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00:00:01:22 जाते हैं और आकाश जी आ चुके उनको ले लेते हैं। जय श्री राम जी जय श्री राम। वर्ण व्यवस्था मेरे हिसाब से समाज को चलाने के लिए दी गई है। जैसे कि भगवान ने सृष्टि का निर्माण किया। ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण किया। उसके हिसाब से इंसानों को बफरकेट किया चार हिस्सों में कि ये इस समाज के हिस्से का काम ये करेंगे ये करेंगे ये करेंगे ठीक है और वर्ण व्यवस्था मेरे हिसाब से आपके हिसाब से जन्म से ही होती है मेरे हिसाब से जन्म से होती है परंतु अगर किसी का कर्म उसके जन्म के वर्ण मतलब कोई परिवार है कोई मान लो ब्राह्मण परिवार का है लेकिन वो अगर कर्म ब्राह्मण वाले नहीं कर रहा है फॉर अ लॉन्ग पीरियड ऑफ टाइम तो उसको हमें उस वर्ण का मानना चाहिए क्योंकि अल्टीमेटली वर्ण व्यवस्था हमने इस चीज के लिए कि समाज कैसे काम करेगा अगर कोई ब्राह्मण कुल में जन्म किसी ने लिया है और वो लॉन्ग टाइम के लिए या आजीवन मान लो वैश्य करता है बिजनेस है बिजनेस करता है तो हमें उसे अगर सामाजिक दृष्टि से देखा जाए तो उसे हमें वैश्य मानना पड़ेगा यह मेरा पॉइंट

00:01:17:06 है अच्छा मैं पहले आपने जो कहा है ना उसमें एक बात कह देता हूं। जैसे कि हम आपने कहा कि ब्राह्मण यदि अपने वर्ण के अनुसार कार्य नहीं कर रहा है और वो शायद वैश्य व्यक्ति के अनुसार वो अपने जीवन को पार्जन कर रहा है। है ना? ठीक है। अब एक बताइए मुझे कि पतित ब्राह्मण किसे कहेंगे? या कर्म संकरता का दोष कहां पर आएगा?

00:01:55:25 दोष आएगा। जैसे जैसे इसको मैं आपको बताऊं जैसे कि हमने किसी को कोई ड्यूटी दी है। कि तू वॉचमैन है। तेरा काम है यहां पे रक्षा करना। ये तेरी ड्यूटी है। हम ठीक है? हम मगर उसने अपनी ड्यूटी नहीं निभाई। किसी कारण से उसको आसक्ति हुई कि मैं जाकर के वहां पर सब्जी की ठेल लगा लूं। टमाटर बेचूं तो हम उसे ड्यूटी से भागने वाला कहेंगे या उसको ये कहने लगेंगे टमाटर बेचने वाला है। उसकी आइडेंटिटी क्या होगी उस समय?

00:02:36:00 अ मैं बताता हूं उसकी आइडेंटिटी क्या होगी? अह पहले उसने कर्म चूज़ किया अह रक्षा का। क्षत्रिय हो गया वो जैसे कि गार्ड की नौकरी करता गया तो क्षत्रिय हो गया उसके बाद उसका मन परिवर्तन हुआ आप उसको ये नहीं बोल सकते कि वो भागा है हम उसको इस तरीके से क्यों देख रहे हैं कि वो भागा है उसने कर्म अपना चेंज किया है पहले आजीविका वो रक्षात्मक कार्य से कमा रहा था अब वो आजीविका सब्जी का ठेरे लगाने से कमा रहा है तो उसका चेंज हो गया ना कर्म चेंज हो गया इसको हम करण आप जैसे बोल रहे हो कर्म संकरता है वर्ण संता बोल सकते हैं

00:03:10:19 इससे मुझे दो बातें समझ में आई। आपने जो बातें कही है। ठीक है? पहली बात यह है कि मेरा आपने वो जवाब नहीं दिया कि पतित ब्राह्मण या कर्म संकर्ता कब कहा जाएगा? मैं इसका जवाब देता हूं। पतित ब्राह्मण चलो किसी ने जन्म लिया ब्राह्मण कुल में। वो ब्राह्मण है लेकिन वो ब्राह्मण का कर्म नहीं कर रहा है। मतलब कोई कोई और भी कर्म नहीं कर रहा है। लेकिन ब्राह्मण का कर्म नहीं कर रहा है। तो वह रहेगा तो ब्राह्मण श्रेष्ठ नहीं है। कोई बातचीत भी करती है। डेली लाइफ नहीं देखो कोई कोई भी अपनी दिनचर्या में कुछ ना कुछ करता ही है। उसके हिसाब से हम उसको बोलेंगे कि भाई ये ये है या ये ये है। आजीविका कमाने के लिए या किसी भी कार्य के लिए वो कुछ ना कुछ कर्म तो करता ही है। ठीक है? तो अगर वो ब्राह्मण अपना काम नहीं कर रहा है जैसे कि तीन टाइम की संध्या नहीं कर रहा है और जो भी ब्राह्मण कर्म है या उसके घर वालों ने ब्राह्मण का आजीविकोपार्जन वेद इत्यादि पठन पाठन ईश्वर का पठनपाठन कर्मकांड इत्यादि करके उसका आजीविकोपार्जन होना है हम नहीं कर रहा है वो गायत्री वो गायत्री साधना नहीं कर रहा है संध्या वंदन नहीं कर रहा है वो ये सब नहीं कर रहा है

00:04:26:16 इसको कर्म शंकर नहीं कहेंगे और किसी और चीज को कहेंगे इसको इसको ये बोलेंगे ना श्रेष्ठ ब्राह्मण नहीं है। ब्राह्मण तो है। कुछ ना कुछ वही कह रहा हूं। मैं वही कह रहा हूं। मैं वही मैं समझ गया। आप आप मेरी मेरी जगह आ गए। एक एक करके करेंगे तो हो जाएगा क्लियर। यानी कि कोई ब्राह्मण अपने जो वर्णोचित कर्म है वर्णोचित आचरण है उनको ना करके दूसरे अन दूसरे जो वर्ण उसके वर्ण के बाहर की चीजें करता है तो वो श्रेष्ठ ब्राह्मण नहीं है मगर जो ब्राह्मण विशेषण है उसका वो रहेगा उसके पास ठीक है मैं पूरा कर लूं एक मिनट दूसरी बात ऐसे ही ब्राह्मण को पतित ब्राह्मण और ऐसे ही कर्म करने वाले को कर्म संकर भी कहा जाएगा कि वो कर्म से शंकर है संकरता आ दोष आ गया कर्म संकर्ता का वहां पर दोष आया क्या आया कि उसके कर्म जो होने चाहिए थे वो ना हो के दूसरे कर्म में यानी कि श्रेष्ठ वो हुआ जो अपने आचरण के अनुसार चल रहा है और पतित वो हुआ जो अपने आचरण से हीन हो गया आचरण हीन हो गया ठीक है तो पतित पतित ब्राह्मण है ना तो जब हमने उसको कहा कि वो पतित ब्राह्मण है तब तो वो दोषी दिखाई देगा मगर यदि हमने दायित्व

00:05:41:22 से हटना हटने को भी एक दूसरे दायित्व का नाम दे दिया तो दोषी कहां रहा वो? यदि अपने दायित्व दोषी नहीं। यदि अपने दायित्व से हटने को भी हमने एक दूसरे दायित्व का नाम दे दिया। उसको छाव दे दी कि भाई तुम अब तुम्हारी ड्यूटी ये है। मगर अब तुम अपनी ड्यूटी ना निभा के कुछ और कर रहे हो जिसमें तुम्हें मजा आ रहा है। जिसमें तुम्हें आनंद आ रहा है जिसमें तुम्हारी आसक्ति है। तो अब तुमने अपनी ड्यूटी ना निभा करके दूसरी एक दूसरे काम करने लगे। तो हम उसको यह नहीं कहेंगे कि वो ड्यूटी से भागा बल्कि हम यह कहेंगे कि तेरी अब से यही ड्यूटी है। तो वो दोषी नहीं रहा। अगर हमने उसको वो टैग दे दिया ड्यूटी वाला तो वो दोषी नहीं रहेगा। अब दूसरी एक बात मैंने आपकी बातों से यहां ये समझी है कि जैसे कि आपने बताया कि उस वो ऐसा नहीं कहेंगे कि वो भागा। आपने एक बात कही ऐसा नहीं कहेंगे कि वो भागा बल्कि ये कहेंगे कि उसका मन परिवर्तित हो गया। ठीक है? हम तो इसका अर्थ यह है कि वर्णाश्रम जो धर्म बताया गया है या वर्णाश्रम के अनुसार जो कर्म बताए गए हैं हम उनको आप धर्म की दृष्टि से नहीं देखते क्योंकि धर्म जो होता है वो मन परिवर्तित होने के आधार पर बदला नहीं जाता। कहने

00:06:56:28 का अर्थ यह है कि आप वर्ण वर्णाश्रम के अनुसार जो बताई गई नियमावली है कि तेरे अमुक अमुक कर्म होंगे उन कर्मों को आप धर्म की दृष्टि से नहीं देख रहे हैं क्योंकि आप उनको परिवर्तनशील मान रहे हैं मन के आधार पर जबकि धर्म वो है जो मन के आधार पर परिवर्तित नहीं होगा। बहन तो बहन बहन के साथ क्या आचरण है वही रहेगा। माता के साथ क्या आचरण है वही रहेगा। धर्म वो होता है जो परिवर्तनशील ना हो। सनातन धर्म तो कम से कम वही होता है। अब जो परिवर्तनशील है वह क्या है? जैसे इस्लाम में पांच 101 में कहा गया कि ज्यादा सवाल मत करो वरना तुम्हारे लिए वो आयतें भी खोल दी जाएंगी जिनके कारण पहले के कुछ लोग बागी हो गए थे। हम तो यानी कि पहले के लोग बागी हो रहे थे। इसलिए उनके उनको नहीं समझ में आ रहा था मन। उनका मन जो है उनको एक्सेप्ट नहीं कर पा रहा था नियमों को। इस वजह से कुछ नियम बदल दिए गए इस्लाम के

