⬜ Not used yet · 00:00:02:02 – 00:26:34:00 (26:32)
00:00:02:02 तो जब मैं छोटा था तो एक वीडियो गेम खेला करता था मारियो। आप में से कुछ लोगों ने शायद खेला भी होगा। तो उसमें जब सेकंड स्टेज आती थी तो उसमें एक प्राणी मिलता था हेलमेट जो कुछ कछुए के जैसा होता था और उससे आपको हालांकि बचना होता था और दो पिलर्स होते थे जिसके बीच में वह घूमा करता था इधर से उधर लेफ्ट टू राइट लेफ्ट टू राइट और उससे बचते हुए आपको वो जो जगह थी क्रॉस करनी होती थी पर उसमें एक खूबी और थी कि यदि आपने उसके केवल सर पर मार दिया तो एक तरीके जैसे कछुए का सर जैसे उसके जो उसका कवर होता है उसके अंदर घुस जाता है वैसे ही उसका भी सर अंदर घुस जाता था या मान लीजिए टूट जाता था ऐसा होने की स्थिति में फिर वो उसकी स्पीड बढ़ जाती थी और वो उन दो पिलर्स के बीच में एक अंधा प्राणी बन के टकराता रहता था और आवाज भी आती रहती थी दूं दूं दूं दूं दूं दूं आप उस स्टेज में आगे भी चले जाए और यदि किसी कारणवश आप पीछे आते तो आपको वो जो हेलमेट वाला प्राणी है वो वैसा ही करता हुआ मिलता था दूं दूं दूं तो कुछ ऐसी ही मानसिक
00:01:17:27 स्थिति है रामपाल को फॉलो करने वाले अधिकांशतः लोगों की उनको आप कुछ भी बता दो वो अंधे बैल की तरह अंधे क्या कहते हैं उसी हेलमेट की तरह उसको हम लोग हेलमेट कहते थे अब पता नहीं वीडियो गेम के जो बनाने वाले थे उन्होंने उसे क्या नाम दिया होगा पर हम लोग उसे हेलमेट कहते थे तो ऐसी मानसिक स्थिति कुछ रहती है यह रामपाल को फॉलो करने वाले लोगों की। क्यों? देखिए जैसे आकर के कहेंगे कि भाई तुलसीदास जी ने जो रामचरितमानस है उसमें कहा है कि हनुमान जी स्वयं की भक्ति को मना कर रहे हैं क्योंकि वह कह रहे हैं हनुमान जी अपने बारे में बता रहे हैं। तुलसीदास जी उसे लिख रहे हैं कि जो सुबह-सुबह हमारा मुख देख लेता है उसे दिन भर भोजन नहीं मिलता है। तो इसलिए हनुमान जी की पूजा करना गलत है। तो हम जब उन्हें यह बताते हैं कि तुलसीदास जी ने ही कहा है कि
00:02:17:25 वो जो छूट बंदी महा सुखोई ये लोग बंदी छोड़ कहते हैं ना मुक्ति को ये कहते हैं बंदी छोड़ बंदी से छूटना बंदी से मुक्ति तो वहां पर तुलसीदास जी ने भी मुक्ति के बारे में कहा है हनुमान चालीसा की रचना करते समय जो सत बार पाठ कर कोई छूट बंदी महा सुख होई तो जब हम यह बताते हैं तो ये तुरंत बोलते हैं कि भाई हम तुलसीदास जी को नहीं मानते हम तो वाल्मीकि रामायण को मानते हैं तो ऐसे ऐसे अंधे बैलों से यह पूछा जाए कि हनुमान जी को ना मानने के लिए तो तुम रामचरितमानस का प्रमाण प्रस्तुत कर रहे हो और हनुमान जी को मानने के लिए तुम्हें वाल्मीकि रामायण चाहिए। भाई यदि किसी पर विश्वास करोगे तो पूरा करोगे या अधूरा करोगे? तो कुछ ऐसी ही चर्चा आज हम लोग करने वाले हैं जो यह कुछ एक मोटा सा चश्मा लगाने वाला प्राणी है। यह भी वो हेलमेट की याद आती है। इसने एक वीडियो बनाया है हमारे प्रतिकार स्वरूप और उसमें बताया है कि भाई ऐसी बहुत सी गाथाएं हैं जिसमें कि जो जिनको तुम भगवान मानकर पूज रहे हो वो गलत सिद्ध होते हैं। वह भगवान ही सिद्ध नहीं होते हैं। और फिर इसने बहुत से अनर्गल प्रलाप जो जितने
