No part of this video is used anywhere yet.
SRT: ⬇ SRT ⬇ Original file

.srt or .vtt (Hindi). The old file is backed up. After that the match for this video is rebuilt (may take a few minutes, keep the page open).

⬜ Not used yet · 00:00:00:04 – 01:21:59:00 (1:21:59)

00:00:00:04 कि जो ये कोई भी गू वैष्णव संप्रदाय में है तो वो तिलक देख करके हम पहचान जाएंगे कि भाई ये कौन से परिवार से हैं? अच्छा। इसको हम खुद को कहते हैं कि हम नित्यानंद परिवार से हैं। नित्यानंद जिस परिवार से आप हैं। आप हैं तो नित्यानंद परिवार के हैं तो अपना ये वंशी पत्र तिलक त्याग करके तुलसी पत्र तिलक कैसे कर रहे हैं वो? जो भक्ति सिद्धांत सरस्वती हैं उनके जो शिष्य लोग हैं वो कहते हैं कि हम अद्वैत परिवार है। सो अद्वित परिवार है तो अद्वैत परिवार का तिलक संत गोस्वामी महाराज यही भक्ति सिद्धांत जी के शिष्य हैं सरस्वती जी के वो अपने पत्रावली में लिखते हैं हम श्यामानंद परिवार के हैं। कितने गरीब की बात है। इस कौन कहता है कि कृष्ण और वो जो कुरान का ईश्वर है, बाइबल का ईश्वर है ये तीनों एक समान है। तो इस बारे में गौड या वैष्णव संप्रदाय का क्या मत है? जिस प्रकार से जीबीसी नाम का जो संगठन है वो इस का संचालन कर रहा है जो मायापुर इन्होंने बनाया जो मायापुर है आज इस के सबसे बड़ा बंगाल में जी मायापुर ही अप्रामाणिक है जो मायापुर मायापुर अप्रामाणिक क्या बात कर रहे हैं तो सभी को जय श्री राम जैसा कि आप सभी जानते हैं धर्म और अध्यात्म के लिए हम कई अलग-अलग संप्रदाय और व्यक्तित्वों का वक्तव्य लेते रहते हैं और जो वास्तविक सनातन धर्म है उसको समाज के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं। इसी संबंध में आज हम आए हैं भगवत निवास और यहां पर है

00:01:15:08 गौडिया वैष्णव संप्रदाय के प्रमाणिक आचार्य हमारे साथ बैठे हुए हैं और नित्यानंद परिवार से संबंध ये आचार्य जी हैं शास्त्री जी और यह हमें आज बताएंगे कि गौडिय वैष्णव संप्रदाय किस प्रकार से उसके नाम पर एक पाखंडी संस्थान द्वारा धर्म को सनातन धर्म को लगातार आघात पहुंचाया जा रहा है और उसमें सहारा लिया जा रहा है गौडिया वैष्णव संप्रदाय का ही उसी का नाम लेकर करके और एक पाखंड का प्रचार प्रसार किया जा रहा है। आप समझ रहे होंगे मैं किसकी बात कर रहा हूं। हम बात कर रहे हैं स्कॉन की। तो आज विशेष रूप से हम धर्म और अध्यात्म के बारे में बात करते हुए जानेंगे कि स्कॉन किस प्रकार से गौड या वैष्णव संप्रदाय का मिसय करते हुए समा जो सनातन जो सनातन समाज है उसको क्षति पहुंचा रहा है। तो सर्वप्रथम महाराज जी हमें आप अपना एक परिचय प्रदान कर दीजिए हमारे दर्शकों को। जय श्री राधे जय गौर जय निताय। मैं रघुनाथ दास शास्त्री गय संप्रदाय के श्री नित्यानंद परिवार से अंतर्भुक्त हूं युक्त हूं। जो श्रीमन महाप्रभु ने ग संप्रदाय का निर्माण किया उसमें अनेकों परिवार हैं। उसमें मुख्य रूप से श्री नित्यानंद परिवार अद्वैत परिवार ही प्रसिद्ध

00:02:30:19 हैं। और उनमें जो नित्यानंद परिवार हैं उसी के साथ हमारा अंतर्भक्त श्री नित्यानंद प्रभु के जो अर्धांगिनी श्री माता जानवा ठाकुरानी गोस्वामी उनके द्वारा गौ संप्रदाय का बहुत ही प्रचार प्रसार किया गया। उनके मुख्य शिष्यों में श्री गुणनिधि गोस्वामी के परंपरा में हम युक्त हैं। हमारे परंपरा में हमारे जो परम गुरु जी है श्री परम पूज्य श्री तीन गोस्वामी जी महाराज जिनके नाम सर्व विख्यात हैं। सभी जानते हैं। उन्हीं के और भी बहुत शिष्य हुए जैसे वर्ष के विनोद बाबा आदि मुरारी बाबा आदि जो बहुत प्रचार किए हैं। उन्हीं के विख्यात परंपरा में ही हम आते हैं श्री नित्यान परिवार से और गयी संप्रदाय के जो शास्त्र सिद्धांत है और उस विषय पे हमने संस्कृत में संपूर्ण विश्वविद्यालय से शास्त्री और आचार्य भी गौ वेदांत के ऊपर ही किया है और बालकों को गी संप्रदाय के सिद्धांत आदि अध्ययन भी कराते हैं। हरिणाम व्याकरण आदि भी पढ़ाते हैं। तो प्रामाणिक रूप से वृंदावन में तो बहुत साल हो चुका है और इसी कार्य में गू संप्रदाय के प्रचार प्रसार में जो मुख्य सिद्धांत है हमारे आचार्यों का उसी को ही जो है प्रचार प्रसार मैं करता हूं। जी जी बहुत ही सुंदर परिचय हमें आचार्य श्री का प्राप्त

00:03:45:21 हुआ और एक मतलब व्यवस्थित रूप से किस तरह से एक संप्रदाय के द्वारा शिक्षा प्राप्त हो रही होती है ये जानने को मिला और होनी भी चाहिए क्योंकि जो प्रामाणिक संप्रदाय हैं उनमें कोई दोष नहीं है। दोष है उनके नाम पर जो छल किया जा रहा है। समाज को जो छला जा रहा है। तो यह कुछ बात है। तो सबसे पहले एक बात हम पूछेंगे आचार्य श्री कि जो ये इस्कॉन नामक संस्था है जो स्वयं को कहती है कि हम गौडिया वैष्णव संप्रदाय से हैं तो क्या वो प्रामाणिक रूप से गौडिया वैष्णव संप्रदाय है वो इस्कॉन या वो अपने आप में एक संस्था मात्र है वो उसको किस दृष्टिकोण से देखते हैं पहली बात तो देखिए कि जो गॉड ये संप्रदाय है श्रीमन महाप्रभु के पश्चात में श्री नित्यानंद श्री अद्वैत आदि के द्वारा जो यह परंपरा विस्तृत हुआ जी खास करके नित्यानंद परिवार और अद्वैत परिवार मुख्य और उन्हीं के जो परंपरा आगे चली वहां से अनेक परिवार निकल गए तो कहते हैं गोरे में 64 परिवार है अच्छा 64 64 श्री पाठ कहा जाता है और 64 महंत भी हम कहते हैं तो 64 महंत के 64 परिवार परिवार

00:05:00:21 तो मुख्य रूप से जो मुख्य-मुख्य आचार्य है वहां से फिर परिवार निकल गए हैं जी तो ये जो परिवार परिवार निकला। इसमें दो तरह से परंपरा है। एक हो गया शिष्य परंपरा। हम एक हो गया वंश परंपरा। जैसे नित्यानंद प्रभु है तो उनके पुत्र वीरचंद्र गोस्वामी उनके पुत्र उनके पुत्र ऐसे कर करके करके जो है महाराज फिर परंपरा भी चला है। अच्छा और दूसरा है कि जैसे नित्यानंद प्रभु के शिष्य हैं। फिर उनके शिष्य उनके शिष्य ऐसे करके वंश परंपरा शिष्य परंपरा शिष्य परंपरा दोनों ही चला है। वो वंश परंपरा भी शिष्य परंपरा भी है। शिष्यों वो वंश परंपरा में भी अगर हमारा अध्ययन आगे बढ़ रहा है तो शिष्यत्व भी मतलब उसमें वंश भी है शिष्य भी है। और एक केवल शिष्य परंपरा है। शिष्य परंपरा जी तो अब ये जो शिष्य परंपरा है उसमें हमारे सिद्ध प्रणाली दिया जाता है। जैसे कोई भी जमीन खरीदने के लिए गया है ना तो रजिस्ट्री करना पड़ेगा और उसमें सब लिखा पड़ा होगा कि आपके जमीन का नाप इतने से इतना गज है। इतने बाय इतना है। ये इसका दक्षिण में ये है ये है। पूरा सब डिटेल्स होता है। जी तो जब घोड़े संप्रदाय में दीक्षा दी जाती है तो उसको हम सिद्ध प्रणाली कहते हैं। जी उसमें एकादश भाव होता है। तो उसमें स्वरूप दिया जाता है। जैसे यह नवदीप

00:06:16:09 के स्वरूप है और यह ब्रज के स्वरूप ब्रज में मंजरी स्वरूप है। उसमें जो मंजरी स्वरूप है उनका उम्र कितने होंगे? वर्ण क्या होगा? उनका मतलब निकुंज में जब नित्य लीला में जाएंगे तो श्री जी के साथ में सेविका रूप में रहेंगे तो उनकी उम्र क्या होगा? उनका अलंकार क्या होगा? उनका सेवा क्या रहेगा? उनका स्वभाव क्या रहेगा? उनका कुंज क्या होगा? किस स्थान पे उनका निवास होंगे? ये सब डिटेल्स रहता है। तो ये दलील है एक प्रकार से। हम्म। तो ये सभी जो असली परंपरा है वो पीढ़ी दर पीढ़ी वो प्राप्त है। अच्छा ये डॉक्यूमेंटेड है। अच्छा हां सभी के पास है। जितने मुख्य असली परंपरा है सबके पास ये चीजें हैं। मतलब कि वहां जो बैकुंठ लोक में आपको किस तरह का वो जो प्राप्त होता है ये गोलोक में हमारा तो भूम वृंदावन में मुख्य मानते हैं। तो जो जाबोट आदि में फिर शिव जी के साथ में रहकर के सेवा करने का सौभाग्य जो मिलेंगे वो सारी चीजें डिटेल में ये सारे जितने भी प्रामाणिक होंगे उनके पास कागज है तो क्या इन स्कॉन के पास कोई कागज नहीं है क्योंकि उनके परंपरा नहीं है इनके पास है नहीं अच्छा इस के पास ये डिटेलिंग नहीं मिलेगी नहीं मिलेगा आपको हो और एक मजे की बात बताऊं ये तो बहुत बड़ी बहुत बड़ी राज की बात खोल दी तो ये योगपीठ है जैसे कि योगपीठ होते हैं वृंदावन के योगपीठ नवदीप के योगपीठ

00:07:31:22 तो वृंदावन में अनेक कुंज है निकुंज है जहांजहां श्री युगल सर का लीला विलास करते हैं तो उनके जो चित्र हैं जो योगपीठ है वो मूल संप्रदाय के पास ही उपलब्ध है। अच्छा इन किसी के पास उपलब्ध नहीं है और वो एक ऐसे चीज है कि वो नेट में भी उपलब्ध नहीं है। और इतने गुप्त है कि बाहर कोई बताता भी नहीं है। हां तो वो जिनके पास परंपरा नहीं है वो चीज उनके पास उपलब्ध है ही नहीं। क्या बात है। तो वो उनको मिलेगा ही नहीं कभी जो उसकी परंपरा में नहीं है। तो भाई ये कुछ चीजें बताई है आचार्य श्री ने। जो परंपरा से हैं वास्तविक परंपरा से उनके पास ही ये चीजें जो महाराज जी बता रहे हैं वो आपको प्राप्त हो सकती हैं। तो सबसे पहले तो यही एक अप्रामाणिकता का द्योतक हो गया कि जिनके पास परंपरा नहीं है जैसे कि स्कॉन इत्यादि वो आपको कहेंगे तो कि हम प्रामाणिक वैष्णव गौडिया वैष्णव संप्रदाय से हैं। परंतु जो गौडिया वैष्णव संप्रदाय की मुख्य धरोहर है वो डिटेलिंग इत्यादि जो गोलोक धाम की जो डिटेल्स हैं और या जो दूसरी चीजें कुछ बता रहे हैं ये सारी डिटेलिंग आपको जो अप्रामाणिक संस्थान है इस्कॉन यहां पर किसी के पास प्राप्त नहीं होगी क्योंकि यहां पर वो गुप्त रूप से गुरुओं के द्वारा अपने शिष्य को और फिर वो परंपरा के द्वारा प्रदान की जाती है और जो कि बहुत ही क्या कहते हैं संवेदनशील

00:08:47:10 तरीके से सुरक्षित भी रखी जाती है। हां बिल्कुल वो किसी को नहीं दिया जाता है। जी जी जी तो ये तो ठीक है। बहुत ही अच्छा आपने उदाहरण दिया। तो इसमें अब सबसे पहले हम जैसे बात कर रहे हैं कि वो क्या प्रमाणिक रूप से है तो इसके दूसरे घटक एक आते हैं कि क्या जो इसके संस्थापक हैं प्रभुपाद जी इसन के तो इनके जो गुरु हैं क्या उन्होंने प्रामाणिक रूप से दीक्षा प्राप्त की है गौडिया वैष्णव संप्रदाय से कि नहीं की है कि कैसे उन इनके पास ये गौडिया वैष्णव का आया कैसे जितना भी है डुप्लीकेट ही है पर कितना है वो कैसे आया देखिए पहले जो मैं परिवार की बात कर रहा जी तो जैसे कोई भी घोड़े वैष्णव के पास आप जाते हैं जैसे हम तिलक किए हुए यह वंशी पत्र है वेणु पत्र तिलक है तो वेणु भगवान को कितने प्रिय है तो कोई बात ही नहीं है जी पांचात्रि में ईश्वर संगीिता में प्रमाण आते हैं जी कि जो वेणु पत्र है उत्तम कोटि के तिलक है जी वेणुपत्राकृत जो तिलक होते हैं ये उत्तम श्रेणी में आते हैं तिलक के जी जी जी अब जो ये वेणुपत्र तिलक है अद्वैत परिवार में जाएंगे तो वहां पे अश्वत पत्र तिलक है बट पत्र तिलक कहते हैं उसको जैसे नरतम परिवार है हमारे नरतम दास ठाकुर मतलब ये उन्हीं 64 परिवारों में से अलग-अलग परिवारों के नाम आप ले रहे हैं

00:10:03:01 नरतम परिवार और एक आपने अद्वैत परिवार अद्वैत परिवार जैसे नरतम परिवार है उसमें चंपक कलिका आकृति तिलक है जैसे चंपक कलिका पुष्प होते हैं उनके आकृति का तिलक होते हैं जी जी उसके बाद श्यामानंद परिवार है उनमें नपुर तिलक है श्री जी ने स्वयं कर दिया है अच्छा ठीक है वो भी नित्यानंद परिवार से ही थे पर श्री जी ने श्यामानंद प्रभु को विशेष रूप से ये नपुर तिलक प्रदान किया था जी तो वो नपुर तिलक हो गए अच्छा अच्छा फिर आपके और भी परिवार है जिसमें थोड़ा भिन्न-भिन्न तिलक आते हैं। तो ये जो मुख्य में तिलक की बात कर रहा हूं। जैसे गदाधर परिवार है उसमें भी थोड़ा अलग तिलक है। तो ये जो तिलक है तो जैसे गदाधर अद्वैत गदाधर हां अद्वैत गदाधर वो तो गदाधर पंडित के भी जो परंपरा निकले उसमें भी अलग तिलक है। भले ही वो निपुर के जैसा थोड़ा दिखता है पर वो अलग वो तिलक कहते हैं। कहते हैं वृद्ध पुंड्य है। पर वो देखता वैसा ही है। हम तो अब इसमें है कि जो ये कोई भी गड़े वैष्णव संप्रदाय में है तो वो तिलक देख कर के हम पहचान जाएंगे कि भाई ये कौन से परिवार से हैं। अच्छा क्या बात है कि ये तिलक देख के पता लग जाएगा। जी जी नित्यानंद परिवार तो त्रिपुर नहीं संप्रदाय के श्यामानंद परिवार के हो चाहे परिवार के हो वो तिलक मैं नहीं कर सकता क्योंकि मेरे शाखा में हमारे यहां पे कहा जाता है शाखा वृक्ष है तो वृक्ष के शाखा