00:08:03:02 अनुसार। तो धर्म हमारा जो धर्म है वो बदलता नहीं है। तो यहां पे मैं आपसे जानना चाहूंगा क्या मन के आधार पर आप धर्म को बदलने वाला मानते हैं या नहीं मानते? मन के आधार पर धर्म नहीं बदला जा सकता। पर हम जो हमारा ये जो टॉपिक है वो सामाजिक व्यवस्था को रिलेटेड है। वर्ण व्यवस्था का समाज में हिसाब किताब क्या है वो उससे रिलेटेड है। आप इसको इस पे भी आएंगे इस पे भी आएंगे। आगे जब हम लोग तर्कसंगत चलेंगे। अभी जब आपने बात जब हम बात कर रहे हैं ना जैसे अह अह वर्णाश्रम होना चाहिए तो ब्राह्मण के कर्म जो होते हैं। अब उसको हम समाज से लेंगे या शास्त्रों से लेंगे। ब्राह्मण के कर्म क्या होते हैं? ब्राह्मण के कर्म हम शास्त्रों से ही लेंगे। मतलब पालन तो हमें शास्त्रों का ही करना चाहिए। हां। तो शास्त्रों के अनुसार जो धर्म है वो धर्म जो है शाश्वत है और हम सनातन धर्म कहते ही इसे सनातन का अर्थ ही है जो किसी देश काल परिस्थिति में ना बदले उसको सनातन कहते हैं। तो जब हम ये कह देंगे कि मन उसका मन परिवर्तित हो गया और वो वहां से चला गया और वहां पर हम उसको दोष नहीं देंगे तो फिर उसके

00:09:18:09 एक आचरण से हीन हो जाने वाले व्यक्ति को कभी हम दोषी नहीं ठहरा सकते कि तूने अपनी ड्यूटी का परित्याग किया। उसने ड्यूटी का परित्याग करके दूसरी ड्यूटी अपनाई है। उसने कर्म अपने बदले हैं तो उसमें दो बात है। देखिए प्रॉब्लम यही है ना कि ड्यूटी जो होती है ड्यूटी अगर आपको उसको ड्यूटी दी किसने दी? उसके उसको ड्यूटी आइडियली उसके जो कुल के मतलब उसके माता पिता है उसके वो है उन्होंने दी है। उन्होंने नहीं दी। अगर उसका मन नहीं है उन्होंने नहीं दी। ड्यूटी उसे शास्त्रों ने दी है। ड्यूटी उसे ईश्वर ने दी है। उसको किसी विशेष कुल में जन्म देकर के ड्यूटी उसको किसने दी? उसकी वहां पर उस कुल में उसके पिता ने निर्धारित नहीं दिया तेरे को ये कर्म करने को। निर्धारित पूर्व से ही है कि तुम इस कुल में जन्मे हो तो तुम्हारी ड्यूटी ये है। तो उसको ड्यूटी देने वाला ईश्वर है। मेरा एक क्वेश्चन है। एक व्यक्ति है उसने ब्राह्मण कुल में जन्म लिया है। ठीक है? उसके बाद वो वर्ण संकर हुआ या कर्म संकर हुआ। उसके बाद उसने अपना पेशा बदल के कोई दूसरा कर लिया। मान लो वो क्षत्रिय हो गया वो सेना में भर्ती हो गया तो उसको हम पतित ब्राह्मण कह रहे हैं यहां पे तो एक तो एक तो ब्राह्मण ब्राह्मण होके क्षत्रिय का काम क्यों कर रहा है

00:10:33:20 लेकिन वो कई जनरेशन से बहुत अच्छे तरीके से क्षत्रियों का काम का कार्य कर रहा है तो भी वो दोषी है शास्त्रों का दोषी है उसके सारे कुल अगर क्षत्रिय का हां मैं बता देता हूं कई जनरेशन की बात आ गई इसमें यदि उसको पता है कि वो ब्राह्मण है। ठीक है? और मेरे पूर्वजों ने ऐसा कर दिया था कि भाई वह ब्राह्मण का कार्य छोड़कर के क्षत्रिय का कार्य करने लगे। मेरे पूर्वजों ने ऐसा कर दिया था। तो उसको अगर वो चेंज नहीं करता है अगर वो चेंज नहीं करता वापस उसी धर्रे पर आने की कोशिश नहीं करता है तो दोषी है। वरना हम दोषी किसे कहेंगे? प्रश्न ये था कि यदि हम धर्म से विमुख हो जाने को भी एक अच्छा सा आडंबर पहना देंगे, अच्छे से कपड़े पहना देंगे कि हां अब ये जो है व्यापारी हो गया, अब ये वैश्य हो गया तो फिर हम दोषी कब कहेंगे उसे? आचरण को छोड़कर भागने वाला कब किसे कहेंगे? और आपने जैसा कि बताया कि मन परिवर्तित हो गया तो उस पर भी मैंने वो किया कि पर मन के आधार पर धर्म बदलता नहीं है। दूसरी बात कि अब उसने ड्यूटी छोड़ी नहीं है। उसने एक ड्यूटी छोड़ के दूसरी ड्यूटी ली है। तो मैंने क्वेश्चन किया आपसे कि ड्यूटी उसको दी किसने? ईश्वर ने।

00:11:49:20 और उसमें बदलाव कैसे किया? अपने मन से। समझ रहे हैं ना? तो ड्यूटी उसको ईश्वर ने दी है। अगर उसमें चेंज भी करेगा तो ईश्वर ही करेगा। ईश्वर चेंज करते हैं। आपने इस जन्म में कुछ किया। अगले जन्म में आपके कर्मों के हिसाब से वो चेंज कर देते हैं आपकी ड्यूटी। अच्छा तो आपके हिसाब से जिस कुल में हमने जन्म लिया है अगर हमें उसका ज्ञात है कि यह कुल यही करता रहा है तो हमें किसी भी परिस्थिति में वही काम करना चाहिए। चाहे परिस्थिति कोई भी हो वही काम करना चाहिए। नहीं नहीं नहीं ऐसा नहीं है। हमें करने का प्रयास करना चाहिए। यदि व्यवस्था है तो इस सत्य को स्वीकारना चाहिए कि मैं कर्म शंकर हूं। मैं आचरण से हीन हूं। इसमें क्या दिक्कत है? मैं पतित हूं। इसमें क्या दिक्कत है? वो भाई जैसे जैसे मान लीजिए कि आपको अमुक अमुक स्थिति में जैसे हमारे यहां पर एक नारी सदा ब्रह्मचारी श्री राम जी ने कहा एक पत्नी धर्म एक पत्नी व्रत जो होता है वो श्रेष्ठतम है मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम तो श्रेष्ठतम क्या हुआ राम एक पत्नी वाले मगर अमुक अमुक स्थिति में अमुक अमुक चीजों की रक्षा के लिए अमुक अमुक

00:13:04:26 चीजों के लिए हमें एक से ज्यादा विवाह करना पड़ गया तो वहां पर परिस्थिति के अनुसार करना पड़ गया वो बात ठीक है मगर उसमें आपको यह स्वीकारने में क्या दिक्कत है ये गति श्रेष्ठतम नहीं है श्रेष्ठतम गति तो राम वाली ही है हम अगर उसको भी नॉर्मल कर देंगे नॉर्मलाइज कर देंगे तो कल को वो जो एक से ज्यादा विवाह करना लोग नियम बना लेंगे अगर हम उसको भी वो नाम दे देंगे नहीं ये भी सही है हमने परिस्थिति के कारण अगर ऐसा नहीं परिस्थिति वश अपने वर्ण के बाहर जैसे आक्रमणी हो गया हर व्यक्ति का हथियार उठाने की आवश्यकता है सब उठाते हैं। मगर उसको ही हमने धर्म के रूप में ख्यापित कर दिया तो वास्तविकता जो है वो तो खो ही जाएगी। तो हमें कहना पड़ेगा कि नहीं भाई सबसे अच्छी चीज तो है एक ही विवाह हो मगर यदि आपत्ति काल स्थिति में आपने कर भी लिया है तो उसको भी आप ऐसा मत समझो। मगर वो श्रेष्ठतम नहीं है। फाइनेस्ट क्वालिटी ऑफ मर्यादा नहीं है। फाइनेस्ट क्या है? राम। ये हमें मानना पड़ेगा। आपने अमुक अमुक स्थिति में कुछ भी कर लिया। ये चीज अच्छा अच्छा। मतलब आप बोल रहे हैं जो जन्म से है वही श्रेष्ठ है। उसका प्रयास करना चाहिए। ये पॉइंट मैं वो जन्म से जो मिला है दायित्व उसको

00:14:20:07 करने का प्रयास करना चाहिए। आपकी विवशता हो गई। आपके घर में सिचुएशन हो गई। आपके पूर्वजों ने कुछ गलती कर दी। ऐसा ऐसा हो गया तो उस चीज को धारण कर लो कि ठीक है हां यहां पर मैं इतना नहीं कर पा रहा हूं यह मेरे अंदर कमी है। इतनी इतनी चीज बाकी है। जब आप सत्य जैसे मान लीजिए कि किसी के पिता ने कहा कि तुमको सिगरेट नहीं पीनी है। ठीक है? परंतु वो व्यक्ति इतना विवश है। इंद्रियों के कारण या जो भी है वो छोड़ नहीं पा रहा है। मगर उसकी प्रमाण्य बुद्धि है। पिताजी कहते तो सही है। सिगरेट जो है छोड़ देनी चाहिए। मगर उसकी मगर उसकी वो विवशता है कि वो छोड़ नहीं पा रहा है। इंद्रियों के वशीभूत है। ठीक है? तो क्या होगा उससे कि हमारे उस सिद्धांत की रक्षा होगी। जब हम उसको नाम ये नहीं कह दे नहीं सिगरेट पीना अच्छा है। पिताजी जो कह गए वो कह गए सिगरेट पीना अच्छा है। वो ये कहना चालू ना कर दे। वो यही कहे मैं छोड़ नहीं पा रहा हूं। वो ठीक है। मगर बात तो वही सही है। पिताजी ने जो कहा था सिगरेट पीना गलत। तो इस तरीके से हमारा सिद्धांत लुप्त नहीं होगा। तो क्या होगा? कम से कम अगली पीढ़ी बच जाएगी। वो सिगरेट की आदत पड़ने से पहले ही उसको यह पता चल जाएगा सिगरेट पीना गलत है। समझ रहे हैं आप मेरी बात? तो सिद्धांत की रक्षा

