1
00:00:01,920 --> 00:00:06,080
ठीक है तब तक मैं शुरू कर देता हूं। श्री मंगल मूर्त

2
00:00:06,080 --> 00:00:10,720
नमः श्री गुरु नमः बोध

3
00:00:10,720 --> 00:00:14,880
परम सुंदर एकदंतम पितांबरम त्रिनयनम परम पवित्र

4
00:00:14,880 --> 00:00:19,200
बुद्ध दिवाकर कांतिकांत विघ्नेश्वरम

5
00:00:19,200 --> 00:00:24,240
सकल विघ्नहरम नमामि

6
00:00:24,240 --> 00:00:28,400
वाद विश्वेश्वम धर्म मार्ग प्रवर्तकम वंदे श्री

7
00:00:28,400 --> 00:00:32,640
हरिहरं कर पात्रम जगत हरि ओम

8
00:00:32,640 --> 00:00:34,160
तत्सत श्रीमद ते

9
00:00:34,160 --> 00:00:38,560
रामचंद्राय नमः ओम नमः परम हंसा स्वादित

10
00:00:38,560 --> 00:00:42,560
चरण कमल जन्म करंदाय भक्त जनमान मानस निवासाय

11
00:00:42,560 --> 00:00:46,000
श्री रामचंद्राय श्री राम जय

12
00:00:46,000 --> 00:00:50,400
राम जय जय राम

13
00:00:50,400 --> 00:00:54,640
जय राम जय जय राम जय जय राम श्री

14
00:00:54,640 --> 00:00:58,640
राम जय राम जय जय राम श्री

15
00:00:58,640 --> 00:01:02,880
राम श्री राम जय राम जय जय जय

16
00:01:02,880 --> 00:01:07,600
राम श्री राम जय राम जय जय राम

17
00:01:07,600 --> 00:01:11,840
श्री राम जय राम जय जय राम

18
00:01:11,840 --> 00:01:17,600
राम धर्म की जय हो

19
00:01:17,600 --> 00:01:21,600
नाश हो प्राणियों में

20
00:01:21,600 --> 00:01:26,720
विश्व का कल्याण हो गौ माता की

21
00:01:26,720 --> 00:01:31,680
जय हो गौ हत्या बंद हो भारत

22
00:01:31,680 --> 00:01:37,120
अखंड हो भारत

23
00:01:37,120 --> 00:01:42,160
सेना हिंदू सनातनी हो

24
00:01:42,160 --> 00:01:47,200
हम भारत भव्य बनाएंगे हम हिंदू राष्ट्र

25
00:01:47,200 --> 00:01:51,360
हिंदू राष्ट्र भारतवर्ष की जय हो हिंदू राष्ट्र

26
00:01:51,360 --> 00:01:56,080
भारतवर्ष की जय हो जय हो

27
00:01:56,080 --> 00:02:00,720
प्रातः स्मरणीय भगवत पूज्यपाद श्रीमद् परमहंस चरणारविंद

28
00:02:00,720 --> 00:02:05,120
सर्व तंत्र स्वतंत्र अनंतानंद श्री समलंकृत ऋग्वेदीय अपूर्वानाय

29
00:02:05,120 --> 00:02:05,620
श्री

30
00:02:05,280 --> 00:02:09,760
गोवर्धन पुरी पीठाधीश्वर अनंत श्री विभूषित श्रीमद जगुरु शंकराचार्य

31
00:02:09,760 --> 00:02:13,200
गुरुदेव भगवान की जय हो

32
00:02:13,200 --> 00:02:19,200
नमः पार्वती पतय हर हर

33
00:02:20,000 --> 00:02:24,720
चलिए भगवान श्री गणेश की कृपा से शुरू करते हैं और

34
00:02:24,720 --> 00:02:29,840
शिवास जी को भी मैं देख पा रहा हूं यहां पर वो भी ज्वाइन हो गए हैं। तो कुल मिलाकर

35
00:02:29,840 --> 00:02:35,280
दो टीमें बनी हैं और

36
00:02:35,280 --> 00:02:39,440
पहली टीम जो साकार पक्ष की है उसे हर्ष कुमार झा जी लीड

37
00:02:39,440 --> 00:02:43,760
कर रहे हैं और दूसरी निराकार पक्ष की जिसे स्वयं शिवश जी

38
00:02:43,760 --> 00:02:47,920
ही लीड कर रहे हैं। तो हम उसका

39
00:02:47,920 --> 00:02:53,920
इसका प्रारूप आप सब समझ गए हैं किस तरह से होगा।

40
00:02:54,320 --> 00:03:00,320
जी तो

41
00:03:00,480 --> 00:03:05,200
शुरू शुरू करते हैं। तो पहले

42
00:03:05,200 --> 00:03:08,480
साकार पक्ष से

43
00:03:08,480 --> 00:03:13,040
हर्ष जी आप अपने टीम को के सदस्य को

44
00:03:13,040 --> 00:03:17,120
या आप आप स्वयं को बोलेंगे जो भी आपको अपने पॉइंट शेयर करने हैं।

45
00:03:17,120 --> 00:03:21,120
उसके बाद निराकार पक्ष अंतिम में अपने जो क्लोजिंग पॉइंट है

46
00:03:21,120 --> 00:03:25,680
वो वो टीम लीड या फिर टीम लीड के द्वारा चयनित कोई भी सदस्य जो है वो

47
00:03:25,680 --> 00:03:31,680
उस माध्यम से उसको क्लोज कर देगा। ठीक है? अ

48
00:03:32,240 --> 00:03:34,480
और

49
00:03:34,480 --> 00:03:38,480
ठीक है।

50
00:03:38,480 --> 00:03:42,560
इसमें समय का मैं देख लेता हूं

51
00:03:42,560 --> 00:03:47,360
इसमें कि मैंने नोट किया था कि नहीं। समय इसमें

52
00:03:47,360 --> 00:03:51,280
पूरी तरह से

53
00:03:51,280 --> 00:03:55,760
दोद दोद मिनट बोलने का समय है इसमें

54
00:03:55,760 --> 00:03:59,760
दोद मिनट है तो नहीं

55
00:03:59,760 --> 00:04:04,160
तो फिर दो दो मिनट तो दो मिनट से कम में

56
00:04:04,160 --> 00:04:08,240
बात पूरी रखी जा पाएगी ना ना ना दो मिनट से

57
00:04:08,240 --> 00:04:12,240
कम में नहीं रखी जाएगी हां तो दोद मिनट करते हैं

58
00:04:12,240 --> 00:04:16,480
मैं टाइमर लगा लूंगा और मोस्ट ज्यादा ज्यादा हुआ तो

59
00:04:16,480 --> 00:04:20,640
वो प्लस माइनस 15 सेकंड हो जाएगा तो कोई समस्या नहीं है उसमें लेकिन जभी भी 2 मिनट

60
00:04:20,640 --> 00:04:24,800
पूरा हो जाएगा या होने वाला होगा तो मैं टोक दूंगा मेरे ख्याल से

61
00:04:24,800 --> 00:04:29,440
बोलने की समय सीमा ना रखी जाए तो उचित रहेगा

62
00:04:29,440 --> 00:04:34,160
तो तो उसके हिसाब से फिर मुझे अपने ही विवेक से फिर रोकना पड़ेगा

63
00:04:34,160 --> 00:04:38,640
और यह ध्यान रहे कि जब भी भी कोई भी इस

64
00:04:38,640 --> 00:04:43,120
अपनी बात से भटकने की कोशिश करेगा ठीक है तो

65
00:04:43,120 --> 00:04:47,200
मेरे द्वारा उसे से टोका जा सकता है। तो कृपया इस इस बात का

66
00:04:47,200 --> 00:04:47,700
स्मरण

67
00:04:47,520 --> 00:04:51,520
दें आप सभी लोगों को। जी मेरी टीम में मेरी टीम का में

68
00:04:51,520 --> 00:04:55,680
कौन-कौन है एक बार जरा बता दें। पता है आपको? जी जी जी

69
00:04:55,680 --> 00:04:59,680
तो एक मिनट रुकिए मैं क्लोज कर दिया मैंने। हां।

70
00:04:59,680 --> 00:05:03,920
तो आपकी टीम में तनुष प्रताप सिंह जी,

71
00:05:03,920 --> 00:05:08,480
मोहम्मद हैदर अली शेख जी, किरण दीक्षित जी,

72
00:05:08,480 --> 00:05:14,240
नयन चक्रवर्ती जी, सुजीत पाटिल जी और आप स्वयं

73
00:05:14,240 --> 00:05:18,400
हम ठीक है तो आपको देखिए एक

74
00:05:18,400 --> 00:05:22,400
मैं बहुत सरलता कर दूं इसमें देखिए ऐसा

75
00:05:22,400 --> 00:05:28,400
है कि जो सगुण साकार के पक्ष से जो लोग हैं

76
00:05:31,200 --> 00:05:35,200
तो उनके पक्ष में निराकार पक्ष भी

77
00:05:35,200 --> 00:05:40,320
है। है ना? तो फिर निरा निराकार पक्ष क्या है?

78
00:05:40,320 --> 00:05:44,400
निराकार पक्ष वह है जो सगुण ईश्वर के सगुण साकार स्वरूप को

79
00:05:44,400 --> 00:05:48,480
नहीं मानता नहीं पूजता ना ही प्रामाणिक रूप से मानता है

80
00:05:48,480 --> 00:05:52,640
ना ही तार्किक रूप से मानता है ना ही उसकी पूजा या मूर्ति

81
00:05:52,640 --> 00:05:56,720
पूजा इत्यादि का समर्थन करता है तो निराकार

82
00:05:56,720 --> 00:06:01,200
पक्ष का पक्ष यही है कि वह सगुण साकार का विरोधी

83
00:06:01,200 --> 00:06:05,520
है उसको सगुण साकार का खंडन करना है

84
00:06:05,520 --> 00:06:09,600
निराकार पक्ष को ठीक है और यह सिद्ध सिद्ध

85
00:06:09,600 --> 00:06:15,120
करना है कि ईश्वर का अवतार नहीं हो सकता। उसका सगुण साकार स्वरूप नहीं हो सकता।

86
00:06:15,120 --> 00:06:19,120
उसको निराकार को सिद्ध नहीं करना है।

87
00:06:19,120 --> 00:06:23,280
निराकार हो सकता है कि नहीं हो सकता यह नहीं सिद्ध करना है। यह तो

88
00:06:23,280 --> 00:06:27,360
सामने वाली सामने वाला जो दल है वो भी मानता है कि ईश्वर निराकार

89
00:06:27,360 --> 00:06:31,680
और साकार दोनों ही है। तो इसका पक्ष यही है कि उसको

90
00:06:31,680 --> 00:06:36,000
केवल निराकार में सीमित करना है। ठीक है? तो

91
00:06:36,000 --> 00:06:40,080
शुरू सामने वाली टीम से ही किया जाए। समोर साकार से

92
00:06:40,080 --> 00:06:45,520
फिर हम पक्ष से हमारी तरफ से वो करेंगे। जी

93
00:06:45,520 --> 00:06:46,320
ये अपने स्टार्टिंग

94
00:06:46,320 --> 00:06:50,720
पॉइंट्स कृपया रखना शुरू करें।

95
00:06:50,720 --> 00:06:54,720
हर्ष कुमार झा जी और उनकी टीम

96
00:06:54,720 --> 00:06:59,680
सभी को जय श्री कृष्ण जय श्री राम हर हर महादेव

97
00:06:59,680 --> 00:07:03,040
हर हर महादेव

98
00:07:03,040 --> 00:07:07,360
ईश्वर परम कृष्ण सच्चिदानंद विग्रह अनादिरादि

99
00:07:07,360 --> 00:07:10,720
गोविंद सर्व कारणम

100
00:07:10,720 --> 00:07:14,720
सच्चिदानंद रूपाय विश्वत हेतवे तापत्रय

101
00:07:14,720 --> 00:07:19,040
विनाशाय श्री कृष्णााय वयं नमः

102
00:07:19,040 --> 00:07:21,360
तो

103
00:07:21,360 --> 00:07:25,520
मैं सबसे पहले यह यह अपना पक्ष रखता हूं कि

104
00:07:25,520 --> 00:07:29,760
हमारे जो ईश्वर हैं वो साकार

105
00:07:29,760 --> 00:07:34,400
में साकार रूप में अपने नित्योक में निवास करते हैं।

106
00:07:34,400 --> 00:07:36,560
वो

107
00:07:36,560 --> 00:07:40,880
निराकार शक्ति अपने धारण करते हैं और वह साकार सगुण

108
00:07:40,880 --> 00:07:45,200
साकार भी होते हैं। अपने भक्तों की इच्छा से

109
00:07:45,200 --> 00:07:49,600
दुष्टों का संार करने के लिए धर्म स्थापना के लिए

110
00:07:49,600 --> 00:07:55,520
यह मेरा पक्ष है।

111
00:07:55,520 --> 00:07:58,240
ठीक है।

112
00:07:58,240 --> 00:08:00,640
तो

113
00:08:00,640 --> 00:08:03,040
अ

114
00:08:03,040 --> 00:08:09,040
जो हमारी टीम है उससे कोई काउंटर करना चाहेगा इनको?

115
00:08:14,000 --> 00:08:18,160
जी किरण जी।

116
00:08:18,160 --> 00:08:22,320
बोले हां तो आपने कहा कि आपका

117
00:08:22,320 --> 00:08:26,400
जो साकार ईश्वर है वो नित्य लोक में रहते हैं। इस नित्य लोक

118
00:08:26,400 --> 00:08:32,000
को जरा समझाएंगे।

119
00:08:32,000 --> 00:08:36,080
नित्य लोक नित्य लोक का अर्थ है कि वो जहां पे अपने सगुण

120
00:08:36,080 --> 00:08:40,400
साकार रूप धारण करके वो लोक के रूप में भी और अपने

121
00:08:40,400 --> 00:08:44,480
एक साकार मतलब एक चतुर्भुज स्वरूप में

122
00:08:44,480 --> 00:08:48,480
या फिर अपने दिव्य स्वरूप में भी वहां पर निवास करते हैं,

123
00:08:48,480 --> 00:08:52,720
नित्य लीला करते हैं। वो नित्य लोकक मोक्ष धाम, श्री गोलोक

124
00:08:52,720 --> 00:08:56,800
धाम या फिर साकेत धाम, वैकुंठ धाम, कैलाश

125
00:08:56,800 --> 00:09:00,800
धाम इत्यादि है। नित्य लोक का आशय यही है कि

126
00:09:00,800 --> 00:09:05,520
वह कभी नष्ट नहीं होता। वो साकार रूप में वहीं पर

127
00:09:05,520 --> 00:09:09,680
रहता है। वो अपने आप को अदृश्य अवश्य कर

128
00:09:09,680 --> 00:09:15,680
लेते हैं। लेकिन वो अवश्य वहां पर रहता है।

129
00:09:15,840 --> 00:09:21,520
तो यह जो नित्य लोकक है वो मतलब

130
00:09:21,520 --> 00:09:27,520
हम जहां पर है अभी भूलोक में वो नित्योक यहां पर नहीं है क्या

131
00:09:31,120 --> 00:09:36,000
यहां तो परमधाम ही तो कह रहे हो ना

132
00:09:36,000 --> 00:09:40,560
परमधाम को ही तो आप नित्योलोक कह रहे हो ना

133
00:09:40,560 --> 00:09:45,200
जी परमधाम जहां पे भगवान अपने साकार दिव्य स्वरूप में वहां पे निवास करते

134
00:09:45,200 --> 00:09:49,840
और यहां इस धरती लोक पे ईश्वर सर्वव्यापकता

135
00:09:49,840 --> 00:09:54,080
अपने निराकार स्वरूप में भी है। और जब चाहे वो साकार

136
00:09:54,080 --> 00:09:58,560
स्वरूप भी धारण करके अपने भक्तों के साथ लीला करने या

137
00:09:58,560 --> 00:10:02,640
धर्म स्थापना जो भी उनका उद्देश्य होता है वो अपनी इच्छा

138
00:10:02,640 --> 00:10:07,040
अनुसार यहां पे भी आते हैं। लेकिन यह जो लोक है यह नश्वर है। स्वयं

139
00:10:07,040 --> 00:10:12,240
भगवान श्री में ये विलीन हो जाता है। अंत में

140
00:10:12,240 --> 00:10:16,240
नहीं नहीं ये लोक तो माया है। लेकिन आपने कहा कि परमधाम वहां

141
00:10:16,240 --> 00:10:22,240
है और यहां नहीं है तो फिर वो नित्य कैसे रहा

142
00:10:22,800 --> 00:10:26,640
ये तो का

143
00:10:26,640 --> 00:10:31,680
नित्य का अर्थ है कि वो हमेशा रहने वाला लोक है।

144
00:10:31,680 --> 00:10:37,680
यानी कि नहीं है लेकिन देश और परिस्थिति से प्रभावित है।

145
00:10:39,760 --> 00:10:44,000
जी वो काल से प्रभावित नहीं हो सकता और वो अपने दिव्य

146
00:10:44,000 --> 00:10:48,080
लोक जो है अगर आप ये सृष्टि को देखा जाए तो ये सृष्टि भगवान के शरीर

147
00:10:48,080 --> 00:10:52,160
में ही कल्पित मानी जाती है। भगवान के शरीर में ही श्री विग्रह में

148
00:10:52,160 --> 00:10:56,720
ही ये शरीर है। उन्हीं में उत्पन्न होता है। उन्हीं में लय हो जाता है।

149
00:10:56,720 --> 00:11:00,960
भगवान तब प्रकट करते हैं। ये सत्ता

150
00:11:00,960 --> 00:11:03,760
मात्र

151
00:11:03,760 --> 00:11:08,160
है। परमधाम तो हर जगह होना चाहिए ना। परमधाम

152
00:11:08,160 --> 00:11:12,480
का मतलब क्या है? जिस पर सब कुछ टिका हो। तो आप यह नहीं कह सकते कि परमधाम

153
00:11:12,480 --> 00:11:16,640
वहां है और यहां पर नहीं है। है ना? सिर्फ काल

154
00:11:16,640 --> 00:11:20,640
से प्रभावित को भी सनातन नहीं कहा जाता। जो देश काल परिस्थिति से प्रभावित ना हो

155
00:11:20,640 --> 00:11:24,640
उसे ही सनातन या नित्य कहा जाता है। आपका तो देश से

156
00:11:24,640 --> 00:11:29,840
प्रभावित हो रहा है कि वो वहां है यहां नहीं है।

157
00:11:29,840 --> 00:11:35,840
मैंने अपना पक्ष से नित्य

158
00:11:36,080 --> 00:11:40,160
मैं एक चीज क्लियर कर दूं। हर्ष जी आपने शुरुआत जो

159
00:11:40,160 --> 00:11:44,560
है ना वह एक अलग दिशा से कर दी है। आप

160
00:11:44,560 --> 00:11:48,720
परमधाम में जो परमधाम की जो नित्यता है उसके संबंध में आप बात करने

161
00:11:48,720 --> 00:11:52,800
लगे। जबकि बात हमें यह करनी चाहिए कि ईश्वर का

162
00:11:52,800 --> 00:11:56,880
सगुण साकार स्वरूप हो सकता है कि नहीं? वो ले सकता है कि नहीं? अवतार ले सकता है कि

163
00:11:56,880 --> 00:12:01,200
नहीं? उसकी मूर्ति पूजा हो सकती है कि नहीं? उसकी मूर्ति पूजा होना आवश्यक

164
00:12:01,200 --> 00:12:05,280
है कि नहीं? व्यर्थ तो नहीं है इन विषयों में। क्योंकि वो जो नित्य वाली बात

165
00:12:05,280 --> 00:12:09,280
है ना मोक्ष के टाइम पर वह लीन धामोधामी एक हो

166
00:12:09,280 --> 00:12:13,600
जाते हैं तो वह एक अलग चैप्टर हो जाएगा कि

167
00:12:13,600 --> 00:12:18,400
जो नित्य लोक है कि नहीं वह जो केवल मोक्ष

168
00:12:18,400 --> 00:12:18,900
केवल

169
00:12:18,800 --> 00:12:24,560
मोक्ष से पहले वाली जो चीजें हैं ठीक है

170
00:12:24,560 --> 00:12:29,200
मोक्ष से पहले कोई भी चीज नित्य नहीं हां तो

171
00:12:29,200 --> 00:12:33,280
वो उनको अलग-अलग परिभाषाओं में कहा जा सकता है

172
00:12:33,280 --> 00:12:37,440
मगर अंततवा जो एक सनातन सत्य है कि

173
00:12:37,440 --> 00:12:42,480
वह सारी चीजें नित्य नहीं मानी जाएंगी अर्थपूर्ण दृष्टि से

174
00:12:42,480 --> 00:12:46,480
क्योंकि धाम और धाम ही एक हो जाते हैं तो इसलिए वो धाम

175
00:12:46,480 --> 00:12:50,640
को नित्य कहा जाता है मगर धामो और धामी एक हो जाते हैं तो इनका वो स्वरूप नहीं

176
00:12:50,640 --> 00:12:54,720
रह जाएगा जो स्वरूप था। ठीक है? वही मैं कह रहा हूं

177
00:12:54,720 --> 00:12:59,040
कि साकार रूप में धाम और धामी धाम और धामी कभी भी एक नहीं हो सकते।

178
00:12:59,040 --> 00:13:03,840
हां वो वो नित वो नित्य इसलिए कहा जाएगा

179
00:13:03,840 --> 00:13:07,840
वो नित्य इसलिए कहा जाता है क्योंकि धामोधाम एक हो जाते हैं। यानी जो

180
00:13:07,840 --> 00:13:12,080
परम ब्रह्म है परम ब्रह्म स्वरूप है सच्चिदानंद स्वरूप है वो

181
00:13:12,080 --> 00:13:16,640
और धाम एक होते हैं। इसलिए उस धाम को भी नित्य कहा जाता है। ठीक है?

182
00:13:16,640 --> 00:13:20,640
मगर वो अपने एज इट इज स्वरूप में रह

183
00:13:20,640 --> 00:13:24,800
जाएगा। यह जिस परंपरा से आप भी हैं, वह

184
00:13:24,800 --> 00:13:30,800
परंपरा और तर्क और प्रमाण की दृष्टि से सिद्ध नहीं है। ठीक है?

185
00:13:30,800 --> 00:13:33,840
ठीक है। तो विश्व विश्वजीत जी इस पक्ष

186
00:13:33,840 --> 00:13:37,840
में कुछ कह रखना चाहते हैं। तो अब अब एक

187
00:13:37,840 --> 00:13:41,840
एक क्लियर कर लीजिए कि ईश्वर के सगुण साकार स्वरूप का वो

188
00:13:41,840 --> 00:13:45,840
करना है। वहां वो जो मोक्ष के नित्य की बात एक शुरू

189
00:13:45,840 --> 00:13:50,640
हो गई तो उसकी वजह से थोड़ा सा दिशा बदल गई। ईश्वर सगुण

190
00:13:50,640 --> 00:13:55,280
ईश्वर मैं याद दिला दूं एक बार सगुण साकार का एक पक्ष

191
00:13:55,280 --> 00:14:00,400
कि ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है इसलिए

192
00:14:00,400 --> 00:14:04,720
ईश्वर अवतार भी ले सकता है और क्योंकि ईश्वर अवतार ले सकता है सगुण

193
00:14:04,720 --> 00:14:08,880
साकार रूप ले सकता है सगुण साकार हो सकता है इसलिए उसकी मूर्ति

194
00:14:08,880 --> 00:14:13,120
पूजा की जा सकती है और मूर्ति पूजा उसकी जो उसके जो सगुण

195
00:14:13,120 --> 00:14:17,200
साकार की भक्ति है उसका आलंबन लेकर के ही

196
00:14:17,200 --> 00:14:21,680
व्यवहार में ना आ सकने वाले स्वरूप का आलंबन लेकर के ही

197
00:14:21,680 --> 00:14:25,840
जो भक्तगण है वह व्यवहार

198
00:14:25,840 --> 00:14:30,160
में व्यवहार में आ सकने वाले स्वरूप का आलंबन लेकर ही जो

199
00:14:30,160 --> 00:14:34,240
भक्त हैं वो व्यवहार में ना आ सकने वाले स्वरूप को प्राप्त कर

200
00:14:34,240 --> 00:14:38,560
सकते हैं। इसीलिए भगवान ने कहा कि यदा

201
00:14:38,560 --> 00:14:43,200
यदा धर्मस भवती भारत अभान धर्मस

202
00:14:43,200 --> 00:14:47,360
तदात्म सजाम और क्यों भगवान यहां पर किस

203
00:14:47,360 --> 00:14:51,520
चीज की सजन की बात कर रहे हैं

204
00:14:51,520 --> 00:14:55,680
भगवान किस चीज की सृजन करने की बात कर रहे हैं मैं मैं अभी

205
00:14:55,680 --> 00:14:59,920
बात करूंगा मैं इसको पूरा कर लूं और क्यों कि परित्राणाय

206
00:14:59,920 --> 00:15:04,160
साधु नाम ठीक है तो यह आप याद रखें कि यहां से हमारा

207
00:15:04,160 --> 00:15:08,720
शुरू हो रहा यह इस तरह से सगुण साकार को लेकर चलिए

208
00:15:08,720 --> 00:15:12,800
और फिर सगुण साकार रूप नहीं ले सकता।

209
00:15:12,800 --> 00:15:16,800
इस बारे में हम लोग फिर आपको काउंटर करेंगे। तो अब एक

210
00:15:16,800 --> 00:15:20,800
बार जो सगुण साकार की टीम है वो एक बार फिर से अपना पक्ष रख दे जिससे

211
00:15:20,800 --> 00:15:26,800
कि हम आगे बढ़े। सगुण साकार की टीम से

212
00:15:27,200 --> 00:15:31,360
विश्वजीत विश्वजीत जी हैं। हां बोल सकते हैं

213
00:15:31,360 --> 00:15:35,360
हर्ष बोलिए जी विश्वजीत जी राम राम भैया

214
00:15:35,360 --> 00:15:39,600
राम राम भैया ईश्वर की भक्ति के लिए सगुण साकार

215
00:15:39,600 --> 00:15:43,840
रूप का होना जरूरी है। ध्यान केंद्रित करेंगे उन्हीं ईश्वर पे जो जिनका

216
00:15:43,840 --> 00:15:47,840
कोई आकार हो। जैसे कि अगर हम एक बिंदु पे भी ध्यान केंद्रित करके ईश्वर की

217
00:15:47,840 --> 00:15:52,240
भक्ति करते हैं तो उसका भी एक गोल आकार होता है और

218
00:15:52,240 --> 00:15:56,240
यदि आकार ना हो तो हमारे जैसे मनुष्यों के लिए जैसे विश्वास पे

219
00:15:56,240 --> 00:16:00,400
ही सब कुछ चलता है तो कोई भी आजकल के मनुष्य वैज्ञानिक

220
00:16:00,400 --> 00:16:04,400
प्रमाण मांगते किसी भी चीज का तो हम जैसे मनुष्यों के लिए

221
00:16:04,400 --> 00:16:08,640
वो प्रूफ जो होता है ना वह जरूरी होता है तो इसीलिए

222
00:16:08,640 --> 00:16:12,800
भगवान का अवतार लेना भक्तों का कल्याण करने के लिए

223
00:16:12,800 --> 00:16:16,880
यह तो सिद्ध होता और भी बहुत सारी कथाएं

224
00:16:16,880 --> 00:16:20,960
हैं जो कि ऐसा रूप मिलता है उनसे कि

225
00:16:20,960 --> 00:16:25,280
भगवान का सगुण साकार रूप हो सकता है और है भी। मतलब

226
00:16:25,280 --> 00:16:29,600
आपने एक बात कही है कि प्रमाण और

227
00:16:29,600 --> 00:16:33,920
एक बात कही है क्योंकि प्रमाण मिलता है और एक बात कही है

228
00:16:33,920 --> 00:16:38,160
क्योंकि सगुण साकार में ध्यान नहीं लग सकता तो इसलिए किसी

229
00:16:38,160 --> 00:16:42,160
एक बिंदु की आवश्यकता है तो उसके लिए भगवान

230
00:16:42,160 --> 00:16:42,660
जो

231
00:16:42,400 --> 00:16:46,480
है मतलब भगवान की भक्ति के लिए किसी

232
00:16:46,480 --> 00:16:50,480
एक शगुन शाखा रूप को मतलब मानकर चलना ही

233
00:16:50,480 --> 00:16:55,120
होगा। अच्छा यस अब

234
00:16:55,120 --> 00:16:59,360
जो पहले तो एक बार सब लोग हैंड अपने डाउन

235
00:16:59,360 --> 00:17:03,440
कर ले सभी लोग जिससे हमें पता मैं जो बोलूंगा उसके अनुसार

236
00:17:03,440 --> 00:17:07,760
फिर काम कर सके। अब इनकी इन दो बातों को काउंटर कोई करें

237
00:17:07,760 --> 00:17:11,280
तो बताएं।

238
00:17:11,280 --> 00:17:15,360
साकार सगुण साकार विरोधी जो दल है निराकार की तरफ

239
00:17:15,360 --> 00:17:21,360
से कोई काउंटर करेगा वो हैंड रेज करे

240
00:17:24,320 --> 00:17:29,040
कोई काउंटर नहीं करेगा किरण जी आप भी नहीं

241
00:17:29,040 --> 00:17:34,480
सुजीत जी सुजीत जी आप करें

242
00:17:34,480 --> 00:17:38,640
जी अगर हम भगवान के सगुण साकार

243
00:17:38,640 --> 00:17:42,720
की बात करें कि वो भक्ति के लिए इंपॉर्टेंट है क्योंकि भक्ति हम

244
00:17:42,720 --> 00:17:46,720
निर्गुण निराकार पर कर नहीं कर सकते। लेकिन अल्टीमेटली हम देखें

245
00:17:46,720 --> 00:17:50,960
जो अत्यंतिक स्वरूप होगा भगवान का वो निर्गुण

246
00:17:50,960 --> 00:17:54,960
निराकार ही होगा। जो हम ध्यान के लिए या फिर भक्ति के लिए जो

247
00:17:54,960 --> 00:17:58,960
हम एक सगुण स्वप असा रूप जो देखेंगे या फिर ध्यान

248
00:17:58,960 --> 00:18:03,120
करेंगे वो भी मिथ्या ही होगी। क्योंकि ब्रह्म ब्रह्म सत्यम

249
00:18:03,120 --> 00:18:07,280
जगन मिथ्या तो हम जो भी कुछ भी कर रहे हैं इस जगत में वो हम

250
00:18:07,280 --> 00:18:11,360
अगर ब्रह्म की दृष्टि देंगे तो वो मिथ्या ही रहेगा। चाहे भक्ति

251
00:18:11,360 --> 00:18:15,680
पूजा यज्ञ आदि सब कुछ मिथ्या ही है। तो इसका मतलब

252
00:18:15,680 --> 00:18:19,760
जो भगवान का आत्यान स्वरूप है वो तो

253
00:18:19,760 --> 00:18:23,840
सिर्फ निर्गुण निराकार ही है। लेकिन हम कुछ क्षणों के लिए हमारा

254
00:18:23,840 --> 00:18:28,000
ध्यान लग जाए। हमें वो परम ज्ञान या फिर परम ज्ञान पता चल जाए कि

255
00:18:28,000 --> 00:18:32,000
भगवान का स्वरूप निर्गुण निराकार ही है। इसलिए हम सगुण साकार के ध्यान

256
00:18:32,000 --> 00:18:36,400
करते हैं। तो हम सगुण साकार की ओर से निर्गुण निराकार की ओर जाएंगे।

257
00:18:36,400 --> 00:18:40,000
इसका सिर्फ सगुण सार का

258
00:18:40,000 --> 00:18:44,400
हम ध्यान इसलिए कर रहे हैं कि ताकि हम जान सके कि भगवान का असली स्वरूप निर्गुण निराकार

259
00:18:44,400 --> 00:18:47,360
ही है।

260
00:18:47,360 --> 00:18:51,440
तो आपने खंडन कहां किया सगुण साकार? भैया मैं कुछ कहना

261
00:18:51,440 --> 00:18:55,440
चाहूंगा। हां बोलिए भैया इससे

262
00:18:55,440 --> 00:18:59,440
यह साबित नहीं होता कि भगवान का शाकार रूप नहीं

263
00:18:59,440 --> 00:19:04,080
हो सकता। इस बात का आपने ये उल्लेख नहीं किया

264
00:19:04,080 --> 00:19:08,320
जो काउंटर और भैया दूसरी बात कि जैसे मोक्ष

265
00:19:08,320 --> 00:19:12,400
हो या भक्ति हो हमको तो कोई ना कोई एक शगुन साकार जैसे

266
00:19:12,400 --> 00:19:16,480
शिवलिंग हो गए या अग्निदेव हो गए कोई भी रूप लेकर के भगवान का

267
00:19:16,480 --> 00:19:21,120
किसी एक ना एक रूप का तो सगुण साकार रूप लेकर के चलना पड़ेगा। वरना भक्ति

268
00:19:21,120 --> 00:19:25,440
आएगी कहां हमारे अंदर और बिना भक्ति के तो कुछ पॉसिबल

269
00:19:25,440 --> 00:19:29,440
ही नहीं है भैया ना मोक्ष ना स्वर्ग ना कुछ भी पॉसिबल नहीं है बिना

270
00:19:29,440 --> 00:19:32,480
भक्ति के

271
00:19:32,480 --> 00:19:36,800
और भैया ये भी प्रमाण नहीं मिलता कि ये हो ही नहीं सकता सगुण

272
00:19:36,800 --> 00:19:40,880
साकार अगर आप कुछ क्षण के लिए भी ये मानते हैं कि सगुण साकार हो

273
00:19:40,880 --> 00:19:45,280
सकता है भक्तों का उद्धार के लिए तो यह फिर इसका

274
00:19:45,280 --> 00:19:49,280
आप काउंटर कैसे कर पाएंगे मेरा

275
00:19:49,280 --> 00:19:53,840
मेरा कुछ प्रश्न सुजीत जी से एक क्षण के लिए विश्वजीत

276
00:19:53,840 --> 00:19:57,920
जी रुकिए विश्वजीत जी ने अपना पक्ष रख दिया है अब निराकार पक्ष का

277
00:19:57,920 --> 00:20:01,920
ही कोई व्यक्ति बोले क्या मैं कुछ काउंटर

278
00:20:01,920 --> 00:20:06,240
कर सकता हूं मुझे भी कुछ काउंटर करना है सुर जी

279
00:20:06,240 --> 00:20:10,320
आपका पक्ष कौन सा है आशीष जी जी मैं शगुण साकार पक्ष से

280
00:20:10,320 --> 00:20:14,320
हूं और नारायण जी जी नयन मैं निराकार से

281
00:20:14,320 --> 00:20:18,320
हूं हां तो आशीष जी अभी तो आपके ही पक्ष से विश्व जी

282
00:20:18,320 --> 00:20:22,320
ने बोल दिया ना तो और सुजीत जी ने भी आपके

283
00:20:22,320 --> 00:20:28,160
पक्ष से बोला है तो तो नयन जी कृपया आप बोले

284
00:20:28,160 --> 00:20:32,160
जी तो विश्वजीत जी आपने कहा कि यदा यदा

285
00:20:32,160 --> 00:20:36,160
ही धर्मस्य गण भवती भारतम तो उसी श्लोक से आप

286
00:20:36,160 --> 00:20:40,160
यह सिद्ध कर रहे हैं कि उनका अवतार हो रहा है तो आप मुझे यह

287
00:20:40,160 --> 00:20:45,440
कहिए कि जो ईश्वर है उनका अवतार कहां हो रहा है

288
00:20:45,440 --> 00:20:47,600
उनका अवतार उनके अंदर ही हो रहा है

289
00:20:47,600 --> 00:20:52,080
वो कुछ भी कर सकते हैं। जो चाहे वह कर सकते हैं। अगर वे

290
00:20:52,080 --> 00:20:56,080
किसी एक स्थान पे एक वक्त पे प्रेजेंट है, उपस्थित हैं तो

291
00:20:56,080 --> 00:21:00,240
वह अपने अंदर ही उपस्थित है ना कि किसी और जगह में क्योंकि पूरा

292
00:21:00,240 --> 00:21:04,320
संसार पूरा ब्रह्मांड उनके अंदर ही समाया हुआ है। तो यदि वे धरती पर

293
00:21:04,320 --> 00:21:08,880
भी अवतार लेते हैं तो वह अपने अंदर ही यह लीला कर रहे हैं।

294
00:21:08,880 --> 00:21:13,680
ठीक है? तो आप यह तो मान रहे हैं ना कि वो धरती पर अवतार ले रहे हैं।

295
00:21:13,680 --> 00:21:17,760
हां, भक्तों का उद्धार के लिए धर्म का कल्याण के लिए लेते हुए ब्रह्म

296
00:21:17,760 --> 00:21:21,920
को या किसी को भी अगर कुछ क्रिएशन बनाना है

297
00:21:21,920 --> 00:21:25,920
तो उसके लिए एक स्पेस तो मतलब आवश्यक है ना।

298
00:21:25,920 --> 00:21:31,120
स्पेस के बिना तो किसी चीज का आविर्भाव नहीं हो सकता।

299
00:21:31,120 --> 00:21:35,680
स्पेस तो अवश्य है। उनके अंदर स्पेस बहुत है। वो अनलिमिटेड अनंत है।

300
00:21:35,680 --> 00:21:39,680
ठीक है। तो अभी जो चार महावाक्य है वो तो

301
00:21:39,680 --> 00:21:44,240
वेद से ही सिद्ध है। तो उनको आप मानते हैं ना।

302
00:21:44,240 --> 00:21:48,480
जैसे कि अहम ब्रह्मास्म करके जो आता है या ब्रह्म सत्यम जगन

303
00:21:48,480 --> 00:21:52,480
मिथ्या जो है तो अगर उसके स्वरूप से

304
00:21:52,480 --> 00:21:56,640
अगर हम देखेंगे कि अगर कोई ईश्वर

305
00:21:56,640 --> 00:22:00,720
भी अगर जगत में आए वो आ सकता है या नहीं वह तो दूसरी बात है। वो

306
00:22:00,720 --> 00:22:02,640
अगर कुछ भी कर सकता है तो वह अवतार

307
00:22:02,640 --> 00:22:06,800
भी ले सकता है। परंतु प्रश्न यह है कि अगर वह ले सके

308
00:22:06,800 --> 00:22:10,960
वह ले लिया अवतार तो लेने के बाद उसमें एक दोष आएगा

309
00:22:10,960 --> 00:22:15,120
क्योंकि अगर वह जगत में आ रहा है तो वो एक

310
00:22:15,120 --> 00:22:19,120
स्पेस में आ रहा है वहां पर जगत का नियम लागू हो रहा है उसके ऊपर

311
00:22:19,120 --> 00:22:23,280
इसलिए जगत में अपने अंदर ही आ रहे अपने

312
00:22:23,280 --> 00:22:27,440
बाहर नहीं जा रहे वो हां तो उनके ऊपर कोई नियम

313
00:22:27,440 --> 00:22:31,520
नहीं लागू होगा हां नहीं लागू होगा

314
00:22:31,520 --> 00:22:35,600
तो अगर वो अगर अवतार ले रहा है। वह अगर मनुष्य रूप में

315
00:22:35,600 --> 00:22:39,600
हमारे बीच में आ रहा है तो हमारे ऊपर वेदों का या धर्म शास्त्रों

316
00:22:39,600 --> 00:22:43,760
का जो नियम लागू होता है वो उस ईश्वर के ऊपर भी लागू होगा।

317
00:22:43,760 --> 00:22:47,760
तो इस वजह से उसके ऊपर एक दोष भी आएगा जो कि निराकार रूप

318
00:22:47,760 --> 00:22:51,760
में हम यह नहीं कह सकते कि उसमें कोई दोष है। परंतु साकार रूप में

319
00:22:51,760 --> 00:22:55,840
दोष भगवान श्री कृष्ण खुद कहते हैं कि मुझे उनको ना कोई वचन

320
00:22:55,840 --> 00:23:00,560
रोक सकता है ना कोई श्राप मिल सकता है। तो उनको

321
00:23:00,560 --> 00:23:04,640
बस भक्तों का मान रखने के लिए वो यह अपने ऊपर ले सकते

322
00:23:04,640 --> 00:23:08,720
हैं। श्राप हो या कोई वरदान हो या कोई वचन हो अन्यथा

323
00:23:08,720 --> 00:23:12,800
वो यह सब चीजों से परे हैं। उनके ऊपर कोई नियम लागू नहीं

324
00:23:12,800 --> 00:23:16,800
होता। यह भक्तों का कल्याण के लिए भक्तों में भक्ति भावना रखने के लिए उनका

325
00:23:16,800 --> 00:23:17,680
मान सम्मान रखने

326
00:23:17,680 --> 00:23:22,320
के लिए भगवान ऐसा लीला रचाते हैं।

327
00:23:22,320 --> 00:23:26,720
बहुत बढ़िया। मैं फिर कहूंगा निराकार वाले

328
00:23:26,720 --> 00:23:30,800
निराकार वाले अपने आप को मैं फिर कहूंगा निराकार

329
00:23:30,800 --> 00:23:34,880
पक्ष वाले स्वयं को आर्य समाजी जैसा माने।

330
00:23:34,880 --> 00:23:38,880
वो सगुण साकार के अवतार को स्वीकार ना

331
00:23:38,880 --> 00:23:43,040
करें। आपको उसको स्वीकार नहीं करना है। जैसे अभी

332
00:23:43,040 --> 00:23:47,360
नारायण जी ने स्वीकार कर लिया कि

333
00:23:47,360 --> 00:23:51,440
नयन नयन नयन जी ने स्वीकार कर लिया तो आपको स्वीकार नहीं

334
00:23:51,440 --> 00:23:55,520
करना है। सुजीत जी ने भी स्वीकार कर लिया था। आपको स्वीकार नहीं करना है।

335
00:23:55,520 --> 00:23:59,680
शिवंत भैया एक नयन जी से प्रश्न था मेरा अगर आप कहे तो पूछ आप

336
00:23:59,680 --> 00:24:03,920
साकार से हैं या निराकार से हैं? साकार से हैं। ठीक है।

337
00:24:03,920 --> 00:24:07,920
करिए। कृपया मेरा कि आपने कहा करण

338
00:24:07,920 --> 00:24:12,160
जी कोई भी अगर आप बोले क्योंकि अभी क्या है कि हम ये पहली

339
00:24:12,160 --> 00:24:16,240
बार कर रहे हैं तो कोई भी जब बोले तो अपना पक्ष बोलते हुए

340
00:24:16,240 --> 00:24:20,320
ही बोले कि मैं साकार पक्ष पक्ष से हूं और मैं अब प्रश्न करना चाहता हूं तो उससे

341
00:24:20,320 --> 00:24:24,400
हमें आसानी रहेगी। जी करण जी कृपया बोलिए। मेरा ये प्रश्न

342
00:24:24,400 --> 00:24:28,880
था कि जैसे उन्होंने कहा कि कोई दोष लग जाना तो जगत में जब हम अवतार

343
00:24:28,880 --> 00:24:32,800
लेकर प्रभु आते हैं तो दोष तो लगेगा ही तो दोष ना लगना ये कहां कौन

344
00:24:32,800 --> 00:24:36,880
सा कंपलशन है? दोष के साथ ही वह उस जीवन चरित्र को

345
00:24:36,880 --> 00:24:41,040
निभाते हैं और जो अपना कार्य पूर्ण करके जाते हैं तो दोष जो

346
00:24:41,040 --> 00:24:45,280
आप कह रहे हैं कि कोई भी भौतिक दोष उन पर लग रहा है तो उसमें कहां कोई रोक

347
00:24:45,280 --> 00:24:49,920
है और हम कौन होते हैं उस रोक लगाने वाले वो तो

348
00:24:49,920 --> 00:24:54,160
देखिए रोक लगाने वाले तो हम कोई नहीं परंतु अगर मैं कह रहा हूं कि अगर

349
00:24:54,160 --> 00:24:58,240
उसमें दोष आ रहा है तो वह पूजनीय है क्या वो स्वरूप

350
00:24:58,240 --> 00:25:02,320
उनका वो स्वरूप पूजनीय है क्या जिसमें दोष लग रहा है जैसे आप

351
00:25:02,320 --> 00:25:06,480
दोष मतलब किस प्रकार के दोष भौतिक दोष जैसे विचार करना सोना खाना

352
00:25:06,480 --> 00:25:11,200
पीना इसी प्रकार के दोष नहीं वह सब क्यों होगा पर देखिए जो

353
00:25:11,200 --> 00:25:15,280
हम जैसे मनुष्य हैं तो चल फिर रहे हैं तो हमसे

354
00:25:15,280 --> 00:25:19,440
अजान मतलब अनजाने में ही कुछ ना कुछ दोष हो ही रहा है कुछ ना कुछ पाप

355
00:25:19,440 --> 00:25:23,520
हम कर ही रहे हैं कीटों को मार रहे हैं या कुछ भी हो रहा है निश्वास में तो

356
00:25:23,520 --> 00:25:27,680
अगर वो मनुष्य देह लेकर अगर वो आ रहा है तो उसमें भी वही

357
00:25:27,680 --> 00:25:31,760
दोष रहेगा ना उसमें भी अनजाने में वही पाप सब होगा

358
00:25:31,760 --> 00:25:36,000
उससे तो उस प्रकार से तो आप कह रहे हैं कि उससे कुछ अनुकरणी नहीं होगा। जैसे

359
00:25:36,000 --> 00:25:40,320
आचार्य देव होते हैं। आचार्य देव आचार्य देव नमः कहते हैं। हमारे

360
00:25:40,320 --> 00:25:44,640
उपनिषद में वर्णित है। तो उनमें भी दोष कहीं ना कहीं रहता है। जब वशिष्ठ जी ने शिक्षा

361
00:25:44,640 --> 00:25:48,000
प्रारंभ करी थी देनी रामचंद्र जी को तो कहा था कि मेरे

362
00:25:48,000 --> 00:25:52,080
गुणों को स्वीकार करना अवगुणों को नहीं। उसी प्रकार तो वही तो कह रहा हूं। इसका

363
00:25:52,080 --> 00:25:56,240
मतलब आप भी मान रहे हैं कि उनमें अवगुण भी है तो जो ईश्वर है

364
00:25:56,240 --> 00:26:00,400
रूप से अवगुण मतलब भौतिक जो भी उनमें कमियां है जो कि शरीर धारी

365
00:26:00,400 --> 00:26:05,120
के पास होता ही है संसार में जुड़ने के बाद तो वो तो अब सब में रहता है

366
00:26:05,120 --> 00:26:09,120
हां तो आप तो खुद ही कह रहे आप आप मैं क्या खंडन कर आप तो खुद ही खंडन कर रहे हैं

367
00:26:09,120 --> 00:26:13,440
कि अगर वो आ रहे हैं तो उनमें अवगुण भी है उनमें दोष भी है

368
00:26:13,440 --> 00:26:17,840
लेकिन इनके बाद भी आप ये कैसे कह रहे हैं कि ये जो है

369
00:26:17,840 --> 00:26:22,000
मतलब सिद्ध नहीं होते भगवान इन सब अवगुणों के बाद मेरा

370
00:26:22,000 --> 00:26:26,160
पक्ष यह है कि उनका जो निराकार स्वरूप है वही मूल है और वही

371
00:26:26,160 --> 00:26:31,200
पूजनीय योग्य है। अगर वह साकार रूप में आएगा जी

372
00:26:31,200 --> 00:26:35,520
मैं ना साकार पक्ष बोल रहा हूं शशांक तो आपके अनुसार अगर कोई अवतार

373
00:26:35,520 --> 00:26:39,600
लेकर आते हैं इंसानी रूप में तो उनसे अनजाने में पाप हो जाते हैं। कुछ बोल

374
00:26:39,600 --> 00:26:43,680
सकता हूं मैं कीट पतंगों पे वो पैर रख देते हैं। बोल दीजिए।

375
00:26:43,680 --> 00:26:47,680
इस प्रकार के उनसे अनचाही रूप से भी पाप बन जाते हैं। तो

376
00:26:47,680 --> 00:26:51,760
ऐसे तो जो निराकार सृष्टि है इसमें बाढ़ आती रहती है। लोग मरते रहते हैं। तो निराकार

377
00:26:51,760 --> 00:26:55,920
तो हम पूछ ही नहीं सकते। फिर राम जी कृष्ण जी तो जानबूझ के पैर

378
00:26:55,920 --> 00:26:59,920
से बचा भी सकते हैं। कीड़ों को जैसे आप कह रहे हैं लेकिन प्रकृति तो वो भी देती

379
00:26:59,920 --> 00:27:03,040
है। तो वो तो कर्म के अनुसार क्या कहते हैं? फल देती

380
00:27:03,040 --> 00:27:07,280
है। हां तो उसके अब देखिए ये तो

381
00:27:07,280 --> 00:27:11,280
जो प्रकृति है उसका तो यह नियम है ना। इसको हम परमात्मा से क्यों?

382
00:27:11,280 --> 00:27:15,360
प्रकृति को आप ईश्वर से अलग मानते हैं क्या कि ईश्वर ने प्रकृति एक बोल बना

383
00:27:15,360 --> 00:27:19,760
दी उसके अंदर गतिविधियां चल रही है या फिर ईश्वर ही प्रकृति के रूप में विराज

384
00:27:19,760 --> 00:27:23,920
विराजमान है क्योंकि अवतार लेने पे तो उनसे वो क्या कहते हैं कीड़ों

385
00:27:23,920 --> 00:27:27,920
पे पैर रख देंगे लेकिन जो प्रकृति कर्म के अनुसार फल देती है बाढ़ लाती

386
00:27:27,920 --> 00:27:32,080
है बिजली गिराती है सूखे से लोगों को मारती है वो पूजनीय है

387
00:27:32,080 --> 00:27:36,400
ना भैया देखिए अगर हम

388
00:27:36,400 --> 00:27:40,800
उसको ईश्वर प्रकृति है या उससे भिन्न है ये तो अलग बात

389
00:27:40,800 --> 00:27:44,800
मैं जो कह रहा हूं तो हम साकार और निराकार रूप की बात कर रहे हैं

390
00:27:44,800 --> 00:27:48,880
ना आप कह रहे वो ज्यादा पूजनीय वो पूजनीय नहीं है तो डिबेट तो इस बात पे भी नहीं है

391
00:27:48,880 --> 00:27:52,960
ना कि अवतार पूजनीय है या नहीं है उनके होने या ना

392
00:27:52,960 --> 00:27:57,520
होने पे डिबेट है हां तो

393
00:27:57,520 --> 00:28:01,520
नहीं उसी में अगर अगर अनचाहे रूप से पाप कर रहे हैं अवतार और

394
00:28:01,520 --> 00:28:05,760
ईश्वर रूप लेके तो अनचाहे रूप से प्रकृति भी तो वो कर रही है और मीट्योर

395
00:28:05,760 --> 00:28:09,760
तो इस प्रकृति का भी हिस्सा नहीं है। प्रकृति को हम थोड़ी रहे हैं। हम तो उस ब्रह्म

396
00:28:09,760 --> 00:28:13,920
को पूज रहे हैं तो वो ब्रह्म प्रकृति भिन्न कैसे अलग उसको

397
00:28:13,920 --> 00:28:19,120
अलग है अलग है जैसे आप उन्होंने

398
00:28:19,120 --> 00:28:23,280
बहुत होशपच हो रहा है ठीक है एक-एक करके बोले तो अभी अभी दो

399
00:28:23,280 --> 00:28:27,360
कौन-कौन से लोग बोल रहे हैं नयन जी और शशांक जी

400
00:28:27,360 --> 00:28:31,360
बोल रहे थे हां तो नयन जी आप कोशिश

401
00:28:31,360 --> 00:28:35,440
करिए कि [संगीत] आप

402
00:28:35,440 --> 00:28:39,840
एक बार में ही अपनी बात को रखें ठीक है ताकि दूसरा

403
00:28:39,840 --> 00:28:43,840
आप बैक एंड बैक एंड फोर्स करते रहेंगे तो ये कन्वर्सेशन हो जाएगा पूरा इसमें बाकी लोगों को

404
00:28:43,840 --> 00:28:47,840
मौका नहीं मिलेगा बोलने का कोई नहीं अब नयन जी के पक्ष से और लोगों

405
00:28:47,840 --> 00:28:52,080
को ले लीजिए

406
00:28:52,080 --> 00:28:58,080
तो जी

407
00:29:02,080 --> 00:29:06,160
आशीष जी ने एक भी बार नहीं बोला है अभी तक तो उनको उनको

408
00:29:06,160 --> 00:29:10,560
ले लेते हैं। आशीष चतुर्वेदी जी बोल चतुर्वेदी

409
00:29:10,560 --> 00:29:14,640
जी हैं विश्वजीत जी हैं और बोले जी अगर ये आपका

410
00:29:14,640 --> 00:29:18,960
ऐसा मानना है कि ईश्वर निराकार है और साकार नहीं है और

411
00:29:18,960 --> 00:29:24,960
क्या आप ऐसा भी मानते हैं कि ईश्वर सर्वव्याप्त है

412
00:29:26,400 --> 00:29:30,560
निराकार पक्ष से अगर कोई इसका उत्तर दे हमें ईश्वर

413
00:29:30,560 --> 00:29:34,640
ईश्वर सर्वव्याप्त है ईश्वर में ही हम जा रहे हैं

414
00:29:34,640 --> 00:29:38,720
सर्वव्याप्त ईश्वर है या नहीं है जी ईश्वर सर्वव्याप्त

415
00:29:38,720 --> 00:29:42,720
है। सर्व्याप्त है। तो विभिन्न प्रकार की जो आकार हम देखते

416
00:29:42,720 --> 00:29:48,160
हैं अपने आसपास उन सब में भी ईश्वर व्याप्त है। हां

417
00:29:48,160 --> 00:29:52,160
तो इससे आकार किसी आकार मतलब सभी आकारों

418
00:29:52,160 --> 00:29:57,280
में व्याप्त होने की वजह से ईश्वर की साकार होना सिद्ध नहीं होता है।

419
00:29:57,280 --> 00:30:01,360
नहीं क्योंकि जो ईश्वर है वो उसने अपने आप

420
00:30:01,360 --> 00:30:05,520
को माया से ढकने दिया है। इसलिए जो हम देख रहे हैं वो सब मिथ्या है।

421
00:30:05,520 --> 00:30:11,520
और असली जो आतंत्रिक स्वरूप होगा वो निराकार ही होगा।

422
00:30:11,520 --> 00:30:15,680
तो विभिन्न आकारों में जो आप देखते हैं जैसे हमारा ईश्वर जगत बनाता

423
00:30:15,680 --> 00:30:19,760
भी है और बनता भी है। अब मुझे आर्य समाज के ईश्वर के बारे में नहीं पता कि उनका बनता

424
00:30:19,760 --> 00:30:23,840
है या नहीं। लेकिन हमारा अगर बनता है तो विभिन्न आकार जो हम देखते

425
00:30:23,840 --> 00:30:28,560
हैं अपने आसपास वो सब उसी के आकार होते हैं। हां

426
00:30:28,560 --> 00:30:32,640
फिर लेकिन जो हम देख रहे हैं वो सब मिथ्या ही तो है।

427
00:30:32,640 --> 00:30:36,800
हम कितने भी भगत के बात कर ले कि आकार आकार

428
00:30:36,800 --> 00:30:41,360
लेकिन अल्टीमेटली उसका आकार निराकार ही है। व्यवहारिक

429
00:30:41,360 --> 00:30:45,440
सत्य है। अच्छा मैं मैं एक छोटा

430
00:30:45,440 --> 00:30:49,440
सा संशोधन करना चाहूंगा आशीष जी के बात में कि ईश्वर सब कुछ

431
00:30:49,440 --> 00:30:53,600
में नहीं है। ईश्वर में सब कुछ है। ठीक है? तो अगर हम

432
00:30:53,600 --> 00:30:58,000
साकार रूप को अगर मानेंगे तो उसको भी हमें निराकार में ही मानना पड़ेगा।

433
00:30:58,000 --> 00:31:02,720
तो इसका मतलब उसका एक बाउंड्री भी होगा। जी आपने जैसे कहा कि सब कुछ उसमें

434
00:31:02,720 --> 00:31:07,440
सब कुछ उसमें भी है और सब वो भी सब कुछ में जैसे श्लोक है ना

435
00:31:07,440 --> 00:31:11,600
अगर हम एक जरा एक चीज समझिए अगर हम मान

436
00:31:11,600 --> 00:31:15,760
रहे हैं कि एक वस्तु किसी दूसरे वस्तु में है तो वो वस्तु तो पूर्ण है ना

437
00:31:15,760 --> 00:31:19,760
उसमें एक छोटा सा अंश है अगर हम मानेंगे कि

438
00:31:19,760 --> 00:31:23,840
ईश्वर में सब कुछ है तो ठीक है। ईश्वर सब कुछ में है मतलब उसको एक

439
00:31:23,840 --> 00:31:26,640
बाउंड्री हो जाएगा ना। नहीं तो आप देखिए ना गीता में

440
00:31:26,640 --> 00:31:30,880
कहते हैं कि योम पश्यति सर्वत्र सर्व चम पश्यति तस

441
00:31:30,880 --> 00:31:35,120
प्रश प्रसति इसका मतलब यही है कि सब कुछ मुझ में देखता है और सब

442
00:31:35,120 --> 00:31:39,280
कुछ मुझ में स्थित देखता है और सब कुछ मुझ में समाया हुआ देखता

443
00:31:39,280 --> 00:31:43,280
है सब कुछ मुझे देखता है उस प्रकार से भाव रखने वाले जितने भाव

444
00:31:43,280 --> 00:31:47,440
वो है उस सिद्धांत में मैं कह रहा हूं आप कह रहे हैं कि वो केवल सबको

445
00:31:47,440 --> 00:31:51,760
समाया हुआ है वो सब में नहीं है हां तो अगर देखिए इसमें

446
00:31:51,760 --> 00:31:56,240
थोड़ा व्याख्या का या समझने का थोड़ा अंतर हो है। परंतु

447
00:31:56,240 --> 00:32:00,480
जो वह वहां जो बोला गया है कि जो ईश्वर

448
00:32:00,480 --> 00:32:04,480
में सब कुछ है या ईश्वर सब कुछ में है मतलब क्या है? अगर ईश्वर

449
00:32:04,480 --> 00:32:08,560
में सब कुछ है ईश्वर में जो जो चीजें हैं उनमें हम उनको देख

450
00:32:08,560 --> 00:32:12,560
सकते हैं एक साथ। परंतु जो जगत है उससे भी तो परे ईश्वर

451
00:32:12,560 --> 00:32:16,800
होगा ना। जैसे पुरुष सूक्त में कहते हैं कि जो दशांगुलम है ना

452
00:32:16,800 --> 00:32:21,280
जो पूरा जगत है उससे भी 10 अंगुल छोड़ के वह मौजूद

453
00:32:21,280 --> 00:32:25,520
है। तो इस प्रकार से अगर माना जाए तो ईश्वर में सब कुछ

454
00:32:25,520 --> 00:32:29,680
है और जो कुछ है उनके अंदर उसमें हम उनको देख

455
00:32:29,680 --> 00:32:33,840
सकते हैं ब्रह्म स्वरूप में या परमात्मा स्वरूप में जी अतिरिक्त

456
00:32:33,840 --> 00:32:37,680
बात है

457
00:32:37,680 --> 00:32:41,760
अतिरिक्त अंगुल आपने जैसे कहा अतिरिक्त अंगुल वो इस परिभाषा को शायद समझाता

458
00:32:41,760 --> 00:32:46,000
हो कि जो आपके दृष्टिगोचर जो प्रकृति है उससे परे

459
00:32:46,000 --> 00:32:50,320
जो आप विचारणीय नहीं है वो भी ईश्वर है उस प्रकार एक संख्या

460
00:32:50,320 --> 00:32:54,480
से बता दिया गया है 10 अंगुल का ऐसा मतलब नहीं 10 अंगुल आप

461
00:32:54,480 --> 00:32:58,640
उसको ठोस रूप से स्वीकार कर ले 10 अंगुल ये बताया गया कि जो आपसे

462
00:32:58,640 --> 00:33:02,800
कुछ हटके है जो आप अभी ज्ञात नहीं है वो वस्तु जो वो जो क्षेत्र है वो

463
00:33:02,800 --> 00:33:06,880
भी ईश्वर से समाया हुआ है नहीं मैं तो कह

464
00:33:06,880 --> 00:33:11,200
रहा हूं कि उसको वो जो एक्स्ट्रा जो पार्ट है उसको

465
00:33:11,200 --> 00:33:15,600
लेकर पूरा पूरा ही पूरा संसार ही है ब्रह्म परंतु

466
00:33:15,600 --> 00:33:19,760
जितना अंश हम देख रहे हैं वो तो हमारे व्यवहार में है

467
00:33:19,760 --> 00:33:23,840
और जो व्यवहार में आ रहा है उसमें संसार का नियम लागू होगा तो इस

468
00:33:23,840 --> 00:33:28,240
कारण हम उसको उस अंश को हम ईश्वर के रूप में पूजा नहीं कर सकते

469
00:33:28,240 --> 00:33:32,480
जो हमारे कौन सा अंश लोगे जो ईश्वर में नहीं आता है मतलब

470
00:33:32,480 --> 00:33:36,480
सभी चीजें तो ईश्वर में ही समा सर्वत्र ही है तो फिर

471
00:33:36,480 --> 00:33:40,480
वो मूर्ति जिसकी आप खंडन करते हो कि मूर्ति पूजा संभव नहीं है वो

472
00:33:40,480 --> 00:33:44,640
तो इसी जगत का ही अंश हुआ ना तो पारलौकिक वो भी होगा क्योंकि भगवान के अंश

473
00:33:44,640 --> 00:33:48,720
में ही वो आता है तो आप उसका विरोध कैसे करते हो तो

474
00:33:48,720 --> 00:33:52,720
अगर आप एक बात बताइए कि जो मूर्ति का आप

475
00:33:52,720 --> 00:33:57,040
कह रहे हैं तो सब कुछ में है तो आप केवल मूर्ति को ही क्यों मान रहे हैं?

