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00:00:01:18 कि ब्रह्मा विष्णु महेश की मृत्यु होती है। इसके बारे में आज एक ऐसी विवेचना मैं देना चाहता हूं। अपने जो दर्शक हैं, देखने वाले हैं जो या जो फॉलोअर्स हैं या जो शंकरा शंकर परंपरा से जुड़े हुए हैं या किसी भी रूप में वो सनातन की जो मूलधारा है उससे जुड़े हुए हैं। तो उनके लिए मतलब बहुत ध्यान रखने योग्य बिंदु है। ऐसा कुछ नहीं है कि जो मैं नया बताने जा रहा हूं। मगर उस ओर उस ओर ध्यान आकर्षित करवा रहा हूं मैं। इतना मात्र है। तो ये लोग ये कहते हैं कि ब्रह्मा विष्णु और महेश की जन्म और मृत्यु होती है। जी अब बात ये आती है कि जब हमने इनसे पूछा कि काल जब प्रकट हुआ था शब्द शक्ति से उससे पहले कहां था? हालांकि इनका गुरु कहता है कि काल परमात्मा से अतिरिक्त परमात्मा के अतिरिक्त कोई भी नित्य नहीं है। यानी कि वो किसी ना किसी देश काल परिस्थिति में उत्पन्न हुए हैं। ठीक है? जी। तो जब वो उत्पन्न हुए हैं तो अब परमात्मा भी चाहे तो उसको मार नहीं सकता है।
00:01:16:21 देखिए जो चीज बना रहा है परमात्मा उस चीज को मिटा नहीं सकता है। पहली बात यह बाधित है। जी। दूसरी बात यह है कि जो यह मर मरने वाली बात है तो इसमें कि पहले भी वो था इतना ये भी मानते हैं ना कि आत्मा मरती नहीं है जो जन्म लेती है। जन्म मृत्यु वाला कि अगर अभी जो आत्मा जिस शरीर में है वो शरीर मारा गया तो उसके बाद आत्मा नहीं मरी आत्मा जीवित रहेगी। आत्मा अविनाशी है। ठीक है? आत्मा अविनाशी है तो ब्रह्मा विष्णु महेश भी अविनाशी हुए उस तरह से देखा जाए तो ठीक है बिल्कुल तो जन्म और मृत्यु जो होती है तो इससे प्रॉब्लम क्या है फिर जन्म और मृत्यु जो होती है कि ब्रह्मा विष्णु महेश की भी जन्म और मृत्यु होती है तो इससे प्रॉब्लम क्या है यह सोचा है किसी ने कभी भाई जन्म और मृत्यु होती है के बावजूद भी आत्मा जीवित है काल जीवित किसी ना किसी तत्व में और ब्रह्मा विष्णु महेश भी जीवित है। यानी कि जन्म और मृत्यु किसे कहा जा रहा है? केवल प्रकट होने
00:02:32:16 और अप्रकट होने को जन्म और मृत्यु कहा जा रहा है। पहली बात। ठीक है? क्योंकि ये जो अब ये लोग नहीं मानते कि मतलब वो नित्य भी है। परमात्मा के अलावा इनका जो जो इनका गुरु है वह कहता है परमात्मा के अलावा सभी चीजें नित्य नहीं है। कोई भी नित्य नहीं है। चलो मान लिया मगर अविनाशी तो कहता है। है ना? बिल्कुल। तो जब वो अविनाशी कहता है तो इसका मतलब हमें ये मानना पड़ेगा कि ब्रह्मा विष्णु महेश का जो जन्म मृत्यु बता रहे हैं वो केवल उनका प्रकट और अप्रकट होना है। आविर्भाव और तिरोभाव होना है। ठीक है। जी। अब जब आविर्भाव और तिरोभाव होना है तो फिर प्रॉब्लम क्यों आ रही है? जीव को प्रॉब्लम क्यों आ रही है? जब वो जीवित ही है। उसको कोई मार नहीं सकता। वो अविनाशी है। तो फिर उसको जन्म मृत्यु से प्रॉब्लम क्यों आ रही है? अगर हम इस चीज को समझ लेंगे तो ये जन्म मृत्यु वाले टॉपिक में कभी कोई फंस ही नहीं सकता। जो ये फंसाते हैं कि यहां लिखा है, वहां लिखा है। तो प्रॉब्लम यह आ रही है कि जीव कभी मरता नहीं है। अविनाशी है। मगर उसको लग