00:15:35:10 तो करनी पड़ेगी ना। उसी तरीके से कि हम अगर वर्ण के बाहर अमुक अमुक स्थितियों में आपातकालीन धर्म बताया गया है कि अमुक अमुक स्थितियों में आप ऐसासा करिए। है ना? हमारे यहां तीन प्रकार सामान्य स्थितियों का धर्म, आपातकालीन धर्म और विशेष्य धर्म भी होता है। विशेष स्थितियां कुछ होती है वहां पर भी धर्म होता है। तो आपातकालीन में बताया है कि फिर जब ऐसी सिचुएशन आ जाए तो ऐसा कर लो ब्राह्मण को भी हथियार उठाना है ये सब सब कुछ है वहां पर। मगर उसको ही सामान्य के रूप में अगर हम ख्यापित कर देंगे तो सामान्य जो है आपातकालीन स्थितियों से पहले का जो धर्म है सामान्य जो रेगुलर है जो स्टैंडर्ड प्रोटोकॉल है वो तो खो ही जाएगा ना। फिर तो हम सदव आपातकालीन के नाम पर जैसे कि मांस खाने की स्थिति मांस खाने की स्थितियों का क्या है कि अमुक अमुक जैसे प्राण की रक्षा के लिए या फिर जो आपके अंदर प्रवृत्ति से निवृत्ति के लिए आप मांस का उपयोग अमुक अमुक विधियों का आलंबन लेकर के करो तो ये कोई विशेष और आपत्ति काल की स्थितियां हो गई विशेष और आपत्ति काल मगर अब हमने कह दिया देखो देखो वहां पे देखो मांस खाने का कहा तो गया है तो गुम मांस खाओ तो फिर क्या हुआ हमने ने उस सिद्धांत को खो दिया। तो इसलिए यदि वर्ण के

00:16:50:28 बाहर जाकर के विवशता वश आपको करना पड़ रहा है तो इस तथ्य को स्वीकार करो कि मैं एक अच्छा ब्राह्मण नहीं हूं जो कि आपने कहा कि उसको श्रेष्ठ ब्राह्मण नहीं कहा जाएगा। वही हम भी कह रहे हैं। उसको श्रेष्ठ नहीं कहा जाएगा। उसको पतित कहा जाएगा बहिष्कृत। मनुस्मृति में यह भी दिया गया है संविधान कि किन-किन कारणों से व्यक्ति को छोड़ देना चाहिए। उसको लेना नहीं है। यज्ञ में नहीं बुलाना है। विवाह नहीं करना है। है ना? फिर वह अपने ही जैसे किसी व्यक्ति को ढूंढे उसके साथ विवाह करे। मगर यदि वो भी अपने आप को नॉर्मल ब्राह्मण के रूप में ही ख्यापित करता रहेगा तो फिर वो जो कर्म आचर कर्म संकरता की वजह से जो दोष आ रहे हैं उसकी वजह से अगली पीढ़ी में भी दोष आएंगे। तो तो व्यवस्था बनी रहे इसलिए ड्यूटी के विपरीत जाकर के ड्यूटी कोई और ड्यूटी को ड्यूटी का नाम देकर के ड्यूटी के विपरीत आपको जो ड्यूटी ईश्वर से मिली है उस ड्यूटी के विपरीत जाकर के यदि किसी और ड्यूटी को आप अपना रहे हैं तो दोषी आपको तब कहा जा सकता है जब आपका वो जो टैग है ना ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य अथवा शूद्र वो छीना ना जाए। अगर आपने उसको वो छीन के दूसरा टैग दे दिया तो वो दोष ही नहीं रहा। मेरा तो यही काम है। अब जैसे सपोज

00:18:06:07 करिए आपने कहा कि मन परिवर्तित हो गया। वो टमाटर बेचने गया। अब उदाहरण के लिए वहां पर उसी समय अटैक हुआ। उसने सोचा मैं अपनी ड्यूटी छोड़ के टमाटर बेचने वाला बन जाता हूं। और वहां हो गई लूट। तो यहां ड्यूटी छोड़ने की वजह से समाज को नुकसान हुआ ना। तो इसलिए ड्यूटी का छोड़ना किसी के मन पर आधारित नहीं होना चाहिए। और धर्म भी हमारा शाश्वत है। वो मन के आधार पर नहीं बदलता। इसीलिए भगवान श्री कृष्ण के सामने जब अर्जुन कह रहे थे कि मैं तो ध्यान करूंगा मैं तो छोड़ दूंगा मुझे नहीं युद्ध करना तो भगवान ने वहां पर उनको उसके क्षत्रिय धर्म की याद दिलाई कि तू क्षत्रिय है धर्म युक्त धर्म धर्म युक्त युद्ध लड़ना तेरा धर्म है कर्तव्य है और यदि मन के कारण उसको बदला हुआ माना जा सकता था तो भगवान ये तर्क ही ना देते उसको कि तू क्षत्रिय तेरा धर्म धर्म युक्त युद्ध करना रक्षा करना तेरा धर्म तो ये बातें हैं आप बिल्कुल उसी जगह जिस जगह मैं हूं बस ये है कि जो पतित वाली जो थ्योरी है इसको थोड़ा सा जान लीजिए कि कोई ब्राह्मण यदि आचरण से विरुद्ध जाकर के कोई काम करेगा तो उसको आचरणहीन उसी को कर्म संकरता भी कहते हैं। आपको नहीं मालूम है। मगर आचरण हीनता को ही कर्म संता

00:19:21:10 कहते हैं। तो उसी उसको पतित ब्राह्मण आचरणहीन ब्राह्मण निम्न कोटि का ब्राह्मण नाम का ब्राह्मण ये सब उसको कहा जाएगा। यह नहीं मान लिया जाएगा कि वह वही हो गया। वो एक आचरणहीन ब्राह्मण है क्योंकि वह वैश्य वृत्ति का पालन कर रहा है। वो एक आचरणहीन ब्राह्मण है क्योंकि वो इस समय क्षत्रियचित वृत्ति से अपना आजीव कोपार्जन कर रहा है। तो ये चीजें दूसरी एक बात आपने कही लॉन्ग पीरियड लॉन्ग पीरियड वन वर्ड उसमें क्या है? जैसे आपने कहा कि लॉन्ग पीरियड तो कितना लॉन्ग? किसी के लिए 5 मिनट लॉन्ग होता है। किसी के लिए 15 मिनट, किसी के लिए 5 घंटे, किसी के लिए 5 महीने, किसी के लिए 5 साल, किसी के लिए 50 साल, किसी के लिए 100 साल। इतना लॉन्ग। अब ये जो लॉन्ग वाली बात है, इसमें आपको कहीं ना कहीं थर्ड पार्टी को अथॉरिटेटिव रूप में बनाना पड़ेगा। आपका प्रमाण शब्द प्रमाण वो तो हमारे पास है नहीं। कि कितना लॉन्ग पीरियड हो जाने के बाद हम लोग किसी का वर्ण बदला हुआ मान ले उसको घोषित ही कर देंगे यह हो गया तो ऐसा कोई शब्द प्रमाण हमें नहीं प्राप्त है कि आप इतना हो जाए जैसे ये जो स्पॉन वाले हैं वो

00:20:36:14 एक बात कहते हैं कि किसी ने जिसकी जिसके मुख पर भगवान का नाम है वो जो है ब्राह्मण हो गया मैंने पूछा कितनी बार जाकिर नायक कभी ले लेगा पांच बार राम राम राम राम ब्राह्मण बना के बिठा लो अपने यहां तो ये होना चाहिए ना कितनी बार 5 लाख बार 50 लाख बार ऐसा तो कोई व्यवस्था थी नहीं है ऐसी व्यवस्था है शायद मतलब शिव पुराण में कई बार आता है कि ओम नमः शिवाय का इतने बार जाप करोगे तो ये मिल जाएगा मतलब व्यवस्था मुझे ऐसा नहीं है कि ब्राह्मण का जन्म मिलेगा मरण हां जन्म मिलेगा उसी टाइम आप ब्राह्मण नहीं घोषित हो जाओगे समाज में। ये बोल तो ये सारी चीजें हैं। मेरा एक क्वेश्चन है इसमें जैसे भगवान परशुराम जी थे वो ब्राह्मण थे या क्षत्रिय थे? और भगवान ने क्षत्रयोचित वो क्षत्रियोचित उसका आलंबन लेने वाले क्षत्रियोचित आचरण करने वाले ब्राह्मण थे। और देखिए ये आपने अच्छा उदाहरण दिया। बहुत अच्छा उदाहरण दिया। अब इसी में देख लीजिए प्रमाण की बात मैं आपको करता हूं।

00:21:51:25 परशुराम जी ने जो उनकी एक तरीके से प्रवृत्ति थी वो क्षत्रिय की थी। हालांकि उनके पीछे दिव्य कथा है परशुराम जी का और विश्वामित्र जी का जन्म कैसे हुआ था वो शायद आपको पता हो कि उनकी माता के लिए जो खीर बनी थी वो विश्वामित्र जी की माता ने खा ली थी और विश्वामित्र जी की माता के लिए जो खीर बनी थी वो परशुराम जी की माता जी ने खा ली थी। उसमें था आशीर्वाद कि तुम्हें एक अच्छे वो अच्छा क्षत्रिय पुत्र प्राप्त हो या तुम्हें एक अच्छा ब्राह्मण पुत्र प्राप्त हो। तो इसीलिए विश्वामित्र जी के अंदर क्षत्रिय होते हुए भी ब्राह्मण के गुण आ गए थे और परशुराम जी के अंदर ब्राह्मण होते हुए भी क्षत्रिय के आ गए थे। जिसको उन्होंने समय के साथ उद्भाषित कर लिया। स्फोटित कर लिया। तो उन दोनों को दोष लगा। नहीं नहीं अभी दोष की बात बाद में करेंगे। पहले आपको मैं एक प्रमाण दे दूं कि परशुराम जी जब श्री राम के पास जाते हैं तब तक वो अनेकों अनेक युद्ध लड़ चुके हैं। ठीक है? राम जी कहते हैं जब वो उन्हें ललकारते हैं और उल्टी सीधी बातें जो भी कह रहे होते हैं आपस में जो चल रही होती है उस समय राम जी कहते हैं आप ब्राह्मण है इसलिए मैं आपका सम्मान कर रहा हूं।