476
00:33:57,040 --> 00:34:01,120
आप तो दीवार को भी पूज ही सकते हैं ना जो नरसिम्हा अवतार

477
00:34:01,120 --> 00:34:05,200
जैसा हुआ था कि क्या पूछा था कि हिरण्यश कि क्या ये

478
00:34:05,200 --> 00:34:09,440
दीवार में है? तो उसने कहा था कि दीवार को पूछिए मूर्ति एक मिनट एक मिनट

479
00:34:09,440 --> 00:34:14,160
एक मिनट मैं एक चीज क्लियर कर दूं जरा

480
00:34:14,160 --> 00:34:20,160
अभी तक जो पक्ष सामने आ रहा है वह यह आ रहा है कि

481
00:34:22,320 --> 00:34:27,040
ईश्वर यदि अवतार लेगा तो उसमें विकार आ जाएगा। हम

482
00:34:27,040 --> 00:34:31,920
जब विकार आ जाएगा तो फिर विकार युक्त

483
00:34:31,920 --> 00:34:36,080
स्वरूप को क्यों पूजा जाए। ठीक है? दूसरी बात यह

484
00:34:36,080 --> 00:34:40,240
है कि यदि अब आगे बात

485
00:34:40,240 --> 00:34:44,240
होती है कि भाई ईश्वर क्योंकि ईश्वर

486
00:34:44,240 --> 00:34:48,400
जगत बनाता ही नहीं बनता भी है तो वो सब चीजें वही है फिर वहां से

487
00:34:48,400 --> 00:34:52,880
निकल के आया कि वो सब कुछ में है या वो वही

488
00:34:52,880 --> 00:34:57,520
क्या वो सब कुछ में नहीं है बल्कि उसमें सब कुछ है ये वाली बात आ गई

489
00:34:57,520 --> 00:35:01,520
और फिर अंतत गतवा बात ये आई कि यदि सब कुछ

490
00:35:01,520 --> 00:35:05,680
ईश्वर है यदि जितने भी स्वरूप रूप दिख रहे हैं वह ईश्वर के

491
00:35:05,680 --> 00:35:10,240
ही है। तो फिर सब कुछ क्यों नहीं पूज रहे हैं? फिर आप पर्टिकुलर

492
00:35:10,240 --> 00:35:12,240
एक एक विग्रह को एक स्वरूप

493
00:35:12,240 --> 00:35:16,320
को क्यों पूज रहे हैं? ठीक है? अभी तक ये निराकार की ओर से

494
00:35:16,320 --> 00:35:20,480
पक्ष रख दिया गया है। तो अब पहले सारे लोग हैंड डाउन कर दें।

495
00:35:20,480 --> 00:35:24,640
उसके बाद साकार की ओर से उठाएं। हैंड रेज करें।

496
00:35:24,640 --> 00:35:28,880
शिवाशु भैया मैं बस आखरी एक शब्द कहना चाहूंगा। इसके

497
00:35:28,880 --> 00:35:33,200
ही परिपेक्ष में कि ये जो मैंने कहा कि दोष आ जाएगा

498
00:35:33,200 --> 00:35:37,840
उसके साथ एक बात है कि क्रिएशन कैन नॉट बी क्रिएटर

499
00:35:37,840 --> 00:35:41,920
क्रिएटर जो क्रिएटर है उससे जो बन रहा है वह क्रिएशन है और

500
00:35:41,920 --> 00:35:46,240
क्रिएशन कभी क्रिएटर नहीं बन सकता। तो यही मेरा पक्ष

501
00:35:46,240 --> 00:35:51,360
है। आपने ना होने के संबंध में भी

502
00:35:51,360 --> 00:35:55,680
ठीक है ना?

503
00:35:55,680 --> 00:35:59,760
तो अब केवल सगुण साकार

504
00:35:59,760 --> 00:36:04,160
वाले हाथ उठाएं। करण दास, हर्ष जी, आशीष

505
00:36:04,160 --> 00:36:08,960
जी और विश्वजीत जी और शशांक जी है ना

506
00:36:08,960 --> 00:36:14,160
और कोई है जिसने हाथ उठाया हो।

507
00:36:14,160 --> 00:36:20,160
पंडित जी आप देखें किसको बोलना है।

508
00:36:23,360 --> 00:36:27,760
जी जैसा कि उन्होंने कहा कि क्रिएशन कैन नॉट बी क्रिएटेड।

509
00:36:27,760 --> 00:36:31,760
तो उस पक्ष को मैं पूछना चाहूंगा कि आप ये कह रहे

510
00:36:31,760 --> 00:36:35,920
हैं कि जो क्रिएशन है और क्रिएटर है वो एक सेपरेट एंटिटी है। तो

511
00:36:35,920 --> 00:36:40,080
आप ये बताइए कि जो क्रिएशन है उसके लिए एक स्पेस रिक्वायर्ड

512
00:36:40,080 --> 00:36:44,320
है और क्रिएटर उससे भिन्न है। कहीं अलग है स्थित। तो यह

513
00:36:44,320 --> 00:36:48,320
किस तरह से आप वैज्ञानिक तल पर भी और सनातन के सिद्धांत पर भी आप किस

514
00:36:48,320 --> 00:36:52,320
तरह से इसको सिद्ध कर पा रहे हैं ना वैज्ञानिक तल पर यह हो रहा है सिद्ध ना सनातन के

515
00:36:52,320 --> 00:36:56,320
पक्ष क्योंकि आप एक तो पहले भिन्नता उसमें ले आए और भिन्नता

516
00:36:56,320 --> 00:37:00,400
लाने के बाद आप कह रहे हैं कि वो एक क्रिएट कर दिया और वो उससे भिन्न है

517
00:37:00,400 --> 00:37:04,960
अलग कुछ है और फिर वो जगत को देख रहा है बाहर से उस प्रकार

518
00:37:04,960 --> 00:37:08,960
तो आप कैसे समझाएंगे तो आप यदा यदा

519
00:37:08,960 --> 00:37:12,320
ही धर्मस्य वाले श्लोक को आप मानते हैं

520
00:37:12,320 --> 00:37:16,400
जी जी बिलकुल अच्छा तो आप मतलब आप ये मानते हैं

521
00:37:16,400 --> 00:37:20,560
कि जो श्री कृष्ण जो कह रहे हैं कि जब जब

522
00:37:20,560 --> 00:37:24,560
धर्म का ग्लानी होगा तब मैं अपने आप को सृजन करूंगा। ठीक

523
00:37:24,560 --> 00:37:28,640
है ना? मानते हैं। तो वो अगर सृजन कर रहे हैं मतलब वो

524
00:37:28,640 --> 00:37:32,800
क्रिएटर है और जो बन रहा है वह क्रिएशन है। तो अगर आप

525
00:37:32,800 --> 00:37:36,800
जो साकार रूप को मान रहे हैं तो आप क्रिएटर को पूज रहे हैं या क्रिएशन को

526
00:37:36,800 --> 00:37:41,120
पूज रहे हैं? दोनों समान रूप में संभव क्यों नहीं होगा?

527
00:37:41,120 --> 00:37:45,440
दोनों साथ ही में क्यों संभव नहीं है? आप कह रहे हैं कि साथ में मतलब देखिए

528
00:37:45,440 --> 00:37:49,600
जो अगर कोई अगर बन रहा है अगर हम अगर हम आप

529
00:37:49,600 --> 00:37:53,680
कह रहे हैं कि जो क्रिएशन है और क्रिएटर है दोनों एक है। ठीक है? कोई

530
00:37:53,680 --> 00:37:57,840
समस्या नहीं। परंतु अगर क्रिएशन को पूज रहे हैं मतलब उसका क्रिएटर अलग

531
00:37:57,840 --> 00:38:01,840
है। ठीक है ना? जो क्रिएशन भौतिक सिद्धांत आप क्यों बना रहे हैं कि

532
00:38:01,840 --> 00:38:05,840
पोर्ट बन रहा है तो पॉटर की आवश्यकता है। यहां पे पोर्ट और पॉटर में कोई भेद ही नहीं है।

533
00:38:05,840 --> 00:38:09,840
हां। तो ये कैसी बात हो गई? अगर आप मतलब पॉट

534
00:38:09,840 --> 00:38:14,000
को आप पूछ रहे हैं तो उसको बनाने वाला तो कोई और है ना पॉट और पॉटर कैसे

535
00:38:14,000 --> 00:38:18,320
एक हो सकता है भैया से बनता है

536
00:38:18,320 --> 00:38:22,640
तो मिट्टी जो है उसको आप क्रिएटर के रूप में समझिए

537
00:38:22,640 --> 00:38:26,640
क्योंकि क्रिएटर का मतलब ये नहीं जो भौतिक रूप से कुछ ऐसे गढ़ दिया हो बाहरी

538
00:38:26,640 --> 00:38:27,360
रूप से नहीं

539
00:38:27,360 --> 00:38:31,440
ऐसा कैसे समझे मिट्टी जी पहले करके उनके प्रश्न

540
00:38:31,440 --> 00:38:35,440
का उत्तर दीजिए उसके बाद क्रॉस क्वेश्चन आप ऊपर क्वेश्चन

541
00:38:35,440 --> 00:38:39,760
कर देते हैं जो उत्तर नहीं देते

542
00:38:39,760 --> 00:38:44,000
मेरे पास क्वेश्चन था क्रिएशन और क्रिएटर में डिफरेंस है क्या? क्रिएशन

543
00:38:44,000 --> 00:38:48,800
से क्रिएटर अलग है क्या? आप इसका एक बार उत्तर दे दीजिए। उसके बाद आप क्रॉस क्वेश्चन कर लेना।

544
00:38:48,800 --> 00:38:52,960
जी मैं उत्तर देता हूं। आप पहले मिट्टी से उसका उदाहरण दीजिए ना। फिर

545
00:38:52,960 --> 00:38:55,920
वही मतलब

546
00:38:55,920 --> 00:38:59,680
आप क्रॉस क्वेश्चन करोगे।

547
00:38:59,680 --> 00:39:03,200
हेलो

548
00:39:03,200 --> 00:39:07,680
आप संभाले बात को। ये क्या पूछा है आपने? पूछा करण दा

549
00:39:07,680 --> 00:39:12,480
मैं भी देखिए करण जी

550
00:39:12,480 --> 00:39:17,040
एक बार अपना प्रश्न फिर से रिपीट कर दीजिए जी कि दोनों में

551
00:39:17,040 --> 00:39:21,440
जी जी नरेंद्र जी ने ये तर्क दिया था कि क्रिएशन इज सेपरेट फ्रॉम क्रिएशन

552
00:39:21,440 --> 00:39:25,520
क्रिएटर सेपरेट फ्रॉम क्रिएशन तो उस प्रकार मैंने इसे तो मूल रूप से

553
00:39:25,520 --> 00:39:29,520
उनका उनका यही था कि क्या ईश्वर जगत बनता और बनाता दोनों हो

554
00:39:29,520 --> 00:39:33,680
सकता है क्या नहीं क्रिएटर भिन्न रहता है मतलब जगत को निर्माण करके वो भिन्न

555
00:39:33,680 --> 00:39:37,760
कहीं स्थित है कहीं बाहर मतलब ऐसा आप कह रहे हैं करण

556
00:39:37,760 --> 00:39:41,920
जी नहीं नहीं ऐसा मैं नहीं कह रहा हूं ऐसा वे कह रहे थे तो मैंने वो साम उसमें दोनों

557
00:39:41,920 --> 00:39:45,920
में सामंजस्य ऐसे बनाया कि क्रिएशन और क्रिएशन कैन हैपन एट द

558
00:39:45,920 --> 00:39:50,320
सेम टाइम मतलब अलग भी वो नहीं रहेंगे और वो

559
00:39:50,320 --> 00:39:54,320
तो नहीं एक बार एक बार कंफर्म कर लेते हैं तो करण जी इसका अर्थ

560
00:39:54,320 --> 00:39:58,320
यही हुआ कि आप ये कह रहे हैं कि ईश्वर जो है वो जगत बनता भी है और बनाता भी है

561
00:39:58,320 --> 00:40:02,480
करेक्ट इस प्रकार से और अवतार की वही बात है क्योंकि उनमें लिंक है तभी

562
00:40:02,480 --> 00:40:06,560
वो अवतार ले पा रहे हैं और साथ में जो है सब कुछ घटित कर पा रहे हैं और वह

563
00:40:06,560 --> 00:40:10,560
भिन्न अगर रहते वो भिन्न रूप से अगर जगत का निर्माण करके किस

564
00:40:10,560 --> 00:40:14,560
प्रकार से आ रहे हैं अवतार ले रहे हैं तो अवतार बात का तो खंडन कर रहे हैं

565
00:40:14,560 --> 00:40:15,060
उस

566
00:40:14,800 --> 00:40:19,120
बात का मैं कह रहा हूं तो तो आपके हिसाब से क्रिएटर और क्रिएशन दोनों एक ही

567
00:40:19,120 --> 00:40:23,680
वाले क्वेश्चन में जवाब दे दूंगा मैं जवाब

568
00:40:23,680 --> 00:40:27,920
ठीक है अभी अभी एक मिनट अब करण जी ने अपना पॉइंट रख दिया है अब

569
00:40:27,920 --> 00:40:32,000
इसके अगेंस्ट साकार पक्ष

570
00:40:32,000 --> 00:40:36,160
से निराकार करण दास जी साकार से सॉरी

571
00:40:36,160 --> 00:40:41,600
क्षमा कीजिएगा नि- निराकार पक्ष से कौन बोलना चाहता है?

572
00:40:41,600 --> 00:40:45,760
अच्छा मैं एक बार मेरा पक्ष स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मैंने

573
00:40:45,760 --> 00:40:49,920
क्या कहा था? मैंने यह नहीं कहा कि क्रिएशन और क्रिएटर अलग है या

574
00:40:49,920 --> 00:40:54,000
ऐसा कोई वो ऐसा हो भी बन सकता है। ऐसा मैंने

575
00:40:54,000 --> 00:40:58,080
उनके जो उदाहरण था उसका खंडन किया था। अगर मैं यह कहता हूं

576
00:40:58,080 --> 00:41:02,320
कि क्रिएटर है। उसने कोई कुछ बनाया वह क्रिएशन

577
00:41:02,320 --> 00:41:06,400
है। अब वह खुद क्रिएशन बन भी सकता है। परंतु उसका जो

578
00:41:06,400 --> 00:41:10,800
क्रिएशन जो रूप है उस रूप को हम पूज नहीं सकते। हम क्रिएटर

579
00:41:10,800 --> 00:41:15,360
का जो स्वरूप है उस स्वरूप को पूजेंगे। निराकार जो स्वरूप है

580
00:41:15,360 --> 00:41:19,520
न वो विश्वजीत जी बोले भैया अगर

581
00:41:19,520 --> 00:41:23,520
हम क्रिएटर और क्रिएशन दोनों को अलग माने तो फिर

582
00:41:23,520 --> 00:41:27,600
एक एक्स्ट्रा मटेरियल इस दुनिया में आ जाएगा। जैसे कि उन्होंने कहा

583
00:41:27,600 --> 00:41:30,000
मिट्टी से अगर कोई बर्तन बनाने वाला है

584
00:41:30,000 --> 00:41:34,000
तो वो अगर दोनों भिन्न है तो मिट्टी अलग हो गया और बर्तन बनाने

585
00:41:34,000 --> 00:41:38,080
वाला अलग हो गया। तो जब बनाने वाले ईश्वर अलग हो गए तो उनसे

586
00:41:38,080 --> 00:41:42,320
पहले अगर मिट्टी मौजूद था इस सृष्टि में तो फिर ईश्वर की महत्व

587
00:41:42,320 --> 00:41:46,560
महत्वाकांक्षा कम हो जाएगी क्योंकि उनसे पहले भी कुछ था

588
00:41:46,560 --> 00:41:50,720
इस जगत में और जैसा कि हम लोग यह मानते हैं कि हर कण

589
00:41:50,720 --> 00:41:54,800
में भगवान है या फिर भगवान के अंदर ही हर कण है दोनों एक ही बात होगा

590
00:41:54,800 --> 00:41:58,880
तभी यह सिद्ध हो पाएगा क्योंकि हर कण में भगवान है तो मिट्टी में भी

591
00:41:58,880 --> 00:42:03,200
वही है बनाने वाले भी वही बन भी वही रहे हैं और

592
00:42:03,200 --> 00:42:07,280
एक प्रश्न और था नयन जी का अगर वे अवतार लेते हैं तो विकार आ जाता

593
00:42:07,280 --> 00:42:11,360
है। तो विकार मनुष्यों की दृष्टि से आता है ना कि उनके दृष्टि से जैसा कि मैंने

594
00:42:11,360 --> 00:42:15,520
पहले भी अपना पक्ष रखा था कि भगवान ये जो पाप पुण्य जो भी भगवान

595
00:42:15,520 --> 00:42:19,760
को लगता है ये भक्तों का लाज रखने के लिए भगवान ऐसा लीला रचाते

596
00:42:19,760 --> 00:42:24,160
हैं। जैसे द्रोपदी जी ने श्राप दिया। ये सॉरी माफ कीजिएगा।

597
00:42:24,160 --> 00:42:28,240
दुर्योधन की जो माता जी थी उन्होंने श्राप दिया था भगवान को कि उनका

598
00:42:28,240 --> 00:42:30,640
जो

599
00:42:30,640 --> 00:42:35,040
कि उनका जो पूरा जनरेशन है वो खत्म हो जाएगा आपस में लड़ के तो

600
00:42:35,040 --> 00:42:39,280
इस बात का लाज रखने के लिए भगवान उसको मतलब बोले कि ठीक है मैं आपके

601
00:42:39,280 --> 00:42:43,440
स्व मतलब जो श्राप है उसको स्वीकार करता हूं इसके अलावा अगर

602
00:42:43,440 --> 00:42:45,120
भगवान चाहते तो ऐसा

603
00:42:45,120 --> 00:42:49,360
ना भी होता क्योंकि वो भक्तों का लाज रखते हैं इसीलिए भगवान

604
00:42:49,360 --> 00:42:53,360
अपने ऊपर श्राप पाप पुण्य सब मान लेते हैं मगर

605
00:42:53,360 --> 00:42:57,360
मगर भगवान इन सब चीजों से बहुत अलग है, बहुत दूर है। इन सब

606
00:42:57,360 --> 00:43:01,760
चीजों का उनके ऊपर कोई असर नहीं होता है। हम

607
00:43:01,760 --> 00:43:05,840
अब मैं चाहता हूं कि साकार रूप क्यों

608
00:43:05,840 --> 00:43:09,920
नहीं हो सकता भगवान का? इस बात का प्रमाण दे या काउंटर करें।

609
00:43:09,920 --> 00:43:14,000
अच्छा विश्वजीत जी को और आशीष जी दोनों का ही मैंने दो पक्ष सुना है।

610
00:43:14,000 --> 00:43:18,160
मैं एक प्रश्न करना चाहता हूं। अच्छा आपने कहा

611
00:43:18,160 --> 00:43:22,160
कि देखिए दो बातें हैं आप पहले

612
00:43:22,160 --> 00:43:26,240
तो उन्होंने जो प्रश्न किया है उसका उत्तर भी दीजिएगा अपने उत्तर में और फिर ये अपना

613
00:43:26,240 --> 00:43:30,480
जो प्रश्न कर रहे हैं तो वो भी करिएगा हां दोनों करिएगा जी

614
00:43:30,480 --> 00:43:34,640
हां बोलिए तो आपने ये कहा कि जो

615
00:43:34,640 --> 00:43:38,640
क्रिएशन है वही क्रिएटर बन सकता है तो उसमें कोई समस्या नहीं है।

616
00:43:38,640 --> 00:43:42,720
अगर हम कहेंगे कि मिट्टी और जो बनाने वाला वो अलग है तो दोनों

617
00:43:42,720 --> 00:43:46,880
अलग है तो ऐसा नहीं हो सकता। ठीक है? अब आप मुझे प्रश्न का उत्तर

618
00:43:46,880 --> 00:43:51,040
दीजिए। चावल में कार्बोहाइड्रेट होता है ना हैं या फल

619
00:43:51,040 --> 00:43:55,120
में? फल में जो होता है फल हम तो फल नहीं खाने के फल खाने के

620
00:43:55,120 --> 00:43:59,120
लिए तो नहीं खाते। उसमें जो पुष्टि है जो एनर्जी है उसको

621
00:43:59,120 --> 00:44:00,320
लेने के लिए हम खाते हैं।

622
00:44:00,320 --> 00:44:04,480
तो क्या आप मतलब वहां से मतलब देखदेख कर बस वही चुन

623
00:44:04,480 --> 00:44:08,560
चुन के खाते हैं या पूरा फल ही खाते हैं? पूरा फल खाते हैं। पूरा

624
00:44:08,560 --> 00:44:13,040
फल खाते हैं ना? तो मेरा बस पॉइंट यही है कि क्रिएशन में क्रिएटर

625
00:44:13,040 --> 00:44:17,120
के अंदर ही क्रिएशन है। तो अगर हम पूरे क्रिएटर को ही पूज ले तो उसके

626
00:44:17,120 --> 00:44:21,120
साथ पूरा क्रिएशन ही पूजित हो जाता है। जैसा कि श्री कृष्ण ने गीता ने

627
00:44:21,120 --> 00:44:25,200
श्री कृष्ण जी ने गीता में कहा है कि तुम मेरा इस स्वरूप को पूजो बाकी स्वरूप अपने आप ही

628
00:44:25,200 --> 00:44:29,600
पूजित हो जाते हैं। जी सही बात है। सही बात है मेरा कि

629
00:44:29,600 --> 00:44:33,600
हमको चुन चुनकर बस इस साकार रूप को मानो। जरूरत नहीं है। पूरी

630
00:44:33,600 --> 00:44:37,680
निराकार जाएंगे। मैं यह नहीं बोल रहा हूं कि मैं

631
00:44:37,680 --> 00:44:41,680
दीवार की पूजा नहीं कर सकता। मैं किसी भी चीज का पूजा कर सकता हूं। वो

632
00:44:41,680 --> 00:44:45,680
वो मेरी श्रद्धा है कि भगवान मुझे उस रूप में अवतार लेकर आए

633
00:44:45,680 --> 00:44:49,760
थे तो हम लोग उस रूप की पूजा कर सकते हैं। क्योंकि कण-कण में भगवान है तो हम किसी भी

634
00:44:49,760 --> 00:44:53,760
चीज की पूजा कर सकते हैं। वो भगवान का ही पूजा माना जाएगा।

635
00:44:53,760 --> 00:44:57,760
दीवार की भी अभी तक एक एक प्रश्न

636
00:44:57,760 --> 00:45:01,920
अभी तक एक प्रश्न जी भैया। अभी तक एक प्रश्न क्लियर

637
00:45:01,920 --> 00:45:06,400
दिखाई दे रहा है कि यदि

638
00:45:06,400 --> 00:45:10,560
सब कुछ भगवान है तो

639
00:45:10,560 --> 00:45:15,280
फिर किसी एक स्वरूप को ही वो सर्वशक्तिमान सच्चिदानंद

640
00:45:15,280 --> 00:45:15,780
कहते

641
00:45:15,760 --> 00:45:19,760
हुए क्यों पूजा जा रहा है यदि

642
00:45:19,760 --> 00:45:24,080
सब कुछ भगवान है तो इस बारे में इस पर आप अब

643
00:45:24,080 --> 00:45:28,160
प्रकाश डालिए है ना नयन जी सही कह रहे हो सही कह रहा हूं ना मैं

644
00:45:28,160 --> 00:45:32,160
जी उत्तर भैया मेरा कहने का अर्थ ये नहीं

645
00:45:32,160 --> 00:45:36,240
था कि किसी एक रूप की पूजा करे बल्कि मेरा यह कहने का अर्थ है जो आज

646
00:45:36,240 --> 00:45:40,320
का वार्ता का जो मुख्य विषय है कि भगवान का साकार रूप भी हो सकता

647
00:45:40,320 --> 00:45:44,160
है। जब

648
00:45:44,160 --> 00:45:48,320
आप अगर सब कुछ को पूजने की बात करेंगे तो बात ये आ जाएगी क्या आप गधे

649
00:45:48,320 --> 00:45:52,320
को भी पूजेंगे क्या भगवान के अंदर ही है वो

650
00:45:52,320 --> 00:45:56,480
सृष्टि में है तो क्या आप स्वान को भी पूज लेंगे गली

651
00:45:56,480 --> 00:46:00,560
यहां पे तो 16 24 आ जाएगा ना आप ऐसे सबको नहीं पूज सकते दोनों पूजे

652
00:46:00,560 --> 00:46:04,960
जाते हैं भगवान के रूप में पंडित जी आप संयम रखें

653
00:46:04,960 --> 00:46:09,040
अपने ऊपर

654
00:46:09,040 --> 00:46:13,360
जी मैं उत्तर अब जो है निराकार वाले

655
00:46:13,360 --> 00:46:17,760
एक बिल्कुल सब क्लियर हो गया है अब निराकार वाले जो

656
00:46:17,760 --> 00:46:22,000
टीम है वो अपने हैंड डाउन कर ले जिससे कि हम देख सके

657
00:46:22,000 --> 00:46:26,240
साकार वाले कौन-कौन लोग हैं तो हम उनमें से चुने किसी को

658
00:46:26,240 --> 00:46:30,400
तो भैया मैं जब उत्तर देना है एक मिनट विश्वजीत जी एक मिनट पहले

659
00:46:30,400 --> 00:46:34,400
सब लोग नीचे कर ले हाथ उसके बाद रेज करें दोबारा कर देता हूं।

660
00:46:34,400 --> 00:46:38,000
रुक जाइए।

661
00:46:38,000 --> 00:46:42,720
अब अब अभी साकार वाले रैंड रेस करें।

662
00:46:42,720 --> 00:46:48,720
केवल साकार वाले

663
00:46:49,280 --> 00:46:53,280
हर्ष झा जी हैं। शशांत जी हैं।

664
00:46:53,280 --> 00:46:59,280
जी सीता प्राणा जी ने अभी तक नहीं बोला है। बोलिए

665
00:47:01,120 --> 00:47:06,080
श्री सीताराम जी सीताराम

666
00:47:06,080 --> 00:47:10,320
और जो ईश्वर है उसे हम साकार रूप में सिर्फ इसलिए पूछते हैं

667
00:47:10,320 --> 00:47:14,320
ताकि हम उसे भक्ति कर सके क्योंकि निराकार में हम प्रेम नहीं कर

668
00:47:14,320 --> 00:47:18,880
सकते। मेन पॉइंट जो आ जाता है प्रेम कहा जाता है।

669
00:47:18,880 --> 00:47:22,880
इसीलिए साकार रूप में अंजना पड़ता

670
00:47:22,880 --> 00:47:26,240
है।

671
00:47:26,240 --> 00:47:30,240
मतलब कहने का अर्थ है कि जो भाव है वो भी साकार स्वरूप है। तो

672
00:47:30,240 --> 00:47:34,400
वो अपने ही मतलब उसी उसी साकार

673
00:47:34,400 --> 00:47:38,800
स्वरूप को खोजता है। तो जैसे प्रेम भी

674
00:47:38,800 --> 00:47:43,120
एक भाव ही हो गया। यह कहना चाह रहे हैं आप।

675
00:47:43,120 --> 00:47:47,360
जी भैया इसमें थोड़ा मैं ऐड करूंगा साकार पक्ष से।

676
00:47:47,360 --> 00:47:51,520
करिए करिए। जी मैं यह कहता हूं कि जैसे निराकार पक्ष के हैं

677
00:47:51,520 --> 00:47:55,760
तो शास्त्र सम्मत रूप से निराकार को सिद्ध अगर करने की कोशिश करेंगे तो निराकार

678
00:47:55,760 --> 00:47:59,760
में तो इस प्रकार भी कहा गया है कि जैसे वेद पाठी ब्राह्मण का वेद से

679
00:47:59,760 --> 00:48:03,760
जैसा प्रयोजन रह जाता है निराकार को समझने के बाद उसी प्रकार का भाव है। तो क्या

680
00:48:03,760 --> 00:48:07,840
ये जो निराकार का पक्ष रख रहे हैं वो उस प्रकार के तत्वदर्शी हैं? मतलब

681
00:48:07,840 --> 00:48:11,840
क्या उनमें पूरी तरह से कोई भी चीज का भिन्नता का वो परिचय नहीं दे

682
00:48:11,840 --> 00:48:16,000
रहे हैं। सोना हो, पत्थर हो या फिर ब्राह्मण हो, चांडाल हो। इस प्रकार जो हमारे

683
00:48:16,000 --> 00:48:20,240
व्यवहारिक धर्म के जो है नहीं इसमें देखिए एक बात है हम लोगों का पक्ष

684
00:48:20,240 --> 00:48:24,240
तो हम ये ये करेंगे कि हम निराकार साकार को होने ही नहीं

685
00:48:24,240 --> 00:48:28,320
देंगे। हम यह नहीं कहेंगे कि एक एक उसके बाद

686
00:48:28,320 --> 00:48:32,480
जो है निराकार की साकार की वो नहीं रह जाती है। सगुण साकार

687
00:48:32,480 --> 00:48:36,880
की उपयोगिता नहीं रह जाती है। हम यह सब नहीं कहेंगे। हम तो यह कहने वाले हैं

688
00:48:36,880 --> 00:48:41,040
कि ईश्वर सगुण साकार हो ही नहीं सकता। उसकी मूर्ति बनाकर पूजा करना

689
00:48:41,040 --> 00:48:41,540
व्यर्थ

690
00:48:41,440 --> 00:48:45,520
है। तो हम उस पक्ष की ओर से आप पर काउंटर

691
00:48:45,520 --> 00:48:48,400
कर रहे हैं।

692
00:48:48,400 --> 00:48:52,640
भैया निराकार पक्ष में होने के लिए तो वो सब गुण भी आवश्यक

693
00:48:52,640 --> 00:48:56,880
है ना कि निराकार मतलब निर्विकार स्वरूप जैसे कोई भी भेद नहीं दृष्टिकोण

694
00:48:56,880 --> 00:49:01,120
रखने वाला। अभेद दृष्टि अद्वैत दृष्टि ठीक है। आपकी

695
00:49:01,120 --> 00:49:05,120
बात समझ गए। अब साकार पक्ष इस पॉइंट को कोई

696
00:49:05,120 --> 00:49:09,280
कहना चाहता है क्या? तो पहले आप हां पहले आप सीता

697
00:49:09,280 --> 00:49:13,440
प्राण सीता प्राण जी के जो पॉइंट को है उनको अगर काउंटर है कोई क्वेश्चन है तो

698
00:49:13,440 --> 00:49:18,080
बोले जी भैया प्रश्न क्या है एक बार फिर से पल दीजिए हां

699
00:49:18,080 --> 00:49:22,160
नहीं प्रश्न आपकी तरफ से नहीं था अब आप वो तो आपके समर्थन से

700
00:49:22,160 --> 00:49:26,400
था तो निराकार निराकार को देना है

701
00:49:26,400 --> 00:49:29,040
ठीक है

702
00:49:29,040 --> 00:49:33,040
हमारी साइड कौन-कौन है भाई धनुष हैदर

703
00:49:33,040 --> 00:49:37,280
अली जी हैदर अली जी भी कुछ बोले क्या

704
00:49:37,280 --> 00:49:41,280
कहें हम? हम हम तो ज्ञान ले रहे हैं बस। नहीं नहीं निराकार

705
00:49:41,280 --> 00:49:45,440
पक्ष निराकार पक्ष से कृपया अपना भी कोई

706
00:49:45,440 --> 00:49:51,440
भी पॉइंट ऑफ व्यू तो रखें ही।

707
00:49:52,080 --> 00:49:56,240
चलिए ठीक है। उनको नहीं रखना है तो आगे अन्य लोगों से

708
00:49:56,240 --> 00:50:02,240
दीक्षित जी सुजीत पाटिल जी एवं नयन जी

709
00:50:02,400 --> 00:50:07,680
कर सकते। कर लीजिए तब तक कर लीजिए।

710
00:50:07,680 --> 00:50:12,160
तो जो निराकार वाले पक्ष है जो भी जो लोग होते हैं योगी गण

711
00:50:12,160 --> 00:50:16,240
वो जिस ज्योति को पूजते हैं भाई भक्त

712
00:50:16,240 --> 00:50:20,240
अपना निज रूप मान के रूप में जो आते प्रेम से प्रकट होते

713
00:50:20,240 --> 00:50:24,240
है सबसे पहले तो व्यापक प्रेम से प्रकट जाना अब जो

714
00:50:24,240 --> 00:50:28,400
प्रेम से प्रकट हो गए जिस ज्योति को वही ज्योति है वो प्रेम से प्रकट हुई है

715
00:50:28,400 --> 00:50:32,560
ठीक है अब जो प्रेम से प्रकट हो गई है उसे

716
00:50:32,560 --> 00:50:38,560
छोड़ के हम फिर निर्गुण की तरफ क्यों भाग

717
00:50:40,480 --> 00:50:45,520
तो आप अब किसको किस ओर जा रहे हैं? मतलब सगुण साकार को छोड़ रहे हैं क्या?

718
00:50:45,520 --> 00:50:50,720
नहीं तो

719
00:50:50,720 --> 00:50:53,520
ठीक है।

720
00:50:53,520 --> 00:50:58,160
ठीक है। निरा निराकार वाले अब

721
00:50:58,160 --> 00:51:03,200
निराकार वाले इनको जवाब दें भाई।

722
00:51:03,200 --> 00:51:08,480
उत्तर दें। बोलिए सुजीत जी

723
00:51:08,480 --> 00:51:12,480
जी अगर हम भगवान को किसी आकार

724
00:51:12,480 --> 00:51:16,480
में सीमित कर देंगे फिर उसको वो सर्वशक्तिमान नहीं

725
00:51:16,480 --> 00:51:20,800
रह सकता ना क्योंकि हम देखते हैं कि कहीं ना कहीं इस सीमा में

726
00:51:20,800 --> 00:51:24,800
ईश्वर है अपने लोक में है या फिर इस आकार में है तो इससे वो

727
00:51:24,800 --> 00:51:28,960
सीमित हो जाएगा और रही बात कि हम अह

728
00:51:28,960 --> 00:51:33,040
कि जो ज्योति है वो भक्ति से प्रकट हुई है ऐसा

729
00:51:33,040 --> 00:51:37,120
नहीं अह अनेक ज्ञानी हुए जिन जिन्होंने ब्रह्म

730
00:51:37,120 --> 00:51:41,200
का स्वरूप समझकर वो ध्यान लगाया ज्योति का वो उनका

731
00:51:41,200 --> 00:51:45,440
ज्ञान हुआ है उनको भक्ति नहीं वो भक्ति से नहीं गए वो ज्ञान मार्ग से गए अनेक

732
00:51:45,440 --> 00:51:49,760
साधक है जो वो उस स्वरूप को ध्यान करते हैं फिर उनको ज्ञान होता है

733
00:51:49,760 --> 00:51:54,400
तो जरूरी नहीं कि भक्ति भक्ति ही ईश्वर के मार्ग पर

734
00:51:54,400 --> 00:51:55,600
जो सामान्य जन उनके

735
00:51:55,600 --> 00:51:59,680
लिए भक्ति है लेकिन जो ज्ञानी जन है या फिर योगी है वो

736
00:51:59,680 --> 00:52:03,760
योग लगा योग आसन करके और प्राणायाम आदि करके उन जो ईश्वर

737
00:52:03,760 --> 00:52:07,840
है उसका स्वर का ध्यान करते हैं। फिर इसका मतलब ये है कि हमें

738
00:52:07,840 --> 00:52:11,920
जरूरी नहीं कि सगुण साकार के आकार का। सगुण साकार की कोई जरूरत नहीं है। इसका

739
00:52:11,920 --> 00:52:15,920
मतलब सिर्फ यही कहना चाहता हूं मैं कि हमें सगुण साकार के निर्गुण निराकार कभी हो

740
00:52:15,920 --> 00:52:19,920
सकता है हमें उसका ध्यान करके। ऐसा जरूरी नहीं कि सगुण साकार ही

741
00:52:19,920 --> 00:52:24,160
चाहिए। क्योंकि अगर हम उनको आकार में डालेंगे फिर सुजीत

742
00:52:24,160 --> 00:52:28,400
जी मैं फिर वही कहूंगा कि आप इस बात को जो एक्सेप्ट

743
00:52:28,400 --> 00:52:32,480
कर रहे हैं ना कि नहीं वो क्या कहते हैं जो ज्ञानी जन

744
00:52:32,480 --> 00:52:36,880
नहीं है उनके लिए भक्ति है ये चीज हमारा हमें नहीं स्वीकार

745
00:52:36,880 --> 00:52:41,840
करनी है। नहीं नहीं स्वीकार कर रहे हैं। मेरा मतलब फिर ये है कि

746
00:52:41,840 --> 00:52:45,840
किसी भी रूप से हमें शगुन साकार का अस्तित्व

747
00:52:45,840 --> 00:52:49,840
स्वीकार नहीं करना है। और इसका कारण क्या है? क्यों नहीं करना

748
00:52:49,840 --> 00:52:54,000
है कि कौन-कौन से तर्क आ सकते हैं सगुण साकार के खंडन

749
00:52:54,000 --> 00:52:58,000
के लिए हम लोग सीख सके व्यवहारिक रूप से सीख सके थ्योरिकली नहीं

750
00:52:58,000 --> 00:53:02,080
कि हमारे भगवान को भगवान का खंडन करने के लिए किस-किस तरह

751
00:53:02,080 --> 00:53:06,480
का प्रहार हो सकता है ये जो सगुण साकार और निराकार में जो आज ये तुलनात्मक

752
00:53:06,480 --> 00:53:10,880
वैचारिक चर्चा हो रही है गोष्ठी हो रही है इसका उद्देश्य यही है कि सगुण

753
00:53:10,880 --> 00:53:15,280
साकार का मत जो है सगुण साकार का अस्तित्व

754
00:53:15,280 --> 00:53:19,440
पर किस-किस प्रकार से प्रहार किया जा सकता है तो इसलिए

755
00:53:19,440 --> 00:53:23,520
आवश्यक है कि जो सामने वाली जो यह वाली इस तरफ से जो कर

756
00:53:23,520 --> 00:53:27,760
रही है सगुण साकार का जो अस्तित्व क्या कहते

757
00:53:27,760 --> 00:53:31,840
हैं स्वीकार नहीं करती है तो वो ना करे किसी भी रूप

758
00:53:31,840 --> 00:53:36,320
से ना करे क्योंकि किसी भी रूप से होगा तो फिर मूर्ति बन जाएगी ना पूजा हो जाएगी

759
00:53:36,320 --> 00:53:40,400
जबकि जो सगुण साकार का खंडन करते हैं कि नहीं ईश्वर अवतार नहीं

760
00:53:40,400 --> 00:53:44,480
ले सकता ईश्वर की मूर्ति नहीं हो सकती ईश्वर का सगुण साकार

761
00:53:44,480 --> 00:53:49,520
स्वरूप नहीं हो सकता वो ये थोड़ी ना करते हैं कि नहीं नहीं वो उनके ये ठीक है

762
00:53:49,520 --> 00:53:53,520
जो कम ज्ञानी है। समझ रहे हैं आप? जी भैया मैं कुछ कहना चाहता

763
00:53:53,520 --> 00:53:57,520
हूं। साकार पक्ष से मैं निराकार का एक बार क्लियर कर

764
00:53:57,520 --> 00:54:02,560
दूं कि किसी भी तरह से सगुण साकार को एक्सेप्ट ना करें आप।

765
00:54:02,560 --> 00:54:06,720
यही आपका पक्ष है। शिवशी मैं भी कुछ कहना चाहता हूं। साकार

766
00:54:06,720 --> 00:54:10,880
पक्ष से एक मिनट कहिएगा। पहले मैं निराकार पक्ष को

767
00:54:10,880 --> 00:54:14,880
थोड़ा सा वो कर दूं। तो अभी

768
00:54:14,880 --> 00:54:19,120
अभी मेरे ख्याल से पड़ रही है। अभी

769
00:54:19,120 --> 00:54:24,640
क्या है कि सुजीत जी आप हैंड हैंड डाउन कर लीजिए।

770
00:54:24,640 --> 00:54:26,480
हाथ अपना अभी

771
00:54:26,480 --> 00:54:30,800
साकार की तरफ से ही वो उठ रही है। ठीक है?

772
00:54:30,800 --> 00:54:35,200
और अगर निराकार की ओर से कोई इनको काउंटर करना चाहता है

773
00:54:35,200 --> 00:54:39,280
तो करें। मगर अब ध्यान रखें निराकार वाले अप्रत्यक्ष रूप से यह स्वीकार

774
00:54:39,280 --> 00:54:43,360
ना करें कि नहीं सगुण साकार इस तरीके से हो सकता

775
00:54:43,360 --> 00:54:47,520
है। मगर फिर भी हम वो नहीं यह करेंगे। वो एक अलग चीज हो जाएगी।

776
00:54:47,520 --> 00:54:51,520
आपको होना ही स्वीकार नहीं करना है तो उस पर बात करें।

777
00:54:51,520 --> 00:54:56,480
तो अगर इनको काउंटर करना है तो करें नहीं तो अन्यथा फिर मैं करूं काउंटर।

778
00:54:56,480 --> 00:55:00,720
मैं कर सकता हूं क्या निराकार कुछ? निराकार से कौन है? तनुष

779
00:55:00,720 --> 00:55:04,880
जी हां बोले जो इससे पहले प्रेम

780
00:55:04,880 --> 00:55:08,880
की बात हुई कि सगुण साकार रूप से प्रेम करके हम

781
00:55:08,880 --> 00:55:12,880
मतलब भक्ति कर सकते हैं। आप यहां से शुरू करिए। आप यहां से

782
00:55:12,880 --> 00:55:17,040
शुरू करिए कि जब सब कुछ भगवान

783
00:55:17,040 --> 00:55:21,040
ही है। सब कुछ सारे स्वरूप उसी

784
00:55:21,040 --> 00:55:25,120
के हैं या सब में वो है। इस कारण से यदि पूज रहे हो तो सब

785
00:55:25,120 --> 00:55:29,360
कुछ को क्यों नहीं पूज रहे हो? फिर कुछ विशेष विग्रह को कुछ विशेष

786
00:55:29,360 --> 00:55:33,520
स्वरूप पूज रहे हो। यहां से शुरू वो भी है। पर मेरा एक

787
00:55:33,520 --> 00:55:37,680
दूसरा पॉइंट है कि प्रेम तो निर्गुण स्वरूप से भी किया जा सकता है।

788
00:55:37,680 --> 00:55:41,760
प्रेम करने के लिए हमें सगुण की जरूरत नहीं है। हम अगर सबको

789
00:55:41,760 --> 00:55:46,000
ही भगवान मान रहे हैं तो फिर अह हमें सगुण की जरूरत

790
00:55:46,000 --> 00:55:50,240
क्यों पड़ रही है प्रेम के लिए? अगर हम भक्ति रखते हैं तो हम निर्गुण

791
00:55:50,240 --> 00:55:56,240
रूप के ब्रह्म में भी भक्ति रख के मतलब पार

792
00:55:56,240 --> 00:56:00,320
इसका उत्तर अगर थोड़ा देना चाहूंगा। कौन-कौन देना चाहता है? पहले बताएं

793
00:56:00,320 --> 00:56:04,640
एक बार

794
00:56:04,640 --> 00:56:09,520
विश्वजीत जी और शशांक

795
00:56:09,520 --> 00:56:13,680
जी आप बोले आपने आपने काफी देर से नहीं बोला है शशांक चौधरी

796
00:56:13,680 --> 00:56:17,760
जी ने भी नहीं बोला है हां हां बोलिए जी मैं

797
00:56:17,760 --> 00:56:21,840
बोलूं बाकी सब हाथ बाकी सब हाथ नीचे करिए कहने पर हाथ

798
00:56:21,840 --> 00:56:25,840
उठाया कर उससे थोड़ा क्लिटी रहती है तो निराकार

799
00:56:25,840 --> 00:56:30,640
पक्ष से भी ये मतलब क्वेश्चन पूछा गया है कि जब सभी भगवान है तो

800
00:56:30,640 --> 00:56:35,200
स्पेसिफिक रूप को ही क्यों पूजा जाए? सबको क्यों नहीं पूजते? तो

801
00:56:35,200 --> 00:56:39,680
इस सबसे पहले मैं जवाब देना चाहता हूं। निराकार हमें कुछ सिखा नहीं सकता।

802
00:56:39,680 --> 00:56:43,760
जो भी हमें वैल्यूज मूल्य जीवन के सिखाए जाते हैं वो साकार रूप में ही सिखा

803
00:56:43,760 --> 00:56:47,840
सकते हैं। निराकार कुछ नहीं सिखा सकता। और जो निराकार का ध्यान लगाते

804
00:56:47,840 --> 00:56:53,040
हो ध्यान लगाने के लिए भी निराकार का कैसे ध्यान लगा सकते हो? एम्प्टी स्पेस का

805
00:56:53,040 --> 00:56:56,880
जो भी यज्ञ करते हैं जो भी हम पूछते हो जैसे अभी आप

806
00:56:56,880 --> 00:57:00,960
कह रहे थे कि जो ज्यादा एलिवेटेड ऋषि होते हैं वो निराकार का

807
00:57:00,960 --> 00:57:05,360
ध्यान लगाते हैं तो ध्यान लगाते किसका है एट द एंड जब कुछ है ही नहीं

808
00:57:05,360 --> 00:57:09,520
सब सब भ्रम है और कोई बिना आकार के भ्रम है तो फिर ध्यान बैठ के आंख बंद

809
00:57:09,520 --> 00:57:13,920
करके सोचते क्या हो और एक भी उदाहरण आप मुझे ऐसा दे दो जो निराकार

810
00:57:13,920 --> 00:57:17,920
ईश्वर ने कोई भी मूल्य सिखाए हो जैसे कृष्ण जी राम जी

811
00:57:17,920 --> 00:57:21,920
आके हमें मूल्य सिखाए के उत्तम कैसे बने?

812
00:57:21,920 --> 00:57:26,080
मर्यादाओं में कैसे रह? वचनों का पालन कैसे करें? निराकार किस प्रकार

813
00:57:26,080 --> 00:57:30,240
से और क्या सिखाता है मनुष्य को कि वो मोक्ष तक जा सके।

814
00:57:30,240 --> 00:57:34,320
ठीक है? धन्यवाद। भाई मैं थोड़ा ऐड करना चाहूंगा मैं साकार पक्ष।

815
00:57:34,320 --> 00:57:38,480
कर दीजिए। साकार पक्ष खूब ऐड कर दीजिए भाई। हम लोग दब

816
00:57:38,480 --> 00:57:41,920
जाए उसके नीचे।

817
00:57:41,920 --> 00:57:46,480
ये शिवंत ये कहना चाहता हूं कि जैसे उन्होंने कहा कि निराकार

818
00:57:46,480 --> 00:57:50,480
अगर सब कुछ आप कह रहे हो कि साकार दृष्टि से कि सब कुछ में ईश्वर है तो फिर आप

819
00:57:50,480 --> 00:57:54,480
क्यों विशेष कुछ विग्रह को पूज रहे हो तो ये सीमा हम पर लगती

820
00:57:54,480 --> 00:57:58,480
है ना हम असीमित थोड़ी है हम पर तो सीमाएं लगती है वो असीमित है

821
00:57:58,480 --> 00:58:02,560
वो तो विभिन्न प्रकार में हर जगह पूजित हो सकता है पर हम तो सीमाएं लगता है ना

822
00:58:02,560 --> 00:58:06,640
हमारे माता-पिता है हम सभी पुरुष स्त्रियों को माता-पिता नहीं कह सकते तो

823
00:58:06,640 --> 00:58:10,720
हम जगत में हमारे भिन्न है शिक्षक हैं हम हर हर किसी को शिक्षक थोड़ी कहेंगे। अब

824
00:58:10,720 --> 00:58:14,880
विद्यालय में कोई शिक्षक है, कोई विद्यार्थी है। अब सब कुछ तो उसके

825
00:58:14,880 --> 00:58:18,880
लिए ना वो एक एकत्व भाव है। हम तो सामान्य हैं। हमके

826
00:58:18,880 --> 00:58:24,240
लिए तो सीमाएं लगेंग ही विग्रह बनेंगे और पूजे भी जाएंगे।

827
00:58:24,240 --> 00:58:28,320
जी जी इसका उत्तर देखिए तो तो

828
00:58:28,320 --> 00:58:32,400
मोटा मोटा पहले केवल हाथ उठाए। पहले केवल हाथ उठाए। अभी ये

829
00:58:32,400 --> 00:58:36,480
हो गया साकार का साकार से किसी और को भी बोलना है। नहीं

830
00:58:36,480 --> 00:58:41,120
नहीं

831
00:58:41,120 --> 00:58:45,200
एक-एक करके पॉइंट लेके चलते हैं। तो मोटा-म मोटी ये कह रहे हैं कि व्यवहार

832
00:58:45,200 --> 00:58:49,520
में हम हैं। अब साकार वालों का हो गया है। तो हम निराकार वालों का पक्ष

833
00:58:49,520 --> 00:58:54,160
लेने जा रहे हैं। आप जो साकार वाले हैं वो हाथ अभी डाउन रखें।

834
00:58:54,160 --> 00:58:58,240
तो साकार वालों के लिए बस एक पॉइंट मैं इसको जोड़ देता हूं। मतलब जोड़ क्या देता हूं।

835
00:58:58,240 --> 00:59:02,400
किसी को बता देता हूं कि वह यह कहना चाह रहे हैं कि व्यवहार में होने के कारण उनको

836
00:59:02,400 --> 00:59:06,720
व्यवहारिक पॉइंट ऑफ व्यू से ही डील करना पड़ेगा और वो वो

837
00:59:06,720 --> 00:59:11,120
हमेशा साकार ही होगा। चाहे वो कोई अच्छी बातें सीखनी

838
00:59:11,120 --> 00:59:15,280
सिखानी हो या शिक्षा देनी हो सब कुछ व्यवहार है और व्यवहार स्व

839
00:59:15,280 --> 00:59:18,640
जो है वो उसका जो

840
00:59:18,640 --> 00:59:22,720
जो अंत है वह क्या बोलते हैं? साकार स्वरूप ही होगा। ठीक है?

