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00:00:02:00 तो भाई आज बात करेंगे जो हमारे तथाकथित लुप्त संप्रदाय के गुप्त मगर वेल नोन गालीबाज आचार्य हैं। मैं गालियां देता हूं। मैं गालियां देता हूं और मैं गालियां दूंगा। उनकी जो गाली देने की विधा है, जो उनका कौशल है, जो वह गर्व के साथ, दंभ के साथ स्वीकार करते हैं। उनके कुछ कुतर्क हैं। उन कुतर्कों को भी लेंगे और अच्छे से मीमांसा करेंगे कि इनकी गाली देना कितना धर्म सम्मत है जिसको ये स्वीकार करते हैं कि मैं गाली दूं देता हूं और मैं गाली दूंगा। तो सबसे पहले इनके कुछ कुतर्क हैं जो हमें Facebook इत्यादि के माध्यम से प्राप्त हुए या फिर इनके वीडियोस के माध्यम से प्राप्त हुए। उन कुतर्कों को ले लें और आगे इन कुतर्कों के आधार पर ही इनकी गाली की मीमांसा करेंगे कि इनके कुतर्क कितने ठीक हैं। कितने तर्क संगत हैं ये जो हमारे लुप्त गाली बाजाचार्य हैं। है ना? वैसे आचार्य शब्द ऐड करना ठीक नहीं लगता है। मगर क्या करें? लोगों को बताने के लिए विवशता है हमारी। बताना तो पड़ेगा ना किसकी बात कर रहे हैं। तो
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00:01:13:27 क्या है? गाली तो मैं गाली देता हूं यदि कोई गाली सुनने का काम करें। मैं ऐसा संत नहीं हूं कि तुम मुझे मां बहन की गालियां देते रहो तो मैं माथा झुका कर सुन लूंगा। ऐसी सारस्वत सिद्धि हमारे पास नहीं है कि कोई मुझे गालियां दे और मुझे अपनी सिद्धि बचाने के चक्कर में माथा झुका कर सुनना पड़े। बिल्कुल नहीं। कदापि नहीं। किसको मानोगे? वेद को मानोगे प्रमाण। पुराण को मानोगे, स्मृति को मानोगे, तंत्र को मानोगे, इतिहास को मानोगे, अह आधुनिक नीतिकारों को मानोगे, किसको मानोगे? जहां से मानोगे, वहां से प्रमाण देंगे। चलो प्रारंभ। तो इनका
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00:01:42:02 जो पहला कुतर्क है वह है कि जो गाली सुनने का कार्य करेगा उसे गाली देंगे महाराज। जो गाली सुनने का कार्य करेगा उसे ये गाली देंगे। अब प्रॉब्लम यहां पर यह आती है कि भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण ने 23 वे 24 श्लोक में ये कर दिया है। एक एक प्रॉब्लम दे दी हम लोगों को। है ना? प्रॉब्लम यह दे दी है कि उसमें उन्होंने कह दिया है कि तेरे लिए कर्तव्य और अकर्तव्य के विषय में शास्त्र प्रमाण है तो कौन सा कर्म जो है गाली देने योग्य है यह पूरे वैदिक वांगमय से निकाल के बता दें तो कृपा हो जाएगी यह लुप्त आचार्य की है ना पूरे वांगमय जो है हमारे शास्त्र है सनातन शास्त्र उसमें से कौन सा ऐसा पाप है जिसके कारण उसे गाली देना उचित माना जाए किसी व्यक्ति को वो बताएं क्योंकि इन्होंने कहा है ना जो गाली देने वाला कार्य करेगा उसको को यह गाली देंगे तो वह गाली देने वाला कार्य कौन सा होगा कौन सा नहीं होगा इसके लिए कुछ शास्त्र में विधान होगा ना पहला कोतर्क दूसरा कोतर्क इनका है कि इन्होंने पूर्व पक्षी के रूप में गाली नहीं दी है मतलब इन्होंने पहले
00:02:57:10 अपनी ओर से गाली नहीं दी है वैसे तो दी भी है मगर कहीं पर यह कह रहे होंगे कि मैंने पूर्व पक्षी के रूप में गाली नहीं दी है उसने दी है तो मैंने दे दी अब इनके यहां पर दो मिलते जुलते से तर्क है तर्क क्या कुतर्क एक है कि जो जैसा करेगा उसके साथ हम वैसा ही बर्ताव करेंगे और एक है कि भाई मैंने पूर्व पक्षी के रूप में गाली नहीं दी है। मैंने तो उत्तर पक्ष के रूप में गाली दी है। तो प्रॉब्लम यह है कि अगर हम जैसे को तैसा करेंगे जैसे कि इन्होंने अपनी इस बात के उसमें महाभारत का एक वचन भी लिया है जिसमें भीष्म जी परशुराम जी को बता रहे हैं कि भाई जब कोई व्यक्ति सामने से जिस तरह का व्यवहार कर रहा होता है तो उसके साथ उसी तरह का व्यवहार करना जब करते हैं तो वहां पर हम जो है हमें अधर्मी नहीं माना जाता। इस तरह का वहां पर वचन है। तो अब अगर इसको एज इट इज मान लेंगे जो दिखाई और सुनाई दे रहा है। अगर इस वचन को एज इट इज मान लेंगे तो हमें यह भी मानना पड़ेगा कि कोई अगर किसी की स्त्री के साथ गमन करे पराई स्त्री के साथ तो फल स्वरूप या फिर प्रतिकार स्वरूप वो जो व्यक्ति जिसकी पत्नी के साथ गमन किया गया है उसको भी सामने वाले व्यक्ति की पत्नी
00:04:12:16 के साथ गमन करना चाहिए। है ना? अगर किसी ने किसी की किसी के पिता की हत्या कर दी है तो सामने वाले को भी उसके पिता की हत्या करनी चाहिए। उसको दंड उसको दंड ना देते हुए उसके पिता की हत्या करनी चाहिए। अब यहां पर सबसे बड़ी बात यह आ जाती है कि हमें इस स्मृति वचन का ऐसा अर्थ लेना होगा जिससे कि हमारे बाकी के जो वचन है वो कटे ना। जैसे समस्त श्रुति स्मृति शास्त्रों में सामंजस्य की शिक्षा ही साधु सम्मत धर्म है ना ये तो पढ़ा ही होगा गालीबाजाचार्य जी ने तो अर्ध कुकुट न्याय तो नहीं कर सकते ना कि केवल इसी वचन को मान ले और बाकी सारे वचनों को छोड़ दें महाभारत आदि
00:04:57:19 पर्व पहला अध्याय और 80 से 83वा श्लोक क्या कहा जा रहा है तब व्यास जी भी कोतूहल वश ग्रंथ में गांठ लगाने लगे। वे ऐसे ऐसे श्लोक बोल देते जिनका अर्थ बाहर से दूसरा मालूम पड़ता और भीतर कुछ और होता। इसके संबंध में प्रतिज्ञा पूर्वक श्री कृष्ण द्वैपायन मुनि ने यह बात कही है। क्या कही है? इस ग्रंथ में 8800 श्लोक ऐसे हैं जिनका अर्थ मैं समझता हूं। सुखदेव समझते हैं और संजय समझते हैं या नहीं इसमें संदेह है। मुनिवर वह कूट श्लोक इतने गुथे हुए हैं और गंभीरार्थक हैं कि आज भी उनका रहस्य भेदन नहीं किया जा सकता क्योंकि उनका अर्थ भी गढ़ है। स्वयं सर्वज्ञ गणेश जी भी उन श्लोकों का विचार करते समय क्षण भर के लिए ठहर जाते हैं। इसमें मुझे लगता है कि इनके रास्ते में सबसे बड़ा जो रोड़ा है वो प्रभु श्री राम है। यह जो राम नाम है ना यही इनके रास्ते का सबसे बड़ा कांटा है और
