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00:00:01:20 247 बड़ा टिपिकल भगवत गीता का 247 वाला जो श्लोक है कर्मवादी कारस्ते मा फस गदाच ये एक जटिल मतलब श्लोक समझने में लोगों को परेशानी होती है तो इस पे यहां पर ये ज्यादा बात नहीं करते देखिए क्या लिखा है इन्होंने 247 के अर्थ में 247 में कहा है कि कर्म फल की इच्छा मत कर बस देखिए क्या लिखा है 246 का कितना लंबा चौड़ा बात की थी और 247 में क्या लिखा है अंडरलाइन करके दिखाइए। यह है इनका तत्व ज्ञान। ऐसे होती है तत्वज्ञानी की पिक्चर क्योंकि जटिल है ना इसका मतलब बताना। तो अभी हम बात करेंगे इस पे क्रमबद्धता से। फिलहाल हम दो 47 का अर्थ बता दें। जैसे भगवान कहते हैं कि तुम्हारी परिणाम में कोई अधिकार नहीं है। केवल कर्म करने में अधिकार है। तो यहां पर प्रश्न कई बार यह आ जाता है कि यदि व्यक्ति जीतने के लिए नहीं लड़ रहा है तो उसके लड़ने में वो जो स्तर है उसका लड़ने का वो उतना प्रभावशाली नहीं हो पाएगा। यदि उसके मन में लक्ष्य नहीं होगा कि मुझे जीतना है। है ना? तो यानी कि परिणाम को तो ध्यान में रखकर ही करना है। तो फिर यहां क्या कहा
00:01:16:24 जा रहा है कि परिणाम को ध्यान मतलब परिणाम पर तेरा अधिकार नहीं है। तो बात यह है कि ऐसा नहीं है कि आपको युद्ध जी युद्ध लड़ना है तो जीतने के लिए
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00:01:26:07 लड़ना है। ऐसा नहीं है कि नहीं लड़ना है। जीतने के लिए लड़ना है। पर
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00:01:31:08 उस जीत से आपको क्या मिलेगा? सिर्फ एक भाव। क्या कि मैं वो करूंगा जो शास्त्र कहते हैं। सिंपल। यहां अगर आपके मन में यह भाव है कि मैं जो लड़ रहा हूं युद्ध वो इसलिए मैं जो जीतने के लिए युद्ध लड़ रहा हूं। जीतने के लिए लड़ रहा हूं। परिणाम पे ध्यान दे रहा हूं। मगर उस परिणाम पे मेरा ध्यान इसलिए भोग करना है। उस परिणाम पर मेरा ध्यान इसलिए है कि शास्त्र ने कहा है। ठीक है। अब जैसे जीत जाओगे तो क्या मिलेगा? जीत जाओगे तो महल मिलेगा। तो ठीक है। मैं महल के लिए जीत रहा हूं। मगर मैं महल के लिए इसलिए जीत रहा हूं क्योंकि शास्त्र ने कहा है मुझे पर्सनल कोई इंटरेस्ट नहीं है। अच्छा महल में जाऊंगा तो ऐसे रहूंगा वैसे रहूंगा वहां भोग होगा तो ठीक है। मैं वहां के महलों के भोग भोग रहा हूं। मगर इसलिए भोग रहा हूं क्योंकि शास्त्र ने कहा है मेरी अपनी कोई प्रीति नहीं है। अपनी कोई आसक्ति नहीं है उन भोगों के प्रति। यह बात भगवान शंकराचार्य जी ने अपनी भगवत गीता में
00:02:43:09 बताई। तो जब ऐसा जटिल समस्या वाला आया जैसे योगक्षेम का कोई अर्थ बताया ही नहीं इन्होंने। उसी तरीके से यहां पर भी धीरे से आगे सरक गए कि वह तेरा कर्म में वह है और बस आगे बढ़ दिए। तेरा कर्म में ही अधिकार है। ज्ञान निष्ठा में नहीं। वहां कर्म करते हुए तेरा फल में भी अधिकार नहीं है। अर्थात यह भगवान शंकराचार्य जी ने अर्थ किया है इसका 247 का। अर्थात तुझे किसी भी अवस्था में कर्म फल की इच्छा नहीं होनी चाहिए। यदि कर्म फल में तेरी तृष्णा होगी तो कर्म फल प्राप्ति का का कारण होगा। अतः इस प्रकार कर्म फल प्राप्ति का कारण