841
00:59:22,720 --> 00:59:26,720
तो और उसके बिना आप क्या बोलते हैं? व्यवहार में एक्सिस्ट नहीं कर सकते। कुछ इस तरह

842
00:59:26,720 --> 00:59:30,880
से कहना चाह रहे हैं। तो मैं एक और चीज और बोलिए

843
00:59:30,880 --> 00:59:34,960
बोलिए हर जी हर जी बोलिए

844
00:59:34,960 --> 00:59:39,040
जी जैसे कि निराकार पक्ष से ये आया ना

845
00:59:39,040 --> 00:59:43,040
प्रश्न कि जब ईश्वर सब जगह है सब कुछ ईश्वर ही है तो सारे

846
00:59:43,040 --> 00:59:47,360
स्वरूप पूजनीय क्यों नहीं जो आज सब कुछ है खाली स्पेसिफिक एक

847
00:59:47,360 --> 00:59:51,680
विग्रह को ही क्यों है ना तो इसका उत्तर

848
00:59:51,680 --> 00:59:56,080
यह है कि जल जो है वो तो

849
00:59:56,080 --> 01:00:01,040
सब सर्वत्र व्याप्त नमी के रूप में ना तो हमको

850
01:00:01,040 --> 01:00:05,520
लेकिन हमारा प्यास तो वही बुझा सकता है जो मतलब

851
01:00:05,520 --> 01:00:09,520
जो हमारा प्यास बुझा है जिसको हम पीते हैं जो एक एक रूप में

852
01:00:09,520 --> 01:00:13,520
एक है ना तो हम समुद्र में तो

853
01:00:13,520 --> 01:00:17,840
जल नहीं पी सकते अगर वो पिएंगे तो लगेगा लेकिन वो भी तो जल ही है

854
01:00:17,840 --> 01:00:22,160
और नमी सर्वत्र व्याप्त है लेकिन वो उसको पीने योग्य नहीं है वो

855
01:00:22,160 --> 01:00:26,320
वो हमारा प्यास नहीं बुझा सकता इसलिए जीव का जो प्यास

856
01:00:26,320 --> 01:00:30,400
है वो वो ईश्वर प्राप्ति जो सुलभता से हो जाए

857
01:00:30,400 --> 01:00:34,560
वो साकार साकार में ज्यादा है क्योंकि ईश्वर भगवान श्री कृष्ण

858
01:00:34,560 --> 01:00:38,880
ने ही कहा है कि जो ज्ञानी है वो

859
01:00:38,880 --> 01:00:43,040
मेरा मतलब आत्मा है लेकिन जो भक्त है वो मेरा प्राण है भगवत

860
01:00:43,040 --> 01:00:47,520
गीता में और यह भी बताया कि जो

861
01:00:47,520 --> 01:00:50,400
निर्गुण निराकार पक्ष के जो है वह

862
01:00:50,400 --> 01:00:54,400
अपना साधना करते हैं तो कठिनता से प्राप्त करते हैं लेकिन साकार पक्ष

863
01:00:54,400 --> 01:00:58,480
वाले जो भक्ति से प्राप्त करते हैं वो बहुत जल्दी बहुत

864
01:00:58,480 --> 01:01:03,120
शीघ्र ही वो प्राप्त हो जाते हैं भगवान को बहुत सुलभता होती है उनको

865
01:01:03,120 --> 01:01:07,120
हम तो ये मेरा दो दो पक्ष हुआ और एक और

866
01:01:07,120 --> 01:01:11,200
पक्ष था जो मैं बोलना चाह रहा था लेकिन बोल नहीं पाया कि ईश्वर

867
01:01:11,200 --> 01:01:15,600
जब अवतार लेता है तो वो सीमित हो जाता है। इस तरह का जो

868
01:01:15,600 --> 01:01:19,600
बात है तो ये उसकी सीमितता नहीं उसकी पूर्णता

869
01:01:19,600 --> 01:01:24,000
है। पहली बात कि जब ईश्वर साकार आता है तो ऐसा नहीं कि वो निराकार

870
01:01:24,000 --> 01:01:28,000
रूप में सर्वत्र नहीं रहता है ना वो सर्वत्र व्याप्त है

871
01:01:28,000 --> 01:01:32,080
अपने निराकार निराकारता से और साकार रूप में

872
01:01:32,080 --> 01:01:36,080
हमारे समक्ष आता है और दूसरा एक और प्रश्न था कि जब उसमें दोष

873
01:01:36,080 --> 01:01:40,320
आ जाएगा अगर वो साकार लेगा तो तो इसका भी मैं उत्तर दूंगा कि वो

874
01:01:40,320 --> 01:01:44,480
कि वो जब भगवान आते हैं तो उनको कोई कर्म बंधन बांध ही नहीं सकता। भगवान स्वयं

875
01:01:44,480 --> 01:01:48,560
कहते हैं कि मेरे को कर्मों में आसक्ति नहीं तो मेरे को कर्म बांध नहीं सकते। जब कर्म

876
01:01:48,560 --> 01:01:52,720
बांधते नहीं तो दोष आता ही नहीं। जब तक दोष नहीं आएगा तो वो उसमें

877
01:01:52,720 --> 01:01:56,720
दोष कैसे लगेगा? है ना? और एक और है कि भगवान का जो

878
01:01:56,720 --> 01:02:00,800
विग्रह है हम लोग देखते हैं। मनुष्य लोग देखते हैं कि वो

879
01:02:00,800 --> 01:02:05,040
एक मानव तनधारी है। है ना? लेकिन अगर हम देखा शास्त्रों में पढ़े

880
01:02:05,040 --> 01:02:05,540
तो उनको

881
01:02:05,520 --> 01:02:09,600
चिन्मय शरीरधारी भी बताया गया है। भगवान श्री राम, श्री कृष्ण इत्यादि

882
01:02:09,600 --> 01:02:13,680
को वो चिन्मय रूप धारण करके आते हैं। मानव जैसे प्रतीत होते हैं लेकिन

883
01:02:13,680 --> 01:02:17,760
उनका शरीर जो रहता है वो हमारी जैसे पंच भौतिकता नहीं

884
01:02:17,760 --> 01:02:21,760
सच्चिदानंद स्वरूप रहता है। जैसे सच्चिदानंद विग्रह कहा गया है। है

885
01:02:21,760 --> 01:02:26,160
ना? ना विग्रह का अर्थ तो रूप है, साकार है। हम तो तो

886
01:02:26,160 --> 01:02:30,160
इस आधार पे हम ये कह सकते हैं कि भगवान को ना तो दोष लगता है और

887
01:02:30,160 --> 01:02:34,240
भगवान भगवान सर्वत्र होते हुए भी जीव की जो

888
01:02:34,240 --> 01:02:38,240
प्यास है वो अपने साकार रूप से ही बुझाते हैं। तो यहां पर ये

889
01:02:38,240 --> 01:02:42,480
मेरा तर्क है कि भगवान का साकार रूप की उपयोगिता

890
01:02:42,480 --> 01:02:47,200
साकार रूप की जो है ना मेरा पक्ष यही है।

891
01:02:47,200 --> 01:02:50,720
फल लगता है यहां पे।

892
01:02:50,720 --> 01:02:54,720
ठीक है। निराकार की ओर से कोई है जो नयन जी को छोड़

893
01:02:54,720 --> 01:02:58,160
के और कोई है?

894
01:02:58,160 --> 01:03:01,440
चलिए नयन जी आप बोले।

895
01:03:01,440 --> 01:03:05,520
जी मैंने शशांक जी और हर्ष जी दोनों का तर्क

896
01:03:05,520 --> 01:03:09,920
का आगे-आगे उत्तर दूंगा। पहले शशांक जी का जो

897
01:03:09,920 --> 01:03:14,000
पक्ष था कि निराकार रूप से हम कुछ सीख नहीं

898
01:03:14,000 --> 01:03:18,000
सकते मूल्य। जो हम साकार रूप से सीख सकते

899
01:03:18,000 --> 01:03:22,240
हैं। तो इस पर मैं यह कहूंगा कि क्या जो हमें

900
01:03:22,240 --> 01:03:26,240
जो वैल्यूस मोरल वैल्यूस अगर हमें जानना है तो उसके लिए

901
01:03:26,240 --> 01:03:30,960
क्या ईश्वर की आवश्यकता है? क्या धर्मशास्त्र वेद या

902
01:03:30,960 --> 01:03:35,440
महाभारत पुराण आदि जो शास्त्र है तो उससे क्या हम सीख नहीं सकते?

903
01:03:35,440 --> 01:03:39,680
दूसरी बात अगर हम यह मानते हैं कि अगर आप रामायण

904
01:03:39,680 --> 01:03:43,680
महाभारत से सीखने

905
01:03:43,680 --> 01:03:48,480
एक मिनट आप पूरी बात जी को पूरा कर लेने दीजिए पहले नयन जी

906
01:03:48,480 --> 01:03:52,560
ये पहली बात दूसरी बात अगर हम यह मानते हैं कि

907
01:03:52,560 --> 01:03:56,800
जो निराकार जो उनका स्वरूप है उसके अंदर ही सब कुछ है।

908
01:03:56,800 --> 01:04:00,960
है ना? वह सब कुछ में है और सब कुछ उनमें है। तो हमें तो कोई परेशानी

909
01:04:00,960 --> 01:04:05,200
नहीं है इसमें कि हम किसी से सीखे किससे ना सीखें। पूरी जगत ही हमें

910
01:04:05,200 --> 01:04:09,360
हमारे लिए शिक्षणीय है। किसी भी व्यक्ति से उन्होंने जैसे एक व्यक्ति ने पिछले

911
01:04:09,360 --> 01:04:13,520
कहा था कि मेरे अवगुणों को मत लो। मेरे सद्गुणों को लो। तो

912
01:04:13,520 --> 01:04:17,760
किसी भी व्यक्ति से हम उसके अच्छे गुण देखकर सीख सकते हैं। वो आम मनुष्य

913
01:04:17,760 --> 01:04:21,760
ही हो या अवतार ही हो या भगवान ही हो। तो उसके अच्छे गुण

914
01:04:21,760 --> 01:04:26,000
तो हम ले ही सकते हैं। तो इसमें कोई समस्या नहीं है। और हर्ष

915
01:04:26,000 --> 01:04:30,080
जी का जो पक्ष था कि जल के बारे में आप कह रहे थे कि

916
01:04:30,080 --> 01:04:34,160
जो अच्छे जल है उसको ही जो पीने योग्य है उसको हम

917
01:04:34,160 --> 01:04:38,320
व्यवहार में ला व्यवहार रूप से व्यवहार कर सकते हैं। बाकियों

918
01:04:38,320 --> 01:04:42,400
के साथ नहीं। तो यहां पर मैं कहूंगा गीता का

919
01:04:42,400 --> 01:04:46,800
एक श्लोक है दो अध्याय का 45व श्लोक शायद है

920
01:04:46,800 --> 01:04:51,360
कि जहां पर कहते हैं कि त्रगुण्य विषया वेदागुण्य भव्जुन

921
01:04:51,360 --> 01:04:55,520
तो वो यह कह रहे हैं अर्जुन को कि वेद का जो विषय है वह

922
01:04:55,520 --> 01:04:58,800
तीन गुणों से मतलब मिला मिला हुआ है तो

923
01:04:58,800 --> 01:05:03,040
तुम तीनों गुणों के परे जाओ तुम निर्गुण हो तो अर्जुन को उन्होंने

924
01:05:03,040 --> 01:05:07,360
यह क्यों नहीं कहा कि तुम सात्विक बनो क्योंकि तीनों गुणों में तो श्रेष्ठ सात्विक

925
01:05:07,360 --> 01:05:11,440
है तो आपके अनुसार भी अगर देखा जाए जितने सारे जितने प्रकार के जल

926
01:05:11,440 --> 01:05:15,600
मौजूद है उनमें से जो श्रेष्ठ है जो पीने योग्य है तो वह क्यों

927
01:05:15,600 --> 01:05:19,840
उनको बनने नहीं कह बनने के लिए नहीं कह रहे वो कह रहे कि इन सबके पड़े

928
01:05:19,840 --> 01:05:24,560
तुम जाओ तो यही पक्ष है हां

929
01:05:24,560 --> 01:05:28,640
अब नयन जी ने रख लिया है और अब

930
01:05:28,640 --> 01:05:32,640
मैं ऐसा करता हूं कि अभी तक काफी देर हो चुकी तो अब

931
01:05:32,640 --> 01:05:36,800
जो है दो लोगों के बीच में बात हो उनमें से जो जिसका पक्ष कमजोर

932
01:05:36,800 --> 01:05:41,360
दिखाई दे उसको हटा के उसकी की टीम से दूसरा व्यक्ति आ जाए। ठीक है ना?

933
01:05:41,360 --> 01:05:46,080
तो ऐसे कर लेते हैं। अब जो बात हो रही है अब होगी

934
01:05:46,080 --> 01:05:50,640
शशांक जी और नयन जी के बीच में। चलिए

935
01:05:50,640 --> 01:05:54,800
शशांक जी उत्तर दीजिए। जी तो जैसे

936
01:05:54,800 --> 01:05:59,040
मैंने अभी क्वेश्चन पूछा था कि निराकार से कोई वैल्यू नहीं मिलते। तो उसके उत्तर में भी उन्होंने

937
01:05:59,040 --> 01:06:03,200
कहा कि हम तो किसी से भी सीख सकते हैं। ये नॉकउ राउंड है।

938
01:06:03,200 --> 01:06:07,280
इसके बाद जी आवाज कहां से आ रही है?

939
01:06:07,280 --> 01:06:11,760
यह नॉक आउट राउंड है। तो इसमें जब आप एक बार जाएंगे तो फिर दोबारा

940
01:06:11,760 --> 01:06:14,080
या तो हो सकता है कि अवसर प्राप्त

941
01:06:14,080 --> 01:06:18,480
ना भी हो आपको बोलने का और ये भी हो सकता है कि मतलब

942
01:06:18,480 --> 01:06:23,120
आपका आपकी बारी ना आ पाए। तो इस हिसाब से लड़िएगा

943
01:06:23,120 --> 01:06:26,800
अपने पक्ष में रखिएगा।

944
01:06:26,800 --> 01:06:31,120
मैं जी केवल दो लोगों के बीच बात होगी। लगातार

945
01:06:31,120 --> 01:06:35,200
इधर से उधर से केवल दो लोग एक दूसरे से बात करेंगे और जो

946
01:06:35,200 --> 01:06:39,200
जिसका पक्ष कमजोर होगा उसको उसको हटा करके उसकी टीम के दूसरे व्यक्ति

947
01:06:39,200 --> 01:06:43,280
को ले लिया जाएगा। ठीक है। शशांक जी और शशाचांग जी अब अपनी पक्ष को

948
01:06:43,280 --> 01:06:47,440
रखें। जी। तो और अगर आपको लगता है कि इसका जवाब नहीं दे सकते। कोई और देना देता

949
01:06:47,440 --> 01:06:51,680
है तो आप भी स्वयं वालंटियर करके बोल सकते हैं कि नहीं नहीं मेरी टीम से अब ये बोलेंगे।

950
01:06:51,680 --> 01:06:55,680
ठीक है? ऐसे भी किया जा सकता है। बोल तो मैं नयन जी आपसे एक सवाल पूछता

951
01:06:55,680 --> 01:06:59,680
हूं। तो अपने पक्ष के अनुसार आपको निराकार का ही समर्थन देना है। उसमें

952
01:06:59,680 --> 01:07:03,760
अगर आप यह कहेंगे कि प्राकृति से हम सीख सकते हैं तो प्राकृति का भी आकार है। ठीक है?

953
01:07:03,760 --> 01:07:07,920
तो मेरा फिर वही एक बेसिक सा सवाल है। निराकार ईश्वर जिसका कोई रूप नहीं

954
01:07:07,920 --> 01:07:12,000
है, कोई डायमेंशन नहीं है, कुछ नहीं है। ठीक है? कोई रंग, रूप, गंध

955
01:07:12,000 --> 01:07:16,080
कुछ नहीं है। उसका कोई आकार नहीं है। उससे हम क्या वैल्यू सीख सकते हैं? और

956
01:07:16,080 --> 01:07:20,080
पिछली बार आपने उत्तर में हमारे समर्थन दे दिया था कि महाभारत रामायण से भी हम सीख सकते हैं। तो

957
01:07:20,080 --> 01:07:24,720
वहां पर तो अवतारवाद को आप सपोर्ट कर रहे थे। तो बिना आकार के बिना

958
01:07:24,720 --> 01:07:28,720
किसी अवतारवाद के बारे में मैंने कहा कि जो भी

959
01:07:28,720 --> 01:07:29,760
व्यक्ति

960
01:07:29,760 --> 01:07:33,760
है कोई भी व्यक्ति है या कोई भी मनुष्य है तो उससे हम कुछ

961
01:07:33,760 --> 01:07:38,080
ना कुछ अच्छे चीजें तो सीख ही सकते हैं ना और हमारे धर्मशास्त्र तो मौजूद

962
01:07:38,080 --> 01:07:42,160
है जिससे हम अच्छे चीजें सीख सकते हैं तो उसके लिए ईश्वर की आवश्यकता क्या है

963
01:07:42,160 --> 01:07:47,920
तो फिर तो आप भी क्यों पूछ रहे हो फिर निराकार को अगर सब चीज यहीं से सीख सकते हैं प्राकृतिक

964
01:07:47,920 --> 01:07:52,000
ईश्वर की नीड क्या रहेगी वही तो है ना जो जो निराकार देखिए एक मेरा मेरा

965
01:07:52,000 --> 01:07:56,160
पक्ष यह है कि जो ईश्वर का जो निराकार स्वरूप है

966
01:07:56,160 --> 01:08:00,160
वो नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त सच्चिदानंद घन विग्रह स्वरूप है जो

967
01:08:00,160 --> 01:08:04,480
अजन्मा और अविनाशी है तो अगर वो जन्म लेगा वो अगर संसार में आएगा

968
01:08:04,480 --> 01:08:08,720
तो उसका यह जो ये जो मतलब उसका गुण है नित्य

969
01:08:08,720 --> 01:08:12,720
शुद्ध बुद्ध मुक्त और सच्चिदानंद घन तो यह जो स्वरूप

970
01:08:12,720 --> 01:08:17,040
है वह बाधित हो जाएगा तो इस कारण हम उसको मतलब पूर्ण

971
01:08:17,040 --> 01:08:21,520
नहीं कह सकते जो पूर्ण है तो इस कारण हम जो वह अजन्मा

972
01:08:21,520 --> 01:08:25,600
रूप है। हम उसको पूज सकते हैं। वह पूजनीय है। और जो उसका साकार

973
01:08:25,600 --> 01:08:29,920
में अगर वह आ रहा है तो वो क्रिएशन बन रहा है उससे हम सीख सकते हैं। कुछ अच्छे

974
01:08:29,920 --> 01:08:34,160
चीजें सीख सकते हैं। परंतु पूजनीय नहीं है क्योंकि वो पूर्ण नहीं है।

975
01:08:34,160 --> 01:08:38,240
तो यही मेरा पक्ष है। लेकिन इससे साबित क्या होता है? अगर किसी में

976
01:08:38,240 --> 01:08:42,800
कोई भी डिफिटी है, विकार है तो वो पूजनीय नहीं रह जाएगा। पूजने के लिए

977
01:08:42,800 --> 01:08:44,880
मतलब एकदम से ही विकार

978
01:08:44,880 --> 01:08:49,040
युक्त को ही हम पूजेंगे। इसका तो कोई मतलब ये कहां पे लिखा

979
01:08:49,040 --> 01:08:53,040
हुआ है कि विकार युक्त को ही हमेशा पूजो तभी मुक्ति प्राप्त होगी। इसमें विकार होगा तो

980
01:08:53,040 --> 01:08:57,040
उसको मैं पूजा पूजूंगा ही क्यों विकार तो मैंने सबसे पहले

981
01:08:57,040 --> 01:09:01,120
अपने प्रश्न में पूछा था कि प्रकृति भी कर्मों के अनुसार फल देती है। कहीं पे बाढ़

982
01:09:01,120 --> 01:09:05,200
ला के लोगों को मारती है। पूरे के पूरे गांव उजाड़ देती है। ये प्रकृति भी आपने

983
01:09:05,200 --> 01:09:09,360
माना था कि ये ईश्वर की ही रची हुई है। तो ईश्वर ने ही जो चीज बनाई है वही

984
01:09:09,360 --> 01:09:13,520
लोगों को कष्ट दे रही है। तो डायरेक्टली ईश्वर ही कष्ट दे रहा है ना। हां तो वही

985
01:09:13,520 --> 01:09:17,520
तो मेरा पक्ष है कि हम उस प्राकृत को यानी ईश्वर को क्यों पूजे जो जो कोई

986
01:09:17,520 --> 01:09:21,680
अभी बच्चा जन्मा ही है उसके ऊपर से पेड़ गिर जाए बिजली गिर जाए

987
01:09:21,680 --> 01:09:26,080
तो वो फिर हम साकार को क्यों पूजे तो मेरा

988
01:09:26,080 --> 01:09:30,400
विधान तो साकार निराकार ईश्वर ने कहा ना कि मैंने सृष्टि की रचना कर दी सृष्टि ही कर्मों

989
01:09:30,400 --> 01:09:34,640
के अनुसार फल देगी सबको आप तो मेरा ही पक्ष कह रहे हैं

990
01:09:34,640 --> 01:09:40,640
कहां से जो ईश्वर ने आपने कहा डिफिटी होती है अगर ईश्वर

991
01:09:40,880 --> 01:09:44,960
तो अपने आप ही विकार मैंने प्रकृति बनाई है तो उसमें तो अपने

992
01:09:44,960 --> 01:09:49,120
आप ही विकार है जो निराकार ईश्वर देखिए मैंने मेरा पक्ष था कि ईश्वर

993
01:09:49,120 --> 01:09:53,360
ने प्रकृति बनाई है तो ईश्वर क्रिएटर है प्रकृति क्रिएशन है क्रिएशन

994
01:09:53,360 --> 01:09:57,360
में दोष है तो हम प्रकृति को नहीं पूज सकते हम ईश्वर को पूजेंगे तो ईश्वर

995
01:09:57,360 --> 01:09:59,920
को हम क्यों पूजें जिसने दोष युक्त प्रकृति बनाई है

996
01:09:59,920 --> 01:10:03,920
दोष तो आ गया ना ईश्वर में परफेक्ट प्रकृति बना सकते ईश्वर को भी बना सकते हैं ना वो उनकी मर्जी

997
01:10:03,920 --> 01:10:08,240
है तो तो ऐसे ईश्वर खुद भी विकार युक्त शरीर धारण करके अवतार

998
01:10:08,240 --> 01:10:12,720
लेके मनुष्य को उद्धार के लिए लीला कर सकते हैं इसका मतलब वो अगर

999
01:10:12,720 --> 01:10:16,720
आप बना सकता है जो लोगों को दंड दे आप

1000
01:10:16,720 --> 01:10:20,800
मान रहे हैं अवतार नहीं अच्छा आप मान रहे हैं कि ईश्वर ने

1001
01:10:20,800 --> 01:10:24,880
जो प्रकृति बनाई है वो दोष युक्त है उसमें अगर हम है तो अगर उस

1002
01:10:24,880 --> 01:10:28,880
प्रकृति में अगर भगवान आ रहे हैं तो वो खुद भी दोष मतलब

1003
01:10:28,880 --> 01:10:33,360
दोष मैंने मना कब करा कि उसमें उनमें दोष नहीं है मैं तो कह रहा हूं उनके

1004
01:10:33,360 --> 01:10:37,520
उनको पूछ सकते हैं नहीं पूजने का कहां से विधान है कि हम नहीं पूछ सकते

1005
01:10:37,520 --> 01:10:41,520
अरे मेरा तो सीधासीधा बात है कि अगर पूछेंगे

1006
01:10:41,520 --> 01:10:45,680
तो यही बात को बार-बार नहीं देखो परफेक्ट तो ऐसे कोई भी नहीं होता कोई

1007
01:10:45,680 --> 01:10:49,760
है दयानंद सरस्वती जी वो भी परफेक्ट नहीं है लेकिन आप उनके भी वही मूल्य

1008
01:10:49,760 --> 01:10:53,760
उसको लेते हो ना जो लेने योग्य हैं सभी को नहीं लेते ना तो हम भी अपने

1009
01:10:53,760 --> 01:10:57,840
अवतारों के जो अवकार है उनको नहीं देखते उनके जो बाकी 99%

1010
01:10:57,840 --> 01:11:01,840
जो उन्होंने लीला करी है जो ज्ञान दिया है और हम भी

1011
01:11:01,840 --> 01:11:06,000
सिर्फ उन्हीं को लेते उन्हीं को पूछते हम तो हर देखिए ईश्वर का तो संज्ञा

1012
01:11:06,000 --> 01:11:10,000
ही यहां पर बाधित हो जाएगा हर मनुष्य अगर हम कोई मनुष्य कहता है कि मैं

1013
01:11:10,000 --> 01:11:14,000
ईश्वर हूं तो उसको उसको प्रमाण करना पड़ेगा कि उसमें कोई दोष नहीं है ना तो ऐसे तो

1014
01:11:14,000 --> 01:11:15,200
निराकार का प्रमाण देके

1015
01:11:15,200 --> 01:11:19,200
दिखाइए हमारे तो अवतारवाद में अब निराकार ईश्वर का फिर प्रमाण क्या दोगे आप ऐसे कि

1016
01:11:19,200 --> 01:11:24,240
कहां पे किसकी सहायता की किसको वचन दिए

1017
01:11:24,240 --> 01:11:28,640
ईश्वर की अगर संज्ञा में भी कहूं जितने सारे संज्ञा है मुझे सभी ज्ञात नहीं परंतु

1018
01:11:28,640 --> 01:11:33,520
जिसमें कोई दोष नहीं होगा जो 100% विशुद्ध है और जो

1019
01:11:33,520 --> 01:11:37,600
है एक मिनट यहां पर दोनों पक्षों में एक बात जो

1020
01:11:37,600 --> 01:11:41,680
बोली नहीं जा रही है शशांक जी की

1021
01:11:41,680 --> 01:11:45,760
ओर से भी एक माइनस पॉइंट चल रहा है। हल्का सा छोटा सा वो भूल रहे हैं कुछ और

1022
01:11:45,760 --> 01:11:50,000
नयन जी आपकी ओर से भी कुछ आप छोटा सा भूल रहे हैं। तो कोशिश

1023
01:11:50,000 --> 01:11:54,480
करिए कि आप अपने पक्ष पे पुष्ट करें। भैया एक चीज मैं जरा ऐड कर आपको।

1024
01:11:54,480 --> 01:11:58,720
अब आप आपकी बारी आएगी। अभी दोनों में से जो अगर साकार

1025
01:11:58,720 --> 01:12:02,720
की ओर से शशांक जी हटते हैं तो फिर आपको ले लिया जाएगा। जी नयन जी अब

1026
01:12:02,720 --> 01:12:06,720
अपनी बात बोले। बोलिए। जी मेरा मेरा बात बस

1027
01:12:06,720 --> 01:12:10,720
इतना था कि जो मतलब क्या कहूं कि

1028
01:12:10,720 --> 01:12:15,200
जो अभी देखिए अगर मैं साकार के रूप से भी कहूंगा जो निराकार

1029
01:12:15,200 --> 01:12:19,200
है उससे साकार बन रहा है तो ये थोड़ा डायवर्जेंट रे जैसा

1030
01:12:19,200 --> 01:12:23,520
होता है ना फिजिक्स में तो वैसा हो जाएगा कि अगर हम देखेंगे निराकार

1031
01:12:23,520 --> 01:12:27,600
से साकार बन रहा है बहुत सारे साकार अब कौन से रूप को पूजे ये वाला रूप या वो

1032
01:12:27,600 --> 01:12:30,560
वाला रूप तो साकार में भेद है परंतु निराकार

1033
01:12:30,560 --> 01:12:34,640
में भेद नहीं वही मूल है और वही नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त है तो इसलिए

1034
01:12:34,640 --> 01:12:39,520
लिए जो नित्य है हम उसी को पूजेंगे तो सीधासीधा बात है। और दूसरा

1035
01:12:39,520 --> 01:12:43,600
जी आप कहिए हां अब इस पॉइंट को काउंटर कर सकते हैं शशांक जी

1036
01:12:43,600 --> 01:12:48,000
तो कृपया करें। जी इसी पॉइंट को तो काउंटर कर रहा हूं मैं कि निराकार

1037
01:12:48,000 --> 01:12:52,080
है अगर वो उसमें कोई दो शशांक जी का एक पॉइंट बहुत बढ़िया रहा।

1038
01:12:52,080 --> 01:12:56,080
भैया इस पॉइंट का काउंटर मैं करना चाहूंगा। एक मिनट शशांक जी

1039
01:12:56,080 --> 01:13:00,080
का एक पॉइंट बहुत बढ़िया रहा कि ईश्वर जब सृष्टि बना रहा

1040
01:13:00,080 --> 01:13:04,240
है तो वो भी दोष युक्त है। ठीक है? अगर आप निराकार को भी मानते

1041
01:13:04,240 --> 01:13:08,240
हो निराकार ने सृष्टि बनाई है तो वह भी दोष युक्त है क्योंकि दोष युक्त क्योंकि

1042
01:13:08,240 --> 01:13:12,320
दोष युक्त सृष्टि है अगर हम ये सब दोष देखते कीड़ों को मारना ये करना वो

1043
01:13:12,320 --> 01:13:16,560
करना ठीक है तो इसका जवाब क्या

1044
01:13:16,560 --> 01:13:20,960
दिया है नयन जी ने वो दोबारा से बता दीजिए जी

1045
01:13:20,960 --> 01:13:24,960
मैंने कहा कि अगर वो दोष युक्त प्रकृति बना रहा है

1046
01:13:24,960 --> 01:13:29,040
तो उसमें अगर वो आएंगे तो वो खुद भी दोष युक्त होंगे तो

1047
01:13:29,040 --> 01:13:33,120
इस कारण से हम उसे पूछ मेरा एक जी अगर मैं

1048
01:13:33,120 --> 01:13:37,520
कोई डेवलपर हूं या फिर कार मैन्युफैक्चरर हूं मैंने कोई प्रोडक्ट

1049
01:13:37,520 --> 01:13:41,600
बनाया उससे लोगों को दोष लग रहा है उससे उनकी हत्या हो रही है तो उसका इल्जाम

1050
01:13:41,600 --> 01:13:45,680
मेरे पास आएगा ना क्योंकि मैं क्रिएटर हूं ईश्वर ने अगर दोष युक्त प्रकृति

1051
01:13:45,680 --> 01:13:49,760
बनाई है और उससे लोगों को कष्ट हो रहा है बाढ़ आ रही है सूखे से मर रहे हैं आपस में सब लड़ के

1052
01:13:49,760 --> 01:13:54,240
मर रहे हैं तो उसका दोष भी ईश्वर को मिलना चाहिए ना निराकार ईश्वर को

1053
01:13:54,240 --> 01:13:58,480
निराकार ईश्वर को साकार को नहीं साकार तो हमारे बीच में जो निराकार

1054
01:13:58,480 --> 01:14:00,960
ईश्वर जिन्होंने

1055
01:14:00,960 --> 01:14:05,200
दिया उसको हम इसके परिपेक्ष में व्यवहार नहीं कर सकते क्योंकि

1056
01:14:05,200 --> 01:14:09,360
आप क्रिएशन है जो अगर कोई कार मैन्युफैक्चरर

1057
01:14:09,360 --> 01:14:13,520
कार बना रहा है तो उससे लोग मर रहे हैं तो कार के बाहर वाले लोग मर रहे हैं परंतु यहां पर कार

1058
01:14:13,520 --> 01:14:17,600
के अंदर वाले लोग ही मर रहे हैं तो यह उदाहरण उसके साथ मेरे ख्याल

1059
01:14:17,600 --> 01:14:21,600
से अंदर वाले भी लोग मर रहे हैं अंदर वाले भी मर जाते है ना क्रिएटर की अगर

1060
01:14:21,600 --> 01:14:25,680
एयर बैग नहीं खुले मैं एयर बैग बनाने वाली कंपनी का मैन्युफैक्चरर हूं तो

1061
01:14:25,680 --> 01:14:29,760
अगर एयर बैग नहीं खुले उसकी वजह से लोग मरे हैं बाहर वाले बच गए अंदर वाले मरे

1062
01:14:29,760 --> 01:14:33,760
हैं उनका उसका दोष भी तो मुझ पे आएगा ना। तो ऐसे निराकार ईश्वर जिसने सृष्टि

1063
01:14:33,760 --> 01:14:37,840
बनाई है और वो अलग से बैठा हुआ है। एक उसका दोष आएगा

1064
01:14:37,840 --> 01:14:41,840
ना। अब जो है भैया एक पॉइंट हमको बोलने

1065
01:14:41,840 --> 01:14:45,840
दीजिए। एक मिनट विश्वजीत जी अभी आवश्यकता नहीं है ना। अभी शशांक जी का

1066
01:14:45,840 --> 01:14:49,600
ठीक चल रहा है ना? तो

1067
01:14:49,600 --> 01:14:54,400
निराकार की ओर से और कोई हो जो

1068
01:14:54,400 --> 01:14:58,320
सामने आना चाहे।

1069
01:14:58,320 --> 01:15:03,360
है कोई किरण दीक्षित जी कहां गए

1070
01:15:03,360 --> 01:15:08,240
नहीं है क्या उपलब्ध हां हां वो बोलिए

1071
01:15:08,240 --> 01:15:12,320
तो आइए फिर अब आप इनको थोड़ा सा विराम देते

1072
01:15:12,320 --> 01:15:16,800
हैं नयन जी को अब आप बोल

1073
01:15:16,800 --> 01:15:20,880
अरे मैं आपको क्या कहूं शिवाजी साकार का तो मतलब खंडन हो

1074
01:15:20,880 --> 01:15:26,880
ही नहीं सकता सही से अगर चर्चा इस विषय पर होता की

1075
01:15:27,680 --> 01:15:31,760
ठीक है। ठीक है। ठीक है। तो चर्चा अगर इस मेरा एक

1076
01:15:31,760 --> 01:15:35,760
बात सुन लीजिए। जी कि किसी दिन चर्चा इस विषय पर भी रखी

1077
01:15:35,760 --> 01:15:39,840
है कि मतलब भगवान का जो मौलिक स्वरूप है वो साकार है निराकार। जी

1078
01:15:39,840 --> 01:15:43,920
अब आप ये सुझाव उसमें दीजिएगा। अभी हम लोग जो चर्चा को

1079
01:15:43,920 --> 01:15:48,000
थोड़ा आगे बढ़ाते हैं। अ फिर

1080
01:15:48,000 --> 01:15:52,080
निराकार की ओर से अब कौन बचा? सुजीत जी आप

1081
01:15:52,080 --> 01:15:56,400
नहीं आएंगे। आप हाथ नहीं उठा रहे हैं और बाकी सभी लोग शांत हैं तो अब तनुष

1082
01:15:56,400 --> 01:16:01,120
जी ने हाथ हैंड रेज किया था तो अब आप आ गए हैं

1083
01:16:01,120 --> 01:16:03,520
और

1084
01:16:03,520 --> 01:16:07,760
दो सेकंड मैं अपना पॉइंट रिमेंबर कर

1085
01:16:07,760 --> 01:16:11,920
कर लीजिए कह लीजिए हां हां अभी याद आया जब हम ये कहते

1086
01:16:11,920 --> 01:16:13,840
हैं कि दोष युक्त प्रकृति

1087
01:16:13,840 --> 01:16:18,640
में कुछ अगर बुरा हो रहा है या अच्छा हो रहा है तो उसके दोष

1088
01:16:18,640 --> 01:16:22,880
ईश्वर को लगा तो वो तो सगुण स्वरूप में भी ईश्वर को लगेंगे क्योंकि क्योंकि प्रकृति

1089
01:16:22,880 --> 01:16:26,960
उनहीं की है। तो हम ये क्यों मान रहे हैं कि जब ईश्वर निर्गुण है तो दोष बस

1090
01:16:26,960 --> 01:16:31,040
निर्गुण स्वरूप को ही ना। तनुष जी ये प्रश्न नहीं था। वो

1091
01:16:31,040 --> 01:16:35,120
तो इन्होंने नयन जी ने ऑलरेडी आरोप लगाए हुए थे ना कि उन पे विकार आ

1092
01:16:35,120 --> 01:16:39,360
जाता है तो हम उन विकार को एक्सेप्ट कर रहे हैं। इनका पॉइंट था कि जो निर्गुण

1093
01:16:39,360 --> 01:16:43,520
है जो निराकार है उस पे कोई विकार नहीं होते हैं। आपको उसका

1094
01:16:43,520 --> 01:16:47,760
पक्ष लेना है। जो सगुण है उनमें तो हम विकार मान लेते हैं। वो जब

1095
01:16:47,760 --> 01:16:51,760
जन्म लेते हैं तो विकार आ जाता है। जो निर्गुण निराकार

1096
01:16:51,760 --> 01:16:56,000
है उसमें भी विकार है। इसका खंडन करिए अब। नहीं नहीं मैं यह बोल रहा हूं कि सगुण

1097
01:16:56,000 --> 01:17:00,160
में अगर आप किसी का विकार मान के उसकी पूजा कर रहे हैं जी तो आप

1098
01:17:00,160 --> 01:17:05,440
वो जब संपूर्ण है ही नहीं तो आप उसकी पूजा कैसे कर सकते हैं तो

1099
01:17:05,440 --> 01:17:09,680
जो मैंने तर्क दिया है उसके अकॉर्डिंग निराकार भी नहीं है ना

1100
01:17:09,680 --> 01:17:13,920
देखिए उसको डिफेंड करिए शशांक जी ये ये जो चीज है चलिए आप तनुष

1101
01:17:13,920 --> 01:17:18,000
जी आप ही लीजिए फिर जब बात नहीं बनेगी तो नहीं

1102
01:17:18,000 --> 01:17:22,240
इस इस लॉजिक के अकॉर्डिंग तो गुरु और जो माता-पिता है सभी में विकार होते

1103
01:17:22,240 --> 01:17:26,240
हैं तो ऐसे फिर कोई भी पूजने नहीं रहेगा। अगर हम विकारों को हम सिर्फ

1104
01:17:26,240 --> 01:17:29,040
उसी को पूजेंगे जिसमें कोई भी देखिए इनका इनका पॉइंट

1105
01:17:29,040 --> 01:17:33,200
ये है ये ये कह रहे हैं कि जो जो ईश्वर के अवतार हैं उनमें

1106
01:17:33,200 --> 01:17:37,280
विकार है मगर विकार जिसमें होगा उसे हम पूज क्यों नहीं

1107
01:17:37,280 --> 01:17:41,600
सकते? ये कहां लिखा है? मतलब ये ऐसा क्यों माना जाएगा? दूसरी बात

1108
01:17:41,600 --> 01:17:46,080
है। दूसरी बात तनुष जी का यह कहना है। तनुष जी का यह कहना है कि अगर आप

1109
01:17:46,080 --> 01:17:50,240
ईश्वर में विकार को स्वीकार कर रहे हैं तो फिर आप जो

1110
01:17:50,240 --> 01:17:54,320
है अगर आप ईश्वर में विकार को स्वीकार कर

1111
01:17:54,320 --> 01:17:58,320
रहे हैं तो आप उसको पूर्ण की संज्ञा कैसे दे सकते हैं? उसको ईश्वर कैसे

1112
01:17:58,320 --> 01:18:02,400
कह सकते हैं? वो संज्ञा बाधित हो रही है। दोनों ही पक्ष मजबूत है।

1113
01:18:02,400 --> 01:18:06,800
ठीक है? अब आप दोनों आपस में बात करें जिससे कि हम निष्कर्ष

1114
01:18:06,800 --> 01:18:11,200
तक पहुंचे। जी और जो

1115
01:18:11,200 --> 01:18:15,280
निर्गुण स्वरूप है तो क्योंकि उसकी कोई क्वालिटी नहीं

1116
01:18:15,280 --> 01:18:19,440
है। ये कह सकते हैं कि कोई क्वालिटी नहीं या फिर ये कह सकते हैं कि सारी

1117
01:18:19,440 --> 01:18:23,440
क्वालिटी उसमें मौजूद है। इसलिए हम उसकी पूजा कर सकते हैं इसलिए वो पूर्ण

1118
01:18:23,440 --> 01:18:29,440
है।

1119
01:18:30,560 --> 01:18:34,640
जी बोल। यह तो कंट्राडिक्टरी हो गया ना कि उनमें कोई भी क्वालिटी

1120
01:18:34,640 --> 01:18:38,640
नहीं है और सारी क्वालिटी उन्हीं में है। ये तो दोनों बातें कह दी

1121
01:18:38,640 --> 01:18:43,200
उन्होंने निर्गुण के दोनों यही दोनों बातें फिर अवतार पे भी लागू होती है कि उनमें

1122
01:18:43,200 --> 01:18:47,520
अवतार तो बाधित हो जाता है ना तो अवतार

1123
01:18:47,520 --> 01:18:51,520
जब आ रहा है तो वो तो बाधित हो रहा है क्योंकि उसमें कुछ ना कुछ विकार आ रहे हैं।

1124
01:18:51,520 --> 01:18:55,520
ये आप ही ने बोला बाधित हुआ कृष्ण जी किस चीज

1125
01:18:55,520 --> 01:18:59,840
से बाधित हुए थे महाभारत में वो अवतार के ऊपर डिपेंड करता है। नरसिम्हा

1126
01:18:59,840 --> 01:19:03,920
जी किस चीज पे बाधित हुए थे? इंसान उन्होंने अगर कोई शरीर

1127
01:19:03,920 --> 01:19:08,080
धारण किया है हां तो उनकी पहुंच एक लिमिट

1128
01:19:08,080 --> 01:19:12,240
के बाहर से नहीं है उस मनुष्य शरीर में तो उन्हें मैं पूर्ण क्यों

1129
01:19:12,240 --> 01:19:16,560
समझूं? तो निराकार जो ये अनंत ब्रह्मांड है ये

1130
01:19:16,560 --> 01:19:20,720
इसका भी कोई लिमिट नहीं है। है ना? ये भी एक्सपेंड नहीं होता हर सेकंड। ये

1131
01:19:20,720 --> 01:19:24,720
भी तो बढ़ रहा है ना। पहले से तो नहीं है। हां हां। अगर निराकार को आप देखो तो ये

1132
01:19:24,720 --> 01:19:28,720
भी तो हर सेकंड बढ़ ही रहा है ना। अपना आकार बढ़ा ही रहा है। तो निराकार ये भी कैसे हो गया? जो

1133
01:19:28,720 --> 01:19:32,800
एम्प्टी स्पेस है वो स्पेस भी तो लिमिटेड स्पेस होता है ना कोई भी चीज इनफाइनाइट

1134
01:19:32,800 --> 01:19:37,280
स्पेस के अंदर है स्पेस के अंदर ईश्वर भी है निराकार बनाने वाले

1135
01:19:37,280 --> 01:19:41,360
ने जैसे पहले कमरा बनाया उसके अंदर फिर निराकार ईश्वर आया फिर उसने धरती बनाई विकार युक्त

1136
01:19:41,360 --> 01:19:45,600
है ना तो आप तो वो तो एक ही बात हो गई ना भाई जब आप एक

1137
01:19:45,600 --> 01:19:49,600
ही बात आप नहीं मान रहे ना एक ही बात थोड़ा पंडित जी

1138
01:19:49,600 --> 01:19:53,680
क्लियर कर दे दोनों पक्षों को क्या कह रहे हैं दोनों पक्ष नहीं दोनों

1139
01:19:53,680 --> 01:19:57,680
के दोनों मतलब कि शशांक जी एक्चुअली क्या है आपकी

1140
01:19:57,680 --> 01:20:01,840
आपकी बात का तो मतलब मैं मैं बोल नहीं सकता वरना अब बहुत

1141
01:20:01,840 --> 01:20:06,000
हो जाता है खंडन अभी लेकिन देखिए आप

1142
01:20:06,000 --> 01:20:10,080
आप लिमिट मत करिए ईश्वर को ना शशांक जी नहीं नहीं मैं

1143
01:20:10,080 --> 01:20:14,240
अवतार के समय पे लिमिट कर रहा हूं उनको क्योंकि देखो जब ये

1144
01:20:14,240 --> 01:20:18,720
शुरू हुई है तो शिवश भैया ने बताया था कि जितने भी निराकार वाले हैं

1145
01:20:18,720 --> 01:20:24,320
जो साकार वाले हैं वो निराकार और साकार को एक मानते हैं जैसे हम मानते हैं निराकार

1146
01:20:24,320 --> 01:20:28,320
अवतार लेता है एक मिनट एक एक मिनट पंडित जी पहली बात आप

1147
01:20:28,320 --> 01:20:32,640
चीटिंग ना करें। ठीक है? हां। और दूसरी

1148
01:20:32,640 --> 01:20:36,880
बात यह है कि शशांक जी का यह वाला जो पॉइंट

1149
01:20:36,880 --> 01:20:42,880
है ना कि क्या कहते हैं ये

1150
01:20:42,880 --> 01:20:46,880
वो ये कह रहे हैं कि भाई ईश्वर में विकार है मतलब भगवान के अवतार में

1151
01:20:46,880 --> 01:20:51,040
विकार है मगर फिर भी हम उसकी पूजा करते हैं। तो यहां पे एक तो वो

1152
01:20:51,040 --> 01:20:55,760
यह कह रहे हैं और सामने वालों का कहना है कि उसमें अगर विकार है भी

1153
01:20:55,760 --> 01:20:59,920
अगर उसमें विकार है तो आप उसको पूर्ण कैसे कह रहे हैं? नहीं पर वह

1154
01:20:59,920 --> 01:21:04,080
विकार भी तो मनुष्य की दृष्टि से भगवान के बताए हुए विकार में से है ना। जैसे

1155
01:21:04,080 --> 01:21:08,160
विकार अभी बताया था कि जब वह जन्म लेते हैं तो अपनी मर्जी के

1156
01:21:08,160 --> 01:21:12,320
बिना भी उनसे कुछ पाप बनते हैं। जैसे चींटी मकोड़ों की हत्या

1157
01:21:12,320 --> 01:21:16,400
करना स्वास लेते समय जो भी माइक्रो ऑर्गेनिज्म है उनकी हत्या करना। तो

1158
01:21:16,400 --> 01:21:20,480
ये ईश्वर के बनाए हुए नियम के विकार है ना। उनसे परे तो विकार नहीं है ना ईश्वर

1159
01:21:20,480 --> 01:21:24,960
में कोई। ये हमारी दृष्टि से विकार है ना? ईश्वर की ही बनाई हुई विकारित

1160
01:21:24,960 --> 01:21:29,440
सृष्टि में ईश्वर पे ही विकारी दोष लग रहे हैं। तो तो लगे

1161
01:21:29,440 --> 01:21:33,440
हां तो लेकिन तब भी तो पूजे हैं ना ईश्वर ने ही तो नियम बनाए ईश्वर ने ही वो विकार

1162
01:21:33,440 --> 01:21:38,000
बनाए ठीक है शशांक जी अब जो है आपकी टीम की तरफ से और लोगों को

1163
01:21:38,000 --> 01:21:41,520
भैया अगर मैं बोलता हूं

1164
01:21:41,520 --> 01:21:45,520
भैया मैं उत्तर देना चाहूंगा जैसा कि आप लोग ने

1165
01:21:45,520 --> 01:21:49,600
निराकार पक्ष वालों ने कहा कि अगर हम किसी अवतार को मान लेते हैं तो

1166
01:21:49,600 --> 01:21:53,600
उनपे बाधा आ जाएगी कि वो उसी रूप में रहेंगे लिमिटेड हो जाएंगे।

1167
01:21:53,600 --> 01:21:57,600
तो भैया हम लोग तो पहले से बोले कि वो अनंत हैं तो अनंत में भी

1168
01:21:57,600 --> 01:21:58,100
अगर वह

1169
01:21:58,080 --> 01:22:02,240
उसी रूप में अनंत है जिसका हम लोग कल्पना नहीं कर सकते तो क्या

1170
01:22:02,240 --> 01:22:06,320
आप लोगों ने अनंत का परिभाषा पता कर लिया है कि क्या होता

1171
01:22:06,320 --> 01:22:10,480
है अनंत जिसके रूप में आप बोल रहे हैं कि बाधा आ रही है और दूसरी

1172
01:22:10,480 --> 01:22:14,640
बात भैया जैसा कि आप लोगों ने यह भी बोला था कि एक रूप की पूजा

1173
01:22:14,640 --> 01:22:18,800
कैसे कर सकते हैं वो हर जगह में बहुत सारे रूप है उनका तो तो भैया

1174
01:22:18,800 --> 01:22:22,800
अगर हम ईश्वर को एक पल के लिए हम रंग की संज्ञा देते

1175
01:22:22,800 --> 01:22:27,040
हैं जो कलर बोलते हैं हम लोग तो कलर का मतलब तो एक ही होता है ना कि रंग। अब रंग

1176
01:22:27,040 --> 01:22:31,120
हरा हो, नीला हो, काला हो, कैसा भी हो उससे क्या फर्क पड़ता है? उसके अनेक

1177
01:22:31,120 --> 01:22:35,200
प्रकार होते हैं। लेकिन रंग तो रंग एक ही चीज होता है। तो

1178
01:22:35,200 --> 01:22:39,600
ईश्वर तो एक ही शब्द है, एक ही चीज है बट उनके अनेकों प्रकार हैं।

1179
01:22:39,600 --> 01:22:43,600
तो हम किसी भी प्रकार की पूजा कर सकते हैं अपने अनुसार। और

1180
01:22:43,600 --> 01:22:47,840
भैया एक बात और आया था कि अनेकों रूप है और ईश्वर सभी

1181
01:22:47,840 --> 01:22:51,920
जगह है। तो क्या हम गधे की पूजा कर सकते हैं? तो भैया कर सकते हैं। अगर नहीं करेंगे

1182
01:22:51,920 --> 01:22:56,000
तो हमको उस पल ये मानना पड़ेगा कि उनके अंदर ईश्वर नहीं है। उनके हृदय

1183
01:22:56,000 --> 01:23:00,240
में ईश्वर का वास नहीं है। और ईश्वर से

1184
01:23:00,240 --> 01:23:04,240
यहां पे एक मिनट क्या सभी साकार वाले इनके इस उत्तर से

1185
01:23:04,240 --> 01:23:08,240
सहमत है? ये आप एक तरह से निराकार का पक्ष नहीं बोल रहे

1186
01:23:08,240 --> 01:23:12,480
थे थोड़ी देर के लिए। नहीं भैया क्योंकि

1187
01:23:12,480 --> 01:23:13,360
ठीक है विश्वजीत

1188
01:23:13,360 --> 01:23:16,240
जी

1189
01:23:16,240 --> 01:23:20,240
जो जो लेने लायक है वो ले ली जाएंगी। आपकी बात सुन ली है।

1190
01:23:20,240 --> 01:23:24,320
अब हमारी ओर से तनुष जी बात कर रहे थे। कहां गए

1191
01:23:24,320 --> 01:23:30,320
तनुष जी? चलिए तनु जी हैं। आप विराम लेना चाहेंगे या

1192
01:23:31,360 --> 01:23:35,360
मेरा बस एक बात है विश्वजीत जी को उन्होंने कहा कि हम गधे का भी पूजा कर

1193
01:23:35,360 --> 01:23:40,720
सकते हैं। तो आप कर क्यों नहीं रहे? हम

1194
01:23:40,720 --> 01:23:45,440
रुक जाइए जी सुनिए सुनिए

1195
01:23:45,440 --> 01:23:49,440
एक मिनट एक मिनट जी उनकी टीम वालों ने ही उनको इस

1196
01:23:49,440 --> 01:23:53,600
बात पर माना नहीं है स्वीकार नहीं किया तो हमें उस बात को खींचने की आवश्यकता

1197
01:23:53,600 --> 01:23:57,600
नहीं है ठीक है और दूसरी बात यह है कि अब

1198
01:23:57,600 --> 01:24:01,760
जो है निराकार की ओर से रह गए हैं मेरे सामने दो दिख रहे

1199
01:24:01,760 --> 01:24:07,760
हैं सुजीत जी ने भी हाथ नीचे कर लिया है सुजीत जी आप बोलेंगे

1200
01:24:08,240 --> 01:24:11,760
हां बोलिए ठीक है।

1201
01:24:11,760 --> 01:24:17,520
लेकिन पॉइंट क्या है? जो पॉइंट यही है कि

1202
01:24:17,520 --> 01:24:21,600
ईश्वर में विकार है। विकार को माना जब

1203
01:24:21,600 --> 01:24:25,760
विकार है तो पूर्ण नहीं तो उसे ईश्वर संज्ञा उस पर सिद्ध नहीं हो रही है। उसकी पूजा

1204
01:24:25,760 --> 01:24:29,040
क्यों हो रही है? ठीक है? और अभी-अभी आपके जो

1205
01:24:29,040 --> 01:24:33,120
आपकी टीम के जो व्यक्ति हैं उनका कहना है कि भाई बिल्कुल हम सब

1206
01:24:33,120 --> 01:24:37,200
चीजों को पूछ सकते हैं। किसी भी चीज को खुद वो कोई भी

1207
01:24:37,200 --> 01:24:41,360
चीज हो हम उसको पूछ सकते हैं क्योंकि अगर हम उसे नहीं पूजेंगे तो

1208
01:24:41,360 --> 01:24:45,920
वैसे इसको लेने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इसको साकार मनो ने स्वीकारा नहीं है।

1209
01:24:45,920 --> 01:24:49,920
ठीक है? तो अब आप इस बात का अब आप इस बात का वो करें

1210
01:24:49,920 --> 01:24:54,160
कि विकार है यदि अगर आप ये स्वीकार

1211
01:24:54,160 --> 01:24:58,800
किया आपकी टीम वालों ने कि उसमें विकार है तो

1212
01:24:58,800 --> 01:25:02,960
फिर उसकी पूजा क्यों की जाए? उसको पूर्ण की संज्ञा क्यों दी जाए? विकार

1213
01:25:02,960 --> 01:25:07,200
है तो ऐसा क्यों माना जाए? ठीक है? और इस पर

1214
01:25:07,200 --> 01:25:12,320
एक एक आपकी ओर से एक जवाब दिया गया था कि भाई विकार तो

1215
01:25:12,320 --> 01:25:16,800
निराकार वाले ईश्वर में भी है क्योंकि वो दोष युक्त सृष्टि बना रहा है।

1216
01:25:16,800 --> 01:25:21,040
ठीक है? तो विकार वहां पर भी है। तो फिर उसकी

1217
01:25:21,040 --> 01:25:25,120
पूजा क्यों हो सकती है? तो इस तरह से अस्तित्व का ही सवाल है। मतलब इस

1218
01:25:25,120 --> 01:25:29,120
तरह से तो इस तरह से तो दुनिया जो है नास्तिक हो जाएगी। ये

1219
01:25:29,120 --> 01:25:33,680
उनका पक्ष था। तो अब जो है सुजीत जी

1220
01:25:33,680 --> 01:25:36,800
और

1221
01:25:36,800 --> 01:25:42,800
साकार की ओर से कौन रह गया है विश्वजीत जी

1222
01:25:42,960 --> 01:25:47,120
हर्ष जी आप नहीं बोले हैं आप बोलिए हर्ष जी और सुजीत जी अब बात करेंगे आपस

1223
01:25:47,120 --> 01:25:51,280
में जो प्रकृति हम अगर कह सकते हैं कि

1224
01:25:51,280 --> 01:25:55,760
जो ब्रह्म जो निर्गुण निराकार ईश्वर है उससे भी प्रकृति

1225
01:25:55,760 --> 01:25:59,760
में जब बाढ़ आती है या सूखा पड़ता है तो उससे उस उससे उसको भी

1226
01:25:59,760 --> 01:26:04,160
दोष लगता है। लेकिन अह जब हम कहते हैं अगर दोष लगता है, तो वह बाधित हो जाएगा।

1227
01:26:04,160 --> 01:26:08,160
लेकिन जो निर्गुण निराकार है वह किसी भी लिमिट से नहीं है। जो हम

1228
01:26:08,160 --> 01:26:12,160
कहते हैं कि प्रकृति में ऐसा क्यों हुआ फिर वो उसका दोष उसे लेगा उसको नहीं लगेगा।

1229
01:26:12,160 --> 01:26:16,640
क्योंकि वो जो है इधर के दुख सुख से जो है वो प्रभावित नहीं रहता।

1230
01:26:16,640 --> 01:26:20,720
लेकिन जो सगुण साकार ईश्वर है वो प्रभावित हो सकता है। अगर समझो

1231
01:26:20,720 --> 01:26:24,880
कि भगवा भक्त कोई आ चाहिए या फिर कुछ अधर्म हुआ

1232
01:26:24,880 --> 01:26:29,200
तो तो इससे जो सगुण साकार ईश्वर है उसको उसको

1233
01:26:29,200 --> 01:26:33,280
भावना जगेगी और फिर वो सीमित हो जाएगा क्योंकि हम उसको भावना बांध रखते हैं। अगर

1234
01:26:33,280 --> 01:26:37,440
हम फिर कहे कि वो अपने लोक में है तो वहां भी उसको दुख पहुंच

1235
01:26:37,440 --> 01:26:41,600
रहा है। और हम क्या चाहते हैं? हम जीव की जो असली चाय है वो

1236
01:26:41,600 --> 01:26:45,600
सच्चिद आनंद है। हम अनंत आनंद चाहते हैं। अगर हम बांध देंगे कि प्रकृति

1237
01:26:45,600 --> 01:26:49,680
में ऐसा होगा वैसा हुआ तो उसको दोष उसे लगेगा। उसको दोष नहीं लगेगा। उसने

1238
01:26:49,680 --> 01:26:52,000
सब प्रकृति बनाई है। जो भी यहां होता

1239
01:26:52,000 --> 01:26:56,080
है वो सिर्फ हमारे कर्म की वजह से होता है। और प्रकृति भी हमारा कर्म का

1240
01:26:56,080 --> 01:27:00,400
ही प्रभाव से ऐसा आपत्ति उत्पन्न करती है। जब हम

1241
01:27:00,400 --> 01:27:04,480
प्रजा का एक बहुत सा भाग अधर्म करने लगता है। तब प्रकृति देखती है

1242
01:27:04,480 --> 01:27:08,480
और तब वो ऐसे आपदाएं लाती है। इसका दोष ब्रह्म

1243
01:27:08,480 --> 01:27:12,640
को नहीं जाएगा। या फिर निर्गुण निराकार ईश्वर है। वो नहीं जाएगा। वो अलग ही है। वो सच्चिदानंद

1244
01:27:12,640 --> 01:27:16,720
स्वरूप में ही हमेशा रहता है। उसका दोष प्रकृति का जो आता है

1245
01:27:16,720 --> 01:27:20,880
आप उसका दोष उस पे नहीं जाएगा। उसका जो हम जो कर रहे हैं हमारा जो कर्म