00:23:07:03 वरना इतनी बातें मैं आपकी नहीं सुनता। तो राम जी ने उनको ब्राह्मण क्यों कहा? क्षत्रिय कहना चाहिए था। द्रोणाचार्य ने महाभारत का युद्ध लड़ा और रावण ने युद्ध लड़ा। मगर कभी रावण को क्षत्रिय नहीं कहा गया। कभी द्रोणाचार्य को क्षत्रिय नहीं कहा गया। ब्राह्मण कहा गया। तो कर्म के आधार पर हम जो है तो परशुराम जी के केस में उनका ये आपात धर्म कहा जाएगा या उनके जीवन का उद्देश्य कहा आपात धर्म आपात धर्म तो जैसे हमारा कहना है कि परशुराम जी ने हथियार उठाया तो इसलिए उनको क्षत्रिय कहना चाहिए कि नहीं कहना चाहिए ठीक है मैं कह रहा हूं कि श्री राम जी ने कई जगह पर उपदेश दे दिए हम हम लोगों को धर्म उपदेश कहते हैं जिसे श्री राम जी ने कई जगह गायत्री वंदन किया संध्या वंदन किया सब कुछ किया हम तो धर्म उपदेश देने वाले कारण क्या उनको कहीं पे ब्राह्मण कह दिया गया

00:24:20:16 सबसे पहले तो ये कि सारे वर्ण को ही भगवान की पूजा करने का अधिकार है क्योंकि केवल आदमी कोई पूजा करता है डजंट मीन वो ब्राह्मण है मुख्य कार्य मैंने धर्मोपदेश की बात की है और जो मैंने बात की है पूजा की बात नहीं की मैंने बात की है जो ब्राह्मणोचित पूजा होती है वर्णोचित पूजा होती है द्विजोचित पूजा होती है अच्छा और और छोड़िए ये छोड़ दीजिए जब वो जन्मे थे तब तो वो मिट्टी में खेल रहे हैं तब तो वो संध्या वंदन भी नहीं कर रहे हैं तो क्या उससे पहले तक उनको शूद्र कहा गया

00:24:57:27 मुझे ये परशुराम वाला दोबारा से करना करना डिस्कस पर अभी अभी मेरे दिमाग में आया स्वामी विवेकानंद ने यह कहा है कि जन्म से सभी शूद्र होते हैं और उसके बाद विवेकानंद जी हमारे लिए प्रमाण नहीं है। नहीं है। अच्छा अच्छा जितने अंश में वो शंकराचार्य की फिलोसफी मानते हैं उतने अंश में प्रमाण है। जहां वो शंकराचार्य के विरुद्ध चले जाते हैं वहां प्रमाण है ही नहीं। गायत्री परिवार और विवेकानंद दोनों ही आईडियोलॉजिकली शंकराचार्य पर आधारित है। उनके लिए शंकराचार्य का दिया जाने वाला ज्ञान ही प्रमाण है। गायत्री परिवार का भी और विवेकानंद का भी। पंडित राम शर्माचार्य जी ने तो ये आदि गुरु शंकराचार्य जी पर एक उनके जीवन दर्शन पर कोई ग्रंथ लिखा है। मुझे नाम नहीं याद आ रहा है। प्रॉपर उन्हीं को समर्पित सारी फिलॉसफी है इन दोनों की। मगर बस एक चीज में अलग हो गए। वर्णाश्रम व्यवस्था मुख्य रूप से। वर्णाश्रम व्यवस्था में उन्होंने छोड़ दिया। और आदि शंकराचार्य जी जो इनके मुख्य स्त्रोत है ज्ञान के उन्होंने अपने 13 वे अध्याय के दूसरे श्लोक में लिखा कि जो व्यक्ति संप्रदायहीन है परंपरा विहीन है

00:26:13:03 परंपरा के आचार्य नहीं है वो उस व्यक्ति को भले ही कितना भी विद्वान क्यों ना हो त्याग देना चाहिए। यह शंकराचार्य जी का कोट है। तो खैर जो जन्म से शद्र होते हैं तो यह तो रही विवेकानंद जी की बात। हम बात करें अगर कि हमारे शास्त्रों में हमारे शास्त्रों में ही कई जगह ऐसी उपमाएं आई हैं। जैसे कि भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि जो लोग यह कहते हैं मतलब नास्तिकों के लिए उन्होंने कहा जो लोग यह कहते हैं कि इस सृष्टि का जो विस्तार हुआ है वो स्त्री पुरुष के भोग से हुआ है। मतलब नास्तिकों के लिए क्या है? कोई ईश्वर नहीं है। स्त्री पुरुष के भोग से ही विस्तार को प्राप्त हुई है सृष्टि। ठीक है? जो लोग ऐसा कहते हैं वो राक्षस होते हैं। तो क्या वो मनुष्य नहीं है जो नास्तिक है? क्या उसकी योनि ही चेंज मान ली जाए? या फिर यह माना जाए कि भगवान ने वहां कहा वो राक्षस वत होते हैं। इसी प्रकार से जहां पर ये वाली बात आएगी जन्म से शूद्र होते हैं तो वहां ये कहा जाता है शूद्रवत होते हैं। जैसे किसी को हमने कह दिया कि धर्मणी

00:27:28:04 ना जिसका गुरु नहीं स्कंद पुराण में वचन है जिसका गुरु नहीं वो पशु है पशु है तो क्या वो वास्तविकता में एक पशु के योनि से जन्म लेने वाला पशु के गर्भ से जन्म लेने वाला नहीं पशुवत है इसी तरीके से इसका हमें लेना पड़ेगा एक मेरा क्वेश्चन और है एक वर्ड है द्विज जिसका अर्थ है दूसरा जन्म हम आप बोल रहे हो कि भगवान ने हमें हमारे कर्म के हिसाब से जन्म दिया है कि इस कर्म में तो मैंने इसने कुल में जन्म लिया है। तुम्हें तुम्हें इसी से ही इसी का जो ये चल रहे हैं उस हिसाब से चलना है। और जब हम गुरु के पास जाते हैं तो हमारा दूसरा जन्म होता है। तो क्या हमारा गुरु हमें दूसरे वर्ण के हिसाब से दीक्षित कर सकता है। उपदेश दे सकता है। देना नहीं चाहिए। यदि दे रहा है तो वो शास्त्रों के विरुद्ध है।

00:28:25:25 धर्म के विरुद्ध है। ओके। तो सारे वर्णों के फिर और वैसे भी वैसे भी जो संस्कार होता है जब आपने संस्कार की बात की है तो संस्कार होता है तो चाहे वो ब्राह्मण हो चाहे क्षत्रिय हो चाहे वैश्य हो दिया उसको उपदेश गायत्री का ही जाता है। किसी और का दे दिया जाता है। उसमें तो कोई अंतर है नहीं। दूसरी बात यह है कि जब यह बात हो ही रही है कि कर्म से वह बनेगा तो आप खैर उस बात को मानते हैं मुझे कहने की जरूरत नहीं है। आप जब ये मानते हैं कि जन्म से वो होता है मगर उसको बदला भी जा सकता है तो बदलने वाली बात पे दिक्कत है हमारे बीच में। जन्म से तो आप भी मानते हैं मगर उसको बदला भी जा सकता है। इसमें हम लोग डिस्कस कर रहे हैं। मगर जन्म से मानने वाली बात में मैं आपको एक वो दे दूं। तर्क और प्रमाण। अगर हम यह मानेंगे कि संस्कार के बाद वो अमुक अमुक वर्ण में अपॉइंट हुआ हम गुरु के द्वारा अगर हम ये मानेंगे संस्कार के बाद जब गायत्री उसका जने हुआ तब गुरु ने कहा तुम वैश्य हो गए तुम क्षत्रिय होगे तुम ब्राह्मण हो गए जो भी है हम तो उसमें दिक्कत ये आती है कि हमारे शास्त्रों में मनुस्मृति में बताया गया है कि ब्राह्मण का जनेऊ इस काल

00:29:40:26 में होना है क्षत्रिय का जनेऊ इस काल में होना है। शुद्ध वैश्य का जनेऊ इस काल में होना है। ऋतु काल भी बताया गया है। और उसकी जो आयु है इतने से इतने बीच में ब्राह्मण का हो जाना चाहिए। इतने से इतने बीच में क्षत्रिय का होना चाहिए। इतने से इतने बीच में वैश्य का होना चाहिए। तो यदि संस्कार के बाद ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य विशेषण संज्ञा उसको प्राप्त हो रही है तो संस्कार के पहले किसको किस आधार पर ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य मान लेंगे?