00:11:18:07 है तो ये शाखा पहचाने कौन से शाखा से है जी तो ये तिलक उसका पहचान है अब कोई भी संप्रदाय के होंगे वो अपने गुरु के तिलक का परिवर्तन नहीं कर सकते नहीं कर सकते कोई भी नहीं कर सकते तो जो ये वाले हैं इनसे आप जरा पूछो कि इनके परिवार कौन सा है? हम कि भाई आप बूढ़े संप्रदाय से तो आपके परिवार कौन सा है? 64 परिवार में से कौन सा परिवार में कौन सा एक परिवार है? आप पूछो उनसे जी तो इसका कहना है उन्हीं के मैं किताब से आपको प्रमाण दूंगा। उनका एक किताब उन्होंने निकाला कि गौ परंपरा हमारा विशुद्ध है। हम विशुद्ध गीय परंपरा से हैं। ये किताब उन्होंने लिखा और उसमें उन्होंने ये प्रमाण दिया। बाकायदा मैंने अपने जो चैनल है आपने देखा होगा ग ये जो चैनल है हमारे उसमें मैंने हिंदी में और बांग्ला में दोनों में मैंने वीडियो बनवाई और पूरा डिटेल्स में मैंने बताया कि उनके प्रमाण दे दे के बताया ये चीज कि देखिए ये ग्रंथ में इनका लिखा हुआ है इस कौन खुद को कहते हैं कि हम नित्यानंद परिवार से हैं नित्यानंद जिस परिवार से आप हैं वहां पे हैं अरे तो नित्यानंद परिवार के तो अपना ये वंशी पत्र तिलक त्याग करके तुलसी पत्र तिलक कैसे कर रहे हैं वो जी ठीक है अच्छा इस के संस्थापक कौन है ये भक्त तुलसी पत्र तिलक किसका है श्याम? नहीं नहीं यह आपका हो गया इस वाले करते हैं। नहीं नहीं इस वाले वो अपने 64 परिवारों

00:12:33:15 में से किसी का है क्या? हैं दूसरे परंपरा के हैं। दूसरे परिवारों 64 में से किसी एक परिवार का वो तिलक है और हैं वो कहते स्वयं को नित्यानंद परिवार के जिस परिवार के आप हैं प्रामाणिक रूप से रूप से जी आपके पास वो डिटेल्स हैं जो गोलोक धाम की जो डिटेल्स जो बताई अभी आपने शुरू में एक सुंदर सी व्याख्या की थी वो डिटेल्स भी उनके पास नहीं है। नहीं वो तो नहीं है। जी तो जैसे कि वो खुद को कहते कि नित्यानंद परिवार इस वाले कहते हैं। अपनी किताब में उन्होंने लिखा है कि हम नित्यानंद परिवार की परंपरा से हैं। जी तो मेरा प्रश्न है कि आप नित्यानंद परिवार से तो नित्यानंद परिवार के जो तिलक उसको आपने कैसे बदल दिया? जी अब आते हैं कि जो ये एसी प्रभुपाद हैं हां हां स्वामी प्रभुपाद जो इस्कॉन के प्रतिष्ठाता है इनके जो गुरु है भक्ति सिद्धांत सरस्वती जी हैं। जी जी और भक्ति सिद्धांत सरस्वती जी ने गौ मठ स्थापना किया। जी तो जो गौ मठ के जितने आचार्य हैं जी ये अलग-अलग लोगों का अलग-अलग कहना है। जी कुछ लोग कहते हैं कि हम अद्वैत परिवार के हैं। अच्छा तो अद्वैत परिवार के हैं तो उनका तिलक इस के ही लोग खुद कह रहे हैं। इसन के जो प्रभुपाद हैं उनके जो गुरु भाई लोग हैं क्योंकि इस के जो प्रभुपाद है उनका जो गुरु है भक्ति सिद्धांत प्रभुपाद हैं। भक्ति सिद्धांत सरस्वती हैं। तो भक्ति सिद्धांत के जो सरस्वती है उसके द्वारा गमठ बनाई गई। हम्म तो भक्ति सिद्धांत सरस्वती जी के अलग-अलग शिष्य हैं। अलग-अलग

00:13:48:19 परंपरा है। हम्म भक्ति सिद्धांत के दो मुख्य शिष्य थे। एक सुंदरानंद विद्या विनोद जी थे और दूसरा थे पूरी गोस्वामी महाराज। ये दोनों प्रसिद्ध उनके शिष्य हुए जिसको हम लेफ्ट राइट एंड कहेंगे। हम और जो भक्ति सिद्धांत सरस्वती हैं। हम उनके जो शिष्य लोग हैं वो कहते हैं कि हम अद्वैत परिवार हैं। सब नहीं कहते हैं। कुछ कहते हैं हम अद्वैत परिवार हैं। जैसे इस्कॉन भी तो वहीं से आया। हम् तो इस कहते हम नित्यानंद परिवार हैं। कुछ गौरी मठ के लोग कहते हैं कि हम अद्वैत परिवार हैं। तो अद्वैत परिवार है तो अद्वैतिक परिवार का तिलक हो जाएगा बट पत्र। बट पत्र वट पत्र तिलक हो जाएगा। तो महाराज आपने अपने गुरु परंपरा के तिलक तो जज नहीं कर सकते। तो मतलब अगर आप अद्वैत परिवार के हैं तो आपका वट पत्र होना चाहिए। और आप अगर नित्यानंद के हैं तो आपका बंशी पत्र बंशी पत्र होना चाहिए। मगर आपका है अलग ही एक तुलसी पत्र। अच्छा उसमें और भी मजे की बात मैंने अपने जो चैनल में गॉड चैनल जो है तो उसमें भी बाकायदा प्रमाण दिया कि अलग-अलग मठ जी खुद के जब तक भक्ति सिद्धांत सरस्वती के जो शिष्य हैं उन्हीं के अलग-अलग शिष्यों ने अलग-अलग परंपरा निकाली जी क्योंकि वास्तविक कोई परंपरा नहीं है। इसलिए कि इनको पता ही नहीं है कि परंपरा है। जब बाबाजी संप्रदाय के लोगों ने आवाज उठाया जी तो देखा कि भाई हमारे यहां से भाग-भाग करके इस गोमाट से भाग-भाग करके सब आज जितने

00:15:03:20 लोग हैं मूल परंपरा में सब वहीं से हैं वैसे अधिकतर वहीं से फिर यहां पे आए हैं। हमारे यहां से कोई वहां पे नहीं गया है। हम तो जब ऐसे भागने लगे तो कुछ महाराजों ने चेष्टा किया कि भाई अब तो बचाया कैसे जाए। तो उन्होंने परंपरा निकाली। आप देखिए कि 100 साल तो बीत चुका है। अब तो बिखर चुका है। हम तो जब इन लोगों ने परंपरा निकाला तो आपस में इन लोगों का विरोध हो गया। हम पूरी के एक माटे वो है संत गोस्वामी महाराज यही भक्ति सिद्धांत जी के शिष्य हैं सरस्वती जी के वो अपने पत्रावली में लिखते हैं हम श्यामानंद परिवार के हैं। कितने गजब की बात है और वो बाकायदा मेरे पास पेपर है। अच्छा अभी एक सन्यासी जी को मैंने परिवर्तन किया घोड़ी मठ के तो वो कहते कि महाराज हमको तो ये पता था कि हम बक्रेश्वर परिवार हैं। बताइए वो कहते कि हम बक्रेश्वर परिवार हैं। महाराज हमको तो यही पता था। और दूसरा कोई कहते कि भाई हम तो श्यामान परिवार के हैं। और कोई यह भी कहता है कि हम नरतम परिवार से हैं। हम तो हमारा हां ये अलग-अलग है। किसी को कोई पता ही नहीं है कि हम कौन से परिवार हैं। हम गोमोट और इस खुद ही एक दूसरे से इन्होंने ऐसी खिचड़ी पकाई है कि उसमें से कुछ भी निकल पाना बड़ा। देखिए ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि जब आपके पास परंपरा नहीं है

00:16:18:28 तो खिचड़ी पक गया ना। बिल्कुल बिल्कुल। अब खिचड़ी हम लोगों में कोई नहीं खिचड़ी पक जो नित्यानंद परिवार की वो तो कह रहा नित्यानंद परिवार के ठोस तरीके से आगे बढ़ रहे हैं आगे बढ़ रहे हैं और जो नकली होता है वो उसको कहीं ना कहीं मिलावट करनी पड़ती है तो उसका वो खिचड़ीकरण हो ही जाता है इनके जो परंपरा है दिखाया इन्होंने इस के देखिएगा जो खास करके जो परंपरा के ये दिखाते हैं कि जैसे भक्ति सिद्धांत सरस्वती जी मतलब मूल इस जहां से जुड़ा हुआ है भक्ति सिद्धांत जी से समस्या वहीं से पैदा होते हैं। जी। दूसरा जगह से हां, वो थोड़ा सा मैं जानना चाहता हूं आपके मुखारविंदु से कि उनकी जो दीक्षा है, वह क्या विधि विध शास्त्रोक्त है, क्या है? उसमें बड़े सारे प्रश्न हैं। हां, उसको मैं इसलिए कह रहा हूं कि जैसे कि जो परंपरा इस्कॉन आज सबके सामने दिखाते हैं। हम्म। कि भक्ति सिद्धांत सरस्वती गोस्वामी के शिष्य हैं। प्रभुपाद जो इस्कॉन के प्रतिष्ठाता हैं। तो भक्ति सिद्धांत जी के गुरु कौन है? गौर किशोर बाबा। अच्छा। हां। गौर किशोर किशोर दास बाबा जी महाराज अब देखिए उसके नाम पे पीछे क्या लगा हुआ है बाबा जी महाराज बाबा जी महाराज उनका वस्त्र वो क्या धारण करते थे सफेद वस्त्र अच्छा क्योंकि गौ में लाल वस्त्र गड़ुआ को निषिद्ध किया गया है नहीं धारण कर सकते आप गे वस्त्र

00:17:34:09 को सफेद ही धारण करना है क्योंकि देखिए संप्रदाय का अलग-अलग होता है। जी जी जी तो मतलब कहते हैं कि भाई हमारा ये सफेद है तो हम सफेद पहनेंगे सात्विक गुण को धारण करके अपनी-अपनी अनन्यता है। विधि के लिए गुरु के लिए और मतलब पहचान भी तो है गौ संप्रदाय है तो सफेद वस्त्र है बिल्कुल ठीक है यूनिफ होने की वजह से व्यवस्था व्यवस्था व्यवस्था सुंदर रहता है जी जी तो जो गुरु किशोर दास बाबा जी महाराज है वो बाबा जी हैं उन्होंने कोई दंड नहीं लिया खुद कोई उन्होंने यज्ञवि नहीं धारण किया हुआ है। अच्छा हां भाई बाबा जी महाराज कैसे यज्ञ धारण करेंगे मतलब सन्यासी थे मगर दंड नहीं था नहीं दंड नहीं है ब्रह्मचारी से सन्यासी हुए थे हां ब्रह्मचारी उस समय यज्ञपति रहा होगा कभी सन्यास से पहले अब वो तो पूर्व क्योंकि आप आजकल तो परंपरा खंडित वगैरह भी हो गए हैं बंगाल में तो आजकल उपगोपीत बहुत कम लोगों का होता है। अच्छा, अच्छा। तो, जी। तो, तो, उनके पास ना दंड था उस समय और यह सब सन्यास वाली जो यह सब चीज़ें होती है, यह नहीं थी। फिर आगे देखिए, हमारे गोरे संप्रदाय में जब सन्यास हो जाते हैं, तब तो यह गोपी पिता सब परित्याग हो जाता है। उसका तो कोई स्टेमिन नहीं परमहंस है। तो बाबा जी महाराज हमारे यहां पे बेशस्त्रय होते हैं। बाबा जी महाराज माना जाता है। जिसको हम भेग बोलते हैं। एक ग्रंथ भी आता है। भेकाश्रय विधि जो हमारे आचार्य

00:18:49:13 के द्वारा लिखित है वो। अच्छा। तो वो बाबा जी परंपरागत के थे। तो जो गोर किशोर बाबा है वो अदित परिवार से थे। अच्छा अत परिवार से हैं। तो जो अदत परिवार का तिलक कौन सा बट पत्र तिलक जब वो जीवित थे तो बट पत्र ही तिलक करते थे। अच्छा और वो उनके जो जीवनी है हम हरिदास दास जी द्वारा हमारे आचार्य के द्वारा लिखित है। जी उसमें उनके दो शिष्य का नाम मिलते हैं। उसमें भक्ति सिद्धांत जी के नाम नहीं है। अच्छा हां गौर गौर किशोर दास बाबा जी के शिष्यों में भक्ति सिद्धांत जी हालांकि वो उनके शिष्य थे पता नहीं इसका कोई गारंटी नहीं मतलब यह भी एक इसका कोई गारंटी नहीं कौन क्लेम करता है वो इस गोमट क्लेम करते इसका कोई प्रामाणिकता नहीं है अच्छा इसका कोई प्रामाणिकता नहीं है मतलब वो ये क्लेम जिससे करते हैं कि इनसे हमने दीक्षा ली इनके हम शिष्य हैं उनके वो शिष्य थे कि नहीं ये भी विवादास्पद बात विवादास्पद बात है और ये सालों साल विवादी रहे क्योंकि अगर आप उनके शिष्य हैं तो उनके प्राप्ति होने के बाद आपने उनके चित्र रख के छवि छवि रख के आपने स्वयं सन्यास ले लिया। आपने कोई यज्ञ, हवन आदि कुछ भी नहीं करवाया और स्वयं ही आपने सन्यास लिया। जी। कहा कि सपना आदेश हुआ और इसलिए हमने गुरु जी के चित्र रख के सन्यास ले लिया। क्या गुरु

00:20:04:14 का चित्र सामने रख के सन्यास ले लेना कोई शास्त्र सिद्ध बात है। बिल्कुल सिद्ध शास्त्र सिद्ध बात नहीं है। जी। अब उसके बाद देखिए। इसमें तो ये भी हो सकता है ना कि कोई अ वैसी शक्ति नकारात्मक शक्ति भी आपको स्वप्न दे सकती है। कुछ राक्षसी कार्य के लिए आपको प्रवृत्त कर सकती है। कर सकते हैं। तो आपको पता करने के लिए किसी प्रामाणिक दूसरे आचार्य के पास जाना होगा कि मुझे जो स्वप्न प्राप्ति हुई है वो सही है कि नहीं। उसको वेरीफाई कराना आवश्यक होता है प्रामाणिक आचार्य से। देखिए उसके बाद देखिए कि खुद आपके गुरु जी जो जीवित रहते हुए बट पत्र तिलक करते जी उस तिलक को आपने परिवर्तन किया तो क्या यह अपराध नहीं है? बिल्कुल आपके गुरु जी तो सफेद वस्त्र पहनते थे। आपको कहां से घेआ मिल गया? जी आपके गुरु जी के पास तो कोई दंड धारण नहीं थे। आपने त्रिदंड कहां से मिल गया आपको? बिल्कुल। आपके गुरु में तो यज्ञपवित नहीं थे। क्योंकि बाबा जी सन्यासी में तो यज्ञप होता ही नहीं है। उन्होंने यज्ञपवित भी कर लिया। हां उन्होंने खुद यज्ञपोभीत कर लिया। दंड सन्यास लिया या मतलब पहले यज्ञपवित। यज्ञ तो उन्होंने पहले किया हुआ था। पर सन्यास के समय तो यज्ञपति उतार दिया जाता है ना भाई। उन्होंने नहीं उतारा। ना नहीं उनके सन्यास होते तो यज्ञ पवित्र रहता है। अच्छा उन्होंने सन्यास के बाद भी यज्ञ पवित्र उतारा नहीं है। नहीं नहीं नहीं बिल्कुल नहीं। तो ये तो काफी मतलब अलग बात दिखाई