00:06:12:19 मैंने तो कहा ही है कहीं पर भी कि जीवन में जब कुछ भी समझ में ना आ रहा हो तो राम की शरण में जाओ आपको उत्तर प्राप्त होने लगेंगे जब रावण ने सीता माता का हरण कर लिया तो क्या प्रतिकार स्वरूप श्री राम ने भी रावण की पत्नी का हरण किया मंदोदरी का हरण किया जो रावण था उसने श्री राम की पत्नी को अपने यहां पर रखा सीता माता को तो इस कारण से उनको अग्नि परीक्षा देनी पड़ी। इतना सब हुआ है ना जवाब देना पड़ा अयोध्या वापस जाकर के। तो इस तरह की स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया श्री राम जी की पत्नी को रावण ने। तो क्या रावण की पत्नी को या रावण को ऐसी स्थिति में लाकर खड़ा किया श्री राम ने? अच्छा जब स्मृति के वचन जो श्रुति के वचनों का विरोध होने लगे तो वहां पर किसको मानेंगे? किसको माना जाएगा? अगर इस वचन का कि भाई जो सामने वाला जैसा व्यवहार कर रहा होता है उसके साथ वैसा ही व्यवहार किया जाए। अगर सामने वाला कोई दुराचरण कर रहा है तो आप भी उसके साथ दुराचरण करोगे तो वो गलत
00:07:27:27 नहीं माना जाएगा। इस तरह का अगर अर्थ निकाल लें इस वचन का, महाभारत के इस वचन का तो यहां पर विरोध किसका होगा? फिर विरोध होगा श्री राम का रामायण का और रामायण क्या है? स्वयं वेद ही रामायण के रूप में अवतरित हुए हैं। स्वयं वेद ही श्री राम के रूप में अवतरित हुए हैं। तो विरोध होगा। तो इसलिए और भी ना जाने कितने ऐसे वाक्य हैं जहां पर यह कहा जा रहा है कि जो अभी हम आगे बताएंगे। जहां पर यह कहा जा रहा है कि सामने वाला अगर ऐसा ऐसा कर भी रहा हो तब भी आप ऐसा ऐसा ना करें। जवाब में अगर कोई तुम्हें गाली दे भी रहा है तो आप उसको प्रति उत्तर में गाली ना दें। क्योंकि जो जब आप चुप रहेंगे गाली सुनने के बाद भी तो सामने वाले का जो क्रोध है ना वही उसे भस्म कर देगा। जो सुनने वाले के अश्रू जो गिरेंगे ना वही उसके लिए तबाही होंगे। यह सब लिखा हुआ है शास्त्रों में। अभी आगे बताएंगे। तो क्या हुआ? अगर इस वचन का हम अर्थ यह ले लें कि भाई टिट फॉर टैट करिए और एज इट इज ले ले जो सुनाई और दिखाई दे रहा है तो श्री राम का विरोध हो जाएगा। शास्त्रों के अन्य बहुत सारे वचनों का विरोध हो जाएगा।
00:08:43:01 तो हमें क्या समझना पड़ेगा कि युद्ध करते समय जब कोई व्यक्ति आपके ऊपर जिस तरह का प्रहार कर रहा है शस्त्र जो दैहिक युद्ध होता है तो उसी तरह का प्रहार आप उस पर कर सकते हैं। जैसे तलवार से वार कर रहा है तो तलवार आप चला सकते हैं। धनुष से वार कर रहा है तो धनुष आप चला वो वार कर रहा है। दैहिक वार कर रहा है तो आप दहिक वार उस पर कर सकते हैं। मगर यह नहीं है कि किसी ने आपको अगर माता से जोड़ करके और बहन से जोड़ करके गाली दे दी तो आप भी उसके जैसा दुराचरण करने लगे क्योंकि वहां पर आप दुराचारी हो जाएंगे। और दूसरी बात यह भी है कि जब इस तरह की कोई गाली दी जाती है तो आपने सिर्फ सामने वाले को गाली थोड़ी ना दी है। उसको जिससे जोड़ा है जिसके साथ उसकी माता अथवा बहन जो हो सकता है निर्दोष हो। उसके भी चरित्र पर आपने लांछन लगाया ना मिथ्या वाक्य के द्वारा। तो यह सारी बातें हैं जो इनके इस कुतर्क को तहसनहस करती हैं कि जैसे को तैसा। अब या तो ये लाएंगे और कोई प्रमाण राम को टक्कर देने के लिए। इनका तो काम ही है। इनका
00:09:58:10 तो आचरण ऐसा है कि आज यदि श्री राम भी खड़े हो जाए इनके सामने तो ये उनको भी कहने लगेंगे कि नहीं नहीं यहां यहां पर राम जी गलत है और हो सकता है अभी आएंगे इन वाक्यों का उत्तर देने आओ भाई आओ मैं तो कहता हूं सामने आओ ना अब तो सारी चीजें अब तो घड़ा भर चुका है जितना बचाना था जितना लोगों को नहीं दिखाना था हमारी और तुम्हारी प्रतिस्पर्धा है ना? वह सब सीमाएं तो अब लांगी जा चुकी हैं। तो अब तो यह वीडियो बाजी का खेल बंद हो। हमने तो अपनी कम्युनिटी पोस्ट में भी कह दिया, लाइव में भी कह दिया सामना करो, सामना करो। अभी भी कह रहे हैं सामना करो। खैर जैसा तुम्हें सहज हो उसका अनुसार करिए। तो इनके एक कुतर्क है जिनकी धज्जियां उड़ती हैं श्री राम जी के द्वारा और शास्त्र के अन्य वचनों के द्वारा। अच्छा हमारे पास एक इनका कुतर्क और है। कह
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00:10:54:04 रहे थे कि गाली तो भगवान कृष्ण ने भी नहीं दी कभी किसी को। अरे भैया उनके पास माथा काटने का सिस्टम उपलब्ध था। भगवान श्री कृष्ण के पास सुदर्शन चक्र था। इसीलिए उन्होंने चक्र का प्रयोग करके गाली देने वाले का मस्तक उड़ा दिया। मेरे पास नहीं है तो मैं क्या करूं? वाचिक प्रतिकार भी नहीं करूं
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00:11:10:04 कि हमारे पास असाधारण शस्त्र नहीं है। इसलिए जो है अ हम जो है गाली का उपयोग करते हैं। अच्छा शास्त्रों में यह भी वचन आया है आगे कि अभी हम शास्त्रों के वचन भी उत करेंगे। तो शास्त्रों में यह भी वचन आया है कि सामने वाला यदि नियत्ता है। है ना? सामने वाली सामने वाला यदि शस्त्र से रहित है तो उसको छोड़ देना चाहिए। ठीक है? अब जब यह कह रहे हैं कि हमारे पास शस्त्र नहीं है तो इसका मतलब यह मान रहे हैं कि युद्ध की स्थिति है। शस्त्र का अभाव बता रहे हैं ना। शस्त्र शस्त्र की उपयोगिता सिद्ध हो रही है। इसीलिए तो कह रहे हैं कि शस्त्र का अभाव है तो यानी युद्ध की स्थिति है। तो जिसको ये गाली दे रहे हैं जिस पर ये शस्त्र का विकल्प के रूप में ये गाली को चुन रहे हैं वो तो निहत्ता है। उसके पास क्या है? वो आपको मिसाइल मार रहा है दूर बैठ के या आपको जो है गोली मार रहा है दूर बैठ के बम गिरा रहा है या आपके सामने खड़ा हुआ खंजर लेकर के। हां। क्या कर रहा है वह?
