⬜ Not used yet · 00:00:01:25 – 00:29:13:00 (29:11)
00:00:01:25 जी भैया जय श्री राम हरे कृष्णा प्रभु जी जय श्री राम हरे कृष्णा आप ही है आपसे ही बात हो रही थी अभी जो दिन भर कन्वर्सेशन हो रहा था जी जी जी प्रभु जी जी हां जी अ तो आपको किस चीज से असहमत हैं आप हमारी जो आपने हमसे संपर्क किया था प्रभु जी जैसे आपकी मैंने वीडियोस देखी हैं कि आप एक ही चीज को टारगेट करते हो कि जो शिव जी हैं जो विष्णु जी हैं उसको लेके तो उसमें मैं थोड़ा असहमत था। अच्छा इसके अलावा बाकी की चीजें जो है हमारी उससे आप सहमत हैं?
00:00:52:12 जी बहुत कुछ चीजें मतलब ये ऐसा देखा है कि हम सिर्फ शिवो विष्णु के बारे में बात करते हैं या फिर अन्य चीजें भी जानते हैं आप हमारी। अन्य थोड़ी बहुत जानता हूं। जैसे कि अभी शंकराचार्य प्रभु जी की बातें चल रही है हाल फिलहाल में उनके मैंने आपने हमारा कबीर पंथियों के साथ वीडियो देखा है? नहीं नहीं प्रभु जी आपने हमारा आर्य समाज के लिए वीडियो देखा है? नहीं नहीं प्रभु जी आपने हमारा इस्लाम के लिए वीडियो देखा है? थोड़ा थोड़ा देखा है। आर्य समाज के लिए अभी मैंने थोड़ी सी वीडियो देखी थी आज ही और इस्लाम के लिए भी मैंने थोड़ी वीडियो देखी थी। अच्छा अच्छा जी जी तो इस कौन को लेकर के जो वैचारिक स्पष्टता है संशय है या फिर जो हमारे प्रश्न है वो केवल एक नहीं है कि हरी और हर में भेद क्यों ये बहुत सारे प्रश्नों में से एक प्रश्न है तो ठीक है तो बताइए आप कि केवल विष्णु ही भगवान है उनको ही भगवान मानना चाहिए या सीधे इस पर आ जाते हैं कि आपके श्रीमद् भागवतम में तीन 152 25 में लिखा हुआ है कि शिव दुर्गा
00:02:07:15 काली के नाम को कृष्ण के नाम के समान समझने वाले मूर्ख है अपराधी हैं। उनका नाम जप करना मतलब उनको भगवान समझना कृष्ण के समान भगवान समझना उन्हें पाप है। मूर्खता है। तो यह इससे आप सहमत हैं। इस बात से जे प्रभु ऐसे मूर्ख नहीं कह सकते क्योंकि वो भी जो देवी देवता है वह भी उनके अंश हैं। ऐसे नहीं मैं पूछ रहा हूं क्या वो उनके समान है कि नहीं? नहीं समान नहीं है प्रभु जी। समान नहीं है। अच्छा समान ना होने के लिए आपका ऐसा क्यों बिलीफ है? समान नहीं है क्योंकि प्रभु जी बहुत सारी चीजें हैं जो कि मैंने भगवत गीता में पढ़ी है और श्री विष्णु पुराण में पढ़ी है बहुत सारी चीजें हैं जो उपनिषदों में भी प्रमाण देखा है क्या प्रभु जी देखो अभी मैंने सिर्फ अभी मैं प्राण पुराण पढ़ना आरंभ किया है मैंने अभी उपनिषद नहीं पढ़े तो जब आपने पूरा पूरा अभी आप आप अभी किसी निर्णय पे नहीं पहुंचना चाहिए ना जब आपने अध्ययन कंप्लीट नहीं किया है तो तो फिर आप क्यों क्यों कह रहे हैं कि नहीं उनको समान समझना पाखंड है। पाखंड तो मैंने शब्द यूज़ नहीं किया प्रभु
00:03:22:21 जी क्योंकि ये जो उस विचारधारा का समर्थन कर रहे हैं जो पाखंड कह रही है। अब आप मुझे बताइए चलिए मैं पूछता हूं आपसे क्या शिव दुर्गा काली को कृष्ण के समान समझना मूर्खता है या नहीं? नहीं मूर्खता नहीं है क्योंकि गरुण प्राण मेंता नहीं है तो मतलब आप यह जो भगवत श्रीमद् भागवतम भाष में जो लिखा है प्रभु जी पहले हम पहले सुनिए तो हम पहले एक विषय तय करेंगे फिर उस व्याख्या हम आपकी सुनेंगे विषय इसलिए तय करना आवश्यक होता है