00:30:17:01 क्योंकि गुरु के पास तो वो तब जाएगा जब गायत्री वो हो गया उसका उपनयन पहला दिन तो वही है जब वो गुरु उसका उस दिन उसका उपनयन किस आधार पे होगा ब्राह्मण के आधार पे होगा वैश्य के आधार पे होगा क्षत्रिय के आधार पे तो यहां से दोनों चीजें कट जाती है कि बचपन से व्यक्ति शूद्र होता है अगर हम उसको शूद्रवत नहीं डायरेक्ट शूद्र ही बोले और ये भी चीज कट जाती है कि वो संस्कार के बाद वो जो है वो होता है ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य हां संस्कार स्कार के बिना वो एक निम्न एक नीच एक पतित ब्राह्मण कहलाएगा। भाई यह भी तो सोचिए कि यदि उसको कोई ड्यूटी मिली है समाज की व्यवस्था के लिए भगवान पिछले जन्म के कर्मों के आधार पर ही इस जन्म का शरीर चुनता है। इस जन्म का कुल चुनता है कि तुम्हें इस जन्म में इस कुल में मुझे जन्म देना है। और यदि उसने उन जो उसको जो वो साध्य कोटि का धर्म है उसको साधा ही नहीं। तो यहां पर उसकी उसको कुछ तो ब्लेम कर करना चाहिए ना। अब हमने कह दिया कि साधा नहीं तो जो है वो वो बन गया जो जो वो कर रहा है। तो यहां पे तो उसको छूट मिल गई। खूब अपने पिता की आज्ञा का अनादर करो। तुम जो करोगे वही तुम्हारी वो हो जाएगी। पिता का पिता का बुढ़ापे

00:31:32:07 में ध्यान रखना धर्म है। मगर हम पिता का ध्यान नहीं रख रहे। अपने मित्र का ध्यान रख रहे हैं। मेरी मेरा मन बदल गया। मैं अपने मित्र की ध्यान रखने मित्र का ध्यान रखने लगा। तो हम उसको दोष कहां दे पाएंगे? वो तो कहने लगे इस समय तो यही मेरा धर्म है। और 10 मिनट बाद अगर उसके मन में फिर आया तो फिर बदल देगा। अब तो मेरा यही धर्म है। अब मैं टमाटर नहीं मैं करेला बेचूंगा। अब मेरा यही धर्म है। तो जैसे कि आपने तर्क की दृष्टि से पूछा था सामाजिक व्यवस्था के बारे में। है ना? कि समाज की व्यवस्था से हम देख रहे हैं। तो सोचिए वो व्यवस्था कैसी होगी? जहां व्यक्ति जब चाहे तब अपने मन के अनुसार मेरी मनोवत्ति हो गई। अपने मन के अनुसार बदल ले। अगर हम यहां इस बात को माने कि भगवान ने जो हमें काम अपॉइंट किया है इस जन्म में हमें वही करना है। उस हिसाब से आपका तर्क बिल्कुल सही है। अगर हम एक शास्त्रों को साइड रख दे अगर नहीं हमें नहीं रखना चाहिए। अगर हम शास्त्र को साइड रख दे। उस दृष्टि से देखने वाली बात बोल रहा हूं मैं। उसी पे आ गया। अब मैं उसी पे आ गया। जी हां। अगर हम एक सामाजिक दृष्टि से देखें कि समाज को चलाने के लिए हमें चार अलग-अलग व्यवस्थाएं चाहिए। जन्म से जब हम किसी व्यक्ति

00:32:47:13 का चार अलग-अलग व्यक्ति का हमने एनालिसिस करा किसी भी वर्ण में वो जन्मे हो। हमें हमने उनकी स्किल्स और क्वालिटीज हमें ऐसी लगी कि एक स्किल सही है, एक स्केल सही है, एक स्केल सही है, एक स्किल सही है। और उनका जन्म अगर मान लो ब्राह्मण ब्राह्मण के काम नहीं कर मतलब क्वालिटीज मान लो डिफरेंट हो गई। संकरता हो गई क्वालिटीज में तो हमें उनको उनका वो कर्म नहीं देना चाहिए। जब हमें उन्हें फोर्स करना चाहिए कि तुम जिस उसमें पैदा हुए हो तुम वही करो। तुम्हारी क्वालिटी स्किल्स डजंट मैटर हियर। ठीक है। इस पर बात कर लेते हैं। पहली बात तो यह है सामाजिक व्यवस्था में जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था कैसे काम आती है वो मैं आपको बता दूं। जैसे कि मान लीजिए कि मुझे रक्षा की जरूरत है और मुझे पता चला कि यहां पे क्षत्रिय है। क्षत्रिय का घर है। मैं गया वहां पर कि भैया भैया रक्षा करो। मुझे रक्षा की आवश्यकता है। क्षत्रिय ने कहा अभी पांच मिनट पहले मैं जो है ब्राह्मण बन गया हूं। तो क्या यह व्यवस्था है? पहली बात। दूसरी बात आपने कहा यदि चार लोगों को हमने पिक किया और चार लोगों में से उनकी क्वालिटीज के हिसाब से उन्हें नहीं देना चाहिए

00:34:02:14 बल्कि उनको फोर्स करना चाहिए कि तेरा जो जन्म है उसके हिसाब से ले। पहली बात तो इसमें कुछ सिचुएशनंस लागू हो रही है। एक कि चारों के बारे में हमें पता नहीं है कि उनका कुल क्या है या पता है। ये क्लियर कर दीजिए। लेट से पता है इन दिस केस। अच्छा पता है। तो तो सबसे पहली बात है कि यदि मान लीजिए हमको चारों के कुल के अनुसार हमने ले लिया कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य चार हमको मिल गए। ठीक है? हम्म। हां हां। मिल गए ना? अब हम देख रहे हैं कि उन चारों में ही क्या कहते हैं? अपनी कुल के विपरीत प्रवत्त है। स्किल सेट है। चारों और में विपरीत है। के हिसाब से ना चारों में कुल के विपरीत है। तो यहां पर दिक्कत ये है यदि ब्राह्मण कुल के लड़के में ब्राह्मण की प्रवृत्ति नहीं है। ब्राह्मण के गुण नहीं है। तो क्या दूसरे ब्राह्मण कुल के लड़के मर गए हैं? सारे के सारे हम लोग क्या करेंगे? किसी दूसरे ब्राह्मण के घर जाएंगे उसको देखेंगे। हां इन चारों में ही हम लोग तब करेंगे इनकी

00:35:17:22 गुणवत्ता के अनुसार जब दुनिया में अन्य कुल नष्ट हो चुके हो उसको कहेंगे आपातकालीन धर्म। आपातकालीन स्थिति उसी को कहेंगे कि चार ही है इनहीं में से करना है जो करना है। पांचवा कोई है ही नहीं जिसमें हम सिलेक्शन कर सके। तो अभी तो ऐसा नहीं है। अगर एक ब्राह्मण सही नहीं है तो दूसरे ब्राह्मण के घर जाओ भाई। दूसरी बात आपने यहां पर कहा कि हम लोग चार हम लोग चार लोग होंगे तो इसमें क्या बात आती है कि उन चारों को भी आप कहीं ना कहीं से पिक तो करोगे ना कहां से करोगे उनका शुरुआती पैरामीटर क्या होगा रास्ते में चलते चलते रिक्शे वाले को भी रोक लोगे साइकिल वाले को भी रोक लोगे ए रुक जा मुझे तेरे कर्म गुण गुण कर्म चेक करने हैं तेरी कुशलता चेक करनी है रुक ऐसा तो करेंगे नहीं। तो एक कोई ना कोई स्टार्टिंग पॉइंट हमें लेना पड़ेगा कि हम किसी ब्राह्मण के घर जाएं। यदि ब्राह्मण का सिलेक्शन करना है तो ब्राह्मण के घर जाए। ब्राह्मण से ले आए एक लड़का या स्त्री या पुरुष जो जिस तरह का भी उसका उपयोग है और क्षत्रिय के लिए क्षत्रिय के घर जाए। तो ये जो शुरुआती पैरामीटर है यही जन्म जन्म आधारित वर्ण अवस्था है। उसके

00:36:33:01 बाद यदि ब्राह्मण कुल से आया हुआ ब्राह्मण लड़का उचित नहीं है। अपने वर्णोचित कार्य को नहीं कर पा रहा है या उसमें वह कुशलता नहीं है तो हम उसको त्याग देंगे और किसी दूसरे को देखेंगे। अच्छा एक चीज और है। अब जैसे हम आते हैं भाई भारतीय में तो हमारे हम सबको पता है कि हमारा सरनेम के हिसाब से हमारा यह वर्ण है। बहुत लोगों को अपना वर्ण नहीं पता होता है। बहुत लोग सरनेम अपना चेंज कर लेते हैं या फिर अगर हम बाकी धर्मों की बात बाकी पंथों की बात करें तो उनको तो अपना वर्ण नहीं पता। भाई कहीं ना कहीं वो उनको पैदा तो ब्रह्मा जी ने ही करा है। अब एट दिस पॉइंट ऑफ टाइम उन्हें नहीं पता कि उनका वर्ण क्या है। तो उन्हें क्या करना चाहिए या उन्हें हमेशा दोष ही लगता रहेगा या फिर कभी दोष लग रहा है किसी जनरेशन को किसी इंसान किसी की लाइफ को कभी नहीं लग रहा है। तो इसका क्या इलाज है? इसका इलाज ये है कि उन्हें जो है सनातन सिद्धांतों के आधार पर जीवन जीना चाहिए। देखिए प्रॉब्लम क्या है? जैसे हम दूसरे अ लोकतांत्रिक व्यवस्था की बात कर ले और या फिर ईसाई

00:37:48:02 धर्म ईसाई जो मत है या इस्लाम मत है इनकी बात कर ले। प्रॉब्लम इन सब चीज इन सब में ये है हम इनका उदाहरण तो लेते हैं पर पहले आप अपने आप से पूछिए। क्या इन व्यवस्थाओं से आप खुश हैं? हमने लोकतंत्र का उदाहरण तो ले लिया कि जो पुलिस वाला उसके उस पर बनेगा कि नहीं बनेगा? क्या हम पुलिस की व्यवस्था से खुश हैं? क्या हम आर्मी की व्यवस्था को जो आर्मी पुलिस की जो व्यवस्थाएं जो लोकतंत्र के हिसाब से है मैं आर्मी को गलत नहीं कह रहा हूं। आर्मी सही है जो हमारे देश की रक्षा करता है उसका सम्मान है। मगर ये जो आज लोकतांत्रिक व्यवस्था है इससे क्या हम खुश हैं? एक पुलिस वाला रेिग्नेशन लेटर दे सकता है। अपनी ड्यूटी छोड़कर भाग सकता है। समय आने पर विपदा पड़ने पर। तो क्या हम इससे खुश हैं? एक ब्राह्मण जो है अपनी ब्राह्मण जो है ब्राह्मण का कर्म होता है दान के ऊपर आधारित जीवन जीना दान के ऊपर एक तरीके से अगर और सरल भाषा में कहे तो भीख पर मगर आज ब्राह्मण जो है लालच व सबकी क्योंकि हमने ही दी करना वर्ण व्यवस्था सब जगह घुस रहा है तो हमें वो ब्राह्मण मिलना ही बंद हो गए हैं न्यूनत उसमें न्यूनता आती जा रही है जो धर्म ब्रह्म की सही सही व्याख्या लोगों तक पहुंचाए तो क्या