00:03:47:22 रहा है कि वो मर रहा है। क्या हो रहा है? उसको लग रहा है कि वह मर रहा है। उसका नाश हो रहा है। वह कभी नाश नहीं होता। नाशवान नहीं है जीव आत्मा। मगर उसको लग रहा है कि वो उसका नाश हो रहा है। तो उसी प्रकार से क्या कहते हैं? उसका जन्म नहीं होता। बार-बार तो जन्म नहीं हो रहा। एक बार शब्द शक्ति से बना दिया। हमारे यहां तो आत्मा वास्तविकता में तो आत्मा की कभी उत्पत्ति हुई नहीं है। नित्य है। ठीक है? मगर अगर रामपाल के अनुसार भी मान लिया जाए तो आत्मा एक बार जन्म ले ली उसके बाद तो उसका वो नहीं होना नाश नाशवान तो नहीं है। एक बार जन्म ले ली। तो अब क्या है कि जब उसको मरना नहीं है वह अविनाशी है फिर भी उसको यह लग रहा है फिर भी उसका जन्म मृत्यु जो हो रही है प्रकट और अप्रकट वो हो रही है तो यह जो प्रॉब्लम यह नहीं है कि वो अप्रकट और अप्रकट क्यों हो रही है प्रॉब्लम ये नहीं है कि उसका जन्म मृत्यु क्यों हो रही है क्योंकि जिसको वो जन्म मृत्यु समझ रहा है वो केवल उसका आविर्भाव और तिरोभाव है। इस प्रपंच रूपी संसार में आना और जाना प्रपंच रूपी संसार में प्रकट होना और अप्रकट
00:05:02:26 होना क्योंकि वास्तविकता क्या है? उसको कोई मार नहीं सकता। इतना मानते हैं रामपाल वाले मानते हैं। ठीक है? अब बात ये आती है तो समस्या क्या है? समस्या यही है कि हमको ये क्यों लग रहा है कि हम मर रहे हैं? यही बंधन है, यही अविद्या है, यही माया है। यही प्रपंच रूपी संसार है। हमको यह क्यों लग रहा है कि हम मर रहे हैं। ठीक है? तो ईश्वर कौन है? ईश्वर वो नहीं है जो प्रपंच रूपी संसार में आ जा नहीं सकता। ईश्वर वो नहीं है। ईश्वर वो है जिसको प्रपंच रूपी संसार में आने जाने के बावजूद भी जब वो आए तो उसको यह ना लगे कि वो आ रहा जा रहा है। समझ रहे हैं? जब ईश्वर कौन है? विद्यावान। और हम कौन है? अविद्या से जुड़े हुए। तो हम कौन है? जिसको यह लग रहा है कि हमारी मृत्यु हो रही है। हम लोग मर रहे हैं। हम लोग जीवित हो रहे हैं। हम लोग मर रहे हैं। हम लोग जीवित हो रहे हैं। हमारा जन्म हो रहा है। हमारी मृत्यु हो रही है। जबकि हम अविनाशी हैं। तो ईश्वर कौन है? अविनाशी ईश्वर भी है। अविनाशी हम भी हैं। जीव भी अविनाशी है और परमात्मा भी अविनाशी है। मगर
00:06:18:02 एक मिनट शिवश भाई जय श्री राम। हर हर महादेव। जय श्री राम। अच्छा यह चीज है देखो इस पर थोड़ा सा हम बात कर लेते हैं मेरी बात जरा सी रह गई है मेरी बात पूरी हो जाने दीजिए तो ईश्वर कौन है ईश्वर कौन है हम कौन है जो हम भी अविनाशी है मगर हम जब आते जाते हैं तो हमें ये भ्रम हो रहा है कि हम मर रहे हैं। हम जीवित हो रहे हैं। हम मर रहे हैं। हम जीवित हो रहे हैं। इस भ्रम का नाम ही बंधन है। ठीक है और ईश्वर कौन है जो आ जा तो रहा है हमारी तरह प्रकट अप्रकट हो रहा है आविर्भाव तेरो भाव हो रहा है इनका भी कबीर वहां से आएगा यहां से वहां जाएगा ठीक है तो आविर्भाव तिरोभाव हो रहा है और अगर आविर्भाव तिरोभाव नहीं हो सकता तो ये भी बाधा है भाई क्या ईश्वर अपना आविर्भाव तिरोभाव कर सकता है इस प्रपंच रूपी संसार में मैं नहीं कह रहा जन्म मृत्यु अभी उनके हिसाब से चलते हैं वो अपने आप को प्रकट और अप्रकट तो कर सकता है कभी भी कि इतना भी कमजोर है। ठीक है? अगर कर सकता है तो यानी कि उसका आना जाना भी आविर्भाव तेरो भाव मानना पड़ेगा कि हो रहा है। वही आविर्भाव
