
उसमें तत्व ज्ञान भी देखते थे वेद में अच्छा दिखाओ आचार्य बता रहे हैं जरा ऐसा दिखाओ

428
00:29:32,560 --> 00:29:36,640
मेरे पूरी के शंकराचार्य बता रहे हैं पूरी के शंकराचार्य बता आपके दुनिया भर के आचार्य

429
00:29:36,640 --> 00:29:40,720
की वीडियो शंकराचार्य की ओर से बोलने वाला प्रामाणिक कौन है

430
00:29:40,720 --> 00:29:44,720
मैं कि तुम और बात ये है नहीं उसमें बात ये है कि अगर शंकराचार्य

431
00:29:44,720 --> 00:29:49,360
ने कोई बात गलत बोली तो शास्त्रों से चेक होगा कि नहीं होगा फिर वही बात आ गई अभी बात क्या चल रही है साणाचार्य

432
00:29:49,360 --> 00:29:53,410
क्या सोचते थे क्या नहीं सोचते थे कौन बताएगा तो जबरदस्ती इस पे ला रहे हो बात तो शास्त्रों

433
00:29:53,410 --> 00:29:57,440
[हंसी] पे चल रही है बात देखो अभी बात ये चल रही साचार्य तो उन्हें कर्म

434
00:29:57,440 --> 00:30:01,680
कर्मकांड नहीं मानते तो तुम्हें इस पे आ गया कि अगर तुम्हें उनका एक कोट मिल गया है मुझे नहीं जरूरत

435
00:30:01,680 --> 00:30:05,760
है उनकी कोई किताब लाने की मिल जाएगी तो दे भी दूंगा जिसमें उन्होंने तत्व ज्ञान की बात

436
00:30:05,760 --> 00:30:10,160
की हो वेद में मगर वो क्या सोचते थे क्या नहीं सोचते थे ऑथेंटिकली

437
00:30:10,160 --> 00:30:14,320
बताने वाला उनसे जो प्रामाणिक रूप से जुड़ा हुआ व्यक्ति वही बताएगा ना

438
00:30:14,320 --> 00:30:18,320
नहीं वो तो गलत भी तो बोल सकता है ना तो गलत बोल सकता है तो वो तुम्हें छपी हुई किताब भी तो गलत बोल सकता

439
00:30:18,320 --> 00:30:22,400
है फिर तुम ये भी क्लेम मत करो कि उन्होंने ये लिखा और आप उसमें न्यूट्रल हो जाओ उन्होंने क्या

440
00:30:22,400 --> 00:30:26,800
लिखा क्या नहीं लिखा मुझे नहीं पता यही मेरा कहना है कि जब तुम्हें वेद

441
00:30:26,800 --> 00:30:30,960
जब तुम्हें प्रमाण उनका डायरेक्ट जब हमें उनका डायरेक्ट शब्द प्रमाण मिल रहा है तो किसी तीसरे किसने

442
00:30:30,960 --> 00:30:35,280
दिया वो शब्द प्रमाण उनका डायरेक्ट उन्होंने मिल रहा है मैनुस्क्रिप्ट मिल रहा है मैनुस्क्रिप्ट

443
00:30:35,280 --> 00:30:37,840
उन्होंने दिया

444
00:30:37,840 --> 00:30:41,840
मिल रहा है ना उन्होंने दिया नहीं तो वो वो यहां पे मेरे सामने थोड़ी

445
00:30:41,840 --> 00:30:43,360
है अभी

446
00:30:43,360 --> 00:30:48,000
कोई बीच में कोई बीच में विश्वास है ना जो ये बोल रहा है ये उनका मनुस्क्रिप्ट

447
00:30:48,000 --> 00:30:52,000
है कोई बीच में है ना मुझे तो यह भी नहीं पता कि जो ईश्वर ने वेद दिए थे वही

448
00:30:52,000 --> 00:30:56,000
वेद दिए थे वही तो मेरा कहना है कि जब उनके मंत्रों पर विश्वास कर

449
00:30:56,000 --> 00:31:00,000
सुनिए तो जैसे आपने ने बोला कि शंकराचार्य बताएंगे कि शराणाचार्य क्या शंकराचार्य शराणाचार्य

450
00:31:00,000 --> 00:31:04,000
थोड़ी क्यों क्योंकि हमारे लिए वो शब्द प्रमाण है। हम उनका किसी भी मामले

451
00:31:04,000 --> 00:31:08,000
में विरोध नहीं करेंगे। यही मेरा कहना है। क्यों नहीं

452
00:31:08,000 --> 00:31:12,080
करेंगे? विरोध तो हो रहा है ना साफ-साफ। तो फिर हम अपने आप को वैदिक नहीं कहेंगे। हम अपना नया अलग