00:21:19:20 दे रही है। हां जी। तो उसके बाद देखिए उन्होंने ये कार्य किया तो वहां से समस्या उत्पन्न होता है। कुल मिलाकर के अगर देखें कि जिनको वो भक्ति सिद्धांत जी का गुरु बता रहे हैं। वो अद्वैत परिवार के हैं और भक्ति सिद्धांत जी को जो लोग अपना गुरु बता रहे हैं वो नित्यानंद परिवार का स्वयं को कह रहे हैं। पहली बात। हम्म। दूसरी बात वो जो टीका लगाते थे अद्वैत परिवार वाले जो गौर किशोर दास जी बाबा जी उनका ना तो इनके पास टीका आया है ना अद्वैत परिवार के थे तो अद्वैत परिवार का टीका ना हो के स्वयं उन्होंने तिलक बनवा दिया। नित्यानंद परिवार नहीं नित्यानंद परिवार का भी नहीं वो स्वयं स्वयं और उसमें भी जो भक्ति मतलब नित्यानंद परिवार का टीका भी नहीं है ये ना भक्ति सिद्धांत जी के शिष्य हैं हां उनमें खुद ही अलग-अलग बातें हैं। कोई कहता है कि हम शमानंद परिवार से, कोई कहता है नरोत्तम से, कोई कहता है नित्यानंद से, कोई कहता है अद्वैत से। अच्छा। अब उन्होंने तिलक जो है अपना स्वतंत्र बनाया तुलसी पत्र और उनमें भी आपको ऐसा चित्र मिल जाएगा भक्ति a जो स्वामी प्रभुपाद है उनके कि वो खुद नित्यानंद परिवार के जैसा तिलक लगा रहा है। क्योंकि उनको कोई पता ही नहीं है। एक जो मन में आ रहा है जैसा तिलक लगा। प्रमाणिक रूप से नहीं है। ऐसा नहीं है। फिर साथ ही साथ हमने ये देखा कि क्या कहते हैं? उनके पास जो सन्यास था उसमें दंड नहीं था।

00:22:34:21 है ना? और जनेऊ तो खैर त्याग ही दिया जाता है जब सन्यास लिया जाता है। मगर इससे इत पहली बात तो ये सन्यास स्वयं ले रहे हैं अशास्त्रीय विधि से। ऐसा कोई शास्त्रीय विधि है ही नहीं। उसप अभी हम बात करेंगे। मगर अगर ले भी रहे हैं तो इन्होंने दंड कहां से आ गया? और इन्होंने अपना जनेऊ क्यों नहीं त्यागा? इनके पास गेरुआ वस्त्र कहां से आ गए? ये बात हो जाती है। हां। और सबसे बड़ी बात है कि जब गुरु जी प्राप्ति हो गए तब जाकर के आपने तिलक परिवर्तन कर लिया। अगर आपके गुरु जीवित होते तो क्या वो इसको मान लेते कि आप अपने तिलक को परंपरा का आचार्य के तिलक को आपने परिवर्तन कर दिया। गुरु के ना होने की स्थिति में एक अब वो है गुरु विरोध गुरु विरोध उन्होंने कर लिया। अच्छा इसमें एक मैंने अभी देखा था कुछ दिनों पूर्व हमने देखा था कि कहीं पर दंड सन्यास दिया जा रहा है तो वहां काफी शास्त्रीय विधि का आडंबर दिखाया जा रहा है। वो थोड़ा सा उसमें बताइए। देखिए विधि का शास्त्र का आडंबर जब भक्ति सिद्धांत जी ने लिया स्वयं शुद्ध सन्यास खुद ही खुद सन्यास दिया खुद को जी तो उस समय में क्या इतना आडंबर किया उन्होंने? कुछ भी नहीं किया। नहीं किया। तो आज ये जो हवन करा करके यज्ञ करा करके फलाना गौर्य संप्रदाय में कोई हवन की विधि नहीं है। हम्म जो गृहस्थ हैं उनके लिए केवल मात्र विवाह आदि इत्यादि जो भी श्रद्धा आदि कार्य होंगे उस समय में हवन आदि होगा। हम्म हम्म। परंतु जो वृत्त संत सन्नस है उनमें टोटल

00:23:49:25 हवन निषिद्ध है। वह हवन आदि नहीं होता है। यहां पर सीधी सी स्पष्ट बात है वहां पे। अब आजकल कोई लोग कर रहा है तो उससे हमें कोई मतलब नहीं। तो ये इस्कॉन जब ये मानता है कि किसी ने स्वप्न में आदेश कर दिया उसको दंड सन्यास दिया जा सकता है तो उसको फिर ये आडंबर करने की दिखावा करने की आवश्यकता क्यों? ये प्रतिष्ठित करना चाहता है ना। अपने को। ये तो अपने आपको प्रतिष्ठित करना चाहता है। शास्त्रोक्त के हम बहुत शास्त्र हैं। हम प्रामाणिक हैं। अच्छा मैं इसमें एक प्रश्न करना चाहूंगा कि जैसे आपने इसको मान लिया कि हमको स्वप्न आया तो क्या किसी और को स्वप्न आ जाएगा। नहीं नहीं वो तो बिल्कुल नहीं मानेंगे। क्योंकि एक ही सिद्ध है। देखिए भक्ति सिद्धांत सरस्वती का जो प्रॉब्लम है ना कहां से स्टार्ट होता थोड़ा सा उसका वर जाते हैं। जी जो भक्ति सिद्धांत सरस्वती जो परंपरा गोमठ इसको हम दिखाते हैं। जी उसमें दिखाते भक्ति सिद्धांत के गुरु गौर किशोर बाबा है। और गौर किशोर बाबा के गुरु कौन है? भक्ति विनोद ठाकुर दिखाते हैं। जो परंपरा के आप देखेंगे उनमें भक्ति विनोद ठाकुर गौर किशोर बाबा जी के गुरु कहां से हो गए? भक्ति विनोद ठाकुर मजे की बात है ना? क्योंकि परंपरा में तो दिखाते हैं। वो कहां से आए यहां पे? वो कहते हैं कि भागवत गुरु है। कहते हैं भागवत परंपरा है। अब इसमें देखिए भागवत परंपरा हो नहीं सकता क्योंकि गोर कृष्ण दास बाबा जी महाराज जो है भक्ति विनोद से जाकर के कोई शिक्षा नहीं ली हुई है। वही उनसे भजन शिक्षा नहीं ली

00:25:04:26 हुई है। ये दोनों आपस में मित्र थे। अपित तो भक्ति विनोद जी गोरकिशोर के पास जाते थे। और उनसे जाकर के चर्चा करते थे। ठीक है। मतलब मित्रता को संघ को ये लोग गुरु और शिष्य शिष्य बनवा दिए। और जबकि गौर किशोर बाबा और भक्ति विनोद समय से भी ऊपर है गौर किशोर बाबा उनको इन्होंने फ्रेंड बना दिया और वहां पे तो भागवत परंपरा दिखाने के अब प्रयास किया। अच्छा आप देखिए मजे की बात इन्होंने क्या-क्या किया है जो भक्ति विनोद ठाकुर ये नित्यानंद परिवार से इन्होंने उनके भी तिलक परिवर्तन करवाया। इसमें मजे की बात बताओ जो भक्ति विनोद ठाकुर हैं उनके गुरु थे प्रामाणिक गुरु श्री विपिन बिहारी गोस्वामी महाराज अच्छा भक्ति विनोद ठाकुर के जो पूर्व जीवन है किस परिवार के थे? वो है नित्यानंद परिवार के। अच्छा जो भक्ति विनोद ठाकुर के पूर्व जीवन है वो अलग है। और जब वो प्रामाणिक गुण संप्रदाय से जुड़े फिर उनका सिद्धांत बदला। खुद उन्होंने अपने जीवन पे लिखा कि मैं अपना पूर्व जीवन को भूलना चाहता हूं। जी जी तो जब वो प्रामाणिक परंपरा के आचार्य से जुड़े उस समय में जो विपिन बिहारी गोस्वामी जी थे उनसे दीक्षा ले। तो विपिन बिहारी गोस्वामी कौन है? जो विपिन बिहारी गोस्वामी जी हैं वो हमारे श्री रामायण ठाकुर यानी जानवा माता के ही शिष्य जी उन्हीं के परंपरा में दीक्षित

00:26:20:04 थे। कि जो विपिन बिहारी गोस्वामी परिवार के हैं जो भक्ति विनोद ठाकुर भक्ति विनोद ठाकुर के काफी शिष्य थे। भक्ति विनोद ठाकुर के जो 14 बच्चे थे उसमें विमला प्रसाद जिनका नाम बाद में भक्ति सिद्धांत सरस्वती प्रभुपाद पड़ा और उनके दूसरा भाई था ललिता प्रसाद जो भक्ति विनोद ठाकुर के शिष्य भी हैं और पुत्र भी हैं। ओ अब ललिता प्रसाद ये जो भक्ति सिद्धांत परंपरा के लोग हैं ये कहते हैं कि भक्ति विनोद ठाकुर के साथ विपिन बिहारी का कोई विरोध हो गया जिसके कारण भक्ति विनोद जी ने विपिन बिहारी को परित्याग कर दिया हम गुरु त्याग कर दिया इसलिए ये लोग भक्ति विनोद ठाकुर के तिलक को भी परिवर्तन कर दिया तुलसी पत्र लगा दिया भक्ति विनोद जी ने जब उनको अपने से हटा दिया अलग तो फिर वो किस तरह से अपने आप को देखिए तो देखिए तो मजे की बात यहीं पे है तो इन्होंने प्रचार किया जी भक्ति सिद्धांत सरस्वती जी ने कि भक्ति भक्ति विनोद ठाकुर ने विपिन बिहारी गोस्वामी को परित्याग कर दिया है। अरे ऐसा बोला इन्होंने। अब देखिए जो भक्ति विनोद ठाकुर के शिष्य थे बहुत सारे जो भक्ति तीर्थ आदि ठाकुर हुए और खास करके ललिता प्रसाद उनके पुत्र भी शिष्य भी हैं। तो ललिता प्रसाद के भी शिष्य परंपरा चला है। वो अभी वीर ननगर में है बंगाल में। वो जो असली परंपरा है भक्ति विनोद जी के वो कहते कि नहीं हमारे भक्ति

00:27:35:15 विनोद ठाकुर ने कभी भी विपिन बिहारी गोस्वामी का परित्याग नहीं किया। और भक्ति तीर्थ ठाकुर आदि के जो परंपरा चली उन्होंने भी वही कहा कि भाई नहीं कभी परित्याग नहीं किया और वो लोग खुद नित्यानंद परिवार के तिलक करते हैं बताइए और इधर ये लोगों ने आपने भक्ति सिद्धांत जी ने उनके तिलक को चेंज कर दिया और ये कह दिया विपिन बिहारी को परित्याग कर दिया जबकि असली जो मतलब जो विमला दो और है वो कह रहे हैं कि नहीं किया और वो भी विमला प्रसाद जी के भाई है अपना सगा भाई ललिता प्रसाद और वो भी भक्ति विनोद के शिष्य भी है और पुत्र भी है और उनके परंपरा अभी भी चल रहे हैं और वह इस बात पे अड़े हुए और बिल्कुल नहीं मानते प्रामाणिक उनको कहते हैं कि नहीं विपिन बिहारी गोस्वामी को कभी भी व्यक्ति विनोद जी ने परित्याग नहीं किया सिद्धांत सरस्वती की प्रामाणिकता यहां भी भंग हो गई हां बिल्कुल भंग हुआ उनका कहना क्योंकि उनके साथ कई दो अन्य लोग जो प्रामाणिक उनके खुद भाई भी खुद क्लेम कर रहे हैं पर यहां पे भंग हो गई जो उन्होंने गौर गौर गौर किशोर दास बाबा जी की भी जो बात उनकी बात कही कि उनके गुरु वो थे हां अब उसमें बात देखिए जो भक्ति विनोद ठाकुर जो गौर किशोर दास बाबा जी जी उनके गुरु अद्वैत परिवार के हैं। जी नंद किशोर गोस्वामी आदि करके कोई उनका वह परंपरा में आते हैं। तो वह अद्वैत परिवार से तो कोई भी हमारे परिवार के होंगे तो वो अपना तिलक आदि स्वरूप को सिद्धांत

00:28:50:16 को परिवर्तन नहीं कर सकता। अखंड रूप से वो पालन करना चाहिए। जी। अब इसके बाद इन्होंने दिखाया कि भक्ति विनोद जी के गुरु जी हैं क्या? अह जगन्नाथ दास बाजी महाराज। भक्ति विनोद जी के गुरु बना दिए जगन्नाथ दास बाजी महाराज। तो जगन्नाथ दास बाबा जी जो महाराज उनके वास्तव में गुरु कोई और हैं। विपिन बिहारी गोस्वामी है। विपिन बिहारी जो नित्यानंद परिवार से हैं। जिनका परित्याग दिखा रहे हैं। ये ये लोग कह रहे थे त्याग कर दिया। त्याग कर दिया। पर असली में कोई परित्याग नहीं हुआ है। अरे दादा। अच्छा अब जगन्नाथ दास बाबा जी जो महाराज है वो भी बाबा जी हैं। हां हां ठीक है देखिए जगन्नाथ दास बाबा जी महाराज जी ये खुद नित्यानंद परिवार से हैं और जो जगन्नाथ दास बाबा जी के असली मंदिर है वो भी अभी हम लोगों के सेवा में है। मतलब हमारे जो दादा काका गुरु जी थे मुरारी काका जी उन्हीं के शिष्य को ही यह मंदिर समर्पित किया गया था और उन्हीं के ही शिष्य अभी भी वो चला रहे हैं। मतलब असली जो स्थान है। जी। अब उनके जो परिवार है वो नित्यानंद परिवार हैं। तो जगन्नाथ दास बाबा जी महाराज जो नित्यानंद परिवार के उनके तिलक को भी उन्होंने चेंज किया। ये भी बाबा जी है। ये भी सफेद कपड़ा पहनते हैं। वो भी जेलवा आदि धारण नहीं कर सकते। जिनको उनका नकली गुरु घोषित कर रहे हैं। उनका भी तिलक चेंज कर रहे हैं। हां बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल मतलब फोटो वगैरह में फोटो वगैरह में। हां बिल्कुल। तो जगन्नाथ दास बाबा

00:30:05:22 जी महाराज जो हमारे जो नित्यानंद परिवार से हैं ठीक है ठीक है उनको एक सीमा होती है एक सीमा होती है कि भाई आप पहले तो किसी को उनका यूं ही गुरु बना रहे हो जो गुरु हैं उनका परित्याग दिखा रहे हो और अपने गुरु का टीका बदल रहे हो फिर उनके उनका जो नकली गुरु जिसको घोषित कर रहे हो उसका भी तिलक टीका सब बदल दे रहे हो मतलब अपनी जो खिचड़ी है जो अपनी जो चीजें हैं उनको ख्यापित ित करने के लिए क्या कहते हैं? प्रामाणिक रूप से ख्यापित करने के लिए इतना सारा मतलब पूरा माथा मथैया माथा मथैया करनी पड़ी और जो जगन्नाथ दास बाबा जी महाराज है वो भी बाबा जी हैं। वो भी कोई जेनु धारण नहीं करते थे। सफेद वस्त्र पहनते थे। दंड नहीं धारण करते थे। तो जो जगन्नाथ दास बाबा जी हैं वो नितिता परिवार के हैं। तो उनके भी उन्होंने परंपरा को उन्होंने खंडित कर दिया। अच्छा भक्ति विन और ठाकुर जी जगन्नाथ दास बाबा जी के पास शिक्षा अधिग्रहण करने के लिए जाते थे। उनके कुछ शिष्य वगैरह नहीं थे। हम हम तो ये नित्यानंद परिवार के हो गए। हम तो नित्यानंद परिवार के हो गए। इनके तिलक को स्वरूप को उन्होंने चेंज किया। उसके बाद ये सीधा पहुंच जाते हैं बलदेव विद्याभूषण में परंपरा में। अब बलदेव विद्याभूषण कहां से मतलब कनेक्टेड है? 100 150 साल में तो जगन्नाथ दास बाबा जी के साथ