1246
01:27:20,880 --> 01:27:25,920
है वो उसको दएगा क्योंकि प्रकृति सिर्फ कर्म का

1247
01:27:25,920 --> 01:27:31,520
ठीक है सुजीत जी आपकी बात हो गई हर्ष जी कोई काउंटर करेगा इनको

1248
01:27:31,520 --> 01:27:35,440
हर्ष जी आप बोल

1249
01:27:35,440 --> 01:27:39,600
केवल हर्ष जी और सुजीत जी के बीच में अभी बात हो रही है। दोनों में से जो नॉकउ होगा

1250
01:27:39,600 --> 01:27:43,680
उसकी टीम का दूसरा मेंबर आ जाएगा तो बाकी सब लोग हैंडरे मतलब डाउन

1251
01:27:43,680 --> 01:27:49,520
कर ले थोड़े कन्फजिंग कन्फ्यूजन होती है उससे

1252
01:27:49,520 --> 01:27:53,600
जी मैं यह कहूंगा कि ईश्वर के जो साकार रूप है उसमें

1253
01:27:53,600 --> 01:27:57,920
विकार कैसे हो सकता है? वो जब ईश्वर ही है निराकार ईश्वर ही जब साकार

1254
01:27:57,920 --> 01:28:02,400
रूप में आ रहा है उसके कंट्रोल में सब कुछ है। वही सभी प्राणियों के

1255
01:28:02,400 --> 01:28:06,640
सभी कर्म फलों को वो जानता है। कर्म फल देना भी जानता है। किस प्रकार से कैसे

1256
01:28:06,640 --> 01:28:10,720
क्या करना है सब वो जानता है। तो वो किस प्रकार से विकार युक्त

1257
01:28:10,720 --> 01:28:14,720
हो रहा है। पहला बात वो विकार युक्त है ही नहीं। वो सभी को उसी के कर्म

1258
01:28:14,720 --> 01:28:20,080
फल के अनुसार बहुत आवश्यक बात कही है अभी तक जो

1259
01:28:20,080 --> 01:28:24,240
साकार की ओर से जो मुझे एक पॉइंट मैं मिसिंग बता रहा था शशांक

1260
01:28:24,240 --> 01:28:28,640
चौधरी जी इस बात को जो बोल रहे थे कि विकार

1261
01:28:28,640 --> 01:28:33,120
युक्त है तो उसकी पूजा क्यों नहीं हो सकती मतलब वो स्वीकार कर रहे थे कि विकार है।

1262
01:28:33,120 --> 01:28:37,200
है ना? तो विकार को स्वीकार नहीं करना है।

1263
01:28:37,200 --> 01:28:41,440
उसके संबंध में जो तर्क और प्रमाण दिए जा रहे हैं वह सही है कि नहीं है

1264
01:28:41,440 --> 01:28:45,520
वह बात एक अलग है। मगर हमें यह आपको सगुण साकार को यह स्वीकार नहीं

1265
01:28:45,520 --> 01:28:49,680
करना है कि विकार है। ठीक है? तो यह अभी हर्ष जी ने

1266
01:28:49,680 --> 01:28:50,640
क्लियर किया और

1267
01:28:50,640 --> 01:28:54,640
आगे से ध्यान रखेंगे कि टीम वाले जब उनकी टीम से कोई वक्तव्य दिया

1268
01:28:54,640 --> 01:28:59,120
जा रहा हो तो जो कैप्टन होगा वो डिसाइड करेगा कि मतलब

1269
01:28:59,120 --> 01:29:03,680
कि उनकी ओर से जो वक्तव्य दिया जा रहा है उनकी टीम की ओर से वो वक्तव्य

1270
01:29:03,680 --> 01:29:08,320
मान्य है कि नहीं उसको स्वीकार मतलब उस पर आगे आर्ग्यू करें कि ना करें

1271
01:29:08,320 --> 01:29:12,320
है ना तो इसकी वजह से अभी तक यह बहुत लंबे टाइम से मैं देख रहा हूं इस पर किसी

1272
01:29:12,320 --> 01:29:16,400
ने बोला नहीं था कि विकार है ही नहीं आप विकार को स्वीकार कर

1273
01:29:16,400 --> 01:29:20,560
रहे थे जो कि विकार की पूजा क्यों नहीं हो सकती विकार युक्त की तो विकार

1274
01:29:20,560 --> 01:29:24,560
है ही नहीं यह बात बोलनी अब इसके समर्थन में तर्क है कि नहीं प्रमाण है

1275
01:29:24,560 --> 01:29:28,880
कि नहीं वह बात अब बाद की है मगर यह सबसे पहले आवश्यक था कि हम विकार को स्वीकार

1276
01:29:28,880 --> 01:29:33,200
क्योंकि विकार को स्वीकार कर लिया तो हम जिसकी पूजा कर रहे हैं वो पूर्ण नहीं है

1277
01:29:33,200 --> 01:29:37,680
बस अगर पूर्ण नहीं है तो फिर वो ईश्वर नहीं है हम

1278
01:29:37,680 --> 01:29:43,440
तो विकार को स्वीकार नहीं करना था खैर अ

1279
01:29:43,440 --> 01:29:47,520
हर जी ने ये तो बोल दिया कि विकार नहीं है अब हर जी आगे आप अपनी

1280
01:29:47,520 --> 01:29:52,800
बात को सिद्ध करें कि विकार क्यों ना माना जाए।

1281
01:29:52,800 --> 01:29:57,200
विकार इसलिए नहीं माना जाएगा क्योंकि ईश्वर जो है वह अपने जब अवतार

1282
01:29:57,200 --> 01:30:01,360
धारण करने के विषय में बताते हैं कि वो क्यों आते हैं। धर्म

1283
01:30:01,360 --> 01:30:06,080
रक्षा के लिए आते हैं। साधु जन का कल्याण करने आते हैं और

1284
01:30:06,080 --> 01:30:10,080
एक मर्यादा स्थापना कुछ भी जो उनका अपना उद्देश्य

1285
01:30:10,080 --> 01:30:14,560
होता है धर्म संस्थापना का वो पूरा करते हैं। तो

1286
01:30:14,560 --> 01:30:19,680
वो पहला तो निर्लिप्त है। कर्मों से निर्लिप्त है। वो

1287
01:30:19,680 --> 01:30:23,920
वो बस एक होता है ना कि अपने आप को दिखाते हैं कि मैं ऐसा

1288
01:30:23,920 --> 01:30:28,240
कर रहा हूं लेकिन वास्तव में वो अकर्ता है क्योंकि वो कर्मों में लिप्त नहीं है

1289
01:30:28,240 --> 01:30:32,320
और वो ऐसा क्यों दिखाते हैं ऐसा क्योंकि वो सबसे

1290
01:30:32,320 --> 01:30:36,400
पहले बताए हैं कि जो मुझे जिस भाव से जानता है जिस भाव से मुझे जानता

1291
01:30:36,400 --> 01:30:40,960
है मैं उसी रूप में उसे प्राप्त होता हूं। अगर अगर वो

1292
01:30:40,960 --> 01:30:44,960
लिप्त हो जाते कर्मों में तो फिर वो कर्मों के बंधन में बंध जाते और

1293
01:30:44,960 --> 01:30:49,040
कर्मों में के बंधन में बंध जाते तो वो दोष पूर्ण हो जाता। ईश्वर पहले ही

1294
01:30:49,040 --> 01:30:53,120
कृष्ण भगवान ने गीता में स्पष्ट कहा है कि मुझे कर्म बांध नहीं सकते क्योंकि मैं कर्मों में

1295
01:30:53,120 --> 01:30:57,280
लिप्त नहीं हूं इसलिए उनमें कोई विकार नहीं और दूसरा जब वो साकार

1296
01:30:57,280 --> 01:31:01,360
ईश्वर के रूप में आते हैं रामकृष्ण इत्यादि के रूप में तो वो

1297
01:31:01,360 --> 01:31:05,440
सब कुछ पहले जानते हैं वो निराकार स्वरूप उनका मतलब खत्म नहीं

1298
01:31:05,440 --> 01:31:07,840
हो जाता वो सर्वव्यापी पहले भी है अभी भी

1299
01:31:07,840 --> 01:31:12,320
है उनकी सत्ता हर जगह है लेकिन वो बस हमें एक

1300
01:31:12,320 --> 01:31:16,400
दृष्टिगोचर होते हैं सामने में कि वो हमारे सामने खड़े हैं हम उनको देख

1301
01:31:16,400 --> 01:31:20,560
सकते हैं हम उनको मतलब उनसे व्यवहार कर सकते हैं तो

1302
01:31:20,560 --> 01:31:24,640
उसमें कोई भी दोष आ ही नहीं सकता क्योंकि वो सबको जानते हैं। सब कुछ

1303
01:31:24,640 --> 01:31:28,720
को वही नियंत्रण करते हैं। वही अपने कर्म फल देना

1304
01:31:28,720 --> 01:31:33,840
समझ गए समझ गए। तो अब सुजीत जी आप अपनी बात

1305
01:31:33,840 --> 01:31:38,240
जी अब हर्ष जी ने कहा कि जो अवतार

1306
01:31:38,240 --> 01:31:42,560
व्रत लेते हैं वो सिर्फ भक्तों की भावना से लेते हैं कि भक्त जैसा

1307
01:31:42,560 --> 01:31:46,640
भाव से बचता है हम उसी भाव से मैं उसका सामने आ जाता हूं। फिर ऐसा

1308
01:31:46,640 --> 01:31:50,640
अगर हम कहेंगे कि कि नहीं वो तो अवतार लेता है हमारे भाव से। अब

1309
01:31:50,640 --> 01:31:54,720
किसी को अब आज विश्वजीत से जैसे जी

1310
01:31:54,720 --> 01:31:58,720
ने कहा कि हम तो गधे में भी पूछ लेंगे। अब किसी का भाव

1311
01:31:58,720 --> 01:32:03,280
गधे में हो गया तो फिर कैसे चलेगा? ऐसा अवतार अगर हम बेसिकली

1312
01:32:03,280 --> 01:32:07,280
अगर हम उसको किसी भी रूप में ढाल देंगे तो वो सीमित ही हो जाएगा। और

1313
01:32:07,280 --> 01:32:11,680
अगर हम कहेंगे नहीं हम है मेरा भावना ऐसे है अब क्या सत्य

1314
01:32:11,680 --> 01:32:15,760
कि कहते हैं ना कबीर कि अब हजार लोग हैं हजार की भावना

1315
01:32:15,760 --> 01:32:20,000
अलग-अलग फिर अलग-अलग भगवान हो जाएंगे क्या फिर अब इतना अलग हो गए फिर कौन कौन

1316
01:32:20,000 --> 01:32:23,040
कौन किसको पूजेगा कौन किसको पूजेगा फिर ये तो सब

1317
01:32:23,040 --> 01:32:27,200
सुजीत जी मैं एक बात कहूं कि उनके यहां पर दो पॉइंट चल

1318
01:32:27,200 --> 01:32:32,480
रहे हैं साकार वालों के तो

1319
01:32:32,480 --> 01:32:37,280
अब साकार वालों के दो पॉइंट क्या है कि एक कि विकार तो

1320
01:32:37,280 --> 01:32:41,440
निराकार ईश्वर में भी आ रहा है क्योंकि वो ऐसी सृष्टि बना रहा है जो कीड़ों को मार

1321
01:32:41,440 --> 01:32:46,560
रही है। ठीक है? और दूसरा आपने क्या कहा है कि वो

1322
01:32:46,560 --> 01:32:50,720
अभी आप क्या कह रहे हैं? अभी जो आपने कहा है कि आपकी भावना

1323
01:32:50,720 --> 01:32:54,720
अगर भावना अगर हजार लोग की भावना अलग-अलग होगी तो अलग-अलग

1324
01:32:54,720 --> 01:32:58,720
तो ये आप एक नया पॉइंट ला रहे हैं क्योंकि अभी हर्ष जी ने जो दूसरा पॉइंट रखा है वो

1325
01:32:58,720 --> 01:33:02,880
ये रखा है कि क्योंकि भगवान समस्त कर्मों को करते हुए भी

1326
01:33:02,880 --> 01:33:07,280
अकर्ता है इसलिए उन्हें कोई दोष नहीं लगता है। प्रमाण

1327
01:33:07,280 --> 01:33:11,680
के प्रमाण के दृष्टव्य से हर्ष जी ने ये बात रखी।

1328
01:33:11,680 --> 01:33:16,000
ठीक है? ठीक है। तो आप इस इन दोनों

1329
01:33:16,000 --> 01:33:20,320
बातों में आप आप आपको जवाब देना चाहिए था। खैर तनुष

1330
01:33:20,320 --> 01:33:26,320
जी का हो गया है या तनुष जी अभी बोलेंगे?

1331
01:33:27,600 --> 01:33:31,840
एक पॉइंट था मेरा कि जो उन्होंने गीता

1332
01:33:31,840 --> 01:33:35,840
का श्लोक बोला था कि मैं हर एक कर्म करने के बाद

1333
01:33:35,840 --> 01:33:39,840
भी करता हूं। तो वहां पे मैं कृष्ण

1334
01:33:39,840 --> 01:33:43,840
जी को भगवान नहीं मान रहा हूं। वहां पर मैं यह मान रहा हूं कि

1335
01:33:43,840 --> 01:33:48,080
कृष्ण जी निर्गुण ब्रह्म की बात कर रहे हैं कि जो माया के द्वारा उनकी

1336
01:33:48,080 --> 01:33:52,640
सृष्टि बनाई गई है उसमें वो कर्म करके भी

1337
01:33:52,640 --> 01:33:56,720
मतलब कर्म करने के बाद भी उनको कर्ता का प्रभाव नहीं

1338
01:33:56,720 --> 01:33:59,600
पड़ता।

1339
01:33:59,600 --> 01:34:03,920
ये पॉइंट

1340
01:34:03,920 --> 01:34:08,080
ठीक है? तो ईश्वर ईश्वर जब कर

1341
01:34:08,080 --> 01:34:12,240
अपने निर्गुण निराकार स्वरूप में कर्म कर सकता है। करता

1342
01:34:12,240 --> 01:34:16,240
है तो वो निर्लिप्त है आपके है ना वो

1343
01:34:16,240 --> 01:34:20,480
भी तो निर्लिप्त है ना और कृष्ण भगवान ने भी वहां पर अपने

1344
01:34:20,480 --> 01:34:24,480
विषय में ही कहा है ना कि मुझे कर्म नहीं बांधते क्योंकि मैं कर्मों

1345
01:34:24,480 --> 01:34:30,000
में लिप्त नहीं होता नहीं नहीं उसे मैं कृष्ण जी के विषय में नहीं मानूंगा

1346
01:34:30,000 --> 01:34:34,240
क्योंकि अगर मैं मान लूंगा तो मैं तो फिर वो सगुण रूप मान रहा हूं उनका

1347
01:34:34,240 --> 01:34:38,240
तो मैं यह मान रहा हूं कि वो निर्गुण ब्रह्म की बात कर रहे हैं और तब वो कहते हैं कि मैं

1348
01:34:38,240 --> 01:34:42,240
अगर कोई कर्म करता हूं तब भी मैं करता नहीं हूं। देखिए प्रमाण की बात

1349
01:34:42,240 --> 01:34:46,320
तो ऐसी है कि वहां फिर

1350
01:34:46,320 --> 01:34:50,320
दूसरी बात आ जाएगी। वह हम लोगों को प्रमाणों को तो ना मानने वाला होना ही

1351
01:34:50,320 --> 01:34:55,280
पड़ेगा क्योंकि वहां पर मुझ लिखा है। हमें यह मानना पड़ेगा।

1352
01:34:55,280 --> 01:35:00,480
ठीक है? तो अब निराकार की ओर से

1353
01:35:00,480 --> 01:35:05,200
सभी का हो चुका है ऑलमोस्ट। तो फिर मैं बात करता हूं। ठीक है।

1354
01:35:05,200 --> 01:35:09,280
अर्जी से हम बोले

1355
01:35:09,280 --> 01:35:15,280
बोले

1356
01:35:16,320 --> 01:35:21,200
एक मिनट चलेगा

1357
01:35:21,200 --> 01:35:24,480
और बेटा देखिए

1358
01:35:24,480 --> 01:35:28,720
दो बातें चल रही है कि एक तो भाई कि

1359
01:35:28,720 --> 01:35:32,720
विकार आ जाएगा। ठीक है? और दूसरी

1360
01:35:32,720 --> 01:35:36,720
बात हर्ष जी आपने जो अभी रखा है ना कि समस्त कर्मों को करते हुए मैं करता

1361
01:35:36,720 --> 01:35:40,880
हूं। ठीक है? तो यहां आप उनको कर्म की दृष्टि

1362
01:35:40,880 --> 01:35:44,960
से निर्विकार मान रहे हैं कि वह

1363
01:35:44,960 --> 01:35:48,960
कोई भी कर्म गलत नहीं करते। इस दृष्टि से आप उनको निराकार

1364
01:35:48,960 --> 01:35:53,120
मान रहे हैं। मगर उनके स्वरूप की दृष्टि

1365
01:35:53,120 --> 01:35:58,000
से भी तो विकार है। जैसे कि वो

1366
01:35:58,000 --> 01:36:02,080
क्या कहते हैं? जैसे सबसे पहले एक बहुत अच्छा टॉपिक छिड़ गया था। मगर फिर

1367
01:36:02,080 --> 01:36:07,040
उसको कंटिन्यू नहीं किया गया। कि जैसे भगवान अवतार लेते हैं

1368
01:36:07,040 --> 01:36:11,040
तो लेने से पहले वह कहां थे?

1369
01:36:11,040 --> 01:36:15,040
कहां पर ले रहे हैं? भाई अवतरित होने का मतलब है

1370
01:36:15,040 --> 01:36:19,040
कि उतरना। तो कहां से उतर रहे हैं? पहाड़ से नीचे उतर रहे हैं। तो जब वो पहाड़

1371
01:36:19,040 --> 01:36:23,040
पर भी थे और नीचे भी थे तो फिर वो उतर कहां रहे हैं? ये क्या है? जी

1372
01:36:23,040 --> 01:36:26,000
बताइए।

1373
01:36:26,000 --> 01:36:30,320
ईश्वर अपने चलिए बोलिए हर जी।

1374
01:36:30,320 --> 01:36:34,400
जी ईश्वर अपने निर्गुण रूप में सर्वत्र व्याप्त है।

1375
01:36:34,400 --> 01:36:38,480
निराकार स्वरूप में सर्वत्र व्याप्त है। जब वो सृष्टि में

1376
01:36:38,480 --> 01:36:42,800
साकार स्वरूप में अपने धाम पे भी निवास करते हैं। दृष्टिगोचर

1377
01:36:42,800 --> 01:36:46,960
होते हैं। तो जब वो अवतार लेते हैं तो अपने उसी धाम से

1378
01:36:46,960 --> 01:36:50,960
अपने रूप को यहां धरती पे आते हैं। हम लोग क्या कहते हैं? हम लोग कहते हैं कि वो परमात्मा

1379
01:36:50,960 --> 01:36:54,960
यहां पे धरती पे आया क्योंकि हमारे वैसे ना गुण ना कर्म हमारे वैसे

1380
01:36:54,960 --> 01:36:59,200
कुछ भी नहीं है। है ना? वो ईश्वर आते हैं। ईश्वर

1381
01:36:59,200 --> 01:37:03,360
कहां से आते हैं? ईश्वर अपने धाम से ही आते हैं। या फिर अगर धाम

1382
01:37:03,360 --> 01:37:07,680
से ना माना जाए तो वो प्रकट होते हैं। उन्होंने कहा है मैं प्रकट होता हूं युग युग में।

1383
01:37:07,680 --> 01:37:11,680
है ना? तो बस वो वहीं थे बस वो प्रकट हो गए। इसको ये भी माना जा

1384
01:37:11,680 --> 01:37:15,840
सकता है। वो साकार हो गए। है ना? अवतार लेना मतलब एक रूप धारण

1385
01:37:15,840 --> 01:37:20,080
करना। तो निर्गुण निराकार से वो अवतार धारण कर लिए

1386
01:37:20,080 --> 01:37:24,240
तो वो साकार हो गए। और अगर मतलब वो वहां पर थे मतलब

1387
01:37:24,240 --> 01:37:28,480
कि वो वहां पर थे और वो वहां

1388
01:37:28,480 --> 01:37:32,480
पर पहले से भी थे मगर अभी वो प्रकट हो गए। कहने

1389
01:37:32,480 --> 01:37:36,800
का सीधा तात्पर्य है कि यहां पर यह कहना चाहिए कि पहले वो व्यवहारिक

1390
01:37:36,800 --> 01:37:40,880
इंद्रियों का विषय नहीं थे। अब वो व्यवहार में आ सकने वाला उन्होंने रूप

1391
01:37:40,880 --> 01:37:41,380
ले लिया

1392
01:37:41,200 --> 01:37:45,200
है। ये तो जी बिल्कुल ये आने

1393
01:37:45,200 --> 01:37:49,440
जाने वाली बात होगी। अच्छा दूसरी बात अब यह आती है कि

1394
01:37:49,440 --> 01:37:55,440
स्वरूप में एक चीज और आती है कि वह यहां है वहां नहीं है।

1395
01:37:55,520 --> 01:37:59,760
इसको कैसे डिफाइन

1396
01:37:59,760 --> 01:38:03,920
भैया ईश्वर अगर ईश्वर मैं मैं कहना चाहूंगा अभी बात

1397
01:38:03,920 --> 01:38:07,920
हो रही है। है ना? मैं यह कहना चाहूंगा कि

1398
01:38:07,920 --> 01:38:11,920
अगर देखा जाए तो शास्त्रों के अनुसार ईश्वर ही

1399
01:38:11,920 --> 01:38:16,160
सर्वत्र है। सभी रूपों में भी वही है क्योंकि वही एक ब्रह्म

1400
01:38:16,160 --> 01:38:20,160
ब्रह्म जो था वही सर्वत्र सभी रूपों में

1401
01:38:20,160 --> 01:38:24,240
प्रकट हुआ। वही भगवान ने गीता में कहा है मैं ही

1402
01:38:24,240 --> 01:38:28,320
सत हूं। मैं ही असत भी हूं। है ना? जड़ चेतन भी मैं ही हूं।

1403
01:38:28,320 --> 01:38:32,320
वह सर्वत्र सब जगह व्याप्त है। वो हमारे

1404
01:38:32,320 --> 01:38:36,400
रूप में अपने माया को आीन कर मतलब अपनी माया में रख के अपने

1405
01:38:36,400 --> 01:38:40,800
आप को माया में रख के हमारे जैसे रूप में भी है। लेकिन वो जब ज्ञान

1406
01:38:40,800 --> 01:38:45,040
रूप में आए हैं तो वो सगुण साकार रूप में भी है जो जिनको हम ईश्वर कहते हैं

1407
01:38:45,040 --> 01:38:49,520
और चिन्मय शरीर हम लोग स्थूल शरीर धारी है वो चिन्मय शरीर धारी है। तो

1408
01:38:49,520 --> 01:38:53,760
उनकी ये निराकारता या फिर उनकी सगुण साकार

1409
01:38:53,760 --> 01:38:56,480
होने के कारण उनकी जो निराकारता है वो खंडित

1410
01:38:56,480 --> 01:39:00,640
ऐसे नहीं होती ना। वह तो सर्वत्र है। वो सब चीजों को कंट्रोल

1411
01:39:00,640 --> 01:39:04,720
कर सकते हैं। वहां से भी है ना पर वह सब जगह है तो

1412
01:39:04,720 --> 01:39:08,880
वो अपने रूप को अनगिनत अनंत रूपों में भी व्यक्त कर सकते हैं।

1413
01:39:08,880 --> 01:39:12,960
जहां चाहे जब चाहे तो वो ये नहीं माना जा सकता कि

1414
01:39:12,960 --> 01:39:17,360
उनका जो स्वरूप है वो सीमित है। वो एक देश है। क्योंकि वो

1415
01:39:17,360 --> 01:39:21,360
जी वो एक देश नहीं हो सकते कि वो सर्वत्र हैं। वो

1416
01:39:21,360 --> 01:39:25,360
बस रूप के द्वारा हमें हमें प्रतीत होते हैं कि वो सामने प्रकट है।

1417
01:39:25,360 --> 01:39:29,520
हमारे सामने हैं। लेकिन सिर्फ हमारे सामने ही नहीं है। जब भगवान

1418
01:39:29,520 --> 01:39:33,520
श्री कृष्ण यहां पर धरती पर हैं, हमारे साथ लीला कर रहे हैं तो इसका

1419
01:39:33,520 --> 01:39:37,600
अर्थ यह नहीं कि वह गोलक धाम में नहीं थे। इसका अर्थ यह नहीं कि भगवान बैकुंठ में

1420
01:39:37,600 --> 01:39:42,000
नहीं थे। इसका अर्थ यह नहीं कि भगवान साकेत में नहीं थे। सर्वत्र वो है

1421
01:39:42,000 --> 01:39:46,160
लेकिन वह यहां भी है। वो बस दृष्टिगोचर हो रहे हैं। उसी तरह जहां चाहे

1422
01:39:46,160 --> 01:39:50,160
वहां प्रकट हो सकते हैं। तो उनका जो स्वरूपता है वो निराकारता

1423
01:39:50,160 --> 01:39:54,480
को भी मतलब खंडित नहीं करता है। निराकारता

1424
01:39:54,480 --> 01:39:58,880
और स्वरूपता एकता ही है दोनों में। अच्छा

1425
01:39:58,880 --> 01:40:02,880
भगवान ने अपने आप को अजन्मा कहा है कि मैं

1426
01:40:02,880 --> 01:40:06,960
अजन्मा हूं। तो फिर उनका ये जन्म और ये प्रकट

1427
01:40:06,960 --> 01:40:11,040
और अप्रकट ये सब क्या है? वह तो पहले से ही प्र मतलब वो

1428
01:40:11,040 --> 01:40:11,600
है

1429
01:40:11,600 --> 01:40:15,600
अजन्मा मतलब जिसका जन्म नहीं होता तो

1430
01:40:15,600 --> 01:40:21,600
फिर यह जन्म क्यों है प्रकट क्यों है या अविर्भाव क्यों हो रहा है

1431
01:40:21,920 --> 01:40:26,000
जन्म उन्होंने स्पष्ट कहा है कि मैं मनुष्यों की तरह भगवान ने नौवें अध्याय

1432
01:40:26,000 --> 01:40:30,000
में कहा है ना कि जो मुझे मनुष्य की तरह जन्मता मरता जानता है वो मूढ़ है

1433
01:40:30,000 --> 01:40:34,240
मूर्ख है तो भगवान तो पहले मनुष्य की तरह ना जन्म लेता है ना मरते हैं

1434
01:40:34,240 --> 01:40:38,400
मतलब जन्म मतलब उनका होता ही नहीं बस वो एक दृष्टि मतलब

1435
01:40:38,400 --> 01:40:42,480
वो वो साकार स्वरूप में दृष्टिगोचर होते हैं और फिर अंतर्ध्य भी हो जाते

1436
01:40:42,480 --> 01:40:46,560
हैं। है ना? तो इसका मतलब इसका मतलब

1437
01:40:46,560 --> 01:40:52,000
मतलब भगवान का जन्म नहीं हो सकता माता के गर्भ से।

1438
01:40:52,000 --> 01:40:56,080
वो चाहे तो माता के गर्भ से जन्म ले सकते हैं। वो कहीं मतलब वो

1439
01:40:56,080 --> 01:41:00,160
बाध्य नहीं है ना किसी कर्म के करने में। और सर वो सब कुछ तो करने वाला

1440
01:41:00,160 --> 01:41:04,160
भी है तो नहीं है तो फिर

1441
01:41:04,160 --> 01:41:08,400
आप अजन्मे के संबंध में ये वाला क्यों दे रहे हैं कि उनका मनुष्यों

1442
01:41:08,400 --> 01:41:12,560
के जैसा जन्म नहीं होता। जब जन्म हो सकता है तो आप ये वाला तर्क

1443
01:41:12,560 --> 01:41:16,880
क्यों दे रहे हैं कि मनुष्यों के जैसा जन्म हो सकता। मेरा

1444
01:41:16,880 --> 01:41:20,960
कहने का आशा ये है कि भगवान जो है वो जब सृष्टि बनाता है तो इसका मतलब

1445
01:41:20,960 --> 01:41:25,200
ये नहीं कि वो सृष्टि से पहले नहीं था। वो सृष्टि से पहले भी था। अनादि है, अनंत

1446
01:41:25,200 --> 01:41:29,280
है वो है। जब वो धरती पर अवतार लेता है तो मां के गर्भ

1447
01:41:29,280 --> 01:41:33,360
से अगर चाहे तो अवतार ले सकता है। मतलब वो साकार हो सकता है। इसका मतलब ये नहीं

1448
01:41:33,360 --> 01:41:37,600
कि उनका जो स्वरूपता है वो अजन्मा खंडित हो जाता है। वो अजन्मा

1449
01:41:37,600 --> 01:41:41,680
तो अपना अपने जो मूलभूत स्वरूप है अपने को कहा है

1450
01:41:41,680 --> 01:41:46,320
ना। फिर उनको जन्मा जन्मा वाली बात क्यों कह रहे हैं आप?

1451
01:41:46,320 --> 01:41:50,640
उन्होंने अपने आप को अजन्मा कह दिया ना। ईश्वर अजन्मा

1452
01:41:50,640 --> 01:41:54,800
वेद में भी कहा है। श्री कृष्ण भगवान ने भी कहा है। ठीक है हर्ष

1453
01:41:54,800 --> 01:41:58,960
जी अब आपकी ओर से कोई और आ जाए तो मैं मैं

1454
01:41:58,960 --> 01:42:03,120
एक चीज कहना चाहूंगा भगवान श्री कृष्ण का मैं भगवान

1455
01:42:03,120 --> 01:42:07,280
श्री कृष्ण का जो जन्म का जो बात आता है तो श्रीमद् भागवतम

1456
01:42:07,280 --> 01:42:11,680
में भी या फिर जहां कहीं भी उनका यह वर्णन नहीं मिलता कि वो प्रकट

1457
01:42:11,680 --> 01:42:15,760
मतलब कि वो गर्भ से जन्म लिए हैं। श्रीमद् भागवतम में उनका यह बात

1458
01:42:15,760 --> 01:42:19,840
बताया गया है कि देवकी मैया के गर्भ में वायु था। वायु बाहर

1459
01:42:19,840 --> 01:42:23,920
निकला और भगवान अपने चतुर्भुज या अष्ट अष्टभुजा स्वरूप में वहां प्रकट

1460
01:42:23,920 --> 01:42:28,160
हुए थे तो वहां पर वो जन्म एकदम बालक के जैसा जन्म नहीं

1461
01:42:28,160 --> 01:42:32,320
दिखाया गया है और उनका गर्भ से बाहर होना चाहते तो फिर इसका

1462
01:42:32,320 --> 01:42:36,320
मतलब कि ये कहना कि ईश्वर वो पूर्ण है वो वो

1463
01:42:36,320 --> 01:42:40,480
गलत हो रहा है क्योंकि वो चतुर मेरा

1464
01:42:40,480 --> 01:42:44,960
मेरा एक कथा कथन है कि उनका जो

1465
01:42:44,960 --> 01:42:48,960
अच्छा भैया एक बताइए तो अगर उनका जन्म नहीं हुआ

1466
01:42:48,960 --> 01:42:53,120
था। तो भाद्र भाद्रपद मास के जो कृष्ण पक्ष

1467
01:42:53,120 --> 01:42:58,000
का अष्टमी है उसको जन्माष्टमी क्यों कहा जाता है? प्रकटष्टमी क्यों नहीं?

1468
01:42:58,000 --> 01:43:03,200
ये भी है ये भी है। जी जी तो अभी बात ये हो रही थी कि

1469
01:43:03,200 --> 01:43:07,360
आप देखिए आप दोनों बातें कर रहे हैं। मैं पूछ रहा हूं जन्म हो सकता

1470
01:43:07,360 --> 01:43:11,360
है कि नहीं? तो आप कह रहे हैं जन्म हो सकता है। फिर आप यह कह रहे हैं भागवत में

1471
01:43:11,360 --> 01:43:15,440
प्रमाण है यहां यह है वहां वो है कि वो क्या कहते हैं

1472
01:43:15,440 --> 01:43:19,600
इस रूप में प्रकट होते हैं। तो आप तो खुद ही अपनी बात को काट रहे हो। जन्म

1473
01:43:19,600 --> 01:43:22,320
ले सकता है माता के गर्भ से ले सकता है

1474
01:43:22,320 --> 01:43:26,320
कि नहीं ले सकता है? अगर नहीं ले सकता है तो फिर आप यह क्यों कह रहे हैं कि ले सकता

1475
01:43:26,320 --> 01:43:30,560
है और अगर ले सकता है तो फिर यह क्यों कह रहे हैं कि वो प्रकट

1476
01:43:30,560 --> 01:43:35,680
होते हैं जन्म नहीं लेते हैं तो आप अपनी बातों को कंट्राडिक्ट

1477
01:43:35,680 --> 01:43:39,760
नहीं नहीं मैं कह रहा हूं आपने कहा वो ले सकते हैं कि नहीं आपने

1478
01:43:39,760 --> 01:43:43,840
सकने वाली बात कही तो मैंने तो मैंने कहा वो ले सकते हैं आपने ये नहीं

1479
01:43:43,840 --> 01:43:48,560
कहा वो लिए हैं कि नहीं लिए होने का आशय में अगर आप लिया जाए तो

1480
01:43:48,560 --> 01:43:52,560
उन्होंने परशुराम जी को देखो क्वेश्चन क्या हो रहा है क्वेश्चन ये हो रहा है कि जब वो

1481
01:43:52,560 --> 01:43:56,560
ले सकते हैं तो अजन्मा क्यों कहा फिर अजन्मा वाली बात खत्म हो जाती

1482
01:43:56,560 --> 01:44:00,720
है कि वो तो जन्म हो रहा है ईश्वर का

1483
01:44:00,720 --> 01:44:04,800
ईश्वर अपने जिस रूप में है ऐसा हुआ है मेरी

1484
01:44:04,800 --> 01:44:08,880
बात सुनिए ऐसा हुआ है मैंने पूछा कि जब ईश्वर अजन्मा है तो

1485
01:44:08,880 --> 01:44:13,360
उसको आप जो है ये जन्म लेने वाला क्यों कह रहे हैं ये सब क्यों कह रहे हैं फिर आपने कहा

1486
01:44:13,360 --> 01:44:17,520
कि नहीं ईश्वर का जो जन्म है वो मनुष्य जैसा नहीं वो

1487
01:44:17,520 --> 01:44:21,760
ईश्वर जो लीला लीला में आते हैं तो वो मनुष्य जैसा जन्म नहीं होता है वो

1488
01:44:21,760 --> 01:44:25,840
प्रकट और अप्रकट होते हैं। है ना? तो फिर

1489
01:44:25,840 --> 01:44:29,920
वहां जब आप यह पक्ष रखने लगेंगे कि आप जन्म

1490
01:44:29,920 --> 01:44:33,920
को मानते ही नहीं है। जब आप यह पक्ष रखने लगेंगे तो ईश्वर

1491
01:44:33,920 --> 01:44:37,360
पर बाधा आएगी कि ईश्वर ले सकता है कि नहीं। जब

1492
01:44:37,360 --> 01:44:41,360
आप यह मान रहे हैं कि ईश्वर जन्म ले सकता है तो आपको केवल

1493
01:44:41,360 --> 01:44:45,360
इस बात का आपको यह प्रमाण नहीं देना है कि उसने कभी जन्म नहीं लिया है।

1494
01:44:45,360 --> 01:44:49,360
हम आपको यह प्रमाण नहीं देना है कि वो केवल प्रकट होता

1495
01:44:49,360 --> 01:44:54,240
है। एक मिनट आपको ये प्रमाण नहीं देना है कि वो केवल

1496
01:44:54,240 --> 01:44:58,400
वो केवल प्रकट होता है। वो जन्म नहीं लेता है। ठीक है? आपको यह प्रमाण नहीं देना है।

1497
01:44:58,400 --> 01:45:02,640
आपको जन्म लेने वाला मानते हुए भी अजन्ना

1498
01:45:02,640 --> 01:45:06,720
वाली बात से हम लोगों को सेटिस्फाइड करना है। ठीक है?

1499
01:45:06,720 --> 01:45:10,800
ये अभी तक का था। अब मैं ऐसा करता हूं कि आपकी टीम से किसी और

1500
01:45:10,800 --> 01:45:14,960
को लेता हूं। काफी देर हो गई है आप काफी लोगों को कर चुके हैं।

1501
01:45:14,960 --> 01:45:19,040
एक बात कहना चाहता हूं। ये कह दूं बस इतना एक चीज कह देता हूं

1502
01:45:19,040 --> 01:45:23,040
मैं बस। जी भगवान अपने परमार्थिक एक मिनट एक मिनट। हम लोग ऑलरेडी

1503
01:45:23,040 --> 01:45:27,120
25 मिनट जो है वो डिले कर चुके हैं इसको। ले लीजिए इनकी आखरी

1504
01:45:27,120 --> 01:45:31,120
बात ले लीजिए हर्ष तो इसको थोड़ा सा हम क्लोज भी करते हैं है ना

1505
01:45:31,120 --> 01:45:35,360
क्योंकि डेढ़ घंटे का था ये दो घंटा होने वाला है तो हम इसको जल्दी से जल्दी क्लोज

1506
01:45:35,360 --> 01:45:38,880
करने की कोशिश करते हैं हर्ष जी बताएं

1507
01:45:38,880 --> 01:45:42,880
अपनी कह रहा हूं जी जी भगवान ने

1508
01:45:42,880 --> 01:45:47,200
अपने गीता में कहा है कि मैं अजन्मा अविनाशी होते हुए भी मैं प्रकट

1509
01:45:47,200 --> 01:45:51,280
होता हूं अपनी माया को आीन करके वो अब जो अपने आप को अजन्मा अविनाशी

1510
01:45:51,280 --> 01:45:52,480
कह रहे हैं वो अपने परमार्थिक

1511
01:45:52,480 --> 01:45:56,480
स्वरूप को कह रहे हैं और अब व्यवहारिक स्वरूप में आने के कारण वो वो

1512
01:45:56,480 --> 01:46:00,800
लोगों को दृष्टिगोचर हो रहे हैं कि वो जन्म ले रहे हैं। इसलिए लोगों के द्वारा वो जन्माष्टमी

1513
01:46:00,800 --> 01:46:04,880
या फिर जो भी कहा जाए वो मान्य है। लेकिन उनका जो जन्म है

1514
01:46:04,880 --> 01:46:08,960
वो जन्म लिए हैं कि नहीं उसका बात अलग है। वो ले सकते हैं कि नहीं वो बात अलग

1515
01:46:08,960 --> 01:46:13,040
है। वो ले सकते हैं लेकिन वो लिए हैं कि नहीं इसका प्रमाण इसमें नहीं

1516
01:46:13,040 --> 01:46:17,120
है कि वो बालक के स्वरूप में वो जन्म ले लिए और पंच

1517
01:46:17,120 --> 01:46:21,280
भौतिक रूप में वो आ गए। वो शरीर धारी के रूप में हम

1518
01:46:21,280 --> 01:46:25,360
लोग समझ गए। हम समझ गए। अब हर्ष जी की टीम से किसी और को ले लिया जाए। मैं तब

1519
01:46:25,360 --> 01:46:29,360
तक अपना वह दे रहा हूं इस पर काउंटर कि जब

1520
01:46:29,360 --> 01:46:33,520
आपने यह कह दिया कि भाई वह जन्म अह क्या कहते

1521
01:46:33,520 --> 01:46:37,520
हैं वह लेते हैं कि नहीं लेते वो पारमार्थिक दृष्टि से व्यवहारिक उसमें आए

1522
01:46:37,520 --> 01:46:41,680
इसलिए कह दिया जाता है कि वह जन्म लेते हैं तो उस हिसाब से

1523
01:46:41,680 --> 01:46:45,840
मगर वो लेते हैं कि नहीं लिया है कि इस हिसाब से तो व्यवहारिक स्वरूप

1524
01:46:45,840 --> 01:46:50,000
से उन्होंने बहुत कुछ ऐसी चीजें लागू हो जाएंगी जो फिर अगर आप

1525
01:46:50,000 --> 01:46:54,160
उनके जन्म को नहीं मानेंगे तो व्यवहारिक दृष्टि से

1526
01:46:54,160 --> 01:46:58,240
मानी मानी जाने वाली और भी बहुत सी चीजें हैं। तो हम लोग उसमें कह देते हैं

1527
01:46:58,240 --> 01:47:02,480
व्यवहार की दृष्टि से है। व्यवहार की दृष्टि से है। तो वो सारी चीजें व्यर्थ

1528
01:47:02,480 --> 01:47:06,640
हो जाएंगी। फिर वो वहां पर ऐसा कहना फॉर एग्जांपल जैसे कि भगवान

1529
01:47:06,640 --> 01:47:07,520
ने ये वाली लीला

1530
01:47:07,520 --> 01:47:11,520
की हम तो ये दोष युक्त चीज आ रही है दिखाई

1531
01:47:11,520 --> 01:47:15,920
दे रही है। हम उस लीला वो लीला है केवल हम लोग ये कह देते हैं लीला

1532
01:47:15,920 --> 01:47:19,920
लीला का कुछ अर्थ होता है परमार्थ और प्रातिभाषिक

1533
01:47:19,920 --> 01:47:23,920
दृष्टि से। मगर उस अर्थ को ना लेते हुए हम लीला वाले रूप को ही

1534
01:47:23,920 --> 01:47:28,000
लेते हैं। हम् तो वहां पर यह कह देना कि यह तो लीला

1535
01:47:28,000 --> 01:47:30,560
है

1536
01:47:30,560 --> 01:47:35,120
और लीला कहते हुए हम उसको क्या कहते हैं

1537
01:47:35,120 --> 01:47:39,120
स्वीकार करवा देते हैं कि भगवान ने जो है परमार्थिक दृष्टि से कुछ और

1538
01:47:39,120 --> 01:47:43,120
मैसेज दिया है। मगर ये लीला है इसको ऐसा ना माने। अगर ऐसा

1539
01:47:43,120 --> 01:47:47,200
है अगर आप यह कहेंगे कि मतलब भगवान का जन्म

1540
01:47:47,200 --> 01:47:51,440
जो है होता नहीं है। बस वो जो है कह दिया

1541
01:47:51,440 --> 01:47:56,480
जाता है। यही तो कहा है ना आपने? एक बार क्लियर कर दीजिए।

1542
01:47:56,480 --> 01:48:00,560
मैं कहता हूं कि भगवान जन्म चाहे तो ले सकते हैं। लेकिन वो लिए हैं कि नहीं उसके ऊपर

1543
01:48:00,560 --> 01:48:04,640
है ना। प्रमाण बताते हैं कि भगवान श्री कृष्ण ने जन्म नहीं लिया। भगवान ने प्रकट हुए

1544
01:48:04,640 --> 01:48:08,640
हैं। चाहे ये ये आपसे पूछा ही नहीं गया था ना

1545
01:48:08,640 --> 01:48:13,040
कि भगवान ने जन्म लिया है कि नहीं लिया है। जब भगवान जन्म

1546
01:48:13,040 --> 01:48:17,120
ले सकते हैं। जब भगवान जन्म ले सकते हैं। आपने स्वीकार कर लिया तो हम आप

1547
01:48:17,120 --> 01:48:21,840
हमें इसका उत्तर दीजिए। फिर उनको अजन्मा क्यों कहा जा रहा है?

1548
01:48:21,840 --> 01:48:22,560
क्योंकि वह

1549
01:48:22,560 --> 01:48:26,640
अपने परमार्थ स्वरूप में पहले से विद्यमान है। वो संसार में व्यवहार होने

1550
01:48:26,640 --> 01:48:30,640
के व्यवहार करने के लिए वो माता का बस वो चयन करते हैं कि

1551
01:48:30,640 --> 01:48:35,440
हम इस माता के द्वारा हम प्रकट हो रहे हैं। मतलब उनके जन्म जन्म

1552
01:48:35,440 --> 01:48:39,600
नहीं मान रहे हैं। शिवा जी उनका

1553
01:48:39,600 --> 01:48:45,280
व्यवहार में आने के लिए तो माना जाएगा। लेकिन उनका जो परमार्थिक स्वरूप है उसमें तो

1554
01:48:45,280 --> 01:48:49,440
ये कहिए ना कि व्यवहारिक स्वरूप से यही मैं कह रहा था।

1555
01:48:49,440 --> 01:48:54,320
आप ये बोल ही नहीं रहे हैं। आप ये नहीं बोल रहे हैं कि

1556
01:48:54,320 --> 01:48:58,480
जो प्रपंच रूपी संसार के दृष्टिकोण से उनका जो प्रकट

1557
01:48:58,480 --> 01:49:02,800
और अप्रकट होना है उसी को जन्म और अजन्म कहा जाएगा। जिस

1558
01:49:02,800 --> 01:49:06,960
प्रकार से प्रपंच रूपी संसार में जब जीवात्मा आ रही है या जा

1559
01:49:06,960 --> 01:49:10,960
रही है तो उसको भी जन्म लेना कहा जा रहा है उसका। जबकि वो जन्म थोड़ी

1560
01:49:10,960 --> 01:49:15,280
ना ले रही है। केवल कोई शरीर धारण कर रही है। वास्तविकता क्या है?

1561
01:49:15,280 --> 01:49:19,440
वास्तविकता यह है कि वह केवल एक शरीर धारण कर रही है। मगर हम कहते हैं कि

1562
01:49:19,440 --> 01:49:23,760
फलाने का जन्म हुआ। अगर अगर हम

1563
01:49:23,760 --> 01:49:28,080
जीवात्माओं का संसार रूपी प्रपंच रूपी संसार में जन्म मानते

1564
01:49:28,080 --> 01:49:32,160
हैं, जन्म कहते हैं तो उस दृष्टिकोण से भगवान का भी जन्म

1565
01:49:32,160 --> 01:49:36,160
होना हम कह सकते हैं। अगर हम उसके मौलिक स्वरूप

1566
01:49:36,160 --> 01:49:37,600
की ही बात करते हैं सबका कि

1567
01:49:37,600 --> 01:49:41,760
कोई जन्मता मरता नहीं है। अगर हम जब वो वाली बात करेंगे तो

1568
01:49:41,760 --> 01:49:45,760
हम ये कहेंगे कि नहीं भगवान भी प्रकट और अप्रकट होते हैं। जन्म नहीं लेते। तो

1569
01:49:45,760 --> 01:49:50,080
आप बहुत देर से यही यह बात ना करके और इस बात का जवाब दे रहे हैं

1570
01:49:50,080 --> 01:49:54,240
कि वह जो है उन्होंने कभी जन्म लिया नहीं है। वो

1571
01:49:54,240 --> 01:49:58,400
जन्म ले सकते हैं मगर जन्म कभी लिया नहीं। जबकि पूछा ये जा रहा है जब वो जन्म ले सकते हैं

1572
01:49:58,400 --> 01:50:02,480
तो उनको अजन्मा क्यों कहा जा रहा है? तो सीधी सी बात है कि परमेश्वर

1573
01:50:02,480 --> 01:50:06,640
जो है वो ईश्वर जो है वो सदैव विद्यमान है। उनका

1574
01:50:06,640 --> 01:50:10,640
कभी कोई जन्म नहीं हुआ। वो नित्य है, वो सनातन है। इसलिए वो

1575
01:50:10,640 --> 01:50:14,720
अजन्मा है। मगर लीला में जब वो प्रकट और अप्रकट होते

1576
01:50:14,720 --> 01:50:18,880
हैं तो उसी को लीला संसार रूपी

1577
01:50:18,880 --> 01:50:23,040
दृष्टिकोण से मनुष्य दृष्टि से उसको

1578
01:50:23,040 --> 01:50:27,120
जो है जन्म और मृत्यु कहा जाता है। ठीक है? ये

1579
01:50:27,120 --> 01:50:31,600
मौलिक स्वरूप था। जीने वही बता।

1580
01:50:31,600 --> 01:50:36,080
नहीं आप जो है ये जो स्पष्टता के साथ ये वाली बात नहीं रखी आपने।

1581
01:50:36,080 --> 01:50:41,280
बताया ना अंत में बताया आपने हां मैंने फिर बताया

1582
01:50:41,280 --> 01:50:45,760
तो ठीक है यह जन्म वाला वो तो हो गया

1583
01:50:45,760 --> 01:50:49,760
मगर जब आप ये कहते हैं कि ईश्वर चाहे तो कुछ भी कर सकता है

1584
01:50:49,760 --> 01:50:53,040
अब हर जी नहीं हर जी की ओर से और कोई बोले करण

1585
01:50:53,040 --> 01:50:57,360
करण दास जी आप सकते

1586
01:50:57,360 --> 01:51:01,440
भाई आप थोड़ा प्रश्न रख दीजिए जैसे मैं मैं प्रश्न रख

1587
01:51:01,440 --> 01:51:05,520
रहा हूं कि एक देश वाली बात को

1588
01:51:05,520 --> 01:51:09,840
हमने सेट कर लिया है और जन्म वाली बात को भी हमने सेट कर लिया है।

1589
01:51:09,840 --> 01:51:13,920
मगर अब बात यह आता है बात यह आती है कि हम बार-बार यह कहते

1590
01:51:13,920 --> 01:51:18,000
हैं कि ईश्वर सब कुछ कर सकता है इसलिए वह

1591
01:51:18,000 --> 01:51:22,080
जन्म भी ले सकता है। ठीक है? और दूसरी बात

1592
01:51:22,080 --> 01:51:26,320
यह है पहले ऐसी बात को क्लियर कर लेते हैं। पहले विकार वाली

1593
01:51:26,320 --> 01:51:30,800
बात को ले लेते हैं। कि क्योंकि मैं निर्गुण निराकार

1594
01:51:30,800 --> 01:51:34,880
को पूज रहा हूं। है ना? जी।

1595
01:51:34,880 --> 01:51:40,080
और निर्गुण निराकार को या सगुण निराकार को पूज रहा हूं।

1596
01:51:40,080 --> 01:51:44,160
तो क्योंकि निराकार वाले उसमें भी विकार

1597
01:51:44,160 --> 01:51:48,160
है। है ना? कि वह दोष युक्त सृष्टि बना रहा है, यह

1598
01:51:48,160 --> 01:51:52,160
कर रहा है, वह कर रहा है। तो इससे सगुण साकार के विकार

1599
01:51:52,160 --> 01:51:56,800
को एक्सेप्ट किया जाना सिद्ध नहीं होता है।

1600
01:51:56,800 --> 01:52:01,680
आपने सगुण साकार में विकार नहीं है। इसके पक्ष में कुछ नहीं कहा है।

1601
01:52:01,680 --> 01:52:05,920
तो आप इसके पक्ष में बताएं कि वह जो कर्म है

1602
01:52:05,920 --> 01:52:08,240
और यह सारी चीजें

1603
01:52:08,240 --> 01:52:12,320
कि भाई जब वह चल रहे हैं तो कोई बैक्टीरिया मर गया, कोई कीटाणु

1604
01:52:12,320 --> 01:52:16,640
मर गया और फिर आपने बहुत सी चीजें ऐसी हुई जो विकार

1605
01:52:16,640 --> 01:52:21,280
युक्त हो गए वो कर्म है ना। जी। तो अब क्या है कि

1606
01:52:21,280 --> 01:52:25,360
ये क्रॉस क्वेश्चन किया गया कि भाई निर्गुण निराकार भी

1607
01:52:25,360 --> 01:52:30,080
तो ऐसी चीज बना रहा है जो विकार युक्त है तो वो भी एक विकार हो गया बनाना।

1608
01:52:30,080 --> 01:52:34,160
भैया यही प्रश्न है कि व्यवहारिक जगत में विका शून्यता की हम कैसे मांग कर पा

1609
01:52:34,160 --> 01:52:38,240
रहे हैं? मतलब विकार विकार शून्यता की मांग हम क्यों कर रहे हैं

1610
01:52:38,240 --> 01:52:42,240
व्यवहारिक जगत में वो अवतार लेंगे हमारे बीच में रहेंगे तो वो

1611
01:52:42,240 --> 01:52:46,560
जो शद्र छोटी मोटी जो समस्याएं आप बता रहे हो उसके कारण जो धर्म

1612
01:52:46,560 --> 01:52:51,760
की स्थापना है वह अपना मूल्य उद्देश्य है कि जैसे मान लीजिए

1613
01:52:51,760 --> 01:52:55,760
समस्या अगर आप यह कहेंगे कि छोटी मोटी समस्या तो छोटी

1614
01:52:55,760 --> 01:53:00,160
मोटी पूर्ण की परिभाषा को काट देगी

1615
01:53:00,160 --> 01:53:04,240
नहीं तो फिर ऐसे तर्क देंगे भैया कि जैसे महाभारत का युद्ध हुआ। ज्यादा से ज्यादा ये हो

1616
01:53:04,240 --> 01:53:08,240
सकता है कि जब आप निराकार का खंडन करेंगे कि वो ऐसे दोष युक्त सृष्टि

1617
01:53:08,240 --> 01:53:12,640
बना रहा है तो इस इस तरीके से आप जब निराकार का खंडन

1618
01:53:12,640 --> 01:53:16,880
करेंगे तो यह हो सकता है कि आप संसार को नास्तिकता दे

1619
01:53:16,880 --> 01:53:21,600
क्योंकि सगुण साकार को आप सिद्ध नहीं कर रहे हैं। आप निराकार को

1620
01:53:21,600 --> 01:53:23,280
काट कर जो है सगुण साकार

1621
01:53:23,280 --> 01:53:27,280
को पुष्ट कर रहे हैं। तो और दूसरी बात और सगुण

1622
01:53:27,280 --> 01:53:32,000
साकार में आप छोटी मोटी चीजें मान ही रहे हैं। तो

1623
01:53:32,000 --> 01:53:38,000
आप उसको खंडन करिए कि भाई जो यह

1624
01:53:38,400 --> 01:53:42,400
क्या कहते हैं कि भाई उनसे जो बैक्टीरिया वगैरह मर रहे हैं।

1625
01:53:42,400 --> 01:53:47,280
अब यहां पे देखिए वो वाली बात दोबारा आ गई जो शुरुआत में एक बात थी

1626
01:53:47,280 --> 01:53:51,360
कि भगवान में विकार थोड़ा बहुत मान लिया होता है। तो

1627
01:53:51,360 --> 01:53:55,440
विकार भगवान में जैसे ही मान लिया आपने थोड़ा बहुत भी तो पूर्णता वाली बात नष्ट

1628
01:53:55,440 --> 01:53:59,600
हो गई। ठीक है? तो अब खैर इनकी ओर से अगर और

1629
01:53:59,600 --> 01:54:05,600
कोई बोले जो नहीं अब तक बोला है

1630
01:54:08,080 --> 01:54:12,800
जी शिवशी मैं बोल सकता हूं आशीष चतुर्वेदी बोलिए

1631
01:54:12,800 --> 01:54:18,160
बोलिए

1632
01:54:18,160 --> 01:54:22,720
बोलिए आशीष जी

1633
01:54:22,720 --> 01:54:28,720
किसने बोला था अभी मैं बोल सकता हूं आशीष जी ने बोला था आवाज नहीं आ रही उनकी

1634
01:54:29,840 --> 01:54:35,680
ठीक है तब तक हां तब तक और किसी को ले लेते हैं।

1635
01:54:35,680 --> 01:54:39,680
विश्वजीत जी बोलेंगे विश्वजीत जी आप तो आपका तो हो गया

1636
01:54:39,680 --> 01:54:44,880
है भैया मैं बोलना भी चाहता हूं

1637
01:54:44,880 --> 01:54:48,880
निराकार रूप भगवान को ले चलेंगे तो हम लोग को ज्ञान और कर्म

1638
01:54:48,880 --> 01:54:53,520
का वो उपदेश कैसे मिलेगा या फिर वरदान कैसे मिलेगा

1639
01:54:53,520 --> 01:54:57,920
आवाज से केवल आवाज भैया

1640
01:54:57,920 --> 01:55:02,080
केवल आवाज से हां आवाज गूंजेगी आकाशवाणी

1641
01:55:02,080 --> 01:55:06,080
होगी ऐसा कभी ये पॉइंट मैं बहुत पहले देना चाहता

1642
01:55:06,080 --> 01:55:10,080
था जब ये बाद की बात आई थी ना भगवान हमें सिखाएंगे कैसे जी भैया

1643
01:55:10,080 --> 01:55:14,160
तो निराकार होते हुए सिखा सकते हैं आवाज गूंजेगी सिखा सकते

1644
01:55:14,160 --> 01:55:18,560
हैं बट सिखाए हैं ऐसा कहीं प्रमाण अब ये ये अब अलग सिखाए

1645
01:55:18,560 --> 01:55:23,600
हैं कि नहीं वो सिखा सकते हैं नहीं शिवश भैया उसका

1646
01:55:23,600 --> 01:55:27,600
निराकार ईश्वर को साकार आवाज गूंज जानी एक

1647
01:55:27,600 --> 01:55:31,760
मिनट नहीं शिवश भैया स्पेस में तो आवाज जाएगी नहीं ये जो सृष्टि बनाई

1648
01:55:31,760 --> 01:55:35,840
है आकार वाली सृष्टि है इसके अंदर आकाशवाणी होगी ना वायु के द्वारा

1649
01:55:35,840 --> 01:55:39,840
उसी पंच तत्व में ऐसे है जो जो ध्वनि पैदा कर सकती है इसलिए हम आकार कहते फिर

1650
01:55:39,840 --> 01:55:44,000
भी निराकार कैसे इस सृष्टि के अंदर आ गई ना निराकार

1651
01:55:44,000 --> 01:55:48,080
कोई अगर एक कमरे के अंदर कोई भी वायु आ रही है तो उस आकार वाले उसके

1652
01:55:48,080 --> 01:55:52,400
अंदर आ गई ना वो निराकार निराकार से केवल इतना है जो

1653
01:55:52,400 --> 01:55:56,560
निराकार से केवल इतना मान लीजिए कि वो सगुण निराकार है गुण है

1654
01:55:56,560 --> 01:56:00,720
पर निराकार है तो सृष्टि के अंदर सृष्टि के अंदर ऐसी

1655
01:56:00,720 --> 01:56:04,720
बहुत सी चीजें हैं जो सगुण निराकार है तो क्या वो सब तो इस हिसाब

1656
01:56:04,720 --> 01:56:08,960
से आप जो कह रहे हैं निराकार पक्ष नहीं ले रहे मैं वापस आ गया हूं तो क्या मैं

1657
01:56:08,960 --> 01:56:14,080
नहीं हम लोग निराकार का पक्ष ले रहे हैं वो चाहे सगुण हो चाहे निर्गुण होकार

1658
01:56:14,080 --> 01:56:18,080
जैसे और क्या निराकार कोई भी आकार

1659
01:56:18,080 --> 01:56:22,320
हो सकता है आकाशवाणी में भी जो होते हैं वो वाइब्रेट

1660
01:56:22,320 --> 01:56:26,480
करते हैं हिलते हैं निराकार उत्पन्न होती है एक मिनट चौधरी

1661
01:56:26,480 --> 01:56:30,800
जी एक मिनट जी कि हम निराकार

1662
01:56:30,800 --> 01:56:34,880
और सगुण साकार का पक्ष नहीं ले रहे हैं। हम हमें

1663
01:56:34,880 --> 01:56:38,640
हमारा है पक्ष ये कि हम सगुण साकार को स्वीकार नहीं करेंगे।

1664
01:56:38,640 --> 01:56:42,720
ये पक्ष है हमारा। जी। ठीक है। तो अब ये वाली बात तो रह ही नहीं जाती

1665
01:56:42,720 --> 01:56:46,960
कि हम निर्गुण निराकार के उससे अपना पक्ष रखें या

1666
01:56:46,960 --> 01:56:50,960
सगुण निराकार के। ये निर्गुण निराकार के उससे रखें या सगुण

1667
01:56:50,960 --> 01:56:55,280
निराकार के। हां। दूसरी बात आपने कही कि सृष्टि में वो कोई वाइब्रेशन होती है, ध्वनि

1668
01:56:55,280 --> 01:56:59,280
होती है। तो बात ऐसी है कि आपके अनुसार फिर

1669
01:56:59,280 --> 01:57:03,840
दुनिया में कोई भी चीज निराकार है ही नहीं। प्रपंच रूपी संसार में

1670
01:57:03,840 --> 01:57:07,920
भैया इसके अनुसार तो हर व्यक्ति के जीवन में एक ना एक बार

1671
01:57:07,920 --> 01:57:11,920
भविष्यवाणी करना ईश्वर को जरूरी हो जाएगा साक्षी नहीं जरूरी

1672
01:57:11,920 --> 01:57:16,000
की बात नहीं है अभी बात ये है कि निराकार रूप से वो शिक्षा दे सकते हैं

1673
01:57:16,000 --> 01:57:20,400
कि नहीं दे सकते हैं तो फिर आने की फिर आवश्यकता खत्म हो जाएगी ना

1674
01:57:20,400 --> 01:57:24,560
आप आप आवश्यकता से सिद्ध कर रहे हैं भगवान का स्वरूप किस रूप में करेंगे

1675
01:57:24,560 --> 01:57:28,880
उनको एक मिनट विश्वजीत जी आप जो है भगवान का स्वरूप

1676
01:57:28,880 --> 01:57:32,960
आवश्यकता के कारण सिद्ध कर रहे हैं कि आवश्यकता है

1677
01:57:32,960 --> 01:57:36,960
शिक्षा देने की, फॉलो करने की। इसलिए भगवान का अवतार होना

1678
01:57:36,960 --> 01:57:41,280
आवश्यक है। तो मैं उस आवश्यकता को ध्वस्त कर रहा हूं। भगवान जो है आकाशवाणी

1679
01:57:41,280 --> 01:57:45,760
कर देंगे और जो है आपको वो हो जाएगा।

1680
01:57:45,760 --> 01:57:49,840
नहीं नहीं तो नहीं तो आप वैदिक मंत्रों का दृष्टा बन जाएंगे। हम

1681
01:57:49,840 --> 01:57:53,760
निराकार हो गए। भाई कई कई चीजें ऐसी हुई है ना

1682
01:57:53,760 --> 01:57:57,760
कि वह जो है कंस जा रहा था

1683
01:57:57,760 --> 01:58:01,760
अपनी बहन को लेकर के माता देवकी को लेकर के और

1684
01:58:01,760 --> 01:58:06,080
आकाशवाणी हुई थी कि नहीं हुई थी कि तू जिसको ले जा रहा है उसी का सातवां

1685
01:58:06,080 --> 01:58:10,560
पुत्र तेरे तेरा नाश करेगा आठवां आठवा

1686
01:58:10,560 --> 01:58:16,560
हां आठवां तो शिवश भैया जैसे ये बात है तो इसमें ऐसा

1687
01:58:17,520 --> 01:58:21,920
आ रहा होगा राक्षस एक एक करके बोल एक एक करके एक मिनट

1688
01:58:21,920 --> 01:58:25,920
एक एक मिनट एक मिनट ईश्वर सुनिए एक एक

1689
01:58:25,920 --> 01:58:30,000
मिनट एक चीज क्लियर कर दूं एक चीज मैं क्लियर कर दूं एक चीज एक चीज मैं क्लियर

1690
01:58:30,000 --> 01:58:33,280
कर दूं कि

1691
01:58:33,280 --> 01:58:37,280
ये जो बात है इन्होंने

1692
01:58:37,280 --> 01:58:42,320
लास्ट में एक बात कही थी कि इसका कोई प्रमाण है तो मैंने प्रमाण दे दिया

1693
01:58:42,320 --> 01:58:47,520
जीश भैया देखो

1694
01:58:47,520 --> 01:58:51,600
के रूप में थोड़ा हॉचपच हो जाएगा अब विश्वजीत जी

1695
01:58:51,600 --> 01:58:55,680
को हटाइए और जिसका नहीं हुआ हो साकार से

1696
01:58:55,680 --> 01:59:00,000
उसको ले लीजिए या फिर फर्स्ट से शुरू करिए और

1697
01:59:00,000 --> 01:59:04,560
ये लास्ट राउंड होगा अगर लास्ट राउंड में सही से स्टैंड नहीं कर पाया साकार

1698
01:59:04,560 --> 01:59:08,640
तो आज साकार वाले उसको प्राप्त करेंगे पंडित

1699
01:59:08,640 --> 01:59:12,640
जी उनकी तरफ से अगर लोहा लेना चाहे वो बात अलग है

1700
01:59:12,640 --> 01:59:17,440
शिवश भैया मैं बस वो आकाशवाणी वाली बात पूरी करना चाहता हूं अपनी

1701
01:59:17,440 --> 01:59:21,600
शशांक जी समझने का प्रयास करिए क्योंकि क्योंकि एक एक उसमें

1702
01:59:21,600 --> 01:59:25,680
चल रहा है ना कि भाई अभी आपका सबसे पहले आप ही थे ना?