जैसे मैंने आपसे ये नहीं कहा क्यों मैं ये पूछ रहा हूं तो आप जब ये कह रहे हैं कि मूर्खता नहीं है तो आपका जो इस का श्रीमद् भागवतम भाष्य है उसमें जो ये लाइन मेंशन है कि उसको को समझना मूर्खता है। वह सही लाइन है या गलत लाइन है। इस बारे में आप क्या कहेंगे? मूर्खता और पाखंड इन दोनों शब्दों में बहुत बड़ा अंतर है। मूर्खता ये दोनों शब्द हमें इस से प्राप्त है। मूर्ख दोनों शब्द हमें इस से प्राप्त है। मूर्खता आपकी ग्रंथ मेंशन है और पाखंड आपके अधिकृत व्यक्ति ने बोला है। दूसरी बात मैंने प्रश्न आपसे पाखंड का नहीं किया। मैंने बोला मूर्खता। मैं दोबारा अपना प्रश्न क्लियर कर देता हूं कि
00:04:38:01 क्या शिव दुर्गा काली को क्या शब्द पहले यूज़ किया था तभी पाखंड हमने इसलिए बोला क्योंकि इस के अधिकृत व्यक्ति ने ये बात बोली है पाखंड बोला है प्रभु जी मैं यहां पे इस की बात करने के लिए नहीं तो आप आप इस की इस बात से सहमत है उसे पाखंड बोलना मैं आपसे पूछ रहा हूं अभी नहीं पाखंड पाखंड बोलने से सहमत है आप पाखंड अगर शब्द यूज़ हुआ है तो वह गलत है। मूर्खता आप उसका विरोध करेंगे यहां से जाने के बाद। किसका? जिसने पाखंड शब्द यूज़ किया है। नहीं प्रभु जी ऐसे तो हमें देखा जाए बहुत सारे एग्जांपल है हमारे पास। मैं मैं आपसे पूछ रहा हूं। विरोधाभासी भावना रखेंगे। जैसे आपने हमारा विरोध किया। एक तरीके से कमेंट किया। मान लीजिए कमेंट ही किया। कमेंट के द्वारा आपने असमर्थन अपना प्रकट किया। तो इसी प्रकार से कम से कम आप असमर्थन प्रकट करेंगे उनका जो पाखंड कह रहे हैं। नहीं असमर्थन नहीं मैं उनसे प्रश्न जरूर करूंगा जैसे कि मैं आपसे कर रहा हूं। असमर्थन नहीं करूंगा क्योंकि मेरा जो मतलब आप इसका विरोध नहीं करते हैं कि पाखंड बोला है। इस बात से आपको विरोध नहीं है। बस आप जानना चाहते हैं कि क्यों बोला है।
00:05:53:20 हां क्यों बोला उसका रीजन क्या है? जब तक मुझे वह पूरा नहीं पता होगा तो मैं उसको अब आप यह तो मानते हैं मूर्खता जी जी मूर्खता तो कई जगह कई जगह यूज हो जाता है बट कभी ऐसा हो जाता है कि क्या स्वीकार कर रहे हैं क्या शिव दुर्गा काली को मानने वाले कृष्ण के समान समझने वाले मूर्ख हैं आप क्या मानते हैं फिलहाल मूर्ख है या नहीं है प्रभु जी वो मूर्ख है क्योंकि वो परम ब्रह्म है और परम ब्रह्म को अगर देवता से मूर्ख मानते हैं ना बस अब ये अब ये थोड़ा सेट हुआ अब हम उससे आगे आपकी व्याख्या सुनते हैं कि क्यों आप क्यों कह रहे हैं कि वो मूर्ख है जी जी जैसे प्रभु जी आप एक चीज देखो एक पिता होते हैं एक पिता होते हैं उनका पुत्र होता है और जब वो पुत्र हो जाता है क्या वो पुत्र दोबारा वही पिता बन जाता है जिससे वो आया है अच्छा ये बताइए पुत्र क्या अलग से कहीं से निकलता है उसका अलग होता है पुत्र में क्या उतनी ही एबिलिटीज होती है जितनी पिता में है या सेम होता है पुत्र पहले पिता पर निर्भर करता है या नहीं
00:07:08:21 करता है प्रभु जी पहले आप एक चीज क्लियर करो कि जब एक पुत्र पैदा होता है पिता से तो क्या वो दोबारा वही पिता के वहीं पे जा सकता है जहां से वो इसको मैं और क्लियर कर देता हूं यही अंतर है मानवों में और ईश्वर में ईश्वर से जब कुछ निकलेगा तो पूर्ण ही निकलेगा क्योंकि ईश्वर पूर्ण है। मानव पूर्ण नहीं है। उससे जब कुछ निकलेगा तो वो अपूर्ण निकलेगा। दूसरी बात इसको और आगे चलते हैं। क्या आप वेदों के याह