00:12:25:18 वह तो निहत्ता है। उसके पास तो शस्त्र नहीं है। तो फिर तुम शस्त्र का विकल्प लेकर के वार कैसे करने वाले हो जाओगे? और 100 की सीधी एक बात मेरे भाई 100 की सीधी एक बात कि शस्त्र का विकल्प गाली है। यह भी तो तुम्हें शास्त्र से निकालना पड़ेगा। क्या करें? भगवान श्री कृष्ण ने कह दिया ना। नहीं तो तुम्हारी बातें मान लेते। भाई तुम ही तो हो। धर्म का विस्तार से धर्म की व्याख्या कर सकने वाले एकमात्र तुम ही हो। मगर क्या करें? हमारी श्रद्धा जो है भगवान कृष्ण में हो गई। भगवान राम में हो गई। क्या करें? बाद में आए तुम पहले आ जाते। अपने गुप्त वास में जो कर रहे थे उसको छोड़ के थोड़ा पहले आ जाते। हमारी श्रद्धा होने से पहले। सनातनियों की श्रद्धा लुप्त संप्रदाय के गुप्त आचार में नहीं है। गालीबाज में नहीं है। सनातनियों की श्रद्धा भगवान श्री कृष्ण में है। भगवान श्री राम में है। सुना कानों में जा रही होगी ना आवाज? हां। तो यह प्रॉब्लम है कि सनातनी वो लुप्त संप्रदाय के गुप्त आचार्य को उस तरह से नहीं मानते। प्रमाण जिस तरह से राम को मानते हैं यह प्रॉब्लम है। जिस तरह से कृष्ण को मानते हैं, यह
00:13:40:26 प्रॉब्लम है। है ना? तो कहां लिखा है कि शस्त्र का विकल्प गाली होगा? शास्त्र तो उल्टी बातें कर रहे हैं। तो भाई अब इस गाली बाजाचार्य की गालियों की मीमांसा कर लेते हैं। शास्त्रों के आधार पे। तो मनुस्मृति सातव अध्याय के 51 वे श्लोक में लिखा हुआ है कि क्रोध से उत्पन्न होने वाले आठ व्यसन होते हैं। उनमें से एक व्यसन है कठोर वाणी बोलना, कठोर वचन बोलना। और आगे इस व्यसन को मृत्यु से भी भयंकर बताया गया है सात 53 में। इसके बाद जो अभी मैंने बात कही थी कि जब आप यह कह रहे हैं कि मेरे पास शस्त्र नहीं है इसलिए मैं गाली का उपयोग करता हूं। तो ऐसे में जब आप शस्त्र का विकल्प गाली को ले रहे हैं। पहली बात तो यह है कि शास्त्रों में कहीं शस्त्र का विकल्प गाली नहीं दिया गया है। मनमुखी है। और दूसरी बात यह है कि शस्त्र का विकल्प जब आप ढूंढ रहे हैं। यानी कि आप युद्ध की स्थिति मान रहे हैं तो आप सामने वाला जो है निहत्ता है। उसके पास तो शस्त्र नहीं है। तो शास्त्र कह रहे हैं कि जिसके पास शस्त्र ना हो उसको छोड़ देना चाहिए। उसको नहीं मारना चाहिए।
00:14:56:12 तो फिर आप यहां पर भी मनुस्मृति का विरोध कर रहे हैं। सातवां अध्याय 92वा श्लोक क्या लिखा है? कि जो सोया हुआ बखथर रहित नग्न शस्त्र रहित युद्ध से विमुख केवल देखने के लिए लाया हुआ और दूसरे से युद्ध में जुटा हुआ हो ऐसे शत्रु को ना मारे छोड़ दें युद्ध की स्थिति की बात हो रही है ना अब बात करते हैं कि जो गाली जब कोई किसी को देता है तो उसमें पहली बात तो यह जैसे पीछे कहा कि हमने अगर किसी को माता से जोड़कर, बहन से जोड़कर गाली दी, माता के साथ गमन करने वाला कहा तो उसमें केवल हमने उसको ही गाली नहीं दी है। उसकी माता को भी माता के चरित्र पर भी लांछन लगाया है। बहन के चरित्र पर भी लांछन लगाया। यानी कि मिथ्या भाषण किया है। झूठ बोला है। तो अब झूठ की बात देख क्या बोल? झूठ असत्य बोलना अधर्म है। क्योंकि सत्य जो है धर्म के लक्षणों में से एक है। है ना? वो भी दिखाते हैं अभी। तो झूठ बोलने पर जिस सभा में झूठ बोले झूठ बोला जाता है वहां उस सभा के सभासद जो है मारे जाते
00:16:11:15 हैं। कहां लिखा है? मनुस्मृति आठवां अध्याय 14वा श्लोक। अच्छा इसके बाद झूठ बोलने वाला दोषी जो है वह दंड के योग्य है। कहां लिखा है? आठवां अध्याय 36वा श्लोक। झूठी गवाही देने पर दंड है। आठवां अध्याय 257 वा श्लोक। अच्छा अब एक तो बहुत ही अब यहां पर एक तो बहुत ही सटीक बात आ गई है। बहुत सटीक बिल्कुल प्रासंगिक बात क्या है वो इसको खोल लेते हैं मनुस्मृति में आठवां अध्याय और 225वा श्लोक क्या लिखा है? इसमें लिखा हुआ है जो मनुष्य कन्या को छत योनि कहकर मतलब दूषित कहकर ऐसे दोष को साबित ना कर पाए तो राजा उसको दंड दे यानी यह दंडनीय अपराध है। तो पहली बात तो जब आप किसी को गाली दे रहे हैं तो किसी कन्या पर किसी स्त्री पर दोष लग रहा है। आप उसको साबित करने पे सक्षम नहीं है। तो क्या हुआ कि वह आपका अधर्म आचरण है, दोष युक्त आचरण है। आप दंड के भागी हैं। और
00:17:26:21 साथ ही साथ जो प्रासंगिकता है कि आपने आरोप लगाया एक स्त्री को लेकर, एक मातृशक्ति को लेकर के मठ से जोड़कर वहां पर भी यह लागू होता है। साबित करो। वरना स्वीकार करो। तुम आचार्य नहीं हो। क्योंकि आचार्य कौन होता है जो शास्त्रों के जो जो तत्व होता है ना उसको जानता है और अपने शिष्यों को बताता है स्वयं धारण करता है और उनमें भी धारण करवाता है और अगर तुम्हारा तात्पर्य यह है शास्त्रों का कि किसी को भी बिना सोचे समझे मुंह उठा के बस कुछ भी कोई भी आरोप लगा दो किसी को गाली के रूप में लगा दो किसी को सीधे-सीधे कह करके लगा दो तो यह अगर तुम्हारे अनुसार शास्त्रों का तात्पर्य है तो कल को तुम अपने शिष्यों में यही आचरण तो धारण करवाओगे। खैर जब जब तुम किसी को गाली देते हो तो किसी ना किसी वहां पर निर्दोष कन्या को वो जो आरोप लग रहा होता है। है ना? भले ही वो अपने जीवन में कुछ और हो मगर जहां पर तुम जिससे जोड़कर उसको गाली दे रहे हो। उस मिथ्या भाषण के अनुसार उस पर एक आरोप लग रहा होता है। मिथ्या भाषण गलत है। वह हमने बता दिया। मगर अब यह जो आरोप लग रहा है इसको यदि