00:39:03:03 हो रहा है? नास्तिकता पनप रही पनप रही है। आप एक उदाहरण ले लीजिए। आर्य समाज का ले लीजिए। आर्य समाज का जो धर्म ब्रह्म है वो ना परंपरा से प्राप्त है और ना ही उसमें वर्णाश्रम धर्म का पालन है। नतीजा आर्य समाज नामक फैक्ट्री से बाहर निकलता है। विकास दिव्य कीर्ति कौन है? नास्तिक। विकास दिव्य कीर्ति की जो फैमिली है वो आर्य समाज को फॉलो करती है। और वहां से क्या निकला बाहर नास्तिक इन सब का पर्यावसान परंपरा प्राप्त सिद्धांत परंपरा प्राप्त धर्म ब्रह्म वर्ण व्यवस्था इत्यादि को ना मानने का जो पर्यावसान है वो किस में है नास्तिकता में तो क्या हम लोग इन चीजों को अडॉप कर पा रहे हैं पूरी तरीके से जैसे आज का संविधान ही मान लीजिए जितने लोग ज्यादा होंगे वही नियम नियम बन जाएगा तो ये सेक्स मैरिज को भी अलऊ कर दिया जाएगा। लेकिन रिलेशनशिप को भी अलऊ कर दिया जाएगा। तो क्या हम इन व्यवस्थाओं से खुश हैं? जो हम इनका उदाहरण लेकर के कहते हैं क्या ये सही ये नहीं होना चाहिए? ये बात। अच्छा एक क्वेश्चन और है मेरा। एक महिला है उसने

00:40:18:21 एक वर्ण में एक रह गया वो क्वेश्चन कि उनके लिए क्या व्यवस्था है जो अपना वर्ण भूल गए हैं। उनको प्रयास करना चाहिए अपना वर्ण। किसी तरीके से वर्ण ध्यान आ जाए। प्रयास करना चाहिए। अन्यथा जिस भी तरीके से उनका जीवन का निर्वाह हो रहा है वह करते रहना चाहिए। यह मानते हुए कि अभी हम वर्णाश्रम व्यवस्था के अतिरिक्त है बाहर है। पता उन्हें कैसे लगेगा? वो सिद्ध योगी हो जाए और फिर नहीं पता चलता है। जब हम लोग जब हम लोग इतिहास जानने निकलते हैं। यहां क्या हुआ था? यहां क्या हुआ था? हमारे पिताजी कहां रहते थे? वहां कहां रहते धीरे-धीरे जब जाकर के इस तरीके से अगर इन्वेस्टिगेशन करें तो पता लग जाता है। 90% चांस होते हैं कि पता लग जाता है। अगर नहीं लगता तो अपने आप को एक जो अंतज इत्यादि के रूप में देखते हुए वर्णाश्रम व्यवस्था से बाहर मानते हुए क्योंकि आज तो वैसे भी आज का जो समय है लोकतंत्र का तो इसमें तो वैसे भी वो वाले नियम लागू है कि भैया जब डिवाइडर है डिवाइडर वाला रोड है फोर लाइन और डिवाइडर के एक तरफ जो है जो रोड है वो अंडर कंस्ट्रक्शन है तो उस समय तो मजबूरी है कि सब लोगों को रॉन्ग साइड ही जाना पड़ेगा आपातकालीन संक्रमण काल तो इस समय समय आप ये एक्सपेक्ट नहीं कर सकते कि सब कुछ अपने अपने

00:41:33:27 हिसाब से होता जाए। मगर कर्मवादी कारस्ते मा फलेस्तु कदाच एज मच एस पॉसिबल जिससे निर्वाह हो सकता है वो निर्वाह करे। अन्यथा जिसज वृत्ति से जिसका जीवन का निर्वाह हो रहा है वो करता रहे। और जैसे मान लीजिए कोई अगर शिक्षक बन भी रहा है और वो ब्राह्मण नहीं है तो तो उसको पैसे कहां मिलने हैं? शिक्षक बनने में। आधुनिक शिक्षा को देने में पैसे मिलने हैं ना। यज्ञ तो करवाने से नहीं। यज्ञ करवाने में ना जाए आधुनिक शिक्षक बने साइंस पढ़ाए और तो और वेतन भोगी होते हुए वैसे भी शद्र है शद्रवत हो जाएगा क्योंकि ब्राह्मण का जो उच्चतम वो है वो तो यही है कि वो दान दक्षिणा से ही अपना काम चलाए वेतन से नहीं क्योंकि ब्राह्मण का एक वो होता है मनुस्मृति में एक सिद्धांत है कि जिन कर्मों को करते समय आपके मन में छिपाने का भाव आएगा वह कर्म तामसिक होते हैं और इन कर्मों के आधार पर ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के कामों को बांटा गया है। जैसे वैश्य का काम देख लीजिए। वैश्य जब तक थोड़ा बहुत छुपाएगा नहीं, उसका बिजनेस नहीं हो पाएगा। क्यों? उसको बता उसको ये छिपाना पड़ेगा। मैं कितने का लाया हूं और तुझे कितने का दे रहा हूं? का

00:42:49:06 लाया हूं। तुझको में दे रहा हूं। यह उसको बोलना पड़ेगा। छिपाने का भाव आ गया। लाया होगा का। मगर उसको कहना पड़ेगा। का लाया हूं। का दे रहा हूं। केवल ₹1 मार्जिन ले रहा हूं। उसको अपने अनुसार जो जो उसका एक निश्चित जो मार्जिन होता है यानी कि मुनाफा वो वहां पर लेने के लिए वैश्यचित जो धर्म है उसमें छिपाने का भाव आ ही जाएगा। क्षत्रिय को सामने वाले से युद्ध लड़ना है तो अपनी रणनीति को छिपाना है। हमारे पास कितने हथियार हैं। हम कब कहां कैसे अटैक करेंगे ये सब छिपाना है। ब्राह्मण को छिपाना नहीं है। बताना है। जो वो जानता है वो उसको बताना है। पंडित जी राम राम। जय श्री राम। जय श्री कृष्ण हर महादेव। तो यह छिपाने वाले कर्मों के आधार पर ही धर्म और अधर्म का और कर्तव्य और अकर्तव्य का निर्धारण हुआ है। और ब्राह्मण के जीवन से छिपाने वाले कार्यों को काटा गया है एस मच एस पॉसिबल। तो क्या हुआ कि क्या कहते हैं? वेतन

00:44:04:07 की बात करें। यदि ब्राह्मण वेतन पर ध्यान देने लगेगा। और एक बात और कही गई है ब्राह्मण के लिए सम्मान ब्राह्मण को सम्मान का नहीं अपमान को खोजना अपमान का भूखा रहना है। ब्राह्मण के लिए अपमान अमृत है और सम्मान विष है। क्यों? क्योंकि यदि वो सम्मान की खोज में रहेगा वो कैसे कहेगा मुझे दे दो भैया? वो मांग नहीं पाएगा भिक्षा। क्योंकि वो सम्मान में रहेगा। दूसरी बात सम्मान से जुड़ा होता है अहंकार और मुक्ति कैसे मिलेगी? जब आपका अहंकार दूर हो जाए। मेरी आइडेंटिटी जो है जो मैं भगवान से अलग अपने आप को फील कर रहा हूं बंद हो जाए। यह सब तो खैर दार्शनिकता हो गई बहुत। मगर ब्राह्मण के जीवन से ये जो छिपाने वाली बातें हैं वो कम करी गई है। उस कारण से देखने में ये भी लगेगा आपको कि इनका जीवन बहुत सरल है। क्यों? ब्राह्मण को सम्मान के लिए नहीं बोलना है। मेरा सम्मान होना चाहिए। अगर बोल रहा है तो शास्त्र विरुद्ध है। दूसरी बात ब्राह्मण को केवल आजी उसके निमित्त प्राण रक्षा के निमित्त धन अर्जित करना है। केवल प्राण रक्षा के निमित्त उससे ज्यादा आए तो छोड़ दे। तो क्यों? क्योंकि प्राण रक्षा

00:45:19:10 से जैसे ही ज्यादा आएगा। यानी कि मेरी जरूरत नहीं है और मेरे पास धन आ गया तो मैं क्या करूंगा उस धन का? हम लोग क्या करते हैं? एक्स्ट्रा मनी जो होती है उसका। सेव करके रख लेते हैं। सेव ताला लगाते हैं कि नहीं? क्या बताते हैं दुनिया में यहां रखा है मेरा धन तो ब्राह्मण के पास यदि ज्यादा धन होगा तो वह उसको छिपाएगा तो इसलिए ये भी कट कर दिया ब्राह्मण बिना कपड़ों के नहाएगा नहीं निंदा नहीं करेगा ऐसे बहुत से कार्य है जहां पर छिपाने का भाव है वो मना कर दिए गए ब्राह्मण को इसी कारण क्योंकि उसमें सब में छिपाने का भाव तो ये छिपाने के जो भाव है जितने ज्यादा होते चले जाते हैं तो ब्राह्मण से क्षत्रिय क्षत्रिय वैश्य शूद्र इत्यादि आ जाता है। उनकी सद्गति का इंतजाम उनके अनुसार ही कर दिया गया कि जिसको जैसा कर्तव्य मिला उसके अनुसार उसकी सद्गति मिल जाएगी। तो कहने का मतलब यह है कि वेतन जब अगर वेतन भोगी अगर ब्राह्मण होगा तो जब तक उसका वेतन सुनिश्चित नहीं होगा ब्राह्मण का तब तक वो अपने ज्ञान को देने से रोकेगा। अभी एक जगह पर कहीं पर ब्याह पढ़ा जा रहा था किसी ब्राह्मण के द्वारा तो ब्राह्मण ने कहा कि ₹000 यहां पर वो लाइए दक्षिणा