1703
01:59:25,680 --> 01:59:29,840
नहीं मैं तो मैंने तो बीच में ज्वाइन किया था। नहीं नहीं अभी अभी

1704
01:59:29,840 --> 01:59:33,840
क्या कहते हैं? अभी जब ये वाला राउंड शुरू हुआ है ना नॉकउ राउंड उसमें आप ही थे

1705
01:59:33,840 --> 01:59:38,160
ना। जी जी हां तो अभी रुक जाइए। आप कोई और हो अगर

1706
01:59:38,160 --> 01:59:42,160
साकार की ओर से जो जी जिसका

1707
01:59:42,160 --> 01:59:46,800
जिसका अभी तक वो नहीं आया है। नंबर नहीं आया है। नॉकउ

1708
01:59:46,800 --> 01:59:51,440
किसका नहीं आया? आशीष हां आशीष जी बोलिए

1709
01:59:51,440 --> 01:59:55,840
जी आपका प्रश्न क्या था सर मैं खुद ही भूल गया सर

1710
01:59:55,840 --> 01:59:59,840
विकार वाला प्रश्न जो आपका है हां एक तो विकार वाला है कि भाई

1711
01:59:59,840 --> 02:00:02,560
आप अगर ये कहेंगे कि निराकार में भी विकार है तो

1712
02:00:02,560 --> 02:00:06,880
आप ज्यादा से ज्यादा क्या करेंगे कि सृष्टि को नास्तिक बनाएंगे ठीक है

1713
02:00:06,880 --> 02:00:11,120
तो आपको अपने विकार और फिर आप यह कह देंगे कि भाई विकार

1714
02:00:11,120 --> 02:00:15,360
को पूजा नहीं जा सकता ये कहां का नियम है और मतलब

1715
02:00:15,360 --> 02:00:19,680
आप विकार को स्वीकार कर रहे हैं और उसके पक्ष में आप उसके समर्थन

1716
02:00:19,680 --> 02:00:23,840
में ये कह रहे हैं कि निराकार ईश्वर में भी विकार है

1717
02:00:23,840 --> 02:00:27,520
और क्या कहते हैं

1718
02:00:27,520 --> 02:00:31,600
ये निराकार ईश्वर में भी विकार है और एक चीज

1719
02:00:31,600 --> 02:00:35,600
और कह रहे हैं कि ईश्वर में अगर छोटे-मोटे विकार

1720
02:00:35,600 --> 02:00:39,680
हैं तो हां निराकार ईश्वर में भी विकार हैं तो विकार युक्त चीज को पूजा

1721
02:00:39,680 --> 02:00:43,760
नहीं जा सकता। ये कहां का विधान है? तो यह आप कह रहे हैं तो

1722
02:00:43,760 --> 02:00:47,840
इस तरीके से आप अपने ईश्वर को ईश्वर सिद्ध नहीं कर रहे क्योंकि आप कह रहे हैं कि

1723
02:00:47,840 --> 02:00:52,000
वह पूर्ण नहीं है और उसके पक्ष में कह रहे हैं कि तुम भी तो अपूर्ण को पूजते हो।

1724
02:00:52,000 --> 02:00:56,320
ठीक है? तो अपूर्ण को पूजा नहीं जा सकता है। ऐसा कहीं नहीं है। तो अपूर्ण के

1725
02:00:56,320 --> 02:01:00,400
अपूर्ण के उसमें आपने जब यही मान लिया कि वो अपूर्ण है तो वो ईश्वर ही

1726
02:01:00,400 --> 02:01:04,720
नहीं है। हम तो जब वो ईश्वर नहीं है तो आपने नास्तिकता दी संसार

1727
02:01:04,720 --> 02:01:08,880
को। पहली बात और विश्वजीत से विश्वजीत

1728
02:01:08,880 --> 02:01:12,960
जी से क्या बात हो रही थी? पंडित जी आपको याद है क्या? अभी अभी

1729
02:01:12,960 --> 02:01:17,040
जो हो रही थी बात? जी भैया आकाशवाणी के

1730
02:01:17,040 --> 02:01:18,560
बारे में।

1731
02:01:18,560 --> 02:01:22,640
हां विश्वजीत जी का एक पॉइंट था और ये सगुण साकार वालों

1732
02:01:22,640 --> 02:01:28,400
का सगुण साकार वालों ने जो पक्ष रखा कि

1733
02:01:28,400 --> 02:01:32,640
आवश्यकता कि जब वो आएगा ही नहीं तो उसकी आवश्यकता क्या होगी? मतलब

1734
02:01:32,640 --> 02:01:36,720
उसकी आवश्यकता है आने जाने की। है ना? तो इसलिए उसका आना आना जाना

1735
02:01:36,720 --> 02:01:40,960
आवश्यक है। इसलिए वो आता जाता है। ठीक है? तो इसका

1736
02:01:40,960 --> 02:01:44,960
मैंने ब्रेक किया कि भाई वो अपने निराकार स्वरूप से आपको ज्ञान वगैरह दे सकता

1737
02:01:44,960 --> 02:01:49,760
है। बहुत कुछ कर सकता है निराकार स्वरूप से। तो

1738
02:01:49,760 --> 02:01:53,840
वो जो है इन्होंने कहा कि प्रमाण क्या है? तो मैंने एक प्रमाण भी दिया कि

1739
02:01:53,840 --> 02:01:57,920
उसने एक भविष्यवा ऐसी बहुत सारी कथाएं मिलंगी जिसमें कि उस प्रमाण

1740
02:01:57,920 --> 02:02:03,040
में भी तो उनको अवतार लेना ही पड़ा ना साकार रूप में

1741
02:02:03,040 --> 02:02:07,200
तो फिर आवश्यकता तो ध्वस्त हो गई ना उन्होंने आपको ज्ञान

1742
02:02:07,200 --> 02:02:12,640
देने के लिए अवतार नहीं लिया उन्होंने आकाशवाणी कर दी

1743
02:02:12,640 --> 02:02:16,000
आवश्यकता

1744
02:02:16,000 --> 02:02:20,000
मैं अवतार लूंगा मेरी बात समझिए आपने

1745
02:02:20,000 --> 02:02:24,240
कहा कि ज्ञान देने के लिए अवतार आवश्यक है तो ज्ञान

1746
02:02:24,240 --> 02:02:28,800
देने के लिए आवश्यकता को खंडित किया मैंने।

1747
02:02:28,800 --> 02:02:32,800
ठीक है? सगुण निराकार के द्वारा वो जो है खंडित हो

1748
02:02:32,800 --> 02:02:37,360
गई आपकी बात। ठीक है? और दूसरी बात

1749
02:02:37,360 --> 02:02:40,720
कि

1750
02:02:40,720 --> 02:02:44,880
भगवान यदि चाहे तो केवल अपने मन में अपनी जो

1751
02:02:44,880 --> 02:02:49,120
वो है शक्ति से आपके मन में वो बोध करा देंगे। जो जो

1752
02:02:49,120 --> 02:02:53,120
वो सोच आपसे सुचवाना चाहते हैं वो सुचवा सकते हैं।

1753
02:02:53,120 --> 02:02:57,280
विचार जो आपके मन में उत्पन्न कराना चाहे तो कर सकते हैं। तो यह कहना

1754
02:02:57,280 --> 02:03:01,840
कि वो उनका जो है हमें सिखाने के लिए आवश्यक

1755
02:03:01,840 --> 02:03:05,920
है अवतार लेना इसलिए वो अवतार लेते

1756
02:03:05,920 --> 02:03:10,080
हैं तो यह ध्वस्त हो जाता है यहां से। अब आशीष जी आप अपनी बात बोले। मैंने

1757
02:03:10,080 --> 02:03:14,080
आवश्यकता का खंडन किया है और मैंने विकार वाली बात में आपको एक्सप्लेन

1758
02:03:14,080 --> 02:03:18,240
कर दिया। जी जी जहां तक विकार की बात है तो

1759
02:03:18,240 --> 02:03:22,480
अगर आप सूर्य का प्रतिबिंब जल में देखते हैं और उसको पत्थर से मारते हैं तो

1760
02:03:22,480 --> 02:03:26,800
उसका असर सूर्य पे नहीं होता है। प्रतिबिंब पे होता है और कुछ टाइम बाद फिर से वो स्थिर

1761
02:03:26,800 --> 02:03:31,120
हो जाता है। तो यहां होने वाले किसी भी विकार

1762
02:03:31,120 --> 02:03:35,120
अथवा किसी भी कर्म का फल ईश्वर को नहीं भोगना पड़ता है। वो इससे परे

1763
02:03:35,120 --> 02:03:38,240
है।

1764
02:03:38,240 --> 02:03:42,240
नहीं भोगना नहीं पड़ता। वो तो उसकी वो तो उसकी अपनी बात

1765
02:03:42,240 --> 02:03:46,240
है ना कि उसको भोगना है कि नहीं भोगना है। हम तो यह देख

1766
02:03:46,240 --> 02:03:50,240
रहे हैं ना कि उसके द्वारा कीड़े मारे जा रहे हैं। जी तो

1767
02:03:50,240 --> 02:03:55,120
फिर अगर चंद्र का पूरा ना दिखना आपकी दृष्टि में भेद हो सकता है।

1768
02:03:55,120 --> 02:03:58,800
चंद्र तो पूरा ही है।

1769
02:03:58,800 --> 02:04:02,800
आपकी दृष्टि का भेद हो सकता है। चंद्र का पूरा गोल ना दिखना। लेकिन चंद्र तो

1770
02:04:02,800 --> 02:04:06,640
गोल ही है। पूरा ही है।

1771
02:04:06,640 --> 02:04:10,880
तो वो दृष्टि भेद मुझे समझाइए ना कि कीड़ा मर रहा है तो क्या करूं मैं उसका?

1772
02:04:10,880 --> 02:04:16,240
क्या है उसकी वास्तविकता?

1773
02:04:16,240 --> 02:04:20,240
उसमें फिर उसका प्रारब्ध होगा। आशीष जी परमार्थ व्यवहार का

1774
02:04:20,240 --> 02:04:23,600
थोड़ा कांसेप्ट समझाइए इनको।

1775
02:04:23,600 --> 02:04:27,600
को नहीं पता है ये। पंडित जी अभी आपसे बात होने वाली है लग रहा है। वो आरआरआर का

1776
02:04:27,600 --> 02:04:31,840
सीन आने वाला है।

1777
02:04:31,840 --> 02:04:36,400
बहुत देर से जय श्री राम जय श्री राम राम उन्मेश जी

1778
02:04:36,400 --> 02:04:40,560
उन्मे किस पक्ष को रखने रखेंगे अभी आप जब रखेंगे

1779
02:04:40,560 --> 02:04:44,640
तो साकार को साकार को रखूंगा मैं यदि वो दुर्बल

1780
02:04:44,640 --> 02:04:48,640
हो जाएगा तो अच्छा अच्छा अच्छा अच्छा शिवश भैया मैं यहां पर एक बात रख सकता

1781
02:04:48,640 --> 02:04:52,960
हूं आशीष जी के लिए जी उन्होंने उन्होंने जो अवतारवाद

1782
02:04:52,960 --> 02:04:57,120
को लेकर कहा था नयन जी नयन जी बहुत सारे हमारे पास ब्रेन है

1783
02:04:57,120 --> 02:05:01,120
और यहां पे मेरे ख्याल से इस समय कोई पक्ष नहीं रखूंगा मैं बस बस उनसे

1784
02:05:01,120 --> 02:05:05,520
एक प्रश्न बस छोड़कर मैं बस निश्च हो जाऊंगा। मगर जाइएगा

1785
02:05:05,520 --> 02:05:09,920
नहीं। ये नहीं कि अपनी बात बोल के आप वो इतनी अच्छी

1786
02:05:09,920 --> 02:05:14,000
उसको चर्चा को छोड़कर ही चले जाए। नहीं आप आप चर्चा करिए। मैं

1787
02:05:14,000 --> 02:05:18,080
बस उनसे एक प्रश्न देकर मतलब दे रहा हूं कि आशीष जी

1788
02:05:18,080 --> 02:05:21,680
ने जो अवतार आप मुझे दे दीजिए। समय आने पर मैं रख दूंगा। अभी आशीष जी

1789
02:05:21,680 --> 02:05:26,160
आप इनके प्रश्न को ना लीजिएगा। आप मुझे दे दीजिए। तो उनके जो अवतारवाद

1790
02:05:26,160 --> 02:05:30,400
का जो प्रश्न था वहां पर मैं एक चीज कहना चाहूंगा कि जो कृष्ण

1791
02:05:30,400 --> 02:05:34,640
जी जो अगर कह रहे हैं कि यदा यदा ही धर्मस ग्लानी भवती भारत

1792
02:05:34,640 --> 02:05:38,800
तो वो जब जबजब धर्म के लिए ग्लानी होगा तबतब वो अवतार

1793
02:05:38,800 --> 02:05:42,800
लेंगे अगर नहीं लेंगे तो मतलब वो तो लेने के लिए बाध्य है

1794
02:05:42,800 --> 02:05:46,960
ना तो साकार रूप जो है वह अवतार लेने के लिए बाध्य है अगर नहीं

1795
02:05:46,960 --> 02:05:52,320
लेगा तो शास्त्र का खंडन हो जाएगा क्योंकि शास्त्रों में उल्लेख है उनका अवतार लेना पड़ेगा

1796
02:05:52,320 --> 02:05:54,560
हम

1797
02:05:54,560 --> 02:05:57,680
हम ठीक है।

1798
02:05:57,680 --> 02:06:01,760
वो लाइट जला दो। बोर्ड में बटन है लाइट का। ठीक

1799
02:06:01,760 --> 02:06:05,920
है आशीष जी अब आप इनकी बात को अभी ना लें। मैं समय आने

1800
02:06:05,920 --> 02:06:10,240
पे इसको उरत कर दूंगा। अभी आप

1801
02:06:10,240 --> 02:06:14,960
जो विकार वाली बात है कि भाई वो जो विकार हो रहा है हम

1802
02:06:14,960 --> 02:06:19,600
अब आपने एक बात कही है प्रारब्ध कि उसका प्रारब्ध होगा कीड़े का इसलिए वो मर गया।

1803
02:06:19,600 --> 02:06:23,920
ठीक है? जी। तो ऐसे तो फिर हम किसी को भी दोष नहीं दे सकते कि उसका प्रारब्ध

1804
02:06:23,920 --> 02:06:28,000
होगा। वह मर गया। कोई भी व्यक्ति कोई भी अपराध

1805
02:06:28,000 --> 02:06:32,640
कर रहा है उसको हम दोष ही नहीं दे सकते कि उसका प्रारब्ध होगा।

1806
02:06:32,640 --> 02:06:37,280
तो ये प्रार कि दोष दिया जाना और नहीं दिया जाना। इसको थोड़ा

1807
02:06:37,280 --> 02:06:43,040
डिफाइन करिए आप।

1808
02:06:43,040 --> 02:06:47,280
जो मतलब अपराध हमने हमसे अनजाने में होते हैं वो अगर

1809
02:06:47,280 --> 02:06:51,280
किसी को कष्ट पहुंचता है हमसे अनजाने में तो वो उसका प्रारब्ध होता है और अगर हम

1810
02:06:51,280 --> 02:06:55,520
किसी को जान पहुंचा जान मतलब अपनी पूरी

1811
02:06:55,520 --> 02:06:59,600
समझ के साथ नुकसान पहुंचाते हैं तो वो उसका प्रारब्ध नहीं होता

1812
02:06:59,600 --> 02:07:03,600
लगता है। यानी कि अनजाने में किए जाने वाले जो वो हो जाते हैं वो दोष

1813
02:07:03,600 --> 02:07:07,760
नहीं देते हैं। जी उसका प्रारब्ध होता है। वो ये तो आप गलत बोल

1814
02:07:07,760 --> 02:07:12,000
रहे हैं। दोष लगता है। कई बार कहा जाता है ना कि किचन

1815
02:07:12,000 --> 02:07:16,080
में यह इतने लोग अग्नि जलाने से मर जाते हैं। कई बार ऐसा

1816
02:07:16,080 --> 02:07:20,080
होता है ना रसोई घर में इतने जीवों की हत्या हो जाती है अनजाने में हमसे

1817
02:07:20,080 --> 02:07:24,400
तो इसलिए ये करना चाहिए प्रतिदिन है ना इसलिए तो पंच महायज्ञ

1818
02:07:24,400 --> 02:07:28,400
कहे गए हैं। पंच महायज्ञ हां तो आपकी ये बात गलत है कि

1819
02:07:28,400 --> 02:07:32,480
अनजाने में किए हुए पापों का दोष लगता ही नहीं है। बहुत जगन्य

1820
02:07:32,480 --> 02:07:36,560
हो जाएगा तो लगेगा ना। अब कोई व्यक्ति कोई व्यक्ति अपने किसी उसमें

1821
02:07:36,560 --> 02:07:40,720
जा रहा है और उससे किसी बच्चे की निर्मम हत्या हो गई कुचल गया

1822
02:07:40,720 --> 02:07:45,040
बच्चा कोई बालक है वो मृत्यु को प्राप्त हो गया तो उसको दोष नहीं लगना

1823
02:07:45,040 --> 02:07:51,040
चाहिए कि तुम ऐसे बुद्धिहीन व्यक्ति हो तो गाड़ी क्यों चला रहे हो

1824
02:07:51,120 --> 02:07:52,400
हां जी

1825
02:07:52,400 --> 02:07:56,720
तो अनजाने अनजाने की बात तो ये है कि तो दोष

1826
02:07:56,720 --> 02:08:00,880
लगेगा तो आप यहां पे रख मतलब चीज नहीं रख रहे

1827
02:08:00,880 --> 02:08:06,320
हैं। खैर अ अब जो

1828
02:08:06,320 --> 02:08:10,400
नए लोग हैं उनके उनसे अतिरिक्त मुझे लगता है अभी इस समय

1829
02:08:10,400 --> 02:08:14,560
साकार के पक्ष से और कोई नहीं है। ठीक है। तो अभी

1830
02:08:14,560 --> 02:08:19,120
मैं अब पंडित जी और उन्मेश जी में से कौन

1831
02:08:19,120 --> 02:08:23,200
हर्ष झा जी ने अपना हाथ उठाया तो हर्ष झा जी अब काफी काफी समय हो

1832
02:08:23,200 --> 02:08:27,280
गया है थोड़ा एक निष्कर्ष तक पहुंचे

1833
02:08:27,280 --> 02:08:31,440
है ना तो उन्मेश जी और पंडित जी में से कोई

1834
02:08:31,440 --> 02:08:35,840
जी को बोले श्री गणेश करें वो ज्यादा ज्ञानी है हमसे बोलिए उन्मेश

1835
02:08:35,840 --> 02:08:38,480
जी

1836
02:08:38,480 --> 02:08:42,000
नाटो नाटो

1837
02:08:42,000 --> 02:08:46,160
नारायण जी जी तो निराकार पक्ष से आपका क्या पक्ष

1838
02:08:46,160 --> 02:08:49,360
है अभी बाबू जी

1839
02:08:49,360 --> 02:08:53,520
अभी बात दो चल दो चल दो दो चल रही है एक तो ये चल

1840
02:08:53,520 --> 02:08:57,520
रही थी कि साकार के पक्ष ने कहा था आवश्यकता

1841
02:08:57,520 --> 02:09:01,520
है तो मैंने उस आवश्यकता को खंडित किया था वो कह रहे थे कि

1842
02:09:01,520 --> 02:09:05,520
भाई जब भगवान अवतार नहीं लेंगे सगुण साकार तो वो शिक्षा कैसे

1843
02:09:05,520 --> 02:09:09,680
देंगे तो मैंने कहा केवल आकाशवाणी से दे देंगे शिक्षा

1844
02:09:09,680 --> 02:09:13,840
हम तब भी सगुण साकार साकार की तो आवश्यकता नहीं हुई ना फिर

1845
02:09:13,840 --> 02:09:17,840
अगर शिक्षा की बात है तो और वो अपनी शब्द जो उनकी

1846
02:09:17,840 --> 02:09:21,920
शक्ति है उससे भी केवल बोध करा सकते हैं आपको बहुत कुछ ठीक है तो आप

1847
02:09:21,920 --> 02:09:26,240
आवश्यकता को मैंने खंडित किया जी दूसरी बात यह है कि अभी

1848
02:09:26,240 --> 02:09:30,400
बात ये हो रही है कि विकार ये कहा गया

1849
02:09:30,400 --> 02:09:35,280
कि भगवान जो है वह

1850
02:09:35,280 --> 02:09:39,840
यहां आएंगे तो उनके द्वारा भी कई ऐसे कर्म होते हैं जिसका उनको दोष लग जाएगा

1851
02:09:39,840 --> 02:09:44,320
तो वह दोष युक्त हो जाएंगे है ना? तो

1852
02:09:44,320 --> 02:09:48,480
इसके पक्ष में जो साकार की ओर से अभी तक जो रखा गया है वो क्या-क्या

1853
02:09:48,480 --> 02:09:52,720
है वो मैं बता दूं आपको। एक रखा गया है कि निराकार ईश्वर भी तो ऐसी सृष्टि बनाता

1854
02:09:52,720 --> 02:09:56,800
है जो कीड़ों को मारती है। ऐसा पहाड़ बनाता है जो किसी दिन टूट जाता

1855
02:09:56,800 --> 02:09:57,300
है तो

1856
02:09:57,120 --> 02:10:01,200
मर जाते हैं। मतलब प्रकृति भी चीजों को खराब कर रही है।

1857
02:10:01,200 --> 02:10:05,280
ठीक है? कुल मिलाकर और एक पक्ष ये रखा मतलब निरा तो तुम

1858
02:10:05,280 --> 02:10:09,440
निराकार की पूजा क्यों करते हो? और दूसरा पक्ष इन्होंने यह रखा

1859
02:10:09,440 --> 02:10:13,520
कि दोष युक्त दोष युक्त

1860
02:10:13,520 --> 02:10:17,520
की पूजा नहीं हो सकती। ये कहां का

1861
02:10:17,520 --> 02:10:22,480
प्रमाण है। ठीक है? तो इसको मैंने ऐसे खंडित किया

1862
02:10:22,480 --> 02:10:26,800
कि भाई अगर आप यह मानते हो कि दोष

1863
02:10:26,800 --> 02:10:30,800
युक्त की पूजा नहीं हो सकती। इसका प्रमाण नहीं है मान लो। तो सबसे

1864
02:10:30,800 --> 02:10:34,880
पहली बात तो यह आ जाएगी कि आपने जब मान लिया कि

1865
02:10:34,880 --> 02:10:39,120
भगवान में दोष है। वो अपूर्ण है तो वो भगवान

1866
02:10:39,120 --> 02:10:43,280
की जो वो है डेफिनेशन वो वहां खत्म हो गई जब आपने दोष

1867
02:10:43,280 --> 02:10:47,840
मान लिया तो उनके द्वारा कीड़े इत्यादि को ना मरना प्रैक्टिकली

1868
02:10:47,840 --> 02:10:51,920
थोड़ा सा समझाना पड़ेगा कि वो दोष युक्त क्यों नहीं है और अगर आप ये मान

1869
02:10:51,920 --> 02:10:56,240
लेंगे कि दोष युक्त है मगर दोष युक्त की भी पूजा हो सकती है तो

1870
02:10:56,240 --> 02:11:00,720
फिर क्या होगा कि ये दोष

1871
02:11:00,720 --> 02:11:04,800
युक्त की पूजा हो सकती है तो फिर यह दिक्कत आएगी वो भगवान ही नहीं रहेंगे हां आप

1872
02:11:04,800 --> 02:11:09,040
एक जो है आप जैसे अन्य लोग हैं जिनमें ज्यादा दोष हैं।

1873
02:11:09,040 --> 02:11:12,240
आप किसी ऐसे की पूजा कर रहे हो जिसमें कम दोष है तो

1874
02:11:12,240 --> 02:11:16,240
फिर तो आर्य समाज की वो धारणा सिद्ध हो जाएगी। महापुरुष महापुरुष की

1875
02:11:16,240 --> 02:11:20,240
पूजा करो महापुरुष है भगवान नहीं है ना वो सिद्ध हो जाएगा

1876
02:11:20,240 --> 02:11:24,480
और जो निर्गुण निराकार की तुलना तुलना की तो उससे क्या होगा ज्यादा

1877
02:11:24,480 --> 02:11:28,480
ज्यादा यदि आप निर्गुण या सगुण में भी दोष निकाल देंगे सगुण

1878
02:11:28,480 --> 02:11:32,560
में दोष अगर आप निकाल देंगे कि भाई सगुण निराकार

1879
02:11:32,560 --> 02:11:36,880
ईश्वर भी तो ऐसी सृष्टि की रचना कर रहा है जो जिसमें

1880
02:11:36,880 --> 02:11:41,040
दोष है तो आप अगर यह कर देंगे तो ज्यादा से ज्यादा यह होगा कि आप

1881
02:11:41,040 --> 02:11:45,280
संसार को नास्तिक बना देंगे। आपका ईश्वर आपने सिद्ध नहीं किया। सामने

1882
02:11:45,280 --> 02:11:49,440
वाले का ईश्वर आपने खंडित कर दिया तो ईश्वर है ही नहीं। है ना? ये

1883
02:11:49,440 --> 02:11:53,440
दो पक्ष और विश्वजीत वाले बता दिया मैंने

1884
02:11:53,440 --> 02:11:57,440
कि आवश्यकता का खंडन आवश्यकता और विकार के जो दो पॉइंट है उनका मैंने

1885
02:11:57,440 --> 02:12:01,520
खंडन किया। अब आप पक्ष रखें। भैया मैंने भी एक पक्ष दिया

1886
02:12:01,520 --> 02:12:03,920
था।

1887
02:12:03,920 --> 02:12:08,800
हर्ष जी आपने क्या पक्ष लिया था?

1888
02:12:08,800 --> 02:12:12,800
मैंने बताया था ना कि वो तो कर्मों में लिप्त नहीं होते। जब कर्म में लिप्त नहीं होते

1889
02:12:12,800 --> 02:12:16,880
तो उनको कर्म का दोष नहीं लग सकता। जब कर्म का दोष नहीं लग सकता तो वो ये

1890
02:12:16,880 --> 02:12:20,960
प्रमाण से आपने लिया है। वो कर्मों में लिप्त नहीं होते। प्रश्न ये पूछा जा रहा है कि

1891
02:12:20,960 --> 02:12:25,680
हम कैसे समझे कि वो जब कीड़ा मर रहा है तो क्या हो रहा है? उसको क्या समझे?

1892
02:12:25,680 --> 02:12:29,760
यह प्रमाण से आपने दिया है। उसको मतलब प्रमाण और

1893
02:12:29,760 --> 02:12:33,760
युक्ति नहीं है उसमें। उसको समझना भी है ना थोड़ा सा कि भाई

1894
02:12:33,760 --> 02:12:38,320
भगवान वो जो कीड़ा मर रहा है हमने वहां से देख लिया

1895
02:12:38,320 --> 02:12:42,320
क्या मैं कर्मों में लिप्त अच्छा कोई व्यक्ति अगर और कोई व्यक्ति ये कह देगा कि

1896
02:12:42,320 --> 02:12:47,440
मैं कर्मों में लिप्त नहीं होता तो क्या उसकी बात को ये मान लिया जाए

1897
02:12:47,440 --> 02:12:51,840
है ना और समझिए गीता में ही कहा गया है कि तू तो यह समझ

1898
02:12:51,840 --> 02:12:56,000
कहा जा रहा है कि गुण ही गुण में बरत रहे हैं तू कुछ नहीं करता

1899
02:12:56,000 --> 02:13:00,400
तो लो दुनिया में किसी भी व्यक्ति को

1900
02:13:00,400 --> 02:13:04,480
फिर पाप ही नहीं कहा जा सकता क्योंकि भगवान ने कहा तू ऐसा समझ कि

1901
02:13:04,480 --> 02:13:08,640
मैंने कुछ किया ही नहीं है। कर्तापन के लिए कहा है ना भगवान

1902
02:13:08,640 --> 02:13:12,720
ने कि गुण ही गुण में बरत रहे हैं। ऐसा समझना

1903
02:13:12,720 --> 02:13:17,120
चाहिए तो ये दिक्कत आएगा तो

1904
02:13:17,120 --> 02:13:23,120
तो ही दोष आता है। जब कर्तापन आता है तभी दोष आता है।

1905
02:13:23,840 --> 02:13:27,840
तो तो फिर फिर हम किसी को पापी कह ही नहीं सकते।

1906
02:13:27,840 --> 02:13:31,920
फिर तो पाप तो स्वेच्छा से लोग करते हैं

1907
02:13:31,920 --> 02:13:36,240
ना तो वो जब स्वेच्छा आ जाता है पाप से तो तो कर्ता

1908
02:13:36,240 --> 02:13:40,480
में बंध गया वो वो खुद स्वयं अपने को कर्ता समझता है अज्ञान के

1909
02:13:40,480 --> 02:13:45,520
कारण ना वो अपने को कर्ता समझता है तो उसमें विकार और दोष उत्पन्न हो जाता है

1910
02:13:45,520 --> 02:13:49,600
नहीं वो कर्ता समझता है यदि प्रत्येक व्यक्ति

1911
02:13:49,600 --> 02:13:53,680
को हम गीता के आधार पर यह मानने लगे कि कोई कोई

1912
02:13:53,680 --> 02:13:57,760
कार्य नहीं कर रहा है बल्कि गुण ही गुण में बरत रहे हैं वस्तु

1913
02:13:57,760 --> 02:14:01,840
जो जीव है वो नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त है नैन चिंदती

1914
02:14:01,840 --> 02:14:06,080
शस्त्राण है ना तो क्या

1915
02:14:06,080 --> 02:14:10,160
कहते हैं जब हम इसको ही मान तो किसी को भी पाप नहीं लगेगा तो

1916
02:14:10,160 --> 02:14:14,240
इसलिए अभी बात क्या है कि मैं इस पर फोकस कर रहा हूं कि हम जब

1917
02:14:14,240 --> 02:14:18,240
वो कीड़ा मर रहा है तो उसको हम कैसे समझे कि वो कीड़े का दोष नहीं

1918
02:14:18,240 --> 02:14:22,480
जा रहा है भगवान पर ये प्रमाण से आप हमने जान लिया कि भगवान

1919
02:14:22,480 --> 02:14:26,560
जो है परे हैं उनको दोष नहीं लगता है ठीक है वो परे हैं

1920
02:14:26,560 --> 02:14:30,800
मगर अगर इसको प्रैक्टिकली हम कैसे समझे कि ये जो कीड़ा मरा इसका दोष भगवान

1921
02:14:30,800 --> 02:14:36,640
को नहीं लग रहा है। युक्ति क्या है इसमें? वो युक्ति मिस हो रही है।

1922
02:14:36,640 --> 02:14:39,040
ठीक है। सब यही बताएं। उन्मेश

1923
02:14:39,040 --> 02:14:41,600
जी बोले

1924
02:14:41,600 --> 02:14:45,760
जी नारायण। तो पहले तो मैं मुझे जो अब तक समझ में आया वो

1925
02:14:45,760 --> 02:14:50,400
मैं एक मिनट में कह दूं या सही में समझा हूं या नहीं। तो निराकार

1926
02:14:50,400 --> 02:14:54,800
पक्ष से यह बात रखी गई कि साकार वालों

1927
02:14:54,800 --> 02:14:58,800
के लिए कि विकार इत्यादि उसमें होता है भगवान में तो वो पूर्णम

1928
02:14:58,800 --> 02:15:03,040
नहीं है तो उसे भगवान ईश्वर नहीं कह सकते तो उसके ऊपर साकार पक्ष

1929
02:15:03,040 --> 02:15:07,040
ने ये कहा कि अंतिमतः निराकार जो रूप है

1930
02:15:07,040 --> 02:15:11,040
उसका वो तो सृष्टि तो बनाने वाला है तो उस दृष्टि से उसमें

1931
02:15:11,040 --> 02:15:15,440
भी विकार आ जाएगा। तो जैसा अभी शिवशु भैया ने कहा कि

1932
02:15:15,440 --> 02:15:19,520
जो अदरवाइज भी हमारी बात होती है ना कि मैं गलत होने

1933
02:15:19,520 --> 02:15:23,680
से आपका सही सिद्ध नहीं होगा तो निराकार में भी विकार है

1934
02:15:23,680 --> 02:15:27,680
इसके इस कारण से साकार में विकार होना समर्थित

1935
02:15:27,680 --> 02:15:31,760
नहीं होगा सिद्ध नहीं होगा और स्वीकार कर भी लिया साकार में विकार होना

1936
02:15:31,760 --> 02:15:35,760
तो फिर वही बात आ जाएगी कि ईश्वर का खंडन ही हो जाएगा ईश्वरत्व ही नहीं बचेगा

1937
02:15:35,760 --> 02:15:39,760
वहां तो अभी इस स्वीकार के मामले में साकार पक्ष

1938
02:15:39,760 --> 02:15:43,840
से युक्ति प्रस्तुत करनी है ठीक यही बात है।

1939
02:15:43,840 --> 02:15:47,840
बिल्कुल जी और आवश्यकता कही गई है तो

1940
02:15:47,840 --> 02:15:51,920
उसका खंडन किया गया है कि भगवान अगर अवतार नहीं लेगा तो ऐसा

1941
02:15:51,920 --> 02:15:54,320
हो जाएगा वैसा हो जाएगा।

1942
02:15:54,320 --> 02:15:58,480
और दीक्षा निराकार रूप में होते हुए वो दे सकता है।

1943
02:15:58,480 --> 02:16:02,640
ठीक है तो आवश्यकता नहीं है उसकी आने जाने की। जी जी पक्ष

1944
02:16:02,640 --> 02:16:06,880
रखा था साकार पक्ष रखा। तो अब आप इन दोनों बिंदुओं पे रखें बात। हां जी।

1945
02:16:06,880 --> 02:16:11,040
तो पहली बात तो इसमें एक बात और जोड़ लें। हर्ष जी ने एक बात और कही है कि भाई वो

1946
02:16:11,040 --> 02:16:15,680
कर्मों को करते हुए भी अकर्ता है क्योंकि गीता में लिखा है। ठीक है?

1947
02:16:15,680 --> 02:16:19,840
मगर फिर यहां वो दूसरी बातें आ जाएंगी कि प्रमाण को कौन मानता है? कौन नहीं मानता

1948
02:16:19,840 --> 02:16:23,920
है? तो एक तो ये वाली बात भी आएगी। तो इसलिए हमें अब युक्ति को

1949
02:16:23,920 --> 02:16:29,440
ले भी चलना होगा। है ना? तो युक्ति आप बताएं। जी।

1950
02:16:29,440 --> 02:16:33,760
तो अभी पहले तो बात ये आ जाती है कि अ मैं थोड़ा सा विचार

1951
02:16:33,760 --> 02:16:37,840
कर रहा हूं कि डायरेक्ट काउंटर करूं या मूल में ही घुस जाऊं।

1952
02:16:37,840 --> 02:16:41,920
तो मैं पूछता हूं यदि शिवांशु जी आपको वो मैंने

1953
02:16:41,920 --> 02:16:46,080
पाथ नहीं छोड़ा है ऐसा लगे तो आगे जाएंगे नहीं तो मैं सीधी युक्ति दे

1954
02:16:46,080 --> 02:16:50,320
दूंगा मैं मूल में ही घुसना चाह रहा था निराकार पक्ष के लिए अभी आपके

1955
02:16:50,320 --> 02:16:54,560
लिए कि आप निराकार और निर्गुण मानते हो केवल मानते हो केवल वो निराकार

1956
02:16:54,560 --> 02:16:58,960
है केवल निर्गुण है सगुण साकार है ही नहीं तो पहली तो चीज यह है

1957
02:16:58,960 --> 02:17:03,520
कि निराकार और निर्गुण की व्याख्या आप क्या करते हो यह मेरा प्रश्न होगा

1958
02:17:03,520 --> 02:17:07,840
यदि ठीक है तो आगे जाएंगे नहीं तो डायरेक्ट युक्ति दे देंगे निराकार

1959
02:17:07,840 --> 02:17:09,360
और निर्गुण का मतलब क्या मानते

1960
02:17:09,360 --> 02:17:13,440
हो आप? यह मेरा पक्ष है। निराकार का मतलब मानते

1961
02:17:13,440 --> 02:17:17,680
हैं जो जो दृष्टि का विषय ना हो। हम

1962
02:17:17,680 --> 02:17:22,320
ठीक है? निराकार का और निर्गुण का मतलब जो व्यवहार में ना आ सके।

1963
02:17:22,320 --> 02:17:26,400
अच्छा तो आप अभी स्वयं को निर्गुण

1964
02:17:26,400 --> 02:17:32,080
निराकार मान रहे हो या सगुण साकार मान रहे हो। आप कैसे हो अभी?

1965
02:17:32,080 --> 02:17:36,080
अभी मैं अपने आप को सगुण साकार मान रहा हूं। मान रहा हूं। तो यदि

1966
02:17:36,080 --> 02:17:40,480
आप सगुण साकार है स्वयं को मान रहे हैं और वह सत्य भी है तो निर्गुण

1967
02:17:40,480 --> 02:17:44,480
निराकार का जो रूप वहां बैठा है वह बैठा है ऐसा भी नहीं कह सकते

1968
02:17:44,480 --> 02:17:48,640
जो निर्गुण निराकार रूप है परमेश्वर का वो है

1969
02:17:48,640 --> 02:17:54,000
ये आपको कैसे पता चला युक्ति पर

1970
02:17:54,000 --> 02:17:58,000
वो है निर्गुण निराकार स्वरूप ये तो

1971
02:17:58,000 --> 02:18:01,760
मुझे शब्द प्रमाण से ही पता चला

1972
02:18:01,760 --> 02:18:06,240
प्रमाण से और प्रातिभाषिक सत्य से प्रातिभाषिक के अनुभव से

1973
02:18:06,240 --> 02:18:10,320
हां वो अभी हम प्रमाण को अभी नहीं लेंगे शायद कदाचित यदि आपने ये

1974
02:18:10,320 --> 02:18:14,480
बोला है तो तो वो युक्ति क्या है वो प्रातिभाषिक सत्य क्या है जिससे

1975
02:18:14,480 --> 02:18:19,200
वो युक्ति है युक्ति ये है कि मेरे मन में सच्चिदानंद

1976
02:18:19,200 --> 02:18:24,480
की चाह विद्यमान है हम है ना जी

1977
02:18:24,480 --> 02:18:28,480
और सच्चिदानंद से जो है ये सिद्ध होता है चाह

1978
02:18:28,480 --> 02:18:32,560
विद्यमान है तो सच्चिदानंद का विषय है और सच्चिदानंद का विषय है

1979
02:18:32,560 --> 02:18:36,800
तो सच्चिदानंद है युक्ति यह है कि इसका मतलब इस दुनिया में कोई नित्य

1980
02:18:36,800 --> 02:18:41,360
शुद्ध मुक्त बुद्ध है। हम

1981
02:18:41,360 --> 02:18:45,440
मगर आप मुझसे मेरी युक्ति पूछ के अगर जाएंगे अपने पक्ष पे तो पहले

1982
02:18:45,440 --> 02:18:49,760
मुझसे ही साकार सिद्ध करवा लेंगे आप क्योंकि मैं तो साकार का पक्षकार हूं।

1983
02:18:49,760 --> 02:18:54,720
अच्छा हां वही वही करना चाह रहा था। इस चर्चा के लिए वो नहीं होगा।

1984
02:18:54,720 --> 02:18:58,880
जी सही है। सही है। तो आप अब जो अब आर्य अगर आर्य समाज

1985
02:18:58,880 --> 02:19:02,960
की ओर से मैं दूंगा। हां। अगर आज समाज जैसे किसी विचारधारा की ओर से मैं

1986
02:19:02,960 --> 02:19:07,200
दूं तो मेरे पास जो है कि ईश्वर

1987
02:19:07,200 --> 02:19:11,440
है इसको मानने के लिए केवल इतना है कि इस दुनिया में क्रिएशन

1988
02:19:11,440 --> 02:19:15,920
है तो इसका कोई ना कोई क्रिएटर है हम है ना जी फिर

1989
02:19:15,920 --> 02:19:19,920
मैं तो उस बात को फिर वो करता हूं ना खंडन की अगर हम मान

1990
02:19:19,920 --> 02:19:24,000
रहे हैं कि पृथ्वी को कोई गोल घुमाने वाली कोई

1991
02:19:24,000 --> 02:19:28,000
शक्ति है तो हम उस शक्ति को ईश्वर क्यों

1992
02:19:28,000 --> 02:19:32,080
माने हो सकता है उस शक्ति उस शक्ति को भी किसी और शक्ति ने

1993
02:19:32,080 --> 02:19:36,080
धक्का दिया हो। हम हो सकता है उस शक्ति को भी किसी और शक्ति

1994
02:19:36,080 --> 02:19:39,520
ने धक्का दिया हो। तो पृथ्वी को घुमाने वाली शक्ति के रूप में

1995
02:19:39,520 --> 02:19:43,680
ईश्वर को स्वीकार कैसे कर पाएंगे। जी तो तो ईश्वर को स्वीकार

1996
02:19:43,680 --> 02:19:47,840
ही नहीं कर सकते। उसके पीछे के पीछे के पीछे के पीछे पता नहीं कितने और

1997
02:19:47,840 --> 02:19:52,480
डायमेंशंस हो और इसे शास्त्र में अनवस्था का दोष कहा जाता है। वो

1998
02:19:52,480 --> 02:19:56,800
इनफाइनाइट हो जाता है पीछे पीछे पीछे पीछे। हां

1999
02:19:56,800 --> 02:20:01,200
तो ये बात आ जाएगी। तो इसलिए आप जो है निराकार का खंडन ना करें।

2000
02:20:01,200 --> 02:20:05,280
आप सगुण साकार का पक्ष सिद्ध करो। ठीक। हां सही। फिर वही

2001
02:20:05,280 --> 02:20:09,280
बात वो वाली बात भी आ जाएगी जो अभी अभी चल रही थी। कि अगर मैं

2002
02:20:09,280 --> 02:20:13,600
मैं अपनी चीजों को वो कर लूंगा मान लो मैं सिद्ध नहीं कर पा रहा हूं निराकार

2003
02:20:13,600 --> 02:20:17,600
को जो कि नहीं कर सकते। क्योंकि मैं सच्चिदानंद होते हुए जब जाऊंगा

2004
02:20:17,600 --> 02:20:21,600
जब मैं सिद्ध करने ईश्वर को तो वहां ईश्वर सब कुछ कर सकता है। तो ईश्वर सब कुछ कर

2005
02:20:21,600 --> 02:20:26,160
सकता है तो वो आ गया। आ गया।

2006
02:20:26,160 --> 02:20:30,160
सही है। तो इसलिए अगर मैं ऐसे सिद्ध

2007
02:20:30,160 --> 02:20:34,160
करूंगा तो यहां पे ये दिक्कत आ जाएगी और अगर आर समाजी तरीके से अगर

2008
02:20:34,160 --> 02:20:38,560
ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करूंगा तो वहां वो अनंत वाला दोष लग जाएगा।

2009
02:20:38,560 --> 02:20:42,960
इसलिए आप जो है ईश्वर रहित संसार ना बनाएं।

2010
02:20:42,960 --> 02:20:46,960
संसार ईश्वर रहित हो जाएगा। जी इसलिए आप सगुण साकार को

2011
02:20:46,960 --> 02:20:50,960
सिद्ध करें। हम ठीक तो आपसे फिर

2012
02:20:50,960 --> 02:20:55,280
एक छोटा सा प्रश्न कदाचित मेरा यह प्रश्न भी उसी दिशा में जाएगा कदाचित

2013
02:20:55,280 --> 02:20:59,440
पूछ लेता हूं मैं नहीं तो हम फिर से पलट लेंगे रास्ता

2014
02:20:59,440 --> 02:21:03,680
आप निर्गुण निराकार तो मानते हो ईश्वर को केवल तो क्या आप

2015
02:21:03,680 --> 02:21:07,840
सगुण भी मानते हो साकार की तो आगे सगुण सगुण

2016
02:21:07,840 --> 02:21:11,840
मानते हैं सगुण निराकार होता है वो अच्छा सगुण निराकार

2017
02:21:11,840 --> 02:21:16,800
होता है तो कैसे थोड़ा सा समझाएं सगुण निराकार का मतलब सगुण

2018
02:21:16,800 --> 02:21:21,280
निराकार प्रकार जब भी कोई कार्य होगा

2019
02:21:21,280 --> 02:21:25,280
ठीक है तो कार्य होने वाले के रूप में सगुणी कहा जाएगा ना

2020
02:21:25,280 --> 02:21:29,360
उसे गुण है कार्य करने का गुण है है ना अच्छा तो मतलब

2021
02:21:29,360 --> 02:21:33,600
केवल आकार से परहेज है आकार से परहेज आकार से

2022
02:21:33,600 --> 02:21:38,800
मूर्ति पूजा से परहेज है

2023
02:21:38,800 --> 02:21:43,760
अच्छा ठीक है मूर्ति पूजा से

2024
02:21:43,760 --> 02:21:47,760
ठीक है तो हम अभी डायरेक्ट अभी वो जो विकार वाली बात थी ना उसके ऊपर युक्ति

2025
02:21:47,760 --> 02:21:52,560
दे देते हैं। ठीक है? तो ये फिर से वहां जाएगा।

2026
02:21:52,560 --> 02:21:56,640
तो विकार की जब तक बात है कि फिर से एक बार मैं कह देता हूं कि

2027
02:21:56,640 --> 02:22:00,640
निराकार पक्ष से कहा गया कि साकार यदि मानोगे तो उसमें

2028
02:22:00,640 --> 02:22:04,880
विकार इत्यादि आ जाएगा। तो फिर से तो निराकार में भी विकार है। सृष्टि

2029
02:22:04,880 --> 02:22:08,880
इत्यादि बनाता है तो कीड़े मरते हैं। तो निराकार को विकार इत सिद्ध

2030
02:22:08,880 --> 02:22:13,040
करने से साकार सिद्ध नहीं होगा। अच्छा तो बात इसमें ये आ जाती है कि

2031
02:22:13,040 --> 02:22:17,120
जो कीड़ा मर रहा है तो उसका दोष भगवान पे जाएगा या

2032
02:22:17,120 --> 02:22:21,360
नहीं जाएगा तो बात ऐसी है कीड़े

2033
02:22:21,360 --> 02:22:25,360
का मरना या किसी चीज किसी किसी भी चीज का जन्म लेना मरना

2034
02:22:25,360 --> 02:22:29,440
ये जो धरातल है ये जो लेवल है वो व्यावहारिक

2035
02:22:29,440 --> 02:22:33,680
लेवल है मूलत तो व्यवहार में वो कीड़ा जन्म ले रहा है

2036
02:22:33,680 --> 02:22:37,840
और व्यवहार व्यवहार में ही मर रहा है बात ऐसी है

2037
02:22:37,840 --> 02:22:42,000
कि ईश्वर की दृष्टि से मतलब अ पारमार्थिक दृष्टि

2038
02:22:42,000 --> 02:22:46,160
से देखेंगे इस पूरे जगत को मतलब एक छोटी सी

2039
02:22:46,160 --> 02:22:50,480
बात यहां ये आ जाएगी कि पारमार्थिक दृष्टि से देखने पर ये है ही नहीं जगत मिलेगा

2040
02:22:50,480 --> 02:22:54,480
ही नहीं वो एक अलग बात लेकिन अभी के लिए पारमारिक

2041
02:22:54,480 --> 02:22:58,720
दृष्टि से देखेंगे तो पाप हम कीड़े को मारने वाला ईश्वर को बता रहे हैं।

2042
02:22:58,720 --> 02:23:02,800
इसमें आपत्ति आ रही है कि अरे ईश्वर तो कीड़े को मारने वाला हो गया। इसमें

2043
02:23:02,800 --> 02:23:07,040
आपत्ति क्या है? सामान्य शब्दों में कि ईश्वर कीड़े को मारने

2044
02:23:07,040 --> 02:23:11,200
वाला हो गया है। इसका मतलब वो पाप का भागी बन गया और कीड़े

2045
02:23:11,200 --> 02:23:15,280
को ना मारना पुण्य का काम है। अन्यथा उसे बचाना। तो पाप और

2046
02:23:15,280 --> 02:23:19,520
पुण्य दोनों ही मूलत अस्तित्व में है ही नहीं। ईश्वर

2047
02:23:19,520 --> 02:23:23,760
की दृष्टि से परमात्मा की दृष्टि से। उसने एक वीडियो गेम

2048
02:23:23,760 --> 02:23:27,840
बनाया है। वो ये है आईटी वाला वीडियो गेम उसने

2049
02:23:27,840 --> 02:23:32,240
बनाया। उसमें उसमें मतलब शस्त्र

2050
02:23:32,240 --> 02:23:36,240
भी दिए हैं और शस्त्रों से बचने के लिए साधन भी दिए हैं। पाप भी करना,

2051
02:23:36,240 --> 02:23:40,800
पुण्य भी करना योग में कोई व्यक्ति पाप कर रहा है, कोई व्यक्ति पुण्य कर रहे हैं।

2052
02:23:40,800 --> 02:23:44,880
वो बाहर बैठा है। वो उनका मतलब पाप और पुण्य

2053
02:23:44,880 --> 02:23:49,040
का दोनों का वो निर्माता है। उसके लिए दोनों चीजें

2054
02:23:49,040 --> 02:23:53,200
है ही नहीं। तो इसलिए वो उसकी बनाई हुई जो

2055
02:23:53,200 --> 02:23:57,440
सृष्टि है जिसको हम अभी मिथ्या कहेंगे आगे। तो उस सृष्टि

2056
02:23:57,440 --> 02:24:01,520
में जो घट रहा है नहीं भी घट रहा है तो उन दोनों के

2057
02:24:01,520 --> 02:24:05,520
लिए वो उत्तरदाई नहीं कि उसने केवल सृष्टि बनाई उसके अंतर्गत जो

2058
02:24:05,520 --> 02:24:09,600
कुछ चल रहा है उसने केवल सृष्टि नहीं बनाई सृष्टि बनाने के बाद सृष्टि

2059
02:24:09,600 --> 02:24:13,680
में 100 तो लोग हैं उसने बताया ये ये करोगे तो मेरे

2060
02:24:13,680 --> 02:24:17,760
पास आ जाओगे सृष्टि से बाहर निकलोगे ये करोगे तो मुझसे

2061
02:24:17,760 --> 02:24:21,760
दूर जाओगे और उसमें जिसे

2062
02:24:21,760 --> 02:24:25,920
कहते हैं संकल्प स्वतंत्र मतलब यह अच्छा यह गलत चुनाव आपका

2063
02:24:25,920 --> 02:24:30,480
जैसा चुनाव करोगे वैसा फल पाओगे। तो यदि कोई व्यक्ति

2064
02:24:30,480 --> 02:24:34,480
उसमें से मतलब सुनामी आ गई या यह हो गया वो हो गया जिस व्यक्ति ने अपने

2065
02:24:34,480 --> 02:24:39,040
पांव से कुचल दिया कीड़े को तो उस व्यक्ति का कर्म है उसी को जाकर के मिलेगा।

2066
02:24:39,040 --> 02:24:43,120
मैंने तो उसे बनाया हुआ है केवल सृष्टि को बनाया मैंने वो मशीन बना

2067
02:24:43,120 --> 02:24:47,520
दी मैंने तो अतः मेरे ऊपर दोष नहीं आएगा और यह

2068
02:24:47,520 --> 02:24:52,000
बात चल रही है मशीन को स्वीकार करने के बाद उस सृष्टि को स्वीकार करने के बाद

2069
02:24:52,000 --> 02:24:56,240
वास्तविकता में कोई मर भी नहीं रहा है कोई जन्म भी नहीं ले रहा है

2070
02:24:56,240 --> 02:25:00,240
जो हो ही नहीं रहा है उसका दोष आप यदि मैं भगवान हूं तो

2071
02:25:00,240 --> 02:25:04,560
जो हो ही नहीं रहा है उसका दोष आप मेरे माथे पर फोड़ रहे हो

2072
02:25:04,560 --> 02:25:08,960
ये इसमें मेरा क्वेश्चन यह रहेगा

2073
02:25:08,960 --> 02:25:13,120
आपने जो चीज समझाई है मैं उसको पहले क्लियर कर दूं। हो ही नहीं रहा

2074
02:25:13,120 --> 02:25:17,120
है। प्रैक्टिकली मैं बताऊं कि जैसे कि एक चार 24 में

2075
02:25:17,120 --> 02:25:21,200
श्लोक आया है। मैं इस समय समर्थन में बात कर रहा हूं साकार

2076
02:25:21,200 --> 02:25:24,720
के। चार 24 में श्लोक आया कि जिस अर्पण में कर्ता

2077
02:25:24,720 --> 02:25:28,720
भी ब्रह्म है। सामग्री भी ब्रह्म है। क्रिया भी ब्रह्म है।

2078
02:25:28,720 --> 02:25:32,800
सब कुछ ब्रह्म है। है ना? उससे फल स्वरूप जो फल

2079
02:25:32,800 --> 02:25:36,960
है वो भी ब्रह्म ही प्राप्त होता है। हां वो ब्रह्मा समझ

2080
02:25:36,960 --> 02:25:41,440
में आता है। जो कीड़ा है वह भी ब्रह्म था।

2081
02:25:41,440 --> 02:25:45,520
यह भी तो माना जाए वो भाई जगत बनाता जो कीड़ा है उसमें वो

2082
02:25:45,520 --> 02:25:49,520
भी ब्रह्म ही है। और अगर ब्रह्म नहीं मानेंगे तो फिर

2083
02:25:49,520 --> 02:25:54,000
वो उसका जो वो सच्चिदानंद वाला स्वरूप है उसमें दोष आ जाएगा।

2084
02:25:54,000 --> 02:25:58,080
तो जब कीड़ा भी ब्रह्म है। जब क्रिया भी ब्रह्म

2085
02:25:58,080 --> 02:26:02,160
है उसको मारे जाने वाली है ना? और जब वो

2086
02:26:02,160 --> 02:26:06,160
भी ब्रह्म है जो मार जिसके पैर से वो कुचला जा रहा है। ठीक है?