00:18:41:25 तुम सिद्ध नहीं कर पा रहे हो तो यह अलग से एक पाप है। यह अलग से एक दंड दंडनीय अपराध है। ठीक है? और चलते हैं आगे भाई। अब आगे आ जाता है झूठी गवाही देना पाप है। अगर आप मिथ्या भाषण कर रहे हो तो वह भी झूठी गवाही है। तो झूठी गवाही देना पाप है। यह कहां लिखा है? गरुड़ पुराण दूसरा खंड और चौथा अध्याय 28वा श्लोक अगले जन्म में यह व्यक्ति गूंगा जन्म लेगा यह अपराध जो अपराध था वह बता दिया अब उसका फल क्या होगा वो देखिए यह कहां लिखा है गरुड़ पुराण 2 5 9 अच्छा दुर्वचन बोलने वाला जो दुर्वचन बोलने वाला होता है वो यम मार्ग में रोते-रोते चलता है पिटता पिटता कष्ट भोगता भोगता यहां पर भी दंडनीय बताया गया गरुण पुराण दो चार 10 अच्छा एक चीज और है लज्जा शील यह धर्म है क्योंकि धर्म क्या होता है सुखप्रद है इसको सुखप्रद कहा गया है गरुण पुराण
00:19:57:01 में और सुखप्रद क्या है धर्म ही सुखप्रद होता है तो धर्म सुखप्रद होता है कहां लिखा है अष्टांग हृदय सूत्र में दो20 में और लज्जा सुखप्रद है। यह कहां लिखा है? महाभारत शांति पर्व 290 20 मन वाणी द्वारा किसी से द्रोह ना करना यह भी धर्म है। महाभारत शांति पर्व 162वा अध्याय 21वां श्लोक। अच्छा धर्म का त्याग भी नहीं करना है। जैसे आप कामना करो कि हम शत्रु पर विजय प्राप्त कर तो यह तो बड़ा फेमस श्लोक है। कामना से, भय से, लोभ से भी धर्म का त्याग ना करें। तो जब गाली बकने को अधर्म कहा जा रहा है, धर्म से बाहर कहा जा रहा है तो आप धर्म का त्याग नहीं कर सकते कि हम सामने वाले से जीत जाएंगे गाली देकर। कुछ सीमाएं आपको कुछ सीमाओं में सीमित रहना ही होगा। तभी अधर्म से लड़ते लड़ते यदि आप विजय हो गए तो धर्म की जीत कहलाएगी। अगर आपने भी सभी सीमाएं लांगना शुरू कर दिया तो हो सकता है कि भौतिक रूप से आप सामने वाले से जीत जाए पर अंत में जीत धर्म की नहीं होगी
00:21:12:07 अधर्म की होगी जैसे वो हॉरर फिल्मों में भूत होता था ना जो इस इस शरीर को मार दिया तो दूसरे शरीर में आ गया जिसने मारा था उसी में आ गया वही है यदि आप इस तरह का आचरण करेंगे कि हम कोई भी सीमा नहीं सीमा में सीमित नहीं रहेंगे तुम तो कहते ही हो कि मैं जो है शास्त्र से बाहर जाता हूं तो शास्त्र से बाहर चले गए तो आचार्य किस बात के भाई शास्त्र से बाहर कैसे जा रहे हो तुम वो भी गाली बकने के लिए लोगों की लोगों को माता की बहन की गालियां देने के लिए तुम शास्त्र से बाहर जाते हो हां चलो खैर अच्छा झूठ बोलना 15 अनर्थों में से एक अनर्थ अर्थ है कहां लिखा है श्रीमद् भागवत 11वा अध्याय 11वा स्कंध 23वा अध्याय 18 19 श्लोक अब देखिए श्री राम धर्म का साक्षात स्वरूप है वाल्मीकि रामायण 37 13 दो प्रकार की बातें नहीं करते हैं ठीक है ये भी धर्म हो गया दो प्रकार की बातें ना करना झूठ ना बोलना झूठ ना बोलना भी धर्म हो गया
00:22:27:15 असत्य ना बोलना असत्य भाषण ना करना धर्म है सत्य भाषण करना धर्म है तो क्या हुआ कि लज्जा इत्यादि शील इत्यादि धर्म है तो रावण ने इनको कितना दुख दिया तो आपका यह कहना है कि मेरे पास शस्त्र नहीं है इसलिए मैं गाली का उपयोग करता हूं तो भाई श्री राम भी तो दुखी रहे थे विवश रहे थे काफी दिनों तक लीला में सही मगर विवश तो दिखाई दिए थे ना उन्होंने कब गाली देना शुरू कर दिया। कब रावण को माता की बहन की गालियां दी उन्होंने? और यदि नहीं दी तो यह धर्म कहां से आ रहा है तुम्हारे पास? ऐसा करना। नमाजियों से, क्रिश्चियनों से, कहां से सीख रहे हो धर्म? और एक बात ध्यान रखना यह कहा गया है कि लांछन लगाने वाला साबित ना कर पाए तो दंड के योग्य है। इसलिए लांछन लगाने से पहले ये तय कर लोगे तुम उसको साबित कर पाओगे कि नहीं। इसीलिए चिल्लाता था मैं अकाट्य और आज भी चिल्ला रहा हूं अकाट्य। समझे? सत्य धर्म है श्रीमद् भागवत
00:23:42:26 सात 11 आठ से 12 30 लक्षणों में से एक लक्षण ये सब बता दिया है। हालांकि मैं इसलिए सब नहीं बता रहा था कि जग जाहिर बातें हैं। मगर ठीक है। तुम ऐसे मानोगे तो ऐसे ही सही। अब जो वास्तविक गुरु में निष्ठा रखने वाले शिष्य हैं पूरी शंकराचार्य जी के उन्होंने भी तुम्हारी गालियों की कुछ मीमांसा हमें प्रदान की है। है ना? वह जो ढोंगी वाले शिष्य हैं वह नहीं वास्तविक निष्ठा वाले तप करने वाले शिष्य जो तुम स्वयं को कहते हुए घूमते हो ना हंस वंशावतंस है ना। तो अब हंस भगवान जी ने क्या धर्म बताया है वो देखो। तो क्या लिखा है हंस गीता में महाभारत शांति पर्व 299वा अध्याय तो इसमें जब वैसे तो पूरा अध्याय ही इसी से रिलेटेड जो बात हम कर रहे हैं मगर सीधे-सीधे इसमें आते हैं तो हंस गीता में जो यह आठवां श्लोक है उसमें लिखा
00:24:58:02 गया है कि अमंगलमय बातें मुंह से भी ना निकाले क्यों ना निकाले यदि विद्वान पुरुष को कटु वचन रूपी बाणों से बहुत अधिक चोट पहुंचाए तो भी उसे शांत ही रहना चाहिए। ये हंस भगवान कह रहे हैं। तुम हंस वंशावत हंस कहते हो ना अपने आप को। वही कह रहे हैं हंस। हंस भगवान ही कह रहे हैं। आगे क्या है?