00:07:43:10 पूर्ण तो सिर्फ परब्रह्म है। बाकी जो इनके तत्व है वो तो अपूर्ण है। वो पूर्ण नहीं है। ये आप किस आधार पर कह रहे हैं? वो परब्रह्म है। बाकी सब उनके तत्व है। जी ग्रंथों के आधार पर कह रहा हूं। प्रभु जी आप श्री विष्णु पुराण उठा के देख लो। उसमें स्वयं भगवान शिव उनकी मैं आपको वेदों का वाक्य दिखा दूं कि शिव की भक्ति करना मोक्षदायक है। उपनिषद का वाक्य दिखा दूं। तब आपका फैसला क्या होगा? प्रभु जी गरुण पुराण में 12 12 आप मुझे पुराण का उदाहरण दे रहे हैं। मैं आपको श्रुति का वो दे रहा हूं। प्रमाण श्रुति मैं भी प्रभु जी मैं आपको श्रुति का दे रहा हूं। अगर मैं आपसे आपको उपनिषद का वाक्य दिखा दूं कि शिव की भक्ति करना मोक्षदायक है तो आपका निर्णय क्या होगा? क्या आपका निर्णय बदल जाएगा या यही रहेगा जो अभी है? जो अभी है प्रभु जी जो मैंने पढ़ा मैं अपने निर्णय पर रहूंगा जो आप जब तो आप श्रुति को नहीं जब मैं आपको पढ़ा दूंगा मैं तब की बात कर रहा हूं तो क्या आप पुराण को नहीं मानते हो पुराण को मानता हूं फिर मैं भी उपनिषदों को मानता हूं जब मैं पढूंगा तब मैं तो मैं पुराण को मानने से मना कहां कर रहा हूं जब ये कहा गया कि विष्णु जी परम
00:08:58:19 ब्रह्म है तो मैंने उनको परम ब्रह्म माना जब ये कहा गया कि शिव जी परम ब्रह्म है तो मैंने उसको भी परम ब्रह्म माना आपने ने जब विष्णु को कहा गया तब तो माना मगर जब शिव को कहा गया तब नहीं माना। दूसरी बात आपने कुछ श्लोकों से आप किसी भी श्लोक से सिद्ध नहीं कर सकते कि शिव और विष्णु में भेद है। मगर भेद नहीं है। यह मैं नारद पुराण से सिद्ध कर सकता हूं। भेद नहीं है। ये मैं भागवत से सिद्ध कर सकता हूं। मुझे पूरा करने दीजिए। भेद नहीं इसके अलावा इसके अलावा एक वचन है। पुराणों का ही वचन है। मत्स्य पुराण 145वा अध्याय 52वा श्लोक सभी श्रुति स्मृति शास्त्रों में सामंजस्य की शिक्षा साधु सम्मत धर्म है। अगर कोई ऐसी शिक्षा है जो दूसरे का खंडन कर रही है तो हमको ऐसा अर्थ निकालना पड़ेगा। खंडन वाला अर्थ नहीं हमें ऐसा अर्थ निकालना पड़ेगा जिसमें किसी का भी खंडन ना हो। तो श्रुति शास्त्रों में शिव की भक्ति को मोक्ष कहा जा रहा है। उपनिषद में कहा जा रहा है। मैं आपको अभी श्लोक खोल के दिखा देता हूं। जब विष्णु को परम ब्रह्म कहा जा रहा है तो हमने मानने से मना थोड़ी ना किया है। मगर यह कहीं नहीं लिखा है कि विष्णु और शिव में भेद है।
00:10:09:08 ये तो ये यजुर्वेद का श्लोक है यजुर्वेद यजुर्वेद का श्लोक है। इसका संस्कृत का उच्चारण मैं नहीं पढूंगा। मगर सीधे सीधे इसमें शिव स्वरूप कल्याण दाता और मोक्ष दाता कहा गया है। मोक्ष ओके इसको आप नहीं मानेंगे प्रभु जी जब मैं जब मैं उसको अच्छे से मैं पढूंगा पूरा जब फिर आपको आने की आवश्यकता नहीं है। आप पहले अपना अच्छे से अध्ययन करिए तब आते हैं आप फिर आप आए क्यों है? प्रभु जी इसमें मेरी जो मैं बात मतलब आपने अगर इतना पढ़ लिया है तो हम उसके आधार पे आपसे बात करें जितना आप पढ़ के आए हो। उसके बाहर से हम बात ना करें। जबकि उसके बाहर भी सच्चाई है। आपको कितना लग रहा है प्रभु जी कि आपने आप मेरी बात कंप्लीट नहीं होने दे रहे। आपको जो जो चीजें मैंने जो आपने जो बात बोलिए अपनी बात बोलिए हां हां बोलिए अपनी बात जो वीडियो में आपने मैंने जो कमेंट किया था उसमें आपको मैंने बताया कि गरुण पुराण में ऐसा मेंशन है कि ब्रह्मा विष्णु और शिव में कोई अंतर नहीं है और कोई भी उनमें भेद