00:07:33:10 तेरो भाव आत्मा का भी हो रहा है। वही आविर्भाव तेरो भाव ब्रह्मा विष्णु महेश का भी हो रहा है। मगर हमारा जो हम बंधन वाले हैं। हमारी बंधन की पहचान क्या है कि हमारा आविर्भाव और तिरोभाव होगा तो हमें लगेगा कि हम वास्तव में मरे और वास्तव में जीवित हुए। उत्पन्न हुए हमें यह लगता है और ईश्वर कौन है जो आएगा जाएगा हमारी तरह आविर्भाव तिरोभाव होगा हमारी तरह मगर उसको मालूम है कि उसका ये जन्म मृत्यु नहीं है उसको मालूम है कि वो मुक्त है उसको मालूम है कि उसको कभी कुछ नहीं हो सकता उसको मालूम है कि वो अविनाशी है हम कौन है हमें नहीं मालूम है कि हम अविनाशी है थ्योरिकली मालूम है हमें फील नहीं हो रहा है हमारे ऊपर कोई हाथ घुमाएगा तो हमारी पलक झपकेगी यानी कि हमें भय है मरने का भय है तो हम अविनाशी होते हुए भी ऐसा फील कर रहे हैं। यह नहीं जानते हैं कि हम अविनाशी हैं। और हम में और ईश्वर में अंतर इतना है कि आविर्भाव तिरोभाव वो भी अपना कर कर सकता है। आता है जाता है। परंतु उसको यह मालूम है कि मैं अविनाशी हूं। उसको यह मालूम है कि मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। यह अंतर है इस दृष्टिकोण से ईश्वर और आत्मा में। ठीक है? इतना आ गया।
00:08:49:20 यानी कि आना जाना महत्व नहीं कर रहा है। महत्व क्या कर रहा है? मालूम है कि नहीं मालूम है? ईश्वर और जीव में महत्वपूर्ण क्या है? आपको अगर मालूम है जिसको मालूम है वो ईश्वर है। जिसको नहीं मालूम है वो जीव है। इसी बात को भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा था कि तू नहीं जानता मैं जानता हूं। कहा था तेरे और मेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं। तो कहने का अर्थ यह है कि आविर्भाव और तिरोभाव नहीं हो सकता। ऐसा नहीं है। अगर अगर हम ये कहेंगे कि ईश्वर का आविर्भाव तिरोभाव नहीं हो सकता तो हम ईश्वर को बाधित करेंगे। अंतर केवल इतना है कि आविर्भाव तिरोभाव के समय भी क्या ईश्वर यह जानता है कि वो उसका जन्म मृत्यु नहीं होती। हां ईश्वर जानता है। इसका प्रमाण भगवत गीता में ही दिया है। वो जानते हैं कि अर्जुन तेरे और मेरे कई जन्म हो चुके हैं। अब तू नहीं जानता मैं जानता हूं। वो क्यों जान रहे हैं? क्योंकि वो ईश्वर है। और अर्जुन क्यों नहीं जान रहा है? क्योंकि वो जीव है क्योंकि वो बंधन में है। बस इतना अंतर है। तो अंतर ये नहीं है ईश्वर को ईश्वर कहने के लिए कि उसका आविर्भाव नहीं