00:25:30:26 16वा श्लोक जो दूसरे के द्वारा गाली दी जाने पर भी बदले में उसे गाली नहीं देता उस क्षमाशील मनुष्य का दबा हुआ क्रोध उस गाली देने वाले को भस्म कर देता है। यह तो मना कर रहे हैं गाली देने को। कहां है भाई आपके पास प्रमाण? कहां है? लाओ गाली देने का प्रमाण लाओ। कहां पर मां बहन लोगों की गालियां देने का प्रमाण है? लाओ। लुप्त संप्रदाय के गुप्त आचार्य गाली देने को शास्त्र सम्मत या धर्म सम्मत सिद्ध करेंगे।
00:26:11:00 हां। आगे क्या लिखा है? हंस भगवान ने आगे लिखा है कि पाप करने वाला अपराधी अवस्था में अपने से बड़ा हो या बराबर उसके द्वारा अपमानित होकर मार खाकर गाली सुनकर भी उसे क्षमा कर देना चाहिए क्योंकि ऐसा करने वाला पुरुष परम सिद्धि को प्राप्त होता है। धर्म है ये भाई और हंस वंशावतंस कहते हो ना स्वयं को हंस भगवान ही बोल रहे हैं। है ना? और मनुस्मृति में कहा गया है 162वा श्लोक कि ब्राह्मण को सदैव अपमान को ढूंढना चाहिए। जो अपमान है वो ब्राह्मण के लिए अमृत के समान है और सम्मान विष के समान है। तो कैसे ढूंढ रहे हो तुम अपने लिए सम्मान? जो तुम कह रहे हो एक जगह कुतर्क में कह रहे हो ना कि भैया मैं वो सारसत मेरी सिद्धियां सारस्वत नहीं है। है ना? जो मैं अपनी सिद्धियों को बचाने के चक्कर में माथा झुकाकर
00:27:26:07 मैं सुनू कदापि नहीं। यह तो घमंड है। तुम्हें तो सम्मान से दूर रहना है। अपमान को ढूंढना है। अपमान तुम्हारे लिए अमृत है। मनुस्मृति को तो मानते हो ना कि नहीं मानते। छोड़ दिया। हां। चलो। तो ये अपमान की बात सुन लो भाई। यह क्या कहा जा रहा है कि यहां पर भी उसी बात मनुस्मति के वचन को ही यहां पर समर्थन मिल रहा है। क्या अपमानित होकर भी आप शांत रहें। इससे आपको परम सिद्धि मिलेगी। अपमान करने वाले को जो है दंड मिलेगा। उसके द्वारा किया गया पुण्य भी आपको मिल जाएगा। और वो आपके दबे हुए क्रोध की अग्नि में जलकर भस्म हो जाएगा। ये शास्त्र कह रहे हैं। क्या करें? तुमसे ज्यादा श्रद्धा है ना इनमें है ना वो तुम्हारे वो मलेच राज कॉमिक्स जो कॉमिक्स कररेक्टर्स हैं है ना और वो तुम्हें सपने में आकर के जो चीजें मिल जाती हैं सिद्धियां वो चमत्कारिक शक्तियां उनसे ज्यादा श्रद्धा है इनमें महाभारत में रामायण में है ना और आगे क्या लिखा
00:28:38:22 है मुझे कोई श्राप दे दे तो भी मैं बदले में उसे श्राप नहीं देता। तो यहां पे वो जो पलटवार करने वाली बात है उसका आपका विरोध यहां पर हो रहा है। मैंने कहा था ना शास्त्रों में बहुत सारे वचन है तुम्हारे इस कुतर्क को खंडित करने के लिए। विद्वान को चाहिए कि वह अपमान पाकर अमृत पीने की भांति संतुष्ट हो। ब्राह्मण के लिए मनुस्मृति में मना किया गया ना। यहां विद्वान को भी मना किया जा रहा है। क्योंकि अपमानित पुरुष तो सुख से सोता है किंतु अपमान करने वाले का नाश हो जाता
00:29:18:22 है। क्रोधी मनुष्य जो यज्ञ करता है, दान देता है, तप करता है, हवन करता है, उसके उन सब कर्मों के फल को यमराज हर लेते हैं। क्रोध करने वाले का वह किया हुआ सारा परिश्रम व्यर्थ जाता है। महाभारत उद्योग पर्व अध्याय 36 अब इसमें क्या है? दूसरा श्लोक है दूसरों से गाली सुनकर भी स्वयं उन्हें गाली ना दें। सहन करने वाले का रोका हुआ क्रोध ही गाली देने वाले को जला डालता है और उसके पुण्यों का फल भी ले लेता है। मैंने अभी कहा था ना कि अपमान सहन कर लेने वाला जो होता है वह परम सिद्धि को प्राप्त होता है। क्यों? क्योंकि सामने वाले के पुण्य भी उसको मिलते हैं और उसका नाश अपने आप हो जाता है। यहां जो दबा हुआ क्रोध होता है उससे। फिर आगे क्या लिखा है? उद्योग पर्व अध्याय 36 और आठवां श्लोक क्या है? जिसकी वाणी रूखी और स्वभाव कठोर है। जो मर्म स्थान पर आघात करता है और वाग बाणों से
00:30:33:27 मनुष्यों को पीड़ा पहुंचाता है। उसे ऐसा समझना चाहिए कि वह मनुष्यों में महा दरिद्र है। और वह अपने मुख में दरिद्रता अथवा मौत को बांधे हुए ढोरा है। छी-छ यदि दूसरा विद्वान पुरुष को यदि विद्वान पुरुष को कोई मनुष्य अग्नि और सूर्य के समान दग्ध करने वाले अत्यंत तीखे भाग बाणों से चोट पहुंचाए तो वह विद्वान पुरुष चोट खाकर अत्यंत वेदना सहते हुए भी ऐसा समझे कि वह मेरे पुण्य को पुष्ट कर रहा है। ये शास्त्र कह रहे हैं भाई गाली के जवाब में गाली देने से मना कर रहे हैं। हम गाली तो कम से कम गाली का उत्तर नहीं है। इतना तो अभी तक समझ में आ ही गया होगा देखने वालों को भी जो प्रबुद्ध लोग हैं आंख पर पट्टी बांध करके नहीं रहते हैं। जो तर्कसंगत सोचते हैं। अच्छा अब आगे क्या बताया जा रहा है? 12 श्लोक में बोलने से ना बोलना ही अच्छा बताया गया है। सत्य बोलना वाणी की दूसरी विशेषता है। मौन की अपेक्षा भी अधिक लाभप्रद क्या है? अगर बोलो तो
00:31:49:01 क्या बोलो? सत्य यह मनुस्मृति में भी लिखा है। और सत्य के साथ-साथ अगर प्रिय बोलना तो यह वाणी की तीसरी विशेषता है। यदि सत्य और प्रिय के साथ ही धर्म सम्मत भी हो जाए। धर्म संत भी कहा जाए तो वह वचन की चौथी विशेषता है। तो इसमें असत्य भाषण को बाहर निकाल दिया गया। किक कर दिया गया। अच्छा यदि कोई किसी की निंदा करता या उसे गाली देता हो तो वह भी बदले में निंदा या गाली गलौज ना करें। क्योंकि जो गाली या निंदा सह लेता है, उस पुरुष का आंतरिक दुख ही गाली देने वाले या अपमान करने वाले को जला डालता है। यह फिर लिखा है महाभारत आदि
00:32:38:22 पर्व 87वा अध्याय और सातवां श्लोक। जो
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→ Used in: A · Video सदाचारी या दुराचारी @swaminigrahacharya गुरु परंपरा क्या है | The Nigrah Nika... at 28:02 ↗
00:32:46:28 स्वभाव का कठोर है। दूसरों के मर्म में चोट पहुंचाता हो, तीखी बातें बोलता हो। कठोर वचन रूपी कांटों से दूसरे मनुष्य को पीड़ा देता हो उसे अत्यंत लक्ष्मीहीन दरिद्र अभागा समझे उसे देखना भी बुरा है क्योंकि वह कड़वी बोली के रूप में अपने मुंह में बंधी हुई एक पिशाचिनी को ढो रहा है।
