1
00:00:00,080 --> 00:00:04,480
तब हमने बताया कि आचार्य रामशंकर शुक्ल जी ने मुझे व्यक्तिगत रूप से बताया था कि 12 फरवरी

2
00:00:04,480 --> 00:00:05,520
2022 को बताया था कि

3
00:00:05,520 --> 00:00:09,680
कब बताया था जब हम छत्तीसगढ़ के कोलारिया ग्राम में कथा सुभाष कार्यक्रम में थे तो 12 फरवरी 2022 को आचार्य

4
00:00:09,680 --> 00:00:13,840
राम शंकर शुक्ल जी ने मुझे व्यक्तिगत रूप से बताया था फोन में बात हुई थी कि ये लोग शंकराचार्य जी के भोजन में आपत्तिजनक

5
00:00:13,840 --> 00:00:14,340
मिश्रण

6
00:00:14,080 --> 00:00:18,320
करते हैं परिक हमने ये बात सार्वजनिक की तो संकट की दुहाई देकर चुप रहने की बात करने लगे

7
00:00:18,320 --> 00:00:22,480
और अगर शिवाश को ये लगता है कि बात झूठ है तो उस वीडियो के सार्वजनिक होने के बाद रामशंकर शुक्ल

8
00:00:22,480 --> 00:00:27,040
की जो बात हमने आचार्य जी की जो बात कही की परिक भगवान शंकराचार्य जी के

9
00:00:27,040 --> 00:00:32,200
कर रहे हैं आपत्तिजनक जो विश्व को दिखाने वाले

10
00:00:32,200 --> 00:00:36,240
जींकर शुक्ल जी सवाल में तो आचार्य रामशंकर शुक्ल जी

11
00:00:36,240 --> 00:00:40,240
को इतने प्रताड़ित किया गया द्वारा कि वो कहे हमको ये सब हटा दीजिए हटा दीजिए और अंत में

12
00:00:40,240 --> 00:00:44,400
क्षमा मांगते हुए या एक प्रकार से कहे तो गिड़गिड़ाते हुए उन्होंने एक वीडियो

13
00:00:44,400 --> 00:00:48,480
ऑडियो संदेश जारी किया था अगर आपको वो ऑडियो संदेश चाहिए नहीं

14
00:00:48,480 --> 00:00:52,480
12 फरवरी 2022 को ही हमने आचार्य रामशंकर शुक्ल जी को दोपहर में एक ऑडियो भेजा था

15
00:00:52,480 --> 00:00:56,560
उस ऑडियो को मैं आपको भेज दूंगा चार मिनट का ऑडियो था ये कह रहे थे कि मत में चल रही है गांधी जी को जवाब बता

16
00:00:56,560 --> 00:01:02,560
रहे सामने जगह सुधार नहीं हुआ अभी समय है सुना

17
00:01:06,640 --> 00:01:11,240
तो सभी को जय श्री राम और आज

18
00:01:11,240 --> 00:01:15,680
हम शरणागत हैं आचार्य रामशंकर

19
00:01:15,680 --> 00:01:19,880
शुक्ल जी और इन्हें किसी भी प्रकार के परिचय की आवश्यकता नहीं

20
00:01:19,880 --> 00:01:24,000
है। हमारे सर्वभूत हृदय धर्म

21
00:01:24,000 --> 00:01:28,320
सम्राट कृपात्री जी महाराज के कृपा पात्र शिष्य हैं आप और

22
00:01:28,320 --> 00:01:33,320
वर्तमान में जो पूरी पीठाधीश्वर हैं श्रीमद जगुरु

23
00:01:33,320 --> 00:01:37,320
शंकराचार्य तो उनके गुरु भाई होते हैं

24
00:01:37,320 --> 00:01:42,760
और वेद विधान पर बहुत

25
00:01:42,760 --> 00:01:47,600
इनका अच्छा अध्ययन है और गुरुकुल में हमारे

26
00:01:47,600 --> 00:01:52,000
भटकों को और आने वाली पीढ़ी को तैयार कर रहे हैं जो धर्म ध्वजाओं

27
00:01:52,000 --> 00:01:56,080
को लेकर के आगे बढ़ेगी। तो विशेष रूप से आज जिस प्रसंग

28
00:01:56,080 --> 00:02:00,240
में हम आए यहां पर गुरुदेव की शरण में वैसे पहले भी आप इन्हें देख चुके

29
00:02:00,240 --> 00:02:04,560
हैं हमारे YouTube चैनल पर और इनका भी YouTube चैनल है उसको भी हम लोग अक्सर

30
00:02:04,560 --> 00:02:08,640
बताते रहते हैं। विशेष रूप से जो प्रसंग है वो आप सभी जानते हैं।

31
00:02:08,640 --> 00:02:13,520
उससे आप अवगत हैं। यदि आप पिछले कुछ दिनों से आहान को फॉलो कर रहे हैं।

32
00:02:13,520 --> 00:02:17,520
जिसमें कि एक व्यक्ति है भगवतानंद नाम का

33
00:02:17,520 --> 00:02:21,920
जो स्वयं को निग्रह संप्रदाय का

34
00:02:21,920 --> 00:02:26,080
आचार्य बताता है। उसकी गद्दी पर मतलब उसका जो उत्तराधिकारी है वो बताता

35
00:02:26,080 --> 00:02:30,240
है और वो स्वयं को कहता है निग्रचार्य

36
00:02:30,240 --> 00:02:34,560
और उसने अनेक प्रकार के आक्षेप लगाए हैं

37
00:02:34,560 --> 00:02:37,960
अह पूरी पीठ पर।

38
00:02:37,960 --> 00:02:42,000
हालांकि अप्रत्यक्ष रूप से उसने अनेक बार

39
00:02:42,000 --> 00:02:46,240
जो जगदगुरु शंकराचार्य उनका भी उपहास उड़ाया है।

40
00:02:46,240 --> 00:02:50,320
जैसे कि उनकी 3 वर्ष की जो हिंदू राष्ट्र की घोषणा

41
00:02:50,320 --> 00:02:54,960
है उसको लेकर के फतिया कसना मजाक बनाना उपहास करना

42
00:02:54,960 --> 00:02:58,240
या फिर जो

43
00:02:58,240 --> 00:03:02,800
क्या कहते हैं ये जैसे उन्होंने गुरुदेव ने कहीं किसी प्रसंग वश कहा

44
00:03:02,800 --> 00:03:06,800
कि भाई हमारे पास मधुमक्खियों की सेना है तो इसने वहां

45
00:03:06,800 --> 00:03:11,040
पर भी जगदगुरु शंकराचार्य जी का उपहास उड़ाने का प्रयास

46
00:03:11,040 --> 00:03:15,280
किया है बनाता है अपने अकेले वीडियो बना करके तो उसने

47
00:03:15,280 --> 00:03:19,360
अपने जो यह प्रसंग चल रहा है, जो आक्षेप वह

48
00:03:19,360 --> 00:03:23,360
लगा रहा है, इन इसी क्रम में उन्होंने आचार्य श्री का भी नाम

49
00:03:23,360 --> 00:03:27,520
लिया है उसने भगवत आनंद ने। तो हमारे साथ आज ये बैठे हुए हैं।

50
00:03:27,520 --> 00:03:32,400
कुछ समस्याओं का निराकरण प्रस्तुत जो जिस जितने अंश में ये उस

51
00:03:32,400 --> 00:03:36,560
उन विषयों से जुड़े हुए हैं जिसमें उन्होंने इनको जोड़ा है। तो वो सारी बातें हम

52
00:03:36,560 --> 00:03:40,800
लोग ये क्रम चलाने वाले हैं कि जो आक्षेप लगाए जा रहे हैं उनका जो आधार

53
00:03:40,800 --> 00:03:45,200
है वो क्या है? जिसका नाम लिया जा रहा है उसका क्या कहना है? तो

54
00:03:45,200 --> 00:03:50,160
इसी संदर्भ में इस विशेष और महत्वपूर्ण

55
00:03:50,160 --> 00:03:54,160
जानकारी को आप लोग जाने और आगे प्रेषित करें जो अभी हमें प्राप्त

56
00:03:54,160 --> 00:03:58,320
होने वाली है आचार्य श्री के मुख से तो आचार्य सब आचार्य श्री सबसे

57
00:03:58,320 --> 00:04:03,120
पहले आपके चरणों मेरा प्रणाम निवेदन नारायण

58
00:04:03,120 --> 00:04:07,200
नारायण जी आचार्य श्री एक भगवतानंद नाम

59
00:04:07,200 --> 00:04:11,680
का व्यक्ति है। उसका कहना है कि वह

60
00:04:11,680 --> 00:04:13,360
एक लुप्त संप्रदाय है

61
00:04:13,360 --> 00:04:17,600
निग्रह नाम का। उसका वह आज का जैसे हमारे यहां शंकराचार्य

62
00:04:17,600 --> 00:04:22,000
होते हैं उत्तराधिकारी ऐसे ही वो उस संप्रदाय

63
00:04:22,000 --> 00:04:26,000
का उत्तराधिकारी है आज का। तो यह तो खैर एक अलग विषय है कि

64
00:04:26,000 --> 00:04:30,320
उसका संप्रदाय क्या है या जो भी है। और वह कहां से शिक्षा दीक्षा