00:11:24:09 करता है तो उसको गौ हत्या के बराबर पाप लगता है। ठीक है प्रभु जी? अब अब आते हैं उसके आगे कि परब्रह्म जो हैं वह विष्णु से भी ऊपर हैं। जिनको हम श्री कृष्ण कहते हैं भगवत गीता में ऐसा वर्णन है जहां पे वो खुद कहते हैं कि मैं ही परम ब्रह्म हूं। किसी भी जितने भी शिव जी हैं और ब्रह्मा जी हैं और ये अपने विष्णु जी हैं ये कहीं भी ऐसा नहीं कहते कि मैं परब्रह्म हूं। पर श्री कृष्ण भगवान ने भगवत गीता में कहा है अर्जुन को और उन्होंने अपना प्रमाण भी दिया है विश्व रूप दिखा के अर्जुन को क्योंकि उस टाइम उसको भी विश्वास नहीं हो रहा था ये एक मिथ्या है अब हो गई आपकी बात पूरी हो गई मैं बोलू अब जी जी जी ये एक मिथ्या है कि केवल श्री कृष्ण भगवान ने स्वयं को परम ब्रह्म कहा है मिथ्या है ये जो फैलाई गई है शिव पुराण में शिव जी ने स्पष्ट कहा है मैं हूं परम ब्रह्म राम गीता में अध्यात्म रामायण में राम जी ने कहा है मैं हूं परम ब्रह्म भगवती पुराण में भगवती भगवती ने कहा है मैं हूं परम ब्रह्म ये एक मिथ्या फैलाई गई है शिव पुराण में आपको दिखाऊं प्रभु जी विश्वूप किसने दिखाया फिर अगर
00:12:39:10 ऐसा कह दिया उन्होंने तो विश्व रूप अच्छा ये सनातन सिद्धांत है कि जो विश्वूप दिखाएगा उसको ही परम ब्रह्म माना जाएगा यही तो मेन प्रमाण है नहीं तो कलयुग में ये सनातन आप ये सनातन सिद्धांत है कि जो विश्व रूप दिखा अब मैं कह दूं हलाहल विष किसने पिया भाई? प्रह्लाद महाराज तो आप मुझसे पूछोगे हलाहल विष पीने से ये सिद्ध नहीं होता कि विष पीने वाला ही परम ब्रह्म है। हल पार्वती माता के साथ विवाह किसने किया भाई? अब आप मुझसे पूछोगे यह कहां का सिद्धांत है कि जो पार्वती से ब्याह करेगा वही वही परम ब्रह्म है। तो यह आपका अपना व्यक्तिगत तर्क है। जब श्रुति ने किसी को महर्षि वेदव्यास दो एक 11 व्यक्तिगत तर्क अमान्य है। व्यास जी को पुराणों को मानते हैं ना। तो व्यास जी ने कहा है व्यक्तिगत तर्क अमान्य है। आप इसका शास्त्रों से मुझे दीजिए कि जो विराट स्वरूप दिखाएगा वही परम ब्रह्म माना जाएगा। दूसरी बात ये बताइए सीधे आ जाते हैं। शास्त्रों में कहते हैं प्रभु जी वही बताते हैं कि अर्जुन कहते हैं कि अगर आप परम ब्रह्म हो तो मुझे अपना वही स्वरूप दिखाओ। तब कृष्ण भगवान ने उनको विश्वूप दिखाया था। तो शिव जी ने शिवजी से किसी ने नहीं कहा। शिवजी को वो चीज नहीं करनी थी। शिव
00:13:54:12 जी को दूसरी चीजें करनी थी। शिवजी से किसी ने नहीं कहा ये चीज। उनकी लीला अलग है। उनकी कथा अलग है। अच्छा चलो अब सीधे आ जाते हैं। क्या इस के द्वारा पूजित होने वाला जो ईश्वर है कृष्ण वो सर्वशक्तिमान है। इस के साथ नहीं प्रभु जी उनको पूरा जगत पूजता है। इस पूजते हैं मगर इस की विचारधारा के अनुसार पूजित होने वाला जो कृष्ण है क्या वो सर्वशक्तिमान सिद्ध होता है? जी प्रभु अच्छा तो जी जो ईश्वर है उसकी एक चीज है कि वो अबाध्य है सर्वशक्तिमान है वो किसी भी नियम के नीचे नहीं है बल्कि सभी नियमों को बनाने वाला सर्व नियामक है अब आप ये बताइए जिस प्रकार दूध से दही बन जाता है पर दही से दूध नहीं उसी प्रकार कृष्ण तो शिव बन जाते हैं पर शिव से कृष्ण नहीं बन पाते तो यहां पे जो आपका कृष्ण है इस का कृष्ण ये कृष्ण रुक क्यों रहा है शिव बनने से वापस पास कृष्ण क्यों नहीं बन पा रहा है