तू मत बन। क्योंकि जब मनुष्य कर्म फल की कामना से प्रेरित होकर कर्म में प्रवृत्त होता है तब वह कर्म कर्म फल रूप पुनर्जन्म का हेतु बन जाता है। यदि कर्म फल की इच्छा ना करें तो दुख रूप कर्म करने की आवश्यकता क्या है? तो इसका जवाब आगे दिया है कि योग में स्थित होकर 48 वे में योग में स्थित होकर केवल ईश्वर के लिए कर्म कर। क्यों कर रहा हूं मैं? मैं क्यों जीत रहा हूं? मेरा जीतने का उद्देश्य यह नहीं है कि मुझे भोग प्राप्त हो। मेरा जीतने का उद्देश्य इसलिए है क्योंकि मुझे वो करना है जो ईश्वर ने कहा है। तो केवल ईश्वर के लिए कर्म कर उनमें भी ईश्वर मुझ पर प्रसन्न हो।
00:03:58:16 इस आशा रूप आसक्ति को छोड़ दे। ईश्वर मुझसे प्रसन्न होंगे। यह भी ध्यान मत दे। केवल एक मुझसे कहा है मुझे करना है बस मुझे क्रेडिट नहीं लेना है कौन क्या कहता है यह सब नहीं देखना है ईश्वर प्रसन्न होंगे मुझसे इसके प्रति आसक्ति भी नहीं रखनी है केवल मुझे वो करना है जो ईश्वर ने कहा है ठीक है इस भावना के साथ अपना कर्म करिए तो यह समय पर आ जाती है कांकर भाष्य से चीजें समझ में तो
00:04:34:27 48 पर आ जाते हैं हम। 47वा हो गया। अब इसने 48 से 50 तक एक साथ लिया। तो हम 48 से 50 पहले इसका पढ़ लेते हैं। इसका पढ़ते हैं। पहले 48 से 50 क्या लिख रहा है ये? 48 से 50 तक का भाव है कि शास्त्र विधि अनुसार। अच्छा इसने यहां पर एक बात और है 247 में जब इसने कहा कि कर्म फल की इच्छा मत कर तो जब इसने वहां पीछे कहा था कि लाभ हानि लाभ हानि वाले लाभ हानि में समत्व बुद्धि रखने का खंडन किया था तो इसका मतलब ये दो 47 वाला जो श्लोक है इसका भी खंडन हो गया क्यों खंडन हो गया क्योंकि यहां भी यही कहा जा रहा है कि लाभ हानि पर ध्यान मत रख हमने बताया था ना पीछे पीछे के दो श्लोक ऐसे थे इसमें लाभ हानि और समत्व बुद्धि रखने को कहा जा रहा है तो उसने मना कर दिया था कि नहीं अर्जुन कौन से खेत की मूली है जो दुखी नहीं होगा है ना और लाभहानि के बिना युद्ध कैसे हो सकता है दो श्लोकों में इसने मना किया था तो इसका अर्थ है कि यहां कर्म फल की इच्छा मत कर यहां पर भी खंडन हो रहा है ठीक है क्योंकि पीछे इसने माना
00:05:50:02 है लाभ हानि में समबुद्धि नहीं रखनी है और राग द्वेष में समबुद्धि नहीं रखनी तो 247 का भी खंडन हो गया। लगभग मेरे ख्याल से अभी तक पांच श्लोक हो गए हैं। यह श्लोक भी ध्यान रखिएगा कि इसने हम लोग कितने श्लोक निकालेंगे जो इसने नहीं माने। एज इट इज नहीं माने या तो गलत कह दिया सीधे-सीधे अर्थ बदलने की तो बात दूर है। इसने गलत कह दिया। मैं पेज नंबर बता दूं क्या आपको? दिखाना है आपको तो। वैसे वह हो चुका है। पेज नंबर 23 देखिए।
00:06:28:14 लास्ट लाइन देखिए 23 में बिना लाभ हानि के युद्ध हो सकता है। 31 से 37 के बीच में कोई श्लोक है जिसमें लाभ हानि को समान समझकर युद्ध करने की बात कही है भगवान ने तो उसका खंडन कर रहा है। बिना लाभ हानि के युद्ध हो सकता है। [संगीत]
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भगवतद्गीता का 2:47 एक जटिल श्लोक है -रामपाल नहीं समझ पाया #satlokashram #rampalmaharajbooks
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