00:10:04:21 होगा। जिसको हम लोग सांसारिक दृष्टिकोण से जन्म मृत्यु कहते हैं। अंतर यह नहीं है कि ईश्वर का जन्म मृत्यु नहीं होगी। आविर्भाव तिरोभाव नहीं होगा। ना अंतर यह है कि जन्म मृत्यु के समय भी आविर्भाव तिरोभाव के समय भी क्या जिसका जन्म मृत्यु हो रहा है आविर्भाव तिरोभाव हो रहा है वो ये जानता है कि मेरा आविर्भाव तिरोभाव जो हो रहा है ये जन्म मृत्यु मेरा वो नहीं है। ना मैं कभी उत्पन्न हुआ हूं ना मैं कभी मैं अविनाशी हूं। यह सब जो जानता है वह ईश्वर है। तो ब्रह्मा विष्णु महेश भगवान श्री कृष्ण यह जानते हैं अपने आविर्भाव भाव के समय भी कि हम कौन है बस जो अपनी रियल आइडेंटिटी को जानता है वो ईश्वर है। जो नहीं जानता वो बंधन में वो मुक्त नहीं है। मोक्ष वो ईश्वर नहीं है। वो जीव है। जी
00:10:55:25 बहुत सुंदर बहुत सुंदर अच्छा हां शिवश जी इसी पर एक लॉजिकली चीज है वो ये है कि दरअसल में ईश्वर इस बात को पूरी तरह जानता है कि वो संसार मतलब संसार में आने वाला होते हुए भी संसार भी है वो और संसार में आने वाला भी है और संसार के परे जो शक्ति या जो भी तत्व कह लो या जो भी कह लो वो भी ईश्वर ही है। पारमार्थिक सब वो भी ईश्वर ही है। यह सब कुछ जानने वाला है। इसीलिए वो ईश्वर है। ईश्वर जो है हम हमारे और आपके रूप में इस संसार में माया में भटक भी रहा है। इसीलिए और हमारे और आपके रूप के अतिरिक्त एक परमात्मीय रूप में जो है वो सबको मोक्ष भी दे रहा है। इसीलिए वो माया में रहते हुए भी माया के बंधनों से परे भी है। मतलब माया में रहते हुए भी माया के बंधनों से परे है। वह जो है जन्म लेते हुए भी हम जैसे जीवों के रूप में वह जब चाहता है तो जन्म लेता है और अपनी माया को अपने अधीन जब चाहता है तो करके बड़े-बड़े जो है लीलाएं कर देता है। जैसे जो है कृष्ण अवतार में देखने को मिला। नरसिंह अवतार में देखने के
00:12:10:28 लिए मिला कि जब जरूरत पड़ी तो बिना किसी मतलब मां के गर्भ के जो है खंभे से प्रकट हो जा रहे हैं। कृष्ण अवतार में देखने के लिए मिला कि एक सामान्य मां के गर्भ से जो है प्रकट होने के बाद बड़े-बड़े चमत्कार कर ले रहे हैं। इसीलिए वह जन्म लेते हुए भी अजन्मा है। वही मैं कह रहा हूं कि ईश्वर को ईश्वर मानने के लिए यह नियम नहीं लगा सकते कि उसका आविर्भाव तिरोभाव नहीं होता या सांसारिक दृष्टिकोण से उसकी जन्म और मृत्यु नहीं होती। ठीक है? जो अगर ये नियम लगा देंगे तो अगर ये नियम लगा देंगे तो ईश्वर बाधित हो जाएगा। ईश्वर की सर्वशक्तिता खंडित हो जाएगी। तो कहने का मतलब ये है कि ईश्वर ईश्वर भी अपना आविर्भाव तिरोभाव दिखाएगा, लीला करेगा, सब कुछ करेगा। परंतु यह सब करते हुए भी उसको यह पता होगा कि मुझे मैं ईश्वर हूं। मैं अविनाशी हूं। मैं नित्य हूं। मैं अनंत हूं। मैं सत्यम ज्ञानम अनंतम ब्रह्म। ठीक है? तो ये जो बात आती है कि ब्रह्मा विष्णु महेश का देवी भागवत में लिखा है कि वो आविर्भाव तिरोभाव होता है जिसको वहां जन्म मृत्यु कह दिया तो इसके कारण आप उनका ईश्वरत्व खंडित नहीं कर सकते।