00:14:55:18 यह जैसे एक वो है बल्ब है बल्ब के अंदर लाइट होती है तो क्या वो लाइट बल्ब बन सकती है ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है बन सकती है ईश्वर है यहां बात यहां बात बाित चीजों की नहीं हो रही है तो श्री कृष्ण तो इसका मतलब आप ये कह रहे हैं ना कि ईश्वर भी कुछ कार्य है जो नहीं कर पाता है आप ये कह रहे हैं ना कुछ कार्य है जो ईश्वर भी नहीं कर सकता। ये कह रहे हैं ना आप? मैंने तो ऐसा नहीं कहा। मैं तो तो आप तो बल्ब से आप जो मैच करा के कह रहे हैं क्या बल्ब से वो लाइट बल्ब बन सकती है? तो वही तो मैं कह रहा हूं। ईश्वर से शिव बन रहे हैं तो शिव से निकल कर के पूर्ण से पूर्ण ही निकलता है। वेदों में वाक्य है। पूर्ण से पूर्ण ही निकलता है। तो पूर्ण जब निकल रहा है तो जब वो पूर्ण है तो वह वापस क्यों नहीं बन सकता है पूर्ण?
00:15:52:21 आपकी आवाज आपकी आवाज वो हो रही है। संतुलन नहीं आ रहा है आपका। बोलिए दोबारा बोलिए आपकी आवाज जी बोलिए। व्यवहार में भिन्न है, परमार्थ में नहीं है। व्यवहार में नहीं बन सकता। परमार्थ में बन सकता। उसी को अद्वैत कहा जाता
00:16:38:03 है। नहीं नहीं आपने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया। मैंने आपके सवाल का जवाब दिया। व्यवहार में नहीं बन सकता। परमार्थ में वही उसकी प्राप्ति है। वही लक्ष्य है उसका मोक्ष। आपका वो चेहरा नहीं दिख रहा है। आप एक काम करिए एग्जिट हो जाइए। दोबारा से ज्वाइन करिए। कभी-कभी मैं इस के कुछ फॉलोअर्स से बात करता हूं तो मुझे कभी-कभी वैसा
00:17:53:22 लगने लगता है कि जो इनको मालूम है बस ये उतना ही बोलेंगे उतना ही पढ़ेंगे उसके आगे ना 1 इंच इनको जानना है ना जानने की उत्सुकता है। तो यह सब देख के बड़ा हृदय को दुख होता है। और यह हमारे हिंदू भाई है जो हमसे छीने जा रहे हैं। एक जब तक ईश्वर को सर्वशक्तिमान सिद्ध नहीं करेंगे तब तक हम धर्म की स्थापना नहीं कर पाएंगे और तब तक हमारी मातृशक्ति सुरक्षित नहीं हो पाएगी। धर्म और अधर्म की जो लड़ाई है वो मूलत एक आधार पर है। मातृ शक्ति का शोषण या मातृ शक्ति की रक्षा। तो मैं जो लोगों से जाकर के प्रश्न करता हूं ना बार-बार कि आपका ईश्वर सर्वशक्तिमान है कि नहीं? ईश्वर को बाधित करने की आड़ में दुनिया में शोषण शुरू होता है। अधर्म शुरू होता है कि भाई सर्वशक्तिमान ईश्वर ने तो वो दे दी है मर्यादा। तो कैसे कैसे मर्यादा