00:31:20:24 बलदेव का कोई कनेक्ट हो ही नहीं सकता। हम बलदेव विद्याभूषण के शिष्य बलदेव विद्याभूषण भी गौरी वैष्णवी हां गौ वैष्णवी वो श्यामानंद परिवार से हैं। अच्छा तो उनके तिलक नपुर तिलक है। अच्छा इन्होंने बाकायदा श्यामानंद प्रभु के तिलक का परिवर्तन किया था। ये लेकर के मैंने बहुत लेख किया था लिखा था कि ये आपके श्यामानंद प्रभु के तिलक परिवर्तन कर दिया। का तिलक परिवर्तन कर दिया क्योंकि इन्हें भक्ति जो सिद्धांत को दिखाना था। भक्ति सिद्धांत को प्रमाणिक दिखाना था और बलदेव विद्याभूषण को भी इन्होंने तिलक परिवर्तन कर दिया। हां हां सब सबका जितने आचार्य हैं षड गोस्वामी को जो चित्र हैं जो हमारे षड गोस्वामी रूप सनातन आदि के जो चित्र हैं बाकायदा इन्होंने उस चित्र में सबका जेनू लगाए हुए हैं जबकि मूल जितने परंपारिक जो चित्र है पूर्व हम्म पुराना जब गौरम इसका नया वो जो चित्र हैं उसमें कहीं पे भी जेएनू नहीं है। यह चित्र आप हमें बिलकुल मैं उपलब्ध कराऊंगा और उन्होंने बाकायदा राधा कुंड में अपने जो जेएनयू थे उतार करके उन्होंने दे दिया था कि ये हम तो सन्यासी हम विरक्त है हमको कोई इसका प्रयोजन नहीं है तो हम तो भाई सन्यास आश्रम में है तो हमें तो उसका कोई प्रयोजन नहीं है जी तो जब आचार्य ने त्याग दिया उन्होंने आचार्य के सबके तिलोक बदले सबके जो है जेनु लगा दिए सब के वस्त्र बदल दिया इस कौन

00:32:36:00 है अच्छा ये लोग जो वैष्णव अपराध की बात करते हैं आप सोचिए कितने बड़े वैष्णव अपराधी है। आपने गुरु की तिलक बदलवाया, स्वरूप बदलवाया। आपने पूर्व आचार्य के तिलक स्वरूप को बदलवाते हैं और इनको कोई अपराध की बोध नहीं होती है। तो मैं तो इनको समझता हूं इनकी विवेक इतना मर चुका है। अपराध से इतना ये लोग ग्रस्त हैं। इतने अपराध कर चुके कि विवेक इनकी मर चुका है। जिसके कारण अपराध का बोध नहीं हो रहा है। जब व्यक्ति अपराध करने लग जाता है, पाप करने लग जाता है तो उसकी बोझ में इतना वो दब जाता है कि उसको पता ही नहीं लगता कि मैं अपराध कर रहा हूं। ये घनघोर अपराध है। निकृष्टता की पराकाष्ठा। बिल्कुल। तो इसमें एक शब्द बार-बार अभी सुनने में आता है। यह तो हमने देख लिया कि इन्होंने अपने आप को प्रामाणिक सिद्ध करने के लिए अपने गुरु उनके उनसे किसी को जोड़ना है तो उसका उसकी परंपरा का सड गोस्वामियों का सबका इन्होंने रूप परिवर्तन करके अपने उसमें आइडियोलॉजी में अपनी बुक्स में दिखाया। तो एक महाराज जी एक शब्द हमने बार-बार सुना। ये गौडिया मठ क्या है? इस पे थोड़ा सा प्रकाश डालिए क्योंकि हम सुनते हैं गौडिया वैष्णव संप्रदाय अलग है और गौडिया मठ अलग है। तो इसमें आप क्या कहते हैं? देखिए कि जो गौ संप्रदाय है जी हमारे यहां पे मंजरी भाव

00:33:51:01 की उपासना है राग मार्ग में हम एक हो गया विधि मार्ग एक हो गया राग मार्ग जो लोभ जिसको हम कहते हैं भगवान की सेवा का लोभ लोभ उससे यह राग मार्ग में लोग आगे बढ़ जाता है और विधि मतलब केवल विधि हम पूजा सेवा अर्चना आदि करेंगे कोई भाव का आश्रय नहीं है बस सेवा करते जा रहे हैं ठाकुर जी के विधि के हिसाब से और एक हो गया लोभ वशीभूत हो के आगे सेवा करना जी तो मुख्य जो संप्रदाय है उसमें सिद्ध जो प्रणाली है वो देते हैं फिर उनमें जो है मंजरी भाव की उपासना है परंतु जो गौ मठ है उसमें ये सब नहीं है अर्थात महाप्रभु ने जो हृदय दिया महाप्रभु एक चैतन्य चरितामृत की एक पंक्ति है अंतरंग भक्त शने करे रसास्सादन बहिरंग भक्त शने करे हरि नाम संकीर्तन जो महाप्रभु है जो बहिरंग भक्त हैं उनके साथ महाप्रभु केवल हरि नाम संकीर्तन ही करते हैं। अच्छा जो अंतरंग है उनके साथ रसस्वादन कर रहे हैं। जो बाहर बाहर से भक्त हैं उनके साथ केवल संकीर्तन हां और जो अंदर से भी भक्त हैं उनके साथ जो है हां मतलब अंतरंग हाई लेवल रस स्वादन

00:35:06:09 रस्सा स्वादन कर रहे हैं जी तो मुख्य जो महाप्रभु का भाव है कि जी श्री युगल सरकार की उपासना और श्री जी की राधा दास्य जिसको कहेंगे हम हम कहते हैं राधा दास्य श्री जी की दासी होना वो भाव लेकर के सेवा करना तो ये मूल गौरी संप्रदाय के ये सिद्धांत पे चलते हैं अच्छा और वहां पे विधि भक्ति लेकर के वो लोग चलते हैं। उसमें यह सब कोई नहीं नहीं ऐसा कुछ सुनने में आया था। गौडिया मठ नाम से एक अलग से संस्था बना ली गई है जो हां वो तो अलग मठ वो तो हमने बता ही दिया कि जो परंपरा जब उनका है नहीं एक्चुअली जो भक्ति सिद्धा इन्होंने मतलब अपना एक गौडिया मठ नाम से एक संस्था डाल दी जिसको कि हम अपने हिसाब से चला सकते हैं। चला सकते हैं। देखिए जो गौ मठ है ये भक्ति सिद्धा सरस्वती जी ने बनवाया। जी तो जो सरस्वती जी है उनका तो गुरु परंपरा ही क्लेम नहीं हो रहा है। जी उनका तो परंपरा ही नहीं है। जी वो तो खुद से ही उन्होंने बनवा लिया। खुद से उन्होंने जो है बनवाया। अब देखिए मजे की बात जो भक्ति सिद्धांत सरस्वती जी हैं। उनके जो दो मुख्य शिष्य थे पूरीदास और सुंदरानंद विद्या ये दोनों बाद में खुद असली संप्रदाय से दीक्षा ले लिए। हम जब भक्ति सिद्धांत जी प्राप्ति हो गए उससे पहले समस्त मठ का उत्तराधिकारी पूरीदास

00:36:21:20 जी को करके गए थे। बाद में पूरीदास जी को जब पता चला कि ये तो यहां पे परंपरा ही नहीं है क्योंकि वो बहुत बड़े विद्वान थे और सुंदरानंद विद्या विनोद जी वो भी गौ मठ के जितने सिद्धांत जी के शिष्य थे और सुंदरानंद विद्या विनोद जी इन्होंने भी ग मठ के लगभग सबसे अधिक ग्रंथ इन्होंने हरपुरदास जी ने छपाया और सुंदरानंद विद्या विनोद जी ने भी बाद में नित्यानंद परिवार से दीक्षा ले लिया वो भी उधर से इधर आ गए हां इधर से ये परंपरा नहीं थी परंपरा नहीं थे अच्छा किसी भी के कारण से आ गए अच्छा और आज तो बहुत लोग ऐसे आज आ जाते तो जो भक्ति सिद्धांत जी ने जो गौरी मठ बनवाया वो बाबा जी के विरोध में है। उनका यह कहना था कि जो कुटिया में भजन करते हैं निष्किंचन हो करके ये कपट है। वो कहते थे कि बाबा जी के संग नहीं करना चाहिए। बाबा जी स्त्री संघी होते हैं। बाबा जी यानी कि जो मूल परंपरा के जो सन्यासी हैं। अच्छा। उनको ये सब कहते थे। ये सब कह कर के उन्होंने अपना संप्रदाय बनवा लिया। मतलब अपना एक अलग तैयार कर लिया। जबकि बाबा जी के साथ नहीं रहना चाहिए। जबकि उनके गुरु खुद बाबा जी हैं। जब वो कहते कि मेरे गुरु जी हैं। तो उनके जो गुरु जी है वो खुद ही बाबा जी हैं। गोर किशोर बाबा जी है। तो जब कहते तो कहते कि दुनिया में दो ही बाबा जी शुद्ध थे और बाकी कोई शुद्ध नहीं था। तो जो

00:37:36:24 उनके साथ में है वो ठीक मतलब गौर किशोर बाबा जी जो है वो वो शुद्ध थे। वो शुद्ध थे क्योंकि बाकी उस समय में और कोई शुद्ध नहीं था। हम जबकि गोर किशोर दास बाबा जी सिद्धांतों के किसी पर भी कोई भी आक्षेप लगा देते हैं। हल आक्षेप लगा देते हैं। जी तो वो अलग उनका संस्था हो गए। वो मूल ग संप्रदाय से उसका कोई लेना देना नहीं है। एक संस्था है मठ नाम से और जो भक्ति सिद्धांत जी जब वृंदावन में आए थे तो जो जी जो हमारे जी जब भक्ति सिद्धांत से वृंदावन में आए थे जो श्री पंडित बाबा से जब मिले थे तो उस समय में पंडित बाबा ने उनको पूछा था कि तुम्हारा गुरु कौन है तो कहा कि गौर किशोर बाबा है तो बोला तुमने गौर किशन का तुमने तिलक कैसे परिवर्तन कर लिया कैसे लाल कपड़े कैसे दंड ले लिया हम तो उन्होंने बताया कि मैंने गुरु जी के फोटो रख के मैंने दीक्षा लिया तो उन्होंने वहां से भगा दिया उनको। बोला जाओ यहां से तुम। अरे ये बाकायदा प्रूफ है। मैं आपको किताब दूंगा जहां पे ये सब मेंशन है। अच्छा। और वो उस समय में उस समय में जो बाबा जी महाराज के सेवक थे उन्होंने खुद ये बताया घटना। ये प्रूफ भी आप हमें उपलब्ध करा दीजिएगा। बिल्कुल मैं आपको प्रूफ बना कि भक्ति सिद्धांत जी जब गए थे पंडित बाबा से। पंडित बाबा से मिलने तो उन्होंने पूछा कि तुम्हारे गुरु कौन है? तो उन्होंने बताया कि ऐसे हैं तो उन्होंने

00:38:51:27 कहा टीका तो उनका यह है। तो उन्होंने कहा टीका मैंने बदल लिया है और मैंने जो है सन्यास भी उनकी फोटो से कर लिया है। तो उनको वहां से भगा दिया था उन्होंने पंडित बाबा जी ने। तो ये भी एक जानने योग्य विषय है। अच्छा ये हमने काफी बात कर ली कि दीक्षा जो उनकी शास्त्रोक्त थी कि नहीं थी। अभी हम लोग एक तथ्य पर बात कर रहे हैं। एक सिद्धांत पर कि जैसे एक संप्रदाय से अनेकानेक लोग दीक्षित होते हैं। तो क्या वो सभी दीक्षित लोग कहीं पर भी जाके परंपरा की तरफ से कि उसका प्रमाणिक मैं वक्ता हूं और मैं व अधिकृत वक्ता हूं और मैं जो है आपको उस परंपरा के सिद्धांत बता रहा हूं। भले ही मेरे सिद्धांत वो जो मेरे से पीछे वाले लोग हैं उनके विरुद्ध हो। हम तो क्या यह किया जाना उचित है? मैं एग्जांपल के तौर पर समझा दूं। जैसे कि मैं अगर इस से दीक्षित हो जाता हूं और फिर जाकर के कहीं पर भी इस के नाम से शिक्षा प्रचारित प्रसारित करने लगूं कि मैं भैया इस से जुड़ा हुआ व्यक्ति हूं और इस की शिक्षाओं के विरुद्ध शिक्षा देने लगूं। और यह कहते हुए कि इस के बारे में मैं सही बात कर रहा हूं। तो क्या यह उचित है? क्योंकि यहां पर यही दिखाई दे रहा है। जैसे कि गौडिया वैष्णव संप्रदाय

00:40:07:03 से हैं हम मगर गौडिय वैष्णव संप्रदाय के विरुद्ध जाकर के गुरुओं के विरुद्ध जाकर के आचरण कर रहे हैं, शिक्षाएं दे रहे हैं। मगर स्वयं को कह रहे हैं कि हम उन्हीं के वो हैं। तो क्या ये जो सिद्धांत है कि कोई भी व्यक्ति कहीं पर दीक्षा वो सिद्धांत किसी परंपरा के अगर बताएगा तो वो तभी बता सकता है जब उसको उस परंपरा द्वारा नियुक्त किया गया हो। आचार्यों द्वारा है ना और वो बता सकता है मगर तब तक उसकी बातें मानी जाने लायक है जब तक उससे पूर्वाचार्यों के जो कथन है उनसे उसका मिलान हो रहा हो ना कि उसके विरुद्ध जाकर के वो चीजें बताई जा रही हो तो इसमें आप क्या कहते हैं? देखिए जैसे गोड़े संप्रदाय है। कोई भी संप्रदाय के तो जब संप्रदाय से दीक्षा लेते हैं तो संप्रदाय का केवल कह सकते हैं कि मैं गण संप्रदाय से हूं। इसमें यह सिद्धांत है। आप भी हरि नाम करो आपका कल्याण होगा। जी परंतु फिलॉसोफिकल जो सिद्धांत है। हम्म जो परंपरा से क्या आचार्य का सिद्धांत है वो वही बता सकता है जो गौ संप्रदाय के द्वारा आचार्य के द्वारा जो प्रतिनिधित्व रूप में उनका अधिकार दिया गया हो कि आप गुरु पद में जिनको बैठाया गया हो। बिलकुल, बिलकुल। जिनको अधिकृत किया गया हो शिष्य गुरु के द्वारा। जैसे इस क्कौन भी अभी ये कर रहा है कि वह चुन रहा है कि कौन गुरु शिष्य बना