65
00:04:30,320 --> 00:04:34,400
प्राप्त कर रहा है। किन आचार्यों के उसमें चल रहा है शरणागत होकर के। वह तो

66
00:04:34,400 --> 00:04:39,200
एक अलग विषय है। मगर सर्वप्रथम उसने एक

67
00:04:39,200 --> 00:04:44,360
आरोप लगाया है कि पूरी पीठ के

68
00:04:44,360 --> 00:04:48,800
परिकर जगदगुरु शंकराचार्य को मतलब नहीं शंकराचार्य

69
00:04:48,800 --> 00:04:52,880
पीठ है जो पूरी की उसमें जो शंकराचार्य जी की सेवा में

70
00:04:52,880 --> 00:04:56,960
जो रथ है वो परिकर उनको खाने में

71
00:04:56,960 --> 00:05:01,440
मिलाकर के कुछ दे रहे हैं वो उसका उद्देश्य संभवत

72
00:05:01,440 --> 00:05:05,880
उन्हें अपने वश में करना है।

73
00:05:05,880 --> 00:05:10,080
तो अब यह तो इसका आरोप है ही। अब इसमें आप कैसे

74
00:05:10,080 --> 00:05:14,160
जुड़ रहे हैं क्योंकि वह आपका नाम ले करके यह बोल रहा है कि यह बात

75
00:05:14,160 --> 00:05:18,680
आपने उससे कही है। और वह यह भी दावा कर रहा है

76
00:05:18,680 --> 00:05:22,800
कि उसके पास आपकी कोई कॉल रिकॉर्डिंग है।

77
00:05:22,800 --> 00:05:26,960
ठीक है? तो सबसे पहले तो आप यह हमें बताएं

78
00:05:26,960 --> 00:05:28,720
क्या इस प्रकार की कोई बात आपने

79
00:05:28,720 --> 00:05:32,960
उससे कही है या आपकी उससे बात होती है तो क्या बात हुई या कब

80
00:05:32,960 --> 00:05:37,560
से बात नहीं हुई? थोड़ा सा इस पर प्रकाश डालें। हरि

81
00:05:37,560 --> 00:05:41,640
शरणम पाद तोषित विश्वेषम धर्म मार्ग

82
00:05:41,640 --> 00:05:47,480
प्रवर्तकम वंदे हरिहरंदम करप पात्रम

83
00:05:47,480 --> 00:05:51,760
जगतगुरु वास्तव में पौराणिक बिंदु

84
00:05:51,760 --> 00:05:56,440
के आधार पर पांच संप्रदाय हैं।

85
00:05:56,440 --> 00:06:02,440
वैष्णव शय शाणपत सऊ

86
00:06:03,360 --> 00:06:07,520
यहां पौराणिक मान्यता है। तो शाक्त संप्रदाय

87
00:06:07,520 --> 00:06:12,000
का अंग कह लीजिए क्योंकि परमात्मा के पांच कृत

88
00:06:12,000 --> 00:06:16,280
हैं। सृष्टि

89
00:06:16,280 --> 00:06:20,560
सजन एवं संहार जिसे संघति

90
00:06:20,560 --> 00:06:24,920
कहते हैं। और निग्रह

91
00:06:24,920 --> 00:06:28,960
अनुशासन अनुग्रह कृपा इन

92
00:06:28,960 --> 00:06:33,440
पांचों संप्रदाय के पांच देवता है। जी

93
00:06:33,440 --> 00:06:37,680
सौर भगवान सूर्य से सृष्टि विष्णु भगवान से पोषण चंद्र

94
00:06:37,680 --> 00:06:41,680
भगवान से संगृति जी परंबा भगवती से

95
00:06:41,680 --> 00:06:46,240
निग्रह जी और भगवान गणपति से अनुग्रह

96
00:06:46,240 --> 00:06:50,320
जी तो ये मन से अपना कोई भी

97
00:06:50,320 --> 00:06:54,320
संप्रदाय बना ले कुछ कर ले इसके लिए कोई

98
00:06:54,320 --> 00:06:58,640
हमारे यहां रोक-टोक तो है नहीं जो भी जब कह दे हम

99
00:06:58,640 --> 00:07:02,640
स्वयंभू शंकराचार्य स्वयंभू राम वैष्णवा आचार्य हैं

100
00:07:02,640 --> 00:07:07,600
स्वामी को कुछ भी कह ले जी पर मूल रूप है शास्त्र संप्रदाय

101
00:07:07,600 --> 00:07:11,800
भागवतानंद ने जो कुछ बात कही जी पहली बात

102
00:07:11,800 --> 00:07:15,840
तो कई वर्षों पूर्व

103
00:07:15,840 --> 00:07:18,640
महाराज श्री के ही मंच पर हम

104
00:07:18,640 --> 00:07:22,640
लोगों का आपसी संपर्क हुआ पूरी वाले शंकराचार्य जी के

105
00:07:22,640 --> 00:07:26,880
मंच पर पूरी वाले शंकराचार्य जी के मंच पर संपर्क हुआ

106
00:07:26,880 --> 00:07:30,960
और वहां इन्होंने प्रवचन भी किया हमारे यहां आश्रम में आकर

107
00:07:30,960 --> 00:07:35,040
के गीता गीता पर भी प्रवचन तीन चार दिन तक किया। कई दिनों

108
00:07:35,040 --> 00:07:39,600
तक रहे। अच्छा प्रयागराज में प्रयागराज अच्छा प्रशांत

109
00:07:39,600 --> 00:07:43,680
मिश्र जी ने संपर्क कराया। प्रशांत मिश्र जी अच्छा तो संपर्क

110
00:07:43,680 --> 00:07:47,920
हो गया। जी अब ये है कि इतने संपर्क था और इस

111
00:07:47,920 --> 00:07:52,160
बात से पूरी पीठ को

112
00:07:52,160 --> 00:07:56,320
महाराज श्री के दर्शन के लिए गए थे। वहां इनको दर्शन में कुछ

113
00:07:56,320 --> 00:08:00,640
व्यतिक्रम हुआ और तब यह उस विषय

114
00:08:00,640 --> 00:08:04,720
को लेकर के कई लोगों से भी बात किए होंगे। हमसे इन्होंने पूछा कि

115
00:08:04,720 --> 00:08:08,960
महाराज जी से दर्शन के लिए प्रतिबंध किया गया तो हमें दर्शन

116
00:08:08,960 --> 00:08:12,960
नहीं मिला। ऐसा क्यों किया गया? तुमने कहा कोरोना के बाद

117
00:08:12,960 --> 00:08:17,120
से महाराष्ट्र के दर्शन के लिए दूरी बनाकर रखा जाता

118
00:08:17,120 --> 00:08:21,440
है और और भी लोग दूरी बनाते ही हैं कोरोना में। कोरोना के बाद तो

119
00:08:21,440 --> 00:08:25,440
लोगों को दूरी बनाना एक प्रकार से संम सिखाया गया। इस

120
00:08:25,440 --> 00:08:29,920
दृष्टि से हम लोग भी दूरी बना के रहते हैं। हम इन्होंने परों

121
00:08:29,920 --> 00:08:34,160
के संबंध में भी बहुत कुछ बातें कही खानपान को लेकर के

122
00:08:34,160 --> 00:08:38,640
तो हमने कहा इस पर हमें कोई ऐसी जानकारी नहीं है। हो सकता है जो कुछ करते

123
00:08:38,640 --> 00:08:42,640
हैं वो जाने और आप अपने हिसाब से जो कह रहे हो आप जानिए।

124
00:08:42,640 --> 00:08:46,720
इस पर हमारा कोई लेनदेन नहीं है। खानपान के संबंध में या और भी बहुत सी

125
00:08:46,720 --> 00:08:50,800
चीजों में नहीं लेनदेन। अभी जो बात इन्होंने भोजन को लेकर के

126
00:08:50,800 --> 00:08:54,960
महाराज श्री के भोजन में दिया जा रहा है। ऐसी बात जो आपके द्वारा

127
00:08:54,960 --> 00:08:58,960
कही जा रही बताई जा रही है। अब तक तो हमारी उनकी

128
00:08:58,960 --> 00:09:03,040
बातें ही कई सालों से नहीं हुई। अगर ये ऐसा कह रहे हैं

129
00:09:03,040 --> 00:09:06,160
तो किसी ने कुछ कहा होगा, किसी ने कुछ सुना होगा।

130
00:09:06,160 --> 00:09:10,560
हमारा उससे कोई लेनदेन नहीं है। मतलब आपने यह नहीं कहा है कि

131
00:09:10,560 --> 00:09:13,680
परिकरों के द्वारा भोजन में मिलाकर उनको कुछ दिया जा रहा है।

132
00:09:13,680 --> 00:09:17,920
कुछ नहीं है। अच्छा ये बात किसी ने हमको कहा

133
00:09:17,920 --> 00:09:21,920
भी था। जी ऐसा अन्य किसी अन्य किसी ने हमसे बताया था। लेकिन

134
00:09:21,920 --> 00:09:25,920
हमारी उनकी तो कोई बात ही नहीं हो रही है। कब से नहीं हुई? आचार्य श्री उनकी उनसे

135
00:09:25,920 --> 00:09:29,920
आपकी बात लगभग हमारा अंदाज जो पहला इनका

136
00:09:29,920 --> 00:09:33,920
वीडियो था वो दो साल तो हो ही गया होगा। अच्छा तो दो