2087
02:26:06,160 --> 02:26:10,160
जब ये तीनों चारों चीजें एनवायरमेंट भी ब्रह्म है वहां का। नीचे

2088
02:26:10,160 --> 02:26:14,480
मान लीजिए कीड़ा जब दबता है तो ऊपर से तो किसी कर्ता ने दबाया मगर

2089
02:26:14,480 --> 02:26:19,040
नीचे तो पृथ्वी ठोस है ना जिसके कारण जिस दो चीजों के बीच में वो पिसा

2090
02:26:19,040 --> 02:26:23,200
हम तो पृथ्वी भी ब्रह्म है। तो जब सब कुछ ब्रह्म है तो वहां क्रिया

2091
02:26:23,200 --> 02:26:27,200
का कोई स्पेसिफिकली किसी क्रिया का घटित होना सिद्ध ही नहीं हो

2092
02:26:27,200 --> 02:26:31,200
रहा है। हम तो फिर ऐसा दोष फिर इसका पाप कैसे जा सकता है?

2093
02:26:31,200 --> 02:26:35,440
तो इसी को भगवान ने कहा कि वास्तविकता में मैं परे हूं हम

2094
02:26:35,440 --> 02:26:39,600
और यहां पर वो अपने इस पारमार्थिक दृष्टि से बता रहे हैं कि समस्त कर्मों

2095
02:26:39,600 --> 02:26:40,100
को

2096
02:26:39,760 --> 02:26:43,760
करते हुए भी मैं अकर्ता हूं। हम जी मैं बंधन में नहीं

2097
02:26:43,760 --> 02:26:48,400
हूं। तो अब बात ये आती है काउंटर क्वेश्चन मेरा यह है

2098
02:26:48,400 --> 02:26:52,720
कि ब्रह्म दृष्टि से तो संसार का प्रत्येक

2099
02:26:52,720 --> 02:26:56,720
व्यक्ति कुछ भी नहीं कर रहा है। हम तो उसको दोष क्यों

2100
02:26:56,720 --> 02:27:01,200
लग रहा है? उसको पापी क्यों कहा जा रहा है? उसको विकार युक्त क्यों कहा जा रहा है?

2101
02:27:01,200 --> 02:27:05,360
अच्छा इसके लिए मैं मतलब कहने का मतलब है फिर किसी को ईश्वर

2102
02:27:05,360 --> 02:27:09,360
और फिर किसी को पापी क्यों मनुष्य क्यों कहा जा रहा है? फिर तो सब ईश्वर होगा क्योंकि

2103
02:27:09,360 --> 02:27:13,920
ब्रह्म दृष्टि से तो मनुष्य ने भी कुछ नहीं किया है।

2104
02:27:13,920 --> 02:27:17,920
है ना? जी यही है ना तो ब्रह्म दृष्टि से तो कुछ हो ही नहीं रहा है। हो ही नहीं रहा

2105
02:27:17,920 --> 02:27:22,000
है। हां सही बताइए। इसमें फिर भी वही आ जाएगा ना। इसमें

2106
02:27:22,000 --> 02:27:26,000
ऐसा हां हां जी बोलिए। पंडित जी बोलिए। और क्या

2107
02:27:26,000 --> 02:27:30,160
बोलते हैं? माया का विचार होगा। नहीं आप बात पूरी कर लीजिए अनुमय जी आप सही सही दिशा

2108
02:27:30,160 --> 02:27:34,240
में है आप अब थोड़ा एक एक

2109
02:27:34,240 --> 02:27:38,880
उस पर पहुंच रही है चर्चा अब निष्कर्ष की ओर आती जी

2110
02:27:38,880 --> 02:27:43,280
तो बात आपके काउंटर क्वेश्चन पर ऐसी है कि जब सब ब्रह्म ही है

2111
02:27:43,280 --> 02:27:47,600
ये मान लिया हमने तो तब ब्रह्म है ये क्यों मान लिया क्योंकि वो पीड़ा

2112
02:27:47,600 --> 02:27:51,680
मर मरने का दोष भगवान के ऊपर नहीं जाएगा इसलिए मान लिया

2113
02:27:51,680 --> 02:27:55,520
सब ब्रह्म ही है तो जब ब्रह्मा ही है

2114
02:27:55,520 --> 02:27:59,680
तो ये मनुष्य दृष्ट से दोष लगना, पाप लगना, धर्मशास्त्र का पूरा

2115
02:27:59,680 --> 02:28:04,160
करो, पुण्य करो। ये क्यों है? ये जो ब्रह्म मैंने माना है ये मैंने

2116
02:28:04,160 --> 02:28:08,240
मतलब साकार वालों को एक चीज थोड़ा सा खुल के बताई है। ये मेरा पक्ष नहीं

2117
02:28:08,240 --> 02:28:12,480
है। मैंने आपकी बात को थोड़ा एक्सप्लोर किया है बस।

2118
02:28:12,480 --> 02:28:16,640
जी वो पता चल गया। ये चतुर न्याय कहते हैं इसे। हम

2119
02:28:16,640 --> 02:28:20,800
चलो आप साकार वाले मानते हो ना उसको तो आपकी दृष्टि से ऐसा ऐसा ऐसा आपने बता

2120
02:28:20,800 --> 02:28:24,880
दिया। जी जी बिल्कुल। तब आप जब आपका यह प्रश्न है कि तो

2121
02:28:24,880 --> 02:28:29,200
फिर ब्रह्मा ही है तो पाप पुण्य इत्यादि की व्याख्या क्यों और कैसी

2122
02:28:29,200 --> 02:28:33,600
इसमें एक छोटा सा दृष्टांत देना चाहूंगा एक अश्व है और वो

2123
02:28:33,600 --> 02:28:37,680
मतलब पाला हुआ है पालतू अश्व है जंगल जंगल का नहीं है

2124
02:28:37,680 --> 02:28:41,840
और उसको मतलब रोज थोड़ी देर के लिए खुला छोड़ा जाता है और बाद में

2125
02:28:41,840 --> 02:28:45,920
24 में से 20 घंटे उसके गले में यह रस्सी बांधी जाती है। वो कहीं आ जा

2126
02:28:45,920 --> 02:28:50,160
नहीं सकता। चार घंटों के लिए उसे खुला छोड़ा जाता है। अब ऐसा

2127
02:28:50,160 --> 02:28:54,400
थोड़ा सा दृश्य लाइए विजुअलाइजेशन करिए तभी और मतलब आप

2128
02:28:54,400 --> 02:28:58,480
निरा करते हैं तो कि मान के चलो एक आदमी है

2129
02:28:58,480 --> 02:29:02,800
उसके हाथ में कुछ नहीं है। रस्सी नहीं कुछ नहीं है। केवल उसने उस घोड़े को

2130
02:29:02,800 --> 02:29:07,200
ऐसा गला फेरा उसका मतलब रस्सी डालने की एक्शन की उसने घोड़े

2131
02:29:07,200 --> 02:29:10,640
के गले में और वो ऐसा रस्सी पकड़ने की

2132
02:29:10,640 --> 02:29:14,640
एक्शन करके चलने लगा। वो घोड़ा उसके पीछे पीछे जाता है।

2133
02:29:14,640 --> 02:29:18,640
मैं केवल अभी समय जाएगा इसलिए मेरे पास वो वीडियो क्लिप भी है। ऐसा प्रयोग करके भी

2134
02:29:18,640 --> 02:29:22,640
देखा गया है कि घोड़ा उसके पीछे पीछे जाता है। खुद

2135
02:29:22,640 --> 02:29:26,640
को बांधा हुआ समझ के समझ कर जाता है उसके पीछे। ऐसा आप

2136
02:29:26,640 --> 02:29:31,040
YouTube पर डालोगे तो मिल जाएगा। तो ये बात है। अभी

2137
02:29:31,040 --> 02:29:35,360
मैं एक प्रश्न पूछूंगा उत्तर स्वयं ही दे दूंगा। ये प्रसंग

2138
02:29:35,360 --> 02:29:39,360
सबको समझ में आ गया कि घोड़ा वास्तविकता में

2139
02:29:39,360 --> 02:29:43,360
बंधा हुआ नहीं है। जी ठीक। तो अब प्रश्न यहां आ जाएगा तीसरा उत्तर

2140
02:29:43,360 --> 02:29:47,520
मैं दे दूंगा वो जो अश्व है वह बद्ध है या मुक्त

2141
02:29:47,520 --> 02:29:51,520
है इसके दो उत्तर हो जाएंगे वास्तविकता

2142
02:29:51,520 --> 02:29:55,840
हमारी दृष्टि से अश्व की दृष्टि से हमारी दृष्टि जो है वो रियलिटी है

2143
02:29:55,840 --> 02:30:00,880
हमारी दृष्टि हां दिख रहा है उसके गले में कुछ है नहीं वो मुक्त ही है नित्य मुक्त

2144
02:30:00,880 --> 02:30:05,200
और ये जो इस इस प्रश्न का जो दूसरा उत्तर है अश्वबद्ध है या मुक्त है

2145
02:30:05,200 --> 02:30:09,200
अश्व की दृष्टि से उत्तर हम ही देंगे बड़ा

2146
02:30:09,200 --> 02:30:13,600
आगे उसे देख रहे हैं हम उत्तर हम ही देंगे लेकिन अश्व की दृष्टि से देंगे। अश्व

2147
02:30:13,600 --> 02:30:17,600
जब तक स्वयं को बद्ध मानेगा तब तक वो बद्ध है। बद्ध

2148
02:30:17,600 --> 02:30:23,600
ही है। क्या बात है? जब तक स्वयं को बद्ध मानेगा। ये बात

2149
02:30:23,760 --> 02:30:25,680
और जब किसी दूसरे आश्रम ने उसको

2150
02:30:25,680 --> 02:30:29,760
बता दिया जैसे पंचतंत्र में होता है ना दो पशु बात करते। अरे देखो देखो तुम्हारे गल में है नहीं

2151
02:30:29,760 --> 02:30:33,920
कुछ। ऐसा देखा उसने। अरे तो वो क्षण उसका मुक्ति

2152
02:30:33,920 --> 02:30:38,160
का क्षण माना जाएगा। वास्तविकता में वो मुक्त ही था है और

2153
02:30:38,160 --> 02:30:42,240
रहेगा। लेकिन वो अपने आप को मुक्त समझना

2154
02:30:42,240 --> 02:30:47,840
अनुभव करना यह होता है मुक्ति का क्षय तो इस दृष्टि से

2155
02:30:47,840 --> 02:30:51,920
हो जाएगा स्वरूप स्वरूप को जानना तो इस दृष्टि से जीव के लिए कहा जाता है

2156
02:30:51,920 --> 02:30:56,160
वो नित्य भी है बद्ध भी है दोनों पूरी की पूरी विरोधाभासात्मक

2157
02:30:56,160 --> 02:31:00,240
चीजें है एक ही जीव के लिए कैसे कही जाती है वो अश्व है जीव

2158
02:31:00,240 --> 02:31:04,240
वहां तो मूलत वो मुक्त है स्वयं को जब तक वो

2159
02:31:04,240 --> 02:31:08,320
बद्ध मान रहा है तब तक वो बद्ध ही रहेगा वो जाएगा नहीं बहुत बढ़िया

2160
02:31:08,320 --> 02:31:12,320
बहुत बढ़िया जवाब। तो इसलिए पाप पुण्य का इंतजाम किस दृष्टि से

2161
02:31:12,320 --> 02:31:16,640
होता है? बिल्कुल बिल्कुल। तो कहने का मतलब इसको मैं थोड़ा आम

2162
02:31:16,640 --> 02:31:21,120
भाषा में एक्सप्लोर कर दूं और जी जी कि भगवान

2163
02:31:21,120 --> 02:31:25,120
ने कहा हे अर्जुन तेरे और मेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं।

2164
02:31:25,120 --> 02:31:29,440
तू जान तू नहीं जानता पर मैं जानता हूं। तो यहां खेल

2165
02:31:29,440 --> 02:31:34,080
केवल किस बात का है? कि भगवान वो है

2166
02:31:34,080 --> 02:31:38,320
जो विद्यावान है और मनुष्य

2167
02:31:38,320 --> 02:31:41,440
वह है, प्राणी वह है जो अविद्या से युक्त है।

2168
02:31:41,440 --> 02:31:45,520
तो मार मर भगवान से भी कीड़ा

2169
02:31:45,520 --> 02:31:49,520
रहा है। ब्रह्म और मर मनुष्य से भी कीड़ा रहा है। ब्रह्म

2170
02:31:49,520 --> 02:31:53,680
दृष्टि से जो है भगवान ये जानते हैं। ब्रह्म दृष्टि

2171
02:31:53,680 --> 02:31:57,840
से देखने पर क्या है कि कोई कुछ नहीं हो रहा है। कोई कीड़ा

2172
02:31:57,840 --> 02:32:02,320
नहीं मारा गया। और व्यवहारिक दृष्टि से क्या हुआ कि हां कीड़ा मारा गया। तो

2173
02:32:02,320 --> 02:32:06,400
ब्रह्म दृष्टि से ना मनुष्य के द्वारा कीड़ा मारा गया है ना ही

2174
02:32:06,400 --> 02:32:10,480
ईश्वर उनके स्वरूप के द्वारा सगुण साकार स्वरूप के द्वारा ठीक है

2175
02:32:10,480 --> 02:32:14,720
मगर व्यवहारिक दृष्टि से मनुष्य के द्वारा भी और ईश्वर

2176
02:32:14,720 --> 02:32:18,800
के द्वारा भी कीड़ा मारा गया मगर फिर जब ब्रह्म दृष्टि से किसी के द्वारा भी

2177
02:32:18,800 --> 02:32:23,040
कीड़ा नहीं मारा गया है तो

2178
02:32:23,040 --> 02:32:27,440
किसी को ईश्वर और किसी को मनुष्य

2179
02:32:27,440 --> 02:32:31,760
क्यों कहा जा रहा है इसलिए कहा जा रहा है कि ईश्वर वो है जो मैं जो ये जानता

2180
02:32:31,760 --> 02:32:35,760
है कि यह कीड़ा भी मैं ही हूं। ईश्वर वो

2181
02:32:35,760 --> 02:32:40,400
है जो ये जानता है कि ये क्रिया भी मैं ही हूं।

2182
02:32:40,400 --> 02:32:44,400
ईश्वर वो है जो ये जानता है कि कुछ नहीं मर रहा है। है

2183
02:32:44,400 --> 02:32:50,400
ना? जो ये जो इस सत्य को जानता है जो

2184
02:32:50,800 --> 02:32:54,800
अविद्या से मुक्त है उसको ईश्वर कहा गया। जिसे अपने स्वरूप का बोध

2185
02:32:54,800 --> 02:32:57,040
है वो ईश्वर है।

2186
02:32:57,040 --> 02:33:01,200
है ना? और जिसे स्वरूप का बोध नहीं है वह वहां पर पापी

2187
02:33:01,200 --> 02:33:05,360
कहा जाएगा क्योंकि उसको उसको अपने मनुष्य रूपी होने का वह प्राप्त

2188
02:33:05,360 --> 02:33:09,440
है और उसकी दृष्टि में ऐसा नहीं है कि कुछ हो ही नहीं रहा है। उसकी

2189
02:33:09,440 --> 02:33:13,760
दृष्टि में ऐसा है कि कुछ हुआ है ना जो शब्द शब्द

2190
02:33:13,760 --> 02:33:17,840
प्रमाण है प्रातिभाषिक जो है उसकी दृष्टि से उसको बार-बार बताया तो जा

2191
02:33:17,840 --> 02:33:21,920
रहा है कि कुछ नहीं हो रहा है। गुणी गुण में बरत रहे हैं। जैसे भगवान श्री कृष्ण ने कहा

2192
02:33:21,920 --> 02:33:26,400
कि गुण तुझे ऐसा समझना चाहिए कि गुणी गुण में बरत रहे हैं।

2193
02:33:26,400 --> 02:33:30,720
तो ऐसा समझने योग्य खुद को बनाना है उसके उसके पहले

2194
02:33:30,720 --> 02:33:35,040
कि गुण ही गुण में बरत रहे हैं। इस स्टेज तक पहुंचने से पहले

2195
02:33:35,040 --> 02:33:39,280
हमको अपने आप को ऐसा योग्य बनाना है कि हम ऐसा सोच पाएं। मन

2196
02:33:39,280 --> 02:33:43,280
से फील कर पाएं। है ना? बार-बार हम प्रमाण को जैसे हम कहते

2197
02:33:43,280 --> 02:33:47,360
हैं ना जैसे हमें एक उदाहरण दिया जाता है कि भाई तुम्हें अगर भगवान की ओर

2198
02:33:47,360 --> 02:33:51,520
तो एक छोटी भगवान की दिशा में आगे बढ़ना है। तो एक छोटी सी बात जरूर किया

2199
02:33:51,520 --> 02:33:55,600
करें कि दिन भर में जो भी कुछ अच्छा कार्य करें तो बोले भगवत कृपा से भगवत कृपा से।

2200
02:33:55,600 --> 02:33:59,760
तो ये क्या है कि वास्तविकता तो यही है सब भगवत

2201
02:33:59,760 --> 02:34:03,840
कृपा से हो रहा है मगर हमें फील तो नहीं हो रहा है मगर फिर

2202
02:34:03,840 --> 02:34:07,920
भी हमको जो है ये बोलना होता है अपने मन को ये बताना होता है ऑल

2203
02:34:07,920 --> 02:34:12,320
इज वेल वाली बात भगवत कृपा से भगवत कृपा से जिससे

2204
02:34:12,320 --> 02:34:16,320
हमारे जो चित्त का जो दोष है वो खत्म होते हुए एक दिन वो भगवत कृपा से

2205
02:34:16,320 --> 02:34:20,400
वाली जो सत्यता है वो वास्तविकता हो जाए अभी भगवत कृपा से हमें फील नहीं

2206
02:34:20,400 --> 02:34:24,400
हो रहा है फील वो भगवत कृपा जो है वो हमें

2207
02:34:24,400 --> 02:34:28,560
केवल शब्द प्रमाण से प्राप्त है और प्रातिभाषिक अनुमान प्रमाण से प्राप्त है।

2208
02:34:28,560 --> 02:34:32,720
मगर अभी हमें प्रत्यक्ष प्रमाण से फील नहीं हो रहा है। भगवत भगवत कृपा से ही

2209
02:34:32,720 --> 02:34:36,880
हो रहा है। है ना? मगर फिर भी हम अपने मन को ये बता रहे हैं भगवत कृपा

2210
02:34:36,880 --> 02:34:40,960
से भगवत कृपा से तो यही बात भगवान ने कही कि तू अपने मन को ये बता कि

2211
02:34:40,960 --> 02:34:45,040
सब गुण गुण ही गुण में बरत रहे हैं। बार-बार बता जिससे उसको हैबिट हो।

2212
02:34:45,040 --> 02:34:49,120
ठीक है? तो क्योंकि जो मनुष्य है जो

2213
02:34:49,120 --> 02:34:53,280
प्राणी है वह स्वयं को नहीं समझ रहा है

2214
02:34:53,280 --> 02:34:57,360
कि भाई मैं जो है मैं मुक्त हूं वो नहीं जानता

2215
02:34:57,360 --> 02:35:01,440
वो प्रत्यक्ष रूप से फील नहीं कर पा रहा है कीड़ा मैंने नहीं मारा

2216
02:35:01,440 --> 02:35:05,440
यहां कीड़ा मरा ही नहीं है ना कुछ हुआ ही नहीं वो ये फील नहीं कर पा रहा

2217
02:35:05,440 --> 02:35:09,440
है इसलिए वो पद्ध है इसलिए वो मनुष्य है वो प्राणी है

2218
02:35:09,440 --> 02:35:13,600
और ईश्वर कौन है जो सब कुछ जानता है वो जानता है कि

2219
02:35:13,600 --> 02:35:17,600
यहां कुछ नहीं मर रहा है यह कीड़ा भी मैं ही हूं सब मैं ही हूं। एवरीथिंग इज

2220
02:35:17,600 --> 02:35:21,680
मी। तो वो है। तो ये चीज समझ

2221
02:35:21,680 --> 02:35:25,760
में आई? मैं बस इसमें एक चीज और जोड़ दूंगा। बस यही अंतर है ईश्वर और मनुष्य

2222
02:35:25,760 --> 02:35:27,440
में। और अगर शब्द

2223
02:35:27,440 --> 02:35:31,440
को लेकर चल तो ब्रह्म और ईश्वर में भी क्योंकि ईश्वर को

2224
02:35:31,440 --> 02:35:35,520
इस बात का ज्ञान है कि वो ब्रह्म है। हमें इस बात का भी ज्ञान

2225
02:35:35,520 --> 02:35:39,520
नहीं है कि हम ब्रह्म है। तो ईश्वर अगर यहां

2226
02:35:39,520 --> 02:35:43,760
इस धरती पर आकर अगर बन बन रोए जाके और बोले मेरी सीता

2227
02:35:43,760 --> 02:35:47,840
कहीं देखी क्या? या युद्ध में खड़ा हो के उपदेश दे या माखन चुराए फिर

2228
02:35:47,840 --> 02:35:51,840
भी उसको इस बात का ज्ञान है कि वो ब्रह्म है। अंतर बस यही है कि हमें इस बात

2229
02:35:51,840 --> 02:35:56,720
का ज्ञान नहीं है। हम ब्रह्म नहीं है इसलिए वो ईश्वर है और हम

2230
02:35:56,720 --> 02:36:00,720
मनुष्य हैं। जी मनुष्य हैं। जी छोटी सी बात केवल जोड़ना

2231
02:36:00,720 --> 02:36:05,200
चाहूंगा जैसे हिमांशु भाई और पंडित जी ने कहा उससे ही आगे की बात

2232
02:36:05,200 --> 02:36:10,160
कि जैसा सुशुप्ति में होता है ना सुशुप्ति का मतलब होता है स्वपक्ष विरहित निद्रा

2233
02:36:10,160 --> 02:36:14,320
तो उसमें शरीर इंद्रिय, मन और बुद्धि चारों सो जाते हैं या तो विलीन हो जाते हैं।

2234
02:36:14,320 --> 02:36:18,320
हम हम में लीन हो जाते हैं। अपने स्वरूप में आठ घंटे

2235
02:36:18,320 --> 02:36:22,480
की सुशुप्ति हो गई तो हम हम में होते हैं। और मोक्ष अवस्था भी कुछ ऐसी

2236
02:36:22,480 --> 02:36:26,560
ही है। तो यहां पर भी एक शंका आ जाती है कि तो दोनों में भेद क्या है? तो यही

2237
02:36:26,560 --> 02:36:31,200
भेद है जो आप दोनों ने कहा कि सुशुप्ति में जब हम होते हैं सुशुप्त

2238
02:36:31,200 --> 02:36:35,280
में होते हुए हमें पता नहीं चलता मैं अभी सो रहा हूं। बाद में पता चलता है नींद अच्छी

2239
02:36:35,280 --> 02:36:39,440
हुई। लेकिन सुशुप्त अवस्था में नहीं पता चलता। मैं अभी सो रहा हूं। तो ये भेद

2240
02:36:39,440 --> 02:36:42,560
है मोक्षावस्था में और सुशुप्त का। जी हम बहुत

2241
02:36:42,560 --> 02:36:46,880
बढ़िया। तो अब यहां पर एक प्रश्न वैसे

2242
02:36:46,880 --> 02:36:51,680
प्रश्न तो अभी दो और हैं मगर एक प्रश्न यह आ जाएगा

2243
02:36:51,680 --> 02:36:55,600
कि

2244
02:36:55,600 --> 02:37:00,640
जब सब कुछ ईश्वर ही है। है ना?

2245
02:37:00,640 --> 02:37:05,040
तो उस पे फिर माया का पर्दा क्यों पड़ा? जब वो सब कुछ जानता

2246
02:37:05,040 --> 02:37:09,040
है, जब वो सब कुछ जानता है, तो फिर वो

2247
02:37:09,040 --> 02:37:13,280
अपने आप को बद्ध क्यों समझ रहा है? जैसे आपने घोड़े वाला उदाहरण दिया।

2248
02:37:13,280 --> 02:37:18,480
अच्छा मतलब सिर्फ निराकर से पूछ रहे हो।

2249
02:37:18,480 --> 02:37:22,560
अब तो मैं क्वेश्चन करूंगा ना। हां इन्वेस्ट

2250
02:37:22,560 --> 02:37:26,720
पता है आपको क्या है कि जब मैंने कई बार आर्य समाजियों से बातें की है। इन

2251
02:37:26,720 --> 02:37:31,120
क्वेश्चन से आने ही नहीं देते वो चर्चा को। ऐसी ऊटपटांग

2252
02:37:31,120 --> 02:37:35,280
बातें करेंगे आचार स्तर के लोग भी कि वो जो अच्छी

2253
02:37:35,280 --> 02:37:39,600
जो चर्चा हो सकती है ना एक दिशा पूर्ण वो आ ही नहीं पाती है। गड़बड़ गड़बड़

2254
02:37:39,600 --> 02:37:43,600
के या तो कर देंगे। अगर लाइव होगा तो बड़बड़ पे आ जाएंगे। अरे तुमने कर

2255
02:37:43,600 --> 02:37:48,400
क्या लिया? हमने क्रांतिकारी बनाए हैं। ये है वो है। वो जो जो

2256
02:37:48,400 --> 02:37:52,480
वास्तविकता में किसी निष्कर्ष की ओर हम लोग बढ़ रहे हैं आगे वो ना हो के

2257
02:37:52,480 --> 02:37:56,560
वो बूमबाम बूम होके लाइव में तो ऐसा होगा और जब

2258
02:37:56,560 --> 02:38:00,560
प्रत्यक्ष चर्चा हो रही होगी तो उसमें वो अटक जाएंगे। रील कैसेट

2259
02:38:00,560 --> 02:38:04,640
नहीं नहीं गायत्री मंत्र सही है। भले ही वो

2260
02:38:04,640 --> 02:38:08,800
क्या कहते हैं? गायत्री मंत्र का अर्थ यह है कि ईश्वर से हम कुछ मांग रहे हैं मगर फिर भी वो नहीं

2261
02:38:08,800 --> 02:38:12,960
गलत तो नहीं है गलत तो नहीं है गलत तो नहीं है तो अटक ही जाते हैं तो वो

2262
02:38:12,960 --> 02:38:17,200
जब वो वाला तर्क ही नहीं देंगे जिस पर मैं आगे बढ़ सकूं आगे का काउंटर

2263
02:38:17,200 --> 02:38:21,440
क्वेश्चन कर सकूं तो फिर मैं वहां पर कैसे वो करूं उनको

2264
02:38:21,440 --> 02:38:25,600
तो ये शुद्ध चर्चा आ ही नहीं पाती। अब जब आपने ये कहा कि जीव

2265
02:38:25,600 --> 02:38:29,920
भी ब्रह्म है और वो भी ब्रह्म है। जब इस पर आप आए तो फिर काउंटर क्वेश्चन

2266
02:38:29,920 --> 02:38:33,760
मुझे मैंने आपको मजबूर किया ना वो कहने पर जी

2267
02:38:33,760 --> 02:38:37,920
मैंने आपको मजबूर किया ना कि समस्त कर्मों को करते हुए भी भगवान

2268
02:38:37,920 --> 02:38:42,000
जो है अकर्ता कैसे प्रैक्टिकली समझाइए मुझे है ना

2269
02:38:42,000 --> 02:38:46,080
तो आपने जो है उसमें ब्री समीक्षा वो व्याख्या करते हुए ये

2270
02:38:46,080 --> 02:38:51,200
कहा मगर वो लोग मुझे मौका ही नहीं देते कि मैं ये बात बोलूं तो मुझे काउंटर करें

2271
02:38:51,200 --> 02:38:55,200
तो मैंने आपको वहां तक पहुंचाया कि आप ये बात बोले तो अब

2272
02:38:55,200 --> 02:38:59,440
जिससे वो आगे की बात आए इससे आगे की जब आप ये कह रहे हैं कि

2273
02:38:59,440 --> 02:39:03,680
ईश्वर और मनुष्य में केवल इतना अंतर है कि मनुष्य वो

2274
02:39:03,680 --> 02:39:06,960
है जो यह समझ रहा है कि

2275
02:39:06,960 --> 02:39:11,040
क्या कहते हैं वो बद्ध है और ईश्वर वो है जो

2276
02:39:11,040 --> 02:39:15,040
ये जानता है वो बद्ध नहीं है मतलब वो मुक्त है तो इसमें फिर ये बात

2277
02:39:15,040 --> 02:39:19,120
आती है कि जब एक ही तत्व है कुल मिलाकर केवल

2278
02:39:19,120 --> 02:39:23,360
बद्ध समझना और ना समझने वाली बात है तो जो विद्यावान है

2279
02:39:23,360 --> 02:39:27,360
वो अविद्या से ग्रसित कैसे हो रहा है जहां प्रकाश है वहां

2280
02:39:27,360 --> 02:39:31,440
अंधेरा कैसे हम है ना और और

2281
02:39:31,440 --> 02:39:36,400
दूसरी बात ये आती है एक चीज और थी कि

2282
02:39:36,400 --> 02:39:40,720
जैसे कई बार इस वाले भी इस तर्क को देते हैं कि भाई

2283
02:39:40,720 --> 02:39:44,800
भगवान वो ये कैसा ब्रह्म है जैसे माया ने ढक लिया ठीक है तो

2284
02:39:44,800 --> 02:39:48,800
इसके उत्तर में तो मैं इसके उत्तर में तो मैं यह पूछता हूं

2285
02:39:48,800 --> 02:39:52,800
कि अभी हमको भगवान जैसे उनके अनुसार जो भगवान है वो

2286
02:39:52,800 --> 02:39:56,800
बैठे हैं तो वो हमें दिख क्यों नहीं रहे उनके

2287
02:39:56,800 --> 02:40:02,480
अनुसार भगवान यहां भी है ना जी भगवान हमारे बगल में खड़ा है

2288
02:40:02,480 --> 02:40:06,640
तो वो हमें दिख क्यों नहीं रहे क्यों तो उनको कहना पड़ेगा कि भैया उन्होंने

2289
02:40:06,640 --> 02:40:10,880
अपनी माया से अपने आप को छुपाया हुआ है तो ये कैसा भगवान

2290
02:40:10,880 --> 02:40:14,880
है जो माया से छिप जाता है ये नहीं आएगा जो सनातन सत्य है

2291
02:40:14,880 --> 02:40:18,960
वो तो किसी से बाधित नहीं हो सकता ना है ना तो खैर यह वाला तो

2292
02:40:18,960 --> 02:40:22,960
काउंटर ऐसे हो जाता है मगर अभी मैं पूछ रहा हूं कि जो विद्यावान

2293
02:40:22,960 --> 02:40:27,280
है वह अविद्या से युक्त कैसे हुआ जो स्वयं

2294
02:40:27,280 --> 02:40:31,280
सत स्वरूप है उसमें यह विकार कैसे आ रहा है कि वो अपने आप को बद्ध समझ

2295
02:40:31,280 --> 02:40:36,000
रहा है तो यह विरोधाभासी चीज है कैसे जहां प्रकाश है

2296
02:40:36,000 --> 02:40:40,240
जहां प्रकाश है बिल्कुल विश्वजीत जी जहां प्रकाश है वहां

2297
02:40:40,240 --> 02:40:44,640
पे अंधेरा नहीं हो सकता जहां अंधेरा है वहां प्रकाश का अस्तित्व नहीं है इसीलिए अंधेरा

2298
02:40:44,640 --> 02:40:48,880
तो अब आप इसको बताएं कि जो है ये

2299
02:40:48,880 --> 02:40:52,880
जब विद्यावान है ब्रह्म तो वो तो उसी

2300
02:40:52,880 --> 02:40:56,960
समय जिस समय वो विद्यावान है उसी समय वो अविद्या से ग्रसित हो रहा है।

2301
02:40:56,960 --> 02:41:01,440
इसको थोड़ा समझाइए कैसे समझ में नहीं आ रहा। बस

2302
02:41:01,440 --> 02:41:04,000
उससे पहले बस मैं एक लाइन कह देता हूं।

2303
02:41:04,000 --> 02:41:08,080
जी पंडित जी इसका खंडन आप भी कर देंगे तो नहीं मैं नहीं आप

2304
02:41:08,080 --> 02:41:13,120
यही बोलिए क्योंकि आप अच्छे वक्ता हैं। मैं बस एक ये लाइन बोलूंगा कि

2305
02:41:13,120 --> 02:41:17,120
मांडूक्य उपनिषद शंकर भाष्य 336 में एक

2306
02:41:17,120 --> 02:41:21,360
बहुत ही सुंदर लाइन कही है उन्होंने भाष्यकार भगवान

2307
02:41:21,360 --> 02:41:25,440
ने अविद्या लक्षणा अनादि माया ठीक है?

2308
02:41:25,440 --> 02:41:29,840
और उसका अर्थ यह होता है कि माया जो है वह अविद्या

2309
02:41:29,840 --> 02:41:33,920
रूप है और वह अनादि है ब्रह्म की तरह। ठीक है? तो वो

2310
02:41:33,920 --> 02:41:38,000
आपके पहले पार्ट का ये आंसर है जो एक लाइन में मैंने कहा है लेकिन अब

2311
02:41:38,000 --> 02:41:42,800
इसके बाद कंटिन्यू करके उमेश जी आप पूरा एक्सप्लेन कर दीजिए और जो इनके प्रश्नों का उत्तर दे दीजिए।

2312
02:41:42,800 --> 02:41:47,440
जी। तो शिवम जी आपका यह कहना है कि जो

2313
02:41:47,440 --> 02:41:52,000
ऐसा हो रहा है अभी कि वो एक ही समय में अविद्यावान भी है

2314
02:41:52,000 --> 02:41:56,000
विद्यावान भी है और अविद्यावान भी है दोनों के तो दोनों में से तो एक हो सकता

2315
02:41:56,000 --> 02:42:00,160
है तो बात ऐसी है कि और जो इस वाला जो है वो भी थोड़ा सा

2316
02:42:00,160 --> 02:42:04,240
ले लेते हैं इसमें कि अविद्यावान होना मतलब क्या माया का आवरण पड़

2317
02:42:04,240 --> 02:42:08,240
जाना माया का माया के प्रभाव में आ जाना तो बात ऐसी है कि पहले

2318
02:42:08,240 --> 02:42:12,240
तो यह समझना होगा माया है क्या सीधी सी भाषा में अभी

2319
02:42:12,240 --> 02:42:16,480
कहेंगे तो या संस्कृत का थोड़ा सा व्याकरण का इसमें पार्ट आ जाता है या

2320
02:42:16,480 --> 02:42:19,840
मां हिंदी में समझा देता हूं या मतलब जो

2321
02:42:19,840 --> 02:42:23,840
और मां मतलब नहीं है तो थोड़ा अधिक व्याकरण में नहीं घुसूंगा

2322
02:42:23,840 --> 02:42:28,000
जो नहीं है उसको कहते हैं माया ये तो हो गया एक शब्द में बात

2323
02:42:28,000 --> 02:42:32,160
अब ऐसी है कि एक कमरा है उस कमरे में बहुत प्रकाश भी

2324
02:42:32,160 --> 02:42:36,400
नहीं है और बहुत ज्यादा अंध अंधेरा भी नहीं है इस ऐसे कमरे

2325
02:42:36,400 --> 02:42:40,480
में एक रस्सी पड़ी हुई है और उस रस्सी के सामने से कोई आदमी गुजर

2326
02:42:40,480 --> 02:42:44,560
रहा है तो वो रस्सी को देखने के बाद उसे हो गया अरे ये तो सर्प है

2327
02:42:44,560 --> 02:42:48,720
वो भागा उसे पसीना आ गया हार्ट हार्ट बीट्स उसके बढ़ गए इत्यादि

2328
02:42:48,720 --> 02:42:52,800
इत्यादि अब उस प्रसंग के ऊपर हमें विचार करना है जिससे

2329
02:42:52,800 --> 02:42:56,960
हमें माया समझ में आ जाएगी और माया समझ में आ जाने के बाद इसका पता चल जाएगा

2330
02:42:56,960 --> 02:43:01,120
कि वो साइमलटेनियसली दोनों कैसे हैं विद्यावान भी अविद्या तो

2331
02:43:01,120 --> 02:43:05,120
माया क्या है वास्तविकता में वहां है रस्सी

2332
02:43:05,120 --> 02:43:09,200
उस व्यक्ति का जो आय कांटेक्ट हो रहा है वो रस्सी में इसमें एक प्रश्न

2333
02:43:09,200 --> 02:43:13,520
ध्यान रखिएगा पंडित जी एक प्रश्न ध्यान रखिएगा कि साइमलटेनियस

2334
02:43:13,520 --> 02:43:17,600
जो एक साथ दोनों विपरीत चीजें कैसे वो उसका जवाब तो चल ही रहा है

2335
02:43:17,600 --> 02:43:22,320
और आगे ये कि जो ब्रह्म है वो ब्रह्म ब्रह्म कैसा जो जो है

2336
02:43:22,320 --> 02:43:26,640
माया से जाता है हां वो आगे वो आगे वो तो आगे आ जाएगा

2337
02:43:26,640 --> 02:43:30,640
अभी एक समय वाली बात का उत्तर चल रहा है जी हां जी वो एक समय के बाद वो

2338
02:43:30,640 --> 02:43:34,720
आगे आ जाएगा सही बात है तो उस

2339
02:43:34,720 --> 02:43:35,220
व्यक्ति

2340
02:43:34,960 --> 02:43:39,120
का जो आय कांटेक्ट है वो रस्सी से ही हो रहा है रस्सी से ही होगा

2341
02:43:39,120 --> 02:43:43,120
क्योंकि वहां रस्सी ही है वास्तविकता में आय कांटेक्ट रस्सी से

2342
02:43:43,120 --> 02:43:47,680
हो जाने के बाद भी उसे यहां ज्ञान हो रहा है सर्प का। ये थोड़ा

2343
02:43:47,680 --> 02:43:52,160
101 मिनट की प्रोसेस है समझाने के लिए। अभी वो स्किप कर करेंगे हम। न्याय दर्शन लाना पड़ेगा।

2344
02:43:52,160 --> 02:43:56,320
थोड़ा अभ्यास का कांसेप्ट आता है उसमें क्योंकि पहले के एक्सपीरियंस के हिसाब से फिर अभी एक्सपीरियंस कर रहे हैं।

2345
02:43:56,320 --> 02:44:00,320
सारी चीजें हैं। अभ्यास भी आता है और उसे न्याय दर्शन के एक कांसेप्ट भी है। वो

2346
02:44:00,320 --> 02:44:04,320
मतलब बहुत सारा टेक्निकल विषय आ जाता है न्याय वैशेषिक दर्शन का। ठीक? तो

2347
02:44:04,320 --> 02:44:08,320
आई कॉन्ट्रैक्ट रस्सी से हो रहा है और उसे ज्ञान हो रहा है सर्प का।

2348
02:44:08,320 --> 02:44:12,400
बिल्कुल। तो बात ऐसी ही आ जाती है इसमें सत और असत ये दो शब्द

2349
02:44:12,400 --> 02:44:16,480
हमें पहले समझने हैं। सत मतलब अस्तित्व जिसका है वो और

2350
02:44:16,480 --> 02:44:20,800
असत मतलब जिसका अस्तित्व ही नहीं है। ये थोड़ा सा समझा देंगे एक मिनट में।

2351
02:44:20,800 --> 02:44:25,200
जैसे शास्त्रों में शब्द आते हैं शश श्रृंग ख पुष्प या वंध्या पुस्तक।

2352
02:44:25,200 --> 02:44:29,760
शश माने खरगोश रैबिट और श्रृंग मतलब उसका जो सिंह होता है वो

2353
02:44:29,760 --> 02:44:34,000
वो मस्तक पे जो होता है तो शश अस्तित्व में है कहीं ना कहीं

2354
02:44:34,000 --> 02:44:38,160
किसी ना किसी पशु का सिंह भी अस्तित्व में है परंतु शश का सिंह

2355
02:44:38,160 --> 02:44:42,160
शश का श्रृंग इसकी बात करेंगे तो वो अस्तित्व में है ही नहीं

2356
02:44:42,160 --> 02:44:46,160
था अभी नहीं है आगे भी नहीं होगा वध्या का पुत्र वंध्या स्त्री

2357
02:44:46,160 --> 02:44:50,080
प्रारब्ध कहीं ना कहीं अस्तित्व में है किसी ना किसी मातृशक्ति का पुत्र

2358
02:44:50,080 --> 02:44:54,320
भी है लेकिन वंध्या स्त्री का पुत्र यह जो पदार्थ है ये केवल

2359
02:44:54,320 --> 02:44:58,400
नाम है यह पदार्थ नहीं है विश्व में नहीं था नहीं है नहीं

2360
02:44:58,400 --> 02:45:02,640
होगा ख पुष्प ख माने आकाश आकाश मतलब अभी

2361
02:45:02,640 --> 02:45:06,800
स्पेस ले लेंगे और पुष्प माने फूल तो आकाश है फूल है

2362
02:45:06,800 --> 02:45:10,800
आकाश में उगने वाला आकाश में विकसित होने वाला पुष्प पदार्थ

2363
02:45:10,800 --> 02:45:14,880
नहीं है केवल शब्द है जैसा गुरुदेव कहते हैं धर्मनिरपेक्ष केवल शब्द है पदार्थ नहीं

2364
02:45:14,880 --> 02:45:19,040
है उस दृष्टि से तो ये केवल शब्द हो गए तो इनको

2365
02:45:19,040 --> 02:45:23,120
कहते हैं असत माने एकिस्टेंस में ना होने

2366
02:45:23,120 --> 02:45:27,120
वाले और इसके के विपरीत हो जाता है सत एक्सिस्ट। अभी

2367
02:45:27,120 --> 02:45:31,440
हम व्यावहारिक रूप से बात कर रहे हैं सर्प और के सर्प और रस्सी के बारे में।

2368
02:45:31,440 --> 02:45:35,520
तो व्यावहारिक रूप से अभी हम कहेंगे सत कौन है? अस्तित्व में कौन है?

2369
02:45:35,520 --> 02:45:40,000
रस्सी। और रस्सी के ऊपर जो दिख रहा है वो वो जो है सर्प

2370
02:45:40,000 --> 02:45:44,000
वो उसे क्या कहेंगे? ये अभी यहां प्रश्न है। उसे

2371
02:45:44,000 --> 02:45:48,480
सत कहेंगे या असत कहेंगे? सर्प को व्यावहारिक दृष्टि से अभी रस्सी

2372
02:45:48,480 --> 02:45:52,560
अगर अगर हम वीडियो गेम वाला क्वेश्चन घुमा के पूछ लिया आपसे

2373
02:45:52,560 --> 02:45:57,200
वीडियो गेम वाला क्वेश्चन। हम यदि यदि

2374
02:45:57,200 --> 02:46:01,360
यदि हम वो व्यक्ति नहीं है जो उससे प्रभावित हुआ है हम और

2375
02:46:01,360 --> 02:46:05,280
यदि हम ये जानते हैं कि वो सर्प नहीं है वो रस्सी है हम तो हम

2376
02:46:05,280 --> 02:46:09,440
उस सर्प शब्द को वहां पर कहेंगे क्या कहते

2377
02:46:09,440 --> 02:46:13,440
हैं अविद्या माया क्या कहेंगे असत हां असत

2378
02:46:13,440 --> 02:46:17,920
जी नहीं वो दो मैं वो भी बता रहा हूं वो दोनों नहीं कह सकते बात ऐसी है

2379
02:46:17,920 --> 02:46:21,920
कि दो ही पक्ष है या तो हम सर्प को सत कह सकते हैं या तो असत कह

2380
02:46:21,920 --> 02:46:26,080
सकते हैं तीसरा तो है सच कह कह सकते हैं या नहीं इसके

2381
02:46:26,080 --> 02:46:30,240
ऊपर बात करेंगे। सर्प को सच नहीं कह सकते। व्याहारिक दृष्टि से सत्य

2382
02:46:30,240 --> 02:46:34,240
क्योंकि यदि उसे अभी सर्प देखने पर देखने के बाद कोई छूने

2383
02:46:34,240 --> 02:46:38,400
के लिए जाएगा नहीं वैसे तो लेकिन अभी अभी के लिए उसे कोई छूता है

2384
02:46:38,400 --> 02:46:42,560
तो वो उसको डसेगा नहीं क्योंकि वो है ही नहीं ना भास्कर में रस्सी

2385
02:46:42,560 --> 02:46:46,720
है। मान के चलो रस्सी में कुछ कांटा लगा है। वो कांटा उसे ऐसा है हो गया

2386
02:46:46,720 --> 02:46:51,360
पिन हो गया। उसे लगा सर आपने मुझे डसा है। ठीक है। लेकिन उसे बीच नहीं चढ़ेगा।

2387
02:46:51,360 --> 02:46:55,360
हां यह एक अलग चैप्टर खुल जाएगा कि मन की शक्ति है तो विष चढ़ेगा

2388
02:46:55,360 --> 02:46:59,600
इत्यादि वो अलग बात ऐसे प्रयोग भी हुए हैं पाश्चात्य देशों में अभी के लिए

2389
02:46:59,600 --> 02:47:04,160
तो उसको सत नहीं कह सकते क्योंकि वो डसता नहीं है सर्प

2390
02:47:04,160 --> 02:47:08,400
ठीक है तो सत नहीं कह सकते और अब दूसरा पक्ष होगा असत कहेंगे तो उसे

2391
02:47:08,400 --> 02:47:12,400
तो असत भी नहीं कह सकते क्योंकि वास्तविकता में यदि

2392
02:47:12,400 --> 02:47:16,560
उस व्यक्ति को सर्प दिख जाता वास्तविकता में तो उसकी जैसे-जैसे

2393
02:47:16,560 --> 02:47:20,480
रिएक्शन हो जाती उसके उसको पसीना आ जाता है वो भाग जाता हार्ट बीट्स बढ़

2394
02:47:20,480 --> 02:47:24,640
जाते वही सेम टू सेम रिएक्शन अभी उसकी हो

2395
02:47:24,640 --> 02:47:28,800
रही है रस्सी को देखने के बाद तो इसलिए वह जो दिख रहा है जो कुछ दिख

2396
02:47:28,800 --> 02:47:32,800
रहा है उस व्यक्ति के दृष्टिकोण से सर पर वो असद भी नहीं है क्योंकि वो

2397
02:47:32,800 --> 02:47:36,960
है चाहे उस उसकी दृष्टि से ही सही

2398
02:47:36,960 --> 02:47:40,960
लेकिन है और उसके जो परिणाम है ना वो परिणाम तो सत वाले है ना

2399
02:47:40,960 --> 02:47:45,520
उसके वास्तविक शरीर में परिणाम हो रहे हैं हार्ट बीट्स बढ़ गए उसके हां तो मैंने

2400
02:47:45,520 --> 02:47:49,600
मैंने मैंने असल में मैंने मुक्त की दृष्टि से कहा है जो उससे प्रभावित नहीं

2401
02:47:49,600 --> 02:47:53,760
हुआ है जो ये जानता वो मतलब उसने छू के मान लीजिए उसने छू के देखा

2402
02:47:53,760 --> 02:47:58,000
हुआ है। मैंने उस दृष्टि से आपको कहा कि वो असत है। उसको सर्प कहना

2403
02:47:58,000 --> 02:48:02,400
सर्प संज्ञा ठीक है। तो उस दृष्टि से कह सकते हैं। उस दृष्टि से ठीक है। हां

2404
02:48:02,400 --> 02:48:06,560
तो अभी वो अभी ये आ गया कि वो जो सर्प है वो सत भी

2405
02:48:06,560 --> 02:48:10,880
नहीं है। असत भी नहीं है। दोनों नहीं कह सकते। लेकिन कुछ तो है ना वो।

2406
02:48:10,880 --> 02:48:15,040
दोनों नहीं तो क्या है? तो उसमें एक शब्द आता है शास्त्रों में जी। उसे कहते

2407
02:48:15,040 --> 02:48:19,280
हैं अनिर्वचनीय माया। अनिर्वचनीय शब्द का ही अर्थ होता है वचनीय

2408
02:48:19,280 --> 02:48:23,280
या निर्वचनीय इस संस्कृत शब्द का अर्थ होता है जो शब्दों में

2409
02:48:23,280 --> 02:48:27,280
पिरोया जा सके जिसे शब्दों में पिरोया ही

2410
02:48:27,280 --> 02:48:31,440
नहीं जा सकता सत भिन असि लेकिन वो कुछ तो है मतलब उसे

2411
02:48:31,440 --> 02:48:35,920
कहते हैं अनिर्वचनीय तो माया ऐसी है अब बात आ जाएगी

2412
02:48:35,920 --> 02:48:40,080
विद्यावान और अविद्यावान साइमलटेनियसली कैसे है दोनों तो मैं

2413
02:48:40,080 --> 02:48:44,080
परमात्मा हूं माया कौन है मेरी शक्ति है

2414
02:48:44,080 --> 02:48:48,160
हां बिल्कुल अब इधर अद्वैतवादी कूद जाएंगे

2415
02:48:48,160 --> 02:48:52,160
तो आ गया द्वैत आ गया अद्वैत का खंडन हो गया तो इन छोटा सा

2416
02:48:52,160 --> 02:48:56,400
उनका खंडन करते हम करते चले हम एक मिनट में एक वाक्य में कि

2417
02:48:56,400 --> 02:49:00,720
शक्ति हो जैसे पूज्य गुरुदेव भगवान की ही वाणी है शक्ति अपने

2418
02:49:00,720 --> 02:49:04,880
अस्तित्व से अपने शक्तिमान को सद्वितीय नहीं करती जैसे

2419
02:49:04,880 --> 02:49:09,120
अग्नि है अग्नि में दाहिका शक्ति विद्यमान है तो

2420
02:49:09,120 --> 02:49:13,280
दाहिका शक्ति मान के चलिए अग्नि से निकाल ली जाए तो अग्नि ही कहां बचेगा वो

2421
02:49:13,280 --> 02:49:17,360
कुछ बचेगा नहीं वहां बिल्कुल तो अग्नि और अग्नि में जो शक्ति है वो एक

2422
02:49:17,360 --> 02:49:21,360
ही है लेकिन लक्षण स्वरूप भूत लक्षण एक

2423
02:49:21,360 --> 02:49:25,600
ही है दोनों का शक्तिमान है वो शक्ति और शक्तिमान शक्तिमान

2424
02:49:25,600 --> 02:49:29,840
में ऐसी क्षमता है कि वो अपनी जो कैपेसिटी इसप मैं भी मैं एक

2425
02:49:29,840 --> 02:49:34,400
थोड़ा मेरे जो उदाहरण होते हैं वो वैसे होते हैं थोड़े से सामने वो थोड़ा

2426
02:49:34,400 --> 02:49:38,640
कार्टून वाले हां मैं मैं सोच जानबूझकर

2427
02:49:38,640 --> 02:49:43,040
ऐसा बहुत वैसे उदाहरण देता हूं जिससे सामने वाले को बहुत

2428
02:49:43,040 --> 02:49:47,440
सरलता से समझ में भी आए और वो व्यत्मक रूप से भी उसको देख सके।

2429
02:49:47,440 --> 02:49:51,600
जी जी भगवान श्री कृष्ण को तो वो मानते हैं ना कि

2430
02:49:51,600 --> 02:49:55,920
वो तो हैं कम से कम। ठीक है। हम अगर हम ऐसे मानने

2431
02:49:55,920 --> 02:50:00,320
लगेंगे कि भगवान जैसे शक्ति होने के कारण द्वैत आ गया।

2432
02:50:00,320 --> 02:50:04,720
हम तो भगवान श्री कृष्ण के दो हाथ भी हैं। हम

2433
02:50:04,720 --> 02:50:08,720
तो दो तत्व हो गए। यानी ईश्वर एक नहीं है। वहां पे भी

2434
02:50:08,720 --> 02:50:12,720
द्वैत हो गया। अब दो पैर भी है तो त्रेत हो गया।

2435
02:50:12,720 --> 02:50:16,720
फिर उनका माथा भी है ना तो क्या कहेंगे

2436
02:50:16,720 --> 02:50:20,960
उसको चतुर्थ चतुर्थक चतुर्थक कहेंगे लगा और उनका उदर भी

2437
02:50:20,960 --> 02:50:25,840
है ठीक है तो वो हो गया पंचायत

2438
02:50:25,840 --> 02:50:29,840
पंचायत हो गया उसके बाद फिर हम कहेंगे कि भाई वो मुरली भी

2439
02:50:29,840 --> 02:50:34,240
जो है वो भी वही है हम आभूषण भी वही है जी

2440
02:50:34,240 --> 02:50:38,240
हम वस्त्र भी वही है हां तो

2441
02:50:38,240 --> 02:50:43,840
कितने अहत हो जाएंगे फिर सैकड़ों तक चले जाना पड़ेगा फिर हां हां

2442
02:50:43,840 --> 02:50:47,840
और उनके केश है एक केश एक एक केश

2443
02:50:47,840 --> 02:50:51,840
जी फिर अनंत केश हां तो कितने ऐत

2444
02:50:51,840 --> 02:50:55,840
हो जाएंगे तो ये कहना कि वो शक्ति से शक्तिमान वो

2445
02:50:55,840 --> 02:50:59,920
हो जाता है हां वो हो जाता है जी वो आपने बात अभी पूरी कर

2446
02:50:59,920 --> 02:51:03,920
दी थी चोरभूत हो गया तो वो द्वैतों का

2447
02:51:03,920 --> 02:51:07,360
खंडन थोड़ा सा हो गया एक मिनट में तो बात अभी ये है

2448
02:51:07,360 --> 02:51:11,440
नहीं हुआ का खंडन नहीं हुआ द्वैत को ना मानने वालों का खंडन हुआ

2449
02:51:11,440 --> 02:51:15,680
हां वैसा को तो हम भी मानते हैं। हां वो ठीक है। मतलब

2450
02:51:15,680 --> 02:51:19,840
जो केवल द्वैत मानते हैं। अद्वैत को नहीं मानते हैं उनका खंडन हो गया। अद्वैत

2451
02:51:19,840 --> 02:51:24,000
को ना मानते हैं। जी जैसे जैसे आज के जो सगुण

2452
02:51:24,000 --> 02:51:28,080
साकार के पक्ष लोग पक्ष में जो बात कर रहे हैं वो भगवान के निर्गुण

2453
02:51:28,080 --> 02:51:32,160
स्वरूप को भी स्वीकार करते हैं। सगुण निराकार को भी स्वीकार करते हैं। जो आपने 8:00 बजे

2454
02:51:32,160 --> 02:51:36,400
पहले बात कही थी 8:30 बजे एकदम शुरू में शुरू में वही बात है। हां जी जी अवश्य

2455
02:51:36,400 --> 02:51:40,560
अवश्य जी। क्योंकि मतलब एक थोड़ा सा इसमें जोड़ दूं एक वाक्य केवल

2456
02:51:40,560 --> 02:51:44,800
कि जो केवल द्वैत मानते हैं ना तो वेदों में द्वैत अद्वैत विशिष्ट

2457
02:51:44,800 --> 02:51:48,800
अद्वैत शुद्ध्वता द्वैत अद्वैत पांचों फर्क मंत्र मिलते हैं। एक थोड़ा

2458
02:51:48,800 --> 02:51:53,040
सा मैं एक अलग बात बताता चलूं प्रसंग आ गया है तो सभी के लिए

2459
02:51:53,040 --> 02:51:57,440
बात ऐसी आ जाती है वह सभी मतलब जो मधवाचार्य के अनुयाय जी हैं मधवाचार्य

2460
02:51:57,440 --> 02:52:01,600
जी के जो कट्टर बन गए हैं अद्वैत को नहीं मानते तो उनके ऊपर बाध्यता

2461
02:52:01,600 --> 02:52:05,760
है अद्वैत को मानने की क्यों क्योंकि वो तो द्वैत को भी मानते हैं और वेद

2462
02:52:05,760 --> 02:52:09,760
में अद्वैत पर वचन भी मिल जाते हैं द्वैत पर भी मिल जाते हैं। तो अद्वैत को

2463
02:52:09,760 --> 02:52:13,760
मानते हुए द्वैत को माना जा सकता है। बिल्कुल लेकिन केवल द्वैत

2464
02:52:13,760 --> 02:52:17,920
को मानते हुए द्वैत की वो प्रेम में अद्वैत कहां बिठाएंगे असंभव

2465
02:52:17,920 --> 02:52:22,160
है तो ये बात है ठीक है तो अभी हमारी

2466
02:52:22,160 --> 02:52:22,660
बात

2467
02:52:22,400 --> 02:52:26,400
चल रही थी वो एक ही समय में विद्या अविद्यावान कैसे एक ही समय इसको लीजिए

2468
02:52:26,400 --> 02:52:31,120
आप इसको अभी अभी इसको ले लेते हैं तो

2469
02:52:31,120 --> 02:52:35,120
तो ये हमने माया को थोड़ा तो समझ लिया संक्षेप में और

2470
02:52:35,120 --> 02:52:39,520
मैं परब्रह्म हूं अभी मेरी माया शक्ति है माया शक्ति का ही नाम है माया

2471
02:52:39,520 --> 02:52:43,600
मेरी शक्ति ही है माया तो मैं बीचबीच में

2472
02:52:43,600 --> 02:52:47,600
बीचबीच में बोलते जाइए कि मान लेते हैं थोड़ी

2473
02:52:47,600 --> 02:52:51,680
देर के लिए ऐसे बोलते जाइए क्योंकि ये वहां वहां जाएगा ना

2474
02:52:51,680 --> 02:52:55,760
जब सार्वजनिक होगा हां तो तो जो वो वो होते हैं

2475
02:52:55,760 --> 02:53:00,160
ना क्या कहते हैं उनको

2476
02:53:00,160 --> 02:53:05,040
असामाजिक तत्व इसकी कटिंग बनाएंगे कटिंग बनाएंगे जी

2477
02:53:05,040 --> 02:53:09,040
बोलिए अच्छा मतलब ये मुझे संज्ञान में नहीं था ये जाएगा

2478
02:53:09,040 --> 02:53:13,120
सार्वजनिक तौर से ठीक ठीक ठीक है। इतनी अच्छी चर्चा है

2479
02:53:13,120 --> 02:53:17,120
तो जाएगी। जानी भी चाहिए। तो बात ऐसी है कि वो

2480
02:53:17,120 --> 02:53:21,280
दोनों समय में विद्यावान अविद्यावान अविद्यवान कहते हैं। यह जो आक्षेप है इसका

2481
02:53:21,280 --> 02:53:25,280
उत्तर ऐसा है कि मैं हूं परबह्म। मैं अभी के लिए तो क्या हूं?