00:41:22:07 सकता है कौन नहीं बना सकता। हां तो जब वो ये खुद त- तय कर रहा है कि हमारे यहां के गुरु कौन होंगे तो वो कैसे गौडिय वैष्णव संप्रदाय का गुरु खुद बन गया। वो भी विरोध गुरु विरोध करते हुए। हां वही तो देखिए कोई भी तो अपना संप्रदाय का ऐसा प्रचार नहीं कर सकता ना। तो वो प्रचार कर सकता है कि गड़े संप्रदाय का आप भी हरि नाम करो। हम भी संप्रदाय से आप जोड़ना चाहते हो। कोई प्रामाणिक आचार्य के पास नहीं जा सकते। प्रामाणिक आचार्य के पास आप लाओ। फिर आपको सिद्धांत देखिए, जो इसने अध्ययन नहीं किया, जो आचार्य के ग्रंथ नहीं पढ़े, उसको क्या पता कि संप्रदाय के क्या सिद्धांत हैं? अभी किसी जो भी प्रचार करने वाले हैं उनसे जाकर पूछ लो कि घोड़े संप्रदाय के प्रमाण क्या है? जी। कितने प्रमाण घोड़े संप्रदाय के आचार्य मानते हैं? जी कि भाई प्रत्यक्ष मानते हैं कि अनुमान मानते हैं कि उपमान मानते हैं कि अथा आपत्ति माने क्या मानते हैं? कितने प्रमाण घोड़े में शिकारे हैं? जी। साधारण लोगों को पता ही नहीं है कि कितने प्रमाण हैं। तो जब आपको खुद ही नहीं पता है ये सारे चीज तत्वों का ज्ञान नहीं है तो वो प्रचार नहीं कर सकते। कोई भी उत्पादक कोई आकर के जुड़ जाए। अभी देखिए जिनका दीक्षा नहीं हुआ। जिनको शास्त्र का ज्ञान नहीं है। वो आ कर के खुद कह रहा है कि मैं अभी प्रचार करूंगा। खुद में ज्ञान जबकि उनका कोई दीक्षा भी नहीं हुई है। क्लासेस चला रहे हैं। हां क्लासेस चला रहे। जब उनको खुद दीक्षा नहीं हुआ है। एक बिज़नेस मॉडल दे दिया है ना समाज में। बस बस बस बस जी। तो सीधी सी

00:42:37:13 बात है इसमें कि जो भी चल रहा है जब तक कोई भी प्रामाणिक आचार्य के द्वारा नियुक्त नहीं किया जाता अथवा संप्रदाय के द्वारा नियुक्त नहीं किया जाता है तब तक कोई भी इस प्रकार की बात नहीं कर सकता तो इसका अर्थ है कि गौडिया वैष्णव संप्रदाय के नाम से और प्रभुपाद जी द्वारा स्थापित ये जो संस्था है इसके द्वारा गौडिया वैष्णव संप्रदाय से विरुद्ध जो चीजें चीजें शिक्षाओं का प्रचार प्रसार करना यह सर्वदा कदाचित मतलब तो बिल्कुल सरासर ये गलत है अनुचित है। बिल्कुल अनुचित है। जी जी कोई भी हो चाहे जब तक गौडिया वैष्णव संप्रदाय का प्रामाणिक रूप से उसे संरक्षण प्राप्त नहीं है तो उसको गौडिया वैष्णव संप्रदाय का होते हुए स्वयं को प्रस्तुत करते हुए और गौडिया वैष्णव के नाम से शिक्षाएं प्रचार प्रसार नहीं करनी चाहिए। पर कोई भी मूल गुण्य संप्रदाय आज तक उनको स्वीकार नहीं किया। नहीं किया। नहीं किया। नहीं किया। आज तक नहीं स्वीकार नहीं। ये स्पष्ट बात है। यहां वहां दबे मुंह से प्रशंसा वो हां बहुत अलग अलग बात है जैसे एक होता है ना प्रशंसा पत्र दे दिया गया मगर प्रमाण पत्र आज तक किसी को नहीं प्रमाण पत्र देखिए जैसे कोई कोई मेरे पास आ जाता है आज कूद करके तो क्या मैं उसको मारने के लिए लडूंगा भाई मैं तो हम लोग सभी समद्रि है साधु है तो कोई भी हमारे साथ मिलने के लिए आएगा तो

00:43:52:14 हम कहेंगे ठीक है महाराज जी मेरे पास भी आते हैं बहुत सारे बहुत संप्रदाय के लोग आते हैं बहुत परंपरा के लोग आते हैं सब के हाथ हम जोड़ते भी हैं हम घर पर बैठाते भी हैं भजन भी कराते हैं कोई दिक्कत नहीं है परंतु जब सिद्धांत की बात आएंगे प्रामाणिकता की बात आएगा। लिखित में जब बातें होंगी तब वो शिकार ही होता है। यह अह जो गौडिय वैष्णव संप्रदाय है, यह अपना स्वयं को कितना मधवाचार्य जी से संबद्ध मानता है क्योंकि ये स्वयं को जब बात आती है हमारी परंपरा से आ रहा है तो ना तो गौरिया वैष्णव से संबंध है हम और ना ही मधवाचार्य से संबंध मगर वो रखता ऐसे है जैसे उनसे ज्यादा प्रमाणिक कोई है नहीं हम तो मधवाचार्य जी का गौ वैष्णव संप्रदाय में क्या महत्व है किस तरह से देखा जाता है वो थोड़ा स्पष्ट कर देखिए हमारे आचार्य ने जो माधवाचार्य है, रामानुचार्य, शधा स्वामी पाद है, इन सभी को वृद्ध वैष्णव की श्रेणी में रखा है। अच्छा कि ये भी वैष्णव है। जैसे आपके शंकर परंपरा में अलग-अलग से उसमें एक वैष्णव से भी है, सात्य भी है। सब समन्वय है ना उनका तो स्मार्थ होते हुए वैष्णव स्मार्थ होते हुए शैव स्मार्थ होते हुए सात तो ऐसे तो श्वास्वामी तो वैष्णव से आते हैं। उनको मानते हैं हमारे संप्रदाय के तो वृद्ध होते हुए वैष्णव हैं। तो जो वृद्ध

00:45:07:18 वैष्णव के श्रेणी में इनको रखते हैं। अच्छा तो जो माध्य संप्रदाय है उसी से जो हमारे माधवेंद्र पुरी हैं हम वहां से फिर मंत्र आए हैं। मंत्र आए हैं। मंत्र केवल गोपाल मंत्र अच्छा वो माध्य संप्रदाय में तो विवेचना नहीं है। नहीं तात्विक विवेचना नहीं है। मतलब वो जो उनका सिद्धांत था दैत्य हमारे से दैत्य नहीं है। द्वैतवाद नहीं है। नहीं है। हमारा अचिंत भिलाविद है। अचिंत हमारे स्वतंत्र मतलब ये सिद्धांत आपका स्वतंत्र है। सिद्धांत मधवाचार्य जी से नहीं है। कोई लेना देना नहीं है। केवल मंत्र केवल मंत्र संपर्क है। अपितु और दूसरा क्योंकि हमारे पास स्वतंत्र ब्रह्मसूत्र के भाष्य हैं। प्रस्थान के प्रस्थान के स्वतंत्र भाष्य हैं। अच्छा वो मधवास से नहीं आचार्य संप्रदाय से नहीं और उनके जो उपास्य हैं इत्यादि है जो भी सिद्धांत हैं हमारे पूजा पद्धति सब आचार्य ने भिन्न लिखी हुई है। उपासना पद्धति भी भिन्न है। लगभग केवल मंत्र ही अच्छा कई जगह पर मतलब ऐसा भी हो तात्विक विवेचना भी मधवाचार्य संप्रदाय का जो तात्विक विवेचना उससे इतर है। पीटर है क्योंकि अचिं्य भेदाभेदवाद है। क्योंकि उनका तो दैत्य है। हमारा तो अचिंत भेदाभेद है। उनका स्पष्ट दैत्य है। हमारा तो अचिंत्य भेदाभेद है। मतलब दैत्य भी है अद्वैत भी है। परंतु जो भेद है वो कैसा है? अचिंत है। अगम्य है क्योंकि तर्का प्रतिष्ठाना इत्यादि जो शास्त्र में कही गई है इसलिए वह

00:46:22:19 अचिंत नहीं है। कहा गया है। बिलकुल बिलकुल बाकी जो दैत्य है अदैत्य है। तो मतलब एक तरीके से कहना चाहिए कि वो लोग जो अपने आप को मधवाचार से संबंध बताते हैं कि हमारा ज्ञान विज्ञान दर्शन सब उनसे आ रहा है। तो ये कहना सरासर गलत है। गलत है। नहीं बिल्कुल गलत है। बिल्कुल अनुचित है। जी। अच्छा एक अब बात आती है जब हम इतनी देर से उनकी प्रामाणिकता की बात कर रहे हैं तो बात ये आती है कि भाई प्रामाणिकता हम क्यों चेक कर रहे हैं किसी की क्यों बात कर रहे हैं प्रामाणिकता पे तो जैसे अभी मुख्य रूप से जो अंतर आ रहे थे कि गुरु विरोध दिखाई दे रहा है इस में वो तो हमने देख ही लिया मगर अब जैसे कि समाज को दी जाने वाली कौन सी शिक्षाएं हैं जो प्रभावित कर रही हैं समाज को तो उसमें एक बहुत बड़ा घटक है वर्ण व्यवस्था हम तो इस का कहना है कि कोई भी व्यक्ति भले ही वो मलेच्छ क्यों ना हो। वो कोई भी व्यक्ति है अगर वह जो है भगवन नाम संकीर्तन करने लगेगा तो वह जो है ब्राह्मण हो जाएगा। फिर जो है उसकी ब्राह्मण के अनुसार दीक्षा हो जाएगी। अब वो वो वाले जो फैक्टर्स हैं मैंने कई बार अपने वीडियोस में इंटरव्यूज में पूछे भी हैं कि यदि कोई केवल नाम जप करने से ब्राह्मण हो जाएगा। उसकी ब्राह्मण के जैसी पदवी हो जाएगी। जो उसकी भक्ति यात्रा है वो तो एक बात अलग है। मगर वो समाज में ब्राह्मण

00:47:37:25 के रूप में ख्यापित हो जाए। उसका उपयोग विनियोग ब्राह्मण के तरीके से होने लगे तो कितनी बार उसको नाम जप करना होगा जिससे वो ब्राह्मण हो जाए है ना या फिर अगर इस तरह से कोई भी ब्राह्मण हो सकता है तो फिर ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र इत्यादि वर्ण की जरूरत क्या रही क्योंकि कोई भी कभी भी अपना बदल सकता है मैंने राम बोला मेरा वर्ण बदल गया क्षत्रिय हूं मैं और मुझे लड़ने से डर लग रहा है मैंने बोला राम बदल गया वर्ण अब मैं ब्राह्मण हो गया छोड़ दी मैंने लड़ाई तो इस तरह से तो कर्तव्य से भागना भी धर्म हो जाएगा। है ना? तो इन सब बातों के उत्तर मिलते नहीं है। और फिर ये भी पूछा जाता है कि आपने ब्राह्मण छोड़ के आज तक कितने अन्य वर्ण घोषित किए अपने यहां अगर आप कर्म से बना रहे हो। भाई आपने ब्राह्मण बनाया है। शूद्र किसी को बताया कि नहीं बताया? तुम जो है ब्राह्मण तुल्य नहीं हुए। ऐसा आपने किसी को कहा तो शूद्र लेने के बाहर जाते हो इस कौन के? तो ये सब बातों पे उनका उनकी तरफ से कोई संतुष्टिजनक जवाब नहीं मिला। तो इस बारे में वर्ण व्यवस्था को लेके जन्म कर्म की क्या कैसे व्याख्या है गौ वैष्णव संप्रदाय इसको लेकर के मैंने भी वीडियो बनवाई थी अपने जो गौ चैनल है क्योंकि बहुत लंबा विषय है इसमें सब कुछ बोलना संभव नहीं है तो आप उसमें भी हमारा

00:48:53:10 वक्तव्य है तो किसी को सुनना है तो वहां से सुन सकते लिंक दे दीजिएगा हम डिस्क्रिप्शन में तो उसमें थोड़ा सा मतलब स्पष्ट रूप से हमारा बता देते हैं कि हमारे जो गोस्वामी पाद ने वर्णाश्रम धर्म का कोई विरोध नहीं किया है जन्म से हां बिल्कुल उन्होंने अपितु ये कहा कि जीव गोस्वामी चाहे सनातन गोस्वामी बकायदा मैंने वीडियो में प्रमाण भी दिया कि जो दशम स्कंध के ऊपर जो टीका लिखी है आचार्य ने उन्होंने कहा कि जन्म से ही ब्राह्मण हो सकते हैं। कर्म से ब्राह्मण नहीं हो सकते। जी जहां पे सप्तम स्कंध में बात आता है कि जिस वर्ण के व्यक्ति में जिस प्रकार के गुण दिखा जाए उसी को उस वर्ण का मान लेना चाहिए। तो उस पर हमारे विष्णु चक्रवर्ती पद का कहना है जी। कि इसका तात्पर्य ये नहीं है कि किसी के अंदर ब्राह्मण के समदमादी गुण दिखने पर उसको ब्राह्मण ही मान लिया जाए। जी नहीं है उसको तुल्य आदर मिल सकता है आदर मिल सकता है जैसे कि मतलब उसके साथ व्यवहार वैसा होना चाहिए ना कि उसका उपयोग विनियोग जो है वेदों के वही बात है जैसे कि ये हमारे पिता तुल्य है जी जी जी पिता तो नहीं है ना महाराज इसकी मृत्यु पर हम श्रद्धा श्राद्धा आदि नहीं करेंगे जी जी तो इस प्रकार पिता तुल्य और पिता होना ये दोनों अलग बात है बिल्कुल तो वैष्णव और ब्राह्मण ये एक ही सिक्का के दो पहलू है भगवान के दोनों ही परम प्रिय है जी परंतु ये दोनों का अधिकार क्षेत्र अलग जैसे मेरा एक उदाहरण भी एक है। जैसे

00:50:08:24 एक स्त्री है उसका पति और ससुर। ठीक है? दोनों ही आदरणीय हैं। जी। पर दोनों के साथ उनका व्यवहार उनका अधिकार क्षेत्र अलग है। अलग है। अलग है। तो ये ब्राह्मण का अधिकार इसीलिए हमारे आचार्य ने तो सीधा कहा कि श्राद्ध आदि जो भी पुरहत कर्म आदि उसका अधिकार केवल ब्राह्मण को ही है। जो शास्त्र में दिया गया तो वो उनका वो कृत वही करेंगे। आप वैष्णव हो तो आपको कृष्ण पूजा में कोई भी विधि निषेध आपको नहीं मिलेगा। गाना भजन में इत्यादि में कोई बाधा है हम परंतु अगर आप वैष्णव नहीं है फिर आप क्या अलग बात हो जाएंगे तो वैष्णव हो गए तो आप सभी समान है परंतु वर्ण आपकी बदलेगा नहीं जी जी और जीव गोस्वामी पाद तक तो यहां पे इन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि इस जन्म में कोई भी ब्राह्मण नहीं हो सकता मतलब जो भी जन्म से होगा वही एक जगह बात आती है कि यदि कोई ऐसे कुल में उत्पन्न है जहां कुत्ते का मांस खाया गया खाया जाता हो उसकी जीवा पे भी यदि भगवान का नाम आ जाएगा तो वो मुक्ति के लिए तो वो है योग्य कि उसको मुक्ति तो मिलेगी भगवान के नाम के कारण मगर यदि उसकी इच्छा है कि मैं ब्राह्मण उचित कार्य करूं वेदोक्त कार्य करूं जो सिर्फ ब्राह्मण ही कर सकता है तो उसको अगला जन्म लेना पड़ेगा ब्राह्मण कुल में उसको जन्म