00:13:26:14 जब वो वहां पर कह रहे हैं कि मैं जानता हूं तू नहीं जानता। यह ना जानने वाली बात ही है। ना जानने वाला ही बंधन में है। जानने वाला मुक्त है। सारी संसार की जो जड़ है वो यही है। अविद्या ना जानना। हम लोग गीता का जो सेशन चला रहे हैं उसमें भी देखिए हर अध्याय में एन केन प्रकारन बंधन का कारण है अज्ञान। बंधन का कारण है अविद्या। बंधन का कारण है माया। बंधन का कारण है भ्रम। बंधन का कारण है यह प्रपंच रूपी संसार माया से बना हुआ तो यह कहना बहुत बड़ी मूर्खता है कि ईश्वर का जिसका आविर्भाव भाव होगा वो जो है ईश्वर नहीं अभी हम पूछ ले कि क्या यहां कबीर प्रकट हो सकते हैं कि नहीं मानना पड़ेगा हो सकते है मानना पड़ेगा ना और प्रकट होने के बाद दोबारा गायब हो सकते हैं कि नहीं मानना पड़ेगा हो सकते है तो इसी को अगर कोई कह दे कि जन्म मृत्यु हो गया थे और अब नहीं है तो इसी आविर्भाव केवल आविर्भाव तेरो भाव हो रहा है वास्तविकता में जैसे जीव का हम लोग जीव की जन्म मृत्यु मान रहे हैं वास्तविकता में तो उसका आविर्भाव भाव हो
00:14:41:15 रहा है ना क्या हो रहा है जीव का जीव मर रहा है क्या वास्तविकता में नहीं मर रहा आविर्भाव तिरोभाव हो रहा है तो जब जीव का आविर्भाव तिरोभाव हो रहा है जन्म मृत्यु नहीं हो रहा है तो हम ब्रह्मा विष्णु महेश का जन्म मृत्यु कैसे मान सकते हैं केवल आविर्भाव हो रहा जिसको सांसारिक प्रपंच रूपी दृष्टिकोण से जन्म मृत्यु कहा जा रहा है। पहली बात। दूसरी बात यह है कि इस आविर्भाव और तिरोभाव के समय जिसको यह मालूम है कि मेरा नाश नहीं हो सकता वो ईश्वर है। वो मुक्त है। और जिसको नहीं मालूम है कि मेरा मेरा मेरा मैं अविनाशी हूं। मेरी मृत्यु नहीं हो सकती। जिसको यह बात नहीं मालूम है वह बंधन में है। वह मुक्त नहीं है। यही अंतर था अर्जुन और भगवान श्री कृष्ण में। यही अंतर था। हे अर्जुन तेरे और मेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं। तू नहीं जानता मैं जानता हूं। ठीक है? तो जो विद्यावान है, जिसको मालूम है कि मैं मुक्त हूं, मैं अविनाशी हूं, मैं नित्य हूं, वो ईश्वर है। और जिसको नहीं मालूम है, वो जीव है जो बंधन में है और जिस दिन उसको मालूम पड़ जाएगा कि उसको कोई कुछ नहीं कर सकता है तो उसको मोक्ष मिल गया, मुक्त हो गया। ठीक है?
00:15:56:26 तो इस बात को हम सबको कंठस्थ कर लेना चाहिए। ये जीवन मृत्यु वाली बात से हम लोगों को विचलित नहीं होना चाहिए। ईश्वर सब कुछ कर सकता है। वो अपना नाश करके भी दिखा देगा इस प्रपंच रूपी संसार में। क्या बात कर रहे हो? ईश्वर किसी भी प्रकार के नियम के ईश्वर किसी भी प्रकार के नियम के नीचे नहीं है। वो सभी नियमों को बनाने वाला सर्वियामक है। आ जाओ। दुनिया का कोई ऐसा ईश्वर नहीं है। सनातन धर्म के विरोध में खड़ा किया जाने वाला जो सनातन धर्म के ईश्वर के सामने टिक सके। क्यों? क्योंकि क्योंकि सत्यम ज्ञानम अनंतम ब्रह्म ईश्वर ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है जो सर्वशक्तिमान है। जी [संगीत]
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आविर्भाव और तिरोभाव का तात्त्विक विश्लेषण #तत्त्वदर्शीसंत#rampaljimaharaj
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