00:19:09:01 को लांगा जाए? कैसे शोषण किया जाए? तो चलो एक नया ईश्वर लाते हैं। फिर उसे बाधित किया जाता है। जी जी जी बोलिए प्रभु। जी तो मैं ये कह रहा था कि इसका अर्थ ये है आप ये मानते हैं कि श्री कृष्ण भी कुछ कुछ कार्य है जो नहीं कर सकते। नहीं मैंने तो ऐसा बोला नहीं प्रभु कि हां वो कोई कार्य नहीं कर सकते। देखिए आप कुछ बोलते नहीं है मगर मगर अपनी जो परिभाषा में जो बात करते हैं ब्रह्म तो प्रभु वही है जो सब कुछ कर सकते हैं। जी तो अब जब वो शिव बने तो उसके बाद वापस कृष्ण क्यों नहीं बन पा रहे हैं? शिव वो नहीं बने। शिव शिव उनका एक अंश है। तो यानी कि हां इसको थोड़ा मैं समझ लूं। अच्छा है आपने ये बात बोली कि शिव उनका एक अंश है। तो यानी कि उनके उनका कोई एक हिस्सा अगर उनसे अलग हो जाता है। एक मुझे पूरा करने दीजिए। मुझे पूरा करने दीजिए। मुझे पूरा करने दीजिए। मुझे पूरा करने दीजिए। मुझे पूरा करने दीजिए। आप पूरा नहीं करने देंगे। 64 है। आप पूरा नहीं करने देंगे। आप आप पूरा नहीं करने देंगे। जी जी जी बोले बोले तो जब उनका कोई एक
00:20:24:04 हिस्सा उनसे अलग हो जाता है तो वो अपने उस कण में वो इतना सा हिस्सा है। मान लीजिए उस कण में वो पूर्ण नहीं है। क्या उनको वो तभी तक पूर्ण है जब तक वो पूरे रहेंगे। उनका अगर वो अंश अलग हो जाएगा। तो उस अंश में उस अंश में वो पूर्ण नहीं है क्या? जी जी अंश में पूर्ण नहीं है तभी तो वो उनका अंश है। अगर वो पूर्ण हो सकता है अच्छा अंश में पूर्ण नहीं है। इसका मतलब आप ये कह रहे हैं कि जो ईश्वर है वो अपने अंश में पूर्ण नहीं हो सकता। पूर्ण हो सकता है पर वो उन्होंने अपना पूर्ण रूप दिया नहीं। उस अंश को जैसे मतलब ये ये आप कह रहे हैं कि ईश्वर की इच्छा पर निर्भर है कि वो अगर अपने अंश को पूर्ण दे तो वो पूर्ण होगा नहीं देंगे तो नहीं होगा इच्छा पर है ना तो फिर तो इसका मतलब इसको छोड़ दीजिए जब उनकी इच्छा है तो वो तो चाहे जो करें वो देंगे पूर्णता नहीं देंगे फिर आप वादित क्यों कर रहे हो कि वो नहीं कर सकते ऐसा कहीं प्रमाण है कि उन्होंने ये किया किनों वो नहीं देते शिवजी को अपनी संपूर्ण शक्तियां ऐसा कुछ लिखा है शिवजी जब उनसे से निकलते हैं तो शिव जी को अपनी संपूर्ण प्रभु जी बहुत सारे प्रमाण है जहां पे शिव जी का और कृष्ण भगवान का युद्ध हुआ है
00:21:39:10 वहां आप देख सकते हो और सबसे मेन चीज जो परब्रह्म होता है वो कभी मोह माया में नहीं पड़ता पर जब विष्णु भगवान ने मोहिनी अवतार लिया था तब शिव जी भी अह मोह मोह बस उनमें फंस गए थे और उन्हें विष्णु भगवान ने बोला कि आप समझो आप तो वो त्रिदेवों में से एक हो। आप इस मोह माया के चक्कर में क्यों फंसे? ये आपने बहुत अच्छा किया। ये आपने बहुत अच्छा किया। मैं एक मिनट आप पर कोई होता है तो वो मोह माया में फंसता है क्या? अब ठीक है। अब आपने बहुत अच्छा किया ये कह के। इसका अर्थ ये है कि परबह्म जो है मोह माया में नहीं फस सकता। बाधित हो गया ना? जी। सीमा लग गई ना? जी जी जी बाधित हो गया। जी जी मोह माया में नहीं फस सकता ना जी जी बोलिए बोलिए अरे मैं आपसे पूछ रहा हूं एक सीमा आ गई ना कि परबह्म जो है मोह माया में नहीं फस सकता ये क्या है ये कोई सीमा अच्छा ये सीमा नहीं है ये क्या है ये नियम नहीं है मैं आपसे पूछ रहा हूं ये नियम नहीं है क्या ये नियम नहीं है क्या कोई नहीं है