00:51:23:27 लेना पड़ेगा ब्राह्मण शरीर धारण करना पड़ेगा ये जीव ने स्पष्ट बोला जी देखिए कि जैसे समाधि याज्ञ है उस यज्ञ कि यह तो ब्राह्मण आदि होना अनिवार्य है। तो जिसका वर्ण जा जो जन्म ले रहा है पूर्व जन्म में उसका कोई भी अपराध या पाप के कारण ब्राह्मण कुल उसका जन्म नहीं हुआ है। अर्थात वो जो समाधि यज्ञ है वो करने का अनधिकृत है। उस पाप के कारण जिसके कारण से उसका जन्म ब्राह्मण इत जन में हुआ है। अभी हम ठीक है? तो इसलिए जो भी जन्म होगा अगर भगवान के भी नाम लेते हैं तो उसका कल्याण हो जाएगा। भगवत धाम में चला जाएगा। क्योंकि हमारा हां मोक्ष भी मिल जाएगा। भगवत धाम मिल जाएगा। तो सीधी सी बात है। मतलब यहां पे तो हमारे भक्तों तो मोक्ष नहीं चाहते। तो वो कहते हैं कि हम भगवान की सेवा करना दास आदि वही वही मोक्ष है बात है आपके उसमें गौ वैष्णव में थोड़ा सा अलग है जी तो इसमें स्पष्टता ये बात है कि जो भी है क्योंकि हमारा मुख्य उद्देश्य ब्राह्मण नहीं होना है क्या हम ब्राह्मण होने के लिए आए हैं जी जी अच्छा ब्राह्मण जो बनवा रहा है क्या वो ठेकेदार है ब्राह्मण बना है कि नहीं किसी को भी आप उठा के ब्राह्मण बना देते क्या अच्छा आप तो सबको ये दिखा रहा है कि हम ही एकमात्र

00:52:39:01 यज्ञ पूर्ण संगठन है जो ब्राह्मण बनाते हैं जी तो मेरा सवाल यही है भाई आप जो कृत्य कर रहे हैं तो क्या आपके ब्राह्मणत्व का विचार कौन करेगा? हम्म आपके भी तो विचार होना चाहिए क्योंकि आप भी तो विचार करके सबको बनवा रहे तो आपका विचार करेगा कौन? दूसरे लोग भी करेंगे ना। स्वयंभू हैं। हां आप तो स्वयंभू है तो हमारे आचार्य तो सीधा कहा कि उसके लिए दूसरी जन्म की आवश्यकता पड़ेगी अगर उसको करना है। तो जब भक्त है वो वैष्णव होना चाहता है। ब्राह्मण नहीं होना चाहता। उसको वैष्णव होना है। ब्राह्मण नहीं। हमारे महाप्रभु ने जब कहा

00:53:13:14 त्रिनादर्श तो त्रि से भी अपने आपको छोटा समझना है। बिलकुल जो हमारे आचार्य हैं आप सोचिए कि हमारे जो अह सनातन गोस्वामी उपाधि हरिदास ठाकुर है इन्होंने कभी जगन्नाथ मंदिर में प्रवेश नहीं किया। क्यों? कहते कि जवन हरिदास जो हरिदास जी हैं वो कहते हैं कि मैं जवन के घर में पाला बड़ा हूं। अन्न खाया हूं। इसलिए भाई ने वहां पर प्रवेश का अधिकार। ये लोग उसी के नाम से कहते देखिए चैतन्य महाप्रभु ने देखिए उनको जो है वो किया तो मैं उनसे पूछता हूं भाई वो अगर उन्होंने उनको शरण दी हरिदास ठाकुर जी को तो क्या उन्होंने गायत्री मंत्र दे दिया उन्होंने क्या जनेऊ दे दिया कोई कुछ नहीं दिया क्योंकि उन्होंने स्वयं ही अपने आप को ऐसा बना करके रखा कि नहीं मैं अंदर नहीं जाऊंगा ये सब चीजें हां देखिए उसमें जो सनातन गोस्वामी आदि उन्होंने तो स्पष्ट रूप से गाया नहीं क्योंकि वो त्रिणादपी आदि भाव है ना तो त्रणादिपि जब भाव है तो आप कैसे ब्राह्मण होंगे जी आपको तो उसमें प्रयोजन ही नहीं है आपका लक्ष्य ही नहीं है और बिरहद भागवतामृत में जो हमारे आचार्य पाद बताते हैं सनातन गोस्वामी जब गोप कुमार को सभी मुनि ऋषि आदि ने कहा कि तुम ब्राह्मण शरीर प्रदान कर देते हैं तुम यहीं पे रह के भजन किया करो अच्छा तो उन्होंने कहा कि नहीं चाहिए हमको नहीं चाहिए नहीं चाहिए मतलब शरीर देने की बात तब भी आई थी कि शरीर हम दे देते हैं हां शरीर भी देते हैं ब्राह्मण बना देते थे ब्राह्मण का शरीर शरीर दे देते

00:54:28:14 हैं तो कहा कि नहीं क्योंकि ब्राह्मण यज्ञ को ही धर्म मानते हैं और यज्ञ आदि कर्म को ही करते रहते हैं और इसलिए हमको भगवान की सेवा करना है मतलब साक्षात सेवा करना उनके अंदर भगवत वो जो भक्ति वाला पार्ट था वो हां वो मतलब मतलब थोड़ा मुझे लगता क्योंकि उसमें लग जाऊंगा तो मेरा वो नहीं होगा जो मुख्य जो श्री ठाकुर जी का दर्शन होंगे जिस मार्ग में जो प्रवृत्त हो जाता है वही मार्ग उसको सही लगता है क्योंकि यज्ञ भी धर्म है परंतु ईश्वर की साकार रूप का उपासना मधुर रस की उपासना वो मेरा छूट जाएगा इसलिए उन्होंने वो लेने के लिए मना ही कर दिया था तो बताइए जब आचार्य खुद उसको नहीं लेते हैं तो हम कैसे ले लेंगे? हम कैसे उसको ग्रहण कर लेंगे? तो स्पष्ट सा बात है सर। इसमें एक चीज़ मैंने जो निकाली मतलब समझ में आई है कि अह धर्म के अनुसार शास्त्रों के अनुसार भगवत प्राप्ति बताया गया है मनुष्य जीवन का लक्ष्य। कहीं भी यह नहीं आया है कि ब्राह्मण होना मनुष्य जीवन का लक्ष्य। अब यदि कोई व्यक्ति भगवत प्राप्ति से इतर वो कह रहा है कि नहीं नहीं मेरा जीवन का लक्ष्य तो ब्राह्मण बनना ही है। ब्राह्मण भाई भगवत प्राप्ति तो ब्राह्मण बने बिना भी हो रही है और यदि आप ब्राह्मण बनने के लिए भाग रहे हो ना कि भगवत प्राप्ति के लिए भाग रहे हो तो फिर यानी कि इतने अंश में आप शास्त्रों का विरोध कर

00:55:43:15 रहे हो जो ये कह रहा है कि भगवत प्राप्ति ही तुम्हारा लक्ष्य है। धर्म का लय ही उसी में सच्चिदानंद को प्राप्त करना। तो यदि आप ये कह रहे हो मेरे जीवन का लक्ष्य जो है वो नहीं है भगवत प्राप्ति बल्कि ब्राह्मण बनना मेरे जीवन का लक्ष्य है तो तुम फिर यहां गैर सनातनी अहिू सनातन विरोधी सब कुछ सनातन विरोधी देखिए आचार्य विरोधी है ना क्योंकि आचार्य ने तो इसको स्वीकार किया नहीं किया वो अपना स्वतंत्र सिद्धांत दे रहे हैं जी जी तो इस विषय में हमारा वो पूरा स्पष्ट भीड़ है सुनने से उनको समझ में आ जाएगा कि आचार्य ने स्पष्ट रूप से क्या कहा जी अच्छा इसमें अब आती है वर्ण व्यवस्था के बाद एक जो गौडिया वैष्णव संप्रदाय है उसमें जैसे ये जो भगवान के अन्य रूप हैं भगवान कृष्ण के इत अन्य रूप हैं जैसे राम या शिव जी या दुर्गा माता तो इनको क्या तात्विक भेद देखता है या रसगत भेद देखता है गौडिया वैष्णव संप्रदाय और जैसे एक बात आती है ना कि जो स्वमत की रक्षा होती है ना उसको रखने के लिए तो इसमें थोड़ा सा प्रकाश डाल दीजिए क्योंकि जो इस के द्वारा बहुत ही आपत्तिजनक तरीके से निंदा की जाती है शिव जी की दुर्गा माता की

00:56:58:19 आपने अगर उनकी भगवत गीता पढ़ी हो तो उसमें लिखा हुआ है कि जो शिव जी हैं वो इंद्रियों के अधीन है और जो है माता पार्वती ने जब उन्हें भोग के लिए उकसाया तो वो सहमत हो गए। तो इस तरीके से मतलब थोड़ा निंदित स्वर सुनाई देता है। तो इसमें आप किस तरह से देखेंगे? देखिए गौ संप्रदाय के इष्ट जो है श्री युगल सरकारी है राधाकृष्ण। अच्छा और जो समस्त विभवती हैं जो माता शक्ति है स्त्री स्वरूप शक्ति वो श्री किशोरी जी से है। ये हमारा परम सिद्धांत है। जी। मतलब श्री जी टॉप है। बाकी सब उनके अंश ही है। विस्तार है। उनके ही विस्तार है। श्री ठाकुर जी है कृष्ण और विष्णु आदि सब उन्हीं के ही विस्तार हैं। उसमें कोई हमारी भेद नहीं है। हम जो शिव आदि हैं उनके साथ भी भेद नहीं है। रसगत भेद है। रसगत भेद है। रसगतिक भेद नहीं है। तात्विक भेद नहीं है। जी। हमारे आचार्य ने स्पष्ट कहा जो शिव चतुर्दशी जब हम व्रत मनाते हैं सदा शिव क्योंकि शिव रहस्य आदि ग्रंथ में भी सदाशिव को ही परम तत्व माना गया सदा शिव की ही विस्तार तो शिवा आदि है जो क्योंकि हमारे यहां पे सिद्धांत ये आता है कि जैसे ब्रह्मा जी कोई भी जीव

00:58:13:27 फिर ब्रह्मा भी हो जाता है कई बार तो ऐसे कई कल्प में भी कई बार जो साधारण जीव है उसको भी शिव उपाधि दिया जाता है तब भगवान सदाशिव हो के विराजमान होते हैं और साधारण जो जीव है उसको उपाधि मात्र प्राप्त हो जाता है। कई बार उत्साह भी होता है ना शिव तो वो उपाधि से बनता है। हां हां अच्छा तो ये तो सदा शिव जो होते हैं वो ये जितने भी भगवान के अंश आदि है सब समान है। जो नारायण है विष्णु है सब समान समान है। केवल रसगत भेद है। शिव जी और कृष्ण में भी रसगत भेद है। रसगत भेद तात्विक भेद तो नहीं है। तात्विक भेद नहीं है। अच्छा मतलब जो सदाशिव हैं उनके साथ समान ही है। अच्छा महाविष्णु के अवतार ही बताते हैं। सदा शिव आदि एक ही है। केवल रसगत भेद है। मतलब श्री जुगल सर का लीला विलास कर रहे हैं। तो इस के द्वारा जो यह किया जाता है कि नहीं तात्विक भेद है इनमें तो ये तो फिर वो तो उनका अपना अलग भाव है। उनका भ्रामिक आईडियोलॉजी डालने के लिए कि एक ही स्वरूप तक सीमित हो जाए। ना वह तो अपना वो तो मैं क्या बोलूं कोई रोज किसी को दाल खिलाया जाए तो वो कहेंगे कि दाल ही सबसे परम पवित्र श्रेष्ठ है वो तो अपनी बात है देखिए भगवान हमारे यहां पे तो अनंत गुणधारी जी तो अनंत गुण के अनंत उनके लीला है अनेक स्वरूप में भगवान आविभूत होते हैं देखिए मैं तो मानता हूं एकम

00:59:29:06 सत विपरा बहुदा वदती सत एक ही है विप्र उसको बहुत प्रकार से बोलते हैं तो हमारे यहां पे जो नारायण आदि है भगवान शिवा आदि है उसके साथ में रसगत भेद है परम परम तत्व हम श्री कृष्ण को ही मानते हैं। बाकी सब उन्हीं के ही विस्तार है। उन्हीं का ही विस्तार। उन्हीं का ही विस्तार है। अच्छा अब एक बात आती है कि सब कुछ हो जाने के बाद इस के द्वारा एक प्रचार किया जाता है कि बाइबल के द्वारा प्रतिपादित होने वाला जो क्राइस्ट यहोवा जीसस क्राइस्ट नहीं। ये बात और पकड़ लेते हैं लोग कि हम जब क्राइस्ट कहते हैं कहते हैं नहीं जीसस क्राइस्ट और तुम कैसे कह रहे हो? तो क्राइस्ट की बात कर रहे हैं यहोवा की बात कि बाइबल का जो ईश्वर है और कुरान का जो ईश्वर है उस ईश्वर के साथ इस कहता है कि कृष्ण और वो जो कुरान का ईश्वर है बाइबल का ईश्वर है ये तीनों एक समान है। तो इस बारे में गॉड या वैष्णव संप्रदाय का क्या मत है? जो ऐसा मानते हैं वो नितांत वज्रमूर्त है। अच्छा ठीक है जो भी अल्लाह को या क्राइस्ट को या दूसरे यहोवा आदि जो भी है जी कृष्ण के साथ तुल्य करना इतने मूर्ख लोग हैं जो तुम शिवादि के साथ जब तुलना करने में तुम्हारा तुम निंदा कर देते हो जैसे कि हमारे भक्ति रक्षा में सिंधु में भक्ति

01:00:44:14 के 64 अंग में स्पष्ट लिखा हुआ है कि देवता की निंदा करना अपराध है कोई भी देवता का स्पष्ट चाहे कोई भी हो अगर कोई देवता का अपराध करते हैं तो ये अपराध देवता आपसे श्रेष्ठ है। आपको उनको प्रणाम करना पड़ेगा। आकाशात्मितोपयं गच्छति सागरम सर्वदेव नमस्कार केशव प्रतिगच्छति सभी भगवान की विभूति हैं। तो आप देवता की निंदा नहीं कर सकते। स्पष्ट बात है। तो जब हमारे हिंदू और सनातन शास्त्र में कोई योवा ये क्राइस्ट अल्लाह इसकी कोई जिक्र है। कहीं पे नहीं। ना कि हमारे कोई आचार्य ने इस प्रकार की वही बात कहा है। अपितु हमारे आचार्य ने तो स्पष्ट कहा कि जो वेद विरुद्ध मत हैं वो ग्रहणीय कदापि नहीं है। तो ये जो मत है वो सब वेद विरुद्ध है। तो वो तो कभी हो ही नहीं सकता। और हमारे जो आचार्य ने जितने भी अवतार के लिए शास्त्र लिखे लघु भगवतामृत में अवतार के लिए जितने भी अवतार हुए उस विषय में लिखे तो वहां पे उन्होंने कभी भी इस प्रकार की कोई बात ही नहीं कहा कि मोहम्मद जो है सावेश अवतार है तो इनके प्रोपोगेंडा खुद के बनाए हुए हैं। अच्छा ये कोई अवतार अवतार नहीं है। सावेश अवतार और ये ये सब मूर्ख की बात है। ये कोई आचार्य नहीं है। ये उनके मैसेंजर थे। ना और ये उनके पुत्र मैसेज सन