2482
02:53:25,280 --> 02:53:29,520
विद्यावान। विद्या से युक्त हूं। विद्या से युक्त होना मेरा

2483
02:53:29,520 --> 02:53:33,520
नित्य स्वरूप है। ऐसा एक भी समय नहीं मिलेगा। जिस समय में

2484
02:53:33,520 --> 02:53:38,000
ऐसा कहा जा सके मैं अमुक अमुक समय के लिए विद्यावान नहीं हूं या विद्यावान

2485
02:53:38,000 --> 02:53:42,080
नहीं होऊंगा। ऐसा एक भी समय नहीं मिलेगा। तो मैं विद्यावान

2486
02:53:42,080 --> 02:53:46,080
होना मेरा पूरा बन गया। नित्यता आ गई उसमें। तो अब बात केवल

2487
02:53:46,080 --> 02:53:51,280
इतनी बच जाती है कि विद्यावान होते हुए भी मैं अविद्यावान कैसे बन जाता?

2488
02:53:51,280 --> 02:53:55,440
तो इसका उत्तर अभी संक्षेप में मेरी जो शक्ति है माया उस

2489
02:53:55,440 --> 02:53:59,920
माया शक्ति के प्रभाव से माया शक्ति के माया शक्ति को साधन के रूप में

2490
02:53:59,920 --> 02:54:04,320
प्रयोग में लेने के बाद ही मैं सृष्टि की संरचना कर देता हूं।

2491
02:54:04,320 --> 02:54:08,400
और जो सृष्टि में जो पाप पुण्य इत्यादि होंगे सभी ब्रह्म ही है।

2492
02:54:08,400 --> 02:54:12,960
लेकिन वो अश्व वाला उदाहरण वो सृष्टि के बारे में अभी हमें पता है क्या है?

2493
02:54:12,960 --> 02:54:15,200
बात ऐसी है कि जबजब मुझे

2494
02:54:15,200 --> 02:54:19,600
आवश्यकता प्रतीत होती है उसे मुझे उस वीडियो गेम में कूद जाना है।

2495
02:54:19,600 --> 02:54:24,240
जो अभी मिशन पूरा कर रहा है वहां खिलाड़ी तो उसे बहुत

2496
02:54:24,240 --> 02:54:28,560
ये हो रहा है। आगे नहीं जा पा रहा वो। तो उसकी मदद के लिए मुझे उसमें कूदना

2497
02:54:28,560 --> 02:54:32,960
है। तो मैं अपनी माया शक्ति तो मेरी है।

2498
02:54:32,960 --> 02:54:36,960
मैं उसका स्वामी हूं। शक्तिमान हूं। तो जब वो चीज मेरी है।

2499
02:54:36,960 --> 02:54:41,280
मेरे कंट्रोल में है। तो उस चीज के प्रभाव में आना

2500
02:54:41,280 --> 02:54:45,280
ना आना। अमुक समय तक आना, अमुक समय तक ना आना, अमुक समय तक

2501
02:54:45,280 --> 02:54:49,600
जाना और फिर उससे बाहर निकलना यह पूरी की पूरी बात मेरे कंट्रोल

2502
02:54:49,600 --> 02:54:53,760
में है। क्योंकि जिसके प्रभाव में मैं जा रहा हूं, मैं जाना चाहता हूं वो

2503
02:54:53,760 --> 02:54:57,920
मेरी है। वो मेरे कंट्रोल में है माया। तो इसलिए मैं खुद

2504
02:54:57,920 --> 02:55:02,800
डिसाइड करता हूं कि मैं अभी उस माया शक्ति के प्रभाव में स्वयं को

2505
02:55:02,800 --> 02:55:06,800
मतलब उस माया शक्ति का अपने आप पर प्रभाव मानूंगा। उस माया शक्ति के

2506
02:55:06,800 --> 02:55:10,880
कंट्रोल में मैं चला जाऊंगा। मेरी ही इच्छा से। तो इसलिए मैं माया

2507
02:55:10,880 --> 02:55:14,960
शक्ति के प्रवाह में चला जाता हूं। जैसे कि मान के चलो ऐसा केवल मैंने वीडियो गेम

2508
02:55:14,960 --> 02:55:19,120
नहीं बनाया है। मैं जो आईआईटी वाला हूं आदमी मैंने ऐसी भी चीज बना

2509
02:55:19,120 --> 02:55:23,520
डाली। मैं इस शरीर से उस वीडियो गेम में कूद जाऊंगा। जैसे हॉरर

2510
02:55:23,520 --> 02:55:27,520
मूवीज में दिखता है। टीवी से भूतनी बाहर आ जाता है। टेलीपोट भी

2511
02:55:27,520 --> 02:55:30,320
कह सकते हैं। तो उस सृष्टि में मैं चला

2512
02:55:30,320 --> 02:55:34,720
जाता हूं। इधर से कूद के। तो जब मुझे मालूम है मैं कौन हूं?

2513
02:55:34,720 --> 02:55:38,720
मैं विद्यमान हूं। वो सृष्टि सब मिथ्या है। वो है ही नहीं। वास्तविकता में

2514
02:55:38,720 --> 02:55:43,600
लेकिन अब मुझे उसमें कूदना है क्योंकि मुझे उसे जिताना है

2515
02:55:43,600 --> 02:55:47,840
तो मुझे पहले से जैसा हम किसी नाटक में भूमिका

2516
02:55:47,840 --> 02:55:51,920
करते हैं ना तो भूमिका करने के लिए जब हम स्टेज में जाते हैं स्टेज पर

2517
02:55:51,920 --> 02:55:56,080
जाने के पहले हमें मालूम होता है मैं अमुक अमुक हूं लेकिन मैं अभी अमुक अमुक

2518
02:55:56,080 --> 02:56:00,080
बनूंगा मैं वो बनने जा रहा हूं तो जो

2519
02:56:00,080 --> 02:56:04,240
अभिनेता भूमिका कर रहा होता है मैं अभी उनमें दोषी हूं मैं रावण

2520
02:56:04,240 --> 02:56:08,400
की भूमिका करने जाऊंगा तो मैं भूमिका जब कर रहा होता हूं उस

2521
02:56:08,400 --> 02:56:12,880
भूमिका करने का जो समय है उस समय में मैं यदि

2522
02:56:12,880 --> 02:56:17,280
मैं कौन हूं मैं मनुष्य हूं मैं उन्मेश दोषी हूं मैं अभिनेता हूं

2523
02:56:17,280 --> 02:56:21,840
इसी बात को मैं यदि भूल गया तो मैं रावण की भूमिका कर कैसे पाऊंगा

2524
02:56:21,840 --> 02:56:25,920
रावण की भूमिका करने के लिए पहले मुझे ज्ञात होना ही चाहिए कि मैं

2525
02:56:25,920 --> 02:56:30,400
कौन हूं उसमें खंड खंड आ गया तो भूमिका खत्म भूमिका

2526
02:56:30,400 --> 02:56:35,040
तभी कर पाऊंगा जब मेरा मेरे वास्तविक स्वरूप का ज्ञान मुझे है अखंडित

2527
02:56:35,040 --> 02:56:39,200
रूप से तो मैं उस वीडियो में मैं कूदूंगा कूदने से पहले जानूंगा मैं कौन हूं

2528
02:56:39,200 --> 02:56:43,520
क्या हूं लेकिन अभी मैं जा रहा हूं और उसमें जाने के बाद

2529
02:56:43,520 --> 02:56:45,360
मुझ पर भी आघात हो जाएंगे

2530
02:56:45,360 --> 02:56:49,760
तो मैं अभी वास्तविक रूप में मैं ईश्वर परम ब्रह्म हूं मैं वीडियो

2531
02:56:49,760 --> 02:56:53,760
गेम को बनाने वाला हूं यह पूरी सृष्टि है ही नहीं लेकिन

2532
02:56:53,760 --> 02:56:57,920
उस सृष्टि के अंदर जाने के बाद जो घाव मुझ पर लगेंगे

2533
02:56:57,920 --> 02:57:02,240
उसकी मुझे वेदना भी होगी घाव पहली बात तो घाव होंगे मुझ पर वेदना

2534
02:57:02,240 --> 02:57:06,320
होगी सब चीजें होंगी और उसको मदद करूंगा और फिर से वापस

2535
02:57:06,320 --> 02:57:10,480
आ जाऊंगा का फर्क केवल इतना है। अब मैं उस वीडियो गेम में

2536
02:57:10,480 --> 02:57:14,640
गया। 10 लोग 10 सैनिक लड़ रहे हैं। मैं 11वा वहां

2537
02:57:14,640 --> 02:57:18,800
पहुंच गया। तो वो जो 10 सैनिक हैं मिथ्या वाले

2538
02:57:18,800 --> 02:57:22,960
उनकी दृष्टि उनको पता भी है। अरे हमारे भगवान आ गए मदद के लिए। उनकी

2539
02:57:22,960 --> 02:57:26,960
दृष्टि से मैं भगवान भी हूं लेकिन मुझे घाव भी हो रहे हैं। उनकी

2540
02:57:26,960 --> 02:57:31,040
दृष्टि से क्या है? हमारे भगवान नीचे आ गए हैं। तो इसीलिए वो

2541
02:57:31,040 --> 02:57:35,120
क्या मानेंगे? हम उनको भी घाव लग रहे हैं, चोट हो रही है। उनको भी वेदाना हो रही है।

2542
02:57:35,120 --> 02:57:39,200
यह 10 जो मेरे पक्ष से लड़ रहे हैं उनको मालूम है। सामने वाले जो है वो नहीं

2543
02:57:39,200 --> 02:57:43,200
जानते यह भगवान आ गया है। वो क्या मानेंगे? अरे हां ये तो मतलब ऐसा

2544
02:57:43,200 --> 02:57:47,520
ही है। 11वा कुछ सैनिक आ गया उसको भी चोटिल कर दो ये कर दो वो कर दो।

2545
02:57:47,520 --> 02:57:51,840
बात ऐसी है अभी मैं अभी विद्यावान तो मैं हूं ही। क्योंकि

2546
02:57:51,840 --> 02:57:55,920
विद्यावान मुझे नहीं मानेंगे तो भूमिका ही नहीं कर पाऊंगा। तार्किक दृष्टि से असंभव

2547
02:57:55,920 --> 02:57:59,920
है। तो क्योंकि मैं भूमिका कर रहा हूं तो मैं विद्यावान हूं ही।

2548
02:57:59,920 --> 02:58:00,480
उसी समय

2549
02:58:00,480 --> 02:58:05,040
पर भी अविद्यावान होते हुए अविद्यावान कैसे हो गया? मैं वास्तविकता

2550
02:58:05,040 --> 02:58:09,280
में अविद्यावान हुआ ही नहीं हूं। जो सामने वाले हैं उनकी

2551
02:58:09,280 --> 02:58:13,520
दृष्टि से क्योंकि वो अभी अविद्या में है। उनकी दृष्टि से मैं उनके जैसा

2552
02:58:13,520 --> 02:58:17,680
ही बन गया हूं। तो हम जब सभी बात कर रहे हैं अभी भगवान की

2553
02:58:17,680 --> 02:58:21,680
बात कर रहे हैं तो हम देखते हैं कि अरे वो भी अविद्यावान होता दिख रहा है।

2554
02:58:21,680 --> 02:58:25,840
हमारे ही जैसा लेकिन उसको पता है वास्तविकता यहां पे इंटरप्ट

2555
02:58:25,840 --> 02:58:29,840
करूंगा। जी जी थोड़ा सा जी अवश्य बात

2556
02:58:29,840 --> 02:58:34,480
यह कर रहे हैं कि विद्यावान होते हुए अविद्यावान

2557
02:58:34,480 --> 02:58:38,640
वो जो आप यहां से यहां पर अवतार की बात को वो कर रहे हैं। भगवान जब

2558
02:58:38,640 --> 02:58:42,640
अवतार लेते हैं तो वो क्यों दिख रहे हैं? हम बात कर रहे हैं कि वो जो

2559
02:58:42,640 --> 02:58:46,800
सामने वाले हैं जो सामने वाले जो भगवान को नहीं समझ

2560
02:58:46,800 --> 02:58:50,880
पा रहे हैं कि ये भगवान है। हां वो सामने वाले भी

2561
02:58:50,880 --> 02:58:54,880
सामने वाला तत्व से तो वही है ना ईश्वर ही है ना। हां तो

2562
02:58:54,880 --> 02:58:59,040
फिर वो वो बुद्धू क्यों बन रहे हैं? वो वो ऐसा क्यों मतलब

2563
02:58:59,040 --> 02:59:03,600
ईश्वर उस रूप में स्वयं को बुद्ध मतलब बुद्ध क्यों ईश्वर विद्यावान

2564
02:59:03,600 --> 02:59:07,600
होते हुए भी बुद्धू क्यों बन रहा है अविद्यावान अविद्या से ग्रसित क्यों हो रहा है उसका

2565
02:59:07,600 --> 02:59:12,560
एकदम सिंपल सा उदाहरण कि बात ऐसी होती है

2566
02:59:12,560 --> 02:59:15,760
इसका केवल एक उत्तर यही है कि माया उसकी मर्जी

2567
02:59:15,760 --> 02:59:19,760
कहने का अर्थ ये है कहने का अर्थ ये है कि एक ही

2568
02:59:19,760 --> 02:59:23,840
समय में ये दो विपरीत चीजें कैसे हो सकती हैं इसमें

2569
02:59:23,840 --> 02:59:29,040
एक तर्क और आता है हां कि यदि यदि

2570
02:59:29,040 --> 02:59:33,120
यदि एक ही तत्व है बहुत सारी जीवात्माएं नहीं है। एक ही जीव एक ही तत्व

2571
02:59:33,120 --> 02:59:37,280
है। ब्रह्म और जीव भी एक है। तो जब एक जीव को मुक्ति मिलती है तो

2572
02:59:37,280 --> 02:59:41,280
सभी को मिल जानी चाहिए। मिलनी चाहिए। है ना? तो बात वही है

2573
02:59:41,280 --> 02:59:45,360
कि जब ये जब जब तत्व से जब हम मुक्त हैं, जब तत्व से

2574
02:59:45,360 --> 02:59:49,360
हम अविद्यावान है, अविद्या से मुक्त हैं तो फिर

2575
02:59:49,360 --> 02:59:53,440
अविद्या से ग्रसित क्यों हो रहे हैं? कैसे हो सकते हैं? जब मेरे

2576
02:59:53,440 --> 02:59:57,440
को मालूम है कि 2 2 4 होता है। जब मेरे को मालूम है कि

2577
02:59:57,440 --> 03:00:01,440
2 2 4 होता है तो मैं ये कैसे कह सकता हूं कि मैं नहीं

2578
03:00:01,440 --> 03:00:05,440
मालूम है कि 2 2 4 होता है। है ना? मैं मैं

2579
03:00:05,440 --> 03:00:09,440
इसका मैं इसका एक एक पॉइंट रख देता हूं। यहां

2580
03:00:09,440 --> 03:00:13,520
पर है कि आप जो है वो अपने दृष्टिकोण से देखकर यह बात

2581
03:00:13,520 --> 03:00:18,000
कह रहे हैं और इसी को ही अध्यास रूप कहते हैं क्योंकि माया का एक

2582
03:00:18,000 --> 03:00:22,080
बहुत फंडामेंटल गुण है उसे बोलते हैं माया का अध्यास

2583
03:00:22,080 --> 03:00:26,240
रूप होना जैसे रस्सी रस्सी

2584
03:00:26,240 --> 03:00:30,320
में जैसे रजो सर्प का एग्जांपल ले लेते हैं तो जैसे रस्सी में सर्प या

2585
03:00:30,320 --> 03:00:30,880
फिर

2586
03:00:30,880 --> 03:00:34,880
मान लीजिए कोई सीपी होती है ना सीपी जिसके अंदर चांदी का मिथ्यारोप होता

2587
03:00:34,880 --> 03:00:39,600
है है ना ऐसा होता है उसी प्रकार मायावश जब जीव होता है।

2588
03:00:39,600 --> 03:00:44,320
वह भी एक निर्गुण ब्रह्म को नाना प्रकार से

2589
03:00:44,320 --> 03:00:48,400
नाना रूपात्मक जगत के रूप में उसको देखता है और तब उस समय

2590
03:00:48,400 --> 03:00:52,560
वो दो चीजें देख रहा होता है। एक कि वो ईश्वर और एक

2591
03:00:52,560 --> 03:00:56,720
अपने आप को तो वो अपने आप को तो नहीं जान पा रहा होता है अभ्यास के कारण कि

2592
03:00:56,720 --> 03:01:00,800
वो भी ब्रह्म है ईश्वर है। उसका बोध नहीं है। इसलिए वो ईश्वर नहीं कहलाता है। और दूसरा जो

2593
03:01:00,800 --> 03:01:04,800
उसके सामने जो होता है जो दूस 11वां करैक्टर जो इंट्रोड्यूस किया था उनमे जी ने

2594
03:01:04,800 --> 03:01:09,440
जो स्वयं ईश्वर था उसको उसको इस बात का पता होता है। तो तो

2595
03:01:09,440 --> 03:01:13,680
मतलब हम ये ये कह रहे हैं कि एक समय में मैं अज्ञानी और मूर्ख

2596
03:01:13,680 --> 03:01:17,680
अज्ञानी और ज्ञानी दोनों हूं। भैया मैं एक चीज

2597
03:01:17,680 --> 03:01:21,840
एक चीज बोलना चाहूंगा भाषा में कि जैसे हमारे माता-पिता कभी

2598
03:01:21,840 --> 03:01:26,000
जोड़ घटाव सिखाते हैं तो जानबूझ के कभी गलती कर देते हैं ताकि वो हमारा

2599
03:01:26,000 --> 03:01:30,000
परीक्षण कर सकते हैं हमें आता है कि नहीं। तब तो हम हमारे माता-पिता को बोलते

2600
03:01:30,000 --> 03:01:34,080
हैं कि नहीं मम्मी ऐसा नहीं ऐसा होगा। आप ईश्वर का पक्ष ले रहे हैं अवतार का पक्ष

2601
03:01:34,080 --> 03:01:38,720
ले रहे हैं। हां जी भैया ईश्वर भी वैसे ही करते हैं।

2602
03:01:38,720 --> 03:01:43,280
हमें अभी अवतार का पक्ष नहीं लेना है। हमें अभी

2603
03:01:43,280 --> 03:01:45,920
अवतार का पक्ष लेते लेते हम यहां पर आ गए कि

2604
03:01:45,920 --> 03:01:50,080
सब कुछ जब जब हमने अवतार के पक्ष में यह कहा ना कि सब कुछ वही

2605
03:01:50,080 --> 03:01:54,240
है तो कुछ हो ही नहीं रहा है। जब हमें यह कहना पड़ गया अवतार के पक्ष में

2606
03:01:54,240 --> 03:01:58,800
कि सब कुछ वही है। क्योंकि भगवान को कर्मों से मुक्त सिद्ध करना था।

2607
03:01:58,800 --> 03:02:02,800
है ना? जी। तो हमको ये कहना जब पड़ गया कि सब कुछ वही

2608
03:02:02,800 --> 03:02:06,800
है अवतार के समर्थन में। तो जब सब कुछ वही है कह दिया तो फिर

2609
03:02:06,800 --> 03:02:10,960
यह कहा फिर अब यह बात आई है कि मनुष्य के रूप में वह बाधित क्यों

2610
03:02:10,960 --> 03:02:14,960
हो रहा है? मनुष्य के रूप में वह बंधन में क्यों आ रहा है? मनुष्य के रूप

2611
03:02:14,960 --> 03:02:19,280
में वो अविद्या से ग्रसित क्यों हो रहा है? जब वो तत्व से जब वो सच्चिदानंद है

2612
03:02:19,280 --> 03:02:23,360
जब वो सब कुछ जानता है तो एक ही समय में दो विपरीत स्थितियां कैसे हो

2613
03:02:23,360 --> 03:02:27,680
रही है? अविद्या अविद्या साथ में कैसे ये होना संभव है क्या?

2614
03:02:27,680 --> 03:02:31,680
क्या आप ऐसा मानते हैं विद्या एक मिनट क्या आप ऐसा मानते हैं? क्या अविद्या

2615
03:02:31,680 --> 03:02:35,920
अविद्या साथ में हो सकती है? और अगर मानते हैं तो उसको थोड़ा सा समझाइए

2616
03:02:35,920 --> 03:02:39,840
कैसे हो सकती है कैसे सिद्ध होता है ये

2617
03:02:39,840 --> 03:02:43,840
संभव है क्योंकि वो अनंत शक्तिवान है कुछ भी कर सकते हैं तो दोनों एक साथ

2618
03:02:43,840 --> 03:02:48,640
आ सकता है और वो ऐसा इसीलिए करते हैं ताकि उनका कोई उपदेश हम तक पहुंचे

2619
03:02:48,640 --> 03:02:52,720
नहीं करने वाली बात नहीं है यहां होने वाली बात है एग्जिस्टेंस

2620
03:02:52,720 --> 03:02:56,880
साथ में हो सकता है क्या आप क्रिया की बात कर रहे हैं कि वो कुछ भी कर

2621
03:02:56,880 --> 03:03:00,960
सकता है वो एक अलग चीज है और हम कह रहे हैं

2622
03:03:00,960 --> 03:03:05,280
कि विद्या और अविद्या साथ में कैसे रह रही भाई जहां पे प्रकाश अंधेरा

2623
03:03:05,280 --> 03:03:09,440
वहीं हो सकता है जहां उजाला ना हो। तो हम फिर ये तो भैया

2624
03:03:09,440 --> 03:03:13,520
बिना उजाले को आप अंधेरे को डिफाइन कैसे करिएगा? तो

2625
03:03:13,520 --> 03:03:17,760
हम नहीं करेंगे। नहीं करेंगे फिर

2626
03:03:17,760 --> 03:03:22,000
अंधेरे का तो वास्तविकता ही खत्म हो जाएगा ना भैया। बिना

2627
03:03:22,000 --> 03:03:26,000
उजाले बिना उजाले के भाई सामने जो मनुष्य है वह बंधन में है ना? हां

2628
03:03:26,000 --> 03:03:31,840
ठीक है। कर दीजिए। ईश्वर रहित कर दीजिए संसार को और क्या है

2629
03:03:31,840 --> 03:03:36,160
भाई? आप ज्यादा से ज्यादा जब हम यह कह रहे हैं कि

2630
03:03:36,160 --> 03:03:40,560
हम यह कह रहे हैं मनुष्य को यह क्यों लग रहा है कि

2631
03:03:40,560 --> 03:03:44,560
मनुष्य रूप में उसी तत्व को यह कैसे लग सकता है कि जो है

2632
03:03:44,560 --> 03:03:48,880
मैं बंध गया हूं। मैं अविद्या से ग्रसित हूं या मुझे गलत दिखाई दे रहा है। माया

2633
03:03:48,880 --> 03:03:52,960
दिख रही है। ये सब क्यों हो रहा है? जबकि तत्व से मैं वही हूं।

2634
03:03:52,960 --> 03:03:56,960
तत्व से मैं जानता हूं कि वही क्या कहते हैं? मैं

2635
03:03:56,960 --> 03:04:01,280
मुक्त हूं। है ना? जी भैया। तो अभी

2636
03:04:01,280 --> 03:04:05,840
यह यह चल रहा है कि जहां पर प्रकाश है

2637
03:04:05,840 --> 03:04:10,080
वहां अंधेरे को हम नहीं मान सकते और या फिर आप अगर मानते

2638
03:04:10,080 --> 03:04:14,400
हैं तो बताएं कि क्यों मानते हैं विद्या और अविद्या साथ में है

2639
03:04:14,400 --> 03:04:16,080
ना अब पहले तो आपको

2640
03:04:16,080 --> 03:04:20,080
यह बताना है क्या विद्या और अविद्या साथ में हो सकती है एक साथ एक ही समय

2641
03:04:20,080 --> 03:04:24,320
में और अगर हो सकती है तो ऐसा आप क्यों मानते हैं युक्ति क्या है प्रमाण

2642
03:04:24,320 --> 03:04:28,480
क्या है ये कह रहा हूं जी बोले

2643
03:04:28,480 --> 03:04:32,560
जी कुछ पंडित जी बोलने वाले हो? नहीं नहीं ऐसा मुझे लगा था।

2644
03:04:32,560 --> 03:04:36,960
भैया एक छोटा सा वक्तव्य दूंगा जैसे कि पहले कहा था अविद्या

2645
03:04:36,960 --> 03:04:40,960
और विद्या मतलब एक साथ ना हो तो विद्या और अविद्या दोनों अगर

2646
03:04:40,960 --> 03:04:45,120
इंडिपेंडेंट रहे एक दूसरे से रहित तो एक दूसरे का वास्तविकता ही सिद्ध नहीं

2647
03:04:45,120 --> 03:04:49,600
हो पाएगा। जैसे कि पाप और पुण्य होता है। अच्छे कर्म

2648
03:04:49,600 --> 03:04:53,680
आप सिद्ध आप समझ आप मेरी बात को काट

2649
03:04:53,680 --> 03:04:57,840
करके केवल ईश्वर रहित ही तो करेंगे। आपको अपना पक्ष सिद्ध

2650
03:04:57,840 --> 03:05:02,000
करना होगा ना। जी भैया अगर नहीं रहेगी साथ

2651
03:05:02,000 --> 03:05:06,000
में तो ऐसा हो जाएगा वैसा हो जाएगा यह क्या है कि मेरा खंडन कि

2652
03:05:06,000 --> 03:05:10,080
मैं अगर जो ये क्या कहते हैं कि मैं

2653
03:05:10,080 --> 03:05:14,080
निराकार के पक्ष को रखने वाला हूं तो निराकार का खंडन या ईश्वर के अवतार को ना

2654
03:05:14,080 --> 03:05:18,320
मानने वाला हूं तो ईश्वर के अवतार का ना मानने वाला का खंडन मगर ईश्वर के अवतार

2655
03:05:18,320 --> 03:05:22,320
को तो सिद्ध करना ही होगा ना

2656
03:05:22,320 --> 03:05:26,400
तो ऐसे जी बोले तो इसमें बात

2657
03:05:26,400 --> 03:05:30,400
अब ऐसी है कि हम ये जो आक्षेप कर रहे हैं मतलब

2658
03:05:30,400 --> 03:05:31,600
आप जो आपसे आक्षेप

2659
03:05:31,600 --> 03:05:35,680
कर रहे हो कि कोई सवाल एक बार और क्लियर

2660
03:05:35,680 --> 03:05:39,840
कर दूं क्योंकि बीच में दूसरी बातें भी हो गई। पहला सवाल क्या विद्या

2661
03:05:39,840 --> 03:05:44,080
और अविद्या साथ में रह सकती है? जबकि हम जानते हैं कि प्रकाश

2662
03:05:44,080 --> 03:05:48,240
और अंधेरा साथ में नहीं रह सकते हैं। एक समय में एक ही देशकाल परिस्थिति

2663
03:05:48,240 --> 03:05:52,320
में नहीं हो सकते। तो क्या आप ऐसा मानते हैं कि विद्या और विद्या साथ

2664
03:05:52,320 --> 03:05:56,400
में रहती है? क्योंकि आप यह कह रहे हैं कि एक ही तत्व जो है एक एक

2665
03:05:56,400 --> 03:06:00,480
रूप में जो है बाधित है और एक रूप में मुक्त है। ठीक है जी। तो क्या

2666
03:06:00,480 --> 03:06:04,480
आप ऐसा मानते हैं? अगर मानते हैं तो उसमें युक्ति और प्रमाण क्या है?

2667
03:06:04,480 --> 03:06:08,960
अब ये बताओ। जी। तो पहले युक्ति और प्रमाण बताएंगे

2668
03:06:08,960 --> 03:06:13,040
क्योंकि अविद्या और अविद्या साथ में रह सकती है या नहीं? इसका

2669
03:06:13,040 --> 03:06:17,200
उत्तर व्यावहारिक धरातल से हां है और पारमारिक धरातल से नहीं।

2670
03:06:17,200 --> 03:06:21,280
क्योंकि अविद्या तो मूलत है ही नहीं। तो इसलिए पहले तर्क और प्रमाण

2671
03:06:21,280 --> 03:06:25,680
की बात करेंगे कि ऐसा क्यों होता है? तो बाद में इसका उत्तर ऑटोमेटिकली

2672
03:06:25,680 --> 03:06:29,840
मिल जाएगा हां या ना में तो बात एकदम सिंपल सी है

2673
03:06:29,840 --> 03:06:33,840
जो पंडित जी अभी बात कर रहे हैं तो उमेश जी आपने इसका उत्तर तो ऑलरेडी दे दिया है

2674
03:06:33,840 --> 03:06:38,160
ना अगर आप ये रजो सर्प का एग्जांपल ले लीजिए तो अविद्या

2675
03:06:38,160 --> 03:06:42,160
भी है और वहां विद्या दोनों विद्यमान है। लेकिन पॉइंट ऑफ व्यू चेंज हो गया

2676
03:06:42,160 --> 03:06:46,240
है। राइट? हां एक्सक्टली वही बात और फिर भी मतलब जो शिवम जी का प्रश्न

2677
03:06:46,240 --> 03:06:46,740
है

2678
03:06:46,640 --> 03:06:50,800
नहीं नहीं पंडित जी यहां मैं काउंटर करूंगा। नहीं नहीं काउंटर करेंगे।

2679
03:06:50,800 --> 03:06:55,040
क्यों करेंगे? यहां पे जो व्यक्ति ये समझ रहा है ना कि ये सर्प है

2680
03:06:55,040 --> 03:06:59,040
वो व्यक्ति ये नहीं समझ रहा है कि ये रस्सी है। हम जो व्यक्ति ये

2681
03:06:59,040 --> 03:07:03,200
समझ रहा है कि ये सर्प है वो व्यक्ति ये नहीं समझ रहा है कि वो रस्सी है। जी हां

2682
03:07:03,200 --> 03:07:07,280
लेकिन लेकिन विद्या और विद्या और अविद्या तो दोनों दोनों वहां पे एक्सिस्ट तो

2683
03:07:07,280 --> 03:07:11,280
कर रही है ना। वो तो हम जब हम इधर से देख रहे हैं मुक्त की दृष्टि

2684
03:07:11,280 --> 03:07:15,920
से जानते हैं शब्द प्रमाण से जान रहे हैं। अभी तो यह हो रहा है कि वो व्यक्ति

2685
03:07:15,920 --> 03:07:20,000
वो व्यक्ति जो देख रहा है उसको वो व्यक्ति यदि इस ब्रह्म का ही स्वरूप

2686
03:07:20,000 --> 03:07:24,000
है मुक्त ही है तो वो क्यों वो क्यों उस समय सर्प

2687
03:07:24,000 --> 03:07:28,160
से वो हो गया है और जिस समय वो ऐसा हुआ है सुनिए वो

2688
03:07:28,160 --> 03:07:32,800
ऐसा भी हुआ है वहां पर कि उस समय वो नहीं जान रहा है कि ये सर्प नहीं है।

2689
03:07:32,800 --> 03:07:36,960
है ना? जी हां तो

2690
03:07:36,960 --> 03:07:40,960
ये बताइए कि यदि वो व्यक्ति मुक्त है तो वो यह क्यों जान

2691
03:07:40,960 --> 03:07:45,040
रहा है कि ये सर्प है और यदि वो व्यक्ति मुक्त नहीं है तो फिर हम उसे ये क्यों

2692
03:07:45,040 --> 03:07:49,120
कह रहे हैं कि वो मुक्त है वो इसलिए क्योंकि वो व्यवहार में मुक्त नहीं

2693
03:07:49,120 --> 03:07:53,120
है। वो परमार्थ में मुक्त है। व्यवहार में वो मुक्त नहीं है। व्यवहार

2694
03:07:53,120 --> 03:07:57,280
में अभी भी उसके अंदर वो सारी समस्याएं हैं। वो माया की आवरण

2695
03:07:57,280 --> 03:08:01,440
शक्ति से विक्षेप शक्ति से घिरा हुआ है। अध्यास से घिरा हुआ है।

2696
03:08:01,440 --> 03:08:02,560
इसलिए

2697
03:08:02,560 --> 03:08:06,560
ये अंतर दिख रहा है आपको। लेकिन अगर आप परमार्थ की जैसे कि जब

2698
03:08:06,560 --> 03:08:10,560
आप वो वीडियो गेम का करैक्टर खेलेंगे ठीक है तो उस समय आपकी भी

2699
03:08:10,560 --> 03:08:14,560
अपनी बाधाएं होंगी। आप भी एक मिशन के बाद ही दूसरा मिशन कर सकते हैं

2700
03:08:14,560 --> 03:08:18,560
या फिर आपकी लिमिटेशंस है कि आप जब आपने गेम की ही लिमिट इतनी बना दी है तो आप

2701
03:08:18,560 --> 03:08:22,640
उसके बियों्ड नहीं जा सकते। ठीक है? लेकिन जब जो गेम खेल रहा है

2702
03:08:22,640 --> 03:08:26,800
उसे इस बात का पता है ना। व्यवहार की दृष्टि से तो वो मुक्त है वो बात जानता है लेकिन उस कररेक्टर में होकर

2703
03:08:26,800 --> 03:08:30,800
वो नहीं जान रहा है तो परमार्थ की दृष्टि से तो वो बिल्कुल

2704
03:08:30,800 --> 03:08:35,440
मुक्त है लेकिन जब व्यवहार में होने के कारण क्या बोलते हैं फिर वो अपने आप को

2705
03:08:35,440 --> 03:08:39,520
अमुक्त कह लीजिए या माया में होने की वाली बात कह लीजिए बंद कहेंगे

2706
03:08:39,520 --> 03:08:43,520
बंद बंद नहीं तो ये तो ये तो ये तो शब्द प्रमाण हो गया ना

2707
03:08:43,520 --> 03:08:47,600
बात ये चल रही है देखिए जब हम जब हम परमार्थ की दृष्टि लाएंगे तो

2708
03:08:47,600 --> 03:08:52,000
हम सीधे ये कहेंगे कि भाई ये शब्द प्रमाण है ऐसा है वहां पर ठीक है

2709
03:08:52,000 --> 03:08:56,000
अभी बात ये हो रही है कि अभी मैं समझना चाह रहा हूं। आपने

2710
03:08:56,000 --> 03:09:00,320
जो शब्द प्रमाण से मुझे बताया है ना तो उससे उत्पन्न होने वाले संशय

2711
03:09:00,320 --> 03:09:05,440
है जो मैं आपसे पूछ रहा हूं। वो संशय क्या है? पहला कि

2712
03:09:05,440 --> 03:09:09,520
क्या ज्ञान और प्रकाश साथ में रह

2713
03:09:09,520 --> 03:09:13,520
सकता है वो आप मानते हो। यदि मानते हो तो उसमें प्रमाण और युक्ति क्या

2714
03:09:13,520 --> 03:09:17,760
है?

2715
03:09:17,760 --> 03:09:21,920
ज्ञान और ये आप मुझे शब्द प्रमाण देते हो कि वो व्यवहार नहीं परमार्थ है। ज्ञान

2716
03:09:21,920 --> 03:09:26,480
और प्रकाश मैं समझा नहीं कदाचित तुमको अंदर और प्रकाश कहना

2717
03:09:26,480 --> 03:09:31,680
या तो अविद्या मैं और क्लियर कर दूं क्या विद्या और अविद्या

2718
03:09:31,680 --> 03:09:36,080
मैं मानता हूं कि विद्या और अविद्या ज्ञान और प्रकाश की तरह ही है। ठीक है?

2719
03:09:36,080 --> 03:09:40,080
तो विद्या और विद्या ज्ञान और प्रकाश की तरह जब है तो

2720
03:09:40,080 --> 03:09:45,440
क्या आप यह मानते हैं कि नहीं विद्या और विद्या अंधेरे और अंधकार और प्रकाश

2721
03:09:45,440 --> 03:09:49,520
अंधकार और प्रकाश की तरह है तो क्या आप मानते हैं कि अंधकार और प्रकाश एक समय में एक

2722
03:09:49,520 --> 03:09:53,680
साथ रह सकता है और यदि मानते हैं तो ये

2723
03:09:53,680 --> 03:09:59,680
बताइए कि इसमें प्रमाण और युक्ति क्या है?

2724
03:10:01,040 --> 03:10:05,280
ठीक है। आप बोलोगे पंडित जी क्या नहीं मैं कोई दूसरा लॉजिक

2725
03:10:05,280 --> 03:10:09,280
देने वाला था लेकिन आप बोलिए वरना अरे नहीं तो आपका मतलब आपकी चर्चा हो जाने दीजिए

2726
03:10:09,280 --> 03:10:13,360
आप देखिए क्या है कि अंधकार तो फिर तभी भी एक्सिस्ट करता है

2727
03:10:13,360 --> 03:10:17,360
प्रकाश होने के बाद भी बस वो प्रकाश का आवरण ओढ़ ओढ़ने के बाद वो अंधकार

2728
03:10:17,360 --> 03:10:21,440
जो है वो छिप जाता है। जैसे माया अपनी आवरण

2729
03:10:21,440 --> 03:10:25,600
शक्ति से जो सत्य जो वास्तविक सत्य है जो वास्तविकता होती है उस

2730
03:10:25,600 --> 03:10:29,760
पे ऐसा आवरण डालती है कि वो पूर्ण रूप से छिप तो जाता है लेकिन वशिष्ठ फिर भी

2731
03:10:29,760 --> 03:10:34,080
करता है जैसे काले बादल के पीछे छिपा हुआ सूर्य ठीक है चलिए

2732
03:10:34,080 --> 03:10:38,080
मैं इसको और थोड़ा सा एक्सप्लोर कर देता हूं हां कि वो छिप जाता

2733
03:10:38,080 --> 03:10:42,640
है मगर हमें इंफॉर्मेशन तो ये प्राप्त हो रही है कि अब अंधकार नहीं है

2734
03:10:42,640 --> 03:10:46,720
हां व्यवहार में हो रही है हो रही है प्रत्यक्ष प्रमाण तो यही है ना अंधकार नहीं

2735
03:10:46,720 --> 03:10:50,800
है तो अंधकार जब नहीं है तो यानी कि हमने ये माना

2736
03:10:50,800 --> 03:10:54,880
कि प्रकाश के होते समय अंधकार नहीं होगा। इंफॉर्मेशन में तो कम से

2737
03:10:54,880 --> 03:10:59,120
कम नहीं होगा। हां नहीं होगा। ठीक है? और हमने ये माना कि प्रकाश

2738
03:10:59,120 --> 03:11:03,680
के उसमें और अगर ऐसे देखेंगे तो दुनिया में कुछ भी चीज नहीं है।

2739
03:11:03,680 --> 03:11:07,920
है ना? फिर तो वही वाली बात आ जाएगी। तो व्यवहार की बात जब करेंगे तो व्यवहार में हमें मानना

2740
03:11:07,920 --> 03:11:12,000
पड़ेगा कि भैया ये जो इंफॉर्मेशन है वो जो अंधेरा

2741
03:11:12,000 --> 03:11:16,320
है। जब प्रकाश हुआ तो अंधेरा नहीं रहा। और जब अंधेरा हुआ तो अंधेरा

2742
03:11:16,320 --> 03:11:20,880
तब हुआ जब प्रकाश नहीं रहा। ठीक है? अंधेरा होने का

2743
03:11:20,880 --> 03:11:25,200
जो वो है अंधेरा होने का प्रमाण मतलब अंधेरा

2744
03:11:25,200 --> 03:11:29,440
हुआ ही इसलिए है क्योंकि प्रकाश नहीं है। कारण

2745
03:11:29,440 --> 03:11:33,840
ही अंधेरे का कारण ही है प्रकाश का अभाव। ठीक है?

2746
03:11:33,840 --> 03:11:39,840
तो मैं मानता हूं कि अविद्या का कारण ही है अविद्या का ना होना।

2747
03:11:40,560 --> 03:11:44,640
है ना? तो अब पहली बात अब अगर आप नहीं मानते हैं तो क्यों

2748
03:11:44,640 --> 03:11:48,800
नहीं मानते हैं? और क्या ये दोनों चीजें साथ में एक समय में एक जगह रह सकती

2749
03:11:48,800 --> 03:11:53,120
हैं? एक ही तत्व में है ना? और और दूसरी बात

2750
03:11:53,120 --> 03:11:55,520
कि

2751
03:11:55,520 --> 03:12:01,520
इसमें प्रमाण और युक्ति क्या है? अगर रह सकती है तो ये कह रहा हूं।

2752
03:12:01,760 --> 03:12:05,840
तो व्यवहार की दृष्टि में तो बिल्कुल नहीं रह

2753
03:12:05,840 --> 03:12:09,920
सकती एक साथ। ठीक है। मतलब वो पॉसिबल ही नहीं थी। ये वही वाली बात हो

2754
03:12:09,920 --> 03:12:14,160
गई कि वो ये अनिर्वचनीय वाली बात

2755
03:12:14,160 --> 03:12:18,240
वहां पे हो गई या फिर एक बंधिया का पुत्र वाली जैसी बातें कहने का

2756
03:12:18,240 --> 03:12:22,240
मतलब है मैं मैं आपको अपनी बात समझा दूं कि जो मुक्त

2757
03:12:22,240 --> 03:12:26,400
है जो जानता है कि दो और दो चार होते

2758
03:12:26,400 --> 03:12:30,480
हैं वो कैसे जान रहा है कि दो और दो चार नहीं होते या

2759
03:12:30,480 --> 03:12:35,520
वो जान ही नहीं रहा है कि दो और दो कितना होता है वो बंधन में कैसे आ रहा है

2760
03:12:35,520 --> 03:12:39,600
जबकि वो तो वास्तविकता में क्या है कि दो और दो चार होते हैं वो जानने वाला है

2761
03:12:39,600 --> 03:12:43,600
तो दो और दो चार होते हैं जानने वाला होते हुए

2762
03:12:43,600 --> 03:12:47,680
भी दो और दो चार नहीं होते ऐसा होने ऐसा कैसे

2763
03:12:47,680 --> 03:12:52,560
हो सकता है एक साथ एक ही समय में ये बात

2764
03:12:52,560 --> 03:12:56,240
बताएं

2765
03:12:56,240 --> 03:13:01,440
फिर उदाहरण दीजिएगा ऐसा कब हुआ था ये सोच के

2766
03:13:01,440 --> 03:13:05,520
पाएंगे उन्मेश जी उन्मेश जी को बोल कुछ बोल रहे थे पंडित

2767
03:13:05,520 --> 03:13:09,600
जी अभी नहीं ना मैंने काटा नहीं मैं नहीं नहीं काटा नहीं मैं बस यही कह रहा था फिर

2768
03:13:09,600 --> 03:13:13,680
यहां पे फिर माया का विचार आएगा लेकिन आप बोलिए फिर मैं अपनी बात कहूंगा क्योंकि मुझे पता है उस फिर

2769
03:13:13,680 --> 03:13:17,680
से क्वेश्चन आएगा हम जी वो तो आएगा ही आने वाला

2770
03:13:17,680 --> 03:13:21,840
ही है तो इसमें बात ऐसी है जो आपने शिवम जी कहा मतलब दो और दो

2771
03:13:21,840 --> 03:13:25,920
चार होते हैं मैं जान रहा हूं फिर भी मैं दो और दो कितने होते

2772
03:13:25,920 --> 03:13:30,080
हैं या पांच कितने मतलब मैं जानता नहीं इस रूप में मैं कैसे जा रहा हूं

2773
03:13:30,080 --> 03:13:35,360
जानते हुए भी तो यही बात है इसमें

2774
03:13:35,360 --> 03:13:39,360
पहली तो उसे उसमें सबसे पहली मेरी मर्जी ये सबसे

2775
03:13:39,360 --> 03:13:43,360
पहली बात है मुझे उस रूप में अपने आप को ढालना है वो तो ठीक है वो

2776
03:13:43,360 --> 03:13:47,440
एक अलग रूप से हो गया कि वो हां वो तो अलग हो गया लेकिन एक मतलब

2777
03:13:47,440 --> 03:13:51,440
पॉइंट क्लियर और दूसरी बात यदि मुझे उस रूप में अपने

2778
03:13:51,440 --> 03:13:55,600
को सबसे पहले क्लियर करते करते चले कि क्या जिस

2779
03:13:55,600 --> 03:13:59,680
प्रकार से प्रकाश और अंधेरा है क्या उसी प्रकार से अविद्या और विद्या

2780
03:13:59,680 --> 03:14:03,680
है क्या पहले इसको आप करें क्योंकि प्रकाश प्रकाश और अंधेरे

2781
03:14:03,680 --> 03:14:07,680
में क्या है प्रकाश एक अभाव पदार्थ है जब

2782
03:14:07,680 --> 03:14:11,360
जब प्रकाश नहीं अंधकार अंधकार एक

2783
03:14:11,360 --> 03:14:15,840
अभाव है। जब प्रकाश नहीं है तभी अंधकार का अस्तित्व

2784
03:14:15,840 --> 03:14:19,840
है। ठीक है तो क्या आप इसी तरीके से विद्या और अविद्या का अस्तित्व

2785
03:14:19,840 --> 03:14:23,920
मानते हैं कि नहीं मानते? पहले इसको क्लियर करो। अच्छा अब सबसे

2786
03:14:23,920 --> 03:14:28,080
पहले बात ऐसी आ जाती है जब आपने भाव का विषय निकाल ही लिया है। तो ये पूरा

2787
03:14:28,080 --> 03:14:33,840
का पूरा विषय हो जाता है न्याय दर्शन का। विद्या का शब्द का प्रयोग क्यों कर रहे हैं? विद्या

2788
03:14:33,840 --> 03:14:38,080
विद्या का मतलब आप यहां पे अर्थ यही है ना कि जो अविद्या का अभाव

2789
03:14:38,080 --> 03:14:42,080
नहीं नहीं नहीं विद्या फिर उसको अभावात्मक हो जाएगी बिल्कुल नहीं

2790
03:14:42,080 --> 03:14:46,160
विद्या भाव पदार्थ है ये स्पेसिफिक शब्द जो है विद्या का प्रयोग क्यों कर रहे हैं अपने

2791
03:14:46,160 --> 03:14:50,400
प्रश्न में ये पूछ रहा हूं मैं मैं हां

2792
03:14:50,400 --> 03:14:54,400
उनका प्रश्न ऐसा है कि विद्यावान मतलब जो जानने वाला है वो

2793
03:14:54,400 --> 03:14:58,560
ना जानने वाला कैसे बन पा रहा है अच्छा अच्छा अच्छा अच्छा अच्छा तो

2794
03:14:58,560 --> 03:15:02,640
विद्यावान अविद्यावान कैसे हो रहा है इसलिए वह विद्या अविद्या का थोड़ा सा

2795
03:15:02,640 --> 03:15:06,720
मतलब सुलभता के लिए ऐसा मुझे लग रहा है कि वहां कुछ अलग बिलकुल बिलकुल आप

2796
03:15:06,720 --> 03:15:11,520
सही कह रहे हैं तो पहला पहले इसको क्लियर करें तो हम आगे बढ़े

2797
03:15:11,520 --> 03:15:15,680
क्या आप क्या आप क्या ज्ञान और प्रकाश की तरह ही

2798
03:15:15,680 --> 03:15:19,680
विद्या और अविद्या को मानते हैं जिसमें कि प्रकाश

2799
03:15:19,680 --> 03:15:23,680
के ना होने में ही अंधकार का एक्सिस्ट अस्तित्व

2800
03:15:23,680 --> 03:15:26,400
है तो क्या आप उसी प्रकार से ये मानते हैं कि विद्या के

2801
03:15:26,400 --> 03:15:30,640
ना होने में ही अविद्या का अस्तित्व है अब

2802
03:15:30,640 --> 03:15:34,640
बात ऐसी है जो अंधेरा और प्रकाश वाली बात है ना तो जब हम अभाव की

2803
03:15:34,640 --> 03:15:39,040
बात करते हैं किसी भी चीज का अभाव हो नॉन एक्सिस्ट तो अभाव

2804
03:15:39,040 --> 03:15:43,040
न्याय दर्शन के अनुसार ऐसा होता है प्रतियोगी एक वहां शब्द आ जाता है बहुत अधिक

2805
03:15:43,040 --> 03:15:47,040
टेक्निकल में अभी नहीं घुसूंगा लेकिन फिर भी केवल अभाव

2806
03:15:47,040 --> 03:15:51,120
है ऐसा हम कह नहीं सकते देखो सामने वाला पूछेगा अरे किस चीज

2807
03:15:51,120 --> 03:15:55,280
के अभाव के बारे में तुम बात कर रहे हो तो अभाव किसी ना किसी का

2808
03:15:55,280 --> 03:15:59,440
होता है केवल अभाव नहीं होता ऐसा स्पेस में तो

2809
03:15:59,440 --> 03:16:03,440
किसी ना किसी चीज का अभाव हो जाता है तो किसी ना किसी भाव पदार्थ का

2810
03:16:03,440 --> 03:16:07,600
अभाव होता है। कब कहां होगा वो अलग बात है। तो इसे कहते

2811
03:16:07,600 --> 03:16:11,600
हैं जिसका अभाव होता है ना उसे कहते हैं प्रतियोगी। मान के चलो

2812
03:16:11,600 --> 03:16:15,760
मैं इस कमरे में बैठा हूं। इस कमरे में मिट्टी का बर्तन नहीं है अभी

2813
03:16:15,760 --> 03:16:19,920
मौजूद नहीं है मटका। तो वो हो गया प्रतियोगी। वो

2814
03:16:19,920 --> 03:16:24,080
नहीं है तो क्या है? इस उसका अभाव विद्यमान है। तो अभाव किसी ना

2815
03:16:24,080 --> 03:16:28,080
किसी चीज का होता है। अब जब हम किसी चीज को अभाव रूप

2816
03:16:28,080 --> 03:16:32,320
में मानते हैं जैसा कि अंधेरा अभाव रूप है। तो ये बताना पड़ना

2817
03:16:32,320 --> 03:16:36,320
आवश्यक बताना आवश्यक हो जाता है कि किस चीज का अभाव मतलब

2818
03:16:36,320 --> 03:16:40,560
अंधेरा। केवल अभाव नहीं कह सकते। तो यहां ये बात आ जाती है कि प्रकाश

2819
03:16:40,560 --> 03:16:41,600
का अभाव मतलब

2820
03:16:41,600 --> 03:16:43,920
अंधेरा।

2821
03:16:43,920 --> 03:16:48,080
वैसा ही तो क्या आप अविद्या अविद्या को ऐसा ही मानते हैं कि

2822
03:16:48,080 --> 03:16:52,880
विद्या का अभाव अविद्या।

2823
03:16:52,880 --> 03:16:57,760
थोड़ा सा क्या कैसी बात है जैसा प्रकाश और अंधेरा

2824
03:16:57,760 --> 03:17:01,920
इन दोनों में से हम एग्जजेक्टली कह सकते हैं कि प्रकाश का अभाव मतलब

2825
03:17:01,920 --> 03:17:05,920
अंधेरा अंधकार तो वैसा सामान्यता

2826
03:17:05,920 --> 03:17:10,400
कह सकेंगे कि विद्या का अभाव मतलब अविद्या

2827
03:17:10,400 --> 03:17:14,720
लेकिन किस दृष्टि से अभी देखना आवश्यक है विद्या का अभाव मतलब क्या विद्या

2828
03:17:14,720 --> 03:17:18,800
को विद्या का अभाव कहेंगे तो माइनस यह आघात

2829
03:17:18,800 --> 03:17:22,960
हो जाएगा ईश्वर पर कहीं ना कहीं किसी ना किसी स्थान पर किसी ना किसी देश

2830
03:17:22,960 --> 03:17:27,120
काल परिस्थिति में विद्या का अभाव हो रहा है तो बात खत्म

2831
03:17:27,120 --> 03:17:31,200
सर्वशक्तिमान ईश्वर का खंडन हो गया तो इसलिए विद्या का अभाव

2832
03:17:31,200 --> 03:17:35,520
एग्जजेक्टली इसी शब्दों में नहीं कह सकते जिस शब्दों में प्रकाश का

2833
03:17:35,520 --> 03:17:39,600
अभाव में ही अविद्या का अस्तित्व मानते हैं नहीं नहीं जैसा मैं

2834
03:17:39,600 --> 03:17:43,600
अभी क्लियर कर रहा हूं तो प्रकाश और अंधेरा में जिस तरह से हम मानते हैं एक्सजेक्टली मानते हैं

2835
03:17:43,600 --> 03:17:47,920
कि ठीक है प्रकाश का ना होना मतलब अंधकार उसकी दृष्टि से विद्या

2836
03:17:47,920 --> 03:17:51,920
का ना होना बात अटक जाएगी यहां पर ही विद्या का ना होना क्या

2837
03:17:51,920 --> 03:17:56,000
है वो अगला पॉइंट विद्या का ना होना केवल इतना हमने

2838
03:17:56,000 --> 03:17:56,720
मान लिया

2839
03:17:56,720 --> 03:18:01,200
तो हमारा ईश्वर खत्म हो गया पूरा का पूरा नास्तिकता आ गई तो इसलिए

2840
03:18:01,200 --> 03:18:05,440
विद्या का अभाव मतलब विद्या का ना एक्सिस्टेंस ये अविद्या नहीं

2841
03:18:05,440 --> 03:18:09,600
बात ऐसी है मैं यही कह रहा हूं बहुत बढ़िया बहुत बढ़िया नहीं

2842
03:18:09,600 --> 03:18:13,760
है बहुत देर से सुनना चाह रहा था मैं मैं भी

2843
03:18:13,760 --> 03:18:18,880
यही मेरे मन में भी यही बात आ रही थी मैं बोल रहा था यही यही पॉइंट है

2844
03:18:18,880 --> 03:18:22,880
मैं पूरा कर दूंगी क्या आपकी? अवश्य अवश्य अवश्य कर इसमें

2845
03:18:22,880 --> 03:18:27,200
एक और बात जोड़ दूं और माया और अविद्या माया तथा अविद्या यह दोनों ही

2846
03:18:27,200 --> 03:18:31,600
मैं तो आज मैं तो आज मैं तो आज की चर्चा का ये शीर्षक

2847
03:18:31,600 --> 03:18:37,600
डालने वाला था कि साकार पक्ष हार गया।

2848
03:18:37,600 --> 03:18:41,760
तो ऐसा है कि गुरुदेव से ये प्रश्न पूछा

2849
03:18:41,760 --> 03:18:46,480
था। गुरुदेव का जो इंटरव्यू डला हुआ है उसमें प्रश्न है।

2850
03:18:46,480 --> 03:18:50,960
गुरुदेव का पहला सेंटेंस यही था कि

2851
03:18:50,960 --> 03:18:55,200
अविद्या अभाव पदार्थ नहीं है। एक्सक्टली वो ज्ञान

2852
03:18:55,200 --> 03:18:59,200
और प्रकाश की तरह है ही नहीं। अंधकार और प्रकाश की तरह है

2853
03:18:59,200 --> 03:19:03,200
ही नहीं। क्यों? क्योंकि अंधकार क्या है? जब प्रकाश नहीं है

2854
03:19:03,200 --> 03:19:07,680
तभी अंधकार है। मगर अविद्या क्या है? विद्या है तब भी अविद्या है।

2855
03:19:07,680 --> 03:19:11,840
उसका अस्तित्व है। विद्या के ना होने पर ही अविद्या नहीं

2856
03:19:11,840 --> 03:19:15,840
है। अविद्या का अपना अस्तित्व है। अभी आपने बोला भी है

2857
03:19:15,840 --> 03:19:19,840
कि अविद्या अनादि नित्य है। जी बोला है ना?