453
00:31:12,080 --> 00:31:16,240
से बना लेंगे। हम तो कहेंगे ना। तो तुम सिद्ध करो तुम्हारा वैदिक होना स्वतंत्र

454
00:31:16,240 --> 00:31:20,240
रूप से बिना गुरु परंपरा के। नहीं गुरु परंपरा इसमें क्या है? अभी देखो

455
00:31:20,240 --> 00:31:24,320
जैसे यहां पर ये वाली बात मैंने कही। मैं आपके ही शास्त्रों से टकरा रही है। तब

456
00:31:24,320 --> 00:31:28,400
आप अपनी परंपरा को ही खत्म कर दे रहे पॉइंट मैं यह नहीं कह रहा हूं। मैं परंपरा को खत्म नहीं कर रहा

457
00:31:28,400 --> 00:31:32,400
हूं। तुम मेरी बातों को गलत मतलब निकाल रहे हो। अभी जैसे शणाचार्य की बात कर रही। तुमने

458
00:31:32,400 --> 00:31:36,480
माना कि उन्होंने कर्मकांड कहा है। अब मैं जब इस पर आ गया कि भैया जब उनकी चीज तुम्हें

459
00:31:36,480 --> 00:31:40,480
किताब प्राप्त कैसे हुई परंपरा से? उनकी परंपरा से तो उनकी परंपरा का

460
00:31:40,480 --> 00:31:44,480
जो व्यक्ति तुम्हें किताब दे रहा है वही व्यक्ति बताएगा कि उनकी सही मानसिकता

461
00:31:44,480 --> 00:31:48,640
क्या थी? अब उनकी उनकी परंपरा का व्यक्ति बता रहा है। उनकी मानसिकता तात्विक

462
00:31:48,640 --> 00:31:52,720
भी थी। तुम कह रहे हो वो झूठ बोल रहा है क्योंकि उनकी किताब में तो केवल कर्मकांड लिखा है। उन्होंने

463
00:31:52,720 --> 00:31:56,880
ये नहीं लिखा तत्व ज्ञान है ही नहीं वेद में। उन्होंने ये लिखा कि कर्मकांड है।

464
00:31:56,880 --> 00:31:58,480
मगर तुमने अपने आप उनको तत्व

465
00:31:58,480 --> 00:32:02,560
ज्ञान का विरोधी मान लिया वेदार्थ में। मगर ठीक है मान भी लिया तो जो व्यक्ति

466
00:32:02,560 --> 00:32:06,560
तुमको यह झूठ बोल सकता है कि उनके वह तत्व ज्ञान देखते थे वेदार्थ

467
00:32:06,560 --> 00:32:10,960
में वही व्यक्ति तुम्हें झूठी किताब भी तो दे सकता है तो इसीलिए

468
00:32:10,960 --> 00:32:15,120
मेरा कहना है कि जब हम परंपरा से प्राप्त होने वाले अर्थ पर विश्वास

469
00:32:15,120 --> 00:32:19,200
नहीं करते हैं या फिर सायनाचार्य की परंपरा से

470
00:32:19,200 --> 00:32:23,600
प्राप्त होने वाले जो गुरुजनों द्वारा कहे जाने वाले वाक्य सायनाचार्य

471
00:32:23,600 --> 00:32:27,600
के संदर्भ में उस पर जब हम विश्वास नहीं करते हैं तो हमें उस बुक पर भी

472
00:32:27,600 --> 00:32:31,600
विश्वास नहीं करना चाहिए जो हमें उसी गुरु परंपरा से मिली है जिसमें लिखा हुआ है

473
00:32:31,600 --> 00:32:35,600
कि कर्मकांड की प्राचुर्यता है। पहली बात तो उस स्थिति में आपको अपने

474
00:32:35,600 --> 00:32:39,600
आप को न्यूट्रल मानना पड़ेगा कि भैया उसमें क्या लिखा था क्या नहीं लिखा था हमें नहीं

475
00:32:39,600 --> 00:32:43,680
पता हमारा यह है इस विषय में तो ऐसे ही

476
00:32:43,680 --> 00:32:47,760
तो यही बात चाहे जितना पूछ लो अंत में यही बात आएगी अगर तुमने

477
00:32:47,760 --> 00:32:51,840
हमको गलत साबित कर भी दिया तो तुम वैदिक सिद्ध नहीं हो पाओगे

478
00:32:51,840 --> 00:32:55,840
वेद को तुम खत्म करोगे वहां तर्क खत्म हो जाएगा फिर वहां पर आपके

479
00:32:55,840 --> 00:32:59,840
पास सिर्फ अपनी बातें रह जाएंगी वहां तर्क नहीं है फिर लॉजिक खत्म वहां

480
00:32:59,840 --> 00:33:05,840
पर

481
00:33:13,840 --> 00:33:17,840
[संगीत]