01:01:59:20 ऑफ गॉड कुछ नहीं है सब सब झूठा है जीसस क्राइस्ट के सब मूर्खता है कुछ नहीं अच्छा इसमें देखिए मैं ये तो हम लोगों को मालूम ही है कि वो जो है वेद विरुद्ध आईडियोलॉजीस है उसका कारण क्या है बता दूं मैं थोड़ा सा उसका कारण है कि जब पाश्चात्य देश में प्रचार करना है तो क्राइस्ट को थोड़ा सा मान लेंगे तो वहां के लोग थोड़ा सा प्रेम करने लगेंगे तो प्रचार के करना है इनको तो इसलिए उनको लपेटे में लेना है तो इसलिए ये सब झूठमठ फैला करके उनको झूठी है वो और दूसरी दूसरी बात ये है कि अगर ऐसा करना भी है तो फिर जब अपने शिव के देश में जब प्रचार करना है तब क्यों नहीं सोच रहे हो कि शिव को शिव के लोगों को लपेटने के लिए भी यही किया जाए। नहीं करेंगे तब नहीं करेंगे शिव के लोगों से डर नहीं लगता है। हां डर नहीं लगता। अच्छा इस विषय में कई बार ये जो इस के लोग हैं मुझसे कुतर्क कर चुके हैं कि भाई कुरान और बाइबल पूरी तरीके से वेदों से भिन्न थोड़ी ना है। वो कुछ-कुछ पार्ट है जो वेदों से भिन्न है। तो थोड़े-थोड़े से पार्ट भिन्न होने के चक्कर में हम ये थोड़ी ना कह सकते कि वो वेद विरुद्ध हैं। तो पहली बात तो ये है कि इन किताबों ने स्वयं ही ऐसे सिद्धांत दे दिए हैं जो कि वेदों से किसी भी प्रकार से सामंजस्यता बिठाने से मना कर देते हैं। जैसे कि ये किताबें स्वयं ये कह रही है। कुरान ये कह रही है कि मैं उतरी हूं सबका

01:03:14:26 सत्यापन करने के लिए। मेरा सत्या मैं सबका सत्यापन करूंगी। तो वेद का सत्यापन कौन करेगा? कुरान। तो यदि वेद के साथ आपको कुरान की सामंजस्यता बिठानी है तो कुरान की वो लाइन आपको मिटानी पड़ेगी कि वो सबका सत्यापन करेगी। अब जब आप उस लाइन को मिटा दोगे तो क्या वो वही कुरान होगी जो आज वो कुरान है? नहीं होगी। वो उसको आपको दूसरा नाम देना पड़ेगा कि बदली हुई कुरान, आयत मिटाई गई कुरान। यही तो नाम देना पड़ेगा। अगर मान लीजिए कोई एक बुक है उसमें कई सारे पेजेस हैं और उसमें से एक पेज हम नहीं ले रहे हैं। फाड़ रहे हैं। तो अब वो बुक वो बुक नहीं है जो थी। अब वो बुक फाड़ी हुई फटी हुई बुक है। है ना? तो पहली बात तो ये आ गई। दूसरी बात ये आती है कि अगर थोड़े से अंश के कारण दो चीजों में हम एक मान लेते हैं तो फिर थोड़े से थोड़ा सा थोड़े से गुण तो जीव में भी ब्रह्म के हैं फिर आप क्यों उसके पीछे भागते हो। है ना मनुष्य में भी भगवान के कुछ गुण हैं तो आप मनुष्य और भगवान को एक क्यों नहीं मान लेते हो? फिर शंकराचार्य को मायावादी क्यों कहने लगते हो? तो एक वो वाली बात एक आ जाती है कि आप विरोध क्यों प्रकट करते हो। जब आप दो चीजों में जरा से भी गुण मिल जाएंगे तो आप एक मान लोगे। तो ये उनकी अह एक मूर्खतापूर्ण कुतर्क रहता है कि वेद विरोधी आईडियोलॉजीस

01:04:29:27 को और वेद सम्मत सिद्ध करते हैं और वहीं पर शिव पुराण इत्यादि के द्वारा ख्यापित होने वाले जो भगवान हैं, उनकी निंदा कर देते हैं। तो यह जो इनका कांसेप्ट है कि थोड़ा बहुत उसमें क्योंकि आंशिक समानता है कुरान और बाइबल में इसलिए कुरान और बाइबल को वेद के समान और कुरान के ईश्वर और बाइबल के ईश्वर को कृष्ण के समान कहना उचित है तो इसको आप कैसे देखते हैं? देखिए सीधी-सीधी इसमें तो स्पष्ट बात है। जब जो भी श्रीमद् भागवत महापुराण को हम परम प्रमाण मानते हैं। जी गौर्य संप्रदाय में श्रीमद् भागवत महापुराण को मुख्य रूप से कहा गया है। अच्छा तो श्रीमद् भागवत महापुराण में क्या कहा कि जो वेद में प्रतिपादन किया गया वो धर्म है और जो वेद वृद्ध है अधर्म है जी जो वेद प्रतिपादन करते हैं जो वेद में मान्यता है वो धर्म है जो वेद वृद्ध है वो अधर्म है अधर्म है चाहे वो थोड़ा अंश हो चाहे ज्यादा अंश हो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता है इसीलिए हमारे आचार्य ने जो बौद्ध के द्वारा प्रचारित किया गया है भगवान बुद्ध के द्वारा भी उन्होंने कहा कि हम अवतार मानते मानते हैं परंतु उन्होंने वेद विरुद्ध का प्रचार किया इसलिए हम उनका नहीं मानते हैं। हमारा स्पष्ट यहां पे अभिमत है। चाहे कोई भी व्यक्ति हो वेद

01:05:45:03 के विरुद्ध जाएगा तो हम उसका नहीं मानते। चाहे वो आंशिक रूप में हो चाहे वो पूर्ण रूप अभी इतना सा भी वो विरोध हो गया तो विरोधी हो गया ना। विरोध हो गया हम नहीं मानते। और दूसरी बात जो मैं कहूंगा जो भी ये क्राइस्ट को अथवा जो कुरान के जो ईश्वर है जो अल्लाह है इनको जो मानते हैं और मोहम्मद को जो मानते हैं जी इनके जैसा कोई वज्र मूर्ख नहीं हो सकता। मैं क्यों बोल रहा हूं थोड़ा सा जो अभी आप जो भी लोग इस विषय पे चर्चा करते क्योंकि थोड़ा बहुत हमने भी तो अध्ययन किया अध्ययन के साथ में थोड़ा बहुत सुना भी है। जी तो जो ये कुराण में जो कहा जा रहा है जो चीजें बताई गई हैं किसी भी प्रकार से वो ग्रहणीय होता ही नहीं है। जो सिस्टम जो कल्चर वहां पे है बहुत भिन्न है। वो वेद से बिल्कुल नहीं कहूंगा वो घृणित है। उसका कदापि ग्रहण नहीं हो सकता। मतलब व्यभचार परिपूर्ण है। जी जी ठीक है? तो ये जो व्यभचार है क्योंकि ये लोग व्यभिचार को ही धर्म मानते हैं। जहां व्यतिक्रम होंगे व्यभचार होंगे इसी को ये धर्म मान के बैठ जाते हैं। जी तो इस विषय में तो स्पष्ट मत है। इसको कोई प्रमाण हम लोग नहीं मानते हैं। जी इसमें एक ये भी है कि जैसे हमने कहा कि भाई वो अल्लाह है या कुरान है तो उसकी कुछ चीजें

01:07:00:09 मैच करती हैं इसलिए हमने कह दिया कि वो पूरी तरीके से विरोधी थोड़ी ना कह सकते हैं। मगर बात ये है कि कुछ चीजें जो मैच करती हैं वो कुरान नहीं है। कुछ चीजें जो मैच करती हैं केवल वो अल्लाह नहीं है। कुरान और अल्लाह वो है जो उसके साथ-साथ बहुत सारी चीजों को मिला के एक बुक बनी जिसका नाम कुरान है। कुरान कोई एक लाइन नहीं है। कुरान कोई एक पेज नहीं है। बहुत सारी चीजें हैं। बहुत सारे इसमें सिद्धांत हैं। जिनको मिला करके एक नाम दिया गया कुरान। इसी तरीके से बहुत सारे लाइंस हैं बहुत सारे सिद्धांत हैं जिनके द्वारा पूजित होने वाला जो एक ईश्वर है वो उनका है काल्पनिक है जो भी है मगर उसका नाम है अल्लाह ठीक है तो जब हम कहते हैं कि उस एक लाइन की वजह से हम उसको मैच करा लें कि वो एक लाइन मिल तो रही है तो इसलिए वो विरोधी नहीं है वो तो हमारे साथ के ही हो गए तो ऐसा हम नहीं कर सकते क्योंकि उस एक वो एक लाइन कुरान नहीं है उस एक लाइन के द्वारा केवल अल्लाह नहीं बन जाता है अल्लाह बनता है पूरी कुरान के द्वारा और कुरान बनती है बहुत सारी आयतों के द्वारा कुछ एक आयतों के कारण हम कुरान को वेद सम्मत या अल्लाह को कृष्ण के समान नहीं कह सकते। नहीं कह सकते है ना सीधी स्पष्ट बात जी अब इसमें एक बात आती है कि जिस प्रकार से जीबीसी नाम का जो संगठन है वो इस का संचालन कर रहा है एक

01:08:15:18 लाइक ए बिजनेस मॉडल तो इसको आप किस तरह से देखते हैं? देखिए पहली बात तो हमने जो परंपरा तो स्पष्ट खंडित है जी और जो जीबीसी के द्वारा जो किया जा रहा है अब देखिए कि हमारे जो मायापुर इन्होंने बनाया जो मायापुर है आज इस कॉल के सबसे बड़ा बंगाल में जी मायापुर ही अप्रामाणिक है जी ठीक है जो मायापुर मायापुर अप्रामाणिक क्या बात कर रहे हैं जो असली मायापुर है वो प्राचीन नवदवी है इन्होंने जो अभी मायापुर बनाया जो ममपेल बनवाया ये जो केदार केदारनाथ भक्ति विनोद की और भक्ति सिद्धांत के द्वारा बनाई गई है। और जो अपने आचार्य हैं जो अपने पूर्वाचार्य हैं गौ वैष्णव हां मूल परंपरा के वो उसको नहीं मानते हम लोग मायापुर को नहीं मानते वो उनके द्वारा डुप्लीकेट बनाई गई है। अच्छा हां वो डुप्लीट और वास्तविक मायापुर कहां वास्तविक गंगा जी के उस पार में है। वो असली नवद्वीप है। असली नवद्वीप जो है जहां ये माया ये मायापुर का टेंपल बना हुआ है। वो नकली है वो। अच्छा वो मियापुर था। ओ उसका नाम था पहले मियापुर। उसी को मायापुर बनवाया मायापुर कहा बनवाया गया है अच्छा और क्योंकि असली नवद्वीप में उनको स्थान ही नहीं मिला जगह ही नहीं दिया क्योंकि मूल परंपरा के उस समय में प्रामाणिक थे इसलिए उनको मौका ही नहीं मिला वहां जाने का

01:09:30:19 किसी ने स्थान ही नहीं दिया उनको फिर उन्होंने अपना पैसा आदि खर्च करके उधर बनवाए देखिए और भी है जहांजहां हमारे मूल संप्रदाय के मठ मंदिर होते हैं वहां वहां पर करके वह जाते हैं जाकर के आसपास में ही थोड़ी देर दूर में जाकर के जमीन खरीद लेते हैं खरीद करके वहां पे अपना मंदिर खड़ा करते हैं और सेम उसी के नाम पे वो बनवाते हैं और लोगों में यह प्रचार करते हैं कि यह असली है वह डुप्लीकेट है। तो ऐसा ऐसा एक्चुअली क्या है कि धीरे-धीरे लोगों में फिर वहां पे आने जाने के कारण लोग उसी को ही प्रमाण मानते हैं कि यही असली है वो डुप्लीकेट है। अभी जैसे हमारे नित्यानंद महाप्रभु के जो जन्म स्थान है वहां पे एक चक्र धाम वहां पे भी इन्होंने मंदिर बनाया और भक्तों में यह प्रचार किया कि ये असली स्थान है नित्यानंद प्रभु का जन्म स्थान। जबकि सालों से पुराना स्थान पहले से ही है। जैसे बंगाल में जहां पर नरोत्तम दास ठाकुर ने भी प्रचार किया खेतोरी धाम उनका स्थान और वहां पे मेन मंदिर के थोड़े से दूर में इन्होंने एक मंदिर बनाया और उसी को कहते असली यही स्थान है और वो डुप्लीकेट है। तो जहां-जहां असली स्थान है उसके आसपास में बगल में मंदिर बनवाना और फिर उसी को ही असली मंदिर कह कर के ख्यापित करना ये इनकी स्थिति है। और ये बाबा जी और मूल संप्रदाय से मिलने नहीं देते। इनके कोई किताब नहीं पढ़ने

01:10:45:27 देते। कहते ये सहजिया है। ये असली परंपरा नहीं। इनकी किताब मत पढ़ना। इनसे जाके मिलना मत। इनके साथ कोई संबंध मत रखना। इनके जाके दर्शन नहीं करना। इसके मंदिर पे मत जाना। क्यों? क्यों बोलते हैं? इसका कारण है क्योंकि मूल संप्रदाय के साथ जाएंगे। उनके साथ बैठेंगे। उनके साथ चर्चा होगी तो फिर लोगों को सच पता चल जाएगा। सच पता ना चल जाए। इसलिए ये लोग कभी उनसे मिलने भी नहीं देते। तो ये जो संस्था चल रही है ये तो पूरा बिजनेस मॉडल है और कुछ नहीं है। क्योंकि जो जो इतने लोग हरि नाम ये करवा रहे हैं मैं इतना ही मानता हूं कि गौर्य संप्रदाय के सहारा लेकर के इन्होंने नाम का प्रचार किया। नाम तो इन्होंने प्रचार किया परंतु नाम के विकृति भी किया और साथ-साथ में धर्म का हानि भी किया। वेदाद शास्त्रों का आचार्यों का इन्होंने विरोध भी किया। तो केवल नाम प्रचार इतनी ही ग्रहण है कि इन्होंने नाम का बड़ा प्रचार कर दिया। भगन नाम का इतना ठीक है। परंतु बाकी जो कृति है इनकी वो कभी भी धर्मीय आचारण से युक्त नहीं है ना मूल संप्रदाय के साथ युक्त युक्त है। तो पूरा के पूरा एक बिजनेस मॉडल खड़ा हो गया है। मतलब ये जो जीबीसी के द्वारा इस तरह से बिजनेस के तरीके से जो संचालित किया जा रहा है और अगर उनको गढ़ संप्रदाय है तो गढ़ संप्रदाय के जो आचार्य के ग्रंथ है क्यों वो पब्लिश

01:12:00:28 पब्लिश नहीं करते हैं? क्यों आचार्य के लेख को इन्होंने परिवर्तन कर दिया? भागवत जी की टीका तक जिन्होंने परिवर्तन करने देखिए मुझे देखिए मैं अपना बताऊं तो मुझे ऐसा इसमें कई बार दिखाई दे रहा है कि इसमें क्रिश्चियनिटी को डाल रहे हैं ज्वस फिलॉसफी को डाल रहे हैं इस्लामिक फिलॉसोफी को डाल रहे हैं जिस कारण से उन्हें अपने नए ग्रंथ चाहिए भले ही वो अपने को कहे हम गौडिय हां बिल्कुल सही बात है अच्छा इसमें एक ये बात और देखने को मिलती है कि जीबीसी संचालित कर रही है जीबीसी नियुक्त कर रही है मगर एट दी एंड हो क्या रहा है कहीं पर सुनाई दे रहा है कि जो समलैंगिक विवाह हो रहा है जर्मनी इत्यादि में ऐसा सुनाई दिया। अभी पटना में इनके मंदिर में ऐसा था कि वो जो एक अध्यक्ष था काफी वर्षों से था और काफी वर्षों के पूर्व का उसका नग्न वीडियो आया सामने और इस तरह की कई चीजें सामने आई कि भाई उसको बचाने के लिए एक वो गुटबाजी थी अंदर कि कौन तो मतलब ये अप्रामाणिक रूप से तो कर ही रहे हैं कार्य। बिजनेस के तरीके से कर भी रहे हैं। इनपुट जब हमें दिखाई दे रहा है कि अप्रामाणिक है, गलत है, अनुचित है। आउटपुट भी कहीं ना कहीं अप्रतल गलत ही आ रहा है। अनुचित के द्वारा उचित तो आएगा ही नहीं निकल के। तो वो चीजें भी हमें जैसे दिखाई दे रही है तो इस बारे में आप क्या कहेंगे? देखिए जब कोई भी संस्था अधर्म