00:46:34:16 तो लड़की वालों ने तो दे दिया लड़के वाले थोड़े टाइट थे है ना तो लड़के वाले बोले कि ये ₹2100 ले लो या उसने कम दिए होंगे तो ब्राह्मण ने कहा नहीं नहीं तो मैं वहीं बैठा था तो मैंने कहा आप ये फिक्स नहीं कर सकते फिक्स हो जाएगा तो वेतन हो जाएगा आपको दक्षिणा स्वरूप जो मिल रहा है वो लो। बोले क्यों? हमारे बच्चों को कारों में नहीं घूमना है। मैंने कहा नहीं घूमना है। ब्राह्मण उसी को कहते हैं। जितना जो मिल रहा है दक्षिणा स्वरूप वो लीजिए। अगर आपने फिक्स किया फिक्स करने का मतलब जब तक आपका वो निश्चित अमाउंट नहीं आने की संभावना है। तब तक आप वो जो ज्ञान है उसको आप अंदर छिपाओगे। जितना छिपाएंगे सारी दुनिया सारा धर्म अधर्म सब कुछ छिपाने पर ही है। मैंने कुछ वीडियो बनाए इस बारे में। छिपाने से ही हमारी प्रज्ञा शक्ति इफेक्ट होती है। झूठ बोल रहे हैं छिपा रहे हैं। मर्डर कर रहे हैं छिपा रहे हैं। सब पाप है। सब में छिपाने का भाव है। व्यभचार कर रहे हैं, छिपा रहे हैं। मगर शास्त्र सम्मत जब भोग में जा रहे हैं तो बता रहे हैं। डीजे लगवा रहे हैं। बैंड बजवा रहे हैं। लोगों को बता रहे हैं। कि आई एम गोइंग टू समवेयर

00:47:50:00 टुडे बताते हैं शादी का कार का कार्ड तक छपवाते हैं विचार करना होता है तो घर वालों तक को नहीं बताते तो ऐसे ही है कि ब्राह्मण जो है वो यदि वेतन भोगी हो जाएगा तो उसके अंदर छिपाने का भाव आएगा कि मैं मैथमेटिक्स तभी पढ़ाऊं ब्रह्म का ज्ञान तभी दूं धर्म का ज्ञान तभी दूं जब मेरा निश्चित अमाउंट फिक्स हो जी ओके मेरा एक क्वेश्चन और था। एक एक महिला है उसका एक वर्ण में उसका वो वो पैदा हुई है। उसके बाद उस वो किसी दूसरे वर्ण में उसकी शादी हो गई है। तो अब उसका काम भगवान ने उसे वो दिया था वो करना है या जो उसको नए कुल में वो है वो करना है। मतलब उसका वर्ण नहीं बदलेगा या शादी करने के बाद उसका वर्ण बदल जाएगा? मैं उसका उत्तर दे देता हूं। देखिए ऐसा है कि वर्ण जो है वह पुरुषों का होता है आईडियली ठीक है लेकिन उसमें रोटी और बेटी की मर्यादा दोनों होती ही है क्योंकि अब उसका जो वर्ण है वो जो उसके पति का वर्ण है उसे वही वरण करना पड़ेगा कि पति ने उसको वर्ण किया इसमें एक बात और कह दूं कि शास्त्रोक्त मर्यादा के हिसाब से स्त्रियों का कोई

00:49:05:08 आज भी पार्जन का कार्य तो है नहीं क्या कार्य है घर का खाना बनाना घर की देखभाल करना घर हाउस मैनेजर गृह मंत्रालय उनके पास तो स्त्री पहली बात जहां भी जाती है उसको क्या मिलेगा वहां पर गृह मंत्रालय तो उसके वर्ण उसके कर्म में चेंज कहां आ रहा है उसको तो वही कार्य करना है चारों में से कहीं भी जाए पहली बात तो ये जाना नहीं चाहिए अब उसके बाद बात कर रहे हैं कि वो चारों में से कहीं भी जाएगी उसका जो शास्त्रों के हिसाब से जो उसका कार्य है वो तो वही है उसको घर ही संभालना है उसको घर को स्वर्ग बनाना उसको घर को मंदिर बनाना है। उसको अपने जो उसका भ्रता है उसकी सहायता करनी है कि वो अपने वर्णाश्रम धर्म के पालन में कहीं चूक ना जाए। तो इस तरीके से जो पत्नी है उसका कोई विशेष अलग से धर्म नहीं है। उसका मेन जो है वो घर गृहस्ती को ही मंदिर बनाना, स्वर्ग बनाना, गृह मंत्रालय पत्नी के पास है तो वो चेंज नहीं होगा। दूसरी बात यह है कि मनुस्मति में वचन आया कि स्त्री का कोई कुल नहीं होता है अपना वो जिस कुल में ब्याती है उसी कुल की मानी जाए तो लेकिन इसका अर्थ

00:50:23:06 ये एक जरूर दोष उत्पन्न होगा कि उनकी जो आगे होने वाली जो संतान होगी वो वर्ण शंकर अवश्य कहलाएगी। वर्ण शंकर हो जाएगी। ये दोष जरूर आ जाएगा। बाकी स्त्री के कर्म जो ब्राह्मण के यहां जाने पड़ते हैं। स्त्री के कर्म तो वही रहेंगे। वो जहां भी जाए उसको अपने घर गृह मंत्रालय को संभालना है। आचरण चेंज कब हो रहे हैं? जब ब्राह्मण जो है वैश्य उचित वृत्ति से और जो है वो आजीविक कोपार्जन कर रहा है। तब हो रहे हैं। तब प्रभाव पड़ रहा है। जी।

00:51:00:16 और अगर स्त्री मान लो विवाह ही ना करे तो उसे वही वर्ण का अपनाना पड़ेगा जिस वर्ण में वो पैदा हुई है। पहली बात उसको वर्ण अपनाना ही कहां है? पहली बात तो ये उसका उसका धर्म क्या है? गृह मंत्रालय उसका धर्म है। तो उसको ऐसा नहीं है मुझे चुनाव करना है कि मुझे ट्रेडिंग करनी है या मुझे पढ़ाना है या मुझे जो है रक्षा करनी है। अगर उसे विवाह ही नहीं करना है तो धनोपार्जन के लिए कुछ ना कुछ तो करना पड़ेगा। तब पहली बात तो यह है कि इसकी व्यवस्था की गई है कि जो स्त्री होती है उसको सदैव किसी ना किसी पुरुष के साथ में रहना चाहिए। तो वो जिस पुरुष के साथ रहेगी पहला तो उसका कर्तव्य है कि वो उसका भरण पोषण करे। दूसरी बात विवाह ना करने को वो नहीं कहा गया है। आज्ञा नहीं दी गई है। स्त्री को विवाह करना ही है। हम तीसरी बात ये है कि आप यहां पे फिर आपातकालीन ले आ रहे हो। उस स्थिति में उसको नहीं फिर भैया जब आखरी हमारा कोई है नहीं पुरुष नहीं है तो हम कुछ ना कुछ तो करेंगे कुछ भी करे फिर जब उसने शास्त्रों को तिलांजलि देकर के विवाह ना करना अपना लिया शास्त्रों को तिलांजलि देकर के उसने पुरुष विहीन जीवन जीना अपना लिया और उसके जीवन की आज ऐसी परिस्थिति

00:52:15:20 आ ही गई है कि उसको खुद ही कमाना है खुद ही खाना है तो जाकर के फिर कमाए खाए राम राज्य क्या था हर व्यक्ति स्वकर्मण अपने अपने कर्म के हिसाब से अपने अपने वर्ण के हिसाब से कार्य करता था। तो हम यह कहते हैं कि हवा उतनी ही चलती थी जितनी चलनी चाहिए। धूप उतनी निकलनी थी जितनी निकलनी चाहिए। संसार की कोई भी ऐसी आईडियोलॉजी नहीं है जिसने दावा किया हो। मैं कहता हूं हमारे राम दूसरों के लिए कल्पना है। हमारे राम इस्लाम के लिए कल्पना है। हमारे राम क्या कहते हैं? ये ईसाई के लिए कल्पना है। बौद्धों के लिए कल्पना है हमारे राम। ठीक है? तो अगर मैं कहूं तो इस्लाम ने, क्रिश्चियन ने, बौद्ध ने कहीं कल्पना में ही सही ऐसा दावा कर दिया क्या? परफेक्शन एक परफेक्ट समाज का दावा कर दिया? नहीं किया। हमारे यहां किया गया। हवा उतनी ही चलती थी जितनी चलनी चाहिए। धूप उतनी निकलती थी जितनी निकलनी चाहिए। अकाल मृत्यु किसी की नहीं होती थी। कोई विधवा नहीं होती थी। यह सब दावे हमारे यहां किए गए।

00:53:31:08 कल्पना में ही सही तुमने कर दिया क्या? क्यों नहीं कर पाए? और एक बात देख लीजिए। संसार में धर्म और ब्रह्म को बताने का दावा करने वाली बहुत सी आईडियोलॉजी ढेर सारी। कहीं पर भी एक आदर्श दिया क्या कि मैं यह जो आईडियोलॉजी जो हम दे रहे हैं इस आईडियोलॉजी को हमारे इस व्यक्ति ने पूर्णतया निभा के दिखाया। दुनिया में कोई नहीं है। मोहम्मद ने इस्लाम की आईडियोलॉजी बताने वाले के रूप में मोहम्मद ख्यापित है। मगर उन्होंने भी कई जगह चूक कर दी। मोहम्मद ने भी कई जगह चूक कर दी। उनहीं के हिसाब से उनहीं के स्क्रिप्चर के हिसाब से कहीं-क पर मोहम्मद जो है भूल गए यह कर दिया वो कर दिया ऐसे गलतियां की जिनको बाद में उन्होंने उन्हें सुधारा यानी कि पूरी दुनिया में सब सब लोग दावा करते हैं कि हमारे पास धर्म और ब्रह्म की व्याख्या है। मगर उस धर्म ब्रह्म को पाने के लिए उस धर्म बताए जाने वाले धर्म पर चलने वाला एक एग्जांपल सेट नहीं कर पाया पूरी दुनिया में कोई सिर्फ सनातन ने किया राम एक एग्जांपल है

00:54:46:09 हमारे पास जो परफेक्ट राम मेरा एक क्वेश्चन परशुराम जी पे वापस आया है जैसे परशुराम जी ने ब्राह्मण कुल में जन्म लिया उन्होंने क्षत्रिय का मोस्टली काम किया तो उन्हें उन्हें दोष लग गया। ये सही है। आपातकालीन स्थिति में उन्होंने क्षत्रिय क्षत्रियचित वृत्ति का आलंबन लिया। बिल्कुल लिया। उन्हें श्रेष्ठतम ब्राह्मण के रूप में कहां पर अपनाया गया?