00:03:33:06 भी सनातन विरोधी हैं विधर्मी हैं और मूर्ति पूजा को ना मानने वाले जो अलंकार समाधि इत्यादि हैं वो भी इस तरह के प्रलाप करते रहते हैं। तो वैसा ही प्रलाप इसने भी किया कि कृष्ण भगवान की रास लीला या है वो है जो भी है। उन सबके बीच में उसने यह कहा कि हां अब तुम यह कह सकते हो कि अगर एक जगह पर ब्रह्मा विष्णु महेश का तिरोभाव अविर्भाव लिखा है जन्म और मृत्यु लिखी है तो दूसरी जगह उन्हें परम ब्रह्म भी तो कहा गया है। तो तुम यह कह सकते हो रामपालियों से यानी उसने कहा हमसे यह कह सकते हो कि तुम केवल यह वाला हिस्सा ही क्यों मान रहे हो जिसमें कि वो उनका मरण होना सिद्ध हो रहा है। उनकी जन्म मृत्यु सिद्ध हो रही है। वह वाला हिस्सा क्यों नहीं मान रहे हो कि जिसमें कि उन्हें परम ब्रह्म कहा जा रहा है। अविनाशी कहा जा रहा है। तो यह जो पाखंडी है जो गधा है गधे जैसी बुद्धि हो गई ना इसकी तो यह बोल रहा है वहां पर कि भाई यह सवाल तो हम भी तुमसे पूछ सकते हैं कि तुम उसी को क्यों मान रहे हो जिसमें कि उनको परम ब्रह्म कहा गया है। तो मेरे भाई मिस्टर हेलमेट हम दोनों चीजों को मानते
00:04:48:25 हैं। हम उनकी उसको भी उस चीज को भी मानते हैं कि हां वो जो आविर्भाव तिरोभाव है लीला स्वरूप उनका आविर्भाव तिरोभाव होता है। परंतु वास्तविक स्थिति में वह परम ब्रह्म है। हम इस तरह से दोनों में से किसी भी बात का खंडन नहीं होने देते। मगर तुम यह तो मानते हो कि उनका आविर्भाव तिरोभाव होता है या फिर वो भक्ति अपनी प्रकट कर रहे हैं या फिर किसी भी कोई भी स्थिति जिसके कारण तुम जो है उनका भगवान ना होना सिद्ध करना चाहते हो तुम वो तो मानते हो जिससे कि उनका भगवान ना होना सिद्ध हो सके तुम्हारे शब्दों में तुम्हारे अर्थों में हमारे अर्थों में नहीं हमारे अर्थों में तो उनका भी अर्थ ऐसा निकलेगा उन लीलाओं का भी अर्थ ऐसा निकलेगा जिससे कि वो सर्वशक्तिमान ईश्वर सिद्ध होंगे होंगे वो किसी दिन सामना होगा तब पता चलेगा वह तो तुम्हारे अंदर सामर्थ्य है नहीं वह जब गुरु ही ऐसा है तो सामर्थ्य कहां से आएगा चेलों में हम खैर तो सबसे पहली बात यह है मिस्टर हेलमेट कि हम केवल इस पक्ष को ही नहीं मानते हैं कि भाई वो ब्रह्मा विष्णु महेश परम ब्रह्म है और हम इसको भी मानते हैं जहां पर वो ऐसी बात कह रहे हैं कि हमारा भी आविर्भाव तिरोभाव होता है।
00:06:04:04 ठीक है? मगर तुम ऐसा करते हो कि सिर्फ एक ही पक्ष को मानते हो जिसमें कि उनकी निम्नता को सिद्ध करने का प्रयास कर सको। तो अब ऐसे में हम क्यों सही हैं और तुम क्यों गलत हो इसको हम बताते हैं कि तुम्हारा जो ब्रह्मा विष्णु महेश को या भगवान श्री कृष्ण को या उनकी किसी भी किसी भी भगवत स्वरूप को निम्न प्रकट करते हुए जो तुम प्रमाणों का उपयोग करते हो शास्त्रों के वचनों का उपयोग करते हो तुम्हारे द्वारा उन शास्त्रों को रचने वाला ही झूठा सिद्ध होता है और तुम्हारे जो गुरु हैं या तुम भी अपने कई अनेकानेक वीडियोस में इस बात को मान चुके हो पढ़े जो प्राणी समझे ना सारे रहे अज्ञानी यह सारे ज्ञानी थे ब्रह्मा विष्णु महेश दुर्गा और ब्रह्म इनका पिता सर पुरुष और सतयुग्य ब्राह्मण यह सारे अज्ञानी थे इनको यथार्थ ज्ञान भक्ति का नहीं था पूर्ण मोक्ष का मार्ग नहीं ज्ञान था और यह वेदों से भी परिचित नहीं थे। वेदों को पढ़े। वेद पढ़े पर कि ये ऋषि