01:13:16:12 से आरंभ होगा तो धर्म वहां से निकलेगा नहीं। जी। तो जहां से परंपरा यहां पे खंडित है। जी जी। क्योंकि परंपरागत जो सिद्धांत है वो उनको मिला ही नहीं है। तो कोसों दूर है। इसीलिए जो देखिए आज हरि नाम ये कर रहा है तो आजकल रैप सॉन्ग करते हैं। हरि नाम नहीं करते रैप में करते हैं। पाश्चात्य स्टाइल में करते हैं। उल्टा सीधा कपड़ा पहन करके भगवान के सामने नृत्य कर रहा है। तो ये जितने सारी चीजें हैं ये बिल्कुल शास्त्र के विरोधी हैं। और जो भी इनके द्वारा किया जाता है। ये गौशास्त्र और वेदादि शास्त्र के विरुद्धचरण है। ये जो वृद्धाचरण में कर रहे हैं वो अपने हिसाब से मनमर्जी से कर रहे हैं। और ये सब करने के कारण लोगों में एक ये भी फैल जाता है कि शायद गोय्य संप्रदाय ही वेद विरुद्ध है। जी जी बहुत हानि हो रही है। ये मूल्य देखिए मूल गयी संप्रदाय के जो आचार्य हैं वो बहुत ही विरक्त और निष्ठा पूर्वक भजन करते एकांत हो के। प्रचार में उनका उतना उत्सुकता नहीं है। शिष्य करने में नहीं है। क्योंकि हमारे आचार्य ने कहा कि बहु शिष्य नहीं करना है। अधिक शिष्य नहीं करना है। तो जिसके कारण से अधिक शिष्य लोग कोई करना ही नहीं चाहते हैं। जैसे रूप सनातन है। रूप गोस्वामी के एक ही शिष्य जीव गोस्वामी पाद। जीव गोस्वामी बाद के भी दो चार ही शिष्य हैं। तो बड़े-बड़े जो आचार्य हुए वो ज्यादा

01:14:31:15 शिष्य नहीं किए हुए हैं। तो आज जो इनके माध्यम से ही गीय संप्रदाय की जो बहुत प्रचार हुआ तो लोगों को लगता है कि गड़ीय मठ और इस ही गौ संप्रदाय है। प्रबुद्ध जनों में गौडीय वैष्णव की छवि भी कहीं ना कहीं संप्रदाय जो है वो छवि बिगड़ी भी है। छवि बिगड़ी हुई है उन्हीं के कारण क्योंकि लोग कई बार आक्षेप करते हैं। क्योंकि जो जब कोई व्यक्ति कोई भी संप्रदाय प्रामाणिक जब वो इस्कॉन या गढ़वा की खंडन करने जाता है तो उस समय में गोरीय संप्रदाय का भी खंडन कर देते हैं। कई बार मतलब आक्षेप भी कर देते हैं। मैं मैं अपने ही बताऊं कि कई बार इस से बात कर के लोगों से बात करते समय ऐसा हुआ है कि कुछ ऐसे तात्विक बातें हुई है जहां पर भाई अब वह इस तरह से प्रस्तुत कर रहे हैं सनातन धर्म को तो उनको रोकने के लिए हर तरह का सिद्धांत वहां रखना पड़ता है। कुछ लोग ऐसे भी हमको मिले मैं नाम नहीं लूंगा मगर जिन्होंने क्योंकि वो इस से बहुत ज्यादा रुष्ट थे तो उन्होंने कहीं ना कहीं इस को उत्तर देते हुए कहीं ना कहीं कुछ ऐसी चीजों को भी छेड़ा जिसमें कि कुछ जिज्ञासाएं बनाई जैसे कि कुछ लोगों ने ये कहा कि जो चैतन्य चरितामृत है वो एक प्रमाणिक ग्रंथ नहीं है। तो बात तो ठीक है कि इस ऐसा कर रहा है तो वही सामने वाले लोग क्योंकि इस्कॉन के द्वारा उन्होंने यह भी बताया कि स्कॉन के द्वारा क्या-क्या कुप्रचार

01:15:46:24 किया गया उनके लिए मगर फिर भी इस इस चीज पर चेतन चरतामृत पर और मतलब जो लोगों का रुष्ट होना है इस तरह से और प्रत्यक्ष रूप से गौड़िया वैष्णव संप्रदाय का कहीं ना कहीं विरोध हो जाना है तो इसमें आप कैसे रखेंगे क्या कहेंगे देखिए कि जो भी लोग चैतन्य चरितामृत के ऊपर आक्षेप करते हैं या अपने संप्रदाय के ऊपर आक्षेप होता है देखिए संप्रदाय में तो खंडन वंडन कुछ ना कुछ स्वमत प्रतिष्ठित के लिए चलते रहता है। उसमें अलग बात है। जैसे तुलसीदास जी ने रामचरितमानस लिखा वो परम प्रमाणिक ग्रंथ है। और गौ संप्रदाय में श्री जो हमारे कृष्णा कविराज गोस्वामी के द्वारा लिखा गया जो ये श्री चैतन्य चरितामृत है वो भी हमारे लिए उतना ही प्रमाणिक है। अच्छा जितना तुलसीदास जी के लिए रामचरितमानस है। अच्छा तुलसीदास जी को ये लोग प्योर वैष्णव नहीं मानते। मानते हैं कौन वाले? हम लोग बिलकुल ब्रह्म वैष्णव मानते हैं उनको तो यह क्या यह भी परंपरा विरोधी है इस परंपरा विरोधी है देखिए जो जिन गोस्वामी के पास पिताजी एक धनबाद के अभी श्रीमान जी हैं उन्होंने कहा कि जो वो तुलसीदास जी का ग्रंथ है उनके दो ही तीन कांड प्राप्त है बाकी के प्राप्त नहीं है तो हम उन्हें प्रमाण ये तो बिल्कुल सरासर झूठ है देखिए जो जीव गोस्वामी पाद के पिताजी थे वल्लभ अनुपम भी कहते हैं उनका नाम तो रूप सनातन के जो भ्राता है तो वो तो श्री राम जी

01:17:01:25 के भक्त थे ऐसा है कि रूप सनातन में उनको कहा कि तुम राम नाम छोड़ के कृष्ण कृष्ण जप करो। हम तीनों भाई मिलकर के राधा कृष्ण की भजन करते हैं। अब क्या हुआ? तो गोस्वामी पाद के जो पिताजी उन्होंने कुछ दिन प्रयास किया। बाद में रोने लगे। कष्ट होने लगे। बोले कि हम अपने इष्ट को छोड़ नहीं सकते। तो फिर सनातन गोस्वामी पाद ने उन्होंने उनको कहा कि भाई हम तो तुम्हारा परीक्षा ले रहे थे कि तुम्हारा इष्ट में कितना निष्ठा है, कितना प्रेम है। तो जब तुम्हारा राम में प्रेम है, तुम राम जी का भजन करो। कोई आपत्ति नहीं है। अब देखती है जो हमारे षड गोस्वामी के प्रधान गोस्वामी हैं वो खुद कह रहे हैं कि तुम राम जी को तुम्हारा प्रिय है तो राम जी का भजन करो और ये कहते वो परम वैष्णव नहीं है। ये तो वज्रमर को कोई होगा तो बोल सकते हैं। तुलसीदास जी हां तो इसीलिए उसी प्रकार जो चैतन्य चरितामृत है वो परम प्रमाणिक ग्रंथ है। पर हमारे जो विश्वनाथ चक्रवर्ती पाद है। कई लोग कहते हैं कि विश्वनाथ चक्रवर्ती पाद को प्रामाणिक आचार्य मानते हैं। जो लोग आक्षेप करते हैं वो लोग रघुनाथ दास गोस्वामी को भी परम प्रमाण मानते हैं और विष्णु चक्रवर्तीवाद को भी परम प्रमाण मानते हैं। मजे की बात जो मंत्रार्थ दीपिका है उसमें जब कामबीज गायत्री का मंत्र आदि का व्याख्यान करने लगे विश्वनाथ चक्रवर्ती पाद तो उस समय जो है उनको कुछ इसमें शंका हो

01:18:16:28 गया। तो वो सोचने लगे कि यह शंका सही है कि गलत है। तो श्री जी ने सपनादेश दिया कि जो चैतन्य चरितामृत में कृष्णना कविराज ने लिखा वो शत प्रतिशत सत्य है और मेरी आज्ञा से कृपा से उसने लिखा है। इसमें कोई गलत नहीं है। तो चक्रवर्ती पाद ने फिर प्रमाण के रूप में उसी को ही उन्होंने ग्रहण किया हुआ है। तो आपने जो आचार्य है उसमें श्री चैतन्य चरितामृत जो है वो कोई प्रक्षिप्त ग्रंथ नहीं है। वो परम प्रमाणिक ग्रंथ है। उसमें कोई भी ऐसी बात गलत नहीं लिखी गई है। जो बात लिखी गई वो परम सत्य है। और जो कुछ लोग आक्षेप करते हैं या जो भी नाती प्रमाण जो ग्रंथ हैं वो लेकर के आ जाते हैं कि ये देखो हमारे पास ये ग्रंथ है और ये प्रमाण है। परंतु जो ग्रंथ लेकर के आ जाते हैं वो ग्रंथ भी अभी इसी सदी में लिखा गया है। इसका भी हमारे पास प्रमाण है। रिकॉर्डेड है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से प्रमाण भी है उसका कि ये ग्रंथ अभी के लिखे हुए हैं। ये पुराने ग्रंथ नहीं है। हम्। तो, अभी भी कोई विद्वान हो जाए संस्कृत में कुछ लिख दे और उसको क्या हम प्रमाण मान लेंगे? किसी के नाम पे कुछ भी हम लिख सकते हैं? अच्छा। तो, वह अलग बात है। तो, ऐसे मतलब झूठे प्रमाण बनाए गए मतलब कि आक्षेप लगाने के लिए। उसको हटाने लगा के ये बहुत पुराना प्रमाण है। हां हां। बस बस बस ये बात है।

01:19:32:09 कुल मिलाकर के एक चीज ऐसे सामने आ रही है कि इस तरह से परंपराओं का अनाधिकृत रूप से नाम लिया जाना इस बारे में कोई ना कोई एक विधि का मतलब संविधान अवश्य होना चाहिए कि कोई भी अपने पूर्वोक्त पूर्वचार्य से बिना अनुमति के उस नाम का उपयोग ना करें क्योंकि ये एक बहुत बड़ा आज बिजनेस बना दिया इसको। बिल्कुल आप जो सही बात जैसे गय संप्रदाय में 64 श्री पाठ है और उसमें अनेकों पीठ है देखिए वृंदावन में कोई आए मूल संप्रदाय से जुड़ना चाहता है तो हमारे पास भी आ सकते हैं यहां पे ओपन है कोई भी आ जाए सप्तदेवालय है वृंदावन में कोई आए घोड़े संप्रदाय का तो सप्त देवालय के मंदिर है वहां पे आके दर्शन करें जो हमारे श्री गो संप्रदाय के आचार्य के द्वारा स्थापित की गई है। जी तो जो मुख्य आचार्य हैं वह तो है प्रामाणिक आचार्य परंतु उनके तक लोग पहुंच नहीं पा रहे वो क्योंकि वो प्रचार में नहीं है ना तो भी नहीं है और फिर ये वाली बात भी है कि अगर किसी को इंस्पेक्टर तक पहुंचना है और बहुत सारे लोग अपने घर के बाहर इंस्पेक्टर की नेमप्लेट लगा लेंगे तो चांसेस कम हो जाएंगे वास्तविक इंस्पेक्टर तक पहुंचना बहुत-बहुत आपका आभार इतना आपने हमें समय दिया और बड़ा सुंदर आपने जो है कुछ चीजें बताई जो जनसामान्य के लिए बहुत आवश्यक थी जानना और बस मैं फिर से वही एक बात दोहराऊंगा कि

01:20:47:13 आपको यदि भगवान कृष्ण की भक्ति करनी है चैतन्य महाप्रभु जी के द्वारा सिद्धांत जिन सिद्धांतों को आप जानते हैं कि चैतन्य महाप्रभु जी ने दिए हैं उन सिद्धांतों के आधार पर यदि आपको कृष्ण भगवान को प्राप्त करना है तो प्रामाणिक उनका जो संप्रदाय है प्रामाणिक उनके जो गौीय वैष्णव संप्रदाय है उससे आप जुड़िए वैष्णव बनिए कोई आवश्यक नहीं मैं यह नहीं कहूंगा कि नहीं आप शंकराचार्य से जगद्गुरु शंकराचार्य जी से ही दीक्षा लीजिए। आप वैष्णव बनिए। वैष्णव शंकराचार्य जी के शिष्य बनते हुए भी बन सकते हैं। स्मार्थ होते हुए वैष्णव बन सकते हैं। मगर यदि आपको इन सिद्धांतों पे भी चलना है तो प्रामाणिक संप्रदायों में जाइए। रामानुज संप्रदाय में जाइए। प्रामाणिक मधवाचार्य संप्रदाय में जाइए। प्रामाणिक गौडिया वैष्णव संप्रदाय में जाइए। मगर इन पाखंडी संस्थाओं से स्वयं को और स्वयं के परिवार को बचाइए। जो केवल पूर्वाचार्यों का ये जो परंपराएं हैं प्रामाणिक इनका नाम लेकर अपने मंतव्यों की सिद्धि करने में लगे हुए हैं। अपने लाभ के लिए कार्यरत है। तो इसी के साथ हम इस चर्चा को विराम देते हैं। जय जय श्रीमन नारायण जय गौर जय निताय जय जगन्नाथ जय जगन्नाथ [संगीत] हम्म [संगीत]

Plans for this video (0)

No Plans yet. Press "✂️ Open Clip Cutter" to make one.

🤖 Ask AI for suggestions

AI reads the remaining (unused) parts of this video and gives ideas for new videos: from where to where, hook, and what to remove from the middle. Suggestions follow the RULES and appear here as "AI Suggestion". You can review, edit or approve them.

  • ⬜
    Hindi SRT Required

    YouTube Studio → Subtitles → Hindi → upload the SRT file. (Checked automatically once OAuth is connected.)

  • ⬜
    English SRT

    YouTube Studio → Subtitles → Add language → English → upload the SRT file.

  • ⬜
    Title (per Rules)

    Check the title against the RULES on honorifics, names and terms.

  • ⬜
    Description

    YouTube Studio → Details → Description. Write it as per the RULES.

  • ⬜
    End Screen

    YouTube Studio → Editor → End screen. The API does not report this, so press Done after adding it.

  • ⬜
    Cards

    YouTube Studio → Editor → Cards. The API does not report this, so press Done after adding them.

  • ⬜
    Playlist Automatic

    YouTube Studio → Details → add to Playlists. It gets ticked ✓ automatically at the next sync.

  • ⬜
    Thumbnail

    YouTube Studio → Details → Thumbnail → upload a custom thumbnail.

"Done" is your confirmation. The YouTube API does not report things like End Screen and Cards.

Playlists

Not in any public playlist (or YouTube sync has not run yet).

A: AHVAAN - Call Of Dharma Video 1:21:59 · 06 Apr 2025

Is #ISKCON a branch of the Gaudiya Vaishnav sect

0%
☁️ Drive Not in Drive yet

Notes

Description

(empty)

History

No changes yet.

✂️ Clip Cutter

⌨️ Keyboard shortcuts

Space Play/Pause · I Set start · O Set end · ←→ 1 second (Shift: 5) · ,. 1 frame · P Preview · Enter Add clip · Esc Stop

▶

Start

End

🔍 zoom
Already used Plan clips
⚠️ () of this clip is already used in another video (green part). Fine if on purpose, otherwise change the times.
✂ Remove (middle part: bad audio, bad section)

Move the video to that spot (click the SRT or the bar), then press "Start"/"End".

Clips () · Total

Add clips above. They will appear here; drag (⋮⋮) to reorder.

Hook, full note for editor, status