137
00:09:33,920 --> 00:09:38,640
साल से तो कोई बात हुई नहीं। 2 साल से कोई बात नहीं हुई है ना। ओ हो हो

138
00:09:38,640 --> 00:09:42,880
अच्छा एक ये बात ये तो मान के चल कि दो साल तो हो ही गया होगा लगभग लगभग

139
00:09:42,880 --> 00:09:47,960
लगभग लगभग हो गया होगा क्योंकि इस महीने के पहले वाले

140
00:09:47,960 --> 00:09:52,160
मेले के पहले की बात है जी जी जी तो लगभग दो वर्ष

141
00:09:52,160 --> 00:09:56,160
हो गया होगा जहां तक अनुमान है जी जी तो कोई बात हमारी उल्टी हुई

142
00:09:56,160 --> 00:10:00,320
नहीं बात करने के लिए हमने अब मन बना लिया कि

143
00:10:00,320 --> 00:10:04,480
इनसे कोई बात भी नहीं करनी है इसलिए कि ये अनावश्यक

144
00:10:04,480 --> 00:10:08,560
अनर्गल प्रलाप ज्यादा करते हैं। जी शास्त्र की मर्यादा को ध्यान में

145
00:10:08,560 --> 00:10:12,560
रखते हुए मैंने सुनते हुए लिखा है कि ना प्रष्ठा कर सच गुरु याद

146
00:10:12,560 --> 00:10:16,560
आपसे कोई बात पूछे नहीं तो आपको जबरदस्ती क्यों

147
00:10:16,560 --> 00:10:20,880
पढ़ते हैं फिर और तमाम संत महात्माओं को लेकर के आप कहो

148
00:10:20,880 --> 00:10:25,120
क्या आप ही सारे सार्वभौमिक सिद्धांत जानते हैं पुराणों की बातें

149
00:10:25,120 --> 00:10:28,960
मित्र वाक्य है सिद्धांत वाक्य तो पूर्व

150
00:10:28,960 --> 00:10:33,040
मीमांसा में मिलता इसलिए हमारे महाराष्ट्र धर्म सम्राट कहते

151
00:10:33,040 --> 00:10:37,280
थे पुराणों की बातें प्रशंसात्मक जिसके दरवाजे

152
00:10:37,280 --> 00:10:41,520
आप जाइए उसकी प्रशंसा करिए। जी। गणेश पुराण में गणेश जी से सृष्टि,

153
00:10:41,520 --> 00:10:45,760
गणेश जी की प्रशंसा, देवी भागवत में भगवती से किस द्वारा सृष्टि

154
00:10:45,760 --> 00:10:49,760
उनकी प्रशंसा, शिव पुराण में भगवान शिव के द्वारा सृष्टि उनकी प्रशंसा,

155
00:10:49,760 --> 00:10:53,920
विष्णु पुराण में भगवान विष्णु के द्वारा सृष्टि उनकी प्रशंसा। ये हमारी

156
00:10:53,920 --> 00:10:58,480
मान्यताएं पुराणों के आधार पर हैं जो यथार्थ हैं।

157
00:10:58,480 --> 00:11:02,960
लेकिन इन बातों को को के मूल्य में पूर्व मीमांसा ही

158
00:11:02,960 --> 00:11:07,360
समर्थन दे तब वो सिद्धांत माने जाएंगे। यदि पूर्व मीमांसा

159
00:11:07,360 --> 00:11:12,080
सिद्धांत नहीं देता नहीं इसको कहता तो वो बातें गौर मानी जाएंगी।

160
00:11:12,080 --> 00:11:16,440
इसलिए हमारे प्रमाण वेद है स्मृतियां पूर्व

161
00:11:16,440 --> 00:11:20,480
मीमांसा और नीचे आने पर पुराण है। उनके नीचे

162
00:11:20,480 --> 00:11:24,480
आने पर रामायण आदि है। तो रामायण महाभारत

163
00:11:24,480 --> 00:11:28,640
इतिहास ग्रंथ भी पुराण माने जाते हैं। वेद वाक्य पिता के वाक्य हैं। पितृ

164
00:11:28,640 --> 00:11:33,040
वाक्य हैं। पुराण के वाक्य मित्र वाक्य है। मित्र कभी-कभी

165
00:11:33,040 --> 00:11:37,120
कोई बात सिद्धांत से भी हटकर के कुछ कह जाता

166
00:11:37,120 --> 00:11:41,360
है। तो वे हमारे सिद्धांत नहीं बनेंगे। उसको हम समझ लेंगे

167
00:11:41,360 --> 00:11:44,240
तब उस बात को कहेंगे जी और जो हमारी

168
00:11:44,240 --> 00:11:48,320
इतिहास ग्रंथ है वो कांता समित वाक्य है पत्नी के समान

169
00:11:48,320 --> 00:11:52,480
पत्नी किसी बात को कह रही है उसको व्यक्ति जल्दी मान लेता है सिद्धांत

170
00:11:52,480 --> 00:11:56,800
से हट भी जाता है मित्र के वाक्य को सिद्धांत से हट भी जाता है

171
00:11:56,800 --> 00:12:00,840
लेकिन जो वेद वाक्य है वो पितृ वाक्य है धर्मम

172
00:12:00,840 --> 00:12:05,360
चर धर्म पर चलिए आचार्य देव भव पित देव भव

173
00:12:05,360 --> 00:12:09,440
अतिथि देव भव यथावत है सत्यम यात सत्य

174
00:12:09,440 --> 00:12:13,520
सत्यम वहां आवाज है। वहां वेद की आवाज है। सत्यम

175
00:12:13,520 --> 00:12:18,400
व सत्यम प्रयात कहने पर मित्र वाक्य हो जाएगा। सत्य बोलना चाहिए।

176
00:12:18,400 --> 00:12:22,560
हम सत्य बोलने का प्रयास करना चाहिए। पत्नी का

177
00:12:22,560 --> 00:12:26,560
वाक्य हो गया। इसलिए किसी प्रकार से सिद्धांत वाक्य

178
00:12:26,560 --> 00:12:31,040
से हटकर के हमको पौराणिक सिद्धांतों को प्रशंसात्मक

179
00:12:31,040 --> 00:12:35,040
समझ करके उनको ही मूल में नहीं रखना है। जब तक कि वेद

180
00:12:35,040 --> 00:12:39,120
वाक्य प्रमाणित ना करें। जी जी बहुत-बहुत सुंदर। इस दृष्टि से

181
00:12:39,120 --> 00:12:43,120
कभी भी इन्होंने बहुत सी बातें कही कदाचित

182
00:12:43,120 --> 00:12:47,840
हमें अभ्यास नहीं है YouTube का कुछ लोगों ने ज्यादा कदा सुनाया

183
00:12:47,840 --> 00:12:51,840
तो सुनाने पर हमने देखा तो हम कहा कि ये इनका प्रलाप है

184
00:12:51,840 --> 00:12:56,080
ये अनावश्यक किसी प्रासंगिक बातों को रख

185
00:12:56,080 --> 00:12:59,680
के पुराणों की बातों को रख के कभी हमारे धर्म सम्राट

186
00:12:59,680 --> 00:13:03,840
महाराज श्री के भी पक्ष को देख के शबरी को इन्होंने कह

187
00:13:03,840 --> 00:13:08,000
दिया कि वो भेनी है ब्राहरी नहीं है महाराज श्री ने तो

188
00:13:08,000 --> 00:13:12,080
पूर्वा परा सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए किसी

189
00:13:12,080 --> 00:13:16,200
भी बात को कब कहां कह रहे हैं इन बातों को ध्यान में रखकर

190
00:13:16,200 --> 00:13:20,800
के ऐतिहासिक पौराणिक और स्मृति के वृतांत

191
00:13:20,800 --> 00:13:24,880
को ध्यान में रखते हुए वाक्य कहते हैं। उस सिद्धांत के आधार

192
00:13:24,880 --> 00:13:29,200
पर ब्राह्मणी कही गई। वाल्मीकि जी ब्राह्मण कहे गए। इसमें

193
00:13:29,200 --> 00:13:33,440
कोई आक्षेप लगा करके और आचार्यों के प्रति ऐसी

194
00:13:33,440 --> 00:13:37,760
भावना व्यक्त करना एक अनर्गल प्रणाम और महाराज

195
00:13:37,760 --> 00:13:42,320
श्री के प्रति इन्होंने इनके प्रति जब ये बात हमारे पहले

196
00:13:42,320 --> 00:13:46,560
दो साल डेढ़ साल महाराज श्री यानी कि पूरी पीठाधीश्वर पूरा पूरी पीठाधीश्वर

197
00:13:46,560 --> 00:13:50,640
जी तो उनके प्रति इस प्रकार की बातें कहना इनके

198
00:13:50,640 --> 00:13:55,120
लिए शोभा नहीं देता इनको वाणी पर संम रखना चाहिए और

199
00:13:55,120 --> 00:13:59,440
कोई बात नहीं समझ में आती तो उसके स्वयं कभी

200
00:13:59,440 --> 00:14:03,680
अवसर पाने पर महाराज से तो अवसर देते ही हैं।

201
00:14:03,680 --> 00:14:07,680
अवसर पाने की बात छोड़ दीजिए। जी आप सभा में खड़े होकर के

202
00:14:07,680 --> 00:14:11,760
प्रश्न करिए। जी महाराज उसका उत्तर देते हैं। जी तो उस उत्तर को

203
00:14:11,760 --> 00:14:14,520
आप लेकर के संतुष्ट हो जाइए। जी। अना

204
00:14:14,520 --> 00:14:18,560
अनावश्यक लोगों की कही बातों को बाग जाल बना

205
00:14:18,560 --> 00:14:22,720
करके जाल बिछा करके ऊटपटांग की बात कहना

206
00:14:22,720 --> 00:14:26,640
ये शोभनीय नहीं है ये अशोभनीय बातें हैं।

207
00:14:26,640 --> 00:14:30,800
इससे आपको अपने जीवन को कृतार्थ करना है।

208
00:14:30,800 --> 00:14:35,120
इन बातों को कहने की आवश्यकता नहीं। सबसे बड़ा अपराध है। 10 अपराध

209
00:14:35,120 --> 00:14:39,120
माने गए सन निंदा सते नाम वैभव कथा से और

210
00:14:39,120 --> 00:14:43,280
भेद दी संतों की निंदा करना। फिर क्या असंतों की निंदा करें?