00:07:19:06 महामुनि जो जितने भी थे वो सब अज्ञानी थे मूर्ख थे। उनके द्वारा किसी को मुक्ति नहीं मिली। ऐसा वैसा हुआ। यह हुआ वो हुआ। तो इसका अर्थ यह हुआ कि अगर तुमने ऐसा कुछ किया जिसके कारण तुम जिसको प्रमाण के रूप में प्रस्तुत कर रहे हो। उस प्रमाण को रचने वाला ही लिखने वाला ही प्रदान करने वाला ही गलत सिद्ध हो रहा है। झूठा सिद्ध हो रहा है। मूर्ख या अज्ञानी सिद्ध हो रहा है। द्वेषी सिद्ध हो रहा है। पाखंडी सिद्ध हो रहा है। तो फिर तुम्हारे द्वारा उस प्रमाण पर विश्वास होना सिद्ध नहीं होता। अभी हेलमेट होना अभी बात घुसी नहीं होगी। जैसे कि मान लीजिए आपने स्कंद पुराण या कोई भी पुराण का एक वचन ले लिया। देवी भागवत का ही ले लिया। एक जगह लिखा है कि ब्रह्मा विष्णु महेश का आविर्भाव तिरोभाव है। दूसरी जगह लिखा है कि वह जो है परम ब्रह्म है। अविनाशी है। तो यदि आपने केवल यह माना कि उनका आविर्भाव तिरोभाव होता है और यह नहीं माना कि वो अविनाशी है तो आपको अविनाशी ना मानने के स्थिति में यह मानना पड़ेगा कि इस लाइन को लिखने वाला व्यक्ति किसी भी कारणवश गलत लिख रहा है। लिखने वाले को गलत मानना पड़ेगा ना। क्योंकि तुम इसको मान ही नहीं रहे। सिरे से खारिज कर रहे हो।
00:08:34:16 है ना? तो जब ऐसा करोगे कि यह व्यक्ति गलत लिख सकता है। जब इसकी क्रेडिबिलिटी जब इसकी विश्वसनीयता पर आप प्रश्न उठा दोगे तो इनके द्वारा ही दूसरा जो वचन जिसके जिसके द्वारा आप अपने स्वार्थ की सिद्धि कर रहे हो, मंतव्य की सिद्धि कर रहे हो, वो वचन भी झूठा साबित हो जाएगा। यानी कि कोई व्यक्ति अगर एक जगह झूठ बोल सकता है तो वह दूसरी जगह भी झूठ बोल सकता है। तो अब जब तुम्हें ग्रंथ लिखने वाले पर विश्वास नहीं है किसी भी कारण से वो मूर्ख है या उसे पूरा ज्ञान ही नहीं था या वो द्वेष वश तुमसे कुछ छुपाना चाह रहा था। जैसे कि तुम्हारी एक कहानी है कि वेदों को कहने वाला जो काल है उसको पूरे वेद दिए गए थे पर उसने कुछ छुपा लिया या वह कहीं-कहीं पर झूठ बोलता है। कहीं-कहीं पर वो लोगों को भ्रमित करता है। भटकाता है या तुम्हारे अनुसार ब्रह्मा विष्णु महेश भी अज्ञानी हैं। तो जब तुम्हारा इन ग्रंथों को प्रदान करने वाले के ऊपर विश्वास होना सिद्ध नहीं होता है। तो उनकी कही हुई किसी भी बात के आधार पर अपनी कोई बात को सिद्ध करने का प्रयास कैसे सही सिद्ध हो सकता है? जैसे कि तुम उनके कथनों के आधार पर जिसको तुम मूर्ख कह रहे हो उसके कथनों के आधार पर कह रहे हो कि ब्रह्मा विष्णु महेश की जन्म और मृत्यु होती है।