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00:33:14:07 कौन है गाली देने वाला जिसके मुंह में पिशाचिनी बैठी हुई है। ठीक है? और बोलो ताल ठोको। वीडियो बनाना अगला मैं गाली देता हूं। मैं गाली दूंगा। जो मुझे गाली देगा उसको दूंगा। जो गाली खाने का काम करेगा उसको दूंगा। क्योंकि मैं राम से बड़ा हूं। मैं कृष्ण से बड़ा हूं। वेदव्यास से बड़ा हूं। टोपाचार्य हूं मैं। यदि कोई अपने साथ पाप पूर्ण दुर्व्यवहार करे तो स्वयं भी बदले में वैसा पाप पूर्ण आचरण ना करें। सदैव साधु सद व्यवहार ही करें। जो पाप करने की इच्छा करता है उसका पाप स्वयं उसे ही नष्ट कर देता है। तो ये क्या है? महाभारत वन पर्व 207 45वा श्लोक अब ये पद्म पुराण में षष्ठी खंड और 19वा अध्याय 355 वा श्लोक क्या कह रहा है? विष्णु धर्मोत्तर पुराण में भी है। तीन 253
00:34:29:10 44 में और पंच तंत्र में भी है। धर्म का सार सुने और इसे धारण करें। दूसरे के द्वारा किए हुए जिस बर्ताव को अपने लिए नहीं चाहते हैं उसे दूसरों के प्रति भी नहीं करना चाहिए। महाभारत शांति पर्व मोक्ष धर्म पर्व 249वा अध्याय और 20वा श्लोक मनुष्य दूसरों द्वारा किए हुए जिस व्यवहार को अपने लिए वांछनीय नहीं मानता दूसरों के प्रति भी वैसा ना करे। उसे यह जानना चाहिए कि जो हिंसा, असत्य, चौर्य, व्यभचार आदि बर्ताव अपने लिए अप्रिय हैं। वह दूसरों के लिए भी प्रिय नहीं हो सकता। तो क्या है? जब तुम किसी को उसकी माता से, उसकी बहन से जोड़ रहे हो, तो तुम ये अपेक्षा करते हो कि तुमसे कोई गलती हो जाने पर तुमको तुम्हारी माता से या बहन से जोड़ दिया जाए। भाई तुमने थोड़ी देर के लिए ही सही ऋषिकेश ब्रह्मचारी जी के कमेंट को अपनी कम्युनिटी में डाल दिया ना पोस्ट में हो गई गलती क्योंकि तुमने तो यह बताया नहीं कि किस गलती कौन से गलती है जो गाली के योग्य है तो गाली तो दी जा सकती है तो तुमसे गलतियां हो रही है तो तुमको जोड़ा
00:35:46:10 जाए अब मुंह सिल जाएगा सिलवा लेना जाकर के सूजा लेना उसमें मोटा वाला धागा जिससे उससे बोरे को सिला जाता है ना गेहूं के उससे सिल लेना अपना मुंह क्या लिखा है महाभारत शांति पर्व मोक्ष धर्म पर्व 200 59वा अध्याय अच्छा पहले वाला श्लोक भी 259वा था 49 नहीं था 29वा अध्याय चल रहा है अब 21वा श्लोक है जो स्वयं दूसरे के घर में उपति बनकर जाता है। पराई स्त्री के साथ वह विचार करता है। वह दूसरे के साथ वैसा ही कर्म करते देख किससे क्या कह सकता है? यदि दूसरे की उसी प्रवृत्ति के कारण वह निंदा करे तो वह पुरुष उसकी निंदा को नहीं सह सकता। ऐसा मेरा विश्वास है। 167वा अध्याय नौवा श्लोक मन को वश में करके धर्म को अपना प्रधान धेय बनाना चाहिए और संपूर्ण प्राणियों के साथ वैसा ही बर्ताव करना चाहिए जैसा हम अपने लिए चाहते
00:36:55:09 हैं। शांति पर्व 124वां अध्याय 67वा 67वा श्लोक अपना जो पौरुष और कर्म अन्यों के लिए हितकर ना हो अथवा जिसे करने में संकोच का अनुभव होता हो उसे किसी तरह नहीं करना चाहिए। मनुस्मृति में 12वें अध्याय में 37वें श्लोक में कहा गया है जिन कार्यों को करते समय छिपाने का भाव उत्पन्न हो वह कार्य तामसिक है। तामसिक कौन है? मतलब आपको सात्विकता से दूर ले जाने वाले यानी कि मोक्ष से दूर ले जाने वाले यानी कि धर्म से दूर ले जाने वाले। ठीक है? कम से कम सदाचरण और स्वयं को आचार्य कहने वाले ब्राह्मण के लिए तो नहीं होने चाहिए। हम छिपाने वाले तो यह जो गालियां हैं यह देते समय क्या तुम यह सोच सकते हो? तुम अपनी माता के बगल में बैठे हो। अपने घर की मातृ शक्तियों के बगल में बैठे हो। वहां से छुपाना तो नहीं पड़ेगा इन शब्दों को तुम्हें। जब तुम यह सब बोल रहेगे तो जिन कार्यों को करते समय छिपाने का भाव उत्पन्न हो उससे दूर रहो। यहां पर भी वही बात की जा रही है। क्या कि जिसको बोलने में संकोच हो निंदा भी उसी में आती है। है ना? ऐसी निंदा जिसे छिपाने का भाव उनमें
00:38:10:21 प्रकट हो। वो निंदा जो है अधर्म को अधर्म कहना निंदा नहीं है। तो वही बात यहां पर भी की जा रही है। मनुष्य दूसरे के जिस कर्म की निंदा करे उसको स्वयं भी कभी ना करे। जो दूसरे की निंदा तो करता है किंतु स्वयं उसी निंद कर्म में संलग्न रहता है वह उपास का पात्र होता है। तो यहां पे अब मैं तुम्हें एक एग्जांपल बताऊं। तुमने कहा कि दुबई जाने वाले जो बागेश्वर हैं उनके साथ क्यों वो नीचे बैठे हैं बागेश्वर वाले और शंकराचार्य जी ऊपर बैठे हैं जगतुगुरु भगवान। तो वहां पर तुमने कटाक्ष किया कि क्यों भाई वह उनसे मिल रहे हैं। जब तुमने विदेशगामी के साथ उसका आतित्य स्वीकार किया और तुमसे प्रश्न किया गया विदेश गमन करने वाले किसी भी व्यक्ति को हम ना समर्थन देते हैं। विदेश गमन वाले कृत में और ना उस व्यक्ति का हम प्रोत्साहन करते हैं कि तुमने बहुत अच्छा किया ना किसी को ऐसा करने की सलाह देते हैं। मैं बहुत अच्छे से नाम लेना चाहूंगा और यह मेरे मन की पीड़ा है जिसको मैं व्यक्त नहीं करना चाहता था लेकिन मैं करूंगा। अनुराग कृष्ण शास्त्री जो श्रीनाथ गुरु जी के श्रीनाथ शास्त्री जी के पौत्र हैं। अमरनाथ धाम में रहते हैं। वैदिक गुरुकुल
00:39:26:04 के नाम से एक संस्थान भी चलाते हैं। विदेश गमन किए वो वहां से एमए या क्या एमकॉम एमकॉम या कुछ करके आए थे। मतलब जो भी वहां की पढ़ाई थी वो करके अपना एमबी या जो भी करके एमकॉम जो भी करके आए थे। उन्होंने मेरी चिकित्सा करवाई। जब मेरे ऊपर आचारिक प्रयोग हुआ था। जब सूर्य ग्रहण लगा था कार्तिक पूर्णिमा को जब भी चंद्र ग्रहण कार्तिक पूर्णिमा को जब लगा था तब तो उन्होंने मेरी चिकित्सा करवाई थी। लेकिन उस चिकित्सा में जो खर्च हुआ उसको जब उन्होंने वहन किया तो इसका अर्थ यह नहीं है कि हम उनके विदेश का समर्थन करने लगे। हां फिर उस चिकित्सा के अंतर्गत हम कोलकाता गए थे। उन्हीं के यजमान के यहां रुके थे या परिचित के यहां तो वो कथा कर रहे थे उस समय। हमको भी बुला एक दिन के लिए हम भी चले गए कि विदेश गमन करने के वाले के साथ तुम क्या कर रहे हो? तो तुमने कहा हमने उसके विदेश गमन का थोड़ी ना वो किया है समर्थन वो ऐसा ऐसा व्यक्ति है इसलिए उसका आतिथित्य स्वीकार कर लिया यही तो कहा तुमने तुमने ठीक इसी तरीके के आचरण की निंदा की तो तुम तो उपहास के पात्र हो या तो ना मानो इस श्लोक को हटा दो फाड़ दो महाभारत इत्यादि वो सपने में आके जो मिल रहा है वो है धर्म वहीं से सीख रहे हो ना गाली वहीं से मिला बाय