2858
03:19:19,840 --> 03:19:24,320
जी अभी पंडित जी ने बोला। थोड़ी देर पहले बोला था। हां।

2859
03:19:24,320 --> 03:19:29,040
अब श्वेता शत्रुपनिषद में ये बात है भी कि विद्या और अविद्या

2860
03:19:29,040 --> 03:19:33,680
दोनों ब्रह्म में अनादि उससे रहते हैं। विद्यमान।

2861
03:19:33,680 --> 03:19:37,760
तो सबसे पहली बात तो यह समझनी होगी कि अविद्या कोई अभाव पदार्थ नहीं

2862
03:19:37,760 --> 03:19:41,840
है। अब यह तो चीज क्लियर हो गई कि अविद्या अभाव

2863
03:19:41,840 --> 03:19:45,920
पदार्थ नहीं है। तो इसका मतलब आप ये कह रहे हैं कि दोनों

2864
03:19:45,920 --> 03:19:50,000
एक ही समय में एक ही तत्व में एकिस्ट कर सकते हैं। विद्या और

2865
03:19:50,000 --> 03:19:52,720
विद्या दोनों तो इसको थोड़ा सा आप युक्ति से बता

2866
03:19:52,720 --> 03:19:57,520
दे। प्रमाण तो हमें मिल गया श्वेता सूत्रपनिषद और गुरुदेव का। अच्छा

2867
03:19:57,520 --> 03:20:02,080
थोड़ा सा इसमें युक्ति बताएं कुछ कि दो दो विपरीत दो विपरीतार्थक

2868
03:20:02,080 --> 03:20:06,160
चीजें कहां पर रहती है एक साथ ऐसे कुछ सिर्फ ऐसे कुछ युक्ति दें

2869
03:20:06,160 --> 03:20:10,080
चुंबक में भैया

2870
03:20:10,080 --> 03:20:14,320
चुंबक में नॉर्थ पोल और साउथ पोल चुंबक चिपक जाते हैं

2871
03:20:14,320 --> 03:20:18,640
नहीं वो तो अलग विषय हो जाएगा नहीं वो नहीं आप

2872
03:20:18,640 --> 03:20:22,880
थोड़ा सा मतलब क्या कहना चाह रहे हो चुंबक के उदाहरण से भैया दिन और रात

2873
03:20:22,880 --> 03:20:28,480
शाम के वक्त दोनों मौजूद होते हैं विपरीत चीजें

2874
03:20:28,480 --> 03:20:32,800
नहीं दिन और रात तो वो तो एक उसको नाम दिया गया कि इस स्थिति

2875
03:20:32,800 --> 03:20:37,840
को क्या कहते हैं? को संध्या बोल देंगे आप लेकिन वो नहीं कहलाएगा।

2876
03:20:37,840 --> 03:20:43,200
दिन और रात तो कह ही नहीं सकते। रात तो तभी है जब दिन नहीं है। हम

2877
03:20:43,200 --> 03:20:47,200
तो मतलब ये तो एक समय में होता ही नहीं है ना दिन और रात। तो वो

2878
03:20:47,200 --> 03:20:51,280
मतलब उदाहरण उतना सटीक नहीं बैठेगा। तो अंधकार और प्रकाश वाला ही मामला हो गया।

2879
03:20:51,280 --> 03:20:55,440
हां मामला हो जाएगा। एक समय में नहीं। तो ये जो बात है ना जो हमने

2880
03:20:55,440 --> 03:20:59,840
कुछ समय पहले अवतारवाद की तरफ विषय हमारा आ रहा था वो अभिनेता

2881
03:20:59,840 --> 03:21:03,920
का हमने उदाहरण ले लिया था। तो वही बात ले लेते हैं यहां कि ये

2882
03:21:03,920 --> 03:21:08,240
अवतारवाद के लिए नहीं हम कह रहे हैं अभी विद्या अविद्या दोनों एक साथ विद्या

2883
03:21:08,240 --> 03:21:12,240
क्या है? मैं उन्मेश दोषी हूं और उस एक घंटे के लिए

2884
03:21:12,240 --> 03:21:16,320
उस दो घंटे के लिए मैं स्वयं को रावण मानता हूं। तो

2885
03:21:16,320 --> 03:21:20,400
यह हो गई अविद्या मतलब मेरा जो मूल स्वरूप है उस स्वरूप को

2886
03:21:20,400 --> 03:21:24,560
उस स्वरूप को मैं भुला रहा हूं जानबूझ करके ही सही जैसे

2887
03:21:24,560 --> 03:21:28,880
कैसे भी तो उस एक ही समय में मैं उनकी

2888
03:21:28,880 --> 03:21:32,880
तो हूं ही मुझे मालूम है कि मैं कौन हूं इसलिए तो मैं भूमिका कर रहा

2889
03:21:32,880 --> 03:21:36,960
हूं लेकिन उस समय क्या है मैं ही स्वयं को रावण

2890
03:21:36,960 --> 03:21:41,120
नहीं मान रहा हूं तो ये हो गया विद्या अविद्या का एक साथ होना

2891
03:21:41,120 --> 03:21:43,520
इसका एक और दे देता हूं मैं जादूगर का

2892
03:21:43,520 --> 03:21:47,760
एग्जांपल ले लेते हैं जैसे जैसे जादूगर जब जादू दिखाता है

2893
03:21:47,760 --> 03:21:51,760
तो वो अविद्या होती है। लेकिन जादूगर

2894
03:21:51,760 --> 03:21:56,960
का अपने ही बनाए हुए जादू द्वारा प्रभावित ना होना वो विद्या है।

2895
03:21:56,960 --> 03:22:01,040
और विद्या दोनों एक साथ कर रही है। जी और

2896
03:22:01,040 --> 03:22:05,120
एक एग्जांपल मैं इसमें जो इस तर्क से तो इस तर्क से तो अगर

2897
03:22:05,120 --> 03:22:09,120
आप इस तर्क से करेंगे तो भगवान जितने भी प्राणी है वो सब ईश्वर सिद्ध

2898
03:22:09,120 --> 03:22:12,560
होंगे। तो

2899
03:22:12,560 --> 03:22:17,120
नहीं तो

2900
03:22:17,120 --> 03:22:21,200
ब्रह्म है बिल्कुल बिल्कुल जितने भी प्राणी है सब ब्रह्म स्वरूप

2901
03:22:21,200 --> 03:22:25,680
है लेकिन ईश्वर सिद्ध इसलिए नहीं होंगे क्योंकि फिर वहां क्योंकि वो

2902
03:22:25,680 --> 03:22:29,680
उसी वो वो वो इस समय जादूगर नहीं बने

2903
03:22:29,680 --> 03:22:33,760
हैं वो वो दृष्टा बने हैं जो जादूगर जादू कर रहा है और

2904
03:22:33,760 --> 03:22:37,840
अपने आप को वो दृष्टा समझ रहे हैं उसका मतलब वो जादू देख के उस जादू क्या बात है

2905
03:22:37,840 --> 03:22:41,920
बहुत बढ़िया ये भी बहुत अच्छा है बहुत अच्छा बहुत तो

2906
03:22:41,920 --> 03:22:46,320
चलिए इसका एक एक बहुत वैसा सा उदाहरण मैं दे देता हूं।

2907
03:22:46,320 --> 03:22:50,720
शिवशु जी मैं एक दो उदाहरण लेने वाला था। क्या पहले दे दूं?

2908
03:22:50,720 --> 03:22:54,880
आप दे दीजिए आप। हां। तो बाद में पंडित जी आपने

2909
03:22:54,880 --> 03:22:59,040
जो बोला ना मेरा थोड़ा अभी नेटवर्क चला गया था। बाद में आप कह दीजिए

2910
03:22:59,040 --> 03:23:03,040
आपने क्या बोला? जी आपने तो ये वाला तो बहुत ध्वस्त कर दिया। ये वाला कह के

2911
03:23:03,040 --> 03:23:07,200
वो नारायण। चलिए पंडित जी आप अभी कह दीजिए। मतलब अभी

2912
03:23:07,200 --> 03:23:11,440
विषय पूरा मैं सुन नहीं पाया था। मैं मैं ये कह रहा था जैसे मैंने जादूगर

2913
03:23:11,440 --> 03:23:16,400
का एग्जांपल दिया था तो जब आप बता रहे थे वो

2914
03:23:16,400 --> 03:23:22,160
अभिनेता वाला एग्जांपल दे रहे थे ना तो मैंने ये कहा था कि जैसे जादूगर

2915
03:23:22,160 --> 03:23:26,240
अपना जादू दिखाता है ठीक है तो वो वो जो जादू है

2916
03:23:26,240 --> 03:23:30,720
वो तो अविद्या ही है एक्सिस्ट नहीं मतलब वो जादू ही लेकिन

2917
03:23:30,720 --> 03:23:32,240
जादूगर का उस जादू

2918
03:23:32,240 --> 03:23:36,240
से प्रभावित ना होना ही वो विद्या है। सही बात तो तो

2919
03:23:36,240 --> 03:23:41,120
इस पे उन्होंने तर्क किया था तो ऐसे तो फिर सारे ही अपने आप को ईश्वर समझ बैठेंगे

2920
03:23:41,120 --> 03:23:45,280
तो मैंने इसका उत्तर दिया कि बिल्कुल सभी के सभी लोग ब्रह्म

2921
03:23:45,280 --> 03:23:49,360
है। ठीक है? लेकिन जब वो ब्रह्म माया में आता है तो ईश्वर कहलाता है। तो लेकिन वो ईश्वर

2922
03:23:49,360 --> 03:23:53,360
इसलिए नहीं कहलाएंगे क्योंकि वो इस समय उस वो जादूगर

2923
03:23:53,360 --> 03:23:57,360
नहीं बने हैं। वो उस जादूगर के द्वारा बनाए हुए जो जो जादू

2924
03:23:57,360 --> 03:24:01,520
कर रहा है उसका दृष्टा बने हुए हैं। जी जी सही सही बात। इसलिए

2925
03:24:01,520 --> 03:24:05,600
वो अपने को ईश्वर मैं इसको मैं इसको उन्मेश जी वाले उदाहरण से मिलाते

2926
03:24:05,600 --> 03:24:09,680
हुए आपकी बात को पंडित जी की बात को बताऊं। जैसे उन्मेश जी ने कहा

2927
03:24:09,680 --> 03:24:13,920
कि कोई व्यक्ति अभिनेता बनता है। तो वह जानता

2928
03:24:13,920 --> 03:24:18,320
है कि मैं अभिनेता मैं रोल करने आया हूं। फिर भी वो

2929
03:24:18,320 --> 03:24:22,320
उन क्षणों में अपने उसी उसी मस्तिष्क में ये भी

2930
03:24:22,320 --> 03:24:26,320
फील करता है कि मैं रावण हूं। मैं फलाना हूं। उसी मस्तिष्क

2931
03:24:26,320 --> 03:24:30,400
में जिस मस्तिष्क से वो ये जानता है कि मैं वास्तविकता में कौन हूं। अगर वो फील

2932
03:24:30,400 --> 03:24:34,640
नहीं करेगा तो एक्टिंग नहीं करेगा। ना तो दोनों चीजें वो फील वो फील

2933
03:24:34,640 --> 03:24:39,040
करता है। रावण को भी फील करता है उस समय। ठीक है? तो अब जब ये

2934
03:24:39,040 --> 03:24:43,120
दोनों चीजें फील करने वाली बात आती है तो फिर ये होता है कि इस इस

2935
03:24:43,120 --> 03:24:47,280
तरीके से तो जो ईश्वर है और जो जीव है

2936
03:24:47,280 --> 03:24:51,760
वो फिर प्रत्येक जीव कहेगा कि भाई मैं मैं भी ऐसे ही कर रहा हूं। है ना?

2937
03:24:51,760 --> 03:24:55,920
केवल यही बात तो है। तो फिर अंतर क्या रह गया? जब रोल प्ले

2938
03:24:55,920 --> 03:24:59,920
करने वाली केवल बात है। तो हम तो अंतर ये रह गया

2939
03:24:59,920 --> 03:25:05,360
कि जब ये क्या कहते हैं?

2940
03:25:05,360 --> 03:25:09,360
जब ईश्वर अपना अवतार लेता है तो वो ईश्वर का रोल

2941
03:25:09,360 --> 03:25:13,680
करता है। ईश्वर का ही रोल करता है। मगर जब ईश्वर

2942
03:25:13,680 --> 03:25:17,760
ये जीवों के रूप में है तब वो बद्ध का यानी ईश्वर जब ईश्वर

2943
03:25:17,760 --> 03:25:22,080
के रूप में मुक्त का रोल करता है और जीव के रूप में बद्ध

2944
03:25:22,080 --> 03:25:26,400
का रोल करते हैं। इसलिए वो जीव जो है पूजनीय नहीं है। वो ईश्वर नहीं है।

2945
03:25:26,400 --> 03:25:30,640
जी सही। वो क्योंकि वो प्राणी के रूप में जीव के रूप में बद्ध

2946
03:25:30,640 --> 03:25:34,800
का रोल प्ले कर रहा है। ठीक है। पहली बात तो ये हो गई। अब आप

2947
03:25:34,800 --> 03:25:38,960
दूसरी कोई बात उदाहरण देने वाले थे वह बता दीजिए। हां जी जो हमारे

2948
03:25:38,960 --> 03:25:44,480
विजयनगर साम्राज्य के जो संस्थापक थे ना माधवाचार्य जी तत्कालीन शंकराचार्य

2949
03:25:44,480 --> 03:25:48,800
जी विद्यारण्य स्वामी जी तो उनका ग्रंथ है पंचदशी नाम से बहुत बड़ा ग्रंथ है

2950
03:25:48,800 --> 03:25:53,040
प्रकरण ग्रंथ है अद्वैत वेदांत का तो उसमें छठा प्रकरण आ जाता है उसमें कुल 15

2951
03:25:53,040 --> 03:25:57,280
प्रकरण है तो उसमें जो छठा प्रकरण है चित्रदीप प्रकरण नाम से तो उसमें

2952
03:25:57,280 --> 03:26:01,920
पहले पहले श्लोकों में चित्रदीप प्रकरण में जो

2953
03:26:01,920 --> 03:26:02,420
ड्राइंग

2954
03:26:02,320 --> 03:26:06,400
करने वाला कैनवास होता है ना कागज मान के चलो या कोई तो वस्त्र होता है तो उसका

2955
03:26:06,400 --> 03:26:10,480
उदाहरण उन्होंने दिया है उस वस्त्र के ऊपर सूरज जो हम बचपन

2956
03:26:10,480 --> 03:26:14,640
में चित्र निकालते थे सभी पर्वत निकालेंगे नदी निकालेंगे सूरज निकालेंगे तो

2957
03:26:14,640 --> 03:26:18,800
वो चित्र किसी हमारे घर के बालक ने बनाया तो वो हमारे

2958
03:26:18,800 --> 03:26:23,120
पास दिखाने के लिए आ जाता है देखो मैंने कितना अच्छा चित्र बनाया है तो हम

2959
03:26:23,120 --> 03:26:27,120
उस चित्र की वहां स्तुति कर देते हैं बहुत अच्छा सूर्य बनाया तुमने

2960
03:26:27,120 --> 03:26:31,120
पिछले बार जैसा बनाया था ना उसके उससे भी अच्छा बनाया है तो यदि

2961
03:26:31,120 --> 03:26:35,120
हम उसे ये कह देंगे अरे क्या है ये तो वस्त्र दिखा रहे हो तुम मुझे और ये तो रंग

2962
03:26:35,120 --> 03:26:39,520
है तो वो वो मतलब निराश हो जाएगा चला जाएगा बेचारा बेचारा

2963
03:26:39,520 --> 03:26:43,680
बच्चा तो उस समय हमें क्या करना होता है हम यद्यपि जानते

2964
03:26:43,680 --> 03:26:47,840
वो बच्चा भी जानता है यद्यपि हम जानते हैं कि वो वस्त्र है और

2965
03:26:47,840 --> 03:26:51,920
वो रंग है वहां सूर्य जैसा कुछ है ही नहीं फिर भी हम

2966
03:26:51,920 --> 03:26:56,000
अपने आप के ऊपर यह प्रभाव डालते हैं या वो

2967
03:26:56,000 --> 03:27:00,080
लदवाते हैं कि वो सूर्य ही है

2968
03:27:00,080 --> 03:27:04,320
ऐसा होना चाहिए ऐसा नहीं होना चाहिए और उसको साथ

2969
03:27:04,320 --> 03:27:08,400
लेकर के हम बोलते हैं कि सूर्य सूर्य अच्छा बना। सूर्य अच्छा नहीं बना। तो

2970
03:27:08,400 --> 03:27:12,480
ये हो गई विद्या अविद्या एक साथ। एक दूसरा उदाहरण जो

2971
03:27:12,480 --> 03:27:16,800
समुंदर है पूरा का पूरा और उस समुंदर में से कोई एक पानी का बूंद उछला

2972
03:27:16,800 --> 03:27:17,360
ऊपर

2973
03:27:17,360 --> 03:27:21,360
10 सेकंड उसने ऐसा प्रवास किया और फिर समुंदर में समा गया। तो

2974
03:27:21,360 --> 03:27:25,680
ये जो है बात उछलने से पहले वो कहां था? नहीं था क्या वो? अवश्य

2975
03:27:25,680 --> 03:27:29,840
था। हां। लेकिन वो बूंद के रूप में नहीं था। समुंदर के रूप में था। लेकिन था

2976
03:27:29,840 --> 03:27:34,000
अवश्य। आ गया और फिर से डूब गया। समुंदर में विलीन

2977
03:27:34,000 --> 03:27:38,240
हो गया। एक्सजेक्टली ये एग्जांपल नहीं है लेकिन थोड़ा सा मैच करेगा

2978
03:27:38,240 --> 03:27:42,320
इसलिए मैंने लिया है। तो वो जो है ये जन्मा और जन्मा

2979
03:27:42,320 --> 03:27:46,320
वाले के लिए फिट है ये। हां वो फिट है ये वाला। लेकिन इसमें से ये जो बात थी ना कि

2980
03:27:46,320 --> 03:27:50,480
वो तो ऐसे तो सभी ईश्वर हो जाएंगे। तो इसके ऊपर मैं थोड़ा सा

2981
03:27:50,480 --> 03:27:54,640
लेना चाहता हूं एक उदाहरण था। तो वो जो उसका प्राकट्य हुआ समंदर से

2982
03:27:54,640 --> 03:27:58,880
तो वो उसकी उत्पत्ति नहीं है। उसको उत्पत्ति का अर्थ पहले ना होना।

2983
03:27:58,880 --> 03:28:02,960
पहले से था। किस रूप में था अलग बात लेकिन पहले से था लेकिन एक

2984
03:28:02,960 --> 03:28:07,040
मिनट पूरा कर लूं तो ये ऊपर आ गया तो वो

2985
03:28:07,040 --> 03:28:11,200
उसका जो हमारी बहुत देर पहले चर्चा हुई तो उसे उसी को ही जन्म कहते हैं

2986
03:28:11,200 --> 03:28:15,520
प्राकट्य को ही और बाद में फिर से समुंदर में चला जाएगा उसे ही विलिनीकरण कहेंगे

2987
03:28:15,520 --> 03:28:19,520
व्यावहारिक रूप से उसे मृत्यु कहेंगे तो जो बीच का जो उसका प्रवास

2988
03:28:19,520 --> 03:28:23,680
है 10 सेकंड का 15 सेकंड का बिंदु के रूप में बूंद के रूप में

2989
03:28:23,680 --> 03:28:28,240
तो वो अभी जीव है और समुंदर है परमात्मा ईश्वर तो वो

2990
03:28:28,240 --> 03:28:32,240
जो जीव है तो अपने आप को वो ईश्वर क्यों नहीं कहलाएगा अपने आप को या

2991
03:28:32,240 --> 03:28:32,740
सही

2992
03:28:32,640 --> 03:28:37,520
हमारी चर्चा में वो ईश्वर क्यों कहेंगे उसे क्योंकि

2993
03:28:37,520 --> 03:28:41,600
यदि उसने उस 10 सेकंड्स में अपने आप को ईश्वर ही स्थापित

2994
03:28:41,600 --> 03:28:45,680
करने का प्रयास किया हां वो अलग बात कि मेरा मूल स्वरूप ईश्वर

2995
03:28:45,680 --> 03:28:50,400
है समुद्र है मुझे उसे पाना है अलग बात लेकिन मैं ही ईश्वर हूं

2996
03:28:50,400 --> 03:28:54,720
जो तात्विक रूप से है परंतु उसने अपने आप को बूंद

2997
03:28:54,720 --> 03:28:58,800
समझते हुए यदि ये बात कह डाली मैं ईश्वर हूं तो वो उसका उसका

2998
03:28:58,800 --> 03:29:02,880
ईगो कहलाता है। अहंकार कहलाता है। कहलाता है। व्यवहार के रूप में जिसे हम ईगो कहते

2999
03:29:02,880 --> 03:29:07,040
हैं। मैं अहंकार शब्द का प्रयोग नहीं करूंगा क्योंकि वो थोड़ा सा अलग अर्थ हो जाता है।

3000
03:29:07,040 --> 03:29:11,360
जिसे हम ईगो के रूप में जानते हैं। ये ईगो आ जाएगा। यदि उसने

3001
03:29:11,360 --> 03:29:15,600
किस उससे किसने पूछा कि अच्छा तुम ईश्वर हो क्या? तो लाओ फिर सुनामी।

3002
03:29:15,600 --> 03:29:19,760
तो उस बूंद में यद्यपि तात्विक रूप से समुद्र समुद्र ही है।

3003
03:29:19,760 --> 03:29:23,920
उस बूंद में सुनामी लाने का सामर्थ्य नहीं है क्योंकि वो

3004
03:29:23,920 --> 03:29:28,160
अपने आप को बूंद मान रहा है। अपने आप को बद्ध मान रहा है। तो ये बात

3005
03:29:28,160 --> 03:29:32,640
आ जाती है जो आपने कहा ना पंडित जी और शिवा जी आपने जो ये किया उसका विस्तार

3006
03:29:32,640 --> 03:29:37,520
तो इसलिए वो सब के सब ईश्वर नहीं हो जाएंगे। ऐसी बात

3007
03:29:37,520 --> 03:29:41,520
मैं अब मैं इसमें एक उदाहरण और दे दूं। उसके बाद इस चर्चा को विराम करेंगे।

3008
03:29:41,520 --> 03:29:45,680
विराम करते हैं। एक उदाहरण लेकर मैं इसको रोकूंगा।

3009
03:29:45,680 --> 03:29:47,680
जी विश्वजीत जी आप बोल रहे

3010
03:29:47,680 --> 03:29:51,680
महाभारत से जैसे भगवान कृष्ण रथ का पहिया उठा लेते हैं। जबकि वह पहले

3011
03:29:51,680 --> 03:29:55,680
ही सबको मार चुके थे या फिर कुछ भी कर सकते थे तो क्या जरूरत था पहिया उठाने का तो ये भी

3012
03:29:55,680 --> 03:29:59,200
एग्जांपल हो सकता है।

3013
03:29:59,200 --> 03:30:03,360
किस रूप में कि माया और माया और ये विद्या और अविद्या

3014
03:30:03,360 --> 03:30:07,440
एक साथ कैसे इस रूप में? हां मतलब जैसे कि भगवान को तो रथ

3015
03:30:07,440 --> 03:30:11,920
का पहिया उठाने का जरूरत नहीं था। नहीं यह तो आवश्यकता वाली बात आ गई। आवश्यकता

3016
03:30:11,920 --> 03:30:16,160
वाली आ गई। हां ये तो आवश्यकता है ना वो आवश्यकता को हमने खंडित

3017
03:30:16,160 --> 03:30:20,720
किया है। चलिए मैं उसमें बात करूंगा। मैं एक उदाहरण दे दूं छोटा सा कि

3018
03:30:20,720 --> 03:30:24,800
दो विपरीतार्थक स्थितियां एक ही समय एक ही तत्व में कैसे

3019
03:30:24,800 --> 03:30:29,040
विराजमान रह सकती हैं? और इसमें उसका भी आंसर मिल जाएगा जो आर्य समाज

3020
03:30:29,040 --> 03:30:33,040
की ओर से मैंने देखा था कि एक तर्क दिया जाता

3021
03:30:33,040 --> 03:30:37,200
है जिसमें कहा जाता है कि अगर एक ही तत्व है, एक

3022
03:30:37,200 --> 03:30:41,760
ही आत्मा है। है ना? तो क्या कहते हैं ये

3023
03:30:41,760 --> 03:30:45,760
जब एक को मुक्ति मिले तो सबको मुक्ति मिल जाए। एक को सुख और दूसरे को

3024
03:30:45,760 --> 03:30:49,840
दुख कैसे हो रहा है? जब एक ही जीव है तो है ना? वही वाली बात

3025
03:30:49,840 --> 03:30:55,840
कि दो विपरीतार्थक चीजें एक साथ कैसे हैं? तो उस पर मैं बोल दूं जरा

3026
03:30:56,560 --> 03:31:00,640
जब हम अब यहां से देखिए सांसारिक दृष्टि से

3027
03:31:00,640 --> 03:31:04,960
हम मुक्त हैं। ठीक है? सांसारिक दृष्टि से हम मुक्त हैं।

3028
03:31:04,960 --> 03:31:09,200
और हमने मुक्त होते हुए हम बैठे

3029
03:31:09,200 --> 03:31:13,440
भगवान के नाम का जाप करने। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे

3030
03:31:13,440 --> 03:31:17,680
राम हरे राम राम राम हरे हरे। ठीक है? तो अब क्या है?

3031
03:31:17,680 --> 03:31:21,840
जब हमने जाप करना शुरू किया तो हम हमारी जो

3032
03:31:21,840 --> 03:31:25,920
जीवा है उससे हम बोल रहे हैं हरे कृष्णा हरे कृष्ण कृष्ण कृष्णा हरे

3033
03:31:25,920 --> 03:31:29,920
हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे यानी यानी

3034
03:31:29,920 --> 03:31:34,560
हमारी एक कॉन्शियसनेस जो है यानी हमारी जो एक कॉन्शियसनेस

3035
03:31:34,560 --> 03:31:38,720
है वो किस किस काम में अब लग गई है हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा

3036
03:31:38,720 --> 03:31:42,960
कृष्णा हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ठीक है हम इसी समय

3037
03:31:42,960 --> 03:31:46,960
जो हमारी संसार के नजरिए से जो मुक्त कॉन्शियसनेस है

3038
03:31:46,960 --> 03:31:51,040
वो वो भ्रमण करती है। करती है ना वो क्या

3039
03:31:51,040 --> 03:31:55,200
करती है कि ये ये है ये वो है ये वो है। एक ही

3040
03:31:55,200 --> 03:31:59,360
समय में वो हरे कृष्ण का जाप करने के लिए बंधन में

3041
03:31:59,360 --> 03:32:03,680
है। हम और उसी समय में वो पूरे संसार

3042
03:32:03,680 --> 03:32:07,680
के बारे में विचार कर लेने के लिए भी मुक्त है। बिल्कुल है

3043
03:32:07,680 --> 03:32:11,680
ना? जी। ठीक है। बंधन है वहां। वो हरे कृष्ण के लिए

3044
03:32:11,680 --> 03:32:15,680
तू जपते जाना है तुझे। जब तक कमांड नहीं मिलेगा। मुक्त का कमांड

3045
03:32:15,680 --> 03:32:19,680
नहीं मिलेगा जब तक तब तक तुझे जपते जाना है। हरे कृष्ण का

3046
03:32:19,680 --> 03:32:23,840
जाप करते हुए भी वो मुक्त भी है और वो बद्ध भी है।

3047
03:32:23,840 --> 03:32:27,840
और सुनिए एक ही समय में अलग-अलग

3048
03:32:27,840 --> 03:32:32,160
फीलिंग अब वो जो अब वो जो बद्ध है

3049
03:32:32,160 --> 03:32:36,160
हरे कृष्ण जाप में जो लिप्त हो चुकी है जो उसी कॉन्शियसनेस का

3050
03:32:36,160 --> 03:32:40,480
एक रूप ठीक है और एक रूप ये हो गया जो स्वतंत्र

3051
03:32:40,480 --> 03:32:44,480
पूरे संसार में भ्रमण कर रहा है जो ये भी जानता है कि मैं ही हूं जो वहां जाप कर

3052
03:32:44,480 --> 03:32:48,480
रहा हूं और एक वहां पे वो बद्ध हो गया जिसको जाप करना ही है करते

3053
03:32:48,480 --> 03:32:52,720
जाना है करते जाना है उस दृष्टिकोण से वो बंधन ही तो है कि आसन

3054
03:32:52,720 --> 03:32:56,880
पर बैठ के करते जाना जाओ। ठीक है? उसी समय एक

3055
03:32:56,880 --> 03:33:01,120
मच्छर भी बैठता है आपके शरीर पर जो आपको

3056
03:33:01,120 --> 03:33:05,280
काटता है। तो आपके हाथ को एक कमांड जाती है और पट्ट से उसको

3057
03:33:05,280 --> 03:33:09,920
मार देता है। अब ये जो हाथ का कमांड है

3058
03:33:09,920 --> 03:33:14,160
यह आपका बद्ध ही तो है उसको मारने के लिए। जबकि

3059
03:33:14,160 --> 03:33:18,320
आप मुक्त हो पूरे संसार के बारे में सोचने के लिए। तो एक ही समय में

3060
03:33:18,320 --> 03:33:22,400
तीन यहां पर हमने चेतनाएं प्राप्त कर ली। कौन-कौन सी? एक जो हरे

3061
03:33:22,400 --> 03:33:26,400
कृष्ण का जाप करने के लिए बद्ध है। एक जो मच्छर को मारने के

3062
03:33:26,400 --> 03:33:26,960
लिए बद्ध

3063
03:33:26,960 --> 03:33:31,200
है। और एक जो स्वतंत्र है जो जानती है कि मैं

3064
03:33:31,200 --> 03:33:35,200
मैं ही हूं जो मच्छर को मार रही हूं। मैं ही हूं जो हरे कृष्ण का जाप

3065
03:33:35,200 --> 03:33:39,600
कर रही हूं। मैं ही हूं जो पूरे संसार में भ्रमण कर रही हूं। ठीक है?

3066
03:33:39,600 --> 03:33:43,680
और उसको बार-बार कमांड भी नहीं देना पड़ रहा है हरे कृष्ण का जाप करने के लिए। तो एक

3067
03:33:43,680 --> 03:33:47,840
ही समय में यहां हमने जब हमारी चेतना का स्तर इतना निम्न

3068
03:33:47,840 --> 03:33:51,840
है। अभी प्रज्ञा शक्ति का स्तर इतना निम्न है। अभी तो

3069
03:33:51,840 --> 03:33:55,920
एक ही समय में जब हमने तीन और मैं सोच रहा हूं कि अभी हम उदाहरण देने पर

3070
03:33:55,920 --> 03:34:00,880
आएंगे तो मुझे लगता है 50 तो निकाल ही लेंगे एक ही समय पे। है ना?

3071
03:34:00,880 --> 03:34:05,280
50 तो निकाल ही लेंगे। तो एक ही समय पे जब हम जैसे निकृष्ट प्रज्ञा

3072
03:34:05,280 --> 03:34:11,280
शक्ति वाले 50 ऐसे दृश्य दिखा 50

3073
03:34:11,280 --> 03:34:15,520
अस्तित्व मान सकते हैं अलग-अलग फीलिंग्स के है ना अलग-अलग

3074
03:34:15,520 --> 03:34:19,520
फीलिंग्स के 50 वो निकाल सकते हैं तो सोचिए प्रज्ञा शक्ति

3075
03:34:19,520 --> 03:34:23,520
का स्तर जिसका अपरंपार होगा अनंत होगा वो

3076
03:34:23,520 --> 03:34:27,520
कितने फील एक साथ में कर ले सकता है विपरीतार्थक

3077
03:34:27,520 --> 03:34:31,920
एक ही समय में तो विद्या और अविद्या

3078
03:34:31,920 --> 03:34:36,160
एक साथ रह सकती है। अविद्या भाव पदार्थ नहीं है। और एक

3079
03:34:36,160 --> 03:34:41,680
ही समय में दो विपरीत आर्थक चीज़ें घटित हो सकती हैं। और

3080
03:34:41,680 --> 03:34:42,240
हम

3081
03:34:42,240 --> 03:34:46,400
जो एक ये जो चीज है ना कि जो स्वरूप से तत्व

3082
03:34:46,400 --> 03:34:50,960
से एक ही है जीव और ब्रह्म। इसमें जीव के अंदर जो सच्चिदानंद

3083
03:34:50,960 --> 03:34:55,120
की चाह आ रही है। ठीक है? वो ही यह

3084
03:34:55,120 --> 03:34:59,120
सिद्ध कर रही है कि तू सच्चिदानंद है। वो चाह

3085
03:34:59,120 --> 03:35:03,840
आ कैसे गई उसके अंदर? जब उसने रस्सी को सांप समझा

3086
03:35:03,840 --> 03:35:08,000
जब उसने रस्सी को सांप समझा उसने समझ लिया सांप है तो उसके

3087
03:35:08,000 --> 03:35:12,240
अंदर जीवित रहने की चाह कैसे आ गई? सत स्वरूप में रहने की चाह

3088
03:35:12,240 --> 03:35:16,640
कैसे आ गई? उसी से सिद्ध हो गया कि वो सत स्वरूप ही है।

3089
03:35:16,640 --> 03:35:20,640
इसीलिए उसके अंदर वो चाह विद्यमान है। जैसे कि वो आपने

3090
03:35:20,640 --> 03:35:24,800
एक उदाहरण दिया था ना कि जादूगर

3091
03:35:24,800 --> 03:35:28,800
जादू दिखाता है। अभिनय अभिनय अभिनय करने वाला अभिनय करता है। तो एक होता है जो

3092
03:35:28,800 --> 03:35:32,880
ये जानता है कि अभिनय है। मगर मैं अभिनय कर रहा हूं। ठीक है? और एक होता है

3093
03:35:32,880 --> 03:35:37,200
जो दर्शक होता है जो देखता है कि ये जादू है। ये अभिनय है और वो उसका मजा

3094
03:35:37,200 --> 03:35:41,440
लेता है। ठीक है? भैया एक सवाल पूछना चाहूंगा इस जादूगर।

3095
03:35:41,440 --> 03:35:45,440
अगर उसी मगर उसी समय मगर उसी समय

3096
03:35:45,440 --> 03:35:49,760
जो दृष्टा के रूप में जो देख रहा है जो प्रभावित हो रहा है उसी

3097
03:35:49,760 --> 03:35:55,200
समय वो ये जानता भी होता है कि मैं वास्तविकता में कौन हूं।

3098
03:35:55,200 --> 03:35:57,440
जी तभी तो वो उसका आनंद ले रहा है।

3099
03:35:57,440 --> 03:36:01,520
हां बस ये है कि ये जो सच्चिदानंद का जो

3100
03:36:01,520 --> 03:36:05,920
कनेक्शन है ये जो भाई भाई देखो मेरे अंदर भी चाह विद्यमान

3101
03:36:05,920 --> 03:36:10,320
है। इससे इससे पता चल गया कि अंदर से मैं भी जानता हूं। हम

3102
03:36:10,320 --> 03:36:14,400
सच्चिदानंद की चाह विद्यमान होने से यह भी हो गया कि मैं भी जानता हूं कि मैं कौन

3103
03:36:14,400 --> 03:36:19,360
हूं। ठीक है। मगर मैं इसको कनेक्ट नहीं कर पा रहा हूं।

3104
03:36:19,360 --> 03:36:23,520
तो इस कनेक्शन को कनेक्ट करने वाला अवतार है। ईश्वर है। भगवान का

3105
03:36:23,520 --> 03:36:28,320
स्वरूप है। सगुण साकार जो इस कनेक्शन से कनेक्ट है।

3106
03:36:28,320 --> 03:36:32,480
और इस कनेक्शन से जो कनेक्ट नहीं मैं जान नहीं पा रहा हूं। मेरे अंदर की जो चाह है यही

3107
03:36:32,480 --> 03:36:36,720
बता रही है कि मैं ये हूं मैं वो हूं। ठीक है? तो ये जो प्रत्यक्ष

3108
03:36:36,720 --> 03:36:40,720
रूप से मैं फील नहीं कर पा रहा हूं। ये प्रातिभाषिक अनुमान को शब्द प्रमाण

3109
03:36:40,720 --> 03:36:44,800
को उसके कारण मैं बद्ध हूं। जी विश्वजीत जी हां अब ये करते

3110
03:36:44,800 --> 03:36:49,120
हैं कि एक जो बात आती है ना ईश्वर

3111
03:36:49,120 --> 03:36:53,200
यदि ईश्वर एक मिनट यदि ईश्वर सब कुछ कर सकता है तो क्या

3112
03:36:53,200 --> 03:36:57,280
वो दो और दो को पांच बना सकता है क्या वो ऐसा पत्थर बना सकता

3113
03:36:57,280 --> 03:37:01,280
है जिसको वो स्वयं ना उठा सके क्या वो मतलब

3114
03:37:01,280 --> 03:37:05,360
ऐसी बंद्या पुत्र को जन्म दे सकता है ना इलॉजिकल वो

3115
03:37:05,360 --> 03:37:09,520
लॉजिकल फैलेसी कहते हैं क्या कहते हैं इसको ऐसा कुछ

3116
03:37:09,520 --> 03:37:12,720
कहते हैं ना हां इस

3117
03:37:12,720 --> 03:37:18,720
पर हम लोग अगली चर्चा रखेंगे। यदि ईश्वर सब कुछ कर सकता है तो ऐसासा

3118
03:37:19,200 --> 03:37:23,520
विश्वजीत और फिर इसको विराम पूछ लीजिए जो जादूगर

3119
03:37:23,520 --> 03:37:27,840
वाला एग्जांपल दिए वो तो दृष्टा की दृष्टि से सिद्ध होता है कि विद्या और

3120
03:37:27,840 --> 03:37:31,840
विद्या एक साथ मौजूद है। परंतु अगर जादूगर की नजर से देखें तो वह

3121
03:37:31,840 --> 03:37:36,080
तो विद्यावान ही हुआ ना क्योंकि उसे सब ज्ञात है पहले से। नहीं मगर

3122
03:37:36,080 --> 03:37:40,080
जादू के रूप में वह जादू जिस समय दिखा रहा है तो उसकी एक चेतना जान

3123
03:37:40,080 --> 03:37:44,240
रही जान रही है ना कि जादू हो रहा है भैया वो

3124
03:37:44,240 --> 03:37:48,400
जादू उसको पता है कि जादू नहीं कर रहा हूं मैं वो तो दृष्टा ऐसे मूर्ख बन रहे है उसको

3125
03:37:48,400 --> 03:37:53,200
जादू समझ के एक्चुअली में वो जादू हो ही नहीं रहा है

3126
03:37:53,200 --> 03:37:57,520
मैं आपको मैं आपको बताऊं ऐसे है जैसे कि इसको अभिनय

3127
03:37:57,520 --> 03:38:01,520
वाले में ले लीजिए तो ज्यादा अच्छे से समझ पाएंगे अभिनय करने

3128
03:38:01,520 --> 03:38:05,760
वाले से उससे समझ लीजिए जादू वाले को छोड़ अभिनय में भी देख लीजिए कोई भी एक्टर

3129
03:38:05,760 --> 03:38:09,840
अभिनय करता है जैसे मान लीजिए शाहरुख खान है उसको तो अभिनय करते वक्त भी

3130
03:38:09,840 --> 03:38:13,840
ये ज्ञान है कि वो शाहरुख खान तो मैं मैं वही कह रहा हूं। मैं उसको

3131
03:38:13,840 --> 03:38:18,160
आपको अंतर दे रहा हूं। मालूम है।

3132
03:38:18,160 --> 03:38:22,480
फिर भी उसी समय पे यदि वो ये नहीं समझेगा कि शाहरुख

3133
03:38:22,480 --> 03:38:26,880
खान है तो वो एक्टिंग नहीं कर पाएगा शाहरुख खान की। हां तब वो रोएगा नहीं। हां।

3134
03:38:26,880 --> 03:38:28,000
उसको ये समझना

3135
03:38:28,000 --> 03:38:32,080
पड़ेगा वहां पर कि वो अह वो

3136
03:38:32,080 --> 03:38:36,080
फलाना कैरेक्टर भी है किसी फिल्म का। बिलकुल। ठीक है?

3137
03:38:36,080 --> 03:38:40,240
उतनी चेतना शक्ति वहां पे उसकी बाधित वो उसमें आएगी उस

3138
03:38:40,240 --> 03:38:44,400
प्रभाव में कि वो और एक ही समय में उसको मालूम

3139
03:38:44,400 --> 03:38:48,400
है मैं शाहरुख हूं। उसको मालूम है मैं अजय देवगन हूं। मगर उसी

3140
03:38:48,400 --> 03:38:54,000
समय में उसकी वो चेतना एक आएगी जिसमें कि नहीं मैं अजय देवगन

3141
03:38:54,000 --> 03:38:58,320
क्या कहते हैं? नहीं हूं। मैं ये हूं। मैं दृश्यम का वो मैं दृश्यम

3142
03:38:58,320 --> 03:39:02,800
का चौथी क्लास फेल हूं। आप क्या विश्व जी आप आप एक दर्शक का एग्जांपल

3143
03:39:02,800 --> 03:39:06,960
ले लीजिए यहां पर। एक दर्शक जब मूवी देखने जाता है हॉल में मान लीजिए बहुत

3144
03:39:06,960 --> 03:39:10,960
ही ज्यादा सैड मूवी है वो ठीक है तो उसे पता है

3145
03:39:10,960 --> 03:39:15,360
कि ये पिक्चर चल रही है या हॉरर मूवी है उसे पता है पिक्चर चल रही है लेकिन फिर भी डरता है

3146
03:39:15,360 --> 03:39:19,440
फिर भी कोई सैड सीन आता है तो उसमें रोने लगता है आंख में आंसू आते हैं उसे

3147
03:39:19,440 --> 03:39:23,600
पता है ये बात कि पिक्चर एक्टिंग है यार कुछ नहीं है फिर भी लेकिन फिर भी करना है बस बस

3148
03:39:23,600 --> 03:39:27,600
ये जो अमाउंट है ना ये जो अमाउंट है समझने और ना

3149
03:39:27,600 --> 03:39:32,480
समझने वाला ये अमाउंट कम ज्यादा होता है हां जैसे

3150
03:39:32,480 --> 03:39:36,560
कोई कोई कोई फिल्म में इतना ज्यादा खो

3151
03:39:36,560 --> 03:39:40,800
जाता है कि वो बहुत ज्यादा उसको वो जानता है कि मैं सच्चिदानंद

3152
03:39:40,800 --> 03:39:43,360
हूं। यानी इस फिल्म से मुक्त हूं मैं। फिल्म

3153
03:39:43,360 --> 03:39:47,360
के दृष्टिकोण से मैं मुक्त हूं। मगर फिर भी वो वहां रोने भी लगेगा, इमोशनल भी

3154
03:39:47,360 --> 03:39:51,440
हो जाएगा और कहीं-कहीं पे किसी की एक्टिंग इतनी बेकार होती है। क्यों? क्योंकि

3155
03:39:51,440 --> 03:39:56,800
वो अपने कररेक्टर में डूब नहीं पाता। होती है।

3156
03:39:56,800 --> 03:40:01,040
कहीं-कहीं पे एक्टिंग इतनी लूज होती है कि सामने वाला वो कनेक्ट ना हो पाए। तुमसे

3157
03:40:01,040 --> 03:40:05,360
प्रभावित ना हो पाए। तो यानी कि वहां पर तुम वहां पर तुमने एक्टिंग जबरदस्त

3158
03:40:05,360 --> 03:40:09,600
नहीं की है। अपने कररेक्टर में तुम डूबे नहीं। तुम अलाउद्दीन खिलजी बनते समय राक्षस

3159
03:40:09,600 --> 03:40:13,840
नहीं बने। हम और कहीं-कहीं पे व्यक्ति

3160
03:40:13,840 --> 03:40:18,080
इतना स्मार्ट होता है कि वो जो है आपसे कनेक्ट नहीं होता। आप कितनी भी अच्छी एक्टिंग कर लो

3161
03:40:18,080 --> 03:40:22,560
वो आराम से चला आएगा बाहर। अरे बकवास मूवी थी।

3162
03:40:22,560 --> 03:40:26,560
है ना? उस टाइम दृष्टा के पास रहते हैं भैया। बकवास मूवी

3163
03:40:26,560 --> 03:40:30,640
थी। नहीं नहीं तो फिर तीन तरह के तो इसमें तीन तरह के आपके सिनेरियो हो जाएंगे। एक तो वो होगा

3164
03:40:30,640 --> 03:40:34,720
जो बिल्कुल भी प्रभावित नहीं हो रहा। बोर हो रहा है। एक होगा जो

3165
03:40:34,720 --> 03:40:38,880
प्रभावित हो रहा है लेकिन मूवी थिएटर से बाहर निकलते ही नॉर्मल हो गया। ठीक है। बाकी

3166
03:40:38,880 --> 03:40:43,360
ये जो उदाहरण दिए गए हैं इनका स्पष्टीकरण में

3167
03:40:43,360 --> 03:40:47,440
थोड़ा सा स्तर कम ज्यादा हो सकता है। हां है ना? सभी उदाहरण

3168
03:40:47,440 --> 03:40:51,440
काम के हैं। मगर वो वो एक बहुत प्रत्यक्ष उदाहरण अभी मैंने

3169
03:40:51,440 --> 03:40:56,000
बताया नाम जप वाला। वो अनुभव मुझे होता है। तो इसलिए मैंने बताया।

3170
03:40:56,000 --> 03:40:58,800
जी। और एक एक अंतिम जो बता देता हूं जो आजकल

3171
03:40:58,800 --> 03:41:02,880
हम सभी लोग हैं माया की दृष्टि से। ठीक है? कि हम मूवी देख

3172
03:41:02,880 --> 03:41:06,880
के इतने उससे प्रभावित हो जाते हैं कि हम सच ही मान बैठते हैं। ठीक है? और कई लोग

3173
03:41:06,880 --> 03:41:11,120
तो फिर उसके उस मूवी के चक्कर में कई लोग तो सच मान के बैठ गए कि अरे एक्टर

3174
03:41:11,120 --> 03:41:15,280
मर गया, एक्ट्रेस बन गए तो लोग अपने आप को भी हर्ट करने लगते हैं। अपने आप को भी लगता है कि नहीं नहीं

3175
03:41:15,280 --> 03:41:19,520
क्योंकि सच में हो रहा है ऐसा। तो वो बिल्कुल एकदम माया में ग्रसित होने वाला है।

3176
03:41:19,520 --> 03:41:23,520
इसको जन्म लेने पड़ेंगे अभी कई बार समझने के लिए कि हां ठीक है ये। तो हम

3177
03:41:23,520 --> 03:41:27,520
लोग जो यह बात कर रहे थे ना एक समय में दो विपरीतार्थक चीजें एक

3178
03:41:27,520 --> 03:41:31,600
ही जगह पर कैसे हो सकती हैं? तो जो हमारी जो चेतना है

3179
03:41:31,600 --> 03:41:35,680
जो ब्रह्म की जो चेतना है वो इतनी शक्तिशाली है कि उसमें ना

3180
03:41:35,680 --> 03:41:39,760
जाने कितनी फीलिंग्स एक साथ विपरीतार्थक हो सकती हैं। इसमें कोई

3181
03:41:39,760 --> 03:41:44,320
डाउट नहीं है क्योंकि हम एक ही समय में जब हम जैसे निकृष्ट लोगों की

3182
03:41:44,320 --> 03:41:48,320
चेतना जो है एक ही समय में दो तीन तरह की फीलिंग तो अभी मैंने गिना दी

3183
03:41:48,320 --> 03:41:52,640
हम लोग जब करने बैठेंगे तो बहुत सारी फीलिंग्स आ जाएंगी। ठीक है?

3184
03:41:52,640 --> 03:41:56,640
तो आज को इसको विराम देते हैं और अगली बार हम लोग चर्चा रखेंगे कि भाई

3185
03:41:56,640 --> 03:42:00,800
वो दो और दो पांच कैसे आप लोग कमर कस के आए जो ईश्वर

3186
03:42:00,800 --> 03:42:04,880
सब कुछ कर सकता है क्योंकि सामने आर्य समाजी तो नहीं मिलेंगे मगर मैं

3187
03:42:04,880 --> 03:42:07,760
जरूर मिलूंगा

3188
03:42:07,760 --> 03:42:12,080
तो भैया विराम गर्व की बात कि सामने आप हैं। आर्य

3189
03:42:12,080 --> 03:42:13,840
समाजी के सामने रहेंगे तो गर्व

3190
03:42:13,840 --> 03:42:17,840
महसूस नहीं होगा हम लोगों को कि अपोनेंट में कौन है वह भी मैटर

3191
03:42:17,840 --> 03:42:21,120
करता है

3192
03:42:21,120 --> 03:42:23,520
चलिए

3193
03:42:23,520 --> 03:42:27,680
बहुत बहुत करता हूं आज बहुत हां बहुत बढ़िया जी भैया

3194
03:42:27,680 --> 03:42:31,680
हर तरह से हमने कोशिश किया है लेने का है ना जी

3195
03:42:31,680 --> 03:42:35,680
ठीक है फिर भगवान का एक मिनट नाम लेके फिर इसको क्लोज करते हैं ठीक है जी

3196
03:42:35,680 --> 03:42:39,840
जी बिल्कुल बिल्कुल भैया हरि ओम तत्सत श्रीमते रामचंद्राय नमः

3197
03:42:39,840 --> 03:42:44,080
ओम नमः परमहंसा स्वादित चरण कमल चंदाय भक्त

3198
03:42:44,080 --> 03:42:48,240
जनमान मानस निवासाय श्री रामचंद्राय श्री राम जय

3199
03:42:48,240 --> 03:42:52,320
राम जय जय राम श्री राम जय

3200
03:42:52,320 --> 03:42:56,400
राम जय जय राम श्री राम जय राम

3201
03:42:56,400 --> 03:43:00,400
जय जय राम श्री राम जय राम

3202
03:43:00,400 --> 03:43:04,640
जय जय राम श्री राम जय राम जय जय

3203
03:43:04,640 --> 03:43:08,800
राम श्री राम जय राम जय जय

3204
03:43:08,800 --> 03:43:14,400
राम धर्म की जय हो धर्म का

3205
03:43:14,400 --> 03:43:18,960
प्राणियों में हो विश्व का कल्याण

3206
03:43:18,960 --> 03:43:23,280
हो गौ माता की जय हो हत्या

3207
03:43:23,280 --> 03:43:29,200
बंद हो भारत अखंड हो भारत

3208
03:43:29,200 --> 03:43:29,700
हर

3209
03:43:29,520 --> 03:43:34,000
हिंदू सेना हर हिंदू सनातन सनातन

3210
03:43:34,000 --> 03:43:38,320
हम भारत भव्य बनाएंगे हम हिंदू राष्ट्र बनाएंगे

3211
03:43:38,320 --> 03:43:43,760
हम भारत भव्य बनाएंगे

3212
03:43:43,760 --> 03:43:48,160
भगवत पूज्य पाद धर्म सम्राट स्वामी श्री कृपात्री जी महाराज की

3213
03:43:48,160 --> 03:43:52,800
जय जय हो स्मरणीय भगवत पूज्य पाद अनंतानंद

3214
03:43:52,800 --> 03:43:57,120
श्री समलंकृत ऋग्वेदीय पूर्वानाय श्री गोवर्धन पुरी पीठाधीश्वर

3215
03:43:57,120 --> 03:44:01,360
अनंत श्री विभूषित श्रीमद जगतुगुरु शंकराचार्य गुरुदेव भगवान की

3216
03:44:01,360 --> 03:44:07,360
जय जय नमः पार्वती हरव

3217
03:44:08,560 --> 03:44:12,720
चलिए सभी को जय श्री राम। जय श्री राम। जय श्री राम।

3218
03:44:12,720 --> 03:44:17,800
जय श्री राम।

3219
03:44:17,800 --> 03:44:21,800
[संगीत]