00:09:49:18 अरे भाई क्यों? मूर्ख ने हो सकता है यहां भी मूर्खता करती हो। दूसरी बात, तुम ये कह रहे हो कि उन्होंने तत्वदर्शी के पास जाने को कहा है। अरे भाई क्यों? जो तुम्हें भटकाना चाहता है, जो मूर्ख है, जो झूठ बोल सकता है, हो सकता है उसने जो ये तत्वदर्शी की निशानी बताई है, वह भी गलत हो। समझे ना मिस्टर अंधे गधे? तो इसलिए यदि किसी व्यक्ति की यदि किसी ग्रंथ की एक भी पंक्ति पर आपको विश्वास नहीं है तो उस ग्रंथ को रचने वाले द्वारा रचने वाले महानुभाव के द्वारा कही गई किसी भी पंक्ति पर आपका विश्वास होना सिद्ध नहीं होता है। तो यदि अगर तुम कह रहे हो कि काल ने भगवत गीता बोलते समय लोगों को भटकाया है। काल लोगों को भटकाता है या काल मूर्ख है या काल अज्ञानी है तो काल यदि बता रहा है कि तत्वदर्शी की पहचान यह यह है तो वो पहचान सही पहचान है यह जरूरी नहीं है क्योंकि काल तो मूर्ख है काल तो झूठ बोलता है है ना बहरहाल इस इस पूरे अंधे हेलमेट्स की भीड़ में एक व्यक्ति ऐसा मिला जिसने इस बारे में बात की पहली बार कि एक जगह अगर यह लिखा है और दूसरी जगह यह लिखा है तो इसी को क्यों माने इसको क्यों ना माने इनका कहना यही था भाई साहब
00:11:04:21 का कि जिस बात को तुम मानना चाहते हो वह क्यों माने जिस बात को हम मानना चाहते हैं वह क्यों ना माने तो पहले तो मिस्टर हेलमेट हेलमेट ना मालूम है ना वही जिसका सर टूट गया है अब वो अंदर घुस गया वो दो खंभों के बीच में दूं दूं दूं ऐसे करके टकरा रहा है वही वही हेलमेट तो मिस्टर हेलमेट बात ऐसी है सबसे पहली बात तो मैंने आपको बता दी कि हम दोनों में से किसी एक चीज को नहीं दोनों दोनों को मानते हैं। लीला स्वरूप उनका आविर्भाव तिरोभाव मानते हैं। और वास्तविक स्थिति में हम मानते हैं कि वह परम ब्रह्म है। और ऐसा करने पर शास्त्र को रचने वाले का कोई भी वचन खारिज नहीं होता। गलत सिद्ध नहीं होता। झूठा सिद्ध नहीं होता। जिसके कारण हमारा उन्हें प्रमाण के रूप में स्वीकार करना सिद्ध हो पाता है। मगर तुम उनके किसी एक वचन को सिरे से खारिज करते हो जिसके कारण तुम्हारा उन पर विश्वास होना सिद्ध नहीं होता। जब तुम्हें विश्वास ही नहीं है तो उनके आधार पर तुम यह कैसे मान सकते हो कि नहीं भाई वो जो है उनका आविर्भाव तिरोभाव होता है। जब तुम्हें वेदव्यास जी की लेखनी पर विश्वास नहीं है किसी भी एक जगह तो उनकी किसी भी एक जगह की लेखनी पर आपका विश्वास कैसे हो सकता है? ठीक है? दूसरी
00:12:20:00 बात यह आती है कि शास्त्रों में ही दिया गया है कि यह जो वेद शास्त्र पुराण हैं इनको सबको मनुष्य भले ही पढ़ ले मगर गुरु के बिना उसकी मति भ्रष्ट हो जाती है। तो अगर आप बात करते हैं पुराणों को जानने वाला होने की तो प्रश्न यह बनता है कि आपका गुरु कौन है? आप कहोगे कि तत्वदर्शी रामपाल जेलधाम निवासी तो फिर हम पूछेंगे उसका गुरु कौन है? भाई आपको पुराण का जो अध्ययन है शास्त्रों का अध्ययन कम से कम उन शास्त्रों का जिन शास्त्रों को जिन शास्त्रों में यह कहा गया है कि उनको गुरु के सानिध्य में ही पढ़ें। उन शास्त्रों का अध्ययन आपके पास गुरुओं के द्वारा आना चाहिए। है ना? तो जब आप गुरुओं की बात करते हैं तो ज्यादा से ज्यादा आप बहुत ज्यादा झूठ बोलेंगे तो कबीर तक पहुंच जाएंगे। कबीर के पीछे के गुरु आपको मिलेंगे नहीं। जबकि पुराणों का उद्गम स्थल कबीर से तो है नहीं। कबीर ने तो पुराण नहीं रचे ना। पुराण तो रचने वाले वेदव्यास जी हैं। तो कबीर से पहले का समय में भी पुराण थे। तो वो पुराण को कबीर ने नहीं रचा है। पुराण आ रहे हैं गुरु शिष्य परंपरा से। तो दूसरा दूसरा