00:55:20:12 ओके। तो आइडली उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था कि किसी क्षत्रिय की मदद लेके उस क्षत्रिय को ट्रेन करके जैसे चाणक्य ने किया। इस तरह से करना चाहिए था। देखिए पहली बात है कि आप कर सकते थे। मैं इसका उत्तर देता हूं। मैं इसका उत्तर देता हूं। देखिए ऐसा है कि आप भगवान परशुराम को कंपेयर नहीं कर सकते किसी भी बीइंग से। इसको इसको मैं ऐसे मैं ऐसे बता दूं कंपेयर ना करने के विषय में कि रामो विग्रहवान धर्म परशुराम विग्रह धर्म नहीं है। तो कहीं कहीं पे भगवान के जो अन्य अवतार है उन्होंने अवतार किया लीलावत लीला के रूप में अनेक सारे उदाहरण देने के लिए किया मगर यथावत उनको एकजेक्टली हम सेम टू सेम कॉपी नहीं कर सकते हम कॉपी किसे कर सकते हैं राम को राम विग्रह धर्म अब जो भगवान ने अन्य जो रूप लेकर के अन्य जो लीलाएं किए हैं अन्य जो आचरण किए हैं उनको आदर्श के रूप में नहीं अपनाया जा सकता क्योंकि उन्होंने कई जगह पर सीमाओं के पार जाकर के भी दिखाया और वो दिखाने की आवश्यकता थी क्योंकि उन्हें एक नियम ख्यापित करना था कि

00:56:35:15 ईश्वर किसी भी प्रकार के नियम के नीचे नहीं है। ईश्वर सभी नियमों को बनाने वाला सर्वियामक है। तो मैं हसूंगा भी, मैं गाऊंगा भी, मैं नाचूंगा भी, मैं रोऊंगा भी तो जब उन्हें सभी नियमों को तोड़ने वाले के रूप में अपने आप को बताना है कि मैं पूर्ण हूं। सत्यम ज्ञान अनंतम ब्रह्म तो मैं सब कुछ कर सकने वाला हूं तो मैं अनेकानेक अजीब अजीब तरह की लीलाएं करके भी दिखाऊं इसीलिए भगवान के सभी अन्य रूप जो है वो हमारे लिए पूज्य है आराध्य है स्मरणीय है आदरणीय है अनुसरणीय है बट अनुकरणीय नहीं और जो राम है वो हमारे साथ हमारे लिए ये सब होते अनुकरणीय भी है। हम लोग उन सबको ओबे करेंगे। भगवान कृष्ण को ओबे करेंगे। भगवान परशुराम को ओबे करेंगे। अगर उन्होंने कहीं कोई सिद्धांत दिया उसको ओबे करेंगे। मगर फॉलो नहीं करेंगे। फॉलो हम राम को करते हैं। राम आदर्श है हमारा। क्योंकि जब हम ईश्वर को फॉलो अगर ईश्वर को फॉलो करने वाली बातें सोच लेंगे तो उसमें तो यह भी आ जाएगा कि ईश्वर ने विष पीना सिखाया। भाई नीलकंठ

00:57:51:01 के रूप में उसको भी फॉलो करें। विष पीना चाहिए क्योंकि उन्होंने हलाल विष पिया था। है ना? तो क्या कहते हैं? बाकी सभी जो हमारे पूज्य भगवान के जो अन्य रूप हैं वो हमारे लिए पूजनीय है। बिल्कुल नो डाउट उनकी पूजा करके हमें मोक्ष की प्राप्ति होगी। मगर एज ए मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में राम है उनको फॉलो करना

00:58:29:04 जी नाउ आई एम आउट ऑफ क्वेश्चन मतलब बहुत कुछ आपकी बातें मुझे समझ में आई है जो कि मुझे स्टार्टिंग में नहीं लगा था कि मैं इस बात को मानूंगा चिंतन करूंगा मैं इस बात पे और भी वैसे और देखो अभी अच्छा रेफरेंस मुझे शास्त्र बाकी आप यहां से कुछ क्वेश्चन कुछ क्वेश्चन देखिए जन्म आधारित तो आप भी मानते हैं बस आप इतना मानते हैं कि बाद में चेंज हो जाएगा जन्म आधारित तो आप भी मानते हैं या नहीं हो सकता इस पर अभी मैं सोचूंगा अब आप इस पर चिंतन करिएगा हम लोग जो बुक एक प्रकाशित करने वाले हैं आहान की है उसमें एक पूरा चैप्टर है वर्ण व्यवस्था का तर्क और प्रमाण के साथ तो मैं देखता हूं अभी अभी उसका जो वो पार्ट है है ना वर्ण व्यवस्था वाला वो मैं आपको देने का देने का प्रयास करूंगा। ठीक है? हां ये सब रेफरेंसेस आप ले लीजिएगा। देखिएगा कि ब्राह्मण को कितना वो किया गया है कि अब देखिए आप ब्राह्मण जरूरत से ज्यादा कमा नहीं सकता। ब्राह्मण ऐसे ही ब्राह्मण का जीवन होगा निर्वाह कि भैया कोई अगर चाहे तो इसमें दान कर दे थोड़ा सा तो उससे ही ब्राह्मण का वो चलेगा और उसी से उसको वो जो धर्मोचित

00:59:44:09 कार्य आगे करने हैं योजनाबद्ध तरीके से वो भी चलेंगे और ब्राह्मण अपमान का भूखा रहना चाहिए सम्मान नहीं देखना चाहिए और बहुत सारी ऐसी चीजें जो उसके जीवन को कठिन बनाती है देखने में कि ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य होने से अमुक विधि में अमुक व्यक्ति अधिकृत है। केवल इस बात का परवसान है। इस बात में इनका पर्यावसान है। ऐसा नहीं है कि भाई जो शूद्र है उसको मोक्ष नहीं मिल सकता। उसको भगवान की शरणागत नहीं मिल सकती। ऐसा नहीं है। फलचर्य नहीं है। फलचर्य नहीं है। जो इन विधियों का सारी विधियां है जो कुल मिलाकर के करना डूस एंड डोंट्स है ना कर्तव्य और अकर्तव्य तो ये सारी विधियां विधि और विधि निषेध ये सारी विधियों का पर्यावसान क्या है? धर्म इनको ही तो धर्म कहते हैं। ये करना है ये नहीं करना। ये धर्म है। और धर्म का पर्यावसान है। धर्म का पर्यावसान है मोक्ष में। तो ऐसा नहीं है कि कोई ब्राह्मण के रास्ते पर चलकर के ही उसको मोक्ष मिलेगा। वरना मोक्ष नहीं मिलेगा। मोक्ष किसी को भी मिल सकता है। तो कर्मकांड के भाव से जी अब जी तो जन्म आधारित जो व्यवस्था है उसका पर्यावसान जो व्यवहार है ना संसार में जो व्यवहार कैसे करना है उसमें है

01:01:00:02 इसमें नहीं है कि किसको परमार्थ मिलेगा किसको परमार्थ नहीं मिलेगा। परमार्थ तो ये है कि भैया अभी भगवान का नाम जपने लगो राम राम राम राम राम राम राम और अभी देखो आपका वहां से परमार्थ सेट होने लगेगा। एजुकेटेड दलित आर ऑल मूविंग बस हटा दीजिए। ठीक है। काफी है। पढ़ लिया। एजुकेटेड दलित मूव कर रहे हैं बुद्धिज्म की ओर। तो आवश्यकता यह नहीं है कि हम अपने धर्म की परिभाषा बदल दें। आवश्यकता यह है कि उनसे जाकर के बैठ के ऐसी ही वार्ता करें जैसे आज आकाश गर्ग जी से की है। उन तक वो शिक्षा नहीं पहुंच रही है धर्म को समझने वाली। इसलिए मूव कर रहे हैं। उन तक सही शिक्षा पहुंचेगी धर्म की तो मूव नहीं करेंगे। मगर इसके उलट यदि हम धर्म को ही बदलने लगे इस भय से कि व्यक्ति धर्म को छोड़ रहा है। इस भय से हम धर्म को चेंज करने लगे। हां तो व्यक्ति तो कल को यह भी कहेगा कि मुझे बहन से विवाह करना है। तो ठीक है अपने अलऊ कर दो बहन से विवाह करना। उसके आगे और बढ़ेगा। सोचिए कहां-कहां तक जा सकता है। पराकाष्ठा पे जाएगा। व्यक्ति तो जानवर है। जानवर के समान था ना धर्म ना पशु भी समान। तो हम यह नहीं कर सकते कि बाढ़ का पानी आ गया और मंत्री जी से पूछा गया

01:02:14:12 कि मंत्री जी बाढ़ का पानी खतरे के निशान तक आ गया तो खतरे का निशान 2 इंच और ऊपर उठा

⬜ Not used yet · 01:02:19:22 – 01:03:38:00 (1:18)

01:02:19:22 दो। नहीं हमको व्यवस्था करनी होगी कि बाढ़ से कैसे बचा जाए ना कि उस उस निशान को ही बदल दो। धर्म को ही बदल दो। फिर धर्म बदल गया तो धर्म क्या है? मनुष्य की भावनाओं के अनुसार यह सारी बातें हैं। तो आवश्यकता यह नहीं है कि हम अपने धर्म को चेंज करते जाए। आवश्यकता यह है कि उसका सही स्वरूप उस तक पहुंचाएं। ठीक है? फिर पूरा करते हैं। कोई आ भी नहीं रहा है। आपको रेफरेंस पंडित जी दे देंगे। आशा करते हैं आज की चर्चा आपको अच्छी लगी हो और काफी सारे तथ्यों पर हम लोगों ने बात की है। प्रकाश भी डाला है। एक सुनील जी से वार्ता हुई थी। वह हमारे पास एक उसमें पीडीएफ में है पूरी वार्ता क्रमबद्धता से तो उसको भी आप ले लीजिएगा। उसमें आपको बहुत फैक्टफुल चीजें आएंगी। ठीक है पंडित जी आभार आपका और आकाश गर्ग जी आपका आभार। जो लोग भी हमें सहायता करना चाहते हैं, आर्थिक बल प्रदान कर सकते हैं हमें। यह बारकोड यहां पर दिया गया है। अकाउंट डिटेल्स भी दी गई है। सभी को जय श्री राम। जय श्री राम। जय श्री राम जय श्री कृष्णा हर महादेव हर महादेव

01:03:36:11 [संगीत]

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Video 1:03:41 · 27 May 2025

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