211
00:14:43,280 --> 00:14:47,600
तो बोले नहीं लक्षणा से असंतों की भी निंदा नहीं करनी। निंदा

212
00:14:47,600 --> 00:14:51,600
होना ही नहीं चाहिए। जी असत वैभव कथा झूठी कथा नहीं

213
00:14:51,600 --> 00:14:55,680
कहना चाहिए कि 56 बीघे का पर्चा बो दिया गया। उस उस प्रकार

214
00:14:55,680 --> 00:14:59,760
की कोई बात नहीं करनी चाहिए। श्री में इस में कोई भेद नहीं

215
00:14:59,760 --> 00:15:03,760
देखना चाहिए। आचार्यों के विद्वानों

216
00:15:03,760 --> 00:15:08,080
के गुरुजनों के शास्त्रों के वचनों में अश्रद्धा नहीं आनी चाहिए।

217
00:15:08,080 --> 00:15:12,160
जी तो यदि आप किसी बात को कहना चाहते हैं तो शास्त्र

218
00:15:12,160 --> 00:15:16,320
की बात को आप अपने ढंग से कह जाइए लेकिन निंदा की दृष्टि से मत

219
00:15:16,320 --> 00:15:20,960
कहिए। जी पहली बात तो आपको असंजम

220
00:15:20,960 --> 00:15:24,800
के द्वारा ही कुछ कहने की आवश्यकता है। असंजम पकड़ने की आवश्यकता नहीं।

221
00:15:24,800 --> 00:15:28,880
फिर हमारा नाम आप बार-बार क्यों जोड़ते हो? हम तो आपसे कोई

222
00:15:28,880 --> 00:15:33,080
बात नहीं कर रहे हैं। आपने पुस्तक भी भेजी तो हमने धन्यवाद भी नहीं

223
00:15:33,080 --> 00:15:37,360
दिया। क्यों? क्योंकि आपने प्रथम वीडियो में ऐसी

224
00:15:37,360 --> 00:15:40,560
बातें सब कह दी जहां कि हमने उस बात को कोई ऐसा

225
00:15:40,560 --> 00:15:44,720
कुछ कहा नहीं। हम तो इस बात को इस ढंग से कहा कि भाई कोई खानपान

226
00:15:44,720 --> 00:15:48,800
की बात है तो वो आप जानिए। उसमें आपने अपना ऐसा कुछ वो नहीं है। नहीं कुछ

227
00:15:48,800 --> 00:15:52,960
नहीं। हमने कुछ कहा आपको कहां प्रत्यक्ष मिलेगा? कौन गारंटी है कि आप प्रत्यक्ष सुन

228
00:15:52,960 --> 00:15:57,120
रहे हो। श्रोता हो जी। उटपटांग के लोगों ने कुछ कहा सुनी की कर

229
00:15:57,120 --> 00:16:01,360
दी और उसको आपने अपने उसमें प्रारूप

230
00:16:01,360 --> 00:16:05,440
बना लिया। अपराध बना करके उसको आप कह रहे हैं तो यह आपका

231
00:16:05,440 --> 00:16:09,440
असत्य भाषण होगा। इससे अपराध घोषित होगा। इसलिए

232
00:16:09,440 --> 00:16:13,440
जब तक पूरी बात प्रत्यक्षीकरण ना हो जाए। कौन सा आप प्रत्यक्ष दे दोगे?

233
00:16:13,440 --> 00:16:17,440
कौन सी गवाही दिलाओगे आप? जी। गवाही देने वाला झूठ बोल दे। यही

234
00:16:17,440 --> 00:16:21,600
तो गुरु जी मैं भी कहता हूं कि जब आपके पास ठोस प्रमाण नहीं है तो

235
00:16:21,600 --> 00:16:26,400
इस तरह से गंभीर विषयों को ऐसे सार्वजनिक तौर पर उछालना

236
00:16:26,400 --> 00:16:30,480
तो ये शोभ फिर कोई बात कहीं हो रही होगी। वो जाने दूसरा

237
00:16:30,480 --> 00:16:34,480
जाने। जी आप कौन जानने वाले हैं? जी जी आप कौन सी बात आप कौन

238
00:16:34,480 --> 00:16:38,480
सा व्यक्ति दूध का धोया हुआ है? आप कौन दूध के धोए हैं क्या जो आप

239
00:16:38,480 --> 00:16:42,480
इस प्रकार की बात कर नहीं नहीं गुरुदेव इनका कहना है कि यह निग्रह करने आए हैं

240
00:16:42,480 --> 00:16:46,480
सब आपको कौन अधिकार दिया ये कह रहे हैं कि हमको जो है देवताओं ने अधिकार

241
00:16:46,480 --> 00:16:51,040
दिया नहीं कौन अधिकार आपको दिया उन देवताओं से आप गवाही दिलाइए

242
00:16:51,040 --> 00:16:55,360
वे देवता के प्रत्यक्षीकरण करें कि हां हम कहते हैं कि भाई ये

243
00:16:55,360 --> 00:16:55,860
निग्रह

244
00:16:55,840 --> 00:17:00,160
करने आए हैं। मगर गुरुदेव अगर आ भी जाएंगे तब भी जो हमारी परंपरा

245
00:17:00,160 --> 00:17:04,160
प्राप्त गति है यदि वह सहमत नहीं होगी तो बुद्ध को भी तो नहीं स्वीकारा हमने

246
00:17:04,160 --> 00:17:08,560
स्वीकार किया गया तो अगर कोई देवता रूप में आके कह भी देगा कि इनकी बात मानो शंकराचार्य

247
00:17:08,560 --> 00:17:12,720
के विपरीत हो के उस समय तो ऐसा हुआ कि परीक्षित के शरीर शांत

248
00:17:12,720 --> 00:17:17,040
होने पर जन्मेज ने सब यज्ञ किया विषाक्तता आ गई पूरे देश में

249
00:17:17,040 --> 00:17:21,040
तो लोग अधड़ पर चलने लग गए जी जब विषाक्तता आई मस्तिष्क

250
00:17:21,040 --> 00:17:25,120
की विकृति आई ब्रेन हेमरेज हुआ तो लोग गड़बड़ हो गए उसी को

251
00:17:25,120 --> 00:17:29,200
सुधारने की दृष्टि से जी अब गड़बड़ काम करने लगे सुधारने की दृष्टि

252
00:17:29,200 --> 00:17:33,280
से भगवान प्रकट हो के उन्होंने कहा वेद प्रमाण नहीं है उस समय उन्होंने

253
00:17:33,280 --> 00:17:37,280
कह दिया वैद की हिंसा वेद में हिंसा लिखी है आप एक बात

254
00:17:37,280 --> 00:17:41,360
मान रहे हैं और हिंसा किसकी करनी चाहिए कब करनी इसको नहीं मान रहे जी फल

255
00:17:41,360 --> 00:17:45,520
कौन देगा जी हमारे महाराष्ट्र धर्म सम्राट गुरुदेव ये कहा

256
00:17:45,520 --> 00:17:49,920
करते थे पूरी पीठाधीश्वर महाराज से बात कहा करते हैं कि फल चौरे

257
00:17:49,920 --> 00:17:54,080
नहीं है हमारे यहां फल कौन देगा अगर आप भगवान बदलेंगे

258
00:17:54,080 --> 00:17:58,320
सिद्धांत बदलेंगे भगवान भगवान बदलेंगे तो फल देने वाला फल

259
00:17:58,320 --> 00:18:02,320
हमसे चाहते हैं सनातन धर्म से और भगवान बदलना चाहते हैं सिद्धांत

260
00:18:02,320 --> 00:18:06,560
बदलना चाहते हैं फल कौन देगा दोद मिलकर चार होता

261
00:18:06,560 --> 00:18:10,840
है दोद मिलकर पांच आपको कहना है तो गणित के सिद्धांत को बदलना

262
00:18:10,840 --> 00:18:15,440
पड़ेगा और बदलने के लिए गणित दूसरी लानी पड़ेगी जी