00:13:35:01 फैक्ट आ जाता है कि तुम्हारा पुराणों के मामले में प्रामाणिक बातें कहना सही सिद्ध नहीं होता क्योंकि तुम्हारा पुराण जहां से उद्भाषित हो रहे हैं वो तुम्हारी गुरु शिष्य परंपरा में नहीं है। जो पुराणों को लिखने वाला है वो तुम्हारा गुरु नहीं है परंपरा में। ठीक है? कबीर तुम्हारे अनुसार कबीर ईश्वर है। कबीर ने अपना अपना वेद लिखा है। सूक्ष्म वेद उसका कोई गुरु नहीं है। हालांकि कबीर दास जी के गुरु थे रामानंदाचार्य जी। उस तरह से देखेंगे तो आप वेदव्यास जी से जुड़ जाएंगे। मगर डायरेक्ट जब आप कबीर से ही मानते हो कि कबीर अपने आप में भगवान है तो हो सकता है वो भगवान हो तो मान लो ले जाओ अपने पास। कोई दिक्कत नहीं है। हम नहीं मानते। हम तो उन्हें भगवान का भक्त मानते हैं। खैर तो बैक टू द पॉइंट कि वेदव्यास जी ने पुराणों की अगर रचना की है तो वेदव्यास जी उसमें बता रहे हैं कि इनको किससे समझना है परंपरा प्राप्त आचार्यों से। तो इसलिए क्योंकि तुम्हारे पास वेदव्यास जी वाली परंपरा नहीं है। इसलिए जो पुराणों का अर्थ तुम करोगे वो नहीं माना जाएगा और जो हम करेंगे वो माना जाएगा। ठीक है? दूसरी बात कि एक बात तो मैंने पहले बताई थी कि तुम्हारे अनुसार
00:14:51:08 पुराण को रचने वाला ही गलत सिद्ध हो रहा है। तुम ऐसा उसका अर्थ कर रहे हो। तो जब तुम्हारे अनुसार पुराण को रचने वाला ही गलत सिद्ध हो रहा है तो उस पुराण के किसी भी बात पर विश्वास होना कैसे सिद्ध हो पाएगा? अब दूसरी इससे आगे की बात आती है कि चलो मान लिया कि आप पुराण की एक बात को कह रहे हो कि हां यह सही लिखा है यह गलत लिखा है इसका फैसला कैसे करोगे अब तुम अगर कहोगे कि तत्वदर्शी करेगा तो तत्वदर्शी तब बन पाएगा ना कोई जब वो तत्वदर्शी आप किसी को इन शास्त्रों के आधार पर ही तो कह रहे हो इन शास्त्रों का अभी तक फैसला नहीं हुआ है कि कौन सी लाइन सही है और कौन सी लाइन गलत गलत है। जब तक यह निर्णय नहीं हुआ है तब तक आप इनमें से किसी एक लाइन के आधार पर किसी को तत्वदर्शी कैसे कहोगे? है ना? यह समझ में नहीं आ रहा होगा। तो थोड़े बुद्धिजीवी वाले लोग हैं वो समझ पाएंगे ये सब चीजें। तार्किक है ना बहुत ज्यादा लॉजिकल चीजें हैं। और तुम हो वो हेलमेट दो खंभों के बीच में दूं दूं दूं। है ना? तो ये तो रही अब एक बात। अब मैं तुम्हें तुम्हारे प्रैक्टिकल से समझा देता हूं। तो भाई तुम्हारे जो यह बुक्स हैं इनके अनुसार ब्रह्मा विष्णु महेश भगवान नहीं है। मगर