00:40:41:08 पोलर वही से मिले प्रेम प्रसंग पराई स्त्रियों के लिए भावना ब्रह्मचर्य आश्रम में और वहीं से मिल रही है गाली फाड़ दो इन शास्त्रों को दूसरों को दबाने के लिए लाते हो केवल स्वयं पर लागू नहीं करोगे तो क्या है कि तुमने पूरी शंकराचार्य जी का या अन्य लोगों से भी किसी के साथ मेरे साथ मैं आरएसएस वालों के साथ मिलकर के मैंने वहां जो है दुर्गा माता को गाली देने वालों से क्यों लड़ाई की भाई है ना तो मैं ये नहीं कह सकता कि मैं उनके साथ उनको साथ में ले गया था पर मैंने उनके सिद्धांतों का कोई समर्थन नहीं कर दिया था जहां-जहां पे वो गलत है। मैं ये नहीं तुम ये कह सकते हो क्योंकि तुम स्वयंभू हो। तुम्हारे पास मलेच्छ राज है। कॉमिक्स कैरेक्टर्स हैं। एक नया एमसीयू बनाने वाले हो। एमसीयू नहीं क्या बनाओगे तुम
00:41:44:03 बनाओगे एनसीयू नहीं एनसीयू नहीं जीसीयू है ना जीसीयू सही है क्या गुप्त कॉमिक्स यूनिवर्स ये सही है हां तो तुम बनाओगे जीसीयू इसीलिए वही तर्क तुम्हारे पे तो लागू होगा मगर दूसरे पर लागू नहीं तो यहां क्या कहा गया है कि तुम जिस दूसरे के जिस कर्म की निंदा कर रहे हो उस कर्म को स्वयं ना करो और अगर कर रहे हो तो तुम उपहास के पात्र हो तो बनाना दो मिनट का वीडियो और अपने ऊपर हंसना वो मन ईरानी
00:42:28:10 बनके सज्जनों का धर्म सदैव सत्पुरुषों में ही रहा है। अतः उसका आश्रय लेके उसे नष्ट ना करें। धर्म युद्ध में तत्पर हुआ जो क्षत्रिय अधर्म से विजय पाता है। छल कपट को जीविका का साधन बनाने वाला वह पापी स्वयं ही अपना नाश करता है। लो अधर्म से विजय पाना भी गलत है। जो मैंने बात कही कहां लिखा है? महाभारत शांति पर्व राज धर्मानुशासनम पर्व 95वा अध्याय और 15 से 17 श्लोक यह दुष्टों का काम है। अधर्म आचरण का आलंबन लेकर के युद्ध में जीतना यह दुष्टों का काम है। श्रेष्ठ पुरुष तो दुष्टों पर धर्म से ही विजय पानी पाते हैं। धर्म पूर्वक युद्ध कर मर जाना भी अच्छा है। परंतु पाप कर्म के द्वारा विजय पाना अच्छा नहीं है। और तुम कह रहे हो कि मैं गालियां यूज़ करता हूं। लोगों की माताओं और बहनों को बीच में लाता हूं। अब यह भगवतानंद अपने आप को श्रेष्ठ तो मानता ही है। इसमें तो कोई दो राय है नहीं। है ना? हर जगह क्रेडिट लेने भागता है। मैंने कहा
00:43:43:13 था वहां सेवा शुरू हुई। मैंने अलग जला अलग जगह आई है लोगों के दिलों में तो ये आगाज हुआ है। ये क्रांति हुई है। है ना? तो इसमें कोई दो राय नहीं है कि अपने आप को श्रेष्ठ मानता है और गीता का सिद्धांत है कि लोग श्रेष्ठ को फॉलो करते हैं और वैसे भी आचार्य तो खुद को घोषित कर ही दिया है और आचार्य क्या होता है जो आचरण खुद करता है वही आचरण अपने शिष्यों में स्थापित करता है। आदि शंकराचार्य जी शास्त्रों के संदर्भ से मठामना मानुष आश्रम में लिख रहे हैं। तो जरा कल्पना करके देखिए कि इस तरह के पापाचारियों द्वारा निर्देशित शिक्षित सेना जो होगी हिंदू राष्ट्र के लिए धर्म स्थापना के लिए लड़ने वाली वो क्या कर रही होगी तेरी मां की तेरी बहन की यही सेना बनाएगा ना ये यही आचरण स्थापित करेगा ना अपने शिष्यों में दूसरों का निग्रह करने वाले पहले स्वयं का निग्रह कर ले। अपना निग्रह कर
00:44:58:19 ले। खुद जांच ले कि तुझ में क्या है। दूसरों का निग्रह करने चला है मूर्ख। अपने आप को कभी देख ना पाया। ऐसा राष्ट्र बनाएगा। ऐसी धर्म संस्थापना करेगा। ऐसा निग्रह करेगा संसार का ऐसी फौज खड़ी करेगा जो लड़ने की बजाय शस्त्रों का इंतजाम करने की बजाय प्रबंध करने की बजाय गालियां देके काम चलाएगी। उन मातृशक्तियों से उनके पुत्रों को उनके भाइयों को जोड़ेगी वो सेना जिनका कोई दोष भी नहीं होगा। ऐसी नीच सेना तैयार करेंगे। पापाचारियों की सेना तैयार करोगे और सोचोगे कि हमने धर्म स्थापना कर
00:45:58:15 दी। दुराचारियों की सेना होगी। वो दुराचारियों की सेना लंपटों की सेना होगी वो। लंपट सेना चले हैं निग्रह करने। महाभारत उद्योग पर्व प्रजागर पर्व 39वा अध्याय 71वा 72वा श्लोक जो अपने प्रतिकूल जान पड़े उसे दूसरों के प्रति भी ना करें गलती तुम तय कर रहे हो भाई कोई गलती कर रहा है तो तुम उसको उसकी माताओं बहन बहनों से जोड़ रहे हो तो वही वाली बात यहां पर भी आ रही है उसे दूसरों के प्रति भी ना करें थोड़े में धर्म का यही स्वरूप है इसके विपरीत जिसमें जिसमें कामना से प्रवृत्ति होती है वह तो अधर्म है। अक्रोध से क्रोध को जीते। असाधु से सद व्यवहार से वश में करें। कृपण को दान से जीते और झूठ पर सत्य से विजय प्राप्त करें। सत्य से कहां है तुम्हारा सत्य? जो शास्त्रों का अन्यथा मनमाना अर्थ लगाता है और जो मंदबुद्धि ऐसा ही व्याख्यान देता है उसे भी ब्रह्म हत्या के समान पातकी जानना चाहिए। ब्रह धर्म पुराण उत्तर खंड 20वा अध्याय
00:47:14:02 और नौ से 10 श्लोक ऐसे लोग ही भगवत गीता में ऐसे ही लोगों के लिए कहा गया है जो अधर्म को धर्म और धर्म को अधर्म मान लेते हैं। 18वा अध्याय 32वां श्लोक श्री भर हरि कृत श्री वैराग्य शतकम यहां क्या कहा जा रहा है? दीजिए दीजिए गालियां आप तो गाली मान मतलब गाली वाले अथवा गालियों से संपन्न है उसके अभाव से गाली संपन्न ना होने से हम भी प्रत्युत्तर में गाली देने में असमर्थ हैं। मतलब आप गालियों से संपन्न है मगर हमारे पास गालियां नहीं है। तो हम असमर्थ हैं गाली देने में। संसार में यह विदित है कि जो विद्यमान है हो वही दिया जाता है। निश्चय ही कोई भी किसी को सशक खरगोश का सींग नहीं देता। तो आप गाली से विद्यमान हैं। इसलिए आप गाली दे सकते हैं। हमारे पास गालियां नहीं है। हम गाली नहीं दे सकते। अब भाई जब आचार्य हैं बहुत बड़े सिद्ध हैं