263
00:18:15,440 --> 00:18:19,760
उसके बताने वाले को लाना पड़ेगा बहुत से प्रचारकों ने इसी तरह किया

264
00:18:19,760 --> 00:18:23,760
स्वामी मान्य दयानंद स्वामी जी ने इसीलिए अपने अपने सिद्धांत

265
00:18:23,760 --> 00:18:27,760
को बदला पुनर्जन्म नहीं माना माना सब नहीं माना अलग से भगवान

266
00:18:27,760 --> 00:18:31,760
नहीं माना भगवान से काम चलाई ईसाइयों ने अलग भगवान

267
00:18:31,760 --> 00:18:36,000
माना अपना सिद्धांत अपना पक्ष रखा ईसाइयों ने अलग

268
00:18:36,000 --> 00:18:40,000
सिद्धांत माना मुसलमानों ने अलग सिद्धांत सिद्धांत माना अबस्थियों ने

269
00:18:40,000 --> 00:18:44,000
अलग सिद्धांत माना फिलिस्तियों ने अलग सिद्धांत माना तो अपने अलग-अलग भगवान

270
00:18:44,000 --> 00:18:48,160
बदलने पड़े क्योंकि फल कौन देगा हमारे भगवान फल देंगे नहीं

271
00:18:48,160 --> 00:18:52,640
सनातन धर्म से फल देने वाला है नहीं इसलिए मैं ग्रहचार्य

272
00:18:52,640 --> 00:18:56,640
हो या जो भी हो भगवत भगवत भागवत आनंद को कायदे

273
00:18:56,640 --> 00:19:00,640
से रहने की आवश्यकता है। संयम बरतने की आवश्यकता है। इस प्रकार

274
00:19:00,640 --> 00:19:04,640
के उपटपटांग की बातें करने की कोई आवश्यकता नहीं। और करना है तो

275
00:19:04,640 --> 00:19:09,120
आप सामने प्रत्यक्ष जाकर के कहिए। साहस दिखाइए। साहस दिखाइए। हां। आप

276
00:19:09,120 --> 00:19:13,120
सामने मिलिए। जिस तरह से कहने के लिए निंदा मानी जाएगी और निंदा

277
00:19:13,120 --> 00:19:17,200
सबसे बड़ा धर्म है। जी। और गोस्वामी जी ने क्या हमारे

278
00:19:17,200 --> 00:19:21,360
भविष्य पुराण में भी कहा कि कोई निंदा करने वाला चमगादड़ का जन्म

279
00:19:21,360 --> 00:19:24,160
लेता।

280
00:19:24,160 --> 00:19:28,240
सब क निंदा जे जड़ कर ते चमगादड़ हो अवतरह

281
00:19:28,240 --> 00:19:32,320
ही गोस्वामी जी की पंक्ति क्यों निंदा करते हो आप आप जब जानते

282
00:19:32,320 --> 00:19:36,320
नहीं आप आपका प्रत्यक्ष बोध नहीं है आप अनुमान

283
00:19:36,320 --> 00:19:40,320
के आधार पर और किसी के कोई आप पुरुष आपको नहीं बता रहा है

284
00:19:40,320 --> 00:19:44,480
जो शब्द प्रमाण मानेंगे आप जी जी यही मैं भी कहता हूं हां कोई आप पुरुष

285
00:19:44,480 --> 00:19:48,720
कह रहा हो तो शब्द प्रमाण माना जाएगा इधर-उधर के लोग जिनको जिनका स्वार्थ

286
00:19:48,720 --> 00:19:53,040
नहीं सिद्ध हो रहा है वो कुछ बात कह रहे हैं जी और बड़ों

287
00:19:53,040 --> 00:19:57,200
यह बात तो यही तो हुआ ना वो भगवान सदाशिव

288
00:19:57,200 --> 00:20:01,440
माता भगवती पार्वती जगदंबा राजश्री गोद में लेकर के बैठे

289
00:20:01,440 --> 00:20:05,600
ऋषियों को उपदेश दे रहे थे जी उस चित्रकेतु राजा

290
00:20:05,600 --> 00:20:09,680
ने भली बुरी बात कही स्थापित हुआ

291
00:20:09,680 --> 00:20:14,000
जी वही तो जाकर के बाद में वृतासुर हुआ जी तो ऐसी

292
00:20:14,000 --> 00:20:18,080
स्थिति में जब तक आपको प्रत्यक्ष भी प्रमाण नहीं है और

293
00:20:18,080 --> 00:20:22,080
शब्द प्रमाण भी जब तक आप पुरुषों के द्वारा ना प्रकट हो तब अब तक

294
00:20:22,080 --> 00:20:26,160
वो भी प्रमाण नहीं है। अनुमान प्रमाण कहां से सिद्ध करोगे आप?

295
00:20:26,160 --> 00:20:30,240
लिंगस पास अनुमान अनुमान पर्वत पर धुआ देख के अग्नि

296
00:20:30,240 --> 00:20:34,480
का अनुमान कहां से लगाओगे आप? इसलिए बहुत सी बातों को संजय पूर्वक

297
00:20:34,480 --> 00:20:38,800
आप अपना तप करो, स्वाध्याय करो, भजन करो। हम आपको उपदेश

298
00:20:38,800 --> 00:20:39,300
नहीं कर

299
00:20:39,200 --> 00:20:43,520
रहे हैं। आपको राय दे रहे हैं। हम आपसे तो बातें

300
00:20:43,520 --> 00:20:47,600
नहीं कर रहे हैं। बहुत दिनों से कोई मतलब नहीं रखते। इसलिए नहीं रखते कि आप

301
00:20:47,600 --> 00:20:51,680
अनर्ग प्राप्त कर जाते हो। जी। कोई आपकी दृष्टि में खड़ा है ही नहीं

302
00:20:51,680 --> 00:20:55,760
है। आप ही दूध के धोए हुए हो। आप ही भूगर्भ से पैदा हुए

303
00:20:55,760 --> 00:20:59,920
हो। आप ही अपने मन से मठासी बने हुए हो। जी। कौन

304
00:20:59,920 --> 00:21:04,080
आपको कह रहा है कि आप प्रमाणित करिए किसी को? आपसे सर्टिफिकेट कोई मांग

305
00:21:04,080 --> 00:21:08,960
रहा है क्या? जी। बहुत सी चीजें कलयुग है। इसमें ना वर्ण व्यवस्थित

306
00:21:08,960 --> 00:21:13,440
है श्रमता तो वरना आश्रम धन की रक्षा करो। जी गौ कट रही 80,000

307
00:21:13,440 --> 00:21:17,760
उसकी रक्षा करो। जी देश में जी गोपी विप्रेष

308
00:21:17,760 --> 00:21:22,080
वेद सती भी सत्यवाद दान शीले सप्त विरा

309
00:21:22,080 --> 00:21:26,160
इन सातों की रक्षा करो आप अगर बल सामर्थ्य है आप में भगवान ने

310
00:21:26,160 --> 00:21:30,240
आपको भेजा है तो वो दम दिखाओ आप जी अब वेदम वाली

311
00:21:30,240 --> 00:21:34,240
बात क्यों करते हो आपकी बातों में कौन सा दम है जब तक कि कोई

312
00:21:34,240 --> 00:21:38,320
प्रमाण नहीं इसलिए इन बातों को अनर्गन माना जाए और कोई इनसे कोई

313
00:21:38,320 --> 00:21:42,320
बातचीत करने की बहुत आवश्यकता नहीं क्योंकि ऐसे ही भक्त रहते हैं तो

314
00:21:42,320 --> 00:21:46,320
इसका अर्थ तो यह तो स्पष्ट है कि आपने ऐसा कुछ नहीं कहा है।

315
00:21:46,320 --> 00:21:51,720
जो बातें बना रहे हैं। कोई बात ही नहीं है। हमारी कोई नहीं। अच्छा आचार्य श्री जो यह

316
00:21:51,720 --> 00:21:54,400
जो बात है ये मैंने भी अपनी शैली

317
00:21:54,400 --> 00:21:58,480
में उन भगवत के समक्ष रखने का प्रयास किया है

318
00:21:58,480 --> 00:22:02,720
कि भाई आप केवल अनुमान हो गया किसी बात का तो उसको

319
00:22:02,720 --> 00:22:07,040
लेकर के किसी की जो प्रतिष्ठा है उस पर उंगली नहीं उठा सकते। आपके

320
00:22:07,040 --> 00:22:11,040
सामने प्रत्यक्ष प्रमाण आपको चाहिए होंगे। ठोस प्रमाण और जैसे आपने बताया

321
00:22:11,040 --> 00:22:15,120
कि अगर शब्द प्रमाण चलेगा तो किसका चलेगा अन्यथा आपके पास कौन से वो

322
00:22:15,120 --> 00:22:19,280
प्रत्यक्ष प्रमाण होंगे ये भी आपने बताया केवल अनुमान कहीं से

323
00:22:19,280 --> 00:22:23,360
कुछ किसी की वही कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा भानुमती का कुबा जोड़ा वाली बात

324
00:22:23,360 --> 00:22:27,360
वो उसके आधार पे हम युद्ध स्तर पर नहीं जा सकते ये बात

325
00:22:27,360 --> 00:22:31,440
हमने भी बताने की कोशिश की हमने कहा कि अकाट्य प्रमाण आपके