00:16:07:01 आपकी इसमें लिखा हुआ है सृष्टि रचना में 31 ये ज्ञान गंगा में 32 प्रश्न का जवाब देते हुए जो जिंदा बाबा हैं। वह यह बता रहे हैं। धर्मदास को कि जो गीता का ज्ञान है वह परमपिता परमात्मा विष्णु ने दिया है। कृष्ण के रूप में हम अब इसी में यह बात भी लिखी हुई है तुम्हारे तत्वदर्शी के नाम से कि भैया नहीं ब्रह्मा विष्णु महेश तो परमात्मा नहीं है और जबकि तत्वदर्शी के ही नाम से फिर कबीर के नाम से लिखा हुआ है कि ब्रह्मा विष्णु मतलब विष्णु भगवान परमात्मा है। गीता का ज्ञान उन्होंने दिया है और तुम कह रहे हो कि वो परमात्मा नहीं है और गीता का ज्ञान देने वाला काल नाम का राक्षस है। तो ये दो बातें हो गई। अब इसमें से किसी एक बात को किस आधार पर मानोगे? तुम जाहिर सी बात है यह कहोगे कि हम हमारी बात इसलिए मानी जाएगी क्योंकि हम उनके शिष्य हैं। हम डायरेक्ट उनसे मिले हैं इस किताब को लिखने वाले से। तो ऐसे ही पुराण की बात हमारी मानी इसलिए जाएगी क्योंकि हम उन शिष्यों के शिष्य हैं जो शिष्य डायरेक्ट उनसे मिले हैं। है ना? उन पुराणों को लिखने वालों से। दूसरी बात कि अब अगर हम इसमें
00:17:22:09 से किसी एक बात को ही माने और दूसरी बात को ना माने तो ऐसे में हमारा तत्वदर्शी पर विश्वास होना ही सिद्ध नहीं होगा। तो जब तत्वदर्शी पर हमारा विश्वास होना ही सिद्ध नहीं होगा तो हम यह नहीं कह सकते नहीं नहीं तत्वदर्शी ने कहा है कि जिंदा जो परमात्मा है वह विष्णु है। हम यह नहीं कह सकते। तो हम यह प्रमाण तुम्हें केवल इसलिए दिखाते हैं कि जिससे कि तुम यह समझ सको कि तुम्हारा तत्वदर्शी के अंदर कितनी अल्प बुद्धि है। अगर यह किताबें उसने लिखी है तो। हालांकि इन पर भी डाउट है कौन लिख रहा है। मैनेजमेंट लिख रहा है कि क्या लिख रहा है? तो अब बात तुमको शायद थोड़ी-थोड़ी समझ में आने लगी होगी कि तुम्हारी किताबों में भी जस्ट विपरीत चीजें लिखी हुई हैं। तो फिर कोई एक बात किस आधार पर मानोगे? जिस आधार पर कोई एक बात तुम मान रहे हो या जो निचोड़ तुम अपने तत्वदर्शी की बातों का जेलधाम निवासी की बातों का निकाल रहे हो मिस्टर हेलमेट उसी आधार पर हम पुराण की बातों का मर्म निकाल सकते हैं तुम नहीं समझ रहे हो तुम नहीं हो उसके अधिकारी दूसरी बात ये है अंतत गत्वा बात ये आ जाती है हां इसमें मैं एक बात और जोड़ दूंगा कि हम
00:18:37:10 हम जो है तुमको सिद्ध कर रहे हैं कि देखो तुम्हारे तत्वदर्शी ने भी विष्णु को परमात्मा कहा है। अब तुम यह मत कहने लगना कि अगर तत्वदर्शी को मानते हो तो उसकी सारी बातें क्यों नहीं मान रहे हो? क्योंकि हमारे लिए विष्णु भगवान को परमात्मा परम ब्रह्म परम अक्षर ब्रह्म समझ गए? मानने के लिए हमें तत्वदर्शी की आवश्यकता नहीं है। हमारे पास पर्याप्त प्रमाण है। हम तुम्हें यह बता रहे हैं कि जिसको तुम प्रमाण मानते हो वह भी बोल रहा है। और यदि दो बातों में एक बात निकालने का यदि दो बातों में मिलाकर के सामंजस्य की बात को निकालने का नियम तुम यहां पर लागू करोगे तो फिर तुमसे पूछा जाएगा कि यह नियम पुराणों में क्यों नहीं लागू कर रहे हो? हम समझ रहे हो ना? और 100 की सीधी एक बात मेरे भाई 100 की सीधी एक बात भाई तुम पुराणों में वेद शास्त्रों में स्मृति अन्य स्मृति ग्रंथों में बुराई दिखा दिखा के दिखा दिखा के क्या साबित कर रहे हो कि उन ग्रंथों के द्वारा जो भजनीय हैं उन ग्रंथों के द्वारा जो प्रतिपाद विषय हैं वो सब गलत है तो मत मानो ना भाई तुम यही तो साबित करने में लगे हो तुमने आज तक पुराण वगैरह जो जितने भी स्मृति ग्रंथ है तुमने ने यह बताया है