00:48:30:00 तो जब तप कर रहे हैं तो वाणी के द्वारा भी तो इनका तप सिद्ध होना चाहिए ना प्रकट होना चाहिए ना मगर वाणी के द्वारा तो तप हो नहीं रहा है इनका क्यों क्योंकि भगवत गीता में कहा जा रहा है 17व अध्याय के 15 वे श्लोक में कि जो उद्वेग ना करने वाला प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है और उसके बाद वेद शास्त्र के पठन का वो भी है नाम जप का अभ्यास अभ्यास है वही वाणी संबंधी तप कहा जाता है प्रिय हितकारक और यथार्थ भाषण वाणी संबंधी तप है कहां है तप भाई इधर कामाख्या उधर एमसीयू यही तप है इधर माता की पूजा उधर दूसरे की माता के साथ खिलवाड़ यही तप है। उसको किसी से किसी को भी जोड़ देना यही तप है। एमसीयू से जीसीयू वाल्मीकि रामायण में युद्ध कांड में क्या कहा गया है? श्रेष्ठ पुरुष दूसरे की बुराई करने वाले पापियों के पाप कर्म को नहीं अपनाते
00:49:45:12 हैं। बदले में उनके साथ स्वयं भी पाप पूर्ण बर्ताव नहीं करना चाहते हैं। अतः अपनी प्रतिज्ञा और सदाचार की रक्षा ही करनी चाहिए क्योंकि साधु पुरुष अपने उत्तम चरित्र से ही विभूषित होते हैं। सदाचार ही उनका आभूषण है। अब आती है गुरु निंदा की बात। तो जो माता पिता पत्नी भाई पुत्र और गुरु की निंदा करे वह दंड के योग्य है। मनुस्मृति आठवां अध्याय 275वा श्लोक
00:50:19:24 हम सज्जनों गुरुजनों की निंदा करने वाला पापी है। दो चार नौ और सज्जन की बात से याद आया कि पूरी के शंकराचार्य जी को सज्जन तो तुम भी मानते हो ना। तुमने अपनी वह जो वेबसाइट इत्यादि वहां अपने परिचय इत्यादि में लिखा है ना कि मुझे वहां इस होलीनेस उनसे भी जो है मुझे यह प्राप्त हुआ है ना तो यह मत कहना कि सज्जन नहीं मानते और क्या है और निंदा क्या की है निंदा जो उपहास उड़ाते हो है ना उपहास पूर्ण वक्तव्य देते हो ना जो तिरस्कार पूर्ण वक्तव्य हल्के शब्दों में बात करते हो अपने पिता की बात आ जाती तो बड़ा सम्मान दोगले दोगले व्यक्ति इसको कहते हैं रामनाभिते वही कार्य करो जो सब जगह कर सको बदलाव ना करना पड़े जो यहां बोलूंगा वही सब जगह बोलूंगा जहां कथा में बुलाया जाएगा वहां मृदभाषी नहीं बन जाऊंगा और अगर मृदभाषी होगा तो मृदवासी रहूंगा तुम्हारी
00:51:34:24 तरह नहीं। ये देखो अपने मन में स्वयं को अपने को बड़ा समझने वाला घमंडी गरुड़ पुराण दो चार 11 यम मार्ग में रोते हुए चलता है यह व्यक्ति और वो भी वो सज्जनों गुरुजनों की निंदा करने वाला है। अब गुरुजन वो तुम्हारे कैसे हैं? चलो इसको भी पकड़ लेते हैं। ऐसे तो तुम मानोगे नहीं मेरे गुरुजन वह तुम्हारे तो वह सपने वाले मलेचराज टाइप के गुरु हैं। तो अब गुरुजन तुम्हारे कैसे हैं? अध्यात्म का ज्ञान देने वाला गुरु उसका सम्मान ना करने पर नरक तो तुमको अध्यात्म का ज्ञान तो मिला ना पूरी के शंकराचार्य जी से बैठे हो ना पैरों में उनके पूछ रहे हो ना कुछ कहां लिखा है गरुड़ पुराण दो चार 49 अध्यात्म का ज्ञान देने वाले गुरु का सम्मान ना करने पर नरक जो तुम जिन्होंने तुमको अध्यात्म का ज्ञान दिया। वह तुम्हारे गुरु हुए उस अंश में तो हुए जिसमें उन्होंने तुम्हें अध्यात्म का ज्ञान दिया। अब
00:52:50:00 तुमने उनका अपमान कैसे किया? तुमने उन पर वही आरोप लगाया। ऐसा कार्य करने को दोष बताया जो कार्य तुम स्वयं कर रहे हो। निंदा की तुमने कि भाई वो बागेश्वर वालों के साथ क्यों है? फलानों के साथ क्यों है? चलो मेरी बात छोड़ दो। उनकी तो निंदा की ना। और जबकि तुम खुद अशास्त्रीय व्यक्ति के साथ खड़े हो। वहां पर तुम कह दो कि मैंने उसके इस अंश का समर्थन नहीं किया। तो गुरुदेव ने कौन से बागेश्वर वालों के सभी अंशों का समर्थन किया है?
00:53:26:27 तो अगर तुम्हें जवाब मिल जाए ना यह गाली का पक्ष लेने का श्री राम के विरोध में महाभारत के विरोध में अंश भगवान के विरोध में है ना जो अन्य जो वचन है महाभारत इत्यादि शास्त्रों के इनके विरोध में अगर तुमको मिल जाए कुछ बोलने को टटोल लेना अपना वो सपने में जाना मलचराज इत्यादि जो आते हैं तुम्हारे सपने में तो उनको टटोल लेना उनसे पूछ लेना कुछ दे दो भाई राम से लड़ने के कृष्ण से लड़ने के लिए ले आना फिर होगा रकुल रीत सदा चली आई प्राण जाई पर वचन ना जाई बिना ना मानत जल्दी जड़ गए तीन दिन बीत बोले राम सको तब भय बिन होए ना प्रीत यही हुआ था इस पूरे विवाद में यही हुआ था विनय ही किया था हमने मान जाओ पर नहीं समझ में आया तो भय भी ना हो ना प्रीत तो तो ये थी इस लुप्त संप्रदाय के गुप्त गालीबाजाचार्य की गालियों की मीमांसा शास्त्रोक्त अब आओ भैया तुम लोग लड़ने जो इसके फॉलोवरर्स हैं जो हंधभक्त हैं वो अब आओ लड़ने कि नहीं नहीं राम जी गलत है हमारा लुप्त
00:54:42:09 आचार्य सही है गुप्त आचार्य सही है और तुम आओ भैया भगवतानंद राम जी गलत है कृष्ण गलत है हंस भगवान गलत है महाभारत गलत है वेद व्यास गलत है। गणेश जी गलत है। हमारे को जो मलच राज आकर के मंत्र दे रहा है ना सपने में वो सही है। एमसीयू से निकल के जीसीयू में कहा था ना यही वाली बात कही थी ना विनय समझे नहीं विनय को उदारता को कायरता समझ लिया। कोई बात नहीं। चलो समय निकाल पाना मलेच्छराज से वह ज्ञान बटोर लेना कि श्री राम का विरोध कैसे करना है श्री कृष्ण का विरोध कैसे करना है यह सब ज्ञान जब बटोर लेना तो बताना कभी आमनासामना हो जाएगा हां जय श्री राम
00:55:35:00 [संगीत]
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गालियों का पोस्टमार्टम-लुप्त सम्प्रदाय का गुप्त आचार्य
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