326
00:22:31,440 --> 00:22:35,440
होने चाहिए अगर आप किसी ऐसे व्यक्ति के ऊपर लांछन लगा रहे

327
00:22:35,440 --> 00:22:39,760
हैं जो स्वयं जगुरु शंकराचार्य जी भगवान की उसमें है। अच्छा

328
00:22:39,760 --> 00:22:43,760
इसमें एक चीज यह आती है क्या जैसे कि अभी जब आरोप लग ही

329
00:22:43,760 --> 00:22:48,000
गया है वहां की व्यवस्था में तो क्या आप जैसे वहां

330
00:22:48,000 --> 00:22:52,000
जाते हैं आते हैं क्या इस तरह का के कोई आपको अनुभव जो

331
00:22:52,000 --> 00:22:56,080
ऐसा वहां पर जैसे अब इन्होंने आरोप तो लगाया है आपने नहीं कहा बात अलग है

332
00:22:56,080 --> 00:23:00,240
मगर आरोप तो इन्होंने लगाया है तो क्या आपको इस तरह का वहां

333
00:23:00,240 --> 00:23:04,480
पर अनुभव कोई वहां महसूस होता है कि इस तरह का ऐसा

334
00:23:04,480 --> 00:23:08,480
है कि पहले वाले वीडियो से जी स्वामी

335
00:23:08,480 --> 00:23:09,600
जी को अरुचि हो

336
00:23:09,600 --> 00:23:13,760
गई। जी जी तो हमने निकटता बंद कर दी।

337
00:23:13,760 --> 00:23:17,760
अच्छा जब इन्होंने ये बोल दिया जब इन्होंने बोल दिया केवल

338
00:23:17,760 --> 00:23:21,920
महाराज श्री का दर्शन वही मूल्यवान मानते हैं। अच्छा

339
00:23:21,920 --> 00:23:26,000
अन्य लोगों से कोई बात नहीं करते। क्योंकि इन्होंने इधर आपके

340
00:23:26,000 --> 00:23:30,000
बारे में ऐसा प्रसारण कर दिया तो वहां से एक दूरी बन गई। दूरी

341
00:23:30,000 --> 00:23:34,000
बन गई। तो इसलिए हम उन गतिविधियों में बिल्कुल नहीं जाते।

342
00:23:34,000 --> 00:23:38,160
मगर जब आप जा रहे थे जब तक इन्होंने नहीं बोला था। आप जैसे खुद उसमें मठ

343
00:23:38,160 --> 00:23:42,240
में जा रहे हो जब तो आपने देखा होगा कि कैसी गतिविधियां है क्या है

344
00:23:42,240 --> 00:23:46,320
तो वो क्या संदिग्ध लगती थी आपको या क्या था अच्छा लोग आ

345
00:23:46,320 --> 00:23:50,320
रहे हैं जा रहे हैं हमारे आश्रम में भी माताएं आ रही हैं लड़कियां आ रही

346
00:23:50,320 --> 00:23:54,400
हैं पुरुष आ रहे हैं जी तमाम प्रकार के लोग मठों में आते जाते हैं जी तो

347
00:23:54,400 --> 00:23:58,480
उसको आने जाने की दृष्टि को लेकर के और खराब दृष्टि

348
00:23:58,480 --> 00:24:02,800
से देख लेना जी लोगों की अपनीपनी नियत है जी हमारा

349
00:24:02,800 --> 00:24:06,880
उसमें कुछ लेनदेन नहीं मतलब आपकी जानकारी में ऐसा कुछ नहीं है हम भी मठ

350
00:24:06,880 --> 00:24:11,360
चलाते हमारे यहां सब आते जाते हैं। जी तो तो इसलिए हम नकारात्मक

351
00:24:11,360 --> 00:24:15,440
सोच नहीं रखते। सकारात्मक सोच रखते। मतलब

352
00:24:15,440 --> 00:24:19,520
आपकी जानकारी में मठ में ऐसा कुछ नहीं है। आपकी जानकारी में नहीं है। ये

353
00:24:19,520 --> 00:24:23,600
आप कह रहे जब आप नजदीकी थी। अभी तो खैर उनके वक्तव्य के

354
00:24:23,600 --> 00:24:24,880
कारण एक जो भीनी

355
00:24:24,880 --> 00:24:28,880
भी सी एक दूरी होती है वो आ गई है। तो यह भी

356
00:24:28,880 --> 00:24:32,960
भगवतानंद का ही फैलाया हुआ

357
00:24:32,960 --> 00:24:37,440
कुचक्र है कि आचार्य श्री के संबंध भी जो

358
00:24:37,440 --> 00:24:41,520
वहां से थोड़ा सा ऐसे हो गए। फिर भी क्योंकि आचार्य श्री

359
00:24:41,520 --> 00:24:45,600
की जो महानता है उसको कोई नकार नहीं सकता है तो उस पर कोई

360
00:24:45,600 --> 00:24:49,760
प्रश्न नहीं कर सकता तो इसलिए आज भी ये स्वतंत्र रूप से वहां जा

361
00:24:49,760 --> 00:24:53,760
सकते हैं आ सकते हैं इनको कोई रोक रोकने वाला नहीं है जाते हैं महाराज

362
00:24:53,760 --> 00:24:58,000
के साथ उनके मंच पर मंच पे मंच पर भी बैठते हैं वहां उनको

363
00:24:58,000 --> 00:25:02,000
कोई नहीं रोकता है जगन्नाथ पुरी भी जाते हैं जी और जो

364
00:25:02,000 --> 00:25:06,400
सुविधाएं कमरा मिल जाता रहा महाराज श्री का जो लाड प्यार है मिलता है आशीर्वाद

365
00:25:06,400 --> 00:25:10,560
मिलता है जी और फलाहारकि हम करते हैं तो हमारे फलाहार

366
00:25:10,560 --> 00:25:14,560
पर महाराज जी की पूरी दृष्टि मिल रहा है कि नहीं मिल रहा है व्यवस्था है

367
00:25:14,560 --> 00:25:18,720
कि नहीं है लोगों को कहते भी रहते हैं अच्छा इसमें एक बात

368
00:25:18,720 --> 00:25:22,880
आती है ऐसे मतलब हम जब सोच के देखें कि यदि वो कुछ

369
00:25:22,880 --> 00:25:27,360
खाने में मिलाकर के दे रहे हैं उनको जगुरु शंकराचार्य

370
00:25:27,360 --> 00:25:31,360
भगवान को और पहली बात तो यही अपने आप में एक बहुत बड़ा विषय है कि

371
00:25:31,360 --> 00:25:35,520
ऐसा कौन सा पदार्थ है जो उनके अनुगत रहने वाले तैयार

372
00:25:35,520 --> 00:25:39,600
कर पा रहे हैं और वह प्रभावशाली सिद्ध हो रहा जगुरु शंकराचार्य

373
00:25:39,600 --> 00:25:40,100
पर

374
00:25:39,920 --> 00:25:44,000
मगर दूसरी बात एक यह है कि यदि वह खाने में मिलाकर दे रहे हैं और उनको

375
00:25:44,000 --> 00:25:48,320
पता चल गया जैसे कि उनको ये संदेश पहुंचाया गया ये भगवतानंद

376
00:25:48,320 --> 00:25:52,320
जैसों के द्वारा कि शंकराचार्य जी को कुछ खाने में लाकर तो आप तो

377
00:25:52,320 --> 00:25:56,400
उनके शत्रु हो गए। तो इस हिसाब से यदि इस पूरी के शंकराचार्य जी

378
00:25:56,400 --> 00:26:00,400
उनके बस वश में हैं क्योंकि वह खाने में लाकर के रोज दे रहे हैं तो उनको तो

379
00:26:00,400 --> 00:26:04,480
वहां पर फिर आपको बिल्कुल यदि वो इस इस तरह का कुछ है तो आप तो बिल्कुल भी वहां

380
00:26:04,480 --> 00:26:08,640
पर आना जाना आपका रोक दिया जाता है। कैसे हम माने कि मिला करके

381
00:26:08,640 --> 00:26:12,800
दे रहे हैं। महाराज श्री का जब प्रसाद आता है तो पूछ लेते हैं शुक्ल

382
00:26:12,800 --> 00:26:16,880
जी को पनीर गई कि नहीं महाराज जी को पनीर मिलती है और वही पनीर हमको

383
00:26:16,880 --> 00:26:21,280
भेजी जाती है जी महाराज श्री के द्वारा जी सायंकाल दैनिक

384
00:26:21,280 --> 00:26:25,280
का नियम इस इस बार ऐसा हुआ पनीर दी

385
00:26:25,280 --> 00:26:29,360
जाती थी जी कि फलाहार में हमको पनीर दिया करो जी तो आती थी तो

386
00:26:29,360 --> 00:26:33,360
अगर मिलाई गई तो तो हमारे में आप भी वशीकरण में हो जाते हैं हां

387
00:26:33,360 --> 00:26:37,440
हम भी मिलाई जाती जो भोजन गुरुदेव महाराज को जाता है

388
00:26:37,440 --> 00:26:41,680
वही भोजन अगर आचार्य श्री वहां पर है तो इनको भी जाता है भोजन नहीं आता

389
00:26:41,680 --> 00:26:45,840
जो भी जो भी प्रसाद है जो भी जो भी प्रसाद ग्रहण कर किया