00:19:52:19 कि देखो देखो इनकी पूजा नहीं करनी चाहिए क्योंकि ऐसा ऐसा लिखा है। अबे तुमने यह क्यों नहीं कभी बताया कि कबीर की पूजा करनी चाहिए। कहां लिखा है? हैं? और तुम जो कवि से कबीर बनाते हो तो फिर अगर मान लो वो कवि कबीर ही है। हालांकि तुमने अग्न्या को अधन्या कर दिया। कभी मिलोगे ना सामने तब बताऊंगा। अग्ञा को जो तुमने अधन्या किया है कवि को जो तुमने कबीर किया है अपने मन से अपने मनगढ़ंत शिव राम आपटे की बात को मानो कि ब्रज शब्द का अर्थ जाना होता है मगर शिव राम आपटे की दूसरी बात को मत मानो कि कवि का अर्थ कहीं नहीं लिखा कबीर होता है आज्ञा का अर्थ कहीं नहीं लिखा कि बिन ब्याह वो वो होता है कुमारी गाय है ना तो ये जो है तुम्हारी स्टाइल है कि भाई अपने हिसाब से कहीं से भी कोई चीज उठा के दिखा दी। अरे भाई वेदों में कवि के द्वारा तुम्हारे कबीर की ही बात की गई है। तो फिर कहीं पे लिखा तो होना चाहिए ना कि हां यह वही कबीर है जिसकी वेदों में बात की गई है और जहां पर लिखा हो वो हमारे द्वारा स्वीकार्य भी तो होना चाहिए।
00:21:08:02 अगर वेदव्यास जी के या फिर ब्रह्मा जी के द्वारा प्राप्त होने वाले वेद आदि शास्त्रों से तुम यह निकाल रहे हो कि यह इसमें देखो कबीर की बात हो रही है तो उनके द्वारा ही कहीं पर ये मेंशन होना चाहिए ना कि यह वही कबीर है जो तुम्हारा वाला कबीर है। यह वही कबीर है जिसकी बात वेदों में हुई है। जैसे कि अगर विष्णु की बात वेद में हुई, शिव की बात वेद में हुई तो जिनको हम मानते हैं वेदव्यास जी उनके द्वारा रचित जो अन्य ग्रंथ हैं उसमें उन्होंने बताया ना कि हां वेदों के द्वारा ऐसी यही है विष्णु जिसकी वेदों द्वारा बात होती है। यही है शिव जिनकी वेदों द्वारा बात होती है। तुम्हारा कहां है वो? और अगर वेदों में कोई नाम आ गया हो उस नाम का कोई भी व्यक्ति मान्य हो जाएगा। तो फिर हो सकता है कोई राठौड़ हो, कोई ब्राह्मण हो, कोई शिव हो। पता नहीं कितने ऐसे भगवान बनते डोलेंगे तुम्हारे हेलमेट्स के। अब तुम कह दोगे नहीं वही एक है जो कुंवारा पैदा हुआ था। तो इन सब पर आकर के बात करना। वो कौन कुंवारी गाय का दूध पिया था, क्या हुआ था, क्या नहीं हुआ था। समझ में आ रहा है? अभी हमने तुमको यह बता दिया कि एक ही शास्त्र के एक अर्थ को मानना और दूसरे अर्थ को ना मानने वाला व्यक्ति
00:22:23:20 शास्त्र पर विश्वास करने वाला सिद्ध नहीं होता। हम इस शास्त्र पर विश्वास नहीं करते। समझे? तुम्हें बताने के लिए बता रहे हैं कि तुम्हारा जो वो है तत्वदर्शी वो कितना बड़ा क्या है वो तुम ही जानो। तो अगर तुम भी ऐसे ही हो तो ठीक है। पुराणों पर विश्वास ना करने वाले हो जाओ। बात ही खत्म हो जाएगी। तुम भी हो जाओ एक विधर्मी दूसरा धर्म। बहुत सारे धर्म बने हैं सनातन के विरोध में। तुम भी हो जाओ। मगर ये तुम्हारी चाल है कि पुराण को वेद को मानने वाला होने वाले के रूप में अपने आप को ख्यापित करते हुए ढोंग करते हुए हम पुराण और वेद से आदमी को दूर ले