00:22:54:24 कि नहीं ठीक है। ये नियम है कि नहीं? मैं पूछ रहा हूं ये नियम है कि नहीं? क्या है ये जो आप बोल रहे हैं? ऐसे ही कुछ दिन पहले अब मैं एक बात बता दूं। ऐसे ही कुछ दिन पहले हमारी कबीर पंथियों से बात हुई। कबीर पंथियों से हमने पूछा क्या आपका ईश्वर सब कुछ कर सकता है? बोले हां। मैंने पूछा क्या वो माता के गर्भ से जन्म ले सकता है? बोले ना। मैंने बोला ये तो नियम लग गया। तो पता है वो क्या बोले? यह नियम नहीं है। तो क्या है ये? क्यों बोल रहे हो? जब नियम नहीं है तो। अगर यह कुछ है ही नहीं, इसका अस्तित्व नहीं है तो बोल क्यों रहे हो? यह नियम ही तो है कि परबह्म माया से प्रभावित नहीं हो सकता है। क्या है ये? चलिए वो दर्शक देख लेंगे। आपका कहना है परबह्म माया से प्रभावित नहीं हो सकता। परबह्म अपने अंश में पूर्ण नहीं हो सकता। मगर फिर भी वह सर्वशक्तिमान है। जी क्योंकि परब्रह्म में ईश्वर की जो हमारी डेफिनेशन है अब मैं बता दूं। ईश्वर की जो हमारी डेफिनेशन है वो है पहला नंबर है असतो मा सदगमया तमसो मा ज्योतिर गमया मृत्युमा मा मृतम गमया इसका अर्थ है अगर भाव में जाएंगे तो दुनिया के प्रत्येक प्राणी के अंदर सतचित आनंद की चाह है
00:24:10:14 और अगर इसको देखेंगे तो वो ढूंढ रहा है सब कुछ कर सकने वाले को सब कुछ किसी भी तरीके की बाधा से रहे तो इस चाह का जो सब्जेक्ट होता है। जैसे भूख भूख का विषय क्या होता है? खाना जो भूख को मिटा सके। तो सतचित आनंद की चाह का जो विषय होता है वो होता है सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर। अगर हमारा जो परमेश्वर है जिसको हम परमेश्वर कह रहे हैं वो सब कुछ कर सकने वाला नहीं है तो वो मनुष्य की चाह का विषय ही नहीं है। इसका अर्थ है कि ऐसे ऐसे ईश्वर को मनुष्य अपने विकल्प के अनुसार या तो प्राप्त करना चाहेगा या तो प्राप्त करना नहीं चाहेगा। तो नास्तिकों के सामने इस ईश्वर का अस्तित्व हम सिद्ध नहीं कर सकते। जो कहेगा कि मैं माया से प्रभावित नहीं हो सकता। समझने का प्रयास करिएगा हम क्यों करते हैं। क्यों क्यों ईश्वर का सर्वशक्तिमान सिद्ध होना आवश्यक है। नास्तिकों के सामने इस ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध हम नहीं कर पाएंगे। जो खुद ही कह रहा है कि मैं माया से प्रभावित नहीं हो सकता। जब नहीं कर पाएंगे तो क्या है? धर्मे हीना पशु भी समाना। सामने खड़ी हुई तीन स्त्रियों में से कौन माता है, कौन बहन है, कौन पिता है, यह हमें धर्म से पता लगता है। और धर्म क्या है? सच्चिदानंद
00:25:25:20 स्वरूप परमेश्वर को प्राप्त कर करवाने वाली मर्यादा का नाम धर्म है। तो जब सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर सच्चिदानंद स्वरूप हो ही नहीं रहा है। वो अबाध्य हो ही नहीं रहा है। तो फिर उसको प्राप्त करने की कोई प्रयास क्यों करेगा जो मर्यादाओं का आलंबन ले? तो जब मर्यादाओं का आलंबन नहीं लेगा तो उसके पास धर्म होने का कोई आधार नहीं बचा। तो हमारा जो ईश्वर है तो वह है मनुष्य की इस चाह का विषय असुतो मा सद्गमया तमसो मा ज्योतिर्गमया मृत्यु माम गमया इसका विषय है सत्यम ज्ञानम अनंतम ब्रह ईश्वर किसी भी प्रकार के नियम के नीचे नहीं है। वो सभी नियमों को बनाने वाला सर्व नियामक है। इसीलिए अगर कोई कहे कि ईश्वर जन्म नहीं ले सकता तो वो राम कृष्ण आदि के रूप में जन्म ले दिखाएगा। अगर कोई कहे कि वह अपनी देह का नाश नहीं कर सकता तो अपनी देह का नाश भी करके दिखाएगा। अगर कोई कहे कि वह कम नहीं बन सकता। वो कम अवतार लेगा। व नहीं बन सकता वरा अवतार लेगा। कोई कहे वो वामन नहीं बन सकता। मत्स्य नहीं बन सकता। वो सारे अवतार लेगा। कोई कहे कि वो आधा जानवर आधा इंसान नहीं बन सकता। वो वो भी बन के दिखाएगा। कोई कहे कि वो झूठ नहीं बोल सकता। वो कृष्ण बनेगा। कोई कहे कि वो छल नहीं कर सकता। वो मोहिनी बनेगा। कोई कहे कि वो राम वो सच नहीं बोल सकता तो वो राम बनेगा। यह है ईश्वर। वह हर उस बाधा