390
00:26:45,840 --> 00:26:50,000
जा रहा है तो उसमें जो महाराज श्री को जा रहा है और उस उसमें से जो महाराज

391
00:26:50,000 --> 00:26:54,080
श्री आप ग्रहण कर सकते हैं तो वो आपको आता है तो पहली बात तो ये

392
00:26:54,080 --> 00:26:55,120
दूसरी बात यह है कि एक

393
00:26:55,120 --> 00:26:59,760
सोचने वाली बात है कि अगर ऐसा वशीकरण वाला प्रसाद में मिलाकर

394
00:26:59,760 --> 00:27:04,320
दिया ही जा रहा है जो अपने आप में एक बहुत बड़ा जांच का विषय है

395
00:27:04,320 --> 00:27:08,640
कि अनुगत रहने वाले अब ऐसी चीज ऐसी चीजें कर पा रहे हैं जो जिसके

396
00:27:08,640 --> 00:27:13,040
अनुगत है उसको प्रभाव डाल पाए। हम और दूसरी बात यह भी है कि

397
00:27:13,040 --> 00:27:17,120
यदि ऐसा कर रहे हैं और जब उनको पता चल गया कि उनको ऐसा लग गया

398
00:27:17,120 --> 00:27:21,120
मान लीजिए कि आचार्य श्री ने किसी को यह कहा है कि भोजन में बुला के कुछ दिया जा

399
00:27:21,120 --> 00:27:25,680
रहा है तो आचार्य श्री कैसे वहां पर आ जा पा रहे हैं और और गुरुदेव

400
00:27:25,680 --> 00:27:29,760
जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान की कृपा प्राप्त कर पा रहे हैं। ये भी एक बात है। उनके

401
00:27:29,760 --> 00:27:34,000
द्वारा प्रसाद उनके द्वारा जो है प्रसाद का वही वही

402
00:27:34,000 --> 00:27:38,480
पनीर हमको भी वही उनका पूरी दृष्टि रहती है जगदुरु शंकराचार्य

403
00:27:38,480 --> 00:27:42,560
भगवान की कि इनके पास कौन से वो भोज्य पदार्थ पहुंच

404
00:27:42,560 --> 00:27:47,240
रहे हैं कि नहीं पहुंच रहे हैं यथोचित रूप से तो

405
00:27:47,240 --> 00:27:51,280
यदि जो परिकर हैं वो गलत कर रहे हैं वो उनको वश में कर

406
00:27:51,280 --> 00:27:55,280
रहे हैं तो गुरुदेव भगवान की ये जो कृपा दृष्टि हो रही

407
00:27:55,280 --> 00:27:59,520
है आचार्य श्री के लिए उसको क्यों नहीं परिवर्तित कर रहे हैं वो नहीं यदि महाराज

408
00:27:59,520 --> 00:28:03,520
श्री को दिया जा रहा है तो अगर हमारे प्रति अरुचि है वहां

409
00:28:03,520 --> 00:28:07,600
के परिक्रमों की तो हमको भी कुछ मिला के दिया जा सकता लेकिन ऐसा नहीं

410
00:28:07,600 --> 00:28:10,480
होता बिल्कुल तो ये भी एक बात क्लियर हुई

411
00:28:10,480 --> 00:28:14,480
अच्छा आचार्य श्री एक बात आई कि जैसे आपने

412
00:28:14,480 --> 00:28:18,560
अभी एक पक्ष रखा था कि ये व्यक्ति जो है भगवतानंद ये शास्त्र के पक्ष

413
00:28:18,560 --> 00:28:22,640
पक्ष को रखता है। साथ ही साथ शास्त्र के पक्ष को रखने की आड़ में यह

414
00:28:22,640 --> 00:28:26,720
जो है उपहास या फिर निंदा परख

415
00:28:26,720 --> 00:28:31,280
फतियां कसता है। जैसे एक पंक्त पंक्ति मैंने कसी कहीं पे किसी

416
00:28:31,280 --> 00:28:34,360
संदर्भ में कह रहा है

417
00:28:34,360 --> 00:28:38,640
कि अह अगर वह इतना ही है तो जब

418
00:28:38,640 --> 00:28:42,880
नकली शंकराचार्य घुमाया जाता है तो फिर तुम्हारे भूतों

419
00:28:42,880 --> 00:28:47,040
में क्यों पता नहीं चिंगारी होती है। जो स्वयं को आचार्य कह रहा है क्या उसके

420
00:28:47,040 --> 00:28:51,280
मुख से गाली जैसे अश्लील भाषाएं शब्द ये सब निर्गत होते हैं।

421
00:28:51,280 --> 00:28:55,440
ठीक है जो स्वयं को आचार्य कहे। शब्द दोष भी

422
00:28:55,440 --> 00:28:59,800
बहुत बड़े अपराध माने गए हैं। जी मुख से निकले हुए शब्द

423
00:28:59,800 --> 00:29:03,840
भी वैचारिक अपराध माने जाते हैं। अच्छा

424
00:29:03,840 --> 00:29:08,080
शारीरिक अपराध जैसे वैचारिक अपराध, मानसिक अपराध तो पहली

425
00:29:08,080 --> 00:29:12,080
बात तो कोई भी अपराध पहले मनोवैज्ञानिक बनता है। जी फिर कहीं

426
00:29:12,080 --> 00:29:16,640
वैचारिक बनता है फिर शारीरिक बनता है। हम तो इसका मतलब है कि मनोवैज्ञानिक

427
00:29:16,640 --> 00:29:20,880
अपराध ज्यादा हो रहा है तभी वैचारिक उतर रहा है। जी फिर वैचारिक

428
00:29:20,880 --> 00:29:25,040
उतर के शारीरिक कह नहीं पा रहा है। लेकिन शरीर से उसको

429
00:29:25,040 --> 00:29:25,680
प्रदर्शन

430
00:29:25,680 --> 00:29:29,920
कर रहा है। हम गाली इत्याद देना जी यह शोभा

431
00:29:29,920 --> 00:29:34,000
थोड़ी देता है। यह बहुत अच्छी बात नहीं है। मतलब आचार्य के लिए आचार्य के लक्षणों में

432
00:29:34,000 --> 00:29:38,680
तो ये नहीं आ सकता है कि वो आचार्य का मतलब इतना है आचिनोजम

433
00:29:38,680 --> 00:29:42,880
शास्त्रम वेद मध्यापजा स्वयं आचार

434
00:29:42,880 --> 00:29:46,880
जस्मात तम आचार्य विदो विदु वही आचार्य

435
00:29:46,880 --> 00:29:51,120
वेदों के सिद्धांतों को निकाल कर लंबे लबा लोगों को बताए सदाचार

436
00:29:51,120 --> 00:29:55,360
का पालन कराए अनाचार को बताने से

437
00:29:55,360 --> 00:29:59,760
अच्छा है कि सदाचार बतावे सदाचार का बल बढ़ जाएगा तो अनाचार

438
00:29:59,760 --> 00:30:03,760
कम हो जाए वो सीधी बात तो जो आचरण ऐसा आचरण करें

439
00:30:03,760 --> 00:30:08,000
वही आचरण स्थापित आप अगर बता ही रहे तो यति धर्म का व्याख्यान करो

440
00:30:08,000 --> 00:30:12,000
जी ये सन्यास का धर्म है जी जी ये अनंत दंड है ये अमुक दंड

441
00:30:12,000 --> 00:30:16,080
है ये अमुक दंड है ये संध्या है यतियों के संबंध में आप उसको

442
00:30:16,080 --> 00:30:20,640
बताओ उसकी थ्योरी तैयार करो जी तब प्रैक्टिकल हो हम

443
00:30:20,640 --> 00:30:25,120
अब आप कहीं बात कहीं की सुनी कहीं की बात कही जी जी अनावश्यक

444
00:30:25,120 --> 00:30:29,200
समय अपना बर्बाद करते हो दूसरे का भी बर्बाद करते हो लोग उसको

445
00:30:29,200 --> 00:30:33,360
देखते हैं लोगों के मन में असदभावनाएं व्यक्त

446
00:30:33,360 --> 00:30:37,600
करते हो। इसलिए अनावश्यक अपना समय मत गवाइए। अपना स्वाद

447
00:30:37,600 --> 00:30:40,800
फिर आप कहते हो हम जंगल में तपस्या करने जाते हैं। लोगों ने हमसे बताया

448
00:30:40,800 --> 00:30:44,880
कि अबकी वीडियो में आया वहां जा रहे हैं तो कौन तपस्या आप करते हो? कहां

449
00:30:44,880 --> 00:30:48,880
जा रहे हैं? जंगलों में जी जी तपस्या करने कौन तपस्या

450
00:30:48,880 --> 00:30:52,960
कर रहे हो? यही आपके पास केवल धंधा रह गया। जी

451
00:30:52,960 --> 00:30:56,960
इन लोगों को महाराष्ट्र के परिक्रमों को महाराज

452
00:30:56,960 --> 00:31:00,960
के ऊपर अन्य लोगों के ऊपर अन्य साधुओं संतों के ऊपर सबके निकाल निकाल कर

453
00:31:00,960 --> 00:31:05,040
उगाते हैं। कहां से उसमें नेगेटिव पावर है उसको आप पकड़ पकड़ के