जाएंगे। गीता को मानने वाला मानने वाले रूप में स्वयं को ख्यापित करते हुए हम गीता से दूर ले जाएंगे। है ना मिस्टर हेलमेट? तो 100 की सीधी एक बात है कि तुमने आज तक शास्त्रों से यही तो दिखाया है कि कृष्ण बुरे हैं, राम बुरे हैं, हनुमान बुरे हैं, विष्णु बुरे हैं, शिव बुरे हैं। यही तो दिखाया है ना। अबे ये तो दिखाओ कि कबीर अच्छा है। कबीर नहीं मरता है। ये तो दिखाओ। अब तुम कह दोगे कि उन शास्त्रों में वह परम ब्रह्म की बात ही
00:23:38:21 नहीं हुई है। मगर शास्त्र में तो लिखा हुआ है कि वेदोक्त धर्म ही परम धर्म है और धर्म क्या है? धर्म का वास्तविक फल मोक्ष है और लो। तो वेदों के अनुसार मिलने वाला धर्म ही धर्म है। वेदों में बताया गया जो जीवन और मृत्यु से मुक्त होने वाला जो कारण है उसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है जो तुमको जीवन और मृत्यु से मुक्त करा सके मोक्ष दिला सके। ये तो लिया गया वेदों में। अब तुम वेदों को पढ़ाकर, पुराणों को पढ़ा कर यही तो सिद्ध कर रहे हो कि वेदों को और पुराणों को क्यों नहीं पढ़ना? क्योंकि इसमें जो जो प्रतिपाद विषय है उन सब की बुराई है। तो भाई मत मानो ना वेदों को पुराणों को क्यों मानने वाला होने का ढोंग कर रहे हो? जाओ अपना सूक्ष्म सूक्ष्म वेद पढ़ो और उसके आधार पर भक्ति करो। तुम जो ये रायता फैलाते हो कि भाई हमको हम तो वेद और पुराण को मानने वाले हैं। और मानते क्या है कि उसमें जिनजिन की बुराई की है हम वो बता रहे हैं तुम्हें आ के। हां कि किस किस की बुराई की गई है। अरे बताना है तो यह बताओ कि जिसकी तुम भक्ति करवा रहे हो भक्ति कहां लिखी है उनमें? कहीं नहीं। शास्त्रार्थ
00:24:54:04 में रविदास से हार गए थे कबीर। और कबीर को हराने वाला शास्त्रार्थ किससे हारा था? शंकराचार्य से। नाम याद होगा शंकराचार्य। समझे? और उसके बाद रामानंदाचार्य जी के रामानंदाचार्य जी के पास जाकर के उनका शिष्यत्व प्राप्त किया और भगवत भक्ति की। पुराण में लिखा है नहीं मानते हो तो पूरा मत मानो। मानते हो तो पूरा मानो। जैसे कि इसको मानते हो तो पूरा मानते हो ना। आना बताऊंगा ऐसी से खोल के। ऐसी ऐसी ऐसी ऐसी चीजें निकलेंगी ना तुम्हारी किताबों से। सोचो कि मिट्टी का तेल छिड़क करके आत्महत्या कर ले। मैं ही बचाऊंगा फिर तुम्हें। समझे? इतनी बार कहा है नंबर दिया है 7408301869 फोन कर लो। मेरे चैनल पर मत आओ। किसी बीच के चैनल पर चर्चा कर लो भाई। तिया पाचा हो जाए। नहीं कायर हो ना? बचपन में मां का दूध नहीं पिया ना। इसीलिए हेलमेट दूं दूं दूं बने रहो। अरे भाई अगर इन अरे भाई अगर इन किताबों
00:26:09:10 के द्वारा जो प्रतिपाद्य विषय हैं अगर वह तुमको समझ में नहीं आ रहे हैं वो बुरे लग रहे हैं तो इससे यह नहीं सिद्ध होता कि जिनको तुम मनवाना चाहते हो वो सही है समझे तो इसीलिए कहता हूं मत पड़ो चक्कर में कोई है नहीं टक्कर में जय श्री राम [संगीत]
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रामपाल के ठोस बुद्धि भक्त #तत्त्वदर्शीसंत #rampaljimaharaj
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