00:26:40:26 को तोड़ सकता है जो एक मनुष्य सोच सकता है। इसका अर्थ क्या हुआ? कि दुनिया में किसी भी कार्य के कारण हम यह नहीं कह सकते कि सनातन ईश्वर के सामने एक लाइन लिखी जा सकती है कि दुनिया में कोई भी कार्य ऐसा है जिसके लिए उसके सामने लिखा जा सके कि ही कांट डू इट। यही लाइन है जो सनातन को सर्वशक्तिमान ईश्वर प्रदान करती है। जिसकी वजह से सनातन अलग हो जाता है। दुनिया की सारी सनातन विरोधी विचारधाराओं से। अगर केरल स्टोरीज वाली लड़कियों से जब पूछा जाएगा कि ये तुम्हारा कैसा ईश्वर है? जो रो रहा है। ये तुम्हारा कैसा ईश्वर है जो रास रचा रहा है। यह तुम्हारा कैसा ईश्वर है? जो अपनी पत्नी के खो जाने पर वानरों की सहायता ले रहा है। तो हमको उन बच्चियों को केवल एक नियम बताना होगा कि ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है। तो भगवान ने जो विभिन्न प्रकार की लीलाएं की है उसमें उन्होंने बहुत सारे साइंटिफिक स्पिरिचुअल फिलॉसफिकल अर्थ बताएं। ब्रह्मा सरस्वती विवाह गणेश जी का सर काटना शिव जी का मोहिनी के प्रति आकर्षित हो जाना। भृगु ऋषि की पत्नी का गला काट देना, विष्णु जी के कान से मधुकटप का उत्पन्न हो जाना जिससे विष्णु जी ही नहीं जीत पा रहे हैं। माता को आकर के उनका वध करना ये सब लीलाओं के अपने अपने अर्थ
00:27:55:27 तो हैं। मगर एक बात भगवान बार-बार हमें बता रहे हैं। ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है। इसी बात को भगवान ने भगवत गीता में भी कहा कि वो लोग जो मुझे मनुष्य देह में देख करके मेरा ब्रह्म ब्रह्म तत्व भूल जाते हैं। मेरा ब्रह्मत्व नहीं भूल जाते। वो मूर्ख है। वो बताने आए हैं आपको कि भाई मेरे ऊपर ये मर्यादा लागू नहीं होती। मुझे फिनिश कर लेने दीजिए। तो ये है एक मिनट एक मिनट पूरा कर लेने दीजिए। मुझे पूरा कर लेने दीजिए। मुझे पूरा कर लेने दीजिए। तो वो आपको इन लीलाओं के माध्यम से बता रहे हैं। मोहिनी के प्रति आकर्षित भी होंगे। उनके कान से मधुकटप भी उत्पन्न होंगे। वो माता बनके भी रक्त बीज का वध करेंगे। ब्रह्मा विष्णु महेश तीनों एक साइड खड़े हो जाएंगे। और काल्यावन से श्री कृष्ण के रूप में भागेंगे भी रण छोड़ के भागेंगे। वो यह भी करके दिखाएंगे कि मैं भाग रहा हूं। देखो मैं डर भी सकता हूं। वो सब कुछ करके दिखाएंगे। क्योंकि ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है। हमें इसी बात को हम प्रचारित प्रसारित करने का प्रयास कर रहे हैं। आपका ईश्वर कौन है? जो बाधित हो रहा है। जो माया से मोहित नहीं हो सकता। उस पर एक बाधा लग रही है। और जब जब ईश्वर पर बाधा लगती है तब तब अधर्मी तंत्र उत्पन्न होते हैं। अब बताइए आप
00:29:11:00 [संगीत]
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शिव,दुर्गा काली माँ को कृष्ण जी के सम्मान समझने वाला मूर्ख है अपराधी है ? - #iskcondevotees
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