454
00:31:05,040 --> 00:31:09,040
ऊपर उछ रहे हो। नेगेटिव पावर तो मुख में जो रसगुल्ला का

455
00:31:09,040 --> 00:31:13,360
स्वाद लेता है वही जीवा बर्चे का भी स्वाद लेती।

456
00:31:13,360 --> 00:31:17,760
नेगेटिव बातें कहना उचित नहीं।

457
00:31:17,760 --> 00:31:21,920
जी और फिर अब प्रामाणिक भी है बहुत सी बातें

458
00:31:21,920 --> 00:31:26,400
तो आप प्रामाणिक है जी अच्छा कहने के लिए तो आप कुछ भी कह सकते हो

459
00:31:26,400 --> 00:31:30,480
जी अब कोई आदमी मानहानि का दावा करे बात

460
00:31:30,480 --> 00:31:34,560
अलग है आपके ऊपर कोई आक्षेप लगा के दावा करे अलग बात है

461
00:31:34,560 --> 00:31:38,560
लेकिन लोग समझते हैं कि छचुरी पटाखा समझ के आपकी बात को कोई ध्यान

462
00:31:38,560 --> 00:31:42,640
नहीं देता क्या छचुरी क्या छिछ पका समझ

463
00:31:42,640 --> 00:31:46,640
के कोई ध्यान छिछड़ी छचुरी पटाका समझ के कोई आपकी बातों

464
00:31:46,640 --> 00:31:51,120
का ध्यान नहीं देता। हां। नहीं तो तमाम लोग का कमजोर बच्चे थोड़े हैं आप

465
00:31:51,120 --> 00:31:55,120
आपसे। हां। है जी। आप सबको कमजोर माने बैठे

466
00:31:55,120 --> 00:31:56,560
हो। जी।

467
00:31:56,560 --> 00:32:00,880
हां। चिचचई पराका के कारण नहीं देता। तो बस वही है कि हाथी जा रही कुत्ते भूक

468
00:32:00,880 --> 00:32:04,880
रहे हैं। जी तो हाथी कुत्तों का ध्यान नहीं देते। जी जी। अब

469
00:32:04,880 --> 00:32:09,040
इससे बड़ा क्या हो सकता? तो बहुत अनुग्रह प्राप्त

470
00:32:09,040 --> 00:32:13,160
हुआ आचार्य श्री का। और एक बात क्लियर हो गई कि आचार्य श्री

471
00:32:13,160 --> 00:32:17,480
ने ऐसी कोई बात भगवतानंद से नहीं कही है

472
00:32:17,480 --> 00:32:21,840
कि गुरुदेव भगवान को ऐसा कुछ मिलाकर के खिलाया जा रहा है। दूसरा

473
00:32:21,840 --> 00:32:26,240
इन्होंने प्रकाश डाला एक तथ्य पर कि

474
00:32:26,240 --> 00:32:30,480
इन्होंने ऐसा इनकी जानकारी में ऐसा कुछ नहीं है कि वहां पर ऐसा कुछ वातावरण

475
00:32:30,480 --> 00:32:34,880
हो। वो बात और है कि भगवतानंद के ऐसा बयान दे देने के कारण ही

476
00:32:34,880 --> 00:32:39,120
आचार्य श्री की आज जो उनके परिकरों से है उनसे एक भीनी सी दूरी

477
00:32:39,120 --> 00:32:43,120
हो गई है। इसके बावजूद भी इनको यथोचित वहां पर आदर

478
00:32:43,120 --> 00:32:47,280
सत्कार प्राप्त होता है क्योंकि ये गुरुदेव भगवान के प्रिय हैं।

479
00:32:47,280 --> 00:32:51,440
ठीक है? दूसरी बात और इसमें फिर यहां पर एक तर्क जो आचार्य श्री ने भी उठाया। दो

480
00:32:51,440 --> 00:32:55,440
तर्क उठे यहां से कि यदि जगुरु शंकराचार्य भगवान को कोई

481
00:32:55,440 --> 00:32:59,520
वशीकरण वाला पदार्थ दिया जा रहा है तो फिर जब परिकरों

482
00:32:59,520 --> 00:33:04,000
को मालूम है कि ये आचार्य श्री इनके उनके परिकों के बारे में कुछ ऐसा विरोधाभासी

483
00:33:04,000 --> 00:33:08,320
वक्तव्य दे चुके हैं तो फिर उन्हें सबसे पहले गुरुदेव भगवान

484
00:33:08,320 --> 00:33:11,680
के जो गुरुदेव भगवान की जो कृपा दृष्टि इनको

485
00:33:11,680 --> 00:33:15,760
जगतगुरु भगवान की जो कृपा दृष्टि इनको प्राप्त हो रही है उसमें बाधा डालनी

486
00:33:15,760 --> 00:33:19,760
चाहिए थी और दूसरा तर्क यह भी प्राप्त हो रहा है कि यदि जब

487
00:33:19,760 --> 00:33:24,080
ये वहां जाते हैं और इनको वही भोजन वो भोज्य पदार्थ मिलता है जो ये ग्रहण

488
00:33:24,080 --> 00:33:28,080
करते हैं वो आता वहीं से है जो गुरुदेव भगवान के लिए तैयार किया जाता

489
00:33:28,080 --> 00:33:32,400
है और यदि उसमें कुछ ऐसी ऐसा पदार्थ मिलाया जा रहा है तो फिर वही

490
00:33:32,400 --> 00:33:37,120
पदार्थ इनके पास भी आ रहा है तो फिर इन पर भी वशीकरण होना एक ये

491
00:33:37,120 --> 00:33:41,280
बात कही जा सकती है। एक और बात है कि वो पदार्थ है कौन सा

492
00:33:41,280 --> 00:33:45,280
ये तो अभी तक बताया ही नहीं गया। वो पदार्थ है कौन सा जो ये सब कर

493
00:33:45,280 --> 00:33:49,280
रहा है। इस पर कोई दृष्टि डाली नहीं गई। तो ये सब हमें जानकारियां प्राप्त

494
00:33:49,280 --> 00:33:53,280
हुई। इसके साथ ही साथ धर्म की कुछ गुण व्याख्या

495
00:33:53,280 --> 00:33:57,360
भी गुरुदेव ने अपने शैली में बताई जो कि काफी रोचक

496
00:33:57,360 --> 00:34:01,520
थी और सभी इस महत्वपूर्ण जानकारी को ज्यादा से ज्यादा शेयर

497
00:34:01,520 --> 00:34:06,080
करें क्योंकि लोगों को किसी प्रकार से संघर्ष

498
00:34:06,080 --> 00:34:10,240
करके हम कहीं के लिए धार्मिक वो भी मनुवाद के

499
00:34:10,240 --> 00:34:14,400
सिद्धांतों के लिए आस्थावान बनाते हैं और इस प्रकार के कुप्रचार से ये

500
00:34:14,400 --> 00:34:18,480
जो भगवतानंद जैसा कि गुरुदेव ने कहा कि भगवतानंद अगर शास्त्र

501
00:34:18,480 --> 00:34:22,560
का पक्ष रखना है तो शास्त्र का पक्ष रखें मगर निंदा ना करें।

502
00:34:22,560 --> 00:34:26,560
उन्होंने कहा यदि तुम्हें सवाल आ रहा है तो सभा में जाकर के तुम सवाल कर सकते हो। यही सब

503
00:34:26,560 --> 00:34:27,060
चीजें

504
00:34:26,720 --> 00:34:30,880
हमने कही थी और तुम जिन जिन जिस आधार पर तुम जो आरोप लगा

505
00:34:30,880 --> 00:34:34,880
रहे हो वो आधार ही नहीं आरोप लगाने का

506
00:34:34,880 --> 00:34:39,120
बात करने का। जैसे कि उन्होंने कहा कि शब्द प्रमाण किसका होगा? कोई आप पुरुष होगा।

507
00:34:39,120 --> 00:34:43,360
उसका होगा। कोई विशेष प्रतिष्ठा रखता होगा समाज में। उसका शब्द प्रमाण माना

508
00:34:43,360 --> 00:34:47,600
जाएगा। या फिर तुम्हारे पास प्रत्यक्ष प्रमाण होने चाहिए। केवल अनुमान प्रमाण के आधार

509
00:34:47,600 --> 00:34:51,600
पर आप जाकर के वहां किसी प्रतिष्ठित प्रतिष्ठा

510
00:34:51,600 --> 00:34:55,680
प्राप्त व्यक्ति के ऊपर गुरुदेव भगवान के स्वयं के परिकरों के ऊपर

511
00:34:55,680 --> 00:34:59,680
आप जो है ऐसे नहीं उठा सकते। जबकि गुरुदेव भगवान स्वयं ने ये

512
00:34:59,680 --> 00:35:03,760
कहा है कि मेरे परिकर जो है स्वयं देवता स्वरूप है। तो

513
00:35:03,760 --> 00:35:07,760
यह सारी जानकारियां हमें प्राप्त हुई। गुरुदेव आपने हमें समय दिया।

514
00:35:07,760 --> 00:35:11,840
आपकी वाणी हमें प्राप्त हुई। आपको मैं प्रणाम करता हूं। हर हर

515
00:35:11,840 --> 00:35:15,840
महावीर हर जय श्री राम। [संगीत]
